☢️ अध्याय 10/11 — रसायन विज्ञान

रेडियोधर्मिता — अवधारणा एवं अनुप्रयोग

Radioactivity - Concepts and Applications | RAS Pre + Mains
📋 इस अध्याय में
  1. रेडियोधर्मिता की खोज एवं मूल सिद्धांत (Discovery & Basic Principles)
  2. अर्ध-आयु (Half-Life) एवं रेडियोधर्मी क्षय नियम
  3. अल्फा, बीटा, गामा क्षय (Alpha, Beta, Gamma Decay)
  4. रेडियोधर्मिता के अनुप्रयोग (Applications of Radioactivity)
  5. भारत में परमाणु ऊर्जा एवं सुरक्षा (India's Nuclear Energy & Safety Framework)
🌟 क्या आप जानते हैं?

1896 का एक धुँधला सर्दियों का दिन — पेरिस के भौतिकशास्त्री हेनरी बेकरल (Henri Becquerel) यूरेनियम लवण के क्रिस्टल पर सूर्य के प्रकाश का प्रभाव जाँच रहे थे। संयोगवश कई दिनों तक आकाश बादलों से घिरा रहा, और उन्होंने यूरेनियम के नमूने को एक फोटोग्राफिक प्लेट के ऊपर रखकर दराज़ में बंद कर दिया — बिना सूर्य के प्रकाश के, यह सोचकर कि प्लेट अनएक्सपोज़्ड ही रहेगी। कुछ दिनों बाद जब उन्होंने प्लेट को विकसित (Develop) किया, तो वे चौंक गए — प्लेट पर यूरेनियम के क्रिस्टल की स्पष्ट छाप उभर आई थी, मानो किसी अदृश्य प्रकाश ने उसे प्रभावित किया हो! बिना किसी बाहरी ऊर्जा स्रोत के, यूरेनियम स्वयं ही कोई रहस्यमयी किरणें उत्सर्जित कर रहा था। इस एक आकस्मिक खोज ने परमाणु के भीतर छिपी एक बिल्कुल नई दुनिया — रेडियोधर्मिता (Radioactivity) — का रहस्य खोल दिया, जिसके लिए बेकरल को 1903 में नोबेल पुरस्कार (मैरी व पियरे क्यूरी के साथ संयुक्त रूप से) प्रदान किया गया।

1रेडियोधर्मिता की खोज एवं मूल सिद्धांत (Discovery & Basic Principles)

रेडियोधर्मिता वह नाभिकीय प्रक्रिया है जिसमें अस्थिर परमाणु नाभिक स्वतः ऊर्जा का उत्सर्जन करते हुए (अल्फा, बीटा, गामा विकिरण के रूप में) अधिक स्थिर नाभिक में परिवर्तित हो जाते हैं। इस प्रक्रिया की खोज 1896 में हेनरी बेकरल (Henri Becquerel) ने की, जब उन्होंने पाया कि यूरेनियम से स्वतः अदृश्य किरणें निकलती हैं जिन्हें रेडियोएक्टिव किरणें कहा गया। आगे चलकर मैरी क्यूरी एवं पियरे क्यूरी ने इस क्षेत्र में पोलोनियम व रेडियम जैसे नए रेडियोधर्मी तत्वों की खोज कर इसे और आगे बढ़ाया।

¶ चित्र: हेनरी बेकरल (Henri Becquerel) — रेडियोधर्मिता के खोजकर्ता, जिन्हें 1903 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया

रदरफोर्ड-सोडी नियम (Rutherford-Soddy Law)

यह नियम अर्नेस्ट रदरफोर्ड (Ernest Rutherford) एवं फ्रेडरिक सोडी (Frederick Soddy) द्वारा प्रतिपादित किया गया। इसके अनुसार किसी रेडियोधर्मी पदार्थ में एकांक समय में क्षयित होने वाले नाभिकों की संख्या (dN/dt), उस समय उपस्थित कुल नाभिकों की संख्या (N) के अनुक्रमानुपाती होती है — अर्थात रेडियोधर्मी क्षय की दर सदैव उपस्थित नाभिकों की मात्रा पर निर्भर करती है, बाह्य कारकों (ताप, दाब) पर नहीं।

📐 रेडियोधर्मी क्षय नियम (Law of Radioactive Decay) — सूत्र/अभिक्रिया

dN/dt = −λN
N = N₀ e^(−λt)
जहाँ: N = समय t पर उपस्थित नाभिकों की संख्या, N₀ = प्रारंभिक नाभिकों की संख्या, λ = रेडियोधर्मी स्थिरांक (क्षय स्थिरांक)

💡 नाभिकीय स्थिरता — तत्व अपने आप स्थिर क्यों होना चाहते हैं?

