🌐 अध्याय 11/11 — आधुनिक विश्व इतिहास

शीत युद्ध के दौरान विश्व

World during Cold War | RAS Mains
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📖 पहली कहानी — जब बम गिराने वाले विमान मिठाई गिराने लगे

जुलाई 1948, बर्लिन। तीन साल पहले तक इस शहर पर अमेरिकी और ब्रिटिश विमान बम बरसाते थे। अब यही शहर चार हिस्सों में बँटा है — एक हिस्सा सोवियत संघ के पास और तीन हिस्से अमेरिका, ब्रिटेन और फ़्रांस के पास। मुश्किल यह है कि पूरा बर्लिन सोवियत क़ब्ज़े वाले जर्मनी के बीचोबीच पड़ता है, यानी पश्चिमी हिस्से चारों ओर से सोवियत इलाक़े से घिरे एक टापू जैसे हैं।

24 जून 1948 को सोवियत संघ ने इस टापू तक जाने वाली हर सड़क, हर रेल लाइन और हर नहर बंद कर दी। इसे सोवियत नाकेबंदी कहते हैं। पश्चिम बर्लिन के बीस लाख से अधिक लोगों के पास कुछ ही सप्ताह का भोजन और कोयला बचा था। स्टालिन का हिसाब सीधा था — या तो पश्चिमी देश भूखे शहर को छोड़कर चले जाएँगे, या रास्ता खुलवाने के लिए टैंक भेजेंगे और तीसरा विश्व युद्ध शुरू करने का दोष उन्हीं पर आएगा।

अमेरिका और ब्रिटेन ने तीसरा रास्ता निकाला, जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। उन्होंने तय किया कि पूरे शहर को आसमान से पाला जाएगा। आटा, दूध का चूर्ण, दवाइयाँ, यहाँ तक कि कोयला भी विमानों में लादकर लाया जाने लगा। कुछ ही महीनों में हाल यह था कि हर कुछ मिनट में एक विमान उतरता था। यह सिलसिला लगभग ग्यारह महीने चला।

इन्हीं उड़ानों के एक अमेरिकी पायलट गेल हैल्वर्सन ने एक दिन हवाई अड्डे की बाड़ के पास खड़े दुबले-पतले बच्चों को देखा। उसकी जेब में च्यूइंग गम की बस दो पट्टियाँ थीं। उसने वे तोड़कर बाँट दीं और वादा किया कि कल वह विमान से मिठाई गिराएगा। बच्चों ने पूछा — इतने विमानों में तुम्हें पहचानेंगे कैसे? उसने कहा — मैं उतरते समय पंख हिलाऊँगा। अगले दिन उसने अपने रूमालों से छोटे-छोटे पैराशूट बनाए और उनसे चॉकलेट बाँधकर गिरा दी। बच्चों ने उसे नाम दिया — "कैंडी बॉम्बर", यानी मिठाई बरसाने वाला। जल्दी ही दूसरे पायलट भी यही करने लगे।

जिस शहर पर तीन साल पहले बम गिरते थे, उस पर अब मिठाई गिर रही थी, और गिराने वाले वही लोग थे। मई 1949 में स्टालिन ने हार मानकर रास्ते खोल दिए। एक भी गोली नहीं चली थी, फिर भी एक पक्ष जीता और दूसरा हारा था।

यही था शीत युद्ध — ऐसा संघर्ष जिसमें दोनों महाशक्तियों की सेनाएँ आपस में कभी सीधे नहीं लड़ीं, पर एक-दूसरे को झुकाने के लिए भोजन, डॉलर, प्रचार, जासूसी और परमाणु बम — सब कुछ दाँव पर लगाया गया। 1945 के बाद इसी खिंचाव ने दुनिया को दो खेमों में बाँट दिया, यह बँटवारा 1991 तक चला, और नव-स्वतंत्र भारत ने नेहरू के नेतृत्व में दोनों से अलग तीसरा रास्ता चुना। यह अध्याय इसी की कहानी है।

📖 दूसरी कहानी — दीवार के दो ओर एक परिवार (1945–1991)

ध्यान रहे: इस कहानी के भाई-बहन और उनका परिवार काल्पनिक हैं, ताकि पूरा शीत युद्ध एक आम बर्लिनवासी परिवार की नज़र से समझ आ सके। कहानी में आई घटनाएँ, तिथियाँ और बाक़ी सभी व्यक्ति असली हैं।

1945 — बर्लिन की एक टूटी-फूटी इमारत के तहख़ाने में दो बच्चे रहते हैं: बारह साल की हेल्गा और दस साल का उसका भाई कार्ल। पिता युद्ध से नहीं लौटे। शहर चार विजेता देशों में बँट चुका है। बच्चों के लिए इसका मतलब बस इतना है कि एक गली में अमेरिकी सिपाही चॉकलेट देते हैं और दूसरी में सोवियत सिपाही काली रोटी। किसी को अंदाज़ा नहीं कि गलियों का यही फ़र्क़ आगे चलकर दुनिया का सबसे बड़ा बँटवारा बनेगा।

1948 — माँ कहती है कि पश्चिमी हिस्सों में नया सिक्का चल पड़ा है और उसी से नाराज़ होकर सोवियत संघ ने शहर के रास्ते बंद कर दिए हैं। हेल्गा और कार्ल हर शाम हवाई अड्डे की बाड़ पर खड़े होकर विमान गिनते हैं। एक दिन कार्ल के हाथ रूमाल के पैराशूट से बँधी चॉकलेट लगती है। उस दिन से उसके लिए "अमेरिका" का मतलब वही चॉकलेट है।

1949 — जर्मनी दो देश बन जाता है। पश्चिम में संघीय गणराज्य, जहाँ चुनाव, निजी दुकानें और अमेरिकी मदद है; पूरब में लोकतांत्रिक गणराज्य, जहाँ एक ही पार्टी का राज और सरकारी कारख़ाने हैं। इसी साल हेल्गा की शादी एक अध्यापक से होती है जिसका घर शहर के पूर्वी हिस्से में है। वह वहीं चली जाती है। कार्ल माँ के साथ पश्चिमी हिस्से में रहता है। अभी इसमें कोई दिक़्क़त नहीं — शहर के दोनों हिस्सों के बीच लोग रोज़ ट्राम से आते-जाते हैं।

1953 — स्टालिन की मृत्यु के तीन महीने बाद, 17 जून को पूर्वी बर्लिन के मज़दूर बढ़ाए गए काम के बोझ के विरोध में सड़कों पर उतरते हैं। हेल्गा अपनी खिड़की से सोवियत टैंक देखती है। आंदोलन कुचल दिया जाता है। उसका पति कहता है — अब यहाँ खुलकर बोलना बंद करो।

1961 — हर महीने हज़ारों लोग पूरब छोड़कर पश्चिम भाग रहे हैं, जिनमें डॉक्टर, इंजीनियर और अध्यापक सबसे आगे हैं। 13 अगस्त की सुबह हेल्गा दूध लेने निकलती है तो देखती है कि रात भर में गली के आर-पार काँटेदार तार खिंच गए हैं। कुछ ही दिनों में तार की जगह पत्थर की दीवार ले लेती है। कार्ल उस पार खड़ा हाथ हिलाता है; हेल्गा अपनी छोटी बेटी को ऊपर उठाकर दिखाती है। दोनों के बीच कुछ ही मीटर की दूरी है, पर अब वे मिल नहीं सकते।

1962 — अक्टूबर की तेरह रातें दोनों भाई-बहन ने अलग-अलग रेडियो पर एक ही ख़बर सुनते हुए काटीं। सोवियत संघ ने अमेरिका के पड़ोस में क्यूबा में परमाणु मिसाइलें लगाई थीं और अमेरिका ने उस द्वीप को जहाज़ों से घेर लिया था। कार्ल ने तहख़ाने में डिब्बाबंद खाना जमा किया। सबको डर था कि युद्ध हुआ तो पहला निशाना बर्लिन ही बनेगा। फिर दोनों पक्ष पीछे हटे, और दुनिया ने पहली बार समझा कि यह खेल कितना ख़तरनाक है।

1972 — दोनों महाशक्तियाँ थक चुकी हैं और हथियार सीमित करने के समझौते कर रही हैं; इस नरमी को तनाव-शैथिल्य कहा गया। दोनों जर्मनी भी आपस में संधि करते हैं। ग्यारह साल बाद कार्ल को पहली बार एक दिन का परवाना मिलता है। वह बहन के लिए कॉफ़ी और संतरे ले जाता है, जो पूरब में मुश्किल से मिलते हैं। हेल्गा कहती है — हमारे यहाँ कोई बेरोज़गार नहीं, इलाज मुफ़्त है; पर दुकानों में क़तारें हैं और पड़ोसी भी पुलिस का मुख़बिर हो सकता है।

1979–85 — नरमी टूट जाती है। सोवियत सेना अफ़ग़ानिस्तान में घुसती है, अमेरिका नए मिसाइल यूरोप में लगाता है। कार्ल का बेटा पश्चिम में मिसाइलों के विरोध में जुलूस निकालता है। हेल्गा की बेटी पूरब में एक गिरजाघर की शांति-सभा में जाती है और पुलिस उसका नाम लिख लेती है।

1989 — मॉस्को में अब गोर्बाचेव हैं, जो साफ़ कह चुके हैं कि पूर्वी यूरोप की सरकारों को बचाने सोवियत टैंक नहीं आएँगे। पूर्वी जर्मनी में हर सोमवार लाखों लोग मोमबत्तियाँ लेकर निकलते हैं। 9 नवंबर की रात एक सरकारी प्रवक्ता ग़लती से कह देता है कि सीमा "अभी से" खुली है। भीड़ चौकियों पर पहुँचती है और पहरेदार फाटक खोल देते हैं। छप्पन साल की हेल्गा अपनी बेटी का हाथ पकड़कर उसी गली से पश्चिम में जाती है जिसमें 1961 में तार खिंचे थे। कार्ल दूसरी ओर खड़ा है। अट्ठाईस साल बाद भाई-बहन गले मिलते हैं।

1990–91 — 3 अक्टूबर 1990 को दोनों जर्मनी एक हो जाते हैं। अगले साल 26 दिसंबर 1991 को ख़ुद सोवियत संघ पंद्रह देशों में बिखर जाता है। हेल्गा के पोते ने दीवार का एक टुकड़ा मेज़ पर सजा रखा है। वह पूछता है — दादी, यह दीवार किसलिए थी? हेल्गा कहती है — दो बड़े देश एक-दूसरे से डरते थे, और उस डर की क़ीमत हम जैसे लोगों ने चुकाई।

इस कहानी में पूरा अध्याय छिपा है: चार हिस्सों में बँटा शहर → भाग 4 (याल्टा और पॉट्सडैम); नाकेबंदी, हवाई पुल और दो जर्मनी → भाग 8; अमेरिकी मदद और नया सिक्का → भाग 7 (मार्शल योजना); परमाणु डर → भाग 10; 1953 से 1991 तक की घटनाएँ (दीवार, क्यूबा, तनाव-शैथिल्य, अफ़ग़ानिस्तान, गोर्बाचेव, विघटन) → भाग 3 का अंतिम हिस्सा; और इस बँटवारे से अलग रहने का भारत का निर्णय → भाग 14।

📋 इस अध्याय में
  1. शुरू करने से पहले — इस अध्याय के ज़रूरी शब्द
  2. शीत युद्ध — अर्थ, परिभाषाएँ और विशेषताएँ
  3. शीत युद्ध के कारण
  4. शीत युद्ध के चरण — एक झलक
  5. याल्टा और पॉट्सडैम — मित्रता में दरार (1945)
  6. 1946 — भाषणों का वर्ष (वाक्-युद्ध की शुरुआत)
  7. ट्रूमैन सिद्धांत और नियंत्रण की नीति (1947)
  8. मार्शल योजना और सोवियत उत्तर (1947–1949)
  9. बर्लिन नाकेबंदी और जर्मनी का विभाजन (1948–49)
  10. नाटो — पश्चिम का सैन्य गठबंधन (1949)
  11. परमाणु होड़ और मैकार्थीवाद
  12. चीन में साम्यवादी क्रांति (1949)
  13. कोरियाई युद्ध (1950–1953) — शीत युद्ध का पहला "गर्म" युद्ध
  14. कोरियाई युद्ध में भारत की भूमिका
  15. भारत की गुटनिरपेक्षता
  16. शीत युद्ध के प्रभाव और संयुक्त राष्ट्र
  17. शीत युद्ध का दोष किसका? — इतिहासकारों के मत
  18. राजस्थान से जुड़ाव
  19. व्यक्तित्व और कालक्रम (Timeline)

शुरू करने से पहले — इस अध्याय के ज़रूरी शब्द

शीत युद्ध को समझने में सबसे बड़ी बाधा इसकी शब्दावली है। नीचे दिए शब्द पूरे अध्याय में बार-बार आएँगे। इन्हें एक बार ध्यान से पढ़ लीजिए, फिर आगे का हर भाग आसानी से समझ आएगा।

क. दो व्यवस्थाएँ, दो खेमे

शब्द

सरल अर्थ

महाशक्ति (Superpower)

ऐसा देश जिसकी सेना, अर्थव्यवस्था और प्रभाव पूरी दुनिया तक पहुँचता हो। 1945 के बाद ऐसे दो ही देश थे — अमेरिका और सोवियत संघ।

पूँजीवाद (Capitalism)

ऐसी व्यवस्था जिसमें कारख़ाने, खेत और दुकानें निजी लोगों की होती हैं और वे मुनाफ़े के लिए काम करते हैं। अमेरिका इसका नेता था।

साम्यवाद (Communism)

ऐसी व्यवस्था जिसमें कारख़ाने और खेत सरकार के होते हैं और एक ही पार्टी राज करती है। सोवियत संघ इसका नेता था।

खेमा / गुट (Bloc)

एक महाशक्ति और उसके साथी देशों का समूह। अमेरिकी खेमे को पश्चिमी खेमा और सोवियत खेमे को पूर्वी खेमा कहा गया।

उपग्रह देश (Satellite State)

काग़ज़ पर स्वतंत्र, पर असल में किसी महाशक्ति के इशारे पर चलने वाला देश। पोलैंड, हंगरी, पूर्वी जर्मनी आदि सोवियत संघ के उपग्रह देश थे।

तीसरी दुनिया (Third World)

एशिया, अफ़्रीका और लातिन अमेरिका के वे नए स्वतंत्र और ग़रीब देश जो दोनों में से किसी खेमे में नहीं थे।

पूरब और पश्चिम का अर्थ: इस अध्याय में "पश्चिम" का मतलब दिशा नहीं, बल्कि अमेरिका और उसके साथी देश हैं; और "पूरब" का मतलब सोवियत संघ और उसके साथी देश। इसीलिए जापान नक़्शे में पूरब में होते हुए भी "पश्चिमी खेमे" का देश कहा जाता है।

ख. लड़ाई के नए तरीक़े

शब्द

सरल अर्थ

छद्म युद्ध (Proxy War)

ऐसा युद्ध जिसमें दोनों महाशक्तियाँ ख़ुद आमने-सामने नहीं लड़तीं, बल्कि किसी तीसरे देश में दो विरोधी पक्षों को हथियार और धन देकर लड़वाती हैं। कोरिया और वियतनाम इसके उदाहरण हैं।

नियंत्रण / रोकथाम (Containment)

अमेरिका की वह नीति कि साम्यवाद जहाँ तक फैल चुका है वहीं रोक दिया जाए, आगे न बढ़ने दिया जाए।

नाकेबंदी (Blockade)

किसी शहर या देश तक जाने वाले सारे रास्ते बंद कर देना, ताकि वहाँ भोजन और सामान न पहुँच सके।

हवाई पुल (Airlift)

ज़मीन के रास्ते बंद होने पर विमानों से लगातार सामान पहुँचाना।

अधिकृत क्षेत्र (Occupation Zone)

हारे हुए देश का वह हिस्सा जिस पर किसी विजेता देश की सेना का शासन हो।

लौह-आवरण (Iron Curtain)

पूर्वी और पश्चिमी यूरोप के बीच की वह अदृश्य सीमा जिसके पार सोवियत प्रभाव वाले देशों में बाहर की दुनिया का आना-जाना और ख़बरें रोक दी गई थीं।

ग. परमाणु युग के शब्द

शब्द

सरल अर्थ

परमाणु बम (Atom Bomb)

भारी परमाणुओं को तोड़कर ऊर्जा निकालने वाला बम; हिरोशिमा पर यही गिरा था।

हाइड्रोजन बम (Hydrogen Bomb)

हल्के परमाणुओं को जोड़कर ऊर्जा निकालने वाला बम, जो परमाणु बम से सैकड़ों गुना अधिक विनाशकारी है।

निवारण / प्रतिरोधक क्षमता (Deterrence)

शत्रु को यह भरोसा दिला देना कि हमला करोगे तो इतना भारी जवाब मिलेगा कि हमला करना ही घाटे का सौदा है।

परस्पर सुनिश्चित विनाश (Mutually Assured Destruction)

वह स्थिति जिसमें दोनों पक्षों के पास इतने बम हों कि जो पहले हमला करे वह भी जवाबी हमले में नष्ट हो जाए। इसी डर ने दोनों को सीधे युद्ध से रोके रखा।

हथियारों की होड़ (Arms Race)

एक-दूसरे से अधिक और बेहतर हथियार बनाने की प्रतिस्पर्धा।

घ. संयुक्त राष्ट्र और कूटनीति के शब्द

शब्द

सरल अर्थ

महासभा (General Assembly)

संयुक्त राष्ट्र का वह सदन जिसमें हर सदस्य देश बैठता है और हर देश का एक मत होता है। इसके प्रस्ताव सलाह जैसे होते हैं।

सुरक्षा परिषद (Security Council)

संयुक्त राष्ट्र की सबसे शक्तिशाली संस्था, जो युद्ध और शांति के निर्णय लेती है। इसके पाँच स्थायी सदस्य हैं — अमेरिका, सोवियत संघ (अब रूस), ब्रिटेन, फ़्रांस और चीन।

निषेधाधिकार (Veto)

पाँचों स्थायी सदस्यों का वह अधिकार कि उनमें से एक भी "नहीं" कह दे तो प्रस्ताव गिर जाता है।

युद्धविराम (Armistice)

लड़ाई रोकने का समझौता। यह शांति-संधि नहीं होती; युद्ध काग़ज़ पर जारी रहता है।

असैन्य क्षेत्र (Demilitarised Zone)

दो शत्रु देशों के बीच की वह पट्टी जहाँ कोई भी सेना नहीं रख सकता।

प्रत्यावर्तन (Repatriation)

युद्धबंदियों को उनके अपने देश वापस भेजना।

गुटनिरपेक्षता (Non-Alignment)

किसी भी सैन्य खेमे में शामिल न होना और हर मुद्दे पर अपने विवेक से निर्णय लेना।

तटस्थता (Neutrality)

युद्ध या विवाद में किसी का पक्ष न लेना और चुप रहना। गुटनिरपेक्षता इससे अलग है, क्योंकि गुटनिरपेक्ष देश सही-ग़लत पर खुलकर बोलता है।

तनाव-शैथिल्य / दितांत (Détente)

दोनों महाशक्तियों के बीच तनाव का कम होना और आपसी समझौतों का दौर (मुख्यतः 1963 से 1979)।

📌 "शीत" युद्ध ही क्यों कहा गया?

