☭ अध्याय 8/11 — आधुनिक विश्व इतिहास

रूसी क्रांति

Russian Revolution | RAS Mains
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🌅 कहानी 1 — जिस दिन औरतों ने रोटी माँगी और एक साम्राज्य गिर गया

8 मार्च 1917, पेत्रोग्राद। रूस की राजधानी में कड़ाके की सर्दी है और देश तीसरे साल से महायुद्ध लड़ रहा है। शहर की औरतें हर सुबह अँधेरे में, बर्फ़ पर, रोटी की दुकानों के आगे घंटों क़तार में खड़ी रहती हैं, और कई बार दुकान खुलने पर पता चलता है कि आटा आया ही नहीं। उनके पति और बेटे मोर्चे पर हैं। आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है। कपड़ा मिलों की महिला मज़दूर काम छोड़कर सड़क पर उतर आती हैं। उनका एक ही नारा है — "रोटी दो!"

वे पास के लोहे के कारख़ानों के फाटकों पर जाकर पुरुषों को पुकारती हैं — बाहर आओ! शाम तक लगभग एक लाख लोग सड़कों पर हैं। अगले दो दिन में यह संख्या दुगुनी-तिगुनी हो जाती है, और नारे बदल जाते हैं — "युद्ध बंद करो!", "निरंकुश शासन का नाश हो!" राजा, जिसे रूस में ज़ार कहा जाता है, मोर्चे के मुख्यालय से तार भेजता है — गोली चलाकर भीड़ को हटाओ।

चौथे दिन सैनिकों ने गोली चलाई और कई लोग मारे गए। पर उस रात बैरकों में सैनिकों को नींद नहीं आई। वे ख़ुद कुछ महीने पहले तक किसान और मज़दूर थे; जिन पर उन्होंने गोली चलाई थी, वे उनकी अपनी माँओं और बहनों जैसी थीं। अगली सुबह एक टुकड़ी ने अपने अफ़सर का आदेश मानने से मना कर दिया और बंदूक़ें लेकर भीड़ में जा मिली। फिर दूसरी, फिर तीसरी। शाम तक राजधानी के लाखों सैनिक जनता के साथ थे। एक हफ़्ते के भीतर तीन सौ वर्ष पुराना रोमानोव राजवंश ढह गया।

आठ महीने बाद, 7 नवंबर की रात, एक छोटे पर अनुशासित दल — बोल्शेविक — ने "शांति, भूमि और रोटी" के नारे के सहारे राजधानी के टेलीफ़ोन केंद्र, पुल, रेलवे स्टेशन और बैंक चुपचाप अपने क़ब्ज़े में ले लिए। सुबह तक लेनिन के नेतृत्व में दुनिया की पहली मज़दूर-किसान सरकार बन चुकी थी। फ्रांसीसी क्रांति ने दुनिया को राजनीतिक समानता का विचार दिया था; रूसी क्रांति ने आर्थिक समानता का सपना दिखाया — और उसी से बीसवीं सदी का सबसे बड़ा वैचारिक संघर्ष, पूँजीवाद बनाम साम्यवाद, जन्मा।

🏠 कहानी 2 — दो भाइयों की कहानी: एक मज़दूर, एक किसान (1885–1937)

ध्यान रहे: इस कहानी का मुख्य पात्र और उसका परिवार काल्पनिक हैं, ताकि पूरा दौर एक आम इंसान की नज़र से समझ आ सके। कहानी में आई घटनाएँ, तिथियाँ और बाक़ी सभी व्यक्ति असली हैं।

गाँव। इवान का जन्म 1885 के आसपास रूस के एक गाँव में हुआ। उसके दादा ज़मींदार के बँधुआ किसान थे — ज़मीन के साथ ख़रीदे-बेचे जा सकते थे। 1861 में ज़ार ने उन्हें आज़ाद तो कर दिया, पर ज़मीन का जो टुकड़ा मिला, वह छोटा और पथरीला था, और उसकी क़ीमत परिवार को उनचास साल तक किस्तों में चुकानी थी। ज़मीन इवान के पिता के नाम नहीं, पूरे गाँव की साझी संस्था के नाम थी, जो हर कुछ साल में खेत दोबारा बाँट देती थी। परिवार बढ़ता गया, खेत के टुकड़े छोटे होते गए। बड़ा भाई प्योत्र गाँव में रहा; इवान काम की तलाश में राजधानी चला गया।

कारख़ाना। इवान को लोहे के एक विशाल कारख़ाने में काम मिला, जहाँ तीस हज़ार मज़दूर एक साथ काम करते थे। ग्यारह घंटे की पारी, एक कमरे में दस आदमी, और संघ बनाने या हड़ताल करने पर जेल। जनवरी 1905 के एक रविवार को वह हज़ारों मज़दूरों के साथ, ज़ार की तस्वीर हाथ में लिए, महल की ओर चला — सबको विश्वास था कि "पिता-समान ज़ार" को बस उनकी तकलीफ़ पता नहीं है। सैनिकों ने गोली चला दी। इवान बच गया, पर उस दिन के बाद उसने ज़ार की तस्वीर घर में नहीं टाँगी। उसी साल कारख़ाने के मज़दूरों ने पहली बार अपने प्रतिनिधि चुनकर एक परिषद बनाई, जिसे सोवियत कहा गया।

युद्ध। 1914 में प्योत्र को सेना में भर्ती कर लिया गया। उसके पत्र आते — तीन सैनिकों पर एक बंदूक़ है, जूते फटे हैं, अफ़सर हमें जानवरों की तरह हाँकते हैं। गाँव में खेत जोतने को मर्द नहीं बचे; शहर में रोटी के दाम चार गुना हो गए। मार्च 1917 में जब औरतें सड़कों पर उतरीं, तो इवान का कारख़ाना भी बंद हो गया। ज़ार चला गया। इवान को अपने कारख़ाने से सोवियत का प्रतिनिधि चुना गया।

दो सरकारें। अब एक नई सरकार थी, जिसमें वकील और प्रोफ़ेसर बैठे थे। उसने बोलने की आज़ादी दी, पर युद्ध बंद नहीं किया और ज़मीन का फ़ैसला "बाद में" पर टाल दिया। इवान की सोवियत के पास असली ताक़त थी — रेल, तार और सैनिक उसी की सुनते थे — पर उसके नेता सरकार चलाने से हिचकते थे। अप्रैल की एक रात इवान ने रेलवे स्टेशन पर एक गंजे, दाढ़ी वाले आदमी को बोलते सुना, जो अभी-अभी विदेश से लौटा था। उसने तीन ही बातें कहीं: युद्ध अभी बंद हो; ज़मीन अभी किसानों को मिले; सारी सत्ता सोवियतों के हाथ में आए। वह लेनिन था। इवान उसके दल में शामिल हो गया।

अक्टूबर और उसके बाद। 7 नवंबर की रात इवान हाथ में बंदूक़ लिए उन मज़दूरों में था जिन्होंने टेलीफ़ोन केंद्र पर क़ब्ज़ा किया। अगले दिन नई सरकार ने घोषणा की कि ज़मींदारों की सारी ज़मीन किसानों की है। प्योत्र मोर्चा छोड़कर गाँव लौटा और उसे ज़मीन मिली। पर फिर तीन साल का गृहयुद्ध आया। शहरों और सेना को खिलाने के लिए हथियारबंद दस्ते गाँव आते और प्योत्र का सारा "अतिरिक्त" अनाज उठा ले जाते। उसने बोना ही कम कर दिया। 1921 में अकाल पड़ा। तब लेनिन ने नीति बदली: किसान एक तय कर देकर बाक़ी अनाज बाज़ार में बेच सकता था। प्योत्र ने मेहनत की, दो गायें और एक घोड़ा ख़रीद लिया।

स्टालिन का समय। 1929 में आदेश आया कि सबके खेत, पशु और औज़ार मिलाकर एक सामूहिक खेत बनेगा। प्योत्र ने मना किया। दो गायों और एक घोड़े के कारण उसे "धनी किसान" यानी वर्ग-शत्रु घोषित कर दिया गया और परिवार सहित मालगाड़ी में भरकर साइबेरिया भेज दिया गया; इवान को फिर कभी उसकी ख़बर नहीं मिली। इवान ख़ुद अब एक नए इस्पात-नगर में फ़ोरमैन था। उसका बेटा, जो पहली पीढ़ी थी जिसने स्कूल देखा, इंजीनियर बना। कारख़ाने दिन-रात चलते थे, बेरोज़गारी नहीं थी, इलाज और पढ़ाई मुफ़्त थी। पर 1937 में इवान रात को दरवाज़े पर हर आहट से चौंक जाता था, क्योंकि उसके कई पुराने साथी, जिन्होंने उसके साथ क्रांति की थी, एक-एक करके ग़ायब हो रहे थे।

इस कहानी में पूरा अध्याय छिपा है: बँधुआ किसानों की अधूरी मुक्ति (खंड 2), 1905 का ख़ूनी रविवार और पहली सोवियत (खंड 3), किसान और मज़दूर की दशा (खंड 5), विश्व युद्ध (खंड 7), ज़ार का पतन और दो सरकारें (खंड 8 और 9), बोल्शेविकों की जीत और भूमि का आदेश (खंड 10 और 11), गृहयुद्ध और अनाज की ज़बरन वसूली (खंड 12), नई आर्थिक नीति, सामूहिक खेत और स्टालिन का आतंक (खंड 13)।

📋 इस अध्याय में
  1. शुरू करने से पहले — इस अध्याय के ज़रूरी शब्द
  2. परिचय — प्रकृति, तीन चरण और दो पंचांग
  3. 19वीं सदी का रूस — पृष्ठभूमि
  4. 1905 की क्रांति — "पूर्वाभ्यास"
  5. दीर्घकालिक राजनीतिक कारण
  6. आर्थिक और सामाजिक कारण
  7. वैचारिक कारण, राजनीतिक दल और साहित्य
  8. तात्कालिक कारण — प्रथम विश्व युद्ध
  9. फ़रवरी (मार्च) क्रांति 1917 — ज़ारशाही का अंत
  10. दोहरी सत्ता, अप्रैल थीसिस और कोर्निलोव प्रकरण
  11. अक्टूबर (नवंबर) क्रांति 1917 — बोल्शेविक विजय
  12. बोल्शेविक सरकार और ब्रेस्ट-लिटोव्स्क संधि
  13. गृहयुद्ध, चेका और युद्ध साम्यवाद (1918–1921)
  14. नई आर्थिक नीति और स्टालिन का युग
  15. बहुआयामी प्रभाव और मूल्यांकन
  16. भारत और राजस्थान से जुड़ाव
  17. प्रमुख व्यक्तित्व और कालक्रम (Timeline)

शुरू करने से पहले — इस अध्याय के ज़रूरी शब्द

यह अध्याय विचारधारा के शब्दों से भरा है। अगर ये शब्द साफ़ हो जाएँ, तो पूरी क्रांति की कहानी आसान हो जाती है। इसलिए पहले इन्हें समझ लीजिए।

A. तीन शब्द जो सबसे ज़्यादा उलझाते हैं — समाजवाद, साम्यवाद, मार्क्सवाद

शब्द

सरल अर्थ

समाजवाद

यह विचार कि कारख़ाने, खदानें, बैंक और ज़मीन कुछ धनी लोगों की निजी संपत्ति न होकर पूरे समाज (व्यवहार में सरकार) की हों, और उनसे होने वाली कमाई सबकी भलाई में लगे।

साम्यवाद

समाजवाद का अंतिम और सबसे आगे का रूप, जिसकी कल्पना यह है कि एक दिन न कोई अमीर रहेगा न ग़रीब, न निजी संपत्ति रहेगी, और अंत में सरकार की भी ज़रूरत नहीं बचेगी। व्यवहार में "साम्यवादी देश" उन्हें कहा गया जहाँ एक ही दल — कम्युनिस्ट पार्टी — का शासन था।

मार्क्सवाद

जर्मन विचारक कार्ल मार्क्स (1818–1883) के विचार, जिनमें उसने समझाया कि समाज पूँजीवाद से समाजवाद और फिर साम्यवाद तक कैसे और क्यों पहुँचेगा। यानी मार्क्सवाद उस मंज़िल तक पहुँचने का रास्ता बताने वाला सिद्धांत है।

B. मार्क्सवाद की शब्दावली

◆ पूँजीवाद: वह व्यवस्था जिसमें कारख़ाने और ज़मीन निजी मालिकों के होते हैं और उत्पादन मुनाफ़े के लिए होता है।

◆ बुर्जुआ (पूँजीपति वर्ग): कारख़ानों, बैंकों और व्यापार के मालिक। इस अध्याय में "बुर्जुआ क्रांति" का अर्थ है ऐसी क्रांति जो राजा को हटाकर सत्ता इस धनी मध्यम वर्ग को दे और संसद तथा नागरिक अधिकार लाए।

◆ सर्वहारा (मज़दूर वर्ग): जिनके पास अपनी कोई ज़मीन या कारख़ाना नहीं; जो केवल अपनी मेहनत बेचकर जीते हैं।

◆ वर्ग-संघर्ष: मालिकों और मज़दूरों के हितों का टकराव — मालिक कम मज़दूरी देकर अधिक मुनाफ़ा चाहता है, मज़दूर अधिक मज़दूरी।

◆ सर्वहारा का अधिनायकत्व: मार्क्स का यह विचार कि क्रांति के बाद कुछ समय तक सत्ता पूरी तरह मज़दूर वर्ग के हाथ में रहेगी, ताकि पुराने मालिक वापस न आ सकें। "अधिनायकत्व" का अर्थ है बिना रोक-टोक का शासन।

◆ राष्ट्रीयकरण: निजी कारख़ानों, बैंकों या ज़मीन को सरकार द्वारा अपने हाथ में ले लेना।

C. पुराने रूस के शब्द

◆ ज़ार और ज़ारशाही: रूस के सम्राट की उपाधि ज़ार थी, और उसका बिना रोक-टोक का शासन ज़ारशाही।

◆ कृषि-दास: वह किसान जो ज़मींदार की ज़मीन से बँधा हो। वह गाँव नहीं छोड़ सकता था, ज़मींदार की अनुमति के बिना विवाह नहीं कर सकता था, और ज़मीन बिकने पर उसके साथ ही नए मालिक का हो जाता था। वह पूरी तरह ग़ुलाम नहीं था — उसका अपना घर और खेती थी — पर आज़ाद भी नहीं था।

◆ रूढ़िवादी चर्च: ईसाई धर्म की वह शाखा जो रूस में मानी जाती थी; इसका मुखिया रोम का पोप नहीं था, और यह पूरी तरह ज़ार के अधीन तथा उसका समर्थक था।

◆ पोग्रोम: यहूदियों के मोहल्लों पर भीड़ के संगठित हमले — लूट, आगज़नी और हत्या — जिन्हें पुलिस प्रायः अनदेखा करती थी।

◆ साइबेरिया निर्वासन: रूस का सुदूर पूर्वी, बर्फ़ीला इलाक़ा, जहाँ सरकार अपने विरोधियों को वर्षों के लिए भेज देती थी।

◆ उदारवादी और प्रतिक्रियावादी: जो लोग संसद, संविधान और नागरिक अधिकार चाहते थे पर संपत्ति की व्यवस्था नहीं बदलना चाहते थे, वे उदारवादी थे। जो हर बदलाव के विरोधी थे और पुरानी व्यवस्था लौटाना चाहते थे, वे प्रतिक्रियावादी।

D. संस्थाओं के नाम

नाम

क्या थी

ड्यूमा

1905 के बाद बनी रूस की चुनी हुई संसद, जिसके पास नाम-मात्र के अधिकार थे; ज़ार उसे जब चाहे भंग कर देता था।

सोवियत

रूसी भाषा में "परिषद"। कारख़ानों के मज़दूरों और सेना की टुकड़ियों द्वारा सीधे चुने गए प्रतिनिधियों की सभा। हर शहर की अपनी सोवियत थी; इन सबमें राजधानी की सोवियत सबसे ताक़तवर थी।

अस्थायी सरकार

ज़ार के हटने के बाद ड्यूमा के नेताओं ने जो सरकार बनाई। "अस्थायी" इसलिए कि उसे केवल तब तक चलना था जब तक जनता एक संविधान सभा न चुन ले।

संविधान सभा

पूरे देश की जनता द्वारा चुनी जाने वाली वह सभा, जिसे रूस का नया संविधान बनाना था।

कमिसार

बोल्शेविक सरकार में मंत्री के लिए प्रयुक्त शब्द; सेना में दल की ओर से नज़र रखने वाला अधिकारी भी।

कोमिन्टर्न

दुनिया भर की कम्युनिस्ट पार्टियों का मास्को से चलने वाला संगठन (1919), जिसका लक्ष्य दूसरे देशों में भी क्रांति फैलाना था।

E. एक शहर, तीन नाम

रूस की राजधानी का नाम इस अध्याय में तीन तरह से आएगा, पर शहर एक ही है। 1914 तक वह सेंट पीटर्सबर्ग था। युद्ध छिड़ने पर, क्योंकि "बर्ग" जर्मन भाषा का शब्द है, उसे बदलकर पेत्रोग्राद कर दिया गया; 1917 की दोनों क्रांतियाँ इसी नाम के समय हुईं। 1924 में लेनिन की मृत्यु के बाद वह लेनिनग्राद कहलाया, और 1991 में फिर सेंट पीटर्सबर्ग। 1918 से रूस की राजधानी मास्को है।

🔑 मुख्य शब्द

समाजवाद • साम्यवाद • मार्क्सवाद • बुर्जुआ • सर्वहारा • वर्ग-संघर्ष • सर्वहारा का अधिनायकत्व • राष्ट्रीयकरण • ज़ार • कृषि-दास • पोग्रोम • उदारवादी • ड्यूमा • सोवियत • अस्थायी सरकार • संविधान सभा • कमिसार • कोमिन्टर्न

1. परिचय — प्रकृति, तीन चरण और दो पंचांग

रूसी क्रांति (1917) 20वीं सदी की सबसे युगांतरकारी घटनाओं में से एक है। इसने ज़ारशाही (Tsarist Autocracy — ज़ार का निरंकुश राजतंत्र) का अंत किया और कार्ल मार्क्स के विचारों पर आधारित दुनिया के पहले समाजवादी राज्य की स्थापना की। यह क्रांति किसी एक दिन की घटना नहीं, बल्कि घटनाओं की एक शृंखला थी — जिसे सामान्यतः तीन चरणों में देखा जाता है।

चित्र 1: रूसी क्रांति के तीन चरण और पंचांग का अंतर

चित्र 1: रूसी क्रांति के तीन चरण और पंचांग का अंतर

चरण

काल

स्वरूप

परिणाम

1905 की क्रांति

जनवरी–दिसंबर 1905

स्वतःस्फूर्त जन-विद्रोह; बिना केंद्रीय नेतृत्व

ज़ार बचा; ड्यूमा और नागरिक अधिकारों का वादा

फ़रवरी क्रांति

8–15 मार्च 1917 (पुराना पंचांग: 23 फ़रवरी–2 मार्च)

स्वतःस्फूर्त — भूख, युद्ध-थकान; मज़दूर + सैनिक

ज़ारशाही और रोमानोव वंश का अंत; अस्थायी सरकार

अक्टूबर क्रांति

7 नवंबर 1917 (पुराना पंचांग: 25 अक्टूबर)

नियोजित और संगठित सशस्त्र विद्रोह — बोल्शेविक दल

बोल्शेविक सरकार; विश्व का पहला साम्यवादी राज्य

📌 दो पंचांग — दो नाम

रूस में फ़रवरी 1918 तक पुराना जूलियन पंचांग (Julian Calendar) चलता था, जो 20वीं सदी में यूरोप के ग्रेगोरियन पंचांग (Gregorian Calendar) से 13 दिन पीछे था। इसलिए —