जिस प्रकार एक असंतुलित वस्तु स्वतः लुढ़ककर संतुलन की स्थिति में आ जाती है, उसी प्रकार अस्थिर नाभिक भी α या β-कण उत्सर्जित कर प्रोटॉन संख्या (Z) एवं न्यूट्रॉन संख्या (N) के 'अच्छे अनुपात' की ओर स्वतः रूपांतरित होते जाते हैं, जब तक कि वे एक स्थिर विन्यास प्राप्त न कर लें — जैसे सभी रेडियोधर्मी श्रृंखलाएँ अंततः स्थिर सीसा (Lead) पर जाकर समाप्त होती हैं।

प्राकृतिक रेडियोएक्टिव श्रृंखलाएँ

प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले रेडियोधर्मी तत्वों की तीन मुख्य श्रृंखलाएँ होती हैं जिन्हें यूरेनियम, एक्टिनियम एवं थोरियम श्रृंखला कहा जाता है। प्रत्येक श्रृंखला एक दीर्घ अर्ध-आयु वाले तत्व से शुरू होकर अंततः स्थिर सीसा (Lead) पर समाप्त होती है। यूरेनियम के साथ एक चौथी श्रृंखला नेप्टूनियम (4n+1) भी पाई जाती है, जो प्लूटोनियम से शुरू होकर बिस्मथ (Bismuth) पर समाप्त होती है।

रेडियोसक्रियता की इकाइयाँ

इकाईपरिभाषा
क्यूरी (Curie) — पारंपरिक मात्रक3.7 × 10¹⁰ विघटन प्रति सेकंड
बेकरेल (Becquerel) — SI मात्रक1 विघटन प्रति सेकंड
रदरफोर्ड (Rutherford)10⁶ विघटन प्रति सेकंड
🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
रेडियोधर्मिताहेनरी बेकरलरदरफोर्ड-सोडी नियमक्षय स्थिरांक (λ)यूरेनियम-एक्टिनियम-थोरियम श्रृंखलाक्यूरीबेकरेलरदरफोर्ड
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2अर्ध-आयु (Half-Life) एवं रेडियोधर्मी क्षय नियम

किसी रेडियोधर्मी पदार्थ की अर्ध-आयु (T₁/₂) वह समय होता है जिसमें उसकी आधी मात्रा विघटित हो जाती है। यह प्रत्येक रेडियोधर्मी समस्थानिक (Isotope) का एक अद्वितीय एवं स्थिर गुण होता है, जो बाह्य ताप, दाब अथवा रासायनिक अवस्था से प्रभावित नहीं होता।

📐 अर्ध-आयु एवं क्षय स्थिरांक में संबंध — सूत्र/अभिक्रिया

T₁/₂ = 0.693 / λ

💡 अर्ध-आयु को समझना — एक सरल उदाहरण

यदि किसी रेडियोधर्मी पदार्थ के 100 ग्राम में से आधी मात्रा (50 ग्राम) क्षयित होने में 10 वर्ष लगते हैं, तो उसकी अर्ध-आयु 10 वर्ष होगी। अगले 10 वर्षों में शेष 50 ग्राम में से आधा (25 ग्राम) पुनः क्षयित हो जाएगा — यह प्रक्रिया घातांकीय (Exponential) होती है, रैखिक नहीं, अर्थात पदार्थ कभी पूर्णतः 'शून्य' नहीं होता, बल्कि प्रत्येक अर्ध-आयु में उसकी मात्रा आधी होती चली जाती है।

प्रमुख रेडियोधर्मी समस्थानिकों की अर्ध-आयु

समस्थानिकअर्ध-आयु
कार्बन-14 (C-14)लगभग 5,730 वर्ष
यूरेनियम-238 (U-238)लगभग 4.5 अरब वर्ष
कोबाल्ट-60 (Co-60)लगभग 5.27 वर्ष
आयोडीन-131 (I-131)लगभग 8 दिन
रेडियम-226 (Ra-226)लगभग 1,600 वर्ष
🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
अर्ध-आयुघातांकीय क्षयसमस्थानिकरेडियोधर्मी स्थिरांक
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3अल्फा, बीटा, गामा क्षय (Alpha, Beta, Gamma Decay)