जिस युद्ध में गोलियाँ चलती हैं उसे "गर्म" युद्ध कहा जाता है। यहाँ दोनों महाशक्तियों की सेनाएँ आपस में कभी सीधे नहीं भिड़ीं, इसलिए इसे "ठंडा" यानी शीत युद्ध कहा गया। पर ध्यान रहे कि यह केवल महाशक्तियों के लिए ठंडा था — कोरिया, वियतनाम और अफ़ग़ानिस्तान जैसे देशों में इसी खींचतान के कारण लाखों लोग मारे गए।

1. शीत युद्ध — अर्थ, परिभाषाएँ और विशेषताएँ

द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिका और सोवियत संघ एक ही पाले में लड़े थे, पर युद्ध समाप्त होते ही दोनों के बीच अविश्वास, प्रतिस्पर्धा और तनाव की ऐसी स्थिति बनी जिसमें प्रत्यक्ष युद्ध नहीं हुआ, पर शांति भी नहीं रही। दोनों ने विचारधारा, कूटनीति, आर्थिक सहायता, सैन्य गठबंधन, जासूसी, प्रचार और हथियारों की होड़ के सहारे एक-दूसरे को कमज़ोर करने का प्रयास किया — इसी स्थिति को शीत युद्ध (Cold War) कहते हैं। यह लगभग 1945/47 से 1991 तक चला।

📘 आसान परिभाषा: शीत युद्ध (Cold War)

📚 परिभाषा: दो महाशक्तियों और उनके गुटों के बीच ऐसा दीर्घकालिक वैचारिक, राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य संघर्ष, जिसमें सीधी सशस्त्र लड़ाई नहीं होती, पर युद्ध की आशंका लगातार बनी रहती है।

💬 आसान भाषा में: न पूरी शांति, न खुला युद्ध — "सशस्त्र शांति"। दोनों पक्ष तलवार म्यान में रखते हैं, पर हाथ हमेशा मूठ पर रहता है। 🏠 उदाहरण: अमेरिका और सोवियत संघ कभी आमने-सामने नहीं लड़े, पर कोरिया (1950–53) में अमेरिका ने सीधे और सोवियत संघ ने हथियार व सलाहकार भेजकर परोक्ष रूप से भाग लिया।

A. "शीत युद्ध" शब्द कहाँ से आया?

व्यक्ति

वर्ष

योगदान

जॉर्ज ऑरवेल (ब्रिटिश लेखक)

19 अक्टूबर 1945

निबंध "आप और परमाणु बम" (You and the Atomic Bomb) में पहली बार परमाणु-युग के स्थायी तनाव के लिए "कोल्ड वॉर" शब्द प्रयोग किया

बर्नार्ड बरूच (अमेरिकी पूँजीपति, राष्ट्रपति के सलाहकार)

16 अप्रैल 1947

दक्षिण कैरोलिना में भाषण — "आज हम शीत युद्ध के बीच हैं" — पहली बार अमेरिका-सोवियत संबंधों के लिए प्रयोग

वॉल्टर लिपमैन (अमेरिकी पत्रकार)

1947

पुस्तक "द कोल्ड वॉर" — इससे शब्द लोकप्रिय हुआ और अकादमिक जगत में स्थापित हुआ

⚠️ ध्यान दें

"न युद्ध, न शांति" (No war, no peace) वाली उक्ति लियोन ट्रॉट्स्की की है, पर उसका संबंध 1918 की ब्रेस्ट-लिटोव्स्क वार्ता में जर्मनी के प्रति सोवियत नीति से था — वह शीत युद्ध की परिभाषा नहीं है। शीत युद्ध शब्द के संदर्भ में ऑरवेल (1945) → बरूच (1947) → लिपमैन (1947) का क्रम याद रखें।

B. प्रमुख परिभाषाएँ और मत

विद्वान

परिभाषा / मत

लुई हाले (Louis Halle)

शीत युद्ध परमाणु-युग की ऐसी तनावपूर्ण स्थिति है जो शस्त्र-युद्ध से पूरी तरह भिन्न, पर उससे अधिक भयानक है; इसमें छोटे देश महाशक्तियों के मोहरे बन गए।

एम. एस. राजन (भारतीय विद्वान)

शीत युद्ध शक्ति-संघर्ष, वैचारिक भिन्नता, जीवन-पद्धति के भेद और राष्ट्रीय हितों के टकराव का मिला-जुला परिणाम था, जिसकी तीव्रता देश-काल के अनुसार घटती-बढ़ती रही।

डी. एफ. फ़्लेमिंग (D. F. Fleming)

यह मुख्यतः मनोवैज्ञानिक और प्रचार-युद्ध था — लड़ाई मैदान से अधिक मस्तिष्कों में लड़ी गई।

जवाहरलाल नेहरू

शीत युद्ध को "भय और घृणा की राजनीति" मानते थे जो पूरी मानवता को परमाणु विनाश की ओर धकेल सकती है; इसलिए भारत ने किसी भी गुट से दूर रहने की नीति अपनाई।

जॉन लुई गैडिस (John Lewis Gaddis)

शीत युद्ध पारस्परिक अविश्वास और सुरक्षा-भय से उपजा; दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के इरादों को ग़लत समझा।

◆ सरल परिभाषा: जब दो देश अविश्वास, संदेह, दुष्प्रचार और षड्यंत्र की राजनीति में उलझकर बार-बार यह चेतावनी देते रहें कि हितों की रक्षा न हुई तो युद्ध होगा — पर वास्तव में युद्ध न करें — तो वे शीत युद्ध की स्थिति में होते हैं।

C. शीत युद्ध की विशेषताएँ

1. प्रत्यक्ष युद्ध का अभाव: अमेरिका और सोवियत संघ की सेनाएँ कभी आमने-सामने नहीं लड़ीं — परमाणु बम का भय इसकी सबसे बड़ी वजह था।

2. वैचारिक संघर्ष: पूँजीवाद + उदार लोकतंत्र बनाम साम्यवाद + एकदलीय शासन — दोनों अपनी व्यवस्था को पूरी दुनिया के लिए आदर्श मानते थे।

3. द्वि-ध्रुवीय विश्व (Bipolar World): दुनिया दो ध्रुवों में बँटी; छोटे देशों पर किसी एक खेमे में जाने का दबाव।

4. छद्म युद्ध (Proxy Wars): महाशक्तियाँ स्वयं न लड़कर तीसरे देशों में अपने समर्थकों को हथियार और धन देती रहीं — कोरिया (1950), आगे वियतनाम, अफ़ग़ानिस्तान।

5. हथियारों और परमाणु की होड़: 1949 में सोवियत परमाणु बम के बाद "संतुलित आतंक" (Balance of Terror) की स्थिति।

6. सैन्य गठबंधन: नाटो (1949), सीटो (1954), सेंटो (1955/59) बनाम वारसॉ संधि (1955)।

7. आर्थिक सहायता को हथियार बनाना: मार्शल योजना बनाम मोलोतोव योजना और कोमेकॉन।

8. जासूसी और प्रचार: सी.आई.ए. (अमेरिका, 1947) और सोवियत गुप्तचर संस्थाएँ (1954 से के.जी.बी.); रेडियो, फ़िल्में, अख़बार — "मस्तिष्कों पर क़ब्ज़े" की लड़ाई।

9. संयुक्त राष्ट्र में गतिरोध: सुरक्षा परिषद में वीटो का बार-बार प्रयोग — विशेषकर सोवियत संघ द्वारा (1945–55 में सर्वाधिक)।

10. तीसरी धारा — गुटनिरपेक्षता: भारत जैसे नव-स्वतंत्र देशों ने किसी खेमे में न जाकर स्वतंत्र नीति अपनाई।

चित्र 1: शीत युद्ध के दो गुट और गुटनिरपेक्षता का तीसरा रास्ता

चित्र 1: शीत युद्ध के दो गुट और गुटनिरपेक्षता का तीसरा रास्ता

💡 आसान भाषा में समझें

किसी क़स्बे में दो बड़े व्यापारी हैं — दोनों के पास इतनी ताक़त है कि सीधी लड़ाई में दोनों बर्बाद हो जाएँगे। इसलिए वे लड़ते नहीं, पर हर छोटे दुकानदार को उधार, सामान और सुरक्षा का लालच देकर अपने पाले में खींचते हैं, एक-दूसरे की जासूसी करते हैं, बाज़ार में अफ़वाहें फैलाते हैं और कभी-कभी अपने समर्थकों को आपस में लड़ा देते हैं। कुछ दुकानदार — जैसे भारत — कहते हैं, "हम दोनों से व्यापार करेंगे, पर किसी के ग़ुलाम नहीं बनेंगे।" यही शीत युद्ध और गुटनिरपेक्षता है।

2. शीत युद्ध के कारण

शीत युद्ध किसी एक घटना से नहीं, बल्कि 1917 से 1947 तक जमा हुए अविश्वास, वैचारिक विरोध और युद्धोत्तर शक्ति-शून्यता से पैदा हुआ। वास्तविक प्रेरणा दोनों की विश्व की एकमात्र महाशक्ति बनने की इच्छा थी — यदि केवल विचारधारा ही कारण होती, तो दोनों द्वितीय विश्व युद्ध में एक ही नाव में सवार न होते।

A. ऐतिहासिक और वैचारिक कारण

1. 1917 से चला आ रहा अविश्वास: बोल्शेविक क्रांति के बाद रूसी गृहयुद्ध (1918–20) में ब्रिटेन, फ्रांस, अमेरिका और जापान ने बोल्शेविक-विरोधी "गोरों" की सहायता के लिए सेनाएँ भेजीं; सोवियत संघ को पेरिस शांति सम्मेलन से दूर रखा गया।

▸ मान्यता में देरी — ब्रिटेन ने 1924, पर अमेरिका ने 1933 में सोवियत संघ को मान्यता दी।

2. विरोधी विचारधाराएँ: साम्यवाद पूँजीवाद के विनाश को ऐतिहासिक अनिवार्यता मानता था; पश्चिम साम्यवाद को स्वतंत्रता और निजी संपत्ति का शत्रु मानता था।

3. तुष्टीकरण और नाज़ी-सोवियत समझौता: सोवियत संघ ने म्यूनिख समझौते (1938) को हिटलर को पूर्व की ओर मोड़ने की पश्चिमी चाल माना; पश्चिम ने नाज़ी-सोवियत समझौते (23 अगस्त 1939) को विश्वासघात माना।

B. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उपजे संदेह

4. "दूसरे मोर्चे" में देरी: जून 1941 से सोवियत संघ जर्मनी का मुख्य बोझ झेल रहा था; स्टालिन बार-बार पश्चिमी यूरोप में मोर्चा खोलने की माँग करता रहा, पर वह जून 1944 (नॉर्मंडी) में खुला — स्टालिन को लगा कि पश्चिम चाहता है कि जर्मनी और रूस आपस में लड़कर कमज़ोर हों।

5. परमाणु रहस्य: अमेरिका ने मैनहट्टन परियोजना की जानकारी सोवियत संघ से छिपाई; पॉट्सडैम में ट्रूमैन ने केवल "एक नए शक्तिशाली हथियार" का संकेत दिया। हिरोशिमा को सोवियत संघ ने अपने लिए चेतावनी भी माना।

6. उधार-पट्टा सहायता (Lend-Lease) का अचानक अंत (मई–अगस्त 1945) और युद्धोत्तर पुनर्निर्माण ऋण न मिलने से सोवियत नाराज़गी।

C. युद्धोत्तर परिस्थितियाँ

7. शक्ति-शून्यता (Power Vacuum): जर्मनी, जापान पराजित; ब्रिटेन और फ्रांस आर्थिक रूप से टूट चुके — यूरोप और एशिया में जो ख़ाली जगह बनी, उसे भरने के लिए दो ही शक्तियाँ बचीं।

8. पूर्वी यूरोप पर सोवियत नियंत्रण: याल्टा में स्वतंत्र चुनाव का वादा होने के बावजूद पोलैंड, रोमानिया, बुल्गारिया, हंगरी और अंततः चेकोस्लोवाकिया (1948) में साम्यवादी सरकारें बिठाई गईं। स्टालिन के लिए यह सुरक्षा-कवच था (रूस पर पश्चिम से दो बार — 1914 और 1941 में — आक्रमण हुआ था); पश्चिम के लिए यह विस्तारवाद था।

9. ईरान और तुर्की पर दबाव (1946): सोवियत सेना समय-सीमा के बाद भी उत्तरी ईरान में रुकी रही (मई 1946 में हटी); तुर्की से जलडमरूमध्य (बोस्फ़ोरस-डार्डनेल्स) पर संयुक्त नियंत्रण माँगा — पश्चिम को भूमध्य सागर तक सोवियत पहुँच का ख़तरा दिखा।

10. संयुक्त राष्ट्र में वीटो का दुरुपयोग: सोवियत संघ के बार-बार वीटो से पश्चिम का संदेह बढ़ा; सोवियत संघ को संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी बहुमत से भय था।

11. नेतृत्व और प्रचार: रूज़वेल्ट (मृत्यु 12 अप्रैल 1945) के स्थान पर ट्रूमैन का अपेक्षाकृत कठोर रुख़; स्टालिन का अत्यधिक संदेहशील स्वभाव; चर्चिल का खुला साम्यवाद-विरोध; दोनों ओर के अख़बारों और रेडियो का दुष्प्रचार।

12. आर्थिक हित: अमेरिका को अपने विशाल उत्पादन के लिए खुले विश्व-बाज़ार चाहिए थे; सोवियत नियंत्रण वाले क्षेत्र इन बाज़ारों से बाहर हो रहे थे।

📌 उत्तर-लेखन संकेत

कारणों को तीन स्तरों में लिखें — (1) दीर्घकालिक (1917 का अविश्वास, विचारधारा), (2) युद्धकालीन (दूसरा मोर्चा, परमाणु रहस्य), (3) युद्धोत्तर (शक्ति-शून्यता, पूर्वी यूरोप, ईरान-तुर्की, नेतृत्व)। अंत में लिखें कि मूल प्रेरणा महाशक्ति बनने की होड़ थी और विचारधारा उसका औज़ार बनी।

3. शीत युद्ध के चरण — एक झलक

शीत युद्ध 1945 से 1991 तक चला। नीचे की तालिका में उसके सभी चरण एक नज़र में हैं। 1945–1953 का विस्तार आगे के भागों में है और 1953–1991 की पूरी कहानी इसी भाग के अंत में दी गई है।

चरण

काल

प्रमुख घटनाएँ और स्वरूप

जड़ें

1917–1945

बोल्शेविक क्रांति, हस्तक्षेप, देर से मान्यता; युद्धकालीन गठबंधन में भी संदेह

आरंभ और उभार ⭐

1945–1953

याल्टा-पॉट्सडैम, लौह-आवरण, ट्रूमैन सिद्धांत, मार्शल योजना, बर्लिन नाकेबंदी, नाटो, सोवियत बम, चीनी क्रांति, कोरियाई युद्ध

तनाव और हल्की नरमी

1953–1962

स्टालिन की मृत्यु (1953), ख्रुश्चेव का "शांतिपूर्ण सहअस्तित्व"; सीटो (1954), वारसॉ संधि (1955), हंगरी (1956), स्वेज़ (1956), स्पुतनिक (1957), यू-2 घटना (1960), बर्लिन दीवार (1961), क्यूबा मिसाइल संकट (1962)

दितांत (तनाव-शैथिल्य)

1963–1979

हॉटलाइन, आंशिक परीक्षण प्रतिबंध संधि (1963), अप्रसार संधि (1968), साल्ट-1 (1972), हेलसिंकी (1975); पर वियतनाम युद्ध जारी

दूसरा शीत युद्ध

1979–1985

सोवियत संघ का अफ़ग़ानिस्तान में प्रवेश (1979), रीगन की "स्टार वॉर्स" योजना, ओलंपिक बहिष्कार

अंत

1985–1991

गोर्बाचेव के ग्लासनोस्त-पेरेस्त्रोइका, बर्लिन दीवार का पतन (9 नवंबर 1989), जर्मनी का एकीकरण (1990), सोवियत संघ का विघटन (26 दिसंबर 1991) — 15 स्वतंत्र देश

शीत युद्ध की शुरुआत कब मानें? — विभिन्न मत

◆ 1917: कुछ विद्वान बोल्शेविक क्रांति को ही शीत युद्ध की वैचारिक शुरुआत मानते हैं।

◆ 1945: याल्टा-पॉट्सडैम के मतभेद और हिरोशिमा — "परमाणु कूटनीति" की शुरुआत।

◆ 1946: स्टालिन का भाषण (फ़रवरी), केनन का लंबा तार (फ़रवरी) और चर्चिल का लौह-आवरण भाषण (मार्च) — वाक्-युद्ध की शुरुआत।

◆ 1947: ट्रूमैन सिद्धांत (12 मार्च 1947) — अधिकांश इतिहासकार इसे शीत युद्ध की औपचारिक/आधिकारिक घोषणा मानते हैं।

1953 से 1991 तक — शीत युद्ध की आगे की पूरी कहानी

ऊपर की तालिका में 1953 के बाद की घटनाओं के केवल नाम आए हैं। इस अध्याय के आगे के भागों में 1945 से 1953 तक का विस्तार है, इसलिए उसके बाद की कहानी यहीं पूरी समझ लीजिए। इसे चार दौरों में बाँटकर पढ़ना सबसे आसान है।

▶ पहला दौर (1953–1962) — नरमी की बातें, पर सबसे ख़तरनाक संकट

मार्च 1953 में स्टालिन की मृत्यु हुई और कुछ समय बाद निकिता ख्रुश्चेव सोवियत संघ के नेता बने। फ़रवरी 1956 में उन्होंने पार्टी के बीसवें अधिवेशन में एक गुप्त भाषण देकर स्टालिन के अत्याचारों की निंदा की और कहा कि पूँजीवादी और साम्यवादी देश बिना युद्ध के साथ-साथ रह सकते हैं। इसे शांतिपूर्ण सहअस्तित्व (Peaceful Coexistence) कहा गया। पर व्यवहार में तनाव बना रहा:

