21 नवंबर 1963 का दिन — केरल के छोटे से मछुआरे गांव थुंबा (Thumba) में, एक साइकिल पर रॉकेट का एक हिस्सा और एक बैलगाड़ी पर दूसरा हिस्सा लादकर वैज्ञानिक चर्च के प्रांगण में बनी अस्थायी प्रयोगशाला की ओर बढ़ रहे थे — क्योंकि उस समय भारत के पास न तो कोई प्रक्षेपण केंद्र था, न पर्याप्त संसाधन। उस दिन भारत का पहला साउंडिंग रॉकेट अंतरिक्ष में छोड़ा गया। उन वैज्ञानिकों में एक युवा डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम भी थे, जो आगे चलकर भारत के राष्ट्रपति बने। यह वही भारत है, जिसने ठीक 60 साल बाद, 23 अगस्त 2023 को चंद्रयान-3 को चांद के दक्षिणी ध्रुव पर उतारकर विश्व का पहला देश बनने का गौरव हासिल किया — और अब 2028 तक अपने खुद के अंतरिक्ष स्टेशन व मानव अंतरिक्ष उड़ान की तैयारी कर रहा है। साइकिल पर रॉकेट ले जाने से लेकर चांद पर तिरंगा फहराने तक — यही है भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की अद्भुत यात्रा, जिसे हम इस अध्याय में विस्तार से समझेंगे।
भाग 1: ISRO का इतिहास, संरचना एवं प्रमुख केंद्र
भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई ने 1962 में 'भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति (Indian National Committee for Space Research - INCOSPAR)' की स्थापना करवाई, जिसके अंतर्गत ही थुंबा में भारत का पहला रॉकेट प्रक्षेपण केंद्र बना। इसी समिति के आधार पर 15 अगस्त 1969 को 'भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (Indian Space Research Organisation - ISRO)' की औपचारिक स्थापना हुई। जून 1972 में अंतरिक्ष आयोग (Space Commission) व अंतरिक्ष विभाग (Department of Space - DOS) का गठन किया गया, तथा सितंबर 1972 में ISRO को DOS के अंतर्गत लाया गया — जो सीधे प्रधानमंत्री के अधीन कार्य करता है।
भारत का संपूर्ण अंतरिक्ष कार्यक्रम एक स्पष्ट पदानुक्रम में संचालित होता है:
| अंतरिक्ष विभाग Department of Space — प्रधानमंत्री के अधीन | ➜ | अंतरिक्ष आयोग Space Commission — नीति निर्धारण | ➜ | ISRO क्रियान्वयन एजेंसी — अनुसंधान व विकास |
|---|
चित्र: भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की प्रशासनिक संरचना — नीति से क्रियान्वयन तक
ISRO का कार्य कई विशेषीकृत केंद्रों में बंटा है, जो अलग-अलग कार्यों पर केंद्रित हैं — यह वर्गीकरण परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है:
| केंद्र | स्थान एवं कार्य |
|---|---|
| विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (VSSC) | तिरुवनंतपुरम, केरल — प्रक्षेपण यानों (PSLV, GSLV, LVM3) के डिज़ाइन व विकास हेतु प्रमुख केंद्र |
| यू.आर. राव उपग्रह केंद्र (URSC) | बेंगलुरु, कर्नाटक — संचार, नौवहन, सुदूर संवेदन व अंतरग्रहीय मिशनों हेतु उपग्रहों के डिज़ाइन व निर्माण का प्रमुख केंद्र |
| सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (SDSC SHAR) | श्रीहरिकोटा, आंध्र प्रदेश — भारत का प्रमुख प्रक्षेपण स्थल (Spaceport); यहीं से सभी बड़े मिशन लॉन्च होते हैं |
| अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (SAC) | अहमदाबाद, गुजरात — उपग्रह पेलोड, संचार व सुदूर संवेदन अनुप्रयोगों पर शोध |
| इसरो टेलीमेट्री ट्रैकिंग एंड कमांड नेटवर्क (ISTRAC) | बेंगलुरु (मुख्यालय) — उपग्रहों व प्रक्षेपण यानों की ट्रैकिंग व नियंत्रण; जोधपुर (राजस्थान) सहित देश भर में कई ग्राउंड स्टेशन |
| राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (NRSC) — क्षेत्रीय केंद्र पश्चिम (RRSC-West) | जोधपुर, राजस्थान — राजस्थान, पंजाब, हरियाणा व गुजरात के लिए भू-स्थानिक अनुप्रयोग, विशेष रूप से शुष्क पारिस्थितिकी तंत्र (Arid Ecosystem) अध्ययन हेतु समर्पित |
जब भी कोई कहे कि राजस्थान का अंतरिक्ष कार्यक्रम से कोई सीधा नाता नहीं है, तो जोधपुर का नाम याद रखिए! जोधपुर में ISTRAC का ग्राउंड स्टेशन तथा राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र का क्षेत्रीय केंद्र-पश्चिम (RRSC-West) स्थापित है, जो राजस्थान सहित उत्तर-पश्चिमी भारत के रेगिस्तानी व शुष्क क्षेत्रों की उपग्रह-आधारित निगरानी, जल-संसाधन प्रबंधन व मरुस्थलीकरण अध्ययन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है — यानी राजस्थान का रेगिस्तान भी ISRO के वैज्ञानिक अध्ययन का हिस्सा है!
परंपरागत रूप से भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र पूर्णतः सरकारी था, परंतु 2020 के बाद इसमें बड़ा सुधार हुआ, जिससे निजी कंपनियों की भागीदारी को बढ़ावा मिला:
इस सुधार का परिणाम है कि फरवरी 2026 तक भारत में 400 से अधिक पंजीकृत अंतरिक्ष स्टार्टअप्स सक्रिय हैं, जिनमें $500 मिलियन डॉलर से अधिक का निवेश हो चुका है, तथा IN-SPACe ने 100 से अधिक निजी संस्थाओं को अंतरिक्ष गतिविधियों की अनुमति दी है। भारत का अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था अगले एक दशक में $40-45 बिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है, जिसमें वैश्विक बाज़ार में 8% हिस्सेदारी का लक्ष्य रखा गया है।
1. विक्रम साराभाई ने 1962 में INCOSPAR बनवाई; ISRO की औपचारिक स्थापना 15 अगस्त 1969 को हुई; यह अंतरिक्ष विभाग (DOS) के अधीन कार्य करता है। 2. प्रमुख केंद्र — VSSC (तिरुवनंतपुरम, यान विकास), URSC (बेंगलुरु, उपग्रह), SDSC शार (श्रीहरिकोटा, प्रक्षेपण स्थल), SAC (अहमदाबाद)। 3. राजस्थान कनेक्शन — जोधपुर में ISTRAC ग्राउंड स्टेशन व NRSC का क्षेत्रीय केंद्र-पश्चिम (RRSC-West) स्थापित है। 4. NSIL (वाणिज्यीकरण) व IN-SPACe (निजी क्षेत्र नियमन) से भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र अब निजी स्टार्टअप्स के लिए खुल चुका है — 400+ स्टार्टअप सक्रिय।
भाग 2: प्रक्षेपण यान (Launch Vehicles)
