📋 इस अध्याय में
- सामाजिक जीवन का परिचय — चार प्रमुख भाग
- सोलह संस्कार — परिचय एवं वर्गीकरण
- जन्म संबंधी रीति-रिवाज
- विवाह संबंधी रीति-रिवाज — प्रारंभिक चरण
- विवाह संबंधी रीति-रिवाज — विवाह-पूर्व की रस्में
- विवाह संबंधी रीति-रिवाज — बारात एवं फेरे
- विवाह संबंधी रीति-रिवाज — विवाह-पश्चात की रस्में
- मृत्यु संबंधी रीति-रिवाज
- सती प्रथा — इतिहास एवं उन्मूलन
- बाल विवाह प्रथा — इतिहास एवं कानून
- दहेज प्रथा, विधवा पुनर्विवाह एवं पर्दा प्रथा
- दास प्रथा, बेगार प्रथा एवं अन्य सामाजिक कुरीतियाँ
- जनजातीय एवं क्षेत्रीय सामाजिक प्रथाएँ
- राजस्थानी वेशभूषा — परिचय
- पुरुषों की वेशभूषा
- महिलाओं की वेशभूषा
- आदिवासियों की वेशभूषा
- राजस्थानी आभूषण — परिचय एवं इतिहास
- सिर एवं माथे के आभूषण
- कान, नाक एवं दाँत के आभूषण
- गले के आभूषण
- बाजू एवं अंगुली के आभूषण
- कमर, हाथ एवं पैर के आभूषण
- बच्चों के आभूषण एवं लाख की चूड़ियाँ
- नवीनतम अपडेट
- अध्याय सारांश
कल्पना कीजिए — एक नवजात शिशु के जन्म पर पूरा गाँव एक साथ खुश होता है, ननिहाल पक्ष से उपहारों की झड़ी लग जाती है, बहनें द्वार पर स्वस्तिक बनाती हैं। कुछ वर्षों बाद वही बच्चा दुल्हन बनकर विदा होती है — तोरण मारा जाता है, सात फेरे होते हैं, और अंत में "कोयलड़ी" के विरह-गीतों के बीच वह अपने पीहर को अलविदा कहती है। और फिर जीवन के अंत में, वही परिवार श्मशान की ओर चल पड़ता है, जहाँ मुखाग्नि दी जाती है, तेरहवीं होती है, और परिवार फिर से सामान्य जीवन की ओर लौटता है। यह है राजस्थान का सामाजिक जीवन — जन्म से मृत्यु तक हर पड़ाव पर एक रीति, एक रिवाज, एक परंपरा। इसी सामाजिक ताने-बाने में कभी सुंदर परंपराएँ पनपीं, तो कभी सती प्रथा, बाल-विवाह व दहेज जैसी कुरीतियाँ भी जड़ जमा बैठीं — जिनके विरुद्ध लंबा सामाजिक सुधार आंदोलन चला। और इसी सामाजिक जीवन को अभिव्यक्त करने वाला सबसे रंगीन माध्यम रहा राजस्थान की वेशभूषा व आभूषण — जहाँ पगड़ी सम्मान का प्रतीक बनी, तो बोरला-रखड़ी-कुंदन के आभूषणों ने स्त्री-सौंदर्य को नया आयाम दिया। इस अध्याय में हम राजस्थान के इसी संपूर्ण सामाजिक जीवन-चक्र को विस्तार से समझेंगे।
"मारू थारे देश में उपजै तीन रतन, इक ढोला दूजी मरवण तीजो कसूमल रंग" — राजस्थानी लोकोक्ति — मारवाड़ के तीन रत्नों का वर्णन (ढोला, मरवण एवं कसूमल रंग)
1सामाजिक जीवन का परिचय — चार प्रमुख भाग
राजस्थान के सामाजिक रीति-रिवाजों को मुख्यतः चार भागों में बाँटा गया है — जन्म संबंधी रीति-रिवाज, विवाह संबंधी रीति-रिवाज, मृत्यु संबंधी रीति-रिवाज, तथा अन्य सामाजिक प्रथाएँ (16 संस्कार सहित)। यह वर्गीकरण समझने से जीवन-चक्र के हर पड़ाव से जुड़ी परंपराओं को व्यवस्थित रूप से याद रखना आसान हो जाता है।
2सोलह संस्कार — परिचय एवं वर्गीकरण
हिन्दू परंपरा में मनुष्य के जीवन को शुद्ध व संस्कारित करने हेतु सोलह संस्कारों का विधान है, जिन्हें जन्म-पूर्व, बचपन, शिक्षा एवं गृहस्थ-अंतिम — चार चरणों में बाँटा जा सकता है।
| संस्कार | अर्थ एवं उद्देश्य |
|---|
| गर्भाधान | स्वस्थ व संस्कारी संतान के लिए गर्भाधान का संकल्प |
| पुंसवन | गर्भस्थ शिशु के मानसिक व शारीरिक विकास के लिए (तीसरे-चौथे महीने में) |
| सीमन्तोन्नयन (मारवाड़ में "अगरणी") | गर्भवती माँ को मानसिक शांति व प्रसन्न रखने के लिए |
| जातकर्म | जन्म के समय पिता द्वारा शिशु को शहद चटाना व आशीर्वाद देना |
| नामकरण | शिशु का नाम रखना; जन्म के 11वें या 12वें दिन |
| निष्क्रमण | बच्चे का पहली बार घर से बाहर निकलना (सूर्य व चंद्रमा के दर्शन) |
| अन्नप्राशन | 6 महीने बाद बच्चे को पहली बार अन्न (ठोस भोजन) खिलाना |
| चूड़ाकर्म (मुंडन) | सिर के बाल कटवाना ताकि शुद्ध व तेज बढ़े |
| कर्णवेध | कान छेदना (स्वास्थ्य व शिक्षा के दृष्टिकोण से) |
| विद्यारंभ | बच्चे को अक्षर-ज्ञान व प्रारंभिक शिक्षा की शुरुआत कराना |
| उपनयन (जनेऊ) | गुरु के पास शिक्षा हेतु जाना व जनेऊ धारण करना |
| वेदारंभ | वेदों व शास्त्रों की गंभीर शिक्षा शुरू करना |
| केशांत | किशोरावस्था के अंत में पहली बार दाढ़ी-मूँछ बनाना |
| समावर्तन | शिक्षा पूरी कर गुरुकुल से विदाई (आज का दीक्षांत समारोह) |
| विवाह | गृहस्थ जीवन में प्रवेश करना व समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाना |
| अंत्येष्टि | मृत्यु के पश्चात अंतिम विदाई व अंतिम संस्कार |
3जन्म संबंधी रीति-रिवाज
बच्चे के जन्म से जुड़ी अनेक छोटी-बड़ी रस्में राजस्थान में प्रचलित हैं, जो गर्भावस्था से लेकर शैशवावस्था तक परिवार व समाज को उत्सव में बाँधती हैं।
| रीति-रिवाज | अर्थ |
|---|
| जामणा | बच्चे के जन्म पर ननिहाल पक्ष की ओर से भेजे जाने वाले उपहार व कपड़े |
| ढूँढ | होली के आसपास छोटे बच्चों के लिए ननिहाल से आने वाले उपहार व उत्सव |
| न्हावण / न्हाण | बच्चे व माँ का प्रथम औपचारिक स्नान (शुद्धिकरण की रस्म) |
| सतवाड़ौ (मारवाड़ में "अगरणी") | प्रसव के सातवें दिन होने वाली पारंपरिक रस्म |
| पनघट कुआँ पूजन (जलवा पूजन) | जल के देवता की पूजा तथा माँ का प्रथम बार घर से बाहर निकलना |
| आख्या | बच्चे के जन्म के आठ दिन बाद बहन-बेटियों द्वारा घर के द्वार पर साँतिया (स्वस्तिक) बनाना |
| कोथला | बेटी का पहला प्रसव होने पर उसके पीहर वालों द्वारा जवाई व उसके संबंधियों को भेंट देना |
| पंचमासी | गर्भावस्था के 5वें महीने में की जाने वाली रस्म (शिशु की कुशलता के लिए) |
| दसोटण | बच्चे के जन्म के 10वें दिन किया जाने वाला उत्सव व नामकरण |
