💊 अध्याय 6/11 — रसायन विज्ञान

औषधियाँ, प्रतिऑक्सीकारक, परिरक्षक

Drugs, Antioxidants, Preservatives | RAS Pre + Mains
📋 इस अध्याय में
  1. औषधि वर्गीकरण (Classification of Drugs)
  2. प्राकृतिक (हर्बल) बनाम संश्लेषित औषधियाँ
  3. प्रतिऑक्सीकारक (Antioxidants)
  4. परिरक्षक (Preservatives)
🌟 क्या आप जानते हैं?

28 सितंबर 1928 की सुबह, लंदन के सेंट मैरी अस्पताल में बैक्टीरियोलॉजिस्ट अलेक्जेंडर फ्लेमिंग छुट्टियों से लौटकर अपनी प्रयोगशाला में पहुँचे। उन्होंने देखा कि मेज पर पड़ी एक पेट्री डिश में, जिसमें उन्होंने स्टेफायलोकोकस बैक्टीरिया उगाए थे, गलती से एक फफूँद (फंगस) उग आई थी — और हैरानी की बात यह थी कि फफूँद के चारों ओर के बैक्टीरिया मर चुके थे! जहाँ ज़्यादातर वैज्ञानिक इसे "दूषित प्रयोग" मानकर फेंक देते, वहीं फ्लेमिंग की जिज्ञासा जाग उठी। उन्होंने पाया कि यह फफूँद Penicillium notatum थी, जो एक ऐसा रसायन छोड़ रही थी जो बैक्टीरिया को मार सकता था — उन्होंने इसे नाम दिया "पेनिसिलिन"। यही संयोग बीसवीं सदी की सबसे बड़ी चिकित्सा क्रांति — एंटीबायोटिक युग — की शुरुआत बना, जिसने लाखों-करोड़ों जानें बचाईं। दिलचस्प बात यह है कि ठीक इसी तरह की रसायन-विज्ञान की समझ आज हमारे किचन में भी काम आती है — जब हम अचार में नमक या सिरका डालते हैं, बिस्किट में एंटीऑक्सीडेंट मिलाया जाता है, या दवा की एक गोली बुखार उतार देती है — इन सबके पीछे वही रासायनिक सिद्धांत काम करते हैं जिन्हें अब हम विस्तार से समझेंगे।

1औषधि वर्गीकरण (Classification of Drugs)

औषधि विज्ञान को फार्माकोलॉजी (Pharmacology) कहा जाता है तथा औषधियों के निर्माण उद्योग को फार्मास्युटिकल उद्योग कहते हैं। भारत में औषधियों की गुणवत्ता एवं सुरक्षा की निगरानी CDSCO (Central Drugs Standard Control Organization) द्वारा की जाती है — किसी भी नई औषधि को बाजार में लाने से पहले प्री-क्लिनिकल तथा क्लिनिकल परीक्षण अनिवार्य होते हैं। औषधियाँ शरीर के वृहत आण्विक (Macromolecular) लक्ष्यों के साथ अन्योन्यक्रिया कर जैविक प्रतिक्रिया उत्पन्न करती हैं तथा रोगों के उपचार, नियंत्रण या रोकथाम में सहायक होती हैं।

1.1 प्रति-अम्ल (Antacids)

प्रति-अम्ल वे औषधियाँ हैं जो आमाशय में उपस्थित अधिक मात्रा के हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl) को निष्प्रभावी कर अम्लता, जलन (Heartburn) तथा अपच से राहत प्रदान करती हैं। अम्लता के प्रमुख कारणों में चाय-कॉफी का अत्यधिक सेवन, तले-भुने पदार्थों का अधिक सेवन, अनियमित भोजन तथा तनाव शामिल हैं।

📐 प्रमुख एंटासिड औषधियाँ — सूत्र/अभिक्रिया

सिमेटिडीन (Cimetidine)
रैनिटिडीन (Ranitidine)
ओमेप्राजोल (Omeprazole)
लैंसोप्राजोल (Lansoprazole)

💡 रोज़मर्रा का उदाहरण

जब आप बहुत तला-भुना या मसालेदार भोजन करने के बाद सीने में जलन महसूस करते हैं, तो अक्सर डॉक्टर एंटासिड की गोली (जैसे रैनिटिडीन) लेने की सलाह देते हैं — यह गोली सीधे आमाशय के अतिरिक्त HCl को उदासीन कर देती है, ठीक वैसे ही जैसे बेकिंग सोडा अम्ल को उदासीन करता है, जिससे कुछ ही मिनटों में राहत मिल जाती है।

