जोधपुर के एक छोटे से गाँव बोरूंदा में एक बच्चा बड़ा हो रहा था, जिसे उसकी दादी रात को लोक-कथाएं सुनाती थी। बड़ा होकर उसने वही लोक-कथाएं 800 से अधिक कहानियों में बदल दीं और राजस्थानी साहित्य को नोबेल पुरस्कार की चर्चा तक पहुँचा दिया — यह थे विजयदान देथा। बीकानेर की गलियों में एक छोटी बच्ची दस साल की उम्र में महाराजा गंगा सिंह के दरबार में गाना गाती थी, आगे चलकर उसकी आवाज़ में "केसरिया बालम" इतना मशहूर हुआ कि वह गीत राजस्थान की पहचान बन गया — यह थीं अल्लाह जिलाई बाई। शाहपुरा के एक ठाकुर परिवार में तीन पीढ़ियों ने मिलकर अंग्रेज़ों के विरुद्ध ऐसी चेतावनी लिखी और ऐसा बम फेंका कि दिल्ली का वाइसराय तक हिल गया — यह थे बारहठ परिवार के केसरी सिंह, जोरावर सिंह और प्रताप सिंह। और सीकर के पास कशी का बास गाँव में जन्मा एक बालक आगे चलकर महात्मा गांधी का "पाँचवा पुत्र" कहलाया और उद्योग जगत में बजाज समूह की नींव रखी — यह थे जमनालाल बजाज। राजस्थान केवल किलों-महलों और रेगिस्तान की धरती नहीं है — यह उन असाधारण इंसानों की धरती है जिन्होंने अपनी कलम, अपनी आवाज़, अपने बलिदान और अपने संघर्ष से इस धरती को अमर बना दिया। यह अध्याय उन्हीं महान विभूतियों को समर्पित है।
1. परिचय — राजस्थान की विभूतियों का महत्व
राजस्थान की सांस्कृतिक व राजनीतिक विरासत केवल स्मारकों, कलाओं व परंपराओं तक सीमित नहीं है — यह उन असंख्य व्यक्तित्वों की भी गाथा है जिन्होंने साहित्य, समाज-सुधार, स्वतंत्रता संग्राम, संगीत एवं कला के क्षेत्र में अपना अप्रतिम योगदान दिया। यह अध्याय पाँच प्रमुख वर्गों में राजस्थान की महान विभूतियों का अध्ययन प्रस्तुत करता है — साहित्यकार, समाज सुधारक, स्वतंत्रता सेनानी, कलाकार-संगीतज्ञ एवं वर्तमान प्रसिद्ध व्यक्तित्व। RAS परीक्षा की दृष्टि से यह अध्याय अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें ऐतिहासिक तथ्यों के साथ-साथ समसामयिक (करेंट अफेयर्स) जानकारी की भी मांग रहती है।
इतिहास के अमर व्यक्तित्व — त्याग, स्वामिभक्ति एवं शौर्य
- पन्नाधाय: मेवाड़ के महाराणा उदयसिंह की धाय माँ। 1535 ई. में मेवाड़ के सामंत बनवीर ने महाराणा विक्रमादित्य की हत्या कर दी और युवराज उदयसिंह को भी मारना चाहा। पन्नाधाय ने अपने पुत्र चंदन को उदयसिंह के स्थान पर सुला दिया — बनवीर की तलवार से चंदन मारा गया, और पन्ना ने उदयसिंह को किले से बाहर निकालकर (कुंभलगढ़ पहुँचाकर) उसकी जान बचाई। मेवाड़ के इतिहास में पन्नाधाय का यह त्याग अविस्मरणीय घटना है।
- दुर्गादास राठौड़: स्वामीभक्त वीर-शिरोमणि, महाराजा जसवंतसिंह के मंत्री आसकरण के पुत्र। जन्म 13 अगस्त 1638 को मारवाड़ के सालवा गाँव में। जसवंतसिंह की मृत्यु के बाद उनकी रानियों तथा खालसा हुए जोधपुर के उत्तराधिकारी अजीतसिंह की रक्षा के लिए राठौड़-सिसोदिया संघ बनाकर औरंगजेब से उसकी मृत्यु (1707 ई.) तक संघर्ष किया। औरंगजेब के विद्रोही पुत्र शहजादा अकबर की सहायता की तथा उसके पुत्र-पुत्री (बुलंद अख्तर व सफीयतुन्निसा) को शरण देकर इस्लामी (कुरान की) शिक्षा दिलवाई — यह साम्प्रदायिक सहिष्णुता का उदाहरण है। बाद में अजीतसिंह ने अनबन होने पर उन्हें मारवाड़ से निर्वासित कर दिया, तब वे सपरिवार मेवाड़ चले गए। मृत्यु 22 नवम्बर 1718 को उज्जैन में। कर्नल जेम्स टॉड ने उन्हें "राठौड़ों का यूलिसीज़" (Ulysses) कहा। मारवाड़ की प्रसिद्ध उक्ति — "मायड़ ऐसा पूत जण, जैसा दुर्गादास"।
- कंपनी हवलदार मेजर पीरू सिंह: जन्म 20 मई 1918 को रामपुरा बेरी (झुंझुनूं) में; 1936 में 6 बटालियन राजपूताना राइफल्स में भर्ती। 18 जुलाई 1948 को जम्मू-कश्मीर के तिथवाल में शत्रु के कब्ज़े वाली पहाड़ी पर हमला कर अंतिम साँस से पहले दुश्मन के ठिकाने नष्ट कर दिए। मरणोपरांत परमवीर चक्र — परमवीर चक्र पाने वाले पहले राजस्थानी।
- मेजर शैतान सिंह: "बाणासुर के शहीद" नाम से प्रसिद्ध; जन्म 1 सितम्बर 1924 को जोधपुर जिले की फलौदी तहसील के बाणासुर गाँव में। 17 नवम्बर 1962 को चीन ने लद्दाख की चुशूल चौकी पर हमला किया — चौकी की रक्षा इनकी "चार्ली कंपनी" पर थी। 120 साथियों के साथ चीनी सेना को दो बार पीछे धकेला; अंत में घायल होकर भी अकेले गोलीबारी करते रहे और 18 नवम्बर 1962 को 38 वर्ष की आयु में वीरगति पाई। मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित।
2. साहित्यकार — मध्यकालीन डिंगल परंपरा
राजस्थान की साहित्यिक परंपरा डिंगल-पिंगल भाषा (अध्याय 6 में विस्तृत वर्णन) में रची गई वीर-काव्य व ऐतिहासिक चारण-साहित्य से समृद्ध रही है। इस परंपरा के कुछ प्रमुख स्तंभ निम्नलिखित हैं —
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⏰ काल/निर्माता: लगभग 12वीं शताब्दी (परंपरागत तिथि)
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⭐ विशेषता: पृथ्वीराज चौहान तृतीय के दरबारी कवि, "पृथ्वीराज रासो" के रचनाकार, जिन्हें हिंदी साहित्य का प्रथम महाकाव्य कहा जाता है — यद्यपि आधुनिक इतिहासकार (जैसे दशरथ शर्मा) इसकी ऐतिहासिकता व वर्तमान स्वरूप की प्रामाणिकता पर प्रश्न उठाते हैं।
पृथ्वीराज रासो का उपलब्ध स्वरूप कई शताब्दियों में जोड़े गए प्रसंगों (प्रक्षेप) से युक्त माना जाता है, तथा इसकी 12वीं शताब्दी की मूल रचना के रूप में प्रामाणिकता विद्वानों में विवादित है। परीक्षा में इसे "परंपरागत रूप से माना जाता है कि..." कहकर लिखना अधिक तथ्यात्मक रूप से सुरक्षित है।
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⏰ काल/निर्माता: 1771 – 1833
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⭐ विशेषता: महाराजा मानसिंह जोधपुर के दरबारी कवि, "बांकीदास री ख्यात" (राजस्थान की लगभग 2000 ऐतिहासिक घटनाओं का संकलन) के रचनाकार। 1805 में लिखी "चेतावणी रो गीत" राजस्थानी साहित्य की सबसे पुरानी अंग्रेज़ों के विरुद्ध चेतावनी कविताओं में से एक है — यह बारहठ परिवार की प्रसिद्ध चेतावनी कविता से लगभग एक शताब्दी पूर्व की रचना है।
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⏰ काल/निर्माता: 1815 – 1868