प्रक्षेपण यान (Launch Vehicle) वह रॉकेट है, जो उपग्रह या अंतरिक्ष यान को पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर निकालकर अंतरिक्ष की निर्धारित कक्षा में स्थापित करता है। यह आमतौर पर कई 'चरणों (Stages)' में बंटा होता है — हर चरण अपना ईंधन जलाकर अलग हो जाता है, जिससे यान हल्का होता जाता है और अगला चरण उसे और ऊंचाई व गति देता है — बिल्कुल वैसे ही जैसे कोई धावक बैटन रिले दौड़ में एक-एक करके अपने साथी को बैटन थमाता जाता है।
भारत का पहला प्रक्षेपण यान 'उपग्रह प्रक्षेपण यान (Satellite Launch Vehicle - SLV-3)' था, जिसने 18 जुलाई 1980 को रोहिणी उपग्रह को सफलतापूर्वक कक्षा में स्थापित किया — इसके साथ ही भारत उपग्रह प्रक्षेपण क्षमता रखने वाला विश्व का छठा देश बना। इसके बाद 'संवर्धित उपग्रह प्रक्षेपण यान (Augmented Satellite Launch Vehicle - ASLV)' विकसित किया गया, जो SLV से अधिक भार ले जाने में सक्षम था।
ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (Polar Satellite Launch Vehicle - PSLV) भारत का सबसे सफल व भरोसेमंद प्रक्षेपण यान है, जो मुख्यतः सूर्य-तुल्यकालिक ध्रुवीय कक्षा (Sun-Synchronous Polar Orbit) में उपग्रह स्थापित करता है। इसने 30 से अधिक देशों के उपग्रह प्रक्षेपित किए हैं तथा 2017 में एक ही उड़ान में रिकॉर्ड 104 उपग्रह प्रक्षेपित करने की उपलब्धि हासिल की।
15 फरवरी 2017 को PSLV-C37 मिशन ने एक ही प्रक्षेपण में 104 उपग्रह अंतरिक्ष में भेजे — यह उस समय विश्व रिकॉर्ड था! इसमें भारत का अपना कार्टोसैट-2D उपग्रह तथा 96 अमेरिकी व अन्य देशों के छोटे उपग्रह शामिल थे। यह दिखाता है कि PSLV कितना भरोसेमंद व लागत-प्रभावी वाहन है — जिसे दुनिया भर के देश अपने उपग्रह भेजने के लिए चुनते हैं।
भूस्थैतिक उपग्रह प्रक्षेपण यान (Geosynchronous Satellite Launch Vehicle - GSLV) भारी उपग्रहों को भूस्थैतिक स्थानांतरण कक्षा (Geostationary Transfer Orbit - GTO) में भेजने हेतु उपयोग होता है। इसके तीसरे चरण में 'क्रायोजेनिक इंजन (Cryogenic Engine)' लगा होता है, जो अत्यंत निम्न तापमान पर तरल हाइड्रोजन व तरल ऑक्सीजन का उपयोग करता है। शुरुआत में यह तकनीक भारत के पास नहीं थी और अमेरिका के दबाव में रूस ने भी तकनीक हस्तांतरण से इनकार कर दिया था — तब भारतीय वैज्ञानिकों ने स्वयं परिश्रम से स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन विकसित किया, जो भारत की आत्मनिर्भरता की एक बड़ी मिसाल है।
प्रक्षेपण यान मार्क-3 (Launch Vehicle Mark-3 - LVM3), जिसे पहले GSLV Mk-III कहा जाता था, भारत का सबसे शक्तिशाली प्रक्षेपण यान है, जो भूस्थैतिक स्थानांतरण कक्षा में 4,000 किलोग्राम तक का भार ले जा सकता है। इसमें विश्व के सबसे बड़े ठोस ईंधन बूस्टर व स्वदेशी क्रायोजेनिक चरण लगे हैं। यही वाहन चंद्रयान-2, चंद्रयान-3 तथा गगनयान के मानव-रहित व मानव मिशनों के लिए 'मानव-रेटेड प्रक्षेपण यान (Human-Rated Launch Vehicle - HLVM3)' के रूप में उपयोग हो रहा है।
लघु उपग्रह प्रक्षेपण यान (Small Satellite Launch Vehicle - SSLV) को विशेष रूप से छोटे उपग्रहों (500 किलोग्राम तक) को कम लागत, कम समय (कुछ ही दिनों की तैयारी) व कम जनशक्ति में लॉन्च करने हेतु डिज़ाइन किया गया है — यह तेज़ी से बढ़ते वैश्विक लघु-उपग्रह बाज़ार की मांग को पूरा करता है तथा निजी क्षेत्र के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है।
ISRO वर्तमान में 'अगली पीढ़ी का प्रक्षेपण यान (Next Generation Launch Vehicle - NGLV)', जिसे 'सूर्या (Soorya)' नाम भी दिया गया है, विकसित कर रहा है — यह आंशिक रूप से पुनः प्रयोज्य (Partially Reusable), तीन-चरणीय व मध्यम से अति-भारी श्रेणी का वाहन होगा, जो अंततः PSLV व GSLV की जगह लेगा। जनवरी 2026 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने श्रीहरिकोटा में एक तीसरे प्रक्षेपण पैड (Third Launch Pad) की स्थापना को ₹3,984.86 करोड़ की लागत से मंज़ूरी दी, जो NGLV व LVM3 दोनों के लिए उपयोग होगा। अप्रैल 2026 में ISRO ने पुनः प्रयोज्य रॉकेट (Reusable Launch Vehicle - RLV) कार्यक्रम हेतु 'लैंडिंग लेग हार्डवेयर' के निर्माण का टेंडर जारी किया, जो भविष्य में रॉकेट को वापस धरती पर सुरक्षित उतारने व दोबारा उपयोग करने की दिशा में एक बड़ा कदम है — ठीक वैसे ही जैसे स्पेसX अपने फाल्कन रॉकेट को दोबारा इस्तेमाल करता है।
| SLV/ASLV 1980s — प्रारंभिक क्षमता | ➜ | PSLV 1994 से — भरोसेमंद वाहन | ➜ | GSLV/LVM3 भारी भार, क्रायोजेनिक तकनीक | ➜ | NGLV (सूर्या) भविष्य — पुनः प्रयोज्य वाहन |
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चित्र: भारत के प्रक्षेपण यानों का विकास क्रम — प्रारंभिक क्षमता से लेकर पुनः प्रयोज्य भविष्य तक
1. SLV-3 (1980) भारत का पहला सफल प्रक्षेपण यान था; PSLV सबसे भरोसेमंद वाहन है (2017 में 104 उपग्रह एक साथ लॉन्च)। 2. GSLV व LVM3 में स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन तकनीक का उपयोग होता है; LVM3 (HLVM3) ही चंद्रयान व गगनयान का वाहन है। 3. SSLV छोटे उपग्रहों के लिए तेज़ व सस्ता समाधान है। 4. NGLV/सूर्या भविष्य का पुनः प्रयोज्य वाहन है; श्रीहरिकोटा में तीसरा लॉन्च पैड (₹3,984.86 करोड़) 2026 में स्वीकृत हुआ।
भाग 3: उपग्रह एवं उनके अनुप्रयोग
उपग्रह (Satellite) एक ऐसी वस्तु है, जो किसी ग्रह के चारों ओर एक निश्चित कक्षा (Orbit) में परिक्रमा करती है। उपग्रह की ऊंचाई व कार्य के अनुसार कक्षाओं को मुख्यतः तीन वर्गों में बांटा जाता है:
| निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) — 160-2,000 km — सुदूर संवेदन उपग्रह | ||
|---|---|---|
| मध्यम पृथ्वी कक्षा (MEO) — 2,000-35,786 km — नौवहन उपग्रह (NavIC) | ||
| भूस्थैतिक कक्षा (GEO) — 35,786 km — संचार उपग्रह (INSAT/GSAT) |
चित्र: उपग्रह कक्षाओं के प्रकार — ऊंचाई अनुसार कार्य क्षेत्र भिन्न होता है
