कल्पना कीजिए — 16वीं शताब्दी का मेवाड़, जहाँ एक राजपूत राजकुमारी अपने राजमहल के वैभव को त्यागकर, हाथ में इकतारा लिए, गलियों में "पायो जी मैंने राम रतन धन पायो" गाती फिरती है। यही मीराबाई हैं, जिनकी भक्ति ने जाति, कुल व राजसत्ता की सभी सीमाओं को तोड़ दिया। ठीक इसी धरती पर, कहीं एक जुलाहा (कबीर), कहीं एक चमार (रैदास), कहीं एक दर्जी (पीपा), और कहीं एक जाट किसान (जांभोजी) — सब मिलकर यह सिद्ध कर रहे थे कि भक्ति के दरबार में जन्म की जाति नहीं, हृदय की सच्चाई मायने रखती है। और दूसरी ओर, फारस से चलकर आया एक सूफी संत, ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती, अजमेर की धरती को अपनी कर्मस्थली बनाकर हिन्दू-मुस्लिम दोनों समुदायों का साझा आस्था-केंद्र बना देता है — आज भी हर धर्म का व्यक्ति उनकी दरगाह पर चादर चढ़ाने जाता है। राजस्थान का धार्मिक जीवन केवल मंदिर-मस्जिद की गिनती नहीं है — यह सैकड़ों वर्षों से चली आ रही उस सामाजिक क्रांति की कहानी है, जिसने ऊँच-नीच, छुआछूत व सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध आवाज़ उठाई। इस अध्याय में हम राजस्थान के इसी समृद्ध धार्मिक व सामाजिक-सुधारवादी इतिहास को समझेंगे — वैष्णव, शैव व निर्गुण भक्ति संप्रदायों से लेकर सूफी परंपरा तक।
"साधो शब्द साधना कीजै। जासूं जनम जनम दुख भाजै।।" — संत दादू दयाल — निर्गुण भक्ति परंपरा का उपदेश
राजस्थान में राम, कृष्ण, शिव तथा दुर्गा-पूजा पर आधारित अनेक धार्मिक संप्रदायों का जन्म व विकास हुआ। हिन्दू धर्म राजस्थान का प्रमुख धर्म है, और इसके अंतर्गत विष्णु-पूजक अर्थात वैष्णव धर्म में आस्था रखने वालों की संख्या सर्वाधिक है। वैष्णवों के अतिरिक्त शैव व शाक्त मतावलंबी भी न्यूनाधिक संख्या में निवास करते हैं। वैष्णव व शैव — दोनों ही उपासना-पद्धति के आधार पर दो वर्गों में विभाजित किए जा सकते हैं — सगुण संप्रदाय व निर्गुण संप्रदाय। यह वर्गीकरण समझना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि आगे के सभी संत व संप्रदाय इसी वर्गीकरण के अंतर्गत आते हैं।
वैष्णव धर्म वह मत है, जिसमें भगवान विष्णु व उनके अवतारों को प्रधान देव मानकर उनकी आराधना की जाती है — इसे "भागवत धर्म" भी कहा जाता है, और इसके प्रवर्तक स्वयं भगवान वासुदेव श्रीकृष्ण माने जाते हैं। राजस्थान में वैष्णव धर्म के विषय में प्रारंभिक जानकारी का सबसे प्राचीन साक्ष्य घोसुण्डी अभिलेख (लगभग 2 ईसा पूर्व) है — यह राजस्थान में वैष्णव धर्म का सर्वप्रथम पुरातात्विक उल्लेख माना जाता है। मत्स्य पुराण में विष्णु के दस अवतारों का वर्णन मिलता है, यद्यपि कुल चौदह अवतार गिनाए जाते हैं — इनमें सबसे पवित्र अवतार वराह अवतार माना जाता है। दक्षिण भारत में वैष्णव