27 अगस्त 1859 — पेनसिल्वेनिया (अमेरिका) के टिटसविले नामक छोटे-से कस्बे में एडविन ड्रेक (Edwin Drake) नामक एक रिटायर्ड रेलवे कंडक्टर ज़मीन में मात्र 69 फीट गहरा एक कुआँ खोद रहा था — आसपास के लोग उसे पागल समझते थे और इस जगह को 'ड्रेक्स फॉली' (Drake's Folly) कहकर मज़ाक उड़ाते थे। उस दिन अचानक ज़मीन से काला, गाढ़ा तरल फूट पड़ा — यह कच्चा तेल (Crude Oil) था। इस एक खोज ने पूरी दुनिया की तस्वीर बदल दी — जो पेट्रोलियम कभी दीयों में जलाने भर के काम आता था, वही आगे चलकर पेट्रोल, डीज़ल, LPG और सैकड़ों रसायनों का स्रोत बना और आधुनिक औद्योगिक सभ्यता की धड़कन बन गया। आज हर बार जब हम अपने वाहन में पेट्रोल भरवाते हैं और पेट्रोल पंप पर 'ऑक्टेन नंबर' लिखा देखते हैं, तो वास्तव में हम उसी 1859 की खोज से शुरू हुई यात्रा के एक वैज्ञानिक मापदंड से रूबरू हो रहे होते हैं।
ईंधन वे पदार्थ होते हैं जो दहन (जलने) की प्रक्रिया के दौरान मुख्यतः ऊष्मा के रूप में ऊर्जा उत्पन्न करते हैं, तथा यह ऊर्जा विभिन्न उपयोगी कार्यों को संपन्न करने में प्रयुक्त होती है। भौतिक अवस्था के आधार पर ईंधन को तीन वर्गों में बाँटा जाता है — ठोस ईंधन (लकड़ी, कोयला, चारकोल, गोबर के उपले), द्रव ईंधन (पेट्रोल, डीज़ल, केरोसिन) तथा गैसीय ईंधन (LPG, CNG, बायोगैस, हाइड्रोजन)।
ऊष्मा मान (Calorific Value)
किसी ईंधन के 1 किलोग्राम के पूर्ण दहन से प्राप्त होने वाली कुल ऊष्मा ऊर्जा को उस ईंधन का ऊष्मा मान (Calorific Value) कहते हैं। ईंधन जितनी अधिक ऊष्मा देता है, उसका ऊष्मा मान उतना ही अधिक होता है। ऊष्मा मान की SI इकाई किलोजूल प्रति किलोग्राम (kJ/kg) है। ऊष्मा मान के अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि कौन-सा ईंधन अधिक दक्ष (Efficient) एवं आर्थिक (Economical) है, जिससे घरेलू, औद्योगिक एवं परिवहन कार्यों के लिए उपयुक्त ईंधन का चयन संभव होता है।
| ईंधन | ऊष्मीय मान (kJ/kg) |
|---|---|
| गोबर के उपले | 6,000 – 8,000 |
| लकड़ी | 17,000 – 22,000 |
| कोयला | 25,000 – 33,000 |
| पेट्रोल / मिट्टी का तेल / डीज़ल | 45,000 |
| मेथेन / CNG | 50,000 |
| LPG | 55,000 |
| जैव गैस | 35,000 – 40,000 |
| हाइड्रोजन | 1,50,000 |
यदि 1 किलोग्राम हाइड्रोजन तथा 1 किलोग्राम कोयला दोनों को जलाया जाए, तो हाइड्रोजन लगभग 1,50,000 kJ ऊष्मा देगा जबकि कोयला मात्र 25,000-33,000 kJ — अर्थात हाइड्रोजन कोयले से लगभग 5-6 गुना अधिक ऊर्जा-सघन ईंधन है। यही कारण है कि हाइड्रोजन को 'भविष्य का ईंधन' माना जाता है, यद्यपि इसके भंडारण एवं परिवहन में तकनीकी चुनौतियाँ हैं।
दहन (Combustion) एवं इसके प्रकार
दहन वह रासायनिक प्रक्रिया है जिसमें कोई दाह्य पदार्थ वायु (ऑक्सीजन) की उपस्थिति में जलकर ऊष्मा एवं प्रायः प्रकाश ऊर्जा उत्पन्न करता है।
ईंधन के दहन से उत्पन्न हानिकारक प्रभाव
| दहन से उत्पन्न पदार्थ | स्रोत/कारण | स्वास्थ्य एवं पर्यावरण पर प्रभाव |
|---|---|---|
| अनजला कार्बन कण | लकड़ी, कोयला, पेट्रोल जैसे कार्बनयुक्त ईंधनों का दहन | दमा जैसे श्वसन रोग, आँखों-फेफड़ों में जलन, वायु गुणवत्ता में गिरावट |
| कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) | ईंधनों का अपूर्ण दहन | रक्त में ऑक्सीजन आपूर्ति रोकती है; बंद कमरे में कोयला जलाना अत्यंत खतरनाक |
| कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) | अधिकांश ईंधनों का दहन | ग्रीनहाउस गैस — वैश्विक ऊष्मन (Global Warming) का प्रमुख कारण |
| सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) | कोयला एवं डीज़ल का दहन | श्वसन तंत्र को हानि, अम्ल वर्षा का कारण |
| नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOₓ) | पेट्रोल इंजन | वायु प्रदूषण, अम्ल वर्षा, फसलों-भवनों को नुकसान |
अच्छे ईंधन के गुण
(A) कोयला (Coal)
कोयला एक प्रमुख जीवाश्म ईंधन है जो अत्यधिक कार्बन-युक्त अवसादी शैल के रूप में प्राचीन पादप सामग्रियों के संचयन से बना है तथा ऊर्जा एवं बिजली उत्पादन का प्राथमिक स्रोत है। हजारों वर्षों तक भूगर्भ में दबे पेड़-पौधे उच्च ताप एवं दाब के प्रभाव से धीरे-धीरे कोयले में परिवर्तित हो जाते हैं — इस प्रक्रिया को कोयलाभवन (Coalification) कहते हैं।
| ¶ चित्र: बिटूमिनस कोयला — भारत में सर्वाधिक प्रयुक्त एवं व्यावसायिक कोयला, जो झरिया व रानीगंज कोयला क्षेत्रों से प्रमुखता से प्राप्त होता है |
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कार्बन प्रतिशत के आधार पर कोयले के चार प्रकार
| कोयले का प्रकार | कार्बन (%) | भारत में प्रमुख क्षेत्र | उपयोग/महत्व |
|---|---|---|---|
| पीट (Peat) | 40% से कम | नीलगिरी पहाड़ियाँ (तमिलनाडु), सुंदरबन (प. बंगाल) | निम्न कोटि का घरेलू ईंधन, मृदा उपचार में उपयोग |
| लिग्नाइट (Lignite) | 40 – 55% | नेवेली (तमिलनाडु), पलाना (राजस्थान), कच्छ (गुजरात) | घरेलू ईंधन, ताप विद्युत गृहों में महत्वपूर्ण |
| बिटूमिनस (Bituminous) | 40 – 80% | झरिया, रानीगंज (निम्न गोंडवाना क्षेत्र) | धातुकर्मी कोक निर्माण, विद्युत उत्पादन का मुख्य आधार |
| एन्थ्रेसाइट (Anthracite) | 80 – 95% | जम्मू-कश्मीर के कुछ भाग (भारत में अत्यंत दुर्लभ) | श्रेष्ठ घरेलू ईंधन (कम धुआँ, अधिक ऊष्मा) |
राजस्थान के बीकानेर ज़िले में स्थित पलाना क्षेत्र राज्य के प्रमुख लिग्नाइट भंडारों में से एक है। यहाँ से प्राप्त लिग्नाइट का उपयोग स्थानीय ताप विद्युत गृहों में किया जाता है — यह RAS परीक्षा के भूगोल एवं अर्थशास्त्र दोनों खंडों के लिए महत्वपूर्ण तथ्य है।
कोकिंग बनाम नॉन-कोकिंग कोयला
जो कोयला वायु की अनुपस्थिति में गर्म करने पर नरम होकर फैलता है तथा ठोस, कठोर कोक में बदल जाता है, उसे कोकिंग कोयला (Coking Coal) कहते हैं — इसका उपयोग इस्पात उद्योग में ब्लास्ट फर्नेस में अपचायक के रूप में होता है, परंतु यह भारत में दुर्लभ एवं महँगा है (काफी हद तक आयातित)। इसके विपरीत नॉन-कोकिंग कोयला गर्म करने पर कोक नहीं बनाता, केवल राख या भुरभुरा अवशेष छोड़ता है — यह प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है और मुख्यतः विद्युत उत्पादन (थर्मल पावर प्लांट) में प्रयुक्त होता है।
कोक एवं कोलतार (Coke & Coal Tar)
(B) पेट्रोलियम (Petroleum)
