👘 अध्याय 11/13 — राजस्थान की कला एवं संस्कृति

सामाजिक जीवन — रीति-रिवाज, वेशभूषा एवं आभूषण

Social Life: Customs, Costumes & Jewellery | RAS Pre + Mains
📋 इस अध्याय में
  1. सामाजिक जीवन का परिचय — चार प्रमुख भाग
  2. सोलह संस्कार — परिचय एवं वर्गीकरण
  3. जन्म संबंधी रीति-रिवाज
  4. विवाह संबंधी रीति-रिवाज — प्रारंभिक चरण
  5. विवाह संबंधी रीति-रिवाज — विवाह-पूर्व की रस्में
  6. विवाह संबंधी रीति-रिवाज — बारात एवं फेरे
  7. विवाह संबंधी रीति-रिवाज — विवाह-पश्चात की रस्में
  8. मृत्यु संबंधी रीति-रिवाज
  9. सती प्रथा — इतिहास एवं उन्मूलन
  10. बाल विवाह प्रथा — इतिहास एवं कानून
  11. दहेज प्रथा, विधवा पुनर्विवाह एवं पर्दा प्रथा
  12. दास प्रथा, बेगार प्रथा एवं अन्य सामाजिक कुरीतियाँ
  13. जनजातीय एवं क्षेत्रीय सामाजिक प्रथाएँ
  14. राजस्थानी वेशभूषा — परिचय
  15. पुरुषों की वेशभूषा
  16. महिलाओं की वेशभूषा
  17. आदिवासियों की वेशभूषा
  18. राजस्थानी आभूषण — परिचय एवं इतिहास
  19. सिर एवं माथे के आभूषण
  20. कान, नाक एवं दाँत के आभूषण
  21. गले के आभूषण
  22. बाजू एवं अंगुली के आभूषण
  23. कमर, हाथ एवं पैर के आभूषण
  24. बच्चों के आभूषण एवं लाख की चूड़ियाँ
  25. नवीनतम अपडेट
  26. अध्याय सारांश

कल्पना कीजिए — एक नवजात शिशु के जन्म पर पूरा गाँव एक साथ खुश होता है, ननिहाल पक्ष से उपहारों की झड़ी लग जाती है, बहनें द्वार पर स्वस्तिक बनाती हैं। कुछ वर्षों बाद वही बच्चा दुल्हन बनकर विदा होती है — तोरण मारा जाता है, सात फेरे होते हैं, और अंत में "कोयलड़ी" के विरह-गीतों के बीच वह अपने पीहर को अलविदा कहती है। और फिर जीवन के अंत में, वही परिवार श्मशान की ओर चल पड़ता है, जहाँ मुखाग्नि दी जाती है, तेरहवीं होती है, और परिवार फिर से सामान्य जीवन की ओर लौटता है। यह है राजस्थान का सामाजिक जीवन — जन्म से मृत्यु तक हर पड़ाव पर एक रीति, एक रिवाज, एक परंपरा। इसी सामाजिक ताने-बाने में कभी सुंदर परंपराएँ पनपीं, तो कभी सती प्रथा, बाल-विवाह व दहेज जैसी कुरीतियाँ भी जड़ जमा बैठीं — जिनके विरुद्ध लंबा सामाजिक सुधार आंदोलन चला। और इसी सामाजिक जीवन को अभिव्यक्त करने वाला सबसे रंगीन माध्यम रहा राजस्थान की वेशभूषा व आभूषण — जहाँ पगड़ी सम्मान का प्रतीक बनी, तो बोरला-रखड़ी-कुंदन के आभूषणों ने स्त्री-सौंदर्य को नया आयाम दिया। इस अध्याय में हम राजस्थान के इसी संपूर्ण सामाजिक जीवन-चक्र को विस्तार से समझेंगे।

"मारू थारे देश में उपजै तीन रतन, इक ढोला दूजी मरवण तीजो कसूमल रंग" — राजस्थानी लोकोक्ति — मारवाड़ के तीन रत्नों का वर्णन (ढोला, मरवण एवं कसूमल रंग)

1सामाजिक जीवन का परिचय — चार प्रमुख भाग

राजस्थान के सामाजिक रीति-रिवाजों को मुख्यतः चार भागों में बाँटा गया है — जन्म संबंधी रीति-रिवाज, विवाह संबंधी रीति-रिवाज, मृत्यु संबंधी रीति-रिवाज, तथा अन्य सामाजिक प्रथाएँ (16 संस्कार सहित)। यह वर्गीकरण समझने से जीवन-चक्र के हर पड़ाव से जुड़ी परंपराओं को व्यवस्थित रूप से याद रखना आसान हो जाता है।

2सोलह संस्कार — परिचय एवं वर्गीकरण

हिन्दू परंपरा में मनुष्य के जीवन को शुद्ध व संस्कारित करने हेतु सोलह संस्कारों का विधान है, जिन्हें जन्म-पूर्व, बचपन, शिक्षा एवं गृहस्थ-अंतिम — चार चरणों में बाँटा जा सकता है।

संस्कारअर्थ एवं उद्देश्य
गर्भाधानस्वस्थ व संस्कारी संतान के लिए गर्भाधान का संकल्प
पुंसवनगर्भस्थ शिशु के मानसिक व शारीरिक विकास के लिए (तीसरे-चौथे महीने में)
सीमन्तोन्नयन (मारवाड़ में "अगरणी")गर्भवती माँ को मानसिक शांति व प्रसन्न रखने के लिए
जातकर्मजन्म के समय पिता द्वारा शिशु को शहद चटाना व आशीर्वाद देना
नामकरणशिशु का नाम रखना; जन्म के 11वें या 12वें दिन
निष्क्रमणबच्चे का पहली बार घर से बाहर निकलना (सूर्य व चंद्रमा के दर्शन)
अन्नप्राशन6 महीने बाद बच्चे को पहली बार अन्न (ठोस भोजन) खिलाना
चूड़ाकर्म (मुंडन)सिर के बाल कटवाना ताकि शुद्ध व तेज बढ़े
कर्णवेधकान छेदना (स्वास्थ्य व शिक्षा के दृष्टिकोण से)
विद्यारंभबच्चे को अक्षर-ज्ञान व प्रारंभिक शिक्षा की शुरुआत कराना
उपनयन (जनेऊ)गुरु के पास शिक्षा हेतु जाना व जनेऊ धारण करना
वेदारंभवेदों व शास्त्रों की गंभीर शिक्षा शुरू करना
केशांतकिशोरावस्था के अंत में पहली बार दाढ़ी-मूँछ बनाना
समावर्तनशिक्षा पूरी कर गुरुकुल से विदाई (आज का दीक्षांत समारोह)
विवाहगृहस्थ जीवन में प्रवेश करना व समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाना
अंत्येष्टिमृत्यु के पश्चात अंतिम विदाई व अंतिम संस्कार

3जन्म संबंधी रीति-रिवाज

बच्चे के जन्म से जुड़ी अनेक छोटी-बड़ी रस्में राजस्थान में प्रचलित हैं, जो गर्भावस्था से लेकर शैशवावस्था तक परिवार व समाज को उत्सव में बाँधती हैं।

