1660 के दशक में आयरिश वैज्ञानिक रॉबर्ट बॉयल अपनी प्रयोगशाला में बैंगनी रंग की सिरप (Violet Syrup) से कुछ प्रयोग कर रहे थे। एक दिन गलती से उनके हाथ से हाइड्रोक्लोरिक अम्ल की कुछ बूँदें उस बैंगनी सिरप में गिर गईं — और तुरंत सिरप का रंग लाल हो गया! हैरान होकर बॉयल ने इसे क्षार के साथ भी आज़माया — इस बार रंग हरा-नीला हो गया। यही संयोग आगे चलकर लिटमस (Litmus) जैसे सूचकों (Indicators) की खोज का आधार बना, जिनसे आज भी हम बिना किसी महंगे उपकरण के यह पता लगा सकते हैं कि कोई पदार्थ अम्लीय है या क्षारीय। दिलचस्प बात यह है कि आपके शरीर के अंदर, आपकी रसोई में, यहाँ तक कि बारिश की हर बूँद में भी यही अम्ल-क्षार का खेल लगातार चलता रहता है — नींबू का खट्टापन, साबुन की चिकनाई, पेट में जलन, या दूध का फटना — इन सबके पीछे एक ही विज्ञान छिपा है। आइए इस अध्याय में समझते हैं कि अम्ल, क्षार, लवण, pH तथा बफर विलयन आखिर काम कैसे करते हैं।
अम्ल शब्द लैटिन शब्द "Acidus" से बना है, जिसका अर्थ खट्टा होता है, जबकि क्षार (Alkali) शब्द अरबी शब्द "Al-Qali" से बना है, जिसका अर्थ है पौधों की राख से प्राप्त पदार्थ। समय के साथ वैज्ञानिकों ने अम्ल-क्षार को समझाने के लिए कई सिद्धांत प्रस्तुत किए, जो एक-दूसरे की सीमाओं को दूर करते हुए क्रमशः अधिक व्यापक होते गए।
स्वीडिश वैज्ञानिक स्वान्ते आरेनियस (Svante Arrhenius) ने 1887 में अम्ल-क्षार की पहली आधुनिक परिभाषा दी।
जब आप नींबू के रस में पानी मिलाते हैं, तो साइट्रिक अम्ल पानी में घुलकर H⁺ आयन छोड़ता है, जिससे विलयन खट्टा हो जाता है — यही आरेनियस के अम्ल की परिभाषा का सीधा उदाहरण है। इसी तरह जब आप साबुन के पानी को छूते हैं और वह चिकना महसूस होता है, तो यह उसमें उपस्थित OH⁻ आयनों के कारण होता है।
डेनिश रसायनज्ञ योहानेस ब्रॉन्स्टेड तथा अंग्रेज़ रसायनज्ञ थॉमस लॉरी ने अम्ल-क्षार की अधिक व्यापक परिभाषा दी, जो जलीय विलयन तक सीमित नहीं है।
H₂O + HCl ⇌ H₃O⁺ + Cl⁻ (H₂O क्षारक, H₃O⁺ इसका संयुग्मी अम्ल)
NH₃ + H₂O ⇌ NH₄⁺ + OH⁻ (NH₃ क्षारक, NH₄⁺ इसका संयुग्मी अम्ल)
अमोनिया (NH₃) में कोई OH⁻ समूह नहीं होता, फिर भी यह क्षारीय स्वभाव दिखाता है — घर की सफाई में उपयोग होने वाले अमोनिया-युक्त क्लीनर की तीखी गंध और क्षारीय प्रभाव इसी कारण है। आरेनियस सिद्धांत इसे समझा नहीं पाता, परंतु ब्रॉन्स्टेड-लॉरी सिद्धांत के अनुसार NH₃ पानी से एक प्रोटॉन ग्रहण कर NH₄⁺ बनाता है, इसलिए यह क्षारक है।
अमेरिकी रसायनज्ञ जी. एन. लुईस ने अम्ल-क्षार की सबसे व्यापक परिभाषा दी, जो इलेक्ट्रॉन युग्म के आदान-प्रदान पर आधारित है।
BF₃ + :NH₃ → BF₃:NH₃
(BF₃ इलेक्ट्रॉन-युग्म ग्रहण करता है इसलिए लुईस अम्ल, NH₃ इलेक्ट्रॉन-युग्म प्रदान करता है इसलिए लुईस क्षारक)
