क्या आप जानते हैं कि जब आपकी दादी-नानी दही जमाती हैं, रोटी का आटा गूंथकर उसे कुछ घंटे फूलने देती हैं, या गांव में शराब बनाई जाती है — तो यह सब हज़ारों साल पुरानी 'जैव प्रौद्योगिकी (Biotechnology)' ही है! प्राचीन मनुष्य को यह नहीं पता था कि दूध में मौजूद जीवाणु (Bacteria) उसे दही में बदल रहे हैं, या ख़मीर (Yeast) आटे को फुला रहा है — परंतु वह अनजाने में ही जीवित जीवों का उपयोग कर एक उपयोगी उत्पाद बना रहा था। अब कल्पना कीजिए 20 नवंबर 2025 का दिन — जब भारत ने बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पर 'BIRSA 101' नामक विश्व की सबसे किफायती स्वदेशी CRISPR जीन थेरेपी लॉन्च की, जो सिकल सेल रोग जैसी आनुवंशिक बीमारी को जड़ से ठीक कर सकती है — मरीज़ के शरीर के अंदर ही उसके ख़राब जीन को सुधारकर! यह वही यात्रा है — दही जमाने से लेकर जीन में सुधार करने तक — जिसे हम इस अध्याय में विस्तार से समझेंगे।
भाग 1: जैव प्रौद्योगिकी की बुनियादी अवधारणाएं
जैव प्रौद्योगिकी (Biotechnology) वह विज्ञान है, जिसमें जीवित जीवों (सूक्ष्मजीव, पौधे, पशु) या उनके अंगों/कोशिकाओं/एंजाइम का उपयोग करके ऐसे उत्पाद या प्रक्रियाएं विकसित की जाती हैं, जो मानव जीवन के लिए उपयोगी हों। इसका इतिहास हज़ारों वर्ष पुराना है — दही, शराब, पनीर व ब्रेड बनाना 'पारंपरिक जैव प्रौद्योगिकी' के उदाहरण हैं। परंतु आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी की शुरुआत 1953 में जेम्स वाटसन व फ्रांसिस क्रिक द्वारा DNA की द्वि-कुंडलिनी (Double Helix) संरचना की खोज से हुई, तथा 1973 में स्टेनली कोहेन व हरबर्ट बॉयर द्वारा पहली बार 'पुनर्योगज DNA तकनीक (Recombinant DNA Technology)' का सफल प्रयोग किया गया — यहीं से आधुनिक आनुवंशिक अभियांत्रिकी का जन्म माना जाता है।
जैव प्रौद्योगिकी को उसके क्षेत्र व अनुप्रयोग के अनुसार अलग-अलग 'रंगों' में वर्गीकृत किया जाता है — यह वर्गीकरण परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है:
| रंग/शाखा | क्षेत्र एवं उपयोग |
|---|---|
| लाल जैव प्रौद्योगिकी (Red Biotechnology) | चिकित्सा क्षेत्र — जीन थेरेपी, स्टेम सेल शोध, नई दवाओं व वैक्सीन का विकास |
| हरित जैव प्रौद्योगिकी (Green Biotechnology) | कृषि क्षेत्र — पोषक तत्वों से भरपूर, सूखा-सहिष्णु व कीट-प्रतिरोधी GM फसलें विकसित करना |
| श्वेत जैव प्रौद्योगिकी (White Biotechnology) | औद्योगिक प्रक्रियाएं — सूक्ष्मजीवों/एंजाइम से पर्यावरण-अनुकूल औद्योगिक उत्पादन (डिटर्जेंट, कपड़ा, कागज़) |
| नीली जैव प्रौद्योगिकी (Blue Biotechnology) | समुद्री जीवों का उपयोग — बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक, सौंदर्य प्रसाधन व औषधि हेतु समुद्री एंजाइम/प्रोटीन |
| धूसर जैव प्रौद्योगिकी (Grey Biotechnology) | पर्यावरण संरक्षण — बायोरेमेडिएशन, अपशिष्ट प्रबंधन |
| पीली जैव प्रौद्योगिकी (Yellow Biotechnology) | खाद्य उत्पादन एवं पोषण — किण्वित खाद्य पदार्थ, खाद्य सुरक्षा |
जब आप डायबिटीज़ के मरीज़ को इंसुलिन का इंजेक्शन लेते देखते हैं, तो वह इंसुलिन असल में जीवाणु (E. coli) द्वारा बनाया गया 'लाल जैव प्रौद्योगिकी' का उत्पाद है। जब आप जींस पहनते हैं जिसे 'स्टोन-वॉश' फिनिश दी गई है, तो यह काम पत्थर की बजाय एक विशेष एंजाइम ने किया, जो 'श्वेत जैव प्रौद्योगिकी' का उदाहरण है। और जब किसान Bt कॉटन बोता है, तो वह 'हरित जैव प्रौद्योगिकी' का लाभ उठा रहा है — एक ही विज्ञान, अनेक रंग, अनेक उपयोग!