| सुहावड़ / कुमकुम | प्रसूता (माँ) के लिए बनाया जाने वाला पौष्टिक भोजन या उससे जुड़ी रस्म |
4विवाह संबंधी रीति-रिवाज — प्रारंभिक चरण
राजस्थानी विवाह एक बहु-चरणीय सामाजिक उत्सव है, जिसमें दर्जनों छोटी-बड़ी रस्में शामिल होती हैं। सबसे पहले हम विवाह के प्रारंभिक चरण (रिश्ता तय होने से लेकर तिथि निर्धारण तक) की रस्मों को समझेंगे।
| रीति-रिवाज | अर्थ |
|---|
| सगाई | विवाह का प्रारंभिक रिश्ता तय होना |
| टीका | वधू पक्ष द्वारा वर के माथे पर तिलक लगाकर रिश्ते की पुष्टि करना |
| चीकणी (रावणी/गोद भरना) | सगाई के बाद वधू के लिए वर पक्ष द्वारा भेजे गए कौथली उपहार व मिठाई |
| पीली चिट्ठी | विवाह की शुभ तिथि तय होने पर वधू पक्ष द्वारा भेजा गया निमंत्रण पत्र |
| इकताई | वर-वधू के कपड़े बनाने के लिए दर्जी द्वारा पहले मुहूर्त से नाप लेना |
| गणपति पूजन | विघ्नहर्ता गणेश की पूजा व प्रथम निमंत्रण-पत्र उन्हें अर्पित करना |
| पत्रिका | विवाह का निमंत्रण-पत्र |
5विवाह संबंधी रीति-रिवाज — विवाह-पूर्व की रस्में
| रीति-रिवाज | अर्थ |
|---|
| रीत | सगाई के समय वर पक्ष द्वारा वधू को दिए जाने वाले जेवर व कपड़े |
| मुगधणा | रसोई के लिए सूखी लकड़ी (ईंधन) का पूजन व उसे लाना |
| पावणा | दामाद का ससुराल में विशेष आदर-सत्कार |
| बान | दूल्हा-दुल्हन को उबटन लगाना और घर से बाहर न निकलने की पाबंदी |
| सीठणे | महिलाओं द्वारा हँसी-ठिठोली में गाए गाली गीत |
| कामण | दूल्हे को जादू-टोने या बुरी नजर से बचाने हेतु गाए जाने वाले गीत |
| मौली (कांकनडोर) | विवाह से दो दिन पहले दूल्हा-दुल्हन को धागे में लोहा, लौंग व कौड़ी बाँधकर सात गाँठें लगाना — बुरी नजर से बचाव का प्रतीक |
| बना-बनी | दूल्हा (बना) व दुल्हन (बनी) के लिए गाए जाने वाले विवाह लोकगीत |
| बत्तीसी / नूतना | माँ द्वारा अपने पीहर (भाई) को भात (मायरा) भरने का न्योता देना |
| मायरा (भात) | मामा द्वारा अपनी बहन के बच्चों की शादी में कपड़े, जेवर व उपहार लाना |
| तोरण | वधू के घर के द्वार पर लटके तोरण को दूल्हे द्वारा (भाले/तलवार से) मारना — विजय का प्रतीक |
| सुहाग थाल | वधू को सुहाग-सामग्री अर्पित करना |
| बिनोटा | वर व वधू के लिए विशेष रूप से बनाई गई शादी की जूतियाँ |
| कन्यावल | वधू पक्ष के करीबी रिश्तेदारों द्वारा फेरों तक रखा जाने वाला उपवास |
| वधू का तेल चढ़ाना | वधू को तेल व उबटन चढ़ाकर शुद्धिकरण करना |
6विवाह संबंधी रीति-रिवाज — बारात एवं फेरे
| रीति-रिवाज | अर्थ |
|---|
| निकासी (बिन्दोरी) | दूल्हे का घोड़ी पर बैठकर गाँव/शहर में भ्रमण करना (बिंदोली नृत्य — झालावाड़) |
| सांकड़ी रात | विवाह से ठीक पहले वाली रात का उत्सव व रात्रि-जागरण |
| कन्यादान | विवाह के द्वारा कन्या (वधू) की जिम्मेदारी माता-पिता द्वारा वर को सौंपने की रस्म |
| जान्नोटण | बारात का सामूहिक भोज या बारात की व्यवस्था |
| बारात | वर पक्ष का वधू के घर प्रस्थान करना |
| कुँवारी जान का भात | बारात के फेरों से पहले वधू पक्ष द्वारा दिया जाने वाला भोजन |
| कलेवा | कुँवर दूल्हे को वधू पक्ष की महिलाओं द्वारा कराया जाने वाला नाश्ता |
| कोयलड़ी | बेटी की विदाई के समय गाए जाने वाले विरह व विदाई गीत |
| परणी जान का जीमण | फेरों के बाद बारात को दिया जाने वाला मुख्य शाही भोज |
| टूँटया | पुरुषों के बारात जाने के बाद घर की महिलाओं द्वारा किया जाने वाला स्वांग/नाटक |
| सामेला | वधू पक्ष द्वारा बारात का स्वागत व मिलनी करना |
| बरी / पड़ला | वर पक्ष द्वारा वधू के लिए लाए गए गहने व शादी का जोड़ा |
| हथबौलणो | नई बहू का प्रथम परिचय |
| सीख | विदाई के समय मेहमानों व बारातियों को दिया जाने वाला उपहार |
| ओझण | वधू को दहेज या उपहार सामग्री देना |
| पहरावणी / रंगबरी | बारात विदाई के समय वधू पक्ष द्वारा बारातियों को दी जाने वाली भेंट या उपहार |
| हथलेवा (पाणिग्रहण) | चंवरी (फेरों के मंडप) में बैठने के बाद वधू का हाथ वर के हाथ में देना |
| फेरे | अग्नि के सात फेरे लेकर वैवाहिक बंधन में बँधना |
7विवाह संबंधी रीति-रिवाज — विवाह-पश्चात की रस्में
| रीति-रिवाज | अर्थ |
|---|
| मुकलावा (गौना) | शादी के कुछ समय बाद वधू का स्थायी रूप से ससुराल जाना |
| आँणौ | शादी के बाद पहली बार वधू का वापस पीहर आना |
| पैसरा | वधू का ससुराल में पहली बार गृह-प्रवेश |
| जुआ-जुई | थाली में दूल्हा-दुल्हन का अंगूठी ढूँढने का खेल |
| बढ़ार | विवाह के अगले दिन आयोजित सार्वजनिक प्रीति-भोज |
| बरोटी | विवाह के बाद वधू के स्वागत में किया गया भोज |
| सोटा-सोटी | दूल्हा-दुल्हन द्वारा छड़ी से एक-दूसरे को मारने की रस्म |
| छात | शादी के बाद कुलदेवी-देवता की पूजा की रस्म |
| डांगड़ी रात | तीर्थ से लौटकर रात्रि-जागरण |
| बाला / चुनड़ी | ननिहाल पक्ष से दी जाने वाली विशेष ओढ़नी |
| कुँवर जोड़ | दूल्हे और उसके साथ आए कुँवर की विशेष पोशाक |
| बयाणौ / बिहाणा | शुभ कार्यों के अंत में दिया जाने वाला दान |
| जात देना | कुल देवता के मंदिर जाकर माथा टेकना |
| हीरावणी | विवाह के समय नववधू को दिया गया कलेवा |
8मृत्यु संबंधी रीति-रिवाज
राजस्थान में मृत्यु से जुड़ी रस्में भी अत्यंत व्यवस्थित व चरणबद्ध हैं — इनका उद्देश्य मृतक की आत्मा की शांति व परिवार को शोक से सामान्य जीवन की ओर लौटाना है।
| रीति-रिवाज | अर्थ |
|---|
| अंत्येष्टि | मृत शरीर को बाँस/लकड़ी की शैय्या पर श्मशान ले जाना; शव को चिता पर रखकर मुखाग्नि देना |
| बखेर / उछाल | श्मशान ले जाते समय रास्ते में पैसे बिखेरना |
| पिंडदान | श्मशान ले जाते समय पहले चौराहे पर आटे का पिंड देना |