23 फ़रवरी (पुराना) = 8 मार्च (नया) → इसे "फ़रवरी क्रांति" भी कहते हैं और "मार्च क्रांति" भी।

25 अक्टूबर (पुराना) = 7 नवंबर (नया) → इसे "अक्टूबर क्रांति" भी कहते हैं और "नवंबर क्रांति" भी। सोवियत सरकार ने 1 फ़रवरी 1918 को सीधे 14 फ़रवरी घोषित करके नया पंचांग अपनाया। (इस अध्याय में सामान्यतः नई तिथियाँ दी गई हैं।)

क्रांति की प्रकृति

◆ राजनीतिक क्रांति: निरंकुश राजतंत्र का अंत — सत्ता पहले उदारवादी अस्थायी सरकार और फिर सोवियतों (मज़दूर-सैनिक परिषदों) के हाथ।

◆ सामाजिक-आर्थिक क्रांति: ज़मींदारी का अंत, भूमि किसानों को, उद्योग-बैंकों का राष्ट्रीयकरण — केवल सत्ता नहीं, संपत्ति-व्यवस्था बदली।

◆ वैचारिक क्रांति: मार्क्सवाद पहली बार ग्रंथों से निकलकर राज्य-व्यवस्था बना — लेनिन ने इसे रूसी परिस्थितियों के अनुसार ढाला (मार्क्सवाद-लेनिनवाद)।

◆ योजनाबद्ध क्रांति: अक्टूबर क्रांति की ख़ास बात यह है कि वह स्वतःस्फूर्त नहीं, बल्कि एक अनुशासित दल द्वारा पूर्व-निर्धारित योजना के अनुसार, सैन्य क्रांतिकारी समिति के माध्यम से, कुछ ही घंटों में संपन्न की गई।

💡 राजस्थान की भाषा में समझें

सोचिए, एक बड़ी रियासत में तीन सौ वर्षों से एक ही राजवंश का राज है। अधिकतर किसान ग़रीब हैं, ज़मीन ठिकानेदारों की है, बोलने की आज़ादी नहीं। पड़ोसी से लड़ाई में हार होती है (जापान से युद्ध), फिर एक बड़े युद्ध में गाँव के जवान मारे जाते हैं और घर में रोटी नहीं बचती (प्रथम विश्व युद्ध)। एक दिन औरतें "रोटी दो" कहती हुई निकलती हैं, सिपाही भी साथ हो जाते हैं — राजा गद्दी छोड़ देता है (फ़रवरी क्रांति)। फिर एक संगठित दल "शांति, भूमि, रोटी" का वादा करके सत्ता ले लेता है (अक्टूबर क्रांति)।

2. 19वीं सदी का रूस — पृष्ठभूमि

रूस यूरोप और एशिया में फैला दुनिया का सबसे बड़ा देश था — पर राजनीतिक रूप से सबसे पिछड़ा। 1613 से यहाँ रोमानोव राजवंश का शासन था और ज़ार (Tsar — रोमन "सीज़र" से बना शब्द) स्वयं को ईश्वर के प्रति ही उत्तरदायी मानता था। 19वीं सदी के मध्य तक पश्चिमी यूरोप में संवैधानिक शासन आ चुका था, पर रूस में न संसद थी, न नागरिक अधिकार।

ज़ार

शासन

मुख्य नीति / घटना

अलेक्ज़ेंडर प्रथम

1801–1825

शुरू में उदार, बाद में प्रतिक्रियावादी; नेपोलियन की हार (1812)

निकोलस प्रथम

1825–1855

दिसंबरवादी विद्रोह (1825) का दमन; नारा — "रूढ़िवादी धर्म, निरंकुशता, राष्ट्रीयता"; क्रीमिया युद्ध (1853–56) में हार

अलेक्ज़ेंडर द्वितीय

1855–1881

"मुक्तिदाता ज़ार" — 1861 में कृषि-दासता (Serfdom) का अंत; ज़ेम्स्त्वो (स्थानीय स्वशासन, 1864), न्याय-सुधार; 1881 में क्रांतिकारी संगठन "जनता की इच्छा" (नरोदनाया वोल्या) ने बम से हत्या की

अलेक्ज़ेंडर तृतीय

1881–1894

कठोर दमन और रूसीकरण; यहूदियों पर हमले (पोग्रोम); साथ ही वित्त मंत्री सर्गेई विट्टे के साथ तेज़ औद्योगीकरण — ट्रांस-साइबेरियाई रेलवे (1891 से)

निकोलस द्वितीय

1894–1917

अंतिम ज़ार — दुर्बल, अनिर्णायक, पर निरंकुशता का कट्टर समर्थक

▶ तालिका को सरल भाषा में समझें

उन्नीसवीं सदी के रूस का इतिहास एक ही ढर्रे पर चलता है: हार के बाद सुधार, और सुधार के बाद दमन। हर बार सुधार अधूरे छोड़ दिए गए, इसलिए असंतोष जमा होता गया।

दिसंबरवादी विद्रोह (1825) रूस में बदलाव की पहली कोशिश थी। नेपोलियन का पीछा करते हुए रूसी सेना के युवा अफ़सर पेरिस तक गए थे; वहाँ उन्होंने देखा कि यूरोप में संविधान और आज़ाद किसान हैं, जबकि उनके अपने देश में बँधुआ किसान और निरंकुश राजा। दिसंबर 1825 में, नए ज़ार के गद्दी पर बैठते समय, उन्होंने संविधान की माँग लेकर विद्रोह किया। विद्रोह कुछ घंटों में कुचल दिया गया; पाँच नेताओं को फाँसी हुई और सैकड़ों साइबेरिया भेजे गए। महीने के नाम पर वे "दिसंबरवादी" कहलाए और आगे के हर क्रांतिकारी के आदर्श बने।

क्रीमिया युद्ध (1853–56) में रूस ब्रिटेन, फ्रांस और तुर्की से लड़ा और अपनी ही ज़मीन पर हारा। कारण साफ़ था: शत्रु के पास भाप के जहाज़, नई बंदूक़ें और रेल थीं; रूस के पास बँधुआ किसानों की सेना, जो पैदल चलकर मोर्चे पर पहुँचती थी। इस हार ने शासकों को समझा दिया कि बँधुआ किसानों वाला देश आधुनिक देशों से नहीं लड़ सकता। इसीलिए नए ज़ार ने 1861 में किसानों को मुक्त किया — दया से नहीं, मजबूरी से। उसने ख़ुद कहा था कि इसे ऊपर से ख़त्म करना बेहतर है, बजाय इसके कि यह नीचे से अपने-आप ख़त्म होने लगे।

पर जब उसी "मुक्तिदाता" ज़ार की 1881 में क्रांतिकारियों ने हत्या कर दी, तो उसके बेटे और पोते ने निष्कर्ष निकाला कि सुधार देना ही ग़लती थी। अगले छत्तीस साल हर माँग का जवाब दमन से दिया गया — और इसी ने शांतिपूर्ण बदलाव के सारे रास्ते बंद कर दिए।

कृषि-दास मुक्ति (1861) — अधूरी आज़ादी

◆ लगभग 2.3 करोड़ निजी कृषि-दास क़ानूनी रूप से स्वतंत्र हुए, पर उन्हें ज़मीन कम और अक्सर ख़राब मिली।

◆ ज़मीन के बदले मुक्ति-भुगतान (Redemption Payments) — 49 वर्षों की किस्तों में; किसान क़र्ज़ में डूबे रहे (ये भुगतान 1907 में जाकर समाप्त हुए)।

◆ ज़मीन व्यक्ति को नहीं, गाँव की सामूहिक संस्था "मीर" (Mir — ग्राम-कम्यून) को मिली, जो समय-समय पर उसका पुनर्बँटवारा करती थी — खेती में सुधार और व्यक्तिगत प्रगति रुकी रही।

क्रांतिकारी विचारों का उदय

◆ लोकवादी / नरोदनिक (Narodniks — "जनता के लोग"): 1870 के दशक में शिक्षित युवा "जनता के पास जाओ" आंदोलन (1874) के तहत गाँवों में गए — किसानों के ग्राम-कम्यून को समाजवाद का आधार माना; प्रेरक — अलेक्ज़ेंडर हर्ज़ेन और निकोलाई चेर्नीशेव्स्की (उपन्यास "क्या करें?", 1863)।

◆ किसानों ने उन्हें नहीं अपनाया, तो एक धड़ा आतंकवाद की ओर मुड़ा — "जनता की इच्छा" ने 1881 में अलेक्ज़ेंडर द्वितीय की हत्या कर दी।

◆ मार्क्सवाद का प्रवेश: जॉर्जी प्लेखानोव — "रूसी मार्क्सवाद के जनक" — ने 1883 में जिनेवा में पहला रूसी मार्क्सवादी समूह "श्रम-मुक्ति" बनाया; उनका तर्क था कि क्रांति किसान नहीं, औद्योगिक मज़दूर (सर्वहारा) लाएँगे।

3. 1905 की क्रांति — "पूर्वाभ्यास"

1917 की क्रांति का पहला विस्फोट 1905 में हुआ। लेनिन ने इसे 1917 का "महान पूर्वाभ्यास" (Dress Rehearsal) कहा था। यह किसी दल की योजना नहीं, बल्कि स्वतःस्फूर्त जन-असंतोष था।

A. पृष्ठभूमि — रूस-जापान युद्ध (1904–05)

◆ छोटे-से एशियाई देश जापान के हाथों विशाल रूस की हार (सुशिमा, मई 1905) — ज़ारशाही की अजेयता का मिथक टूटा और शासन की अक्षमता उजागर हुई।

◆ युद्ध से महँगाई, बेरोज़गारी और खाद्य-संकट — मज़दूरों की हड़तालें (1902–03 से ही) तेज़।

B. ख़ूनी रविवार (22 जनवरी 1905)

◆ पादरी जॉर्जी गापोन के नेतृत्व में लगभग 1.5 लाख मज़दूर, स्त्रियाँ और बच्चे ज़ार के चित्र और धार्मिक प्रतीक लेकर सेंट पीटर्सबर्ग के शीत प्रासाद (Winter Palace) की ओर शांतिपूर्ण जुलूस में चले।

◆ माँगें (याचिका): 8 घंटे का कार्य-दिवस, उचित मज़दूरी, संविधान-सभा, भाषण-प्रेस की स्वतंत्रता, युद्ध का अंत।

◆ सैनिकों ने निहत्थी भीड़ पर गोली चलाई — सरकारी आँकड़ों में लगभग 130 मौतें, अन्य अनुमानों में कई सौ से अधिक। "पिता-समान ज़ार" की छवि उसी दिन टूट गई।

◆ बाद में गापोन पर पुलिस का गुप्तचर होने का संदेह हुआ और 1906 में क्रांतिकारियों ने उसकी हत्या कर दी।

C. क्रांति का प्रसार

◆ देशव्यापी हड़तालें, किसानों द्वारा ज़मींदारों की हवेलियाँ जलाना, पोलैंड-जॉर्जिया-बाल्टिक में राष्ट्रीय विद्रोह।

◆ युद्धपोत पोटेमकिन का विद्रोह (जून 1905) — काला सागर बेड़े के नाविकों का विद्रोह।

◆ सेंट पीटर्सबर्ग सोवियत (अक्टूबर 1905) — मज़दूर प्रतिनिधियों की पहली "सोवियत" (परिषद); उपाध्यक्ष और प्रमुख नेता — युवा लियोन ट्रॉट्स्की। यही संस्था 1917 में क्रांति का केंद्र बनी।

D. अक्टूबर घोषणा-पत्र (30 अक्टूबर 1905)

आम हड़ताल से घबराकर ज़ार निकोलस द्वितीय ने मंत्री विट्टे की सलाह पर (जो इसी के साथ प्रधानमंत्री बना) "अक्टूबर घोषणा-पत्र" (October Manifesto) जारी किया:

1. भाषण, प्रेस, सभा और संगठन की नागरिक स्वतंत्रताएँ।

2. निर्वाचित संसद — राज्य ड्यूमा (State Duma) — का गठन; कोई क़ानून ड्यूमा की सहमति के बिना लागू नहीं होगा।

3. मताधिकार का विस्तार।

उदारवादी संतुष्ट हो गए, आंदोलन बँट गया और सरकार ने धीरे-धीरे दमन से स्थिति पर क़ाबू पा लिया।

E. ड्यूमा का मज़ाक़ और स्टोलिपिन

ड्यूमा

काल

क्या हुआ

पहली

मई–जुलाई 1906

उदारवादी-प्रधान; भूमि-सुधार की माँग — केवल लगभग 72 दिन में भंग

दूसरी

फ़रवरी–जून 1907

समाजवादी प्रभाव बढ़ा — भंग; फिर मताधिकार क़ानून बदलकर ज़मींदारों के पक्ष में कर दिया गया

तीसरी

1907–1912

रूढ़िवादी, ज़ार-समर्थक — पूरा कार्यकाल

चौथी

1912–1917

फ़रवरी क्रांति में इसी की समिति से अस्थायी सरकार बनी

◆ मौलिक क़ानून (1906): घोषणा-पत्र के तुरंत बाद ज़ार ने स्वयं को फिर "सर्वोच्च निरंकुश सत्ता" घोषित किया; ड्यूमा के ऊपर नियुक्त सदस्यों वाली "राज्य परिषद" बैठा दी गई — ड्यूमा के "पर काट दिए गए"।

◆ प्योत्र स्टोलिपिन (प्रधानमंत्री 1906–11): एक ओर कठोर दमन (फाँसी के फंदे को लोग "स्टोलिपिन की टाई" कहने लगे), दूसरी ओर भूमि-सुधार — किसानों को "मीर" से अलग होकर निजी खेत बनाने की छूट, ताकि संपन्न किसानों (कुलकों) का ज़ार-समर्थक वर्ग बने। 1911 में उसकी हत्या हो गई और सुधार अधूरे रहे।

ड्यूमा की तालिका का अर्थ: ज़ार ने 1905 में संसद देने का वादा डर के मारे किया था; जैसे ही सेना मोर्चे से लौटी और ख़तरा टला, उसने वादा खोखला कर दिया। पहली दो ड्यूमा ने ज़मीन किसानों को देने जैसी माँगें उठाईं, तो उन्हें हफ़्तों में भंग कर दिया गया। फिर चुनाव का क़ानून ऐसा बदला गया कि एक ज़मींदार का वोट सैकड़ों किसानों के वोट के बराबर हो गया; इसलिए तीसरी और चौथी ड्यूमा में ज़ार के समर्थक ही भरे थे। जनता ने इससे यह सीखा कि वोट और संसद के रास्ते से इस शासन में कुछ नहीं बदलेगा।

📌 1905 का महत्व

(1) ज़ार की "पिता-छवि" हमेशा के लिए टूटी; (2) सोवियत जैसी क्रांतिकारी संस्था का जन्म; (3) क्रांतिकारियों को सीख — सेना का साथ और संगठित दल के बिना क्रांति सफल नहीं होगी; (4) सुधारों के अधूरे वादों ने जनता का संवैधानिक रास्ते से विश्वास उठा दिया।

4. दीर्घकालिक राजनीतिक कारण

चित्र 2: रूसी क्रांति के कारण — दीर्घकालिक "बारूद" और युद्ध की "चिंगारी"

चित्र 2: रूसी क्रांति के कारण — दीर्घकालिक "बारूद" और युद्ध की "चिंगारी"

A. ज़ारशाही की निरंकुशता

◆ ज़ार स्वयं को "ईश्वर का प्रतिनिधि" और किसी के प्रति उत्तरदायी न मानने वाला एकाधिपति समझता था; नागरिकों के कोई अधिकार नहीं, विरोधियों को साइबेरिया निर्वासन।

◆ गुप्त पुलिस "ओखराना", कठोर सेंसरशिप, नौकरशाही में भ्रष्टाचार।

◆ 1905 के बाद भी ड्यूमा को वास्तविक शक्ति नहीं — जनता का संवैधानिक सुधारों से विश्वास ख़त्म।

B. निकोलस द्वितीय, ज़ारीना और रासपुतिन

◆ निकोलस द्वितीय: सौम्य पारिवारिक व्यक्ति, पर दुर्बल, अंधविश्वासी और अनिर्णायक शासक; इतिहासकार फ़िशर के शब्दों में उसमें घटनाओं के महत्व और व्यक्तियों के चरित्र को समझने की क्षमता नहीं थी।

◆ ज़ारीना अलेक्ज़ांड्रा (जर्मन मूल की) — निरंकुशता की कट्टर समर्थक; पति पर गहरा प्रभाव।

◆ ग्रिगोरी रासपुतिन — साइबेरियाई किसान-"साधु"; युवराज अलेक्सेई के हीमोफ़ीलिया (रक्तस्राव रोग) को "ठीक करने" के दावे से ज़ारीना का विश्वासपात्र बना; 1915 के बाद मंत्रियों की नियुक्ति-बर्ख़ास्तगी तक में दख़ल — राजवंश की भारी बदनामी; दिसंबर 1916 में कुलीनों ने उसकी हत्या कर दी।

C. रूसीकरण की नीति (Russification)

◆ रूसी साम्राज्य में आधे से अधिक लोग ग़ैर-रूसी थे — पोल, फ़िन, यहूदी, यूक्रेनी, जॉर्जियाई, आर्मेनियाई, तातार, उज़्बेक, कज़ाख आदि।

◆ विशेषकर अलेक्ज़ेंडर तृतीय और निकोलस द्वितीय के काल में "एक ज़ार, एक धर्म, एक भाषा" की नीति — रूसी भाषा और रूढ़िवादी चर्च थोपे गए, स्थानीय भाषाओं-स्कूलों पर रोक, यहूदियों पर पोग्रोम।

◆ परिणाम — अल्पसंख्यक जातियाँ ज़ारशाही की शत्रु बनीं; 1905 में पोलैंड, जॉर्जिया, बाल्टिक में विद्रोह; कई क्रांतिकारी नेता (स्टालिन — जॉर्जियाई, ट्रॉट्स्की — यहूदी) इन्हीं समुदायों से आए।

D. विदेश नीति में लगातार अपमान

◆ क्रीमिया युद्ध (1853–56) में हार, रूस-जापान युद्ध (1904–05) में हार, और फिर प्रथम विश्व युद्ध में लगातार पराजय — हर हार ने ज़ारशाही की साख गिराई।

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5. आर्थिक और सामाजिक कारण

A. किसानों की दयनीय दशा

◆ रूस की लगभग 80% जनता किसान थी; 1861 की मुक्ति के बाद भी ज़मीन कम, मुक्ति-भुगतान का बोझ और "मीर" की बेड़ियाँ।

◆ भूमि-असमानता: 19वीं सदी के अंत में लगभग 30 हज़ार बड़े ज़मींदारों के पास लगभग 7 करोड़ देस्यातिना भूमि थी, जबकि लगभग 1 करोड़ किसान परिवारों के पास लगभग 7.5 करोड़ देस्यातिना (1 देस्यातिना ≈ 2.7 एकड़) — बड़ी संख्या में किसान परिवारों के पास गुज़ारे लायक़ ज़मीन नहीं थी।

◆ पुराने औज़ार, बार-बार अकाल (1891–92 का भीषण अकाल), भारी कर — किसानों की एकमात्र माँग थी: "ज़मीन जोतने वाले की"।

