🎪 अध्याय 10/13 — राजस्थान की कला एवं संस्कृति

मेले एवं त्यौहार

Fairs & Festivals of Rajasthan | RAS Pre + Mains
📋 इस अध्याय में
  1. विक्रमी संवत् एवं हिन्दू पंचांग — परिचय
  2. चैत्र मास — त्योहार एवं मेले
  3. वैशाख मास — त्योहार एवं मेले
  4. ज्येष्ठ मास — त्योहार एवं मेले
  5. आषाढ़ मास — त्योहार एवं मेले
  6. श्रावण मास — त्योहार एवं मेले
  7. भाद्रपद मास — त्योहार एवं मेले
  8. आश्विन मास — त्योहार एवं मेले
  9. कार्तिक मास — त्योहार एवं मेले
  10. मार्गशीर्ष मास — त्योहार एवं मेले
  11. पौष मास — त्योहार एवं मेले
  12. माघ मास — त्योहार एवं मेले
  13. फाल्गुन मास — त्योहार एवं मेले
  14. राजस्थान में होली के क्षेत्रीय एवं विविध रूप
  15. राजस्थान के प्रमुख पशु मेले
  16. मुस्लिम धर्म के त्योहार एवं उर्स
  17. जैन धर्म के प्रमुख पर्व
  18. सिख धर्म के प्रमुख पर्व
  19. ईसाई एवं पारसी धर्म के प्रमुख पर्व
  20. सिंधी समुदाय (झूलेलाल) के प्रमुख पर्व
  21. नवीनतम अपडेट
  22. अध्याय सारांश

कल्पना कीजिए — पुष्कर की रेतीली भूमि पर एक साथ हज़ारों ऊँट, घोड़े व बैल सजधज कर खड़े हैं, दूर-दूर से आए व्यापारी मोल-भाव कर रहे हैं, और शाम ढलते ही वही मैदान हजारों दीयों की रोशनी से जगमगा उठता है — यह पुष्कर मेला है, जो विश्वभर के पर्यटकों को आकर्षित करता है। अब कल्पना कीजिए जयपुर की गलियों में गणगौर की सवारी निकल रही है — हाथी, ऊँट, बैंडबाजे और हजारों स्त्रियाँ पारंपरिक वेशभूषा में सिर पर गणगौर की मूर्ति लिए चल रही हैं। और फिर सोचिए नाथद्वारा में होली के दिन दूध-दही से खेली जाने वाली होली, या बीकानेर की "रम्मत" शैली की डेगची-बाल्टी मार होली — राजस्थान का हर महीना, हर मौसम अपने साथ एक नया त्योहार, एक नया मेला लेकर आता है। ये मेले-त्योहार केवल मनोरंजन नहीं हैं — ये कृषि-चक्र, वर्षा-चक्र, लोकदेवता-पूजा व सामाजिक-आर्थिक जीवन को आपस में जोड़ने वाली कड़ी हैं। इसी कारण एक लोकोक्ति प्रचलित है — "तीज त्योहार बावड़ी, ले डूबी गणगौर" — अर्थात राजस्थान में त्योहारों का चक्र श्रावण की तीज से शुरू होकर चैत्र की गणगौर पर पूर्ण होता है। इस अध्याय में हम इसी समृद्ध मेला-त्योहार परंपरा को माह-दर-माह विस्तार से समझेंगे।

"तीज त्योहार बावड़ी, ले डूबी गणगौर" — राजस्थानी लोकोक्ति — त्योहार-चक्र का वर्णन

1विक्रमी संवत् एवं हिन्दू पंचांग — परिचय

राजस्थान सहित संपूर्ण उत्तर भारत में त्योहारों की गणना विक्रमी संवत् (चंद्रमा आधारित पंचांग) के अनुसार की जाती है, जिसमें महीनों की गणना चंद्र-कला (तिथि) के आधार पर होती है। एक चंद्र मास लगभग 29½ दिन का होता है, इसलिए चंद्र वर्ष की गणना 29½ × 12 = लगभग 354-355 दिन होती है, जबकि सौर वर्ष 365 दिन का होता है — इस प्रकार दोनों में लगभग 10-11 दिनों का अंतर रहता है। इस अंतर को संतुलित करने के लिए प्रत्येक तीसरे वर्ष एक अतिरिक्त मास जोड़ा जाता है, जिसे "अधिकमास" या "मलमास" कहते हैं। विक्रमी संवत् के अनुसार वर्ष के बारह महीने इस क्रम में आते हैं — चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष (अग्रहायण), पौष, माघ व फाल्गुन।

2चैत्र मास — त्योहार एवं मेले

चैत्र हिन्दू पंचांग के अनुसार वर्ष का प्रथम मास है, जो वसंत ऋतु में मार्च-अप्रैल के बीच आता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार इसी मास में ब्रह्मा द्वारा सृष्टि की रचना हुई मानी जाती है, तथा इसी दिन से सतयुग व त्रेतायुग का आरंभ माना जाता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से हिन्दू नववर्ष, विक्रम संवत् व चैत्र नवरात्र आरंभ होते हैं।

तिथित्योहार / मेलाविशेषता
चैत्र शुक्ल प्रतिपदाहिन्दू नववर्ष / विक्रम संवत्चैत्र नवरात्र आरंभ (एकम से नवम — "बड़ा नवरात्र", माँ दुर्गा की पूजा)
चैत्र शुक्ल द्वितीयासिंजाराससुराल पक्ष द्वारा नवविवाहित पुत्रवधू को परिधान/उपहार भेजना
चैत्र शुक्ल तृतीया (तीज से एक दिन पहले)गणगौरगण (शिव) व गौर (पार्वती) की पूजा; अविवाहित लड़कियाँ योग्य वर हेतु, विवाहित स्त्रियाँ सुहाग-दीर्घायु हेतु व्रत करती हैं; जयपुर की गणगौर सवारी सर्वाधिक प्रसिद्ध; धींगा गणगौर (उदयपुर, जोधपुर) व गुलाबी गणगौर (नाथद्वारा) भी प्रसिद्ध; जैसलमेर में केवल गवर की पूजा होती है, बूँदी व जोधपुर राजपरिवार गणगौर नहीं मनाता
चैत्र शुक्ल अष्टमीअशोकाष्टमीअशोक के वृक्ष की पूजा
चैत्र शुक्ल नवमीरामनवमीभगवान राम का जन्मोत्सव; बही-खाते बदलने का दिन
चैत्र शुक्ल त्रयोदशीमहावीर जयंती24वें जैन तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्मोत्सव
चैत्र पूर्णिमाहनुमान जयंतीसालासर बालाजी का मेला (चूरू)
चैत्र कृष्ण अष्टमी (बास्योड़ा)शीतलाष्टमीशीतला माता की पूजा, ठंडा भोजन ग्रहण किया जाता है
चैत्र कृष्ण अष्टमघुड़लाराव सातलदेव द्वारा मल्लू खाँ को पराजित करने के उपलक्ष्य में, मारवाड़ क्षेत्र में प्रचलित
चैत्र कृष्ण एकम से पंचमफूलडोल उत्सव (शाहपुरा)रामस्नेही संप्रदाय द्वारा आयोजित (अध्याय 8 से क्रॉस-रेफरेंस)
बादशाह मेला (ब्यावर)
चैत्र कृष्ण सप्तमीशीतला माता मेला (चाकसू)बैलगाड़ी मेला भी कहते हैं
चैत्र कृष्ण अष्टमीकेसरियाजी मेला (धुलेव, उदयपुर)हिन्दू-जैन दोनों समुदायों द्वारा पूजित ऋषभदेव; धूला भील मूर्ति लाया, रात्रि में शोभायात्रा
चैत्र कृष्ण एकादशी से चैत्र शुक्ल एकादशीमल्लीनाथ पशु मेला (तिलवाड़ा, बालोतरा)राजस्थान का सबसे पुराना पशु मेला (अध्याय 9 से क्रॉस-रेफरेंस)
चैत्र अमावस्याघोटिया अंबा मेला (बांसवाड़ा)आदिवासियों का दूसरा कुंभ
चैत्र अमावस्यापाबूजी का मेला (कोलू गाँव, फलोदी)अध्याय 9 से क्रॉस-रेफरेंस
चैत्र शुक्ल एकादशीकैलादेवी मेला (करौली)लांगुरिया नृत्य, लक्खी मेला भी कहते हैं (अध्याय 9 से क्रॉस-रेफरेंस)
चैत्र शुक्ल त्रयोदशी से वैशाख कृष्ण प्रतिपदाश्री महावीर जी मेला (करौली)रथ के सारथी SDM होते हैं