| लांपा / मुखाग्नि | अंत्येष्टि में सबसे बड़े बेटे/निकट भाई द्वारा अग्नि देना |
| सांतरवाड़ा / मुगटी | अंत्येष्टि तक (12 दिन तक) घर/पड़ोस में चूल्हा न जलाना, लोगों का सांत्वना हेतु आना-जाना |
| दोषणियाँ | 12वें दिन पानी से भरे जाने वाले घटक (मटके) |
| पानीवाड़ा | व्यक्ति की मृत्यु के समय सब लोग एकत्र होकर स्नान करके सांत्वना देना |
| भदर / भद्दर | शोक में बाल, दाढ़ी, मूँछ कटवाना |
| कपाल क्रिया | उत्तराधिकारी द्वारा दाह-संस्कार के समय शव-क्रिया के कपाल को फोड़कर उसमें घी डालने की प्रक्रिया |
| फूल एकत्र करना | मृत्यु के तीसरे दिन अस्थियाँ चुनकर कलश में रखना (हरिद्वार में विसर्जन) |
| तीये की बैठक | तीसरे दिन शाम को बैठक; पुष्प अर्पण व मौन प्रार्थना |
| मौसर (औसर/नुक्ता/जोसर) | मृत्यु-भोज; जीते जी की जाने वाली बैठक को "जोसर" कहते हैं |
| जान्नोटण | वर पक्ष की ओर से दिया जाने वाला भोज |
| रियाण | अफीम या चाय के साथ मेहमानों का पारंपरिक मेल-मिलाप |
| नुक्ता | मौसर पर सगे-संबंधियों को दिया जाने वाला उपहार |
| लैण / मूकांण | मृतक के संबंधियों से संवेदना प्रकट करना |
| महीने का घड़ा / छमाही / बारह माह का घड़ा | मृत्यु के क्रमशः एक माह, छह माह व एक वर्ष बाद किया जाने वाला यज्ञानुष्ठान व भोज |
| बैकुण्ठी | मृत व्यक्ति को श्मशान ले जाने की डोली/शैय्या |
| दण्डोत | बैकुण्ठी के आगे उसके रिश्तेदारों द्वारा किया गया प्रणाम |
| नारायण बलि | मृतक की आत्मा के भटकाव को रोकने हेतु किया गया संस्कार |
| श्राद्ध | भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक — कुल 16 दिन |
| आदि श्राद्ध | मृत्यु के 11वें दिन किया जाने वाला श्राद्ध |
| मौसर पर पगड़ी बांधना | मौसर पर बड़े पुत्र को उत्तराधिकारी के रूप में पगड़ी बाँधना |
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9सती प्रथा — इतिहास एवं उन्मूलन
सती प्रथा राजस्थान की सर्वाधिक क्रूर सामाजिक कुरीतियों में से एक थी, जिसके विरुद्ध औपनिवेशिक काल में व्यापक सुधार आंदोलन चला। इसे सहमरण प्रथा, अन्वारोहण अथवा सहगमन प्रथा भी कहा जाता है — इसमें पति की मृत्यु के पश्चात पत्नी अपने पति के शव के साथ चिता पर आरोहण करती थी।
| पहलू | विवरण |
|---|
| राजस्थान की प्रथम ज्ञात सती (साक्ष्य) | जोधपुर सेनापति राणुक की पत्नी संपल्ल कँवर — घटियाला शिलालेख के प्रमाण से (नीचे सावधानी-टिप्पणी देखें) |
| राजस्थान में सर्वप्रथम रोक का प्रयास | सवाई जयसिंह द्वितीय (जयपुर) |
| रियासतों द्वारा गैर-कानूनी घोषित (क्रमशः) | 1822 ई. बूँदी रियासत (विष्णुसिंह) → 1823 ई. कोटा रियासत → 1825 ई. बीकानेर रियासत → 1830 ई. अलवर रियासत → 1844 ई. जयपुर रियासत |
| सती निवारण अधिनियम, 1829 | लॉर्ड विलियम बैंटिक द्वारा (सर्वप्रथम बंगाल में 1829, 1830 ई. से पूरे देश में लागू) |
| अधिनियम के तहत राज्य में सर्वप्रथम प्रतिबंध | अलवर रियासत द्वारा |
| जयपुर में सर्वप्रथम रोक का प्रयास | 1844 ई., एजेंट लुडलो के प्रयासों से, सवाई राम सिंह द्वितीय के समय |
| समाधि निवारण अधिनियम, 1861 | जीवित समाधि को आत्महत्या माना गया |
| राजस्थान की अंतिम सती | 1987 ई., दिवराला गाँव (सीकर) निवासी मालसिंह/मानसिंह की पत्नी रूपकँवर |
| राजस्थान सरकार का कानूनी कदम | सती निवारण अध्यादेश, 1987 ई. में पारित |
| महासती / अनुमरण प्रथा | पति की किसी निशानी (वस्तु/पगड़ी) के साथ सती होने वाली महिला |
| राजस्थान की एकमात्र महासती | रूठी रानी उमादे भटियाणी |
💡 सावधानी — घटियाला शिलालेख की तिथि
राजस्थान की प्रथम ज्ञात सती के प्रमाण स्वरूप उल्लिखित "घटियाला शिलालेख" सामान्यतः 9वीं शताब्दी (लगभग 861 ई., कक्कुक शिलालेख) का माना जाता है। कुछ स्रोतों में इसे भूलवश "1861 ई." लिख दिया जाता है, जो तथ्यात्मक रूप से असंभव है — क्योंकि 1861 ई. तक तो सती प्रथा पर ब्रिटिश काल में कानूनी प्रतिबंध (1829) भी लग चुका था। परीक्षा में इस शिलालेख की तिथि लगभग 9वीं शताब्दी (861 ई. के आसपास) ही लिखें, "1861 ई." कभी न लिखें।
| पहलू | विवरण |
|---|
| कन्या-वध प्रथा | कन्या के जन्म लेते ही उसे अफीम देकर या गला दबाकर मार दिया जाता था |
| सर्वप्रथम गैर-कानूनी घोषित | 1833 ई. कोटा रियासत (राम सिंह द्वितीय, पॉलिटिकल एजेंट विल्किंसन के प्रयास) → 1834 ई. बूँदी रियासत (महाराव बुद्धसिंह) → 1837 ई. बीकानेर (महाराजा रतनसिंह) → 1839 ई. जोधपुर (महाराजा मानसिंह) → 1844 ई. उदयपुर व जयपुर द्वारा |
10बाल विवाह प्रथा — इतिहास एवं कानून
| पहलू | विवरण |
|---|
| भारत में बाल-विवाह का प्रथम लिखित प्रमाण | हर्षवर्धन के समय से मिलता है — उन्होंने अपनी अल्पवयस्क बहन राजश्री का विवाह कन्नौज नरेश ग्रहवर्मन से करवाया |
| विवाह की वर्तमान निश्चित आयु | लड़की — 18 वर्ष; लड़का — 21 वर्ष |
| सर्वप्रथम बाल-विवाह प्रतिबंधक कानून | 1885 ई. में, जोधपुर के प्रधानमंत्री सर प्रताप सिंह द्वारा (महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय के समय) |
| अन्य रियासतों में रोक | 1844 ई. में बीकानेर व जयपुर रियासत द्वारा |
| शारदा एक्ट, 1929 | अजमेर निवासी हरविलास शारदा के प्रयासों से; न्यूनतम आयु — लड़का 18 वर्ष, लड़की 14 वर्ष |
| संशोधन, 1978 (बाल विवाह अंकुश निवारण अधिनियम) | न्यूनतम आयु — लड़का 21 वर्ष, लड़की 18 वर्ष |
| सर्वप्रथम प्रयास | सवाई जयसिंह द्वितीय द्वारा नियम बनाने का प्रयास |
| वाल्टर कृत राजपूत हितकारिणी सभा | इस सभा ने बाल-विवाह प्रथा पर नियम बनाए |
11दहेज प्रथा, विधवा पुनर्विवाह एवं पर्दा प्रथा