B. मज़दूरों का शोषण

◆ 1890 के दशक में वित्त मंत्री विट्टे के नेतृत्व में विदेशी (विशेषकर फ्रांसीसी) पूँजी से तेज़ औद्योगीकरण — पर उद्योग कुछ ही शहरों में सिमटे रहे; इतिहासकार जे. एम. रॉबर्ट्स के शब्दों में वे "कृषि के विशाल सागर में द्वीप" थे।

◆ 11–12 घंटे का काम, बहुत कम मज़दूरी, गंदी बस्तियाँ, मज़दूर संघ बनाने और हड़ताल पर रोक।

◆ केंद्रित मज़दूर वर्ग: पेत्रोग्राद और मास्को के विशाल कारख़ानों (जैसे पुतिलोव कारख़ाना — हज़ारों मज़दूर) में एक जगह जमा मज़दूरों ने जल्दी संगठित शक्ति बना ली — यही बोल्शेविकों का मुख्य आधार बने।

C. सामाजिक असमानता

वर्ग

स्थिति

कुलीन और ज़मींदार

विशाल जागीरें, ऊँचे पद, कर-छूट — सारे अधिकार, कोई ज़िम्मेदारी नहीं; ज़ार के प्रबल समर्थक

रूढ़िवादी चर्च

विशाल संपत्ति; ज़ारशाही का वैचारिक स्तंभ

मध्यम वर्ग (उद्योगपति, व्यापारी, पेशेवर)

छोटा पर शिक्षित वर्ग; संवैधानिक राजतंत्र और उदार सुधार चाहता था — कैडेट और अक्टूबरवादी दल

किसान और मज़दूर

जनसंख्या का विशाल बहुमत — अधिकारहीन, ग़रीब, शोषित

रूसी समाज की यह स्थिति लगभग वैसी ही थी जैसी 1789 से पहले के फ्रांस की — विशेषाधिकार-प्राप्त अल्पसंख्यक बनाम अधिकारहीन बहुसंख्यक।

तालिका का सार: रूसी समाज एक ऐसे पिरामिड जैसा था जिसका ऊपरी सिरा बहुत छोटा और बहुत धनी था, और नीचे का विशाल आधार बहुत ग़रीब। सबसे ज़रूरी बात यह है कि इसका बीच का हिस्सा बहुत पतला था। पश्चिमी यूरोप में व्यापारियों, वकीलों और दुकानदारों का बड़ा मध्यम वर्ग था, जो धीरे-धीरे सुधार करवाता गया। रूस में ऐसा वर्ग छोटा और कमज़ोर था; उद्योग भी अधिकतर विदेशी पूँजी और सरकारी ठेकों से चलते थे, इसलिए कारख़ाना-मालिक सरकार से टकराने की हिम्मत नहीं करते थे। नतीजा — जब ऊपर और नीचे की टक्कर हुई, तो बीच में सँभालने वाला कोई नहीं था।

6. वैचारिक कारण, राजनीतिक दल और साहित्य

मार्क्सवाद की बुनियाद — जिसके बिना यह अध्याय समझ नहीं आता

रूसी क्रांति करने वाले लोग कार्ल मार्क्स के विचारों को मानते थे। इसलिए पहले यह समझ लीजिए कि मार्क्स ने कहा क्या था।

1. समाज की नींव अर्थव्यवस्था है। किसी भी युग में सबसे ज़रूरी प्रश्न यह है कि चीज़ें कैसे पैदा होती हैं और उत्पादन के साधनों (ज़मीन, कारख़ाने) का मालिक कौन है। क़ानून, राजनीति और विचार इसी नींव पर खड़े होते हैं और मालिकों के हित की रक्षा करते हैं।

2. इतिहास वर्गों के टकराव से आगे बढ़ता है। हर युग में दो मुख्य वर्ग रहे हैं — एक जो साधनों का मालिक है, दूसरा जो काम करता है। पहले मालिक और ग़ुलाम, फिर सामंत और किसान, अब पूँजीपति और मज़दूर। इनके टकराव से ही पुरानी व्यवस्था टूटती और नई बनती है।

3. मुनाफ़ा मज़दूर की बिना चुकाई मेहनत है। मज़दूर दिन भर में जितने मूल्य का माल बनाता है, उसे उससे बहुत कम मज़दूरी मिलती है; यही अंतर मालिक का मुनाफ़ा है।

4. पूँजीवाद अपनी क़ब्र ख़ुद खोदता है। कारख़ाने बढ़ेंगे तो मज़दूरों की संख्या बढ़ेगी; वे एक जगह इकट्ठे होंगे, संगठित होंगे, और एक दिन क्रांति करके साधनों को सबकी साझी संपत्ति बना देंगे।

5. क्रम तय है। समाज सामंतवाद से पूँजीवाद में और फिर पूँजीवाद से समाजवाद में जाएगा। इसलिए समाजवादी क्रांति सबसे पहले वहाँ होगी जहाँ पूँजीवाद सबसे अधिक विकसित है — यानी ब्रिटेन या जर्मनी जैसे औद्योगिक देशों में।

▶ फिर क्रांति पिछड़े रूस में कैसे हुई? — लेनिन ने क्या बदला

यहीं सबसे बड़ी पहेली है। मार्क्स के हिसाब से रूस क्रांति के लिए सबसे कम तैयार देश था: वहाँ हर पाँच में से चार लोग किसान थे और कारख़ाने गिने-चुने शहरों में थे। लेनिन ने मार्क्स के विचारों को रूस की हालत के अनुसार चार जगह बदला; इसी बदले हुए रूप को मार्क्सवाद-लेनिनवाद कहते हैं।

प्रश्न

मार्क्स की धारणा

लेनिन का उत्तर

क्रांति कौन करेगा?

मज़दूर वर्ग अपने अनुभव से ख़ुद जागेगा और उठ खड़ा होगा

मज़दूर अपने-आप केवल मज़दूरी बढ़वाने तक सोचता है; उसे क्रांति तक ले जाने के लिए पूरा समय देने वाले, अनुशासित क्रांतिकारियों का छोटा दल चाहिए — अग्रदल

किसान की भूमिका?

किसान पिछड़ा वर्ग है; क्रांति में उसकी भूमिका गौण

रूस में मज़दूर थोड़े हैं; ग़रीब किसान को साथ लिए बिना क्रांति नहीं होगी — मज़दूर-किसान गठबंधन

क्रांति कहाँ होगी?

सबसे विकसित पूँजीवादी देश में

पूँजीवाद अब पूरी दुनिया में फैली ज़ंजीर है; वह वहाँ टूटेगी जहाँ उसकी कड़ी सबसे कमज़ोर है — यानी रूस में

बीच का चरण?

पहले लंबा पूँजीवादी-लोकतांत्रिक दौर ज़रूरी

रूस का पूँजीपति वर्ग इतना कमज़ोर है कि वह यह दौर चला ही नहीं सकता; इसलिए सीधे समाजवादी क्रांति की ओर बढ़ो

इन चार बातों को समझ लेने पर आगे के सारे झगड़े साफ़ हो जाते हैं: बोल्शेविक और मेन्शेविक क्यों अलग हुए, 1917 में बाक़ी समाजवादी सत्ता लेने से क्यों हिचके, और लेनिन ने क्यों कहा कि इंतज़ार मत करो।

A. प्रमुख राजनीतिक दल

दल

स्थापना / नेता

विचारधारा

जनाधार

समाजवादी क्रांतिकारी (एस.आर. — Socialist Revolutionaries)

1901; विक्टर चेर्नोव, केरेंस्की (इसी धारा से)

नरोदनिक परंपरा — भूमि किसानों को; कृषक-समाजवाद; कभी-कभी आतंकवादी तरीक़े

किसान — संख्या में सबसे बड़ा दल

रूसी सामाजिक लोकतांत्रिक मज़दूर दल

1898, मिन्स्क; 1903 में दो धड़ों में विभाजन

मार्क्सवाद — क्रांति का वाहक औद्योगिक सर्वहारा

शहरी मज़दूर, बुद्धिजीवी

↳ बोल्शेविक ("बहुमत वाले")

लेनिन

छोटा, अनुशासित पेशेवर क्रांतिकारियों का दल; तुरंत समाजवादी क्रांति; सर्वहारा का अधिनायकत्व

संगठित औद्योगिक मज़दूर, सैनिक-नाविक

↳ मेन्शेविक ("अल्पमत वाले")

जूलियस मार्तोव

खुला, जन-आधारित दल; पहले पूँजीवादी-लोकतांत्रिक चरण, फिर धीरे-धीरे समाजवाद

उदार समाजवादी, कुशल मज़दूर

संवैधानिक लोकतांत्रिक दल (कैडेट)

1905; पावेल मिल्युकोव

उदारवाद — संवैधानिक राजतंत्र, नागरिक अधिकार

मध्यम वर्ग, पेशेवर

अक्टूबरवादी (Octobrists)

1905; अलेक्ज़ेंडर गुचकोव

अक्टूबर घोषणा-पत्र से संतुष्ट; ज़ार के साथ सीमित सुधार

उद्योगपति, उदार ज़मींदार

▶ दलों को पहचानने का आसान तरीक़ा

इन पाँचों दलों को दो प्रश्नों से अलग किया जा सकता है। पहला — ज़ार का क्या हो? अक्टूबरवादी चाहते थे कि ज़ार बना रहे और थोड़े सुधार हो जाएँ; कैडेट चाहते थे कि ज़ार ब्रिटेन के राजा की तरह केवल नाम का रह जाए; तीनों समाजवादी दल ज़ार को पूरी तरह हटाना चाहते थे। दूसरा — ज़मीन और कारख़ानों का क्या हो? पहले दो दल निजी संपत्ति को छेड़ना नहीं चाहते थे; समाजवादी दल उसे बदलना चाहते थे। समाजवादियों में फ़र्क़ यह था कि समाजवादी क्रांतिकारी दल किसानों का दल था और उसका सारा ज़ोर ज़मीन पर था, जबकि बोल्शेविक और मेन्शेविक मार्क्सवादी थे और उनका ज़ोर शहर के मज़दूर पर।

B. बोल्शेविक-मेन्शेविक विभाजन (1903)

◆ रूसी सामाजिक लोकतांत्रिक मज़दूर दल की दूसरी कांग्रेस (जुलाई–अगस्त 1903) ब्रसेल्स में शुरू होकर लंदन में पूरी हुई; मुद्दा था — दल की सदस्यता किसे मिले।

◆ लेनिन: सदस्य वही जो दल के किसी संगठन में सक्रिय रूप से काम करे — "पेशेवर क्रांतिकारियों का अग्रदल" (Vanguard Party); उनकी पुस्तिका "क्या करें?" (1902) इसी विचार पर थी।

◆ मार्तोव: दल का समर्थन और सहयोग करने वाला हर व्यक्ति सदस्य — खुला, व्यापक दल।

◆ एक मतदान में लेनिन के गुट को बहुमत मिला — रूसी में "बोल्शिन्स्त्वो" → बोल्शेविक; अल्पमत — "मेन्शिन्स्त्वो" → मेन्शेविक। (वास्तव में 1917 के आरंभ तक रूस में मेन्शेविकों का प्रभाव अधिक था — "बहुमत" नाम एक मतदान से मिला था।)

🔴 बोल्शेविक (लेनिन)

⚪ मेन्शेविक (मार्तोव)

◆ छोटा, गुप्त, अनुशासित अग्रदल

◆ पूँजीवादी चरण को लाँघकर सीधे समाजवादी क्रांति

◆ मज़दूर + ग़रीब किसान का गठबंधन

◆ उदारवादियों से कोई समझौता नहीं

◆ सशस्त्र विद्रोह से सत्ता

◆ खुला, जन-आधारित दल

◆ पहले पूँजीवादी-लोकतांत्रिक क्रांति, फिर समाजवाद

◆ मुख्य आधार शहरी मज़दूर

◆ उदारवादियों से सहयोग संभव

◆ संवैधानिक, क्रमिक मार्ग

▶ यह झगड़ा केवल सदस्यता के नियम का नहीं था

ऊपर से देखने पर 1903 का विवाद एक छोटे-से नियम पर था — दल का सदस्य किसे माना जाए। पर इसके पीछे दो बिलकुल अलग सोच थीं। मार्तोव ऐसा दल चाहता था जैसा जर्मनी में था: लाखों सदस्यों वाला, खुला, चुनाव लड़ने वाला। लेनिन कहता था कि रूस जर्मनी नहीं है; यहाँ खुला दल बनाओगे तो अगले ही दिन पुलिस के जासूस उसमें भर जाएँगे और सब नेता साइबेरिया में होंगे। इसलिए दल छोटा, गुप्त और फ़ौज की तरह अनुशासित हो, जिसका हर सदस्य अपना पूरा जीवन इसी काम को दे।

इसी सोच का फ़र्क़ 1917 में निर्णायक बना। मेन्शेविक मार्क्स के क्रम को अक्षरशः मानते थे: अभी "बुर्जुआ" क्रांति का समय है, इसलिए सत्ता उदारवादियों को चलानी चाहिए और समाजवादियों को बाहर से दबाव डालना चाहिए। बोल्शेविकों ने कहा — मौक़ा सामने है, सत्ता ले लो। जिस दल के पास अनुशासित संगठन और साफ़ लक्ष्य था, वही जीता।

C. विचारक और साहित्यकार

व्यक्ति

रचना / विचार

योगदान

कार्ल मार्क्स

"कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र" (1848), "दास कैपिटल" (1867)

वर्ग-संघर्ष, ऐतिहासिक भौतिकवाद — क्रांति का वैचारिक आधार

मिखाइल बाकुनिन, प्योत्र क्रोपोत्किन

अराजकतावाद (Anarchism)

राज्य सहित हर सत्ता का विरोध

इवान तुर्गनेव

"पिता और पुत्र" (1862)

शून्यवाद (Nihilism) शब्द लोकप्रिय — परंपरा, धर्म, सत्ता का निषेध

फ़्योदोर दोस्तोयेव्स्की

"अपराध और दंड", "करामाज़ोव बंधु"

मनुष्य, नैतिकता और पीड़ा के गहरे प्रश्न; रूसी समाज का यथार्थ

लियो टॉल्सटॉय

"युद्ध और शांति", "आन्ना करेनिना"

कुलीन समाज की आलोचना, किसानों के प्रति सहानुभूति; अहिंसा के विचारक — गांधी पर गहरा प्रभाव

मैक्सिम गोर्की

"माँ" (1906)

मज़दूरों के संघर्ष का चित्रण — समाजवादी यथार्थवाद के अग्रदूत

अंतोन चेख़व

कहानियाँ, नाटक

पतनशील कुलीन और मध्यम वर्ग का चित्रण

◆ इन लेखकों ने सीधे क्रांति का आह्वान भले न किया हो, पर रूसी जीवन की पीड़ा, अन्याय और खोखलेपन को उजागर कर शिक्षित वर्ग में राजनीतिक चेतना जगाई। इतिहासकार फ़िशर के अनुसार समाजवादी प्रचार ने मज़दूरों में ज़ारशाही के प्रति गहरा असंतोष और घृणा भर दी।

साहित्य की भूमिका को समझें: ज़ार के रूस में न स्वतंत्र अख़बार थे, न संसद, न राजनीतिक सभा की छूट। ऐसे देश में उपन्यास ही वह जगह थी जहाँ समाज के प्रश्नों पर बहस हो सकती थी, क्योंकि कहानी के पात्रों के मुँह से कही गई बात को पकड़ना सेंसर के लिए कठिन था। इसीलिए रूस में लेखक को समाज का अंतःकरण माना जाता था। तुर्गनेव ने उस युवा पीढ़ी का चित्र खींचा जो किसी भी पुरानी मान्यता को बिना जाँचे मानने को तैयार नहीं थी (इसी रवैये को शून्यवाद कहा गया)। टॉल्सटॉय ने, जो ख़ुद बड़ा ज़मींदार था, कुलीनों के खोखले जीवन के सामने किसान की सादगी को रखा। गोर्की ने पहली बार एक मज़दूर माँ को उपन्यास की नायिका बनाया। अराजकतावादी विचारक इन सबसे आगे जाकर कहते थे कि केवल ज़ार ही नहीं, हर तरह की सरकार दमन का औज़ार है और उसे मिटना चाहिए।

📌 भारत से जुड़ाव — टॉल्सटॉय और गांधी

टॉल्सटॉय की पुस्तक "ईश्वर का राज्य तुम्हारे भीतर है" ने युवा गांधी को गहराई से प्रभावित किया; टॉल्सटॉय ने 1908 में "एक हिंदू को पत्र" लिखा, दोनों में पत्र-व्यवहार हुआ, और गांधी ने 1910 में दक्षिण अफ्रीका में "टॉल्सटॉय फ़ार्म" बसाया।

7. तात्कालिक कारण — प्रथम विश्व युद्ध

कई इतिहासकार मानते हैं कि रूसी क्रांति प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) का प्रत्यक्ष परिणाम थी — युद्ध ने ज़ारशाही की सारी कमज़ोरियों को एक साथ उजागर कर विस्फोट करा दिया। दीर्घकालिक कारणों ने बारूद तैयार किया था, युद्ध ने चिंगारी दी।

◆ उत्साह से निराशा: अगस्त 1914 में रूस मित्र राष्ट्रों (ब्रिटेन-फ्रांस) की ओर से युद्ध में उतरा; ड्यूमा के लगभग सभी दलों ने समर्थन किया — केवल बोल्शेविक विरोध में थे। देशभक्ति में सेंट पीटर्सबर्ग का जर्मन-ध्वनि वाला नाम बदलकर "पेत्रोग्राद" किया गया।

◆ भारी पराजय: टैननबर्ग (अगस्त 1914) और मसूरियन झीलों (सितंबर 1914) पर करारी हार; 1915 में पोलैंड हाथ से निकला; युद्ध में लगभग 1.5 करोड़ सैनिक भेजे गए — 17 लाख से अधिक मरे, लाखों घायल-बंदी।

◆ ज़ार स्वयं सेनापति (सितंबर 1915): हर हार की ज़िम्मेदारी सीधे ज़ार पर; राजधानी में शासन ज़ारीना और रासपुतिन के हाथ — मंत्रियों की अदला-बदली से प्रशासन अराजक।

◆ सेना की दुर्दशा: हथियार, गोला-बारूद, जूते, भोजन की भारी कमी; कई सैनिक बिना राइफ़ल के मोर्चे पर भेजे गए — सेना का मनोबल टूटा, सैनिक भागने लगे।

◆ आर्थिक संकट: खेत-मज़दूर मोर्चे पर गए — कृषि उत्पादन गिरा; रेल-व्यवस्था सेना में लगी — शहरों तक अनाज-ईंधन नहीं पहुँचा; सरकार ने अंधाधुंध नोट छापे — भारी महँगाई, कालाबाज़ारी, जमाख़ोरी।

◆ 1916–17 की भीषण सर्दी: पेत्रोग्राद में रोटी के लिए घंटों लंबी क़तारें; अनाज, ईंधन, कपड़े का अभाव — यही फ़रवरी क्रांति का तात्कालिक कारण बना।

रूस इस युद्ध में गया क्यों? यूरोप उस समय दो गुटों में बँटा था। रूस का फ्रांस और ब्रिटेन से गठबंधन था; दूसरी ओर जर्मनी और ऑस्ट्रिया-हंगरी थे। रूस अपने को बाल्कन के स्लाव लोगों का, ख़ासकर छोटे देश सर्बिया का, संरक्षक मानता था। जब 1914 में ऑस्ट्रिया ने सर्बिया पर हमला किया, तो रूस ने सेना जुटानी शुरू कर दी, और जर्मनी ने रूस पर युद्ध घोषित कर दिया। ज़ार को उम्मीद थी कि एक छोटा, विजयी युद्ध देश को उसके पीछे एकजुट कर देगा और 1905 की यादें मिटा देगा। हुआ ठीक उलटा: एक पिछड़ा, खेतिहर देश यूरोप की सबसे आधुनिक औद्योगिक सेना से तीन साल लड़ा, और इसी बोझ से टूट गया।