पेट्रोलियम को प्रचलित रूप से 'तरल सोना' कहा जाता है तथा इसे खनिज तेल भी कहते हैं — यह शब्द लैटिन शब्द पेट्रा (शैल/पत्थर) तथा ओलियम (तेल) से बना है। पेट्रोलियम हाइड्रोकार्बनों तथा कुछ अन्य यौगिकों का जटिल मिश्रण है, जो पृथ्वी की सतह के नीचे शैलों के भीतर पाशित (Trapped) अवस्था में पाया जाता है। सन 1859 में एडविन ड्रेक ने पेनसिल्वेनिया (USA) में पहले तेल-कुएँ का वेधन किया था।
भंजनात्मक/भिन्नात्मक आसवन (Fractional Distillation)
कच्चे पेट्रोलियम को सीधे उपयोग नहीं किया जा सकता, इसलिए रिफाइनरी में एक ऊँचे टॉवर (Fractionating Column) में इसे गर्म कर विभिन्न उपयोगी भागों में विभाजित किया जाता है — इसे पेट्रोलियम का परिष्करण (Refining) कहते हैं। कम क्वथनांक वाले पदार्थ ऊपर की ओर तथा अधिक क्वथनांक वाले नीचे की ओर एकत्र हो जाते हैं।
| ¶ चित्र: पेट्रोलियम के भंजनात्मक आसवन (Fractional Distillation) की संरचना — क्वथनांक के आधार पर विभिन्न अंशों (LPG, पेट्रोल, नैफ्था, केरोसिन, डीज़ल, बिटुमेन) का पृथक्करण |
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| पेट्रोलियम अंश | तापमान सीमा (लगभग) | उपयोग |
|---|---|---|
| पेट्रोलियम गैस (LPG) | 25°C – 30°C | रसोई गैस, वाहन ईंधन |
| पेट्रोल (Gasoline) | 30°C – 120°C | मोटर वाहन, ड्राई क्लीनिंग |
| नैफ्था (Naphtha) | 120°C – 180°C | पेट्रोकेमिकल उद्योग का कच्चा माल |
| केरोसिन (मिट्टी का तेल) | 180°C – 260°C | स्टोव, लैम्प, जेट ईंधन |
| डीज़ल (Diesel) | 260°C – 340°C | ट्रक, ट्रैक्टर, जनित्र |
| स्नेहक तेल (Lubricating Oil) | ≈ 350°C | मशीनों में स्नेहन (घर्षण कम करना) |
| पैराफिन मोम (Wax) | 350°C के आसपास | मोमबत्ती, बूट पॉलिश, वैक्स पेपर |
| डामर/बिटुमेन (Asphalt) | ≈ 600°C (अवशेष) | सड़क निर्माण, जलरोधक परत |
LPG (Liquified Petroleum Gas) स्वयं पूर्णतः गंधहीन होती है। इसमें सुरक्षा कारणों से मरकैप्टन (थायोल) नामक एक तीव्र गंध वाला रसायन मिलाया जाता है, ताकि रसोई में गैस रिसाव होने पर उसकी गंध से तुरंत पहचान की जा सके और दुर्घटना टाली जा सके — यह प्रत्येक भारतीय रसोई से जुड़ा एक महत्वपूर्ण सुरक्षा-रासायनिक तथ्य है।
(C) प्राकृतिक गैस एवं CNG
पेट्रोलियम खनन के समय प्राप्त गैसें प्राकृतिक गैस कहलाती हैं, जिनमें मुख्यतः मेथेन गैस (CH₄) होती है। इन्हें वाहनों में ईंधन के रूप में उपयोग हेतु संपीड़ित कर सिलिंडरों में भरा जाता है — इसे संपीड़ित प्राकृतिक गैस (Compressed Natural Gas – CNG) कहा जाता है। CNG स्वच्छ ईंधन है, कम प्रदूषण करती है तथा इसका ऊष्मा मान भी उच्च होता है (लगभग 50,000 kJ/kg)।
ऑक्टेन रेटिंग पेट्रोल की नॉकिंग (Knocking) प्रतिरोध क्षमता को दर्शाने वाली संख्या है। यह बताती है कि ईंधन इंजन के सिलेंडर में उच्च ताप एवं दाब की परिस्थितियों में स्वतः दहन (Auto-Ignition) का कितना प्रतिरोध कर सकता है। ऑक्टेन संख्या जितनी अधिक होगी, ईंधन की स्वतः दहन के विरुद्ध प्रतिरोध क्षमता उतनी ही अधिक होगी तथा नॉकिंग की संभावना उतनी ही कम होगी।
नॉकिंग (Knocking) क्या है?
