कल्पना कीजिए — जैसलमेर के रेतीले धोरों के बीच एक राजपूत योद्धा अपनी विवाह की वेदी छोड़कर, हाथ में भाला लिए, गायों को लुटेरों से बचाने दौड़ पड़ता है — यह पाबूजी हैं। कल्पना कीजिए — एक जाट किसान अपनी बहन की गायों को बचाते हुए, सर्प-दंश सहते हुए भी अपना वचन नहीं तोड़ता — यह तेजाजी हैं। और कल्पना कीजिए — एक राजा अपने राज्य को त्यागकर, मक्का से आए पीरों को भोजन कराकर उन्हें चमत्कार दिखाता है, और वे स्वयं उसे "पीरों का पीर" कहकर सम्मानित करते हैं — यह बाबा रामदेवजी हैं। राजस्थान की धरती पर सैकड़ों ऐसे वीर पुरुष हुए, जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर, अपने वचन व कर्तव्य का पालन किया — और मृत्यु के बाद जनमानस ने उन्हें भगवान का दर्जा दे दिया। यही है "लोक देवता" की अवधारणा — जहाँ इतिहास और आस्था इतनी घुल-मिल जाती है कि यह बता पाना कठिन हो जाता है कि कहानी कहाँ खत्म होती है और भक्ति कहाँ शुरू होती है। इसी प्रकार, राजस्थान की लोक देवियाँ — करणी माता, जीण माता, आवड़ माता — भी हर राजवंश, हर समुदाय की रक्षक व कुलदेवी के रूप में पूजी जाती हैं। इस अध्याय में हम इसी अद्भुत लोक-आस्था परंपरा को समझेंगे।
"पाबू, हड़बू, रामदे, मंगल्या मेहा। पंच पीर पधार ज्यो, गोगाजी जहां॥" — राजस्थान के पंचपीर — पारंपरिक लोक-दोहा
लोक देवता वे महापुरुष होते हैं, जिन्होंने अपने जीवन में अलौकिक चमत्कारों से परिपूर्ण एवं वीरता से युक्त कार्य किए, तथा मृत्यु के बाद जनमानस में देवता के रूप में पूजे जाने लगे। इनमें से अधिकांश किसी सामाजिक कार्य — गायों की रक्षा, वचन-पालन, न्याय — के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने वाले वीर योद्धा थे (इनकी गाथाओं का साहित्यिक व मौखिक-प्रदर्शन पक्ष अध्याय 7 में विस्तार से पढ़ा जा चुका है — यहाँ हम इनके धार्मिक पूजा-पक्ष, मंदिर, मेले व चमत्कारों का अध्ययन करेंगे)। राजस्थान में पाँच प्रमुख लोक देवताओं को सम्मिलित रूप से "पंचपीर" कहा जाता है, जिनका उल्लेख उपरोक्त लोक-दोहे में मिलता है — पाबूजी, हड़बूजी, रामदेवजी, मेहाजी व गोगाजी।
⏰ काल/निर्माता: जन्म — 1352 ई., भाद्रपद शुक्ल द्वितीया, उंडूकाश्मीर गाँव (शिव तहसील, बाड़मेर); पिता — अजमाल जी तंवर, माता — मैणादे; पत्नी — नेतलदे (अमरकोट के राजा दल्लेसिंह सोढ़ा की पुत्री); भाई — बीरमदेव (बलराम का अवतार); धर्म बहन — डालीबाई मेघवाल; गुरु — बालीनाथ
⭐ विशेषता: अन्य नाम — रामसा पीर (मुसलमानों द्वारा), रुणिचा रा धणी, "पीरों के पीर"; श्रीकृष्ण का अवतार (हिन्दुओं द्वारा); मक्का से पधारे पंचपीरों को भोजन कराते समय अपना कटोरा प्रस्तुत कर उन्हें चमत्कार दिखाया, जिससे प्रभावित होकर उन पीरों ने रामदेवजी को "पीरों का पीर" कहा; बचपन में सातलमेर गाँव (पोकरण) के लोगों को भैरव नामक क्रूर व्यक्ति के आतंक से मुक्ति दिलाई; शुद्धि आंदोलन चलाया तथा छुआछूत का विरोध किया; समाधि — 1458 ई. में भाद्रपद शुक्ल एकादशी को रुणिचा (जैसलमेर) में राम सरोवर की पाल पर; रुणिचा मंदिर का निर्माण महाराजा गंगासिंह (बीकानेर) द्वारा करवाया गया
रामदेवजी राजस्थान के एकमात्र ऐसे लोक देवता हैं, जो स्वयं कवि भी थे — इनकी प्रसिद्ध रचना "चौबीस बाणियाँ" है (साहित्यिक विवरण अध्याय 7 में)। इनकी सवारी लीला/नीला/रेवंत घोड़ा है; प्रतीक चिन्ह — पगल्या (पत्थर पर उत्कीर्ण पदचिन्ह, क्योंकि ये मूर्ति-पूजा के विरोधी थे); नेजा — रामदेवजी की पंचरंगी व सफेद ध्वजा; देवरा — इनके मंदिर को कहा जाता है।
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| प्रमुख मेला | प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल द्वितीया से एकादशी के मध्य रामदेवरा (जैसलमेर) — राजस्थान का सांप्रदायिक सद्भाव का सबसे बड़ा मेला |
| अन्य पूजा स्थल | मसूरिया (जोधपुर), बिराटियां (ब्यावर), बिठूजा (बालोतरा), रामदेवधाम सूरताखेड़ा (चित्तौड़गढ़), हलदीना (अलवर), खुण्डियावास (डीडवाना-कुचामन — "राजस्थान का मिनी रामदेवरा"), छोटा रामदेवरा (जूनागढ़, गुजरात), रामदेवरा नवलगढ़ (झुंझुनू) |
| भक्त एवं प्रथाएँ | जातरू — रामदेवजी के तीर्थयात्री; रिखियां — रामदेवजी के मेघवाल भक्त; रामदेव जी का जागरण भाद्रपद द्वितीया व एकादशी की रात्रि को होता है; "आंण" — रामदेवजी के अनुयायियों की सौगंध को कहते हैं; कामड़िया पंथ — रामदेवजी द्वारा स्थापित, प्रमुख केंद्र पादरला गाँव (पाली), पोकरण (जैसलमेर) व डीडवाना (नागौर) |