1.2 प्रति-हिस्टैमिन (Antihistamines)

प्रति-हिस्टैमिन औषधियों का उपयोग एलर्जी के उपचार में किया जाता है, क्योंकि एलर्जी मुख्यतः हिस्टामिन नामक रसायन के कारण उत्पन्न होती है, जो त्वचा, फेफड़ों, यकृत के ऊतकों तथा रक्त में पाया जाता है। ये औषधियाँ हिस्टामिन की क्रिया को अवरुद्ध कर खुजली, सूजन, छींक, नाक बहना तथा त्वचा की लालिमा को कम करती हैं।

📐 प्रमुख एंटीहिस्टामिन औषधियाँ — सूत्र/अभिक्रिया

सेटिरिज़िन (Cetirizine)
क्लोरफेनिरामिन (Chlorpheniramine)
डाइफेनहाइड्रामिन (Diphenhydramine/Benadryl)
टरफेनाडीन (Terfenadine)

💡 रोज़मर्रा का उदाहरण

मौसम बदलने पर छींकें आना, आँखों में खुजली या त्वचा पर चकत्ते होना — ये सभी शरीर में हिस्टामिन के अत्यधिक स्राव के लक्षण हैं। ऐसे में सेटिरिज़िन जैसी एंटीहिस्टामिन गोली लेने से कुछ ही घंटों में राहत मिल जाती है, क्योंकि यह हिस्टामिन को उसके रिसेप्टर से जुड़ने से रोक देती है।

1.3 तांत्रिका सक्रिय औषधियाँ — प्रशांतक एवं पीड़ाहारी

तांत्रिका सक्रिय औषधियाँ केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (CNS) को प्रभावित कर मानसिक अवस्था, नींद, दर्द तथा तंत्रिका क्रियाओं को नियंत्रित करती हैं।

(क) प्रशांतक (Tranquilizers)

(ख) पीड़ाहारी (Analgesics / Pain Killers)

एस्पिरिन — एक विशेष केस स्टडी: एस्पिरिन एक अस्वापक पीड़ाहारी तथा ज्वरनाशी औषधि है, जो शरीर में प्रोस्टाग्लैंडिन नामक रसायन के संश्लेषण को कम करती है, जो ऊतकों में दर्द, सूजन व ज्वर के लिए उत्तरदायी होता है। इसे खाली पेट नहीं लेना चाहिए, क्योंकि यह आमाशय की आंतरिक परत को प्रभावित कर अल्सर या जलन उत्पन्न कर सकती है।
💡 रोज़मर्रा का उदाहरण

बुखार होने पर ली जाने वाली आम पैरासिटामोल की गोली एक अस्वापक पीड़ाहारी है — यह न तो नींद लाती है, न ही इसकी लत लगती है, इसीलिए इसे डॉक्टर की सलाह के बिना भी अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है। इसके विपरीत, ऑपरेशन के बाद अस्पताल में दिया जाने वाला मॉर्फिन एक स्वापक पीड़ाहारी है, जिसे बहुत सीमित व नियंत्रित मात्रा में ही दिया जाता है क्योंकि इसकी लत लगने का खतरा रहता है।

1.4 प्रति-सूक्ष्मजीविक एवं प्रतिजैविक (Antibiotics) औषधियाँ

प्रति-सूक्ष्मजीविक औषधियाँ जीवाणु, कवक, वायरस तथा अन्य सूक्ष्मजीवों की वृद्धि को रोकती हैं या उन्हें नष्ट करती हैं। इन्हें दो प्रकारों में बाँटा जाता है — जीवाणुनाशी (Bactericidal, जैसे पेनिसिलिन, जो सूक्ष्मजीवों को सीधे नष्ट करती हैं) तथा जीवाणुरोधी (Bacteriostatic, जैसे एरिथ्रोमाइसिन-टेट्रासाइक्लिन, जो सूक्ष्मजीवों की वृद्धि रोक देती हैं ताकि शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली उन्हें नष्ट कर सके)।