भारतीय राष्ट्रीय उपग्रह प्रणाली (Indian National Satellite System - INSAT) व भारतीय भूस्थैतिक उपग्रह (Geosynchronous Satellite - GSAT) श्रृंखला भूस्थैतिक कक्षा में स्थापित संचार उपग्रह हैं, जो टेलीविज़न प्रसारण, दूरसंचार, मौसम पूर्वानुमान व आपदा चेतावनी सेवाएं प्रदान करते हैं। यह विश्व की सबसे बड़ी घरेलू संचार उपग्रह प्रणालियों में से एक है।
भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली (Indian Regional Navigation Satellite System - IRNSS), जिसे 'NavIC (Navigation with Indian Constellation)' नाम दिया गया है, भारत की अपनी स्वदेशी GPS-जैसी प्रणाली है, जो भारत व इसकी सीमाओं से 1,500 किलोमीटर तक सटीक स्थिति, नौवहन व समय संबंधी सेवाएं प्रदान करती है। परंतु मार्च 2026 तक केवल 3 उपग्रह ही सक्रिय रूप से डेटा दे रहे थे, जबकि सटीक स्थिति निर्धारण हेतु न्यूनतम 4 उपग्रहों की आवश्यकता होती है — इस कमी को दूर करने हेतु ISRO सितंबर 2027 तक NVS-03, NVS-04 व NVS-05 उपग्रह प्रक्षेपित करने की योजना बना रहा है, ताकि प्रणाली को पूर्ण क्षमता पर बहाल किया जा सके।
ध्यान दें: NavIC वर्तमान में एक चुनौतीपूर्ण दौर से गुज़र रहा है — यह RAS परीक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण करेंट अफेयर्स बिंदु है। छात्रों को यह ध्यान रखना चाहिए कि प्रणाली अस्थायी रूप से कमज़ोर स्थिति में है, परंतु ISRO की पुनःस्थापन योजना 2027 तक की है।
सुदूर संवेदन उपग्रह (Remote Sensing Satellites) पृथ्वी की सतह की तस्वीरें व डेटा एकत्र करते हैं, जिनका उपयोग कृषि, वन प्रबंधन, आपदा प्रबंधन, नगर नियोजन व सुरक्षा निगरानी में होता है।
| श्रृंखला | उपयोग |
|---|---|
| भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रह (IRS) | कृषि, जल-संसाधन, वन व भूमि-उपयोग मानचित्रण हेतु विश्व की सबसे बड़ी असैन्य सुदूर संवेदन उपग्रह श्रृंखलाओं में से एक |
| कार्टोसैट (Cartosat) | उच्च-विभेदन मानचित्रण व सीमा निगरानी हेतु उपयोगी |
| रिसैट (RISAT) | रडार इमेजिंग उपग्रह — बादल व रात में भी निगरानी संभव, सुरक्षा व आपदा प्रबंधन हेतु महत्वपूर्ण |
इन सुदूर संवेदन उपग्रहों से प्राप्त डेटा का उपयोग राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (NRSC) व इसके क्षेत्रीय केंद्रों (जैसे जोधपुर स्थित RRSC-West) द्वारा राज्य-स्तरीय योजनाओं में किया जाता है — जैसे राजस्थान में मरुस्थलीकरण की निगरानी, भूजल मानचित्रण व सूखा प्रबंधन।
1. उपग्रह कक्षाएं — LEO (सुदूर संवेदन), MEO (नौवहन), GEO (संचार) — ऊंचाई अनुसार भिन्न कार्य करती हैं। 2. INSAT/GSAT संचार हेतु, NavIC (IRNSS) नौवहन हेतु (वर्तमान में केवल 3 सक्रिय उपग्रह — 2027 तक पुनःस्थापन योजना) प्रयुक्त होते हैं। 3. IRS/Cartosat/RISAT सुदूर संवेदन श्रृंखला — जोधपुर स्थित RRSC-West राजस्थान में इनके डेटा का क्षेत्रीय उपयोग सुनिश्चित करता है। 4. NISAR (जुलाई 2025 प्रक्षेपण, जनवरी 2026 पूर्ण परिचालन) भारत-अमेरिका का ऐतिहासिक संयुक्त सुदूर संवेदन मिशन है।
भाग 4: प्रमुख मिशन एवं भविष्य
| मिशन | वर्ष | उपलब्धि |
|---|---|---|
| चंद्रयान-1 | 2008 | चांद पर जल के अणुओं (Water Molecules) की खोज — एक ऐतिहासिक वैज्ञानिक उपलब्धि |
| चंद्रयान-2 | 2019 | ऑर्बिटर सफल, परंतु विक्रम लैंडर की सॉफ्ट-लैंडिंग असफल रही |
| चंद्रयान-3 | 2023 | 23 अगस्त 2023 को चांद के दक्षिणी ध्रुव पर सफल सॉफ्ट-लैंडिंग — भारत विश्व का पहला देश व चौथा देश (चांद पर सॉफ्ट-लैंडिंग करने वाला) बना |
| चंद्रयान-4 | प्रस्तावित 2027-28 | चंद्र नमूना वापसी मिशन (Lunar Sample Return Mission) — 3 kg तक चंद्र मिट्टी पृथ्वी पर लाने का लक्ष्य; ₹2,104.06 करोड़ स्वीकृत; दो LVM3 प्रक्षेपणों में 5 मॉड्यूल भेजे जाएंगे |
14 जुलाई 2023 को श्रीहरिकोटा से उड़ा एक रॉकेट, और 23 अगस्त 2023 की शाम को विक्रम लैंडर चांद के दक्षिणी ध्रुव पर सफलतापूर्वक उतरा — यह क्षण भारत के लिए गर्व का पल था। चांद का दक्षिणी ध्रुव अत्यंत दुर्गम क्षेत्र है, जहां अभी तक कोई भी देश सफलतापूर्वक नहीं उतरा था। इसी उपलब्धि की याद में हर वर्ष 23 अगस्त को 'राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस (National Space Day)' मनाया जाता है।
मंगल कक्षित्र मिशन (Mars Orbiter Mission - MOM), जिसे 'मंगलयान' भी कहा जाता है, को 5 नवंबर 2013 को PSLV-C25 से प्रक्षेपित किया गया, तथा यह 24 सितंबर 2014 को सफलतापूर्वक मंगल की कक्षा में स्थापित हुआ। भारत, पहले ही प्रयास में मंगल तक पहुंचने वाला विश्व का पहला देश तथा एशिया का पहला देश बना — वह भी मात्र ₹450 करोड़ (लगभग $74 मिलियन) की बेहद किफायती लागत में, जो किसी हॉलीवुड फिल्म के बजट से भी कम था!
आदित्य-L1, भारत का पहला समर्पित सौर मिशन है, जिसे 2 सितंबर 2023 को PSLV से प्रक्षेपित किया गया। यह पृथ्वी व सूर्य के बीच स्थित 'लैग्रेंज बिंदु-1 (L1)' पर स्थापित है, जहां से सूर्य को बिना किसी ग्रहण के लगातार देखा जा सकता है। यह सौर वायुमंडल (कोरोना), सौर तूफान (Solar Flares) व अंतरिक्ष मौसम का अध्ययन करता है, जो पृथ्वी के संचार उपग्रहों व विद्युत ग्रिड को प्रभावित करने वाली घटनाओं की पूर्व चेतावनी में सहायक है।
गगनयान कार्यक्रम के अंतर्गत भारत पहली बार अपने स्वयं के प्रक्षेपण यान व तकनीक से मानव को अंतरिक्ष में भेजने जा रहा है। इस मिशन में कई परीक्षण चरण शामिल हैं, जो 2026 में तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं।