◆ सैन्य गठबंधनों का जाल: अमेरिका ने दक्षिण-पूर्व एशिया में सीटो (1954) और पश्चिम एशिया में बग़दाद संधि (1955, बाद में सेंटो) बनाई। जब 1955 में पश्चिम जर्मनी नाटो में शामिल हुआ तो सोवियत संघ ने उसी साल पूर्वी यूरोप के देशों के साथ वारसॉ संधि बना ली। अब दोनों खेमों के पास अपना-अपना सैन्य गठबंधन था।

◆ हंगरी (1956): हंगरी की जनता ने सोवियत नियंत्रण के विरुद्ध विद्रोह किया और वहाँ के नेता इमरे नॉज ने वारसॉ संधि छोड़ने की घोषणा कर दी। सोवियत टैंकों ने विद्रोह कुचल दिया। इससे साफ़ हो गया कि नरमी की बातों के बावजूद सोवियत संघ अपने खेमे से किसी को निकलने नहीं देगा।

◆ स्वेज़ संकट (1956): मिस्र के राष्ट्रपति नासिर ने स्वेज़ नहर का राष्ट्रीयकरण किया तो ब्रिटेन, फ़्रांस और इज़राइल ने मिस्र पर हमला कर दिया। अमेरिका और सोवियत संघ दोनों ने इसका विरोध किया और हमलावरों को लौटना पड़ा। इससे सिद्ध हुआ कि ब्रिटेन और फ़्रांस अब बड़ी शक्तियाँ नहीं रहे।

◆ अंतरिक्ष की होड़: 4 अक्टूबर 1957 को सोवियत संघ ने दुनिया का पहला कृत्रिम उपग्रह स्पुतनिक छोड़ा और 1961 में यूरी गगारिन अंतरिक्ष में जाने वाले पहले मानव बने। अमेरिका को झटका लगा, क्योंकि जो रॉकेट उपग्रह ले जा सकता है वह परमाणु बम भी ले जा सकता है। जवाब में अमेरिका ने 1969 में चंद्रमा पर मानव उतारा।

◆ यू-2 घटना (1960): सोवियत संघ ने अपने ऊपर जासूसी करता एक अमेरिकी विमान मार गिराया और उसके पायलट को पकड़ लिया। इससे दोनों नेताओं की होने वाली शिखर बैठक टूट गई।

◆ बर्लिन की दीवार (13 अगस्त 1961): पूर्वी जर्मनी से लाखों लोग पश्चिम बर्लिन के रास्ते भाग रहे थे। इसे रोकने के लिए पूर्वी जर्मनी ने शहर के बीच दीवार खड़ी कर दी, जो 28 साल तक शीत युद्ध का सबसे बड़ा प्रतीक बनी रही।

◆ क्यूबा मिसाइल संकट (अक्टूबर 1962): 1959 में फ़िदेल कास्त्रो ने क्यूबा में क्रांति की और वह सोवियत संघ के निकट चला गया। 1961 में अमेरिका ने कास्त्रो को हटाने का एक विफल प्रयास किया। इसके बाद ख्रुश्चेव ने क्यूबा में चुपचाप परमाणु मिसाइलें लगानी शुरू कीं, जो अमेरिका से केवल लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर दूर थीं। अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन कैनेडी ने क्यूबा की समुद्री घेराबंदी कर दी। तेरह दिन तक दुनिया परमाणु युद्ध के कगार पर खड़ी रही। अंत में समझौता हुआ — सोवियत संघ मिसाइलें हटाएगा, अमेरिका क्यूबा पर हमला नहीं करेगा और चुपचाप तुर्की से अपनी मिसाइलें हटाएगा। यह शीत युद्ध का सबसे ख़तरनाक क्षण माना जाता है।

▶ दूसरा दौर (1963–1979) — तनाव-शैथिल्य

क्यूबा संकट ने दोनों को डरा दिया। दोनों समझ गए कि एक ग़लतफ़हमी भी पूरी दुनिया को नष्ट कर सकती है, इसलिए बातचीत का दौर शुरू हुआ:

◆ 1963: दोनों राजधानियों के बीच सीधी संचार लाइन (हॉटलाइन) लगी, ताकि संकट में नेता तुरंत बात कर सकें। इसी वर्ष आंशिक परीक्षण प्रतिबंध संधि हुई, जिसने वायुमंडल, अंतरिक्ष और समुद्र के नीचे परमाणु परीक्षण रोक दिए।

◆ 1968: परमाणु अप्रसार संधि — जिन देशों के पास बम नहीं है वे नहीं बनाएँगे। भारत ने इसे भेदभावपूर्ण मानकर हस्ताक्षर नहीं किए।

◆ 1972: अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन और सोवियत नेता ब्रेझनेव के बीच साल्ट-1 समझौता, जिसने लंबी दूरी के मिसाइलों की संख्या सीमित की।

◆ 1975: हेलसिंकी समझौता — 35 देशों ने यूरोप की मौजूदा सीमाओं और मानव अधिकारों के सम्मान को स्वीकार किया।

इसी दौर में तीन और बातें हुईं जो नरमी के उलट थीं। पहली, वियतनाम युद्ध: 1954 में फ़्रांस की हार के बाद वियतनाम सत्रहवीं अक्षांश रेखा पर साम्यवादी उत्तर और अमेरिका-समर्थित दक्षिण में बँट गया। अमेरिका को डर था कि एक देश साम्यवादी हुआ तो पड़ोसी भी एक-एक कर गिरते जाएँगे; इसे डोमिनो सिद्धांत कहा गया। 1965 से उसने लाखों सैनिक भेजे, पर हो ची मिन्ह के नेतृत्व वाले उत्तर को हरा नहीं सका। 1973 में अमेरिका लौट गया और 1975 में पूरा वियतनाम साम्यवादी शासन में एक हो गया। यह अमेरिका की सबसे बड़ी हार थी। दूसरी, चेकोस्लोवाकिया (1968): वहाँ के नेता दुबचेक ने साम्यवाद को उदार बनाने की कोशिश की, जिसे "प्राग का वसंत" कहा गया। सोवियत टैंकों ने उसे कुचल दिया और ब्रेझनेव ने घोषणा की कि किसी भी साम्यवादी देश में साम्यवाद ख़तरे में पड़ा तो सोवियत संघ हस्तक्षेप करेगा। तीसरी, चीन और सोवियत संघ की फूट: दोनों साम्यवादी देश 1960 के आसपास नेतृत्व और नीति के प्रश्न पर अलग हो गए और 1969 में उनकी सीमा पर झड़पें भी हुईं। अमेरिका ने इसका लाभ उठाया और 1972 में निक्सन चीन गए। अब दुनिया केवल दो ध्रुवों वाली नहीं रही।

▶ तीसरा दौर (1979–1985) — दूसरा शीत युद्ध

दिसंबर 1979 में सोवियत सेना अपनी समर्थक सरकार को बचाने अफ़ग़ानिस्तान में घुस गई। अमेरिका ने इसे विस्तारवाद माना, 1980 के मॉस्को ओलंपिक का बहिष्कार किया और पाकिस्तान के रास्ते अफ़ग़ान लड़ाकों को हथियार दिए। अफ़ग़ानिस्तान सोवियत संघ के लिए वही बन गया जो अमेरिका के लिए वियतनाम था — दस साल का महँगा और हारा हुआ युद्ध। 1981 में अमेरिका के राष्ट्रपति बने रोनाल्ड रीगन ने सैन्य ख़र्च बहुत बढ़ाया और 1983 में अंतरिक्ष में मिसाइल-रोधी ढाल बनाने की योजना घोषित की, जिसे लोग "स्टार वॉर्स" कहने लगे। सोवियत अर्थव्यवस्था इस होड़ का बोझ नहीं उठा पा रही थी।

▶ चौथा दौर (1985–1991) — अंत

मार्च 1985 में मिख़ाइल गोर्बाचेव सोवियत संघ के नेता बने। उन्होंने देखा कि देश की अर्थव्यवस्था ठहर चुकी है, दुकानें ख़ाली हैं और हथियारों पर ख़र्च असहनीय है। उन्होंने दो नीतियाँ शुरू कीं:

◆ ग्लासनोस्त (खुलापन) — सरकार की आलोचना और सच बोलने की छूट।

◆ पेरेस्त्रोइका (पुनर्गठन) — अर्थव्यवस्था और शासन में सुधार, कुछ निजी कारोबार की अनुमति।

विदेश नीति में उन्होंने 1987 में अमेरिका के साथ मध्यम दूरी के सभी मिसाइल नष्ट करने की संधि की, 1989 में अफ़ग़ानिस्तान से सेना लौटाई और साफ़ कह दिया कि पूर्वी यूरोप के देश अपना रास्ता ख़ुद चुनें। परिणाम तेज़ी से आए। 1989 में पोलैंड, हंगरी, पूर्वी जर्मनी, चेकोस्लोवाकिया, बुल्गारिया और रोमानिया में एक के बाद एक साम्यवादी सरकारें गिर गईं। 9 नवंबर 1989 को बर्लिन की दीवार खुल गई। 3 अक्टूबर 1990 को जर्मनी का एकीकरण हुआ। 1991 में वारसॉ संधि भंग कर दी गई।

ख़ुद सोवियत संघ के भीतर खुलेपन ने दबी हुई राष्ट्रीयताओं को आवाज़ दे दी और एक-एक गणराज्य स्वतंत्रता माँगने लगा। अगस्त 1991 में कट्टर साम्यवादियों ने गोर्बाचेव को हटाने का विफल प्रयास किया, जिससे केंद्र की बची-खुची साख भी समाप्त हो गई। 25 दिसंबर 1991 को गोर्बाचेव ने त्यागपत्र दिया और 26 दिसंबर 1991 को सोवियत संघ औपचारिक रूप से समाप्त हो गया। उसकी जगह पंद्रह स्वतंत्र देश बने, जिनमें रूस सबसे बड़ा है। शीत युद्ध बिना किसी अंतिम लड़ाई के समाप्त हो गया।

▶ सोवियत संघ क्यों हारा? — पाँच कारण

1. आर्थिक ठहराव: सरकारी नियंत्रण वाली अर्थव्यवस्था भारी उद्योग और हथियार तो बना लेती थी, पर आम उपभोग की चीज़ें और नई तकनीक नहीं दे पाई।

2. हथियारों की होड़ का बोझ: अमेरिका से छोटी अर्थव्यवस्था होते हुए भी सोवियत संघ को उसके बराबर सैन्य ख़र्च करना पड़ा।

3. अफ़ग़ानिस्तान का युद्ध: दस साल में धन, सैनिक और प्रतिष्ठा — तीनों गए।

4. राजनीतिक जड़ता: एक पार्टी का शासन, भ्रष्टाचार और जनता की भागीदारी का अभाव।

5. राष्ट्रीयताओं का प्रश्न और गोर्बाचेव के सुधार: सुधारों ने व्यवस्था को ठीक करने के बजाय उसकी कमज़ोरियाँ खोल दीं और गणराज्य अलग होते गए।

📌 भारत पर असर

शीत युद्ध के अंत से भारत का सबसे भरोसेमंद साथी और हथियारों का मुख्य स्रोत सोवियत संघ समाप्त हो गया। दुनिया में अमेरिका अकेली महाशक्ति रह गई, जिसे एकध्रुवीय विश्व कहा गया। भारत ने 1991 में ही अपनी अर्थव्यवस्था खोली और अमेरिका, पूर्वी एशिया तथा अन्य देशों से नए संबंध बनाए। गुटनिरपेक्षता की प्रासंगिकता पर भी नई बहस शुरू हुई।

4. याल्टा और पॉट्सडैम — मित्रता में दरार (1945)

युद्ध के अंतिम वर्ष में "तीन बड़े" (Big Three) नेताओं ने युद्धोत्तर विश्व की रूपरेखा तय करने के लिए दो बड़े सम्मेलन किए। पहले में सहयोग की भावना दिखी, दूसरे तक आते-आते संदेह खुलकर सामने आ गया।

पहलू

याल्टा सम्मेलन

पॉट्सडैम सम्मेलन

तिथि और स्थान

4–11 फ़रवरी 1945, क्रीमिया (सोवियत संघ)

17 जुलाई – 2 अगस्त 1945, बर्लिन के पास पॉट्सडैम (जर्मनी)

नेता

रूज़वेल्ट (अमेरिका), चर्चिल (ब्रिटेन), स्टालिन (सोवियत संघ)

ट्रूमैन (अमेरिका), चर्चिल → बीच में ही एटली (ब्रिटेन, चुनाव-परिणाम के बाद), स्टालिन

जर्मनी

पराजय के बाद अधिकृत क्षेत्रों में बाँटना; फ्रांस को भी एक क्षेत्र

चार क्षेत्र — अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, सोवियत संघ; बर्लिन के भी चार सेक्टर; "चार-डी" — निःशस्त्रीकरण, नाज़ीवाद-उन्मूलन, लोकतंत्रीकरण, विकेंद्रीकरण

पूर्वी यूरोप / पोलैंड

"मुक्त यूरोप की घोषणा" — मुक्त क्षेत्रों में स्वतंत्र चुनाव; पोलैंड की सीमा पश्चिम खिसकाना

पोलैंड की पश्चिमी सीमा ओडर-नाइस रेखा — अस्थायी रूप से स्वीकृत; पश्चिम सोवियत नियंत्रण से असंतुष्ट

जापान / एशिया

जर्मनी की हार के तीन महीने बाद सोवियत संघ जापान से युद्ध करेगा; बदले में सख़ालिन, कुरील द्वीप

पॉट्सडैम घोषणा (26 जुलाई 1945) — जापान से बिना शर्त आत्मसमर्पण की माँग

संयुक्त राष्ट्र

सुरक्षा परिषद में वीटो पर सहमति; सैन फ़्रांसिस्को सम्मेलन (अप्रैल 1945) तय

—

हर्जाना

सिद्धांततः सहमति

हर पक्ष अपने क्षेत्र से वसूले; सोवियत संघ को पश्चिमी क्षेत्रों से भी आंशिक भाग

वातावरण

सहयोग, पर वादों की अस्पष्टता

खुला संदेह — ट्रूमैन ने स्टालिन को "नए शक्तिशाली हथियार" की सूचना दी; चार दिन बाद हिरोशिमा (6 अगस्त)

◆ महत्त्व: याल्टा के स्वतंत्र चुनाव वाले वादे का टूटना पश्चिम के लिए सोवियत विश्वासघात का सबसे बड़ा प्रमाण बना; वहीं स्टालिन मानता था कि पूर्वी यूरोप में "मित्र सरकारें" उसका जायज़ सुरक्षा-अधिकार हैं, जिसे याल्टा में स्वीकार किया गया था।

इन दोनों सम्मेलनों को ऐसे समझें: याल्टा (फ़रवरी 1945) के समय युद्ध चल रहा था और तीनों नेताओं को एक-दूसरे की ज़रूरत थी, इसलिए मतभेद दबा दिए गए और वादे गोल-मोल भाषा में किए गए। पॉट्सडैम (जुलाई–अगस्त 1945) तक जर्मनी हार चुका था, यानी साझा शत्रु नहीं रहा। अमेरिका में रूज़वेल्ट की जगह ट्रूमैन आ चुके थे, जो सोवियत संघ के प्रति कहीं अधिक सख़्त थे; और ब्रिटेन में सम्मेलन के बीच ही चर्चिल की जगह एटली आ गए। इसी सम्मेलन में ट्रूमैन को परमाणु बम के सफल परीक्षण की सूचना मिली। इसलिए याल्टा में जो बातें सहमति जैसी दिखती थीं, वे पॉट्सडैम में झगड़े का कारण बन गईं।

सबसे बड़ा झगड़ा पोलैंड पर था। याल्टा में स्टालिन ने पूर्वी यूरोप में "स्वतंत्र चुनाव" का वादा किया था। पश्चिम के लिए इसका अर्थ था कई पार्टियों वाला खुला चुनाव; स्टालिन के लिए इसका अर्थ था ऐसी सरकार जो सोवियत संघ की मित्र हो। स्टालिन का तर्क यह था कि तीस साल में जर्मनी ने दो बार पोलैंड के रास्ते रूस पर हमला किया है, इसलिए वहाँ शत्रु सरकार वह सहन नहीं कर सकता। पश्चिम ने इसे वादाख़िलाफ़ी और साम्यवाद का जबरन फैलाव माना। यहीं से आपसी अविश्वास खुलकर सामने आया।

चित्र 2: शीत युद्ध के आरंभिक पड़ाव — 1945 से 1950 तक

चित्र 2: शीत युद्ध के आरंभिक पड़ाव — 1945 से 1950 तक

5. 1946 — भाषणों का वर्ष (वाक्-युद्ध की शुरुआत)

तिथि

घटना

मुख्य बात और प्रभाव

9 फ़रवरी 1946

स्टालिन का चुनावी भाषण (मॉस्को, बोल्शोई थिएटर)

पूँजीवाद रहते युद्ध अपरिहार्य हैं; सोवियत संघ को भारी उद्योग और रक्षा पर ज़ोर देना होगा — पश्चिम ने इसे "तीसरे विश्व युद्ध की घोषणा" तक कहा

22 फ़रवरी 1946

जॉर्ज केनन का "लंबा तार" (Long Telegram) — मॉस्को से वॉशिंगटन

सोवियत नीति स्वभावतः विस्तारवादी और असुरक्षा-प्रेरित है; वह तर्क नहीं, केवल दृढ़ शक्ति की भाषा समझती है — नियंत्रण नीति का बीज

5 मार्च 1946

चर्चिल का "लौह-आवरण" भाषण — वेस्टमिंस्टर कॉलेज, फ़ुल्टन (मिसौरी, अमेरिका), ट्रूमैन की उपस्थिति में

पूर्वी यूरोप सोवियत नियंत्रण में; आंग्ल-अमेरिकी "विशेष संबंध" और एकजुटता की माँग

14 मार्च 1946

स्टालिन की प्रतिक्रिया (प्रावदा साक्षात्कार)

चर्चिल की तुलना हिटलर से की — "नस्लवादी सिद्धांत" और युद्ध भड़काने का आरोप

सितंबर 1946

नोविकोव तार — वॉशिंगटन से सोवियत राजदूत का मॉस्को को संदेश

अमेरिका विश्व-प्रभुत्व चाहता है — केनन के तार का सोवियत समकक्ष

“बाल्टिक सागर पर स्टेटिन से लेकर एड्रियाटिक सागर पर ट्रिएस्ट तक पूरे महाद्वीप पर एक लौह-आवरण गिर चुका है। उसके पीछे मध्य और पूर्वी यूरोप के प्राचीन राज्यों की सभी राजधानियाँ हैं।” (विंस्टन चर्चिल, फ़ुल्टन, 5 मार्च 1946)

◆ "लौह-आवरण" (Iron Curtain) का अर्थ — एक अदृश्य दीवार जिसने यूरोप को दो भागों में बाँट दिया: पश्चिम के खुले, लोकतांत्रिक समाज और पूर्व के बंद, सोवियत-नियंत्रित समाज।