¶ चित्र: स्कॉटिश वैज्ञानिक अलेक्जेंडर फ्लेमिंग अपनी प्रयोगशाला में — पीछे पेट्री डिश में पेनिसिलिन फफूँद (Penicillium) दिखाई दे रही है, जिसकी 1928 में आकस्मिक खोज ने एंटीबायोटिक युग की शुरुआत की।
प्रतिजैविक (Antibiotic)स्रोत/खोजमुख्य उपयोग
पेनिसिलिन (Penicillin)1928, एलेक्जेंडर फ्लेमिंग द्वारा Penicillium notatum फफूँद सेनिमोनिया, ब्रोंकाइटिस, गले के संक्रमण
स्ट्रेप्टोमाइसिन (Streptomycin)मृदा जीवाणु से प्राप्तक्षय रोग (TB) का उपचार
टेट्रासाइक्लिन (Tetracycline)व्यापक क्षेत्र प्रतिजैविकनेत्र संक्रमण, टाइफाइड, अन्य जीवाणु संक्रमण
क्लोरैम्फेनिकॉल (Chloramphenicol)व्यापक क्षेत्र प्रतिजैविकटाइफाइड के उपचार में विशेष उपयोगी
एम्पिसिलिन/एमॉक्सिसिलिनपेनिसिलिन के अर्ध-संश्लेषित रूपव्यापक जीवाणु संक्रमण
क्षय रोग (TB) उपचार में प्रयुक्त प्रमुख औषधियाँ: आइसोनियाज़िड (Isoniazid), रिफैम्पिसिन (Rifampicin), पायराज़िनामाइड (Pyrazinamide) तथा स्ट्रेप्टोमाइसिन (Streptomycin) — इन चार औषधियों के संयोजन को DOTS (Directly Observed Treatment, Short-course) चिकित्सा में उपयोग किया जाता है, जो भारत के राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम का आधार है।
💡 रोज़मर्रा का उदाहरण

डॉक्टर अक्सर सलाह देते हैं कि एंटीबायोटिक का पूरा कोर्स (सामान्यतः 5-7 दिन) बीच में न छोड़ें, भले ही आप ठीक महसूस करने लगें — इसका कारण यह है कि यदि जीवाणुरोधी (Bacteriostatic) दवा बीच में रोक दी जाए, तो बचे हुए कमजोर जीवाणु फिर से पनप सकते हैं और भविष्य में उसी दवा के प्रति प्रतिरोधी (Antibiotic Resistant) बन सकते हैं — यही "एंटीबायोटिक प्रतिरोध" की गंभीर वैश्विक समस्या का मूल कारण है।

1.5 पूतिरोधी (Antiseptics) एवं विसंक्रामी (Disinfectants)

पूतिरोधी और विसंक्रामी दोनों सूक्ष्मजीवों को नष्ट करने या उनकी वृद्धि रोकने के लिए उपयोग किए जाते हैं, परंतु इनके उपयोग की जगह और सांद्रता में अंतर होता है।

बिंदुपूतिरोधी (Antiseptics)विसंक्रामी (Disinfectants)
प्रयोग स्थानजीवित ऊतकों (त्वचा, घाव) परनिर्जीव वस्तुओं (फर्श, शौचालय, उपकरण) पर
मात्राकम मात्रा भी प्रभावीअधिक मात्रा आवश्यक
प्रभाव अवधिअपेक्षाकृत लंबे समय तकसामान्यतः कम समय तक
उदाहरणडिटॉल, टिंचर आयोडीनफिनॉल, सल्फर डाइऑक्साइड
💡 रोज़मर्रा का उदाहरण

दिलचस्प बात यह है कि एक ही रसायन सांद्रता बदलकर दोनों रूपों में काम कर सकता है — फिनॉल का 0.2% विलयन घाव पर पूतिरोधी के रूप में सुरक्षित रूप से लगाया जा सकता है, जबकि 1% या उससे अधिक सांद्रता का विलयन इतना तीव्र होता है कि इसे केवल फर्श या शौचालय जैसी निर्जीव सतहों की सफाई हेतु विसंक्रामी के रूप में उपयोग किया जाता है — त्वचा पर नहीं।

🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
फार्माकोलॉजीCDSCOएंटासिडएंटीहिस्टामिनप्रशांतकस्वापक पीड़ाहारीअस्वापक पीड़ाहारीजीवाणुनाशीजीवाणुरोधीपेनिसिलिनपूतिरोधीविसंक्रामी
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2प्राकृतिक (हर्बल) बनाम संश्लेषित औषधियाँ