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⭐ विशेषता: बूंदी रियासत के राजकवि, डिंगल-संस्कृत-प्राकृत-अपभ्रंश के विद्वान। प्रमुख रचनाएं — "वंश भास्कर" (महाराव रामसिंह से मतभेद के कारण अपूर्ण रह गई, क्योंकि सूर्यमल्ल 1857 की क्रांति के समर्थक थे जबकि बूंदी रियासत ब्रिटिश संरक्षण में थी) तथा "वीर सतसई" (700 वीर-रस दोहों का संग्रह)।
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⏰ काल/निर्माता: 6 नवम्बर 1549 – 1600
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⭐ विशेषता: राव कल्याणमल के पुत्र व राय सिंह के भाई, अकबर के दरबारी कवि — सेवाओं के बदले अकबर ने इन्हें गागरोन दुर्ग प्रदान किया था। इतालवी विद्वान एल.पी. टेस्सीटोरी ने इन्हें "डिंगल का होरेस" कहा। प्रमुख रचना — "वेलि क्रिसन रुक्मणी री", जिसे समकालीन कवि दुरसा आढ़ा ने "पाँचवा वेद" कहा।
अन्य प्रमुख कवि, ख्यातकार एवं इतिहासकार
- दुरसा आढ़ा: अकबर के समकालीन चारण कवि, जिन्होंने महाराणा प्रताप एवं राव चंद्रसेन की देश-प्रेम भावना का यशोगान किया। रचनाएँ — "विरुद्ध छहत्तरी" (सर्वाधिक प्रसिद्ध), "किरतार बावनी", "वीरमदेव सोलंकी रा दूहा"। वे हिन्दू संस्कृति व शौर्य के प्रशंसक और भारतीय एकता के भक्त माने जाते हैं।
- गवरी बाई (वागड़ की मीरा): डूंगरपुर के नागर ब्राह्मण परिवार में जन्मी कृष्ण-भक्त कवयित्री, जिन्हें "वागड़ की मीरा" कहा जाता है। डूंगरपुर के महारावल शिवसिंह ने 1829 में इनके लिए बालमुकुंद मंदिर बनवाया।
- दयालदास: "बीकानेर रै राठौड़ां री ख्यात" (दयालदास री ख्यात) के रचनाकार; जन्म 1798 ई. में बीकानेर के कुड़ीया गाँव में। इस ख्यात में राठौड़ों की उत्पत्ति से लेकर महाराजा सरदारसिंह के राज्यारोहण (1851 ई.) तक का इतिहास है। यह बीकानेर राजवंश, मुगल-मराठों से राठौड़ों के संबंध, फरमान-निशान आदि के राजस्थानी अनुवाद तथा बीकानेर की प्रशासनिक व्यवस्था जानने का महत्त्वपूर्ण स्रोत है।
- कविराजा श्यामलदास: मेवाड़ के महाराणा शंभूसिंह व उनके उत्तराधिकारी महाराणा सज्जनसिंह के दरबारी कवि; जन्म 1836 ई. में धोंकलिया (भीलवाड़ा) में। महाराणा शंभूसिंह के आदेश पर मेवाड़ का इतिहास लिखना शुरू किया, जो "वीर विनोद" ग्रंथ में संकलित है। ब्रिटिश सरकार ने इन्हें "केसर-ए-हिंद" तथा महाराणा ने "कविराजा" की उपाधि दी। वे 2 जुलाई 1877 को उदयपुर में बनी "देश हितैषिणी सभा" के सदस्य थे (विवाह-संबंधी कुरीतियों पर रोक हेतु), और स्वामी दयानंद के चित्तौड़ आगमन पर उन्होंने ही उनका स्वागत किया था।
- गौरीशंकर हीराचंद ओझा: राजस्थान के इतिहासकार एवं पुरातत्ववेत्ता; जन्म 1863 ई. में रोहिड़ा (सिरोही) में। प्राचीन लिपियों के गहरे ज्ञान के कारण "भारतीय प्राचीन लिपिमाला" ग्रंथ की रचना की। अंग्रेज़ों ने इन्हें "महामहोपाध्याय" व "रायबहादुर" की उपाधियाँ दीं।
3. साहित्यकार — आधुनिक काल
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⏰ काल/निर्माता: 7 जुलाई 1883 – 11 सितम्बर 1922
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⭐ विशेषता: हिंदी, संस्कृत, प्राकृत व पालि के विद्वान, मेयो कॉलेज अजमेर व बीएचयू से सम्बद्ध। इनकी कहानी "उसने कहा था" (1915) को अक्सर हिंदी की पहली सच्ची कहानी कहा जाता है — यद्यपि यह दावा साहित्यिक इतिहासकारों में विवादित है। जयपुर की जन्तर-मन्तर वेधशाला के संरक्षण में भी इनका योगदान रहा।
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⏰ काल/निर्माता: 1 सितम्बर 1926 – 10 नवम्बर 2013
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⭐ विशेषता: राजस्थानी भाषा के सबसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित साहित्यकार। "बातां री फुलवारी" (14 खंड, लोक-कथाओं पर आधारित) समेत 800 से अधिक कहानियों के रचनाकार। कोमल कोठारी के साथ 1960 में रूपायन संस्थान की सह-स्थापना की। साहित्य अकादमी पुरस्कार (1974, प्रथम राजस्थानी विजेता) व पद्मश्री (2007) से सम्मानित। इनकी कहानियों पर आधारित फिल्में — दुविधा (1973), चरणदास चोर, पहेली (2005)। वर्ष 2011 के साहित्य नोबेल पुरस्कार हेतु भी इनके नाम की चर्चा हुई थी। अन्य प्रमुख कृतियाँ — "बापू के तीन हत्यारे" (आलोचना, 1948), "चौधरायन की चतुराई" (लघु कहानी संग्रह, 1996), "दुविधा", "अलेखूं हिटलर", "उलझन", "लजवंती", "सपनप्रिया", "अंतराल"; "बातां री फुलवारी" (लोक कथा) का प्रकाशन 1960 से। अन्य सम्मान — भारतीय भाषा परिषद पुरस्कार (1992), बिहारी पुरस्कार (2002), साहित्य चूड़ामणि पुरस्कार (2006) व राजस्थान रत्न (2012)। "दुविधा" फिल्म मणि कौल ने और उसी कथा पर "पहेली" अमोल पालेकर ने बनाई।
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⏰ काल/निर्माता: 11 सितम्बर 1919 – 11 नवम्बर 2008
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⭐ विशेषता: राजस्थानी व हिंदी दोनों भाषाओं में लेखन। "धरती धोरां री" राजस्थान का गौरव-गीत माना जाता है; "पीथल और पाथल" कविता महाराणा प्रताप को समर्पित है। साहित्य अकादमी पुरस्कार ("लीलटांस" हेतु), ज्ञानपीठ की मूर्तिदेवी पुरस्कार (1986) व पद्मश्री (2004) से सम्मानित। इनकी कविता पर आधारित वृत्तचित्र "Land of Sand Dunes" (गौतम घोष) को स्वर्ण कमल पुरस्कार मिला। "मींझर" और "लीलटांस" इनके प्रमुख राजस्थानी काव्य-संग्रह हैं। इनकी रचनाएँ "गहरी नींद में सोई आत्मा को भी जगा देने" वाली मानी जाती हैं।
अन्य आधुनिक साहित्यकार एवं पत्रकार
- पं. झाबरमल शर्मा: "पत्रकारिता के भीष्म पितामह"; जन्म 1888 ई. में जसरापुर में। 1905 में पं. दुर्गाप्रसाद मिश्र से हिंदी पत्रकारिता व संपादन की शिक्षा ली। संपादित प्रमुख पुस्तकें — सीकर का इतिहास, खेतड़ी का इतिहास, खेतड़ी नरेश और विवेकानंद, आदर्श नरेश, श्री अरविंद चरित, हिंदी गीता रहस्य सार, आत्म विज्ञान शिक्षा, तिलक गाथा, भारतीय गोधन। पद्म भूषण से सम्मानित।
