🏕️ अध्याय 12/13 — राजस्थान की कला एवं संस्कृति

राजस्थान की जनजातियाँ एवं उनकी परंपराएँ

Tribes of Rajasthan & Their Traditions | RAS Pre + Mains
📋 इस अध्याय में
  1. परिचय — राजस्थान की जनजातीय जनसंख्या एवं आंकड़े
  2. राजस्थान की अनुसूचित जनजातियों (Scheduled Tribes) की सूची
  3. भील जनजाति — परिचय, क्षेत्र एवं सामाजिक संगठन
  4. भील जनजाति — उप-समूह (Sub-groups)
  5. भील जनजाति — विवाह प्रथाएं
  6. भील जनजाति — कला, पहचान एवं प्रमुख तथ्य
  7. मीणा (मीना) जनजाति — परिचय एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
  8. मीणा जनजाति — उप-समूह एवं परंपराएं
  9. मीणा-मीना वर्तनी विवाद — समसामयिक मुद्दा
  10. गरासिया जनजाति
  11. सहरिया जनजाति — विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG)
  12. सहरिया जनजाति एवं PM-JANMAN योजना
  13. डामोर जनजाति
  14. कथौड़ी जनजाति
  15. जनजातियों की तुलनात्मक तालिका
  16. कंजर एवं सांसी समुदाय — वर्गीकरण स्पष्टीकरण
  17. गाड़िया लोहार जनजाति
  18. बंजारा समुदाय
  19. जनजातीय सामाजिक प्रथाएं — समेकित दृष्टि
  20. जनजातीय मेले एवं त्यौहार
  21. मांगढ़ धाम नरसंहार — "आदिवासियों का जलियांवाला बाग़"
  22. जनजातीय कल्याण योजनाएं (केंद्र एवं राज्य)
  23. नवीनतम अपडेट (2024-2026)

अरावली की पहाड़ियों में सूरज ढल रहा है। दूर कहीं ढोल की थाप सुनाई दे रही है और उसके साथ एक धुन — तीखी, जंगली, मिट्टी की सोंधी खुशबू जैसी। एक भील युवक अपने तीर-कमान के साथ पहाड़ी की ढलान उतर रहा है, ठीक वैसे ही जैसे सैकड़ों साल पहले महाराणा प्रताप के साथ कंधे से कंधा मिलाकर हल्दीघाटी की धरती पर लड़ने वाले उसके पुरखे उतरा करते थे। थोड़ी दूर दौसा-करौली के जंगलों में एक मीणा किसान अपने खेत की मेड़ पर बैठा है — उसके पूर्वज कभी ढूंढाड़ (आज का जयपुर क्षेत्र) पर राज करते थे, यह गर्व की कहानी उसे उसके दादा ने सुनाई थी। बारां जिले के शाहाबाद के जंगलों में एक सहरिया परिवार अपनी झोंपड़ी के बाहर बैठा है — भारत सरकार की एक नई योजना ने अभी-अभी उनके घर तक पक्की सड़क और बिजली पहुँचाई है। सिरोही की पहाड़ियों में गरासिया जनजाति के लोग अपने मृत पूर्वजों की याद में एक विशाल पत्थर की "देवरा" बना रहे हैं। और कहीं किसी गाँव की पगडंडी पर एक गाड़िया लोहार का बैलगाड़ी-कुनबा गुज़र रहा है — लोहार की धौंकनी और हथौड़े की आवाज़ आज भी उस पुरानी कसम की गूँज सुनाती है जो कभी चित्तौड़ के पतन पर ली गई थी। यही है राजस्थान — जहाँ रेगिस्तान और महलों की चमक-दमक से परे, अरावली की गोद में एक और राजस्थान बसता है — आदिम, सरल, प्रकृति-पूजक और गहरे सामुदायिक बंधन में बंधा हुआ जनजातीय राजस्थान। यह अध्याय उसी राजस्थान की कहानी है — उसकी जनजातियों, उनकी परंपराओं, उनके संघर्ष और उनके गौरव की कहानी।

1परिचय — राजस्थान की जनजातीय जनसंख्या एवं आंकड़े

जनजाति (Tribe) या "आदिवासी" (Adivasi — मूल निवासी) उन समुदायों को कहा जाता है जो मुख्यधारा के हिंदू समाज की जाति-व्यवस्था से बाहर, अपनी अलग भाषा-बोली, धार्मिक विश्वास, सामाजिक संगठन एवं जीवन-शैली के साथ, प्रायः वनों-पहाड़ों से घिरे भौगोलिक क्षेत्रों में निवास करते हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 342 के अंतर्गत राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित समुदायों को "अनुसूचित जनजाति" (Scheduled Tribe — ST) कहा जाता है। राजस्थान जनजातीय जनसंख्या की दृष्टि से भारत के प्रमुख राज्यों में गिना जाता है।

जनगणना 2011 के प्रमुख आंकड़े

2राजस्थान की अनुसूचित जनजातियों (Scheduled Tribes) की सूची

भारत सरकार द्वारा संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश के अंतर्गत राजस्थान में जिन समुदायों को आधिकारिक रूप से अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा प्राप्त है, वे सामान्यतः निम्न सूची में सम्मिलित की जाती हैं। ध्यान रहे कि कुछ नाम एक ही मूल समुदाय के क्षेत्रीय रूप (उप-भेद) हैं।

