⚒️ अध्याय 4/11 — रसायन विज्ञान

धातुकर्म सिद्धांत, अयस्क एवं मिश्रधातु

Metallurgical Principles, Ores and Alloys | RAS Pre + Mains
📋 इस अध्याय में
  1. अयस्क (Ore) एवं खनिज (Mineral) में अंतर
  2. धातुकर्म की प्रक्रिया — सांद्रण, प्रगलन, परिष्करण
  3. प्रमुख अयस्क एवं धातु निष्कर्षण
  4. प्रमुख मिश्रधातु (Important Alloys)
  5. भारत एवं राजस्थान के प्रमुख खनिज क्षेत्र
🌟 क्या आप जानते हैं?

1889 में फ्रांस के सम्राट नेपोलियन तृतीय एक शाही भोज का आयोजन करते थे, जिसमें सबसे विशिष्ट अतिथियों को चाँदी या सोने के बर्तनों में नहीं, बल्कि एक चमकदार सफ़ेद धातु के बर्तनों में भोजन परोसा जाता था — बाकी सामान्य मेहमानों को सोने-चाँदी के बर्तनों से ही संतोष करना पड़ता था! वह विशेष धातु थी — एल्युमिनियम, जो उस समय सोने से भी अधिक कीमती मानी जाती थी, क्योंकि पृथ्वी की पर्पटी में सबसे अधिक मात्रा में मौजूद होने के बावजूद इसे इसके अयस्क से निकालना बेहद कठिन था। मात्र कुछ ही दशकों बाद, दो युवा वैज्ञानिकों — अमेरिका के चार्ल्स हॉल तथा फ्रांस के पॉल हेरॉल्ट — ने एक सरल विद्युत-रासायनिक विधि खोज निकाली, जिसने एल्युमिनियम को इतना सस्ता बना दिया कि आज यह हमारी रसोई के बर्तनों से लेकर हवाई जहाज़ के ढाँचे तक हर जगह मिलता है। यही है धातुकर्म (Metallurgy) की ताकत — सही विधि मिलते ही एक "शाही धातु" आम आदमी की पहुँच में आ जाती है। आइए समझते हैं कि चट्टानों में छिपी धातुओं को किस तरह निकाला, शुद्ध किया और उपयोगी मिश्रधातुओं में बदला जाता है।

1अयस्क (Ore) एवं खनिज (Mineral) में अंतर

पृथ्वी की पर्पटी (Crust) में धातुएँ शुद्ध रूप में बहुत कम पाई जाती हैं। सोना, चाँदी तथा प्लैटिनम जैसी कुछ अक्रियाशील धातुओं को छोड़कर अधिकांश धातुएँ वायु, नमी, कार्बन डाइऑक्साइड तथा अन्य अधातुओं से अभिक्रिया करके यौगिकों के रूप में प्रकृति में पाई जाती हैं। इन प्राकृतिक यौगिकों को समझने के लिए सबसे पहले खनिज और अयस्क के बीच का अंतर स्पष्ट होना ज़रूरी है।

1.1 खनिज, अयस्क एवं गैंग की परिभाषा

💡 रोज़मर्रा का उदाहरण

इसे इस तरह समझें — बॉक्साइट (Al₂O₃·2H₂O) से एल्युमिनियम निकालना आर्थिक रूप से बहुत लाभदायक है, इसलिए बॉक्साइट एक अयस्क है। परंतु फेल्सपार में भी एल्युमिनियम मौजूद होता है, फिर भी उससे एल्युमिनियम निकालना बहुत महंगा एवं कठिन है, इसलिए फेल्सपार एक खनिज तो है, पर अयस्क नहीं कहलाता। ठीक वैसे ही जैसे समुद्री जल में सोना अत्यंत सूक्ष्म मात्रा में घुला होता है, पर उसे निकालना लाभदायक नहीं, इसलिए समुद्री जल सोने का अयस्क नहीं माना जाता।

1.2 धातुकर्म (Metallurgy) की अवधारणा

अयस्कों से धातुओं को निष्कर्षित (Extract) करने तथा उन्हें शुद्ध (Refine) करने की संपूर्ण वैज्ञानिक प्रक्रिया को धातुकर्म (Metallurgy) कहा जाता है। धातुकर्म में प्रयुक्त विधि का चयन अयस्क के स्वभाव, धातु के प्रकार, अयस्क में धातु की मात्रा, उपस्थित अशुद्धियों तथा अयस्क के रासायनिक संगठन पर निर्भर करता है। धातु-निष्कर्षण के पाँच प्रमुख चरण होते हैं — चूर्णन (Crushing-Grinding), अयस्क सांद्रण, अयस्क का निस्तापन/भर्जन, धातु ऑक्साइड का अपचयन, तथा अंत में धातु का शोधन-परिष्करण।