औषधियों को उनके स्रोत के आधार पर दो व्यापक वर्गों में बाँटा जाता है — संश्लेषित औषधियाँ तथा प्राकृतिक (हर्बल) औषधियाँ। दोनों की अपनी विशेषताएँ तथा सीमाएँ हैं।

✔ संश्लेषित औषधियाँ (Synthetic)
  • प्रयोगशाला में रासायनिक संश्लेषण से तैयार
  • सामान्यतः कम आणविक द्रव्यमान
  • संघटन व मात्रा का सटीक ज्ञान
  • तीव्र व मानकीकृत प्रभाव
✔ प्राकृतिक औषधियाँ (Natural/Herbal)
  • वनस्पतियों व पौधों से प्राप्त
  • बिना किसी रासायनिक संश्लेषण के सीधे प्राप्त
  • जड़ी-बूटियों व प्राकृतिक स्रोतों पर आधारित
  • प्रायः दुष्प्रभाव अपेक्षाकृत कम
💡 रोज़मर्रा का उदाहरण

जब आपको सर्दी-जुकाम होता है, तो एक ओर आप पैरासिटामोल (संश्लेषित औषधि) ले सकते हैं जो कुछ ही घंटों में बुखार उतार देती है, तो दूसरी ओर घर में तुलसी-अदरक का काढ़ा (प्राकृतिक औषधि) भी पिया जाता है, जो धीमे परंतु समग्र रूप से रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक होता है। आधुनिक चिकित्सा प्रायः दोनों दृष्टिकोणों का समन्वित उपयोग करने की सलाह देती है।

2.1 प्रमुख औषधीय पौधे, सक्रिय यौगिक एवं औषधीय महत्व

पौधासक्रिय यौगिकमुख्य औषधीय उपयोग
अश्वगंधाविथेनोलाइड्सशक्तिशाली एडेप्टोजेन; मानसिक तनाव-चिंता कम करता है, रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है
आँवलाविटामिन C, टैनिनप्रभावी एंटीऑक्सीडेंट; स्कर्वी रोकथाम, प्रतिरक्षा प्रणाली मज़बूत करता है
अदरकजिंजरोलपाचन तंत्र सक्रिय करता है, मतली-उल्टी में राहत, सूजनरोधी गुण
अफीममॉर्फिन, कोडीनशक्तिशाली दर्द निवारक (एनाल्जेसिक); कोडीन खाँसी नियंत्रक के रूप में
धतूराएट्रोपिन, स्कोपोलामाइननेत्र चिकित्सा में पुतली फैलाने तथा माँसपेशी ऐंठन कम करने में उपयोगी
गिलोयटिनोस्पोरोसाइड्सप्रतिरक्षा प्रणाली सक्रिय करता है, ज्वरनाशी, यकृत स्वास्थ्य में सहायक
हल्दीकुरकुमिनशक्तिशाली सूजनरोधी व एंटीऑक्सीडेंट; घाव भरने व संक्रमण रोकने में उपयोगी
इसबगोलघुलनशील फाइबरप्राकृतिक लैक्सेटिव; कब्ज दूर करता है, कोलेस्ट्रॉल नियंत्रण में सहायक
सिनकोना छालक्विनिनमलेरिया के उपचार में ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण
सर्पगंधारेसरपिनउच्च रक्तचाप नियंत्रित करता है, तंत्रिका तंत्र को शांत करता है
तुलसीयूजेनॉलएंटीबैक्टीरियल-एंटीवायरल-एंटीऑक्सीडेंट; श्वसन रोगों में लाभकारी
लहसुनएलिसिनहृदय स्वास्थ्य लाभकारी; रक्तचाप व कोलेस्ट्रॉल कम करता है
नीमएज़ाडिरैक्टिनत्वचा रोगों में उपयोगी; प्राकृतिक कीटनाशक के रूप में भी प्रयुक्त
मुलेठीग्लिसराइज़िनगले की खराश-खाँसी तथा पेट के अल्सर में लाभकारी
💡 रोज़मर्रा का उदाहरण