रेडियोएक्टिव क्षय के दौरान नाभिक से अल्फा (α), बीटा (β) तथा गामा (γ) किरणों का उत्सर्जन होता है। रेडियोएक्टिवता पर बाह्य कारकों जैसे ताप, दाब तथा पदार्थ की भौतिक अवस्था का कोई प्रभाव नहीं पड़ता — यह एक पूर्णतः नाभिकीय प्रक्रिया है। क्षय के दौरान द्रव्यमान, ऊर्जा, आवेश तथा संवेग के संरक्षण नियमों का सदैव पालन होता है।

(A) अल्फा क्षय (Alpha Decay)

α-कण वास्तव में धनावेशित द्विआयनित हीलियम नाभिक (₂⁴He) होता है, जिसका द्रव्यमान प्रोटॉन के द्रव्यमान का लगभग 4 गुना तथा आवेश प्रोटॉन के आवेश का 2 गुना होता है।

📐 अल्फा क्षय — सामान्य समीकरण एवं उदाहरण — सूत्र/अभिक्रिया

ᴬZX → ᴬ⁻⁴Z₋₂Y + ⁴₂He
उदाहरण: ²³⁸₉₂U → ²³⁴₉₀Th + ⁴₂He

(B) बीटा क्षय (Beta Decay)

जब नाभिक इलेक्ट्रॉन (β⁻) या पॉज़िट्रॉन (β⁺) उत्सर्जित करता है, तो इसे बीटा क्षय कहते हैं। इसमें एक न्यूट्रिनो/एंटीन्यूट्रिनो (आवेशहीन, अत्यल्प द्रव्यमान वाला कण, जिसका पदार्थ के साथ अंतःक्रिया अत्यंत क्षीण होती है) भी उत्सर्जित होता है।

विशेषताβ⁻ क्षय (Beta Minus)β⁺ क्षय (Beta Plus)
उत्सर्जित कणइलेक्ट्रॉन (e⁻) + एंटीन्यूट्रिनोपॉज़िट्रॉन (e⁺) + न्यूट्रिनो
मूल प्रक्रियान्यूट्रॉन → प्रोटॉनप्रोटॉन → न्यूट्रॉन
समीकरणn → p + e⁻ + ν̄p → n + e⁺ + ν
परमाणु क्रमांक (Z)1 बढ़ता है1 घटता है
द्रव्यमान संख्या (A)अपरिवर्तित रहती हैअपरिवर्तित रहती है
उदाहरण³²₁₅P → ³²₁₆S + e⁻ + ν̄²²₁₁Na → ²²₁₀Ne + e⁺ + ν

(C) गामा क्षय (Gamma Decay)

जब कोई उत्तेजित नाभिक निम्न ऊर्जा अवस्था में आता है, तब अतिरिक्त ऊर्जा γ-फोटॉन के रूप में उत्सर्जित होती है। γ-क्षय में परमाणु क्रमांक (Z) एवं द्रव्यमान संख्या (A) में कोई परिवर्तन नहीं होता — अर्थात तत्व का रूपांतरण नहीं होता, केवल ऊर्जा उत्सर्जित होती है। γ-किरणें अत्यंत उच्च आवृत्ति की विद्युतचुंबकीय तरंगें हैं, जिनका विराम द्रव्यमान शून्य होता है, और सामान्यतः α या β क्षय के पश्चात यह उत्सर्जित होती हैं।

📐 गामा क्षय — सामान्य समीकरण — सूत्र/अभिक्रिया

ᴬZX* → ᴬZX + γ

α, β, γ किरणों के गुणों की तुलना

गुणα (अल्फा)β (बीटा)γ (गामा)
प्रकृतिधनावेशित (+2e)ऋणावेशित (−e)उदासीन (कोई आवेश नहीं)
चुंबकीय क्षेत्र में विक्षेपणβ से कमα से अधिककोई विक्षेपण नहीं
भेदन क्षमता (Penetration)न्यूनतम (कागज़ रोक ले)मध्यम (एल्युमिनियम शीट रोके)सर्वाधिक (मोटी सीसा परत आवश्यक)
आयनन क्षमतासर्वाधिकमध्यमन्यूनतम
गतिज ऊर्जातुलनात्मक रूप से कममध्यमसर्वाधिक
द्रव्यमान6.6 × 10⁻²⁷ kg9.1 × 10⁻³¹ kgशून्य (द्रव्यमान रहित)
¶ चित्र: अल्फा, बीटा एवं गामा विकिरणों की भेदन क्षमता (Penetration Power) — α-कण कागज़ से, β-कण एल्युमिनियम शीट से रुक जाते हैं, जबकि γ-किरणों को रोकने हेतु मोटी सीसा (Lead) परत आवश्यक होती है
💡 गीगर-मूलर काउंटर — रेडियोधर्मिता मापने का यंत्र