- कर्पूरचंद कुलिश: जन्म 20 मार्च 1926 को टोंक जिले के सोडा गाँव में। 1951 में पत्रकारिता शुरू की और 7 मार्च 1956 को सांध्यकालीन दैनिक के रूप में "राजस्थान पत्रिका" की शुरुआत की। आपातकाल (1975) के समय गाँवों की यात्रा कर ग्रामीण जीवन पर "मैं देखता चला गया" शृंखला लिखी — इसे राजस्थान के ग्रामीण परिवेश का प्रामाणिक दस्तावेज़ माना जाता है। ढूंढाड़ी में "पोलमपोल" नाम से नियमित कॉलम लिखा, जो उनकी साहित्यिक वसीयत मानी जाती है। वे हिंदी कवि भी थे।
4. साहित्य अकादमी पुरस्कार — राजस्थानी भाषा
साहित्य अकादमी (भारत सरकार) द्वारा 1974 से राजस्थानी भाषा की रचनाओं हेतु वार्षिक पुरस्कार दिया जाता है। विजयदान देथा इस पुरस्कार के प्रथम विजेता (1974) रहे। अब तक 50 से अधिक साहित्यकार इस पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं, जो राजस्थानी भाषा की समृद्ध साहित्यिक परंपरा को दर्शाता है।
| साहित्यकार | कृति/विशेषता |
|---|---|
विजयदान देथा (1974 — प्रथम विजेता) | बातां री फुलवारी |
कन्हैयालाल सेठिया | लीलटांस |
अन्य राजस्थानी साहित्यकार (सूची में) | हर वर्ष नई कृतियों हेतु सम्मान जारी |
परीक्षा हेतु सुझाव: साहित्य अकादमी की राजस्थानी भाषा पुरस्कार विजेताओं की पूर्ण सूची (1974 से अब तक 50+ नाम) प्रतिवर्ष अद्यतन होती है। नवीनतम विजेता का नाम जानने हेतु परीक्षा-वर्ष के निकट साहित्य अकादमी की आधिकारिक वेबसाइट अवश्य देखें।
5. समाज सुधारक — गोविंद गुरु एवं जमनालाल बजाज
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⏰ काल/निर्माता: 1858 – 1931
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⭐ विशेषता: भील व गरासिया जनजातियों में सामाजिक सुधार हेतु 1883 में "सम्प सभा" की स्थापना — नशा-त्याग, एकेश्वरवाद, शिक्षा व बेगार-प्रथा उन्मूलन का आंदोलन। इस आंदोलन के परिणामस्वरूप 17 नवम्बर 1913 को मानगढ़ धाम पर 1500 से अधिक जनजातीय अनुयायियों का नरसंहार हुआ (अध्याय 12 में विस्तृत वर्णन)। गोविंद गुरु को मृत्युदंड की सज़ा हुई थी जिसे बाद में 20 वर्ष के कारावास में बदल दिया गया। सम्प सभा के माध्यम से मेवाड़, डूंगरपुर, ईडर, मालवा आदि क्षेत्रों के भीलों व गरासियों को संगठित किया। 1903 में मानगढ़ की पहाड़ी पर सम्प सभा का पहला बड़ा अधिवेशन हुआ, जहाँ हज़ारों भील-गरासियों ने शराब छोड़ने, बच्चों को पढ़ाने और आपसी झगड़े अपनी पंचायत में ही सुलझाने की शपथ ली; बैठ-बेगार व गैर-वाजिब लागतें न देने का आह्वान किया गया। इसके बाद हर वर्ष आश्विन शुक्ल पूर्णिमा को मानगढ़ पर अधिवेशन होने लगा। वागड़ क्षेत्र में इनका आंदोलन "भगत आंदोलन" कहलाता है। 20 वर्ष की सज़ा के बावजूद वे 10 वर्ष में ही रिहा हो गए। गोविंद गुरु अहिंसा के पक्षधर थे और उनकी श्वेत ध्वजा शांति की प्रतीक थी — आज भी भील समाज में वे पूजनीय हैं।
- मोतीलाल तेजावत (1886-1963): उदयपुर जिले के एक सामान्य ओसवाल परिवार में जन्म; गोविंद गुरु के बाद आदिवासियों के सबसे महत्त्वपूर्ण नेता। आदिवासियों पर अत्याचार से दुखी होकर ठिकाने की नौकरी छोड़ी और 1921 में बैठ-बेगार व लाग-बाग के विरुद्ध भीलों को संगठित किया — यह "एकी आंदोलन" (1921-22) कहलाया, जो सिरोही, ईडर, पालनपुर, विजयनगर तक फैला। विजयनगर राज्य के नीमड़ा गाँव के सम्मेलन पर सेना की गोलीबारी में 1200 भील मारे गए; तेजावत पैर में गोली लगने से घायल होकर भूमिगत हो गए। 8 वर्ष बाद 1929 में गांधीजी की सलाह पर ईडर पुलिस के सामने समर्पण किया; 1936 में रिहा हुए।
- भील-गरासियों के हित में काम करने वाले अन्य नेता — माणिक्यलाल वर्मा, भोगीलाल पंड्या, मामा बालेश्वर दयाल, बलवंतसिंह मेहता, हरिदेव जोशी, गौरीशंकर उपाध्याय; इन्होंने भील क्षेत्रों में शिक्षण संस्थाएँ, प्रौढ़ शालाएँ व छात्रावास खोले। डूंगरपुर में भोगीलाल पंड्या ने 1935 में हरिजन सेवा समिति बनाई; जेल में उन पर हुए अमानुषिक व्यवहार का गोकुलभाई भट्ट, माणिक्यलाल वर्मा, हीरालाल शास्त्री आदि ने विरोध किया, तब महारावल को उन्हें छोड़ना पड़ा।
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⏰ काल/निर्माता: 4 नवम्बर 1889 – 11 फरवरी 1942
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⭐ विशेषता: महात्मा गांधी के अत्यंत निकट सहयोगी — गांधी जी द्वारा "पाँचवा पुत्र" व "मर्चेंट प्रिंस" कहे गए। बजाज समूह के संस्थापक। अपने परिवार के मंदिर को हरिजनों के लिए खोलने वाले भारत के प्रथम व्यक्ति (एक महत्वपूर्ण "प्रथम" तथ्य)। जयपुर सत्याग्रह (1939), बिजोलिया व सीकर आंदोलन में सक्रिय भूमिका। गांधी सेवा संघ के संस्थापक-अध्यक्ष। 1920 में अजमेर में इनकी अध्यक्षता में "राजपूताना मध्य भारत सभा" हुई, जिसमें अर्जुनलाल सेठी, केसरीसिंह बारहठ, राव गोपालसिंह खरवा व विजयसिंह पथिक शामिल हुए। राजस्थान में खादी-प्रचार आंदोलन की देखभाल का ज़िम्मा इन्हीं पर था; जयपुर प्रजामंडल का नेतृत्व इन्होंने हीरालाल शास्त्री के साथ किया।
6. समाज सुधारक — मानिक्य लाल वर्मा एवं गोकुल भाई भट्ट
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⏰ काल/निर्माता: 4 दिसम्बर 1897 – 14 जनवरी 1969
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⭐ विशेषता: बिजोलिया आंदोलन से प्रेरित होकर 24 अप्रैल 1938 को "मेवाड़ प्रजामंडल" के प्रमुख संस्थापक। नरेली (अजमेर के निकट) में सेवाश्रम व डूंगरपुर में भीलों हेतु विद्यालय की स्थापना। संविधान सभा के सदस्य (1949); राजस्थान की पूर्ण-राज्य पूर्व अंतरिम सरकार के प्रमुख; पद्म भूषण (1965) से सम्मानित। मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना के लिए वे साइकिल पर गाँव-गाँव निकले; इनकी प्रेरणा से रमेशचंद्र ओझा व लादूराम व्यास ने 1938 में शाहपुरा प्रजामंडल बनाया। डूंगरपुर में "वागड़ सेवा मंदिर" स्थापित कर भीलों में साक्षरता फैलाई। भारत छोड़ो आंदोलन पर इंदौर में इन्होंने कहा — "भाई हम तो मेवाड़ी हैं, हर बार हर-हर महादेव बोलते आये हैं, इस बार भी बोलेंगे"; 20 अगस्त 1942 को महाराणा को अंग्रेज़ों से संबंध तोड़ने का अल्टीमेटम दिया और अगले दिन गिरफ्तार हुए। इनकी पत्नी नारायणदेवी वर्मा अपने 6 माह के पुत्र को गोद में लेकर जेल गईं। वर्मा कवि भी थे — आज़ादी की लड़ाई में कलम को हथियार बनाया।