दहेज प्रथा में विवाह के समय अथवा विवाह के उपरांत वधू पक्ष द्वारा विवाह की आवश्यक शर्त के रूप में वर पक्ष को धन या संपत्ति दी जाती है — इसके विरुद्ध दहेज निवारण अधिनियम, 1961 तथा भारत सरकार का दहेज निवारक कानून, 2006 पारित किया गया।
विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856 ईश्वरचंद्र विद्यासागर के प्रयासों से लॉर्ड डलहौजी के समय बना और जुलाई 1856 में लॉर्ड कैनिंग ने इसे लागू किया — इस प्रथा (विधवा पुनर्विवाह के निषेध) का सर्वाधिक विरोध स्वामी दयानंद सरस्वती ने किया था। पर्दा प्रथा मध्यकालीन इतिहास में मुस्लिम आक्रांताओं की बुरी नजर से बचने हेतु प्रचलन में आई, जो धीरे-धीरे हिन्दू समाज की एक नैतिक/सामाजिक प्रथा बन गई।
| रिवाज | विवरण |
|---|
| नातरा / आणा | पति की मृत्यु के पश्चात विधवा का किसी अन्य पुरुष से दूसरा विवाह |
| गधराणौ | देवर के साथ पुनर्विवाह करना |
| कागली / नाता | विधवा के पुनर्विवाह के अवसर पर प्रति-विवाह एक रुपया कर लिया जाता था |
| क्षेत्रीय नाम | नाता — बीकानेर में; छेली राशि — जयपुर में; नाता कागली — कोटा में; नाता बराड़ — मेवाड़ में |
12दास प्रथा, बेगार प्रथा एवं अन्य सामाजिक कुरीतियाँ
| प्रथा | विवरण |
|---|
| बेगार प्रथा / हाली प्रथा | सामंतों व राजाओं द्वारा अपनी रैयत से मुफ्त सेवाएँ लेना; बूँदी रियासत में महिलाओं से भी बेगार ली जाती थी |
| सागड़ी / वती प्रथा | अविवाहित पुरुष या विधुर द्वारा अविवाहित स्त्री या विधवा से आपसी सहमति से विवाह करना; सागड़ी निवारण अधिनियम, 1961 |
| बंधुआ मजदूर प्रथा | सेठ-साहूकार द्वारा पैसे उधार देकर किसी धरेजा व्यक्ति को कम मेहनताने/ब्याज की राशि के बदले घरेलू नौकर बनाकर काम करवाना; बंधित श्रम पद्धति अधिनियम, 1976 |
| जौहर / जम्मर | युद्ध में पराजय निश्चित होने पर राजपूत महिलाओं द्वारा सामूहिक आत्मदाह (जौहर); पुरुषों द्वारा किए जाने वाले साके को "जम्मर" (शाका) कहा जाता है |
| आन प्रथा | मेवाड़ में प्रचलित स्वामीभक्ति की शपथ-प्रथा; 1863 ई. में महाराणा शंभूसिंह के काल में समाप्त |
| डावरिया प्रथा | उच्च राजघरानों में कन्या की विदाई के समय साथ भेजी जाने वाली कुँवारी कन्याएँ (दहेज के साथ दास-दासी देने हेतु) |
| चौधान | कोटा रियासत में महिलाओं की खरीद-फरोख्त पर वसूला जाने वाला कर; सर्वप्रथम रोक — 1831 ई. में कोटा रियासत द्वारा |
| मौताणा प्रथा | आदिवासियों में मृत्यु का हर्जाना वसूलना |
| मानव विक्रय प्रथा | सामंती समाज में लड़के-लड़कियों को खरीदा जाता था; सर्वप्रथम रोक — 1847 ई. में जयपुर के पॉलिटिकल एजेंट लुडलो के प्रयासों से, टोंक तथा भीलवाड़ा जिले में |
| समाधि प्रथा | किसी साधु/महापुरुष द्वारा जीवित अवस्था में गड्ढा खोदकर अथवा पानी में मृत्यु का वरण करना |
| तागा प्रथा | आत्महत्या के लिए शरीर पर शस्त्र आदि से घाव करवाना |
| पासवान / खवासन | राजा द्वारा किसी दासी को अंगूठी/आभूषण पहनने की अनुमति देने पर उस दासी को "पासवान" कहा जाता था |
| संथारा / संल्लेखना प्रथा | जैन धर्म से संबंधित प्रथा — अन्न व जल का त्याग कर अपने प्राण त्यागना |
13जनजातीय एवं क्षेत्रीय सामाजिक प्रथाएँ
| प्रथा | समुदाय / विवरण |
|---|
| डाकण प्रथा | आदिवासियों में स्त्रियों को "डाकन" कहकर मार देने की प्रथा; रोक — मेवाड़ भील कोर के कमांडर जे.सी. ब्रुक ने 1853 ई. में, स्वरूपसिंह के समय; भील पुरुष द्वारा पंच लोगों के समक्ष नई साड़ी के किनारे में पैसे बाँधकर साड़ी को चौड़ाई की ओर से फाड़ने पर तलाक माना जाता था (छेड़ा-फाड़ना प्रथा) |
| नाता प्रथा | साँसी जनजाति में प्रचलित — पत्नी का अपने पति के जीते जी बिना फेरे किसी अन्य पुरुष के साथ रहने लगना |
| चारी प्रथा | साँसी जनजाति में प्रचलित — दहेज लड़की वाले न देकर लड़के वाले देते हैं |
| कूकड़ी रस्म | विवाह से पहले लड़की द्वारा चरित्र की परीक्षा देना |
| दापा प्रथा | जनजातियों में वर पक्ष द्वारा वधू पक्ष को वधू-मूल्य देना |
| भोर-भू प्रथा | गरासिया जनजाति में नवजात शिशु की नाल काटने की प्रथा |
| अट्टा-सट्टा विवाह प्रथा | लड़की के बदले में उसी घर की लड़की को बहू के रूप में लेने की प्रथा |
| ओजकौ | रात्रि-भर जागरण करना |
| नांगल | नया मकान बनाने के बाद नवनिर्मित गृह के प्रवेश की रस्म |
| दहेज (चारी प्रथा से भिन्न) | साँसी जनजाति में दहेज लड़के वाले देते हैं (सामान्य प्रथा के विपरीत) |
14राजस्थानी वेशभूषा — परिचय
किसी भी क्षेत्र की वेशभूषा वहाँ की जलवायु, उपलब्ध संसाधनों व संस्कृति से प्रभावित होती है। राजस्थानी वेशभूषा की सबसे मुख्य विशेषता इसका "रंग-बिरंगापन" है — रेगिस्तान के नीरस भूरे-पीले परिदृश्य के बीच राजस्थानी वस्त्रों के चटख रंग जीवन का उल्लास भरते हैं। इसीलिए कहा गया है — "मारू थारे देश में उपजै तीन रतन, इक ढोला दूजी मरवण तीजो कसूमल रंग।"
15पुरुषों की वेशभूषा
| वस्त्र | विवरण |
|---|
| पगड़ी | धूप से रक्षा हेतु सिर पर बाँधी जाती थी; मान-सम्मान का प्रतीक, इसीलिए कहावत — "पगड़ी की लाज रखना"; लंबाई 13-15 मीटर (पाग से छोटी) |
| पाग | 14 से 20 मीटर तक लंबा वस्त्र (पगड़ी से बड़ा) |
| साफा | पाग से छोटा किंतु चौड़ा; एक छोर सिर से कमर के नीचे तक लटकता है |
| पेचा | गोल्डन जरी युक्त सिर वस्त्र |
| पोतिया / खोंगा / फालिया | भीलों द्वारा पगड़ी के स्थान पर बाँधे जाने वाले सिर के अन्य वस्त्र |
| अंगरखी | पुरुषों द्वारा ऊपरी भाग में पहना जाने वाला वस्त्र; प्रकार — तनसुख, दुतई, गाबा, गदर, मिरजाई, डाढ़ी, कानो, डगला, बुगतरी, बंडी |
| चुगा / चोगा | अंगरखी के ऊपर पहना जाने वाला वस्त्र (सवाई माधोसिंह द्वारा प्रचलित) |