भक्ति आंदोलन को सक्रिय करने वाले संतों को "आलवार" कहा जाता है, जिनकी काव्य-रचनाओं का संकलन "दिव्य प्रबंधम" कहलाता है — बारह आलवार संतों में एकमात्र महिला संत आंडाल थीं। राजस्थान में वैष्णव धर्म पाँच प्रमुख संप्रदायों में विभाजित है, जिन्हें सामूहिक रूप से "चतुःसंप्रदाय" (चार संप्रदाय — रामानुज, निम्बार्क, वल्लभ, गौड़ीय — तथा रामानंदी को मिलाकर पाँच) कहा जाता है।
| संप्रदाय | प्रवर्तक | दार्शनिक सिद्धांत | प्रधान पीठ |
|---|---|---|---|
| रामानुज (श्री) संप्रदाय | रामानुजाचार्य (जन्म 1017 ई., तिरुपति, तमिलनाडु) | विशिष्टाद्वैतवाद | श्रीरंगपट्टनम व काँची (मूल); राजस्थान में गलताजी (जयपुर) |
| रामानंदी (रामावत) संप्रदाय | रामानंद (गुरु — राघवानंद) | ज्ञानमार्ग सहित राम-भक्ति की प्रधानता; ऊँच-नीच व छुआछूत का विरोध | गलताजी (जयपुर), उत्तर तोताद्रि (अयोध्या मठ) |
| निम्बार्क (सनकादि/हंस) संप्रदाय | आचार्य निम्बार्काचार्य (12वीं सदी) | द्वैताद्वैत या भेदाभेद | सलेमाबाद (अजमेर) — प्रधान पीठ; उदयपुर — अन्य पीठ |
| वल्लभ संप्रदाय (पुष्टिमार्ग) | वल्लभाचार्य (पिता — लक्ष्मण भट्ट) | शुद्धाद्वैतवाद | श्रीनाथजी (नाथद्वारा, राजसमंद) — प्रधान पीठ (कुल 7 पीठ) |
| गौड़ीय (ब्रह्म) संप्रदाय | चैतन्य महाप्रभु (जन्म नदिया, बंगाल; बचपन का नाम निमाई) | द्वैताद्वैत/अचिन्त्य भेदाभेद; कृष्ण को ही परब्रह्म मानना | वृंदावन (मूल); मारवाड़ में "नीमावत" नाम से प्रसिद्ध |
⏰ काल/निर्माता: प्रवर्तक — रामानुजाचार्य (जन्म 1017 ई., तिरुपति); गुरु — यमुनाचार्य
⭐ विशेषता: प्रमुख रचना "श्री भाष्य" व "वेदांत संग्रहम्"; दर्शन — विशिष्टाद्वैतवाद; रामानुजाचार्य ने मुक्ति का मार्ग ज्ञान को नहीं, अपितु भक्ति को माना; इन्होंने "श्री संप्रदाय" चलाया, इसलिए इसे "सिया संप्रदाय" व "रहस्य संप्रदाय" भी कहा जाता है
⏰ काल/निर्माता: प्रवर्तक — रामानंद; रामानुज संप्रदाय की परंपरा से जुड़े होने के कारण "रामावत संप्रदाय" भी कहलाता है
⭐ विशेषता: विशेषता — ज्ञानमार्ग सहित राम-भक्ति की प्रधानता; ऊँच-नीच, जाति-पाँति व छुआछूत के प्रबल विरोधी; प्रमुख शिष्य — कबीर (जुलाहा), पीपा (दर्जी), धन्ना (जाट), रैदास (चर्मकार), अनंतानंद, सुरसुरानंद, भावानंद, सदना, सैना (नाई), सुरसुरी, पद्मावती, सुखानंद — अर्थात सभी जाति-वर्ग के लोग इस संप्रदाय के शिष्य बने; राजस्थान में प्रवर्तन संत कृष्णदास पयहारी (अनंतानंद के शिष्य) द्वारा हुआ, जिन्होंने 1503 ई. में चतुरनाथ को शास्त्रार्थ में हराया — आमेर के राजा पृथ्वीराज व रानी बालाबाई इनके अनुयायी बने; सवाई जयसिंह ने रामानंदी संप्रदाय को प्रश्रय दिया तथा राजकवि श्रीकृष्ण भट्ट कलानिधि से "राम रासा" ग्रंथ की रचना करवाई