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⏰ काल/निर्माता: 19 फरवरी 1898 – 6 अक्टूबर 1986
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⭐ विशेषता: "राजस्थान का गांधी" कहे जाने वाले समाज सुधारक। 22 जनवरी 1939 को 7 अन्य साथियों के साथ "सिरोही प्रजामंडल" की स्थापना। सिरोही रियासत के पुनर्गठन के समय माउंट आबू को गुजरात में मिलाए जाने का सफलतापूर्वक विरोध किया, जिसके कारण माउंट आबू राजस्थान में ही बना रहा (यह एक महत्वपूर्ण परीक्षा-तथ्य है)। पद्म भूषण (1971) व जमनालाल बजाज पुरस्कार (1982) से सम्मानित। खादी-प्रचार के प्रमुख कार्यकर्ता और स्वतंत्रता-गीत लिखने वाले कवि भी थे; राजस्थान के एकीकरण में भी इनकी अहम भूमिका रही।
अन्य समाज सुधारक एवं जन-सेवी
- स्वामी केशवानंद: "शिक्षा संत"; जन्म 1883 ई. में सीकर जिले के मंगलूणा गाँव में चौधरी ठाकरसी के घर; बचपन का नाम "बीरमा"। गांधीजी से प्रभावित होकर 1921 से 1931 तक स्वाधीनता आंदोलन में भाग लिया और जेल गए। 1932 में संगरिया के जाट विद्यालय का संचालन संभाला और उसे मिडिल स्तर से महाविद्यालय स्तर तक पहुँचाया — कला, कृषि, विज्ञान महाविद्यालय, शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय, संग्रहालय व ग्रामोत्थान विद्यापीठ बनाए। 1944 से 1956 तक बीकानेर के रेगिस्तानी गाँवों में लगभग 300 पाठशालाएँ खुलवाईं तथा चलते-फिरते वाचनालय व पुस्तकालय स्थापित किए।
- आचार्य तुलसी: "अणुव्रत आंदोलन" के सूत्रधार; जन्म 20 अक्टूबर 1914 को नागौर जिले के लाडनूं में। 22 वर्ष की आयु में तेरापंथ संघ के नवें आचार्य बने। नैतिक उत्थान के लिए 1949 में अणुव्रत आंदोलन शुरू किया और लोगों को जोड़ने हेतु एक लाख किलोमीटर की पदयात्राएँ कीं। संदेश — "इन्सान पहले इन्सान, फिर हिन्दू या मुसलमान"।
- स्वामी गोपालदास (1882-1939): चूरू के निकट जन्मे; बीकानेर की वास्तविक स्थिति जनता तक पहुँचाने के कारण महाराजा गंगासिंह के कोप के शिकार हुए। चूरू में लड़कियों के लिए स्कूल खोला, तालाबों की मरम्मत कराई और कुएँ खुदवाए।
- डॉ. पी.के. सेठी: "जयपुर फुट" के जनक; सवाई मानसिंह चिकित्सालय में कार्यरत रामचंद्र के सहयोग से 1969 में दिव्यांगों के लिए कृत्रिम पैर (जयपुर फुट) विकसित किया। सम्मान — रैमन मैग्सेसे अवार्ड, डॉ. बी.सी. राय सम्मान, पद्मश्री तथा रोटरी इंटरनेशनल अवार्ड फॉर वर्ल्ड अंडरस्टैंडिंग एंड पीस।
7. आर्य समाज का राजस्थान में प्रभाव
स्वामी दयानंद सरस्वती (आर्य समाज के संस्थापक, बॉम्बे, 1875) ने राजस्थान की कई बार यात्रा की — 1865 में करौली रियासत के राजकीय अतिथि के रूप में किशनगढ़, जयपुर, पुष्कर व अजमेर में प्रवचन दिए; 1881 में भरतपुर की यात्रा की; तथा महाराणा सज्जन सिंह के आमंत्रण पर उदयपुर पहुँचकर 1883 में वहाँ "परोपकारिणी सभा" की स्थापना की। आर्य समाज के प्रभाव से राजस्थान में जातिगत कठोरता का विरोध, विधवा पुनर्विवाह का समर्थन एवं स्त्री-शिक्षा को बढ़ावा मिला — इस दिशा में अनेक विद्यालयों व महाविद्यालयों की स्थापना हुई।
8. स्वतंत्रता सेनानी — बारहठ परिवार
शाहपुरा (भीलवाड़ा क्षेत्र) के चारण बारहठ परिवार की तीन पीढ़ियों ने राजस्थान के स्वतंत्रता संग्राम में असाधारण बलिदान दिया।
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⏰ काल/निर्माता: 21 नवम्बर 1872 – 14 अगस्त 1941
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⭐ विशेषता: मेवाड़ महाराणा के मुख्य सलाहकार। इनकी रचना "चेतावणी रा चूंगट्या" (राग सोरठ में रचित) ने अनेक युवाओं को स्वतंत्रता संग्राम हेतु प्रेरित किया — यह राजस्थान के क्रांतिकारी साहित्य की सबसे प्रभावशाली रचनाओं में गिनी जाती है। 1903 में ये सोरठे मेवाड़ महाराणा फतहसिंह को भेजे, जिनके प्रभाव से महाराणा दिल्ली दरबार में शामिल नहीं हुए। क्रांतिकारी गतिविधियों हेतु धन जुटाने के क्रम में कोटा के महंत प्यारेलाल की हत्या के मामले में 20 वर्ष की सज़ा हुई और बिहार की हज़ारीबाग जेल में रखे गए; 1919 में रिहा हुए, तब कोटा पहुँचने पर पुत्र प्रतापसिंह की शहादत का समाचार मिला। वे चारणों व राजपूतों में शिक्षा-प्रसार और कुरीतियों से बचने पर बल देते थे; बाद में गांधीजी के संपर्क से अहिंसा के समर्थक बने। राजस्थान के क्रांतिकारियों का जनक शाहपुरा का बारहठ परिवार माना जाता है।
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⏰ काल/निर्माता: 12 सितम्बर 1883 – 17 अक्टूबर 1939
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⭐ विशेषता: 23 दिसम्बर 1912 को दिल्ली में चांदनी चौक की एक छत से वायसराय लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंका (दिल्ली कॉन्सपिरेसी केस) — हार्डिंग गंभीर रूप से घायल हुए। इसके बाद ये मालवा क्षेत्र में भूमिगत हो गए और लंबे समय तक अंग्रेज़ी पुलिस की पकड़ में नहीं आए, जिस कारण इन्हें "राजस्थान का चंद्रशेखर आज़ाद" कहा जाता है।
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⏰ काल/निर्माता: 24 मई 1893 – कारावास में मृत्यु (मृत्यु-वर्ष स्रोतों में भिन्न)
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⭐ विशेषता: केसरी सिंह के पुत्र, हार्डिंग बम-प्रकरण में जोरावर सिंह के साथ उपस्थित रहे। बम बनाने की साजिश में गिरफ्तार होकर 5 वर्ष के कारावास की सज़ा मिली। जेल में क्रूर यातनाओं के बावजूद साथी क्रांतिकारियों के नाम नहीं बताए और कारावास में ही वीरगति को प्राप्त हुए। ये अर्जुनलाल सेठी की वर्धमान पाठशाला के छात्र रहे थे।
विभिन्न स्रोतों में कुँवर प्रताप सिंह बारहठ की मृत्यु-तिथि को लेकर भिन्नता पाई जाती है (कुछ स्रोत 1917 बताते हैं तो कुछ 1918)। परीक्षा में सटीक तिथि लिखने से बचें और "कारावास में यातना के कारण मृत्यु" तथ्य पर ही बल दें।
- शाहपुरा में प्रत्येक वर्ष 23 दिसम्बर को 1974 से "शहीद मेला" आयोजित होता है, जो बारहठ परिवार की स्मृति में मनाया जाता है।
