सन 1828 — जर्मन रसायनज्ञ फ्रेडरिक वोहलर (Friedrich Wöhler) अपनी प्रयोगशाला में एक साधारण अकार्बनिक लवण अमोनियम साइनेट (Ammonium Cyanate) को गर्म कर रहे थे। उस दौर में पूरी दुनिया मानती थी कि कार्बनिक यौगिक (जैसे यूरिया, शर्करा, प्रोटीन) केवल किसी 'जीवनी शक्ति' (Vital Force) की मदद से जीवित शरीर के भीतर ही बन सकते हैं — कोई भी वैज्ञानिक प्रयोगशाला में इन्हें कभी नहीं बना सकता। लेकिन जब वोहलर ने अपने बर्तन में बने सफेद क्रिस्टल की जाँच की, तो वे चौंक गए — यह तो जंतुओं के मूत्र में पाया जाने वाला यूरिया (Urea) था, जो एक शुद्ध कार्बनिक यौगिक है! एक अकार्बनिक लवण से, बिना किसी जीव के, प्रयोगशाला में यूरिया बन गया था। इस एक प्रयोग ने सदियों पुरानी 'जीवनी शक्ति सिद्धांत' की मान्यता को तोड़ दिया और आधुनिक कार्बनिक रसायन विज्ञान (Organic Chemistry) की नींव रख दी — यही वह तत्व है जो आज हमारे भोजन, वस्त्र, ईंधन, प्लास्टिक और लगभग हर वस्तु में समाया हुआ है।
किसी तत्व के दो या दो से अधिक ऐसे रूप, जिनके भौतिक एवं रासायनिक गुणों में पर्याप्त भिन्नता होती है, परन्तु वे एक ही तत्व से बने होते हैं, उन्हें अपररूप (Allotropes) कहते हैं और इस गुण को अपररूपता (Allotropy) कहा जाता है। कार्बन के अपररूप दो व्यापक वर्गों में बाँटे जाते हैं — क्रिस्टलीय अपररूप (Crystalline Allotropes), जिनमें कार्बन परमाणु एक निश्चित ज्यामितीय क्रम में व्यवस्थित होकर नियमित क्रिस्टल जालक बनाते हैं (जैसे हीरा, ग्रेफाइट, फुलरीन, ग्रेफीन, कार्बन नैनोट्यूब), और अक्रिस्टलीय अपररूप (Amorphous Allotropes), जिनकी संरचना अनियमित होती है (जैसे कोयला, कोक, काजल)।
(A) हीरा (Diamond)
हीरा कार्बन का सबसे शुद्ध, सबसे कठोर एवं सबसे मूल्यवान क्रिस्टलीय अपररूप है। यह पृथ्वी के भीतर अत्यंत उच्च दाब और उच्च तापमान की परिस्थितियों में बनता है तथा प्राकृतिक रूप से मुख्यतः किम्बरलाइट शैलों (Kimberlite Rocks) से प्राप्त किया जाता है।
| ¶ चित्र: हीरे की समचतुष्फलकीय (Tetrahedral) क्रिस्टल जालक संरचना — प्रत्येक कार्बन परमाणु चार अन्य कार्बन परमाणुओं से सहसंयोजक बंध द्वारा जुड़ा रहता है |
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संरचना (Structure)
गुणधर्म एवं उपयोग (Properties & Uses)
आभूषणों की दुकान में हीरे की अँगूठी जब रोशनी में चमकती है, तो वह चमक हीरे की अत्यंत उच्च अपवर्तनांक (Refractive Index ≈ 2.42) के कारण होती है — प्रकाश हीरे के भीतर कई बार परावर्तित होकर बाहर निकलता है। यही गुण इसे आभूषणों के लिए सबसे उपयुक्त रत्न बनाता है, जबकि इसकी अत्यधिक कठोरता इसे उद्योगों में काँच काटने और चट्टान छेदने के लिए अपरिहार्य बनाती है।