नॉकिंग वह स्थिति है, जब इंजन के सिलेंडर में ईंधन-वायु मिश्रण स्पार्क प्लग द्वारा प्रज्ज्वलित होने से पहले ही अनियंत्रित रूप से स्वतः दहन कर जाता है। इसके परिणामस्वरूप तीव्र दबाव तरंगें (Pressure Waves) उत्पन्न होती हैं, जिससे इंजन में 'खट-खट' (Knocking/Pinging) जैसी आवाज सुनाई देती है — यह समस्या विशेष रूप से पेट्रोल (Spark Ignition) इंजनों में देखी जाती है।
नॉकिंग के कारण एवं दुष्प्रभाव
ऑक्टेन रेटिंग का निर्धारण
ऑक्टेन रेटिंग हेतु एक सापेक्ष पैमाना (Relative Scale) प्रयुक्त होता है, जिसमें आइसो-ऑक्टेन (Iso-octane) को 100 तथा n-हेप्टेन (n-Heptane) को 0 मान दिया गया है। यदि किसी ईंधन की ऑक्टेन संख्या 90 है, तो इसका अर्थ है कि वह ईंधन 90% आइसो-ऑक्टेन तथा 10% n-हेप्टेन के मिश्रण जैसा व्यवहार करता है। परीक्षण CFR (Cooperative Fuel Research) इंजन से किया जाता है।
| प्रकार | पूरा नाम | उपयोग |
|---|---|---|
| RON | Research Octane Number | सामान्य ड्राइविंग परिस्थितियाँ — भारत में सामान्यतः यही प्रदर्शित होता है |
| MON | Motor Octane Number | उच्च गति/उच्च ताप की परिस्थितियाँ |
| AKI | (RON+MON)/2 | अमेरिका में प्रदर्शित मानक |
| ग्रेड | RON मान |
|---|---|
| सामान्य पेट्रोल | 91 |
| प्रीमियम पेट्रोल | 95 |
| उच्च प्रदर्शन ईंधन | 97 – 100 |
एंटी-नॉक एजेंट का विकास
पहले नॉकिंग रोकने के लिए टेट्रा एथिल लेड (TEL) का उपयोग होता था, परंतु लेड के विषाक्त होने तथा वाहनों के उत्प्रेरक परिवर्तक (Catalytic Converter) को स्थायी रूप से खराब करने के कारण इसे हटा दिया गया। अब इसकी जगह MTBE (Methyl Tertiary Butyl Ether), ETBE, बेंज़ीन, इथेनॉल एवं उच्च-ऑक्टेन एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन का उपयोग किया जाता है — ये ईंधन में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाते हैं जिससे दहन अधिक 'स्वच्छ' होता है।
सीटेन रेटिंग (Cetane Rating) — डीज़ल इंजन
सीटेन संख्या डीज़ल ईंधन की स्व-प्रज्वलन (Self-Ignition) क्षमता को दर्शाने वाली संख्या है। डीज़ल इंजन में स्पार्क प्लग नहीं होता — पहले केवल वायु का उच्च संपीड़न (Compression Ratio ~14:1 से 25:1) होता है, फिर उच्च ताप पर डीज़ल का इंजेक्शन होता है जिससे ईंधन स्वतः प्रज्ज्वलित (Compression Ignition) हो जाता है। इस पैमाने में n-हेक्साडेकेन (Cetane) को 100 तथा अल्फा-मेथिलनैफ्थेलीन को 0 मान दिया गया है। भारत में BS-IV मानक के अंतर्गत न्यूनतम सीटेन संख्या ~48 थी, जो BS-VI (2020 से) में बढ़कर ≥51 कर दी गई है।
| आधार | ऑक्टेन (Octane) | सीटेन (Cetane) |
|---|---|---|
| इंजन प्रकार | पेट्रोल इंजन (Spark Ignition) | डीज़ल इंजन (Compression Ignition) |
| उच्च मान का अर्थ | नॉकिंग कम | शीघ्र प्रज्ज्वलन |
| मापता है | Knock Resistance | Ignition Quality |
| स्पार्क प्लग | आवश्यक | आवश्यक नहीं |
| प्रमुख मानक | RON | Cetane Number |
| श्रेष्ठ हाइड्रोकार्बन | शाखित/एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन | सीधी शृंखला हाइड्रोकार्बन (जैसे n-हेक्साडेकेन) |