क्र.जनजाति का नाममुख्य क्षेत्र
1भील (Bhil)उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, सिरोही, चित्तौड़गढ़
2मीणा/मीना (Meena/Mina)दौसा, सवाई माधोपुर, करौली, टोंक, जयपुर, अलवर
3गरासिया (Garasia)सिरोही, उदयपुर, पाली, डूंगरपुर (गुजरात सीमा से सटा क्षेत्र)
4सहरिया (Sahariya)बारां (किशनगंज व शाहबाद तहसील)
5डामोर (Damor/Damaria)डूंगरपुर, बांसवाड़ा
6कथौड़ी (Kathodi)उदयपुर (कोटड़ा तहसील)
7भील गरासिया (Bhil Garasia)उदयपुर, सिरोही (भील व गरासिया के मिश्रित क्षेत्र)
8ढांका (Dhanka)दक्षिणी राजस्थान का सीमित क्षेत्र
9कोकणा/कोकणी (Kokna)दक्षिणी राजस्थान का सीमित क्षेत्र
10कोली ढोर (Koli Dhor)दक्षिणी राजस्थान का सीमित क्षेत्र
11नायकड़ा (Naikda)दक्षिणी राजस्थान का सीमित क्षेत्र
12पटेलिया (Patelia)दक्षिणी राजस्थान का सीमित क्षेत्र

ध्यान दें: ऊपर दी गई सूची केंद्र सरकार की संवैधानिक अधिसूचना पर आधारित सामान्य सूची है। परीक्षा में सबसे अधिक पूछी जाने वाली और राज्य की सबसे बड़ी दो जनजातियाँ — भील एवं मीणा — तथा तीसरी-चौथी बड़ी जनजातियाँ गरासिया व सहरिया ही रटने योग्य मुख्य नाम हैं। शेष नाम (ढांका, कोकणा, कोली ढोर, नायकड़ा, पटेलिया) संख्या में बहुत सीमित एवं दक्षिणी राजस्थान के कुछ ही गाँवों तक सीमित हैं।

3भील जनजाति — परिचय, क्षेत्र एवं सामाजिक संगठन

📍 🏹 भील जनजाति (दक्षिणी राजस्थान)

⏰ काल/निर्माता: राजस्थान की सबसे बड़ी जनजाति
⭐ विशेषता: नाम "भील" द्रविड़ भाषा के शब्द "बील" या "विल" से बना माना जाता है जिसका अर्थ है "धनुष" — अर्थात् "धनुष चलाने वाले लोग"। भील महाराणा प्रताप के परम सहयोगी रहे हैं तथा हल्दीघाटी युद्ध (1576 ई.) में भील सैनिकों ने मुगल सेना के विरुद्ध महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

भील जनजाति मुख्यतः उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, सिरोही एवं चित्तौड़गढ़ जिलों के पहाड़ी व वनीय क्षेत्रों में निवास करती है। यह क्षेत्र सामूहिक रूप से "भोमट" या "मेवाड़-वागड़ का पहाड़ी क्षेत्र" कहलाता है। भील समाज पितृसत्तात्मक होता है तथा गाँव का मुखिया "गामेती" कहलाता है, जो सामाजिक विवादों के निपटारे व पंचायत संचालन में केंद्रीय भूमिका निभाता है। भील समाज कई गोत्रों (कुल) में विभाजित है और एक ही गोत्र में विवाह वर्जित है (गोत्र-बहिर्विवाह)। भील मुख्यतः वन-उपज, कृषि-श्रम, पशुपालन एवं मक्का की खेती पर निर्भर रहे हैं। इनका मुख्य लोकनृत्य "गवरी" व "गैर" है (अध्याय 4 में विस्तृत वर्णन) तथा लोकदेवता के रूप में ये "गोतमेश्वर महादेव" और "देव नारायण जी" (अध्याय 9 में विस्तृत) की पूजा करते हैं।

4भील जनजाति — उप-समूह (Sub-groups)

भील जनजाति के भीतर भौगोलिक स्थिति व पेशे के आधार पर कई उप-समूह पाए जाते हैं —

उप-समूहपहचान/विशेषता
डूंगरी भीलपहाड़ी क्षेत्रों में निवास करने वाले भील — "डूंगर" (पहाड़) से नामकरण
भीलालाभील व राजपूत मिश्रित वंश माने जाने वाला वर्ग, प्रायः थोड़ा संपन्न
मेवासी भीलमेवाड़ क्षेत्र में केंद्रित भील उप-समूह
रावल भीलसामाजिक रूप से नेतृत्वकारी उपाधि धारण करने वाला वर्ग
पटेलिया भीलग्राम-मुखिया परंपरा से जुड़ा उपसमूह, "पटेल" उपाधि का प्रभाव
तड़वी भीलकुछ क्षेत्रों में मुखिया वर्ग हेतु प्रयुक्त नाम (क्षेत्रीय प्रचलन, राजस्थान-विशिष्ट प्रमाण सीमित)