⏰ काल/निर्माता: प्रवर्तक — आचार्य निम्बार्काचार्य (12वीं सदी); प्रमुख ग्रंथ — वेदांत पारिजात भाष्य, दशश्लोकी
⭐ विशेषता: दर्शन — द्वैताद्वैत या भेदाभेद; विशेषता — राधा को श्रीकृष्ण की परिणीता (विवाहिता पत्नी) मानकर युगल-स्वरूप की मधुर सेवा-भक्ति; सलेमाबाद पीठ की स्थापना आचार्य परशुराम देवाचार्य द्वारा की गई; अन्य नाम — हंस संप्रदाय/सनकादि संप्रदाय; सखी संप्रदाय — निम्बार्क संत हरिदास जी द्वारा प्रवर्तित एक उप-शाखा
⏰ काल/निर्माता: प्रवर्तक — वल्लभाचार्य (पिता — लक्ष्मण भट्ट, माता — इल्लमागारु); उपाधि — विजयनगर शासक कृष्णदेवराय द्वारा "महाप्रभु"
⭐ विशेषता: दर्शन — शुद्धाद्वैतवाद; संप्रदाय का नाम "पुष्टिमार्ग" (अर्थ — ईश्वर की कृपा से प्राप्त मार्ग); वल्लभाचार्य को अग्नि का अवतार (वैश्वानरावतार) माना जाता है; प्रमुख रचना — "अणुभाष्य"; मेवाड़ महाराणा राजसिंह के समय श्रीनाथजी की प्रतिमा वृंदावन से सिहाड़ (नाथद्वारा) लाई गई थी
वल्लभाचार्य के पुत्र विठ्ठलनाथ जी ने आठ प्रमुख कवियों की एक मंडली स्थापित की, जिसे "अष्टछाप कवि मंडली" कहा जाता है — इन कवियों ने श्रीनाथजी के समक्ष कीर्तन-गायन को अपने जीवन का उद्देश्य बनाया।
| अष्टछाप कवि | विशेषता |
|---|---|
| सूरदास | सबसे प्रसिद्ध कवि — इन्हें "पुष्टिमार्ग का जहाज़" कहा जाता है; प्रसिद्ध रचना "सूरसागर" |
| कुम्भनदास | वल्लभाचार्य के प्रथम शिष्यों में से एक |
| परमानंददास | कृष्ण-भक्ति काव्य के प्रमुख रचनाकार |
| कृष्णदास | भक्ति व श्रृंगार रस के कवि |
| नंददास | संस्कृत व ब्रजभाषा दोनों में पारंगत कवि |
| चतुर्भुजदास | सूरदास के पुत्र माने जाते हैं |
| गोविंदस्वामी | विठ्ठलनाथ जी के काल के प्रमुख कवि |
| छीतस्वामी | अष्टछाप के अंतिम कवियों में से एक |
| पीठ (मंदिर) | स्थान |
|---|---|
| श्रीनाथजी (प्रधान पीठ) | नाथद्वारा (राजसमंद) |
| द्वारकाधीश जी | कांकरोली (राजसमंद) |
| मथुराधीश जी | कोटा |
| गोकुलनाथ जी | गोकुल (उत्तर प्रदेश) |
| गोकुलचन्द्रमा जी व मदनमोहन जी | कामां (भरतपुर) |
| बालकृष्ण जी | सूरत (गुजरात) |
⏰ काल/निर्माता: प्रवर्तक — चैतन्य महाप्रभु (जन्म नदिया, बंगाल; बचपन का नाम निमाई); दीक्षा गुरु — गौड़ स्वामी (माध्वाचार्य के शिष्य)
⭐ विशेषता: दर्शन/सिद्धांत — गौड़ स्वामी ने माध्वाचार्य के द्वैतवाद सिद्धांत का प्रचार किया; कृष्ण को ही परब्रह्म मानना; आदर्श वाक्य — "श्रीकृष्ण शरणम् मम्"; मानसिंह प्रथम ने वृंदावन में गोविंददेव जी मंदिर बनवाया, जिसकी मूर्ति औरंगजेब के काल में आमेर लाई गई थी; जयपुर में गोविंददेव जी मंदिर सवाई जयसिंह ने बनवाया
