🌅 कहानी 1 — एक ग़लत मोड़, दो गोलियाँ और एक करोड़ मौतें 28 जून 1914, साराजेवो। बोस्निया की इस छोटी-सी राजधानी में आज ऑस्ट्रिया-हंगरी के साम्राज्य का युवराज फ़्रांज़ फ़र्डिनेंड अपनी पत्नी के साथ खुली कार में घूमने आया है। सड़क के किनारे भीड़ में सात नौजवान छिपे हैं, जिनकी जेबों में बम और पिस्तौलें हैं। वे पड़ोसी देश सर्बिया से जुड़े एक गुप्त संगठन के सदस्य हैं और मानते हैं कि बोस्निया पर ऑस्ट्रिया का राज विदेशी क़ब्ज़ा है। सुबह पहला हमला विफल हो गया: एक युवक ने बम फेंका, पर वह कार से टकराकर पीछे गिरा और पीछे की गाड़ी के लोग घायल हुए। युवराज बच गया। बाक़ी हमलावर निराश होकर बिखर गए। उनमें से एक, उन्नीस साल का गैवरिलो प्रिंसिप, पास की एक खाने की दुकान के आगे जाकर खड़ा हो गया। दोपहर में युवराज ने तय किया कि वह घायलों को देखने अस्पताल जाएगा। रास्ता बदला गया, पर कार चलाने वाले को किसी ने बताया नहीं। वह एक ग़लत गली में मुड़ गया। किसी ने चिल्लाकर कहा — ग़लत रास्ता है, पीछे लो! चालक ने गाड़ी रोकी। वह ठीक उसी दुकान के सामने रुकी थी, प्रिंसिप से कुछ ही क़दम दूर। उसने पिस्तौल निकाली और दो गोलियाँ चलाईं। कुछ ही मिनटों में युवराज और उसकी पत्नी, दोनों मर चुके थे। अगर वह कार उस गली में न मुड़ी होती, तो शायद उस दिन कुछ न होता। पर यूरोप उस समय ऐसा था जैसे बारूद से भरा कमरा; चिंगारी कहीं से भी आ सकती थी। दो गोलियों ने पाँच सप्ताह में पूरे यूरोप को युद्ध में झोंक दिया — और चार वर्ष में लगभग एक करोड़ सैनिक मारे गए। उस युद्ध को "सभी युद्धों को समाप्त करने वाला युद्ध" कहा गया था। पर जो शांति-संधि हुई, उसी को देखकर फ्रांसीसी सेनापति मार्शल फ़ॉश ने कहा — "यह शांति नहीं, बीस वर्ष का युद्ध-विराम है।" ठीक बीस वर्ष बाद, 1 सितंबर 1939 को, दूसरा और कहीं अधिक भयानक विश्व युद्ध छिड़ गया। इन दो युद्धों ने साम्राज्य गिराए, नए देश बनाए, महिलाओं को मताधिकार दिलाया, दुनिया को परमाणु बम दिया — और भारत में उन्हीं युद्धों की आग ने स्वतंत्रता आंदोलन को निर्णायक मोड़ पर पहुँचाया। हाइफ़ा से केरेन तक राजस्थान के सैनिकों की वीरता भी इसी कहानी का हिस्सा है। |
🏠 कहानी 2 — शेखावाटी के एक बाप-बेटे, दो युद्ध (1914–1947) ध्यान रहे: इस कहानी के मुख्य पात्र और उनका गाँव काल्पनिक हैं, ताकि दोनों युद्ध एक आम भारतीय परिवार की नज़र से समझ आ सकें। कहानी में आई घटनाएँ, तिथियाँ, लड़ाइयाँ और बाक़ी सभी व्यक्ति असली हैं। भर्ती। 1914 में शेखावाटी के एक गाँव का नौजवान भँवर सिंह सेना में भर्ती हुआ। गाँव में ज़मीन कम थी और बारिश का भरोसा नहीं; सेना की तनख़्वाह पक्की थी। उसे यह नहीं पता था कि जिस राजा-महाराजाओं की लड़ाई के लिए उसे भेजा जा रहा है, वह कहाँ और क्यों हो रही है। कुछ ही महीनों में वह समुद्र पार फ्रांस के मोर्चे पर था। खाई। वहाँ उसने ऐसी लड़ाई देखी जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी। न घोड़े दौड़ते थे, न तलवारें चलती थीं। दोनों सेनाएँ ज़मीन में खोदी गई लंबी नालियों में बैठी थीं, घुटनों तक कीचड़ और बर्फ़ीले पानी में। बीच की ज़मीन पर कँटीले तार थे। जो भी सिर उठाता, मशीन से चलने वाली बंदूक़ उसे भून देती। एक दिन हवा के साथ पीले-हरे धुएँ का बादल आया, जिससे साँस घुटने लगी और आँखें जलने लगीं — वह ज़हरीली गैस थी। भँवर सिंह के गाँव के तीन साथी वहीं रह गए। बाद में उसे इराक़ के मोर्चे पर भेजा गया, जहाँ गर्मी और बीमारी ने गोलियों से अधिक जानें लीं। वापसी। 1919 में वह एक तमग़ा लेकर लौटा। गाँव बदल चुका था। पिछले साल की महामारी में उसकी पत्नी और गाँव के हर चौथे घर से कोई न कोई मर चुका था। अनाज और कपड़े के दाम दुगुने थे। ठिकानेदार ने "युद्ध के चंदे" के नाम पर नई वसूली शुरू कर रखी थी। उसने सुना था कि युद्ध के बाद अंग्रेज़ भारत को अपना राज देंगे। इसकी जगह ख़बर आई कि पंजाब के एक बाग़ में निहत्थी सभा पर गोलियाँ चलाई गईं, और ऐसा क़ानून बना है जिसमें बिना मुक़दमे किसी को भी जेल भेजा जा सकता है। भँवर सिंह ने अपना तमग़ा संदूक़ में बंद कर दिया। दूसरी पीढ़ी। बीस साल बाद, 1940 में, उसका बेटा रणजीत उसी सेना में भर्ती हुआ। इस बार भी भारत से किसी ने नहीं पूछा था कि वह इस युद्ध में शामिल होना चाहता है या नहीं। रणजीत पहले अफ्रीका में इटली की सेना के विरुद्ध एक पहाड़ी मोर्चे पर लड़ा, जहाँ उसकी टुकड़ी के सूबेदार को वीरता का सबसे बड़ा तमग़ा मरने के बाद मिला। फिर उसकी टुकड़ी मलाया भेजी गई। 1942 में जापान की सेना ने वहाँ अंग्रेज़ों को हरा दिया, और रणजीत हज़ारों भारतीय सैनिकों के साथ युद्धबंदी बन गया। दिल्ली चलो। बंदी-शिविर में एक दिन एक नेता आया, जिसने कहा — तुम किसके लिए लड़ रहे थे? जिसने तुम्हारे देश को ग़ुलाम बना रखा है? मेरे साथ आओ; हम अपनी सेना बनाकर भारत को आज़ाद कराएँगे। वह सुभाष चंद्र बोस थे। रणजीत आज़ाद हिंद फ़ौज में शामिल हो गया और 1944 में भारत की पूर्वी सीमा तक पहुँचा, जहाँ बरसात, भूख और बीमारी ने उस सेना को तोड़ दिया। वह फिर बंदी बना — इस बार अंग्रेज़ों का। घर पर। उन्हीं वर्षों में गाँव में अनाज पर राशन था, मिट्टी का तेल नहीं मिलता था, और मर्दों के जाने के बाद खेत औरतें सँभाल रही थीं। क़स्बे का सेठ, जो सेना को कंबल और अनाज बेचता था, पहले से कई गुना धनी हो गया था। 1945 में जब आज़ाद हिंद फ़ौज के अफ़सरों पर दिल्ली के लाल क़िले में मुक़दमा चला, तो पूरे देश में ऐसा आक्रोश उठा कि सरकार को उन्हें छोड़ना पड़ा; रणजीत भी छूटकर घर आया। दो साल बाद, अगस्त 1947 में, गाँव की चौपाल पर तिरंगा फहराया गया। बूढ़े भँवर सिंह ने कहा — हम दोनों बाप-बेटे पराई लड़ाइयों में लड़े; पर उन्हीं लड़ाइयों ने अंग्रेज़ों को इतना थका दिया कि वे हमें रोक नहीं सके। इस कहानी में पूरा अध्याय छिपा है: पहले युद्ध की खाइयाँ और भारतीय सैनिक (खंड 4), युद्ध के बाद की महामारी, महँगाई और टूटे वादे (खंड 12 और 14), दूसरे युद्ध के मोर्चे (खंड 8), आज़ाद हिंद फ़ौज और स्वतंत्रता (खंड 14), उद्योगपतियों का मुनाफ़ा और आम आदमी की तंगी (खंड 14), तथा राजस्थान के सैनिक और रियासतें (खंड 15)। |
इस अध्याय में युद्ध और कूटनीति के कई शब्द बार-बार आएँगे। पहले इन्हें समझ लीजिए।
देश / साम्राज्य | सरल परिचय |
जर्मनी | 1871 में बना नया, तेज़ी से बढ़ता औद्योगिक देश। इसका सम्राट कैसर कहलाता था (रोमन "सीज़र" से बना शब्द)। |
ऑस्ट्रिया-हंगरी | मध्य यूरोप का पुराना साम्राज्य, जिसमें दर्जन भर अलग-अलग जातियाँ (जर्मन, हंगेरियन, चेक, पोल, सर्ब आदि) एक ही सम्राट के अधीन रहती थीं। इसे डर था कि ये जातियाँ अलग होकर इसे तोड़ देंगी। |
रूस | ज़ार का विशाल पर पिछड़ा साम्राज्य; अपने को सभी स्लाव लोगों (रूसी, सर्ब, चेक, पोल आदि एक जैसी भाषाएँ बोलने वाली जातियाँ) का संरक्षक मानता था। |
ओटोमन साम्राज्य | तुर्की का पुराना, कमज़ोर होता साम्राज्य, जिसके पास अब भी पश्चिम एशिया के अरब इलाक़े थे। उसका सुल्तान दुनिया भर के मुसलमानों का ख़लीफ़ा (धार्मिक मुखिया) माना जाता था। |
बाल्कन | दक्षिण-पूर्वी यूरोप का पहाड़ी इलाक़ा (सर्बिया, बुल्गारिया, यूनान, रोमानिया, बोस्निया आदि), जो तुर्की के कमज़ोर होने से ख़ाली हो रहा था और जिस पर ऑस्ट्रिया तथा रूस, दोनों की नज़र थी। |
ब्रिटेन और फ्रांस | दुनिया के दो सबसे बड़े औपनिवेशिक साम्राज्य। फ्रांस 1871 में जर्मनी से हारकर अपने दो प्रांत खो चुका था और बदला चाहता था। |
◆ गुट / संधि-गठबंधन: दो या अधिक देशों का यह लिखित वादा कि किसी एक पर हमला हुआ तो बाक़ी उसकी मदद को आएँगे।
◆ अल्टीमेटम: अंतिम चेतावनी — "इतने समय में ये शर्तें मानो, वरना युद्ध।"
◆ लामबंदी: शांति के समय घर बैठे लाखों प्रशिक्षित नागरिकों को बुलाकर सेना को युद्ध के लिए तैयार करना और सीमा पर पहुँचाना। 1914 में यह इतना बड़ा और धीमा काम था कि एक बार शुरू होने पर इसे रोकना लगभग असंभव था; इसलिए एक देश की लामबंदी को दूसरा देश युद्ध की घोषणा जैसा ही मानता था।
◆ तटस्थ देश: वह देश जो किसी भी पक्ष की ओर से युद्ध में शामिल न हो।
◆ आत्मनिर्णय: हर जाति को यह तय करने का अधिकार कि वह किस देश में रहेगी और उस पर कौन शासन करेगा।
◆ मैंडेट: हारे हुए देशों से छीने गए उपनिवेश, जिन्हें राष्ट्र संघ ने "देखरेख" के नाम पर विजेता देशों को सौंप दिया; व्यवहार में यह नाम बदला हुआ उपनिवेश ही था।
◆ सामूहिक सुरक्षा: यह विचार कि किसी एक देश पर हमला सब पर हमला माना जाए और सब मिलकर हमलावर को रोकें।
◆ निःशस्त्रीकरण: देशों का अपनी सेना और हथियार घटाना।
◆ मोर्चा: वह पूरी रेखा जिस पर दो सेनाएँ आमने-सामने खड़ी हों। जर्मनी के पश्चिम में फ्रांस की ओर पश्चिमी मोर्चा था और पूरब में रूस की ओर पूर्वी मोर्चा।
◆ नाकाबंदी: नौसेना से शत्रु देश के बंदरगाहों को घेर लेना, ताकि वहाँ न भोजन पहुँचे न कच्चा माल।
◆ पनडुब्बी: पानी के नीचे चलने वाला जहाज़, जो छिपकर दूसरे जहाज़ों को डुबो सकता है।
◆ युद्ध-विराम, आत्मसमर्पण और शांति-संधि: युद्ध-विराम केवल लड़ाई रोकने का समझौता है। आत्मसमर्पण का अर्थ है हार मानकर हथियार डाल देना; "बिना शर्त आत्मसमर्पण" में हारने वाला कोई शर्त नहीं रख सकता। शांति-संधि वह अंतिम लिखित समझौता है जिसमें ज़मीन, जुर्माना और आगे के संबंध तय होते हैं।
◆ तीन गुटों के नाम: पहले युद्ध में जर्मनी और उसके साथी केंद्रीय शक्तियाँ कहलाए (क्योंकि वे यूरोप के बीच में थे); दूसरे युद्ध में जर्मनी, इटली और जापान धुरी राष्ट्र कहलाए। दोनों युद्धों में उनके विरोधी मित्र राष्ट्र थे।
◆ वि-उपनिवेशीकरण: उपनिवेशों का एक-एक करके स्वतंत्र होना।
🔑 मुख्य शब्द कैसर • ऑस्ट्रिया-हंगरी • स्लाव • ओटोमन साम्राज्य • बाल्कन • गुट • अल्टीमेटम • लामबंदी • तटस्थ • आत्मनिर्णय • मैंडेट • सामूहिक सुरक्षा • मोर्चा • नाकाबंदी • युद्ध-विराम और आत्मसमर्पण • केंद्रीय शक्तियाँ • धुरी राष्ट्र • मित्र राष्ट्र |
20वीं सदी के दो विश्व युद्ध — प्रथम (1914–1918) और द्वितीय (1939–1945) — मानव इतिहास के सबसे विनाशकारी संघर्ष थे। पहले के युद्ध सेनाओं के बीच मैदानों में लड़े जाते थे; ये युद्ध पूरे समाज ने लड़े — कारख़ाने, खेत, महिलाएँ, बच्चे, वैज्ञानिक, प्रचार-तंत्र — सब युद्ध का हिस्सा बन गए।
📘 आसान परिभाषा: संपूर्ण युद्ध (Total War) |
📚 परिभाषा: ऐसा युद्ध जिसमें राष्ट्र अपनी पूरी जनशक्ति, अर्थव्यवस्था, उद्योग, विज्ञान और प्रचार को युद्ध में झोंक देता है, और सैनिक व नागरिक का भेद लगभग मिट जाता है — नागरिक भी निशाना बनते हैं। |
💬 आसान भाषा में: युद्ध केवल सीमा पर नहीं, हर घर, हर कारख़ाने, हर खेत में लड़ा जाता है — रसोई से राशन तक सब "मोर्चा" है। 🏠 उदाहरण: जैसे किसी गाँव की लड़ाई में केवल लठैत नहीं, पूरा गाँव — औरतें रोटियाँ बनाएँ, बच्चे संदेश ले जाएँ, कारीगर हथियार बनाएँ — और दुश्मन भी पूरे गाँव को जलाने की कोशिश करे। |
आधार | प्रथम विश्व युद्ध | द्वितीय विश्व युद्ध |
काल | 28 जुलाई 1914 – 11 नवंबर 1918 (लगभग सवा चार वर्ष) | 1 सितंबर 1939 – 2 सितंबर 1945 (लगभग छह वर्ष) |
गुट | मित्र राष्ट्र बनाम केंद्रीय शक्तियाँ | मित्र राष्ट्र बनाम धुरी राष्ट्र |
सेनाएँ | 30 से अधिक देशों के लगभग 6.5 करोड़ सैनिक | लगभग 10 करोड़ से अधिक सैनिक |
मौतें | लगभग 90 लाख सैनिक + लाखों नागरिक (कुल लगभग 1.5–2 करोड़) | लगभग 7–8.5 करोड़ (अधिकतर नागरिक) |
प्रमुख क्षेत्र | मुख्यतः यूरोप (पश्चिमी-पूर्वी मोर्चा), मध्य-पूर्व, अफ्रीका | पूरा विश्व — यूरोप, अफ्रीका, एशिया-प्रशांत, अटलांटिक |
नई तकनीक | मशीनगन, ज़हरीली गैस, टैंक, पनडुब्बी, हवाई जहाज़ | ब्लिट्ज़क्रीग, विमानवाहक पोत, राडार, रॉकेट, परमाणु बम |
💡 आसान भाषा में समझें राजस्थान के एक गाँव में दो बड़े ज़मींदारों के बीच पुरानी दुश्मनी है; दोनों ने अपने-अपने गुट बना लिए हैं। एक छोटी-सी घटना — एक व्यक्ति की हत्या — पर पूरा गाँव लड़ पड़ता है (पहला युद्ध)। समझौता होता है, पर हारे हुए पर इतनी कठोर शर्तें थोप दी जाती हैं कि वह बदले की आग में जलता रहता है। बीस साल बाद वही हारा हुआ ज़मींदार एक उग्र नेता के पीछे फिर लड़ाई छेड़ देता है — इस बार और भयानक (दूसरा युद्ध)। |
प्रथम विश्व युद्ध अचानक नहीं हुआ — 1870 से 1914 तक यूरोप में साम्राज्यवादी राष्ट्रों के स्वार्थों, गुटबंदियों और संकटों ने ऐसा बारूद का ढेर तैयार कर दिया था कि एक चिंगारी ही काफ़ी थी। इतिहासकार इसके दीर्घकालिक कारणों को संक्षेप में "सैन्यवाद, गुटबंदी, साम्राज्यवाद, राष्ट्रवाद" कहते हैं।