5भील जनजाति — विवाह प्रथाएं

भील समाज में विवाह की प्रक्रिया अन्य जनजातियों की तुलना में अपेक्षाकृत खुली एवं सहमति-आधारित रही है, जिसमें मेलों व सामूहिक नृत्य-आयोजनों की केंद्रीय भूमिका होती है।

प्रथाविवरण
गोल गोधेड़ो प्रथाएक पारंपरिक मेला-आयोजन जिसमें युवक-युवतियाँ एकत्र होकर नृत्य करते हैं और परस्पर पसंद के आधार पर जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्रता रहती है — यह भील समाज की सबसे चर्चित सामाजिक प्रथाओं में से एक है।
पहरावणी/दापा प्रथावर पक्ष द्वारा वधू पक्ष को दिया जाने वाला वधू-मूल्य (Bride Price) — नकद, अनाज या पशुधन के रूप में।
नाता प्रथाविधवा पुनर्विवाह या पारस्परिक सहमति से पति-पत्नी के अलगाव के बाद पुनर्विवाह की मान्य प्रथा (अध्याय 11 में इस प्रथा का सामान्य सामाजिक संदर्भ देखें)।
झगड़ा/उधाळा विवाहआपसी सहमति से युवक-युवती का साथ भाग जाना और बाद में सामाजिक स्वीकृति प्राप्त कर विवाह की औपचारिकता पूर्ण करना।
गोदना प्रथामहिलाओं द्वारा शरीर पर पारंपरिक चिह्न गुदवाना — सामाजिक पहचान, सौंदर्य एवं परलोक में पहचान का प्रतीक माना जाता है।
💡 सावधानी — प्रथाओं को केवल सांस्कृतिक संदर्भ में समझें

गोल गोधेड़ो व उधाळा जैसी प्रथाएं भील समाज की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा रही हैं, जिनका उद्देश्य सहमति व सामाजिक स्वीकृति के साथ विवाह सुनिश्चित करना है। परीक्षा में इन्हें केवल तथ्यात्मक/सांस्कृतिक दृष्टिकोण से लिखें, व्यक्तिगत टिप्पणी से बचें।

6भील जनजाति — कला, पहचान एवं प्रमुख तथ्य

7मीणा (मीना) जनजाति — परिचय एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

📍 🌾 मीणा जनजाति (पूर्वी राजस्थान)

⏰ काल/निर्माता: राजस्थान की दूसरी सबसे बड़ी जनजाति
⭐ विशेषता: नाम "मीणा" संस्कृत शब्द "मीन" (मछली) से बना माना जाता है — भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार से सम्बद्ध मानी जाने वाली वंश-परंपरा के आधार पर। मीणा समुदाय को 1954 में औपचारिक रूप से अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा प्रदान किया गया।

मीणा जनजाति मुख्यतः पूर्वी राजस्थान — दौसा, सवाई माधोपुर, करौली, टोंक, जयपुर व अलवर जिलों में केंद्रित है। यह क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से "ढूंढाड़ प्रदेश" कहलाता है। मीणा समुदाय के बीच एक व्यापक सामुदायिक मान्यता (मौखिक इतिहास/लोक-परंपरा) प्रचलित है कि कछवाहा राजपूतों के जयपुर क्षेत्र में सत्ता स्थापित करने से पूर्व, ढूंढाड़ क्षेत्र पर मीणा शासकों का शासन था — इस मान्यता के अनुसार आमेर के प्रसिद्ध "मावठा" (झील) क्षेत्र में मीणा शासकों की सत्ता का उल्लेख मिलता है।

💡 सावधानी — ऐतिहासिक दावे को सही संदर्भ में लिखें

ढूंढाड़ क्षेत्र पर प्राचीन मीणा शासन का उल्लेख मुख्यतः सामुदायिक मौखिक परंपरा (Oral Tradition) व लोक-इतिहास पर आधारित है। परीक्षा में इसे "मीणा समुदाय की परंपरा के अनुसार" कहकर लिखना अधिक सुरक्षित एवं तथ्यात्मक रूप से सटीक होगा, न कि इसे असंदिग्ध ऐतिहासिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना।

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8मीणा जनजाति — उप-समूह एवं परंपराएं

उप-समूहपहचान/विशेषता
जमींदार मीणाभूमि-स्वामित्व एवं कृषि से जुड़ा सामाजिक रूप से अपेक्षाकृत सम्पन्न वर्ग
चौकीदार मीणापरंपरागत रूप से गाँव की चौकीदारी/सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ा वर्ग
पड़िहार/भील मीणामिश्रित सामाजिक पृष्ठभूमि वाला उपसमूह (नाम व वर्गीकरण क्षेत्रीय रूप से भिन्न मिलता है)
रावत मीणासामाजिक रूप से नेतृत्वकारी उपाधि धारण करने वाला वर्ग