लुईस सिद्धांत को समझने के लिए इसे "देने-लेने" के रिश्ते जैसा सोचें — जैसे एक व्यक्ति किसी दूसरे को उपहार (इलेक्ट्रॉन युग्म) देता है, वह दाता (क्षारक) कहलाता है, और जो उपहार स्वीकार करता है वह ग्राही (अम्ल) कहलाता है। यही कारण है कि BF₃ जैसे यौगिक, जिनमें कोई H⁺ आयन नहीं होता, फिर भी लुईस अम्ल की श्रेणी में आते हैं।
हाइड्रोजन हैलाइड अम्लों की सामर्थ्य के क्रम (HF < HCl < HBr < HI) को याद रखने का सरल तरीका है — जैसे-जैसे हैलोजन परमाणु बड़ा होता जाता है (F से I तक), H-X बंध कमज़ोर पड़ता जाता है, ठीक वैसे ही जैसे एक लंबी रबर बैंड को थोड़ा सा खींचने पर भी वह आसानी से टूट जाती है, जबकि छोटी व कसी हुई रबर बैंड को तोड़ना कठिन होता है।
| बिंदु | अम्ल (Acid) | क्षारक (Base/Alkali) |
|---|---|---|
| स्वाद | खट्टा (जैसे नींबू, सिरका) | कड़वा |
| स्पर्श गुण | प्रायः संक्षारक | साबुन जैसे चिकने |
| लिटमस पर प्रभाव | नीले लिटमस को लाल करते हैं | लाल लिटमस को नीला करते हैं |
| मेथिल ऑरेंज पर | लाल रंग | पीला रंग |
| फिनॉल्फ्थेलिन पर | रंगहीन | गुलाबी-बैंगनी रंग |
| धातुओं से अभिक्रिया | सक्रिय धातु से लवण व H₂ गैस बनाते हैं | सामान्यतः अभिक्रिया नहीं (Zn, Al अपवाद) |
| pH मान | 7 से कम | 7 से अधिक |
| उदाहरण | HCl, H₂SO₄, HNO₃, CH₃COOH | NaOH, KOH, Ca(OH)₂, NH₄OH |
| ¶ चित्र: नीले लिटमस पेपर का हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (6M HCl) के संपर्क में आने पर लाल हो जाना — यह अम्लीय प्रकृति की पहचान का सबसे सरल एवं पारंपरिक परीक्षण है। |
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(क) आयनन क्षमता के आधार पर अम्लों का वर्गीकरण
(ख) स्रोत के आधार पर अम्लों का वर्गीकरण
प्रयोगशाला में सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल की एक बूँद भी त्वचा पर गिरने से गंभीर जलन हो सकती है — यह इसकी प्रबल अम्लीय प्रकृति (लगभग पूर्ण आयनन) के कारण है। इसके विपरीत, नींबू के रस (साइट्रिक अम्ल, दुर्बल अम्ल) को सीधे त्वचा पर लगाने से केवल हल्की जलन महसूस होती है, क्योंकि यह आंशिक रूप से ही आयनित होता है।
(ग) अम्लों की प्रमुख अभिक्रियाएँ
धातु के साथ: Zn + H₂SO₄ → ZnSO₄ + H₂↑
धातु कार्बोनेट के साथ: Na₂CO₃ + 2HCl → 2NaCl + H₂O + CO₂↑
धात्विक ऑक्साइड के साथ: CuO + 2HCl → CuCl₂ + H₂O
उदासीनीकरण: NaOH + HCl → NaCl + H₂O (ऊष्माक्षेपी)
सोने के आभूषणों की शुद्धता जाँचने के लिए ज्वेलर्स कभी-कभी एक्वारेजिया जैसे अम्ल-परीक्षण का सहारा लेते हैं — क्योंकि सोना लगभग किसी भी सामान्य अम्ल से प्रभावित नहीं होता, परंतु एक्वारेजिया में यह घुल जाता है। यही कारण है कि इसे "अम्लों का राजा भी हार माने" वाला मिश्रण कहा जाता है।
pH किसी विलयन की अम्लता या क्षारीयता को व्यक्त करने वाला संख्यात्मक पैमाना है, जिसके माध्यम से विलयन में उपस्थित हाइड्रोजन आयन (H⁺) की सांद्रता मापी जाती है। pH शब्द में "p" जर्मन शब्द "Potenz" (शक्ति) से लिया गया है तथा "H" हाइड्रोजन आयनों को दर्शाता है।