9. स्वतंत्रता सेनानी — अर्जुन लाल सेठी एवं विजय सिंह पथिक
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⏰ काल/निर्माता: 9 सितम्बर 1880 – 22 दिसम्बर 1941
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⭐ विशेषता: जैन परिवार में जन्मे, राजस्थान में कांग्रेस संगठन व "जयपुर प्रजामंडल" के संस्थापकों में से एक। 1907 में अजमेर (बाद में जयपुर) में वर्धमान जैन विद्यालय की स्थापना की, जो धार्मिक शिक्षा के साथ राजनीतिक चेतना का भी केंद्र बना। 1912-1920/22 तक जयपुर व वेल्लोर जेल में बंदी रहे। इन्हें राजस्थान के स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख प्रेरणा-स्रोतों में गिना जाता है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक; चौमूं के ठाकुर देवीसिंह के निजी सचिव के रूप में कार्य शुरू किया, पर राजकीय नौकरी छोड़ दी; कुछ समय मथुरा के एक जैन स्कूल में अध्यापक रहे और 1906 में जयपुर आ गए। इनकी वर्धमान पाठशाला "क्रांतिकारियों की नर्सरी" कहलाती थी। एक महंत की हत्या के झूठे आरोप में जेल भेजे गए और 6 वर्ष बाद 1920 में मुक्त हुए। अर्जुनलाल सेठी (1880-1941), केसरीसिंह बारहठ (1872-1941), स्वामी गोपालदास (1882-1939) व राव गोपालसिंह खरवा (1872-1956) राजस्थान के राजनीतिक कार्यकर्ताओं की पहली पीढ़ी के चार प्रमुख नेता माने जाते हैं।
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⏰ काल/निर्माता: 1882 – 1954
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⭐ विशेषता: मूलतः उत्तर प्रदेश के निवासी, परंतु कर्मभूमि राजस्थान रही — लाहौर कॉन्सपिरेसी केस (1915) में नाम आने के बाद स्वयं को "विजय सिंह पथिक" नाम दिया। बिजोलिया किसान आंदोलन के प्रमुख नेतृत्वकर्ता तथा 1917 में बिजोलिया किसान पंचायत (उपरमाल पंच बोर्ड) के संस्थापक। "राजस्थान केसरी", "नवीन राजस्थान" व "राजस्थान सन्देश" पत्रों के संपादक। 1954 में अजमेर में निधन। 1920 में "राजस्थान केसरी" का प्रकाशन पहले वर्धा से, फिर अजमेर से शुरू किया। "राजस्थान सेवा संघ" के संस्थापक — अक्टूबर 1920 में इसे वर्धा से अजमेर लाया गया, ताकि रियासतों के आंदोलनों को गति मिले। पथिक कवि भी थे और स्वतंत्रता-गीतों से जनता को जगाते थे।
- राव गोपालसिंह खरवा: खरवा के ठाकुर; रासबिहारी बोस व बंगाल के क्रांतिकारियों के संपर्क में आकर सशस्त्र क्रांति का मार्ग चुना। 21 फरवरी 1915 की सशस्त्र क्रांति योजना का राजस्थान में उत्तरदायित्व इन्हीं पर था; योजना असफल होने पर टाडगढ़ में नज़रबंद हुए, वहाँ से फरार हुए, फिर पकड़े जाकर अजमेर जेल में रखे गए। 1920 में रिहाई के बाद शांतिपूर्ण राजनीति में लगे। केसरीसिंह बारहठ ने लिखा — "जिस प्रकार पंजाब को लाला लाजपतराय पर और महाराष्ट्र को तिलक पर गर्व है, उसी प्रकार राजस्थान को राव गोपालसिंह खरवा पर गर्व है।"
- सेठ दामोदरदास राठी: ब्यावर के कुशल उद्योगपति, जिनका राजनीतिक कार्यक्षेत्र अर्जुनलाल सेठी, केसरीसिंह बारहठ, राव गोपालसिंह खरवा व विजयसिंह पथिक के साथ रहा। हिंदी के भारी प्रशंसक — 1914 में अपनी कृष्णा मिल के बहीखाते व सारा कार्य हिंदी में करने का संकल्प लिया; ब्यावर में "नागरी प्रचारिणी सभा" स्थापित की और अजमेर-मेरवाड़ा की अदालतों में नागरी लिपि व हिंदी के प्रयोग के लिए आंदोलन चलाया, जिससे अंग्रेज़ कमिश्नर ने राजकीय कार्य हिंदी में करना स्वीकार किया।
10. स्वतंत्रता सेनानी — जयनारायण व्यास एवं हीरालाल शास्त्री
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⏰ काल/निर्माता: 18 फरवरी 1899 – 14 मार्च 1963
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⭐ विशेषता: मारवाड़ हितकारिणी सभा, 1934 में "जोधपुर प्रजामंडल" (भंवरलाल सराफ के साथ) व 1938 में "मारवाड़ लोक परिषद" (सुभाष चंद्र बोस से प्रेरित) के संस्थापक। जोधपुर रियासत के प्रधानमंत्री (1948-49) रहे। राजस्थान के मुख्यमंत्री के रूप में दो बार कार्यभार संभाला — 26 अप्रैल 1951 से 3 मार्च 1952 तथा 1 नवम्बर 1952 से 12 नवम्बर 1954 तक। "तरुण राजस्थान" पत्र के संपादन में योगदान दिया। 1942 के आंदोलन में दबाव के बावजूद आंदोलन समाप्त करने से इनकार कर अडिग रहे। सागरमल गोपा द्वारा जेल-यातनाओं के बारे में लिखे पत्रों पर इन्होंने रेजीडेंट को जाँच हेतु पत्र लिखा। ये स्वतंत्रता-संघर्ष के कवि भी थे।
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⏰ काल/निर्माता: 24 नवम्बर 1899 – 28 दिसम्बर 1974
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⭐ विशेषता: 1929 में बनस्थली में "जीवन कुटीर" की स्थापना की, जो आगे चलकर प्रसिद्ध बनस्थली विद्यापीठ (महिला शिक्षा संस्थान) के रूप में विकसित हुआ — अतः ये समाज-सुधारक भी माने जाते हैं। जयपुर रियासत के प्रधानमंत्री (27 मार्च 1948) तथा 30 मार्च 1949 को राजस्थान राज्य के गठन पर राजस्थान के प्रथम मुख्यमंत्री बने। 1942 में इन्होंने 17 अगस्त की जयपुर सभा में भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा का आश्वासन दिया, परंतु सभा में घोषणा के स्थान पर सरकार से हुई समझौता-वार्ता की जानकारी दी (जयपुर के प्रधानमंत्री मिर्ज़ा इस्माइल से मैत्री के कारण) — इसकी आलोचना हुई और बाबा हरिश्चंद्र आदि ने अलग "आज़ाद मोर्चा" बनाया। इनकी पत्नी रतन शास्त्री भी स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहीं।
परीक्षा में अक्सर भ्रम होता है — राजस्थान के प्रथम मुख्यमंत्री हीरालाल शास्त्री (30 मार्च 1949) थे, जयनारायण व्यास नहीं। जयनारायण व्यास राजस्थान के तीसरे मुख्यमंत्री थे (दो कार्यकाल — 1951-52 व 1952-54)। इस अंतर को स्पष्ट रूप से याद रखें।
11. प्रजामंडल आंदोलन — रियासतों में उत्तरदायी शासन की मांग
राजस्थान की विभिन्न रियासतों में स्वतंत्रता संग्राम के समानांतर, स्थानीय शासकों से उत्तरदायी (जनतांत्रिक) शासन की मांग हेतु "प्रजामंडल" नामक संगठन बनाए गए। इनका उद्देश्य रियासतों में जनप्रतिनिधि सरकार व नागरिक अधिकारों की स्थापना करना था।