9मीणा-मीना वर्तनी विवाद — समसामयिक मुद्दा

समसामयिक जानकारी: पिछले कुछ वर्षों (लगभग 2013 से 2025 तक) में "मीणा" व "मीना" नाम की वर्तनी को लेकर एक विधिक व सामाजिक बहस चलती रही है — कुछ पक्षों का तर्क है कि "मीना" एक भिन्न (गैर-अनुसूचित) उपनाम/समुदाय है जबकि "मीणा" ही संवैधानिक रूप से अधिसूचित ST वर्ग है, तो कुछ अन्य पक्ष इसे मात्र वर्तनी-भेद मानते हैं। यह मामला आरक्षण-पात्रता से जुड़ा होने के कारण विभिन्न स्तरों पर (प्रशासनिक व न्यायिक) विचाराधीन रहा है। छात्रों को परीक्षा में इस विवाद का उल्लेख करते समय तटस्थ भाषा का प्रयोग करना चाहिए और इसे "एक चल रहा प्रशासनिक/विधिक मुद्दा" के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए, न कि किसी एक पक्ष का समर्थन करते हुए।

10गरासिया जनजाति

📍 💃 गरासिया जनजाति (सिरोही, उदयपुर, पाली, डूंगरपुर)

⏰ काल/निर्माता: गुजरात सीमा क्षेत्र की प्रमुख जनजाति
⭐ विशेषता: नाम "गरासिया" संभवतः "गिरास" (भूमि/अनुदान से प्राप्त निर्वाह-भाग) शब्द से सम्बद्ध माना जाता है। गरासिया राजपूत वंश व स्थानीय भील समुदाय के ऐतिहासिक सम्मिश्रण से उत्पन्न समुदाय माने जाते हैं — यद्यपि यह मूलतः सामुदायिक परंपरा पर आधारित मान्यता है।

गरासिया जनजाति मुख्यतः सिरोही, उदयपुर, पाली एवं डूंगरपुर जिलों में तथा गुजरात राज्य से सटे सीमावर्ती क्षेत्रों में निवास करती है। गरासिया समाज की सामाजिक संरचना व विवाह-पद्धति को लेकर लोकप्रिय मीडिया व पर्यटन-लेखों में अक्सर यह उल्लेख किया जाता है कि गरासिया युवक-युवतियों को मेलों में परस्पर साथी चुनने की अपेक्षाकृत अधिक सामाजिक स्वतंत्रता प्राप्त है, तथा विवाह-पूर्व साथ रहने की कुछ परंपराएं भी बताई जाती हैं। हालांकि इन विशिष्ट दावों को अकादमिक मानवशास्त्रीय स्रोतों से पुष्ट करने की आवश्यकता है, इसलिए परीक्षा में इन्हें अत्यंत सावधानी के साथ, "लोकप्रिय विवरणों के अनुसार" कहकर ही लिखा जाना चाहिए।

11सहरिया जनजाति — विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG)

📍 🌿 सहरिया जनजाति (बारां (किशनगंज व शाहबाद तहसील))

⏰ काल/निर्माता: राजस्थान की एकमात्र आधिकारिक PVTG
⭐ विशेषता: सहरिया राजस्थान की एकमात्र ऐसी जनजाति है जिसे भारत सरकार द्वारा आधिकारिक रूप से "विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह" (Particularly Vulnerable Tribal Group — PVTG) घोषित किया गया है — यह वर्गीकरण अत्यंत निम्न साक्षरता दर, पूर्व-कृषि स्तर की आजीविका, घटती/स्थिर जनसंख्या तथा भौगोलिक दुर्गमता जैसे मानकों पर आधारित होता है।

सहरिया जनजाति मुख्यतः बारां जिले की किशनगंज व शाहबाद तहसीलों के सघन वनीय क्षेत्र में निवास करती है, जो कि हाड़ौती क्षेत्र का एक भाग है। इनकी आजीविका मुख्यतः वनोपज संग्रहण, दैनिक श्रम व सीमांत कृषि पर निर्भर रही है। सहरिया समाज को दीर्घकाल से अत्यंत निर्धनता, कुपोषण एवं शिक्षा से वंचित रहने जैसी गंभीर सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, जिसके कारण केंद्र व राज्य सरकार द्वारा इस समुदाय के लिए विशेष कल्याण योजनाएं संचालित की जाती हैं।

12सहरिया जनजाति एवं PM-JANMAN योजना

समसामयिक योजना — PM-JANMAN: प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महाअभियान (PM-JANMAN) की शुरुआत 15 नवम्बर 2023 को जनजातीय गौरव दिवस (भगवान बिरसा मुंडा जयंती) के अवसर पर की गई थी। यह अभियान विशेष रूप से देशभर के PVTG समुदायों (जिनमें राजस्थान की सहरिया जनजाति भी सम्मिलित है) के सर्वांगीण विकास हेतु केंद्रित है, जिसमें सुरक्षित आवास, सड़क व दूरसंचार संपर्क, स्वास्थ्य व पोषण, शिक्षा, बिजली, पेयजल तथा स्थायी आजीविका जैसे 9 प्रमुख स्तंभों पर कार्य किया जा रहा है। बारां जिले के सहरिया-बाहुल्य क्षेत्रों में इस योजना के अंतर्गत आवास, सड़क एवं स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

13डामोर जनजाति

📍 🪈 डामोर जनजाति (डूंगरपुर, बांसवाड़ा)