चित्र 1: प्रथम विश्व युद्ध के दीर्घकालिक कारण और तात्कालिक चिंगारी |
गुट / संधि | वर्ष | सदस्य और उद्देश्य |
द्वि-गुट (Dual Alliance) | 1879 | जर्मनी + ऑस्ट्रिया-हंगरी — बिस्मार्क की नीति, फ्रांस को अकेला रखना |
त्रिगुट (Triple Alliance) | 1882 | जर्मनी + ऑस्ट्रिया-हंगरी + इटली (इटली 1915 में पाला बदलकर मित्र राष्ट्रों में) |
फ्रांस-रूस संधि | 1894 | बिस्मार्क के हटने (1890) के बाद जर्मनी ने रूस से संधि नवीनीकृत नहीं की — फ्रांस-रूस निकट आए |
आंग्ल-जापानी संधि | 1902 | ब्रिटेन ने "शानदार अलगाव" छोड़ा |
सौहार्दपूर्ण समझौता (Entente Cordiale) | 1904 | ब्रिटेन + फ्रांस — औपनिवेशिक विवाद सुलझे (मिस्र-मोरक्को) |
आंग्ल-रूसी समझौता | 1907 | ईरान, अफ़ग़ानिस्तान, तिब्बत पर विवाद सुलझे → त्रि-मैत्री (Triple Entente): ब्रिटेन + फ्रांस + रूस |
◆ परिणाम: यूरोप दो सशस्त्र शिविरों में बँट गया; संधियों के कारण किसी भी दो देशों का स्थानीय झगड़ा महाद्वीपीय युद्ध बनने को तैयार था।
यह पूरा ताना-बाना एक डर से शुरू हुआ। 1871 में जर्मनी ने फ्रांस को हराकर उसके दो प्रांत ले लिए थे। जर्मनी का चतुर मंत्री बिस्मार्क जानता था कि फ्रांस बदला लेगा; इसलिए उसकी पूरी नीति यह थी कि फ्रांस को कोई साथी न मिले। उसने ऑस्ट्रिया और इटली को अपने साथ बाँध लिया, और रूस से भी अलग से दोस्ती का समझौता रखा, ताकि जर्मनी को कभी दो ओर से एक साथ न लड़ना पड़े।
1890 में नए, जोशीले कैसर ने बिस्मार्क को हटा दिया और रूस वाला समझौता आगे नहीं बढ़ाया। अकेला पड़ा रूस फ्रांस से जा मिला — और जर्मनी का सबसे बड़ा डर सच हो गया: अब उसके दोनों ओर शत्रु थे। फिर कैसर ने विशाल नौसेना बनानी शुरू की, जिससे ब्रिटेन घबरा गया, जो अब तक किसी गुट में नहीं था। ब्रिटेन ने अपने पुराने प्रतिद्वंद्वियों, फ्रांस और रूस, से उपनिवेशों के झगड़े निपटाकर दोस्ती कर ली। 1907 तक यूरोप दो हथियारबंद खेमों में बँट चुका था।
इन गुटों को सुरक्षा के लिए बनाया गया था — यह सोचकर कि कोई इतने बड़े गठबंधन पर हमला करने की हिम्मत नहीं करेगा। पर इनका उलटा असर हुआ। अब किसी भी दो देशों का छोटा झगड़ा अपने-आप सबको खींच लेता था, जैसे पहाड़ पर रस्सी से बँधे पर्वतारोहियों में एक के फिसलने पर सब गिर जाते हैं।
1. उग्र राष्ट्रवाद: जर्मन सम्राट विलियम (कैसर विल्हेल्म) द्वितीय की "विश्व-नीति" (Weltpolitik) — "धूप में स्थान", विशाल नौसेना, उपनिवेश; फ्रांस में 1871 की हार और आल्सेस-लॉरेन छिनने से बदले की भावना; बाल्कन में स्लाव राष्ट्रवाद।
2. आंग्ल-जर्मन प्रतिद्वंद्विता: जर्मनी ने कोयला, लोहा, रसायन, बिजली-उद्योग में ब्रिटेन को पीछे छोड़ दिया; नौसैनिक होड़ — ब्रिटेन का "ड्रेडनॉट" (1906) बनाम जर्मन युद्धपोत; कील नहर का विस्तार और बर्लिन–बग़दाद रेलवे से ब्रिटेन को अपने पूर्वी साम्राज्य (भारत) की चिंता।
3. साम्राज्यवादी संघर्ष: प्रथम मोरक्को संकट (1905–06) और द्वितीय — अगादिर संकट (1911) में जर्मनी का फ्रांस से टकराव — हर संकट ने ब्रिटेन-फ्रांस को और क़रीब किया।
4. बाल्कन — "यूरोप का बारूदख़ाना": ओटोमन साम्राज्य ("यूरोप का बीमार आदमी") के पतन से ख़ाली जगह के लिए होड़ — अखिल-स्लाववाद (रूस और सर्बिया — सभी स्लावों की एकता) बनाम ऑस्ट्रिया-हंगरी का विस्तार।
▸ बोस्निया संकट (1908): ऑस्ट्रिया-हंगरी ने बोस्निया-हर्ज़ेगोविना का विलय कर लिया — सर्बिया और रूस आगबबूला, पर जर्मनी के दबाव में रूस को पीछे हटना पड़ा — यह अपमान रूस भूला नहीं।
▸ बाल्कन युद्ध (1912–13): पहले बाल्कन देशों ने तुर्की को हराया, फिर आपस में लड़े — सर्बिया का आकार और हौसला दोनों बढ़े; ऑस्ट्रिया उसे अपने अस्तित्व का ख़तरा मानने लगा।
5. सैन्यवाद और शस्त्रीकरण की होड़: अनिवार्य भर्ती, विशाल स्थायी सेनाएँ, सेनापतियों का राजनीति पर प्रभाव; पहले से बनी युद्ध-योजनाएँ — जैसे जर्मनी की श्लीफ़ेन योजना — जिन्होंने संकट के समय कूटनीति का समय ही नहीं छोड़ा।
6. समाचार-पत्र और प्रचार: अख़बारों ने राष्ट्रवादी उन्माद भड़काया, शत्रु देशों की छवि ख़राब की; जनता भी "छोटे, गौरवशाली युद्ध" की कल्पना में उत्साहित थी।
7. अंतरराष्ट्रीय संस्था का अभाव: विवाद सुलझाने की कोई प्रभावी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था नहीं; हेग सम्मेलन (1899, 1907) निःशस्त्रीकरण में विफल रहे।
इन सब कारणों को जोड़कर देखिए। यूरोप के बड़े देश उपनिवेशों और बाज़ारों के लिए आपस में होड़ कर रहे थे (साम्राज्यवाद); हर देश की जनता को सिखाया गया था कि उसका राष्ट्र सबसे महान है और पड़ोसी उसका शत्रु (उग्र राष्ट्रवाद); इस डर में हर देश अपनी सेना बढ़ाता जा रहा था और जनरलों ने युद्ध की योजनाएँ पहले से बना रखी थीं (सैन्यवाद); और संधियों ने सबको दो खेमों में बाँध दिया था (गुटबंदी)। ऐसी स्थिति में झगड़ा रोकने वाली कोई संस्था नहीं थी। इसलिए प्रश्न यह नहीं था कि युद्ध होगा या नहीं, बल्कि यह कि चिंगारी कहाँ से आएगी। वह बाल्कन से आई, क्योंकि वहीं दो बड़े साम्राज्यों — ऑस्ट्रिया और रूस — के हित सीधे टकराते थे, और वहीं सर्बिया जैसा छोटा, महत्वाकांक्षी देश था जो ऑस्ट्रिया के भीतर रहने वाले अपने जाति-भाइयों को अपने में मिलाना चाहता था।
◆ 28 जून 1914, साराजेवो (बोस्निया): ऑस्ट्रिया-हंगरी के युवराज आर्कड्यूक फ़्रांज़ फ़र्डिनेंड और उनकी पत्नी सोफ़ी की हत्या — हत्यारा गैवरिलो प्रिंसिप, बोस्नियाई सर्ब युवा ("युवा बोस्निया" समूह), जिसे सर्बिया के गुप्त राष्ट्रवादी संगठन "काला हाथ" (Black Hand) से हथियार मिले थे।
तिथि (1914) | घटना |
5–6 जुलाई | जर्मनी ने ऑस्ट्रिया को सर्बिया के विरुद्ध बिना शर्त समर्थन — "कोरा चेक" (Blank Cheque) दिया |
23 जुलाई | ऑस्ट्रिया का सर्बिया को अल्टीमेटम — 48 घंटे; ऐसी शर्तें जो सर्बिया की संप्रभुता पर चोट थीं |
25 जुलाई | सर्बिया ने लगभग सभी शर्तें मानीं, पर ऑस्ट्रियाई अधिकारियों द्वारा जाँच की शर्त नहीं मानी |
28 जुलाई | ऑस्ट्रिया-हंगरी ने सर्बिया पर युद्ध घोषित किया |
30 जुलाई | सर्बिया के समर्थन में रूस ने पूर्ण सैन्य लामबंदी की |
1 अगस्त | जर्मनी ने रूस पर युद्ध घोषित किया |
3 अगस्त | जर्मनी ने फ्रांस पर युद्ध घोषित किया; श्लीफ़ेन योजना के तहत तटस्थ बेल्जियम में प्रवेश |
4 अगस्त | बेल्जियम की तटस्थता (1839 की लंदन संधि) के उल्लंघन पर ब्रिटेन ने जर्मनी पर युद्ध घोषित किया — जर्मन चांसलर ने उस संधि को "काग़ज़ का टुकड़ा" कहा था |
ऊपर की तालिका की आठ तिथियाँ एक के बाद एक गिरते मोहरों की तरह हैं। हर देश ने अपनी ओर से एक "समझदारी भरा" क़दम उठाया, और सबके क़दम मिलकर महाविनाश बन गए।
1. ऑस्ट्रिया ने सोचा: यह सर्बिया को हमेशा के लिए कुचलने का मौक़ा है। पर सर्बिया के पीछे रूस है, इसलिए पहले जर्मनी से पूछ लें।
2. जर्मनी ने सोचा: ऑस्ट्रिया हमारा अकेला भरोसेमंद साथी है; उसे पूरा समर्थन दो। रूस शायद लड़ेगा नहीं; और अगर लड़ना ही है तो अभी बेहतर है, क्योंकि कुछ साल में रूस और मज़बूत हो जाएगा। उसने बिना शर्त समर्थन का वादा दे दिया।
3. ऑस्ट्रिया ने जान-बूझकर ऐसी शर्तें भेजीं जिन्हें कोई स्वतंत्र देश नहीं मान सकता। सर्बिया ने लगभग सब मान लीं; फिर भी ऑस्ट्रिया ने युद्ध छेड़ दिया।
4. रूस ने सोचा: 1908 में हम पीछे हटे थे; इस बार हटे तो बाल्कन में हमारी साख ख़त्म। उसने सेना जुटानी शुरू की।
5. जर्मनी के जनरलों की योजना थी कि रूस की धीमी सेना के तैयार होने से पहले, छह सप्ताह में, फ्रांस को हरा दिया जाए। रूस के सेना जुटाते ही उनकी घड़ी चल पड़ी; अब वे इंतज़ार नहीं कर सकते थे। जर्मनी ने रूस और फिर फ्रांस पर युद्ध घोषित कर दिया।
6. फ्रांस की सीमा पर मज़बूत क़िले थे, इसलिए जर्मन सेना छोटे, तटस्थ देश बेल्जियम से होकर घुसी। बेल्जियम की तटस्थता की गारंटी ब्रिटेन ने दे रखी थी; और ब्रिटेन यह भी नहीं चाहता था कि जर्मनी समुद्र के उस पार के तट पर क़ाबिज़ हो जाए। ब्रिटेन भी युद्ध में आ गया।
लगभग हर सरकार को लगता था कि युद्ध छोटा होगा और "क्रिसमस तक सैनिक घर लौट आएँगे"। किसी ने नहीं सोचा था कि मशीन से चलने वाली बंदूक़ों और रेल से पहुँचती करोड़ों की सेनाओं का युद्ध कैसा होगा।
📌 युद्ध का दोष किसका? वर्साय संधि ने पूरा दोष जर्मनी पर डाला (अनुच्छेद 231)। बाद में जर्मन इतिहासकार फ़्रिट्ज़ फ़िशर (1961) ने भी जर्मनी की आक्रामक महत्वाकांक्षाओं को मुख्य कारण माना; जबकि कई इतिहासकार मानते हैं कि यूरोप के नेता युद्ध में "नींद में चलते हुए" (Sleepwalkers) पहुँच गए — ऑस्ट्रिया की ज़िद, रूस की जल्दबाज़ लामबंदी, फ्रांस-ब्रिटेन की प्रतिबद्धताएँ — सबकी हिस्सेदारी थी। संतुलित निष्कर्ष: बेल्जियम को छोड़कर कोई भी बड़ा राज्य पूर्णतः निर्दोष नहीं था, पर "कोरा चेक" देकर और तटस्थ बेल्जियम पर आक्रमण करके जर्मनी ने स्थानीय युद्ध को विश्व युद्ध में बदलने में निर्णायक भूमिका निभाई। |
चित्र 2: दोनों विश्व युद्धों में आमने-सामने के गुट |
◆ श्लीफ़ेन योजना: दो मोर्चों से बचने के लिए पहले बेल्जियम होकर छह सप्ताह में फ्रांस को हराना, फिर धीमी गति से लामबंद होते रूस की ओर मुड़ना। मार्न की लड़ाई (सितंबर 1914) में फ्रांसीसी-ब्रिटिश सेनाओं ने जर्मनों को पेरिस के पास रोक दिया — योजना विफल।
◆ खाई-युद्ध (Trench Warfare): स्विट्ज़रलैंड से समुद्र तट तक लगभग 700 किमी लंबी खाइयाँ; दोनों ओर कँटीले तार और मशीनगनें — कुछ सौ मीटर के लिए लाखों जानें; कीचड़, चूहे, बीमारी।
◆ ज़हरीली गैस का पहला बड़ा प्रयोग — यप्रेस (अप्रैल 1915); वर्दन (फ़रवरी–दिसंबर 1916) — फ्रांस का "हम उन्हें गुज़रने नहीं देंगे"; सॉम (जुलाई–नवंबर 1916) — पहले ही दिन लगभग 57,000 ब्रिटिश हताहत; सितंबर 1916 में ब्रिटेन ने पहली बार टैंक उतारे।
1914 तक जनरल उसी तरह सोचते थे जैसे सौ साल पहले: सेना आगे बढ़ेगी, शत्रु को घेरेगी और जीत जाएगी। पर हथियार बदल चुके थे। एक मशीन-बंदूक़ एक मिनट में सैकड़ों गोलियाँ दाग़ सकती थी; खुले मैदान में दौड़ते सैनिकों की क़तार उसके सामने घास की तरह कट जाती थी। बचने का एक ही तरीक़ा था — ज़मीन खोदकर उसमें छिप जाना। कुछ ही महीनों में दोनों सेनाओं ने समुद्र से पहाड़ों तक आमने-सामने खाइयों की क़तारें खोद डालीं।
अब स्थिति यह थी कि बचाव करना आसान था और हमला करना लगभग असंभव। फिर भी जनरल बार-बार हमले का आदेश देते। पहले घंटों तोपों से गोले बरसाए जाते; फिर सीटी बजती और हज़ारों सैनिक खाई से निकलकर कँटीले तारों और कीचड़ के बीच से शत्रु की ओर दौड़ते। कुछ ही मिनटों में अधिकतर ढेर हो जाते। कई बड़ी लड़ाइयों में लाखों जानें देकर कुछ किलोमीटर ज़मीन जीती गई, जो अगले महीने फिर छिन गई। तीन साल तक मोर्चा लगभग वहीं का वहीं रहा।
खाई में सैनिक का जीवन नरक जैसा था: घुटनों तक ठंडा कीचड़, जिसमें पैर सड़ने लगते थे; चूहे और जुएँ; ऊपर से हर समय गोलों की बौछार; और बग़ल में पड़े साथियों के शव, जिन्हें उठाने कोई नहीं जा सकता था। लगातार धमाकों से कई सैनिकों का दिमाग़ी संतुलन बिगड़ जाता था। यही अनुभव लेकर लौटी पीढ़ी ने बाद में युद्ध के "गौरव" पर विश्वास करना बंद कर दिया।
यह गतिरोध टूटा कैसे? तीन बातों से। ब्रिटेन की नौसेना की नाकाबंदी ने जर्मनी को भूखा कर दिया। अमेरिका के आने से मित्र राष्ट्रों को ताज़ा सैनिक और अथाह सामान मिला। और 1918 तक टैंक — लोहे की चलती गाड़ी, जो तारों को रौंदकर खाई पार कर सकती थी — काम में आने लगा।
◆ पूर्वी मोर्चा: टैननबर्ग (अगस्त 1914) में रूस की करारी हार; 1917 की क्रांति के बाद रूस ब्रेस्ट-लिटोव्स्क संधि (मार्च 1918) से युद्ध से बाहर।
◆ गैलीपोली (1915–16): ब्रिटेन-फ्रांस का तुर्की की डार्डेनेल्स जलडमरूमध्य पर क़ब्ज़े का असफल अभियान — ऑस्ट्रेलिया-न्यूज़ीलैंड (एंज़ैक) और भारतीय सैनिकों की भारी क्षति।
◆ मध्य-पूर्व: मेसोपोटामिया (इराक) में भारतीय सेना — कुत-अल-अमारा का घेरा और आत्मसमर्पण (अप्रैल 1916), 1917 में बग़दाद पर क़ब्ज़ा; फ़िलिस्तीन अभियान — जनरल एलेनबी ने दिसंबर 1917 में यरुशलम लिया, सितंबर 1918 में हाइफ़ा और दमिश्क; अरब विद्रोह (टी. ई. लॉरेंस — "अरब का लॉरेंस")।
◆ इटली (मई 1915) — लंदन की गुप्त संधि के बाद मित्र राष्ट्रों की ओर; कैपोरेटो (1917) में हार।
◆ समुद्र: जटलैंड (मई 1916) — एकमात्र बड़ी नौसैनिक लड़ाई; ब्रिटेन की नौसैनिक नाकाबंदी से जर्मनी में भुखमरी।