| कला परंपरा | तेरहताली नृत्य — कामड़िया जाति की महिलाओं द्वारा (अध्याय 4 से क्रॉस-रेफरेंस); फड़ — कामड़ जाति के भोपे रावणहत्था वाद्य यंत्र के साथ गाते हैं |
⏰ काल/निर्माता: जन्म — 1073 अथवा 1074 ई., खरनाल, नागौर, माघ शुक्ल चतुर्दशी; पिता — ताहड़जी (नागवंशीय जाट), माता — रामकुँवरी; पत्नी — पेमलदे (पनेर के रामचन्द्र की पुत्री, सती हुईं); बहन — राजल; सवारी — लीलण/सिणगारी घोड़ी
⭐ विशेषता: अन्य नाम — काला व बाला के देवता, कृषि-कार्य के उपकारक देवता, गौरक्षक देवता, गायों का मुक्तिदाता, शिव का 11वाँ अवतार, सहरिया जाति के आराध्य देव; समाधि — 23 अगस्त 1103 ई. भाद्रपद शुक्ल दशमी, सुरसुरा में — गायों की रक्षा करते हुए साँप (बिलाू नाग) द्वारा डसे जाने से; प्रतीक चिन्ह — तलवार लिए हुए अश्वारोही, जीभ पर साँप-दंशित पाषाण मूर्ति
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| प्रमुख मेला | भाद्रपद शुक्ल दशमी ("तेजा दशमी") — परबतसर (कुचामन-डीडवाना) में सबसे बड़ा पशु मेला; पहले मंदिर सुरसुरा में था, महाराजा अभयसिंह के काल में मूर्ति परबतसर लाई गई |
| प्रमुख पूजा स्थल | खरनाल (नागौर), सुरसुरा (अजमेर), सेंदरिया (अजमेर — जहाँ सांप ने काटा), मण्डवारिया (अजमेर — लाछा गुजरी की गायों को मेर के मीणाओं से छुड़ाया), परबतसर (कुचामन-डीडवाना), तेजा चौक (ब्यावर — सबसे पुराना स्थान), बासी दुगारी (बूँदी) |
| कला एवं गीत | तेजा टेर — किसानों द्वारा खेतों में हल जोतते समय गाए जाने वाले तेजाजी के गीत (गायन परंपरा अध्याय 7 में विस्तृत) |
| आधुनिक संदर्भ | तेजा लिफ्ट नहर — इंदिरा गांधी नहर परियोजना की एक शाखा; "वीर तेजाजी" नामक फिल्म रामराज नाहटा द्वारा बनाई गई; लोक-मान्यता — तेजाजी के थान पर आने मात्र से ही साँप व कुत्ते के काटने का उपचार हो जाता है |
⏰ काल/निर्माता: जन्म — 946 ई. (वि.सं. 1003), ददरेवा, चूरू; पिता — जेवरजी चौहान, माता — बाछलदे; पत्नी — कोलूमण्ड (फलोदी) की राजकुमारी "केलम दे"; गुरु — गोरखनाथ; घोड़ी — नीली घोड़ी; वाद्य यंत्र — डेरू, मादल
⭐ विशेषता: अन्य नाम — जाहरपीर, नागों के देवता, नागराज का अवतार, विष्णु का अवतार, गोगा पीर, जीवित पीर, बांगड़ का राजा; वीरगति — 1276 ई. में जोधपुर के देचू गाँव में देवल चारण की गायों को अपने बहनोई जींदराव खींची से छुड़ाते हुए (साहित्यिक/गाथा-विवरण अध्याय 7 में); महमूद गजनवी के साथ भीषण युद्ध किया, जिससे प्रभावित होकर गजनवी ने इन्हें "जाहरपीर" की उपाधि दी
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| समाधि व मंदिर | शीष मेड़ी — जहाँ सिर गिरा (ददरेवा, चूरू); धड़ मेड़ी — जहाँ शरीर गिरा (गोगामेड़ी, नोहर-हनुमानगढ़) — यह मंदिर "मकबरा शैली" में बना है, जिसके मुख्य द्वार पर "बिस्मिल्लाह" लिखा है; निर्माण फिरोजशाह तुगलक द्वारा; वर्तमान स्वरूप महाराजा गंगासिंह (बीकानेर) द्वारा |
| प्रमुख मेला | प्रतिवर्ष गोगानवमी (भाद्रपद कृष्ण नवमी) — गोगामेड़ी, हनुमानगढ़; भाद्रपद मास में हिन्दू पुजारी तथा अन्य मास में मुस्लिम पुजारी (चायल) पूजा करते हैं |
| सामाजिक पक्ष | कायमखानी मुसलमान गोगाजी को अपना वंशज मानते हैं — यह हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक है; "गाँव-गाँव गोगो अर गाँव-गाँव खेजड़ी" लोकोक्ति खेजड़ी वृक्ष के नीचे निवास करने के कारण प्रचलित है |
| पूजा पद्धति | मूर्ति के स्थान पर एक पत्थर पर सर्प की आकृति अंकित की जाती है; साँकल नृत्य — भक्त लोहे की साँकलों के गुच्छे अपनी पीठ पर उठा-उठाकर मारते हैं, जिसे "छाया चढ़ना" कहते हैं; गोगा राखड़ी — किसान वर्षा के बाद खेत जोतने से पहले हल व बैल को 9 गाँठों वाली राखी बाँधते हैं |
⏰ काल/निर्माता: जन्म — 1239 ई., चैत्र अमावस्या, कोलूमण्ड (फलोदी); पिता — धांधलजी, माता — कमलादे; पत्नी — फूलमदे/सुप्यारदे (अमरकोट के राजा सूरजमल सोढ़ा की पुत्री); घोड़ी — केसर कालमी (काले रंग की घोड़ी, देवल चारणी द्वारा प्रदत्त); सहयोगी — हरमल, चाँदा व डामा (भील भाई), सावंत जी राठौड़, सलखा जी सोलंकी
⭐ विशेषता: अन्य नाम — लक्ष्मण का अवतार, ऊँटों के देवता, गौरक्षक देवता एवं प्लेग-रक्षक देवता, हाड़-फाड़ के राठौड़ देवता; मारवाड़ में ऊँट लाने का श्रेय इन्हें दिया जाता है — इसीलिए राइका/रेबारी (ऊँटों की पालक जाति) व देवासी समाज के आराध्य देव हैं; इनकी ध्वजा राजस्थान की सबसे बड़ी ध्वजा मानी जाती है; इन्होंने गुजरात के सात थोरी भाइयों की रक्षा की, तथा गुजरात के शासक मिर्जा खाँ व दूदा सूमरा को युद्ध में हराया