3वैशाख मास — त्योहार एवं मेले

वैशाख हिन्दू पंचांग के अनुसार वर्ष का दूसरा मास है, जो अप्रैल-मई में वसंत के उत्तरार्द्ध व ग्रीष्म के प्रारंभ में आता है। यह मास स्नान, दान, व्रत व तीर्थयात्रा के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है — वैशाख शुक्ल अक्षय तृतीया को विशेष पुण्यफलदायी माना गया है। इसी मास में बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलते हैं तथा जगन्नाथ रथयात्रा की तैयारी प्रारंभ होती है।

तिथित्योहार / मेलाविशेषता
वैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया / आखा तीज)अक्षय तृतीयाशुभ कार्यों की सर्वोत्तम तिथि (अबूझ सावा); परंपरागत रूप से बाल-विवाह की तिथि; किसान हल चलाकर अच्छी फसल की कामना करते हैं; बीकानेर स्थापना दिवस भी इसी तिथि को है
वैशाख शुक्ल चतुर्दशीनृसिंह चतुर्दशी (नृसिंह जयंती)अजमेर में लाल्या-काल्या का मेला (लाल्या — वराह भगवान, काल्या — हिरण्यकश्यप)
वैशाख कृष्ण तृतीयाधींगा गवर मेलामहिलाएँ विभिन्न स्वांग धारण करती हैं
वैशाख शुक्ल अष्टमीनारायणी माता मेला (सरिस्का, अलवर)शक्तिपीठ मेला
वैशाख पूर्णिमाबुद्ध पूर्णिमाभगवान बुद्ध का जन्म, ज्ञान-प्राप्ति व महापरिनिर्वाण; इसे पीपल पूर्णिमा भी कहते हैं
वैशाख पूर्णिमाबाणगंगा मेला (विराटनगर, कोटपूतली-बहरोड़)पौराणिक नदी बाणगंगा से जुड़ा धार्मिक स्नान मेला
वैशाख पूर्णिमागोमती सागर मेला (झालरापाटन)स्नान व दान का महत्त्व
वैशाख पूर्णिमामातृकुंडिया मेला (राशमी, चित्तौड़गढ़)चंद्रभागा नदी के किनारे; "राजस्थान का हरिद्वार" कहा जाता है
वैशाख पूर्णिमागौतमेश्वर मेला (अरनोद, प्रतापगढ़)शिव आराधना एवं आदिवासी भागीदारी
वैशाख पूर्णिमामार्कण्डेश्वर मेला (सिरोही)महर्षि मार्कण्डेय से संबंध

4ज्येष्ठ मास — त्योहार एवं मेले

ज्येष्ठ हिन्दू पंचांग के अनुसार वर्ष का तीसरा मास है, जो मई-जून के बीच आता है — यह ग्रीष्म ऋतु का चरम काल माना जाता है, इसलिए इस मास में जलदान, छाया, सेवा, व्रत व संयम का विशेष महत्व है। लोक परंपरा में ज्येष्ठ मास को तप, परोपकार व पुण्य-अर्जन से जोड़ा जाता है।

तिथित्योहार / मेलाविशेषता
ज्येष्ठ अमावस्या (बड़ अमावस्या)वट सावित्री व्रतसावित्री-सत्यवान कथा; विवाहित स्त्रियाँ वट वृक्ष की पूजा करके पति की दीर्घायु हेतु व्रत करती हैं; इसी दिन से चातुर्मास का आरंभ माना जाता है
ज्येष्ठ अमावस्याशनि जयंतीसूर्यपुत्र शनिदेव का जन्मदिवस; शनि दोष शांति हेतु पूजन
आषाढ़ शुक्ल एकादशी (ग्यारस)देवशयनी एकादशीमान्यता — भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में जाते हैं; इस दिन से देवता चार माह के लिए सो जाते हैं, अतः चार माह तक शुभ कार्य वर्जित रहते हैं
ज्येष्ठ शुक्ल दशमीगंगा दशहरामाँ गंगा का पृथ्वी पर अवतरण; स्नान-दान का अत्यधिक पुण्य
ज्येष्ठ शुक्ल एकादशीनिर्जला एकादशीवर्ष की सबसे कठोर एकादशी — इस दिन जल तक ग्रहण नहीं किया जाता
ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमावट पूर्णिमावट सावित्री व्रत का समापन
ज्येष्ठ/आषाढ़ पूर्णिमागुरु पूर्णिमा / व्यास पूर्णिमामहर्षि वेदव्यास का जन्मदिवस; गुरु को श्रद्धावश दक्षिणा देकर पूजा की जाती है
ज्येष्ठ अमावस्यासीता माता मेला (प्रतापगढ़)सीतामाता वन्यजीव अभयारण्य में (उड़न गिलहरी हेतु प्रसिद्ध); माता सीता के वनवास व लव-कुश जन्म से जुड़ा
वैशाख पूर्णिमा से ज्येष्ठ अमावस्यासीता बाड़ी का मेला (केलवाड़ा, बारां)सहरियाओं का लघु कुंभ
ज्येष्ठ शुक्ल सप्तमी से द्वादशीगंगा दशमी मेला (कामां, डीग)गंगा अवतरण से जुड़ी लोकमान्यता

5आषाढ़ मास — त्योहार एवं मेले

आषाढ़ हिन्दू पंचांग के अनुसार वर्ष का चौथा मास है, जो जून-जुलाई में आता है — यह वर्षा ऋतु के आगमन का संकेत देता है, इसलिए कृषि गतिविधियों की शुरुआत होती है। धार्मिक दृष्टि से आषाढ़ में चातुर्मास का आरंभ होता है, जिस कारण विवाह व अन्य मांगलिक कार्य स्थगित रहते हैं। मान्यता है कि इसी मास में भगवान विष्णु योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं, इसलिए तप, संयम व साधना का विशेष महत्व माना जाता है।

तिथित्योहार / मेलाविशेषता
आषाढ़ शुक्ल एकम से नवमगुप्त नवरात्रशक्ति-साधना एवं तंत्र-मंत्र उपासना का काल; नौ देवियों की गुप्त आराधना
आषाढ़ शुक्ल (अक्षय तृतीया के समान)भडल्या नवमीअक्षय तृतीया के समान शुभ मानी जाती है, नवविवाहितों हेतु सिंजारा (ससुराल से उपहार)

6श्रावण मास — त्योहार एवं मेले

श्रावण हिन्दू पंचांग के अनुसार वर्ष का पाँचवाँ मास है, जो सामान्यतः जुलाई-अगस्त में आता है। यह वर्षा ऋतु, हरियाली व भगवान शिव की उपासना का प्रमुख मास माना जाता है — श्रावण मास प्रकृति-पूजन, लोक-परंपराओं तथा आस्था व पर्यावरण-चेतना का महत्त्वपूर्ण प्रतीक है।