1. जर्मनी का "अप्रतिबंधित पनडुब्बी युद्ध": यात्री-व्यापारी जहाज़ों पर भी हमले — "लुसिटानिया" का डूबना (मई 1915, 128 अमेरिकी मरे); फ़रवरी 1917 में यह नीति फिर शुरू।
2. ज़िमरमैन तार (जनवरी 1917): जर्मनी ने मेक्सिको को अमेरिका के विरुद्ध युद्ध में उतरने पर खोए प्रदेश लौटाने का प्रस्ताव भेजा — ब्रिटेन ने तार पकड़कर उजागर किया।
3. 6 अप्रैल 1917 — अमेरिका युद्ध में; राष्ट्रपति वुडरो विल्सन — "लोकतंत्र के लिए दुनिया को सुरक्षित बनाना"; ताज़ा सैनिकों और अपार संसाधनों ने संतुलन मित्र राष्ट्रों के पक्ष में कर दिया।
4. 1918: जर्मनी का अंतिम वसंत आक्रमण विफल; मित्र राष्ट्रों का "सौ दिन का आक्रमण" (अगस्त से); बुल्गारिया, तुर्की, ऑस्ट्रिया-हंगरी ने हथियार डाले; जर्मनी में नाविक-विद्रोह और क्रांति — 9 नवंबर को कैसर ने गद्दी छोड़ी।
5. 11 नवंबर 1918, प्रातः 11 बजे — फ्रांस के कॉम्पियेन वन में एक रेल-डिब्बे में युद्ध-विराम पर हस्ताक्षर — युद्ध समाप्त।
📌 भारत का योगदान (प्रथम विश्व युद्ध) लगभग 13 लाख भारतीय सैनिक और श्रमिक फ्रांस-बेल्जियम, मेसोपोटामिया, मिस्र, फ़िलिस्तीन, गैलीपोली, पूर्वी अफ्रीका भेजे गए; लगभग 74,000 मारे गए। ख़ुदादाद ख़ान (बेल्जियम, अक्टूबर 1914) विक्टोरिया क्रॉस पाने वाले पहले भारतीय सैनिक बने। भारत से युद्ध के लिए £10 करोड़ का "उपहार" (1917), गेहूँ, जूट, चाय, चमड़ा, लोहा-इस्पात और देशी रियासतों की सेनाएँ और धन भी गए। नई दिल्ली का इंडिया गेट (अखिल भारतीय युद्ध स्मारक) इन्हीं शहीदों की स्मृति में है। |
अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने "न्यायपूर्ण शांति" के लिए चौदह सूत्र रखे, जिनके आधार पर जर्मनी ने युद्ध-विराम स्वीकार किया था। प्रमुख सूत्र — गुप्त संधियों का अंत (खुली कूटनीति), समुद्रों की स्वतंत्रता, व्यापारिक बाधाएँ हटाना, निःशस्त्रीकरण, औपनिवेशिक दावों का निष्पक्ष समाधान, राष्ट्रीयताओं का आत्मनिर्णय (पोलैंड की स्वतंत्रता आदि), और एक "राष्ट्रों का संघ"।
◆ "बड़े चार" (Big Four): वुडरो विल्सन (अमेरिका — आदर्शवादी), जॉर्ज क्लेमेंसो (फ्रांस — "बाघ", जर्मनी को स्थायी रूप से कमज़ोर करना चाहते थे), लॉयड जॉर्ज (ब्रिटेन — बीच का रास्ता), विटोरियो ऑरलैंडो (इटली)।
◆ पराजित देशों को वार्ता में नहीं बुलाया गया — संधि थोपी गई; सोवियत रूस भी बाहर रखा गया। इसलिए जर्मन इसे "थोपी हुई संधि" (Diktat) कहते थे।
क्षेत्र | प्रावधान |
युद्ध-दोष | अनुच्छेद 231 — युद्ध की पूरी ज़िम्मेदारी जर्मनी और उसके साथियों पर; यही हर्जाने का आधार |
हर्जाना | 1921 में 13,200 करोड़ स्वर्ण मार्क (लगभग 3,300 करोड़ डॉलर) तय |
भूमि — पश्चिम | आल्सेस-लॉरेन फ्रांस को; यूपेन-माल्मेडी बेल्जियम को; कोयला-समृद्ध सार क्षेत्र 15 वर्ष राष्ट्रसंघ के अधीन (खदानें फ्रांस को); उत्तरी श्लेसविग डेनमार्क को |
भूमि — पूर्व | पोलिश गलियारा और पोज़ेन पोलैंड को — पूर्वी प्रशा बाक़ी जर्मनी से कट गया; डैन्ज़िग "स्वतंत्र नगर"; मेमेल लिथुआनिया को; ऊपरी सिलेसिया का भाग पोलैंड को |
कुल भूमि-हानि | यूरोप में लगभग 13% भूमि और लगभग 10% (लगभग 65–70 लाख) जनसंख्या; लौह-अयस्क और कोयले के बड़े भंडार |
उपनिवेश | सभी उपनिवेश छिने — राष्ट्रसंघ के "मैंडेट" के रूप में ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, बेल्जियम, दक्षिण अफ्रीका आदि को |
निःशस्त्रीकरण | थलसेना केवल 1 लाख; अनिवार्य भर्ती, टैंक, भारी तोपें, वायुसेना, पनडुब्बी वर्जित; नौसेना केवल 6 युद्धपोत; राइनलैंड सेना-रहित क्षेत्र (15 वर्ष मित्र सेनाओं का क़ब्ज़ा) |
अन्य | ऑस्ट्रिया से विलय वर्जित; जर्मनी को राष्ट्रसंघ से बाहर रखा गया (1926 में प्रवेश); कैसर पर मुक़दमे की धारा |
वर्साय की संधि इसलिए अजीब बनी कि उसे बनाने वाले तीन मुख्य नेता तीन अलग चीज़ें चाहते थे। फ्रांस पर पचास साल में दो बार जर्मनी ने हमला किया था और यह युद्ध उसी की ज़मीन पर लड़ा गया था; उसका नेता चाहता था कि जर्मनी को इतना कमज़ोर कर दिया जाए कि वह फिर कभी न उठ सके। अमेरिका का राष्ट्रपति आदर्शवादी था; वह बदले की जगह ऐसी न्यायपूर्ण शांति चाहता था जिसमें हर जाति को अपना देश मिले और एक विश्व-संस्था झगड़े सुलझाए। ब्रिटेन बीच में था: उसकी जनता जर्मनी को सज़ा देना चाहती थी, पर उसके नेता जानते थे कि जर्मनी उनके माल का बड़ा ग्राहक है और उसे पूरी तरह तोड़ देना ठीक नहीं।
नतीजा एक समझौता था, जो किसी को पूरा नहीं मिला। संधि इतनी कठोर थी कि जर्मनों के मन में गहरा घाव छोड़ गई — सारा दोष उन पर, सेना लगभग ख़त्म, और ऐसा जुर्माना जिसे चुकाने में पीढ़ियाँ लगतीं। पर वह इतनी कठोर भी नहीं थी कि जर्मनी को सचमुच तोड़ देती: उसके कारख़ाने सही-सलामत थे (युद्ध उसकी ज़मीन पर लड़ा ही नहीं गया था), और आबादी तथा उद्योग में वह अब भी यूरोप का सबसे बड़ा देश था। यानी एक ताक़तवर देश को अपमानित करके छोड़ दिया गया — जो सबसे ख़तरनाक मेल है।
जर्मनों को सबसे अधिक दो बातें चुभीं। पहली — उन्होंने युद्ध-विराम इस भरोसे पर माना था कि शांति अमेरिकी राष्ट्रपति के चौदह सूत्रों के आधार पर होगी; पर उन्हें वार्ता की मेज़ पर बैठने तक नहीं दिया गया और तैयार संधि पर हस्ताक्षर करने को कहा गया। दूसरी — आत्मनिर्णय का सिद्धांत पोल, चेक और बाक़ी सबके लिए लागू हुआ, पर जर्मनों के लिए नहीं: लाखों जर्मन-भाषी लोग नए देशों की सीमाओं के भीतर छोड़ दिए गए, और ऑस्ट्रिया को, जो जर्मन-भाषी देश था, जर्मनी से मिलने से मना कर दिया गया।
संधि | पराजित देश | मुख्य परिणाम |
सेंट जर्मेन (सितंबर 1919) | ऑस्ट्रिया | साम्राज्य समाप्त — चेकोस्लोवाकिया, यूगोस्लाविया, पोलैंड को भूमि; दक्षिण टायरॉल इटली को; जर्मनी से विलय वर्जित |
न्युई (नवंबर 1919) | बुल्गारिया | यूनान और यूगोस्लाविया को भूमि; ईजियन सागर तक पहुँच छिनी |
त्रियानों (जून 1920) | हंगरी | लगभग दो-तिहाई भूमि रोमानिया, चेकोस्लोवाकिया, यूगोस्लाविया को |
सेव्र (अगस्त 1920) | ओटोमन तुर्की | अरब क्षेत्र मैंडेट — इराक, फ़िलिस्तीन, ट्रांसजॉर्डन ब्रिटेन को, सीरिया, लेबनान फ्रांस को; ख़लीफ़ा की सत्ता पर चोट — भारत में ख़िलाफ़त आंदोलन |
लोज़ान (जुलाई 1923) | तुर्की | मुस्तफ़ा कमाल (अतातुर्क) के विजयी राष्ट्रीय संघर्ष के बाद सेव्र की जगह — अपेक्षाकृत उदार शर्तें; तुर्की गणराज्य (1923), ख़िलाफ़त का अंत (1924) |
बाक़ी संधियों का सार: इन चार संधियों ने यूरोप और पश्चिम एशिया का नक़्शा ही बदल दिया। ऑस्ट्रिया-हंगरी का विशाल साम्राज्य टुकड़े-टुकड़े होकर कई छोटे देशों में बँट गया, जो आर्थिक रूप से कमज़ोर थे और जिनमें से लगभग हर एक के भीतर दूसरी जातियों के लोग अल्पसंख्यक बनकर रह गए। यही छोटे, बँटे हुए देश आगे हिटलर के लिए आसान शिकार बने। तुर्की का साम्राज्य भी ख़त्म हुआ; उसके अरब इलाक़ों को, जिन्हें युद्ध में स्वतंत्रता का वादा किया गया था, ब्रिटेन और फ्रांस ने आपस में बाँट लिया। आज के इराक़, सीरिया, लेबनान, जॉर्डन और इज़राइल-फ़िलिस्तीन की सीमाएँ और उनके झगड़े उसी बँटवारे की देन हैं। तुर्की का मामला इस दृष्टि से अलग है कि वहाँ मुस्तफ़ा कमाल के नेतृत्व में जनता ने थोपी गई संधि को हथियार उठाकर ठुकरा दिया और बेहतर शर्तें मनवा लीं — इससे दुनिया ने सीखा कि ये संधियाँ बदली भी जा सकती हैं।
◆ संधि के पहले भाग — "प्रसंविदा" (Covenant) — से 10 जनवरी 1920 को स्थापना; मुख्यालय जिनेवा; उद्देश्य — सामूहिक सुरक्षा, विवादों का शांतिपूर्ण समाधान, निःशस्त्रीकरण।
◆ साथ में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (1919) और स्थायी अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (हेग)। भारत वर्साय संधि के हस्ताक्षरकर्ता के रूप में राष्ट्रसंघ का संस्थापक सदस्य बना — स्वतंत्र न होते हुए भी।
◆ कमज़ोरियाँ: प्रस्तावक अमेरिका ही सदस्य नहीं बना (अमेरिकी सीनेट ने संधि अस्वीकार की); जर्मनी-रूस आरंभ में बाहर; अपनी सेना नहीं, निर्णयों के लिए सर्वसम्मति ज़रूरी; बड़े देशों ने नियम तोड़े — मंचूरिया (1931), अबीसीनिया (1935) पर विफलता; अंततः 1946 में भंग, उसकी जगह संयुक्त राष्ट्र।
राष्ट्र संघ का विचार यह था कि अगर कोई देश किसी पर हमला करे, तो बाक़ी सब मिलकर पहले उससे व्यापार बंद कर दें और ज़रूरत पड़े तो उससे लड़ें। यह तभी काम कर सकता था जब बड़े देश अपने निजी हित छोड़कर इसके लिए क़ीमत चुकाने को तैयार हों। दो मौक़ों पर इसकी परीक्षा हुई, और दोनों में यह विफल रहा।
◆ मंचूरिया (1931): जापान ने चीन के इस प्रांत पर क़ब्ज़ा कर लिया। चीन ने संघ से शिकायत की। संघ ने एक जाँच-दल भेजा, जिसे रिपोर्ट देने में एक साल लगा। रिपोर्ट ने जापान को दोषी माना। जापान ने बस संघ की सदस्यता छोड़ दी और मंचूरिया अपने पास रखा। किसी ने कुछ नहीं किया, क्योंकि मंदी के उस दौर में कोई देश जापान से व्यापार बंद करके अपना नुक़सान नहीं करना चाहता था।
◆ अबीसीनिया (1935): इटली ने अफ्रीका के इस स्वतंत्र देश पर हमला किया। इस बार संघ ने इटली से व्यापार पर रोक लगाई — पर तेल को रोक से बाहर रखा, जिसके बिना इटली की सेना एक महीने भी नहीं लड़ सकती थी; और ब्रिटेन ने वह नहर बंद नहीं की जिससे इटली की सेना वहाँ पहुँच रही थी। कारण यह था कि ब्रिटेन और फ्रांस इटली को नाराज़ करके हिटलर की ओर नहीं धकेलना चाहते थे।
इन दोनों घटनाओं से हर आक्रामक शासक ने एक ही सबक़ लिया: संघ केवल निंदा करता है, रोकता नहीं। इसके बाद उसे किसी ने गंभीरता से नहीं लिया।
प्रायः कहा जाता है कि वर्साय की संधि में द्वितीय विश्व युद्ध के बीज थे। ब्रिटिश अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड कीन्स ने अपनी पुस्तक "शांति के आर्थिक परिणाम" (1919) में इसे "कार्थेज जैसी शांति" (हारे हुए को पूरी तरह कुचलने वाली) कहकर चेतावनी दी थी कि यह यूरोप को फिर संकट में डालेगी।
✅ पक्ष — "बीज थे" | ❌ विपक्ष — "सीधे ज़िम्मेदार नहीं" |
◆ युद्ध-दोष और "थोपी हुई संधि" — राष्ट्रीय अपमान, जिसे हिटलर ने भुनाया ◆ भारी हर्जाना → रूर-संकट, 1923 की अति-मुद्रास्फीति → मध्यम वर्ग तबाह ◆ भूमि-हानि, पोलिश गलियारा, डैन्ज़िग — ठीक इन्हीं पर 1939 में युद्ध छिड़ा ◆ जर्मन-भाषियों को चेकोस्लोवाकिया-पोलैंड में रखना — आत्मनिर्णय का दोहरा मानदंड ◆ जर्मनी को कमज़ोर किया, पर इतना नहीं कि वह फिर उठ न सके — "न पूरी तरह कठोर, न उदार" ◆ इटली और जापान भी असंतुष्ट — "विकृत जीत" | ◆ हर्जाना बाद में घटाया गया (डॉज़ 1924, यंग 1929) और 1932 में लगभग समाप्त ◆ 1924–29 में जर्मनी स्थिर हुआ — लोकार्नो (1925), राष्ट्रसंघ में प्रवेश (1926) ◆ असली मोड़ 1929 की महामंदी — उसी ने नाज़ियों को सत्ता दिलाई ◆ हिटलर की विचारधारा — "जीवन-स्थान", नस्लवाद — वर्साय से कहीं आगे गई ◆ ब्रिटेन-फ्रांस का तुष्टीकरण और राष्ट्रसंघ की विफलता — संधि को लागू ही नहीं किया ◆ अमेरिका का अलगाववाद — संधि का गारंटर ही हट गया |
निष्कर्ष: वर्साय संधि ने असंतोष, बदले की भावना और अस्थिरता का उपजाऊ खेत अवश्य तैयार किया — पर उसमें बीज को पेड़ बनाने का काम महामंदी, हिटलर की आक्रामक विचारधारा, तुष्टीकरण और राष्ट्रसंघ की विफलता ने किया। इसलिए वर्साय एक महत्वपूर्ण, पर एकमात्र नहीं, कारण था।
(फ़ासीवाद-नाज़ीवाद के उदय और हिटलर की विदेश नीति का विस्तृत अध्ययन पिछले अध्याय में है; यहाँ कारणों का समेकित रूप दिया गया है।)
प्रकार | कारण | विवरण |
दीर्घकालिक | वर्साय की कठोर संधि | जर्मनी का अपमान और बदले की भावना; इटली-जापान का असंतोष |
अधिनायकवाद का उदय | इटली (मुसोलिनी, 1922), जर्मनी (हिटलर, 1933), जापान का सैन्यवाद — युद्ध-पूजा और विस्तारवाद | |
महामंदी (1929) | बेरोज़गारी और निराशा; लोकतंत्र से मोहभंग; संकुचित आर्थिक राष्ट्रवाद | |
राष्ट्रसंघ की विफलता | मंचूरिया (1931), अबीसीनिया (1935) — आक्रमणकारी दंडित नहीं हुए | |
निःशस्त्रीकरण की विफलता | जिनेवा निःशस्त्रीकरण सम्मेलन (1932–34) विफल; जर्मनी का पुनःशस्त्रीकरण (1935) | |
धुरी का निर्माण | रोम-बर्लिन धुरी, कॉमिन्टर्न-विरोधी समझौता (1936), इस्पात समझौता (1939) | |
साम्यवाद का भय | पश्चिम ने हिटलर को सोवियत संघ के विरुद्ध "दीवार" माना; सोवियत संघ पर अविश्वास | |
निकट के | तुष्टीकरण | राइनलैंड (1936), ऑस्ट्रिया-विलय (1938), म्यूनिख समझौता (1938) — हिटलर का हौसला बढ़ा |