💡 रोज़मर्रा का उदाहरण

धातुकर्म की प्रक्रिया को आप गेहूँ से आटा बनाने जैसी सोच सकते हैं — पहले गेहूँ (अयस्क) को साफ किया जाता है (सांद्रण), फिर पीसा जाता है, और अंत में छानकर शुद्ध आटा (शुद्ध धातु) प्राप्त किया जाता है। जैसे भूसी अलग करना ज़रूरी है, वैसे ही अयस्क से गैंग हटाना धातुकर्म का एक अनिवार्य चरण है।

1.3 अयस्कों का रासायनिक वर्गीकरण

अयस्कों में धातु किस रासायनिक रूप में उपस्थित है, इसके आधार पर उन्हें पाँच मुख्य वर्गों में बाँटा जाता है।

अयस्क का प्रकारउदाहरण (धातु – अयस्क का नाम व सूत्र)
1. ऑक्साइड अयस्क (Oxide Ores)लौह – हैमेटाइट (Fe₂O₃); एल्युमिनियम – बॉक्साइट (Al₂O₃·2H₂O); टिन – कैसिटेराइट (SnO₂); ताँबा – क्यूप्राइट (Cu₂O)
2. सल्फाइड अयस्क (Sulphide Ores)जस्ता – जिंक ब्लेण्ड (ZnS); सीसा – गैलेना (PbS); ताँबा – कॉपर ग्लांस (Cu₂S); चाँदी – अर्जेन्टाइट (Ag₂S)
3. कार्बोनेट अयस्क (Carbonate Ores)लौह – सिडेराइट (FeCO₃); जस्ता – कैलामाइन (ZnCO₃); सीसा – सेरुसाइट (PbCO₃)
4. हैलाइड अयस्क (Halide Ores)चाँदी – हॉर्न सिल्वर (AgCl); सोडियम – खनिज नमक (NaCl); एल्युमिनियम – क्रायोलाइट (Na₃AlF₆)
5. सिलिकेट अयस्क (Silicate Ores)जस्ता – हेमीमॉर्फाइट (2ZnO·SiO₂·H₂O)
💡 रोज़मर्रा का उदाहरण

यह वर्गीकरण याद रखना आसान है यदि आप ध्यान दें कि "-ऑक्साइड" अंत वाले अयस्क ऑक्सीजन से बने हैं, "-सल्फाइड/ब्लेण्ड/ग्लांस" वाले सल्फर से, तथा "-कार्बोनेट/-साइट" वाले अधिकतर CO₃ समूह से जुड़े हैं। जैसे परीक्षा में यदि पूछा जाए कि जिंक ब्लेण्ड किस प्रकार का अयस्क है, तो नाम में "ब्लेण्ड" शब्द ही संकेत देता है कि यह एक सल्फाइड अयस्क (ZnS) है।

🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
खनिजअयस्कगैंग/मैट्रिक्सधातुकर्मऑक्साइड अयस्कसल्फाइड अयस्ककार्बोनेट अयस्कहैलाइड अयस्कसिलिकेट अयस्क
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2धातुकर्म की प्रक्रिया — सांद्रण, प्रगलन, परिष्करण

खानों से निकलने वाला कच्चा अयस्क बड़े-बड़े पत्थरों के रूप में प्राप्त होता है, जिसमें भारी मात्रा में अशुद्धियाँ मिली रहती हैं। इस कच्चे अयस्क से शुद्ध धातु प्राप्त करने तक की यात्रा कई सुनियोजित चरणों से होकर गुज़रती है — आइए एक-एक करके इन्हें समझते हैं।

2.1 चूर्णन — दलन एवं पेषण (Crushing and Grinding)

💡 रोज़मर्रा का उदाहरण

यह ठीक वैसा ही है जैसे मसाला मिल में साबुत मिर्च या धनिया को पहले बड़े हथौड़े जैसी मशीन से मोटा तोड़ा जाता है, फिर बारीक पीसकर पाउडर बनाया जाता है — छोटे कणों में बदलने से आगे छानने या घोलने की प्रक्रिया कहीं आसान हो जाती है।

2.2 अयस्क सांद्रण की विधियाँ (Concentration of Ore)

चूर्णित अयस्क से गैंग (अशुद्धियाँ) अलग करने की प्रक्रिया को अयस्क का सांद्रण या प्रसाधन कहते हैं। अयस्क की प्रकृति के अनुसार चार प्रमुख विधियाँ प्रयोग की जाती हैं।

(i) गुरुत्व पृथक्करण विधि (Gravity Separation)