पुनर्योगज DNA तकनीक (जिसे अक्सर 'आनुवंशिक अभियांत्रिकी' भी कहा जाता है) वह प्रयोगशाला विधि है, जिसमें दो अलग-अलग जीवों के DNA टुकड़ों को जोड़कर एक नया 'पुनर्योगज DNA (Recombinant DNA)' बनाया जाता है। इस नए DNA को किसी होस्ट कोशिका (जैसे जीवाणु) में डाला जाता है, जो फिर वांछित प्रोटीन (जैसे इंसुलिन) का बड़ी मात्रा में उत्पादन शुरू कर देती है।
| 1. जीन पृथक्करण वांछित जीन को अलग करना | ➜ | 2. वेक्टर में प्रवेश प्लाज्मिड/वायरस वाहक में जोड़ना | ➜ | 3. होस्ट कोशिका जीवाणु/यीस्ट में स्थानांतरण | ➜ | 4. उत्पाद निर्माण प्रोटीन का बड़े स्तर पर उत्पादन |
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चित्र: पुनर्योगज DNA तकनीक की कार्यप्रणाली — इसी प्रक्रिया से इंसुलिन, वैक्सीन व अन्य जैव-औषधियां बनती हैं
पुनर्योगज DNA तकनीक के विपरीत, पॉलीमरेज़ चेन रिएक्शन (PCR) एक ऐसी तकनीक है, जिसमें किसी DNA के एक छोटे टुकड़े को जीवित कोशिका के बाहर (in-vitro) ही लाखों प्रतियों में बहुगुणित (Amplify) किया जाता है। इसका आविष्कार 1983 में केरी मुलिस (Kary Mullis) ने किया था, जिसके लिए उन्हें 1993 में नोबेल पुरस्कार मिला। PCR का उपयोग कोविड-19 जांच (RT-PCR टेस्ट), फोरेंसिक जांच में DNA फिंगरप्रिंटिंग (अपराधी की पहचान, पितृत्व परीक्षण) व आनुवंशिक बीमारियों के निदान में व्यापक रूप से होता है।
PCR को एक 'DNA फोटोकॉपी मशीन' समझिए — जैसे एक दस्तावेज़ की सैकड़ों प्रतियां फोटोकॉपियर से कुछ ही मिनटों में बनाई जा सकती हैं, वैसे ही PCR मशीन DNA के एक सूक्ष्म टुकड़े को कुछ ही घंटों में लाखों प्रतियों में बदल देती है — जिससे वैज्ञानिकों को जांच व शोध के लिए पर्याप्त मात्रा मिल जाती है। कोविड-19 महामारी के दौरान RT-PCR टेस्ट इसी तकनीक पर आधारित थे।
1. आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी की शुरुआत 1953 (DNA संरचना खोज) व 1973 (पहली पुनर्योगज DNA तकनीक — कोहेन व बॉयर) से मानी जाती है। 2. जैव प्रौद्योगिकी की प्रमुख शाखाएं — लाल (चिकित्सा), हरित (कृषि), श्वेत (औद्योगिक), नीली (समुद्री), धूसर (पर्यावरण) व पीली (खाद्य) हैं। 3. पुनर्योगज DNA तकनीक से इंसुलिन जैसे प्रोटीन जीवाणु कोशिका में बड़े पैमाने पर बनाए जाते हैं। 4. PCR (केरी मुलिस, 1983, नोबेल 1993) से DNA को शरीर के बाहर लाखों गुना बहुगुणित किया जाता है — कोविड जांच व फोरेंसिक में उपयोगी। 5. किण्वन तकनीक व ऊतक संवर्धन क्रमशः औद्योगिक उत्पादन व रोग-मुक्त पौध-प्रवर्धन में उपयोगी हैं।
भाग 2: आनुवंशिक अभियांत्रिकी एवं जीन संपादन