रीति-रिवाजअर्थ
जामणाबच्चे के जन्म पर ननिहाल पक्ष की ओर से भेजे जाने वाले उपहार व कपड़े
ढूँढहोली के आसपास छोटे बच्चों के लिए ननिहाल से आने वाले उपहार व उत्सव
न्हावण / न्हाणबच्चे व माँ का प्रथम औपचारिक स्नान (शुद्धिकरण की रस्म)
सतवाड़ौ (मारवाड़ में "अगरणी")प्रसव के सातवें दिन होने वाली पारंपरिक रस्म
पनघट कुआँ पूजन (जलवा पूजन)जल के देवता की पूजा तथा माँ का प्रथम बार घर से बाहर निकलना
आख्याबच्चे के जन्म के आठ दिन बाद बहन-बेटियों द्वारा घर के द्वार पर साँतिया (स्वस्तिक) बनाना
कोथलाबेटी का पहला प्रसव होने पर उसके पीहर वालों द्वारा जवाई व उसके संबंधियों को भेंट देना
पंचमासीगर्भावस्था के 5वें महीने में की जाने वाली रस्म (शिशु की कुशलता के लिए)
दसोटणबच्चे के जन्म के 10वें दिन किया जाने वाला उत्सव व नामकरण
सुहावड़ / कुमकुमप्रसूता (माँ) के लिए बनाया जाने वाला पौष्टिक भोजन या उससे जुड़ी रस्म

4विवाह संबंधी रीति-रिवाज — प्रारंभिक चरण

राजस्थानी विवाह एक बहु-चरणीय सामाजिक उत्सव है, जिसमें दर्जनों छोटी-बड़ी रस्में शामिल होती हैं। सबसे पहले हम विवाह के प्रारंभिक चरण (रिश्ता तय होने से लेकर तिथि निर्धारण तक) की रस्मों को समझेंगे।

रीति-रिवाजअर्थ
सगाईविवाह का प्रारंभिक रिश्ता तय होना
टीकावधू पक्ष द्वारा वर के माथे पर तिलक लगाकर रिश्ते की पुष्टि करना
चीकणी (रावणी/गोद भरना)सगाई के बाद वधू के लिए वर पक्ष द्वारा भेजे गए कौथली उपहार व मिठाई
पीली चिट्ठीविवाह की शुभ तिथि तय होने पर वधू पक्ष द्वारा भेजा गया निमंत्रण पत्र
इकताईवर-वधू के कपड़े बनाने के लिए दर्जी द्वारा पहले मुहूर्त से नाप लेना
गणपति पूजनविघ्नहर्ता गणेश की पूजा व प्रथम निमंत्रण-पत्र उन्हें अर्पित करना
पत्रिकाविवाह का निमंत्रण-पत्र

5विवाह संबंधी रीति-रिवाज — विवाह-पूर्व की रस्में

रीति-रिवाजअर्थ
रीतसगाई के समय वर पक्ष द्वारा वधू को दिए जाने वाले जेवर व कपड़े
मुगधणारसोई के लिए सूखी लकड़ी (ईंधन) का पूजन व उसे लाना
पावणादामाद का ससुराल में विशेष आदर-सत्कार
बानदूल्हा-दुल्हन को उबटन लगाना और घर से बाहर न निकलने की पाबंदी
सीठणेमहिलाओं द्वारा हँसी-ठिठोली में गाए गाली गीत
कामणदूल्हे को जादू-टोने या बुरी नजर से बचाने हेतु गाए जाने वाले गीत
मौली (कांकनडोर)विवाह से दो दिन पहले दूल्हा-दुल्हन को धागे में लोहा, लौंग व कौड़ी बाँधकर सात गाँठें लगाना — बुरी नजर से बचाव का प्रतीक
बना-बनीदूल्हा (बना) व दुल्हन (बनी) के लिए गाए जाने वाले विवाह लोकगीत
बत्तीसी / नूतनामाँ द्वारा अपने पीहर (भाई) को भात (मायरा) भरने का न्योता देना
मायरा (भात)मामा द्वारा अपनी बहन के बच्चों की शादी में कपड़े, जेवर व उपहार लाना
तोरणवधू के घर के द्वार पर लटके तोरण को दूल्हे द्वारा (भाले/तलवार से) मारना — विजय का प्रतीक
सुहाग थालवधू को सुहाग-सामग्री अर्पित करना
बिनोटावर व वधू के लिए विशेष रूप से बनाई गई शादी की जूतियाँ
कन्यावलवधू पक्ष के करीबी रिश्तेदारों द्वारा फेरों तक रखा जाने वाला उपवास
वधू का तेल चढ़ानावधू को तेल व उबटन चढ़ाकर शुद्धिकरण करना

6विवाह संबंधी रीति-रिवाज — बारात एवं फेरे

रीति-रिवाजअर्थ
निकासी (बिन्दोरी)दूल्हे का घोड़ी पर बैठकर गाँव/शहर में भ्रमण करना (बिंदोली नृत्य — झालावाड़)
सांकड़ी रातविवाह से ठीक पहले वाली रात का उत्सव व रात्रि-जागरण
कन्यादानविवाह के द्वारा कन्या (वधू) की जिम्मेदारी माता-पिता द्वारा वर को सौंपने की रस्म
जान्नोटणबारात का सामूहिक भोज या बारात की व्यवस्था
बारातवर पक्ष का वधू के घर प्रस्थान करना
कुँवारी जान का भातबारात के फेरों से पहले वधू पक्ष द्वारा दिया जाने वाला भोजन
कलेवाकुँवर दूल्हे को वधू पक्ष की महिलाओं द्वारा कराया जाने वाला नाश्ता
कोयलड़ीबेटी की विदाई के समय गाए जाने वाले विरह व विदाई गीत
परणी जान का जीमणफेरों के बाद बारात को दिया जाने वाला मुख्य शाही भोज
टूँटयापुरुषों के बारात जाने के बाद घर की महिलाओं द्वारा किया जाने वाला स्वांग/नाटक
सामेलावधू पक्ष द्वारा बारात का स्वागत व मिलनी करना
बरी / पड़लावर पक्ष द्वारा वधू के लिए लाए गए गहने व शादी का जोड़ा
हथबौलणोनई बहू का प्रथम परिचय
सीखविदाई के समय मेहमानों व बारातियों को दिया जाने वाला उपहार
ओझणवधू को दहेज या उपहार सामग्री देना
पहरावणी / रंगबरीबारात विदाई के समय वधू पक्ष द्वारा बारातियों को दी जाने वाली भेंट या उपहार
हथलेवा (पाणिग्रहण)चंवरी (फेरों के मंडप) में बैठने के बाद वधू का हाथ वर के हाथ में देना
फेरेअग्नि के सात फेरे लेकर वैवाहिक बंधन में बँधना

7विवाह संबंधी रीति-रिवाज — विवाह-पश्चात की रस्में

रीति-रिवाजअर्थ
मुकलावा (गौना)शादी के कुछ समय बाद वधू का स्थायी रूप से ससुराल जाना
आँणौशादी के बाद पहली बार वधू का वापस पीहर आना
पैसरावधू का ससुराल में पहली बार गृह-प्रवेश
जुआ-जुईथाली में दूल्हा-दुल्हन का अंगूठी ढूँढने का खेल
बढ़ारविवाह के अगले दिन आयोजित सार्वजनिक प्रीति-भोज
बरोटीविवाह के बाद वधू के स्वागत में किया गया भोज
सोटा-सोटीदूल्हा-दुल्हन द्वारा छड़ी से एक-दूसरे को मारने की रस्म
छातशादी के बाद कुलदेवी-देवता की पूजा की रस्म
डांगड़ी राततीर्थ से लौटकर रात्रि-जागरण
बाला / चुनड़ीननिहाल पक्ष से दी जाने वाली विशेष ओढ़नी
कुँवर जोड़दूल्हे और उसके साथ आए कुँवर की विशेष पोशाक
बयाणौ / बिहाणाशुभ कार्यों के अंत में दिया जाने वाला दान
जात देनाकुल देवता के मंदिर जाकर माथा टेकना
हीरावणीविवाह के समय नववधू को दिया गया कलेवा