💡 क्रिकेट की भाषा में

राजस्थान की टीम एक बड़े टूर्नामेंट में लगातार हार रही है। कप्तान (ज़ार) ने ख़ुद कोचिंग संभाल ली — और हारें बढ़ गईं। खिलाड़ियों के पास ढंग के बल्ले-जूते तक नहीं, घर में परिवार भूखा है। एक दिन खिलाड़ी कह देते हैं — "अब नहीं खेलेंगे!" फ़रवरी 1917 में रूसी सैनिकों ने ठीक यही किया — अफ़सरों का आदेश मानने के बजाय जनता का साथ दिया।

8. फ़रवरी (मार्च) क्रांति 1917 — ज़ारशाही का अंत

तिथि (नई)

घटना

महत्व

8 मार्च

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस — पेत्रोग्राद की कपड़ा मिलों की महिला मज़दूरों की हड़ताल; "रोटी दो", "युद्ध बंद करो"

क्रांति का आरंभ — महिलाओं की अग्रणी भूमिका

9–10 मार्च

पुरुष मज़दूर भी शामिल; पूरे शहर में आम हड़ताल; "निरंकुशता का नाश हो" के नारे

आर्थिक माँग → राजनीतिक आंदोलन

11 मार्च

ज़ार ने गोली चलाने और ड्यूमा भंग करने का आदेश दिया

दमन का अंतिम प्रयास

12 मार्च

राजधानी की सैनिक टुकड़ियों ने विद्रोह कर जनता का साथ दिया; शस्त्रागार लूटे, बंदी छुड़ाए; पेत्रोग्राद सोवियत का गठन; ड्यूमा की अस्थायी समिति

निर्णायक मोड़ — सेना जनता के साथ

14 मार्च

सोवियत का "आदेश संख्या 1" — सैनिक अपनी समितियाँ बनाएँ, हथियार उनके नियंत्रण में; सैन्य आदेश तभी मान्य जब सोवियत से मेल खाए

सेना पर अस्थायी सरकार की पकड़ कमज़ोर

15 मार्च

प्रिंस ल्वोव के नेतृत्व में अस्थायी सरकार; ज़ार निकोलस द्वितीय ने अपने और पुत्र की ओर से भाई ग्रैंड ड्यूक माइकल के पक्ष में सिंहासन त्यागा

रोमानोव वंश का अंत (1613–1917)

16 मार्च

माइकल ने भी गद्दी स्वीकार करने से इनकार किया

रूस में राजतंत्र समाप्त

◆ स्वरूप: यह क्रांति स्वतःस्फूर्त थी — किसी दल ने इसकी योजना नहीं बनाई; बोल्शेविक नेता उस समय जेल, निर्वासन या विदेश में थे। अपेक्षाकृत कम रक्तपात (लगभग 1,300–1,500 मौतें) हुआ।

◆ पेत्रोग्राद का इस क्रांति में वही स्थान था जो फ्रांसीसी क्रांति में पेरिस का।

▶ तालिका के पीछे की कहानी — सैनिकों ने पाला क्यों बदला?

हड़तालें और रोटी के दंगे रूस में पहले भी हुए थे और हर बार सेना ने उन्हें कुचल दिया था। 1917 में अंतर केवल एक था: सेना ने गोली चलाने से मना कर दिया। इसका कारण यह था कि तीन साल के युद्ध में पुरानी, प्रशिक्षित सेना का बड़ा हिस्सा मोर्चे पर मारा जा चुका था। राजधानी की बैरकों में अब जो सैनिक थे, वे हाल ही में गाँवों और कारख़ानों से जबरन भर्ती किए गए अधेड़ किसान और जवान मज़दूर थे, जो अगली बारी में मोर्चे पर भेजे जाने का इंतज़ार कर रहे थे। उनमें और सड़क की भीड़ में कोई फ़र्क़ नहीं था।

जब उन्हें निहत्थी औरतों और मज़दूरों पर गोली चलाने का आदेश मिला, तो एक रेजिमेंट ने रात भर बहस की और सुबह अपने अफ़सर के विरुद्ध खड़ी हो गई। उसके बाद विद्रोह आग की तरह फैला। ज़ार ने मोर्चे से भरोसेमंद टुकड़ियाँ भेजनी चाहीं, पर रेल-मज़दूरों ने गाड़ियाँ रोक दीं। अंत में ज़ार के अपने सेनापतियों ने उससे कहा कि सेना को बचाना है तो आप गद्दी छोड़ दें। जिस शासन की रक्षा के लिए न सेना तैयार हो, न सेनापति, वह एक दिन भी नहीं टिकता।

अस्थायी सरकार — मंत्रिमंडल और सुधार

◆ प्रधानमंत्री — प्रिंस ग्योर्गी ल्वोव; विदेश मंत्री — मिल्युकोव (कैडेट); युद्ध मंत्री — गुचकोव (अक्टूबरवादी); न्याय मंत्री — अलेक्ज़ेंडर केरेंस्की (समाजवादी — एकमात्र, जो सोवियत के भी उपाध्यक्ष थे); वित्त — तेरेशचेंको।

◆ सुधार: राजनीतिक बंदियों की रिहाई, निर्वासितों की वापसी, भाषण-प्रेस-सभा की स्वतंत्रता, मृत्युदंड समाप्त, धार्मिक-जातीय भेदभाव का अंत, संविधान सभा के चुनाव का वादा; जुलाई 1917 में महिलाओं को मताधिकार — दुनिया के शुरुआती देशों में।

“ज़ार से सत्ता मज़दूरों ने छीनी थी, पर उन्होंने तुरंत उसे मध्यम वर्ग को सौंप दिया।” (फ़रवरी क्रांति पर इतिहासकारों की प्रचलित टिप्पणी)

9. दोहरी सत्ता, अप्रैल थीसिस और कोर्निलोव प्रकरण

A. दोहरी सत्ता (Dual Power)

फ़रवरी क्रांति के बाद रूस में दो सत्ता-केंद्र बन गए — औपचारिक सत्ता अस्थायी सरकार के पास, पर वास्तविक शक्ति (मज़दूर, सैनिक, रेल, टेलीग्राफ़) पेत्रोग्राद सोवियत के पास। लेनिन ने इसे "दोहरी सत्ता" कहा।

🏛️ अस्थायी सरकार

⚒️ पेत्रोग्राद सोवियत

◆ ड्यूमा के उदारवादी — कैडेट, अक्टूबरवादी; बाद में उदार समाजवादी

◆ मित्र राष्ट्रों के साथ युद्ध जारी रखना

◆ भूमि-सुधार जैसे बड़े फ़ैसले संविधान सभा तक टालना

◆ मध्यम वर्ग, उद्योगपति, अफ़सरों का प्रतिनिधित्व

◆ काग़ज़ी सत्ता — पर सेना-जनता पर पकड़ नहीं

◆ मज़दूरों और सैनिकों के चुने प्रतिनिधि — शुरू में मेन्शेविक-एस.आर. बहुमत

◆ "न विलय, न हर्जाना" वाली तुरंत शांति

◆ ज़मीन किसानों को, कारख़ानों पर मज़दूर-नियंत्रण

◆ आदेश संख्या 1 से सेना पर प्रभाव

◆ धीरे-धीरे बोल्शेविक प्रभाव बढ़ा

◆ अस्थायी सरकार की विफलता: (1) युद्ध जारी रखा — जनता सबसे ज़्यादा शांति चाहती थी; (2) भूमि-सुधार टाला — किसान ख़ुद ज़मीनें छीनने लगे; (3) रोटी और महँगाई की समस्या नहीं सुलझी; (4) संविधान सभा के चुनाव में देरी।

◆ मिल्युकोव नोट संकट (मई 1917): विदेश मंत्री ने मित्र राष्ट्रों को "युद्ध के लक्ष्य पूरे करने" का आश्वासन दिया — जन-आक्रोश, मिल्युकोव-गुचकोव को इस्तीफ़ा देना पड़ा; सरकार में समाजवादी मंत्री आए।

▶ दो सरकारें एक साथ कैसे चलीं — और सोवियत ने सत्ता ख़ुद क्यों नहीं ली?

मार्च 1917 में एक ही महल के दो हिस्सों में दो संस्थाएँ बैठी थीं। एक में ड्यूमा के नेता थे, जिन्होंने अपने को सरकार घोषित कर दिया था; उनके पास मंत्रालय, दफ़्तर और विदेशी सरकारों की मान्यता थी। दूसरे में सोवियत थी; उसके पास कोई पद नहीं था, पर सैनिक, रेल-मज़दूर और डाक-तार के कर्मचारी उसी की बात मानते थे। सरकार कोई आदेश तभी लागू करवा पाती थी जब सोवियत उसका विरोध न करे। एक मंत्री ने ख़ुद माना कि सरकार के पास कोई असली शक्ति नहीं है।

फिर सोवियत ने सत्ता अपने हाथ में क्यों नहीं ले ली? क्योंकि उस समय उसके नेता मेन्शेविक और समाजवादी क्रांतिकारी थे, और वे मार्क्स के बताए क्रम पर चल रहे थे: रूस अभी समाजवाद के लिए तैयार नहीं है; अभी उदारवादियों की बारी है। उन्हें यह डर भी था कि अगर समाजवादियों ने सत्ता ली, तो सेनापति और धनी वर्ग मिलकर गृहयुद्ध छेड़ देंगे। इसलिए उन्होंने अजीब स्थिति चुनी — ताक़त अपने पास, पर ज़िम्मेदारी दूसरों की। यह व्यवस्था टिक नहीं सकती थी। जनता की तीन माँगें — शांति, ज़मीन और रोटी — पूरी करने को कोई तैयार नहीं था, और जो दल इन्हें पूरा करने का वादा करे, मैदान उसी के लिए ख़ाली था।

चित्र 3: 1917 — फ़रवरी क्रांति से अक्टूबर क्रांति तक के प्रमुख पड़ाव

चित्र 3: 1917 — फ़रवरी क्रांति से अक्टूबर क्रांति तक के प्रमुख पड़ाव

B. लेनिन की वापसी और अप्रैल थीसिस

क्रांति के समय लेनिन स्विट्ज़रलैंड में निर्वासन में थे। जर्मनी ने रूस को युद्ध से बाहर करने की आशा में उन्हें और उनके साथियों को एक "सीलबंद रेलगाड़ी" (Sealed Train) से अपने क्षेत्र से गुज़रने दिया। 16 अप्रैल 1917 को वे पेत्रोग्राद के फ़िनलैंड स्टेशन पहुँचे और अगले दिन अपनी "अप्रैल थीसिस" प्रस्तुत की:

(क) युद्ध का अंत: यह "साम्राज्यवादी, लुटेरा युद्ध" है — तुरंत शांति, बिना विलय और हर्जाने के।

(ख) अस्थायी सरकार को कोई समर्थन नहीं — संसदीय गणतंत्र नहीं, सोवियतों का गणतंत्र; नारा — "सारी सत्ता सोवियतों को" (All Power to the Soviets)।

(ग) भूमि का राष्ट्रीयकरण — सभी ज़मींदारों की भूमि ज़ब्त कर स्थानीय किसान सोवियतों के नियंत्रण में।

(घ) सभी बैंकों को मिलाकर एक राष्ट्रीय बैंक, उस पर सोवियत नियंत्रण; उत्पादन-वितरण पर मज़दूरों का नियंत्रण।

(ङ) पुलिस, सेना और नौकरशाही का उन्मूलन; दल का नाम बदलकर "कम्युनिस्ट पार्टी"।

इसी से वह नारा निकला जिसने करोड़ों लोगों को जोड़ा — "शांति, भूमि और रोटी" (Peace, Land and Bread): शांति सैनिकों के लिए, भूमि किसानों के लिए, रोटी मज़दूरों के लिए। शुरू में बोल्शेविक नेता भी इन विचारों से चौंके, पर लेनिन ने जल्दी ही दल को अपने पक्ष में कर लिया।

अप्रैल थीसिस इतनी चौंकाने वाली क्यों थी? लेनिन के लौटने से पहले ख़ुद बोल्शेविक नेता भी, जिनमें स्टालिन शामिल था, अस्थायी सरकार को शर्तों के साथ समर्थन दे रहे थे। लेनिन ने स्टेशन पर उतरते ही यह पूरी नीति उलट दी। उसका तर्क सीधा था: यह सरकार पूँजीपतियों की है, इसलिए यह न युद्ध रोकेगी (क्योंकि युद्ध से उन्हें लाभ है), न ज़मीन देगी (क्योंकि ज़मींदार उनके साथी हैं)। इसलिए इसका समर्थन जनता से धोखा है। सत्ता सोवियतों को लेनी चाहिए, जो मज़दूरों और सैनिकों की अपनी संस्था है। पहले दिन उसके अपने साथियों ने इसे पागलपन कहा। पर हर बीतते महीने के साथ, जैसे-जैसे युद्ध चलता रहा और ज़मीन का फ़ैसला टलता रहा, जनता को लेनिन की बात सही लगने लगी।

C. जुलाई के दिन (16–17 जुलाई 1917)

◆ मोर्चे पर केरेंस्की आक्रमण (जून 1917, गैलिसिया) की विफलता के बाद पेत्रोग्राद में सैनिकों-मज़दूरों के सशस्त्र प्रदर्शन; सरकार ने दबा दिया।

◆ बोल्शेविकों पर "जर्मन एजेंट" होने का आरोप; ट्रॉट्स्की सहित कई नेता गिरफ़्तार; लेनिन और ज़िनोवियेव फ़िनलैंड भाग गए — बोल्शेविकों को बड़ा झटका।

◆ केरेंस्की प्रधानमंत्री बने (जुलाई 1917) — पर युद्ध जारी रखने से उनकी लोकप्रियता गिरती गई।

D. कोर्निलोव प्रकरण (सितंबर 1917)

◆ नए सेनापति जनरल लावर कोर्निलोव ने "व्यवस्था बहाल करने" के नाम पर सेना पेत्रोग्राद की ओर बढ़ाई — इसे सैन्य तख़्तापलट का प्रयास माना गया।

◆ घबराए केरेंस्की ने सोवियत और बोल्शेविकों से मदद माँगी; बोल्शेविकों के "लाल रक्षकों" (Red Guards) को हथियार दिए गए, जेल में बंद नेता छोड़े गए; रेल-मज़दूरों ने पटरियाँ रोकीं — कोर्निलोव का प्रयास बिना लड़े विफल।

◆ परिणाम: बोल्शेविक "क्रांति के रक्षक" बनकर उभरे, हथियार उनके पास रहे; सितंबर में पेत्रोग्राद और मास्को सोवियतों में बोल्शेविक बहुमत; ट्रॉट्स्की पेत्रोग्राद सोवियत के अध्यक्ष बने; केरेंस्की दक्षिणपंथ और वामपंथ — दोनों का विश्वास खो बैठे।

10. अक्टूबर (नवंबर) क्रांति 1917 — बोल्शेविक विजय

A. तैयारी

◆ फ़िनलैंड में छिपे लेनिन ने सितंबर के मध्य से पत्र लिखकर आग्रह किया कि सशस्त्र विद्रोह का समय आ गया है — "देरी मृत्यु के समान है"। अक्टूबर में वे वेश बदलकर गुप्त रूप से पेत्रोग्राद लौट आए।

◆ 23 अक्टूबर (पुराना — 10 अक्टूबर): बोल्शेविक केंद्रीय समिति ने विद्रोह का निर्णय किया (कामेनेव और ज़िनोवियेव ने विरोध किया)।

◆ ट्रॉट्स्की के नेतृत्व में पेत्रोग्राद सोवियत की सैन्य क्रांतिकारी समिति (Military Revolutionary Committee) ने राजधानी की सैनिक टुकड़ियों को अपने पक्ष में किया — विद्रोह की पूरी सैन्य योजना उसी ने बनाई। लक्ष्य था — दूसरी अखिल-रूसी सोवियत कांग्रेस से पहले सत्ता हथियाना।

B. क्रांति की रात (6–7 नवंबर 1917)

1. 6 नवंबर को सरकार ने बोल्शेविक अख़बार बंद करने और नेताओं की गिरफ़्तारी का आदेश दिया — यही संकेत बना।

2. रात में लाल रक्षकों, सैनिकों और नाविकों ने बिना ख़ास प्रतिरोध के टेलीफ़ोन केंद्र, डाकघर, बिजलीघर, रेलवे स्टेशन, पुल और राष्ट्रीय बैंक पर क़ब्ज़ा कर लिया।

3. 7 नवंबर की सुबह सैन्य क्रांतिकारी समिति ने घोषणा की — "अस्थायी सरकार अपदस्थ कर दी गई है"; केरेंस्की एक कार में राजधानी से भाग निकले (बाद में विदेश में रहे)।

4. शाम को युद्धपोत "अरोरा" ने खाली गोला दागकर संकेत दिया; रात में शीत प्रासाद पर धावा — 8 नवंबर की भोर में वहाँ छिपे मंत्री गिरफ़्तार।

5. दूसरी अखिल-रूसी सोवियत कांग्रेस (लगभग 650 प्रतिनिधियों में लगभग 390 बोल्शेविक) ने सत्ता हस्तांतरण को मान्यता दी; मेन्शेविक और दक्षिणपंथी एस.आर. विरोध में बहिर्गमन कर गए।

6. 8 नवंबर: लेनिन की अध्यक्षता में नई सरकार — "जन-कमिसार परिषद" (Council of People's Commissars — सोवनार्कोम); ट्रॉट्स्की — विदेश मामले, स्टालिन — राष्ट्रीयताएँ (जातियाँ), रयकोव — गृह।

राजधानी में सत्ता-परिवर्तन लगभग रक्तहीन रहा — पूरे शहर में गिनी-चुनी मौतें ही हुईं। पर मास्को में लगभग एक सप्ताह तक ख़ूनी लड़ाई हुई, और असली रक्तपात क्रांति के बाद — गृहयुद्ध में — हुआ।

⚠️ ध्यान दें — 1917 में लेनिन कहाँ थे?