यह विधि अयस्क तथा गैंग के कणों के आपेक्षिक घनत्व में अंतर पर आधारित है — अयस्क के कण भारी तथा गैंग के कण हल्के होते हैं। चूर्णित अयस्क को कंपन वाली मेज (Shaking Table) पर रखकर पानी की तेज़ धारा प्रवाहित की जाती है, जिससे भारी अयस्क कण नीचे बैठ जाते हैं और हल्की अशुद्धियाँ पानी के साथ बह जाती हैं। यह विधि हैमेटाइट (Fe₂O₃) तथा कैसिटेराइट (SnO₂) जैसे ऑक्साइड व कार्बोनेट अयस्कों के लिए उपयोगी है।

(ii) चुम्बकीय पृथक्करण विधि (Magnetic Separation)

यह विधि खनिजों के चुम्बकीय गुणों में अंतर पर आधारित है। अयस्क को एक गतिशील पट्टे (Conveyor Belt) पर रखा जाता है, जिसके एक सिरे पर चुम्बकीय रोलर लगा होता है — फेरोचुम्बकीय अयस्क कण चुम्बक की ओर आकर्षित होकर अलग गिरते हैं जबकि अचुम्बकीय गैंग कण दूर गिरते हैं। उदाहरण — टिन के अयस्क कैसिटेराइट (अचुम्बकीय) में मिली चुम्बकीय अशुद्धि वुल्फ्रामाइट (FeWO₄) को इसी विधि से अलग किया जाता है।

(iii) झाग प्लवन विधि (Froth Flotation Process)

यह विधि विशेष रूप से सल्फाइड अयस्कों (जैसे कॉपर पाइराइट, गैलेना, जिंक ब्लेण्ड) के सांद्रण के लिए उपयोग की जाती है। चूर्णित अयस्क को जल तथा चीड़ के तेल (झाग कारक) के साथ मिलाकर बड़े टंकी में रखा जाता है, फिर तेज़ वायु प्रवाहित की जाती है। अयस्क के हल्के, तेल-भीगे कण झाग के साथ ऊपर तैरने लगते हैं, जबकि भारी गैंग कण तली में बैठ जाते हैं — ऊपर तैरते झाग को इकट्ठा कर सांद्रित अयस्क प्राप्त किया जाता है।

(iv) निक्षालन या रासायनिक पृथक्करण विधि (Leaching)

इसमें चूर्णित अयस्क को किसी उपयुक्त रासायनिक विलायक में घोला जाता है, जो अयस्क को घोल देता है जबकि गैंग कण अघुलनशील रहकर पृथक हो जाते हैं। यह विधि बॉक्साइट से एल्युमिना निकालने (बेयर विधि — सांद्र NaOH में) तथा चाँदी-सोने के अयस्कों के निक्षालन (सायनाइड विधि) में प्रयुक्त होती है।

💡 रोज़मर्रा का उदाहरण

झाग प्लवन विधि को आप बर्तन धोते समय साबुन के झाग जैसा समझ सकते हैं — तेल-चिकनाई वाले कण झाग के बुलबुलों से चिपककर ऊपर आ जाते हैं, जबकि भारी मिट्टी के कण नीचे बैठ जाते हैं। ठीक इसी सिद्धांत का उपयोग खनन उद्योग में सल्फाइड अयस्कों को गैंग से अलग करने के लिए किया जाता है।

2.3 निस्तापन (Calcination) एवं भर्जन (Roasting) में अंतर

सांद्रित अयस्क को धातु ऑक्साइड में बदलने के लिए दो प्रमुख विधियाँ प्रयोग की जाती हैं, जो अयस्क के प्रकार पर निर्भर करती हैं।

आधारनिस्तापन (Calcination)भर्जन (Roasting)
अयस्क का प्रकारकार्बोनेट/हाइड्रॉक्साइड अयस्कसल्फाइड अयस्क
वायु की भूमिकाअनुपस्थिति या सीमित वायुवायु की अधिकता (Excess Air)
मुख्य प्रक्रियाऊष्मीय अपघटन (Thermal Decomposition)ऑक्सीकरण (Oxidation)
निकली गैसेंCO₂, जलवाष्पमुख्यतः SO₂ गैस
उदाहरणCaCO₃ → CaO + CO₂2ZnS + 3O₂ → 2ZnO + 2SO₂
💡 रोज़मर्रा का उदाहरण

निस्तापन को आप घर पर चूने के पत्थर (चूना पत्थर) को भट्टे में गर्म कर बुझा चूना बनाने जैसा समझ सकते हैं — इसमें कोई ऑक्सीकरण नहीं, बस गैस (CO₂) निकल जाती है। वहीं भर्जन एक बड़े तवे पर सल्फर-युक्त अयस्क को खुली हवा में भूनने जैसा है, जहाँ ऑक्सीजन सल्फर से मिलकर तीखी गंध वाली SO₂ गैस (जैसी माचिस जलाने पर आती है) छोड़ती है।