मलेरिया के इलाज़ की कहानी बहुत दिलचस्प है — सैकड़ों वर्षों तक सिनकोना छाल से प्राप्त क्विनिन ही मलेरिया का एकमात्र भरोसेमंद इलाज था, और आज भी आधुनिक मलेरिया-रोधी औषधियों की खोज उसी प्राकृतिक यौगिक की समझ पर आधारित है। यह दिखाता है कि कैसे एक साधारण पेड़ की छाल ने चिकित्सा इतिहास की दिशा बदल दी।

🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
संश्लेषित औषधियाँप्राकृतिक औषधियाँअश्वगंधाहल्दीसिनकोनाक्विनिनगिलोयतुलसी
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3प्रतिऑक्सीकारक (Antioxidants)

प्रति-ऑक्सीकारक वे रासायनिक पदार्थ होते हैं जिन्हें वसा और तेलों से युक्त खाद्य पदार्थों में मिलाया जाता है ताकि उनके ऑक्सीकरण को रोका जा सके। जब असंतृप्त वसा और तेलों का लंबे समय तक भंडारण किया जाता है, तो उनमें उपचयन (Oxidation) होने लगता है, जिसके कारण खाद्य पदार्थों का स्वाद व गंध बदल जाती है तथा वे दुर्गन्धयुक्त (Rancid) हो जाते हैं — इस प्रक्रिया को रैंसिडिटी कहा जाता है। प्रतिऑक्सीकारक मुक्त मूलकों (Free Radicals) को निष्क्रिय करके ऑक्सीकरण की शृंखला अभिक्रिया (Chain Reaction) को रोकते हैं।

3.1 संश्लेषित प्रतिऑक्सीकारक

प्रतिऑक्सीकारकप्रकृतिमुख्य उपयोग
BHA (Butylated Hydroxy Anisole)फिनोलिक, वसा में घुलनशील, सामान्य ताप पर स्थिरमक्खन, घी, स्नैक फूड, बेकरी उत्पाद (उच्च ताप पर आंशिक नष्ट)
BHT (Butylated Hydroxy Toluene)फिनोलिक, वसा में घुलनशील, BHA से कम प्रभावीअनाज उत्पाद, बेकरी आइटम — प्रायः BHA के साथ संयुक्त उपयोग
प्रोपाइल गैलेटगैलिक अम्ल का एस्टर, जल में अधिक घुलनशीलप्रायः BHA/BHT के साथ मिलाकर प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों में
TBHQफिनोलिक, उच्च ताप पर भी स्थिर, धातु आयनों से रंगीन यौगिक नहीं बनातातले हुए खाद्य पदार्थ (चिप्स-स्नैक्स), फास्ट फूड
💡 रोज़मर्रा का उदाहरण

बिस्किट या नमकीन के पैकेट पर अक्सर "BHA/BHT antioxidant added" लिखा देखा जा सकता है — इसका मतलब है कि निर्माता ने पैकेट में मौजूद तेल-वसा को खराब होने (रैंसिड होने) से बचाने के लिए ये रसायन मिलाए हैं, जिससे पैकेट महीनों तक भंडारित होने के बावजूद ताज़ा स्वाद बना रहता है।

3.2 प्राकृतिक प्रतिऑक्सीकारक

एंटीऑक्सीडेंट खनिज एवं एंजाइम

💡 रोज़मर्रा का उदाहरण

जब आप कटे हुए सेब या आलू पर नींबू का रस छिड़कते हैं, तो वह भूरा (Oxidized) होने से बच जाता है — यह इसलिए क्योंकि नींबू में मौजूद साइट्रिक व एस्कॉर्बिक अम्ल (Vitamin C) फिनोलेज़ नामक एंजाइम की क्रिया को धीमा कर देते हैं, जो कटी सतह को भूरा बनाने के लिए ज़िम्मेदार होता है। यही सिद्धांत बड़े पैमाने पर पैकेज्ड फलों के रस व सुखाए गए फलों में भी उपयोग होता है।

3.3 संश्लेषित प्रतिऑक्सीकारकों की सीमाएँ

कृत्रिम प्रतिऑक्सीकारकों के उपयोग को लेकर कई विवाद हैं। प्रायोगिक अध्ययनों से पता चला है कि कुछ कृत्रिम प्रतिऑक्सीकारकों में कैंसरजनक प्रभाव पाए जाते हैं — उदाहरणतः BHA सुअर व बंदर जैसे गैर-कृंतक जीवों में तथा चूहों में पेट में घाव उत्पन्न करता पाया गया है, जबकि BHT चूहों व चूहे-जैसे जीवों (Mice) के यकृत में कैंसरजनक प्रभाव उत्पन्न करता पाया गया है। इसीलिए विभिन्न देशों में इनकी अनुमत मात्रा तथा नियामक स्थिति भिन्न-भिन्न है।