आनुवंशिक अभियांत्रिकी (Genetic Engineering), जीवों के DNA को प्रत्यक्ष रूप से बदलने, हटाने या नया जीन जोड़ने की तकनीक है, ताकि उस जीव में वांछित नया गुण उत्पन्न किया जा सके। इस प्रकार बनाए गए जीव को 'आनुवंशिक रूप से रूपांतरित जीव (Genetically Modified Organism - GMO)' कहा जाता है। यह पुनर्योगज DNA तकनीक का ही व्यापक अनुप्रयोग है, जो आज कृषि, चिकित्सा व उद्योग तीनों क्षेत्रों में क्रांति ला चुका है।
कल्पना कीजिए कि DNA एक बहुत लंबा वाक्य है, और उसमें एक गलत शब्द (ख़राब जीन) को ढूंढकर सिर्फ उसे ही मिटाकर सही शब्द लिखना हो — बाकी पूरा वाक्य बिना छेड़े। यही काम करती है CRISPR-Cas9 तकनीक — जिसे वैज्ञानिक 'आणविक कैंची (Molecular Scissors)' भी कहते हैं। यह तकनीक जीवाणुओं की प्राकृतिक प्रतिरक्षा प्रणाली से प्रेरित है, जो वायरस के DNA को पहचानकर काट देती है। जेनिफर डाउडना व एमैनुएल शार्पेंतिए ने 2012 में इस तकनीक को जीन-एडिटिंग में उपयोग करने की खोज की, जिसके लिए उन्हें 2020 में रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार मिला। CRISPR-Cas9 पारंपरिक जीन एडिटिंग विधियों से कहीं अधिक सटीक, तेज़ व सस्ती है।
जीन थेरेपी (Gene Therapy) में किसी बीमारी के मूल कारण — ख़राब जीन — को ठीक करने या बदलने के लिए स्वस्थ जीन को सीधे मरीज़ के शरीर में डाला जाता है, ताकि बीमारी को स्थायी रूप से ठीक किया जा सके। भारत ने इस क्षेत्र में 20 नवंबर 2025 को एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की।
5 जुलाई 1996 को स्कॉटलैंड की रॉसलिन इंस्टीट्यूट में वैज्ञानिकों ने एक ऐतिहासिक कारनामा किया — उन्होंने एक वयस्क भेड़ की स्तन कोशिका (Somatic Cell) से 'डॉली (Dolly)' नामक भेड़ का क्लोन तैयार किया, जो किसी वयस्क कोशिका से बना विश्व का पहला स्तनपायी क्लोन था। इस तकनीक को 'सोमैटिक सेल न्यूक्लियर ट्रांसफर (SCNT)' कहा जाता है — जिसमें किसी वयस्क कोशिका के केंद्रक (Nucleus) को एक अंडाणु में प्रत्यारोपित किया जाता है, जिसका अपना केंद्रक पहले हटा दिया जाता है। डॉली के जन्म ने साबित किया कि किसी परिपक्व कोशिका को दोबारा 'भ्रूण जैसी' अवस्था में लौटाया जा सकता है — इसी खोज ने आगे चलकर प्रेरित बहुशक्त स्टेम कोशिकाओं (Induced Pluripotent Stem Cells - iPSCs) की खोज का रास्ता भी खोला।
स्टेम सेल ऐसी विशेष कोशिकाएं हैं, जो शरीर की किसी भी प्रकार की कोशिका (त्वचा, तंत्रिका, हृदय आदि) में विकसित होने की क्षमता रखती हैं — इसीलिए इन्हें शरीर की 'मूल कोशिकाएं' भी कहा जा सकता है।
स्टेम सेल थेरेपी का उपयोग अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण (Bone Marrow Transplant), जले हुए घावों के उपचार व भविष्य में अंग-पुनर्निर्माण (Organ Regeneration) जैसी संभावनाओं में हो रहा है।