| रियासत | प्रजामंडल | स्थापना वर्ष | प्रमुख नेता |
|---|---|---|---|
मेवाड़ (उदयपुर) | मेवाड़ प्रजामंडल | 1938 | मानिक्य लाल वर्मा |
शाहपुरा | शाहपुरा प्रजामंडल | 1938 | रमेशचंद्र ओझा, लादूराम व्यास (माणिक्यलाल वर्मा की प्रेरणा से) |
सिरोही | सिरोही प्रजामंडल | 1939 | गोकुल भाई भट्ट |
कोटा | कोटा राज्य प्रजामंडल | 1939 | पं. नयनूराम शर्मा, पं. अभिन्न हरि (पहला अधिवेशन मांगरोल, बारां) |
जयपुर | जयपुर प्रजामंडल | प्रारंभिक चरण | अर्जुन लाल सेठी; बाद में जमनालाल बजाज (जयपुर सत्याग्रह, 1939) |
जोधपुर (मारवाड़) | जोधपुर प्रजामंडल | 1934 | जयनारायण व्यास, भंवरलाल सराफ |
बीकानेर | बीकानेर प्रजामंडल/प्रजा परिषद | 1936/1942 | मंगाहाराम वैद्य, रघुवर दयाल गोयल |
डूंगरपुर | डूंगरपुर प्रजामंडल | 1944 | भोगीलाल पंड्या, हरिदेव जोशी, गौरीशंकर आचार्य |
- बालमुकुंद बिस्सा: डीडवाना तहसील के पीलवा गाँव में जन्मे; 1934 में गांधीजी से प्रेरित होकर जोधपुर में "जवाहर खादी भंडार" खोला, जो राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बना। 1942 के उत्तरदायी शासन आंदोलन में जेल गए, जहाँ भूख हड़ताल व यातनाओं से शहीद हुए।
- सागरमल गोपा: जैसलमेर के महारावल जवाहरसिंह के दमनकारी शासन के विरुद्ध जनता को जगाया; 1940 में "जैसलमेर में गुंडाराज" पुस्तक छपवाकर बँटवाई, तो राज्य से निर्वासित हुए और नागपुर से प्रचार करते रहे। पिता की मृत्यु पर लौटे, तब 22 मई 1941 को बंदी बनाकर राजद्रोह में 6 वर्ष की कठोर कैद दी गई; थानेदार गुमानसिंह यातनाएँ देता रहा। 3 अप्रैल 1946 को जेल में उन पर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी गई और 4 अप्रैल को उनकी मृत्यु हुई।
- बीरबल सिंह: गंगानगर जिले के रायसिंहनगर में जन्मे, बीकानेर प्रजा परिषद के सदस्य। 30 जून 1946 को रायसिंहनगर में कार्यकर्ता सम्मेलन हुआ; 1 जुलाई 1946 को झंडा-अभिवादन के दौरान कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी की सूचना पर वे तिरंगा लेकर स्टेशन की ओर बढ़े, तब चली गोली से शहीद हुए — पर तिरंगे को गिरने नहीं दिया। अंतिम शब्द — "झंडा ऊँचा रहे हमारा"।
- कालीबाई: डूंगरपुर की भील बालिका, जो 19 जून 1947 को रास्तापाल सत्याग्रह में अपने शिक्षक सेंगाभाई को बचाते हुए शहीद हुई।
- स्वतंत्रता आंदोलन की प्रमुख महिलाएँ: अजमेर की प्रकाशवती सिन्हा, अंजना देवी (पत्नी — रामनारायण चौधरी), नारायणदेवी वर्मा (पत्नी — माणिक्यलाल वर्मा), रतन शास्त्री (पत्नी — हीरालाल शास्त्री), रमादेवी पांडे, सुमित्रा देवी भार्गव, प्रियंवदा चतुर्वेदी आदि।
12. किसान आंदोलन — बिजोलिया एवं बेगूं
रियासतों में प्रजामंडल आंदोलन के साथ-साथ, अत्यधिक भू-कर व बेगार (जबरन श्रम) प्रथा के विरुद्ध किसान आंदोलन भी चले, जो राजस्थान के स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण अध्याय हैं।
| आंदोलन | प्रमुख चरण/वर्ष | प्रमुख नेता | मुख्य मुद्दा |
|---|---|---|---|
बिजोलिया किसान आंदोलन | प्रारंभ 1897 के असंतोष से; 1897 से 1941 तक बहुचरणीय (पथिक का नेतृत्व 1913 से; 1922 में मुख्य समझौता); "प्रताप" समाचार पत्र में बिजोलिया के अत्याचार छपने से इसकी पूरे देश में चर्चा हुई | साधु सीताराम दास → विजय सिंह पथिक → मानिक्य लाल वर्मा | अत्यधिक लगान (कुंता) व बेगार प्रथा का विरोध |
बेगूं किसान आंदोलन | 1921 से, मेनाल (भीलवाड़ा) से प्रारंभ | रामनारायण चौधरी → विजय सिंह पथिक; गोकुल लाल असावा ("तरुण राजस्थान" के संपादक) | बेगार प्रथा व सरकारी दफ्तरों-अदालतों का बहिष्कार |
ध्यान दें: बिजोलिया आंदोलन एक बहुचरणीय, दीर्घकालिक आंदोलन था जो लगभग चार दशकों (1897–1941) तक चला — इसे किसी एक निश्चित आरंभ-समाप्ति तिथि में बांधने के बजाय चरण-वार (साधु सीताराम दास का प्रारंभिक चरण → विजय सिंह पथिक का नेतृत्व चरण → अंतिम समझौता चरण) समझना परीक्षा के लिए अधिक उपयुक्त है।
13. कलाकार एवं संगीतज्ञ — अल्लाह जिलाई बाई एवं साकर खान
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⏰ काल/निर्माता: 1 फरवरी 1902 – 3 नवम्बर 1992
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⭐ विशेषता: महाराजा गंगा सिंह के दरबार में मात्र 10 वर्ष की आयु से गायन। मांड, ठुमरी, ख्याल व दादरा गायन शैली में पारंगत। इनका सर्वाधिक प्रसिद्ध गीत "केसरिया बालम" है (अध्याय 5 में विस्तृत)। पद्मश्री (1982), संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1988) व मरणोपरांत राजस्थान रत्न (2012) से सम्मानित। 1983 में लंदन के रॉयल अल्बर्ट हॉल में बी.बी.सी. द्वारा "कोर्ट सिंगर" अवार्ड दिया गया।
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⏰ काल/निर्माता: 1938 – लगभग 2011-2013 (मृत्यु-वर्ष में स्रोतों में मामूली भिन्नता)
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⭐ विशेषता: मांगणियार समुदाय के कमायचा वादन में सिद्धहस्त कलाकार — कुछ विद्वानों द्वारा "अब तक के सर्वश्रेष्ठ कमायचा वादक" कहा गया। मांगणियार समुदाय से पद्मश्री पाने वाले प्रथम कलाकार (2013) — यह एक महत्वपूर्ण "प्रथम" तथ्य है। अमेरिका, फ्रांस, जापान, बेल्जियम व सोवियत रूस में प्रस्तुतियां दी।
साकर खान को कई बार "सारंगी वादक" कहा जाता है, परंतु सटीक रूप से वे कमायचा (Kamaicha) वादक थे — सारंगी व कमायचा दोनों तार वाद्य होते हुए भी भिन्न वाद्य हैं (अध्याय 5 में दोनों वाद्यों का अंतर देखें)। परीक्षा में सही वाद्य नाम "कमायचा" ही लिखें।
14. कलाकार एवं संगीतज्ञ — कोमल कोठारी एवं गवरी देवी
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⏰ काल/निर्माता: 1929 – 2004