(B) ग्रेफाइट (Graphite)
ग्रेफाइट कार्बन का एक क्रिस्टलीय अपररूप है। यह शब्द यूनानी शब्द 'Graphō' से बना है जिसका अर्थ है 'लिखना' — इसी कारण यह कागज पर काला निशान छोड़ता है और इसे सामान्यतः 'काला सीसा' (Black Lead) भी कहा जाता है।
| ¶ चित्र: ग्रेफाइट की परतीय (Layered) षट्कोणीय संरचना — परतों के बीच दुर्बल वैन्डर वाल्स बल होने से परतें आसानी से एक-दूसरे पर फिसल सकती हैं |
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संरचना एवं गुणधर्म
| गुण (Property) | हीरा (Diamond) | ग्रेफाइट (Graphite) |
|---|---|---|
| भौतिक अवस्था | पारदर्शी एवं रंगहीन | अपारदर्शी, चमकदार तथा काला |
| संरचना | त्रिविमीय (3D) चतुष्फलकीय संरचना | षट्कोणीय परतदार (Layered) संरचना |
| संकरण | sp³ संकरण | sp² संकरण |
| कठोरता | अत्यधिक कठोर | मुलायम एवं चिकना |
| विशिष्ट घनत्व | 3.51 | 2.25 |
| विद्युत चालकता | विद्युत का कुचालक | विद्युत का सुचालक |
| स्थायित्व | तुलनात्मक रूप से कम स्थायी | ऊष्मागतिक रूप से सर्वाधिक स्थायी |
(C) फुलरीन (Fullerene)
सन 1985 में वैज्ञानिक H. W. Kroto, R. E. Smalley तथा R. F. Curl ने कार्बन के एक नए अपररूप फुलरीन (Fullerene) की खोज की। इस महत्त्वपूर्ण खोज के लिए इन तीनों वैज्ञानिकों को 1996 में रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। जब ग्रेफाइट को हीलियम या आर्गन जैसी अक्रिय गैसों की उपस्थिति में विद्युत आर्क (Electric Arc) द्वारा अत्यधिक ताप पर गर्म किया जाता है, तब फुलरीन का निर्माण होता है।
| ¶ चित्र: बकमिन्स्टर फुलरीन C₆₀ की फुटबॉलनुमा (Buckyball) पिंजरानुमा संरचना — 20 षट्कोणीय व 12 पंचकोणीय फलकों से निर्मित |
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संरचनात्मक विशेषताएँ
जिस तरह एक फुटबॉल काले पंचकोणीय व सफेद षट्कोणीय टुकड़ों को सिलकर बनाया जाता है, ठीक उसी ज्यामिति में C₆₀ फुलरीन के 60 कार्बन परमाणु व्यवस्थित होते हैं। इसी 'नैनो-फुटबॉल' संरचना के कारण वैज्ञानिक फुलरीन का उपयोग दवाओं को शरीर के भीतर सही स्थान तक पहुँचाने वाले सूक्ष्म वाहक (Drug Delivery Vehicle) के रूप में शोध में कर रहे हैं।
ग्रेफीन (Graphene) एवं कार्बन नैनोट्यूब (Carbon Nanotubes) — कार्बन के आधुनिक अपररूप
(D) अक्रिस्टलीय अपररूप (Amorphous Allotropes)
ऐसे कार्बन के अपररूप जिनमें कार्बन परमाणु किसी निश्चित ज्यामितीय व्यवस्था में व्यवस्थित नहीं होते, अर्थात जिनकी संरचना अनियमित होती है, उन्हें अक्रिस्टलीय अपररूप कहते हैं। उदाहरण: कोयला, कोक/चारकोल, काजल।
कोयला (Coal)