तिथित्योहार / मेलाविशेषता
श्रावण कृष्ण पंचमीनाग पंचमीसर्प की पूजा; सर्प-दंश से रक्षा की लोकमान्यता
श्रावण कृष्ण नवमीनिडरी नवमीनेवले (निडरी) की पूजा; साँपों से रक्षा का प्रतीक पर्व
श्रावण के सभी सोमवारश्रावण सोमवार व्रत / सुखिया सोमवारसभी सोमवारों को भगवान शिव की पूजा; कुछ भक्त घर से खाना बनाकर वन में ग्रहण करते हैं (वन सोमवार)
भाद्रपद के प्रत्येक मंगलवारमंगलागौरी व्रतविवाहित महिलाओं द्वारा वैवाहिक सुख-समृद्धि की कामना हेतु व्रत
श्रावण शुक्ल तृतीयाछोटी तीज (श्रावणी/हरियाली तीज)पति-पत्नी के प्रेम का त्योहार; महिलाएँ लहरिया ओढ़ती हैं; जयपुर में छोटी तीज की सवारी प्रसिद्ध; घेवर की मिठाई विशेष
श्रावण पूर्णिमारक्षाबंधन (नारियल पूर्णिमा)भाई-बहन के स्नेह का पर्व; तटीय क्षेत्रों में नारियल पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है, श्रवण कुमार की पूजा; ब्राह्मण नया जनेऊ धारण करते हैं
हरियाली अमावस्याफतेहसागर झील मेला (उदयपुर)झील तट पर धार्मिक अनुष्ठान; कल्पवृक्ष की पूजा (पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा)
श्रावण अमावस्याबुड्ढा जोहड़ मेला (रायसिंहनगर, श्रीगंगानगर)सिख धर्म का प्रमुख मेला
श्रावण शुक्ल सप्तमीपरशुराम महादेव मेलाअरावली क्षेत्र का प्रसिद्ध मेला
श्रावण शुक्ल षष्ठी-सप्तमीसालेश्वर महादेव मेला (पाली)शिव पूजा; अन्य नाम — चन्दन षष्ठी, चानन छठ
श्रावण मास का अंतिम सोमवारवीरपुरी मेला (मंडोर, जोधपुर)शिवभक्ति से जुड़ा
श्रावण शुक्ल पंचमीलोटिया का मेला (मंडोर, जोधपुर)

7भाद्रपद मास — त्योहार एवं मेले

भाद्रपद हिन्दू पंचांग का एक प्रमुख महीना है, जिसे त्योहारों की अधिकता वाला माह माना जाता है — इस माह में कृष्ण जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी, तेजा दशमी व रामदेवरा मेला जैसे महत्त्वपूर्ण धार्मिक एवं लोक-पर्व आते हैं। भाद्रपद मास का संबंध कृषि, वर्षा व लोकदेवताओं की उपासना से भी जुड़ा हुआ है। इसी माह के अंत में पितृ पक्ष (श्राद्ध) का प्रारंभ होता है, जो पूर्वजों की स्मृति व श्रद्धा से संबंधित है।

तिथित्योहार / मेलाविशेषता
भाद्रपद कृष्ण अष्टमीकृष्ण जन्माष्टमीभगवान कृष्ण का जन्मोत्सव
भाद्रपद कृष्ण चतुर्थीगणेश चतुर्थीगणेश जी का जन्मोत्सव; त्रिनेत्र गणेश जी मेला (सवाई माधोपुर)
भाद्रपद शुक्ल पंचमीऋषि पंचमीसप्तऋषियों की पूजा, महिलाओं द्वारा व्रत
भाद्रपद शुक्ल अष्टमीराधाष्टमीश्रीराधा का जन्मोत्सव
भाद्रपद शुक्ल दशमी (तेजा दशमी / रामदेव दशमी)तेजा दशमीलोकदेवता वीर तेजाजी की पूजा (अध्याय 9 से क्रॉस-रेफरेंस); नागौरी नस्ल के पशुओं से जुड़ा वीर तेजाजी पशु मेला (नागौर) — राजस्थान का प्रमुख पशु मेला
भाद्रपद शुक्ल द्वितीयाबाबे री बीजरामदेवजी जयंती से जुड़ा पर्व; रामदेवरा (जैसलमेर) में मेला
भाद्रपद शुक्ल एकादशी (जलझूलनी/देवझूलनी एकादशी)जलझूलनी एकादशीभगवान विष्णु/कृष्ण को बेवाण में बिठाकर जल में झुलाने की परंपरा; अन्य नाम — ढोला ग्यारस, देव झूलनी ग्यारस
भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशीअनंत चतुर्दशीअनंत सूत्र बाँधने की परंपरा; गणेश जी की मूर्ति का विसर्जन
भाद्रपद पूर्णिमाश्राद्ध प्रारंभपितृ पक्ष का आरंभ
भाद्रपद कृष्ण तृतीयाबड़ी तीज (कजली/सातुड़ी/बूढ़ी/उजली तीज)विवाहित स्त्रियाँ पति की दीर्घायु हेतु व्रत रखती हैं; बूँदी में बड़ी तीज की सवारी प्रसिद्ध; पूर्वी राजस्थान व हाड़ौती में प्रचलित (मारवाड़ में भी प्रसिद्ध)
भाद्रपद कृष्ण षष्ठी (हल छठ / ऊब छठ)हल छठबलराम जयंती से संबंधित; हल व कृषि उपकरणों की पूजा; अन्य नाम — चंदन षष्ठी
भाद्रपद कृष्ण नवमीगोगा नवमीलोकदेवता गोगाजी की पूजा; किसान हल को 9 गाँठ वाली राखी बाँधते हैं (अध्याय 9 से क्रॉस-रेफरेंस); गोगामेड़ी (नोहर) में मेला
भाद्रपद कृष्ण द्वादशीबछ बारसगाय व बछड़े की पूजा; अन्य नाम — "गाय पूजनी"
भाद्रपद कृष्ण अमावस्यासती अमावस्याझुंझुनू में रानी सती का मेला; इसे "दादी सती" भी कहा जाता है (अध्याय 9 से क्रॉस-रेफरेंस)
भाद्रपद शुक्ल 2 से 11रामदेवरा मेला (जैसलमेर)लोकदेवता रामदेवजी से संबंधित; पैदल यात्राएँ; "मारवाड़ का कुंभ" कहा जाता है
भाद्रपद कृष्ण 11 से माघ कृष्ण 9रानी सती मेला (झुंझुनू)सती प्रथा से जुड़ा ऐतिहासिक मेला
भाद्रपद शुक्ल 4गणेश चतुर्थी मेला (सवाई माधोपुर) / चुंघी गणेश तीर्थ (जैसलमेर)त्रिनेत्र गणेश मंदिर मेला
भाद्रपद शुक्ल 8भर्तृहरि का मेला (अलवर)नाथ संप्रदाय से जुड़ा; कनफटे साधुओं की उपस्थिति
आश्विन शुक्ल 9चामुंडा माता मेला (जोधपुर दुर्ग)अध्याय 9 से क्रॉस-रेफरेंस
भाद्रपद शुक्ल 11 / भाद्रपद शुक्ल 2 / भाद्रपद शुक्ल 8चारभुजा नाथ मेला (राजसमंद) / खेजड़ली मेला (जोधपुर) / सवाई भोज मेला (आसींद, भीलवाड़ा)क्रमशः वैष्णव आस्था, पर्यावरण-स्मृति (खेजड़ली — अध्याय 8 से क्रॉस-रेफरेंस) व लोक-आस्था से जुड़े मेले
भाद्रपद कृष्ण 3कजली/उजली तीज मेला (बूँदी)
भाद्रपद शुक्ल 11डोल मेला (शाहाबाद, बारां)
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8आश्विन मास — त्योहार एवं मेले