8मृत्यु संबंधी रीति-रिवाज

राजस्थान में मृत्यु से जुड़ी रस्में भी अत्यंत व्यवस्थित व चरणबद्ध हैं — इनका उद्देश्य मृतक की आत्मा की शांति व परिवार को शोक से सामान्य जीवन की ओर लौटाना है।

रीति-रिवाजअर्थ
अंत्येष्टिमृत शरीर को बाँस/लकड़ी की शैय्या पर श्मशान ले जाना; शव को चिता पर रखकर मुखाग्नि देना
बखेर / उछालश्मशान ले जाते समय रास्ते में पैसे बिखेरना
पिंडदानश्मशान ले जाते समय पहले चौराहे पर आटे का पिंड देना
लांपा / मुखाग्निअंत्येष्टि में सबसे बड़े बेटे/निकट भाई द्वारा अग्नि देना
सांतरवाड़ा / मुगटीअंत्येष्टि तक (12 दिन तक) घर/पड़ोस में चूल्हा न जलाना, लोगों का सांत्वना हेतु आना-जाना
दोषणियाँ12वें दिन पानी से भरे जाने वाले घटक (मटके)
पानीवाड़ाव्यक्ति की मृत्यु के समय सब लोग एकत्र होकर स्नान करके सांत्वना देना
भदर / भद्दरशोक में बाल, दाढ़ी, मूँछ कटवाना
कपाल क्रियाउत्तराधिकारी द्वारा दाह-संस्कार के समय शव-क्रिया के कपाल को फोड़कर उसमें घी डालने की प्रक्रिया
फूल एकत्र करनामृत्यु के तीसरे दिन अस्थियाँ चुनकर कलश में रखना (हरिद्वार में विसर्जन)
तीये की बैठकतीसरे दिन शाम को बैठक; पुष्प अर्पण व मौन प्रार्थना
मौसर (औसर/नुक्ता/जोसर)मृत्यु-भोज; जीते जी की जाने वाली बैठक को "जोसर" कहते हैं
जान्नोटणवर पक्ष की ओर से दिया जाने वाला भोज
रियाणअफीम या चाय के साथ मेहमानों का पारंपरिक मेल-मिलाप
नुक्तामौसर पर सगे-संबंधियों को दिया जाने वाला उपहार
लैण / मूकांणमृतक के संबंधियों से संवेदना प्रकट करना
महीने का घड़ा / छमाही / बारह माह का घड़ामृत्यु के क्रमशः एक माह, छह माह व एक वर्ष बाद किया जाने वाला यज्ञानुष्ठान व भोज
बैकुण्ठीमृत व्यक्ति को श्मशान ले जाने की डोली/शैय्या
दण्डोतबैकुण्ठी के आगे उसके रिश्तेदारों द्वारा किया गया प्रणाम
नारायण बलिमृतक की आत्मा के भटकाव को रोकने हेतु किया गया संस्कार
श्राद्धभाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक — कुल 16 दिन
आदि श्राद्धमृत्यु के 11वें दिन किया जाने वाला श्राद्ध
मौसर पर पगड़ी बांधनामौसर पर बड़े पुत्र को उत्तराधिकारी के रूप में पगड़ी बाँधना
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9सती प्रथा — इतिहास एवं उन्मूलन

सती प्रथा राजस्थान की सर्वाधिक क्रूर सामाजिक कुरीतियों में से एक थी, जिसके विरुद्ध औपनिवेशिक काल में व्यापक सुधार आंदोलन चला। इसे सहमरण प्रथा, अन्वारोहण अथवा सहगमन प्रथा भी कहा जाता है — इसमें पति की मृत्यु के पश्चात पत्नी अपने पति के शव के साथ चिता पर आरोहण करती थी।

पहलूविवरण
राजस्थान की प्रथम ज्ञात सती (साक्ष्य)जोधपुर सेनापति राणुक की पत्नी संपल्ल कँवर — घटियाला शिलालेख के प्रमाण से (नीचे सावधानी-टिप्पणी देखें)
राजस्थान में सर्वप्रथम रोक का प्रयाससवाई जयसिंह द्वितीय (जयपुर)
रियासतों द्वारा गैर-कानूनी घोषित (क्रमशः)1822 ई. बूँदी रियासत (विष्णुसिंह) → 1823 ई. कोटा रियासत → 1825 ई. बीकानेर रियासत → 1830 ई. अलवर रियासत → 1844 ई. जयपुर रियासत
सती निवारण अधिनियम, 1829लॉर्ड विलियम बैंटिक द्वारा (सर्वप्रथम बंगाल में 1829, 1830 ई. से पूरे देश में लागू)
अधिनियम के तहत राज्य में सर्वप्रथम प्रतिबंधअलवर रियासत द्वारा
जयपुर में सर्वप्रथम रोक का प्रयास1844 ई., एजेंट लुडलो के प्रयासों से, सवाई राम सिंह द्वितीय के समय
समाधि निवारण अधिनियम, 1861जीवित समाधि को आत्महत्या माना गया
राजस्थान की अंतिम सती1987 ई., दिवराला गाँव (सीकर) निवासी मालसिंह/मानसिंह की पत्नी रूपकँवर
राजस्थान सरकार का कानूनी कदमसती निवारण अध्यादेश, 1987 ई. में पारित
महासती / अनुमरण प्रथापति की किसी निशानी (वस्तु/पगड़ी) के साथ सती होने वाली महिला
राजस्थान की एकमात्र महासतीरूठी रानी उमादे भटियाणी
💡 सावधानी — घटियाला शिलालेख की तिथि

राजस्थान की प्रथम ज्ञात सती के प्रमाण स्वरूप उल्लिखित "घटियाला शिलालेख" सामान्यतः 9वीं शताब्दी (लगभग 861 ई., कक्कुक शिलालेख) का माना जाता है। कुछ स्रोतों में इसे भूलवश "1861 ई." लिख दिया जाता है, जो तथ्यात्मक रूप से असंभव है — क्योंकि 1861 ई. तक तो सती प्रथा पर ब्रिटिश काल में कानूनी प्रतिबंध (1829) भी लग चुका था। परीक्षा में इस शिलालेख की तिथि लगभग 9वीं शताब्दी (861 ई. के आसपास) ही लिखें, "1861 ई." कभी न लिखें।

पहलूविवरण
कन्या-वध प्रथाकन्या के जन्म लेते ही उसे अफीम देकर या गला दबाकर मार दिया जाता था
सर्वप्रथम गैर-कानूनी घोषित1833 ई. कोटा रियासत (राम सिंह द्वितीय, पॉलिटिकल एजेंट विल्किंसन के प्रयास) → 1834 ई. बूँदी रियासत (महाराव बुद्धसिंह) → 1837 ई. बीकानेर (महाराजा रतनसिंह) → 1839 ई. जोधपुर (महाराजा मानसिंह) → 1844 ई. उदयपुर व जयपुर द्वारा