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| पूजा-प्रदर्शन परंपरा | पाबूजी की फड़ — सर्वाधिक लोकप्रिय फड़, रावणहत्था वाद्य यंत्र के साथ नायक जाति के भोपों द्वारा गाई जाती है (अध्याय 3 व 7 से क्रॉस-रेफरेंस); पाबू धणी री वाचना — थोरी जाति के लोगों द्वारा सारंगी के साथ पाबूजी का यशोगान |
| प्रमुख मेला | चैत्र अमावस्या को कोलूमण्ड गाँव (फलोदी) में; कोलू के अलावा उदयपुर के आहड़ में भी प्रतिवर्ष मेला लगता है |
| सामाजिक पक्ष | मेहर जाति के मुसलमान इन्हें पीर मानकर पूजा करते हैं |
⏰ काल/निर्माता: वास्तविक नाम — गांगदेव राठौड़ (शेरगढ़ के सामंत); पिता — वीरमदेव, भाई — राव चूड़ा; गुरु — जालंधरनाथ; सवारी — सिया बैलगाड़ी/सियार
⭐ विशेषता: रामदेवजी की प्रेरणा से ही हड़बूजी ने शस्त्र त्यागकर बालीनाथ से दीक्षा ली और जोगी बने; राव जोधा (जोधपुर) को मंडोर जीतने का आशीर्वाद देते हुए एक कटार भेंट की — मंडोर विजय के पश्चात जोधा ने बिगटी (फलोदी) की जागीर प्रदान की; ये गौ-सेवक देवता के रूप में प्रसिद्ध हैं — विकलांग गायों के लिए घास/चारा माँग कर लाते थे
⏰ काल/निर्माता: जन्म — कृष्ण जन्माष्टमी (भाद्रपद कृष्ण अष्टमी), तापू गाँव; गुहिलवंशीय मांगलिया राजपूत, मंडोर शासक राव चूड़ा के समकालीन; पिता — केलूजी, माता — मायदे; पत्नी — हीरादे, सुहागदे; धर्म बहन — पाना गुजरी (पुष्कर तीर्थयात्रा के दौरान); सवारी — किरड़ काबरा घोड़ा; कामड़िया पंथ से दीक्षित
⭐ विशेषता: वीरगति — जैसलमेर के राव रांणगदेव भाटी से पाना गुजरी की गायों की रक्षा करते हुए (रातड़िया मंगरा, बीकानेर); मेला — बापणी, ओसियां (कृष्ण जन्माष्टमी को); काव्य — "वीर मेहा प्रकाश" (जसदान बीठू द्वारा रचित); लोक-मान्यता — इनके भोपों के वंश में वृद्धि नहीं होती, गोद लेकर वंश आगे चलाते हैं — मांगलिया जाति के इष्ट देव
⏰ काल/निर्माता: जन्म — 1243 ई., माघ शुक्ल षष्ठी, गोठ दड़ावता आसींद (भीलवाड़ा); वास्तविक नाम — उदयसिंह (जाति — बगड़ावत गुर्जर); पिता — सवाईभोज, माता — सेढू देवी; पत्नी — पीपलदे (धार नरेश जयसिंह की पुत्री); घोड़ा — लीलाधर/लीलागर
⭐ विशेषता: अन्य नाम — आयुर्वेद ज्ञाता, औषधि का देवता, विष्णु का अवतार, कमल-अवतरित देवता, "क्रांति के जनक"; प्रमुख मंदिर — सवाईभोज का मंदिर (गोठ दड़ावता आसींद, भीलवाड़ा — इसमें मूर्ति की बजाय ईंटों की पूजा होती है, प्रसाद के रूप में छाछ-राबड़ी चढ़ाई जाती है), देवधाम मंदिर (मासी, बांडी खेराकुशी, जोधपुरिया, टोंक), देवडूंगरी मंदिर (चित्तौड़गढ़ — निर्माण राणा सांगा द्वारा), देवमाली मंदिर (ब्यावर — देहांत स्थल)
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| फड़ चित्रकला | गुर्जर जाति के भोपे, जंतर वाद्य यंत्र के साथ गाथा गाते हैं; यह सबसे प्राचीन, सबसे लंबी (24 हाथ) तथा सर्वाधिक प्रसंगों वाली फड़ है (अध्याय 3 व 7 से क्रॉस-रेफरेंस) |
| डाक टिकट | भारतीय डाक विभाग द्वारा 1992 में ₹5 का डाक टिकट जारी — देवनारायणजी की फड़ पर टिकट जारी होने वाले एकमात्र लोक देवता; 2011 में संचार मंत्रालय द्वारा पुनः ₹5 टिकट जारी |
| आधुनिक संदर्भ | 1111वीं जयंती पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मालासेरी डूंगरी स्वयं आए थे; प्रसिद्ध कथा-संकलन — लक्ष्मी कुमारी चूंडावत रचित "बागड़ावत" |
⏰ काल/निर्माता: जन्म — 1544 ई., महेवा (बाड़मेर); पिता — राव तीड़ाजी/सलखाजी (मारवाड़ के राजा), माता — जाणीदे; पत्नी — रूपादे (स्वयं भी लोकदेवी मानी जाती हैं, इनका मंदिर तिलवाड़ा के समीप मालाजाल में स्थित है); गुरु — उगमसी भाटी (1398 ई. में रूपादे की प्रेरणा से दीक्षा)
⭐ विशेषता: कल्लाजी को चार भुजाओं व दो सिरों वाला (चतुर्भुज) देवता माना जाता है; 1567-68 ई. में अकबर द्वारा चित्तौड़ पर आक्रमण (चित्तौड़ का तीसरा साका) के समय जयमल मेवाड़ी घायल हो गए, तब कल्लाजी ने जयमल को अपने कंधे पर बिठाकर दो तलवारें जयमल के हाथों में दीं तथा स्वयं दो तलवारें लेकर युद्ध किया; प्रमुख पीठ — रनेला (सलूम्बर); आराध्य देवी — नागणेची माता; मीराबाई के भतीजे माने जाते हैं
⏰ काल/निर्माता: यहाँ पंचमुखी पहाड़ी पर घोड़े पर सवार तल्लीनाथ जी की मूर्ति स्थापित है