सीधी शृंखला वाले हाइड्रोकार्बन जैसे n-हेप्टेन बहुत जल्दी जलते हैं और नॉकिंग पैदा करते हैं (ऑक्टेन रेटिंग = 0), जबकि शाखित शृंखला (Branched Chain) वाले आइसो-ऑक्टेन का दहन नियंत्रित होता है (ऑक्टेन रेटिंग = 100)। इसीलिए आधुनिक पेट्रोल में शाखित एवं एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन का अनुपात बढ़ाया जाता है, जबकि डीज़ल के लिए सीधी शृंखला वाले हाइड्रोकार्बन ही सर्वोत्तम माने जाते हैं क्योंकि वे सीटेन संख्या बढ़ाते हैं।
जैव ईंधन (Biofuels) एवं इसकी चार पीढ़ियाँ
जैव ईंधन वह ईंधन है जो पौधों, शैवाल तथा पशु अपशिष्ट जैसे जैविक स्रोतों (बायोमास) से प्राप्त किया जाता है। यह पुनःपूर्ति योग्य फीडस्टॉक से बनने के कारण नवीकरणीय ऊर्जा का स्रोत माना जाता है।
| पीढ़ी | स्रोत | मुख्य विशेषता |
|---|---|---|
| पहली पीढ़ी (1G) | खाद्य फसलें — गन्ना, चुकंदर, गेहूँ, मक्का | बायोएथेनॉल एवं बायोडीज़ल; "ईंधन बनाम भोजन" विवाद इसकी मुख्य सीमा |
| दूसरी पीढ़ी (2G) | गैर-खाद्य स्रोत — लकड़ी, कृषि अपशिष्ट, वन अवशेष | "सेलुलोसिक-इथेनॉल"; खाद्य संसाधनों पर दबाव कम करती है |
| तीसरी पीढ़ी (3G) | शैवाल (Algae-based fuels) | पारंपरिक फसलों से लगभग 10 गुना अधिक उपज; संभावित कार्बन-तटस्थ |
| चौथी पीढ़ी (4G) | आनुवंशिक रूप से संशोधित शैवाल/साइनोबैक्टीरिया | कार्बन कैप्चर व संग्रहण क्षमता — कार्बन-नेगेटिव तक संभव |
जैव ईंधन के प्रमुख प्रकार
हाइड्रोजन ईंधन (Hydrogen Fuel)
हाइड्रोजन एक स्वच्छ एवं वैकल्पिक ईंधन स्रोत है। इसे ईंधन सेल में उपयोग करने पर रासायनिक अभिक्रिया द्वारा विद्युत ऊर्जा उत्पन्न होती है तथा उप-उत्पाद के रूप में केवल जल बनता है। हाइड्रोजन को उत्पादन स्रोत के आधार पर विभिन्न 'रंगों' में वर्गीकृत किया जाता है, जो पर्यावरणीय प्रभाव को दर्शाता है।
| ¶ चित्र: हाइड्रोजन ईंधन सेल से संचालित बस — दहन का उप-उत्पाद केवल जल होने के कारण यह शून्य-कार्बन-उत्सर्जन परिवहन का उदाहरण है |
|---|
| हाइड्रोजन का प्रकार | उत्पादन स्रोत/प्रक्रिया | कार्बन उत्सर्जन |
|---|---|---|
| ग्रे हाइड्रोजन (Grey) | प्राकृतिक गैस से स्टीम मीथेन रिफॉर्मिंग (SMR) | उच्च — वर्तमान में विश्व का सर्वाधिक उत्पादन इसी प्रकार का |
| ब्लू हाइड्रोजन (Blue) | जीवाश्म ईंधन आधारित, परंतु CO₂ को Carbon Capture (CCS) द्वारा पकड़कर संग्रहित | मध्यम — CCS के कारण कम उत्सर्जन |
| ग्रीन हाइड्रोजन (Green) | सौर/पवन ऊर्जा से संचालित जल के इलेक्ट्रोलिसिस द्वारा | शून्य — भविष्य का स्वच्छ एवं सतत ईंधन |
हाइड्रोजन ईंधन के लाभ एवं सीमाएँ
अन्य वैकल्पिक/भविष्य के ईंधन (संक्षेप में)
E20 इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल कार्यक्रम
भारत की राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति 2018 (संशोधित 2022) के अंतर्गत मूल रूप से वर्ष 2030 तक 20% इथेनॉल मिश्रण (E20) का लक्ष्य रखा गया था, परंतु भारत ने नवंबर 2025 में ही यह लक्ष्य प्राप्त कर लिया — निर्धारित समय से पूरे 5 वर्ष पहले। 1 अप्रैल 2026 से E20 ईंधन संपूर्ण भारत के सभी राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में अनिवार्य रूप से लागू कर दिया गया है, जिससे भारत विश्व की उन सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो गया है जिन्होंने राष्ट्रव्यापी स्तर पर 20% इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल कार्यक्रम पूर्ण किया है।