2.4 धातु ऑक्साइड का अपचयन (Reduction Methods)

निस्तापन या भर्जन से प्राप्त धातु ऑक्साइड को शुद्ध धातु में बदलने की प्रक्रिया को अपचयन कहते हैं। धातु की क्रियाशीलता के अनुसार चार प्रमुख विधियाँ अपनाई जाती हैं।

📐 गालक एवं धातुमल — महत्वपूर्ण संबंध — सूत्र/अभिक्रिया

आधात्री (Gangue) + गालक (Flux) → धातुमल (Slag)
उदाहरण: SiO₂ (अम्लीय आधात्री) + CaO (क्षारीय गालक) → CaSiO₃ (धातुमल)

💡 रोज़मर्रा का उदाहरण

थर्माइट वेल्डिंग का सबसे प्रत्यक्ष उदाहरण रेलवे पटरियों की मरम्मत है — जब दो पटरियों को जोड़ना होता है, तो आयरन ऑक्साइड और एल्युमिनियम पाउडर के मिश्रण को जलाया जाता है, जो इतनी तीव्र ऊष्मा छोड़ता है कि पिघला हुआ शुद्ध लोहा सीधे जोड़ पर बह जाता है और ठंडा होकर पटरियों को मज़बूती से जोड़ देता है — बिना किसी बिजली या गैस वेल्डिंग मशीन के।

2.5 धातु शोधन/परिष्करण की विधियाँ (Refining of Metals)

अपचयन से प्राप्त धातु पूर्णतः शुद्ध नहीं होती, इसे कच्ची धातु (Crude Metal) कहते हैं। इसमें उपस्थित अशुद्धियों (अनअपचयित ऑक्साइड, धातुमल, अन्य धातुएँ) को हटाकर शुद्ध धातु प्राप्त करने की प्रक्रिया शोधन कहलाती है।

शोधन विधिसिद्धांत / उपयोग
आसवन (Distillation)कम क्वथनांक वाली धातुओं (जिंक, पारा) को वाष्पित कर, ठंडा कर संघनित किया जाता है
द्रवीकरण (Liquation)कम गलनांक वाली धातुओं (टिन, लेड, बिस्मथ) को ढलवें तल पर पिघलाकर अलग किया जाता है
दण्ड विलोडन (Poling)कॉपर में उपस्थित कॉपर ऑक्साइड को हरी लकड़ी के डंडों से हिलाकर हटाया जाता है
वैद्युत अपघटनी शोधन (Electrorefining)अशुद्ध धातु को एनोड, शुद्ध धातु को कैथोड बनाकर विद्युत अपघटन द्वारा शोधन — ताँबे के शोधन में प्रमुख विधि
क्षेत्र परिशोधन (Zone Refining)अर्धचालकों (सिलिकॉन, जर्मेनियम) के अत्यंत शुद्धिकरण हेतु — पिघले क्षेत्र को धातु की छड़ पर आगे बढ़ाया जाता है
वाष्प प्रावस्था परिष्करण (Vapour Phase Refining)मॉण्ड प्रक्रम (निकैल) व वॉन आर्केल विधि (Zr, Ti) — धातु को वाष्पशील यौगिक बनाकर शुद्ध किया जाता है
💡 रोज़मर्रा का उदाहरण

वैद्युत अपघटनी शोधन को समझने के लिए ताँबे के तार बनाने की प्रक्रिया देखें — बिजली के तारों में 99.9% शुद्ध ताँबा चाहिए होता है (ताकि चालकता अधिकतम रहे), इसलिए अशुद्ध ताँबे की मोटी प्लेट को एनोड तथा शुद्ध ताँबे की पतली प्लेट को कैथोड बनाकर कॉपर सल्फेट के घोल में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है — शुद्ध ताँबा धीरे-धीरे कैथोड पर जमा होता जाता है, जबकि सोना-चाँदी जैसी कीमती अशुद्धियाँ तली में "एनोड पंक" के रूप में बच जाती हैं, जिन्हें बाद में अलग से निकाला जाता है।

🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
चूर्णनगुरुत्व पृथक्करणचुम्बकीय पृथक्करणझाग प्लवननिक्षालननिस्तापनभर्जनप्रगलनगालकधातुमलएल्युमिनो-थर्माइटवैद्युत अपघटनी शोधन
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3प्रमुख अयस्क एवं धातु निष्कर्षण

अब तक हमने धातुकर्म के सामान्य सिद्धांत समझे। अब चार सबसे महत्वपूर्ण धातुओं — लौह, ताँबा, जस्ता तथा एल्युमिनियम — के वास्तविक औद्योगिक निष्कर्षण की प्रक्रिया विस्तार से समझते हैं।