⏰ काल/निर्माता: वागड़ क्षेत्र की जनजाति
⭐ विशेषता: डामोर (कहीं-कहीं "डामरिया" भी) जनजाति मुख्यतः डूंगरपुर व बांसवाड़ा जिलों में निवास करती है। यह क्षेत्र भील व डामोर दोनों समुदायों का साझा निवास-क्षेत्र है, इसीलिए दोनों समुदायों की संस्कृति में पर्याप्त समानताएं देखी जाती हैं।

14कथौड़ी जनजाति

📍 🪵 कथौड़ी जनजाति (उदयपुर (कोटड़ा तहसील))

⏰ काल/निर्माता: राजस्थान की संख्या में सबसे छोटी जनजातियों में से एक
⭐ विशेषता: कथौड़ी जनजाति का नाम इनके परंपरागत पेशे — खैर वृक्ष की लकड़ी से "कत्था" (Catechu) निकालने की प्रक्रिया — से जुड़ा है। यह जनजाति संख्या की दृष्टि से राजस्थान की सबसे छोटी जनजातियों में गिनी जाती है।

कथौड़ी समुदाय मुख्यतः उदयपुर जिले की कोटड़ा तहसील के दुर्गम वनीय क्षेत्र में निवास करता है। परंपरागत रूप से यह समुदाय खैर वृक्षों से कत्था निकालने के पेशे से जुड़ा रहा है — यह उत्पाद अध्याय 3 में वर्णित राजस्थान के हस्तशिल्प एवं वन-आधारित उत्पादों से भी सम्बद्ध है। कथौड़ी समाज के पारंपरिक घर "खोलरा" (अस्थायी झोंपड़ीनुमा आवास) कहलाते हैं तथा परंपरागत परिधान को "फड़का" कहा जाता है।

💡 सावधानी — PVTG वर्गीकरण भ्रम

कुछ सामान्य ज्ञान स्रोतों में कथौड़ी जनजाति को भी विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) के रूप में उल्लेखित किया गया है, जबकि राजस्थान में आधिकारिक रूप से एकमात्र मान्यता-प्राप्त PVTG सहरिया जनजाति ही है। परीक्षा में यदि "राजस्थान की एकमात्र PVTG कौन-सी है" पूछा जाए, तो सुरक्षित एवं सर्वाधिक स्वीकृत उत्तर सहरिया जनजाति ही लिखें।

15जनजातियों की तुलनात्मक तालिका

जनजातिमुख्य जिलाविशेष पहचान
भीलउदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुरसबसे बड़ी जनजाति, तीर-कमठी, गवरी नृत्य-नाट्य
मीणादौसा, सवाई माधोपुर, करौलीदूसरी सबसे बड़ी जनजाति, ढूंढाड़ की ऐतिहासिक परंपरा
गरासियासिरोही, उदयपुर, पालीदेवरा/पालिया स्मारक-पत्थर परंपरा
सहरियाबारां (किशनगंज-शाहबाद)राजस्थान की एकमात्र आधिकारिक PVTG
डामोरडूंगरपुर, बांसवाड़ाचाड़िया अनुष्ठान, "मुखी" ग्राम-प्रधान
कथौड़ीउदयपुर (कोटड़ा)संख्या में सबसे छोटी, कत्था-निर्माण पेशा
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16कंजर एवं सांसी समुदाय — वर्गीकरण स्पष्टीकरण

महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण: कंजर व सांसी समुदाय परंपरागत रूप से घुमंतू (Nomadic) समुदाय रहे हैं, जिन्हें ब्रिटिश शासनकाल में विवादास्पद आपराधिक जनजाति अधिनियम, 1871 (Criminal Tribes Act) के अंतर्गत "आपराधिक जनजाति" के रूप में वर्गीकृत किया गया था। स्वतंत्रता के बाद 1952 में इस अधिनियम को निरस्त कर इन समुदायों को "विमुक्त जाति" (De-notified Tribes) घोषित किया गया। छात्रों के लिए यह जानना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि वर्तमान में राजस्थान में कंजर व सांसी समुदाय आधिकारिक रूप से अनुसूचित जनजाति (ST) नहीं बल्कि अनुसूचित जाति (SC) की श्रेणी में वर्गीकृत हैं — यह परीक्षा में बार-बार भ्रम पैदा करने वाला एक महत्वपूर्ण बिंदु है।

17गाड़िया लोहार जनजाति

📍 🔨 गाड़िया लोहार (संपूर्ण राजस्थान (घुमंतू))

⏰ काल/निर्माता: बैलगाड़ी पर बसने वाला घुमंतू लौह-शिल्पी समुदाय
⭐ विशेषता: गाड़िया लोहार परंपरागत रूप से लौह-निर्मित औजार बनाने वाला घुमंतू समुदाय है, जो बैलगाड़ी (गाड़ी) में अपने परिवार व औजारों के साथ गाँव-गाँव घूमकर कृषि-औजार व घरेलू उपकरण बनाने-मरम्मत करने का कार्य करता है — इसी "गाड़ी में रहने" की विशेषता के कारण इन्हें "गाड़िया लोहार" कहा जाता है।