शैव धर्म के अनुयायी भगवान शिव के उपासक होते हैं, तथा शिव के अवतारों की पूजा करते हैं। इनकी उपासना-पद्धति में लिंग-पूजा प्रमुख है, और अनेक अनुयायी जीवन-पर्यंत ब्रह्मचारी रहते हैं। दक्षिण भारत में शैव धर्म का प्रचार-प्रसार करने वाले संतों को "नयनार" कहा जाता है। शैव मत मुख्यतः चार संप्रदायों में विभाजित है।
| संप्रदाय | प्रवर्तक/मूल सिद्धांत | प्रमुख केंद्र |
|---|---|---|
| पाशुपत संप्रदाय | प्रवर्तक — लकुलीश (शिव का 24वाँ अवतार माना जाता है) | एकलिंगजी मंदिर (उदयपुर, बप्पा रावल द्वारा निर्मित), शीतलेश्वर मंदिर (झालरापाटन, बड़ौली) |
| कापालिक संप्रदाय | भैरव को शिव का अवतार मानकर उपासना; साधु तांत्रिक व श्मशान-वासी होते हैं, शरीर पर भस्म लपेटते हैं व एक स्थान से दूसरे स्थान भ्रमण करते हैं | छह प्रमुख चिह्न — माला, भूषण, कुंडल, रत्न, भस्म व उपवीत |
| लिंगायत (वीरशैव) संप्रदाय | प्रवर्तक — बासवन्ना | कर्नाटक (मूल केंद्र) |
| काश्मीरक संप्रदाय | कश्मीर-केंद्रित शैव उपासना-पद्धति | कश्मीर (मूल केंद्र) |
नाथ संप्रदाय शैव धर्म का ही एक अन्य रूप है, जिसके प्रवर्तक नाथ मुनि माने जाते हैं। इस संप्रदाय के प्रमुख संत मत्स्येन्द्रनाथ, गोपीचंद, भर्तृहरि व गोरखनाथ हैं — हठयोग प्रणाली के जन्मदाता गुरु गोरखनाथ जी को माना जाता है। राजस्थान में नाथ पंथ की दो प्रमुख शाखाएँ प्रचलित हैं।
| शाखा | प्रधान पीठ / प्रवर्तक | विशेषता |
|---|---|---|
| बैराग पंथ | मुख्य केंद्र — राताडूंगा (पुष्कर); प्रथम प्रचारक — भर्तृहरि | नाथ संप्रदाय की प्राचीनतम शाखाओं में से एक |
| मान्नाथी पंथ | प्रधान पीठ — महामंदिर (जोधपुर), निर्माण 1805 ई. में मानसिंह राठौड़ द्वारा गुरु आयस देवनाथ हेतु | 84 खंभों वाला महामंदिर नाथ संप्रदाय का प्रमुख केंद्र |
राजस्थान में निर्गुण भक्ति परंपरा का प्रभाव अत्यंत व्यापक रहा है — इन संतों ने मूर्ति-पूजा, बाह्य आडंबर, जाति-भेद व छुआछूत का खुलकर विरोध किया, तथा भक्ति को समाज-सुधार का माध्यम बनाया। इनमें से अधिकांश संत निम्न व मध्यम वर्ग से आए, जिससे यह सिद्ध होता है कि निर्गुण भक्ति आंदोलन एक व्यापक सामाजिक-सुधार आंदोलन भी था। आगे के अनुभागों में हम राजस्थान के इन प्रमुख निर्गुण संतों व उनके द्वारा स्थापित संप्रदायों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
⏰ काल/निर्माता: जन्म — 1425 ई., चैत्र पूर्णिमा, गागरोन दुर्ग; पिता — राजा कड़ावा राव खींची, माता — लक्ष्मीवती दासी; जाति — खींची राजपूत; गुरु — रामानंद जी; वास्तविक नाम — प्रतापसिंह खींची