1909 में डेनिश रसायनज्ञ सोरेन पीटर लॉरिट्ज़ सारेनसन (Søren Sørensen) ने pH की अवधारणा प्रस्तुत की तथा इसे हाइड्रोजन आयनों की सांद्रता के ऋणात्मक लघुगणक के रूप में परिभाषित किया।
pH = −log₁₀[H⁺]
चूँकि H⁺ जल से जुड़कर H₃O⁺ (हाइड्रोनियम आयन) बनाता है, इसलिए: pH = −log₁₀[H₃O⁺]
pH पैमाना सामान्यतः 0 से 14 तक होता है — pH मान 7 से कम होने पर विलयन अम्लीय, pH = 7 होने पर उदासीन तथा pH 7 से अधिक होने पर विलयन क्षारीय माना जाता है। pH का मान जितना कम होगा, H⁺ आयनों की सांद्रता उतनी ही अधिक होगी।
| ¶ चित्र: pH स्केल (0–14) — विभिन्न दैनिक पदार्थों के अनुमानित pH मान सहित। बाईं ओर अम्लीय (गुलाबी) तथा दाईं ओर क्षारीय (नीला) क्षेत्र दर्शाया गया है। |
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यदि किसी पेय पदार्थ के नमूने में हाइड्रोजन आयन की सांद्रता 4.0×10⁻³ M है (log₁₀2 = 0.301 दिया गया), तो उसका pH = −log₁₀(4.0×10⁻³) = −log₁₀4 + 3 = −(2×0.301) + 3 ≈ 2.398 होगा — अर्थात यह पेय अत्यधिक अम्लीय है, जैसे कोई कार्बोनेटेड शीतल पेय। इसी सूत्र का प्रयोग करके RAS मुख्य परीक्षा में सीधे संख्यात्मक प्रश्न भी पूछे जा चुके हैं।
(i) उदर में अम्लता (Acidity in Stomach)
मानव उदर में जठर रस में उपस्थित हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl) भोजन के पाचन में सहायता करता है। जब यह अम्ल अधिक मात्रा में बनता है, तो अम्लता, जलन तथा दर्द होता है — राहत के लिए मैग्नीशियम हाइड्रॉक्साइड [Mg(OH)₂, Milk of Magnesia] जैसे एंटासिड का उपयोग किया जाता है, जो अतिरिक्त अम्ल को उदासीन कर देते हैं।
(ii) दंत क्षय (Tooth Decay)
मुख की सामान्य pH लगभग 6.5 होती है। भोजन के बाद मुख में बैक्टीरिया भोजन के अवशेषों से अम्ल उत्पन्न करते हैं, जिससे pH घट जाता है। जब pH 5.5 से कम हो जाता है, तो दाँतों का एनामेल क्षय होने लगता है — इसीलिए भोजन के बाद क्षारीय दंतमंजन (जिसमें CaCO₃ या NaHCO₃ होता है) से दाँत साफ करना आवश्यक है।
(iii) अम्ल वर्षा (Acid Rain)
सामान्य वर्षा जल का pH लगभग 5.6 होता है। जब वायुमंडल में उपस्थित SO₂ तथा NO₂ जैसी गैसें जल के साथ मिलकर सल्फ्यूरिक अम्ल तथा नाइट्रिक अम्ल बनाती हैं, तब वर्षा जल की pH और कम हो जाती है, जिसे अम्ल वर्षा कहते हैं — इससे फसलों, जलीय जीवों तथा ताजमहल जैसे ऐतिहासिक स्मारकों को क्षति पहुँचती है।
(iv) मृदा की pH तथा दूध का फटना
मधुमक्खी या चींटी के डंक में फॉर्मिक अम्ल होता है, जो त्वचा पर जलन उत्पन्न करता है — इस स्थिति में सोडियम हाइड्रोजन कार्बोनेट (बेकिंग सोडा) जैसे क्षारीय पदार्थ को लगाने से अम्ल उदासीन हो जाता है और राहत मिलती है। ठीक इसी सिद्धांत पर बिच्छू-बूटी (नेटल) के डंक से होने वाली जलन को पास में उगने वाले डॉक पौधे की क्षारीय पत्तियों से रगड़कर कम किया जा सकता है।