हजारों वर्ष पूर्व भूगर्भ में दबे हुए पेड़-पौधे एवं जीव-जंतु अधिक ताप एवं दाब के प्रभाव से धीरे-धीरे पत्थर जैसी कठोर अवस्था में परिवर्तित हो गए — इस प्रकार बनने वाले पदार्थ को पत्थर का कोयला (Coal) कहते हैं। कार्बन प्रतिशत के आधार पर कोयले को चार श्रेणियों में बाँटा जाता है:
| कोयले का प्रकार | मुख्य विशेषताएँ | कार्बन (%) |
|---|---|---|
| पीट (Peat) | कोयला बनने की प्रथम अवस्था, न्यूनतम श्रेणी, जलने पर धुआँ-राख अधिक व ऊष्मा कम | 50–60% |
| लिग्नाइट (Lignite) | भूरा कोयला, राजस्थान में प्रमुखता से पाया जाता है, पीट से बेहतर गुणवत्ता | लगभग 67% |
| बिटुमिनस (Bituminous) | सामान्य श्रेणी, सर्वाधिक उपयोग में, धुआँ-राख कम व ऊष्मा अधिक | 80–85% |
| एन्थ्रेसाइट (Anthracite) | सर्वोत्तम श्रेणी, जलने पर धुआँ-राख न्यूनतम व ऊष्मा अधिकतम | 90–93% |
कोक/चारकोल (Coke/Charcoal) एवं काजल (Lamp Black/Soot)
| आधार | क्रिस्टलीय अपररूप | अक्रिस्टलीय अपररूप |
|---|---|---|
| संरचना | कार्बन परमाणु निश्चित ज्यामितीय क्रम में व्यवस्थित होकर नियमित क्रिस्टल जालक बनाते हैं | कार्बन परमाणुओं की कोई निश्चित ज्यामितीय व्यवस्था नहीं होती, संरचना अनियमित होती है |
| क्रिस्टल स्वरूप | स्पष्ट एवं नियमित क्रिस्टलीय संरचना होती है | स्पष्ट क्रिस्टलीय संरचना नहीं होती |
| भौतिक गुण | निश्चित एवं सुव्यवस्थित होते हैं | अपेक्षाकृत अनियमित व भिन्न-भिन्न हो सकते हैं |
| शुद्धता | सामान्यतः अधिक शुद्ध रूप में पाए जाते हैं | सामान्यतः अशुद्धियाँ अधिक पाई जाती हैं |
| उदाहरण | हीरा, ग्रेफाइट, फुलरीन, ग्रेफीन, कार्बन नैनोट्यूब | कोयला, कोक, चारकोल, काजल |
चतुःसंयोजकता (Tetravalency) एवं सहसंयोजक बंधन
कार्बन का परमाणु क्रमांक 6 है और इसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 2, 4 होता है, अर्थात इसकी संयोजकता कोश (Valence Shell) में 4 इलेक्ट्रॉन होते हैं। कार्बन न तो 4 इलेक्ट्रॉन त्यागकर धनायन (Cation) बना सकता है (क्योंकि इसके लिए अत्यधिक ऊर्जा चाहिए) और न ही 4 इलेक्ट्रॉन ग्रहण कर ऋणायन (Anion) बना सकता है (क्योंकि 6 प्रोटॉनों का नाभिक 10 इलेक्ट्रॉनों को नियंत्रित करने में कठिनाई महसूस करेगा)। इसलिए कार्बन अपने संयोजकता इलेक्ट्रॉनों को अन्य परमाणुओं के साथ साझा (Share) करके सहसंयोजक बंध (Covalent Bond) बनाता है — इस विशेषता को चतुःसंयोजकता (Tetravalency) कहते हैं।