3.1 लौह (Iron) का निष्कर्षण — वात्या भट्टी विधि

📐 वात्या भट्टी की प्रमुख अभिक्रियाएँ — सूत्र/अभिक्रिया

3Fe₂O₃ + CO → 2Fe₃O₄ + CO₂
Fe₃O₄ + CO → 3FeO + CO₂
FeO + CO → Fe + CO₂
CaO + SiO₂ → CaSiO₃ (धातुमल)

¶ चित्र: वात्या भट्टी (Blast Furnace) का संरचनात्मक चित्रण — ऊपर से अयस्क, कोक व चूना पत्थर डाला जाता है, नीचे से गर्म वायु प्रवाहित होती है तथा तली से पिघला लोहा एवं धातुमल अलग-अलग निकास से बाहर निकाले जाते हैं।
✔ ढलवाँ लोहा (Cast Iron)
  • पिग आयरन को साँचों में ढालकर बनाया जाता है
  • कार्बन की मात्रा लगभग 3% तक
  • अत्यंत कठोर परंतु भंगुर (Brittle)
  • जंग कम लगती है
✔ पिटवाँ लोहा (Wrought Iron)
  • लोहे का सबसे शुद्ध रूप माना जाता है
  • कार्बन मात्रा केवल 0.2%–0.5%
  • अन्य धातु-अशुद्धियाँ बहुत कम
  • उच्च गलनांक (~1823K)
💡 रोज़मर्रा का उदाहरण

जब आप किसी पुराने लोहे के तवे या कढ़ाई (ढलवाँ लोहा) को गिरा देते हैं, तो वह अक्सर टूट जाता है — यह उसकी भंगुरता के कारण है। परंतु लोहे की चादर या तार (पिटवाँ लोहा जैसा शुद्ध रूप) आसानी से मुड़ जाती है, टूटती नहीं — यही कार्बन की मात्रा में अंतर का व्यावहारिक प्रभाव है।

3.2 ताँबा (Copper) का निष्कर्षण

📐 ताँबा निष्कर्षण की प्रमुख अभिक्रियाएँ — सूत्र/अभिक्रिया

2CuFeS₂ + O₂ → Cu₂S + 2FeS + 2SO₂
2Cu₂S + 3O₂ → 2Cu₂O + 2SO₂
Cu₂S + 2Cu₂O → 6Cu + SO₂ (स्वतः अपचयन)

💡 रोज़मर्रा का उदाहरण

फफोलेदार कॉपर का नाम इसकी बनावट से ही समझ आता है — जैसे जली हुई त्वचा पर फफोले उभर आते हैं, वैसे ही ठंडी होती ताँबे की धातु में फँसी SO₂ गैस बुलबुले बनाकर सतह को उभरा-दबा (फफोलेदार) बना देती है। यही कारण है कि इस अशुद्ध ताँबे को "Blister Copper" कहा जाता है।

3.3 जस्ता (Zinc) का निष्कर्षण

📐 जस्ता निष्कर्षण की प्रमुख अभिक्रियाएँ — सूत्र/अभिक्रिया

2ZnS + 3O₂ → 2ZnO + 2SO₂ (भर्जन)
ZnO + C → Zn + CO (1673K पर अपचयन)

💡 रोज़मर्रा का उदाहरण

आपने लोहे की बाल्टी या पाइप पर चमकदार, हल्की धूसर परत देखी होगी — यह गैल्वनीकरण (Galvanisation) है, जिसमें लोहे पर जस्ते की पतली परत चढ़ाई जाती है ताकि उसमें जंग न लगे। यह जस्ता वही है, जो जिंक ब्लेण्ड जैसे अयस्कों से इसी निष्कर्षण प्रक्रिया द्वारा निकाला जाता है।

3.4 एल्युमिनियम (Aluminium) का निष्कर्षण

एल्युमिनियम का मुख्य अयस्क बॉक्साइट (Al₂O₃·2H₂O) है। इसके निष्कर्षण में दो प्रमुख चरण होते हैं — पहले बेयर विधि द्वारा बॉक्साइट से शुद्ध एल्युमिना (Al₂O₃) निकाला जाता है, फिर हॉल-हेराल्ट प्रक्रम द्वारा एल्युमिना का विद्युत अपघटन कर शुद्ध एल्युमिनियम धातु प्राप्त की जाती है।

¶ चित्र: बॉक्साइट अयस्क (Al₂O₃·2H₂O) — एल्युमिनियम धातु का मुख्य प्राकृतिक स्रोत, जो लाल-भूरे रंग की मिट्टी जैसी संरचना में पाया जाता है।