किसी पदार्थ की रेडियोएक्टिविटी को गीगर-मूलर काउंटर (Geiger-Müller Counter) नामक उपकरण द्वारा मापा जाता है। यह उपकरण α, β अथवा γ किरणों के पदार्थ से टकराने पर उत्पन्न आयनीकरण को विद्युत संकेत में बदलकर 'टिक-टिक' ध्वनि के रूप में गिनती करता है — प्रयोगशालाओं व परमाणु संयंत्रों में विकिरण सुरक्षा जाँच हेतु यह एक अनिवार्य उपकरण है।

🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
अल्फा क्षयबीटा क्षयगामा क्षयपॉज़िट्रॉनन्यूट्रिनोएंटीन्यूट्रिनोभेदन क्षमताआयनन क्षमतागीगर-मूलर काउंटर
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4रेडियोधर्मिता के अनुप्रयोग (Applications of Radioactivity)

(A) चिकित्सा क्षेत्र में (Medical Field)

रेडियोधर्मी समस्थानिकों का उपयोग रोगों की पहचान (Diagnosis) तथा उपचार दोनों में किया जाता है।

समस्थानिकउपयोग/अनुप्रयोग
I-131 (आयोडीन)थायराइड ग्रंथि की जाँच एवं उपचार में
Co-60 (कोबाल्ट)कैंसर के उपचार में (रेडियोथेरेपी)
P-32 (फॉस्फोरस)रक्त रोगों (ल्यूकेमिया) के उपचार में
Tc-99 (टेक्नीशियम)फेफड़ों के परीक्षण में
Fe-59 (आयरन)एनीमिया व अन्य रक्त विकारों की जाँच में
Cs-137 / I-125ब्रेकीथेरेपी (Brachytherapy) में
Au-198 (गोल्ड)रक्त कैंसर के उपचार में

(B) पुरातत्व क्षेत्र में — कार्बन डेटिंग (Archaeological Field)

कार्बन डेटिंग एक वैज्ञानिक विधि है, जिसका उपयोग प्राचीन जीवाश्मों, अवशेषों तथा अन्य जैविक पदार्थों की आयु निर्धारित करने के लिए किया जाता है। यह विधि रेडियोधर्मी कार्बन-14 (C-14) के क्षय पर आधारित होती है, जिसकी खोज वैज्ञानिक विलार्ड लिब्बी (Willard Libby) ने की थी।

कार्यविधि

कार्बन डेटिंग का महत्व
  • प्राचीन मानव सभ्यताओं, कंकालों, पेड़ों की आयु ज्ञात करना
  • लगभग 50,000–60,000 वर्ष तक प्रभावी विधि
  • प्राचीन पर्यावरण व जलवायु परिवर्तन का अध्ययन
  • ऐतिहासिक वस्त्रों-ग्रंथों की आयु निर्धारण (जैसे डेड सी स्क्रॉल)
कार्बन डेटिंग की सीमाएँ
  • केवल जैविक (कार्बन-आधारित) वस्तुओं पर प्रभावी, पत्थर-धातु पर नहीं
  • 50,000 वर्ष से अधिक पुराने नमूनों में C-14 मापना कठिन
  • वायुमंडल में C-14 की सांद्रता समय के साथ स्थिर नहीं रही
  • नमूने का संदूषण (Contamination) परिणाम बिगाड़ सकता है
यूरेनियम डेटिंग विधि (Uranium Dating): यह विधि यूरेनियम-238 (U-238) के लेड-206 (Pb-206) में क्षय पर आधारित होती है तथा इसका उपयोग पृथ्वी, चट्टानों एवं खगोलीय नमूनों की आयु (लाखों-करोड़ों वर्ष तक) निर्धारित करने में किया जाता है — भूवैज्ञानिक नमूनों में जितना अधिक लेड-206 होगा, नमूना उतना ही पुराना माना जाएगा। पोटैशियम-40 (K-40) से उल्कापिंडों की तथा रूबिडियम-87 (Rb-87) से चंद्रमा के नमूनों की आयु का अध्ययन किया जाता है।

(C) कृषि एवं (D) औद्योगिक क्षेत्र में

नाभिकीय ऊर्जा (Nuclear Energy)