यदि कार्बन अपने 4 इलेक्ट्रॉन त्याग दे तो C⁴⁺ आयन बनेगा, परंतु मात्र 6 प्रोटॉन वाला नाभिक 2 शेष इलेक्ट्रॉनों को अत्यंत प्रबलता से खींचेगा, जिससे यह अवस्था अत्यंत अस्थिर होगी। इसी प्रकार 4 इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने पर C⁴⁻ बनेगा, परंतु 6 प्रोटॉनों के लिए 10 इलेक्ट्रॉनों को नियंत्रित करना कठिन होगा। इसीलिए कार्बन साझेदारी (Sharing) का मार्ग अपनाता है — यही कारण है कि कार्बन के लगभग सभी यौगिक सहसंयोजक प्रकृति के होते हैं।
शृंखलन (Catenation)
कार्बन परमाणुओं की अपने ही समान परमाणुओं (अन्य कार्बन परमाणुओं) के साथ जुड़कर लंबी शृंखलाएँ, शाखाएँ अथवा वलय (Ring) बनाने की अद्वितीय क्षमता को शृंखलन (Catenation) कहते हैं। कार्बन में यह गुण किसी भी अन्य तत्व की तुलना में सर्वाधिक विकसित है — इसका मुख्य कारण कार्बन का छोटा परमाणु आकार तथा अत्यंत प्रबल एवं स्थायी C–C सहसंयोजक बंध है। इसी शृंखलन गुण के कारण कार्बन लाखों की संख्या में विविध यौगिक बना सकता है — जो किसी भी अन्य तत्व के लिए संभव नहीं है।
कार्बन-कार्बन बंधों के प्रकार
| बंध प्रकार | संरचना (उदाहरण) | बंध लंबाई (लगभग) | बंध सामर्थ्य |
|---|---|---|---|
| एकल बंध (Single Bond, C–C) | ईथेन (H₃C–CH₃) | 154 pm | सबसे कमजोर, सबसे लंबा |
| द्वि-बंध (Double Bond, C=C) | एथिलीन (H₂C=CH₂) | 134 pm | मध्यम सामर्थ्य |
| त्रि-बंध (Triple Bond, C≡C) | एसीटिलीन (HC≡CH) | 120 pm | सर्वाधिक प्रबल, सबसे छोटा |
जीवनी शक्ति सिद्धांत का पतन — वोहलर का यूरिया संश्लेषण
19वीं सदी की शुरुआत तक वैज्ञानिक मानते थे कि कार्बनिक यौगिक (Organic Compounds) केवल जीवित प्राणियों के शरीर में किसी रहस्यमयी 'जीवनी शक्ति' (Vital Force) की उपस्थिति में ही बन सकते हैं, और प्रयोगशाला में इन्हें बनाना असंभव है — इसे जीवनी शक्ति सिद्धांत (Vital Force Theory) कहा जाता था। सन 1828 में फ्रेडरिक वोहलर (Friedrich Wöhler) ने अमोनियम साइनेट (एक अकार्बनिक लवण) को गर्म करके प्रयोगशाला में यूरिया (Urea) — एक विशुद्ध कार्बनिक यौगिक — संश्लेषित कर दिया। इस प्रयोग ने जीवनी शक्ति सिद्धांत को पूरी तरह खारिज कर दिया और आधुनिक कार्बनिक रसायन विज्ञान की नींव रखी।
NH₄CNO →(गर्म करने पर)→ NH₂–CO–NH₂ (यूरिया)
कार्बन यौगिकों की प्रमुख रासायनिक अभिक्रियाएँ
(1) दहन (Combustion)
कार्बन एवं इसके अधिकांश यौगिक ऑक्सीजन में जलकर कार्बन डाइऑक्साइड, जल एवं ऊष्मा तथा प्रकाश ऊर्जा उत्पन्न करते हैं — यह एक ऊष्माक्षेपी (Exothermic) अभिक्रिया है।
CH₄ + 2O₂ → CO₂ + 2H₂O + ऊष्मा
C₂H₅OH + 3O₂ → 2CO₂ + 3H₂O + ऊष्मा
(2) ऑक्सीकरण (Oxidation)
क्षारीय पोटैशियम परमैंगनेट (KMnO₄) या अम्लीय पोटैशियम डाइक्रोमेट (K₂Cr₂O₇) जैसे ऑक्सीकारकों की उपस्थिति में एल्कोहॉल का ऑक्सीकरण होकर कार्बोक्सिलिक अम्ल बनता है — जैसे एथेनॉल का ऑक्सीकरण होकर एथेनोइक अम्ल (सिरका) बनना।