◆ भाषण के समय चर्चिल प्रधानमंत्री नहीं थे (जुलाई 1945 में चुनाव हार चुके थे), पर उनकी प्रतिष्ठा के कारण भाषण ने पूरे पश्चिम की सोच बदल दी।

⚠️ ध्यान दें

"लौह-आवरण" की सीमा चर्चिल के अनुसार बाल्टिक (स्टेटिन) से एड्रियाटिक (ट्रिएस्ट) तक थी — "बाल्टिक से काला सागर" नहीं। भाषण का वास्तविक शीर्षक "शांति के स्नायु" (Sinews of Peace) था।

इन तीनों भाषणों को एक कड़ी में पढ़ें। फ़रवरी 1946 में स्टालिन ने कहा कि पूँजीवाद के रहते युद्ध होते रहेंगे, इसलिए सोवियत संघ को तैयार रहना होगा। अमेरिका ने इसे चुनौती की तरह सुना। कुछ ही दिन बाद मॉस्को में तैनात अमेरिकी राजनयिक जॉर्ज केनन ने अपनी सरकार को एक बहुत लंबा तार भेजा, जिसमें लिखा था कि सोवियत संघ स्वभाव से विस्तारवादी है, वह समझौते से नहीं, केवल दृढ़ विरोध से रुकेगा; पर उससे युद्ध करना ज़रूरी नहीं, बस उसे धैर्य से हर जगह रोके रखना काफ़ी है। यही विचार आगे नियंत्रण की नीति बना। मार्च 1946 में चर्चिल ने अमेरिका के फ़ुल्टन नगर में कहा कि यूरोप के आर-पार एक लौह-आवरण उतर आया है। इस तरह एक ही वर्ष में दोनों ओर के नेताओं ने सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे को शत्रु कह दिया, जबकि अभी तक कोई ठोस क़दम नहीं उठाया गया था। ठोस क़दम अगले वर्ष आया।

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6. ट्रूमैन सिद्धांत और नियंत्रण की नीति (1947)

A. पृष्ठभूमि — ग्रीस और तुर्की

1. ग्रीस: साम्यवादी छापामारों और राजशाही सरकार के बीच गृहयुद्ध (1946–49); ब्रिटेन अब तक सरकार की मदद कर रहा था।

2. तुर्की: सोवियत संघ जलडमरूमध्यों पर संयुक्त नियंत्रण और सैनिक अड्डे चाहता था।

3. ब्रिटेन की असमर्थता: 1946–47 की भीषण सर्दी और आर्थिक संकट से जूझ रहे ब्रिटेन ने 21 फ़रवरी 1947 को अमेरिका को सूचित किया कि वह 31 मार्च के बाद ग्रीस-तुर्की की सहायता नहीं कर सकेगा — विश्व-नेतृत्व की मशाल ब्रिटेन से अमेरिका के हाथ में आ गई।

B. सिद्धांत की घोषणा — 12 मार्च 1947

“संयुक्त राज्य अमेरिका की नीति यह होनी चाहिए कि वह उन स्वतंत्र लोगों का समर्थन करे जो सशस्त्र अल्पसंख्यकों या बाहरी दबावों द्वारा अधीन बनाए जाने के प्रयासों का विरोध कर रहे हैं।” (राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन, अमेरिकी कांग्रेस के संयुक्त सत्र में, 12 मार्च 1947)

1. सहायता: ग्रीस और तुर्की को 40 करोड़ डॉलर (ग्रीस लगभग 30 करोड़, तुर्की 10 करोड़) की आर्थिक-सैन्य सहायता और सैन्य सलाहकार।

2. विश्व का दो जीवन-पद्धतियों में विभाजन: ट्रूमैन के अनुसार हर राष्ट्र को "स्वतंत्रता" और "दमन" में से एक चुनना होगा।

3. अलगाववाद का अंत: 1823 के मुनरो सिद्धांत की परंपरा छोड़कर अमेरिका ने शांतिकाल में विश्व के किसी भी भाग में हस्तक्षेप की ज़िम्मेदारी स्वीकार की।

4. परिणाम: ग्रीस में साम्यवादी पराजित (1949), तुर्की पश्चिमी खेमे में (1952 में नाटो सदस्य)।

📘 आसान परिभाषा: नियंत्रण की नीति (Containment)

📚 परिभाषा: साम्यवाद को जहाँ वह है वहीं रोक देना — उसे नष्ट करने के लिए युद्ध नहीं, पर उसके और फैलाव का हर जगह दृढ़ता से प्रतिरोध करना।

💬 आसान भाषा में: जैसे बाढ़ के पानी को तटबंध बनाकर रोका जाता है — पानी सुखाया नहीं जाता, बस आगे बढ़ने नहीं दिया जाता। 🏠 उदाहरण: केनन का लेख "सोवियत आचरण के स्रोत" (जुलाई 1947, "मिस्टर एक्स" नाम से) — ट्रूमैन सिद्धांत (राजनीतिक), मार्शल योजना (आर्थिक) और नाटो (सैन्य) इसी नीति के तीन स्तंभ बने।

◆ नियंत्रण के साधन: आर्थिक सहायता, सैन्य गठबंधन, विदेशों में सैनिक अड्डे, गुप्तचर गतिविधियाँ (सी.आई.ए. — राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, जुलाई 1947), प्रचार (वॉयस ऑफ़ अमेरिका रेडियो)।

◆ आलोचना: स्वयं वॉल्टर लिपमैन ने "द कोल्ड वॉर" में इस नीति को अमेरिका को दुनिया भर के अलोकतांत्रिक शासकों का संरक्षक बना देने वाली बताया; आगे चलकर केनन ने भी इसके सैन्यीकरण की आलोचना की।

ट्रूमैन सिद्धांत की पृष्ठभूमि सरल शब्दों में: यूनान में राजा की सरकार और साम्यवादी छापामारों के बीच गृहयुद्ध चल रहा था, और तुर्की पर सोवियत संघ अपने जहाज़ों के लिए समुद्री रास्ते में हिस्सेदारी का दबाव डाल रहा था। अब तक इन दोनों को ब्रिटेन सँभाल रहा था। फ़रवरी 1947 में युद्ध से कंगाल हो चुके ब्रिटेन ने अमेरिका को बता दिया कि वह अब यह ख़र्च नहीं उठा सकता। ट्रूमैन के सामने प्रश्न था कि ख़ाली जगह कौन भरेगा। 12 मार्च 1947 को उन्होंने संसद से यूनान और तुर्की के लिए चालीस करोड़ डॉलर माँगे और साथ में एक आम सिद्धांत घोषित कर दिया — जहाँ भी कोई स्वतंत्र जनता हथियारबंद अल्पसंख्यकों या बाहरी दबाव का सामना कर रही हो, अमेरिका उसकी मदद करेगा।

इसका महत्व यह है कि अमेरिका ने डेढ़ सौ साल पुरानी अपनी वह परंपरा छोड़ दी जिसमें वह शांतिकाल में यूरोप के झगड़ों से दूर रहता था। अब उसने पूरी दुनिया में साम्यवाद को रोकने की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। इसी कारण अधिकांश इतिहासकार इस दिन को शीत युद्ध की औपचारिक शुरुआत मानते हैं। आलोचक कहते हैं कि इस सिद्धांत ने दुनिया को "स्वतंत्र" और "ग़ुलाम" के दो सरल ख़ानों में बाँट दिया और आगे चलकर अमेरिका ने साम्यवाद-विरोध के नाम पर कई तानाशाहों का भी साथ दिया।

7. मार्शल योजना और सोवियत उत्तर (1947–1949)

A. मार्शल योजना — यूरोपीय पुनर्निर्माण कार्यक्रम

5 जून 1947 को अमेरिकी विदेश मंत्री जॉर्ज सी. मार्शल ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के दीक्षांत भाषण में घोषणा की कि अमेरिका युद्ध से तबाह यूरोप के पुनर्निर्माण में सहायता करेगा — "हमारी नीति किसी देश या सिद्धांत के विरुद्ध नहीं, बल्कि भूख, ग़रीबी, हताशा और अराजकता के विरुद्ध है।" इसे औपचारिक रूप से यूरोपीय पुनर्निर्माण कार्यक्रम (European Recovery Program) कहा गया।

पहलू

विवरण

कानूनी आधार

आर्थिक सहयोग अधिनियम — 3 अप्रैल 1948; संचालन के लिए यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन (OEEC, अप्रैल 1948)

अवधि

1948–1952 (लगभग चार वर्ष)

राशि

लगभग 13 अरब डॉलर (कुछ स्रोतों में 12–13.3 अरब) — अधिकांश अनुदान के रूप में

लाभार्थी

प्रारंभ में 16 पश्चिमी यूरोपीय देश, आगे पश्चिम जर्मनी भी; सर्वाधिक सहायता ब्रिटेन, फिर फ्रांस, इटली, पश्चिम जर्मनी

उद्देश्य

यूरोप का आर्थिक पुनर्निर्माण, भूख-बेरोज़गारी का अंत, साम्यवाद के प्रसार को रोकना, अमेरिकी वस्तुओं के लिए बाज़ार

परिणाम

पश्चिमी यूरोप का औद्योगिक उत्पादन 1951 तक युद्ध-पूर्व स्तर से लगभग 35% ऊपर; फ्रांस-इटली में साम्यवादी दलों का प्रभाव घटा; पश्चिम जर्मनी का "आर्थिक चमत्कार"; आगे यूरोपीय एकीकरण (यूरोपीय कोयला-इस्पात समुदाय 1951) की नींव

◆ सोवियत संघ को भी निमंत्रण: पेरिस सम्मेलन (जून-जुलाई 1947) में मोलोतोव शामिल हुए, पर अमेरिकी शर्तों और निगरानी को संप्रभुता का उल्लंघन बताकर बाहर चले गए। चेकोस्लोवाकिया और पोलैंड ने पहले रुचि दिखाई, पर मॉस्को के दबाव में पीछे हटे।

◆ सोवियत दृष्टि: स्टालिन ने इसे "डॉलर साम्राज्यवाद" कहा — यूरोप को आर्थिक रूप से अमेरिका का आश्रित बनाने की चाल।

मार्शल योजना क्यों ज़रूरी लगी: 1947 की सर्दी में पश्चिमी यूरोप भूख, बेरोज़गारी और ईंधन की कमी से जूझ रहा था। फ़्रांस और इटली में साम्यवादी पार्टियाँ बहुत लोकप्रिय हो रही थीं। अमेरिका की समझ यह थी कि साम्यवाद ग़रीबी और निराशा में पनपता है; इसलिए बंदूक से पहले रोटी भेजनी होगी। विदेश मंत्री जॉर्ज मार्शल ने 5 जून 1947 को हार्वर्ड विश्वविद्यालय में यह प्रस्ताव रखा। 1948 से 1952 के बीच सोलह देशों को लगभग तेरह अरब डॉलर की सहायता दी गई, जिसका बड़ा भाग अनुदान था, क़र्ज़ नहीं।

इसमें अमेरिका का अपना लाभ भी था। सहायता का अधिकतर धन अमेरिकी माल ख़रीदने में लगा, जिससे अमेरिकी कारख़ानों को बाज़ार मिला। साथ ही एक समृद्ध पश्चिमी यूरोप अमेरिका का स्थायी साथी बन गया। इसीलिए कहा जाता है कि ट्रूमैन सिद्धांत और मार्शल योजना "एक ही अखरोट के दो हिस्से" थे — एक सैनिक रोकथाम, दूसरा आर्थिक रोकथाम। सहायता सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप को भी प्रस्तावित की गई थी, पर स्टालिन ने इसे "डॉलर साम्राज्यवाद" कहकर ठुकरा दिया और अपने उपग्रह देशों को भी लेने से रोक दिया, क्योंकि सहायता लेने वाले को अपनी अर्थव्यवस्था के आँकड़े खोलने पड़ते।

B. सोवियत प्रत्युत्तर

कदम

तिथि

विवरण

मोलोतोव योजना

जुलाई 1947 से

पूर्वी यूरोपीय देशों के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते — मार्शल योजना का विकल्प

कॉमिनफ़ॉर्म

सितंबर 1947 (पोलैंड)

यूरोप के 9 साम्यवादी दलों का सूचना ब्यूरो; ज़्दानोव ने दुनिया को "साम्राज्यवादी" और "लोकतांत्रिक (साम्यवादी)" — दो खेमों में बँटा बताया; मुख्यालय पहले बेलग्रेड, 1948 के बाद बुखारेस्ट

चेकोस्लोवाकिया में तख़्तापलट

फ़रवरी 1948

साम्यवादी दल ने सत्ता पर पूर्ण क़ब्ज़ा किया; मार्च 1948 में विदेश मंत्री जान मसारिक की रहस्यमय मृत्यु — पश्चिम स्तब्ध

यूगोस्लाविया का निष्कासन

28 जून 1948

मार्शल टीटो ने स्टालिन का आधिपत्य नहीं माना — कॉमिनफ़ॉर्म से निकाला गया; साम्यवादी खेमे में पहली दरार; आगे टीटो गुटनिरपेक्ष आंदोलन के संस्थापकों में

कोमेकॉन (पारस्परिक आर्थिक सहायता परिषद)

जनवरी 1949

सोवियत संघ, पोलैंड, चेकोस्लोवाकिया, हंगरी, रोमानिया, बुल्गारिया — आर्थिक गुट; बाद में अल्बानिया, पूर्वी जर्मनी भी

सोवियत उत्तर को ऐसे समझें: स्टालिन ने अमेरिका के हर क़दम के सामने अपना एक क़दम रखा। साम्यवादी पार्टियों को एक सूत्र में बाँधने के लिए सितंबर 1947 में कॉमिनफ़ॉर्म (साम्यवादी सूचना ब्यूरो) बना, जिसका काम था सभी देशों की साम्यवादी पार्टियों को मॉस्को की नीति पर चलाना। मार्शल योजना के जवाब में जनवरी 1949 में कॉमेकॉन (पारस्परिक आर्थिक सहायता परिषद) बनी, जिसने पूर्वी यूरोप की अर्थव्यवस्थाओं को सोवियत संघ से जोड़ दिया। फ़रवरी 1948 में चेकोस्लोवाकिया में, जो पूर्वी यूरोप का अंतिम लोकतांत्रिक देश था, साम्यवादियों ने सत्ता पर पूरा क़ब्ज़ा कर लिया। इस घटना ने पश्चिम को इतना डराया कि मार्शल योजना अमेरिकी संसद में तुरंत पारित हो गई और सैन्य गठबंधन की बात चल पड़ी।

एक अपवाद भी याद रखें — यूगोस्लाविया। वहाँ के साम्यवादी नेता टीटो ने अपना देश सोवियत सेना की मदद के बिना ख़ुद आज़ाद कराया था, इसलिए वे स्टालिन का आदेश मानने को तैयार नहीं थे। 1948 में स्टालिन ने यूगोस्लाविया को कॉमिनफ़ॉर्म से निकाल दिया। इससे सिद्ध हुआ कि साम्यवादी होना और सोवियत खेमे में होना एक ही बात नहीं है। यही टीटो आगे चलकर नेहरू और नासिर के साथ गुटनिरपेक्ष आंदोलन के संस्थापक बने।

🇺🇸 ट्रूमैन सिद्धांत

💵 मार्शल योजना

◆ राजनीतिक-सैन्य साधन

◆ केवल दो देश — ग्रीस, तुर्की

◆ 40 करोड़ डॉलर

◆ सीधे साम्यवाद-विरोधी भाषा

◆ तात्कालिक संकट का उत्तर

◆ आर्थिक साधन

◆ पूरा यूरोप (सोवियत संघ को भी निमंत्रण)

◆ लगभग 13 अरब डॉलर

◆ "भूख और ग़रीबी के विरुद्ध" — मानवीय भाषा

◆ दीर्घकालिक पुनर्निर्माण

◆ ट्रूमैन के शब्दों में दोनों "एक ही अखरोट के दो हिस्से" थे — लक्ष्य एक: साम्यवाद का नियंत्रण।

💡 आसान भाषा में समझें

मोहल्ले में आग लगने के बाद एक धनी पड़ोसी सबको घर दोबारा बनाने के लिए पैसा देता है, पर शर्त रखता है कि हिसाब-किताब वह देखेगा और सामान उसी की दुकान से आएगा। दूसरा पड़ोसी अपने आसपास वालों से कहता है — "उसका पैसा मत लो, वह तुम्हें ख़रीद लेगा; हम आपस में सामान बदल लेंगे।" पहला मार्शल योजना है, दूसरा मोलोतोव योजना और कोमेकॉन।

8. बर्लिन नाकेबंदी और जर्मनी का विभाजन (1948–49)

जर्मनी शीत युद्ध का केंद्र-बिंदु था — जो जर्मनी पर हावी होता, वही यूरोप पर हावी होता। बर्लिन नाकेबंदी शीत युद्ध का पहला बड़ा प्रत्यक्ष संकट थी।

A. पृष्ठभूमि

1. पॉट्सडैम के अनुसार जर्मनी चार क्षेत्रों में बँटा; राजधानी बर्लिन सोवियत क्षेत्र के भीतर (लगभग 160 किमी अंदर) थी, पर उसके भी चार सेक्टर थे — पश्चिम बर्लिन एक "द्वीप" बन गया।

2. सोवियत संघ जर्मनी से भारी हर्जाना और कारख़ाने उठाकर ले जा रहा था; पश्चिमी शक्तियाँ जर्मनी को आर्थिक रूप से खड़ा करना चाहती थीं।

3. जनवरी 1947 में अमेरिकी-ब्रिटिश क्षेत्र मिलकर "बाइज़ोन" बने; आगे फ़्रांसीसी क्षेत्र मिलकर "ट्राइज़ोन"; लंदन सम्मेलन (1948) में पश्चिम जर्मन राज्य बनाने की सहमति।

4. तात्कालिक कारण: 20 जून 1948 को पश्चिमी क्षेत्रों में नई मुद्रा डॉयच मार्क लागू हुई — सोवियत संघ ने इसे जर्मनी के स्थायी विभाजन की दिशा में कदम माना।

B. नाकेबंदी और हवाई पुल

तिथि

घटना

24 जून 1948

सोवियत संघ ने पश्चिमी क्षेत्रों से पश्चिम बर्लिन जाने वाले सभी सड़क, रेल और नहर मार्ग बंद कर दिए; बिजली आपूर्ति भी रोकी

26 जून 1948 से

अमेरिका-ब्रिटेन का "बर्लिन हवाई पुल" (Berlin Airlift) — तीन हवाई गलियारों से भोजन, कोयला, दवाइयाँ; अमेरिकी नाम "ऑपरेशन विटल्स"

अप्रैल 1949

चरम पर एक ही दिन (16 अप्रैल, "ईस्टर परेड") में लगभग 1,400 उड़ानें — हर मिनट एक विमान