⭐ विशेषता: अन्य नाम — ओरण के देवता, जालौर के प्रसिद्ध लोकदेवता, प्रकृति-प्रेमी लोकदेवता; एकमात्र ऐसे लोक देवता जिन्होंने वृक्ष काटने पर रोक लगाई — यह इन्हें बिश्नोई संप्रदाय के पर्यावरण-संरक्षण दर्शन से जोड़ता है (अध्याय 8 से क्रॉस-रेफरेंस); जहरीले जीव के काटने पर उपचार हेतु इनकी पूजा की जाती है
⏰ काल/निर्माता: जन्म — 1358 ई., मारवाड़ के महेवा (बाड़मेर); पिता — राव तीड़ाजी/सलखाजी; गुरु — भैरवनाथ; अन्य नाम — शेषनाग का अवतार, कहेर, कल्याण, कमधज, बाल ब्रह्मचारी, योगी, "दुल्हे के वीर वेश में मरने वाला देवता"
⭐ विशेषता: 1378 ई. में मालवा के सूबेदार निजामुद्दीन व फिरोजशाह तुगलक की संयुक्त सेना ने तेरह टुकड़ियों द्वारा हमला किया, जिसे मल्लीनाथ जी ने दुर्गाष्टमी के दिन हराया; 1399 ई. में मारवाड़ में हरिकीर्तन का आयोजन किया; कुंडा पंथ — मल्लीनाथ जी द्वारा स्थापित एक वाममार्गी पंथ
| लोक देवता | स्थान/काल | विशेषता |
|---|---|---|
| रूपनाथ जी (झरड़ाजी) | जन्म — कोलूमण्ड (फलोदी) | पाबूजी के भतीजे व बूढ़ोजी राठौड़ के पुत्र; इन्होंने जींदराव खींची को मारकर पाबूजी की मृत्यु का बदला लिया; प्रमुख पूजा स्थल — कोलूमण्ड (फलोदी), सिंभूदड़ा (बीकानेर); मूर्ति के स्थान पर साँप की बाँबी (सर्प रक्षक देवता के प्रतीक स्वरूप); मेला — प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल नवमी को |
| डूंगरजी-जवाहरजी | बाथोट-पाथोड़ा गाँव | गरीबों के देवता — अंग्रेजों व धनवानों से धन लूटकर गरीबों में बाँट देते थे (रॉबिन हुड से तुलना); अंग्रेजों ने डूंगरजी को आगरा जेल में बंद किया, जवाहरजी (भतीजा) ने करणा मीणा, सविता बाई व लोहट जाट के साथ आगरा जेल से मुक्त कराया; इन्होंने अंग्रेजों की आगरा जेल एवं नसीराबाद छावनी (1847) लूटी; शरण — महाराजा रतनसिंह (बीकानेर) व तख्तसिंह (जोधपुर) ने दी |
उपर्युक्त प्रमुख लोक देवताओं के अतिरिक्त राजस्थान में अनेक क्षेत्रीय व जाति-विशेष लोक देवता प्रचलित हैं, जिनकी संक्षिप्त परंतु परीक्षोपयोगी जानकारी नीचे दी गई है।
| लोक देवता | स्थान/काल | विशेषता |
|---|---|---|
| वीर फत्ताजी | जन्म — साँठू गाँव (जालौर), गज्जारणी परिवार में | जालौर के लोक देवता; लुटेरों से कठौड़ी गाँव के ब्राह्मणों की गायें छुड़ाते हुए प्राणोत्सर्ग; मेला — प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल नवमी |
| झुंझार जी | मुख्य मंदिर — स्यालोदड़ा गाँव (सीकर) | गायों की रक्षा करते हुए वीरगति प्राप्त; बिना छत का मंदिर (पाँच स्तंभों वाला), जिसमें दूल्हा-दुल्हन एवं तीन भाइयों की मूर्तियों की पूजा की जाती है; मेला — रामनवमी को; स्थान सामान्यतः खेजड़ी वृक्ष के नीचे |
| केसरिया कुँवरजी | जन्म — 1301 ई., रीड़ी गाँव (बीकानेर) | पिता — राव महेंद्र, माता — सुल्तानी देवी; जाखड़ समाज (जाट) के कुलदेवता; मुस्लिम लुटेरों से गायों की रक्षा की; अन्य नाम — जैतमालोत राठौड़, घोड़ा रक्षक देवता |
| बग्गाजी | 1393 ई., राठाली जोहड़ी (बीकानेर) | मालाणी प्रदेश के राड़धरा क्षेत्र के लोकदेवता; मेला — प्रतिवर्ष 14 अक्टूबर, बग्गा गाँव (पुराना नाम गोमटिया), डूंगरगढ़ (बीकानेर) |
| आलमजी | जन्म — नगा गाँव (जैसलमेर) | मेला — भाद्रपद शुक्ल द्वितीया |
लोक देवताओं की एक विशेष श्रेणी क्षेत्र या ग्राम-रक्षक देवताओं की है, जिन्हें प्रत्येक गाँव अथवा क्षेत्र में स्थानीय रक्षक के रूप में पूजा जाता है — इनका किसी एक ऐतिहासिक व्यक्ति से संबंध होना आवश्यक नहीं है, अपितु ये सामान्य लोक-आस्था के प्रतीक हैं।
| देवता प्रकार | विशेषता | पूजा-उद्देश्य / प्रसिद्ध स्थल |
|---|---|---|
| भैरवजी (क्षेत्रपाल) | संपूर्ण राजस्थान में पूजनीय क्षेत्रपाल देवता; मारवाड़ राज्य में सर्वाधिक प्रसिद्ध; जोधपुर राजघराने के मांगलिक अवसरों पर इनकी पूजा की जाती है | मेला — सारंगवास गाँव, पाली (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से द्वितीया) |
| भोमियाजी | भूमि के रक्षक देवता; क्षेत्रपाल के सर्वाधिक मंदिर डूंगरपुर जिले में; "आधे में देवी-देवता तथा आधे में खेतला" — मारवाड़ में प्रचलित कहावत | नाहरसिंह भोमिया — जयपुर नाहरगढ़ दुर्ग के समीप; सूरजमल जी भोमिया — दौसा दुर्ग के समीप |
| खेतलाजी | ग्राम-रक्षक लोक देवता के रूप में प्रतिष्ठित | — |