लवण वे आयनिक यौगिक होते हैं जो अम्ल और क्षार के बीच होने वाली उदासीनीकरण अभिक्रिया से बनते हैं, जिसमें अम्ल का H⁺ आयन तथा क्षार का OH⁻ आयन मिलकर जल बनाते हैं और शेष आयन मिलकर लवण का निर्माण करते हैं। यह अभिक्रिया सामान्यतः ऊष्माक्षेपी होती है।
HCl + NaOH → NaCl + H₂O (उदासीन लवण)
HCl + NH₄OH → NH₄Cl + H₂O (अम्लीय लवण)
CH₃COOH + NaOH → CH₃COONa + H₂O (क्षारीय लवण)
जब आप बेकिंग सोडा (हल्का क्षारीय) को पानी में घोलकर चखते हैं, तो हल्का कड़वा-नमकीन स्वाद महसूस होता है — यह इसलिए क्योंकि सोडियम कार्बोनेट/बाइकार्बोनेट जैसे क्षारीय लवण होते हैं। इसके विपरीत साधारण नमक (NaCl) पूर्णतः उदासीन स्वाद (सिर्फ नमकीन) देता है, क्योंकि यह प्रबल अम्ल-प्रबल क्षार का लवण है।
(i) सोडियम क्लोराइड — NaCl (साधारण नमक)
सफ़ेद क्रिस्टलीय ठोस, गलनांक लगभग 1081K, जल में विलेय। भोजन में साधारण नमक, खाद्य परिरक्षक तथा हिमीकरण मिश्रण के रूप में उपयोगी। यह NaOH, वाशिंग सोडा, बेकिंग सोडा तथा विरंजक चूर्ण जैसे अनेक रसायनों के निर्माण का कच्चा पदार्थ भी है।
(ii) सोडियम हाइड्रॉक्साइड — NaOH (कॉस्टिक सोडा)
क्लोर-क्षार प्रक्रिया (Chlor-Alkali Process) में NaCl के जलीय विलयन के विद्युत अपघटन से एनोड पर क्लोरीन गैस, कैथोड पर हाइड्रोजन गैस तथा विलयन में NaOH प्राप्त होता है। साबुन-डिटर्जेंट निर्माण, पेट्रोलियम शोधन तथा कागज-वस्त्र उद्योग में व्यापक उपयोग।
2NaCl + 2H₂O → 2NaOH + Cl₂↑ + H₂↑
(iii) वाशिंग सोडा — Na₂CO₃·10H₂O
सॉल्वे प्रक्रिया द्वारा तथा बेकिंग सोडा को गर्म करके निर्मित। धुलाई-सफाई, कॉस्टिक सोडा व बेकिंग पाउडर बनाने तथा काँच-कागज उद्योग में उपयोगी।
(iv) बेकिंग सोडा — NaHCO₃
सॉल्वे प्रक्रिया द्वारा NaCl से निर्मित। बेकिंग पाउडर, सोडा वाटर, एंटासिड तथा अग्निशामक यंत्रों में उपयोगी — गर्म करने पर CO₂ गैस निकलती है, जो केक-ब्रेड को फुलाने में मदद करती है।
केक बनाते समय आटे में बेकिंग सोडा या बेकिंग पाउडर मिलाया जाता है — गर्म ओवन में यह विघटित होकर CO₂ गैस छोड़ता है, जो छोटे-छोटे बुलबुलों के रूप में आटे में फँसकर केक को फुला (Spongy) बना देती है। यही कारण है कि बिना बेकिंग सोडा का केक चपटा व सख्त बनता है।
(v) विरंजक चूर्ण — CaOCl₂ (Bleaching Powder)
बुझे हुए चूने पर क्लोरीन गैस प्रवाहित करने से निर्मित — Ca(OH)₂ + Cl₂ → CaOCl₂ + H₂O। पीला व तीक्ष्ण गंध वाला ठोस, कपड़ा-कागज उद्योग में विरंजन, पेयजल शुद्धिकरण तथा रोगाणुनाशक के रूप में उपयोगी।
(vi) प्लास्टर ऑफ पेरिस — CaSO₄·½H₂O (POP)
जिप्सम (CaSO₄·2H₂O) को लगभग 373K पर गर्म करने से निर्मित — यह टूटी हड्डियों को जोड़ने, दंत चिकित्सा तथा मूर्तियाँ-सजावटी वस्तुएँ बनाने में उपयोगी है।
2CaSO₄·2H₂O → (373K) → 2CaSO₄·½H₂O + 3H₂O