12 मई 1949

सोवियत संघ ने नाकेबंदी हटा ली — कुल लगभग 2.7 लाख उड़ानें, 23 लाख टन से अधिक सामग्री

चित्र 3: जर्मनी के चार क्षेत्र, बर्लिन का "द्वीप" और हवाई गलियारे

चित्र 3: जर्मनी के चार क्षेत्र, बर्लिन का "द्वीप" और हवाई गलियारे

नाकेबंदी की असली वजह: पश्चिमी देश अपने तीनों अधिकृत क्षेत्रों को मिलाकर एक मज़बूत पश्चिम जर्मनी बनाना चाहते थे, ताकि यूरोप की अर्थव्यवस्था फिर चल पड़े। इसके लिए उन्होंने जून 1948 में वहाँ एक नई मुद्रा चलाई। सोवियत संघ, जिसे जर्मनी ने युद्ध में सबसे अधिक बर्बाद किया था, जर्मनी को कमज़ोर रखना और उससे हर्जाना वसूलना चाहता था। नई मुद्रा उसे अलग पश्चिम जर्मन देश की ओर पहला क़दम लगी। जवाब में उसने बर्लिन के रास्ते बंद कर दिए, इस आशा में कि पश्चिमी देश या तो अपनी योजना छोड़ेंगे या बर्लिन।

परिणाम उलटा हुआ। हवाई पुल लगभग ग्यारह महीने चला, जिसमें क़रीब पौने तीन लाख उड़ानों से तेईस लाख टन के आसपास सामान पहुँचाया गया। 12 मई 1949 को स्टालिन ने नाकेबंदी हटा ली। इससे तीन बातें हुईं। पहली, जर्मनी का बँटवारा पक्का हो गया — मई 1949 में जर्मन संघीय गणराज्य (पश्चिम जर्मनी) और अक्टूबर 1949 में जर्मन लोकतांत्रिक गणराज्य (पूर्वी जर्मनी) बने। दूसरी, पश्चिम जर्मनी के लोग, जो कल तक अमेरिका के शत्रु थे, अब उसे रक्षक मानने लगे। तीसरी, पश्चिमी यूरोप को लगा कि केवल आर्थिक मदद काफ़ी नहीं, सैन्य गारंटी भी चाहिए; इसी से अगले भाग का नाटो निकला।

C. परिणाम

1. पश्चिम की नैतिक और प्रचार-विजय: बिना एक गोली चलाए सोवियत संघ को पीछे हटना पड़ा; बर्लिन "स्वतंत्रता का प्रतीक" बना।

2. जर्मनी का औपचारिक विभाजन: 23 मई 1949 — संघीय गणराज्य जर्मनी (पश्चिम जर्मनी, राजधानी बॉन, चांसलर कोनराड एडेनॉवर); 7 अक्टूबर 1949 — जर्मन जनवादी गणराज्य (पूर्वी जर्मनी, राजधानी पूर्वी बर्लिन)। 1990 तक यह विभाजन रहा।

3. नाटो का जन्म: संकट ने पश्चिमी यूरोप को यह विश्वास दिलाया कि उसकी सुरक्षा अमेरिकी सैन्य उपस्थिति के बिना संभव नहीं।

4. सीमित टकराव का आदर्श: दोनों पक्षों ने सीधे युद्ध से बचते हुए दबाव की राजनीति की — शीत युद्ध की "संकट-प्रबंधन" शैली का पहला उदाहरण।

⚠️ ध्यान दें

बर्लिन नाकेबंदी (1948–49) और बर्लिन दीवार (13 अगस्त 1961) अलग घटनाएँ हैं। नाकेबंदी सोवियत संघ ने पश्चिम बर्लिन को भूखा रखकर झुकाने के लिए की थी; दीवार पूर्वी जर्मनी ने लोगों का पश्चिम की ओर पलायन रोकने के लिए बनाई — जो 9 नवंबर 1989 को गिरी।

9. नाटो — पश्चिम का सैन्य गठबंधन (1949)

A. रास्ता — ब्रुसेल्स से वॉशिंगटन तक

◆ ब्रुसेल्स संधि (17 मार्च 1948): ब्रिटेन, फ्रांस, बेल्जियम, नीदरलैंड, लक्ज़मबर्ग — 50 वर्ष का रक्षा-समझौता (चेक तख़्तापलट के तुरंत बाद)।

◆ वैंडेनबर्ग प्रस्ताव (जून 1948): अमेरिकी सीनेट ने शांतिकाल में क्षेत्रीय सामूहिक सुरक्षा समझौतों में शामिल होने की अनुमति दी — अलगाववाद का अंत।

B. उत्तर अटलांटिक संधि संगठन

पहलू

विवरण

स्थापना

4 अप्रैल 1949, वॉशिंगटन; मुख्यालय पहले लंदन, फिर पेरिस, 1967 से ब्रुसेल्स

12 संस्थापक सदस्य

अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, फ्रांस, बेल्जियम, नीदरलैंड, लक्ज़मबर्ग, डेनमार्क, नॉर्वे, आइसलैंड, पुर्तगाल, इटली

मूल सिद्धांत — अनुच्छेद 5

किसी एक सदस्य पर सशस्त्र आक्रमण सभी पर आक्रमण माना जाएगा — सामूहिक सुरक्षा

विस्तार

ग्रीस-तुर्की (1952), पश्चिम जर्मनी (1955) — इसी के उत्तर में वारसॉ संधि (14 मई 1955)

महत्त्व

अमेरिका का शांतिकाल में पहला स्थायी सैन्य गठबंधन (1778 की फ्रांस संधि के बाद); यूरोप में अमेरिकी सेनाओं की स्थायी उपस्थिति; पहली बार अनुच्छेद 5 का प्रयोग 11 सितंबर 2001 के बाद

“नाटो का उद्देश्य है — सोवियत संघ को बाहर रखना, अमेरिकियों को भीतर रखना और जर्मनों को नीचे रखना।” (लॉर्ड इस्मे, नाटो के पहले महासचिव)

🛡️ नाटो (1949)

⭐ वारसॉ संधि (1955)

◆ नेता — अमेरिका

◆ स्थापना — 4 अप्रैल 1949

◆ 12 संस्थापक सदस्य

◆ अनुच्छेद 5 — सामूहिक सुरक्षा

◆ आज भी अस्तित्व में (32 सदस्य)

◆ नेता — सोवियत संघ

◆ स्थापना — 14 मई 1955, वारसॉ

◆ 8 सदस्य (सोवियत संघ + 7 पूर्वी यूरोपीय देश)

◆ नाटो में पश्चिम जर्मनी के प्रवेश का उत्तर

◆ 1 जुलाई 1991 को भंग

नाटो का सार एक वाक्य में: इसकी संधि का पाँचवाँ अनुच्छेद कहता है कि किसी एक सदस्य पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा। इसका व्यावहारिक अर्थ यह था कि यदि सोवियत संघ पश्चिमी यूरोप के किसी भी देश पर हमला करता, तो उसे सीधे अमेरिका और उसके परमाणु बम से लड़ना पड़ता। यह अमेरिका के इतिहास में शांतिकाल का पहला स्थायी सैन्य गठबंधन था। 4 अप्रैल 1949 को बारह देशों ने इस पर हस्ताक्षर किए।

सोवियत संघ ने इसे अपने विरुद्ध घेराबंदी माना। उसने तुरंत कोई जवाबी गठबंधन नहीं बनाया, पर जब 1955 में पश्चिम जर्मनी को नाटो में लेकर फिर से हथियारबंद किया गया, तो उसी वर्ष उसने वारसॉ संधि बना ली। इस तरह यूरोप दो हथियारबंद शिविरों में बँट गया। भारत के लिए इसका अर्थ यह था कि दुनिया में सैन्य गठबंधनों का जाल फैल रहा था और हर नए स्वतंत्र देश पर किसी एक में शामिल होने का दबाव था।

10. परमाणु होड़ और मैकार्थीवाद

A. अमेरिकी परमाणु एकाधिकार का अंत

1. 1945–49 — अमेरिकी एकाधिकार: 16 जुलाई 1945 को ट्रिनिटी परीक्षण, फिर हिरोशिमा-नागासाकी; अमेरिका अपने को अजेय मानता था।

2. बरूच योजना (जून 1946): परमाणु ऊर्जा को अंतरराष्ट्रीय नियंत्रण में देने का अमेरिकी प्रस्ताव — पर तब तक अपना बम रखने और निरीक्षण की शर्तों के कारण सोवियत संघ ने अस्वीकार किया; परमाणु नियंत्रण का पहला अवसर खो गया।

3. सोवियत परमाणु परीक्षण — 29 अगस्त 1949: कज़ाख़स्तान के सेमिपलातिंस्क में पहला बम ("आरडीएस-1", पश्चिम में "जो-1" नाम); 23 सितंबर 1949 को ट्रूमैन ने इसकी घोषणा की — अमेरिका का अनुमान था कि यह 1952–53 से पहले संभव नहीं।

4. जासूसी का खुलासा: वैज्ञानिक क्लॉस फ़ुक्स (फ़रवरी 1950 में गिरफ़्तार) ने मैनहट्टन परियोजना के रहस्य सोवियत संघ को दिए थे; आगे रोज़ेनबर्ग दंपति पर मुक़दमा।

5. हाइड्रोजन बम की ओर: 31 जनवरी 1950 — ट्रूमैन ने हाइड्रोजन बम विकसित करने का आदेश दिया (अमेरिका 1952, सोवियत संघ 1953)।

6. एनएससी-68 (अप्रैल 1950): अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद का गोपनीय दस्तावेज़ — रक्षा बजट कई गुना बढ़ाने की सिफ़ारिश; कोरियाई युद्ध के बाद लागू — नियंत्रण नीति का सैन्यीकरण।

⚠️ ध्यान दें

सोवियत संघ का पहला परमाणु परीक्षण 29 अगस्त 1949 को हुआ था; सितंबर 1949 केवल उसकी सार्वजनिक घोषणा (23 सितंबर) का महीना है। इसके बाद "संतुलित आतंक" और आगे "परस्पर सुनिश्चित विनाश" (MAD) की अवधारणा बनी।

परमाणु होड़ की कड़ियाँ: 1945 में केवल अमेरिका के पास परमाणु बम था और वह मानता था कि यह एकाधिकार कई साल चलेगा। 29 अगस्त 1949 को सोवियत संघ ने अपना पहला परमाणु परीक्षण कर दिया, जिसमें जासूसी से मिली जानकारी का भी हाथ था। अमेरिका ने बढ़त बनाए रखने के लिए हाइड्रोजन बम बनाया और 1952 में उसका परीक्षण किया; अगले ही वर्ष सोवियत संघ ने भी कर लिया। ब्रिटेन (1952), फ़्रांस (1960) और चीन (1964) भी इस सूची में जुड़ गए। नतीजा यह हुआ कि दोनों ओर इतने बम जमा हो गए कि युद्ध जीतना किसी के लिए संभव नहीं रहा। यही परस्पर सुनिश्चित विनाश की स्थिति है — डर से पैदा हुई एक अजीब शांति।

B. मैकार्थीवाद — अमेरिका के भीतर "लाल भय"

◆ 9 फ़रवरी 1950: सीनेटर जोसेफ मैकार्थी ने व्हीलिंग (पश्चिम वर्जीनिया) के भाषण में दावा किया कि उसके पास अमेरिकी विदेश विभाग में काम कर रहे 200 से अधिक साम्यवादियों की सूची है।

◆ पृष्ठभूमि: चीन में साम्यवादी विजय, सोवियत बम, एल्जर हिस को सज़ा (जनवरी 1950), फ़ुक्स का खुलासा — जनता में भय।

◆ स्वरूप: बिना प्रमाण आरोप, "निष्ठा-जाँच", सरकारी कर्मचारियों, शिक्षकों, हॉलीवुड कलाकारों की "काली सूची"; हज़ारों की नौकरियाँ गईं।

◆ अंत: 1954 में सीनेट ने मैकार्थी की निंदा की — पर "मैकार्थीवाद" शब्द बिना प्रमाण राजनीतिक उत्पीड़न का पर्याय बन गया।

◆ महत्त्व: शीत युद्ध केवल विदेश नीति नहीं था — उसने लोकतांत्रिक देशों की आंतरिक स्वतंत्रताओं को भी सीमित किया; सोवियत संघ में तो असहमति का दमन और भी कठोर था।

मैकार्थीवाद क्या था: सोवियत बम और चीन में साम्यवाद की जीत — एक ही वर्ष की इन दो घटनाओं से अमेरिका में घबराहट फैल गई कि देश के भीतर छिपे साम्यवादी जासूस यह सब करा रहे हैं। 1950 में सांसद जोसेफ़ मैकार्थी ने दावा किया कि उसके पास सरकार में बैठे साम्यवादियों की सूची है। उसने कभी कोई ठोस प्रमाण नहीं दिया, फिर भी चार साल तक हज़ारों अधिकारियों, अध्यापकों, लेखकों और फ़िल्म कलाकारों से पूछताछ हुई और बहुतों की नौकरियाँ गईं। 1954 में संसद ने स्वयं उसकी निंदा की। आज बिना प्रमाण के किसी पर देशद्रोह का आरोप लगाकर बदनाम करने को "मैकार्थीवाद" कहा जाता है। इससे यह शिक्षा मिलती है कि शीत युद्ध ने लोकतांत्रिक देशों के भीतर भी नागरिक स्वतंत्रता को चोट पहुँचाई।

11. चीन में साम्यवादी क्रांति (1949)

1. गृहयुद्ध: जापान की हार के बाद च्यांग काई-शेक की राष्ट्रवादी कुओमिंतांग सरकार और माओ त्से-तुंग के साम्यवादियों में गृहयुद्ध (1946–49); अमेरिकी सहायता के बावजूद कुओमिंतांग भ्रष्टाचार, मुद्रास्फीति और जन-असंतोष से हारी।

2. 1 अक्टूबर 1949: बीजिंग के थ्यानआनमेन पर माओ ने जनवादी गणराज्य चीन की घोषणा की; दिसंबर 1949 तक च्यांग ताइवान चला गया।

3. चीन-सोवियत मैत्री संधि (14 फ़रवरी 1950): 30 वर्ष की मैत्री, गठबंधन और पारस्परिक सहायता — साम्यवादी खेमा यूरोप से प्रशांत महासागर तक फैल गया।

4. अमेरिका में "चीन किसने खोया?" बहस; अमेरिका ने नई सरकार को मान्यता नहीं दी — संयुक्त राष्ट्र में चीन की सीट ताइवान के पास रही (1971 तक)।

5. सुरक्षा परिषद का बहिष्कार: इसी मुद्दे पर सोवियत संघ ने जनवरी 1950 से सुरक्षा परिषद का बहिष्कार किया — जिसका परिणाम कोरिया में दिखा।

6. भारत की नीति: भारत ने 30 दिसंबर 1949 को जनवादी चीन को मान्यता दी (बर्मा के बाद ऐसा करने वाला दूसरा ग़ैर-साम्यवादी देश) और संयुक्त राष्ट्र में उसकी सदस्यता का समर्थन किया।

📌 शीत युद्ध पर प्रभाव

चीन की क्रांति ने शीत युद्ध को यूरोपीय से वैश्विक बना दिया। एशिया अब मुख्य रणभूमि बनी — कोरिया, हिंद-चीन, ताइवान जलडमरूमध्य। अमेरिका ने अपनी नियंत्रण-नीति एशिया तक फैलाई — जापान का पुनर्निर्माण, आगे सीटो (1954)।

चीन की क्रांति को सरल क्रम में समझें: चीन में 1927 से दो दल लड़ रहे थे — च्यांग काई-शेक की राष्ट्रवादी सरकार (कुओमिंतांग) और माओ त्से-तुंग की साम्यवादी पार्टी। जापानी हमले (1937–45) के समय दोनों ने अस्थायी रूप से हाथ मिलाया, पर युद्ध समाप्त होते ही गृहयुद्ध फिर शुरू हो गया। अमेरिका ने च्यांग को अरबों डॉलर और हथियार दिए, फिर भी वे हार गए। कारण यह था कि उनकी सरकार भ्रष्ट थी, महँगाई बेक़ाबू थी और किसानों की उसमें कोई आस्था नहीं थी; जबकि माओ ने किसानों को ज़मीन देने का वादा किया और उनकी सेना अनुशासित थी। 1 अक्टूबर 1949 को माओ ने चीनी जनवादी गणराज्य की घोषणा की। च्यांग अपनी सरकार लेकर ताइवान द्वीप पर चले गए।

शीत युद्ध पर असर: दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाला देश साम्यवादी खेमे में चला गया और फ़रवरी 1950 में चीन-सोवियत मैत्री संधि हो गई। अब शीत युद्ध केवल यूरोप का मामला नहीं रहा, एशिया भी उसका मैदान बन गया। अमेरिका ने नई सरकार को मान्यता देने से इनकार कर दिया और संयुक्त राष्ट्र में चीन की सीट 1971 तक ताइवान के पास रही। अमेरिका ने जापान को, जो कल तक शत्रु था, एशिया में अपना मुख्य साथी बनाना शुरू किया। भारत ने अलग रास्ता लिया — उसने दिसंबर 1949 में ही नई चीनी सरकार को मान्यता दे दी और संयुक्त राष्ट्र में उसे सीट देने का समर्थन किया, क्योंकि नेहरू का मानना था कि इतने बड़े देश को अलग-थलग रखने से शांति नहीं आएगी।

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12. कोरियाई युद्ध (1950–1953) — शीत युद्ध का पहला "गर्म" युद्ध

A. पृष्ठभूमि

◆ 1910–1945: कोरिया जापान का उपनिवेश।

◆ अगस्त 1945: 38वीं अक्षांश रेखा पर अस्थायी विभाजन — उत्तर में सोवियत सेना, दक्षिण में अमेरिकी सेना।

◆ 1948: एकीकृत चुनाव पर सहमति न होने से दो राज्य — दक्षिण में कोरिया गणराज्य (15 अगस्त 1948, नेता सिंगमन री) और उत्तर में कोरिया लोकतांत्रिक जनवादी गणराज्य (9 सितंबर 1948, नेता किम इल-सुंग)। दोनों पूरे कोरिया पर दावा करते थे।

◆ जनवरी 1950: अमेरिकी विदेश मंत्री डीन एचिसन ने प्रशांत में अमेरिकी "रक्षा-परिधि" बताई जिसमें कोरिया का नाम नहीं था — किम और स्टालिन ने इसे अमेरिकी उदासीनता समझा; स्टालिन ने आक्रमण की अनुमति दी।

B. युद्ध का घटनाक्रम

तिथि

घटना

25 जून 1950

उत्तर कोरिया ने 38वीं रेखा पार कर आक्रमण किया; 28 जून को सियोल पर क़ब्ज़ा

25 और 27 जून 1950

सुरक्षा परिषद (सोवियत संघ अनुपस्थित) — प्रस्ताव 82: आक्रमण की निंदा; प्रस्ताव 83: सदस्य देश दक्षिण कोरिया की सहायता करें