गाड़िया लोहार समुदाय के बारे में एक प्रचलित लोक-कथा कही जाती है कि 1568 ई. में मुगल सम्राट अकबर द्वारा चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर विजय प्राप्त करने के पश्चात्, महाराणा उदयसिंह के साथ रहे इन लौह-शिल्पियों ने यह प्रण लिया था कि जब तक चित्तौड़ पुनः स्वतंत्र नहीं होगा, वे किसी स्थायी घर में निवास नहीं करेंगे — इसी कारण यह समुदाय पीढ़ी-दर-पीढ़ी घुमंतू जीवन जीता रहा। ध्यान रहे कि यह कथा समुदाय की मौखिक परंपरा व लोक-गाथा का हिस्सा है, इसे प्रमाणित ऐतिहासिक दस्तावेज़ के रूप में नहीं बल्कि सांस्कृतिक विरासत-कथा के रूप में समझा जाना चाहिए। वर्गीकरण की दृष्टि से गाड़िया लोहार समुदाय राजस्थान में सामान्यतः अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की श्रेणी में आता है, अनुसूचित जनजाति (ST) की श्रेणी में नहीं।

18बंजारा समुदाय

बंजारा एक ऐतिहासिक घुमंतू व्यापारिक समुदाय है, जो मध्यकाल में बैलों के काफिलों (टांडा) के माध्यम से अनाज, नमक व अन्य वस्तुओं का दूर-दराज तक परिवहन करता था — मुगलकाल में सैन्य अभियानों के दौरान सेना हेतु रसद पहुँचाने में भी बंजारा समुदाय की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। राजस्थान में बंजारा समुदाय वर्तमान में सामान्यतः अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की श्रेणी में वर्गीकृत है। बंजारा महिलाओं की पारंपरिक वेशभूषा व आभूषण (भारी चांदी व कौड़ी के आभूषण) राजस्थान की सांस्कृतिक विविधता का एक रंगीन हिस्सा हैं (अध्याय 11 से क्रॉस-रेफरेंस)।

19जनजातीय सामाजिक प्रथाएं — समेकित दृष्टि

सामान्य समानताएं
  • गोत्र-बहिर्विवाह की परंपरा (सगोत्र विवाह वर्जित)
  • दापा/वधू-मूल्य की प्रथा प्रायः सभी जनजातियों में
  • ग्राम-मुखिया आधारित पंचायत व्यवस्था
  • प्रकृति-पूजा एवं लोकदेवताओं में गहरी आस्था
  • मेलों के माध्यम से सामाजिक मेल-मिलाप की परंपरा
विशिष्ट भिन्नताएं
  • भील — गोल गोधेड़ो प्रथा से जीवनसाथी चयन
  • गरासिया — देवरा/पालिया स्मारक-पत्थर परंपरा
  • सहरिया — PVTG दर्जा, विशेष सरकारी संरक्षण
  • डामोर — चाड़िया अनुष्ठान
  • कथौड़ी — खोलरा आवास, कत्था-निर्माण पेशा

20जनजातीय मेले एवं त्यौहार

राजस्थान के जनजातीय क्षेत्रों में वर्षभर अनेक मेले व त्यौहार आयोजित होते हैं, जिनमें से कई पहले से अध्याय 9 (लोक देवता) व अध्याय 10 (मेले-त्यौहार) में विस्तार से वर्णित किए जा चुके हैं। यहाँ उन्हें जनजातीय दृष्टिकोण से संक्षेप में पुनः प्रस्तुत किया जा रहा है ताकि सम्पूर्ण चित्र स्पष्ट हो सके।

मेला/पर्वस्थानमुख्य समुदाय
बेणेश्वर मेला (माघ पूर्णिमा)डूंगरपुर (सोम-माही-जाखम संगम)भील समुदाय — "आदिवासियों का कुम्भ" कहलाता है
घोटिया आम्बा मेला (चैत्र)बांसवाड़ाभील समुदाय
भगोरिया (होली-पूर्व)बांसवाड़ा-डूंगरपुर सीमा क्षेत्रभील समुदाय — युवक-युवती मिलन पर्व
मानगढ़ धाम धुनी महोत्सव (नवम्बर)बांसवाड़ा (राज.-गुज.-म.प्र. सीमा)भील-गरासिया समुदाय — गोविंद गुरु स्मृति
जनजातीय गौरव दिवस (15 नवम्बर)संपूर्ण जनजातीय क्षेत्रसभी जनजातियाँ — भगवान बिरसा मुंडा जयंती

21मांगढ़ धाम नरसंहार — "आदिवासियों का जलियांवाला बाग़"

"मानगढ़ की पहाड़ी पर बहा आदिवासियों का लहू, आज़ादी के हर संघर्ष की गाथा में अमर हो गया" — लोक-स्मृति