⭐ विशेषता: पीपाजी रामानंद जी के 12 प्रमुख शिष्यों में से एक थे; राज्य त्यागकर वैराग्य धारण किया तथा जीविका हेतु सिलाई का कार्य करने लगे — इसी कारण दर्जी समुदाय इन्हें अपना आराध्य मानता है; ग्रंथ — पीपा पचीसी, पीपा कथा, जोग चिंतामणि; गुरु ग्रन्थ साहिब में पीपा के भजन शामिल हैं — यह सिद्ध करता है कि इनकी ख्याति राजस्थान से बाहर पंजाब तक फैली थी; मेला — चैत्र पूर्णिमा को; प्रमुख स्थल — संत पीपा की छतरी (गागरोन दुर्ग), संत पीपा की गुफा (टोडा ग्राम, केकड़ी), संत पीपा का मंदिर (समदड़ी ग्राम, बाड़मेर)
⏰ काल/निर्माता: जाति — जाट; गुरु — रामानंद (राजस्थान छोड़कर काशी/बनारस चले गए, वहाँ रामानंद के शिष्य बने)
⭐ विशेषता: इन्होंने राजस्थान में भक्ति-आंदोलन की शुरुआत की, तथा पंजाब क्षेत्र में भी अत्यंत लोकप्रिय हुए; निर्गुण-सगुण समन्वित भक्ति को स्वीकार किया; धन्नाजी के उपदेश सिक्खों के आदि ग्रंथ में संकलित हैं — यह इनके अंतर्राज्यीय प्रभाव को दर्शाता है
⏰ काल/निर्माता: जाति — चर्मकार; संप्रदाय — रैदास/रायदास संप्रदाय; आध्यात्मिक गुरु — मीराबाई के भी गुरु माने जाते हैं
⭐ विशेषता: कबीर ने इन्हें "संतों का संत" कहा; रैदास की छतरी चित्तौड़ दुर्ग में स्थित है; रैदास की पचीसी में इनके उपदेश संकलित हैं; इन्होंने जाति-प्रथा के विरुद्ध सर्वाधिक मुखर आवाज़ उठाई — इनका प्रसिद्ध दोहा "मन चंगा तो कठौती में गंगा" आज भी समता के संदेश के रूप में उद्धृत किया जाता है
⏰ काल/निर्माता: जन्म — 1451 ई. (वि.सं. 1508), भाद्रपद कृष्ण अष्टमी (जन्माष्टमी); पिता — लोहटजी पंवार, माता — हंसाबाई; गोत्र — पंवार; बचपन का नाम — धनराज; गुरु — गोरखनाथ; विष्णु के अवतार माने जाते हैं
⭐ विशेषता: बिश्नोई संप्रदाय की स्थापना 1485 ई. में कार्तिक कृष्ण अष्टमी को समराथल (बीकानेर) में की; अनुयायियों को 29 सिद्धांतों (20+9) के पालन का आदेश दिया — इसी "उनतीस" (29) से "बिश्नोई" (बिस+नौ) नाम पड़ा; प्रमुख ग्रंथ — जम्भसागर (29 नियम), जम्भवाणी (120 शब्द संग्रहीत), जम्भसंहिता/जम्भगीता (जांभोजी के 151 शब्दों का संकलन, जिसे पाँचवाँ वेद व उन्नीसवाँ पुराण माना जाता है), विश्नोई धर्म प्रकाश
| पीठ | स्थान | विशेषता |
|---|---|---|
| मुकाम | नोखा (बीकानेर) | जांभोजी की समाधि स्थल (1536 ई., टोपी की पूजा); मेला — फाल्गुन व आश्विन अमावस्या |
| पीपासर | नागौर | जांभोजी की जन्मस्थली; खड़ाऊ पूजन |
| जांभा | फलोदी | जांभोजी के पैर के निशान की पूजा |
| लोहावट | जोधपुर | दूसरा मुकाम कहा जाता है |
| जांगलू | बीकानेर | भिक्षापात्र व चोले की पूजा |
| पांचला सिद्धा | नागौर | बोयत जी द्वारा; वर्ष में तीन मेले (चैत्र, आश्विन, माघ शुक्ल सप्तमी) |
⏰ काल/निर्माता: जन्म — 1482 ई. (वि.सं. 1539), कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी एकादशी), कतरियासर; ज्ञान-प्राप्ति — 12 वर्ष तपस्या के बाद बीकानेर के गोरखमालिया स्थान पर, आश्विन शुक्ल सप्तमी को