7 जुलाई 1950

प्रस्ताव 84 — अमेरिकी नेतृत्व में संयुक्त राष्ट्र कमान; सेनापति जनरल डगलस मैकआर्थर; 16 देशों की सेनाएँ

अगस्त–सितंबर 1950

दक्षिण कोरिया और संयुक्त राष्ट्र सेना दक्षिण-पूर्व में पुसान घेरे तक सिमटी

15 सितंबर 1950

मैकआर्थर का साहसी इंचॉन उभयचर आक्रमण — 28 सितंबर को सियोल वापस

अक्टूबर 1950

संयुक्त राष्ट्र सेना 38वीं रेखा पार कर उत्तर में (7 अक्टूबर, महासभा की स्वीकृति); 19 अक्टूबर प्योंगयांग पर क़ब्ज़ा; सेना यालू नदी (चीन सीमा) की ओर

अक्टूबर–नवंबर 1950

चीन का हस्तक्षेप — लाखों "जन स्वयंसेवक"; नवंबर के अंत में भीषण आक्रमण; संयुक्त राष्ट्र सेना पीछे हटी

4 जनवरी 1951

सियोल फिर उत्तर के हाथ; मार्च 1951 में पुनः वापस

11 अप्रैल 1951

चीन पर बमबारी और परमाणु-प्रयोग की वकालत करने वाले मैकआर्थर को ट्रूमैन ने पद से हटाया — सीमित युद्ध की नीति

जुलाई 1951 – जुलाई 1953

केसोंग और फिर पानमुनजोम में लंबी युद्धविराम वार्ता; मुख्य अड़चन — युद्धबंदियों की वापसी

27 जुलाई 1953

पानमुनजोम युद्धविराम — लगभग 38वीं रेखा के पास युद्धविराम रेखा और 4 किमी चौड़ा असैन्य क्षेत्र; कोई शांति-संधि नहीं — कोरिया आज भी विभाजित

चित्र 4: कोरियाई युद्ध में मोर्चे का आगे-पीछे खिसकना

चित्र 4: कोरियाई युद्ध में मोर्चे का आगे-पीछे खिसकना

कोरियाई युद्ध को चार चरणों में याद रखें। कोरिया 1910 से जापान के क़ब्ज़े में था। 1945 में जापान की हार के बाद अड़तीसवीं अक्षांश रेखा के उत्तर में सोवियत सेना और दक्षिण में अमेरिकी सेना ने जापानियों से हथियार डलवाए। यह अस्थायी व्यवस्था स्थायी बँटवारा बन गई — उत्तर में किम इल-सुंग की साम्यवादी सरकार और दक्षिण में सिंगमन री की अमेरिका-समर्थक सरकार।

1. उत्तर का हमला (जून–सितंबर 1950): 25 जून 1950 को उत्तर कोरिया ने हमला किया और कुछ ही सप्ताह में लगभग पूरा दक्षिण जीत लिया; दक्षिण की सेना एक छोटे-से कोने में सिमट गई।

2. संयुक्त राष्ट्र का पलटवार (सितंबर–अक्टूबर 1950): अमेरिकी सेनापति मैकआर्थर ने शत्रु के पीछे इंचोन बंदरगाह पर सेना उतारी, उत्तर कोरियाई सेना को खदेड़ा और रेखा पार करके चीन की सीमा तक पहुँच गए।

3. चीन का प्रवेश (अक्टूबर 1950 से): अपनी सीमा पर अमेरिकी सेना देखकर चीन ने लाखों सैनिक भेज दिए और संयुक्त राष्ट्र की सेना को वापस दक्षिण में धकेल दिया।

4. गतिरोध और युद्धविराम (1951–53): मोर्चा फिर अड़तीसवीं रेखा के आसपास ठहर गया। दो साल बातचीत चली और 27 जुलाई 1953 को पानमुनजोम में युद्धविराम हुआ।

एक प्रश्न अक्सर उठता है — सोवियत संघ ने सुरक्षा परिषद में निषेधाधिकार क्यों नहीं लगाया? उस समय सोवियत प्रतिनिधि परिषद का बहिष्कार कर रहा था, क्योंकि चीन की सीट साम्यवादी सरकार को नहीं दी गई थी। उसकी अनुपस्थिति में अमेरिका ने उत्तर कोरिया के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई का प्रस्ताव पारित करा लिया। इसीलिए यह युद्ध संयुक्त राष्ट्र के झंडे तले लड़ा गया, हालाँकि सेना मुख्यतः अमेरिकी थी।

परिणाम: तीन साल की लड़ाई और लाखों मौतों के बाद सीमा लगभग वहीं रही जहाँ से युद्ध शुरू हुआ था। कोरिया आज भी बँटा हुआ है और दोनों के बीच शांति-संधि आज तक नहीं हुई। इस युद्ध ने सिद्ध किया कि शीत युद्ध एशिया में "गर्म" हो सकता है, कि परमाणु युग में महाशक्तियाँ युद्ध को सीमित रखेंगी (ट्रूमैन ने चीन पर बम गिराने की माँग करने वाले मैकआर्थर को 1951 में पद से हटा दिया), और कि अमेरिका अब एशिया में भी सैन्य गठबंधन बनाएगा।

C. परिणाम और महत्त्व

1. जन-धन हानि: लगभग 25–30 लाख लोग मारे गए (अधिकांश नागरिक); पूरा प्रायद्वीप तबाह।

2. शीत युद्ध का वैश्वीकरण और सैन्यीकरण: अमेरिकी रक्षा बजट लगभग तीन गुना; एनएससी-68 लागू; ताइवान की रक्षा के लिए सातवाँ बेड़ा; जापान से शांति-संधि (1951) और सुरक्षा समझौता; नाटो का सैन्य ढाँचा मज़बूत।

3. संयुक्त राष्ट्र की भूमिका: पहली बार संयुक्त राष्ट्र के झंडे तले सामूहिक सैन्य कार्रवाई; "शांति के लिए एकता" प्रस्ताव (3 नवंबर 1950) — वीटो से सुरक्षा परिषद ठप होने पर महासभा कार्रवाई की सिफ़ारिश कर सकेगी।

4. चीन का उदय: नवजात जनवादी चीन ने अमेरिका को रोककर अपनी सैन्य प्रतिष्ठा स्थापित की; चीन-अमेरिका शत्रुता दो दशक चली।

5. "सीमित युद्ध" की अवधारणा: परमाणु शक्तियों ने युद्ध को एक क्षेत्र तक सीमित रखा — आगे के छद्म युद्धों का आदर्श।

13. कोरियाई युद्ध में भारत की भूमिका

कोरियाई युद्ध नव-स्वतंत्र भारत की गुटनिरपेक्ष विदेश नीति की पहली बड़ी परीक्षा थी। भारत ने न किसी पक्ष में लड़ाई लड़ी, न तटस्थ होकर चुप बैठा — उसने शांति-निर्माता और मध्यस्थ की भूमिका निभाई।

1. आक्रमण की निंदा: भारत (तब सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य) ने प्रस्ताव 82 का समर्थन कर उत्तर कोरिया को आक्रमणकारी माना; सैन्य कार्रवाई वाले प्रस्ताव 83 पर पहले मतदान नहीं किया, बाद में उसे स्वीकार किया — पर लड़ाकू सेना नहीं भेजी।

2. चेतावनी-दूत की भूमिका: बीजिंग में भारत के राजदूत के. एम. पणिक्कर के माध्यम से चाउ एन-लाई ने (2–3 अक्टूबर 1950) चेताया कि अमेरिकी सेना 38वीं रेखा पार करेगी तो चीन हस्तक्षेप करेगा — अमेरिका ने चेतावनी को अनदेखा किया और परिणाम भुगता।

3. 38वीं रेखा पार करने का विरोध: भारत ने युद्ध को उत्तर तक फैलाने और बाद में चीन को "आक्रमणकारी" घोषित करने वाले प्रस्ताव (फ़रवरी 1951) का विरोध किया — संघर्ष को सीमित रखने का प्रयास।

4. मानवीय सहायता — 60वीं पैराशूट फ़ील्ड एम्बुलेंस: लेफ़्टिनेंट कर्नल ए. जी. रंगराज के नेतृत्व में भारतीय चिकित्सा इकाई ने 1950–54 में हज़ारों घायलों का उपचार किया; इकाई ने पैराशूट से युद्ध-क्षेत्र में उतरकर भी सेवा की — भारत का एकमात्र "सैन्य" योगदान, वह भी मानवीय।

5. युद्धबंदी प्रस्ताव (1952): वार्ता युद्धबंदियों की वापसी पर अटकी थी — बहुत से चीनी-उत्तर कोरियाई बंदी लौटना नहीं चाहते थे। वी. के. कृष्ण मेनन का प्रस्ताव 3 दिसंबर 1952 को महासभा ने पारित किया — बलपूर्वक वापसी नहीं, एक तटस्थ आयोग निर्णय कराए — यही 1953 के युद्धविराम का आधार बना।

6. तटस्थ राष्ट्र प्रत्यावर्तन आयोग (NNRC): स्वीडन, स्विट्ज़रलैंड, पोलैंड, चेकोस्लोवाकिया और भारत — अध्यक्ष भारत के जनरल के. एस. थिमैया।

7. भारतीय अभिरक्षक बल (Custodian Force of India): मेजर जनरल एस. पी. पी. थोराट के नेतृत्व में लगभग 6,000 भारतीय सैनिकों ने असैन्य क्षेत्र में लगभग 22,000 युद्धबंदियों की निष्पक्ष देखरेख की (1953–54) — दोनों पक्षों ने भारत की निष्पक्षता स्वीकार की।

✅ उपलब्धियाँ

⚠️ सीमाएँ

◆ गुटनिरपेक्षता की विश्वसनीयता स्थापित

◆ युद्धविराम का कूटनीतिक आधार भारत का प्रस्ताव

◆ चीन और पश्चिम दोनों से संवाद का पुल

◆ संयुक्त राष्ट्र में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी

◆ आगे हिंद-चीन (1954) के अंतरराष्ट्रीय आयोग की अध्यक्षता

◆ अमेरिका ने भारत को "साम्यवाद के प्रति नरम" माना

◆ सोवियत संघ ने शुरू में भारत को "पश्चिम का पिछलग्गू" कहा

◆ पणिक्कर की चेतावनी को महत्त्व नहीं मिला

◆ चीन पर भरोसे की नीति आगे 1962 में टूटी

14. भारत की गुटनिरपेक्षता

स्वतंत्रता से पहले ही, अंतरिम सरकार के उपाध्यक्ष के रूप में जवाहरलाल नेहरू ने 7 सितंबर 1946 के रेडियो प्रसारण में भारत की विदेश नीति की दिशा स्पष्ट कर दी थी। शीत युद्ध के दो खेमों के बीच भारत ने किसी सैन्य गुट में शामिल न होकर हर मुद्दे पर स्वतंत्र निर्णय का मार्ग चुना।

“हम यथासंभव उन गुटों की शक्ति-राजनीति से दूर रहना चाहते हैं जो एक-दूसरे के विरुद्ध संगठित हैं, जिसने अतीत में विश्व युद्धों को जन्म दिया और जो फिर इससे भी बड़े विनाश की ओर ले जा सकती है।” (जवाहरलाल नेहरू, रेडियो प्रसारण, 7 सितंबर 1946)

📘 आसान परिभाषा: गुटनिरपेक्षता (Non-Alignment)

📚 परिभाषा: शीत युद्ध के किसी भी सैन्य गुट में शामिल न होकर, प्रत्येक अंतरराष्ट्रीय प्रश्न पर उसके गुण-दोष और राष्ट्रीय हित के आधार पर स्वतंत्र निर्णय लेने की सक्रिय नीति।

💬 आसान भाषा में: यह "तटस्थता" (चुप बैठना) नहीं है — गुटनिरपेक्ष देश सही-ग़लत पर खुलकर बोलता है, बस किसी का सैन्य साथी नहीं बनता। 🏠 उदाहरण: कोरिया में भारत ने उत्तर कोरिया के आक्रमण की निंदा की, पर चीन को आक्रमणकारी कहने का विरोध किया और युद्धबंदियों के प्रश्न का हल सुझाया।

A. गुटनिरपेक्षता अपनाने के कारण

1. कठिन संघर्ष से मिली स्वतंत्रता: दो सौ वर्ष की ग़ुलामी के बाद किसी दूसरी शक्ति के अधीन होने का प्रश्न ही नहीं था — विदेश नीति की स्वायत्तता स्वतंत्रता का हिस्सा थी।

2. आर्थिक विकास की आवश्यकता: दोनों खेमों से सहायता, तकनीक और व्यापार चाहिए था; हथियारों की होड़ में धन बर्बाद नहीं करना था।

3. राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत: गांधी का अहिंसा और शांति का दर्शन; कांग्रेस का साम्राज्यवाद-विरोध और फ़ासीवाद-विरोध — किसी गुट की अंधी भक्ति इससे मेल नहीं खाती थी।

4. भू-राजनीतिक स्थिति: भारत दोनों खेमों के बीच स्थित; पड़ोस में सोवियत संघ और (1949 से) साम्यवादी चीन — किसी एक से शत्रुता जोखिम भरी थी।

5. मिश्रित अर्थव्यवस्था और लोकतंत्र: भारत का मॉडल न पूरा पूँजीवादी, न पूरा साम्यवादी था — वैचारिक रूप से भी वह बीच का मार्ग था।

6. एशिया-अफ्रीका का नेतृत्व: नव-स्वतंत्र देशों की स्वतंत्र आवाज़ बनकर विश्व-शांति में भूमिका की आकांक्षा।

B. 1946–1950 में गुटनिरपेक्षता का व्यवहार

वर्ष

कदम

महत्त्व

1946

नेहरू का 7 सितंबर का प्रसारण

नीति की घोषणा

मार्च–अप्रैल 1947

एशियाई संबंध सम्मेलन, नई दिल्ली

एशियाई एकता का पहला मंच; आगे बांडुंग (1955) की नींव

जनवरी 1949

इंडोनेशिया पर दिल्ली सम्मेलन (19 देश) — डच आक्रमण का विरोध

उपनिवेशवाद-विरोध का व्यावहारिक रूप

अप्रैल 1949

लंदन घोषणा — गणराज्य बनकर भी राष्ट्रमंडल में रहना

पश्चिम से संबंध बनाए रखे, पर सैन्य गुट से अलग

अक्टूबर 1949

नेहरू की अमेरिका यात्रा

मैत्री, पर सैन्य गठबंधन से इनकार

30 दिसंबर 1949

जनवादी चीन को मान्यता

पश्चिम की नीति से अलग स्वतंत्र निर्णय

1950–53

कोरियाई युद्ध में मध्यस्थता; तटस्थ राष्ट्र प्रत्यावर्तन आयोग की अध्यक्षता

गुटनिरपेक्षता की सबसे बड़ी परीक्षा — सफल

गुटनिरपेक्षता को लेकर तीन आम भ्रम दूर कर लें। पहला भ्रम यह है कि यह तटस्थता है। तटस्थ देश विवाद में चुप रहता है; भारत चुप नहीं रहा — उसने कोरिया में उत्तर के हमले की निंदा की, स्वेज़ में ब्रिटेन-फ़्रांस की निंदा की और उपनिवेशवाद तथा रंगभेद के विरुद्ध हर मंच पर बोला। दूसरा भ्रम यह है कि यह अलग-थलग रहने की नीति है। इसके उलट भारत ने दोनों खेमों से संबंध रखे और दोनों से सहायता ली — भिलाई का इस्पात कारख़ाना सोवियत सहयोग से बना तो राउरकेला पश्चिम जर्मनी और दुर्गापुर ब्रिटेन के सहयोग से। तीसरा भ्रम यह है कि यह कोई तीसरा सैन्य गुट था। गुटनिरपेक्ष आंदोलन की न कोई सेना थी, न कोई सैन्य संधि; यह केवल समान सोच वाले देशों का मंच था।

नेहरू ने यह रास्ता क्यों चुना — पाँच सीधे कारण:

1. स्वतंत्रता की रक्षा: दो सौ साल की ग़ुलामी के बाद भारत किसी महाशक्ति का पिछलग्गू बनकर अपनी विदेश नीति गिरवी नहीं रखना चाहता था।

2. आर्थिक विकास: ग़रीब देश को हथियारों की होड़ नहीं, कारख़ाने, बाँध और अनाज चाहिए थे; और इनके लिए दोनों ओर से मदद लेने का रास्ता खुला रखना था।

3. भौगोलिक स्थिति: भारत के पड़ोस में सोवियत संघ और चीन दोनों थे; किसी एक खेमे में जाना दूसरे को स्थायी शत्रु बनाना होता।

4. आंतरिक एकता: देश में हर विचारधारा के लोग थे; किसी एक खेमे से जुड़ना भीतर भी फूट डालता।

5. शांति की परंपरा: गांधी के अहिंसक आंदोलन से निकला देश सैन्य गठबंधनों की राजनीति का स्वाभाविक विरोधी था।

आंदोलन कैसे बना: 1954 में भारत और चीन के बीच पंचशील के पाँच सिद्धांतों पर सहमति हुई। अप्रैल 1955 में इंडोनेशिया के बांडुंग नगर में एशिया और अफ़्रीका के 29 देशों का सम्मेलन हुआ, जिसे इस आंदोलन की नींव माना जाता है। सितंबर 1961 में यूगोस्लाविया की राजधानी बेलग्रेड में पहला गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलन हुआ, जिसमें 25 देश आए। इसके पाँच संस्थापक नेता माने जाते हैं — भारत के नेहरू, यूगोस्लाविया के टीटो, मिस्र के नासिर, इंडोनेशिया के सुकर्णो और घाना के एनक्रूमा।

C. आगे का विकास (संक्षेप में)

◆ पंचशील (29 अप्रैल 1954): भारत-चीन के बीच तिब्बत व्यापार समझौते में — (1) एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का सम्मान, (2) अनाक्रमण, (3) आंतरिक मामलों में अहस्तक्षेप, (4) समानता और पारस्परिक लाभ, (5) शांतिपूर्ण सहअस्तित्व।

◆ बांडुंग सम्मेलन (अप्रैल 1955): 29 एशियाई-अफ्रीकी देश — उपनिवेशवाद-विरोध और शांति के "दस सिद्धांत"।

◆ गुटनिरपेक्ष आंदोलन — बेलग्रेड (सितंबर 1961): 25 देश; संस्थापक — नेहरू (भारत), टीटो (यूगोस्लाविया), नासिर (मिस्र), सुकर्णो (इंडोनेशिया), एनक्रूमा (घाना)।