मानगढ़ धाम राजस्थान (बांसवाड़ा), गुजरात एवं मध्यप्रदेश की सीमाओं के संगम-बिंदु पर स्थित एक पहाड़ी है, जो जनजातीय स्वाभिमान व बलिदान का प्रतीक स्थल है। यहाँ 17 नवम्बर 1913 को एक अत्यंत दुखद घटना घटी — समाज-सुधारक व धार्मिक नेता गोविंद गुरु के नेतृत्व में "सम्प सभा" के माध्यम से संगठित हुए हज़ारों भील व अन्य जनजातीय लोग सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन व अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध एक शांतिपूर्ण धार्मिक सभा (धूणी) के लिए एकत्र हुए थे। ब्रिटिश सेना ने इस निहत्थी भीड़ को घेरकर गोलीबारी कर दी, जिसमें 1,500 से अधिक जनजातीय लोग मारे गए — यह घटना जलियांवाला बाग़ हत्याकांड (1919) से भी लगभग 6 वर्ष पूर्व घटित हुई थी, इसीलिए मानगढ़ को अक्सर "आदिवासियों का जलियांवाला बाग़" कहा जाता है।

समसामयिक जानकारी: नवम्बर 2022 में प्रधानमंत्री द्वारा मानगढ़ धाम की धूणी महोत्सव सभा में इस स्थल को राष्ट्रीय स्मारक (National Monument) घोषित करने की बात कही गई थी। राजस्थान सरकार के बजट 2025-26 में मानगढ़ धाम क्षेत्र में जनजातीय पर्यटन सर्किट (Tribal Tourism Circuit) के विकास हेतु घोषणाएं की गई हैं, जिसका उद्देश्य इस ऐतिहासिक स्थल को राष्ट्रीय स्तर पर जनजातीय गौरव एवं बलिदान के प्रतीक के रूप में विकसित करना है।

22जनजातीय कल्याण योजनाएं (केंद्र एवं राज्य)

योजनाउद्देश्य/विवरण
PM-JANMANPVTG समुदायों (सहरिया सहित) हेतु आवास, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा व आजीविका का समग्र विकास (शुभारंभ: 15 नवम्बर 2023)
एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय (EMRS)जनजातीय बाहुल्य क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण आवासीय शिक्षा हेतु राष्ट्रव्यापी विस्तार
वन धन विकास केंद्र योजनावनोपज आधारित आजीविका व मूल्यवर्धन हेतु जनजातीय समूहों का सशक्तिकरण
जनजातीय अनुसंधान संस्थान (TRI), उदयपुरराजस्थान की जनजातियों पर अनुसंधान, दस्तावेज़ीकरण एवं नीति-सुझाव हेतु राज्य स्तरीय संस्थान
सौंध माटी आदि धरोहर प्रलेखन योजनाजनजातीय गौरव दिवस 2025 (डूंगरपुर आयोजन) में शुभारंभ — जनजातीय विरासत के दस्तावेज़ीकरण हेतु राज्य योजना

23नवीनतम अपडेट (2024-2026)

परीक्षा हेतु सुझाव: समसामयिक (Current Affairs) प्रश्नों की तैयारी हेतु छात्रों को परीक्षा-वर्ष के निकटतम महीनों में जनजातीय मामलात विभाग, राजस्थान सरकार तथा भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट व समाचारों से नवीनतम आंकड़े व घोषणाएं अवश्य जांच लेनी चाहिए, क्योंकि योजनाओं के आंकड़े व बजट-आवंटन प्रतिवर्ष अद्यतन होते रहते हैं।

🎯 जनजातियाँ एवं परंपराएं — उत्तर लेखन कोण (RAS Mains) 5-अंक: 60-70 शब्द | 10-अंक: लगभग 120 शब्द

📌 महत्वपूर्ण तथ्य

1. राजस्थान की कुल जनजातीय जनसंख्या (2011) लगभग 92,38,534 है, जो राज्य की जनसंख्या का लगभग 13.48% है। 2. भील राजस्थान की सबसे बड़ी जनजाति है; मीणा दूसरी सबसे बड़ी जनजाति है। 3. सहरिया राजस्थान की एकमात्र आधिकारिक विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) है — मुख्यतः बारां जिले में। 4. भील जनजाति का ग्राम-मुखिया "गामेती" कहलाता है। 5. भील समाज की "गोल गोधेड़ो प्रथा" युवक-युवतियों को जीवनसाथी चुनने का अवसर देती है। 6. मीणा जनजाति को 1954 में औपचारिक रूप से अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा प्राप्त हुआ। 7. मीणा समुदाय की पारंपरिक मान्यता के अनुसार, कछवाहा शासन से पूर्व ढूंढाड़ क्षेत्र (आज का जयपुर) पर मीणा शासकों का शासन था। 8. गरासिया जनजाति मुख्यतः सिरोही, उदयपुर, पाली व डूंगरपुर जिलों में निवास करती है। 9. गरासिया समाज में मृतकों की स्मृति में "देवरा/पालिया" नामक स्मारक-पत्थर स्थापित किए जाते हैं। 10. डामोर जनजाति डूंगरपुर व बांसवाड़ा जिलों में निवास करती है तथा ग्राम-मुखिया को "मुखी" कहा जाता है। 11. कथौड़ी जनजाति उदयपुर की कोटड़ा तहसील में निवास करती है तथा परंपरागत रूप से खैर वृक्ष से कत्था बनाने के पेशे से जुड़ी है। 12. कंजर व सांसी समुदाय वर्तमान में अनुसूचित जाति (SC) की श्रेणी में हैं, अनुसूचित जनजाति (ST) की नहीं। 13. गाड़िया लोहार समुदाय चित्तौड़गढ़ (1568 ई., अकबर विजय) से जुड़ी लोक-मान्यता के अनुसार घुमंतू जीवन व्यतीत करता है — यह OBC वर्ग में वर्गीकृत है। 14. बंजारा समुदाय ऐतिहासिक रूप से व्यापारिक काफिलों (टांडा) से जुड़ा रहा है — राजस्थान में यह OBC वर्ग में वर्गीकृत है। 15. मानगढ़ धाम नरसंहार 17 नवम्बर 1913 को गोविंद गुरु के नेतृत्व में एकत्र हुए जनजातीय लोगों पर हुआ, जिसमें 1,500 से अधिक लोग मारे गए। 16. मानगढ़ धाम को "आदिवासियों का जलियांवाला बाग़" कहा जाता है — यह घटना वास्तविक जलियांवाला बाग़ (1919) से लगभग 6 वर्ष पूर्व घटी। 17. PM-JANMAN योजना 15 नवम्बर 2023 (जनजातीय गौरव दिवस) को प्रारंभ की गई — यह विशेष रूप से PVTG समुदायों हेतु है। 18. बेणेश्वर मेला (डूंगरपुर) भील समुदाय का प्रमुख धार्मिक मेला है, जिसे "आदिवासियों का कुम्भ" कहा जाता है। 19. भगोरिया पर्व बांसवाड़ा-डूंगरपुर क्षेत्र में होली-पूर्व मनाया जाने वाला भील जनजातीय पर्व है। 20. जनजातीय अनुसंधान संस्थान (Tribal Research Institute) उदयपुर में स्थित है, जो राजस्थान की जनजातियों पर शोध व दस्तावेज़ीकरण करता है।