आश्विन हिन्दू पंचांग के अनुसार वर्ष का सातवाँ मास है, जो सामान्यतः सितंबर-अक्टूबर के बीच आता है और शरद ऋतु का प्रतिनिधि माना जाता है। इस मास में शारदीय नवरात्र, दुर्गा पूजा, महानवमी व विजयादशमी (दशहरा) जैसे प्रमुख पर्व आते हैं। आश्विन पूर्णिमा (शरद पूर्णिमा/कोजागरी पूर्णिमा) का विशेष धार्मिक महत्व है, जिसे रास पूर्णिमा भी कहा जाता है।

तिथित्योहार / मेलाविशेषता
आश्विन शुक्ल 1 से 9शारदीय नवरात्रदेवी दुर्गा के नौ रूपों की उपासना, नौ कन्याओं को भोजन; घर की दीवार पर गोबर की "साँझियाँ" (उदयपुर के मच्छन्दर नाथ मंदिर की साँझियाँ प्रसिद्ध); घटस्थापना का महत्व
आश्विन शुक्ल सप्तमीमहासप्तमीदेवी की विशेष आराधना
आश्विन शुक्ल अष्टमीदुर्गाष्टमीदेवी महागौरी की पूजा; कन्या-पूजन का महत्व
आश्विन शुक्ल नवमीमहानवमीदुर्गा पूजा का समापन चरण; शस्त्र पूजा व शक्ति साधना
आश्विन शुक्ल दशमीदशहरा (विजयादशमी)राम द्वारा रावण-वध की स्मृति में असत्य पर सत्य की विजय; शस्त्र-पूजन व शमी-पूजा; कोटा में ऐतिहासिक दशहरा मेला प्रसिद्ध
आश्विन पूर्णिमाशरद पूर्णिमा (रास/कोजागरी पूर्णिमा)लक्ष्मी पूजा; कोजागरी रात्रि में खीर रखने की परंपरा
लालदास जी मेला (अलवर)संत लालदास जी की समाधि/धाम पर आयोजित (अध्याय 8 से क्रॉस-रेफरेंस)

9कार्तिक मास — त्योहार एवं मेले

कार्तिक मास को स्नान-दान का मास कहा जाता है, क्योंकि पूरे महीने में विशेष रूप से कार्तिक स्नान व दान का धार्मिक महत्त्व माना जाता है। देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु के योगनिद्रा से जागने की मान्यता है, जिसके बाद विवाह एवं अन्य शुभ कार्यों का पुनः आरंभ होता है। इसी मास में लगने वाला पुष्कर मेला राजस्थान का सबसे रंगीन और अंतरराष्ट्रीय स्तर का सबसे प्रसिद्ध मेला है, जिसमें बड़ी संख्या में देश-विदेश के पर्यटक आते हैं।

तिथित्योहार / मेलाविशेषता
कार्तिक कृष्ण अष्टमीअहोई अष्टमीअहोई माता (पार्वती का रूप) की पूजा; निःसंतान महिलाएँ संतान-प्राप्ति हेतु निर्जला व्रत करती हैं
कार्तिक कृष्ण एकादशी (रमा एकादशी)रमा एकादशी
कार्तिक कृष्ण त्रयोदशीधनतेरस (धनत्रयोदशी)भगवान धन्वंतरि का अवतरण; आयु, आरोग्य व धन-समृद्धि की कामना; दीपदान की परंपरा
कार्तिक कृष्ण चतुर्दशीनरक चतुर्दशी (छोटी दीपावली/रूप चौदस)नरकासुर वध की स्मृति; प्रातः स्नान का विशेष महत्व
कार्तिक अमावस्यादीपावली (लक्ष्मी पूजन)लक्ष्मी-गणेश पूजन; इसी दिन महावीर स्वामी व स्वामी दयानंद सरस्वती का निर्वाण; व्यापारिक नववर्ष (विक्रम संवत्) का आरंभ
कार्तिक शुक्ल एकमगोवर्धन पूजागोबर से बने गोवर्धन जी की पूजा; मंदिर में अन्नकूट बँटता है (नाथद्वारा का अन्नकूट महोत्सव प्रसिद्ध — अध्याय 8 से क्रॉस-रेफरेंस)
कार्तिक शुक्ल द्वितीयाभाई दूज / यम द्वितीयाभाई-बहन के स्नेह का पर्व; यम-यमुना की कथा से जुड़ा
कार्तिक शुक्ल अष्टमीगोपाष्टमीगायों को चारा खिलाते हैं
कार्तिक शुक्ल नवमी (अक्षय नवमी)आंवला नवमीइस दिन आंवले में विष्णु जी का निवास मानकर उसकी पूजा
कार्तिक शुक्ल एकादशीदेवउठनी एकादशी (देवोत्थान/प्रबोधिनी एकादशी)चार माह की योगनिद्रा के बाद विष्णु जागते हैं; शुभ कार्यों का पुनः आरंभ; तुलसी विवाह भी इसी दिन
कार्तिक पूर्णिमाकार्तिक पूर्णिमा (त्रिपुर/सत्यनारायण पूर्णिमा)कार्तिक स्नान (गंगा/पुष्कर) का विशेष महत्व; दीपदान की परंपरा
कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमापुष्कर मेला (अजमेर)"मेरवाड़ा का कुंभ" — अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि; ऊँट, घोड़े व बैल का क्रय-विक्रय; ब्रह्मा मंदिर व पुष्कर सरोवर पर दीपदान
कार्तिक पूर्णिमाकपिल मुनि मेला (कोलायत, बीकानेर)"जांगल प्रदेश का कुंभ"; सांख्य दर्शन के प्रणेता कपिल मुनि से जुड़ा; सरोवर पर दीपदान
कार्तिक पूर्णिमाचंद्रभागा मेला (झालावाड़)चंद्रभागा नदी तट पर आयोजन; मालवी नस्ल के पशुओं का मेला; "हाड़ौती का सुरंगा मेला" भी कहते हैं
कार्तिक पूर्णिमासाहवा सिख मेला (साहवा, चूरू)राजस्थान का सबसे बड़ा सिख मेला; गुरु नानक व गुरु गोविंद सिंह से जुड़ी स्मृतियाँ
कार्तिक शुक्ल तृतीयागरुड़ मेला (बंशी पहाड़पुर, भरतपुर)वैष्णव परंपरा से जुड़ा; संतान-प्राप्ति हेतु

10मार्गशीर्ष मास — त्योहार एवं मेले

मार्गशीर्ष मास को वैष्णव भक्ति का प्रमुख मास माना जाता है, क्योंकि इस अवधि में भगवान विष्णु की उपासना, स्नान व व्रतों का विशेष धार्मिक महत्व होता है। मोक्षदा एकादशी का संबंध भगवद्गीता के उपदेश से जोड़ा जाता है, जिस कारण इस दिन गीता-पाठ व विष्णु-पूजन का विशेष महत्व माना जाता है।

तिथित्योहार / मेलाविशेषता
मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशीमोक्षदा एकादशीभगवद्गीता उपदेश-दिवस से जुड़ी; व्रत से पापों से मुक्ति, विष्णु-पूजा; धर्म, त्याग व कर्तव्य का प्रतीक
मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमीभीष्म अष्टमीपितामह भीष्म को जलांजलि; पितृ-तर्पण से जुड़ा पर्व