10बाल विवाह प्रथा — इतिहास एवं कानून

पहलूविवरण
भारत में बाल-विवाह का प्रथम लिखित प्रमाणहर्षवर्धन के समय से मिलता है — उन्होंने अपनी अल्पवयस्क बहन राजश्री का विवाह कन्नौज नरेश ग्रहवर्मन से करवाया
विवाह की वर्तमान निश्चित आयुलड़की — 18 वर्ष; लड़का — 21 वर्ष
सर्वप्रथम बाल-विवाह प्रतिबंधक कानून1885 ई. में, जोधपुर के प्रधानमंत्री सर प्रताप सिंह द्वारा (महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय के समय)
अन्य रियासतों में रोक1844 ई. में बीकानेर व जयपुर रियासत द्वारा
शारदा एक्ट, 1929अजमेर निवासी हरविलास शारदा के प्रयासों से; न्यूनतम आयु — लड़का 18 वर्ष, लड़की 14 वर्ष
संशोधन, 1978 (बाल विवाह अंकुश निवारण अधिनियम)न्यूनतम आयु — लड़का 21 वर्ष, लड़की 18 वर्ष
सर्वप्रथम प्रयाससवाई जयसिंह द्वितीय द्वारा नियम बनाने का प्रयास
वाल्टर कृत राजपूत हितकारिणी सभाइस सभा ने बाल-विवाह प्रथा पर नियम बनाए

11दहेज प्रथा, विधवा पुनर्विवाह एवं पर्दा प्रथा

दहेज प्रथा में विवाह के समय अथवा विवाह के उपरांत वधू पक्ष द्वारा विवाह की आवश्यक शर्त के रूप में वर पक्ष को धन या संपत्ति दी जाती है — इसके विरुद्ध दहेज निवारण अधिनियम, 1961 तथा भारत सरकार का दहेज निवारक कानून, 2006 पारित किया गया।

विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856 ईश्वरचंद्र विद्यासागर के प्रयासों से लॉर्ड डलहौजी के समय बना और जुलाई 1856 में लॉर्ड कैनिंग ने इसे लागू किया — इस प्रथा (विधवा पुनर्विवाह के निषेध) का सर्वाधिक विरोध स्वामी दयानंद सरस्वती ने किया था। पर्दा प्रथा मध्यकालीन इतिहास में मुस्लिम आक्रांताओं की बुरी नजर से बचने हेतु प्रचलन में आई, जो धीरे-धीरे हिन्दू समाज की एक नैतिक/सामाजिक प्रथा बन गई।

रिवाजविवरण
नातरा / आणापति की मृत्यु के पश्चात विधवा का किसी अन्य पुरुष से दूसरा विवाह
गधराणौदेवर के साथ पुनर्विवाह करना
कागली / नाताविधवा के पुनर्विवाह के अवसर पर प्रति-विवाह एक रुपया कर लिया जाता था
क्षेत्रीय नामनाता — बीकानेर में; छेली राशि — जयपुर में; नाता कागली — कोटा में; नाता बराड़ — मेवाड़ में

12दास प्रथा, बेगार प्रथा एवं अन्य सामाजिक कुरीतियाँ

प्रथाविवरण
बेगार प्रथा / हाली प्रथासामंतों व राजाओं द्वारा अपनी रैयत से मुफ्त सेवाएँ लेना; बूँदी रियासत में महिलाओं से भी बेगार ली जाती थी
सागड़ी / वती प्रथाअविवाहित पुरुष या विधुर द्वारा अविवाहित स्त्री या विधवा से आपसी सहमति से विवाह करना; सागड़ी निवारण अधिनियम, 1961
बंधुआ मजदूर प्रथासेठ-साहूकार द्वारा पैसे उधार देकर किसी धरेजा व्यक्ति को कम मेहनताने/ब्याज की राशि के बदले घरेलू नौकर बनाकर काम करवाना; बंधित श्रम पद्धति अधिनियम, 1976
जौहर / जम्मरयुद्ध में पराजय निश्चित होने पर राजपूत महिलाओं द्वारा सामूहिक आत्मदाह (जौहर); पुरुषों द्वारा किए जाने वाले साके को "जम्मर" (शाका) कहा जाता है
आन प्रथामेवाड़ में प्रचलित स्वामीभक्ति की शपथ-प्रथा; 1863 ई. में महाराणा शंभूसिंह के काल में समाप्त
डावरिया प्रथाउच्च राजघरानों में कन्या की विदाई के समय साथ भेजी जाने वाली कुँवारी कन्याएँ (दहेज के साथ दास-दासी देने हेतु)
चौधानकोटा रियासत में महिलाओं की खरीद-फरोख्त पर वसूला जाने वाला कर; सर्वप्रथम रोक — 1831 ई. में कोटा रियासत द्वारा
मौताणा प्रथाआदिवासियों में मृत्यु का हर्जाना वसूलना
मानव विक्रय प्रथासामंती समाज में लड़के-लड़कियों को खरीदा जाता था; सर्वप्रथम रोक — 1847 ई. में जयपुर के पॉलिटिकल एजेंट लुडलो के प्रयासों से, टोंक तथा भीलवाड़ा जिले में
समाधि प्रथाकिसी साधु/महापुरुष द्वारा जीवित अवस्था में गड्ढा खोदकर अथवा पानी में मृत्यु का वरण करना
तागा प्रथाआत्महत्या के लिए शरीर पर शस्त्र आदि से घाव करवाना
पासवान / खवासनराजा द्वारा किसी दासी को अंगूठी/आभूषण पहनने की अनुमति देने पर उस दासी को "पासवान" कहा जाता था
संथारा / संल्लेखना प्रथाजैन धर्म से संबंधित प्रथा — अन्न व जल का त्याग कर अपने प्राण त्यागना

13जनजातीय एवं क्षेत्रीय सामाजिक प्रथाएँ

प्रथासमुदाय / विवरण
डाकण प्रथाआदिवासियों में स्त्रियों को "डाकन" कहकर मार देने की प्रथा; रोक — मेवाड़ भील कोर के कमांडर जे.सी. ब्रुक ने 1853 ई. में, स्वरूपसिंह के समय; भील पुरुष द्वारा पंच लोगों के समक्ष नई साड़ी के किनारे में पैसे बाँधकर साड़ी को चौड़ाई की ओर से फाड़ने पर तलाक माना जाता था (छेड़ा-फाड़ना प्रथा)
नाता प्रथासाँसी जनजाति में प्रचलित — पत्नी का अपने पति के जीते जी बिना फेरे किसी अन्य पुरुष के साथ रहने लगना
चारी प्रथासाँसी जनजाति में प्रचलित — दहेज लड़की वाले न देकर लड़के वाले देते हैं
कूकड़ी रस्मविवाह से पहले लड़की द्वारा चरित्र की परीक्षा देना
दापा प्रथाजनजातियों में वर पक्ष द्वारा वधू पक्ष को वधू-मूल्य देना
भोर-भू प्रथागरासिया जनजाति में नवजात शिशु की नाल काटने की प्रथा
अट्टा-सट्टा विवाह प्रथालड़की के बदले में उसी घर की लड़की को बहू के रूप में लेने की प्रथा
ओजकौरात्रि-भर जागरण करना
नांगलनया मकान बनाने के बाद नवनिर्मित गृह के प्रवेश की रस्म
दहेज (चारी प्रथा से भिन्न)साँसी जनजाति में दहेज लड़के वाले देते हैं (सामान्य प्रथा के विपरीत)