CH₃CH₂OH →(ऑक्सीकरण)→ CH₃COOH (एथेनोइक अम्ल)
(3) संकलन/हाइड्रोजनीकरण (Addition/Hydrogenation)
असंतृप्त हाइड्रोकार्बन (द्वि-बंध या त्रि-बंध युक्त) निकिल (Ni) उत्प्रेरक की उपस्थिति में हाइड्रोजन से संयोग कर संतृप्त हाइड्रोकार्बन बनाते हैं — इसी सिद्धांत पर वनस्पति तेल को वनस्पति घी (Vanaspati Ghee) में परिवर्तित किया जाता है।
वनस्पति तेल + H₂ →(Ni उत्प्रेरक, दाब)→ वनस्पति घी (ठोस वसा)
(4) प्रतिस्थापन (Substitution)
संतृप्त हाइड्रोकार्बन (एल्केन) सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में हैलोजन (Cl₂, Br₂) के साथ अभिक्रिया कर हाइड्रोजन परमाणुओं को क्रमिक रूप से हैलोजन परमाणुओं से प्रतिस्थापित करते हैं।
CH₄ + Cl₂ →(सूर्य प्रकाश)→ CH₃Cl + HCl
बाज़ार में मिलने वाला वनस्पति घी वास्तव में तरल वनस्पति तेल (असंतृप्त वसा अम्ल) का हाइड्रोजनीकरण करके बनाया जाता है — निकिल उत्प्रेरक की उपस्थिति में हाइड्रोजन गैस प्रवाहित करने पर द्वि-बंध टूटकर हाइड्रोजन जुड़ जाता है और तरल तेल ठोस घी में बदल जाता है। यह संकलन अभिक्रिया का प्रत्यक्ष दैनिक जीवन उदाहरण है।
केवल कार्बन एवं हाइड्रोजन के परमाणुओं से बने कार्बनिक यौगिकों को हाइड्रोकार्बन (Hydrocarbon) कहते हैं। ये पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस के मुख्य घटक हैं तथा ईंधन के रूप में सर्वाधिक उपयोग किए जाते हैं। हाइड्रोकार्बन को संरचना एवं बंध-प्रकृति के आधार पर विस्तृत रूप से वर्गीकृत किया जाता है।
हाइड्रोकार्बन का वर्गीकरण
हाइड्रोकार्बन के भौतिक गुण
हाइड्रोकार्बन का नामकरण (Nomenclature)
कार्बनिक यौगिकों के नामकरण की तीन प्रणालियाँ प्रचलित हैं — तुच्छ नाम प्रणाली (Trivial Nomenclature, जैसे 'फॉर्मिक एसिड'), व्युत्पन्न प्रणाली (Derived Nomenclature) एवं IUPAC प्रणाली (International Union of Pure and Applied Chemistry), जो आज विश्वव्यापी वैज्ञानिक मानक है। IUPAC नामकरण में कार्बन-संख्या के अनुसार एक निश्चित प्रत्यय (Prefix) एवं बंध-प्रकार के अनुसार एक प्रत्यय (Suffix) प्रयुक्त होता है — एकल बंध हेतु 'ऐन' (-ane), द्वि-बंध हेतु 'ईन' (-ene) तथा त्रि-बंध हेतु 'आइन' (-yne)।
| कार्बन संख्या | प्रत्यय (Prefix) | एल्केन का नाम (उदाहरण) |
|---|---|---|
| C1 | मेथ (Meth) | मेथेन (CH₄) |
| C2 | एथ (Eth) | ईथेन (C₂H₆) |
| C3 | प्रोप (Prop) | प्रोपेन (C₃H₈) |
| C4 | ब्यूट (But) | ब्यूटेन (C₄H₁₀) |
| C5 | पेंट (Pent) | पेंटेन (C₅H₁₂) |
| C6 | हेक्स (Hex) | हेक्सेन (C₆H₁₄) |
| C7 | हेप्ट (Hept) | हेप्टेन (C₇H₁₆) |
| C8 | ऑक्ट (Oct) | ऑक्टेन (C₈H₁₈) |