| अचकन | अंगरखी का संशोधित-विस्तृत रूप |
| धोती | कमर में पहना जाने वाला वस्त्र |
| पछेवड़े | सर्दी में धोती के ऊपर ओढ़ने का वस्त्र |
| अंगोछा | कंधे पर रखा जाने वाला वस्त्र |
| जामा | गर्दन से घुटनों तक का वस्त्र |
| आतमसुख | सर्दी में ऊपर से नीचे तक पहना जाने वाला वस्त्र, कश्मीरी फिरन जैसा |
| बिरजस / ब्रीचेस | चूड़ीदार पायजामा, उत्सव व घुड़सवारी में पहना जाता है |
| कमरबंद / पटका | कमर पर बाँधा जाने वाला वस्त्र, तलवार आदि रखने हेतु |
| पायजामा / सूथन | ढीला वस्त्र, घुटनों से नीचे तक |
- पगड़ी के मौसम व अवसर अनुसार रंग — गुलाबी (वसंत में), लहरिया पगड़ी (श्रावण में), फूल-पत्ती छपाई वाली (होली पर), मंडील पगड़ी (दशहरे पर, बहुरंगी/जरी), मोठड़ा पगड़ी (विवाह पर), सफेद पगड़ी (शोक पर)।
- छाबदार — मेवाड़ में पगड़ी बाँधने वाला व्यक्ति; बंधेरा — जयपुर में पगड़ी बाँधने वाला व्यक्ति; सबसे छोटी पगड़ी — कृष्णचंद पुरोहित (बीकानेर); सबसे बड़ी पगड़ी — अवंतीलाल (बड़ौदा)।
16महिलाओं की वेशभूषा
| वस्त्र | विवरण |
|---|
| चोली | वक्षस्थल को ढकने हेतु पहना जाने वाला वस्त्र (ब्लाउज) |
| कापड़ी | पीठ पर तनियों से बँधने वाली चोली |
| आंगी | बिना बाँह वाली चोली |
| कुर्ती | बिना बाँह की, कांचली के नीचे पहनी जाने वाली |
| कांचली | बाँह-युक्त चोली, मारवाड़ में अधिक प्रचलन |
| घाघरा / पेटीकोट | कमर से एड़ी तक पहना जाने वाला वस्त्र, कलियों को जोड़कर घेरदार (जयपुर का 80 कली घाघरा प्रसिद्ध) |
| लहंगा | घाघरे का छोटा रूप (शेखावाटी में प्रचलित) |
| घघरी | कुँवारी लड़कियों का कमर से घुटने तक का वस्त्र (लहंगे का छोटा रूप) |
| सलवार | कमर से लेकर पाँवों में पहने जाने वाला वस्त्र |
| शरारा | सलवार रूपी वस्त्र, जो शरीर के निचले हिस्से में पैरों में पहना जाता है |
| ओढ़नी | कुर्ती, कांचली व घाघरे के ऊपर शरीर पर पहना जाने वाला वस्त्र |
| चन्द्रकला | बहुमूल्य ओढ़नी |
| कटकी (पांवली भांत) | अविवाहित लड़कियों की जांघों तक की ओढ़नी |
| तारा भांत | आदिवासियों की सर्वाधिक लोकप्रिय ओढ़नी |
| लहरिया | श्रावण मास में पहनी जाने वाली ओढ़नी |
| मोठड़ा | मोठ के दाने जैसी एक-दूसरे को काटती हुई धारीदार लहरिया (जोधपुर) |
| "समुद्र लहर" लहरिया | जयपुर में प्रचलित |
| दामणी | मारवाड़ की लाल रंग की ओढ़नी |
| पोमचा | दुल्हन को दी जाने वाली लाल रंग की ओढ़नी |
| अन्य ओढ़नियाँ | चुनरी, घनक, ज्वार भांत, केरी भांत, लहर भांत |
| घूघी | ऊन से बनी, सर्दी में ओढ़ी जाने वाली |
17आदिवासियों की वेशभूषा
| वस्त्र | विवरण |
|---|
| अंगोछा | भील पुरुषों का सिर पर बाँधने का वस्त्र |
| पोतिया / पोत्या | आदिवासियों में पगड़ी के स्थान पर बाँधा जाने वाला साफा |
| ढेपाड़ा व खोयतु | भील पुरुषों की तंग धोती (ढेपाड़ा) व लंगोटी (खोयतु) |
| जामसाई | आदिवासियों की विवाह के अवसर की फूल-पत्तियों वाली साड़ी |
| नान्दणा / नांदड़ा | आदिवासी स्त्रियों का नीले रंग की छींट का प्राचीनतम वस्त्र |
| फड़का | कथौड़ी महिलाओं की मराठी शैली की साड़ी |
| सिन्दूरी | भीलों की शादी की लाल साड़ी |
| पिरिया | भील दुल्हन का पीला लहंगा |
| कछाबू | भील महिलाओं का घुटने तक का घाघरा |
| रेजा | सहरिया विवाहित महिलाओं का वस्त्र |
| रेनसाई | लहंगे की छींट (काली जमीन पर लाल-भूरे बूंटे) |
| खूसनी | कंजर महिलाओं का तंग पायजामा |
| लूगड़ा (अंगोछा साड़ी) | सफेद जमीन पर लाल बूंटों वाला वस्त्र |
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18राजस्थानी आभूषण — परिचय एवं इतिहास
आभूषण का शाब्दिक अर्थ है — गहना, अलंकार। शरीर को सुंदर व आकर्षक बनाने के लिए इन आभूषणों का प्रयोग किया जाता है। राजस्थान में प्राचीन काल से ही मानव सौंदर्य-प्रेमी रहा है — कालीबंगा व आहड़ सभ्यता के युग की स्त्रियाँ मृण्मय (मिट्टी) तथा चमकीले पत्थरों की मणियों से बने आभूषण पहनती थीं; शुंग काल में स्त्रियाँ मिट्टी के आभूषण प्रयोग में लेती थीं, तथा उस समय हाथीदाँत के बने गहनों का भी उपयोग किया जाता था। धीरे-धीरे समयानुसार आभूषणों में परिवर्तन आया, और वर्तमान में सोना, चाँदी, ताँबा आदि धातुओं से निर्मित आभूषणों का चलन है।
- अजमेर संग्रहालय में नगरी से प्राप्त मृण्मय यक्षिणी की मूर्तियों में बँधे बोल (बोर), शीषफूल एवं पत्री आभूषण दिखाए गए हैं। कवि पृथ्वीराज राठौड़ ने "वेलि क्रिसन रुक्मणी री" में रुक्मणी के श्रृंगार-वर्णन में माँग पर लटकते तिलक का उल्लेख किया है। हर्षचरित में राजाओं के बालों को बाँधने के लिए सोने के पत्रों (जिन्हें "बालापाश" कहा जाता था) का उल्लेख मिलता है।
19सिर एवं माथे के आभूषण
| आभूषण | विवरण |
|---|
| बोर / बोरला | गोल आकार का आभूषण जो सिर पर पहना जाता है (इसके चाँद की आकृति वाले हिस्से को "मोड़ीया" कहते हैं) |
| रखड़ी | सुहाग का प्रतीक, बोरला के समान सिर का आभूषण |
| टीका / टिकड़ा | स्त्रियों के सिर पर पहना जाने वाला आभूषण |
| टोटिया | स्त्रियों के भाल (ललाट) का एक विशेष आभूषण |
| शीशफूल | सिर पर पीछे की तरफ सोने की बारीक साँकल जैसा पहना जाने वाला आभूषण |
| मांगटीका / मांगफूल | माँग में पहना जाने वाला आभूषण |
| सेलड़ौ / सैलड़ौ | स्त्रियों की वेणी (चोटी) में गूँथा जाने वाला आभूषण |
| टीका (रखड़ी/बोरला के आगे) | तिलक वाला फूल की आकृति का आभूषण |
| बिंदी / टिक्की | सुहागिन स्त्रियों द्वारा ललाट पर लगाया जाने वाला पारंपरिक चिह्न |
| फूलगूंधर | शीश (सिर) पर गूँथा जाने वाला एक विशेष रजत (चाँदी) आभूषण |
| गोफण | स्त्रियों के बालों की वेणी (चोटी) में गूँथा जाने वाला आभूषण |