कई जगह लिखा मिलता है कि लेनिन फ़रवरी और अक्टूबर, दोनों क्रांतियों के समय विदेश में थे और 7 नवंबर को ही लौटे। सही तथ्य: फ़रवरी क्रांति के समय वे स्विट्ज़रलैंड में थे और 16 अप्रैल 1917 को लौटे; जुलाई के बाद फ़िनलैंड में छिपे; और अक्टूबर में गुप्त रूप से पेत्रोग्राद लौटकर 7 नवंबर की रात स्मॉल्नी संस्थान (बोल्शेविक मुख्यालय) से विद्रोह का नेतृत्व किया।

C. फ़रवरी बनाम अक्टूबर क्रांति

आधार

फ़रवरी (मार्च) क्रांति

अक्टूबर (नवंबर) क्रांति

स्वरूप

स्वतःस्फूर्त, अनियोजित

नियोजित, संगठित — "नियोजित क्रांति"

नेतृत्व

कोई एक दल नहीं — भूखी जनता, महिलाएँ, सैनिक

बोल्शेविक दल — लेनिन और ट्रॉट्स्की

लक्ष्य

ज़ारशाही का अंत, रोटी, शांति

अस्थायी सरकार का अंत, समाजवादी राज्य

किसके विरुद्ध

ज़ार और रोमानोव वंश

अस्थायी सरकार (केरेंस्की)

परिणाम

उदारवादी अस्थायी सरकार + सोवियत — दोहरी सत्ता

सोवियत सत्ता, एकदलीय शासन की शुरुआत

प्रकृति

राजनीतिक (बुर्जुआ-लोकतांत्रिक) क्रांति

सामाजिक-आर्थिक (समाजवादी) क्रांति

◆ बोल्शेविकों की सफलता के कारण: (1) लेनिन का दृढ़ नेतृत्व और सही समय की पहचान; (2) अनुशासित दल और ट्रॉट्स्की की सैन्य योजना; (3) "शांति, भूमि, रोटी" — जनता की असली माँगों से जुड़ा नारा; (4) अस्थायी सरकार की भूलें — युद्ध जारी रखना, भूमि-सुधार टालना; (5) कोर्निलोव प्रकरण से मिली साख और हथियार; (6) विरोधियों की फूट।

📚 प्रसिद्ध पुस्तक

अमेरिकी पत्रकार जॉन रीड ने क्रांति को अपनी आँखों से देखकर "दस दिन जिन्होंने दुनिया हिला दी" (Ten Days That Shook the World, 1919) लिखी — लेनिन ने इसकी भूमिका लिखी थी।

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11. बोल्शेविक सरकार और ब्रेस्ट-लिटोव्स्क संधि

A. पहले आदेश (Decrees) — 8 नवंबर 1917 और उसके बाद

आदेश / निर्णय

मुख्य बातें

शांति का आदेश

सभी युद्धरत देशों से "बिना विलय, बिना हर्जाने" के तुरंत न्यायपूर्ण शांति की अपील; गुप्त कूटनीति का अंत

भूमि का आदेश

ज़मींदारों, चर्च और राजपरिवार की भूमि बिना मुआवज़े ज़ब्त; भूमि का निजी स्वामित्व समाप्त — उपयोग का अधिकार किसान समितियों/सोवियतों को

रूस की जनता के अधिकारों की घोषणा

सभी राष्ट्रीयताओं की समानता और आत्मनिर्णय — अलग होने तक का अधिकार (फ़िनलैंड दिसंबर 1917 में स्वतंत्र)

मज़दूर नियंत्रण

कारख़ानों के उत्पादन और हिसाब पर मज़दूर समितियों का नियंत्रण; 8 घंटे का कार्य-दिवस

राष्ट्रीयकरण

बैंक (दिसंबर 1917), फिर बड़े उद्योग, विदेशी व्यापार; ज़ार के विदेशी ऋण रद्द (1918)

चर्च और समाज

चर्च राज्य से पृथक (जनवरी 1918), शिक्षा चर्च से मुक्त; कुलीन पदवियाँ समाप्त; विवाह-तलाक़ नागरिक विषय; स्त्री-पुरुष समानता

चेका (दिसंबर 1917)

फ़ेलिक्स द्ज़ेर्ज़िंस्की के नेतृत्व में "प्रतिक्रांति और तोड़फोड़ से लड़ने वाला" गुप्त पुलिस-आयोग

▶ पहले आदेशों का अर्थ — तीनों वादे एक रात में

बोल्शेविकों ने सत्ता लेने के चौबीस घंटे के भीतर वे दो काम कर दिए जिन्हें अस्थायी सरकार आठ महीने तक टालती रही थी। शांति का आदेश करोड़ों सैनिकों के लिए था, जो अब घर लौट सकते थे। भूमि का आदेश करोड़ों किसानों के लिए था। इसमें एक बारीक बात है: किसान 1917 की गर्मियों से ही ज़मींदारों की ज़मीन पर ख़ुद क़ब्ज़ा कर रहे थे; आदेश ने इस क़ब्ज़े को क़ानूनी मुहर दे दी। लेनिन ने यह कार्यक्रम लगभग ज्यों का त्यों किसानों के दल, समाजवादी क्रांतिकारियों, से उठा लिया था। जब किसी ने यह आपत्ति की, तो उसका उत्तर था — इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है कि इसे किसने लिखा; जनता यही चाहती है।

इन आदेशों का राजनीतिक अर्थ बहुत बड़ा था। बोल्शेविक देश में अल्पमत में थे, पर इन दो आदेशों ने सैनिकों और किसानों को कम से कम इतना आश्वस्त कर दिया कि वे नई सरकार को गिराने के लिए नहीं लड़ेंगे। राष्ट्रीयताओं को अलग होने का अधिकार देकर ज़ार के साम्राज्य की ग़ैर-रूसी जातियों का समर्थन पाने की कोशिश की गई। और चेका की स्थापना ने पहले ही महीने में दिखा दिया कि नई सरकार अपने विरोधियों से कैसे निपटेगी।

B. संविधान सभा का अंत — एकदलीय शासन की शुरुआत

◆ नवंबर 1917 में संविधान सभा के चुनाव हुए — रूस का पहला स्वतंत्र आम चुनाव। परिणाम: समाजवादी क्रांतिकारी (एस.आर.) लगभग 40%, बोल्शेविक लगभग 24% (शहरों में बोल्शेविक आगे, गाँवों में एस.आर.)।

◆ सभा 18 जनवरी 1918 को बैठी और उसने बोल्शेविक आदेशों को मानने से इनकार किया; अगले ही दिन (19 जनवरी) लाल रक्षकों ने उसे भंग कर दिया।

◆ कैडेट दल पर प्रतिबंध, विरोधी अख़बार बंद — धीरे-धीरे कम्युनिस्ट पार्टी (1918 में यह नाम अपनाया) ही एकमात्र वैध दल रह गई। मार्च 1918 में राजधानी पेत्रोग्राद से मास्को ले जाई गई।

संविधान सभा को भंग करना क्यों निर्णायक मोड़ था? बोल्शेविक बरसों से माँग करते आए थे कि संविधान सभा चुनी जाए। जब चुनाव हुए, तो उन्हें शहरों और सेना में बहुमत मिला, पर गाँवों ने किसानों के दल को वोट दिया, और पूरे देश में बोल्शेविक चौथाई वोट ही पा सके। अब उनके सामने दो रास्ते थे: जनता का फ़ैसला मानकर सत्ता बाँटें, या सभा को हटा दें। लेनिन ने दूसरा रास्ता चुना। उसका तर्क था कि सोवियतें मज़दूरों की सीधी चुनी संस्था हैं और इसलिए संसद से ऊँचा लोकतंत्र हैं; और क्रांति के शत्रुओं को वोट के सहारे लौटने नहीं दिया जा सकता। सभा केवल एक दिन बैठ सकी। इसी क्षण से रूस में चुनाव से सरकार बदलने का रास्ता बंद हो गया, और आगे सत्ता का फ़ैसला बंदूक़ से होना तय हो गया।

C. ब्रेस्ट-लिटोव्स्क की संधि (3 मार्च 1918)

"शांति" का वादा पूरा करने के लिए बोल्शेविकों ने जर्मनी और उसके साथियों से वार्ता की। ट्रॉट्स्की ने "न युद्ध, न शांति" की नीति से वार्ता खींचनी चाही, तो जर्मनी ने फिर आक्रमण कर दिया। दल के भीतर भारी विरोध के बावजूद लेनिन ने कहा कि क्रांति बचाने के लिए यह "अपमानजनक शांति" भी स्वीकार करनी होगी — उन्हें विश्वास था कि जल्द ही जर्मनी में भी क्रांति होगी।

शर्त

विवरण

क्षेत्र का त्याग

पोलैंड, लिथुआनिया, लातविया (कूरलैंड, लिवोनिया), एस्टोनिया पर दावा छोड़ा; फ़िनलैंड और यूक्रेन की स्वतंत्रता मानी; बेलारूस का भाग

ओटोमन तुर्की को

काकेशस में कार्स, अर्दहान, बातुम

प्रचार पर रोक

जर्मनी और उसके मित्र देशों में क्रांतिकारी प्रचार नहीं

हर्जाना

अगस्त 1918 के पूरक समझौते में 6 अरब मार्क का भुगतान

रूस की हानि

लगभग एक-तिहाई जनसंख्या, लगभग एक-तिहाई कृषि-भूमि, आधे से अधिक उद्योग और लगभग 90% कोयला-खदानें

◆ महत्व: रूस प्रथम विश्व युद्ध से बाहर; बोल्शेविकों को सत्ता मज़बूत करने का समय मिला — पर मित्र राष्ट्र नाराज़ होकर गृहयुद्ध में हस्तक्षेप करने लगे; वामपंथी एस.आर. सरकार से अलग हुए।

◆ अंत: नवंबर 1918 में जर्मनी की हार के बाद सोवियत सरकार ने संधि रद्द कर दी; वर्साय संधि ने भी इसे अमान्य माना — पर पोलैंड, फ़िनलैंड और बाल्टिक देश स्वतंत्र ही रहे।

▶ लेनिन ने इतनी भारी क़ीमत क्यों चुकाई?

संधि की शर्तें इतनी कठोर थीं कि बोल्शेविक दल ख़ुद तीन हिस्सों में बँट गया। एक गुट चाहता था कि जर्मनी के विरुद्ध "क्रांतिकारी युद्ध" जारी रखा जाए। ट्रॉट्स्की बीच का रास्ता चाहता था — न लड़ें, न हस्ताक्षर करें। लेनिन अकेला था जो कहता था कि जो भी शर्त हो, मान लो। उसका तर्क यह था: हमारे पास सेना नहीं बची है; सैनिक ख़ुद मोर्चा छोड़कर ज़मीन लेने गाँव जा चुके हैं। अगर हम नहीं मानेंगे, तो जर्मन सेना राजधानी तक आ जाएगी और क्रांति ही ख़त्म हो जाएगी। ज़मीन तो बाद में वापस आ सकती है; सत्ता एक बार गई तो नहीं आएगी। उसने इसे "साँस लेने की मोहलत" कहा।

घटनाओं ने उसे सही सिद्ध किया: आठ महीने बाद जर्मनी ख़ुद युद्ध हार गया और यह संधि रद्द हो गई। पर इसकी क़ीमत भी चुकानी पड़ी। देशभक्त रूसी बोल्शेविकों को जर्मनी के हाथों बिका हुआ मानने लगे; सरकार में शामिल एकमात्र दूसरा दल अलग हो गया; और ब्रिटेन-फ्रांस, जो चाहते थे कि रूस जर्मनी से लड़ता रहे, बोल्शेविकों के शत्रुओं की मदद करने लगे।

12. गृहयुद्ध, चेका और युद्ध साम्यवाद (1918–1921)

बोल्शेविक सत्ता को ज़मींदारों, पूर्व ज़ारशाही अफ़सरों, उदारवादियों, विरोधी समाजवादियों और अलग होना चाहने वाली राष्ट्रीयताओं ने चुनौती दी। मई 1918 में चेकोस्लोवाक सेना के विद्रोह से पूरे देश में गृहयुद्ध छिड़ गया।

🔴 लाल सेना (बोल्शेविक)

⚪ श्वेत सेना (बोल्शेविक-विरोधी)

◆ संस्थापक और युद्ध-कमिसार — ट्रॉट्स्की (1918); अनिवार्य भर्ती, पूर्व ज़ारशाही अफ़सर "राजनीतिक कमिसारों" की निगरानी में

◆ केंद्रीकृत कमान, स्पष्ट विचारधारा, एक नेता

◆ रूस के केंद्र पर क़ब्ज़ा — मास्को, पेत्रोग्राद, रेल-केंद्र, कारख़ाने

◆ किसानों का परोक्ष समर्थन — गोरों की जीत = ज़मींदारों की वापसी

◆ विदेशी हस्तक्षेप को राष्ट्रवादी रंग देकर जन-समर्थन

◆ राजशाहीवादी, उदारवादी, कुछ समाजवादी — कोई साझा लक्ष्य नहीं

◆ अलग-अलग मोर्चे, अलग सेनापति — देनिकिन (दक्षिण), कोल्चाक (साइबेरिया), युदेनिच (उत्तर-पश्चिम), रैंगल (क्रीमिया)

◆ ब्रिटेन, फ्रांस, अमेरिका, जापान आदि का सैनिक हस्तक्षेप और सहायता

◆ किसानों को ज़मीन वापस छिनने का डर — जन-समर्थन नहीं

◆ परिणाम: 1920 तक मुख्य श्वेत सेनाएँ पराजित

◆ ज़ार परिवार की हत्या: पहले ज़ार्स्कोये सेलो, फिर तोबोल्स्क में बंदी रखे गए ज़ार, ज़ारीना, पाँचों बच्चों और सेवकों को 17 जुलाई 1918 को यूराल क्षेत्र के येकातेरिनबर्ग में बोल्शेविकों ने गोली मार दी — श्वेत सेना उन्हें छुड़ा न ले, इस डर से।

◆ लाल आतंक: 30 अगस्त 1918 को फ़ान्या कपलान द्वारा लेनिन पर गोली चलाने के बाद सरकार ने औपचारिक रूप से "लाल आतंक" घोषित किया — चेका ने हज़ारों "वर्ग-शत्रुओं" और बंधकों को बिना मुक़दमे गोली मारी; बंदी शिविर बने। दूसरी ओर श्वेत सेनाओं का "श्वेत आतंक" भी कम क्रूर नहीं था — यहूदियों पर पोग्रोम, किसानों पर अत्याचार।

◆ पोलैंड से युद्ध (1920): लाल सेना वारसा तक पहुँचकर हारी; रीगा की संधि (1921) से सीमा तय।

◆ मानवीय क़ीमत: युद्ध, आतंक, महामारी (टाइफ़स) और 1921–22 के भीषण अकाल में अनुमानतः 70 लाख से 1 करोड़ से अधिक लोग मरे; लाखों लोग (श्वेत प्रवासी) देश छोड़ गए।

▶ लाल सेना क्यों जीती? — पूरे वाक्यों में

काग़ज़ पर बोल्शेविकों की स्थिति निराशाजनक थी: वे चारों ओर से घिरे थे, और दुनिया की बड़ी ताक़तें उनके शत्रुओं के साथ थीं। फिर भी वे जीते, और इसके चार कारण थे।

1. भूगोल। लाल सेना के पास देश का बीच का हिस्सा था — दोनों बड़े शहर, हथियारों के कारख़ाने और वह जगह जहाँ से सारी रेल-लाइनें निकलती थीं। वह अपनी सेना को एक मोर्चे से दूसरे पर तेज़ी से भेज सकती थी। श्वेत सेनाएँ किनारों पर बिखरी थीं, एक-दूसरे से हज़ारों किलोमीटर दूर, और कभी एक साथ हमला नहीं कर सकीं।

2. एकता। लाल पक्ष में एक दल, एक नेता और एक लक्ष्य था। श्वेत पक्ष में ज़ार के समर्थक, उदारवादी और कुछ समाजवादी साथ लड़ रहे थे, जो एक-दूसरे से उतनी ही घृणा करते थे जितनी बोल्शेविकों से; उनके सेनापति एक-दूसरे का आदेश नहीं मानते थे।

3. किसान। किसान बोल्शेविकों से ख़ुश नहीं थे, क्योंकि वे उनका अनाज छीन रहे थे। पर श्वेत सेनाएँ जहाँ भी पहुँचतीं, पुराने ज़मींदारों को उनकी ज़मीन लौटाने लगतीं। किसान के लिए चुनाव साफ़ था: लाल बुरे हैं, पर गोरे जीते तो ज़मीन ही चली जाएगी।

4. देशभक्ति। श्वेत सेनाओं को ब्रिटेन, फ्रांस, अमेरिका और जापान से हथियार और सैनिक मिले। बोल्शेविकों ने इसे इस तरह पेश किया कि वे विदेशी हमलावरों से रूस की रक्षा कर रहे हैं; ज़ार की सेना के हज़ारों पुराने अफ़सर इसी कारण लाल सेना में आ गए।

विदेशी ताक़तों ने दख़ल क्यों दिया? शुरू में उद्देश्य रूस को जर्मनी के विरुद्ध युद्ध में वापस लाना और वहाँ पड़े अपने हथियारों को जर्मनों के हाथ लगने से बचाना था। युद्ध ख़त्म होने के बाद कारण बदल गए: बोल्शेविकों ने ज़ार के लिए हुए सारे विदेशी क़र्ज़ चुकाने से मना कर दिया था और विदेशी कंपनियों की संपत्ति ज़ब्त कर ली थी; और सबसे बढ़कर यह डर था कि क्रांति उनके अपने देशों के मज़दूरों में न फैल जाए। पर यह दख़ल आधे मन से था; चार साल के युद्ध से थकी उनकी जनता और सैनिक एक और लड़ाई नहीं चाहते थे।

युद्ध साम्यवाद (War Communism, 1918–1921)

◆ सभी उद्योगों का राष्ट्रीयकरण, निजी व्यापार पर रोक, मुद्रा का लगभग लोप — वस्तुओं का राशन से वितरण।

◆ किसानों से अनाज की ज़बरन वसूली (प्रोद्राज़्वेर्स्तका) — हथियारबंद टुकड़ियाँ गाँवों में जाकर "अतिरिक्त" अनाज उठा लेतीं; किसानों ने खेती घटा दी।

◆ मज़दूरों पर सैनिक अनुशासन, हड़ताल पर रोक।

◆ परिणाम: 1921 तक औद्योगिक उत्पादन युद्ध-पूर्व का लगभग पाँचवाँ भाग रह गया; किसान विद्रोह (तांबोव), मज़दूर हड़तालें — और अंततः क्रोनश्टाट विद्रोह (मार्च 1921) — जहाँ वही नाविक, जो 1917 में क्रांति के "गौरव" थे, "कम्युनिस्टों के बिना सोवियत" की माँग को लेकर उठ खड़े हुए; ट्रॉट्स्की की सेना ने उन्हें कुचल दिया।

युद्ध साम्यवाद का तर्क क्या था? यह नीति किसी सोची-समझी योजना से कम और मजबूरी से अधिक निकली थी। कारख़ाने ठप थे, इसलिए शहरों के पास किसानों को अनाज के बदले देने के लिए कपड़ा, औज़ार या नमक कुछ नहीं था; और नोट इतने छप चुके थे कि उनकी कोई क़ीमत नहीं रही थी। ऐसे में किसान अपना अनाज क्यों बेचता? तब सरकार ने वह रास्ता लिया जो हर घिरी हुई सेना लेती है — ज़बरदस्ती उठा लो। कई बोल्शेविकों ने इसे साम्यवाद की ओर सीधी छलाँग मानकर सराहा भी: न पैसा, न बाज़ार, न निजी व्यापार। नतीजे ने यह भ्रम तोड़ दिया। किसान ने उतना ही बोया जितना ख़ुद खा सके; शहर ख़ाली होने लगे, क्योंकि मज़दूर रोटी की तलाश में गाँव लौट गए; और जब 1921 में सूखा पड़ा, तो देश के पास कोई भंडार नहीं था।

13. नई आर्थिक नीति और स्टालिन का युग

चित्र 4: युद्ध साम्यवाद से नई आर्थिक नीति और फिर स्टालिन की योजनाओं तक

चित्र 4: युद्ध साम्यवाद से नई आर्थिक नीति और फिर स्टालिन की योजनाओं तक

A. नई आर्थिक नीति — एनईपी (1921–1928)

क्रोनश्टाट विद्रोह और आर्थिक विनाश देखकर लेनिन ने मार्च 1921 की दसवीं पार्टी कांग्रेस में "नई आर्थिक नीति" (New Economic Policy — NEP) की घोषणा की — समाजवाद की ओर बढ़ने से पहले एक रणनीतिक "पीछे हटना"।

1. अनाज की ज़बरन वसूली बंद — उसकी जगह निश्चित कर (पहले अनाज में, बाद में नक़द); बचा हुआ अधिशेष किसान खुले बाज़ार में बेच सकें।