11पौष मास — त्योहार एवं मेले

पौष मास को शीत ऋतु का प्रमुख धार्मिक मास माना जाता है, जिसमें स्नान, दान व व्रतों का विशेष महत्त्व होता है। इस मास की पौष पूर्णिमा पर स्नान-दान को अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। इसी मास में आयोजित होने वाला नाकोड़ा जी मेला जैन धर्म का एक प्रमुख व प्रसिद्ध मेला है, जहाँ देश-भर से जैन श्रद्धालु दर्शन एवं साधना हेतु आते हैं।

तिथित्योहार / मेलाविशेषता
पौष अमावस्यापौष अमावस्यापितृ-तर्पण का महत्व; दान-पुण्य का दिन
पौष शुक्ल एकादशीसफला एकादशीस्नान-दान का विशेष महत्त्व; दान का पुण्य-फल
पौष कृष्ण दशमीनाकोड़ा जी मेला (बालोतरा)जैन धर्म से संबंधित
पौष शुक्ल दशमीवरकाणा मेला (पाली)जैन धर्म से संबंधित
माघ शुक्ल त्रयोदशी से अमावस्यापर्यटन मरु मेला (जैसलमेर व सम)पर्यटन विभाग द्वारा आयोजन

12माघ मास — त्योहार एवं मेले

माघ मास को स्नान-दान का सर्वोत्तम मास माना जाता है, क्योंकि इस अवधि में किए गए स्नान व दान को विशेष पुण्यफलदायी माना गया है। इसी मास में आने वाली वसंत पंचमी ज्ञान, विद्या व कला की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती की पूजा का प्रमुख पर्व है। माघ माह में आयोजित होने वाला बेणेश्वर मेला राजस्थान का प्रसिद्ध "आदिवासियों का कुंभ" कहलाता है, जो जनजातीय संस्कृति व धार्मिक आस्था का बड़ा केंद्र है। इसी मास में आयोजित होने वाला मानगढ़ धाम मेला आदिवासी समाज से जुड़ा एक महत्त्वपूर्ण स्मृति मेला है, जो गुरु गोविंद गिरी के बलिदान की याद दिलाता है।

तिथित्योहार / मेलाविशेषता
माघ कृष्ण चतुर्थीतिल चौथ (सकट चौथ / वक्रतुण्ड चतुर्थी)गणेश जी व चौथ माता को तिलकुटे का भोग; अन्य नाम — तिलकुटा चौथ
माघ कृष्ण एकादशीषटतिला एकादशीकाली गाय व काले तिलों के दान का महत्व
माघ अमावस्यामौनी अमावस्यामान्यता — मनु ऋषि (ब्रह्मा जी के मानस पुत्र) ने इस दिन मौन रहकर तपस्या की थी
माघ शुक्ल पंचमीबसंत पंचमीऋतुराज बसंत का आगमन; सरस्वती माता की आराधना
माघ पूर्णिमाबेणेश्वर मेला (डूंगरपुर, नवाटापुरा)सोम-माही-जाखम नदियों के संगम पर; आदिवासियों का कुंभ; संत मावजी से संबंधित (अध्याय 8 से क्रॉस-रेफरेंस)
माघ कृष्ण चतुर्थीचौथ माता का मेला (चौथ का बरवाड़ा, सवाई माधोपुर)चौथ माता की पूजा; क्षेत्रीय आस्था (अध्याय 9 से क्रॉस-रेफरेंस)
कार्तिक पूर्णिमाकपिल धारा मेला (बारां)सहरिया जनजाति से संबंधित
माघ मासमानगढ़ धाम मेलाआदिवासी समाज से जुड़ा स्मृति मेला; गुरु गोविंद गिरी के बलिदान की स्मृति
चंद्रभागा पशु मेलाहाड़ौती क्षेत्र में मालवी नस्ल के पशुओं के क्रय-विक्रय हेतु प्रसिद्ध
प्रतिवर्ष माघ मेंनागौर मेलाराजस्थान का प्रमुख पशु मेला (नागौरी नस्ल के पशु)

13फाल्गुन मास — त्योहार एवं मेले

फाल्गुन मास को उत्सवों व रंगों का मास माना जाता है, क्योंकि इस महीने में उल्लास, आनंद व सामूहिक सहभागिता से जुड़े अनेक पर्व मनाए जाते हैं। इसी मास में आने वाली महाशिवरात्रि भगवान शिव की उपासना का सर्वोच्च पर्व है, जिसमें व्रत, रात्रि-जागरण व विशेष पूजा का महत्व होता है। फाल्गुन पूर्णिमा को मनाई जाने वाली होली सामाजिक समरसता, प्रेम व उल्लास का प्रतीक पर्व है, जो भेदभाव मिटाकर आपसी भाईचारे को प्रोत्साहित करता है।

तिथित्योहार / मेलाविशेषता
फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशीमहाशिवरात्रिभगवान शिव की आराधना का प्रमुख पर्व; रात्रि-जागरण व चार पहर की पूजा
फाल्गुन शुक्ल सप्तमीचनणी चेरी मेला (देशनोक, बीकानेर)क्षेत्रीय लोक-आस्था से जुड़ा
फाल्गुन शुक्ल एकादशीआंवला एकादशीनवजात बच्चे के जन्म के बाद पहली होली पर ननिहाल पक्ष उपहार लाता है, जिसे "ढूँढ" कहते हैं
फाल्गुन पूर्णिमाहोली (होलिका दहन)होलिका दहन व रंगोत्सव; सामाजिक समरसता का पर्व; अगले दिन (चैत्र कृष्ण प्रतिपदा) धुलंडी (रंगों की होली) मनाई जाती है
फाल्गुन शुक्ल द्वितीया / सप्तमीफुलेरा दूज / खेलनी सातम
फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशीशिवाड़ मेला (सवाई माधोपुर)इस शिवलिंग को बारहवाँ ज्योतिर्लिंग होने की मान्यता प्राप्त है; महाशिवरात्रि पर विशाल मेला
फाल्गुन शुक्ल सप्तमीचन्द्रप्रभु मेला (तिजारा, अलवर)जैन धर्म से संबंधित; वर्ष में दो बार आयोजन
फाल्गुन माह (7 दिन)डाडा पम्पाराम मेला (विजयनगर, श्रीगंगानगर)संत पम्पाराम की स्मृति में
फाल्गुन पूर्णिमातिलस्वा महादेव मेला (मांडलगढ़, भीलवाड़ा)शिव पूजा से जुड़ा
फाल्गुन माहमेहंदीपुर बालाजी मेला (दौसा)हनुमान जी के बाल रूप की पूजा; मेहंदीपुर बालाजी धाम आस्था व विश्वास के साथ दर्शन हेतु प्रमुख केंद्र

14राजस्थान में होली के क्षेत्रीय एवं विविध रूप

राजस्थान की सबसे विशिष्ट सांस्कृतिक विशेषता यह है कि होली का पर्व हर जिले व क्षेत्र में भिन्न-भिन्न, अनूठे रूपों में मनाया जाता है — यह विषय परीक्षा में क्षेत्र-विशेष पहचान हेतु बार-बार पूछा जाता है।