1. CRISPR-Cas9 (डाउडना-शार्पेंतिए, नोबेल 2020) एक सटीक 'आणविक कैंची' जीन-एडिटिंग तकनीक है। 2. BIRSA 101 (20 नवंबर 2025) — CSIR-IGIB द्वारा विकसित भारत की पहली स्वदेशी CRISPR जीन थेरेपी, सिकल सेल रोग हेतु। 3. डॉली भेड़ (1996) — वयस्क कोशिका से बना पहला स्तनपायी क्लोन, SCNT तकनीक द्वारा। 4. स्टेम सेल — भ्रूणीय (नैतिक विवाद) व iPS कोशिकाएं (यामानाका, नोबेल 2012, भ्रूण-मुक्त विकल्प) दो प्रमुख प्रकार हैं।
भाग 3: जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्रवार अनुप्रयोग
कृषि जैव प्रौद्योगिकी में जीन-रूपांतरित (GM) फसलों को कीट-प्रतिरोधी, सूखा-सहिष्णु या अधिक पौष्टिक बनाया जाता है। भारत में इस क्षेत्र की स्थिति इस प्रकार है:
| GM फसल | स्थिति एवं विवरण |
|---|---|
| Bt कॉटन (Bt Cotton) | 2002 में GEAC द्वारा स्वीकृत — भारत की एकमात्र व्यावसायिक रूप से स्वीकृत GM फसल। बैसिलस थुरिनजिएंसिस (Bacillus thuringiensis) जीवाणु का जीन डाला गया है, जो बॉलवर्म कीट के लिए विषैला प्रोटीन बनाता है। आज भारत के लगभग 90% कपास क्षेत्र (करीब 1.2 करोड़ हेक्टेयर) में उगाई जाती है; 2002-2014 के बीच उत्पादन में 193% वृद्धि दर्ज हुई। |
| GM सरसों DMH-11 | अक्टूबर 2022 में GEAC द्वारा पर्यावरणीय रिलीज़ हेतु स्वीकृत — भारतीय किस्म 'वरुणा' व पूर्वी यूरोपीय किस्म 'अर्ली हीरा-2' के संकरण से विकसित, जिसमें बार्नेज़-बार्स्टार जीन डाले गए हैं। परंपरागत किस्मों से लगभग 30% अधिक उपज की क्षमता। जुलाई 2024 में सुप्रीम कोर्ट के विभाजित फैसले (Split Verdict) के बाद मामला अभी अदालत में विचाराधीन है, व्यावसायिक खेती अभी शुरू नहीं हुई। |
| गोल्डन राइस (Golden Rice) | विटामिन-A की कमी दूर करने हेतु बीटा-कैरोटीन (Beta-Carotene) उत्पन्न करने के लिए जीन-रूपांतरित किस्म। भारत में अभी तक किसी भी GM खाद्य फसल को व्यावसायिक खेती की अनुमति नहीं मिली है। |
चिकित्सा क्षेत्र में जैव प्रौद्योगिकी की सबसे बड़ी देन है — रीकॉम्बिनेंट प्रोटीन दवाएं। 1982 में सबसे पहले जेनेटिक रूप से रूपांतरित E. coli जीवाणु से बनी 'रीकॉम्बिनेंट मानव इंसुलिन' को अमेरिकी FDA ने स्वीकृति दी थी — इससे पहले इंसुलिन सूअर व गाय के अग्न्याशय से निकाला जाता था, जो महंगा व सीमित मात्रा में उपलब्ध था। आज इंसुलिन के अलावा कई वैक्सीन (जैसे हेपेटाइटिस-B वैक्सीन), मोनोक्लोनल एंटीबॉडी व कैंसर की दवाएं भी इसी रीकॉम्बिनेंट तकनीक से बनाई जाती हैं। भारत की जैव प्रौद्योगिकी अर्थव्यवस्था में वैक्सीन क्षेत्र का सबसे बड़ा हिस्सा (लगभग 17.8%) है।
पहले डायबिटीज़ के मरीज़ों के लिए इंसुलिन सूअर या गाय के अग्न्याशय से निकाला जाता था — यह महंगी, सीमित व कभी-कभी एलर्जी पैदा करने वाली प्रक्रिया थी। परंतु जब वैज्ञानिकों ने मानव इंसुलिन बनाने वाला जीन एक साधारण जीवाणु (E. coli) में डाला, तो वह जीवाणु स्वयं एक 'जीवित फैक्ट्री' बन गया, जो लगातार शुद्ध मानव इंसुलिन बनाता रहता है — बिना किसी पशु की आवश्यकता के, असीमित मात्रा में व कम कीमत पर।