2. छोटे उद्योग और खुदरा व्यापार में निजी स्वामित्व और मुनाफ़े की छूट — नया व्यापारी वर्ग "नेपमैन" उभरा।

3. "अर्थव्यवस्था की ऊँचाइयाँ" (Commanding Heights) — बैंक, भारी उद्योग, रेल, विदेशी व्यापार — राज्य के हाथ में ही रहे।

4. सीमित विदेशी पूँजी और रियायतों का स्वागत; मुद्रा और बैंकिंग की पुनर्स्थापना।

◆ परिणाम: 1926–27 तक कृषि और उद्योग उत्पादन लगभग युद्ध-पूर्व (1913) स्तर पर लौट आया। पर दल के भीतर वामपंथी इसे "पूँजीवाद की वापसी" मानते थे।

📘 आसान परिभाषा: नई आर्थिक नीति (एनईपी)

📚 परिभाषा: पूर्ण राज्य-नियंत्रण वाली युद्ध-साम्यवाद व्यवस्था की जगह सीमित बाज़ार और निजी व्यापार की अनुमति, जबकि बड़े उद्योग, बैंक और विदेशी व्यापार राज्य के पास रहें — एक प्रकार की मिश्रित अर्थव्यवस्था।

💬 आसान भाषा में: पहले सरकार ने सब कुछ अपने हाथ में ले लिया तो सब ठप हो गया; फिर उसने कहा — "छोटा-मोटा धंधा और किसान की बची फ़सल की बिक्री तुम करो, बड़े कारख़ाने और बैंक हम चलाएँगे।" 🏠 उदाहरण: दुकानदार ने उधार-वसूली में इतनी सख़्ती की कि ग्राहक आने बंद हो गए; तब उसने थोड़ी ढील दी ताकि दुकान फिर चल पड़े — मक़सद वही, तरीक़ा नरम।

⚠️ ध्यान दें

नई आर्थिक नीति के लिए अक्सर लेनिन के नाम से वाक्य लिखा मिलता है — "एक क़दम पीछे, दो क़दम आगे"। वास्तव में लेनिन की 1904 की एक पुस्तिका का शीर्षक था "एक क़दम आगे, दो क़दम पीछे" — जो 1903 के दल-विभाजन पर थी। एनईपी को लेनिन ने स्वयं एक "पीछे हटना" (Retreat) कहा था।

B. सोवियत संघ का गठन और लेनिन की मृत्यु

◆ 30 दिसंबर 1922: रूस, यूक्रेन, बेलारूस और ट्रांसकॉकेशिया को मिलाकर "सोवियत समाजवादी गणराज्य संघ" (USSR) बना; 1924 में पहला संविधान।

◆ 1922–23 में लगातार आघात (Stroke) के बाद लेनिन की 21 जनवरी 1924 को मृत्यु हुई; पेत्रोग्राद का नाम "लेनिनग्राद" रखा गया (1991 में फिर "सेंट पीटर्सबर्ग")।

◆ लेनिन का "वसीयत-पत्र" (1922–23): उन्होंने स्टालिन को "बहुत रूखा" बताकर महासचिव पद से हटाने की सलाह दी थी — पर यह दस्तावेज़ दबा दिया गया।

C. स्टालिन बनाम ट्रॉट्स्की — सत्ता संघर्ष

🔨 जोसेफ़ स्टालिन

⭐ लियोन ट्रॉट्स्की

◆ जन्म — गोरी (जॉर्जिया), मोची परिवार; असली नाम जुगाश्विली; "स्टालिन" = "इस्पात का आदमी"

◆ 1922 से दल का महासचिव — नियुक्तियों और दल-तंत्र पर पकड़

◆ सिद्धांत — "एक देश में समाजवाद": पहले सोवियत संघ को मज़बूत करो

◆ चतुर गुटबाज़ी — पहले कामेनेव-ज़िनोवियेव, फिर बुख़ारिन के साथ

◆ असली नाम ब्रोन्श्टाइन; अक्टूबर क्रांति का सैन्य योजनाकार

◆ लाल सेना का संस्थापक; प्रखर वक्ता-लेखक

◆ सिद्धांत — "स्थायी क्रांति": क्रांति को दुनिया भर में फैलाना होगा

◆ दल-तंत्र में कमज़ोर; दूसरों को अहंकारी लगे

◆ परिणाम: ट्रॉट्स्की 1927 में दल से निष्कासित, 1928 में मध्य एशिया (अल्मा-अता) निर्वासित, 1929 में देश से बाहर (तुर्की); अंततः अगस्त 1940 में मेक्सिको में स्टालिन के एजेंट ने हत्या कर दी। 1928–29 तक स्टालिन निर्विवाद तानाशाह बन गया।

▶ कम चमकदार आदमी कैसे जीत गया?

1924 में किसी से पूछा जाता कि लेनिन का उत्तराधिकारी कौन होगा, तो लगभग हर कोई ट्रॉट्स्की का नाम लेता: वह क्रांति का संगठनकर्ता था, लाल सेना का निर्माता, और देश का सबसे अच्छा वक्ता। स्टालिन को लोग एक मेहनती पर साधारण दफ़्तरी आदमी समझते थे। फिर भी पाँच साल में स्टालिन सर्वेसर्वा था और ट्रॉट्स्की देश से बाहर। यह तीन कारणों से हुआ।

1. पद की ताक़त। महासचिव का पद उबाऊ माना जाता था — फ़ाइलें, नियुक्तियाँ, तबादले। पर इसी पद से तय होता था कि किस प्रांत में दल का सचिव कौन बनेगा और दल की बड़ी सभा में प्रतिनिधि बनकर कौन आएगा। स्टालिन ने धीरे-धीरे हर जगह अपने वफ़ादार आदमी बैठा दिए। जब भी वोट की नौबत आती, सभा-भवन उसके लोगों से भरा होता।

2. बाँटो और हटाओ। उसने कभी सब विरोधियों से एक साथ टक्कर नहीं ली। पहले दो पुराने नेताओं के साथ मिलकर ट्रॉट्स्की को अलग-थलग किया; फिर दूसरे नेताओं के साथ मिलकर उन दोनों को हटाया; और अंत में उन्हें भी। हर बार वह अपने को बीच का, समझदार आदमी दिखाता रहा।

3. समय के अनुकूल नारा। ट्रॉट्स्की कहता था कि रूस की क्रांति तभी बचेगी जब वह दूसरे देशों में फैले। पर 1920 के दशक तक साफ़ हो चुका था कि जर्मनी या कहीं और क्रांति नहीं होने वाली, और दस साल के युद्ध से थकी जनता नए जोखिम नहीं चाहती थी। स्टालिन का नारा — पहले अपने देश को मज़बूत करो — लोगों को कहीं अधिक व्यावहारिक और देशभक्तिपूर्ण लगा।

D. पंचवर्षीय योजनाएँ और सामूहिकीकरण

नीति

काल

मुख्य विशेषताएँ और परिणाम

प्रथम पंचवर्षीय योजना

1928–1932

राज्य नियोजन संस्था "गोसप्लान" द्वारा; भारी उद्योग — इस्पात, कोयला, बिजली, मशीनें; मैग्नितोगोर्स्क जैसे नए औद्योगिक नगर; लक्ष्य 4 वर्ष 3 माह में "पूरे" घोषित

द्वितीय पंचवर्षीय योजना

1933–1937

भारी उद्योग के साथ परिवहन, रक्षा; स्ताख़ानोव आंदोलन (1935) — अत्यधिक उत्पादन करने वाले मज़दूरों का सम्मान

तृतीय योजना

1938–1941

रक्षा-उद्योग पर ज़ोर; जर्मन आक्रमण (1941) से बाधित

सामूहिकीकरण

1929 से

छोटे निजी खेतों को मिलाकर सामूहिक फ़ार्म (कोलख़ोज़) और राजकीय फ़ार्म (सोवख़ोज़); लक्ष्य — शहरों-उद्योगों के लिए सस्ता अनाज

"कुलकों" का सफ़ाया

1929–1933

संपन्न किसानों (कुलक) को "वर्ग के रूप में समाप्त" करने का अभियान — लाखों निर्वासित या मारे गए; किसानों ने विरोध में पशु मार डाले

भीषण अकाल

1932–1933

ज़बरन अनाज-वसूली से यूक्रेन, कज़ाख़स्तान आदि में अकाल — यूक्रेन में लगभग 35–50 लाख मौतें ("होलोदोमोर"); कुल 55 लाख से अधिक

महान शुद्धिकरण (Great Purge)

1936–1938

दल-नेताओं, सेनापतियों, बुद्धिजीवियों पर दिखावटी मुक़दमे; लगभग 7 लाख को मृत्युदंड, लाखों "गुलाग" श्रम-शिविरों में; कामेनेव, ज़िनोवियेव, बुख़ारिन को मृत्युदंड

◆ उपलब्धि: पिछड़ा कृषि-प्रधान रूस लगभग 15 वर्षों में दुनिया की बड़ी औद्योगिक शक्ति बना — इसी औद्योगिक आधार ने द्वितीय विश्व युद्ध में नाज़ी जर्मनी को हराने में निर्णायक भूमिका निभाई; साक्षरता लगभग 80% (1939) तक पहुँची; बेरोज़गारी समाप्त।

◆ क़ीमत: करोड़ों लोगों की पीड़ा — अकाल, निर्वासन, श्रम-शिविर, भय का शासन; कृषि लंबे समय तक कमज़ोर रही; व्यक्ति-पूजा और सर्वसत्तावाद। स्टालिन की मृत्यु 5 मार्च 1953 को हुई।

▶ तालिका के पीछे की कहानी — उद्योग किसकी क़ीमत पर खड़े हुए?

1928 में स्टालिन ने कहा था: हम विकसित देशों से पचास-सौ साल पीछे हैं; यह दूरी हमें दस साल में पाटनी है, नहीं तो वे हमें कुचल देंगे। प्रश्न यह था कि कारख़ाने खड़े करने का पैसा कहाँ से आए। ब्रिटेन ने यह पूँजी उपनिवेशों से जुटाई थी; रूस के पास उपनिवेश नहीं थे और विदेशी क़र्ज़ मिलता नहीं था। एक ही स्रोत बचता था — अपने ही किसान। योजना यह थी कि किसानों से अनाज बहुत सस्ते में लिया जाए, उसका एक हिस्सा शहरों के मज़दूरों को खिलाया जाए, और बाक़ी विदेश बेचकर मशीनें ख़रीदी जाएँ।

पर ढाई करोड़ अलग-अलग किसान परिवारों से सस्ते में अनाज वसूलना असंभव था; वे छिपा लेते थे या कम बोते थे। सामूहिक खेत इसी का हल था: अगर पूरे गाँव की ज़मीन, पशु और औज़ार एक बड़े खेत में मिला दिए जाएँ, जिसका प्रबंधक सरकार का आदमी हो, तो फ़सल कटते ही सरकार अपना हिस्सा सीधे खलिहान से उठा सकती है।

🌾 एक गाँव में सामूहिकीकरण

गाँव में शहर से दल का एक कार्यकर्ता आता है और सभा बुलाता है। वह कहता है कि कल से सबकी ज़मीन एक होगी; अपनी गाय, घोड़ा, हल और बीज सामूहिक खेत के बाड़े में जमा करा दो। जो तैयार नहीं होते, उनमें से जिनके पास दो गायें या एक मज़दूर रखने लायक़ हैसियत है, उन्हें "कुलक" कहकर गाँव का शत्रु घोषित कर दिया जाता है; उनका घर और सामान ज़ब्त होता है और परिवार को मालगाड़ी में भरकर उत्तर के जंगलों या साइबेरिया भेज दिया जाता है। बाक़ी किसान डर से हस्ताक्षर कर देते हैं — पर अपना पशु सरकार को देने की जगह रात में काटकर खा जाते हैं। कुछ ही वर्षों में देश के आधे घोड़े और गायें ख़त्म हो गईं। फ़सल कम हुई, पर सरकार ने अपना तय हिस्सा पूरा वसूला, बीज तक उठा लिया। 1932–33 में दुनिया के सबसे उपजाऊ इलाक़ों में लाखों किसान भूख से मर गए, जबकि अनाज विदेश भेजा जा रहा था।

इस तरह सोवियत उद्योग की उपलब्धि और सोवियत किसान की त्रासदी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। 1936 का संविधान इसी दौर में आया। काग़ज़ पर वह दुनिया के सबसे उदार संविधानों में था — सबको वोट, बोलने की आज़ादी, काम और आराम का अधिकार। व्यवहार में चुनाव में एक ही दल का एक ही उम्मीदवार होता था, और इसी संविधान के लागू होते-होते इतिहास के सबसे बड़े राजनीतिक दमन का दौर शुरू हुआ।

14. बहुआयामी प्रभाव और मूल्यांकन

A. राजनीतिक प्रभाव

1. विश्व का पहला समाजवादी राज्य — मार्क्सवाद की "प्रयोगशाला"; सिद्धांत को व्यवहार में उतारने का पहला प्रयोग।

2. एकदलीय सर्वसत्तावादी राज्य — "सर्वहारा का अधिनायकत्व" धीरे-धीरे दल का और फिर एक नेता का अधिनायकत्व बना; भाषण, प्रेस, संगठन की स्वतंत्रता ख़त्म — असहमति का स्थान साइबेरिया, जेल या मृत्यु।

3. कोमिन्टर्न (तृतीय अंतरराष्ट्रीय, मार्च 1919, मास्को) — विश्व क्रांति के लिए दुनिया भर की कम्युनिस्ट पार्टियों का संगठन।

4. फ़ासीवाद का उदय: साम्यवाद के डर से यूरोप के उद्योगपतियों, ज़मींदारों और मध्यम वर्ग ने इटली (मुसोलिनी, 1922) और जर्मनी (हिटलर, 1933) में फ़ासीवादियों का साथ दिया; पश्चिमी लोकतंत्रों ने भी "बोल्शेविक ख़तरे" के कारण इन तानाशाहों का तुष्टीकरण किया।

5. महाशक्ति और शीत युद्ध: 1945 के बाद सोवियत संघ अमेरिका के साथ दूसरी महाशक्ति बना; दुनिया पूँजीवादी और साम्यवादी खेमों में बँटी — शीत युद्ध (1947–1991); तीसरा गुटनिरपेक्ष खेमा भी उभरा।

6. उपनिवेशों को प्रेरणा: सोवियत संघ ने साम्राज्यवाद-विरोध और राष्ट्रों के आत्मनिर्णय का समर्थन किया — चीन (1949), वियतनाम, क्यूबा (1959) आदि की क्रांतियाँ और एशिया-अफ्रीका के स्वतंत्रता आंदोलन इससे प्रेरित हुए।

B. सामाजिक प्रभाव

◆ जन्मगत वर्ग-भेद का अंत — कुलीनता, पदवियाँ, ज़मींदारी समाप्त (हालाँकि दल के भीतर एक नया "नौकरशाही अभिजात वर्ग" बन गया)।

◆ स्त्रियों की स्थिति: समान मताधिकार, शिक्षा, रोज़गार, समान वेतन का सिद्धांत, विवाह-तलाक़ में समानता; स्त्रियाँ डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक बनीं।

◆ निःशुल्क शिक्षा और स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, 8 घंटे का कार्य-दिवस — पर शिक्षा का "बोल्शेविकीकरण" (पाठ्यक्रम पर दल का नियंत्रण)।

◆ धर्म पर प्रहार: मार्क्स के अनुसार धर्म "जनता की अफ़ीम" — चर्च की संपत्ति ज़ब्त, नास्तिकता का प्रचार ("जुझारू नास्तिकों का संघ", 1925)।

C. आर्थिक प्रभाव

◆ भूमि और उद्योग का राष्ट्रीयकरण; निजी संपत्ति और मुनाफ़े पर आधारित व्यवस्था की जगह राज्य-स्वामित्व।

◆ नियोजित अर्थव्यवस्था (Planned Economy) का पहला मॉडल — बाद में भारत सहित कई देशों ने पंचवर्षीय योजनाएँ अपनाईं।

◆ विडंबना — मार्क्स के अनुसार जिस औद्योगिक विकास को साम्यवाद का जनक बनना था, रूस में वह साम्यवाद की संतान बना।

◆ पूँजीवादी देशों पर भी असर — मज़दूर-कल्याण, सामाजिक सुरक्षा और कल्याणकारी राज्य की दिशा में सुधार (ताकि क्रांति का ख़तरा न रहे)।

D. मूल्यांकन — क्या क्रांति अनिवार्य थी?

🎲 "संयोग और भूलों का परिणाम"

🏗️ "गहरी संरचनात्मक जड़ें"

◆ उदारवादी-रूढ़िवादी इतिहासकार (जैसे रिचर्ड पाइप्स) — बोल्शेविक विजय अनिवार्य नहीं थी

◆ रूस युद्ध में न जाता तो ज़ारशाही बच सकती थी

◆ ज़ार की भूलें — स्वयं सेनापति बनना, रासपुतिन

◆ अस्थायी सरकार का युद्ध जारी रखना, भूमि-सुधार टालना

◆ जर्मनी का लेनिन को लौटने देना; कोर्निलोव प्रकरण; लेनिन का व्यक्तिगत नेतृत्व

◆ मार्क्सवादी और सामाजिक इतिहासकार — क्रांति की जड़ें गहरी थीं

◆ सदियों की निरंकुशता, सुधारों से इनकार

◆ भूमिहीन, क़र्ज़दार किसानों की ज़मीन की भूख

◆ शोषित, केंद्रित और संगठित मज़दूर वर्ग

◆ 1905 के अधूरे वादे; सोवियतों का स्वतःस्फूर्त पुनर्जन्म

संतुलित निष्कर्ष: दीर्घकालिक सामाजिक-आर्थिक अंतर्विरोधों ने बारूद तैयार किया था, जिससे ज़ारशाही का पतन लगभग निश्चित था; पर सत्ता बोल्शेविकों के ही हाथ आना — युद्ध की परिस्थितियों, अस्थायी सरकार की भूलों और लेनिन के असाधारण नेतृत्व जैसी चिंगारियों का परिणाम था।

E. फ्रांसीसी क्रांति बनाम रूसी क्रांति

आधार

फ्रांसीसी क्रांति (1789)

रूसी क्रांति (1917)

किसके विरुद्ध

निरंकुश राजा, सामंत और चर्च

निरंकुश ज़ार, ज़मींदार — और फिर पूँजीपति वर्ग भी

नेतृत्व

मध्यम वर्ग (वकील, व्यापारी)

मज़दूर वर्ग के नाम पर एक अनुशासित दल

वैचारिक आधार

रूसो, वोल्तेयर, मॉन्टेस्क्यू — उदारवाद

मार्क्स और लेनिन — समाजवाद

मुख्य लक्ष्य

राजनीतिक और क़ानूनी समानता — सब क़ानून के सामने बराबर

आर्थिक समानता — निजी संपत्ति का अंत

संपत्ति के प्रति रुख़

निजी संपत्ति को "पवित्र अधिकार" माना

निजी संपत्ति को शोषण की जड़ मानकर समाप्त किया

नारा

"स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व"

"शांति, भूमि और रोटी"; "सारी सत्ता सोवियतों को"

युद्ध की भूमिका

क्रांति के बाद यूरोप से युद्ध छिड़ा

युद्ध ने ही क्रांति को जन्म दिया

आतंक का दौर

जैकोबिनों का आतंक (1793–94)