(क) बेयर विधि — एल्युमिना का निक्षालन

चूर्णित बॉक्साइट को सांद्र सोडियम हाइड्रॉक्साइड (NaOH) के साथ 473–523K ताप तथा 35 वायुमंडलीय दाब पर गर्म किया जाता है, जिससे सोडियम मेटा-एल्युमिनेट बनता है और अघुलनशील गैंग (Fe₂O₃, SiO₂) छनकर अलग हो जाती है। छाने गए घोल में जल मिलाकर तनु करने पर एल्युमिनियम हाइड्रॉक्साइड [Al(OH)₃] का सफ़ेद अवक्षेप प्राप्त होता है, जिसे निस्तापित करने पर शुद्ध एल्युमिना (Al₂O₃) प्राप्त होता है।

(ख) हॉल-हेराल्ट प्रक्रम — विद्युत अपघटन

शुद्ध एल्युमिना का गलनांक लगभग 2323K होता है, जो व्यावहारिक रूप से बहुत अधिक है, इसलिए इसमें क्रायोलाइट (Na₃AlF₆) तथा फ्लुओरस्पार (CaF₂) मिलाए जाते हैं, जिससे मिश्रण का गलनांक घटकर लगभग 1173K हो जाता है तथा चालकता भी बढ़ जाती है। इस संगलित मिश्रण का इस्पात की टंकी में विद्युत अपघटन किया जाता है, जिसमें टंकी की भीतरी कार्बन परत कैथोड तथा ऊपर लटकाई गई ग्रेफाइट छड़ें एनोड का कार्य करती हैं।

📐 हॉल-हेराल्ट प्रक्रम की विद्युत अपघटनी अभिक्रियाएँ — सूत्र/अभिक्रिया

कैथोड पर: Al³⁺ + 3e⁻ → Al
एनोड पर: 2O²⁻ → O₂ + 4e⁻
एनोड क्षरण: C + O₂ → CO₂ (ग्रेफाइट एनोड को समय-समय पर बदलना पड़ता है)

¶ चित्र: हॉल-हेराल्ट विद्युत अपघटनी सेल की संरचना — ऊपर ग्रेफाइट एनोड, तली में ग्रेफाइट कैथोड, मध्य में संगलित क्रायोलाइट-एल्युमिना का मिश्रण तथा तली में एकत्रित होता पिघला शुद्ध एल्युमिनियम।
💡 रोज़मर्रा का उदाहरण

एल्युमिनियम फॉयल (खाना पैक करने वाली चमकदार पन्नी), हवाई जहाज़ के ढाँचे तथा बिजली की हल्की तारें — ये सभी उसी एल्युमिनियम से बनते हैं, जिसे हॉल-हेराल्ट प्रक्रम द्वारा बॉक्साइट से निकाला जाता है। लगभग 1 किलोग्राम एल्युमिनियम उत्पादन में लगभग 0.5 किलोग्राम कार्बन एनोड नष्ट हो जाता है — यही कारण है कि एल्युमिनियम उत्पादन में बहुत अधिक विद्युत ऊर्जा खर्च होती है, इसलिए इसे "संचित विद्युत" (Congealed Electricity) भी कहा जाता है।

3.5 प्रमुख धातुएँ, उनके अयस्क एवं उपयोग

धातुप्रमुख अयस्कमुख्य उपयोग
आयरन (Fe)हैमेटाइट, मैग्नेटाइटइस्पात, भवन-निर्माण, मशीनें, रेल पटरियाँ
जिंक (Zn)जिंक ब्लेण्ड, कैलामाइनगैल्वनीकरण, पीतल बनाने में, बैटरियाँ
एल्युमिनियम (Al)बॉक्साइटहवाई जहाज़, विद्युत तार, बर्तन, हल्की मिश्रधातु
कॉपर (Cu)कॉपर पाइराइट, मैलाकाइटविद्युत तार, मोटर-जनरेटर, सिक्के
लेड (Pb)गैलेनालेड-एसिड बैटरियाँ, विकिरण सुरक्षा, सोल्डर
सिल्वर (Ag)अर्जेन्टाइट, हॉर्न सिल्वरआभूषण, सिक्के, फोटोग्राफी, दर्पण
🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
वात्या भट्टीपिग आयरनढलवाँ लोहापिटवाँ लोहाबेसेमरीकरणफफोलेदार कॉपरजिंक स्पेल्टरबेयर विधिहॉल-हेराल्ट प्रक्रमक्रायोलाइट
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4प्रमुख मिश्रधातु (Important Alloys)

शुद्ध धातुएँ प्रायः बहुत नरम, कम मज़बूत या जल्दी संक्षारित होने वाली होती हैं, इसलिए व्यावहारिक उपयोग के लिए उन्हें अन्य धातुओं या अधातुओं के साथ मिलाकर मिश्रधातु बनाई जाती है। दो या दो से अधिक धातुओं अथवा किसी धातु तथा अधातु के समांगी (Homogeneous) मिश्रण को मिश्रधातु (Alloy) कहते हैं।