बायोरेमेडिएशन (Bioremediation) वह प्रक्रिया है, जिसमें सूक्ष्मजीवों या पौधों का उपयोग कर प्रदूषित मिट्टी, जल या हवा से हानिकारक पदार्थों को हटाया या कम हानिकारक रूप में बदला जाता है — जैसे तेल रिसाव (Oil Spill) की सफाई में विशेष तेल-भक्षी जीवाणुओं का उपयोग। इसके अलावा जैव उर्वरक (Biofertilizers) व जैव कीटनाशक (Biopesticides) रासायनिक उर्वरक-कीटनाशकों का पर्यावरण-अनुकूल विकल्प प्रदान करते हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है।
1. Bt कॉटन (2002) भारत की एकमात्र स्वीकृत GM फसल है — 90% कपास क्षेत्र में उगाई जाती है। 2. GM सरसों DMH-11 (2022 GEAC स्वीकृति) अभी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है; गोल्डन राइस को अभी भारत में मंज़ूरी नहीं मिली। 3. रीकॉम्बिनेंट इंसुलिन (1982) व वैक्सीन उत्पादन चिकित्सा जैव प्रौद्योगिकी की सबसे बड़ी उपलब्धियां हैं; वैक्सीन भारत के बायोटेक उद्योग का सबसे बड़ा हिस्सा है। 4. औद्योगिक एंजाइम, जैव ईंधन व बायोरेमेडिएशन क्रमशः उद्योग, ऊर्जा व पर्यावरण में जैव प्रौद्योगिकी के प्रमुख अनुप्रयोग हैं।
भाग 4: भारत एवं राजस्थान में जैव प्रौद्योगिकी, नियमन एवं भविष्य
भारत में जैव प्रौद्योगिकी विभाग (Department of Biotechnology - DBT), विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत नोडल एजेंसी है, जो 'राष्ट्रीय जैव प्रौद्योगिकी विकास रणनीति (National Biotechnology Development Strategy)' के माध्यम से देश की जैव प्रौद्योगिकी नीति तय करता है।
| संस्थान/योजना | विवरण |
|---|---|
| जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) | स्वास्थ्य, कृषि व पर्यावरण संबंधी जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान व नीति की नोडल एजेंसी |
| जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद (BIRAC) | DBT द्वारा स्थापित — जैव प्रौद्योगिकी स्टार्टअप्स व नवाचार को विचार से व्यावसायीकरण तक सहायता; वर्तमान में देश भर में 73 BIRAC-समर्थित बायो-इन्क्यूबेटर व 12 DBT-समर्थित बायोटेक पार्क सक्रिय |
| बायोफार्मा शक्ति योजना | केंद्रीय बजट 2026-27 में घोषित — ₹10,000 करोड़ (लगभग $1.20 बिलियन) परिव्यय — घरेलू बायोफार्मा विनिर्माण को मज़बूत करने हेतु |
| इंडिया फार्मा 2026 | उन्नत क्लिनिकल रिसर्च व डीप-टेक क्षमता के साथ भारत को वैश्विक बायोफार्मा हब बनाने की पहल |