अध्याय सारांश

राजस्थान की जनजातियाँ इस राज्य की सांस्कृतिक विविधता की सबसे गहरी परत हैं — भील जैसी वीरता व प्रकृति-पूजा से जुड़ी सबसे बड़ी जनजाति से लेकर, मीणा जैसी ऐतिहासिक गौरव-गाथा वाली दूसरी बड़ी जनजाति तक, गरासिया की अनूठी सामाजिक संरचना से लेकर सहरिया जैसे सबसे कमज़ोर व संरक्षण की आवश्यकता वाले समुदाय तक — हर जनजाति की अपनी विशिष्ट पहचान, परंपरा एवं संघर्ष की कहानी है।

इस अध्याय में हमने न केवल प्रत्येक प्रमुख जनजाति (भील, मीणा, गरासिया, सहरिया, डामोर, कथौड़ी) की सामाजिक संरचना, विवाह-प्रथाएं व सांस्कृतिक विशेषताओं का विस्तृत अध्ययन किया, बल्कि कंजर-सांसी (SC वर्गीकरण), गाड़िया लोहार व बंजारा (OBC वर्गीकरण) जैसे समुदायों के वर्गीकरण को लेकर होने वाले भ्रमों को भी स्पष्ट किया — जो परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। साथ ही, मानगढ़ धाम जैसे बलिदान-स्थल के ऐतिहासिक महत्व तथा PM-JANMAN, EMRS व वन धन विकास केंद्र जैसी वर्तमान कल्याण योजनाओं का भी अध्ययन किया गया, जो जनजातीय समुदायों के समग्र विकास की दिशा में सरकार के प्रयासों को दर्शाती हैं।

छात्रों को यह ध्यान रखना चाहिए कि जनजातीय समाज से जुड़े कई तथ्य मौखिक परंपरा व लोक-मान्यताओं पर आधारित हैं, इसलिए परीक्षा में उत्तर लिखते समय सदैव तथ्यात्मक सावधानी व संतुलित भाषा का प्रयोग करना चाहिए। अगले अध्याय में हम राजस्थान की प्रमुख विभूतियों — साहित्यकारों, समाज-सुधारकों, स्वतंत्रता सेनानियों व कलाकारों — के योगदान का अध्ययन करेंगे, जो राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत की शृंखला की अंतिम कड़ी होगी।

सारांश तालिका — जिला/क्षेत्र-वार जनजातीय पहचान

जिला/क्षेत्रमुख्य जनजातिप्रमुख विशेषता
उदयपुरभील, कथौड़ी, भील गरासियागवरी नृत्य-नाट्य, कत्था-निर्माण (कोटड़ा)
बांसवाड़ाभील, गरासिया, डामोरमानगढ़ धाम, भगोरिया पर्व, घोटिया आम्बा मेला
डूंगरपुरभील, डामोरबेणेश्वर मेला ("आदिवासियों का कुम्भ")
प्रतापगढ़, चित्तौड़गढ़भीलकृषि-श्रम व वनोपज आधारित आजीविका
सिरोही, पालीगरासियादेवरा/पालिया स्मारक-पत्थर परंपरा
बारांसहरियाराजस्थान की एकमात्र PVTG, PM-JANMAN लाभार्थी क्षेत्र
दौसा, सवाई माधोपुर, करौली, टोंक, जयपुर, अलवरमीणाढूंढाड़ की ऐतिहासिक परंपरा
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