14राजस्थानी वेशभूषा — परिचय

किसी भी क्षेत्र की वेशभूषा वहाँ की जलवायु, उपलब्ध संसाधनों व संस्कृति से प्रभावित होती है। राजस्थानी वेशभूषा की सबसे मुख्य विशेषता इसका "रंग-बिरंगापन" है — रेगिस्तान के नीरस भूरे-पीले परिदृश्य के बीच राजस्थानी वस्त्रों के चटख रंग जीवन का उल्लास भरते हैं। इसीलिए कहा गया है — "मारू थारे देश में उपजै तीन रतन, इक ढोला दूजी मरवण तीजो कसूमल रंग।"

15पुरुषों की वेशभूषा

वस्त्रविवरण
पगड़ीधूप से रक्षा हेतु सिर पर बाँधी जाती थी; मान-सम्मान का प्रतीक, इसीलिए कहावत — "पगड़ी की लाज रखना"; लंबाई 13-15 मीटर (पाग से छोटी)
पाग14 से 20 मीटर तक लंबा वस्त्र (पगड़ी से बड़ा)
साफापाग से छोटा किंतु चौड़ा; एक छोर सिर से कमर के नीचे तक लटकता है
पेचागोल्डन जरी युक्त सिर वस्त्र
पोतिया / खोंगा / फालियाभीलों द्वारा पगड़ी के स्थान पर बाँधे जाने वाले सिर के अन्य वस्त्र
अंगरखीपुरुषों द्वारा ऊपरी भाग में पहना जाने वाला वस्त्र; प्रकार — तनसुख, दुतई, गाबा, गदर, मिरजाई, डाढ़ी, कानो, डगला, बुगतरी, बंडी
चुगा / चोगाअंगरखी के ऊपर पहना जाने वाला वस्त्र (सवाई माधोसिंह द्वारा प्रचलित)
अचकनअंगरखी का संशोधित-विस्तृत रूप
धोतीकमर में पहना जाने वाला वस्त्र
पछेवड़ेसर्दी में धोती के ऊपर ओढ़ने का वस्त्र
अंगोछाकंधे पर रखा जाने वाला वस्त्र
जामागर्दन से घुटनों तक का वस्त्र
आतमसुखसर्दी में ऊपर से नीचे तक पहना जाने वाला वस्त्र, कश्मीरी फिरन जैसा
बिरजस / ब्रीचेसचूड़ीदार पायजामा, उत्सव व घुड़सवारी में पहना जाता है
कमरबंद / पटकाकमर पर बाँधा जाने वाला वस्त्र, तलवार आदि रखने हेतु
पायजामा / सूथनढीला वस्त्र, घुटनों से नीचे तक

16महिलाओं की वेशभूषा

वस्त्रविवरण
चोलीवक्षस्थल को ढकने हेतु पहना जाने वाला वस्त्र (ब्लाउज)
कापड़ीपीठ पर तनियों से बँधने वाली चोली
आंगीबिना बाँह वाली चोली
कुर्तीबिना बाँह की, कांचली के नीचे पहनी जाने वाली
कांचलीबाँह-युक्त चोली, मारवाड़ में अधिक प्रचलन
घाघरा / पेटीकोटकमर से एड़ी तक पहना जाने वाला वस्त्र, कलियों को जोड़कर घेरदार (जयपुर का 80 कली घाघरा प्रसिद्ध)
लहंगाघाघरे का छोटा रूप (शेखावाटी में प्रचलित)
घघरीकुँवारी लड़कियों का कमर से घुटने तक का वस्त्र (लहंगे का छोटा रूप)
सलवारकमर से लेकर पाँवों में पहने जाने वाला वस्त्र
शरारासलवार रूपी वस्त्र, जो शरीर के निचले हिस्से में पैरों में पहना जाता है
ओढ़नीकुर्ती, कांचली व घाघरे के ऊपर शरीर पर पहना जाने वाला वस्त्र
चन्द्रकलाबहुमूल्य ओढ़नी
कटकी (पांवली भांत)अविवाहित लड़कियों की जांघों तक की ओढ़नी
तारा भांतआदिवासियों की सर्वाधिक लोकप्रिय ओढ़नी
लहरियाश्रावण मास में पहनी जाने वाली ओढ़नी
मोठड़ामोठ के दाने जैसी एक-दूसरे को काटती हुई धारीदार लहरिया (जोधपुर)
"समुद्र लहर" लहरियाजयपुर में प्रचलित
दामणीमारवाड़ की लाल रंग की ओढ़नी
पोमचादुल्हन को दी जाने वाली लाल रंग की ओढ़नी
अन्य ओढ़नियाँचुनरी, घनक, ज्वार भांत, केरी भांत, लहर भांत
घूघीऊन से बनी, सर्दी में ओढ़ी जाने वाली

17आदिवासियों की वेशभूषा

वस्त्रविवरण
अंगोछाभील पुरुषों का सिर पर बाँधने का वस्त्र
पोतिया / पोत्याआदिवासियों में पगड़ी के स्थान पर बाँधा जाने वाला साफा
ढेपाड़ा व खोयतुभील पुरुषों की तंग धोती (ढेपाड़ा) व लंगोटी (खोयतु)
जामसाईआदिवासियों की विवाह के अवसर की फूल-पत्तियों वाली साड़ी
नान्दणा / नांदड़ाआदिवासी स्त्रियों का नीले रंग की छींट का प्राचीनतम वस्त्र
फड़काकथौड़ी महिलाओं की मराठी शैली की साड़ी
सिन्दूरीभीलों की शादी की लाल साड़ी
पिरियाभील दुल्हन का पीला लहंगा
कछाबूभील महिलाओं का घुटने तक का घाघरा
रेजासहरिया विवाहित महिलाओं का वस्त्र
रेनसाईलहंगे की छींट (काली जमीन पर लाल-भूरे बूंटे)
खूसनीकंजर महिलाओं का तंग पायजामा
लूगड़ा (अंगोछा साड़ी)सफेद जमीन पर लाल बूंटों वाला वस्त्र
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18राजस्थानी आभूषण — परिचय एवं इतिहास

आभूषण का शाब्दिक अर्थ है — गहना, अलंकार। शरीर को सुंदर व आकर्षक बनाने के लिए इन आभूषणों का प्रयोग किया जाता है। राजस्थान में प्राचीन काल से ही मानव सौंदर्य-प्रेमी रहा है — कालीबंगा व आहड़ सभ्यता के युग की स्त्रियाँ मृण्मय (मिट्टी) तथा चमकीले पत्थरों की मणियों से बने आभूषण पहनती थीं; शुंग काल में स्त्रियाँ मिट्टी के आभूषण प्रयोग में लेती थीं, तथा उस समय हाथीदाँत के बने गहनों का भी उपयोग किया जाता था। धीरे-धीरे समयानुसार आभूषणों में परिवर्तन आया, और वर्तमान में सोना, चाँदी, ताँबा आदि धातुओं से निर्मित आभूषणों का चलन है।