जैसा कि भाग 1 में देखा, राजस्थान का जोधपुर शहर भारत के अंतरिक्ष तंत्र का एक शांत परंतु महत्वपूर्ण हिस्सा है — यहां स्थित ISTRAC ग्राउंड स्टेशन उपग्रहों व प्रक्षेपण यानों की ट्रैकिंग में योगदान देता है, जबकि NRSC का क्षेत्रीय केंद्र-पश्चिम (RRSC-West) राजस्थान के शुष्क व मरुस्थलीय क्षेत्रों के उपग्रह-आधारित अध्ययन व निगरानी का केंद्र है। इसके अतिरिक्त IIT जोधपुर का अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी विभाग (Space Technology Department) ISRO के सहयोग से अनुसंधान परियोजनाओं (जैसे उच्च-ऊंचाई परीक्षण सुविधा हेतु इजेक्टर डिफ्यूज़र सिस्टम में फिल्म कूलिंग) पर कार्य कर रहा है, जो राज्य को भविष्य के अंतरिक्ष अनुसंधान में एक सक्रिय भागीदार बना रहा है।
1. चंद्रयान-3 (23 अगस्त 2023) — चांद के दक्षिणी ध्रुव पर सफल लैंडिंग, भारत विश्व का पहला देश; चंद्रयान-4 (2027-28) चंद्र नमूना वापसी मिशन है। 2. मंगलयान (2014) — पहले ही प्रयास में मंगल तक पहुंचने वाला विश्व का पहला देश, मात्र ₹450 करोड़ में। 3. आदित्य-L1 (2023) — सूर्य के अध्ययन हेतु L1 बिंदु पर स्थापित भारत का पहला सौर मिशन। 4. गगनयान — 2026 में परीक्षण तेज़ी से जारी (SOLVE टेस्ट जुलाई 2026); मानव-रहित मिशन 2027, मानव-सहित 2028 संभावित। 5. SpaDeX (जनवरी 2025) — भारतीय डॉकिंग प्रणाली से सफल उपग्रह डॉकिंग; भारत डॉकिंग तकनीक वाला विश्व का चौथा देश बना। 6. शुक्रयान (2028) व भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन BAS-01 (2028) भविष्य की बड़ी परियोजनाएं हैं। 7. राजस्थान — जोधपुर (ISTRAC, RRSC-West, IIT जोधपुर) अंतरिक्ष कार्यक्रम में राज्य का प्रमुख योगदान है।
भाग 5: सुदूर संवेदन, GIS एवं भू-स्थानिक प्रौद्योगिकी
कल्पना कीजिए कि आपके पास एक साधारण नक्शा है, और उस पर आप अलग-अलग 'पारदर्शी परतें (Layers)' चढ़ा सकते हैं — एक परत सड़कों की, एक परत नदियों की, एक परत आबादी के घनत्व की, एक परत मिट्टी के प्रकार की। जब ये सभी परतें एक साथ जोड़ी जाती हैं, तो आप एक ही नक्शे पर अनेक जानकारियों का विश्लेषण कर सकते हैं — यही है भौगोलिक सूचना प्रणाली (Geographic Information System - GIS)। यह एक कंप्यूटर आधारित प्रणाली है, जो भौगोलिक व स्थानिक (Spatial) डेटा को एकत्रित, संग्रहीत, विश्लेषित व प्रदर्शित करती है। भारत का भू-स्थानिक बाज़ार 2021 में ₹38,972 करोड़ का था, जो 12.8% वार्षिक वृद्धि दर से 2025 तक ₹63,100 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान था।
| घटक | कार्य |
|---|---|
| सुदूर संवेदन (Remote Sensing) | उपग्रह/विमान से बिना सीधे संपर्क के पृथ्वी की सतह की जानकारी एकत्र करना (जैसे उपग्रह चित्र) |
| भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) | एकत्रित स्थानिक डेटा को परतों में संगठित कर विश्लेषण व मानचित्रण करने का सॉफ्टवेयर उपकरण |
| वैश्विक नौवहन उपग्रह प्रणाली (GNSS/GPS) | स्थिति, दिशा व समय की सटीक जानकारी देने वाली उपग्रह प्रणाली — भारत की अपनी प्रणाली NavIC है |
भारत सरकार की SVAMITVA (Survey of Villages and Mapping with Improvised Technology in Village Areas) योजना ड्रोन सर्वेक्षण व GIS तकनीक का उपयोग कर ग्रामीण आबादी क्षेत्रों की संपत्ति का डिजिटल रिकॉर्ड (संपत्ति कार्ड) तैयार करती है। इससे लाखों ग्रामीणों को पहली बार अपनी ज़मीन का कानूनी दस्तावेज़ मिला, जिसका उपयोग वे बैंक ऋण लेने में भी कर सकते हैं — यह दिखाता है कि अंतरिक्ष तकनीक कैसे सीधे आम आदमी के जीवन तक पहुंच सकती है।
भुवन, ISRO के राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (NRSC) द्वारा विकसित एक भू-पोर्टल (Geoportal) है, जो भारतीय उपग्रहों से प्राप्त उच्च-विभेदन चित्रों व भू-स्थानिक डेटा को नागरिकों, शोधकर्ताओं व सरकारी विभागों के लिए निःशुल्क उपलब्ध कराता है। इसे अक्सर 'भारत का अपना गूगल अर्थ' कहा जाता है, परंतु यह विशेष रूप से भारतीय भौगोलिक संदर्भ, कृषि, वन व शहरी नियोजन डेटा पर केंद्रित है।
1. GIS स्थानिक डेटा को परतों में संगठित कर विश्लेषण करने वाला उपकरण है; भारत का भू-स्थानिक बाज़ार तेज़ी से बढ़ रहा है (₹38,972 करोड़ → ₹63,100 करोड़, 2021-2025)। 2. सुदूर संवेदन, GIS व GNSS/NavIC मिलकर भू-स्थानिक प्रौद्योगिकी के तीन स्तंभ बनाते हैं। 3. SVAMITVA योजना ड्रोन+GIS से ग्रामीण संपत्ति के डिजिटल रिकॉर्ड बना रही है — प्रौद्योगिकी का सीधा जन-लाभ उदाहरण। 4. भुवन (Bhuvan) — NRSC का भू-पोर्टल, भारत का अपना 'गूगल अर्थ', निःशुल्क उपलब्ध।
भाग 6: अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के क्षेत्रवार अनुप्रयोग
उपग्रह चित्रों से वैज्ञानिक यह पता लगा सकते हैं कि किसी क्षेत्र की फसल स्वस्थ है या तनाव में, कहां सिंचाई की कमी है, तथा आने वाले सीज़न में कितनी उपज होने की संभावना है — यह सब बिना खेत में गए, अंतरिक्ष से ही संभव है।
| क्षेत्र | उपग्रह/कार्यक्रम | कार्य |
|---|---|---|
| संचार | INSAT/GSAT श्रृंखला | दूरसंचार, टीवी प्रसारण, इंटरनेट कनेक्टिविटी विशेषकर दूरदराज़ क्षेत्रों में |
| मौसम पूर्वानुमान | INSAT-3DS (फरवरी 2024 प्रक्षेपित) | तीसरी पीढ़ी का समर्पित मौसम उपग्रह — भू-सतह व समुद्री सतह की निगरानी, IMD/NCMRWF/INCOIS जैसी एजेंसियों को डेटा आपूर्ति |
| आपदा प्रबंधन | राष्ट्रीय आपातकालीन प्रबंधन डेटाबेस (NDEM) | बाढ़, चक्रवात, भूस्खलन व सूखे की स्थिति में उपग्रह चित्रों से त्वरित क्षति आकलन व राहत योजना |
| रक्षा एवं निगरानी | कार्टोसैट-3, RISAT श्रृंखला | सीमा निगरानी, उच्च-विभेदन मानचित्रण व सामरिक टोही (Reconnaissance) |
जब बंगाल की खाड़ी में कोई चक्रवात बनना शुरू होता है, तो INSAT-3DS जैसे मौसम उपग्रह लगातार उसकी गति, तीव्रता व दिशा पर नज़र रखते हैं। भारतीय मौसम विभाग (IMD) इस डेटा के आधार पर 2-3 दिन पहले ही सटीक चेतावनी जारी कर देता है, जिससे तटीय क्षेत्रों से लाखों लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सकता है। यही कारण है कि हाल के वर्षों में भारत में चक्रवात से होने वाली मौतों की संख्या में भारी कमी आई है — यह अंतरिक्ष तकनीक का सबसे सीधा जीवन-रक्षक उपयोग है।