⭐ विशेषता: जसनाथी संप्रदाय की स्थापना 1504 ई. में कतरियासर (बीकानेर) में की; कुल 36 नियम; अनुयायी गले में काला धागा बाँधते हैं तथा जालवृक्ष (खेजड़ी) व मोरपंख को पवित्र मानते हैं; प्रसिद्ध — अग्नि-नृत्य ("फतह-फतह" का जयघोष के साथ अंगारों पर नृत्य); प्रमुख ग्रंथ — सिंभुदड़ा, कांडा, गोरख छंद, सिद्ध जी रो सिरलोका, जसनाथी पुराण; दिल्ली के बादशाह सिकंदर लोदी ने जसनाथजी के चमत्कारों से प्रभावित होकर कतरियासर में 500 बीघा भूमि भेंट की थी
⏰ काल/निर्माता: जन्म — लोक-मान्यता अनुसार दादूदयालजी साबरमती नदी में लोदीरामजी नामक ब्राह्मण को संदूक में मिले (पालन-पोषण लोदीरामजी व उनकी पत्नी सावित्री देवी ने किया); "राजस्थान का कबीर" के नाम से प्रसिद्ध; गुरु — बुड्ढन बाबा (कबीरदास जी के शिष्य)
⭐ विशेषता: दादू पंथ (निपंख/ब्रह्म संप्रदाय) की स्थापना 1574 ई. में सांभर में की; अभिवादन शब्द — सत्तराम; सत्संग स्थल — "अलख दरीबा"; उपदेश ब्रह्म, जगत व मोक्ष पर, हिन्दी+ढूँढाड़ी (सधुक्कड़ी) मिश्रित भाषा में; 1585 ई. में दादूदयालजी ने आमेर के राजा भगवंतदास के साथ इबादतखाना (फतेहपुर सीकरी) में अकबर से मुलाकात की थी; निधन — 1603 ई., ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी, नरैना/नारायणा (फुलेरा)
दादू पंथी अविवाहित रहते हैं तथा पुत्र गोद लेकर पंथ का प्रसार करते हैं। मृत व्यक्ति को जलाया या दफनाया नहीं जाता, बल्कि खुले मैदान में पशु-पक्षियों के खाने हेतु रख दिया जाता है — दादूदयालजी के शव को भी जयपुर स्थित भैराणा की पहाड़ियों में एक गुफा के सामने इसी प्रकार रखा गया था। दादूजी की मृत्यु के पश्चात दादू पंथ पाँच शाखाओं में विभक्त हो गया।
| शाखा | स्थापनाकर्ता / विशेषता |
|---|---|
| खालसा | गरीबदासजी की आचार्य परंपरा से संबंधित साधु; मुख्य पीठ — नारायणा |
| विरक्त | घूम-घूमकर दादू पंथ का उपदेश देने वाले साधु; संस्थापक — दादूजी के शिष्य बनवारीदास जी |
| उत्तरादे या स्थानधारी | राजस्थान छोड़कर उत्तर भारत में दादू पंथ का प्रचार-प्रसार करने वाले साधु |
| खाकी | शरीर पर भस्म लगाने वाले, लंबी जटा रखने वाले साधु |
| नागा | प्रवर्तक — सुंदरदासजी; ये साधु कृषि व व्यापार का कार्य करते तथा शस्त्र रखते थे; मराठों के विरुद्ध जयपुर राजा प्रताप सिंह की सहायता की; निवास-स्थान को "छावनी" कहा जाता था |
राघवदास (राघौदास) द्वारा रचित "भक्तमाल" में दादूदयाल जी के 52 प्रमुख शिष्यों का उल्लेख मिलता है, जिन्हें "52 थांभ" (52 स्तम्भ) कहा जाता है — इनमें दादूजी के दो पुत्र गरीबदासजी व मिस्कनदासजी भी शामिल थे। नीचे इनके कुछ सर्वाधिक प्रसिद्ध शिष्यों का विवरण दिया गया है।
| शिष्य | प्रमुख रचना / विशेषता |
|---|---|
| गरीबदासजी | दादूदयालजी के पुत्र व उत्तराधिकारी; रचनाएँ — आध्यात्म बोध, अनभै प्रबोध, साखी |