होली का रूपस्थान
देवर-भाभी की होलीब्यावर (अजमेर)
रोने-बिलखने वाली होलीजोधपुर
गोबर के कंडों की होलीगलियाकोट (डूंगरपुर)
राड़ रमण की होलीभिलुड़ा गाँव (डूंगरपुर)
दूध-दही की होलीनाथद्वारा (राजसमंद)
बादशाह की होली / बादशाह की सवारीनाथद्वारा (राजसमंद) / ब्यावर (अजमेर)
अंगारों की होलीकेकड़ी (अजमेर), लालसोट (दौसा)
मुर्दे की होलीमरुधनी (भीलवाड़ा)
फूलों की होलीगोविंद देव जी मंदिर, जयपुर
कंकड़ मार होलीजैसलमेर
भाटा गैरजालौर
कानुड़ा गाँव का गैर नृत्यबाड़मेर
गोटा गैरभीनमाल (जालौर)
कोड़ामार होलीभिनाय (अजमेर)
लठमार होलीचांदन गाँव व महावीरजी (करौली)
पत्थर मार होलीबाड़मेर
भगोरिया खेल (आदिवासी)मेवाड़ अंचल
गिंदड़ नृत्यशेखावाटी क्षेत्र
"रम्मत" व डेगची/बाल्टी मार होलीबीकानेर
न्हाण उत्सव / न्हाण की होलीकोटा (आवाँ व सांगोद)
"जन्म, मरण और परण" का प्रतीकात्मक आयोजनजयपुर (सभ्य समाज द्वारा — बाप की अर्थी, बेटे की बारात व पौत्र-जन्म का दृश्य)
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15राजस्थान के प्रमुख पशु मेले

राजस्थान की अर्थव्यवस्था में पशुपालन का विशेष महत्व रहा है, इसी कारण यहाँ अनेक विशाल पशु मेले आयोजित होते हैं, जहाँ ऊँट, घोड़े, बैल व अन्य पशुओं का क्रय-विक्रय होता है — ये मेले धार्मिक आस्था व आर्थिक गतिविधि — दोनों का संगम होते हैं।

पशु मेलास्थान / तिथिविशेषता
पुष्कर मेलाअजमेर, कार्तिक शुक्ल एकादशी-पूर्णिमाऊँट, घोड़े व बैल का क्रय-विक्रय; अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि
वीर तेजाजी पशु मेलापरबतसर, नागौर, भाद्रपद शुक्ल दशमीनागौरी नस्ल के पशु; राजस्थान का प्रमुख पशु मेला
नागौर मेलानागौर, प्रतिवर्ष माघ मेंनागौरी नस्ल के पशुओं हेतु प्रसिद्ध
मल्लीनाथ पशु मेलातिलवाड़ा, बालोतरा, चैत्र कृष्ण एकादशी से चैत्र शुक्ल एकादशीराजस्थान का सबसे पुराना पशु मेला
चंद्रभागा पशु मेलाझालावाड़, कार्तिक पूर्णिमामालवी नस्ल के पशु; "हाड़ौती का सुरंगा मेला" भी कहते हैं
शीतला माता मेला (बैलगाड़ी मेला)चाकसू, चैत्र कृष्ण सप्तमीबैलगाड़ी मेला भी कहते हैं

16मुस्लिम धर्म के त्योहार एवं उर्स

मुस्लिम समाज के त्योहार व उर्स का अध्ययन करने से पहले इस्लामी (हिजरी) कैलेंडर के महीनों के नाम जानना आवश्यक है। इस्लामी कैलेंडर चंद्र-आधारित होता है, जिसमें कुल 12 महीने होते हैं — मुहर्रम, सफ़र, रबी-उल-अव्वल, रबी-उल-सानी, जमाद-उल-अव्वल, जमाद-उल-सानी, रज्जब, शाबान, रमज़ान, शव्वाल, ज़िलक़ाद व ज़िलहिज्ज। इन्हीं महीनों के अनुसार मुस्लिम समाज के प्रमुख त्योहार व उर्स निर्धारित होते हैं — जैसे रमज़ान के बाद ईद-उल-फ़ित्र, ज़िलहिज्ज में ईद-उल-जुहा, रज्जब माह में अजमेर का उर्स, तथा मुहर्रम माह में मातमी आयोजन।

अवसर / पर्वइस्लामी माह / तिथिविशेषता
ईद-उल-फ़ित्ररमज़ान के बाद, शव्वाल माह की 1 तारीखरमज़ान के रोज़ों की समाप्ति का पर्व; फ़ित्रा (दान) का विशेष महत्व; सामूहिक नमाज़
ईद-उल-जुहा (बकरीद)ज़िलहिज्ज माह की 10 तारीखकुर्बानी का पर्व; हज़रत इब्राहीम के पुत्र इस्माइल की कुर्बानी की स्मृति में
मुहर्रममुहर्रम माहशोक पर्व; इमाम हुसैन की शहादत की याद; ताज़िया व मातमी जुलूस
शब-ए-बारातशाबान माह की 14वीं तारीखगुनाहों की माफी की रात; इबादत व कब्रिस्तान-ज़ियारत
शब-ए-क़द्ररमज़ान की 27वीं तारीखक़ुरान अवतरण की रात; हज़ार महीनों से श्रेष्ठ मानी जाती है
ईद मिलाद-उन-नबी (बारावफात)रबी-उल-अव्वल माह की 12वीं तारीखहज़रत मोहम्मद साहब का जन्मदिन व मृत्युदिन

राजस्थान में अनेक प्रसिद्ध सूफी उर्स आयोजित होते हैं, जिनमें अजमेर का उर्स सर्वाधिक प्रसिद्ध है (अध्याय 8 में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती का विस्तृत विवरण दिया जा चुका है — यहाँ राजस्थान के अन्य प्रमुख उर्स की सूची दी गई है)।

उर्सस्थानविशेषता
ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती का उर्सअजमेर, रज्जब माह (6 दिन)विश्व-प्रसिद्ध उर्स; जन्नती दरवाज़ा चौथे दिन खुलता है; कव्वाली का आयोजन
तारकीन का उर्सनागौर, रज्जब माहक़ाज़ी हमीदुद्दीन नागौरी से संबंधित; अजमेर के बाद दूसरा बड़ा उर्स
गलियाकोट का उर्सगलियाकोट (डूंगरपुर), मुहर्रम की 27वीं तारीखदाऊदी बोहरा समुदाय का प्रमुख उर्स; फखरुद्दीन पीर की दरगाह (अध्याय 8 से क्रॉस-रेफरेंस)
नरहड़ की दरगाह का मेलानरहड़ (झुंझुनू), कृष्ण जन्माष्टमीहज़रत हाजी शक्कर बादशाह; हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक
ख्वाजा निज़ामुद्दीन शाह का उर्सफतेहपुर (शेखावाटी), निर्धारित तिथिसूफी परंपरा से जुड़ा
पंजाबशाह बाबा का उर्सअजमेर, ऐतिहासिक"अढ़ाई दिन का झोंपड़ा" से जुड़ा

17जैन धर्म के प्रमुख पर्व

जैन धर्म भारत के प्राचीनतम धर्मों में से एक है, जिसकी मूल शिक्षाएँ अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य व अपरिग्रह पर आधारित हैं। जैन परंपरा के अनुसार कुल 24 तीर्थंकर हुए हैं, जिनमें अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर थे। जैन धर्म कर्म-सिद्धांत व आत्मशुद्धि पर विशेष बल देता है तथा मोक्ष को जीवन का अंतिम लक्ष्य मानता है।

पर्व / उत्सवतिथि / माहविशेष
ऋषभदेव जयंतीचैत्र कृष्ण नवमीप्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव की जयंती; केसरियाजी (उदयपुर) से जुड़ी
महावीर जयंतीचैत्र शुक्ल त्रयोदशी24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी का जन्मोत्सव; प्रभात फेरी व नगर-कीर्तन
पर्युषणभाद्रपद शुक्ल पंचमी-चतुर्दशीजैन धर्म का सबसे पवित्र पर्व; उपवास, तप, क्षमा-याचना
दस-लक्षण पर्वचैत्र, भाद्रपद, माघइस पर्व का संबंध लौकिक जगत से नहीं, अपितु आत्मा के गुणों से होता है
क्षमावाणी / संवत्सरीपर्युषण का अंतिम दिन"मिच्छा मि दुक्कड़म्" कहकर क्षमा-याचना
सुगंध दशमीभाद्रपद शुक्ल दशमीधार्मिक आस्था से जुड़ा पर्व
रोट तीजभाद्रपद शुक्ल तृतीयाविशेष रूप से जैन समाज में प्रचलित
दीपावली (निर्वाण दिवस)कार्तिक अमावस्याभगवान महावीर का निर्वाण दिवस