FSSAI नियमन — नवीनतम स्थिति: भारत में खाद्य पदार्थों में प्रतिऑक्सीकारकों व अन्य योजकों के उपयोग की निगरानी FSSAI (Food Safety and Standards Authority of India) करती है। एस्कॉर्बिक अम्ल जैसे प्रतिऑक्सीकारकों को Good Manufacturing Practice (GMP) स्तर पर अनुमति है। FSSAI ने खाद्य योजकों व मानकों को आधुनिक बनाने हेतु Food Safety and Standards (Food Products Standards and Food Additives) Regulations में संशोधन का मसौदा जारी किया है, जिसमें विभिन्न खाद्य श्रेणियों के लिए प्रतिऑक्सीकारकों व परिरक्षकों की अधिकतम अनुमत मात्रा निर्धारित की गई है।
💡 रोज़मर्रा का उदाहरण

यही कारण है कि आजकल कई खाद्य कंपनियाँ अपने उत्पादों की पैकेजिंग पर "No BHA/BHT Added, Natural Antioxidant (Vitamin E) Used" जैसे दावे करती हैं — क्योंकि उपभोक्ता जागरूकता बढ़ने के साथ कंपनियाँ कृत्रिम की बजाय प्राकृतिक प्रतिऑक्सीकारकों को प्राथमिकता देने लगी हैं, भले ही ये अपेक्षाकृत महँगे हों।

🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
रैंसिडिटीमुक्त मूलकBHABHTTBHQप्रोपाइल गैलेटटोकोफेरॉलएस्कॉर्बिक अम्ललेसिथिनसुपरऑक्साइड डिस्म्यूटेज़
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4परिरक्षक (Preservatives)

परिरक्षक वे रासायनिक पदार्थ हैं, जो खाद्य पदार्थों में जीवाणुओं आदि के कारण होने वाले अवांछित परिवर्तनों को रोकते हैं तथा उन्हें नष्ट होने से बचाते हैं। खाद्य पदार्थों को सड़ने से बचाने के लिए उपयोग की जाने वाली विभिन्न तकनीकों को खाद्य परिरक्षण कहा जाता है।

4.1 आदर्श रासायनिक परिरक्षक के गुण

💡 रोज़मर्रा का उदाहरण

अचार बनाते समय नमक व तेल की भरपूर मात्रा डाली जाती है — यह पारंपरिक भारतीय ज्ञान वास्तव में एक आदर्श परिरक्षक तकनीक है, क्योंकि नमक जीवाणुओं के लिए आवश्यक जल को सोख लेता है (परासरण दाब बढ़ाकर), जिससे वे पनप नहीं पाते और अचार महीनों तक सुरक्षित रहता है — इसीलिए हमारी दादी-नानी बिना किसी फ्रिज के भी अचार वर्षों तक सुरक्षित रख पाती थीं।

4.2 परिरक्षकों का वर्गीकरण

परिरक्षकों को उनकी कार्यप्रणाली के आधार पर पाँच वर्गों में बाँटा जाता है — प्रति-सूक्ष्मजैविक परिरक्षक, प्रतिऑक्सीकारक परिरक्षक, प्रति-एंजाइमी परिरक्षक, प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त परिरक्षक तथा परंपरागत परिरक्षक (नमक-शक्कर)।

परिरक्षक (Preservative)विशिष्ट उपयोग
सॉर्बिक अम्ल / पोटैशियम सॉर्बेटफलों, सब्जियों, अचार उत्पादों, जैम व जैलियों में
बेंजोइक अम्ल / सोडियम बेंजोएटसब्जी अचारों, मुरब्बों, जैमों, अर्ध-प्रसंस्कृत उत्पादों में
प्रोपियोनिक अम्ल / सोडियम प्रोपियोनेटबेकरी उत्पादों, चीज़ स्प्रेड, फलों-सब्जियों में
मिथाइल/इथाइल/प्रोपाइल पैराबेनबेकरी उत्पादों, फल उत्पादों, अचारों-सॉसों में
लैक्टिक अम्लकिण्वित माँस, डेयरी व सब्जी उत्पादों, सॉस, पेयों में
सोडियम नाइट्राइटमाँस उत्पादों में (गुलाबी रंग बनाए रखने हेतु)
सल्फर डाइऑक्साइडफलों के रस, सूखे-निर्जलित फलों व सब्जियों में