| संत रज्जब जी | जन्म 1567 ई., सांगानेर (जयपुर), पठान जाति — विवाह हेतु जाते समय रास्ते में दादूदयालजी का उपदेश सुनकर शिष्य बन गए और जीवनभर दूल्हे के वेष में रहे; रचनाएँ — रज्जब वाणी, सर्वांगी; प्रधान पीठ — सांगानेर |
| सुंदरदास जी | जन्म 1596, दौसा — "दूसरा शंकराचार्य" व "राजस्थान का शंकराचार्य" कहलाए; श्रृंगार रस के घोर विरोधी; 42 ग्रंथों की रचना (ब्रजभाषा-पिंगल में) — सुंदर विलास, ज्ञान समुद्र, सुंदर सार आदि |
| बड़ा सुंदरदास (भीमराज) | बीकानेर के शासक जैतसी के पुत्र; "नागा पंथ" के प्रवर्तक |
| जगगोपालजी | प्रधान पीठ — फतेहपुर सीकरी (उत्तर प्रदेश); जहाँगीर से मुलाकात की; रचना — "चौबीस गुरुओं की लीला" |
| मंगलाराम जी | "सुंदरोदय" ग्रंथ की रचना, जिसमें नागा संप्रदाय का वर्णन है |
| जगन्नाथ दास जी | प्रसिद्ध ग्रंथ — वाणी व गुणगंजनामा; हरड़ेवाणी का संकलन संतदास व जगन्नाथ दास ने किया |
⏰ काल/निर्माता: जन्म — 1719 ई., सोड़ा गाँव (टोंक), माघ शुक्ल चतुर्दशी; पिता — बख्तारामजी, माता — देवजी/देऊजी; पत्नी — गुलाब कँवर; गुरु — गुदड़ संप्रदाय के कृपारामजी (1751 ई. में दीक्षा प्राप्त)
⭐ विशेषता: बचपन का नाम रामकिशन था, जिसे गुरु कृपारामजी ने "रामचरण" नाम दिया; भगवान राम की निर्गुण उपासना करते थे; रामचरण जी ने भीलवाड़ा में साधना के समय मूर्ति-पूजकों द्वारा परेशान किए जाने पर कुहाड़ा गाँव चले गए; शाहपुरा के शासक रणसिंह के निमंत्रण पर रामचरण जी शाहपुरा पहुँचे और वहीं रामस्नेही संप्रदाय की मुख्य गद्दी स्थापित की; 1798 ई. में शाहपुरा में देहांत हुआ; प्रमुख रचना — अणभैवाणी (अणभवाणी, ब्रजभाषा में); उत्सव — फूलडोल उत्सव (होली के दूसरे दिन, चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से पंचमी तक); संप्रदाय के अनुयायी गुलाबी वस्त्र धारण करते हैं, दाढ़ी-मूँछ व सिर पर बाल नहीं रखते तथा मूर्ति-पूजा नहीं करते
| शाखा | संस्थापक | केंद्र / विशेषता |
|---|---|---|
| शाहपुरा शाखा | संत रामचरण जी | शाहपुरा (भीलवाड़ा) — रामस्नेही संप्रदाय की प्रधान पीठ; रामचरण जी के 12 प्रधान शिष्य थे |
| रैण शाखा | संत दरियावजी (जन्म 1676 ई., जैतारण, ब्यावर) | रैण, मेड़ता सिटी (नागौर); दरियावजी का कथन — "नारी सारे संसार की जननी है"; गुरु — पेमदास जी; 1758 ई. में निधन |
| सिंहथल शाखा | हरिरामदास जी (जन्म स्थान — सिंहथल, बीकानेर) | सिंहथल (बीकानेर); पिता — भाग्यचन्द, गुरु — जैमलदास जी; प्रमुख रचनाएँ — निशानी, मंत्र राजप्रकाश, हरिपुरुष जी वाणी |
| खेड़ापा शाखा | संत रामदासजी | जोधपुर ग्रामीण — खेड़ापा |
⏰ काल/निर्माता: जन्म — 1455 ई., कापड़ोद (डीडवाना); मृत्यु — गाढ़ा गाँव (डीडवाना); मूल नाम — हरिसिंह सांखला; उपनाम — "कलयुग का वाल्मीकि" (पहले डाकू थे, फिर साधु बने)