18सिख धर्म के प्रमुख पर्व

सिख धर्म की स्थापना 15वीं शताब्दी में गुरु नानक देव जी द्वारा की गई थी। यह धर्म एकेश्वरवाद पर आधारित है और ईश्वर को निर्गुण, निराकार व सर्वव्यापी मानता है। सिख धर्म में गुरु-परंपरा का विशेष महत्त्व है, जिसमें कुल दस गुरु हुए — अंतिम गुरु, गुरु गोविंद सिंह जी ने गुरु ग्रंथ साहिब को शाश्वत गुरु घोषित किया। सिख धर्म का मूल संदेश "नाम जपो, किरत करो और वंड छको" (ईश्वर-स्मरण, परिश्रम से आजीविका व बाँटकर खाना) पर आधारित है।

पर्वसमयविशेष
गुरु नानक जयंती (गुरुपर्व)कार्तिक पूर्णिमासिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी की जयंती
लोहड़ी13 जनवरीनई फसल के आगमन की खुशी में मनाया जाता है
बैसाखी13/14 अप्रैलगुरु गोविंद सिंह जी द्वारा खालसा पंथ की स्थापना (1699 ई.) की स्मृति में
होला मोहल्लाफाल्गुनवीरता व शस्त्र-कौशल का प्रदर्शन; आनंदपुर साहिब में आयोजित
शहीदी दिवसविभिन्न तिथियाँगुरु अर्जन देव व गुरु तेगबहादुर की शहादत की स्मृति में

19ईसाई एवं पारसी धर्म के प्रमुख पर्व

ईसाई धर्म की उत्पत्ति ईसा मसीह (यीशु मसीह) की शिक्षाओं से हुई, जिनका जन्म लगभग ईसा-पूर्व 4-6 के आसपास माना जाता है। यह धर्म एकेश्वरवाद पर आधारित है और ईश्वर को प्रेम, करुणा व क्षमा का स्रोत मानता है — इसका पवित्र ग्रंथ बाइबिल है। पारसी (ज़रथोस्त्री) धर्म की स्थापना ज़रथोस्त्र द्वारा प्राचीन ईरान (फारस) में की गई थी — यह धर्म एकेश्वरवाद पर आधारित है और आहुरमज़्दा को सर्वोच्च ईश्वर मानता है; इसका मूल सिद्धांत "सद्विचार, सद्वचन और सद्कर्म" पर आधारित है, तथा अग्नि को पवित्रता का प्रतीक माना जाता है।

ईसाई धर्म के प्रमुख पर्व
  • क्रिसमस (25 दिसंबर) — ईसा मसीह का जन्म
  • गुड फ्राइडे/ब्लैक फ्राइडे (मार्च-अप्रैल) — ईसा मसीह के बलिदान की स्मृति
  • ईस्टर (गुड फ्राइडे के बाद का पर्व) — ईसा मसीह के पुनरुत्थान का पर्व
पारसी धर्म के प्रमुख पर्व
  • नौरोज (21 मार्च) — पारसी नववर्ष दिवस
  • खोरदाद साल (अगस्त) — पैगंबर ज़रथोस्त्र का जन्मदिवस
  • गहांबार (वर्ष में 6 बार) — सृष्टि से जुड़े पर्व

20सिंधी समुदाय (झूलेलाल) के प्रमुख पर्व

सिंधी धर्म सिंध क्षेत्र की प्राचीन धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा है, जिसका केंद्र भगवान झूलेलाल की उपासना व वरुण देव से जुड़ी जल-पूजा है। यह परंपरा सामाजिक समरसता, सत्य, अहिंसा व मानव-कल्याण पर आधारित है। झूलेलाल जी का जन्म पाकिस्तान के सिंध प्रांत के धधू नामक स्थान पर हुआ था — इन्हें वरुण देव का अवतार माना जाता है, तथा इन्होंने सिंध की प्रजा को सिंध के राजा मिरखशाह के अत्याचारों से मुक्त कराया था। चेटीचंड, थड़ड़ी सातम व चालीसा महोत्सव जैसे पर्व सिंधी समाज की आस्था, संघर्ष व सांस्कृतिक पहचान को व्यक्त करते हैं।

पर्वतिथिविशेष
चेटीचंडचैत्र शुक्ल प्रतिपदाभगवान झूलेलाल जी का जन्मदिवस, इसी कारण इसे झूलेलाल जयंती भी कहते हैं
थड़ड़ी सातम (बड़ी सातम)भाद्रपद कृष्ण सप्तमीसिंधी समाज में ठंडा भोजन किया जाता है; इसी कारण इसे बायरा/बड़ी सातम भी कहते हैं; महिलाएँ पीपल वृक्ष पर चाँदी की मूर्ति रखकर पूजा करती हैं
चालीसा महोत्सव16 जुलाई से 24 अगस्त तक (40 दिन)सिंध प्रांत के बादशाह मिरखशाह के जुल्मों से परेशान होकर सिंधी समाज द्वारा 40 दिनों का व्रत; 40वें दिन झूलेलाल का अवतरण हुआ
अमुंड पर्वफाल्गुन शुक्ल चतुर्दशीइस दिन झूलेलाल जी की मृत्यु हुई थी

21नवीनतम अपडेट

नवीनतम अपडेट: पुष्कर मेला आज भी राजस्थान पर्यटन विभाग के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में से एक है, जिसमें प्रतिवर्ष हजारों विदेशी पर्यटक भाग लेते हैं तथा ऊँट-श्रृंगार प्रतियोगिता, सांस्कृतिक कार्यक्रम व हॉट-एयर बैलून सफारी जैसे आधुनिक आकर्षण भी अब इस पारंपरिक मेले का हिस्सा बन चुके हैं। राजस्थान पर्यटन विभाग द्वारा आयोजित "मरु महोत्सव" (जैसलमेर, माघ मास) पर्यटन व स्थानीय संस्कृति के संवर्धन का सशक्त माध्यम बन चुका है। बेणेश्वर मेला व मानगढ़ धाम मेला — दोनों को अब राज्य सरकार द्वारा जनजातीय गौरव व विरासत संरक्षण की दृष्टि से विशेष प्रशासनिक व सुरक्षा-व्यवस्था के साथ आयोजित किया जाता है, जिससे जनजातीय समुदाय की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय मंच पर अधिक दृश्यता मिल रही है।

🎯 राजस्थान के मेले एवं त्यौहार — उत्तर लेखन कोण (RAS Mains) 5-अंक: 60-70 शब्द | 10-अंक: लगभग 120 शब्द