| अन्य सिर आभूषण | काचर, सरकयारौ, साँकली, तावीज, सिणगारपट्टी, सूवालळकौ, मैण, मोरमंडली, गेडी, तिलकमणी, खेचा देवाड़ |
20कान, नाक एवं दाँत के आभूषण
| आभूषण | विवरण |
|---|
| झुमका / झुमणौ / झूमर | स्त्रियों के कान का एक विशिष्ट आभूषण |
| टोटी | गोल चकरी के समान आभूषण, जिसके पीछे कान में पहनने के लिए एक डण्डी लगी होती है |
| बाड़लो | गले में पहना जाने वाला एक पारंपरिक आभूषण |
| छैलकड़ी / बुजट्टी | कान में पहनी जाने वाली एक विशेष प्रकार की कड़ी या आभूषण |
| कर्णफूल | कान के निचले भाग में पहना जाने वाला पुष्पाकार आभूषण, जिसमें अक्सर नगीने जड़े होते हैं |
| मेमंद | मसाले वाले लौंग के आकार का सोने या चाँदी के तार से बना आभूषण, जिस पर घुंडीदार नगीना लगा होता है |
| मोरूवर | कान पर लटकाया जाने वाला मोर की आकृति जैसा सुंदर आभूषण |
| अन्य कान के आभूषण | झेलो, कुड़किल, कोकरूँ, गुड़दौ, ठोरियौ, डरगलियौ, डुगरली, तड़कली, पत्तीसुरलिया, पासौ, पीपळपान, बाळा, बूझली, माकड़ी, लटकन, वेड़लौ, संदोल, झालरौ, सुरगवाली, सुरळियौ, जमेला, भचूरिया, मुरकी, मुरकियाँ (पुरुषों के कान का), मादीकड़ |
| हंसली | विशेषकर छोटे बालकों को उनकी "हंसली" खिसकने से बचाने के लिए पहनाया जाने वाला धातु के मोटे तार से बना गोलाकार आभूषण |
| नथ | गोलाकार और रत्नों से जड़ित सोने का भारी नाक का आभूषण |
| भंवरा | नथ के समान ही आभूषण, जो अधिकांशतः बिश्नोई जाति की महिलाओं द्वारा पहना जाता है |
| बेसरी / मादलिया | नाक का एक विशिष्ट आभूषण, जिसमें नाचता हुआ मोर का चिन्ह अंकित होता है (यह किशनगढ़ शैली की "बणी-ठणी" पेंटिंग के कारण भी प्रसिद्ध है — अध्याय 3 से क्रॉस-रेफरेंस) |
| अन्य नाक के आभूषण | भंवरकड़ी, बिजली, लूंग, बारी, काँटा, भोगली, बुलाक, चोप, कोकौ, खीवण, नकफूल, नकेसर, वेणवेसर |
| रखन / नक्कस | दाँतों के ऊपर सोने के पत्तर की खोल (Plating) बनाकर चढ़ाई जाने वाली; मेवात क्षेत्र में कंठ का आभूषण भी "नक्कस" कहलाता है |
| चूंप / मेख | दाँतों के बीच में सोने की छोटी कील जड़वाना; स्त्री-पुरुष दोनों के दाँतों में जड़ी जाने वाली सोने की चूंप को "मेख" भी कहा जाता है |
21गले के आभूषण
| आभूषण | विवरण |
|---|
| कंठी | सोने की बारीक साँकल (chain) जिसमें कोई चैन-लॉकेट लगा होता है |
| मंगलसूत्र | सुहाग के प्रतीक के रूप में काले मोतियों की माला से बना हारनुमा आभूषण |
| तिमणियो / थमण्यो | महिलाओं द्वारा गले में पहना जाने वाला सोने का एक प्रमुख पारंपरिक आभूषण |
| थाळौ | देवमूर्ति-युक्त गले का आभूषण |
| हार | चंद्रहार, कंठहार, हंसहार, सोहनहार, नौलखा हार, मोतीहार, रानीहार आदि प्रकार |
| माला | हमेरमाल, चंद्रमाला, मोहनमाला, मेहरमाला, मटरमाला जैसे प्रकार |
| तांती | देवी-देवताओं के नाम पर बाँधा जाने वाला धार्मिक धागा या आभूषण |
| लाखीणी | दुल्हन के लिए विशेष रूप से बनाई गई लाख की चूड़ी |
| अन्य गले के आभूषण | डोरो, झालरौ, कंठसरी, निगोदर, निगोदरी, तेड़ियौ, आड़, रूचक, बाड़ली, बाड़लौ, हांस, पाट बंगड़ी, गळपटियौ, गळबंध, तख्त, तगतगई, थमण्यो, ठुस्सी, नक्कस, निंबोळी, पंचलड़ी, पंचमणियौ, बजट्टी, पटियौ, तुलसी, हांसली, टेवटौ, ताबीज, तेवटियौ, तांतणियौ, मंगलसूत्र, हौदळ, छैलकड़ौ, बटण, खिवली, खूंगाळ, नांगली, छेड़ियौ, हमेल, रामनवमी, चंपाकली, जुगावली, चोकी, आचोरी, हालरो, हांकर |
22बाजू एवं अंगुली के आभूषण
| आभूषण | विवरण |
|---|
| बजायठ | बाँह पर धारण किया जाने वाला एक पारंपरिक गहना |
| डोडी | भुजा पर पहना जाने वाला एक विशेष प्रकार का कड़ा |
| खाँच | स्त्रियों द्वारा बाँह पर पहना जाने वाला आभूषण |
| बाजूबंध / उतरणो | सोने की बेल्ट जैसी आकृति वाला आभूषण, जो ऊपरी बाँह पर बाँधा जाता है |
| टड्डा | ताँबे की छड़ पर सोने की परत चढ़ा आभूषण, जिसमें 3 वल्ल (घेरे) होते हैं |
| पट्टा | ताँबे की छड़ पर सोने की परत वाला आभूषण, जिसमें केवल 1 वल्ल होता है |
| अन्य बाजू आभूषण | बाजूसोसण, बाहुसंगार, डंटकड़ौ, टडौ, कातरियौ, अड़कणी, बहरखां, तकमा, गजरा |
| मूंदड़ी / बींटी | अंगुलियों में पहना जाने वाला गोलाकार छल्ला/अंगूठा |
| झोटा | तीन आँटों (घेरों) वाली एक विशेष मोटी अंगूठी |
| पट्टा बींटी | सगाई या पाणिग्रहण से पहले वर पक्ष की ओर से वधू को दी जाने वाली चाँदी की मुद्रिका |
| अणत / पवित्री | ताँबे व चाँदी के मिश्रण से बनी अंगूठी, जिसे धार्मिक दृष्टि से शुभ माना जाता है |
| अंगूथळौ | विशेष रूप से हाथ के अंगूठे में पहना जाने वाला आभूषण |
| अरसी | हाथ के अंगूठे में पहनी जाने वाली एक बड़ी अंगूठी, जिसमें अक्सर शीशा (mirror) लगा होता है |
| आंवला | सोने या चाँदी से निर्मित, जिसे पैरों में भी पहना जाता है |
| मुरसी | अंगुलियों में धारण किया जाने वाला एक पारंपरिक आभूषण |
| चूड़ | सोने या चाँदी का बना एक मोटा कड़ा |
| गजरा | मोतियों से परोया जाने वाला सुंदर आभूषण |
| नोगरी | मोतियों की कई लड़ियों के समूह से बना आभूषण |
23कमर, हाथ एवं पैर के आभूषण
| आभूषण | विवरण |
|---|
| पगपान | सोने अथवा चाँदी से बना कमर में पहना जाने वाला आभूषण |
| चौथ | चाँदी से बना आभूषण जो जंजीर के समान होता है, इसे पुरुष एवं महिलाएँ दोनों धारण करते हैं |
| अन्य कमर आभूषण | सटकौ, मेखला, मेरवाला, सिनामा, हालम, मुखल्ला, धाकड़ी, तगड़ी, वसन, करधनी, कन्दोरा, कणकती, जंजीर |
| चूड़ / नेवरी | गोल कड़े के रूप में हाथों में पहना जाने वाला आभूषण |
| पायल / पायजेब | इसे रमझोल या शकुंतला के नाम से भी जाना जाता है |
| टणका / टणको | चाँदी का गोलाकार आभूषण, जिससे चलते समय "टणक-टणक" की आवाज़ आती है |