| इलोजी | हिरण्यकश्यप की बहन होलिका के होने वाले पति माने जाते हैं; मारवाड़ क्षेत्र में "छेड़छाड़ के लोकदेवता" के नाम से पूजित; महिलाएँ अच्छे पति व पुरुष अच्छी पत्नी की प्राप्ति हेतु पूजा करते हैं | इलोजी की बारात — होली पर, बाड़मेर क्षेत्र में |
परीक्षा में लोक देवताओं के जन्म-वर्ष व वाहन के मध्य गड़बड़ी होना एक सामान्य त्रुटि है — नीचे दी गई तालिका के माध्यम से इसे सुव्यवस्थित रूप से याद रखें।
| लोक देवता | जन्म वर्ष | वाहन/सवारी |
|---|---|---|
| गोगाजी | 946 ई. | नीली घोड़ी / गोगा बप्पा |
| पाबूजी | 1239 ई. | केसर कालमी (घोड़ी) |
| देवनारायणजी | 1243 ई. | लीलागर घोड़ा |
| तेजाजी | 1073/1074 ई. | लीलण / सिणगारी घोड़ी |
| हड़बूजी | 1391 ई. | सिया बैलगाड़ी / सियार |
| रामदेवजी | 1352 ई. | नीला/लीला/रेवंत घोड़ा |
| मल्लीनाथ जी | 1358 ई. | — |
| मेहाजी | 14वीं सदी | किरड़ काबरा घोड़ा |
| कल्लाजी राठौड़ | 1544 ई. | — |
| तल्लीनाथ जी | 1544 ई. | — |
जिस प्रकार राजस्थान में लोक देवताओं की पूजा प्रचलित है, उसी प्रकार लोक देवियों (कुलदेवियों) की पूजा भी अत्यंत व्यापक है। लगभग प्रत्येक राजवंश, जाति व समुदाय की अपनी एक कुलदेवी होती है, जिसे परिवार व वंश की रक्षक माना जाता है — यह विषय RAS प्रारंभिक परीक्षा (Pre) में अत्यंत बार-बार पूछा जाता है।
⏰ काल/निर्माता: जन्म — 1387 ई., सुआप गाँव (फलोदी); बचपन का नाम — रिद्धि बाई; पिता — मेहाजी चारण, माता — देवल बाई; विवाह — देशनोक (बीकानेर) निवासी देपाजी बीठू के साथ
⭐ विशेषता: अन्य नाम — दुर्गा देवी का अवतार, जगत माता का अवतार, जोगमाया, "दाढ़ी वाली ढोकरी"/चूहों वाली देवी; करणी माता की छह बहनें थीं (छठी करणी माता, सातवीं गुलाब कंवर) — करणी माता ने बहन गुलाब कंवर के बेटे लाखन को दत्तक पुत्र बनाया, जो श्रावण पूर्णिमा को कोलायत झील में डूबकर मर गया, इसी कारण चारण समुदाय के लोग कपिलमुनि मेले (कोलायत) में नहीं जाते; बीकानेर के राव बीका ने करणी माता की कृपा से राठौड़ वंश की स्थापना की; करणी माता ने 12 मई 1459 को मेहरानगढ़ दुर्ग की नींव अपने हाथों से रखी; मृत्यु — 1538 ई. में देशनोक में
⏰ काल/निर्माता: जन्म — घांघू गाँव, चूरू; बचपन का नाम — जयंती/जैवण बाई; पिता — घंघ, भाई — हर्ष (भैरव का रूप)
⭐ विशेषता: चौहानों की कुलदेवी तथा सीकर के चौहानों की आराध्य देवी; हर्ष पर्वत शिलालेख — मंदिर का निर्माण पृथ्वीराज चौहान प्रथम के सामंत हट्टड़ द्वारा 1064 ई. में करवाया गया; अन्य नाम — जयंती देवी (पुराणों में), भ्रामरी देवी, "भूरी की रानी" (मधुमक्खियों की देवी) — औरंगजेब का आक्रमण असफल किया
| लोक देवी | मंदिर/स्थान | विशेषता |
|---|---|---|
| आवड़ माता (स्वांगिया माता) | लोद्रवा (जैसलमेर) | जैसलमेर के भाटी राजवंश की कुलदेवी; अन्य नाम — स्वांगिया/सांगिया जी/सुग्गा माता/पथवारी/उत्तर की ढाल/तेमड़ा ताई (तेमड़ा भाखर पर स्थान होने के कारण)/हिंगलाज माता; "स्वांगिया" शब्द का अर्थ — मुड़ा हुआ भाला; जैसलमेर के भाटी राजवंश के राज्य-चिन्ह में सबसे ऊपर पालमी चिड़िया (शगुन) तथा स्वांग (मुड़ा हुआ भाला) देवी के हाथ में दिखाया गया है; चिरजा — माता का पाठ; सात देवियों की सम्मिलित प्रतिमा को "स्वांगिया ठाला" कहा जाता है; हिंगलाज माता का अवतार चारण मानते हैं |
| शीला माता | आमेर दुर्ग (जयपुर) — जलेब चौक | आमेर के कच्छवाहा वंश की इष्ट देवी; मूर्ति — अष्टभुजी भगवती, काले पत्थर की; 16वीं सदी में मिर्जा राजा मानसिंह प्रथम ने पूर्वी बंगाल के राजा केदार को हराकर जस्सौर नामक स्थान से यह मूर्ति लाई (अध्याय 1 — आमेर दुर्ग से क्रॉस-रेफरेंस); मेले — नवरात्र में षष्ठी एवं अष्टमी पर; प्रथा — पहले नरबलि, बाद में बकरे की बलि (अब बंद), ढाई प्याला शराब चढ़ती है, भक्तों को शराब व जल का चरणामृत दिया जाता है |
| लोक देवी | मंदिर/स्थान | विशेषता |
|---|---|---|
| आई माता | बिलाड़ा (जोधपुर); जन्म — अंबापुर (गुजरात) | सीरवी जाति की कुलदेवी; रामदेवजी की शिष्या; नवदुर्गा का अवतार मानी जाती हैं; आई माता द्वारा बनाए गए 11 नियमों का पालन करने वाले "11 डोरा पंथी" कहलाते हैं; आई माता मंदिर में अखंड दीपक जलता है, जिसकी ज्योति से केसर टपकता है — इसे "सुगाली" कहा जाता है; बडेर — माता का थान (समाधि स्थल) को कहा जाता है |