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⭐ विशेषता: लोक-विशेषज्ञ (Folklorist) एवं संगीत-शास्त्री, जिन्होंने लांगा व मांगणियार समुदायों की संगीत-परंपरा के दस्तावेज़ीकरण हेतु जीवन समर्पित किया। विजयदान देथा के साथ 1960 में रूपायन संस्थान की सह-स्थापना की। जोधपुर के निकट "अरना झरना संग्रहालय" (2000) की स्थापना की, जो थार की लोक-संस्कृति का "जीवंत संग्रहालय" है। पद्मश्री (1983) व पद्म भूषण (2004) से सम्मानित। जन्म 4 मार्च 1929 को चित्तौड़गढ़ जिले के कपासन कस्बे में; बोरूंदा (जोधपुर) इनके "रूपायन" संस्थान का स्थान है।
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⏰ काल/निर्माता: 14 अप्रैल 1920 – 29 जून 1988
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⭐ विशेषता: मांड, ठुमरी, भजन व गजल गायन में पारंगत — "राजस्थान की कोकिला" कही जाती हैं। मॉस्को (1983) में आयोजित "फेस्टिवल ऑफ इंडिया" में "केसरिया बालम आवो हमारे देस" प्रस्तुत किया। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार व मरणोपरांत राजस्थान रत्न (2013) से सम्मानित। जन्म 1920 में जोधपुर में; संगीत विरासत में मिला — इनके माता-पिता दोनों बीकानेर दरबार के संगीतकार थे।
गवरी देवी को पद्म पुरस्कार नहीं मिला था — इन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार तथा मरणोपरांत राजस्थान रत्न (राज्य सम्मान) प्राप्त हुआ। परीक्षा में इन्हें "पद्मश्री विजेता" के रूप में गलत न लिखें।
- ध्यान दें: मांड गायिका गवरी देवी और डूंगरपुर की भक्त कवयित्री गवरी बाई ("वागड़ की मीरा", 19वीं सदी) दो अलग-अलग व्यक्तित्व हैं।
- जगजीत सिंह: गज़ल गायक; जन्म 8 फरवरी 1941 को श्रीगंगानगर के एक सिख परिवार में; निधन 10 अक्टूबर 2011। राजस्थान सरकार ने 31 मार्च 2012 को इन्हें मरणोपरांत "राजस्थान रत्न" देने की घोषणा की।
- पं. विश्वमोहन भट्ट: जन्म 12 जुलाई 1950 को जयपुर में; 1965 से देश-विदेश में प्रस्तुतियाँ। गिटार में सितार, सरोद और वीणा के 14 अतिरिक्त तारों का समन्वय कर "मोहन वीणा" का आविष्कार किया। 1994 में विख्यात ग्रैमी (Grammy) पुरस्कार मिला।
15. चित्रकार — राम गोपाल विजयवर्गीय
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⏰ काल/निर्माता: 1905 – 2003
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⭐ विशेषता: बंगाल शैली से प्रभावित चित्रकार (गुरु — असित कुमार हलदार व शैलेंद्र नाथ डे, दोनों अवनींद्रनाथ टैगोर की शिष्य-परंपरा से) — अजंता-शैली से प्रेरित रेखांकन व कालिदास, हिन्दू महाकाव्यों तथा फारसी कवियों (उमर खय्याम, हाफिज़, सादी) के विषयों पर आधारित चित्र। राजस्थान कला मंदिर व राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट के प्रमुख (1945-66) रहे। पद्मश्री (1984) व ललित कला अकादमी के फेलो (1988)।
- निहालचंद: किशनगढ़ चित्रशैली को चरम पर पहुँचाने वाले चित्रकार, जो किशनगढ़ के शासक सावंतसिंह (नागरीदास) के दरबार में थे। इन्होंने सावंतसिंह और उनकी प्रेयसी बनी-ठनी को राधा-कृष्ण के रूप में चित्रित किया — "बनी-ठनी" चित्र को "भारतीय मोनालिसा" कहा जाता है।
- कृपालसिंह शेखावत: "शिल्पगुरु"; जन्म 1922 में सीकर जिले के मऊ गाँव में। ब्लू पॉटरी (चीनी मिट्टी के सफेद बर्तनों पर नीले रंग का अंकन, जिसके लिए जयपुर विश्वविख्यात है) पर चित्रांकन से अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई; इस कला को सम्मान दिलाने व प्रसार में इनका नाम सबसे आदर से लिया जाता है। 1974 में पद्मश्री।
16. राजस्थान रत्न सम्मान
राज्य का सर्वोच्च नागरिक सम्मान: राजस्थान रत्न सम्मान की स्थापना वर्ष 2012 में की गई थी — यह राजस्थान राज्य का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है, जिसमें राज्यपाल/मुख्यमंत्री द्वारा प्रशस्ति-पत्र, शॉल एवं एक लाख रुपये की राशि प्रदान की जाती है। इस सम्मान से अब तक सम्मानित हुई प्रमुख विभूतियों में गवरी देवी, अल्लाह जिलाई बाई (दोनों मरणोपरांत), कैलाश सांखला (बाघ संरक्षणविद्), पंडित राम नारायण (सारंगी वादक) व न्यायविद नागेंद्र सिंह जैसे नाम सम्मिलित हैं। प्रारंभिक सम्मानितों में साहित्यकार विजयदान देथा (2012) और गज़ल गायक जगजीत सिंह (मरणोपरांत, घोषणा 31 मार्च 2012) भी शामिल हैं।
17. वर्तमान प्रसिद्ध व्यक्तित्व — मुख्यमंत्री एवं राज्यपाल
| पद | नाम | विवरण |
|---|---|---|
मुख्यमंत्री (14वें) | भजन लाल शर्मा | 12 दिसम्बर 2023 से पदभार; भाजपा; दो उप-मुख्यमंत्री — दिया कुमारी एवं प्रेम चंद बैरवा |
राज्यपाल (22वें) | हरिभाऊ किसनराव बागड़े | 31 जुलाई 2024 से पदभार; पूर्व महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष |
महत्वपूर्ण — समसामयिक जानकारी अद्यतन रखें: मुख्यमंत्री व राज्यपाल जैसे पदों की जानकारी समय के साथ बदल सकती है। परीक्षा से ठीक पहले राजस्थान सरकार की आधिकारिक वेबसाइट (cmo.rajasthan.gov.in) से नवीनतम स्थिति अवश्य जांच लें।
18. वर्तमान पद्म पुरस्कार विजेता (2024-2025)
गणतंत्र दिवस के अवसर पर प्रतिवर्ष घोषित होने वाले पद्म पुरस्कारों में राजस्थान के कलाकारों व सामाजिक कार्यकर्ताओं को नियमित रूप से सम्मानित किया जाता रहा है। वर्ष 2024 व 2025 के कुछ प्रमुख राजस्थानी विजेता निम्नलिखित हैं —
| नाम | क्षेत्र/विधा | वर्ष | विशेषता |
|---|---|---|---|
जानकी लाल भांड | बहरूपिया/सांग लोक-कला | 2024 | चित्तौड़गढ़ निवासी, 60+ वर्षों से बहुरूपिया कला में सक्रिय |
अली मोहम्मद व गनी मोहम्मद ("घनी ब्रदर्स") | लोक-गायन (संयुक्त पुरस्कार) | 2024 | लोक-संगीत क्षेत्र में योगदान |
लक्ष्मण भट्ट तैलंग | ध्रुपद शास्त्रीय संगीत | 2024 | भारतीय शास्त्रीय संगीत पर कई पुस्तकों के लेखक |
डॉ. माया टंडन | सामाजिक कार्य | 2024 | सामाजिक सेवा क्षेत्र में योगदान |
बतूल बेगम | मांड/लोक-गायन | 2025 | दीदवाना, मिरासी समुदाय; पेरिस ओलंपिक 2024 सांस्कृतिक प्रस्तुति में शामिल; 55+ देशों में प्रस्तुति |
शीन काफ़ निज़ाम (शिवकिशन बिस्सा) | उर्दू साहित्य | 2025 | जोधपुर; साहित्य अकादमी पुरस्कार (उर्दू, 2010) से पूर्व सम्मानित |
परीक्षा हेतु सुझाव — समसामयिक अद्यतन: पद्म पुरस्कार सूची हर वर्ष जनवरी (गणतंत्र दिवस) में घोषित होती है — परीक्षा-वर्ष के निकटतम घोषित सूची में राजस्थान के नए विजेताओं की जानकारी भारत सरकार की आधिकारिक पद्म पुरस्कार वेबसाइट से अवश्य अद्यतन कर लें।