4.1 मिश्रधातु बनाने के प्रमुख उद्देश्य

💡 रोज़मर्रा का उदाहरण

शुद्ध सोना (24 कैरेट) इतना नरम होता है कि इससे बनी अंगूठी आसानी से मुड़ या घिस जाती है, इसीलिए आभूषणों में 22 कैरेट सोना (22 भाग सोना + 2 भाग ताँबा/चाँदी) उपयोग होता है — यह मिलावट सोने को कठोर बना देती है, जिससे आभूषण लंबे समय तक टिकते हैं। यही सिद्धांत हर मिश्रधातु के पीछे काम करता है।

4.2 महत्वपूर्ण मिश्रधातुएँ — संघटन एवं उपयोग

मिश्रधातुघटक (संघटन)प्रमुख उपयोग
पीतल (Brass)ताँबा + जस्तातार, बर्तन, सजावटी वस्तुएँ
कांसा (Bronze)ताँबा + टिनसिक्के, मूर्तियाँ, घंटियाँ
अमलगम (Amalgam)पारा + अन्य धातुदंत चिकित्सा में दाँत भरने हेतु
सोल्डर (Solder)टिन + सीसाधातुओं को जोड़ने व वेल्डिंग में
जर्मन सिल्वरताँबा + निकैल + जस्ताबर्तन, मूर्तियाँ, सजावटी वस्तुएँ
गन मेटलताँबा + टिन + जस्ताहथियार व मशीनों के पुर्जे
स्टेनलेस स्टीललोहा + कार्बन + निकैल + क्रोमियमबर्तन, चाकू, औज़ार
मैग्नेलियममैग्नीशियम + एल्युमिनियमहवाई जहाज़ के ढाँचे, हल्की मशीनें
एल्निकोएल्युमिनियम + निकैल + कोबाल्ट + लोहास्थायी चुम्बक बनाने में
नाइक्रोमनिकैल + क्रोमियम + लोहाहीटर, टोस्टर, ओवन के हीटिंग तत्व
ड्यूरालुमिनएल्युमिनियम + ताँबा + मैग्नीशियम + मैंगनीजविमान व अंतरिक्ष यान के पुर्जे
इनवार (Invar)लोहा + निकैलघड़ियाँ व वैज्ञानिक उपकरण (न्यून तापीय प्रसार)
कॉन्स्टैन्टनताँबा + निकैलविद्युत प्रतिरोध तार
मोनेल मेटलताँबा + निकैल + लोहा + मैंगनीजजहाज़ व रासायनिक उपकरण
💡 रोज़मर्रा का उदाहरण

अगली बार जब आप किसी पुराने मंदिर की घंटी बजाएँ, तो ध्यान दें उसकी गहरी, लंबे समय तक गूँजने वाली आवाज़ पर — यह कांसे (ताँबा + टिन) की विशेष ध्वनिक गुणवत्ता के कारण है, जो शुद्ध ताँबे या टिन अकेले नहीं दे सकते। इसी तरह रसोई में उपयोग होने वाला स्टेनलेस स्टील का चाकू निरंतर पानी व नमक के संपर्क में रहकर भी जंग नहीं खाता, क्योंकि इसमें मिला क्रोमियम सतह पर एक अदृश्य सुरक्षा-परत बना देता है।

🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
मिश्रधातुपीतलकांसासोल्डरजर्मन सिल्वरस्टेनलेस स्टीलड्यूरालुमिननाइक्रोमएल्निको
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5भारत एवं राजस्थान के प्रमुख खनिज क्षेत्र

RAS परीक्षा की दृष्टि से यह खंड विशेष महत्व रखता है, क्योंकि राजस्थान खनिज संसाधनों के मामले में भारत का सबसे समृद्ध राज्य है। आइए पहले भारत की स्थिति समझें, फिर राजस्थान के प्रमुख खनिज क्षेत्रों पर गहराई से चर्चा करें।

5.1 भारत के प्रमुख खनिज बेल्ट — एक झलक

💡 रोज़मर्रा का उदाहरण

यदि भारत के खनिज मानचित्र को एक व्यक्ति के शरीर की तरह देखें, तो झारखंड-ओडिशा क्षेत्र "फेफड़े" (लौह-कोयले का भंडार) जैसा है जो उद्योगों को ईंधन व कच्चा माल देता है, जबकि राजस्थान "हृदय" जैसा है जो देश की जस्ता-सीसा-ताँबे की लगभग पूरी आपूर्ति संभालता है — विशेषकर जस्ता उत्पादन में राजस्थान का लगभग एकाधिकार है।