आधुनिक युद्ध अब केवल ज़मीन, समुद्र व आकाश तक सीमित नहीं है — अंतरिक्ष अब चौथा व सबसे महत्वपूर्ण सामरिक क्षेत्र (Domain) बन चुका है। भारत ने इस दिशा में 'रक्षा अंतरिक्ष एजेंसी (Defence Space Agency - DSA)' की स्थापना की है, जो तीनों सेनाओं (थल, जल, वायु) के लिए अंतरिक्ष-आधारित सैन्य क्षमताओं का समन्वय करती है। उपग्रह-आधारित निगरानी, संचार व नौवहन आज सीमा सुरक्षा, मिसाइल मार्गदर्शन व सामरिक योजना का अभिन्न हिस्सा हैं।
1. FASAL कार्यक्रम उपग्रह व मौसम डेटा से फसल पूर्वानुमान करता है — कृषि नीति व खाद्य सुरक्षा में सहायक। 2. INSAT-3DS (2024) मौसम पूर्वानुमान व चक्रवात चेतावनी हेतु तीसरी पीढ़ी का समर्पित उपग्रह है। 3. NDEM आपदा प्रबंधन हेतु उपग्रह डेटा का राष्ट्रीय डेटाबेस है; कार्टोसैट-3/RISAT रक्षा निगरानी में उपयोगी हैं। 4. रक्षा अंतरिक्ष एजेंसी (DSA) भारत के सैन्य अंतरिक्ष उपयोग का समन्वय करती है — अंतरिक्ष अब चौथा सामरिक डोमेन है।
भाग 7: Space Economy एवं निजी क्षेत्र की भूमिका
अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था (Space Economy) में उपग्रह निर्माण, प्रक्षेपण सेवाएं, भू-स्थानिक डेटा सेवाएं व अंतरिक्ष-आधारित संचार/नौवहन सभी शामिल हैं। भारत का यह क्षेत्र अब तेज़ी से एक बड़े वाणिज्यिक उद्योग में बदल रहा है।
| आधार | आंकड़ा (2026) |
|---|---|
| वर्तमान आकार | लगभग $8-9 बिलियन डॉलर — वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी लगभग 2-3% |
| अनुमानित भविष्य (अगला दशक) | $40-45 बिलियन डॉलर तक — लगभग 5 गुना (400%) वृद्धि का अनुमान |
| लक्ष्य हिस्सेदारी | 2030 तक वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में 8% हिस्सेदारी का लक्ष्य |
| अंतरिक्ष स्टार्टअप्स | 2014 में मात्र 1 पंजीकृत स्टार्टअप से बढ़कर फरवरी 2026 तक 400 से अधिक स्टार्टअप सक्रिय |
| निवेश | अंतरिक्ष स्टार्टअप्स में $500 मिलियन डॉलर से अधिक निवेश, जिसमें से लगभग $150 मिलियन डॉलर अकेले 2025 में आया |
जैसा कि भाग 1 में देखा, NSIL (वाणिज्यीकरण) व IN-SPACe (नियमन-प्राधिकरण) निजी क्षेत्र की भागीदारी के दो मुख्य स्तंभ हैं। इसके साथ ही फरवरी 2024 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अंतरिक्ष क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) नीति को भी उदार बनाया, ताकि वैश्विक निवेश व तकनीक को आकर्षित किया जा सके।
| गतिविधि | FDI सीमा (स्वचालित मार्ग) |
|---|---|
| उपग्रह घटकों व उप-प्रणालियों का विनिर्माण | 100% तक स्वचालित मार्ग से अनुमति |
| उपग्रह निर्माण, संचालन व डेटा उत्पाद | 74% तक स्वचालित मार्ग से; इससे अधिक हेतु सरकारी अनुमति आवश्यक |
| प्रक्षेपण यान एवं स्पेसपोर्ट निर्माण | 49% तक स्वचालित मार्ग से; इससे अधिक हेतु सरकारी अनुमति आवश्यक |
क्या आप जानते हैं कि अब भारत में केवल ISRO ही नहीं, बल्कि निजी कंपनियां भी अपने खुद के रॉकेट बना व लॉन्च कर रही हैं? हैदराबाद की स्काईरूट एयरोस्पेस (Skyroot Aerospace) ने भारत का पहला निजी रूप से विकसित रॉकेट 'विक्रम-एस' लॉन्च किया, जबकि चेन्नई की अग्निकुल कॉसमॉस (Agnikul Cosmos) ने अपने 3D-प्रिंटेड रॉकेट इंजन से भारत का पहला निजी लॉन्चपैड स्थापित किया। यह दिखाता है कि भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र अब केवल सरकारी एकाधिकार नहीं, बल्कि एक जीवंत स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र बन चुका है।
1. भारत की Space Economy वर्तमान में ~$8-9 बिलियन डॉलर की है, जो अगले दशक में $40-45 बिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है (5 गुना वृद्धि)। 2. 400+ अंतरिक्ष स्टार्टअप्स (2026) — 2014 में मात्र 1 था; $500 मिलियन डॉलर से अधिक निवेश आकर्षित हुआ है। 3. फरवरी 2024 — अंतरिक्ष क्षेत्र में उदार FDI नीति (घटक विनिर्माण 100%, उपग्रह 74%, प्रक्षेपण यान 49% स्वचालित मार्ग से)। 4. स्काईरूट व अग्निकुल जैसे निजी स्टार्टअप्स भारत के निजी रॉकेट पारिस्थितिकी तंत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं।
भाग 8: अंतरिक्ष सुरक्षा एवं चुनौतियां
पृथ्वी की कक्षा में आज लाखों टुकड़े मलबा (पुराने उपग्रह, रॉकेट के हिस्से, टकराव से बने टुकड़े) मौजूद हैं, जो हज़ारों किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से घूम रहे हैं — इतनी तेज़ गति पर एक छोटा सा बोल्ट भी किसी सक्रिय उपग्रह को नष्ट कर सकता है। इसी समस्या से जुड़ी एक चिंताजनक वैज्ञानिक अवधारणा है — 'केसलर सिंड्रोम (Kessler Syndrome)'।
कल्पना कीजिए डोमिनो के टुकड़ों की एक लंबी कतार — एक गिरता है तो अगला भी गिर जाता है, और यह सिलसिला रुकता नहीं। केसलर सिंड्रोम भी कुछ ऐसा ही है — अगर कक्षा में एक टक्कर होती है, तो उससे बना मलबा और टक्करों को जन्म देता है, और यह चेन रिएक्शन इतना बढ़ सकता है कि निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) आने वाली पीढ़ियों के लिए पूरी तरह अनुपयोगी हो जाए। यही कारण है कि दुनिया भर की अंतरिक्ष एजेंसियां अब मलबा प्रबंधन को गंभीरता से ले रही हैं।
अंतरिक्ष मलबे की समस्या से निपटने हेतु 'अंतर-एजेंसी अंतरिक्ष मलबा समन्वय समिति (Inter-Agency Space Debris Coordination Committee - IADC)' ने वैश्विक दिशानिर्देश जारी किए हैं, जिसके अनुसार किसी भी निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) उपग्रह को उसके मिशन समाप्त होने के 5 वर्षों के भीतर कक्षा से हटाने की विश्वसनीय योजना होनी चाहिए। भारत सहित सभी प्रमुख अंतरिक्ष शक्तियां अब अपने नए उपग्रहों के डिज़ाइन में 'मिशन-पश्चात निपटान (Post-Mission Disposal)' को अनिवार्य रूप से शामिल कर रही हैं, ताकि अंतरिक्ष को भावी पीढ़ियों के लिए उपयोग योग्य बनाए रखा जा सके।