| C9 | नॉन (Non) | नोनेन (C₉H₂₀) |
| C10 | डेक (Dec) | डेकेन (C₁₀H₂₂) |
यदि किसी हाइड्रोकार्बन में 2 कार्बन परमाणु तथा एक द्वि-बंध हो, तो प्रत्यय 'एथ' (Eth) एवं प्रत्यय 'ईन' (-ene) जोड़कर नाम बनता है — एथीन (Ethene, C₂H₄), जिसे सामान्य भाषा में एथिलीन कहा जाता है। इसी प्रकार 2 कार्बन व त्रि-बंध होने पर नाम बनता है — एथाइन (Ethyne, C₂H₂), जिसे एसीटिलीन कहा जाता है। यह क्रमबद्ध पद्धति ही IUPAC नामकरण को विश्व-मान्य एवं भ्रम-रहित बनाती है।
प्रत्येक कार्बनिक यौगिक में उपस्थित वह विशिष्ट परमाणु या परमाणु-समूह, जो यौगिक के रासायनिक गुणों को निर्धारित करता है, क्रियात्मक समूह (Functional Group) कहलाता है — जैसे एल्कोहॉल में –OH समूह, कार्बोक्सिलिक अम्ल में –COOH समूह। एक ही क्रियात्मक समूह वाले यौगिकों की श्रृंखला को समजातीय श्रेणी (Homologous Series) कहा जाता है, जिसमें क्रमागत सदस्यों के बीच –CH₂ का अंतर होता है।
(A) साबुन एवं अपमार्जक की रसायन विज्ञान (Soap & Detergent Chemistry)
उच्च वसा अम्लों (जैसे स्टीयरिक अम्ल, पामिटिक अम्ल, ओलिइक अम्ल) के सोडियम या पोटैशियम लवणों को साबुन कहा जाता है। जब उच्च वसा अम्लों को सोडियम हाइड्रॉक्साइड (NaOH) के जलीय विलयन के साथ गर्म किया जाता है, तो साबुन एवं ग्लिसरॉल का विलयन प्राप्त होता है — इस प्रक्रिया को साबुनीकरण (Saponification) कहते हैं।
वसा/तेल (ट्राइग्लिसराइड) + 3NaOH →(गर्म करने पर)→ 3 साबुन (RCOONa) + ग्लिसरॉल
साबुन किस प्रकार सफाई करता है — मिसेल सिद्धांत
साबुन के प्रत्येक अणु के दो भाग होते हैं — एक लंबी हाइड्रोकार्बन शृंखला जो जल-विरागी (Hydrophobic) होती है और 'पूँछ' कहलाती है, तथा एक ध्रुवीय आयनिक शीर्ष (–COO⁻Na⁺) जो जल-स्नेही (Hydrophilic) होता है। जब साबुन को जल में मिलाया जाता है, तो अणु संगठित होकर मिसेल (Micelle) नामक गोलाकार संरचना बनाते हैं, जिसमें तेल/चिकनाई की बूँदें भीतर की ओर (पूँछों से घिरी) फँस जाती हैं और शीर्ष जल की ओर रहते हैं — इस प्रकार गंदगी जल में घुलकर धुल जाती है।
कठोर जल की समस्या एवं अपमार्जक (Detergents)
साबुन मृदु जल में अच्छी तरह सफाई करता है, परंतु कठोर जल में उपस्थित Ca²⁺ एवं Mg²⁺ आयन साबुन के Na⁺ आयन को प्रतिस्थापित कर अघुलनशील कैल्शियम/मैग्नीशियम लवण (Scum) बनाते हैं — इससे झाग नहीं बनता और सफाई प्रभावित हो जाती है। इस समस्या के समाधान हेतु अपमार्जक (Detergents) उपयोगी हैं, क्योंकि ये Ca²⁺/Mg²⁺ के साथ भी घुलनशील यौगिक बनाते हैं, जो अवक्षेपित नहीं होते — इसीलिए कठोर जल में भी अपमार्जक प्रभावी ढंग से सफाई करते हैं।