लाल आतंक (1918 से), फिर स्टालिन का शुद्धिकरण

अंत में सत्ता किसके हाथ

एक सेनापति — नेपोलियन

एक दल-नेता — स्टालिन

दुनिया पर असर

राष्ट्रवाद, लोकतंत्र और मानवाधिकार के विचार फैले

समाजवाद, नियोजन और साम्राज्यवाद-विरोध के विचार फैले

तुलना का सार: दोनों क्रांतियाँ एक ही तरह के समाज में हुईं — ऊपर निरंकुश राजा और विशेषाधिकार वाला छोटा वर्ग, नीचे करों और भूख से दबी विशाल जनता — और दोनों की चिंगारी रोटी के संकट से भड़की। दोनों में पहले नरम लोग सत्ता में आए, फिर उग्र; दोनों ने अपने राजा को मृत्युदंड दिया; दोनों को पूरे यूरोप के शत्रुओं से लड़ना पड़ा; और दोनों का अंत एक व्यक्ति के शासन में हुआ। मूल अंतर यह है कि फ्रांस की क्रांति वहीं रुक गई जहाँ संपत्ति का प्रश्न आया, जबकि रूस की क्रांति उसी प्रश्न से शुरू हुई। इसीलिए कहा जाता है कि 1789 ने उन्नीसवीं सदी की राजनीति तय की और 1917 ने बीसवीं सदी की।

F. आगे क्या हुआ? — सोवियत संघ का अंत (1953–1991)

स्टालिन की मृत्यु (1953) के बाद उसके उत्तराधिकारी ख़्रुश्चेव ने 1956 में दल की सभा में उसके अत्याचारों की खुली निंदा की और लाखों क़ैदियों को छोड़ा, पर एक दल का शासन और सरकार द्वारा चलाई जाने वाली अर्थव्यवस्था बनी रही। अगले तीन दशक सोवियत संघ अमेरिका के मुक़ाबले की महाशक्ति रहा — अंतरिक्ष में पहला उपग्रह और पहला मानव उसी ने भेजा। पर भीतर से अर्थव्यवस्था जकड़ती गई: हथियारों पर भारी ख़र्च, रोज़मर्रा की चीज़ों की कमी, और ऊपर से तय होने वाले लक्ष्यों के कारण घटती कुशलता।

1985 में सत्ता में आए गोर्बाचेव ने दो सुधार शुरू किए — खुलापन (बोलने और आलोचना करने की छूट) और पुनर्गठन (अर्थव्यवस्था में ढील)। पर छूट मिलते ही दबा हुआ असंतोष फूट पड़ा; साम्राज्य की अलग-अलग जातियों के गणराज्य एक-एक करके स्वतंत्रता माँगने लगे। दिसंबर 1991 में सोवियत संघ समाप्त हो गया और उसकी जगह रूस सहित पंद्रह स्वतंत्र देश बने। जिस राज्य का जन्म 1917 में हुआ था, वह चौहत्तर साल चला।

15. भारत और राजस्थान से जुड़ाव

A. भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन पर प्रभाव

क्षेत्र

प्रभाव

वैचारिक

साम्राज्यवाद को पूँजीवाद का शोषक विस्तार मानने की समझ; लेनिन के आत्मनिर्णय के सिद्धांत से नैतिक बल; स्वतंत्रता का अर्थ केवल सत्ता-हस्तांतरण नहीं, सामाजिक-आर्थिक न्याय भी

कम्युनिस्ट आंदोलन

17 अक्टूबर 1920 को ताशकंद में एम. एन. रॉय, अबनी मुखर्जी आदि ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी बनाई; भारत में कानपुर सम्मेलन (दिसंबर 1925) — सत्यभक्त आदि; रॉय और लेनिन के बीच औपनिवेशिक प्रश्न पर प्रसिद्ध बहस (कोमिन्टर्न की दूसरी कांग्रेस, 1920)

ब्रिटिश दमन

पेशावर षड्यंत्र (1922–27), कानपुर बोल्शेविक षड्यंत्र (1924 — मुज़फ़्फ़र अहमद, एस. ए. डांगे, शौकत उस्मानी, नलिनी गुप्ता), मेरठ षड्यंत्र (1929–33)

मज़दूर-किसान संगठन

अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (1920) — प्रथम अध्यक्ष लाला लाजपत राय; मज़दूर-किसान पार्टियाँ (1926–28); अखिल भारतीय किसान सभा (1936, लखनऊ) — स्वामी सहजानंद सरस्वती

क्रांतिकारी राष्ट्रवाद

भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद ने 1928 में संगठन का नाम "हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन" रखा — लक्ष्य समाजवाद; भगत सिंह ने लेनिन को पढ़ा और 21 जनवरी 1930 (लेनिन दिवस) को अदालत से "लेनिन ज़िंदाबाद" का संदेश भेजा

कांग्रेस का समाजवादी झुकाव

नेहरू ने नवंबर 1927 में क्रांति की दसवीं वर्षगाँठ पर सोवियत संघ की यात्रा की और "सोवियत रूस" (1928) लिखी; कांग्रेस समाजवादी पार्टी (1934) — जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव, राम मनोहर लोहिया; कराची प्रस्ताव (1931) — मौलिक अधिकार और आर्थिक कार्यक्रम

नियोजन

राष्ट्रीय नियोजन समिति (1938) — अध्यक्ष नेहरू, कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष चंद्र बोस की पहल पर; स्वतंत्रता के बाद योजना आयोग (1950) और पंचवर्षीय योजनाएँ (1951 से) — सोवियत मॉडल से प्रेरित

अन्य

राजा महेंद्र प्रताप ने 1919 में लेनिन से भेंट की; रवींद्रनाथ टैगोर ने 1930 में सोवियत संघ की यात्रा कर "रूस की चिट्ठी" लिखी — शिक्षा-प्रसार की प्रशंसा, पर स्वतंत्रता पर अंकुश की आलोचना

◆ गांधी का दृष्टिकोण: गांधी बोल्शेविकों के त्याग और ग़रीबों के प्रति प्रतिबद्धता की सराहना करते थे, पर उनकी हिंसा और बल-प्रयोग को स्वीकार नहीं करते थे — उनका मार्ग अहिंसक सामाजिक परिवर्तन और ट्रस्टीशिप का था।

◆ कुल प्रभाव: राष्ट्रीय आंदोलन उच्च-मध्यम वर्ग से आगे बढ़कर किसान-मज़दूरों का जन-आंदोलन बना; स्वतंत्र भारत ने लोकतांत्रिक समाजवाद, मिश्रित अर्थव्यवस्था और नियोजन को अपनाया — पर संसदीय लोकतंत्र के साथ।

▶ तालिका का सार — भारत ने रूस से क्या लिया और क्या नहीं

रूसी क्रांति ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को तीन चीज़ें दीं। पहली — एक नया प्रश्न। 1917 से पहले आंदोलन का प्रश्न था "अंग्रेज़ कब जाएँगे"; इसके बाद यह प्रश्न भी जुड़ गया कि "अंग्रेज़ों के जाने के बाद किसान और मज़दूर को क्या मिलेगा"। नेहरू, भगत सिंह और समाजवादी नेताओं ने इसी प्रश्न को कांग्रेस के भीतर और बाहर उठाया। दूसरी — संगठन के नए रूप। मज़दूर संघ, किसान सभाएँ और कम्युनिस्ट दल इसी दौर में बने, जिनसे आंदोलन पढ़े-लिखे वर्ग से निकलकर खेतों और कारख़ानों तक पहुँचा। तीसरी — नियोजन का विचार, जो आज़ादी के बाद पंचवर्षीय योजनाओं के रूप में अपनाया गया।

पर भारत ने रूस का रास्ता पूरा नहीं अपनाया। गांधी ने साफ़ कहा कि वे बोल्शेविकों के लक्ष्य — ग़रीब की भलाई — का आदर करते हैं, पर हिंसा और ज़बरदस्ती से लाई गई बराबरी टिकाऊ नहीं होती। उनका विकल्प था कि धनी व्यक्ति अपनी संपत्ति को समाज की अमानत मानकर चले (इसी को वे न्यासिता कहते थे)। आज़ाद भारत ने नियोजन और सरकारी उद्योग तो अपनाए, पर साथ में चुनाव, कई दल, स्वतंत्र अदालतें और निजी संपत्ति भी रखी।

राजस्थान के संदर्भ में एक शब्द समझ लीजिए — लाटा-कूँता: रियासतों में लगान वसूलने का वह तरीक़ा जिसमें खड़ी फ़सल या खलिहान में पड़े अनाज के ढेर को देखकर ठिकाने का आदमी अंदाज़े से तय कर देता था कि इसमें से कितना हिस्सा ठिकाने का है। अंदाज़ा प्रायः किसान के विरुद्ध जाता था, इसलिए किसान आंदोलनों की यह एक बड़ी शिकायत थी।

B. राजस्थान से जुड़ाव

◆ वैचारिक असर: रूसी क्रांति के बाद रियासती राजस्थान के किसान आंदोलनों में "ज़मीन जोतने वाले की" की भावना, लाग-बाग (अवैध कर), बेगार और लाटा-कूंता (फ़सल-आकलन प्रणाली) के पूर्ण उन्मूलन की माँग और वर्ग-चेतना को बल मिला।

◆ बिजौलिया किसान आंदोलन (1897–1941): मेवाड़ का सबसे लंबा किसान आंदोलन — 1916 से विजय सिंह पथिक के नेतृत्व में संगठित; पथिक ने राजस्थान सेवा संघ (1919, वर्धा; 1920 से अजमेर) बनाया और "राजस्थान केसरी", "नवीन राजस्थान" जैसे पत्रों से किसानों को जगाया।

◆ बेगूं किसान आंदोलन (1921–23): रामनारायण चौधरी के नेतृत्व में; 1922 में ठिकाने और किसानों के बीच हुए समझौते को ब्रिटिश सरकार ने तिरस्कार से "बोल्शेविक फ़ैसला" कहा — यह दिखाता है कि अंग्रेज़ों में रूसी क्रांति के प्रभाव का कितना डर था।

◆ शेखावटी किसान आंदोलन: जाट किसान सभा; कटराथल (सीकर) महिला सम्मेलन (25 अप्रैल 1934) — किशोरी देवी की अध्यक्षता में हज़ारों महिलाएँ; मारवाड़ किसान सभा (1941) — संगठित कर-बंदी और किसान सम्मेलन।

◆ अखिल भारतीय किसान सभा (1936) से संपर्क — राजस्थान के किसान नेता राष्ट्रीय वामपंथी नेताओं से जुड़े; आंदोलनों को पर्चों, सम्मेलनों और कर-बंदी का संगठित रूप मिला।

◆ मज़दूर आंदोलन: ब्यावर (कृष्णा मिल्स — राजस्थान की पहली सूती मिल, 1889), भीलवाड़ा और अन्य औद्योगिक केंद्रों में मज़दूर संघ और हड़तालें।

📌 याद रखें

प्रजामंडल आंदोलनों की उत्तरदायी शासन की माँग और जागीरदारी उन्मूलन की लड़ाई में समाजवादी विचारों का गहरा प्रभाव था — स्वतंत्रता के बाद राजस्थान में जागीरदारी उन्मूलन (1952 का राजस्थान भूमि सुधार और जागीर पुनर्ग्रहण अधिनियम) इसी लंबे संघर्ष की परिणति थी।

16. प्रमुख व्यक्तित्व और कालक्रम (Timeline)

व्यक्तित्व

भूमिका

मुख्य तथ्य

निकोलस द्वितीय

अंतिम ज़ार (1894–1917)

दुर्बल, निरंकुश; 15 मार्च 1917 को त्याग; 17 जुलाई 1918 को परिवार सहित हत्या

अलेक्ज़ांड्रा

ज़ारीना

जर्मन मूल; रासपुतिन के प्रभाव में

रासपुतिन

"पवित्र पुरुष" कहलाने वाला साधु

युवराज के रोग के कारण दरबार में प्रभाव; दिसंबर 1916 में हत्या

जॉर्जी गापोन

पादरी, मज़दूर संगठनकर्ता

ख़ूनी रविवार (1905) का जुलूस; 1906 में हत्या

सर्गेई विट्टे

वित्त मंत्री, प्रधानमंत्री

औद्योगीकरण, ट्रांस-साइबेरियाई रेल; अक्टूबर घोषणा-पत्र

प्योत्र स्टोलिपिन

प्रधानमंत्री (1906–11)

दमन + भूमि-सुधार; 1911 में हत्या

जॉर्जी प्लेखानोव

"रूसी मार्क्सवाद के जनक"

"श्रम-मुक्ति" समूह (1883); बाद में मेन्शेविक

व्लादिमीर इलिच लेनिन (उल्यानोव)

बोल्शेविक नेता

जन्म 22 अप्रैल 1870, सिम्बिर्स्क; बड़े भाई अलेक्ज़ेंडर को 1887 में ज़ार की हत्या के षड्यंत्र में फाँसी; अप्रैल थीसिस, अक्टूबर क्रांति, एनईपी; मृत्यु 21 जनवरी 1924

लियोन ट्रॉट्स्की

क्रांति का सैन्य योजनाकार

पेत्रोग्राद सोवियत अध्यक्ष, लाल सेना के संस्थापक; 1940 में मेक्सिको में हत्या

जोसेफ़ स्टालिन

लेनिन के उत्तराधिकारी

महासचिव (1922), पंचवर्षीय योजनाएँ, सामूहिकीकरण, शुद्धिकरण; मृत्यु 5 मार्च 1953

अलेक्ज़ेंडर केरेंस्की

अस्थायी सरकार के प्रधानमंत्री (जुलाई–नवंबर 1917)

युद्ध जारी रखा; अक्टूबर क्रांति में भागे

लावर कोर्निलोव

सेनापति

सितंबर 1917 का असफल तख़्तापलट प्रयास

जूलियस मार्तोव

मेन्शेविक नेता

1903 के विभाजन में लेनिन के विरोधी

फ़ेलिक्स द्ज़ेर्ज़िंस्की

चेका प्रमुख

"लाल आतंक"

एम. एन. रॉय

भारतीय क्रांतिकारी

ताशकंद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (1920); कोमिन्टर्न में लेनिन से बहस

वर्ष / तिथि (नई)

घटना

महत्व

1613

रोमानोव वंश का आरंभ

तीन सौ वर्षों का शासन

1825

दिसंबरवादी विद्रोह

पहला क्रांतिकारी प्रयास

1861

अलेक्ज़ेंडर द्वितीय — कृषि-दासता का अंत

अधूरी मुक्ति

1874

"जनता के पास जाओ" आंदोलन

लोकवाद

1881

अलेक्ज़ेंडर द्वितीय की हत्या

दमन और रूसीकरण का दौर

1883

प्लेखानोव — "श्रम-मुक्ति" समूह

रूसी मार्क्सवाद

1887

लेनिन के भाई को फाँसी

लेनिन का क्रांतिकारी संकल्प

1894

निकोलस द्वितीय ज़ार बने

अंतिम ज़ार

1898

रूसी सामाजिक लोकतांत्रिक मज़दूर दल (मिन्स्क)

—

1903

बोल्शेविक-मेन्शेविक विभाजन

लेनिन का अग्रदल

1904–05

रूस-जापान युद्ध में हार

ज़ारशाही की साख गिरी

22 जनवरी 1905

ख़ूनी रविवार

1905 की क्रांति

जून 1905

पोटेमकिन विद्रोह

सेना में असंतोष

30 अक्टूबर 1905

अक्टूबर घोषणा-पत्र

ड्यूमा का वादा

1906–1911

चार ड्यूमा; स्टोलिपिन के सुधार

अधूरे सुधार

अगस्त 1914

रूस प्रथम विश्व युद्ध में; टैननबर्ग की हार

संकट की शुरुआत

सितंबर 1915

ज़ार स्वयं सेनापति बने

हार की सीधी ज़िम्मेदारी

दिसंबर 1916

रासपुतिन की हत्या

—

8 मार्च 1917

महिला मज़दूरों की हड़ताल

फ़रवरी क्रांति आरंभ

15 मार्च 1917

निकोलस द्वितीय का त्याग; अस्थायी सरकार

रोमानोव वंश का अंत

16–17 अप्रैल 1917

लेनिन की वापसी; अप्रैल थीसिस

"सारी सत्ता सोवियतों को"

जुलाई 1917

जुलाई के दिन; केरेंस्की प्रधानमंत्री

बोल्शेविकों को झटका

सितंबर 1917

कोर्निलोव प्रकरण

बोल्शेविकों को साख

7 नवंबर 1917

अक्टूबर क्रांति

बोल्शेविक सत्ता

8 नवंबर 1917

शांति और भूमि के आदेश; जन-कमिसार परिषद

पहले फ़ैसले

दिसंबर 1917

चेका की स्थापना

गुप्त पुलिस

19 जनवरी 1918

संविधान सभा भंग

एकदलीय शासन की शुरुआत

3 मार्च 1918

ब्रेस्ट-लिटोव्स्क संधि

रूस युद्ध से बाहर

1918–1921

गृहयुद्ध; युद्ध साम्यवाद

लाल सेना की जीत

17 जुलाई 1918

ज़ार परिवार की हत्या (येकातेरिनबर्ग)

—

मार्च 1919

कोमिन्टर्न

विश्व क्रांति का संगठन

1920

ताशकंद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी; अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस

भारत जुड़ाव

मार्च 1921

क्रोनश्टाट विद्रोह; नई आर्थिक नीति

रणनीतिक पीछे हटना

1922

बेगूं का "बोल्शेविक फ़ैसला"; स्टालिन महासचिव

राजस्थान जुड़ाव

30 दिसंबर 1922

सोवियत संघ (USSR) का गठन

—

21 जनवरी 1924

लेनिन की मृत्यु

उत्तराधिकार संघर्ष

1927

ट्रॉट्स्की निष्कासित; नेहरू की सोवियत यात्रा

—

1928

प्रथम पंचवर्षीय योजना

तीव्र औद्योगीकरण

1929–1933

सामूहिकीकरण; 1932–33 का अकाल

भारी मानवीय क़ीमत

1934

कटराथल महिला सम्मेलन; कांग्रेस समाजवादी पार्टी

भारत-राजस्थान जुड़ाव

1936

अखिल भारतीय किसान सभा; सोवियत संविधान

—

1936–1938

महान शुद्धिकरण

आतंक का चरम

1940

मेक्सिको में ट्रॉट्स्की की हत्या

—

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📋 इस अध्याय में
  1. Russian Revolution – Nature and Stages
  2. The Revolution of 1905—The First Outburst
  3. Long-term causes – Political Causes
  4. Long-term causes – economic and social
  5. Ideological reasons – thinkers and philosophy
  6. Immediate Cause – Impact of World War I (WWI)
  7. February/March Revolution (1917) — Fall of Tsarism
  8. Provisional Government vs. Petrograd Soviet — Dual Power
  9. October/November Revolution — Bolshevik विजय (7 November 1917)
  10. Policies of the Bolshevik Government (Lenin's Programme)
  11. Treaty of Brest-Litovsk (Treaty of Brest-Litovsk, 3 March 1918)
  12. Civil War and Red Terror (1918–1921)
  13. NEP and the rise of Stalin (Post-Revolution Developments)
  14. Multi-Dimensional Impact of the Russian Revolution
  15. India and Rajasthan Connection
  16. Views of prominent historians
What is in this chapter? (Index)What is in this chapter? (Index)
1. Introduction—The Nature of the Russian Revolution2. Background—The Revolution of 1905
3. Long-term causes – political4. Long-term causes – economic and social
5. Ideological reasons – parties and ideologues6. Immediate Cause – Impact of WWI
7. February/March Revolution (1917)8. Provisional Govt vs Petrograd Soviet
9. October/November Revolution (1917)10. Policies of the Bolshevik Government
11. Treaty of Brest-Litovsk (1918)12. Civil War and Red Terror (1918-21)
13. NEP and the rise of Stalin14. Multidimensional effect
15. India and Rajasthan Connection16. Mains Analysis + PYQs + Timeline

1917 — A storm swept through Russia, sweeping away the 300-year-old Romanov dynasty in just eight days. And then another storm eight months later — this time the Bolsheviks took power, creating the world's first Communist state. E.H. Carr said: "The Russian Revolution is one of the great turning points in modern history." This was a turning point not just for Russia, but for the entire 20th century.