प्राग पर क़ब्ज़ा (मार्च 1939) | तुष्टीकरण का अंत — ब्रिटेन-फ्रांस ने पोलैंड को सुरक्षा-गारंटी दी | |
नाज़ी-सोवियत समझौता (23 अगस्त 1939) | दो मोर्चों का डर ख़त्म; गुप्त धारा में पोलैंड का बँटवारा | |
तात्कालिक | पोलैंड पर आक्रमण (1 सितंबर 1939) | डैन्ज़िग और पोलिश गलियारे की माँग के बहाने; 3 सितंबर को ब्रिटेन-फ्रांस ने युद्ध घोषित किया |
दूसरे युद्ध के कारणों को एक शृंखला की तरह पढ़िए। वर्साय की संधि ने जर्मनी में अपमान और बदले की भावना छोड़ी। महामंदी ने करोड़ों को बेरोज़गार किया और लोगों का लोकतंत्र से विश्वास उठा दिया। इन दोनों के मेल ने हिटलर को सत्ता दी, जिसकी विचारधारा में युद्ध कोई मजबूरी नहीं, लक्ष्य था — उसे पूरब में ज़मीन जीतनी थी। जब उसने एक-एक करके संधि तोड़नी शुरू की, तो राष्ट्र संघ कुछ नहीं कर सका और ब्रिटेन-फ्रांस ने युद्ध से बचने के लिए उसकी माँगें मान लीं। हर रियायत ने उसे और साहसी बनाया। अंत में सोवियत संघ से समझौता करके उसने दो ओर से घिरने का ख़तरा भी हटा लिया।
इसलिए पहले और दूसरे युद्ध के कारणों में एक बुनियादी अंतर है। 1914 में लगभग सभी बड़े देश किसी न किसी हद तक ज़िम्मेदार थे, और युद्ध काफ़ी हद तक ग़लत अनुमानों से भड़का। 1939 का युद्ध एक शासन की सोची-समझी आक्रामक नीति का नतीजा था; बाक़ी देशों का दोष यह था कि उन्होंने उसे समय रहते नहीं रोका।
📌 एशिया में युद्ध की जड़ें जापान का साम्राज्यवाद — मंचूरिया (1931), कठपुतली "मंचुकुओ" (1932), राष्ट्रसंघ छोड़ना (1933), चीन पर पूर्ण आक्रमण (जुलाई 1937) और नानकिंग नरसंहार (दिसंबर 1937)। अमेरिका ने 1941 में जापान पर तेल-प्रतिबंध लगाया — इसी से जापान ने पर्ल हार्बर पर हमला कर युद्ध को सचमुच विश्वव्यापी बना दिया। |
चित्र 3: द्वितीय विश्व युद्ध के प्रमुख पड़ाव — आक्रमण, मोड़ और विजय |
चरण | प्रमुख घटनाएँ |
1. धुरी की विजयें (1939–1941) | पोलैंड पर "ब्लिट्ज़क्रीग" (बिजली की गति वाला युद्ध — टैंक + वायुसेना) — 17 सितंबर को पूर्व से सोवियत आक्रमण; सर्दियों का "नक़ली युद्ध"; अप्रैल 1940 — डेनमार्क, नॉर्वे; मई 1940 — नीदरलैंड, बेल्जियम, फ्रांस; डनकर्क से 3 लाख से अधिक मित्र सैनिकों की निकासी; 22 जून 1940 — फ्रांस का आत्मसमर्पण (दक्षिण में विशी सरकार); चर्चिल ब्रिटेन के प्रधानमंत्री (मई 1940); ब्रिटेन का हवाई युद्ध (जुलाई–अक्टूबर 1940) — जर्मन वायुसेना की पहली हार; यूनान, यूगोस्लाविया, उत्तरी अफ्रीका में रोमेल |
2. युद्ध का विश्वव्यापी होना (1941) | मार्च 1941 — अमेरिका का "उधार-पट्टा" (Lend-Lease) क़ानून; 22 जून 1941 — "ऑपरेशन बारबरोसा": जर्मनी का सोवियत संघ पर आक्रमण, लेनिनग्राद का 872 दिन का घेरा, दिसंबर में मास्को के द्वार पर जर्मन सेना रुकी; अगस्त 1941 — अटलांटिक चार्टर (रूज़वेल्ट-चर्चिल); 7 दिसंबर 1941 — जापान का पर्ल हार्बर (हवाई) पर हमला → अमेरिका युद्ध में |
3. धुरी का चरम (1942) | जापान ने मलाया, सिंगापुर (15 फ़रवरी 1942), फ़िलीपींस, इंडोनेशिया, बर्मा जीते — भारत की सीमा तक; जर्मन सेना स्टालिनग्राद और काकेशस तक, रोमेल मिस्र में |
4. निर्णायक मोड़ (1942–1943) | मिडवे (जून 1942) — अमेरिकी नौसेना ने चार जापानी विमानवाहक डुबोए; एल अलामीन (अक्टूबर-नवंबर 1942) — ब्रिटिश जनरल मॉन्टगोमरी ने रोमेल को हराया; स्टालिनग्राद (अगस्त 1942 – फ़रवरी 1943) — जर्मन छठी सेना का आत्मसमर्पण — युद्ध का सबसे बड़ा मोड़; कुर्स्क (जुलाई 1943) — इतिहास की सबसे बड़ी टैंक-लड़ाई |
5. मित्र राष्ट्रों की बढ़त (1943–1944) | जुलाई 1943 — सिसिली; मुसोलिनी का पतन, सितंबर में इटली का आत्मसमर्पण; नवंबर 1943 — तेहरान सम्मेलन; 6 जून 1944 — "डी-डे": फ्रांस के नॉर्मंडी तट पर इतिहास का सबसे बड़ा समुद्री-थल अवतरण; अगस्त 1944 — पेरिस मुक्त; इम्फाल-कोहिमा (मार्च–जुलाई 1944) — जापान की भारत पर चढ़ाई विफल |
6. यूरोप में अंत (1945) | फ़रवरी 1945 — याल्टा सम्मेलन; सोवियत सेना बर्लिन में; 30 अप्रैल — हिटलर की आत्महत्या; 7–8 मई 1945 — जर्मनी का बिना शर्त आत्मसमर्पण (8 मई — यूरोप विजय दिवस) |
7. एशिया में अंत (1945) | जुलाई-अगस्त — पॉट्सडैम सम्मेलन; 6 अगस्त — हिरोशिमा; 8 अगस्त — सोवियत संघ का जापान पर युद्ध घोषित; 9 अगस्त — नागासाकी; 15 अगस्त — सम्राट हिरोहितो ने रेडियो पर आत्मसमर्पण घोषित किया; 2 सितंबर 1945 — टोक्यो खाड़ी में अमेरिकी युद्धपोत "मिसौरी" पर औपचारिक आत्मसमर्पण — युद्ध समाप्त |
तालिका में सात चरणों की घटनाएँ हैं। उन्हें समझने के लिए छह प्रश्न पूछिए।
1. "बिजली-युद्ध" क्या था, और वह इतना सफल क्यों रहा? पहले युद्ध से जर्मन जनरलों ने सीखा था कि खाइयों में फँसना हार है। नई युक्ति यह थी: शत्रु की पूरी रेखा पर नहीं, एक संकरी जगह पर सैकड़ों टैंक एक साथ झोंक दो; ऊपर से विमान सड़कों, पुलों और संचार को तोड़ें; टैंक रेखा तोड़कर सीधे सैकड़ों किलोमीटर भीतर घुस जाएँ और शत्रु की सेना को पीछे से घेर लें। शत्रु को सँभलने का समय ही नहीं मिलता। पोलैंड चार सप्ताह में गिरा।
2. फ्रांस छह सप्ताह में कैसे हार गया? फ्रांस ने पिछले युद्ध की तैयारी की थी: उसने जर्मन सीमा पर क़िलों की अभेद्य दीवार बना रखी थी। जर्मन टैंक उस दीवार से टकराए ही नहीं; वे उसके उत्तर में घने जंगलों वाले पहाड़ी इलाक़े से निकले, जिसे फ्रांस टैंकों के लिए असंभव मानता था, और सीधे समुद्र तट तक पहुँचकर ब्रिटिश-फ्रांसीसी सेनाओं को दो हिस्सों में काट दिया। ब्रिटेन अपनी सेना को किसी तरह नावों से निकाल ले गया, पर सारा साज़ो-सामान वहीं छूट गया।
3. ब्रिटेन कैसे बचा? ब्रिटेन पर चढ़ाई के लिए जर्मनी को पहले आसमान पर क़ब्ज़ा चाहिए था। 1940 की गर्मियों में महीनों तक हवाई लड़ाई चली। ब्रिटेन के पास एक नई खोज थी — राडार, जो आते हुए विमानों को दूर से पकड़ लेता था — और उसके नए प्रधानमंत्री चर्चिल ने समझौते से इनकार कर दिया। जर्मनी आसमान नहीं जीत सका और चढ़ाई टाल दी गई। यह हिटलर की पहली विफलता थी।
4. हिटलर ने सोवियत संघ पर हमला क्यों किया? यह उसकी सबसे बड़ी भूल मानी जाती है, पर उसकी विचारधारा में यही असली युद्ध था: पूरब की ज़मीन और संसाधन जीतना और साम्यवाद को मिटाना। शुरू के महीनों में जर्मन सेना ने लाखों सोवियत सैनिक बंदी बनाए और मास्को के पास तक पहुँच गई। पर देश इतना विशाल था कि जीतते-जीतते भी उसका अंत नहीं आता था; फिर भयंकर सर्दी आई, जिसके लिए जर्मन सैनिकों के पास कपड़े तक नहीं थे; और सोवियत संघ ने अपने कारख़ाने उखाड़कर पहाड़ों के उस पार ले जाकर फिर चालू कर दिए।
5. जापान ने अमेरिका पर हमला क्यों किया? जापान चीन में युद्ध लड़ रहा था और उसे तेल, रबर तथा लोहे की ज़रूरत थी, जो दक्षिण-पूर्व एशिया में थे। जब उसने उस ओर क़दम बढ़ाए, तो अमेरिका ने उसे तेल बेचना बंद कर दिया। जापान के पास कुछ ही महीनों का तेल बचा था। उसके सामने दो रास्ते थे: चीन से पीछे हटे, या दक्षिण-पूर्व एशिया के तेल-क्षेत्रों पर क़ब्ज़ा कर ले। दूसरे रास्ते में एक ही रुकावट थी — प्रशांत महासागर में खड़ा अमेरिकी बेड़ा। जापान ने उसे एक ही झटके में नष्ट करने के लिए बिना चेतावनी हमला किया। इससे उसे छह महीने की बढ़त मिली, पर उसने दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक शक्ति को अपने विरुद्ध खड़ा कर लिया।
6. पासा कहाँ पलटा? 1942 के अंत में, छह महीने के भीतर, तीन जगहों पर। प्रशांत में अमेरिकी नौसेना ने जापान के चार बड़े विमानवाहक जहाज़ डुबो दिए; इसके बाद जापान कभी आगे नहीं बढ़ सका। अफ्रीका में ब्रिटिश सेना ने जर्मनों को मिस्र के द्वार से खदेड़ दिया। और सोवियत संघ के स्टालिनग्राद नगर में, गली-गली और मकान-मकान की पाँच महीने की लड़ाई के बाद, जर्मनी की एक पूरी सेना घिरकर हथियार डालने को मजबूर हुई। यहाँ से जर्मन सेना केवल पीछे हटती गई। आगे का युद्ध लंबा और ख़ूनी था, पर नतीजा अब तय था।
◆ मैनहट्टन परियोजना: नाज़ी जर्मनी के परमाणु बम बनाने के डर से (आइंस्टाइन के 1939 के पत्र के बाद) अमेरिका ने गुप्त परियोजना चलाई — वैज्ञानिक निदेशक रॉबर्ट ओपनहाइमर; 16 जुलाई 1945 को न्यू मेक्सिको में पहला परीक्षण ("ट्रिनिटी")।
नगर | तिथि | बम | मौतें (अनुमानित) |
हिरोशिमा | 6 अगस्त 1945 | "लिटिल बॉय" — यूरेनियम; विमान "एनोला गे" | तत्काल लगभग 70–80 हज़ार; 1945 के अंत तक लगभग 1.4 लाख |
नागासाकी | 9 अगस्त 1945 | "फ़ैट मैन" — प्लूटोनियम | तत्काल लगभग 40 हज़ार; 1945 के अंत तक लगभग 70 हज़ार |
◆ बचे हुए लोग — "हिबाकुशा" — दशकों तक विकिरण-जनित कैंसर, जन्म-दोष और सामाजिक भेदभाव झेलते रहे। हिरोशिमा की बालिका सदाको सासाकी और उसके हज़ार काग़ज़ी सारस शांति के प्रतीक बने।
⚖️ प्रयोग के पक्ष में तर्क | 🕊️ विरोध में तर्क |
◆ जापान पर ज़मीनी आक्रमण में लाखों अमेरिकी और जापानी जानें जातीं (इवो जीमा, ओकिनावा का अनुभव) ◆ जापान आत्मसमर्पण नहीं कर रहा था — "अंतिम व्यक्ति तक" लड़ाई की तैयारी ◆ युद्ध को तुरंत समाप्त करना ◆ पर्ल हार्बर और जापानी युद्ध-अपराधों का उत्तर | ◆ नागरिकों का जानबूझकर संहार — नैतिक अपराध ◆ जापान पहले ही लगभग पराजित था; सोवियत प्रवेश से आत्मसमर्पण निकट था ◆ दूसरा बम तीन ही दिन बाद — सोचने का समय नहीं दिया ◆ असल उद्देश्य — युद्धोत्तर दुनिया में सोवियत संघ को शक्ति-प्रदर्शन |
◆ ऐतिहासिक महत्व: परमाणु युग की शुरुआत; शीत युद्ध की परमाणु-होड़ (सोवियत बम 1949); "परस्पर सुनिश्चित विनाश" (MAD) का भय; आगे आंशिक परीक्षण-प्रतिबंध संधि (1963), परमाणु अप्रसार संधि (1968); भारत ने परमाणु निःशस्त्रीकरण की माँग उठाई।
“मैं नहीं जानता कि तीसरा विश्व युद्ध किन हथियारों से लड़ा जाएगा, पर चौथा विश्व युद्ध लाठियों और पत्थरों से लड़ा जाएगा।” (अल्बर्ट आइंस्टाइन (प्रचलित कथन)) |
इस बहस पर संतुलित निष्कर्ष: यह प्रश्न आज भी इतिहासकारों को बाँटता है, और परीक्षा में दोनों पक्ष रखना ही ठीक है। जो इसे उचित मानते हैं, उनका तर्क संख्या का है: बम से लगभग दो लाख लोग मरे, जबकि जापान पर ज़मीनी चढ़ाई में इससे कई गुना अधिक मरते। जो इसे अनुचित मानते हैं, उनका तर्क सिद्धांत का है: दोनों नगर सैनिक ठिकाने नहीं, आम लोगों से भरे शहर थे, और निहत्थे नागरिकों को जान-बूझकर मारना किसी भी लक्ष्य से उचित नहीं ठहरता; और जापान वैसे भी टूटने के कगार पर था। जिस बात पर लगभग सब सहमत हैं, वह यह है कि इन दो बमों ने दुनिया को हमेशा के लिए बदल दिया: पहली बार मनुष्य के हाथ में ऐसा हथियार आया जिससे वह पूरी सभ्यता को मिटा सकता है, और इसी डर ने आगे के पैंतालीस वर्षों की राजनीति तय की।
1. संसाधनों की असमानता: अमेरिका का विशाल औद्योगिक उत्पादन — "लोकतंत्र का शस्त्रागार"; सोवियत संघ की अपार जनशक्ति; ब्रिटिश साम्राज्य (भारत सहित) के संसाधन।
2. हिटलर की सामरिक भूलें: ब्रिटेन को हराए बिना सोवियत संघ पर आक्रमण — दो मोर्चों का युद्ध; पर्ल हार्बर के बाद अमेरिका पर युद्ध घोषित करना; स्टालिनग्राद में "पीछे न हटने" का आदेश।
3. रूसी सर्दी और विशालता — नेपोलियन की तरह हिटलर भी उलझ गया; सोवियत जनता का "महान देशभक्तिपूर्ण युद्ध"।
4. धुरी में समन्वय का अभाव — इटली कमज़ोर कड़ी, जापान-जर्मनी की अलग-अलग रणनीति।
5. गुप्तचर और तकनीक: जर्मन "एनिग्मा" कूट-संदेशों को ब्रिटेन के ब्लेचली पार्क में तोड़ा गया; राडार; अंततः परमाणु बम।
6. समुद्र और आकाश पर नियंत्रण — अटलांटिक की लड़ाई में पनडुब्बियों की हार; जर्मन नगरों-कारख़ानों पर भारी बमबारी।
आधार | प्रथम विश्व युद्ध | द्वितीय विश्व युद्ध |
मुख्य कारण | साम्राज्यवादी होड़, गुटबंदी, राष्ट्रवाद | वर्साय का बदला, फ़ासीवाद-नाज़ीवाद की विचारधारा, विस्तारवाद |
प्रकृति | मुख्यतः खाई-युद्ध — स्थिर, थकाऊ | गतिशील — ब्लिट्ज़क्रीग, टैंक, वायुशक्ति, विमानवाहक |
नागरिक | मौतें मुख्यतः सैनिकों की | अधिकांश मौतें नागरिकों की — बमबारी, प्रलय, अकाल |
वैचारिक पक्ष | कम — राष्ट्रों का संघर्ष | प्रबल — लोकतंत्र बनाम फ़ासीवाद, बाद में साम्यवाद भी |
अंत | युद्ध-विराम; जर्मनी पर क़ब्ज़ा नहीं | बिना शर्त आत्मसमर्पण; जर्मनी-जापान पर क़ब्ज़ा |
शांति-व्यवस्था | वर्साय संधि, राष्ट्रसंघ — दुर्बल | संयुक्त राष्ट्र — सुरक्षा परिषद और वीटो |
शक्ति-संतुलन | यूरोप कमज़ोर, पर केंद्र में; अमेरिका अलगाव में लौटा | यूरोप का वर्चस्व समाप्त — अमेरिका और सोवियत संघ महाशक्तियाँ |
उपनिवेश | राष्ट्रवाद जागा (भारत, मिस्र, तुर्की) | वि-उपनिवेशीकरण का दौर — भारत (1947) से आरंभ |