| लछौ | चाँदी के बारीक तारों से बना पाँव का एक विशेष आभूषण |
| रोळ | पैरों में पहना जाने वाला घुँघरूदार आभूषण |
| झाँझर | पायलनुमा आभूषण, जो अपनी रुनझुन की मधुर आवाज़ के लिए प्रसिद्ध है |
| गोल्या | चाँदी की चौड़ी और सादी अंगूठियाँ जो पैरों में पहनी जाती हैं |
| मिकयौ | स्त्रियों द्वारा पैरों में धारण किया जाने वाला एक पारंपरिक गहना |
| नखलियौ | पाँव की अंगुलियों में पहना जाने वाला एक पारंपरिक गहना |
| बिछिया | सुहाग का प्रतीक, जिसे विवाहित स्त्रियाँ पाँव के चूटकी अंगूठे के पास वाली अंगुली में पहनती हैं |
| फोलरी | चाँदी के बारीक तारों से फूल की आकृति बनाकर पहनी जाने वाली अंगूठी |
| अन्य हाथ-पैर आभूषण | नेवर, पिंजणी, पादसंकळिका, तेघड़, तांती, सिजनी, कंकणी, शकुंतला, बालिया, ओगनिया, अंगूथळौ, गूठलौ, गौर, लछने, छल्ला, बीछुड़ी, जोड़ (जोधपुरी जोड़, हवाई जहाज का जोड़), दोळियौ |
- पुरुषों के विशिष्ट आभूषण — कलंगी (साफे पर लगाया जाने वाला आभूषण), बलेवड़ा (गले का आभूषण), सेहरा (शादी के समय वर द्वारा पहना जाने वाला साफा/पगड़ी जैसा आभूषण), टोडर (पुरुष के पाँवों का स्वर्ण भूषण), माठी (कलाई के कड़े), मुरकी व मादीकड़ (कान के आभूषण)।
24बच्चों के आभूषण एवं लाख की चूड़ियाँ
| आभूषण | विवरण |
|---|
| चूड़ा-कटीर | उदयपुर क्षेत्र में प्रचलित एक विशेष प्रकार का चूड़ा |
| नजरिया | लाल कपड़े में सोने का खेरा, मूंग का आखा तथा रत्नचूर बाँधकर गले में पहनाया जाने वाला आभूषण, ताकि शिशु को नज़र-दोष (गाँठ-गुमड़े) न हो |
| झाँझरिया | बच्चों के पैरों में पहनाई जाने वाली पतली लाल पट्टी या साँकली, जिनमें घुँघरियाँ लगी होती हैं |
| कड़ो / कंडूल्या | बच्चों के हाथ व पैर दोनों में पहनाए जाने वाले कड़े |
| कुड़क | छोटे बच्चों के कान छेदकर पहने जाने वाले सोने-चाँदी या जस्ते के तार, जिनसे बाद में लूंग/बाली पहनी जाती है |
| कंठ / हंसुली | गले में पहनाया जाने वाला एक सुरक्षात्मक आभूषण |
| मुरकी | ठोस सोने की बनी कुडक (कान का आभूषण) |
राजस्थान में लाख की चूड़ियों (मणिहारी उद्योग) की एक समृद्ध व विविधतापूर्ण परंपरा है, जिसमें क्षेत्र व अवसर के अनुसार अनेक प्रकार प्रचलित हैं (हस्तशिल्प के रूप में विस्तृत विवरण अध्याय 3 में दिया जा चुका है — यहाँ हम विवाह-अनुष्ठान में इनके सामाजिक महत्व को समझेंगे)।
| लाख की चूड़ी का प्रकार | विवरण |
|---|
| पड़ला | सादा लाल मुटिया चूड़ा (हिंगल का चूड़ा/सुहाग का चूड़ा); विवाह-पूर्व बरी-पड़ला के साथ ससुराल से आता है |
| लहरिया चूड़ा | श्रावण मास में नवविवाहिताओं द्वारा पहना जाता है; इसमें सफेद, लाल, नीले व पीले रंग की तिरछी धारियाँ होती हैं |
| चौबन्दा चूड़ा | कोटा-बूँदी क्षेत्र में प्रचलित चार बंद का चूड़ा सेट |
| पंचबन्दा चूड़ा | भीलवाड़ा, अजमेर एवं जोधपुर में प्रचलित पाँच बंद का सेट |
| तीन लड़ा चूड़ा | गुर्जर समुदाय की स्त्रियों द्वारा विशेष रूप से पहना जाने वाला चूड़ा |
| पाट का चूड़ा (बरपोई) | उदयपुर क्षेत्र की आदिवासी महिलाओं द्वारा विवाह में पहना जाने वाला चाँदी के पाट का चूड़ा |
| वन्य चूड़ा | उदयपुर क्षेत्र की कुँवारी कन्याओं द्वारा पहना जाने वाला चूड़ा |
| धूपछांव / कड़ा सेट | लाख की दो मोटी चूड़ियों का सेट, जिसे "क्रांति" व "रेनबो" भी कहते हैं |
| अन्य प्रकार | चूड़ा, जलेबी का चूड़ा, चीर का चूड़ा |
25नवीनतम अपडेट
नवीनतम अपडेट: राजस्थान की पारंपरिक कुंदन-मीनाकारी व लाख की चूड़ियों के कारीगरों को अब जीआई टैग (GI Tag) व राष्ट्रीय हस्तशिल्प पुरस्कारों के माध्यम से प्रोत्साहित किया जा रहा है (अध्याय 3 से क्रॉस-रेफरेंस)। सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध राजस्थान सरकार ने बाल-विवाह रोकथाम हेतु "बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम" के प्रभावी क्रियान्वयन तथा दहेज-विरोधी हेल्पलाइन व महिला सुरक्षा हेतु "वूमेन हेल्पलाइन 181" जैसी पहलों को सुदृढ़ किया है। पारंपरिक वेशभूषा व आभूषण अब राजस्थान की "ब्रांड पहचान" के रूप में पर्यटन व फैशन-उद्योग में भी नए सिरे से लोकप्रिय हो रहे हैं, विशेषकर लहरिया, बंधेज व मोठड़ा प्रिंट (अध्याय 3 से क्रॉस-रेफरेंस) अंतरराष्ट्रीय फैशन मंचों पर भी प्रदर्शित किए जा रहे हैं।
🎯 सामाजिक जीवन: रीति-रिवाज, वेशभूषा एवं आभूषण — उत्तर लेखन कोण (RAS Mains) 5-अंक: 60-70 शब्द | 10-अंक: लगभग 120 शब्द
- सामाजिक कुरीतियों (सती, बाल-विवाह, दहेज, दास प्रथा) पर उत्तर में केवल परिभाषा न देकर, इनके उन्मूलन की ऐतिहासिक समय-रेखा (रियासतवार प्रतिबंध वर्ष) व सामाजिक-सुधारकों के योगदान को क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत करें।
- विवाह-संस्कार की रस्मों पर प्रश्न में इन्हें चार उप-चरणों (प्रारंभिक, विवाह-पूर्व, बारात-फेरे, विवाह-पश्चात) में विभाजित कर उत्तर दें — इससे उत्तर संरचित व स्कोरिंग बनता है।
- वेशभूषा व आभूषण पर उत्तर में केवल नाम न गिनाकर, इनके सामाजिक-प्रतीकात्मक महत्व (जैसे — बिछिया व मंगलसूत्र सुहाग के प्रतीक, पगड़ी सम्मान का प्रतीक, बोरला-रखड़ी वैवाहिक स्थिति दर्शाने वाले आभूषण) को अवश्य जोड़ें।
- सामाजिक कुरीतियों व सुधार आंदोलन पर उत्तर में यह स्पष्ट करें कि राजस्थान की रियासतें कई मामलों में (जैसे सती-प्रतिबंध, कन्या-वध विरोधी कानून) ब्रिटिश केंद्रीय कानून से भी पहले स्वयं सुधारवादी कदम उठा चुकी थीं — यह राजस्थान की रियासतों की प्रगतिशील सोच को दर्शाता है।
- यदि प्रश्न "राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान में वेशभूषा व आभूषण का योगदान" पर पूछा जाए, तो पर्यटन, फैशन-उद्योग व GI टैग जैसे आधुनिक आर्थिक आयाम को भी अवश्य जोड़ें।