📌 महत्वपूर्ण तथ्य

1. राजस्थान में त्योहारों का क्रम श्रावण मास की तीज से प्रारंभ माना जाता है, जो चैत्र मास की गणगौर पर समाप्त होता है — "तीज त्योहार बावड़ी, ले डूबी गणगौर"। 2. विक्रमी संवत् चंद्रमा आधारित पंचांग है; चंद्र वर्ष लगभग 354-355 दिन का व सौर वर्ष 365 दिन का होता है — अंतर संतुलित करने हेतु "अधिकमास" जोड़ा जाता है। 3. गणगौर चैत्र शुक्ल तृतीया को मनाई जाती है; जयपुर की गणगौर सवारी सबसे प्रसिद्ध है; बूँदी व जोधपुर राजपरिवार गणगौर नहीं मनाता। 4. पुष्कर मेला (अजमेर) कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक लगता है — यह राजस्थान का सबसे रंगीन व अंतरराष्ट्रीय स्तर का सबसे प्रसिद्ध मेला है, इसे "मेरवाड़ा का कुंभ" कहते हैं। 5. कपिल मुनि मेला (कोलायत, बीकानेर) कार्तिक पूर्णिमा को लगता है, इसे "जांगल प्रदेश का कुंभ" कहा जाता है। 6. बेणेश्वर मेला (डूंगरपुर) माघ पूर्णिमा को लगता है — इसे "आदिवासियों का कुंभ" कहते हैं, सोम-माही-जाखम नदियों के संगम पर संत मावजी से संबंधित। 7. मल्लीनाथ पशु मेला (तिलवाड़ा, बालोतरा) राजस्थान का सबसे पुराना पशु मेला है; वीर तेजाजी पशु मेला (नागौर) राजस्थान का प्रमुख पशु मेला है। 8. साहवा सिख मेला (साहवा, चूरू) कार्तिक पूर्णिमा को लगता है — यह राजस्थान का सबसे बड़ा सिख मेला है। 9. रामदेवरा मेला (जैसलमेर) भाद्रपद शुक्ल द्वितीया से एकादशी के मध्य लगता है — यह राजस्थान का सांप्रदायिक सद्भाव का सबसे बड़ा मेला माना जाता है। 10. राणी सती मेला (झुंझुनू) सती प्रथा से जुड़ा है; 1987 के रूपकंवर सती कांड के बाद सती-महिमामंडन पर कानूनी प्रतिबंध है (अध्याय 9 से क्रॉस-रेफरेंस)। 11. होली फाल्गुन पूर्णिमा को (होलिका दहन) व अगले दिन धुलंडी (चैत्र कृष्ण प्रतिपदा) को मनाई जाती है; राजस्थान में होली के 15 से अधिक क्षेत्रीय रूप प्रचलित हैं। 12. महाशिवरात्रि फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी को मनाई जाती है; शिवाड़ मेला (सवाई माधोपुर) में शिवलिंग को बारहवाँ ज्योतिर्लिंग होने की मान्यता है। 13. देवशयनी एकादशी (आषाढ़ शुक्ल) से देवउठनी एकादशी (कार्तिक शुक्ल) तक चातुर्मास काल में विवाह व मांगलिक कार्य वर्जित रहते हैं। 14. रक्षाबंधन श्रावण पूर्णिमा को मनाया जाता है; तटीय व्यवहार में इसे नारियल पूर्णिमा भी कहते हैं। 15. ईद-उल-फ़ित्र रमज़ान के बाद शव्वाल माह की पहली तारीख को, तथा ईद-उल-जुहा (बकरीद) ज़िलहिज्ज माह की 10वीं तारीख को मनाई जाती है। 16. अजमेर का ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती उर्स रज्जब माह में 6 दिनों तक चलता है — भारत के सबसे बड़े सूफी आयोजनों में गिना जाता है (अध्याय 8 से क्रॉस-रेफरेंस)। 17. महावीर जयंती चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को तथा पर्युषण पर्व भाद्रपद शुक्ल पंचमी से चतुर्दशी तक मनाया जाता है — जैन धर्म का सबसे पवित्र पर्व। 18. बैसाखी (13/14 अप्रैल) गुरु गोविंद सिंह द्वारा 1699 ई. में खालसा पंथ की स्थापना की स्मृति में मनाई जाती है। 19. चेटीचंड (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा) सिंधी समाज के भगवान झूलेलाल की जयंती है, जिन्हें वरुण देव का अवतार माना जाता है। 20. गोवर्धन पूजा (कार्तिक शुक्ल एकम) पर मंदिरों में अन्नकूट बँटता है — नाथद्वारा का अन्नकूट महोत्सव विशेष रूप से प्रसिद्ध है।

22अध्याय सारांश

राजस्थान के मेले व त्योहार इस धरती के कृषि-चक्र, धार्मिक आस्था व सामाजिक जीवन का समग्र प्रतिबिंब हैं। विक्रमी संवत् के बारह महीनों में से हर महीना अपने साथ कोई-न-कोई विशिष्ट पर्व लाता है — चैत्र की गणगौर से लेकर फाल्गुन की होली तक, एक पूरा वार्षिक चक्र पूर्ण होता है, जो कृषि-बुवाई, वर्षा-आगमन व फसल-कटाई जैसी प्राकृतिक घटनाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। पुष्कर, कपिल मुनि, बेणेश्वर व साहवा जैसे मेले न केवल धार्मिक आस्था के केंद्र हैं, बल्कि आर्थिक गतिविधि (पशु-व्यापार), पर्यटन-विकास व सांस्कृतिक पहचान के भी सशक्त माध्यम हैं।

इसी के साथ राजस्थान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ हिन्दू पर्वों के साथ-साथ मुस्लिम उर्स, जैन पर्व, सिख मेले, ईसाई-पारसी त्योहार व सिंधी झूलेलाल परंपरा — सभी को समान श्रद्धा व सम्मान से मनाया जाता है। रामदेवरा मेला, नरहड़ उर्स व अजमेर के ख्वाजा साहब की दरगाह जैसे स्थल इस बात के जीवंत प्रमाण हैं कि राजस्थान की सांस्कृतिक चेतना धार्मिक विविधता को बाँटने वाली नहीं, बल्कि जोड़ने वाली शक्ति रही है।

परीक्षा की दृष्टि से यह अध्याय अत्यंत तथ्य-सघन है — प्रत्येक मास, तिथि, मेला-स्थान व विशेषता का सही मिलान प्रत्यक्ष तथ्यात्मक प्रश्नों के लिए महत्वपूर्ण है, जबकि मेलों के सामाजिक-आर्थिक महत्व व धार्मिक सद्भाव पर आधारित विश्लेषणात्मक प्रश्न मुख्य परीक्षा के लिए उपयोगी हैं। अगले अध्याय में हम राजस्थान के सामाजिक जीवन — रीति-रिवाज, वेशभूषा एवं आभूषण — का अध्ययन करेंगे, जो इन्हीं मेलों व त्योहारों में प्रदर्शित होने वाली सामाजिक परंपराओं की गहराई को उजागर करेगा।

माहप्रमुख त्योहारप्रमुख मेला
चैत्रगणगौर, चैत्र नवरात्र, रामनवमी, हनुमान जयंतीकैलादेवी मेला (करौली), सालासर बालाजी मेला (चूरू)
वैशाखअक्षय तृतीया, बुद्ध पूर्णिमाबाणगंगा मेला, मातृकुंडिया मेला (चित्तौड़गढ़)
ज्येष्ठवट सावित्री, गंगा दशहरा, निर्जला एकादशीसीता माता मेला (प्रतापगढ़)
श्रावणतीज, रक्षाबंधन, नाग पंचमीफतेहसागर झील मेला (उदयपुर), बुड्ढा जोहड़ मेला
भाद्रपदजन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी, तेजा दशमीरामदेवरा मेला (जैसलमेर), नागौर पशु मेला
आश्विनशारदीय नवरात्र, दशहरा, शरद पूर्णिमादशहरा मेला (कोटा)
कार्तिकदीपावली, गोवर्धन पूजा, देवउठनी एकादशीपुष्कर मेला (अजमेर), कपिल मुनि मेला (बीकानेर)
माघबसंत पंचमीबेणेश्वर मेला (डूंगरपुर), मानगढ़ धाम मेला
फाल्गुनमहाशिवरात्रि, होली-धुलंडीशिवाड़ मेला (सवाई माधोपुर), मेहंदीपुर बालाजी मेला
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