भारत पर | रॉलेट एक्ट, जलियाँवाला बाग़, ख़िलाफ़त, असहयोग | मंत्रिमंडलों के त्यागपत्र, भारत छोड़ो, आज़ाद हिंद फ़ौज, स्वतंत्रता |
तुलना का सार: दोनों युद्धों को कई इतिहासकार एक ही लंबे संघर्ष के दो हिस्से मानते हैं, जिनके बीच बीस साल का अंतराल था — दोनों में केंद्र में जर्मनी था और दोनों का मूल प्रश्न यह था कि यूरोप पर किसका दबदबा होगा। पर स्वरूप में वे बहुत अलग थे। पहला युद्ध स्थिर था और मुख्यतः सैनिकों ने झेला; दूसरा गतिशील था और उसकी सबसे बड़ी क़ीमत आम नागरिकों ने चुकाई। पहला राष्ट्रों के स्वार्थ की लड़ाई था; दूसरे में विचारधारा जुड़ गई, इसलिए उसमें समझौते की गुंजाइश नहीं थी और वह पूर्ण हार तक लड़ा गया। और सबसे बड़ा अंतर नतीजे में है: पहले युद्ध के बाद यूरोप घायल होकर भी दुनिया का केंद्र बना रहा; दूसरे के बाद दुनिया का नेतृत्व यूरोप के हाथ से निकलकर दो ग़ैर-यूरोपीय महाशक्तियों के पास चला गया।
1. चार साम्राज्यों का अंत: जर्मन (होहेनज़ोलर्न), ऑस्ट्रो-हंगेरियन (हैब्सबर्ग), रूसी (रोमानोव) और ओटोमन साम्राज्य समाप्त — राजतंत्रों की जगह गणराज्य।
2. नए राष्ट्र: आत्मनिर्णय के सिद्धांत पर पोलैंड, चेकोस्लोवाकिया, यूगोस्लाविया, ऑस्ट्रिया, हंगरी, फ़िनलैंड, एस्टोनिया, लातविया, लिथुआनिया — पर इनमें बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक बचे रहे (जैसे चेकोस्लोवाकिया में 30 लाख जर्मन) — भविष्य के विवादों का कारण।
3. नई विचारधाराएँ: साम्यवाद (रूस, 1917), फ़ासीवाद (इटली, 1922), नाज़ीवाद (जर्मनी, 1933), जापानी सैन्यवाद — लोकतंत्र के लिए चुनौती।
4. राष्ट्रसंघ और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन — विश्व-शांति और श्रमिक-अधिकारों के लिए पहली वैश्विक संस्थाएँ।
5. मध्य-पूर्व का नक्शा: ब्रिटेन-फ्रांस का साइक्स-पिको समझौता (1916) और ब्रिटेन की बालफ़ोर घोषणा (1917) — फ़िलिस्तीन में यहूदियों के "राष्ट्रीय घर" का वादा; अरबों से भी स्वतंत्रता का वादा — अरब-इज़राइल संघर्ष की जड़।
6. अमेरिका और जापान का उदय, यूरोप की सापेक्षिक कमज़ोरी; अमेरिका फिर अलगाववाद में लौटा।
7. उपनिवेशों में जागृति: युद्ध में भागीदारी और "आत्मनिर्णय" के नारे ने भारत, मिस्र, आयरलैंड, चीन (4 मई आंदोलन, 1919) आदि में राष्ट्रवाद को तीव्र किया।
पहले युद्ध के राजनीतिक प्रभावों का सार: यह युद्ध राजाओं के यूरोप का अंत था। 1914 में यूरोप के बड़े हिस्से पर चार पुराने राजवंशों का राज था; 1918 के बाद चारों ग़ायब थे और उनकी जगह गणराज्य और नए राष्ट्र खड़े थे। पर नए राष्ट्र बनाना जितना आसान काग़ज़ पर था, उतना ज़मीन पर नहीं: मध्य यूरोप में जातियाँ इतनी घुली-मिली रहती थीं कि कोई भी सीमा-रेखा खींचो, कुछ लाख लोग "ग़लत" ओर रह ही जाते थे। युद्ध का एक और अनचाहा नतीजा उपनिवेशों में निकला। जब मित्र राष्ट्रों ने कहा कि वे "छोटे राष्ट्रों की स्वतंत्रता" और "आत्मनिर्णय" के लिए लड़ रहे हैं, तो भारत, मिस्र और चीन के लोगों ने पूछा — यह सिद्धांत हम पर क्यों नहीं लागू होता?
1. यूरोप के वर्चस्व का अंत: ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली आर्थिक-सैन्य रूप से टूट गए; अमेरिका और सोवियत संघ दो महाशक्तियाँ बने।
2. शीत युद्ध: पूँजीवादी-लोकतांत्रिक पश्चिम बनाम साम्यवादी पूर्व — चर्चिल का "लौह-आवरण" भाषण (1946), ट्रूमैन सिद्धांत (1947), नाटो (1949) बनाम बाद में वारसॉ संधि (1955) (विस्तृत अध्ययन अगले अध्याय में)।
3. जर्मनी का विभाजन: चार क़ब्ज़ा-क्षेत्र → 1949 में पश्चिम जर्मनी और पूर्वी जर्मनी; बर्लिन भी बँटा (बर्लिन दीवार, 1961); कोरिया भी 38° अक्षांश पर बँटा।
4. संयुक्त राष्ट्र (24 अक्टूबर 1945): सैन फ़्रांसिस्को सम्मेलन में चार्टर; 51 संस्थापक सदस्य (भारत सहित; आज 193); सुरक्षा परिषद में पाँच स्थायी सदस्य — अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, सोवियत संघ, चीन — वीटो शक्ति; साथ में यूनेस्को, विश्व स्वास्थ्य संगठन, खाद्य एवं कृषि संगठन, यूनिसेफ़ आदि।
5. वि-उपनिवेशीकरण: कमज़ोर यूरोप उपनिवेश नहीं थाम सका — भारत-पाकिस्तान (1947), म्यांमार, श्रीलंका (1948), इंडोनेशिया (1949), घाना (1957), और 1960 का "अफ्रीका वर्ष"।
6. युद्ध-अपराधों की जवाबदेही: न्यूरेम्बर्ग (1945–46) और टोक्यो (1946–48) मुक़दमे — टोक्यो में भारतीय न्यायाधीश राधाबिनोद पाल ने विजेताओं के न्याय पर प्रश्न उठाते हुए असहमति-निर्णय दिया।
7. मानवाधिकार: मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा (10 दिसंबर 1948) — भारत की हंसा मेहता ने "सभी पुरुष" की जगह "सभी मनुष्य" लिखवाने में भूमिका निभाई; जनसंहार-निषेध अभिसमय (1948)।
8. इज़राइल की स्थापना (1948), चीन में साम्यवादी क्रांति (1949), गुटनिरपेक्ष आंदोलन — नेहरू, नासिर, टीटो (बेलग्रेड, 1961)।
आधार | प्रथम युद्ध के बाद | द्वितीय युद्ध के बाद |
विश्व व्यवस्था | बहुध्रुवीय, यूरोप-केंद्रित | द्विध्रुवीय — अमेरिका बनाम सोवियत संघ |
शांति-संस्था | राष्ट्रसंघ — अमेरिका बाहर, सेना नहीं | संयुक्त राष्ट्र — महाशक्तियाँ भीतर, सुरक्षा परिषद |
पराजितों के साथ व्यवहार | दंडात्मक — वर्साय; बदले की भावना | क़ब्ज़ा, पर पुनर्निर्माण — मार्शल योजना, जापान का लोकतंत्रीकरण |
साम्राज्य | यूरोपीय साम्राज्य बढ़े (मैंडेट) | यूरोपीय साम्राज्यों का अंत |
नई विचारधाराएँ | फ़ासीवाद-साम्यवाद का उदय | फ़ासीवाद का अंत; साम्यवाद बनाम पूँजीवाद |
1945 में दुनिया का शक्ति-संतुलन पूरी तरह बदल गया। ब्रिटेन जीता, पर दिवालिया होकर; फ्रांस चार साल क़ब्ज़े में रहा; जर्मनी और जापान मलबा थे। केवल दो देश पहले से अधिक ताक़तवर होकर निकले: अमेरिका, जिसकी अपनी ज़मीन पर युद्ध लड़ा ही नहीं गया था और जिसके कारख़ानों ने पूरी दुनिया को हथियार दिए थे; और सोवियत संघ, जिसने दो करोड़ से अधिक लोग खोए थे पर जिसकी सेना अब आधे यूरोप पर खड़ी थी। इन्हीं दोनों को महाशक्ति कहा गया।
संयुक्त राष्ट्र को राष्ट्र संघ की ग़लतियों से सीखकर बनाया गया। इस बार सभी बड़ी ताक़तें शुरू से भीतर थीं। असली फ़ैसले लेने का अधिकार सुरक्षा परिषद को दिया गया, जिसमें पाँच बड़े देश स्थायी सदस्य हैं और हर एक के पास वीटो है — यानी इनमें से कोई एक भी "ना" कह दे तो प्रस्ताव गिर जाता है। यह व्यवस्था लोकतांत्रिक नहीं है, पर इसका तर्क व्यावहारिक था: कोई बड़ा देश तभी भीतर रहेगा जब उसके विरुद्ध फ़ैसला न हो सके; और बड़े देशों के बिना ऐसी संस्था बेकार है।
उपनिवेश इतनी जल्दी आज़ाद क्यों हुए? युद्ध ने वह काम कर दिया जो दशकों के आंदोलन नहीं कर पाए थे। यूरोपीय देशों के पास अब दूर के देशों में सेना रखने का पैसा नहीं था। एशिया में जापान ने गोरी सेनाओं को जिस आसानी से हराया, उससे उनके अजेय होने का भ्रम टूट गया। जिस युद्ध को "स्वतंत्रता के लिए" लड़ा गया बताया गया, उसके बाद दूसरों को ग़ुलाम रखना नैतिक रूप से असंभव हो गया। और दोनों नई महाशक्तियाँ, अपने-अपने कारणों से, पुराने साम्राज्यों के विरुद्ध थीं।
एक बात में इस बार विजेताओं ने पिछली भूल नहीं दोहराई। हारे हुए जर्मनी और जापान पर बदले की संधि थोपने की जगह अमेरिका ने उन्हें फिर से खड़ा करने में मदद की और वहाँ लोकतांत्रिक संविधान बनवाए। नतीजा यह कि दोनों देश कुछ ही दशकों में शांतिप्रिय और समृद्ध लोकतंत्र बन गए।
चित्र 4: दोनों युद्धों की मानवीय क़ीमत और भारत की सैन्य भागीदारी — अनुमानित तुलना |
◆ विशाल युद्ध-व्यय और विनाश — सरकारों पर भारी ऋण; महँगाई, मुद्रा का अवमूल्यन; जर्मनी में 1923 की अति-मुद्रास्फीति।
◆ अमेरिका — ऋणी से विश्व का सबसे बड़ा ऋणदाता; न्यूयॉर्क ने लंदन की जगह वित्तीय केंद्र बनना शुरू किया।
◆ युद्ध-ऋण और हर्जाने का चक्र: अमेरिका → जर्मनी को ऋण → जर्मनी → ब्रिटेन-फ्रांस को हर्जाना → वे अमेरिका को ऋण लौटाएँ — 1929 में अमेरिकी ऋण रुकते ही पूरा चक्र टूटा — महामंदी।
◆ उपनिवेशों में उद्योग: यूरोप से आयात रुकने पर भारत, जापान, लैटिन अमेरिका में वस्त्र, इस्पात, जूट उद्योग बढ़े।
◆ यूरोप और जापान के नगर-उद्योग ध्वस्त; अमेरिका की अर्थव्यवस्था युद्ध-उत्पादन से दोगुनी — विश्व उत्पादन का लगभग आधा।
◆ ब्रेटन वुड्स सम्मेलन (जुलाई 1944): 44 देश — अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और अंतरराष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक (विश्व बैंक) की स्थापना; डॉलर को सोने से जोड़कर (35 डॉलर = 1 औंस) अन्य मुद्राएँ डॉलर से — डॉलर विश्व की आरक्षित मुद्रा बना; बाद में गैट (1947) — मुक्त व्यापार की ओर (1995 से विश्व व्यापार संगठन)। भारत भी संस्थापक सदस्य।
◆ मार्शल योजना (1948–1952): अमेरिकी विदेश मंत्री जॉर्ज मार्शल द्वारा घोषित (जून 1947) "यूरोपीय पुनर्प्राप्ति कार्यक्रम" — पश्चिमी यूरोप को लगभग 1,300 करोड़ डॉलर की सहायता; उद्देश्य — पुनर्निर्माण के साथ साम्यवाद के प्रसार को रोकना; सोवियत संघ ने अपने प्रभाव वाले देशों को इससे अलग रखा।
◆ कल्याणकारी राज्य: ब्रिटेन में बेवरिज रिपोर्ट (1942) और युद्धोत्तर राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (1948); यूरोप में सामाजिक सुरक्षा; आगे यूरोपीय आर्थिक समुदाय — यूरोपीय एकीकरण की शुरुआत।
◆ जापान और पश्चिम जर्मनी का "आर्थिक चमत्कार" — अमेरिकी सहायता से 1960 के दशक तक बड़ी आर्थिक शक्तियाँ।
आर्थिक प्रभावों का सार: दोनों युद्धों का सबसे बड़ा आर्थिक नतीजा यह था कि दुनिया का आर्थिक केंद्र यूरोप से हटकर अमेरिका चला गया। 1914 से पहले लंदन दुनिया का बैंक था और यूरोप दुनिया को उधार देता था; दो युद्धों के बाद वही यूरोप अमेरिका का क़र्ज़दार था और डॉलर दुनिया की मुख्य मुद्रा बन गया। दूसरा नतीजा सरकार की भूमिका में बदलाव था। युद्ध जीतने के लिए सरकारों को कारख़ाने, मज़दूरी, दाम और राशन — सब अपने हाथ में लेने पड़े थे। इससे लोगों ने देखा कि सरकार चाहे तो बेरोज़गारी मिटा सकती है। इसलिए युद्ध के बाद जनता ने माँग की कि जो काम युद्ध के लिए किया गया, वही शांति में स्वास्थ्य, शिक्षा और रोज़गार के लिए किया जाए; इसी से कल्याणकारी राज्य का जन्म हुआ। तीसरा नतीजा उपनिवेशों के लिए था: यूरोप से माल आना रुका तो भारत जैसे देशों में अपने उद्योग पनपने का मौक़ा मिला।
प्रभाव | प्रथम विश्व युद्ध | द्वितीय विश्व युद्ध |
जनहानि | लगभग 90 लाख सैनिक, 2 करोड़ से अधिक घायल; युवा पुरुषों की पूरी पीढ़ी नष्ट — "खोई हुई पीढ़ी" | लगभग 7–8.5 करोड़ — विश्व जनसंख्या का लगभग 3%; सोवियत संघ (लगभग 2.7 करोड़) और चीन की सर्वाधिक क्षति |
नरसंहार | आर्मेनियाई जनसंहार (1915–17) — ओटोमन सरकार द्वारा लगभग 10–15 लाख आर्मेनियाई | प्रलय — लगभग 60 लाख यहूदी; नानकिंग में जापानी अत्याचार |
महामारी | स्पेनिश फ़्लू (1918–20) — दुनिया भर में लगभग 5 करोड़ मौतें; भारत में सबसे अधिक — लगभग 1.2–1.7 करोड़ | टाइफ़स, भुखमरी; बंगाल अकाल (1943) |
विस्थापन | शरणार्थी — रूसी, आर्मेनियाई | करोड़ों विस्थापित; लगभग 1.2 करोड़ जर्मन पूर्वी यूरोप से निकाले गए |
मानसिक आघात | "शेल-शॉक" — खाइयों की बमबारी से मानसिक आघात; मनोचिकित्सा पर ध्यान | युद्ध-आघात (आगे चलकर "अभिघातज तनाव विकार" — PTSD — की पहचान) |
◆ युद्ध-विरोधी साहित्य: एरिक मारिया रेमार्क — "पश्चिमी मोर्चे पर सब शांत" (1929); विल्फ़्रेड ओवेन की युद्ध-कविताएँ; अर्नेस्ट हेमिंग्वे — "ए फ़ेयरवेल टू आर्म्स"; अमेरिकी लेखिका गर्ट्रूड स्टाइन ने युद्ध देखने वाली पीढ़ी को "खोई हुई पीढ़ी" कहा।
◆ मोहभंग और नए कला-आंदोलन: प्रगति और तर्क पर विश्वास डगमगाया — दादावाद, अतियथार्थवाद (Surrealism); द्वितीय युद्ध के बाद अस्तित्ववाद (सार्त्र, कामू); पिकासो की "ग्वेर्निका", ऐन फ़्रैंक की डायरी।
◆ विज्ञान-तकनीक: युद्ध ने अनुसंधान को गति दी — राडार, जेट इंजन, रॉकेट (V-2), पेनिसिलिन का बड़े पैमाने पर उत्पादन, कंप्यूटर (कूट-भेदन), परमाणु ऊर्जा — आगे चलकर अंतरिक्ष युग।
◆ नस्लवाद पर प्रश्न: एशियाई-अफ्रीकी सैनिकों की वीरता और नाज़ी नस्लवाद की भयावहता ने "श्वेत श्रेष्ठता" की धारणा को कमज़ोर किया; अमेरिका में नागरिक अधिकार आंदोलन को बल।
दोनों विश्व युद्धों ने यूरोप और अमेरिका में महिलाओं की आर्थिक और राजनीतिक भागीदारी को अभूतपूर्व रूप से बढ़ाया। पुरुष मोर्चे पर गए तो कारख़ाने, खेत, दफ़्तर, परिवहन और अस्पताल महिलाओं ने सँभाले — और इसी योगदान ने उनके मताधिकार की माँग को अकाट्य बना दिया।