(i) सोडियम बेंजोएट एवं बेंजोइक अम्ल

बेंजोइक अम्ल क्रैनबेरी, आलूबुखारा, दालचीनी में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है। सोडियम बेंजोएट पानी में लगभग 180 गुना अधिक घुलनशील होने के कारण अधिक उपयोग होता है। इसकी क्रिया pH पर निर्भर करती है — यह pH 2.5–4.0 के बीच सर्वाधिक प्रभावी होता है। उपयोग — फल उत्पाद, जैम, पेय, ड्रेसिंग, जैतून।

(ii) सॉर्बेट्स (Sorbates)

पोटैशियम सॉर्बेट जल में अत्यधिक घुलनशील, सफ़ेद, गंधहीन तथा अपेक्षाकृत सस्ता है — यह pH 6.5 तक प्रभावी रहता है तथा खमीर-फफूँद के विरुद्ध सर्वाधिक प्रभावी होता है। उपयोग — चीज़, दही, ब्रेड, केक, पेय, सलाद-ड्रेसिंग।

(iii) प्रोपियोनिक अम्ल

स्ट्रॉबेरी, सेब में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है तथा स्विस चीज़ के किण्वन में भी बनता है। यह मुख्यतः फफूँद के विरुद्ध प्रभावी है, खमीर पर इसका प्रभाव नगण्य होता है — इसीलिए इसे ब्रेड में फफूँद रोकने के लिए उपयोग किया जाता है, जबकि खमीर-युक्त उत्पादों में यह उपयोगी नहीं।

(iv) पैराबेन (Parabens)

पैरा-हाइड्रॉक्सीबेंजोइक अम्ल के एस्टर, मुख्यतः खमीर-फफूँद के विरुद्ध प्रभावी। मिथाइल व प्रोपाइल पैराबेन को प्रायः 2:1 या 3:1 अनुपात में मिलाकर उपयोग किया जाता है, क्योंकि दोनों की प्रभावशीलता व घुलनशीलता भिन्न होती है। ये pH 3–8 के बीच प्रभावी तथा उच्च-निम्न तापमान में स्थिर रहते हैं।

💡 रोज़मर्रा का उदाहरण

सॉफ्ट ड्रिंक या पैकेज्ड फ्रूट जूस की बोतल पर "Preservative: Sodium Benzoate (INS 211)" लिखा देखा जा सकता है — यह वही सोडियम बेंजोएट है, जो पेय के अम्लीय pH (नींबू या अन्य फलों के अम्ल के कारण) में सर्वाधिक प्रभावी ढंग से काम करता है और बोतल को महीनों तक खमीर-फफूँद से सुरक्षित रखता है।

4.3 गैसीय एवं प्राकृतिक-पारंपरिक परिरक्षक

💡 रोज़मर्रा का उदाहरण

सर्दियों में बनने वाला गाजर या आँवले का मुरब्बा बिना फ्रिज के भी महीनों टिक जाता है — इसका रहस्य है भारी मात्रा में शक्कर की चाशनी, जो पानी की उपलब्धता इतनी कम कर देती है कि बैक्टीरिया-फफूँद पनप ही नहीं पाते। यह ठीक उसी सिद्धांत पर काम करता है जिस पर औद्योगिक स्तर पर सोडियम बेंजोएट या पोटैशियम सॉर्बेट काम करते हैं — बस विधि पारंपरिक बनाम आधुनिक है।

🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
परिरक्षकखाद्य परिरक्षणसोडियम बेंजोएटपोटैशियम सॉर्बेटप्रोपियोनिक अम्लपैराबेननिसिनFSSAIक्लॉस्ट्रिडियम बोटुलिनम

📌 अध्याय सारांश (Chapter Summary)

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← अध्याय 5: अम्ल, क्षार, लवण, pH एवं बफर अध्याय 7: कीटनाशक, उर्वरक, बाइंडर्स, मधुरक →