विखंडन (Fission — भारी नाभिक का टूटना) तथा संलयन (Fusion — हल्के नाभिकों का जुड़ना) प्रक्रियाओं का उपयोग परमाणु भट्टी (Nuclear Reactor) में ऊर्जा उत्पादन तथा विभिन्न रेडियोएक्टिव समस्थानिकों के निर्माण में किया जाता है — यही सिद्धांत भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का आधार है, जिसकी विस्तृत चर्चा अगले विषय में की गई है।

🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
I-131Co-60कार्बन डेटिंगविलार्ड लिब्बीयूरेनियम डेटिंगब्रेकीथेरेपीविखंडनसंलयनविसंक्रमण
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5भारत में परमाणु ऊर्जा एवं सुरक्षा (India's Nuclear Energy & Safety Framework)

संस्थागत ढाँचा — DAE, AERB, BARC

¶ चित्र: कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र (तमिलनाडु) — भारत की सबसे बड़ी एकल परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं में से एक

भारत का परमाणु ऊर्जा रोडमैप — लक्ष्य 100 गीगावाट (2047)

केंद्रीय बजट 2025-26 में भारत सरकार ने वर्ष 2047 तक 100 गीगावाट (GW) परमाणु ऊर्जा क्षमता स्थापित करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है, जिसे 'विकसित भारत @2047' तथा 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन के राष्ट्रीय संकल्प का एक प्रमुख स्तंभ माना जा रहा है।

नवीनतम उपलब्धि — प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) क्रांतिक (Critical), अप्रैल 2026: 6 अप्रैल 2026 को कल्पक्कम (तमिलनाडु) में भारत के स्वदेशी रूप से डिज़ाइन एवं निर्मित प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (Prototype Fast Breeder Reactor – PFBR) ने क्रांतिकता (Criticality) प्राप्त कर ली — अर्थात इसमें सतत नाभिकीय शृंखला अभिक्रिया (Sustained Chain Reaction) प्रारंभ हो गई। यह भारत के तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम (प्राकृतिक यूरेनियम → प्लूटोनियम-आधारित फास्ट ब्रीडर रिएक्टर → थोरियम) के दूसरे चरण की एक ऐतिहासिक उपलब्धि है, जो भारत को फास्ट ब्रीडर तकनीक में सक्षम गिने-चुने देशों में शामिल करती है।

नाभिकीय ऊर्जा मिशन — भारत लघु रिएक्टर (Bharat Small Reactors)

फरवरी 2025 के केंद्रीय बजट में वित्त मंत्री ने 'विकसित भारत के लिए नाभिकीय ऊर्जा मिशन' की घोषणा की, जिसके अंतर्गत ₹20,000 करोड़ के परिव्यय से कम-से-कम पाँच स्वदेशी रूप से डिज़ाइन किए गए लघु मॉड्यूलर रिएक्टर (Small Modular Reactors – SMR) वर्ष 2033 तक चालू करने का लक्ष्य रखा गया है। परमाणु ऊर्जा विभाग तीन प्रकार के स्वदेशी SMR डिज़ाइनों पर कार्य कर रहा है — भारत स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (BSMR-200, 220 मेगावाट), SMR-55 (55 मेगावाट), तथा हाइड्रोजन उत्पादन हेतु एक उच्च-तापीय गैस-शीतित रिएक्टर (5 मेगावाट तापीय क्षमता तक)।

💡 निजी क्षेत्र की भागीदारी — एक नया अध्याय

भारत सरकार की 'भारत स्मॉल रिएक्टर' पहल के अंतर्गत हिंडाल्को, जिंदल स्टील एंड पावर, टाटा पावर, रिलायंस इंडस्ट्रीज़, JSW एनर्जी तथा अडानी पावर सहित छह प्रमुख निजी कंपनियों ने प्रस्ताव प्रस्तुत किए हैं — यह भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में पहली बार निजी निवेश के बड़े पैमाने पर प्रवेश का संकेत है, जो अब तक पूर्णतः सरकारी क्षेत्र (DAE/NPCIL) के अधीन रहा है।

विकिरण सुरक्षा एवं सावधानियाँ

🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
DAEAERBBARCPFBRकल्पक्कमक्रांतिकतातीन-चरणीय कार्यक्रमBSMR-200SMR-55नाभिकीय ऊर्जा मिशनविकिरण सुरक्षा

📌 अध्याय सारांश (Chapter Summary)

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← अध्याय 9: ईंधन एवं ऑक्टेन रेटिंग अध्याय 11: हरित रसायन एवं इसके अनुप्रयोग →