1. केसलर सिंड्रोम — मलबे की टक्करों से बनने वाला चेन-रिएक्शन, जो LEO को अनुपयोगी बना सकता है। 2. मिशन शक्ति (27 मार्च 2019) — भारत का ASAT परीक्षण, भारत विश्व का चौथा ASAT-सक्षम देश बना; कम ऊंचाई पर परीक्षण से मलबा जोखिम सीमित रखा गया। 3. IADC दिशानिर्देश — LEO उपग्रहों को मिशन समाप्ति के 5 वर्षों में कक्षा से हटाने की अनिवार्यता। 4. अंतरिक्ष स्थिरता (Sustainability) अब वैश्विक प्राथमिकता है — सभी अंतरिक्ष शक्तियां मिशन-पश्चात निपटान अपना रही हैं।
भाग 9: भारत की अंतरिक्ष नीति एवं भविष्य की संभावनाएं
भारत सरकार ने अप्रैल 2023 में 'भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023' जारी की, जो देश के अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी को स्पष्ट कानूनी व संस्थागत ढांचा प्रदान करने वाला पहला व्यापक दस्तावेज़ है। इस नीति ने ISRO, NSIL, IN-SPACe व निजी क्षेत्र — चारों की भूमिकाओं को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया:
| संस्था | नई भूमिका (नीति 2023 के अनुसार) |
|---|---|
| ISRO | अनुसंधान, नई तकनीकों का विकास व अत्याधुनिक अंतरिक्ष मिशनों पर ध्यान केंद्रित — दिनचर्या संबंधी वाणिज्यिक कार्यों से मुक्त |
| NSIL | ISRO की तकनीकों व सेवाओं का वाणिज्यीकरण — उपग्रह निर्माण व प्रक्षेपण सेवाएं बेचना |
| IN-SPACe | निजी क्षेत्र को अंतरिक्ष गतिविधियों की अनुमति, प्रोत्साहन व नियमन देने वाली स्वतंत्र एजेंसी |
| निजी क्षेत्र | उपग्रह निर्माण, प्रक्षेपण यान विकास, डेटा सेवाओं में पूर्ण भागीदारी की अनुमति |
भारत अगले दशक में अंतरिक्ष क्षेत्र में कई मोर्चों पर आगे बढ़ने की तैयारी में है — पुनः प्रयोज्य प्रक्षेपण यान (NGLV/सूर्या), मानव अंतरिक्ष उड़ान (गगनयान), स्वयं का अंतरिक्ष स्टेशन (BAS), अंतरग्रहीय मिशन (शुक्रयान, चंद्रयान-4) तथा एक फलता-फूलता निजी अंतरिक्ष उद्योग — यह सभी मिलकर भारत को अगले दशक में विश्व की शीर्ष 3-4 अंतरिक्ष शक्तियों में शामिल कर सकते हैं। जून 2026 में केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने दोहराया कि भारत की Space Economy अगले दशक में पांच गुना वृद्धि करेगी — यह केवल वैज्ञानिक गौरव की नहीं, बल्कि रोज़गार, तकनीकी आत्मनिर्भरता व आर्थिक विकास की भी कहानी है।
1. भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 ने ISRO (अनुसंधान), NSIL (वाणिज्यीकरण), IN-SPACe (नियमन) व निजी क्षेत्र की भूमिकाओं को स्पष्ट किया। 2. भारत अगले दशक में NGLV, गगनयान, BAS, शुक्रयान व चंद्रयान-4 के साथ विश्व की अग्रणी अंतरिक्ष शक्तियों में शामिल होने की राह पर है। 3. Space Economy में पांच गुना वृद्धि (जून 2026 का अनुमान) आर्थिक विकास व रोज़गार सृजन का भी बड़ा स्रोत होगी।
भाग 10: गत दो वर्षों के प्रमुख वैश्विक अंतरिक्ष मिशन (करेंट अफेयर्स 2024-2026)
अंतरिक्ष विज्ञान परीक्षाओं में सबसे अधिक करेंट अफेयर्स-आधारित प्रश्न हाल के मिशनों से ही पूछे जाते हैं। नीचे भारत के पिछले दो वर्षों के महत्वपूर्ण मिशन दिए गए हैं — इन्हें भाग 3 व भाग 4 में पहले पढ़े गए विस्तृत विवरण के साथ जोड़कर याद रखें:
| मिशन | तिथि | मुख्य उपलब्धि |
|---|---|---|
| XPoSat (एक्स-रे पोलारिमीटर उपग्रह) | 1 जनवरी 2024 | भारत का पहला समर्पित एक्स-रे पोलारिमेट्री मिशन — ब्लैक होल व न्यूट्रॉन तारों से निकलने वाली एक्स-रे किरणों के ध्रुवीकरण का अध्ययन; विश्व का ऐसा दूसरा मिशन (NASA के IXPE के बाद) |
| INSAT-3DS | 17 फरवरी 2024 | तीसरी पीढ़ी का समर्पित मौसम उपग्रह — भू-सतह व समुद्री सतह निगरानी (भाग 6 में विस्तृत विवरण) |
| SpaDeX (डॉकिंग प्रयोग) | 30 दिसंबर 2024 / 16 जनवरी 2025 (सफल डॉकिंग) | भारतीय डॉकिंग प्रणाली से ऐतिहासिक उपग्रह डॉकिंग — भारत विश्व का चौथा डॉकिंग-सक्षम देश बना (भाग 4 में विस्तृत विवरण) |
| NISAR (भारत-अमेरिका संयुक्त मिशन) | 30 जुलाई 2025 | दोहरी आवृत्ति रडार से पृथ्वी सतह के सूक्ष्मतम बदलावों की निगरानी (भाग 3 में विस्तृत विवरण) |
| गगनयान परीक्षण श्रृंखला (G1) | 2026-27 (योजनाबद्ध) | मानव-रहित परीक्षण उड़ानें — मानव-सहित मिशन (2028) की तैयारी हेतु (भाग 4 में विस्तृत विवरण) |
भारत के साथ-साथ विश्व की अन्य प्रमुख अंतरिक्ष शक्तियां — अमेरिका, चीन, यूरोप व जापान — भी पिछले दो वर्षों में कई ऐतिहासिक मिशन पूरे कर चुकी हैं या कर रही हैं। यह वैश्विक परिदृश्य समझना RAS परीक्षा के अंतरराष्ट्रीय करेंट अफेयर्स खंड के लिए अत्यंत उपयोगी है:
| मिशन (देश/एजेंसी) | तिथि | मुख्य उपलब्धि |
|---|---|---|
| चांगए-6 (Chang'e-6, चीन) | मई-जून 2024 | चांद के सुदूर भाग (Far Side) से चट्टान व मिट्टी के नमूने पृथ्वी पर लाने वाला विश्व का पहला मिशन |
| पोलारिस डॉन (Polaris Dawn, स्पेसX) | सितंबर 2024 | विश्व की पहली पूर्णतः निजी क्षेत्र की स्पेसवॉक (Private Spacewalk) — वाणिज्यिक अंतरिक्ष यात्रा में नया मील का पत्थर |
| हेरा (Hera, ESA) | अक्टूबर 2024 (प्रक्षेपण) | NASA के DART मिशन (2022, क्षुद्रग्रह दिशा-परिवर्तन परीक्षण) के प्रभाव का अध्ययन; नवंबर 2026 तक डिडिमोस-डिमोर्फोस क्षुद्रग्रह प्रणाली तक पहुंचने का लक्ष्य |
| यूरोपा क्लिपर (Europa Clipper, NASA) | 14 अक्टूबर 2024 | बृहस्पति के बर्फीले उपग्रह यूरोपा के उपसतही महासागर में जीवन की संभावना तलाशने हेतु; 2030 में बृहस्पति पहुंचेगा |
| तियानवेन-2 (Tianwen-2, चीन) | 28 मई 2025 | क्षुद्रग्रह कामोओलेवा (469219 Kamo'oalewa) से नमूना वापसी मिशन — जून 2026 में क्षुद्रग्रह तक पहुंचा |
| आर्टेमिस-II (Artemis II, NASA) | 1 अप्रैल 2026 | अपोलो-17 (1972) के बाद मनुष्यों की चांद के चारों ओर पहली परिक्रमा उड़ान — 4 अंतरिक्ष यात्री, लगभग 10 दिन की यात्रा |
| चांगए-7 (Chang'e-7, चीन) | 2026 (योजनाबद्ध) | चांद के दक्षिणी ध्रुव स्थित शैकलटन क्रेटर पर जल-बर्फ खोज मिशन — ऑर्बिटर, लैंडर, रोवर व एक 'हॉपर' उपकरण शामिल |