भारत में GMO व आनुवंशिक रूप से रूपांतरित जीवों के अनुसंधान, परीक्षण व व्यावसायिक उपयोग को तीन-स्तरीय नियामक ढांचे द्वारा नियंत्रित किया जाता है, जो 1986 के पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत 1989 के नियमों पर आधारित है:
| 1. IBSC संस्थागत जैव सुरक्षा समिति (संस्थान स्तर) | ➜ | 2. RCGM आनुवंशिक हेरफेर समीक्षा समिति (DBT) | ➜ | 3. GEAC आनुवंशिक अभियांत्रिकी मूल्यांकन समिति (MoEFCC — अंतिम स्वीकृति) |
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चित्र: भारत का त्रि-स्तरीय GMO नियामक ढांचा — हर प्रस्ताव को क्रमशः तीनों स्तरों से गुज़रना होता है, GEAC ही अंतिम व्यावसायिक स्वीकृति देती है
राजस्थान सरकार ने 2015 में 'राजस्थान जैव प्रौद्योगिकी नीति (Rajasthan Biotech Policy)' लागू की, जिसका उद्देश्य राज्य को जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र में अग्रणी स्थान दिलाना, उद्यमिता को बढ़ावा देना व जैव-संसाधनों का सतत व्यावसायिक उपयोग सुनिश्चित करना है।
भविष्य में जैव प्रौद्योगिकी 'सिंथेटिक जीव विज्ञान (Synthetic Biology)' — जहां वैज्ञानिक शून्य से नए जीवाणु व जैविक प्रणालियां डिज़ाइन कर सकेंगे — तथा 'व्यक्तिगत चिकित्सा (Personalized Medicine)' — जहां हर मरीज़ के जीनोम के अनुसार दवा तैयार होगी — की दिशा में आगे बढ़ेगी। BIRSA 101 जैसी स्वदेशी उपलब्धियां भारत को इस वैश्विक क्रांति में एक अग्रणी व आत्मनिर्भर भागीदार बनाती जा रही हैं।
1. DBT व BIRAC भारत की जैव प्रौद्योगिकी नीति के स्तंभ हैं; बायोफार्मा शक्ति योजना (₹10,000 करोड़, बजट 2026-27) घरेलू विनिर्माण बढ़ाएगी। 2. भारत का GMO नियामक ढांचा त्रि-स्तरीय है — IBSC (संस्थान) → RCGM (DBT) → GEAC (MoEFCC, अंतिम स्वीकृति)। 3. राजस्थान जैव प्रौद्योगिकी नीति (2015) के तहत जयपुर-जोधपुर-अलवर में बायोटेक पार्क व बीकानेर कृषि विश्वविद्यालय में पादप जैव प्रौद्योगिकी केंद्र स्थापित। 4. सबसे बड़ी चुनौतियां — GM सुरक्षा बहस, नैतिक सवाल व IPR मुद्दे; भविष्य सिंथेटिक जीव विज्ञान व व्यक्तिगत चिकित्सा का है।
Q1. पुनर्योगज DNA तकनीक का प्रयोग सबसे पहले किसने व कब किया? Q2. जैव प्रौद्योगिकी की 'लाल' व 'हरित' शाखा में क्या अंतर है? Q3. PCR तकनीक किसने विकसित की तथा इसका मुख्य उपयोग क्या है? Q4. Bt कॉटन में कौनसे जीवाणु का जीन प्रयुक्त होता है तथा यह कैसे काम करता है? Q5. GM सरसों DMH-11 की वर्तमान कानूनी स्थिति क्या है? Q6. BIRSA 101 जीन थेरेपी किस संस्थान ने विकसित की तथा यह किस बीमारी के लिए है? Q7. डॉली भेड़ का क्लोन किस तकनीक से एवं कब बनाया गया था? Q8. भारत के GMO नियामक ढांचे में IBSC, RCGM व GEAC की क्या भूमिका है? Q9. राजस्थान में बायोटेक पार्क कहां-कहां स्थापित किए गए हैं? Q10. 'सिंथेटिक जीव विज्ञान' से क्या तात्पर्य है?