19सिर एवं माथे के आभूषण

आभूषणविवरण
बोर / बोरलागोल आकार का आभूषण जो सिर पर पहना जाता है (इसके चाँद की आकृति वाले हिस्से को "मोड़ीया" कहते हैं)
रखड़ीसुहाग का प्रतीक, बोरला के समान सिर का आभूषण
टीका / टिकड़ास्त्रियों के सिर पर पहना जाने वाला आभूषण
टोटियास्त्रियों के भाल (ललाट) का एक विशेष आभूषण
शीशफूलसिर पर पीछे की तरफ सोने की बारीक साँकल जैसा पहना जाने वाला आभूषण
मांगटीका / मांगफूलमाँग में पहना जाने वाला आभूषण
सेलड़ौ / सैलड़ौस्त्रियों की वेणी (चोटी) में गूँथा जाने वाला आभूषण
टीका (रखड़ी/बोरला के आगे)तिलक वाला फूल की आकृति का आभूषण
बिंदी / टिक्कीसुहागिन स्त्रियों द्वारा ललाट पर लगाया जाने वाला पारंपरिक चिह्न
फूलगूंधरशीश (सिर) पर गूँथा जाने वाला एक विशेष रजत (चाँदी) आभूषण
गोफणस्त्रियों के बालों की वेणी (चोटी) में गूँथा जाने वाला आभूषण
अन्य सिर आभूषणकाचर, सरकयारौ, साँकली, तावीज, सिणगारपट्टी, सूवालळकौ, मैण, मोरमंडली, गेडी, तिलकमणी, खेचा देवाड़

20कान, नाक एवं दाँत के आभूषण

आभूषणविवरण
झुमका / झुमणौ / झूमरस्त्रियों के कान का एक विशिष्ट आभूषण
टोटीगोल चकरी के समान आभूषण, जिसके पीछे कान में पहनने के लिए एक डण्डी लगी होती है
बाड़लोगले में पहना जाने वाला एक पारंपरिक आभूषण
छैलकड़ी / बुजट्टीकान में पहनी जाने वाली एक विशेष प्रकार की कड़ी या आभूषण
कर्णफूलकान के निचले भाग में पहना जाने वाला पुष्पाकार आभूषण, जिसमें अक्सर नगीने जड़े होते हैं
मेमंदमसाले वाले लौंग के आकार का सोने या चाँदी के तार से बना आभूषण, जिस पर घुंडीदार नगीना लगा होता है
मोरूवरकान पर लटकाया जाने वाला मोर की आकृति जैसा सुंदर आभूषण
अन्य कान के आभूषणझेलो, कुड़किल, कोकरूँ, गुड़दौ, ठोरियौ, डरगलियौ, डुगरली, तड़कली, पत्तीसुरलिया, पासौ, पीपळपान, बाळा, बूझली, माकड़ी, लटकन, वेड़लौ, संदोल, झालरौ, सुरगवाली, सुरळियौ, जमेला, भचूरिया, मुरकी, मुरकियाँ (पुरुषों के कान का), मादीकड़
हंसलीविशेषकर छोटे बालकों को उनकी "हंसली" खिसकने से बचाने के लिए पहनाया जाने वाला धातु के मोटे तार से बना गोलाकार आभूषण
नथगोलाकार और रत्नों से जड़ित सोने का भारी नाक का आभूषण
भंवरानथ के समान ही आभूषण, जो अधिकांशतः बिश्नोई जाति की महिलाओं द्वारा पहना जाता है
बेसरी / मादलियानाक का एक विशिष्ट आभूषण, जिसमें नाचता हुआ मोर का चिन्ह अंकित होता है (यह किशनगढ़ शैली की "बणी-ठणी" पेंटिंग के कारण भी प्रसिद्ध है — अध्याय 3 से क्रॉस-रेफरेंस)
अन्य नाक के आभूषणभंवरकड़ी, बिजली, लूंग, बारी, काँटा, भोगली, बुलाक, चोप, कोकौ, खीवण, नकफूल, नकेसर, वेणवेसर
रखन / नक्कसदाँतों के ऊपर सोने के पत्तर की खोल (Plating) बनाकर चढ़ाई जाने वाली; मेवात क्षेत्र में कंठ का आभूषण भी "नक्कस" कहलाता है
चूंप / मेखदाँतों के बीच में सोने की छोटी कील जड़वाना; स्त्री-पुरुष दोनों के दाँतों में जड़ी जाने वाली सोने की चूंप को "मेख" भी कहा जाता है

21गले के आभूषण

आभूषणविवरण
कंठीसोने की बारीक साँकल (chain) जिसमें कोई चैन-लॉकेट लगा होता है
मंगलसूत्रसुहाग के प्रतीक के रूप में काले मोतियों की माला से बना हारनुमा आभूषण
तिमणियो / थमण्योमहिलाओं द्वारा गले में पहना जाने वाला सोने का एक प्रमुख पारंपरिक आभूषण
थाळौदेवमूर्ति-युक्त गले का आभूषण
हारचंद्रहार, कंठहार, हंसहार, सोहनहार, नौलखा हार, मोतीहार, रानीहार आदि प्रकार
मालाहमेरमाल, चंद्रमाला, मोहनमाला, मेहरमाला, मटरमाला जैसे प्रकार
तांतीदेवी-देवताओं के नाम पर बाँधा जाने वाला धार्मिक धागा या आभूषण
लाखीणीदुल्हन के लिए विशेष रूप से बनाई गई लाख की चूड़ी
अन्य गले के आभूषणडोरो, झालरौ, कंठसरी, निगोदर, निगोदरी, तेड़ियौ, आड़, रूचक, बाड़ली, बाड़लौ, हांस, पाट बंगड़ी, गळपटियौ, गळबंध, तख्त, तगतगई, थमण्यो, ठुस्सी, नक्कस, निंबोळी, पंचलड़ी, पंचमणियौ, बजट्टी, पटियौ, तुलसी, हांसली, टेवटौ, ताबीज, तेवटियौ, तांतणियौ, मंगलसूत्र, हौदळ, छैलकड़ौ, बटण, खिवली, खूंगाळ, नांगली, छेड़ियौ, हमेल, रामनवमी, चंपाकली, जुगावली, चोकी, आचोरी, हालरो, हांकर

22बाजू एवं अंगुली के आभूषण

आभूषणविवरण
बजायठबाँह पर धारण किया जाने वाला एक पारंपरिक गहना
डोडीभुजा पर पहना जाने वाला एक विशेष प्रकार का कड़ा
खाँचस्त्रियों द्वारा बाँह पर पहना जाने वाला आभूषण
बाजूबंध / उतरणोसोने की बेल्ट जैसी आकृति वाला आभूषण, जो ऊपरी बाँह पर बाँधा जाता है
टड्डाताँबे की छड़ पर सोने की परत चढ़ा आभूषण, जिसमें 3 वल्ल (घेरे) होते हैं
पट्टाताँबे की छड़ पर सोने की परत वाला आभूषण, जिसमें केवल 1 वल्ल होता है
अन्य बाजू आभूषणबाजूसोसण, बाहुसंगार, डंटकड़ौ, टडौ, कातरियौ, अड़कणी, बहरखां, तकमा, गजरा
मूंदड़ी / बींटीअंगुलियों में पहना जाने वाला गोलाकार छल्ला/अंगूठा
झोटातीन आँटों (घेरों) वाली एक विशेष मोटी अंगूठी
पट्टा बींटीसगाई या पाणिग्रहण से पहले वर पक्ष की ओर से वधू को दी जाने वाली चाँदी की मुद्रिका
अणत / पवित्रीताँबे व चाँदी के मिश्रण से बनी अंगूठी, जिसे धार्मिक दृष्टि से शुभ माना जाता है
अंगूथळौविशेष रूप से हाथ के अंगूठे में पहना जाने वाला आभूषण
अरसीहाथ के अंगूठे में पहनी जाने वाली एक बड़ी अंगूठी, जिसमें अक्सर शीशा (mirror) लगा होता है
आंवलासोने या चाँदी से निर्मित, जिसे पैरों में भी पहना जाता है
मुरसीअंगुलियों में धारण किया जाने वाला एक पारंपरिक आभूषण
चूड़सोने या चाँदी का बना एक मोटा कड़ा
गजरामोतियों से परोया जाने वाला सुंदर आभूषण
नोगरीमोतियों की कई लड़ियों के समूह से बना आभूषण