जब हड्डी टूटने पर डॉक्टर प्लास्टर चढ़ाते हैं, तो सूखा POP पाउडर पानी में मिलाकर पेस्ट बनाया जाता है — यह पेस्ट हवा में सूखते ही पुनः जिप्सम (CaSO₄·2H₂O) में बदल जाता है और कठोर, ठोस परत बनाकर हड्डी को स्थिर रखता है। यही सिद्धांत सफ़ेद चॉक और सजावटी मूर्तियाँ बनाने में भी काम आता है।
किसी लवण की एक सूत्र इकाई में उपस्थित जल के निश्चित अणुओं की संख्या को क्रिस्टलन का जल कहते हैं, जो उस लवण के क्रिस्टलीय ढाँचे का भाग होते हैं।
| लवण | रासायनिक सूत्र | क्रिस्टलन जल के अणु | सामान्य नाम |
|---|---|---|---|
| कॉपर सल्फेट | CuSO₄·5H₂O | 5 | नीला थोथा |
| कैल्शियम सल्फेट | CaSO₄·2H₂O | 2 | जिप्सम |
| सोडियम कार्बोनेट | Na₂CO₃·10H₂O | 10 | वाशिंग सोडा |
| कैल्शियम सल्फेट | CaSO₄·½H₂O | ½ | प्लास्टर ऑफ पेरिस |
| फिटकिरी | K₂SO₄·Al₂(SO₄)₃·24H₂O | 24 | Alum |
नीला थोथा (कॉपर सल्फेट क्रिस्टल) जब गर्म किया जाता है, तो उसका नीला रंग उड़कर वह सफ़ेद पाउडर में बदल जाता है — क्योंकि गर्म करने पर क्रिस्टलन का जल वाष्पित हो जाता है। पानी की कुछ बूँदें वापस डालने पर यह फिर से नीला हो जाता है — यह सरल प्रयोग स्कूलों में क्रिस्टलन जल की अवधारणा समझाने के लिए बहुत लोकप्रिय है।
बफर विलयन वह विशेष प्रकार का घोल होता है, जिसमें थोड़ी मात्रा में अम्ल या क्षार मिलाने पर भी pH में होने वाला परिवर्तन एक निश्चित सीमा तक नियंत्रित हो जाता है, अर्थात इसका pH लगभग स्थिर बना रहता है। जीव विज्ञान, चिकित्सा विज्ञान तथा प्रयोगशाला में बफर अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि अधिकांश रासायनिक अभिक्रियाएँ व एंजाइम विशिष्ट pH पर ही सही प्रकार से कार्य करते हैं।
बफर को एक "सदमा-अवशोषक" (Shock Absorber) की तरह समझें — जैसे कार का सस्पेंशन सड़क के गड्ढों के झटके को अवशोषित कर यात्रा को आरामदायक बनाए रखता है, वैसे ही बफर विलयन अचानक अम्ल या क्षार मिलने के झटके को सोखकर pH को लगभग स्थिर बनाए रखता है।
एसीटिक अम्ल-सोडियम एसीटेट बफर के उदाहरण से बफर की कार्यप्रणाली आसानी से समझी जा सकती है।
यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी झील के किनारे बहुत सारी रेत हो — यदि थोड़ा अतिरिक्त पानी (H⁺ या OH⁻) आ भी जाए, तो रेत (बफर के घटक) उसे सोख लेती है और झील का जलस्तर (pH) लगभग स्थिर बना रहता है। यदि रेत न हो (यानी बफर न हो), तो थोड़ा भी अतिरिक्त पानी झील के जलस्तर को तेज़ी से बदल देगा।
बफर विलयन का pH ज्ञात करने तथा वांछित pH का बफर तैयार करने के लिए हेंडरसन-हासेलबाल्च समीकरण का उपयोग किया जाता है।
अम्लीय बफर के लिए: pH = pKₐ + log([लवण]/[अम्ल])
क्षारीय बफर के लिए: pOH = pK_b + log([लवण]/[क्षार]) तथा pH = 14 − pOH
महत्वपूर्ण बात यह है कि बफर विलयन के pH पर तनुकरण (Dilution) का लगभग कोई प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि समीकरण में लघुगणक के भीतर आने वाला अनुपात (लवण/अम्ल) तनुकरण से अपरिवर्तित रहता है।