◆ कारख़ानों में: ब्रिटेन में लाखों महिलाएँ गोला-बारूद के कारख़ानों में — इन्हें "म्यूनिशनेट" कहा गया; विस्फोटक रसायनों से त्वचा पीली पड़ने के कारण "कैनरी लड़कियाँ" भी; बस-ट्राम संचालक, डाक, बैंक, खेत ("महिला भूमि सेना")।
◆ सेवा: नर्सें, एम्बुलेंस चालक, सेना की सहायक शाखाएँ; ब्रिटिश नर्स एडिथ कैवेल (जर्मनों द्वारा 1915 में मृत्युदंड) प्रतीक बनीं।
◆ मताधिकार: ब्रिटेन — 1918 (30 वर्ष से अधिक, कुछ संपत्ति-शर्तों के साथ), 1928 में पुरुषों के बराबर; जर्मनी (1918–19), सोवियत रूस (1917), अमेरिका (1920), कनाडा, ऑस्ट्रिया, पोलैंड आदि।
◆ सामाजिक बदलाव: छोटे बाल, छोटे परिधान, अकेले यात्रा, धूम्रपान — 1920 के दशक की "नई महिला"; परिवार-नियोजन की चर्चा।
◆ "रोज़ी द रिवेटर" — अमेरिका में कारख़ानों में काम करने वाली महिलाओं का प्रतीक-पोस्टर ("हम कर सकती हैं!"); युद्ध के दौरान लगभग 60 लाख अमेरिकी महिलाएँ पहली बार कामकाजी बनीं — विमान, जहाज़, टैंक कारख़ानों में।
◆ सोवियत संघ: लगभग 8 लाख महिलाएँ सेना में — निशानेबाज़, पायलट, टैंक-चालक; महिला बमवर्षक दस्ता "रात की चुड़ैलें" (Night Witches)।
◆ प्रतिरोध आंदोलन: फ्रांस, पोलैंड, यूगोस्लाविया में महिलाएँ गुप्तचर, संदेशवाहक, छापामार; भारत में आज़ाद हिंद फ़ौज की "रानी झाँसी रेजिमेंट" — कैप्टन लक्ष्मी सहगल के नेतृत्व में।
◆ मताधिकार: फ्रांस (1944), इटली (1945–46), जापान (1945) — युद्ध का सीधा परिणाम।
✅ स्थायी उपलब्धियाँ | ⚠️ सीमाएँ |
◆ मताधिकार और राजनीतिक भागीदारी ◆ आर्थिक स्वतंत्रता — अपना वेतन, बैंक खाता ◆ "केवल गृहिणी" की छवि टूटी — कामकाजी महिला की पहचान ◆ मानवाधिकार घोषणा (1948) में लैंगिक समानता ◆ 1960 के दशक के नारीवादी आंदोलन की नींव | ◆ युद्ध के बाद पुरुष लौटे तो कई महिलाओं को नौकरियों से हटाया गया ◆ समान काम, समान वेतन नहीं मिला ◆ युद्धोत्तर प्रचार ने फिर "घर-परिवार" की भूमिका पर ज़ोर दिया ◆ युद्ध में महिलाओं पर यौन-हिंसा, विधवापन, विस्थापन का भारी बोझ |
📌 उत्तर-लेखन संकेत "दोनों विश्व युद्धों ने यूरोपीय महिलाओं की भागीदारी कैसे बढ़ाई?" — ऐसे प्रश्न में तीनों पक्ष लिखें: (1) प्रथम युद्ध — कारख़ाने (म्यूनिशनेट) + मताधिकार (ब्रिटेन 1918, जर्मनी 1919); (2) द्वितीय युद्ध — रोज़ी द रिवेटर, सोवियत महिला सैनिक, फ्रांस 1944 / इटली 1945 का मताधिकार; (3) दीर्घकालिक — आर्थिक स्वतंत्रता, कल्याणकारी राज्य, नारीवाद की नींव — और सीमाएँ भी। |
◆ सहयोग और आशा: गांधी सहित अधिकांश नेताओं ने इस आशा में ब्रिटेन का साथ दिया कि युद्ध के बाद स्वशासन मिलेगा; गांधी ने सैनिक-भर्ती में भी सहायता की।
◆ होमरूल आंदोलन (1916): तिलक (अप्रैल 1916) और एनी बेसेंट (सितंबर 1916) की होमरूल लीगें; लखनऊ समझौता (दिसंबर 1916) — कांग्रेस-लीग एकता और नरम-गरम दल फिर एक।
◆ मॉन्टेग्यू घोषणा (20 अगस्त 1917): भारत में "उत्तरदायी शासन" का क्रमिक विकास — ब्रिटिश नीति का लक्ष्य घोषित।
◆ ग़दर आंदोलन (1915) का सशस्त्र विद्रोह-प्रयास विफल; सिंगापुर में भारतीय सैनिकों का विद्रोह (फ़रवरी 1915)।
◆ विश्वासघात: युद्ध के बाद रॉलेट अधिनियम (मार्च 1919) — बिना मुक़दमे गिरफ़्तारी ("न दलील, न वकील, न अपील" — "काला क़ानून"); 13 अप्रैल 1919 — जलियाँवाला बाग़ में जनरल डायर की गोलीबारी (सरकारी आँकड़ा 379 मृत, वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक); टैगोर ने "नाइट" की उपाधि लौटाई; हंटर समिति।
◆ भारत सरकार अधिनियम 1919 (प्रांतों में द्वैध शासन) — अपेक्षाओं से बहुत कम।
◆ ख़िलाफ़त आंदोलन: सेव्र की संधि (1920) से ओटोमन ख़लीफ़ा की शक्ति पर चोट → अली बंधुओं का ख़िलाफ़त आंदोलन; गांधी ने इसे हिंदू-मुस्लिम एकता का अवसर मानकर असहयोग आंदोलन (1920) से जोड़ा — गांधी "सहयोगी से असहयोगी" बन गए और राष्ट्रीय आंदोलन जन-आंदोलन बना।
1914 में भारत के लगभग सभी नेताओं ने, गांधी सहित, ब्रिटेन का साथ दिया। उनका विश्वास था कि संकट में साथ देने पर युद्ध के बाद भारत को स्वशासन मिलेगा; 1917 में ब्रिटिश सरकार की घोषणा ने इस उम्मीद को और पक्का किया। तेरह लाख भारतीय मोर्चों पर गए और भारत ने धन तथा सामान से युद्ध में भारी योगदान दिया।
युद्ध ख़त्म होने पर जो मिला, वह इसका उलटा था। युद्ध के समय के आपातकालीन क़ानूनों को हटाने की जगह एक नए क़ानून से स्थायी बना दिया गया, जिसमें बिना मुक़दमे जेल भेजा जा सकता था। उसके विरोध में अमृतसर के एक बाग़ में जुटी निहत्थी भीड़ पर गोलियाँ चलाई गईं। सुधारों के नाम पर जो क़ानून आया, उसमें असली सत्ता अंग्रेज़ों के ही हाथ में रही। ऊपर से महँगाई, भारी कर और महामारी ने आम आदमी का जीना दूभर कर दिया था। और मुसलमान इस बात से आहत थे कि ब्रिटेन ने तुर्की के सुल्तान की, जो उनका धार्मिक मुखिया माना जाता था, सत्ता छीन ली।
इन सबके मेल से तीन बड़े बदलाव आए। गांधी, जो अब तक ब्रिटिश साम्राज्य को मूलतः न्यायपूर्ण मानते थे, उसके विरोधी बन गए। राष्ट्रीय आंदोलन, जो अब तक पढ़े-लिखे वर्ग की याचिकाओं तक सीमित था, जन-आंदोलन बन गया, क्योंकि महँगाई और करों ने किसान और मज़दूर को भी उसमें खींच लिया। और कुछ वर्षों के लिए हिंदू-मुस्लिम एकता बनी, क्योंकि दोनों की शिकायतें एक ही सरकार से थीं।
◆ टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (टिस्को, जमशेदपुर — स्थापना 1907) ने मेसोपोटामिया-मिस्र के मोर्चों के लिए रेल-पटरियाँ और इस्पात दिया — युद्ध ने भारतीय इस्पात उद्योग को पहचान दिलाई।
◆ जूट उद्योग (बंगाल) — रेत की बोरियाँ, तंबू, थैले — उत्पादन और मुनाफ़े में भारी वृद्धि; सूती वस्त्र (बंबई, अहमदाबाद) — ब्रिटिश आयात घटा, सेना की वर्दियाँ।
◆ सरकारी नीति में बदलाव: भारतीय औद्योगिक आयोग (1916–18), भारतीय युद्ध-सामग्री बोर्ड (1917); युद्ध के बाद राजकोषीय आयोग (1921–22) और "विभेदकारी संरक्षण" — इस्पात उद्योग संरक्षण अधिनियम (1924)।
◆ नकारात्मक: भारी महँगाई, युद्ध-ऋण, कर-वृद्धि, ज़बरन भर्ती; 1918 का स्पेनिश फ़्लू — भारत में सबसे अधिक मौतें — जिसने असंतोष को और गहरा किया।
वर्ष | घटना | महत्व |
3 सितंबर 1939 | वायसराय लिनलिथगो ने भारतीयों से पूछे बिना भारत को युद्ध में शामिल घोषित किया | राष्ट्रीय अपमान |
अक्टूबर-नवंबर 1939 | कांग्रेस के प्रांतीय मंत्रिमंडलों का त्यागपत्र; मुस्लिम लीग ने "मुक्ति दिवस" (22 दिसंबर) मनाया | कांग्रेस-सरकार टकराव |
मार्च 1940 | मुस्लिम लीग का लाहौर प्रस्ताव | पाकिस्तान की माँग |
8 अगस्त 1940 | अगस्त प्रस्ताव — युद्ध के बाद संविधान-सभा, "डोमिनियन" दर्जा | कांग्रेस ने अस्वीकार किया |
अक्टूबर 1940 | व्यक्तिगत सत्याग्रह — पहले सत्याग्रही विनोबा भावे, दूसरे नेहरू | युद्ध-विरोध, पर सीमित |
मार्च 1942 | क्रिप्स मिशन — युद्ध के बाद डोमिनियन दर्जा, प्रांतों को अलग होने का अधिकार | विफल — "दिवालिया बैंक का आगे की तारीख़ का चेक" |
8 अगस्त 1942 | भारत छोड़ो प्रस्ताव (बंबई) — "करो या मरो"; अगले दिन सभी नेता गिरफ़्तार; बलिया, सतारा, तामलुक में समानांतर सरकारें | स्वतंत्रता आंदोलन का चरम |
1942–1945 | सुभाष चंद्र बोस — जर्मनी से दक्षिण-पूर्व एशिया; आज़ाद हिंद फ़ौज का नेतृत्व (जुलाई 1943), आज़ाद हिंद सरकार (21 अक्टूबर 1943), अंडमान में तिरंगा (दिसंबर 1943); इम्फाल-कोहिमा (1944) | "दिल्ली चलो", "तुम मुझे ख़ून दो…" |
1945–1946 | लाल क़िला मुक़दमे (शाहनवाज़ ख़ान, प्रेम सहगल, गुरबख़्श सिंह ढिल्लों); नौसेना विद्रोह (फ़रवरी 1946) | भारतीय सेना की निष्ठा डगमगाई |
1945–1947 | ब्रिटेन में एटली की लेबर सरकार; कैबिनेट मिशन (1946); 15 अगस्त 1947 — स्वतंत्रता | युद्ध से थका ब्रिटेन भारत थामने में असमर्थ |
तालिका की घटनाओं के पीछे एक सीधी कहानी है। ब्रिटेन ने भारत को बिना पूछे युद्ध में झोंक दिया। कांग्रेस ने कहा: हम फ़ासीवाद के विरुद्ध हैं, पर आज़ाद देश की तरह लड़ेंगे, ग़ुलाम की तरह नहीं; पहले यह बताओ कि युद्ध के बाद भारत आज़ाद होगा। ब्रिटेन ने हर बार टालने वाला उत्तर दिया — आज़ादी "युद्ध के बाद", और वह भी शर्तों के साथ। 1942 में, जब जापानी सेना भारत की सीमा पर आ पहुँची, ब्रिटेन ने एक मंत्री को प्रस्ताव लेकर भेजा; पर उसमें भी तुरंत कुछ नहीं था। इसी निराशा से "भारत छोड़ो" आंदोलन निकला, जिसे सरकार ने सख़्ती से कुचल दिया।
फिर भी 1945 में ब्रिटेन भारत को रोके रखने की स्थिति में नहीं था, और इसके चार कारण थे। पहला — ब्रिटेन जीता था, पर कंगाल होकर; स्थिति यहाँ तक उलट गई थी कि अब ब्रिटेन भारत का क़र्ज़दार था। दूसरा — जिस भारतीय सेना के बल पर ब्रिटेन भारत पर राज करता था, उसकी वफ़ादारी अब पक्की नहीं थी: आज़ाद हिंद फ़ौज के मुक़दमों के समय पूरे देश की सहानुभूति "बाग़ियों" के साथ थी, और 1946 में नौसेना के जवानों ने खुला विद्रोह कर दिया। तीसरा — ब्रिटेन की अपनी जनता युद्ध से थक चुकी थी और नई सरकार घरेलू सुधारों पर ध्यान देना चाहती थी। चौथा — अमेरिका भी दबाव डाल रहा था कि उपनिवेश छोड़े जाएँ।
युद्ध का एक दुखद नतीजा भी निकला। कांग्रेस के नेता तीन साल जेल में रहे, और इसी अवधि में मुस्लिम लीग ने, जो सरकार का साथ दे रही थी, अपनी पकड़ बहुत मज़बूत कर ली। इसलिए जब स्वतंत्रता आई, तो विभाजन के साथ आई।
युद्ध ने भारत को मित्र राष्ट्रों के लिए "पूर्व का आपूर्ति-केंद्र" बना दिया। ब्रिटेन की अपनी औद्योगिक क्षमता युद्ध में फँसी थी और समुद्री मार्ग असुरक्षित थे, इसलिए भारतीय उद्योगों को अभूतपूर्व माँग मिली।
क्षेत्र | विकास |
संस्थागत ढाँचा | पूर्वी समूह आपूर्ति परिषद (Eastern Group Supply Council, दिल्ली, अक्टूबर 1940) — एशिया-अफ्रीका के ब्रिटिश उपनिवेशों की युद्ध-आपूर्ति का केंद्र; आपूर्ति विभाग, आयुध-कारख़ानों का विस्तार |
इस्पात और इंजीनियरिंग | टिस्को — बख़्तरबंद गाड़ियों ("टाटानगर") के लिए इस्पात, युद्ध-सामग्री; मशीन-औज़ार, साइकिल, डीज़ल इंजन जैसे नए उद्योग |
विमान और जहाज़ | हिंदुस्तान एयरक्राफ़्ट (बेंगलुरु, दिसंबर 1940 — वालचंद हीराचंद) — आगे चलकर एचएएल; सिंधिया शिपयार्ड, विशाखापत्तनम (1941) |
वस्त्र, चमड़ा, रसायन | सेना की वर्दी, कंबल, जूते, पैराशूट; सीमेंट, काग़ज़, रसायन, दवाएँ — आयात रुकने से आयात-प्रतिस्थापन |
पूँजी-संचय | टाटा, बिड़ला, डालमिया, सिंघानिया, वालचंद जैसे घरानों ने भारी मुनाफ़ा कमाया — स्वतंत्र भारत के निजी औद्योगिक ढाँचे की नींव |
स्टर्लिंग शेष | युद्ध-आपूर्ति के बदले ब्रिटेन पर भारत का लगभग £130 करोड़ का बकाया — भारत पहली बार ब्रिटेन का ऋणदाता बना; इसी से स्वतंत्रता के बाद विकास-आयात हुए |
बंबई योजना (1944) | जे. आर. डी. टाटा, जी. डी. बिड़ला सहित उद्योगपतियों की 15 वर्षीय विकास योजना — राज्य की सक्रिय भूमिका, बुनियादी उद्योग; सरकार ने योजना एवं विकास विभाग (1944) बनाया |
◆ सीमाएँ: ब्रिटिश सरकार ने पूँजीगत मशीनों का आयात और भारी उद्योगों (ऑटोमोबाइल, विमान-निर्माण का विस्तार) की अनुमति सीमित रखी; विकास उपभोक्ता और युद्ध-सामग्री तक अधिक रहा; भारी महँगाई (मूल्य लगभग तीन गुने), कपड़ा-अकाल, कालाबाज़ारी और जमाख़ोरी।
◆ दीर्घकालिक प्रभाव: स्वतंत्र भारत की मिश्रित अर्थव्यवस्था, योजना आयोग (1950), भारी-उद्योग आधारित दूसरी पंचवर्षीय योजना — सब पर युद्धकालीन अनुभव और बंबई योजना की छाप।
उद्योगों वाली तालिका का सार: दोनों युद्धों में भारतीय उद्योग के लिए एक ही बात हुई, बस दूसरी बार कहीं बड़े पैमाने पर। सामान्य दिनों में ब्रिटेन नहीं चाहता था कि भारत में कारख़ाने लगें, क्योंकि भारत उसके अपने माल का बाज़ार था। युद्ध में दो चीज़ें बदल गईं: ब्रिटेन का माल आना बंद हो गया, और ब्रिटेन को ख़ुद भारत से सामान चाहिए था — इस्पात, कपड़ा, जूते, तंबू। इसलिए जो चीज़ें पहले बाहर से आती थीं, वे अब देश में बनने लगीं; इसी को आयात-प्रतिस्थापन कहते हैं। भारतीय उद्योगपतियों ने भारी मुनाफ़ा कमाया और पहली बार बड़े पैमाने पर सोचना शुरू किया।
स्टर्लिंग शेष को भी समझ लीजिए। युद्ध में भारत ने ब्रिटेन को जो सामान और सेवाएँ दीं, उनका भुगतान ब्रिटेन ने नक़द नहीं किया; उसने लंदन के बैंक में भारत के खाते में वह रक़म "जमा" लिख दी, यह कहकर कि युद्ध के बाद चुकाएगा। युद्ध के अंत तक यह रक़म बहुत बड़ी हो गई। दो सौ साल से भारत ब्रिटेन का क़र्ज़दार रहा था; अब ब्रिटेन भारत का क़र्ज़दार था। पर इसकी क़ीमत भारत के ग़रीबों ने चुकाई: सरकार ने यह सामान ख़रीदने के लिए बेहिसाब नोट छापे, जिससे चीज़ों के दाम तीन गुने हो गए।