23कमर, हाथ एवं पैर के आभूषण

आभूषणविवरण
पगपानसोने अथवा चाँदी से बना कमर में पहना जाने वाला आभूषण
चौथचाँदी से बना आभूषण जो जंजीर के समान होता है, इसे पुरुष एवं महिलाएँ दोनों धारण करते हैं
अन्य कमर आभूषणसटकौ, मेखला, मेरवाला, सिनामा, हालम, मुखल्ला, धाकड़ी, तगड़ी, वसन, करधनी, कन्दोरा, कणकती, जंजीर
चूड़ / नेवरीगोल कड़े के रूप में हाथों में पहना जाने वाला आभूषण
पायल / पायजेबइसे रमझोल या शकुंतला के नाम से भी जाना जाता है
टणका / टणकोचाँदी का गोलाकार आभूषण, जिससे चलते समय "टणक-टणक" की आवाज़ आती है
लछौचाँदी के बारीक तारों से बना पाँव का एक विशेष आभूषण
रोळपैरों में पहना जाने वाला घुँघरूदार आभूषण
झाँझरपायलनुमा आभूषण, जो अपनी रुनझुन की मधुर आवाज़ के लिए प्रसिद्ध है
गोल्याचाँदी की चौड़ी और सादी अंगूठियाँ जो पैरों में पहनी जाती हैं
मिकयौस्त्रियों द्वारा पैरों में धारण किया जाने वाला एक पारंपरिक गहना
नखलियौपाँव की अंगुलियों में पहना जाने वाला एक पारंपरिक गहना
बिछियासुहाग का प्रतीक, जिसे विवाहित स्त्रियाँ पाँव के चूटकी अंगूठे के पास वाली अंगुली में पहनती हैं
फोलरीचाँदी के बारीक तारों से फूल की आकृति बनाकर पहनी जाने वाली अंगूठी
अन्य हाथ-पैर आभूषणनेवर, पिंजणी, पादसंकळिका, तेघड़, तांती, सिजनी, कंकणी, शकुंतला, बालिया, ओगनिया, अंगूथळौ, गूठलौ, गौर, लछने, छल्ला, बीछुड़ी, जोड़ (जोधपुरी जोड़, हवाई जहाज का जोड़), दोळियौ

24बच्चों के आभूषण एवं लाख की चूड़ियाँ

आभूषणविवरण
चूड़ा-कटीरउदयपुर क्षेत्र में प्रचलित एक विशेष प्रकार का चूड़ा
नजरियालाल कपड़े में सोने का खेरा, मूंग का आखा तथा रत्नचूर बाँधकर गले में पहनाया जाने वाला आभूषण, ताकि शिशु को नज़र-दोष (गाँठ-गुमड़े) न हो
झाँझरियाबच्चों के पैरों में पहनाई जाने वाली पतली लाल पट्टी या साँकली, जिनमें घुँघरियाँ लगी होती हैं
कड़ो / कंडूल्याबच्चों के हाथ व पैर दोनों में पहनाए जाने वाले कड़े
कुड़कछोटे बच्चों के कान छेदकर पहने जाने वाले सोने-चाँदी या जस्ते के तार, जिनसे बाद में लूंग/बाली पहनी जाती है
कंठ / हंसुलीगले में पहनाया जाने वाला एक सुरक्षात्मक आभूषण
मुरकीठोस सोने की बनी कुडक (कान का आभूषण)

राजस्थान में लाख की चूड़ियों (मणिहारी उद्योग) की एक समृद्ध व विविधतापूर्ण परंपरा है, जिसमें क्षेत्र व अवसर के अनुसार अनेक प्रकार प्रचलित हैं (हस्तशिल्प के रूप में विस्तृत विवरण अध्याय 3 में दिया जा चुका है — यहाँ हम विवाह-अनुष्ठान में इनके सामाजिक महत्व को समझेंगे)।

लाख की चूड़ी का प्रकारविवरण
पड़लासादा लाल मुटिया चूड़ा (हिंगल का चूड़ा/सुहाग का चूड़ा); विवाह-पूर्व बरी-पड़ला के साथ ससुराल से आता है
लहरिया चूड़ाश्रावण मास में नवविवाहिताओं द्वारा पहना जाता है; इसमें सफेद, लाल, नीले व पीले रंग की तिरछी धारियाँ होती हैं
चौबन्दा चूड़ाकोटा-बूँदी क्षेत्र में प्रचलित चार बंद का चूड़ा सेट
पंचबन्दा चूड़ाभीलवाड़ा, अजमेर एवं जोधपुर में प्रचलित पाँच बंद का सेट
तीन लड़ा चूड़ागुर्जर समुदाय की स्त्रियों द्वारा विशेष रूप से पहना जाने वाला चूड़ा
पाट का चूड़ा (बरपोई)उदयपुर क्षेत्र की आदिवासी महिलाओं द्वारा विवाह में पहना जाने वाला चाँदी के पाट का चूड़ा
वन्य चूड़ाउदयपुर क्षेत्र की कुँवारी कन्याओं द्वारा पहना जाने वाला चूड़ा
धूपछांव / कड़ा सेटलाख की दो मोटी चूड़ियों का सेट, जिसे "क्रांति" व "रेनबो" भी कहते हैं
अन्य प्रकारचूड़ा, जलेबी का चूड़ा, चीर का चूड़ा

25नवीनतम अपडेट

नवीनतम अपडेट: राजस्थान की पारंपरिक कुंदन-मीनाकारी व लाख की चूड़ियों के कारीगरों को अब जीआई टैग (GI Tag) व राष्ट्रीय हस्तशिल्प पुरस्कारों के माध्यम से प्रोत्साहित किया जा रहा है (अध्याय 3 से क्रॉस-रेफरेंस)। सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध राजस्थान सरकार ने बाल-विवाह रोकथाम हेतु "बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम" के प्रभावी क्रियान्वयन तथा दहेज-विरोधी हेल्पलाइन व महिला सुरक्षा हेतु "वूमेन हेल्पलाइन 181" जैसी पहलों को सुदृढ़ किया है। पारंपरिक वेशभूषा व आभूषण अब राजस्थान की "ब्रांड पहचान" के रूप में पर्यटन व फैशन-उद्योग में भी नए सिरे से लोकप्रिय हो रहे हैं, विशेषकर लहरिया, बंधेज व मोठड़ा प्रिंट (अध्याय 3 से क्रॉस-रेफरेंस) अंतरराष्ट्रीय फैशन मंचों पर भी प्रदर्शित किए जा रहे हैं।

🎯 सामाजिक जीवन: रीति-रिवाज, वेशभूषा एवं आभूषण — उत्तर लेखन कोण (RAS Mains) 5-अंक: 60-70 शब्द | 10-अंक: लगभग 120 शब्द