D. गुटनिरपेक्षता कितनी व्यावहारिक थी? — मूल्यांकन

✅ व्यावहारिक और सफल

⚠️ सीमाएँ और आलोचना

◆ दोनों खेमों से सहायता — अमेरिका से खाद्यान्न (पी.एल.-480), तकनीकी सहायता; सोवियत संघ से भिलाई इस्पात संयंत्र (1955 समझौता), भारी उद्योग

◆ कोरिया, हिंद-चीन, स्वेज़ में मध्यस्थ — छोटे देश की बड़ी कूटनीतिक भूमिका

◆ विदेश नीति की स्वायत्तता बनी रही; हथियारों की होड़ से बचत

◆ नव-स्वतंत्र देशों का नेतृत्व; उपनिवेशवाद-विरोध को बल

◆ अमेरिकी विदेश मंत्री डलेस ने इसे "अनैतिक" कहा (1956); पाकिस्तान अमेरिकी खेमे (सीटो-सेंटो, 1954–55) में जाकर हथियार पाता रहा

◆ 1962 के चीनी आक्रमण ने सैन्य तैयारी की कमज़ोरी उजागर की; तब भारत ने पश्चिम से सहायता माँगी

◆ हंगरी (1956) पर अपेक्षाकृत नरम रुख़ से दोहरे मानदंड का आरोप

◆ 1971 की भारत-सोवियत मैत्री संधि से "सोवियत झुकाव" की आलोचना

◆ निष्कर्ष: गुटनिरपेक्षता आदर्शवाद और यथार्थवाद का संतुलन थी — आदर्श के रूप में शांति और स्वतंत्रता, व्यवहार में राष्ट्रीय हित की रक्षा। 1950 तक के अनुभव (विशेषकर कोरिया) ने सिद्ध किया कि एक नव-स्वतंत्र, सैन्य रूप से कमज़ोर देश भी स्वतंत्र नीति से विश्व-राजनीति में प्रभावी हो सकता है।

गुटनिरपेक्षता का संतुलित मूल्यांकन: इसकी सफलताएँ स्पष्ट हैं — भारत किसी महाशक्ति के युद्ध में नहीं घसीटा गया, उसे दोनों खेमों से आर्थिक और तकनीकी सहायता मिली, नए स्वतंत्र देशों को एक साझा आवाज़ मिली, और कोरिया तथा हिंद-चीन जैसे विवादों में भारत को एक भरोसेमंद मध्यस्थ की प्रतिष्ठा मिली। पर इसकी सीमाएँ भी सामने आईं। 1962 में चीन के हमले के समय कोई गुटनिरपेक्ष देश खुलकर भारत के साथ नहीं आया और भारत को अमेरिका तथा ब्रिटेन से हथियार माँगने पड़े। आलोचक यह भी कहते हैं कि 1956 में हंगरी पर सोवियत कार्रवाई की निंदा करने में भारत ने देर की, और 1971 की भारत-सोवियत मैत्री संधि के बाद भारत का झुकाव सोवियत संघ की ओर दिखने लगा। इसलिए उत्तर में यह लिखना उचित है कि गुटनिरपेक्षता कोई कठोर सिद्धांत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित के अनुसार स्वतंत्र निर्णय लेने की व्यावहारिक नीति थी, जिसे आज रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) के नाम से जारी माना जाता है।

15. शीत युद्ध के प्रभाव और संयुक्त राष्ट्र

A. प्रमुख प्रभाव

क्षेत्र

प्रभाव

राजनीतिक

विश्व का द्वि-ध्रुवीय विभाजन; यूरोप (जर्मनी) और एशिया (कोरिया, बाद में वियतनाम) में विभाजित राष्ट्र; छोटे देश महाशक्तियों के मोहरे

सैन्य

सैन्य गठबंधनों का जाल — नाटो (1949), एंज़स (1951), सीटो (1954), वारसॉ (1955), सेंटो (1955/59); विदेशों में सैनिक अड्डे; परमाणु और प्रक्षेपास्त्र होड़

आर्थिक

विशाल रक्षा बजट; "सैन्य-औद्योगिक संघ"; सहायता की राजनीति — विकासशील देशों को मदद, पर शर्तों के साथ; पश्चिमी यूरोप का पुनर्निर्माण, पूर्वी यूरोप का सोवियत-केंद्रित ढाँचा

वि-उपनिवेशीकरण

दोनों महाशक्तियाँ औपनिवेशिक साम्राज्यों की विरोधी थीं — एशिया-अफ्रीका की स्वतंत्रता तेज़; पर नए देशों को अपने पाले में खींचने की होड़

वैज्ञानिक-तकनीकी

रक्षा अनुसंधान से अंतरिक्ष, कंप्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक्स, संचार में क्रांति — आगे स्पुतनिक (1957), इंटरनेट की जड़ें

सामाजिक-मनोवैज्ञानिक

परमाणु-भय; प्रचार और "लाल भय"; मैकार्थीवाद; पूर्वी खेमे में असहमति का दमन और बंद समाज

भारत पर

गुटनिरपेक्षता का विकास; दोनों खेमों से सहायता; पर पाकिस्तान को अमेरिकी हथियार (1954 से) — कश्मीर प्रश्न पर शीत युद्ध की छाया

B. संयुक्त राष्ट्र पर प्रभाव

1. सुरक्षा परिषद में गतिरोध: वीटो के बार-बार प्रयोग से परिषद कई महत्त्वपूर्ण प्रश्नों पर निष्क्रिय; 1946–1955 में सोवियत संघ ने लगभग 75–80 बार वीटो किया।

2. सदस्यता का प्रश्न: दोनों खेमे एक-दूसरे के समर्थकों को सदस्य बनने से रोकते रहे — 1955 में "पैकेज डील" से 16 नए सदस्य एक साथ प्रविष्ट।

3. चीन की सीट: जनवादी चीन की जगह ताइवान को मान्यता — 1971 तक विवाद; सोवियत बहिष्कार (1950)।

4. सामूहिक सुरक्षा का प्रयोग: कोरिया में पहली बार संयुक्त राष्ट्र के झंडे तले सेना — पर यह सोवियत अनुपस्थिति का "संयोग" था।

5. "शांति के लिए एकता" प्रस्ताव 377 (3 नवंबर 1950): सुरक्षा परिषद ठप होने पर महासभा की भूमिका बढ़ी — आगे स्वेज़ (1956) में पहली संयुक्त राष्ट्र आपात सेना इसी से बनी (जिसमें भारतीय सैनिक भी थे)।

6. परमाणु नियंत्रण में विफलता: परमाणु ऊर्जा आयोग (1946) और बरूच योजना असफल।

7. सकारात्मक पक्ष: महाशक्तियों के बीच संवाद का मंच बना रहा; गुटनिरपेक्ष और नव-स्वतंत्र देशों ने महासभा को उपनिवेशवाद-विरोध का मंच बनाया; मानवाधिकार घोषणा (10 दिसंबर 1948)।

16. शीत युद्ध का दोष किसका? — इतिहासकारों के मत

विचारधारा

प्रमुख इतिहासकार

मुख्य तर्क

परंपरावादी (Orthodox) — 1940–50 का दशक

आर्थर श्लेसिंगर जूनियर, हर्बर्ट फ़ाइस

दोष सोवियत संघ का — स्टालिन का विस्तारवाद, पूर्वी यूरोप पर क़ब्ज़ा, याल्टा के वादे तोड़ना; अमेरिका ने केवल प्रतिक्रिया में नियंत्रण नीति अपनाई

संशोधनवादी (Revisionist) — 1960 का दशक

विलियम एपलमैन विलियम्स ("अमेरिकी कूटनीति की त्रासदी", 1959), गेब्रियल कोल्को, गार अल्परोविट्ज़, डी. एफ. फ़्लेमिंग

दोष अमेरिका का — खुले बाज़ारों के लिए आर्थिक विस्तारवाद, परमाणु बम से सोवियत संघ को डराने की "परमाणु कूटनीति"; सोवियत कदम रक्षात्मक थे

उत्तर-संशोधनवादी (Post-revisionist) — 1970 का दशक

जॉन लुई गैडिस (1972)

दोनों पक्ष ज़िम्मेदार — पारस्परिक ग़लतफ़हमी, असुरक्षा और अविश्वास; कोई एक पक्ष अकेला दोषी नहीं

सोवियत अभिलेखागार के बाद — 1991 के पश्चात

गैडिस ("अब हम जानते हैं", 1997), व्लादिस्लाव ज़ुबोक

स्टालिन की वैचारिक और व्यक्तिगत भूमिका पहले की अपेक्षा अधिक; पर सुरक्षा-भय भी वास्तविक था

📌 उत्तर-लेखन संकेत

संतुलित उत्तर में लिखें — स्टालिन की सुरक्षा-चिंता (दो बार पश्चिम से आक्रमण) और अमेरिका की आर्थिक-वैचारिक महत्वाकांक्षा दोनों वास्तविक थीं; परमाणु बम ने अविश्वास को भय में बदला; और शक्ति-शून्यता ने दो महाशक्तियों को आमने-सामने ला खड़ा किया। निष्कर्ष — शीत युद्ध किसी एक की साज़िश नहीं, बल्कि युद्धोत्तर परिस्थितियों का लगभग अनिवार्य परिणाम था।

तीनों मतों को आसान भाषा में समझें। पहला मत, जिसे परंपरागत मत (Orthodox View) कहते हैं, 1950 के दशक तक पश्चिम में हावी रहा। इसके अनुसार दोष सोवियत संघ का है — स्टालिन ने पूर्वी यूरोप पर क़ब्ज़ा किया, वादे तोड़े और साम्यवाद को पूरी दुनिया में फैलाना चाहा; अमेरिका ने तो केवल बचाव किया। दूसरा मत, संशोधनवादी मत (Revisionist View), 1960 के दशक में वियतनाम युद्ध के समय उभरा, जब अमेरिकी विद्वान अपनी ही सरकार पर प्रश्न उठाने लगे। इसके अनुसार दोष अमेरिका का है — उसे अपने माल के लिए पूरी दुनिया का खुला बाज़ार चाहिए था, उसने परमाणु बम से सोवियत संघ को डराने की कोशिश की, और वह सोवियत संघ की सुरक्षा-चिंताओं को समझने को तैयार नहीं था, जबकि सोवियत संघ युद्ध में दो करोड़ से अधिक लोग खोकर बहुत कमज़ोर था। तीसरा मत, उत्तर-संशोधनवादी मत (Post-Revisionist View), 1970 के दशक से आया। इसके अनुसार दोष किसी एक का नहीं; दोनों एक-दूसरे के इरादों को ग़लत समझते रहे, हर एक का बचाव का क़दम दूसरे को हमला लगता था, और 1945 के बाद यूरोप में जो ख़ाली जगह बनी उसमें दोनों का टकराना लगभग तय था।

📌 उत्तर में कैसे लिखें

पहले तीनों मत एक-एक वाक्य में लिखें, फिर निष्कर्ष दें कि आज अधिकांश इतिहासकार तीसरे मत के निकट हैं — शीत युद्ध आपसी भय, ग़लतफ़हमी और शक्ति-संतुलन की राजनीति की उपज था, जिसमें विचारधारा ने आग में घी का काम किया। 1991 के बाद सोवियत अभिलेख खुलने पर स्टालिन की भूमिका पर फिर ज़ोर बढ़ा है, इसलिए यह बहस आज भी जारी है।

17. राजस्थान से जुड़ाव

शीत युद्ध के शुरुआती वर्ष ही आधुनिक राजस्थान के निर्माण के वर्ष थे, और आगे शीत युद्ध की वैश्विक राजनीति के कई सूत्र राजस्थान की धरती से भी जुड़े।

1. एकीकरण का काल: जिन दिनों यूरोप बँट रहा था, उन्हीं दिनों राजस्थान जुड़ रहा था — मत्स्य संघ (18 मार्च 1948) से वृहत् राजस्थान (30 मार्च 1949) और संयुक्त वृहत्तर राजस्थान (15 मई 1949) तक; बर्लिन नाकेबंदी और नाटो इसी अवधि की घटनाएँ हैं।

2. सूरतगढ़ केंद्रीय यांत्रिक फ़ार्म (1956): श्रीगंगानगर ज़िले में सोवियत संघ से मिली मशीनरी और सहायता से स्थापित एशिया के सबसे बड़े यंत्रीकृत कृषि-फ़ार्मों में से एक — गुटनिरपेक्ष भारत द्वारा सोवियत सहयोग का प्रत्यक्ष उदाहरण।

3. सिंधु जल संधि (1960) और इंदिरा गांधी नहर: विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुई संधि में रावी-ब्यास-सतलज का जल भारत को मिला — इसी से पश्चिमी राजस्थान की इंदिरा गांधी नहर परियोजना को जल-आधार मिला।

4. पोखरण — परमाणु युग में भारत: शीत युद्ध की परमाणु होड़ और भेदभावपूर्ण अप्रसार संधि (1968) को भारत ने अस्वीकार किया; 18 मई 1974 को जैसलमेर ज़िले के पोखरण में पहला शांतिपूर्ण परमाणु परीक्षण और 11–13 मई 1998 को पोखरण-2 — भारत की सामरिक स्वायत्तता की नीति का प्रतीक।

18. व्यक्तित्व और कालक्रम (Timeline)

A. प्रमुख व्यक्तित्व

व्यक्तित्व

देश

शीत युद्ध में भूमिका

हैरी एस. ट्रूमैन

अमेरिका

राष्ट्रपति (1945–53) — ट्रूमैन सिद्धांत, मार्शल योजना, नाटो, कोरिया में हस्तक्षेप, मैकआर्थर की बर्ख़ास्तगी

जोसेफ स्टालिन

सोवियत संघ

पूर्वी यूरोप पर नियंत्रण, बर्लिन नाकेबंदी, कॉमिनफ़ॉर्म-कोमेकॉन, परमाणु बम; मृत्यु 5 मार्च 1953

विंस्टन चर्चिल

ब्रिटेन

लौह-आवरण भाषण (1946); आंग्ल-अमेरिकी एकजुटता के प्रवक्ता

जॉर्ज केनन

अमेरिका

लंबा तार (1946), "मिस्टर एक्स" लेख (1947) — नियंत्रण नीति के जनक

जॉर्ज सी. मार्शल

अमेरिका

विदेश मंत्री — मार्शल योजना; 1953 का नोबेल शांति पुरस्कार

व्याचेस्लाव मोलोतोव

सोवियत संघ

विदेश मंत्री — मार्शल योजना से बहिर्गमन, मोलोतोव योजना

आंद्रेई ज़्दानोव

सोवियत संघ

कॉमिनफ़ॉर्म (1947) में "दो खेमों" का सिद्धांत

जोसिप ब्रोज़ टीटो

यूगोस्लाविया

स्टालिन से टकराव (1948) — स्वतंत्र साम्यवाद; गुटनिरपेक्ष आंदोलन के संस्थापक

माओ त्से-तुंग

चीन

जनवादी चीन के संस्थापक (1949); कोरिया में हस्तक्षेप

किम इल-सुंग / सिंगमन री

उत्तर / दक्षिण कोरिया

कोरिया के दोनों राज्यों के नेता (1948)

डगलस मैकआर्थर

अमेरिका

जापान का प्रशासक; कोरिया में संयुक्त राष्ट्र कमान — इंचॉन; 1951 में हटाए गए

जोसेफ मैकार्थी

अमेरिका

सीनेटर — साम्यवाद-विरोधी "लाल भय" (1950–54)

कोनराड एडेनॉवर

पश्चिम जर्मनी

पहले चांसलर (1949–63) — पश्चिम से एकीकरण

जवाहरलाल नेहरू

भारत

गुटनिरपेक्षता के सूत्रधार; पंचशील, बांडुंग, गुटनिरपेक्ष आंदोलन

वी. के. कृष्ण मेनन

भारत

कोरियाई युद्धबंदी प्रस्ताव (1952) के प्रस्तावक

के. एम. पणिक्कर

भारत

चीन में राजदूत — चाउ एन-लाई की चेतावनी के वाहक (1950)

जनरल के. एस. थिमैया

भारत

तटस्थ राष्ट्र प्रत्यावर्तन आयोग के अध्यक्ष (1953–54); आगे भारतीय थलसेनाध्यक्ष

B. कालक्रम

तिथि

घटना

महत्त्व

1917–1920

बोल्शेविक क्रांति; पश्चिमी हस्तक्षेप

अविश्वास की जड़ें

4–11 फ़रवरी 1945

याल्टा सम्मेलन

युद्धोत्तर योजना

17 जुलाई – 2 अगस्त 1945

पॉट्सडैम सम्मेलन

जर्मनी के चार क्षेत्र

6 / 9 अगस्त 1945

हिरोशिमा / नागासाकी

परमाणु युग

19 अक्टूबर 1945

ऑरवेल का निबंध — "कोल्ड वॉर" शब्द

शब्द की उत्पत्ति

9 फ़रवरी 1946

स्टालिन का भाषण

वाक्-युद्ध

22 फ़रवरी 1946

केनन का लंबा तार

नियंत्रण का बीज

5 मार्च 1946

चर्चिल का लौह-आवरण भाषण, फ़ुल्टन

पश्चिम की एकजुटता

7 सितंबर 1946

नेहरू का प्रसारण

गुटनिरपेक्षता की घोषणा

12 मार्च 1947

ट्रूमैन सिद्धांत

शीत युद्ध की औपचारिक घोषणा

16 अप्रैल 1947

बरूच का भाषण — "शीत युद्ध"

अमेरिका-सोवियत संदर्भ में शब्द

5 जून 1947

मार्शल योजना की घोषणा

आर्थिक नियंत्रण

सितंबर 1947

कॉमिनफ़ॉर्म; ज़्दानोव का "दो खेमे"

सोवियत उत्तर

फ़रवरी 1948

चेकोस्लोवाकिया में साम्यवादी तख़्तापलट

पूर्वी यूरोप पूरा सोवियत प्रभाव में

24 जून 1948 – 12 मई 1949

बर्लिन नाकेबंदी और हवाई पुल

पहला बड़ा संकट

28 जून 1948

टीटो का कॉमिनफ़ॉर्म से निष्कासन

साम्यवादी खेमे में दरार

जनवरी 1949

कोमेकॉन

पूर्वी आर्थिक गुट

4 अप्रैल 1949

नाटो

पश्चिमी सैन्य गुट

23 मई / 7 अक्टूबर 1949

पश्चिम जर्मनी / पूर्वी जर्मनी

जर्मनी का विभाजन

29 अगस्त 1949

सोवियत परमाणु परीक्षण

अमेरिकी एकाधिकार समाप्त

1 अक्टूबर 1949

जनवादी चीन

शीत युद्ध एशिया में

30 दिसंबर 1949

भारत द्वारा चीन को मान्यता

स्वतंत्र विदेश नीति

9 फ़रवरी 1950

मैकार्थी का व्हीलिंग भाषण

लाल भय

14 फ़रवरी 1950

चीन-सोवियत मैत्री संधि

साम्यवादी खेमा मज़बूत

अप्रैल 1950

एनएससी-68

नियंत्रण का सैन्यीकरण

25 जून 1950

कोरियाई युद्ध आरंभ

पहला "गर्म" युद्ध

अक्टूबर–नवंबर 1950

चीन का हस्तक्षेप

युद्ध का विस्तार

3 नवंबर 1950

"शांति के लिए एकता" प्रस्ताव

महासभा की भूमिका

3 दिसंबर 1952

भारत का युद्धबंदी प्रस्ताव

युद्धविराम का आधार

27 जुलाई 1953

पानमुनजोम युद्धविराम

कोरिया का स्थायी विभाजन

1954 / 1955 / 1961

पंचशील / बांडुंग व वारसॉ संधि / गुटनिरपेक्ष आंदोलन

आगे का विकास

9 नवंबर 1989 / 26 दिसंबर 1991

बर्लिन दीवार का पतन / सोवियत संघ का विघटन

शीत युद्ध का अंत

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📋 इस अध्याय में
  1. Cold War – Introduction, Definition, and Features
  2. Causes of Cold War
  3. Phases of Cold War
  4. Truman Doctrine (1947) — Official start of the Cold War
  5. Marshall Plan (1947-1951)
  6. Berlin Blockade and NATO (1948-49)
  7. Nuclear Arms Race (upto 1950)
  8. Korean War (1950-1953)
  9. Major events of the Cold War (up to 1950) – Comparative Table
  10. India's Non-Alignment Policy
  11. Effects of Cold War up to 1950

After World War II, the world was divided into two camps – on one side the capitalist democracy of the USA and on the other side the communism of the USSR. The tension, rivalry and conflict that emerged between the two – without direct war – is called the Cold War. Historian John Lewis Gaddis: "The Cold War arose from mutual distrust and security fear."