🔍 कारण | 💀 परिणाम |
◆ बर्मा पर जापानी क़ब्ज़ा (1942) — बर्मा से आने वाला चावल बंद ◆ अक्टूबर 1942 का चक्रवात (मिदनापुर) — फ़सल नष्ट ◆ "वंचन नीति" (Denial Policy) — जापानी आक्रमण के डर से तटीय बंगाल की नावें और अनाज हटा लिए गए ◆ युद्ध के लिए सेना और कलकत्ता के कारख़ानों को प्राथमिकता से अनाज; महँगाई, जमाख़ोरी, सट्टेबाज़ी ◆ ब्रिटिश युद्ध-मंत्रिमंडल (चर्चिल) द्वारा अनाज-आयात के अनुरोधों को टालना; प्रांतीय सरकार की अक्षमता | ◆ अनुमानतः 30 लाख मौतें (भुखमरी, हैज़ा, मलेरिया) ◆ ग्रामीण बंगाल का सामाजिक ढाँचा टूटा; ज़मीन बिकी, पलायन ◆ वुडहेड अकाल जाँच आयोग (1945) ने प्रशासनिक विफलता मानी ◆ चित्रकार ज़ैनुल आबेदिन, चित्तप्रसाद के रेखाचित्र; नाटक "नबान्न" (1944) ◆ असंतोष से आगे तेभागा आंदोलन (1946); अमर्त्य सेन का "हक़दारी विफलता" सिद्धांत |
बंगाल के अकाल से क्या समझ आता है? सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि 1943 में बंगाल में चावल की कुल पैदावार पिछले कुछ वर्षों से बहुत कम नहीं थी। फिर तीस लाख लोग भूख से क्यों मरे? अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने इसका उत्तर दिया: अकाल हमेशा इसलिए नहीं पड़ता कि अनाज नहीं है; वह इसलिए पड़ता है कि कुछ लोगों के पास उसे ख़रीदने की ताक़त नहीं बचती। युद्ध के कारण दाम कई गुना हो गए थे। शहर के मज़दूर और सैनिक, जिन्हें सरकार राशन और बढ़ा हुआ वेतन दे रही थी, चावल ख़रीद सकते थे। गाँव के भूमिहीन मज़दूर, मछुआरे और कारीगर, जिनकी कमाई वहीं की वहीं थी, नहीं ख़रीद सकते थे। व्यापारियों ने और दाम बढ़ने की उम्मीद में अनाज दबा लिया। और सरकार ने, जिसका सारा ध्यान युद्ध पर था, समय रहते न दाम रोके, न बाहर से अनाज मँगवाया। यह अकाल प्रकृति का नहीं, नीति का था — और इसीलिए यह औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध सबसे बड़े आरोपों में गिना जाता है।
📌 उत्तर-लेखन संकेत "द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारत में स्वदेशी उद्योगों का विकास" जैसे प्रश्न में — (1) कारण (माँग, आयात रुकना, पूर्वी समूह आपूर्ति परिषद), (2) क्षेत्रवार विकास (इस्पात, वस्त्र, विमान, जहाज़, रसायन), (3) पूँजी-संचय और स्टर्लिंग शेष, (4) सीमाएँ (पूँजीगत वस्तुओं पर रोक, महँगाई, बंगाल अकाल), (5) दीर्घकालिक महत्व (बंबई योजना, नियोजन) — पाँचों आयाम लिखें। |
◆ हाइफ़ा का युद्ध (23 सितंबर 1918): जोधपुर लांसर्स (मैसूर लांसर्स के साथ, 15वीं इंपीरियल सर्विस कैवेलरी ब्रिगेड) ने भालों-तलवारों के बल पर ऑटोमन-जर्मन मशीनगनों से सुरक्षित हाइफ़ा को मुक्त कराया — मेजर दलपत सिंह शेखावत ("हाइफ़ा के नायक", वीरगति, मिलिट्री क्रॉस), कैप्टन अमान सिंह जोधा; भारतीय सेना हर वर्ष 23 सितंबर को "हाइफ़ा दिवस" मनाती है; दिल्ली का तीन मूर्ति स्मारक।
◆ सर प्रताप सिंह (जोधपुर) — लगभग 70 वर्ष की आयु में फ्रांस और फ़िलिस्तीन के मोर्चों पर।
◆ गंगा रिसाला (बीकानेर ऊँट सेना) — 1915 में स्वेज़ नहर की रक्षा।
◆ महाराजा गंगा सिंह (बीकानेर) — इंपीरियल वॉर कैबिनेट (1917) में भारत के प्रतिनिधि; पेरिस शांति सम्मेलन (1919) में देशी रियासतों के प्रतिनिधि; एडविन मॉन्टेग्यू के साथ वर्साय संधि पर हस्ताक्षर करने वाले एकमात्र भारतीय शासक — इसी से भारत राष्ट्रसंघ का संस्थापक सदस्य बना।
◆ आज की राजपूताना राइफ़ल्स (गठन 1921) की पूर्ववर्ती बटालियनें — फ्रांस, मेसोपोटामिया, मिस्र, पूर्वी अफ्रीका के मोर्चों पर।
◆ युद्ध-चंदा और किसान असंतोष: रियासतों और ठिकानों ने युद्ध-कोष के नाम पर किसानों से नई लागें वसूलीं — बिजौलिया के किसानों ने विजय सिंह पथिक के नेतृत्व में युद्ध-चंदे और लाग-बाग का विरोध किया; यही असंतोष आगे किसान आंदोलनों की ज़मीन बना।
◆ राजपूताना राइफ़ल्स — इरिट्रिया में इटली के विरुद्ध केरेन (1941), उत्तरी अफ्रीका (एल अलामीन, टोब्रुक), इटली (मोंटे कैसिनो) और बर्मा; रेजिमेंट के दो विक्टोरिया क्रॉस — सूबेदार रिछपाल राम (केरेन, 1941, मरणोपरांत) और कंपनी हवलदार मेजर छेलू राम (ट्यूनीशिया, 1943, मरणोपरांत)।
◆ रियासती सेनाएँ: जोधपुर, जयपुर, बीकानेर (गंगा रिसाला — मध्य-पूर्व और सिंध सीमा), उदयपुर आदि की टुकड़ियाँ विभिन्न मोर्चों पर; जोधपुर (महाराजा उम्मेद सिंह) ने हवाई अड्डा और वायुसेना-प्रशिक्षण की सुविधा दी।
◆ आर्थिक प्रभाव: युद्ध-कोष में करोड़ों रुपये; ऊँट, घोड़े, ऊन, अनाज, चारा युद्ध के लिए; राशनिंग, महँगाई, कालाबाज़ारी — जनता में भारी असंतोष; दूसरी ओर युद्ध-आपूर्ति और व्यापार से मारवाड़ी व्यापारी घरानों का पूँजी-संचय बढ़ा।
◆ राजनीतिक प्रभाव: भारत छोड़ो आंदोलन (1942) में मेवाड़ प्रजामंडल और मारवाड़ लोक परिषद सक्रिय; जयपुर में "आज़ाद मोर्चा" (बाबा हरिश्चंद्र); प्रजामंडलों की उत्तरदायी शासन की माँग तीव्र — जिसने 1948–49 में राजस्थान के एकीकरण का मार्ग तैयार किया।
⚠️ ध्यान दें "राजपूताना राइफ़ल्स" नाम से रेजिमेंट 1921 में बनी — प्रथम विश्व युद्ध में इसकी पूर्ववर्ती बटालियनें (जैसे वेलेज़्लीज़ राइफ़ल्स, आउट्रम्स राइफ़ल्स) लड़ी थीं। द्वितीय विश्व युद्ध में यह इसी नाम से लड़ी। इसी प्रकार, वर्साय संधि पर भारत की ओर से हस्ताक्षर गंगा सिंह और भारत सचिव मॉन्टेग्यू ने किए थे। |
व्यक्तित्व | देश | भूमिका |
विलियम (कैसर) द्वितीय | जर्मनी | "विश्व-नीति", नौसैनिक होड़; 9 नवंबर 1918 को गद्दी छोड़ी |
गैवरिलो प्रिंसिप | बोस्निया | फ़्रांज़ फ़र्डिनेंड का हत्यारा (28 जून 1914) |
वुडरो विल्सन | अमेरिका | चौदह सूत्र, राष्ट्रसंघ के प्रस्तावक; 1919 का नोबेल शांति पुरस्कार |
जॉर्ज क्लेमेंसो | फ्रांस | "बाघ" — कठोर वर्साय संधि के पक्षधर |
लॉयड जॉर्ज | ब्रिटेन | युद्धकालीन प्रधानमंत्री; "बड़े चार" में |
जॉन मेनार्ड कीन्स | ब्रिटेन | "शांति के आर्थिक परिणाम" (1919); ब्रेटन वुड्स के शिल्पकार |
नेविल चेंबरलेन | ब्रिटेन | तुष्टीकरण, म्यूनिख समझौता |
विंस्टन चर्चिल | ब्रिटेन | युद्धकालीन प्रधानमंत्री (1940–45); "लौह-आवरण" भाषण |
फ़्रैंकलिन रूज़वेल्ट | अमेरिका | नई व्यवस्था, उधार-पट्टा, अटलांटिक चार्टर; अप्रैल 1945 में मृत्यु |
हैरी ट्रूमैन | अमेरिका | परमाणु बम के प्रयोग का निर्णय; ट्रूमैन सिद्धांत |
जोसेफ़ स्टालिन | सोवियत संघ | नाज़ी-सोवियत समझौता, स्टालिनग्राद, याल्टा-पॉट्सडैम |
हिटलर, मुसोलिनी, तोजो | धुरी | धुरी राष्ट्रों के नेता (जापान के प्रधानमंत्री तोजो) |
रॉबर्ट ओपनहाइमर | अमेरिका | मैनहट्टन परियोजना के वैज्ञानिक निदेशक — "परमाणु बम के जनक" |
मेजर दलपत सिंह शेखावत | जोधपुर | "हाइफ़ा के नायक" (1918) |
महाराजा गंगा सिंह | बीकानेर | इंपीरियल वॉर कैबिनेट; वर्साय संधि पर हस्ताक्षर |
सुभाष चंद्र बोस | भारत | आज़ाद हिंद फ़ौज और आज़ाद हिंद सरकार |
वर्ष / तिथि | घटना | महत्व |
1879 / 1882 | द्वि-गुट / त्रिगुट | गुटबंदी की शुरुआत |
1904 / 1907 | सौहार्दपूर्ण समझौता / त्रि-मैत्री | यूरोप दो खेमों में |
1905–06, 1911 | मोरक्को संकट | ब्रिटेन-फ्रांस निकट |
1908 | बोस्निया का ऑस्ट्रियाई विलय | बाल्कन तनाव |
1912–13 | बाल्कन युद्ध | सर्बिया का उभार |
28 जून 1914 | साराजेवो हत्याकांड | तात्कालिक कारण |
28 जुलाई 1914 | ऑस्ट्रिया का सर्बिया पर युद्ध | प्रथम विश्व युद्ध आरंभ |
सितंबर 1914 | मार्न की लड़ाई; टैननबर्ग | श्लीफ़ेन योजना विफल |
अक्टूबर 1914 | ख़ुदादाद ख़ान — पहला भारतीय विक्टोरिया क्रॉस | भारत जुड़ाव |
1915 | गैलीपोली; यप्रेस में गैस; लुसिटानिया; इटली का प्रवेश; गंगा रिसाला — स्वेज़ | — |
1915–17 | आर्मेनियाई जनसंहार | मानवीय त्रासदी |
1916 | वर्दन, सॉम, जटलैंड; कुत-अल-अमारा; होमरूल लीगें; लखनऊ समझौता | — |
1917 | अमेरिका का प्रवेश (6 अप्रैल); रूसी क्रांति; मॉन्टेग्यू घोषणा (20 अगस्त) | युद्ध का मोड़ |
जनवरी 1918 | विल्सन के चौदह सूत्र | शांति का आधार |
मार्च 1918 | ब्रेस्ट-लिटोव्स्क संधि | रूस युद्ध से बाहर |
23 सितंबर 1918 | हाइफ़ा का युद्ध — जोधपुर लांसर्स | राजस्थान जुड़ाव |
11 नवंबर 1918 | युद्ध-विराम | प्रथम विश्व युद्ध समाप्त |
1918–20 | स्पेनिश फ़्लू; ब्रिटेन में महिला मताधिकार (1918) | — |
1919 | रॉलेट एक्ट, जलियाँवाला बाग़ (13 अप्रैल); वर्साय संधि (28 जून); अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन | भारत जुड़ाव |
10 जनवरी 1920 | राष्ट्रसंघ | पहली विश्व-शांति संस्था |
1920 | सेव्र संधि; ख़िलाफ़त और असहयोग आंदोलन | भारत जुड़ाव |
1923 | रूर पर क़ब्ज़ा, जर्मन अति-मुद्रास्फीति; लोज़ान संधि | — |
1929 | महामंदी | फ़ासीवाद का अवसर |
1931 / 1935 | मंचूरिया / अबीसीनिया | राष्ट्रसंघ विफल |
1933 | हिटलर चांसलर | — |
1936–38 | राइनलैंड, धुरी, ऑस्ट्रिया-विलय, म्यूनिख | तुष्टीकरण |
23 अगस्त 1939 | नाज़ी-सोवियत समझौता | — |
1 / 3 सितंबर 1939 | पोलैंड पर आक्रमण / ब्रिटेन-फ्रांस का युद्ध घोषणा | द्वितीय विश्व युद्ध आरंभ |
अक्टूबर 1939 | कांग्रेस मंत्रिमंडलों का त्यागपत्र | भारत जुड़ाव |
1940 | फ्रांस का पतन; ब्रिटेन का हवाई युद्ध; अगस्त प्रस्ताव; हिंदुस्तान एयरक्राफ़्ट; पूर्वी समूह आपूर्ति परिषद | — |
1941 | केरेन (रिछपाल राम — विक्टोरिया क्रॉस); सोवियत संघ पर आक्रमण; अटलांटिक चार्टर; पर्ल हार्बर | — |
1942 | सिंगापुर का पतन; क्रिप्स मिशन; मिडवे; भारत छोड़ो; एल अलामीन | — |
1943 | स्टालिनग्राद; छेलू राम — विक्टोरिया क्रॉस; इटली का आत्मसमर्पण; बंगाल अकाल; आज़ाद हिंद सरकार | — |
1944 | डी-डे (6 जून); इम्फाल-कोहिमा; ब्रेटन वुड्स; बंबई योजना; फ्रांस में महिला मताधिकार | — |
फ़रवरी 1945 | याल्टा सम्मेलन | युद्धोत्तर व्यवस्था |
8 मई 1945 | जर्मनी का आत्मसमर्पण | यूरोप में युद्ध समाप्त |
6 / 9 अगस्त 1945 | हिरोशिमा / नागासाकी | परमाणु युग |
2 सितंबर 1945 | जापान का औपचारिक आत्मसमर्पण | द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त |
24 अक्टूबर 1945 | संयुक्त राष्ट्र | नई विश्व-व्यवस्था |
1945–46 | न्यूरेम्बर्ग मुक़दमे; लाल क़िला मुक़दमे; नौसेना विद्रोह | — |
1947–48 | भारत की स्वतंत्रता; मार्शल योजना; मानवाधिकार घोषणा | वि-उपनिवेशीकरण |
Two world wars in the 20th century shook human civilization. World War I (1914-1918) destroyed empires, ended monarchies, and gave birth to new nations. World War II (1939-1945) ushered in the Nuclear Age, ended colonialism, and gave birth to an organization like the United Nations. Historian A.J.P. Taylor: "The Treaty of Versailles contained the seeds of another war."
Imagine two large landowners living as neighbors in a village in Rajasthan. They had an old rivalry, a dispute over farmland. They formed separate alliances. Over a trivial matter—the murder of a leader—the entire village fought among themselves (WWI). So much bloodshed and destruction ensued that a settlement was reached—but the terms were so harsh that the defeated landowner vowed revenge. Twenty years later, war broke out again (WWII)—this time even more horrific. This is the story of both world wars.
Part A: World War I (1914-1918)
A. Alliance System
| Alliance | Year | Member Countries |
|---|---|---|
| Triple Alliance | 1882 | Germany + Italy + Austria-Hungary |
| Triple Entente | 1907 | France + Britain + Russia |
| Result | By 1914 | Europe was divided into two groups – the Central Powers versus the Allied Powers. |
B. Long-Term Causes
C. Immediate Cause
► Assassin: Black Hand — Slavic Nationalist Secret Group
A. Sequence of Events
B. Treaty of Versailles (1919)
The Paris Peace Conference took place in January 1919. The "Big Four"—Woodrow Wilson of the United States, Lloyd George of Britain, Clemenceau of France, and Orlando of Italy—made the decisions.
| Provision | Details | Impact |
|---|---|---|
| 1. War Guilt Clause – Article 231 | Germany bears full responsibility for WWI – the basis for reparations | Feelings of humiliation in Germany |