19. तुलनात्मक तालिका — विभूतियां एवं उनका क्षेत्र
| क्षेत्र | प्रमुख विभूतियां |
|---|---|
साहित्य (मध्यकालीन) | चंद बरदाई, बांकीदास, सूर्यमल्ल मिश्रण, पृथ्वीराज राठौड़ "पीथल" |
साहित्य (आधुनिक) | चंद्रधर शर्मा गुलेरी, विजयदान देथा, कन्हैयालाल सेठिया |
समाज सुधार | गोविंद गुरु, जमनालाल बजाज, मानिक्य लाल वर्मा, गोकुल भाई भट्ट |
स्वतंत्रता संग्राम | बारहठ परिवार (केसरी सिंह, जोरावर सिंह, प्रताप सिंह), अर्जुन लाल सेठी, विजय सिंह पथिक, जयनारायण व्यास, हीरालाल शास्त्री |
कला-संगीत | अल्लाह जिलाई बाई, साकर खान, कोमल कोठारी, गवरी देवी, राम गोपाल विजयवर्गीय |
वर्तमान | भजन लाल शर्मा (मुख्यमंत्री), हरिभाऊ बागड़े (राज्यपाल), बतूल बेगम व अन्य पद्म पुरस्कार विजेता |
- 5-अंक उदाहरण: "विजयदान देथा के साहित्यिक योगदान का संक्षिप्त वर्णन करें।" — परिभाषा/परिचय + 2-3 प्रमुख कृतियां व सम्मान + 1 उदाहरण के साथ 60-70 शब्दों में उत्तर दें।
- 10-अंक उदाहरण: "राजस्थान के स्वतंत्रता संग्राम में बारहठ परिवार व प्रजामंडल आंदोलनों के योगदान का मूल्यांकन कीजिए।" — परिचय + आयाम (बारहठ परिवार, प्रजामंडल, किसान आंदोलन) + उदाहरण + महत्व + निष्कर्ष के साथ लगभग 120 शब्दों में उत्तर दें।
- तुलनात्मक प्रश्नों में (जैसे हीरालाल शास्त्री बनाम जयनारायण व्यास) तिथियों व क्रम को सटीक रखना अत्यंत आवश्यक है।
- समसामयिक (वर्तमान मुख्यमंत्री, राज्यपाल, नवीनतम पद्म पुरस्कार) प्रश्नों की तैयारी परीक्षा-वर्ष के निकट अनिवार्य रूप से अद्यतन करें।
1. विजयदान देथा साहित्य अकादमी राजस्थानी पुरस्कार (1974) के प्रथम विजेता थे।2. चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी "उसने कहा था" को अक्सर हिंदी की पहली कहानी कहा जाता है (यह दावा साहित्यिक इतिहासकारों में विवादित है)।3. कन्हैयालाल सेठिया रचित "धरती धोरां री" राजस्थान का गौरव-गीत माना जाता है।4. गोविंद गुरु ने 1883 में "सम्प सभा" की स्थापना की, जिसके कारण 1913 का मानगढ़ नरसंहार हुआ।5. जमनालाल बजाज को महात्मा गांधी "पाँचवा पुत्र" कहते थे तथा वे अपने परिवार का मंदिर हरिजनों के लिए खोलने वाले भारत के प्रथम व्यक्ति थे।6. गोकुल भाई भट्ट के प्रयासों से माउंट आबू सिरोही के पुनर्गठन के बावजूद राजस्थान में ही बना रहा।7. केसरी सिंह बारहठ की रचना "चेतावणी रा चूंगट्या" राजस्थान के क्रांतिकारी साहित्य की प्रमुख रचना है।8. जोरावर सिंह बारहठ ने 1912 में दिल्ली में वायसराय हार्डिंग पर बम फेंका था।9. हीरालाल शास्त्री राजस्थान के प्रथम मुख्यमंत्री (30 मार्च 1949) थे — जयनारायण व्यास तीसरे मुख्यमंत्री थे।10. हीरालाल शास्त्री ने ही बनस्थली विद्यापीठ की स्थापना (मूल नाम "जीवन कुटीर", 1929) की थी।11. मेवाड़ प्रजामंडल (1938) के प्रमुख संस्थापक मानिक्य लाल वर्मा थे।12. बिजोलिया किसान आंदोलन राजस्थान का सबसे लंबा (बहुचरणीय) किसान आंदोलन माना जाता है।13. अल्लाह जिलाई बाई का प्रसिद्ध गीत "केसरिया बालम" है — इन्हें पद्मश्री (1982) मिला था, पद्म भूषण नहीं।14. साकर खान मांगणियार समुदाय से पद्मश्री पाने वाले प्रथम कलाकार (2013) थे — वे कमायचा वादक थे, सारंगी वादक नहीं।15. कोमल कोठारी व विजयदान देथा ने मिलकर 1960 में रूपायन संस्थान की स्थापना की थी।16. गवरी देवी को पद्म पुरस्कार नहीं, बल्कि मरणोपरांत राजस्थान रत्न (2013) प्रदान किया गया था।17. राजस्थान रत्न सम्मान की स्थापना वर्ष 2012 में हुई — यह राज्य का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है।18. राजस्थान के वर्तमान (2024 से) मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा हैं।19. राजस्थान के वर्तमान (जुलाई 2024 से) राज्यपाल हरिभाऊ किसनराव बागड़े हैं।20. बतूल बेगम (मांड गायिका) को पद्मश्री 2025 प्रदान किया गया तथा उन्होंने पेरिस ओलंपिक 2024 में सांस्कृतिक प्रस्तुति दी।
अध्याय सारांश
राजस्थान की प्रमुख विभूतियों का यह अध्याय हमें यह सिखाता है कि इस धरती की महानता केवल इसके किलों-महलों में नहीं, बल्कि इसके साहित्यकारों की लेखनी, समाज सुधारकों के संकल्प, स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान एवं कलाकारों-संगीतज्ञों की सुरीली आवाज़ में भी बसी है। चंद बरदाई से विजयदान देथा तक की साहित्यिक यात्रा, गोविंद गुरु से जमनालाल बजाज तक के समाज-सुधार के प्रयास, बारहठ परिवार से हीरालाल शास्त्री तक का स्वतंत्रता संग्राम, तथा अल्लाह जिलाई बाई से कोमल कोठारी तक की कला-संगीत परंपरा — यह सभी मिलकर राजस्थान की सांस्कृतिक चेतना को समृद्ध करते हैं।
इस अध्याय में हमने विशेष रूप से उन तथ्यों पर सावधानी बरतने का प्रयास किया है जहाँ परीक्षा में सामान्यतः भ्रम होता है — जैसे राजस्थान के प्रथम मुख्यमंत्री की सही पहचान (हीरालाल शास्त्री, जयनारायण व्यास नहीं), अल्लाह जिलाई बाई व गवरी देवी के सही सम्मान (पद्मश्री व राजस्थान रत्न, न कि पद्म भूषण), साकर खान का सही वाद्य (कमायचा, न कि सारंगी), तथा पृथ्वीराज रासो जैसी रचनाओं की ऐतिहासिक प्रामाणिकता पर उठते प्रश्न। ऐसी सूक्ष्म परंतु महत्वपूर्ण बारीकियां ही RAS परीक्षा में अंतर पैदा करती हैं।
वर्तमान मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा, राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े तथा नवीनतम पद्म पुरस्कार विजेताओं जैसी समसामयिक जानकारी के साथ यह अध्याय राजस्थान कला एवं संस्कृति के संपूर्ण 13-अध्याय शृंखला का समापन करता है। छात्रों को सलाह दी जाती है कि वे परीक्षा-वर्ष के निकट सभी समसामयिक तथ्यों (मुख्यमंत्री, राज्यपाल, पद्म पुरस्कार, राजस्थान रत्न) को आधिकारिक स्रोतों से पुनः सत्यापित अवश्य कर लें, क्योंकि यह जानकारी समय के साथ बदलती रहती है।
सारांश तालिका — विभूति, क्षेत्र एवं मुख्य योगदान
| विभूति | क्षेत्र/जिला | **मुख्य योगदान |
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