नहाने के साबुन को बोरवेल के कठोर जल में रगड़ने पर झाग कम बनता है और त्वचा पर चिपचिपी परत (Scum) महसूस होती है, जबकि उसी कठोर जल में शैम्पू या कपड़े धोने का डिटर्जेंट प्रयोग करने पर भरपूर झाग बनता है — यही अंतर साबुन की सीमा एवं सिंथेटिक अपमार्जक की श्रेष्ठता को स्पष्ट करता है।
(B) प्लास्टिक के घरेलू उपयोग
प्लास्टिक कार्बन युक्त बहुलक (Polymer) पदार्थ हैं, जिन्हें आसानी से किसी भी आकार में ढाला जा सकता है। घरेलू स्तर पर प्लास्टिक का उपयोग खाद्य पैकेजिंग, पानी की बोतलों, बाल्टी-मग जैसे बर्तनों, खिलौनों, फर्नीचर, विद्युत उपकरणों के आवरण एवं पाइपों में व्यापक रूप से होता है — इसका मुख्य कारण इसकी हल्की प्रकृति, जंग-रोधी गुण, सस्ती लागत एवं ढलाई में सुगमता है।
| ¶ चित्र: औद्योगिक उपयोग हेतु तैयार प्लास्टिक कणिकाएँ (Plastic Pellets) — इन्हें पिघलाकर विभिन्न घरेलू व औद्योगिक वस्तुओं में ढाला जाता है |
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(C) कपड़ा/वस्त्र में कार्बन यौगिकों का उपयोग
वस्त्र (Textile) दो व्यापक स्रोतों से प्राप्त होते हैं — प्राकृतिक रेशे (जैसे कपास/सेल्युलोस, ऊन, रेशम) और मानव-निर्मित संश्लेषित रेशे (जैसे नायलॉन, पॉलिएस्टर, रेयॉन), जो सभी कार्बन यौगिकों के बहुलक हैं। संश्लेषित रेशे पेट्रोरसायनों से बहुलकीकरण (Polymerization) द्वारा निर्मित किए जाते हैं और इन्हें धागे के रूप में कताई (Spinning) करके वस्त्र बुना जाता है — इनकी टिकाऊपन, सिलवट-रोधी क्षमता तथा कम लागत के कारण इनका दैनिक जीवन में व्यापक उपयोग होता है, जिसकी विस्तृत चर्चा अगले विषय (औद्योगिक उपयोग) में की गई है।
बहुलकीकरण (Polymerization) की अवधारणा
जब छोटे-छोटे सरल अणु (एकलक/Monomer) आपस में मिलकर एक उच्च अणुभार वाली लंबी शृंखलायुक्त बड़ी संरचना बनाते हैं, जिसे बहुलक (Polymer) कहते हैं, तो इस प्रक्रिया को बहुलकीकरण (Polymerization) कहा जाता है। बहुलक आधुनिक उद्योग की रीढ़ हैं और प्लास्टिक, रबर, रेशे तथा अनेक निर्माण सामग्रियों के मूल आधार हैं।
स्रोत के आधार पर वर्गीकरण
एकलकों एवं संरचना के आधार पर वर्गीकरण
औद्योगिक महत्व के प्रमुख बहुलक
| बहुलक का नाम | मुख्य उपयोग | निर्माण स्रोत (एकलक) |
|---|---|---|
| पॉलीथीन (Polythene) | कुचालक, पैकिंग पदार्थ, घरेलू व प्रयोगशाला पात्र | एथिलीन से |
| पॉलीविनाइल क्लोराइड (PVC) | बरसाती, सीट कवर, फर्श, पाइप | विनाइल क्लोराइड से |
| टेफ्लॉन (PTFE) | नॉन-स्टिक बर्तन, कुचालक, स्नेहक — रासायनिक रूप से निष्क्रिय | टेट्राफ्लुओरोएथिलीन से |
| PMMA (प्लेक्सीग्लास) | काँच का विकल्प, पारदर्शी वस्तुएँ | मेथिल मेथाक्राइलेट से |