💡 Understand the Cold War in simple language

Imagine there are two big stores in the neighborhood—one "America Store" (Capitalism) and the other "Soviet Store" (Communism). They don't destroy each other—because both have atomic bombs. But they draw every small store (country) into their fold, engage in espionage, spread propaganda, and fight small wars (Proxy Wars). This is the Cold War—a fierce rivalry without direct conflict.

1Cold War – Introduction, Definition, and Features

Definitions of Cold War

Scholar/HistorianDefinition/View
Walter Lippmann (1947)He popularized the term Cold War, which was coined in his book "The Cold War" (1947).
Louis Halle"The Cold War was more intense than any actual war. It was fought not on the battlefield, but in the minds."
Fleming"It was a psychological and propaganda war."
Leon Trotsky"No War, No Peace"
John Lewis Gaddis"The Cold War arose from mutual distrust and security fears."
William A. Williams"The Cold War was the result of American economic expansionism."
Arthur Schlesinger Jr."The Cold War was a response to Soviet expansionism."

B. Features of Cold War

1. No Direct Military War: The USA and the USSR never took up arms directly.

2. Ideological Conflict: Capitalism vs. Communism.

3. Proxy Wars: Indirect fighting in Korea, Vietnam, Cuba.

4. Nuclear Arms Race: Nuclear stockpiles held by both superpowers.

5. Non-Alignment: Countries like India adopted the policy of not joining any bloc.

6. Espionage: Espionage by the CIA (USA) and the KGB (Soviet Union).

7. Space Race: The race to demonstrate technological superiority.

8. Propaganda War: Spreading ideology through radio, newspapers, films.

Western Bloc
  • Leadership: USA
  • Ideology: Capitalism + Democracy
  • Military Alliance: NATO (1949)
  • Economic Aid: Marshall Plan
  • Intelligence: CIA
  • Geography: Western Europe + Japan
Eastern Bloc
  • Leadership: Soviet Union (USSR)
  • Ideology: Communism
  • Military Organization: Warsaw Pact (1955)
  • Economic Aid: Molotov Plan / COMECON
  • Intelligence Organization: KGB
  • Geography: Eastern Europe + China (China, 1949)

2Causes of Cold War

1. Global Supremacy Struggle: USA and USSR were both equal power with opposing ideologies – rivalry was inevitable.

2. Historical Distrust:

► After the Russian Revolution of 1917, Western countries opposed the Bolsheviks.

► Russian Civil War (1918-20): USA, Britain, France, Japan supported the anti-Bolsheviks → Deep distrust in the USSR

3. Mutual Suspicion during WWII:

► Delay in Second Front: USSR had been fighting since 1941, US did not open European Front until 1944 → Stalin suspected

► Nazi-Soviet Pact (1939): Suspicion grew in the West

► Atomic Bomb – America hid information from Stalin

► Yalta Conference Agreements: USSR broke its promise of free elections in Eastern Europe

► Stalin gains control of Poland, Hungary, Romania, Bulgaria, Czechoslovakia → West enraged

4. Power Vacuum: Britain and France were economically broken after WWII → USA and USSR tried to fill it.

5. Ideological Conflict: USA wanted to spread capitalism and liberal democracy throughout the world. USSR wanted communism.

6. Domino Theory (President Eisenhower): If one country becomes communist, neighboring countries will also become communist → US intervention policy.

7. Leadership Factor: The aggressive policies of Stalin, Truman, Churchill increased tension.

3Phases of Cold War

Course Note:RAS Mains Syllabus: "The World during the Cold War (upto 1950 AD)" — hence the main focus is on 1945-1950. But a brief introduction to all the phases is given for complete understanding.

Phase 1: Roots, 1917–1945

Phase 2: Peak Cold War, 1945–1953 – the core of the course

Yalta Conference (February 1945)

► Dividing Germany into occupation zones

► Free elections in Eastern Europe – the USSR later broke up

► Establishment of the United Nations

► USSR joins the war against Japan

Potsdam Conference (July–August 1945)

Stalin's Speech (February 1946)

Iron Curtain Speech (Iron Curtain Speech, March 1946)

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4Truman Doctrine (1947) — Official start of the Cold War

Background

Truman's Congress Speech, March 12, 1947

"The US will support free peoples fighting against subjugation." — President Harry Truman
Features of Truman Doctrine
The end of US Isolationism – the US becomes an active participant in world affairs
Containment of Communism - George Kennan's "Containment Policy"
$400 million in aid to Greece and Türkiye – the first practical step
Foundation: Marshall Plan + NATO—together the pillars of US Cold War policy
Significance: Considered the formal and official declaration of the Cold War

5Marshall Plan (1947-1951)

European Recovery Programme (ERP)

June 5, 1947: US Secretary of State George Marshall announced at Harvard University.

AspectDetails
Economic Aid$12 billion (over $130 billion in today's value)
Duration1947-1951 (4 years)
Beneficiary Countries16 Western European Countries: Britain, France, West Germany, Italy, etc.
ObjectivesRebuilding Europe + Eliminating Hunger + Contain Communism
ResultWest Germany and Western Europe prospered. The "German Economic Miracle"
Stalin's ResponseCalled "Dollar Imperialism" → Denied Eastern Europe → Molotov Plan

Exam Facts:The Marshall Plan and the Truman Doctrine—both introduced in 1947. Marshall Plan = Economic + Truman Doctrine = Political + NATO = Military—together were the US Cold War Strategy.

6Berlin Blockade and NATO (1948-49)

Berlin Blockade (1948-49)

1. Background: Germany divided into 4 zones – West Berlin in the territory of the USSR.

2. Soviet Blockade (June 1948): The Soviet Union closed all roads, railways, and canals between West Berlin and West Germany.

3. Western Airlift: US, UK airlift food, fuel, and supplies for 1 year – 200,000+ flights.

4. Blockade Failed (May 1949): USSR had to lift the blockade.

5. Result: Germany permanently divided—West Germany (Federal Republic) and East Germany (Democratic Republic), 1949.

"The Berlin Blockade was the first major confrontation in the Cold War—but the two sides did not fight directly because of the atomic bomb." — Historian

North Atlantic Treaty Organization (NATO — North Atlantic Treaty Organization, 4 April 1949)

1. Formation: 4 April 1949 — 12 Founding Members: USA, UK, France, Canada, Belgium, Netherlands, Luxembourg, Denmark, Norway, Iceland, Portugal, Italy.

2. Core Principle: "An attack on one is an attack on all" — Article 5.

3. Purpose: Collective Security against the Soviet Union (USSR) – Defense of Western Europe.

4. USSR's Response: Warsaw Pact (1955) — military organization of Eastern Europe.

5. Significance: For the first time, the United States formed a permanent military alliance in peacetime—a complete renunciation of isolationism.

7Nuclear Arms Race (upto 1950)

1. US Atomic Monopoly (1945-49): Beginning with Hiroshima and Nagasaki. For four years, only the USA possessed atomic bombs.

2. Soviet Atomic Test (September 29, 1949): "Joe-1" — The USSR tested its first atomic bomb. The American monopoly ended.

3. Start of Arms Race: Both superpowers started stockpiling nuclear weapons.

4. McCarthyism (from 1950): US Senator Joseph McCarthy – campaign against Communist suspects in the US – climate of fear.

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8Korean War (1950-1953)

Background

► North Korea: Under the influence of the USSR — Communist — Leader: Kim Il-sung

► South Korea: Under USA influence—Capitalist—Leader: Syngman Rhee

Sequence of Events

1. June 25, 1950: North Korea attacks South Korea.

2. UN Resolution: The United States led the support of South Korea. The Soviet Union was boycotting the Security Council at the time.

3. Chinese Intervention: US forces reach the Yalu River → China pushes back UN forces.

4. Armistice (1953): Status quo on the 38th parallel. Korea is still divided.

India's Role in Korean War

India's role in the Korean War is a prime example of non-alignment – ​​neither fought on any side, but worked for peace.

1. Non-Alignment: India neither sided with the American bloc nor with the Soviet bloc.

2. Mediator's Role: Advocating for a peaceful settlement between the two parties.

3. Active UN Participation: Efforts to prevent conflict escalation.

4. Role in Ceasefire Negotiations: India played an important diplomatic role.

5. NNRC (Neutral Nations Repatriation Commission): Headed by General K.S. Thimayya—oversees the fair return of Prisoners of War (POW).

6. Custodian Force of India: Ensured the just return of prisoners of war.

7. Humanitarian Assistance: Help to the injured and displaced persons.

Exam Facts — Korea:RAS Mains likely question: "Evaluate India's role in the Korean War." Answer: (1) Non-Alignment, (2) Mediation, (3) NNRC – General Thimayya, (4) Humanitarian role – all three angles must be given.

9Major events of the Cold War (up to 1950) – Comparative Table

EventYearUS SideSoviet Side
Yalta ConferenceFebruary 1945Free elections in Eastern EuropeStalin later broke the promise
Potsdam ConferenceJuly–August 1945Disarmament of GermanyDisagreement grew
Stalin's speechFebruary 1946—Coexistence declared impossible
Iron Curtain SpeechMarch 1946Demands for a Western alliancecalled "imperialist propaganda"
Truman Doctrine1947ContainmentStrong opposition
Marshall PlanJune 1947$12 billion to Europecalled "dollar imperialism"
Cominform1947—Control over European communist parties
Berlin Blockade1948-49Airlift – 1 yearThe blockade failed → had to be lifted
Germany Division1949West Germany (Federal Republic)East Germany (Democratic Republic)
NATO (North Atlantic Treaty)April 4, 194912 members – "Attack on one = attack on all"Strong objection
Communist ChinaOctober 1, 1949Major SetbackBig Win – Geopolitical Gain
nuclear tests of the USSRSeptember 1949American monopoly endsbecome a nuclear power
Korean WarJune 1950Support for the South under the UN bannerSupport for the North + Help from China

10India's Non-Alignment Policy

Nehru's Vision

Prime Minister Jawaharlal Nehru clarified: "India will not become part of any military bloc. We will decide our foreign policy independently."

1. Independent Foreign Policy: Decisions on every issue based on one's national interest.

2. Peaceful Coexistence: Panchsheel (1954) – Five Principles.

3. Non-Aligned Movement (NAM): Nehru, Tito (Yugoslavia), Nasser (Egypt) — NAM was founded in 1961.

4. Criticism of Cold War: Nehru criticized the arms race and propaganda of both the blocs.

5. Practical Use: Received aid from both—steel plants from the USSR, food aid from the USA—but was not subservient to either.

11Effects of Cold War up to 1950

1. Division of the World: Capitalist Bloc vs. Communist Bloc + Non-Aligned Countries.

2. Military Alliances: NATO (1949), Warsaw Pact (1955), SEATO (South-East Asia Treaty Organization, 1954-77), CENTO (Central Treaty Organization).

3. Weakening of UN: UN ineffective due to veto of superpowers.

4. Arms Race: Stockpiling of nuclear weapons – a threat looming over humanity.

5. Technological Development: Advancement in space, communication, computers through defence research.

6. Decolonization: Both blocs drew newly independent countries into their fold → Colonialism ended quickly.

7. Politics of Economic Aid: US and Soviet aid led to the development of developing countries – but affected their autonomy.

8. Psychological Impact: Nuclear fear, fear of espionage, restrictions on free expression.

🎯 Cold War – Mains Angle (Mains Analysis)
  • Angle 1: "What was the Cold War? Analyze its main causes." — RAS Mains Probable — Historical distrust, ideological conflict, power vacuum — all three dimensions
  • Angle 2: "The Truman Doctrine and the Marshall Plan were key instruments of the Cold War." — Explanation
  • Angle 3: "India's role in the Korean War" — Non-alignment, mediation, NNRC (General Thimayya)
  • Angle 4: "Why is the Berlin Blockade (1948-49) called the first major crisis of the Cold War?"
  • Angle 5: "Reasons for and Significance of NATO" — America's first permanent peacetime military alliance
  • Angle 6: "India's Policy of Non-Alignment—Was It Practical?"

★ Facts that must be asked in the exam ★

1. The term "Cold War" was popularized by Walter Lippmann in 1947. 2. There was no direct military conflict in the Cold War – there was ideology, diplomacy, proxy wars, arms race. 3. Yalta Conference (February 1945): Roosevelt + Churchill + Stalin — Decided the post-WWII world order. 4. Iron Curtain Speech, March 1946: Winston Churchill – "Iron Curtain from the Baltic to the Adriatic." 5. Truman Doctrine (March 12, 1947): "America will support free peoples." — Formal start of the Cold War. 6. Marshall Plan (June 1947): European Reconstruction Program (ERP) — $12 billion — 1947–51. 7. Cominform (1947): USSR's control over European Communist Parties. 8. Berlin Blockade (1948-49): USSR fails. Western Airlift succeeds. 9. NATO (North Atlantic Treaty Organization): April 4, 1949 — 12 founding members. "An attack on one is an attack on all." 10. Germany Division, 1949: West Germany (Federal Republic) + East Germany (Democratic Republic). 11. Communism in China (Communist China, 1 October 1949): Mao Zedong – major blow to USA. 12. Soviet Atomic Test, September 1949: American atomic monopoly ended. 13. Korean War (25 June 1950): North Korea invades the 38th Parallel. 14. NNRC (Neutral National Repatriation Commission): Headed by General K.S. Thimayya – India's contribution. 15. Stalin's speech (February 1946): Peaceful coexistence with the West impossible. 16. Domino Theory (Eisenhower): One country becomes communist → neighbors will also become communist – basis of US Containment Policy. 17. McCarthyism: Senator Joseph McCarthy – persecution of communist suspects in the US. 18. India's Non-Alignment: Nehru – Not joining any military bloc. 19. COMECON (1949): Economic organization of Eastern European countries led by the Soviet Union—the Soviet answer to the Marshall Plan. 20. End of Cold War: Fall of Berlin Wall 1989 + Dissolution of USSR 1991.

📝 Previous Year Questions (PYQs) 📝

Q1. "Analyze the major causes and effects of the Cold War." [RAS Mains Probable] Q2."How were the Truman Doctrine (1947) and the Marshall Plan instruments of the Cold War?" [RAS Mains Probable] Q3."Evaluate India's role in the Korean War (1950-53)." [RAS Mains Probable] Q4."Why is the Berlin Blockade (1948-49) considered the first major crisis of the Cold War?" [UPSC GS-I] Q5. "State the reasons for the establishment of NATO, its members and its importance." [RAS Mains Probable] Q6."What was India's policy of non-alignment during the Cold War? Was it practical?" [RAS Mains Probable] Q7."What was the difference between the Yalta Conference and the Potsdam Conference? What role did they play in the Cold War?" [UPSC] Q8."How did the world split into two blocs after WWII? What were its consequences?" [RAS Mains Probable]

📅 Cold War Timeline, up to 1950

Year/DateEventExam Importance
1917Russian Bolshevik RevolutionRoots of the Cold War
1918-20Russian Civil War: USA, Britain, France, Japan supported the anti-BolsheviksThe beginning of historical mistrust
February 1945Yalta Conference: Roosevelt + Churchill + StalinPost-WWII world plan
July–August 1945Potsdam ConferenceUS-USSR disagreements—the beginning of the Cold War
6–9 August 1945Hiroshima-Nagasaki atomic bombs—Japan surrendersThe Nuclear Age—A New Direction for the Cold War
February 1946Stalin's Speech: Coexistence is impossibleDeclaration of Cold War
March 1946The Iron Curtain Speech — ChurchillThe West accepted hostility
March 12, 1947Truman Doctrine: "Support of a free people"The official start of the Cold War
June 1947Marshall Plan (ERP) — $12 billionAttempts to stop communism in Europe
1947Cominform — established by the USSRSoviet response to the Marshall Plan
June 1948Berlin Blockade begins - USSRThe first major Cold War crisis
1948-49Western Airlift — 200,000+ flightsUSSR had to retreat
1949COMECON — Economic organization of Eastern Europe under the leadership of the USSRResponse to the Marshall Plan
April 4, 1949NATO (North Atlantic Treaty) — 12 membersWestern military alliance
May 1949Berlin Blockade Lifted - USSR FailsMoral victory for the West
1949Germany divided: West Germany vs. East GermanyThe permanent division of Europe
October 1, 1949Mao's People's Republic of China — CommunistGeopolitical advantage to the USSR
September 1949USSR's first atomic test—"Joe-1"US nuclear monopoly ends
1950McCarthyism — anti-communist campaign in the United StatesThe climate of fear in America
June 25, 1950Korean War begins - North Korea invadesThe first hot conflict of the Cold War
1950India's Role: Non-alignment, mediation, NNRC (General Thimayya)Practical Example of Non-Alignment
1953Korean Armistice – Status quo at the 38th LineKorea is still divided today
1955Warsaw Pact — the Soviet answer to NATOcomplete arrangement of military groups
1989Fall of the Berlin WallThe beginning of the end of the Cold War
1991Dissolution of USSR → 15 independent statesEnd of the Cold War
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