| राणी सती | झुंझुनू — भारत का सबसे बड़ा सती मंदिर | उपनाम — दादीजी/नारायणी बाई; पति — तनधनदास अग्रवाल; अग्रवालों की कुलदेवी; हिसार के नवाब के सैनिकों द्वारा अपने पति की हत्या के पश्चात, पति की चिता पर प्राणोत्सर्ग कर सती हुईं (माघ कृष्ण नवमी); मेला — भाद्रपद कृष्ण अमावस्या; खेमी सती मंदिर — भारत का दूसरा बड़ा सती मंदिर (झुंझुनू); महत्वपूर्ण नोट — 1987 में रूपकंवर सती कांड के पश्चात भारत सरकार द्वारा सती-प्रथा को महिमामंडित करने वाले पूजन एवं मेलों पर कानूनी प्रतिबंध लगा दिया गया है |
| लोक देवी | मंदिर/स्थान | विशेषता |
|---|---|---|
| कैला देवी | त्रिकूट पर्वत, करौली जिला (काली सिल नदी के किनारे) | गुर्जरों व मीणाओं की इष्ट देवी; अन्य नाम — अन्नपूर्णा माता/जामवंती (पौराणिक नाम); मंदिर 1900 में गोपालसिंह द्वारा; मंदिर की सभामण्डप की बाहरी दीवार पर 999 ई. का एक शिलालेख उत्कीर्ण है, जिसमें चौहान शासकों वाक्पतिराज, सिंहराज व दुल्हराज की प्रशंसा की गई है; मेला — लक्खी मेला (चैत्र शुक्ल अष्टमी); लांगुरिया गीत — कैला देवी की भक्ति में गाया जाता है (घुटकण नृत्य, जोगणिया नृत्य); बोहरा भगत की छतरी मंदिर के सामने स्थित है |
| चामुण्डा माता | मंडोर (जोधपुर) | गुर्जर प्रतिहार राजवंश की कुलदेवी; मूर्ति — काले प्रस्तर की महिषासुरमर्दिनी की; इन्हें महिषासुरमर्दिनी कहा जाता है तथा इनका दूसरा रूप बाज/चील माना जाता है; राव जोधा ने मेहरानगढ़ दुर्ग जोधपुर में मंदिर का निर्माण करवाया; जसराज चौपड़ा कमेटी — 30 सितंबर 2008 को नवरात्र के अवसर पर मंदिर में मची भगदड़ (जिसमें 214 लोगों की मृत्यु हुई) की जाँच हेतु गठित की गई थी |
| लोक देवी | मंदिर/स्थान | विशेषता |
|---|---|---|
| शाकंभरी माता | सांभर (एक मंदिर) व सहारनपुर (दूसरा मंदिर) | सांभर के चौहानों की कुलदेवी; निर्माण — वासुदेव चौहान द्वारा; नामकरण — अकाल-पीड़ित लोगों को बचाने हेतु फल, सब्जियाँ व कंदमूल उत्पन्न करने के कारण; मेले — चैत्र व आश्विन नवरात्र में |
| सुंधा माता | जसवंतपुरा की पहाड़ी (भीनमाल, जालौर) | खंडेलवालों की कुलदेवी; सुंधा पहाड़ी पर स्थित होने के कारण नाम; 2006 में राजस्थान का प्रथम रोपवे यहीं बना; यहाँ भालू अभयारण्य स्थित है |
| अंबिका माता (जगत माता) | जगत गाँव, उदयपुर | गुर्जर प्रतिहारों द्वारा महामारू शैली में निर्मित; मूर्ति — काले प्रस्तर की महिषासुरमर्दिनी की; इस मंदिर को "मेवाड़ का खजुराहो" कहा जाता है (अध्याय 1 से क्रॉस-रेफरेंस) |
| लोक देवी | मंदिर/स्थान | विशेषता |
|---|---|---|
| ज्वाला माता | जोबनेर (जयपुर) | खंगारोत राजवंश की कुलदेवी |
| नागणेची माता | जमवारामगढ़ (जयपुर) मूल स्थान; मंडोर (जोधपुर) | मारवाड़ के राठौड़ वंश की कुलदेवी; मूर्ति — काष्ठ निर्मित, 18 भुजाओं वाली, शस्त्र लिए हुए |
| जमुवाय माता | जमवारामगढ़ (जयपुर) | ढूँढाड़ के कच्छवाहा वंश की कुलदेवी; कच्छवाह शासक दुल्हराय (तेजकरण) ने देवी माँ के आशीर्वाद से शत्रुओं पर विजय प्राप्त की |
| अबुदा माता (अधर देवी) | माउंट आबू (सिरोही) | कल्लाओं की कुलदेवी; राजस्थान की "वैष्णो देवी" कहा जाता है; एकमात्र देवी जिसके होठों की पूजा होती है |
| भ्रमर माता (भंवर माता) | फलौदी | — |
| हिचकी माता | सौरसेन (अंता-बारां) | कुम्हारों की कुलदेवी (ब्रह्माणी); उपनाम — उष्ट्रवाहिनी देवी (राजस्थान की एकमात्र देवी जो ऊँट पर सवार है); मेला — माघ शुक्ल सप्तमी को गधों का मेला |
| सारिका माता | राजसमंद झील की पाल पर | राजस्थान की एकमात्र देवी जिसकी पीठ की पूजा होती है; मधुमेह रोग निवारक देवी मानी जाती हैं |
| राजेश्वरी माता | भरतपुर | भरतपुर के जाट राजवंश की कुलदेवी |
| आशापुरा माता | नाडौल (देसूरी, पाली), मादरी (जसवंतपुरा, जालौर) | अनेक राजवंशों की कुलदेवी |
| कुशाल माता | बदनौर (ब्यावर) | महाराणा कुम्भा ने 1437 ई. में मालवा के महमूद खिलजी प्रथम पर विजय के उपलक्ष्य में पूजा की; चामुण्डा देवी का अवतार मानी जाती हैं |
| चौथ माता | चौथ का बरवाड़ा गाँव (सवाई माधोपुर) | करवा चौथ (कार्तिक कृष्ण चतुर्थी) को महिलाएँ चौथ माता के नाम पर पति की दीर्घायु हेतु व्रत करती हैं |
| सच्चियाय माता | ओसियाँ (जोधपुर ग्रामीण) | ओसवालों की कुलदेवी; मंदिर आठवीं सदी में परमार राजकुमार उपलदेव ने प्रतिहार शैली में बनवाया |
| भदाणा माता | कोटा | हाड़ा चौहानों की कुलदेवी |