यदि किसी अम्लीय बफर में दुर्बल अम्ल तथा उसके लवण की सांद्रता बराबर (1:1 अनुपात) हो, तो log(1) = 0 होने के कारण pH = pKₐ हो जाता है — यानी जब अम्ल और उसका संयुग्मी लवण बराबर मात्रा में हों, तो बफर का pH ठीक उसके pKₐ के बराबर होता है। यही सिद्धांत प्रयोगशाला में किसी वांछित pH का बफर तैयार करते समय उपयोग होता है।
मानव रक्त का pH अत्यंत संकीर्ण सीमा — 7.35 से 7.45 के बीच — बनाए रखना जीवन के लिए आवश्यक है, क्योंकि इससे थोड़ा भी विचलन एंजाइमों तथा कोशिकीय क्रियाओं को बाधित कर सकता है। इसे नियंत्रित रखने में कार्बोनिक अम्ल-बाइकार्बोनेट बफर तंत्र (H₂CO₃/HCO₃⁻) प्रमुख भूमिका निभाता है।
CO₂ + H₂O ⇌ H₂CO₃ ⇌ H⁺ + HCO₃⁻
जब आप तेज़ दौड़ लगाते हैं, तो शरीर में CO₂ की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे रक्त थोड़ा अधिक अम्लीय होने लगता है — इसी कारण दौड़ने के बाद आपकी साँसें तेज़ चलने लगती हैं, क्योंकि फेफड़े अतिरिक्त CO₂ को तेज़ी से बाहर निकालकर रक्त के pH को वापस सामान्य (7.35–7.45) सीमा में लाने की कोशिश करते हैं — यह बाइकार्बोनेट बफर तंत्र तथा श्वसन-प्रतिपूर्ति का प्रत्यक्ष उदाहरण है।
सूचक वे पदार्थ होते हैं जो किसी विलयन की अम्लीय या क्षारीय प्रकृति का पता लगाने के लिए उपयोग किए जाते हैं। ये विभिन्न माध्यमों में रंग या गंध में परिवर्तन करके संकेत देते हैं। सूचक मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं।
रसोई में हल्दी का उपयोग करते समय ध्यान दें — यदि गीले कपड़े पर हल्दी का दाग साबुन (क्षारीय) से धोया जाए, तो वह लाल-भूरा हो जाता है, परंतु पानी से धोने पर वह पीला ही रहता है। यही कारण है कि हल्दी के दाग वाले कपड़ों पर साबुन लगाते ही दाग का रंग बदलता देखा जा सकता है — यह हल्दी के प्राकृतिक सूचक गुण का सजीव उदाहरण है।
गंध सूचक वे पदार्थ होते हैं जिनकी गंध अम्लीय और क्षारीय माध्यम में भिन्न हो जाती है। इन पदार्थों की गंध क्षारीय माध्यम में बदल जाती है या समाप्त हो जाती है, जबकि अम्लीय माध्यम में उनकी गंध बनी रहती है। उदाहरण — प्याज, वैनिला, लौंग का तेल।
| सूचक | अम्लीय माध्यम में रंग | क्षारीय माध्यम में रंग |
|---|---|---|
| लिटमस | लाल | नीला |
| मेथिल ऑरेंज | लाल | पीला |
| फिनॉल्फ्थेलिन | रंगहीन | गुलाबी-बैंगनी |
| हल्दी | कोई परिवर्तन नहीं (पीला) | लाल-भूरा |
स्कूल की प्रयोगशाला में जब फिनॉल्फ्थेलिन की कुछ बूँदें NaOH के रंगहीन विलयन में डाली जाती हैं, तो विलयन तुरंत गहरा गुलाबी हो जाता है — छात्रों के बीच यह सबसे लोकप्रिय प्रयोग है क्योंकि रंग परिवर्तन तुरंत और स्पष्ट दिखता है। जब इसी गुलाबी विलयन में धीरे-धीरे HCl मिलाया जाता है, तो उदासीनीकरण होते ही ठीक pH 7 के आसपास रंग अचानक गायब हो जाता है — यही अनुमापन (Titration) में अंतिम बिंदु पहचानने का आधार है।