| पॉलिएक्रिलोनाइट्राइल (ऑरलॉन) | कृत्रिम ऊन, संश्लेषित रेशे | एक्रिलोनाइट्राइल से |
| ब्यूना-S (स्टाइरीन-ब्यूटाडाइइन रबर) | वाहन टायर, रबर उत्पाद | स्टाइरीन तथा ब्यूटाडाइइन से |
| ब्यूना-N (नाइट्राइल रबर) | तेल-रोधी रबर, तेल सील, टंकी लाइनिंग | एक्रिलोनाइट्राइल व ब्यूटाडाइइन से |
| टेरिलीन (डैक्रॉन/PET) | संश्लेषित रेशे, वस्त्र, टायर-डोरी | टेरेफ्थैलिक अम्ल व एथिलीन ग्लाइकॉल से |
| नायलॉन-6 | रस्सियाँ, टायर-डोरी, रेशे | कैप्रोलैक्टम से |
| नायलॉन-66 | ब्रश के रेशे, रस्सी, पैराशूट, कालीन | हेक्सामेथिलीन डाइएमीन व एडिपिक अम्ल से |
| बेकेलाइट | स्विच, हैंडल, विद्युत इंसुलेटर | फिनॉल व फॉर्मेल्डिहाइड से |
| मेलामाइन-फॉर्मेल्डिहाइड रेज़िन | प्लास्टिक क्रॉकरी | मेलामाइन व फॉर्मेल्डिहाइड से |
प्राकृतिक एवं संश्लेषित रबर (Rubber)
प्राकृतिक रबर असंतृप्त हाइड्रोकार्बन आइसोप्रीन का बहुलक है, जो रबर के पेड़ों के लैटेक्स (दूध जैसा द्रव) से प्राप्त होता है। सन 1839 में चार्ल्स गुडइयर (Charles Goodyear, USA) ने रबर का वल्कनीकरण (Vulcanization) — गंधक (Sulphur) के साथ गर्म करने की प्रक्रिया — विकसित किया, जिससे रबर की प्रत्यास्थता, तन्य सामर्थ्य एवं कठोरता में भारी सुधार हुआ। संश्लेषित रबर (जैसे ब्यूना-S, ब्यूना-N) मानव-निर्मित होते हैं परंतु प्राकृतिक रबर जैसे ही भौतिक गुण रखते हैं और इनका भी वल्कनीकरण किया जा सकता है।
जैव निम्नीकरणीय एवं अजैव निम्नीकरणीय बहुलक
1930 के दशक में वैलेस कैरोथर्स (Wallace Carothers) द्वारा विकसित नायलॉन-66 विश्व का पहला पूर्णतः संश्लेषित रेशा था, जिसने रेशम उद्योग में क्रांति ला दी — यह हल्का, मजबूत, लचीला तथा सस्ता होने के कारण मोज़ों, पैराशूट (द्वितीय विश्वयुद्ध में), टूथब्रश के रेशों तथा आधुनिक कालीनों में व्यापक रूप से उपयोग होता है।
रंजक (Dyes) एवं वर्णक (Pigments)
वे कार्बनिक यौगिक जो जल या अन्य विलायकों में विलेय होकर कपड़े, कागज आदि विभिन्न पदार्थों को रंगने में प्रयुक्त होते हैं, रंजक (Dyes) कहलाते हैं — जैसे इंडिगो (नील, एक वेट रंजक) एवं ऐलिजरीन (मॉर्डेंट रंजक)। इसके विपरीत वर्णक (Pigments) प्रायः अकार्बनिक, जल-अविलेय एवं अत्यधिक स्थिर यौगिक होते हैं, जो पेंट एवं स्याही उद्योग में प्रयुक्त होते हैं।
| गुण | रंजक (Dyes) | वर्णक (Pigments) |
|---|---|---|
| विलेयता | बहुत हद तक विलायकों में विलेयशील | जल एवं अधिकांश विलायकों में अविलेय |
| रासायनिक संगठन | सामान्यतः कार्बनिक यौगिक | सामान्यतः अकार्बनिक यौगिक या भारी धातुएँ |
| स्थिरता एवं प्रकाश-प्रतिरोध | अपेक्षाकृत कम स्थायी, प्रकाश में फीके पड़ते हैं | अधिक स्थायी, प्रकाश से कम प्रभावित |