| 2. War Reparations | ~$33 million ($33 billion) — ₹40+ lakh crore in today's terms | German economy collapses, hyperinflation |
| 3. Military Restrictions | Army: Only 100,000 soldiers. No tanks, artillery, or aircraft. The Rhineland is demilitarized. | Germany was weak—but Hitler broke it in 1935 |
| 4. Territorial Losses | One-eighth of Europe's land and 7 million people were lost. Alsace-Lorraine → France. Danzig = Free City | German nationalism emerged |
| 5. Economic Losses | 2/3 coal mines, 2/3 iron, 70% zinc, 15% agricultural land, 12% cattle | German industry devastated |
"The Treaty of Versailles contained the seeds of a second war." — A.J.P. Taylor, Historian
Other Treaties:Treaty of Sèvres (1920): Ottoman Empire → Turkey + British-French control in the Middle East. Treaty of Trianon: Hungary ceded territories to Romania, Czechoslovakia, and Yugoslavia.
Part B: World War II (1939–1945)
| Event | Date | instant death | Total deaths | name of the bomb |
|---|---|---|---|---|
| Hiroshima – the atomic bomb | 6 August 1945 | 75,000 | ~1,40,000 | Little Boy – uranium bomb |
| Nagasaki – atomic bomb | 9 August 1945 | 40,000 | ~80,000 | Fat Man — Plutonium Bomb |
| Japan Surrender | 15 August 1945 | — | — | VJ Day — WWII ends in the Pacific |
| Formal end of WWII | 2 September 1945 | — | — | Sign on the USS Missouri |
Part C: Multi-Dimensional Impact of World Wars
The impact of the World Wars can be analysed in six dimensions: (1) Political, (2) Economic, (3) Social, (4) Impact on Women, (5) Impact on India's Industries, (6) Political impact on India.
4-A: Political Impact
► Austro-Hungarian Empire → Austria, Hungary, Czechoslovakia, Yugoslavia
► Ottoman Empire → Turkey + British-French control in the Middle East
► Russian Empire → Bolshevik Revolution → Soviet Union (1922)
4-B: Economic Impact
4-C: Social Impact
4-D: Impact of World Wars on Women — Detailed
This question appeared in the RAS Mains exam: "How did the two World Wars increase the political and economic participation of European women?" This is extremely important.
► Britain: 1.8 million women worked in industry for the first time during WWI
► The same thing happened in France, Germany and Austria.
► Britain: Women over 30 granted voting rights in 1918, full equality in 1928
► Germany: Women got the right to vote in 1919
► Austria, Russia, Canada: also gained suffrage after WWI
► USA: 6 million women worked in factories during the war
► Soviet Union (USSR): Women also became active combat soldiers—"Night Witches"—female air force battalions
► France: Women gained the right to vote in 1944—a direct result of WWII
► Italy: in 1945. Japan: in 1945 (under American pressure)
► The image of the "homemaker" is broken → The identity of the working woman
► The Feminist Movement of the 1960s was founded in WWII.
Exam Facts:RAS Mains 2023 (5M): “How did the two World Wars increase the political and economic participation of European women?” — Answer in writing: (1) Factories in WWI + Suffrage, (2) Rosie the Riveter in WWII + France 1944, (3) Foundations of Feminism — Give all three angles.
4-D: Impact of the World Wars on India's Industries—Detailed
This question appeared in RAS Mains Exam 2021 (10 Marks): "Discuss the development of indigenous industries in India during the Second World War."
► Britain was busy with the war → Import of textiles to India stopped
► Indian textile mills—in Mumbai, Ahmedabad, Nagpur—began producing uniforms and materials for war
► Huge increase in demand → Expansion in production → Economic benefits
► TISCO (Tata Iron and Steel Company, Jamshedpur): Demand for steel during the war → TISCO produced in large quantities
► The British government purchased railway lines and ammunition from TISCO.
► Inflation increased – shortage of essential commodities
► Raw material was forcibly sent to Britain
► India had to contribute 100 million pounds for the war.
► Britain's industrial capacity was engaged in the war → demand for supplies from Indian industries
► Rapid growth in textiles, chemicals, engineering, food processing
► Arms, Ammunition, Vehicles, Uniforms, Shoes — Mass Production in India
► TISCO, other steel industries — supply of war materials
► Tata, Birla, Singhania – Capital Accumulation during WWII
► These houses became the foundation of independent India's industrial structure.
► Grain was forcibly taken for war supplies → Severe famine in Bengal
► 3-5 million people died – Man-Made Disaster
► Wartime demand → shortage of goods → skyrocketing prices
► Life of common Indian is difficult → Strength to the nationalist movement
► The experience of WWII inspired independent India to adopt a mixed economy and a heavy industry policy.
► Nehru's socialist model reflects the experience of WWII
4-c: Political Impact on India
1. World War I (WWI, 1914–1918): Central Powers = Germany + Austria-Hungary + Ottoman Empire vs. Allied Powers = Britain + France + Russia + USA + Italy 2. Immediate Cause: June 1914 – Assassination of Archduke Franz Ferdinand in Sarajevo – Black Hand organization 3. Triple Alliance (1882): Germany + Italy + Austria-Hungary. Triple Entente (1907): France + Britain + Russia 4. Treaty of Versailles (1919): Article 231—All responsibility rested with Germany. Reparations: ~$33 billion 5. Germany's losses at Versailles: 1/8 of its land, 7 million people, 2/3 of its coal, 2/3 of its iron, 70% of its zinc 6. Armenian Genocide (1915–17): ~1.5 million Armenians were killed by the Ottoman government 7. Battle of Haifa (23 Sept 1918): Jodhpur Lancers – The Pride of Rajasthan 8. Maharaja Ganga Singh of Bikaner: Represented India at the Paris Peace Conference of 1919 9. Jallianwala Bagh Massacre (1919) + Rowlatt Act – The dark impact of WWI on India 10. Voting Rights for Women in Britain: 1918 (over 30 years), 1928 (full equality) 11. Women's Voting in France: 1944 — a direct result of WWII 12. World War II (WWII, 1939–1945): Axis Powers = Germany + Italy + Japan vs. Allies = Britain + USA + USSR + France 13. WWII begins: September 1, 1939—Germany invades Poland. Britain and France declare war on September 3. 14. Hiroshima (6 August 1945): 75,000 instant deaths. Nagasaki (August 9, 1945): 40,000 instant deaths 15. Holocaust: The murder of 6 million Jews by Nazi Germany 16. United Nations (1945): 51 founding members. Bretton Woods (1944): IMF + World Bank 17. Marshall Plan (1948): $12 billion — Reconstruction of Western Europe 18. Bengal Famine (1943-44): 3-5 million deaths — WWII's impact on India 19. Netaji Subhash Chandra Bose + INA: Attempt to drive Britain out of India with the help of Japan 20. Rosie the Riveter: A symbol of women's factory work in WWII—a foundation of feminism
Q1. “The Treaty of Versailles was responsible for World War II.” Comment. [RAS Mains 2013 — 5 marks] Q2."How did the two world wars increase the political and economic participation of European women?" [RAS Mains 2023 — 5 marks] Q3."Discuss the development of indigenous industries in India during the Second World War." [RAS Mains 2021 — 10 Marks] Q4."Discuss the impact of World War II on international politics." [RAS Mains 2018 — 10 marks] Q5. Describe the main clauses of the Treaty of Versailles and their impact on India. [RAS Mains Possible] Q6.Was the use of atomic bombs on Hiroshima and Nagasaki justified? Analyze from a moral and political perspective. [UPSC GS-1] Q7.Analyze the social impact of World War I—especially on women. [UPSC GS-I] Q8.Compare the political impact of the First and Second World Wars on India. [RAS Mains Probable]
| Year/Date | Event | Exam Importance |
|---|---|---|
| 1882 | Triple Alliance: Germany + Italy + Austria-Hungary | Long-term cause of WWI |
| 1907 | Triple Entente: France + Britain + Russia | Europe divided into two groups |
| June 1914 | Assassination of Archduke Franz Ferdinand in Sarajevo – Black Hand | Immediate cause of WWI |
| 1914 | World War I begins | The world's first global war |
| 1915-17 | Armenian Genocide – ~1.5 million killed | Human tragedy |
| 1917 | Russian Revolution – End of dictatorship | ideological change |
| 1917 | USA joins World War I | turning point of the war |
| November 11, 1918 | WWI ended — Armistice signed | Allied victory |
| January 1919 | Paris Peace Conference | The beginning of the new world order |
| June 28, 1919 | Treaty of Versailles signed | The seeds of WWII were sown |
| 1919 | Establishment of the League of Nations + ILO | First global peace effort |
| 1919 | Rowlatt Act + Jallianwala Bagh — India | Britain's betrayal |
| 23 September | Battle of Haifa - Jodhpur Lancers | Pride of Rajasthan |
| 1918 | Women over 30 get the vote in Britain | The beginning of women empowerment |
| 1919 | Women in Germany get full voting rights | Women's Impact of WWI |
| 1931 | Japan's invasion of Manchuria | WWII role |
| January 30, 1933 | Hitler became Chancellor of Germany | Ideological foundations of WWII |
| October 3, 1935 | Italy invades Ethiopia (Abyssinia) - League of Nations fails | The beginning of appeasement |
| March 12, 1938 | Anschluss – the annexation of Austria to Germany | Violation of the Treaty of Versailles |
| 29 September | Munich Agreement – a symbol of appeasement | Precursor to WWII |
| August 23, 1939 | Nazi-Soviet Non-Aggression Pact | Clearing the way for WWII |
| 1 September | Germany invades Poland – WWII begins | Immediate causes |
| 3 September | Britain and France declared war on Germany | WWII formally begins |
| 1939 | Congress ministries resign – India | India's opposition |
| 1942 | Quit India Movement – "Do or Die" | India's independence movement reaches its peak |
| 1943-44 | Bengal Famine – 3-5 million deaths | The impact of WWII on India |
| 1944 | Bretton Woods Conference – IMF + World Bank | New Global Economic Order |
| 1944 | Women get the right to vote in France | Women's Impact of WWII |
| 6 August 1945 | Hiroshima – Atomic Bomb (Little Boy) | The beginning of the atomic age |
| 9 August 1945 | Nagasaki — Atomic Bomb (Fat Man) | Japan's surrender is inevitable |
| 2 September | WWII formally ends—Japan surrenders | The most devastating war in human history is over. |
| 1945 | Establishment of the United Nations – 51 members | new World Order |
| 1945 | Nuremberg Trials | punishment of war criminals |
| 1948 | Marshall Plan — $12 billion — Rebuilding Europe | Attempts to stop communism |
| 15 August 1947 | India's Independence | The far-reaching impact of WWII |