| बेपीकोलंबो (BepiColombo, ESA-JAXA) | नवंबर 2026 (बुध कक्षा प्रवेश लक्ष्य) | यूरोप-जापान का संयुक्त मिशन — बुध ग्रह के अध्ययन हेतु 8 वर्षों की यात्रा के बाद कक्षा में प्रवेश |
यह दिलचस्प संयोग है कि जिस समय (2024-25) भारत अपनी SpaDeX डॉकिंग तकनीक का परीक्षण कर रहा था, उसी दौर में चीन का चांगए-6 मिशन चांद के उस सुदूर भाग से नमूने ला रहा था, जहां पृथ्वी से सीधा संचार भी संभव नहीं (क्योंकि चांद का सुदूर भाग हमेशा पृथ्वी से छिपा रहता है, इसलिए वहां से संचार हेतु एक विशेष रिले उपग्रह की आवश्यकता होती है)। यह दिखाता है कि 21वीं सदी की अंतरिक्ष दौड़ अब केवल दो देशों (अमेरिका-रूस) तक सीमित नहीं, बल्कि भारत व चीन सहित कई देश एक साथ अलग-अलग तकनीकी मोर्चों पर आगे बढ़ रहे हैं।
अंतरिक्ष अब किसी एक देश की संपत्ति नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानून व सहयोग द्वारा संचालित एक साझा क्षेत्र है — इसे समझना किसी भी अंतरिक्ष-संबंधी प्रश्न के लिए आधारभूत ज्ञान है:
परीक्षा उपयोगी बिंदु: यदि प्रश्न 'भारत के अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष सहयोग' पर केंद्रित हो, तो तीन उदाहरण अवश्य दें — (1) NISAR (भारत-अमेरिका, संयुक्त उपग्रह), (2) आर्टेमिस समझौते (जून 2023 हस्ताक्षर), (3) चंद्रयान-5 (भारत-जापान संयुक्त मिशन, 2028 के बाद प्रस्तावित) — यह उत्तर को व्यापक व अद्यतन बनाता है।
1. भारत (2024-26) — XPoSat, INSAT-3DS, SpaDeX (डॉकिंग में विश्व का चौथा देश), NISAR, गगनयान परीक्षण श्रृंखला। 2. चीन — Chang'e-6 (चांद के सुदूर भाग से नमूना, 2024), Tianwen-2 (क्षुद्रग्रह नमूना, 2025), Chang'e-7 (चंद्र दक्षिणी ध्रुव, 2026)। 3. अमेरिका — Europa Clipper (2024), Polaris Dawn (निजी स्पेसवॉक, 2024), Artemis-II (चंद्र-परिक्रमा मानव मिशन, अप्रैल 2026)। 4. यूरोप-जापान — Hera (क्षुद्रग्रह अध्ययन), BepiColombo (बुध कक्षा प्रवेश, नवंबर 2026)। 5. बाह्य अंतरिक्ष संधि 1967 (स्वामित्व-निषेध) व आर्टेमिस समझौते (भारत का हस्ताक्षर जून 2023) अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष सहयोग के दो स्तंभ हैं।
भाग 11: अंतरिक्ष के मूल सिद्धांत, प्रणोदन एवं वैश्विक तुलनात्मक अध्ययन
'अंतरिक्ष' औपचारिक रूप से कहां से शुरू होता है, इसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य सीमा को 'कार्मन रेखा (Karman Line)' कहते हैं, जो पृथ्वी की सतह से लगभग 100 किलोमीटर ऊंचाई पर स्थित है। इस ऊंचाई के बाद वायुमंडल इतना विरल हो जाता है कि सामान्य विमान उड़ान संभव नहीं रहती — इसलिए इसे पृथ्वी के वायुमंडल व बाह्य अंतरिक्ष के बीच की सीमा माना जाता है। कोई भी यान जो इस रेखा को पार करता है, उसे 'अंतरिक्ष यात्रा' मानी जाती है।
भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को सही संदर्भ में समझने हेतु विश्व अंतरिक्ष इतिहास की प्रमुख घटनाओं को जानना आवश्यक है — यह शीत युद्ध के दौर की अमेरिका-रूस अंतरिक्ष होड़ (Space Race) से जुड़ा है:
| वर्ष | घटना | देश |
|---|---|---|
| 1957 | स्पुतनिक-1 — विश्व का पहला कृत्रिम उपग्रह प्रक्षेपित | USSR |
| 1957 | लाइका (कुत्ता) — अंतरिक्ष में जाने वाला प्रथम जीव (स्पुतनिक-2) | USSR |
| 1961 | यूरी गागरिन — अंतरिक्ष में जाने वाले प्रथम मानव (वोस्तोक-1) | USSR |
| 1963 | वेलेंटीना तेरेश्कोवा — अंतरिक्ष में जाने वाली प्रथम महिला | USSR |
| 1969 | अपोलो-11 — नील आर्मस्ट्रांग व बज़ एल्ड्रिन चांद पर उतरने वाले प्रथम मानव | USA |
| 1971 | सैल्यूट-1 — विश्व का पहला अंतरिक्ष स्टेशन | USSR |
| 1998 | अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) का निर्माण प्रारंभ | बहुराष्ट्रीय (USA-रूस-यूरोप-जापान-कनाडा) |
| क्र. | अध्यक्ष | कार्यकाल |
|---|---|---|
| 1 | विक्रम साराभाई | 1963-1971 (संस्थापक अध्यक्ष) |
| 2 | एम.जी.के. मेनन | 1972 (लगभग 9 माह) |
| 3 | सतीश धवन | 1972-1984 (सबसे लंबा कार्यकाल — 12 वर्ष) |
| 4 | यू.आर. राव | 1984-1994 |
| 5 | के. कस्तूरीरंगन | 1994-2003 |
| 6 | जी. माधवन नायर | 2003-2009 |
| 7 | के. राधाकृष्णन | 2009-2014 |
| 8 | ए.एस. किरण कुमार | 2015-2018 |
| 9 | के. सिवन | 2018-2022 |
| 10 | एस. सोमनाथ | 2022-जनवरी 2025 |
| 11 | डॉ. वी. नारायणन | जनवरी 2025-वर्तमान (वर्तमान अध्यक्ष) |
रॉकेट कार्य के मूल में न्यूटन का तीसरा नियम है — ईंधन जलाकर पीछे की ओर गैस छोड़ने से आगे की ओर बल (Thrust) उत्पन्न होता है। प्रणोदक तीन प्रकार के होते हैं:
| प्रकार | उदाहरण/रसायन | विशेषता |
|---|---|---|
| ठोस प्रणोदक (Solid) | HTPB, अमोनियम परक्लोरेट (Ammonium Perchlorate) | सरल भंडारण; एक बार प्रज्वलित होने पर नियंत्रण कठिन; PSLV/GSLV के बूस्टर में |
| तरल प्रणोदक (Liquid) | UDMH (ईंधन) + N2O4 (ऑक्सीडाइज़र) | नियंत्रण योग्य थ्रस्ट (बंद/शुरू किया जा सकता है); जटिल टैंक प्रणाली आवश्यक |
| क्रायोजेनिक प्रणोदक (Cryogenic) | तरल हाइड्रोजन (LH2) + तरल ऑक्सीजन (LOX) | अत्यंत निम्न तापमान (-253°C तक) पर संग्रहीत; सर्वाधिक ऊर्जा-दक्ष; GSLV/LVM3 के ऊपरी चरण में |
भारत के स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन विकास से पहले रूस ने KVD इंजन तकनीक का सीमित हस्तांतरण किया था; आज भारत के स्वदेशी CE-20 (LVM3 में प्रयुक्त) व CE-7.5 (GSLV में प्रयुक्त) क्रायोजेनिक इंजन इसी आत्मनिर्भरता यात्रा के प्रमाण हैं। भविष्य के हाइपरसोनिक/पुनः प्रयोज्य वाहनों हेतु 'स्क्रैमजेट (Scramjet)' इंजन तकनीक पर भी ISRO शोध कर रहा है, जो वायुमंडलीय ऑक्सीजन का सीधे उपयोग कर ईंधन-भार कम करता है।
| मिशन प्रकार | विवरण | उदाहरण |
|---|---|---|
| फ्लाई-बाय (Fly-By) | लक्ष्य के निकट से गुज़रते हुए डेटा एकत्र करना, बिना कक्षा में स्थापित हुए | New Horizons (प्लूटो) |