| मिश्रण स्तर | इथेनॉल % | पेट्रोल % | वाहन अनुकूलता |
|---|---|---|---|
| E5 | 5% | 95% | सभी वाहन |
| E10 | 10% | 90% | वर्तमान मानक वाहन |
| E20 | 20% | 80% | फ्लेक्स-फ्यूल या संशोधित इंजन |
राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (National Green Hydrogen Mission)
वर्ष 2023 में स्वीकृत इस मिशन का उद्देश्य भारत को हरित हाइड्रोजन उत्पादन, उपयोग एवं निर्यात का वैश्विक केंद्र बनाना है — इसका प्रारंभिक परिव्यय ₹19,744 करोड़ रखा गया है। मिशन के अंतर्गत वर्ष 2030 तक कम-से-कम 5 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) प्रतिवर्ष हरित हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता तथा लगभग 125 गीगावाट अतिरिक्त नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता (जल-इलेक्ट्रोलिसिस हेतु) विकसित करने का लक्ष्य है।
भारत स्टेज-VI (BS-VI) उत्सर्जन मानक
भारत में 1 अप्रैल 2020 से अनिवार्य BS-VI (भारत चरण 6) उत्सर्जन मानक लागू किए गए, जो BS-IV के 50 ppm सल्फर की तुलना में ईंधन में सल्फर की मात्रा को घटाकर मात्र 10 ppm (अति-निम्न सल्फर) तक ले आए — यह लगभग 80% सल्फर की कटौती है। इससे डीज़ल/पेट्रोल वाहनों से हानिकारक कणों (Particulate Matter) एवं नाइट्रोजन ऑक्साइड के उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी आई है, तथा उत्प्रेरक परिवर्तकों (Catalytic Converters) की दक्षता भी बढ़ी है। BS-VI के अंतर्गत वास्तविक समय में उत्सर्जन की निगरानी हेतु ऑन-बोर्ड डायग्नोस्टिक्स (OBD) भी अनिवार्य किया गया है।
मेथनॉल अर्थव्यवस्था कार्यक्रम (Methanol Economy Programme)
नीति आयोग के 'मेथनॉल इकोनॉमी' विज़न का उद्देश्य भारत के विशाल कोयला भंडार, कृषि अवशेष एवं थर्मल पावर प्लांट से निकलने वाली CO₂ का उपयोग कर मेथनॉल एवं डाइमिथाइल ईथर (DME) जैसे स्वच्छ ईंधन बनाना है, जिससे तेल आयात को लगभग 10% तक कम किया जा सके। ONGC तथा CSIR-नेशनल केमिकल लेबोरेटरी (CSIR-NCL) पुणे में DME उत्पादन हेतु एक औद्योगिक पायलट परियोजना स्थापित कर रहे हैं। इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी वैज्ञानिक चुनौती भारत के 'उच्च राख वाले कोयले' का गैसीकरण (Gasification) करना है, जो प्रक्रिया को जटिल एवं महँगा बनाता है।
एक नीति विश्लेषक के रूप में यह समझना आवश्यक है कि भारत की ईंधन नीति एक साथ तीन लक्ष्यों को साधती है — ऊर्जा सुरक्षा (आयात निर्भरता घटाना), पर्यावरण संरक्षण (उत्सर्जन नियंत्रण) तथा ग्रामीण समृद्धि (किसानों को आय)। E20 कार्यक्रम, राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन तथा BS-VI मानक — ये तीनों इसी त्रिस्तरीय रणनीति के अलग-अलग स्तंभ हैं, जो RAS मुख्य परीक्षा में अक्सर एक साथ पूछे जाते हैं।