RAS प्रारंभिक परीक्षा (Pre) में "राजवंश-कुलदेवी" मिलान अत्यंत बार-बार पूछा जाने वाला विषय है। नीचे दी गई तालिका में सभी प्रमुख राजवंशों व समुदायों की कुलदेवियों को एक स्थान पर व्यवस्थित किया गया है।
| राजवंश / समुदाय | कुलदेवी | स्थान |
|---|---|---|
| जयपुर के कच्छवाहा | जमुवाय माता / शीला माता | जमवारामगढ़ / आमेर (जयपुर) |
| मारवाड़ (जोधपुर) के राठौड़ | नागणेची माता | जमवारामगढ़ (मूल) / मंडोर, जोधपुर |
| बीकानेर के राठौड़ | करणी माता | देशनोक (बीकानेर) |
| सीकर के चौहान | जीण माता | रैवासा (सीकर) |
| सांभर के चौहान | शाकंभरी माता | सांभर |
| जालौर के सोनगरा चौहान | आशापुरा माता | जालौर |
| कोटा के हाड़ा चौहान | भदाणा माता | कोटा |
| जैसलमेर के भाटी | आवड़ माता (स्वांगिया माता) | लोद्रवा (जैसलमेर) |
| उदयपुर के गुहिल (सिसोदिया) | बाण माता / अंबिका माता | उदयपुर / जगत गाँव |
| भरतपुर के जाट | राजेश्वरी माता | भरतपुर |
| करौली के यादव | कैला देवी | त्रिकूट पर्वत, करौली |
| जोबनेर के खंगारोत | ज्वाला माता | जोबनेर (जयपुर) |
| मंडोर के गुर्जर प्रतिहार | चामुण्डा माता | मंडोर (जोधपुर) |
| आऊवा के चम्पावत ठाकुर | कुशाल माता | बदनौर (ब्यावर) |
| खंडेलवाल समुदाय | सुंधा माता | भीनमाल (जालौर) |
लोक देवताओं की पूजा की सबसे विशिष्ट परंपरा "भोपा-भोपी" परंपरा है (साहित्यिक-प्रदर्शन पक्ष अध्याय 7 में विस्तृत रूप से पढ़ा जा चुका है — यहाँ हम इसके धार्मिक-अनुष्ठान पक्ष को समझेंगे)। भोपा किसी विशेष लोक देवता के मंदिर/थान का पुजारी होता है, जो साधारण पुजारियों से भिन्न होता है — भोपा प्रायः सम्मोहन/मूर्च्छा (trance) की अवस्था में आकर देवता का संदेश भक्तों तक पहुँचाता है, इसे "देवता का अवतरण" या "खेलना" कहा जाता है। भोपा-भोपी सर्प-दंश, भूत-प्रेत बाधा व असाध्य रोगों के उपचार हेतु भी पूजनीय माने जाते हैं — जैसे रूपनाथ जी व झुंझार जी के भोपे सर्प-दंश पीड़ितों का उपचार करते हैं।
ओरण राजस्थान की एक अनूठी पारिस्थितिकी-धार्मिक अवधारणा है — यह धार्मिक मान्यता के अनुसार पशुओं के चरने के लिए सुरक्षित छोड़ा गया वह भूमि-क्षेत्र है, जिस पर खेती करना, पेड़-पौधे काटना अथवा किसी भी प्रकार का अतिक्रमण करना वर्जित होता है। ओरण को प्रायः किसी स्थानीय लोक देवता अथवा देवी को समर्पित किया जाता है, जिससे इसकी पवित्रता व अलंघनीयता सुनिश्चित होती है — यह परंपरा तल्लीनाथ जी के "वृक्ष-कटाई निषेध" सिद्धांत तथा जांभोजी के बिश्नोई संप्रदाय के पर्यावरण-संरक्षण दर्शन (अध्याय 8) से गहराई से जुड़ी हुई है।
नवीनतम अपडेट: तनोट माता मंदिर (जैसलमेर) — जो 1965 के भारत-पाक युद्ध में भारत की विजय का प्रतीक "विजय स्तम्भ" तनोट माता मंदिर के सामने स्थापित है — आज भी सीमा सुरक्षा बल (BSF) के जवानों द्वारा पूजा जाता है, तथा यह सीमावर्ती क्षेत्र में राष्ट्रीय आस्था व सैन्य-मनोबल का प्रमुख प्रतीक बना हुआ है। रामदेवरा मेला (जैसलमेर) आज भी राजस्थान के सबसे बड़े सांप्रदायिक सद्भाव प्रदर्शक मेलों में गिना जाता है, जहाँ हिन्दू व मुस्लिम दोनों समुदाय समान श्रद्धा से सम्मिलित होते हैं। जसराज चौपड़ा कमेटी (चामुण्डा माता मंदिर भगदड़, 2008) की सिफारिशों के आधार पर मंदिर परिसरों में भीड़-प्रबंधन व सुरक्षा-व्यवस्था के मानकों को निरंतर सुदृढ़ किया जा रहा है, जो राजस्थान के बड़े धार्मिक मेलों में सुरक्षा-नीति निर्धारण हेतु एक संदर्भ-बिंदु बना हुआ है।
1. राजस्थान के पंचपीर — पाबूजी, हड़बूजी, रामदेवजी, मेहाजी व गोगाजी। 2. बाबा रामदेवजी का प्रमुख मंदिर रुणिचा/रामदेवरा (जैसलमेर) है; इन्हें "पीरों का पीर" कहा जाता है; यह राजस्थान का सांप्रदायिक सद्भाव का सबसे बड़ा मेला है। 3. रामदेवजी राजस्थान के एकमात्र ऐसे लोक देवता हैं जो स्वयं कवि भी थे — "चौबीस बाणियाँ" इनकी प्रसिद्ध रचना है। 4. वीर तेजाजी का प्रमुख मंदिर परबतसर (कुचामन-डीडवाना) में है; भाद्रपद शुक्ल दशमी को "तेजा दशमी" मनाई जाती है। 5. गोगाजी का धड़ मेड़ी मंदिर (गोगामेड़ी, हनुमानगढ़) "मकबरा शैली" में बना है; कायमखानी मुसलमान इन्हें अपना वंशज मानते हैं। 6. पाबूजी की फड़ राजस्थान की सर्वाधिक लोकप्रिय फड़ है; रावणहत्था वाद्य यंत्र के साथ नायक जाति के भोपों द्वारा गाई जाती है। 7. देवनारायणजी की फड़ राजस्थान की सबसे प्राचीन, सबसे लंबी (24 हाथ) फड़ है; 1992 व 2011 में इन पर डाक टिकट जारी हुए। 8. वीर कल्लाजी राठौड़ ने चित्तौड़ के तीसरे साके में घायल जयमल को अपने कंधे पर बिठाकर युद्ध किया था। 