| ऑर्बिटर (Orbiter) | लक्ष्य ग्रह/उपग्रह की परिक्रमा करते हुए दीर्घकालिक अध्ययन | चंद्रयान-2 ऑर्बिटर, मंगलयान |
| लैंडर (Lander) | सतह पर सुरक्षित उतरकर स्थिर स्थान से अध्ययन करना | विक्रम लैंडर (चंद्रयान-3) |
| रोवर (Rover) | सतह पर घूमकर विभिन्न स्थानों का अध्ययन करना | प्रज्ञान रोवर (चंद्रयान-3) |
| प्रणाली | देश/क्षेत्र | कवरेज |
|---|---|---|
| GPS (Global Positioning System) | USA | वैश्विक कवरेज — सबसे पुरानी व व्यापक रूप से प्रयुक्त प्रणाली |
| GLONASS | रूस | वैश्विक कवरेज |
| Galileo | यूरोपीय संघ (EU) | वैश्विक कवरेज — असैन्य नियंत्रण वाली प्रणाली |
| BeiDou | चीन | वैश्विक कवरेज — 2020 में पूर्ण रूप से चालू |
| NavIC (IRNSS) | भारत | क्षेत्रीय कवरेज — भारत व सीमाओं से 1,500 km तक |
| GAGAN | भारत | GPS सिग्नल की सटीकता बढ़ाने वाली सहायक प्रणाली (SBAS) — विशेषकर विमानन क्षेत्र हेतु, भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI) व ISRO की संयुक्त परियोजना |
| एजेंसी | देश | प्रमुख उपलब्धि/मिशन |
|---|---|---|
| NASA | USA | अपोलो-11 (चंद्र मानव मिशन), आर्टेमिस कार्यक्रम, यूरोपा क्लिपर |
| Roscosmos | रूस | स्पुतनिक-1, वोस्तोक-1 (गागरिन), सैल्यूट व मीर अंतरिक्ष स्टेशन |
| ESA (European Space Agency) | यूरोप (बहुराष्ट्रीय) | हेरा मिशन, बेपीकोलंबो (JAXA सहयोग से) |
| CNSA | चीन | चांगए श्रृंखला (चंद्र मिशन), तियानवेन (मंगल/क्षुद्रग्रह), तियांगोंग अंतरिक्ष स्टेशन |
| JAXA | जापान | हायाबुसा (क्षुद्रग्रह नमूना मिशन), बेपीकोलंबो (ESA सहयोग) |
| ISRO | भारत | चंद्रयान-3 (चंद्र दक्षिणी ध्रुव), मंगलयान (प्रथम प्रयास में सफलता), SpaDeX (डॉकिंग) |
भारत से जुड़े अंतरिक्ष यात्रियों में सबसे पहला व सबसे प्रसिद्ध नाम है राकेश शर्मा — वे 3 अप्रैल 1984 को सोवियत संघ के सोयुज़ T-11 मिशन के ज़रिए अंतरिक्ष में जाने वाले प्रथम भारतीय बने, तथा अंतरिक्ष से लौटकर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के 'भारत अंतरिक्ष से कैसा दिखता है' प्रश्न पर उनका प्रसिद्ध उत्तर था — 'सारे जहां से अच्छा'। भारतीय मूल की कल्पना चावला अमेरिकी नागरिक के रूप में NASA अंतरिक्ष यात्री बनीं तथा 1997 में STS-87 मिशन से अंतरिक्ष में जाने वाली प्रथम भारतीय मूल की महिला बनीं; दुर्भाग्यवश 1 फरवरी 2003 को कोलंबिया स्पेस शटल दुर्घटना में उनका निधन हो गया।
1. कार्मन रेखा (~100 km) पृथ्वी के वायुमंडल व अंतरिक्ष के बीच की मान्य सीमा है। 2. विश्व अंतरिक्ष इतिहास — स्पुतनिक-1 (1957), गागरिन (1961, प्रथम मानव), तेरेश्कोवा (1963, प्रथम महिला), अपोलो-11 (1969, चांद पर मानव), सैल्यूट-1 (1971, प्रथम स्पेस स्टेशन)। 3. ISRO के अब तक 11 अध्यक्ष रहे हैं — विक्रम साराभाई (संस्थापक) से डॉ. वी. नारायणन (जनवरी 2025 से वर्तमान) तक; सतीश धवन का कार्यकाल सबसे लंबा (12 वर्ष) रहा। 4. प्रणोदक तीन प्रकार — ठोस (HTPB), तरल (UDMH+N2O4) व क्रायोजेनिक (LH2+LOX, CE-20/CE-7.5); PSLV SSO हेतु, GSLV GTO हेतु उपयुक्त है। 5. मिशन प्रकार — Fly-By, Orbiter, Lander, Rover; AstroSat (2015) भारत की पहली समर्पित खगोल विज्ञान वेधशाला है। 6. वैश्विक GNSS — GPS (USA), GLONASS (रूस), Galileo (EU), BeiDou (चीन) व भारत का NavIC+GAGAN। 7. राकेश शर्मा (1984, प्रथम भारतीय अंतरिक्ष यात्री, सोयुज़ T-11) व कल्पना चावला (1997, प्रथम भारतीय-मूल महिला अंतरिक्ष यात्री) भारत से जुड़े प्रमुख नाम हैं।
Q1. ISRO की स्थापना कब हुई तथा इसके संस्थापक कौन थे? Q2. भारत का पहला प्रक्षेपण यान कौनसा था तथा इसने किस उपग्रह को कक्षा में स्थापित किया? Q3. PSLV-C37 मिशन की ऐतिहासिक उपलब्धि क्या थी? Q4. GSLV में प्रयुक्त क्रायोजेनिक इंजन तकनीक के बारे में संक्षेप में लिखिए। Q5. चंद्रयान-3 किस तिथि को चांद पर उतरा तथा इसकी क्या विशेषता है? Q6. मंगलयान मिशन की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या थी? Q7. NavIC प्रणाली क्या है तथा वर्तमान में इसके सामने क्या चुनौती है? Q8. NISAR मिशन किन दो देशों का संयुक्त प्रयास है? Q9. जोधपुर (राजस्थान) में स्थित ISRO से संबंधित केंद्रों के नाम बताइए। Q10. गगनयान कार्यक्रम में व्योममित्र की क्या भूमिका है? Q11. SVAMITVA योजना में GIS तकनीक का क्या उपयोग होता है? Q12. FASAL कार्यक्रम का पूर्ण रूप एवं उद्देश्य बताइए। Q13. INSAT-3DS उपग्रह की मुख्य विशेषताएं क्या हैं? Q14. मिशन शक्ति (ASAT परीक्षण) कब व कहां से किया गया? Q15. केसलर सिंड्रोम क्या है? Q16. IN-SPACe की स्थापना किस उद्देश्य से की गई? Q17. अंतरिक्ष क्षेत्र में FDI नीति (2024) के तहत उपग्रह निर्माण हेतु कितने प्रतिशत तक स्वचालित मार्ग से FDI की अनुमति है? Q18. भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 किस वर्ष जारी हुई तथा इसका मुख्य उद्देश्य क्या है? Q19. SpaDeX मिशन में प्रयुक्त उपग्रहों (SDX01, SDX02) की सफल डॉकिंग किस तिथि को हुई? Q20. चांगए-6 (Chang'e-6) मिशन की ऐतिहासिक उपलब्धि क्या थी? Q21. आर्टेमिस-II मिशन किस तिथि को प्रक्षेपित हुआ तथा इसका उद्देश्य क्या है? Q22. बाह्य अंतरिक्ष संधि (Outer Space Treaty), 1967 के दो प्रमुख प्रावधान बताइए। Q23. भारत ने आर्टेमिस समझौतों (Artemis Accords) पर कब हस्ताक्षर किए? Q24. कार्मन रेखा क्या है तथा यह किस ऊंचाई पर स्थित है? Q25. अंतरिक्ष में जाने वाले प्रथम मानव व प्रथम महिला कौन थे तथा किस मिशन से गए? Q26. ISRO के संस्थापक अध्यक्ष कौन थे तथा वर्तमान अध्यक्ष कौन हैं? Q27. क्रायोजेनिक प्रणोदक में किन रसायनों का उपयोग होता है? Q28. AstroSat क्या है तथा इसे कब प्रक्षेपित किया गया? Q29. GAGAN प्रणाली का उद्देश्य क्या है? Q30. भारत के प्रथम अंतरिक्ष यात्री कौन थे तथा वे किस मिशन से अंतरिक्ष में गए? Q31. फ्लाई-बाय, ऑर्बिटर, लैंडर व रोवर मिशन में क्या अंतर है?