5.2 राजस्थान का अरावली-दिल्ली फोल्ड बेल्ट

अरावली-दिल्ली फोल्ड बेल्ट राजस्थान की सबसे महत्वपूर्ण भूगर्भीय संरचना है, जो राज्य के अधिकांश धात्विक खनिज भंडारों का आधार है। इस बेल्ट के तीन प्रमुख उपक्षेत्र परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

(क) खेतड़ी कॉपर बेल्ट (झुंझुनू)

झुंझुनू जिले का खेतड़ी क्षेत्र भारत के सबसे पुराने व प्रमुख ताँबा-खनन क्षेत्रों में से एक है, जहाँ हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड (HCL) द्वारा खनन किया जाता है। ताँबा उत्पादन में राजस्थान का देश में दूसरा स्थान है (प्रथम स्थान झारखंड का)।

(ख) जावर, रामपुरा-आगुचा एवं राजपुरा-दरीबा जस्ता-सीसा बेल्ट

💡 रोज़मर्रा का उदाहरण

जब भी आप किसी लोहे की बाल्टी या पाइप पर चमकदार परत (गैल्वनीकरण) देखें, तो याद रखें कि उसमें उपयोग हुआ अधिकांश जस्ता संभवतः राजस्थान की रामपुरा-आगुचा या जावर की खानों से ही आया होगा — क्योंकि भारत में जस्ते के उत्पादन पर राजस्थान का लगभग एकाधिकार है।

5.3 राजस्थान के अन्य प्रमुख खनिज

खनिजप्रमुख उत्पादक क्षेत्रविशेष तथ्य
लौह अयस्कजयपुर, दौसा, सीकर, झुंझुनू, उदयपुर, भीलवाड़ामुख्यतः मैग्नेटाइट व हैमेटाइट किस्में
अभ्रक (Mica)भीलवाड़ा, अजमेर, उदयपुर, राजसमंदभारत के कुल उत्पादन का लगभग 25%, झारखंड-आंध्रप्रदेश के बाद तीसरा स्थान
जिप्सम (Gypsum)बीकानेर, नागौर, जोधपुरउत्पादन में राजस्थान का देश में प्रथम स्थान
सीसा-चाँदीउदयपुर, राजसमंद, भीलवाड़ाजस्ते के साथ ही संयुक्त रूप से प्राप्त
संगमरमर व एस्बेस्टॉसमकराना (नागौर), उदयपुरमकराना का सफ़ेद संगमरमर विश्वप्रसिद्ध (ताजमहल में उपयोग)

5.4 राजस्थान खनिज नीति 2024 एवं नवीनतम खोजें

राज्य सरकार ने 4 दिसंबर 2024 को नई खनिज नीति जारी की, जिसका उद्देश्य राज्य की GDP में खनिज क्षेत्र की वर्तमान लगभग 3.4% हिस्सेदारी को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाना है। नीति में वर्ष 2029-30 तक लगभग 50 लाख तथा वर्ष 2046-47 तक लगभग 1 करोड़ लोगों के लिए रोज़गार सृजन तथा राजस्व को वर्ष 2046-47 तक लगभग ₹1 लाख करोड़ वार्षिक तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। नीति में खनिज रियायतों के समय पर आवंटन, खनन नियमों को सरल-पारदर्शी बनाने तथा अवैध खनन के विरुद्ध ज़ीरो टॉलरेंस नीति पर बल दिया गया है।

नवीनतम खनिज खोजें — करंट अफेयर्स: भारतीय भूगर्भीय सर्वेक्षण (GSI) ने बीकानेर-नागौर-गंगानगर क्षेत्र में विशाल पोटाश भंडार (लगभग 2.5 करोड़ टन से अधिक संसाधन) की पुष्टि की है, जो उर्वरक उद्योग के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत अभी अधिकांश पोटाश आयात करता है। इसके अतिरिक्त, केंद्र सरकार ने सितंबर 2025 में नागौर जिले की डेगाना तहसील में टंगस्टन, लिथियम एवं संबंधित रणनीतिक खनिज ब्लॉक की नीलामी हेतु निविदा जारी की — यह भारत के इलेक्ट्रिक वाहन एवं बैटरी उद्योग के लिए महत्वपूर्ण घरेलू लिथियम स्रोत बन सकता है।
💡 रोज़मर्रा का उदाहरण

आपके मोबाइल फोन या इलेक्ट्रिक स्कूटर की बैटरी में उपयोग होने वाला लिथियम अभी तक भारत को विदेशों से आयात करना पड़ता है। यदि डेगाना (नागौर) में मिले लिथियम भंडार का व्यावसायिक खनन सफल होता है, तो भविष्य में राजस्थान भारत की बैटरी आत्मनिर्भरता में सीधी भूमिका निभा सकता है — ठीक वैसे ही जैसे आज यह जस्ते और सीसे की आपूर्ति में निभाता है।

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📌 अध्याय सारांश (Chapter Summary)

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