📌 महत्वपूर्ण तथ्य
1. हिन्दू परंपरा में सोलह संस्कार होते हैं — गर्भाधान से लेकर अंत्येष्टि तक; समावर्तन संस्कार आज के "दीक्षांत समारोह" के समान है। 2. सती प्रथा को सहमरण/अन्वारोहण/सहगमन प्रथा भी कहते हैं; राजस्थान की अंतिम सती 1987 ई. में दिवराला (सीकर) की रूपकँवर थीं। 3. सती निवारण अधिनियम, 1829 लॉर्ड विलियम बैंटिक द्वारा पारित हुआ; रियासतों में सर्वप्रथम रोक 1822 ई. बूँदी रियासत में (विष्णुसिंह द्वारा) लगी। 4. बाल-विवाह पर सर्वप्रथम प्रतिबंधक कानून 1885 ई. में जोधपुर के प्रधानमंत्री सर प्रताप सिंह द्वारा लगाया गया; शारदा एक्ट 1929 अजमेर निवासी हरविलास शारदा के प्रयासों से बना। 5. दहेज निवारण अधिनियम 1961 में तथा विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 1856 में (ईश्वरचंद्र विद्यासागर के प्रयासों से लॉर्ड कैनिंग द्वारा) पारित हुआ। 6. डाकण प्रथा पर रोक मेवाड़ भील कोर के कमांडर जे.सी. ब्रुक द्वारा 1853 ई. में लगाई गई। 7. कन्या-वध प्रथा पर सर्वप्रथम रोक 1833 ई. में कोटा रियासत (राम सिंह द्वितीय) द्वारा लगाई गई। 8. मानव विक्रय प्रथा पर सर्वप्रथम रोक 1847 ई. में जयपुर के पॉलिटिकल एजेंट लुडलो के प्रयासों से टोंक व भीलवाड़ा जिले में लगी। 9. तोरण मारना, कन्यादान, हथलेवा (पाणिग्रहण) व सात फेरे विवाह के सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान माने जाते हैं। 10. राजस्थानी वेशभूषा की सबसे बड़ी विशेषता उसका "रंग-बिरंगापन" है, जो लोकोक्ति "मारू थारे देश में उपजै तीन रतन" में वर्णित है। 11. पगड़ी 13-15 मीटर लंबी होती है, जबकि पाग 14-20 मीटर लंबी होती है — साफा पाग से छोटा किंतु चौड़ा होता है। 12. पगड़ी के रंग मौसम व अवसर अनुसार बदलते हैं — गुलाबी (वसंत), लहरिया (श्रावण), सफेद (शोक), मोठड़ा (विवाह)। 13. जयपुर का 80 कली घाघरा विशेष रूप से प्रसिद्ध है; लहंगा घाघरे का छोटा रूप है, जो शेखावाटी में प्रचलित है। 14. बेसरी/मादलिया आभूषण किशनगढ़ शैली की प्रसिद्ध "बणी-ठणी" पेंटिंग के कारण भी विख्यात है (अध्याय 3 से क्रॉस-रेफरेंस)। 15. बिछिया व मंगलसूत्र सुहाग के प्रतीक आभूषण माने जाते हैं, जिन्हें विवाहित स्त्रियाँ धारण करती हैं। 16. रखड़ी व बोरला — दोनों सिर पर पहने जाने वाले आभूषण हैं, जो सुहाग के प्रतीक माने जाते हैं। 17. नथ नाक का सबसे भारी व प्रतिष्ठित आभूषण है, जबकि भंवरा मुख्यतः बिश्नोई जाति की महिलाओं द्वारा पहना जाता है। 18. लहरिया चूड़ा श्रावण मास में नवविवाहिताओं द्वारा पहना जाता है — इसमें सफेद, लाल, नीले व पीले रंग की तिरछी धारियाँ होती हैं। 19. महासती/अनुमरण प्रथा में पति की किसी निशानी के साथ सती होना शामिल था — राजस्थान की एकमात्र महासती रूठी रानी उमादे भटियाणी थीं। 20. आन प्रथा (मेवाड़ की स्वामीभक्ति शपथ-प्रथा) 1863 ई. में महाराणा शंभूसिंह के काल में समाप्त हुई।
26अध्याय सारांश
राजस्थान का सामाजिक जीवन जन्म से मृत्यु तक फैले एक विशाल रीति-रिवाज संजाल पर आधारित है — सोलह संस्कारों से लेकर विवाह की चालीस से अधिक रस्मों तक, और अंतिम विदाई की सुव्यवस्थित प्रक्रिया तक, हर पड़ाव पर समाज ने अपनी अनूठी परंपराएँ विकसित कीं। परंतु इसी सामाजिक ताने-बाने में सती प्रथा, बाल-विवाह, दहेज, दास प्रथा व डाकण प्रथा जैसी क्रूर कुरीतियाँ भी पनपीं, जिनके विरुद्ध राजस्थान की रियासतों व समाज-सुधारकों ने लंबा संघर्ष किया — कई मामलों में रियासतों ने ब्रिटिश केंद्रीय कानूनों से भी पहले सुधारवादी कदम उठाए, जो उनकी प्रगतिशील दृष्टि को दर्शाता है।
इसी सामाजिक जीवन का सबसे रंगीन व दृश्यमान पक्ष है राजस्थान की वेशभूषा व आभूषण-परंपरा — जहाँ पगड़ी सम्मान का प्रतीक बनी, ओढ़नी व घाघरे ने स्त्री-सौंदर्य को नया रूप दिया, तथा बोरला, रखड़ी, नथ व मंगलसूत्र जैसे आभूषणों ने सुहाग व सामाजिक स्थिति को दृश्यात्मक अभिव्यक्ति दी। ये परंपराएँ आज भी राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा हैं, तथा फैशन व पर्यटन उद्योग में नए आयाम प्राप्त कर रही हैं।
परीक्षा की दृष्टि से यह अध्याय विशेष रूप से RAS प्रारंभिक परीक्षा (Pre) के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है — रीति-रिवाजों के नाम-अर्थ मिलान, सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन-वर्ष व वेशभूषा-आभूषण के नाम जैसे प्रत्यक्ष तथ्यात्मक प्रश्न बार-बार पूछे जाते हैं। अगले अध्याय में हम राजस्थान की जनजातियों व उनकी परंपराओं का अध्ययन करेंगे, जो इसी सामाजिक जीवन के एक विशिष्ट, समृद्ध व विविधतापूर्ण आयाम को उजागर करेगा।
| प्रथा/परंपरा | श्रेणी | महत्वपूर्ण तथ्य |
|---|
| 16 संस्कार | जीवन-चक्र संस्कार | गर्भाधान से अंत्येष्टि तक कुल 16 संस्कार |
| विवाह रीति-रिवाज | सामाजिक उत्सव | सगाई से मुकलावा तक 40+ रस्में |
| मृत्यु संबंधी रीति-रिवाज | अंतिम संस्कार | अंत्येष्टि से श्राद्ध तक व्यवस्थित प्रक्रिया |
| सती प्रथा | सामाजिक कुरीति (उन्मूलित) | अंतिम सती 1987 ई., दिवराला (सीकर) |
| बाल विवाह प्रथा | सामाजिक कुरीति (उन्मूलित) | सर्वप्रथम रोक 1885 ई., जोधपुर |
| दास/बेगार प्रथा | सामाजिक कुरीति (उन्मूलित) | बंधित श्रम पद्धति अधिनियम 1976 |
| पुरुष वेशभूषा | वस्त्र परंपरा | पगड़ी सम्मान का प्रतीक |
| महिला वेशभूषा | वस्त्र परंपरा | ओढ़नी, घाघरा, लहरिया प्रसिद्ध |
| आभूषण परंपरा | श्रृंगार परंपरा | सिर से पैर तक 100+ आभूषण |
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