💡 Understand the Russian Revolution – in the language of Rajasthan

Imagine, in a village in Rajasthan, there is a Zamindar (Tsar = Landlord) who has been ruling for 300 years. 98% of the farmers are poor, they don't have land, they are in debt, but they don't have freedom of speech. There is a defeat in a neighboring village (like Japan) - the Zamindar loses his respect. In a big conflict like WWI, the village's soldiers are killed, but they don't get bread. One day, the women came out on the streets - "Give us bread!" - then the soldiers also joined in - the Zamindar left his house. This was the February Revolution. Then an organized group (Bolsheviks) gave the slogan - "Peace, Land, Bread" - and took power. This was the October Revolution.

1Russian Revolution – Nature and Stages

The Russian Revolution (1917) was one of the most important events of the 20th century. It ended the Tsarist autocracy and established a revolutionary socialist regime. Historians view it in three phases:

phaseperiodMain eventResults
1. Revolution of 190522 Jan 1905Bloody Sunday — Gapon marchTsar creates Duma — October Manifesto
2. February/March Revolution7-15 March 1917Workers Strike, Soldiers join, Tsar abdicateEnd of the Romanov Dynasty — Provisional Govt
3. October/November Revolution7 Nov 1917The Bolsheviks overthrew the Provisional GovernmentThe world's first Communist State

Textbook Revolution: The Bolshevik Revolution is called a "textbook revolution" because it was organized and carried out according to well-defined planning and programs. It was calculated, not spontaneous.

2The Revolution of 1905—The First Outburst

The 1905 Revolution was the first rehearsal for the Russian Revolution. Leon Trotsky called it a "dress rehearsal for 1917." It was a spontaneous uprising—not a planned one.

► Demands: Better working conditions, political rights, industrial reforms — Petition to Tsar

► Tsarist soldiers fired on unarmed protesters—hundreds were killed

► Result: Russia-wide strikes, peasant revolts, sailors' revolt (Battleship Potemkin)

► Civil rights: Freedom of speech, expression, associations

► State Duma (1906): Promise of a Representative Legislative Body

► But the Tsar gradually reduced the Duma's powers and dissolved it several times.

3Long-term causes – Political Causes

A. Tsarist Autocracy

► "He lacked the ability to understand political changes and public demands" — Connect Civils

► Repressive measures — suppressed political opposition — exile to Siberia

► Rasputin's hold on policy – ​​ministers kept changing – administrative chaos

► Jews, Poles, Finns, Uzbeks, Tartars, Cossacks, Armenians — सब नाराज

B. Rise of Political Parties

PartyLeaderthinkingsupport base
BolsheviksVladimir LeninScientific Socialism — Revolution तुरंत — Elite vanguard partyIndustrial workers, radical intellectuals
MensheviksJulius Martov (Martov)Gradual, democratic socialist movement — Mass partyModerate socialists, some workers
Socialist Revolutionaries (SR)Victor ChernovAgrarian socialism — land to peasants — terror tacticsPeasants — the largest group
Kadets (Constitutional Democrats)Paul Milyukov (मिल्युकोव)Liberal — Constitutional Monarchy, civil rightsMiddle class, professionals
OctobristsAlexander Guchkov (गुचकोव)Limited reforms with the TsarModerate conservatives, industrialists

4Long-term causes – economic and social

A. The miserable condition of the farmers

B. Condition of workers

► J.M. Roberts: "The gathering of such a large number of workers in one place gave them the opportunity to develop their organizational strength."

C. Social inequality

5Ideological reasons – thinkers and philosophy

A. Influence of Socialist Thinkers

B. Contribution of writers

C. Nihilism and Populism

► Goal: Destroy the old autocratic system and create a new social order

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6Immediate Cause – Impact of World War I (WWI)

David Thomson wrote: "The Russian Revolution was a direct outcome of the war of 1914–1918." WWI forced all of Russia's internal contradictions to explode at once.

► The government printed more currency → inflation increased further

💡 The impact of WWI on Russia — Cricket Analogy

Imagine the Rajasthan team playing in a major tournament. The team was losing, the captain (the Tsar) himself took over coaching—and they lost even more. The players' morale was broken, their families were hungry and had no money. One day, the players declared, "We won't play. We'll go home first." This is what happened in Russia in February 1917—soldiers stopped obeying their officers' orders and joined the Revolution.

7February/March Revolution (1917) — Fall of Tsarism

Events (7–15 March 1917)

DateEventImportance
7 March 1917Workers' Demonstrations in Petrograd: Hungry and cold workers on the streets - shops lootedExplosion of urban discontent
8 March 1917Women Workers' Strike: Women's strike of Petrograd textile mills — "Bread and Peace!"International Women's Day — Leading Role of Women
12 March 1917Soldiers Join Revolution: Soldiers sent to suppress the rebellion joined the rebels.Military collapse of Tsarist authority
15 March 1917The Abdication of Nicholas II: The End of the 300-Year-Old Romanov DynastyFebruary/March Revolution complete
"The workers seized power from the Tsar, but they immediately handed it over to the middle class." — E. Lipson — on the February Revolution

Results of the February Revolution

8Provisional Government vs. Petrograd Soviet — Dual Power

Provisional Government
  • Cadets + moderate socialists
  • War wanted to continue—with Allies
  • Constitutional Assembly तक decisions
  • Milyukov (Foreign Minister) — annexationist policy
  • Representation of the middle class and elites
  • The basic demands of the people were not met.
Petrograd Soviet
  • Workers + Soldiers representatives
  • Wanted immediate peace – "No annexation, no indemnity"
  • Land to farmers, factories to workers
  • Soviet Order No. 1 — military authority
  • Growing influence of the Bolsheviks
  • "Peace, Land, Bread" — Voice of the People

Lenin's April Theses (April 1917)

Lenin returned from Switzerland (from the German-arranged "Sealed Train") and presented the April Theses—a roadmap of the Bolsheviks' strategy.

July Days और Kerensky Government

9October/November Revolution — Bolshevik विजय (7 November 1917)

"Peace, Land, Bread"—this three-word slogan was the Bolsheviks' greatest strength. By September 1917, the Bolsheviks had gained a majority in the Petrograd and Moscow Soviets.

Preparation for the Revolution

7 November 1917 — Revolution Night

1. Bolsheviks ने strategic points पर कब्जा: Telephone exchanges, Post offices, Railway stations, Banks, Bridges

2. Aurora Cruiser: Cannon signal at night on the Winter Palace—ultimatum of surrender to the Kerensky government

3. Workers, soldiers, and sailors overthrew the Provisional Government.

4. Kerensky fled the capital—never to return

5. Council of People's Commissars (Sovnarkom): Lenin chairman — new government

Exam Facts:February Revolution (15 March 1917) = spontaneous, unplanned, junta-led। October Revolution (7 November 1917) = planned, Bolshevik-organized "Textbook Revolution"। Russia का calendar Old Style (Julian) था — इसीलिए February Revolution = March और October Revolution = November।

10Policies of the Bolshevik Government (Lenin's Programme)

Immediate Decrees

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11Treaty of Brest-Litovsk (Treaty of Brest-Litovsk, 3 March 1918)

Lenin accepted the "obscene peace" – accepted all the conditions of Germany because he thought: first stabilize the revolution in Russia, then there will be a revolution in Germany too.

ConditionDescription
loss of territoryEstonia, Livonia, Finland, Aland Islands → छोड़े; Lithuania, Courland, Poland → Germany को
UkraineDeclared independent state
Kars, Ardahan, BatumiRussia withdrew forces
No Communist PropagandaCommunism will not spread in Central Europe
War reparations$1,500 million (6 billion marks) Germany को
Russia's lossLost 25% land, 33% population, 80% coal, 73% iron

Importance: The Treaty of Brest-Litovsk (1918) kept Russia out of WWI. But after Germany's defeat in WWI (Nov 1918), the treaty became void—Russia regained lost territories.

12Civil War and Red Terror (1918–1921)

Red vs White War

Red Army
  • Bolsheviks – formed by Leon Trotsky
  • Workers + Peasants
  • Centralized command, clear ideology
  • Lenin's "Red Terror"—the systematic elimination of opponents
  • Cheka (चेका): Secret Police — Felix Dzerzhinsky
  • Nicholas II and his family were shot in Yekaterinburg in July 1918.
White Army
  • Anti-Bolshevik forces — royalists, moderate socialists, nationalists
  • Support from Britain, France, USA, Japan (Intervention)
  • Disunited — no common ideology
  • General Denikin, Kolchak, Yudenich — अलग-अलग fronts
  • Peasants did not support – wanted to take back the land
  • Red Army victory in 1921 – Civil War ends

13NEP and the rise of Stalin (Post-Revolution Developments)

New Economic Policy — NEP (1921-1928)

After the devastation of the Civil War and the Kronstadt Rebellion of 1921 (the sailors themselves rose up against the Bolsheviks), Lenin made a tactical retreat and implemented the NEP.

Lenin's death and Stalin's rise (1924–1928)

► "Socialism in One Country" — First strengthen Russia, then world revolution

Stalin's Five Year Plans (1928-)

► Liquidation of the Kulaks (Kulak = rich peasants) — "Dekulakization"

► Ukraine Famine (Holodomor 1932-33): 3-5 million Ukrainians killed – Stalin's policy

14Multi-Dimensional Impact of the Russian Revolution

A. Political influence

1. The world's first Communist State: a practical test of Marxist ideas — "laboratory of Marxism"

2. Rise of USSR as a World Power: Super Power with USA after 1945

3. Inspiration to the Third World: Anti-imperialist movements in Asia and Africa — China (1949), Cuba (1959), Vietnam, Korea

4. Civil Liberties का दमन: One-party state — Red Terror — Opposition banned

5. Foundations of the Cold War: Capitalism vs. Communism — 1947 to 1991

6. Communist International (Comintern, 1919): World revolution का organization

7. The Comintern forced Western democracies to appease Germany and Italy—fear of communism

B. Social impact

1. End of class distinction: Aristocratic privileges ended – "All men equal"

2. Land Redistribution: Land to Peasants

3. Women's equality: Equal voting rights, education, employment — women doctors, judges, factory workers, scientists

4. Secular Education: Literacy almost universal by 1939, expansion of secondary and higher education

5. Improvement in workers' conditions: 8-hour workday, social security, free healthcare

6. Civil War 1918-21: 7 million+ deaths — a heavy price

C. Economic impact

1. Land Nationalization: estates of landlords → peasants

2. State-owned industries: Private industry → workers' control → State control

3. Planned Economy: Five Year Plans — Centralized economic planning का model

4. NEP (1921-28): Limited capitalism की वापसी — "Mixed economy"

5. Rapid Industrialization: 1928-41 — USSR = world's 2nd industrial power

D. ideological influence

1. Marxism-Leninism: The practical application of Marxism—adapted by Lenin

2. Europe's ideological divide: Communism vs. Capitalism—the first such divide since the Protestant Reformation

3. Rise of Fascism: Italy (1922), Germany (1933) — Anti-Communist reaction — Industrialists supported the Fascists

15India and Rajasthan Connection

A. Impact on Indian Communism

B. Influence on Indian National Leaders

C. Rajasthan Connection

► Bijolia Peasant Movement (1897-1941): The long struggle of the peasants in Mewar – inspiration from Lenin

16Views of prominent historians

"The Russian Revolution is one of the great turning points in modern history." — E.H. Carr
"The Russian Revolution opened a new chapter in the history of human emancipation." — Christopher Hill
"The Russian Revolution was not inevitable but the result of a series of accidents and miscalculations." — Richard Pipes
🎯 Russian Revolution (Mains Analysis)
  • Mains Angle 1: Analysis of the long term (Political, Economic, Social, Ideological) and immediate (WWI) causes of the Russian Revolution.
  • Mains Angle 2: February Revolution vs. October Revolution—What was the difference between the two? One was spontaneous, the other was planned.
  • Mains Angle 3: "The Bolshevik Revolution was a textbook revolution." Justify this statement.
  • Mains Angle 4: Lenin's contributions — April Theses, NEP, Brest-Litovsk Treaty — Was Lenin a pragmatist?
  • Mains Angle 5: Impact of Russian Revolution on Indian independence movement — AITUC, CPI, Bhagat Singh, Nehru.
  • Mains Angle 6: "The Russian Revolution was the direct outcome of World War I." (David Thomson) — Examine this statement.
  • Mains Angle 7: Rise of Stalin and from NEP to Five Year Plans – How successful was the Stalinist model?
  • Mains Angle 8: How did the Russian Revolution give rise to Fascism? (Anti-Communist reaction in Italy and Germany)

📌 Key Personalities – At a Glance

PersonRoleKey Facts
Tsar Nicholas IIThe last Tsar of Russia (1894–1917)Weak, autocratic — abdication on 15 March 1917 — shot with family in July 1918
Tsarina Alexandrawife of Nicholas IIUnder the influence of Rasputin – harm to the administration
Rasputin"Mad Monk"Confidant of Alexandra—murdered by nobles in 1916
Vladimir LeninLeader of the BolsheviksApril Theses, October Revolution, NEP — death on 21 January 1924
Leon TrotskyCreator of the Red ArmyPlanning of the October Revolution, Brest-Litovsk negotiations — assassination in Mexico in 1940
Joseph StalinLenin's successorFive Year Plans, Collectivization, Great Purge — "Man of Steel"
Alexander KerenskyProvisional Government के PMContinued the War – Participated in the October Revolution
Georgy GaponPriest, labor organizerLead-up to Bloody Sunday (1905)
Father Plekhanov (Plekhanov)Father of Russian MarxismMarx introduced to Russia
M.N. RoyIndian CommunistCPI was founded in Tashkent in 1920

★ Facts that must be asked in the exam ★

1. 3 Phases of the Russian Revolution: 1905 Revolution (Bloody Sunday), February 1917 (Tsar abdicate), October 1917 (Bolshevik) 2. Bloody Sunday (22 January 1905): Tsarist soldiers, led by Georgy Gapon, shot approximately 150,000 workers. 3. October Manifesto (30 October 1905): Nicholas II promised civil rights + Duma 4. Nicholas II: 1894–1917—weak, incompetent—last Tsar of the Romanov Dynasty 5. Romanov Dynasty: 300+ years — ended with the abdication of Nicholas II on March 15, 1917 6. 8 March 1917: Women Workers' Strike, Petrograd textile mills — International Women's Day से जुड़ा 7. "Peace, Land, Bread": The Bolsheviks' slogan—the people's three basic demands—was the key to the October Revolution. 8. October Revolution (7 November 1917): Bolsheviks captured telephone exchanges, post offices, and banks. 9. Council of People's Commissars (Sovnarkom): Lenin chairman — new government 10. Treaty of Brest-Litovsk (3 March 1918): Russia ने Germany से peace — 25% land, 33% population खोई 11. Cheka (चेका): Felix Dzerzhinsky — Bolshevik Secret Police — "Red Terror" 12. Civil War (1918-21): Red vs White — 70 लाख+ deaths — Red Army जीती 13. New Economic Policy (NEP, 1921): Limited capitalism — Lenin: "One step backward, two steps forward" 14. Lenin's death: 21 January 1924 — Stalin vs Trotsky power struggle 15. First Five Year Plan (1928-32): Rapid industrialization — Stalin 16. AITUC (1920): Lala Lajpat Rai — first President — inspired by the Russian Revolution 17. CPI (1920): Founded by M.N. Roy in Tashkent — part of the Comintern 18. E.H. Carr: "Russian Revolution is one of the great turning points in modern history" 19. David Thomson: "Russian Revolution was a direct outcome of the war of 1914-1918" 20. "Textbook Revolution": October Revolution — planned, organized, not spontaneous

📝 Previous Year Questions (PYQs) 📝

Q1. Discuss the causes and consequences of the Russian Revolution (1917). What impact did it have on world history? (RAS Mains Expected – 15M) Q2."Russian Revolution was not inevitable, but the result of a series of accidents and miscalculations." (Richard Pipes) — इस कथन का मूल्यांकन कीजिए। (UPSC GS-I) Q3.Explain the fundamental difference between the February Revolution (1917) and the October Revolution (1917). (RAS Mains Probable) Q4.Bloody Sunday (1905) — what was its significance in the context of the Russian Revolution? (RAS 2-M possible) Q5. What was the Treaty of Brest-Litovsk (1918)? What were its consequences? (RAS/UPSC probable) Q6.What impact did the Russian Revolution have on India's freedom movement? (RAS Mains Probable) Q7.What was Lenin's New Economic Policy (NEP)? What was its need? (UPSC) Q8."World War I was the immediate cause of the Russian Revolution." (David Thomson) — Examine this statement. (UPSC GS-I)

📅 Russian Revolution - Important Timeline

Year/DateEventExam Importance
1861Alexander II – Abolition of serfdomEconomic inequality hasn't gone away
1894Nicholas II – became TsarThe last of the Romanov Dynasty
1904-05Russo-Japanese War — Russia's defeatThe image of the Tsar was broken
22 Jan 1905Bloody Sunday — Gapon march, Tsarist soldiers opened fire1905 Revolution trigger
30 Oct 1905October Manifesto — Nicholas IIDuma's promise, civil rights
1906Establishment of the State DumaBut the Tsar reduced his powers
1914Russia enters WWIReason for Immediate Revolution
1915Nicholas II personally took command of the armyDefeat = Tsar's responsibility
7 March 1917Workers' Demonstrations, PetrogradFebruary Revolution begins
8 March 1917Women Workers' Strike — "Bread and Peace!"International Women's Day
12 March 1917Soldiers joined the RevolutionTsarist authority collapse
15 March 1917The Abdication of Nicholas II—The End of the 300-Year Romanov DynastyFebruary/March Revolution
April 1917Lenin वापस — April Theses — "No support to Provisional Govt"Strategy of the October Revolution
3 July 1917July Days — Bolshevik protest — Lenin Finland भागेSetback for Bolsheviks
7 Nov 1917October Revolution — Bolsheviks take power — "textbook revolution"World's first Communist State
15 Nov 1917Decree on Land, Decree on PeaceBolshevik programme
Jan 1918Constituent Assembly dissolve कियाThe beginning of the one-party state
3 March 1918Treaty of Brest-Litovsk — Russia-Germany peace25% land + 33% population lost
July 1918Tablet to Nicholas II + Family in YekaterinburgThe formal end of the Romanov Dynasty
1918-21Civil War — Red vs White — 70 लाख+ deathsVictory of the Red Army
1919Comintern (Communist International) — LeninWorld Revolution का organization
1920AITUC, CPI (India में Communist movement)Russian Revolution का Indian impact
1921NEP (New Economic Policy) — Lenin"One step backward, two steps forward"
21 Jan 1924Lenin's death — Stalin vs TrotskyThe future of the USSR was decided
1928First Five Year Plan — StalinRapid Industrialization
1929-33Collectivization — Kulaks का liquidationUkraine Famine — Holodomor

Next chapter:Ch09 — Nazism and Fascism: The anti-communist reaction to the Russian Revolution led to the rise of Mussolini in Italy and Hitler in Germany. Industrialists, fearing communism, supported the fascists.

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