9. तल्लीनाथ जी एकमात्र ऐसे लोक देवता हैं जिन्होंने वृक्ष-कटाई पर रोक लगाई — यह बिश्नोई संप्रदाय के पर्यावरण-दर्शन से जुड़ता है। 10. मल्लीनाथ पशु मेला (तिलवाड़ा, बालोतरा) राजस्थान का सबसे पुराना पशु मेला माना जाता है। 11. करणी माता चारणों की कुलदेवी तथा बीकानेर के राठौड़ों की आराध्य देवी हैं; इन्हें "चूहों वाली देवी" कहा जाता है, मंदिर देशनोक (बीकानेर) में है। 12. जीण माता सीकर के चौहानों की आराध्य देवी हैं; मंदिर हर्ष पर्वत शिलालेख (1064 ई.) से जुड़ा है। 13. आवड़ माता (स्वांगिया माता) जैसलमेर के भाटी राजवंश की कुलदेवी हैं, मंदिर लोद्रवा में है। 14. शीला माता आमेर के कच्छवाहा वंश की इष्ट देवी हैं; मूर्ति मानसिंह प्रथम बंगाल से लाए थे (अध्याय 1 से क्रॉस-रेफरेंस)। 15. राणी सती मंदिर (झुंझुनू) भारत का सबसे बड़ा सती मंदिर है; 1987 के रूपकंवर सती कांड के बाद सती-महिमामंडन पर कानूनी प्रतिबंध लगा। 16. कैला देवी (करौली) गुर्जर-मीणा समुदाय की इष्ट देवी हैं; मंदिर में 999 ई. का शिलालेख चौहान शासकों की प्रशंसा में उत्कीर्ण है। 17. कच्छवाहा वंश (जयपुर) की कुलदेवी जमुवाय माता व शीला माता दोनों मानी जाती हैं; मारवाड़ राठौड़ों की कुलदेवी नागणेची माता है। 18. चामुण्डा माता मंदिर (मंडोर, जोधपुर) में 2008 में भगदड़ में 214 लोगों की मृत्यु हुई थी, जिसकी जाँच हेतु जसराज चौपड़ा कमेटी बनी। 19. ओरण एक धार्मिक-पारिस्थितिकी अवधारणा है, जो पशु-चारण हेतु सुरक्षित छोड़ी गई अलंघनीय भूमि है, जिस पर खेती व वृक्ष-कटाई वर्जित होती है। 20. भोपा-भोपी परंपरा में भोपा मूर्च्छा/ट्रांस अवस्था में देवता का संदेश भक्तों तक पहुँचाता है — यह राजस्थान की विशिष्ट "Oracle" परंपरा है।
राजस्थान के लोक देवता व लोक देवियाँ इस धरती की सामूहिक स्मृति व सामाजिक मूल्यों के जीवंत प्रतीक हैं। पाबूजी, तेजाजी, गोगाजी, रामदेवजी व देवनारायणजी जैसे लोक देवता मूलतः साधारण मनुष्य थे, जिन्होंने वचन-पालन, गौ-रक्षा व सामाजिक न्याय के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया — और यही बलिदान उन्हें देवत्व तक ले गया। इनमें से अनेक (रामदेवजी, गोगाजी) हिन्दू व मुस्लिम — दोनों समुदायों द्वारा समान श्रद्धा से पूजे जाते हैं, जो राजस्थान की सांस्कृतिक समरसता का अनूठा उदाहरण है।
इसी समांतर परंपरा में करणी माता, जीण माता, आवड़ माता व शीला माता जैसी लोक देवियाँ प्रत्येक प्रमुख राजवंश की कुलदेवी के रूप में पूजित हैं — यह दर्शाता है कि राजस्थान में राजसत्ता व लोक-आस्था कितनी गहराई से एक-दूसरे से जुड़ी रहीं। भोपा-भोपी परंपरा व ओरण जैसी धार्मिक प्रथाओं ने न केवल आस्था को जीवित रखा, बल्कि पर्यावरण-संरक्षण जैसे आधुनिक सरोकारों को भी सैकड़ों वर्ष पहले ही संस्थागत रूप दे दिया।
परीक्षा की दृष्टि से यह अध्याय अत्यंत तथ्य-सघन है — प्रत्येक लोक देवता/देवी का जन्म-स्थान, मंदिर, मेला-तिथि व कुलदेवी-राजवंश मिलान जैसे प्रत्यक्ष तथ्यात्मक प्रश्नों के साथ-साथ, सांप्रदायिक सद्भाव व पर्यावरण-संरक्षण जैसे विश्लेषणात्मक मुख्य परीक्षा प्रश्नों के लिए भी अत्यंत उपयोगी है। अगले अध्याय में हम राजस्थान के मेलों एवं त्योहारों का अध्ययन करेंगे, जो इन्हीं लोक देवी-देवताओं की पूजा-परंपरा की सामाजिक-आर्थिक अभिव्यक्ति है।
| देवता/देवी | प्रमुख मंदिर/स्थान | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|
| बाबा रामदेवजी | रुणिचा/रामदेवरा (जैसलमेर) | सांप्रदायिक सद्भाव का सबसे बड़ा मेला; स्वयं कवि |
| वीर तेजाजी | परबतसर (कुचामन-डीडवाना) | सर्प-दंश निवारक देवता; तेजा दशमी |
| गोगाजी चौहान | गोगामेड़ी (हनुमानगढ़) | हिन्दू-मुस्लिम दोनों द्वारा पूजित; जाहरपीर |
| पाबूजी राठौड़ | कोलूमण्ड (फलोदी) | सर्वाधिक लोकप्रिय फड़; ऊँटों के देवता |
| देवनारायणजी | मालासेरी डूंगरी (आसींद, भीलवाड़ा) | सबसे लंबी फड़ (24 हाथ); डाक टिकट |
| वीर कल्लाजी राठौड़ | चित्तौड़गढ़ दुर्ग / रनेला (सलूम्बर) | चित्तौड़ के तीसरे साके से संबद्ध |
| करणी माता | देशनोक (बीकानेर) | चारणों की कुलदेवी; चूहों वाली देवी |
| जीण माता | रैवासा (सीकर) | सीकर चौहानों की आराध्य देवी |
| आवड़ माता (स्वांगिया) | लोद्रवा (जैसलमेर) | जैसलमेर भाटी राजवंश की कुलदेवी |
| शीला माता | आमेर दुर्ग (जयपुर) | कच्छवाहा वंश की इष्ट देवी |