📌 महत्वपूर्ण तथ्य

1. हिन्दू परंपरा में सोलह संस्कार होते हैं — गर्भाधान से लेकर अंत्येष्टि तक; समावर्तन संस्कार आज के "दीक्षांत समारोह" के समान है। 2. सती प्रथा को सहमरण/अन्वारोहण/सहगमन प्रथा भी कहते हैं; राजस्थान की अंतिम सती 1987 ई. में दिवराला (सीकर) की रूपकँवर थीं। 3. सती निवारण अधिनियम, 1829 लॉर्ड विलियम बैंटिक द्वारा पारित हुआ; रियासतों में सर्वप्रथम रोक 1822 ई. बूँदी रियासत में (विष्णुसिंह द्वारा) लगी। 4. बाल-विवाह पर सर्वप्रथम प्रतिबंधक कानून 1885 ई. में जोधपुर के प्रधानमंत्री सर प्रताप सिंह द्वारा लगाया गया; शारदा एक्ट 1929 अजमेर निवासी हरविलास शारदा के प्रयासों से बना। 5. दहेज निवारण अधिनियम 1961 में तथा विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 1856 में (ईश्वरचंद्र विद्यासागर के प्रयासों से लॉर्ड कैनिंग द्वारा) पारित हुआ। 6. डाकण प्रथा पर रोक मेवाड़ भील कोर के कमांडर जे.सी. ब्रुक द्वारा 1853 ई. में लगाई गई। 7. कन्या-वध प्रथा पर सर्वप्रथम रोक 1833 ई. में कोटा रियासत (राम सिंह द्वितीय) द्वारा लगाई गई। 8. मानव विक्रय प्रथा पर सर्वप्रथम रोक 1847 ई. में जयपुर के पॉलिटिकल एजेंट लुडलो के प्रयासों से टोंक व भीलवाड़ा जिले में लगी। 9. तोरण मारना, कन्यादान, हथलेवा (पाणिग्रहण) व सात फेरे विवाह के सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान माने जाते हैं। 10. राजस्थानी वेशभूषा की सबसे बड़ी विशेषता उसका "रंग-बिरंगापन" है, जो लोकोक्ति "मारू थारे देश में उपजै तीन रतन" में वर्णित है। 11. पगड़ी 13-15 मीटर लंबी होती है, जबकि पाग 14-20 मीटर लंबी होती है — साफा पाग से छोटा किंतु चौड़ा होता है। 12. पगड़ी के रंग मौसम व अवसर अनुसार बदलते हैं — गुलाबी (वसंत), लहरिया (श्रावण), सफेद (शोक), मोठड़ा (विवाह)। 13. जयपुर का 80 कली घाघरा विशेष रूप से प्रसिद्ध है; लहंगा घाघरे का छोटा रूप है, जो शेखावाटी में प्रचलित है। 14. बेसरी/मादलिया आभूषण किशनगढ़ शैली की प्रसिद्ध "बणी-ठणी" पेंटिंग के कारण भी विख्यात है (अध्याय 3 से क्रॉस-रेफरेंस)। 15. बिछिया व मंगलसूत्र सुहाग के प्रतीक आभूषण माने जाते हैं, जिन्हें विवाहित स्त्रियाँ धारण करती हैं। 16. रखड़ी व बोरला — दोनों सिर पर पहने जाने वाले आभूषण हैं, जो सुहाग के प्रतीक माने जाते हैं। 17. नथ नाक का सबसे भारी व प्रतिष्ठित आभूषण है, जबकि भंवरा मुख्यतः बिश्नोई जाति की महिलाओं द्वारा पहना जाता है। 18. लहरिया चूड़ा श्रावण मास में नवविवाहिताओं द्वारा पहना जाता है — इसमें सफेद, लाल, नीले व पीले रंग की तिरछी धारियाँ होती हैं। 19. महासती/अनुमरण प्रथा में पति की किसी निशानी के साथ सती होना शामिल था — राजस्थान की एकमात्र महासती रूठी रानी उमादे भटियाणी थीं। 20. आन प्रथा (मेवाड़ की स्वामीभक्ति शपथ-प्रथा) 1863 ई. में महाराणा शंभूसिंह के काल में समाप्त हुई।

26अध्याय सारांश

राजस्थान का सामाजिक जीवन जन्म से मृत्यु तक फैले एक विशाल रीति-रिवाज संजाल पर आधारित है — सोलह संस्कारों से लेकर विवाह की चालीस से अधिक रस्मों तक, और अंतिम विदाई की सुव्यवस्थित प्रक्रिया तक, हर पड़ाव पर समाज ने अपनी अनूठी परंपराएँ विकसित कीं। परंतु इसी सामाजिक ताने-बाने में सती प्रथा, बाल-विवाह, दहेज, दास प्रथा व डाकण प्रथा जैसी क्रूर कुरीतियाँ भी पनपीं, जिनके विरुद्ध राजस्थान की रियासतों व समाज-सुधारकों ने लंबा संघर्ष किया — कई मामलों में रियासतों ने ब्रिटिश केंद्रीय कानूनों से भी पहले सुधारवादी कदम उठाए, जो उनकी प्रगतिशील दृष्टि को दर्शाता है।

इसी सामाजिक जीवन का सबसे रंगीन व दृश्यमान पक्ष है राजस्थान की वेशभूषा व आभूषण-परंपरा — जहाँ पगड़ी सम्मान का प्रतीक बनी, ओढ़नी व घाघरे ने स्त्री-सौंदर्य को नया रूप दिया, तथा बोरला, रखड़ी, नथ व मंगलसूत्र जैसे आभूषणों ने सुहाग व सामाजिक स्थिति को दृश्यात्मक अभिव्यक्ति दी। ये परंपराएँ आज भी राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा हैं, तथा फैशन व पर्यटन उद्योग में नए आयाम प्राप्त कर रही हैं।

परीक्षा की दृष्टि से यह अध्याय विशेष रूप से RAS प्रारंभिक परीक्षा (Pre) के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है — रीति-रिवाजों के नाम-अर्थ मिलान, सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन-वर्ष व वेशभूषा-आभूषण के नाम जैसे प्रत्यक्ष तथ्यात्मक प्रश्न बार-बार पूछे जाते हैं। अगले अध्याय में हम राजस्थान की जनजातियों व उनकी परंपराओं का अध्ययन करेंगे, जो इसी सामाजिक जीवन के एक विशिष्ट, समृद्ध व विविधतापूर्ण आयाम को उजागर करेगा।

प्रथा/परंपराश्रेणीमहत्वपूर्ण तथ्य
16 संस्कारजीवन-चक्र संस्कारगर्भाधान से अंत्येष्टि तक कुल 16 संस्कार
विवाह रीति-रिवाजसामाजिक उत्सवसगाई से मुकलावा तक 40+ रस्में
मृत्यु संबंधी रीति-रिवाजअंतिम संस्कारअंत्येष्टि से श्राद्ध तक व्यवस्थित प्रक्रिया
सती प्रथासामाजिक कुरीति (उन्मूलित)अंतिम सती 1987 ई., दिवराला (सीकर)
बाल विवाह प्रथासामाजिक कुरीति (उन्मूलित)सर्वप्रथम रोक 1885 ई., जोधपुर
दास/बेगार प्रथासामाजिक कुरीति (उन्मूलित)बंधित श्रम पद्धति अधिनियम 1976
पुरुष वेशभूषावस्त्र परंपरापगड़ी सम्मान का प्रतीक
महिला वेशभूषावस्त्र परंपराओढ़नी, घाघरा, लहरिया प्रसिद्ध
आभूषण परंपराश्रृंगार परंपरासिर से पैर तक 100+ आभूषण
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