⭐ विशेषता: हरिदासजी ने निरंजनी/निराला संप्रदाय की स्थापना की — इसमें परमात्मा को "अलख निरंजन" या "हरि निरंजन" कहा जाता है; प्रधान पीठ — गाढ़ा (डीडवाना); शाखाएँ — निहंग (भिक्षा से जीवन-निर्वाह, खाकी रंग की गुदड़ी) व घरबारी (गृहस्थ जीवन जीने वाले अनुयायी); प्रमुख ग्रंथ — कुंजलम स्वरूपम्; उपदेश — निर्गुण व सगुण दोनों भक्ति; मेला — फाल्गुन शुक्ल प्रतिपदा से द्वादशी तक
⏰ काल/निर्माता: जन्म — 1703 ई., डेहरा गाँव (अलवर), भाद्रपद शुक्ल तृतीया; निधन — 1782 ई., नई दिल्ली; पिता — मुरलीधर, माता — कुँजो बाई; बचपन का नाम — रणजीत सिंह; गुरु — शुकदेव जी
⭐ विशेषता: चरणदासी संप्रदाय — निर्गुण व सगुण भक्ति का मिश्रण; कुल 42 नियम, अनुयायी पीले वस्त्र धारण करते हैं; प्रभाव क्षेत्र — मेवात व दिल्ली; जयपुर के कच्छवाहा शासक सवाई प्रताप सिंह चरणदासजी के अनुयायी थे; चरणदास जी ने 1739 ई. में नादिरशाह के आक्रमण की भविष्यवाणी की थी; प्रमुख ग्रंथ — ब्रह्म ज्ञान सागर, भक्ति सागर, ब्रह्म चरित्र; डेहरा में चरणदास जी की टोपी, माला, गुदड़ी व चोला आज भी सुरक्षित है
⏰ काल/निर्माता: जन्म — डेहरा गाँव (अलवर) 1703 ई.; कार्यक्षेत्र — डूंगरपुर-बांसवाड़ा; भाषा — वागड़ी; मावजी को "भगवान विष्णु का कल्कि अवतार" माना जाता है
⭐ विशेषता: निष्कलंक संप्रदाय की स्थापना की; कर्म, भक्ति व योग पर बल दिया; बेणेश्वर धाम की स्थापना सोम-माही-जाखम नदियों के संगम पर की — यहाँ प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा को विशाल मेला लगता है, जिसे "आदिवासियों का कुंभ" कहा जाता है (जनजातीय पक्ष अध्याय 12 में विस्तृत); "चौपड़ा" — संत मावजी की वाणियाँ, वाद-विवाद शैली में लिखित, भविष्यवाणी हेतु प्रसिद्ध — पाँच खंड (सामसागर, मेघसागर, रत्नसागर, प्रेमसागर, अनंतसागर); मावजी ने छुआछूत मिटाने हेतु "लसोड़िया आंदोलन" चलाया
उपर्युक्त प्रमुख संप्रदायों के अतिरिक्त राजस्थान में कई अन्य निर्गुण संत व संप्रदाय भी प्रचलित रहे हैं, जिनका परीक्षा की दृष्टि से संक्षिप्त परंतु सटीक ज्ञान आवश्यक है।
| संत / संप्रदाय | स्थान / काल | विशेषता |
|---|---|---|
| संत लालदास जी (लालदासी संप्रदाय) | जन्म 1540 ई., धौलीदूब गाँव (अलवर); मृत्यु 1648 ई. | मेव जाति के लकड़हारे, गोत्र — दूलोत; प्रधान पीठ — नगला (भरतपुर), अलवर व भरतपुर; उपदेश मेवाती भाषा में; प्रमुख शिक्षा — राम की निर्गुण उपासना व हिन्दू-मुस्लिम एकता; प्रमुख ग्रंथ — लालदासजी री चेतावनियाँ, लालदास जी री कथा |
| गुदड़ संप्रदाय | मुख्य केंद्र — दांतड़ा (भीलवाड़ा) | संस्थापक — संतदास जी; रामचरण जी के गुरु कृपारामजी इसी संप्रदाय से संबंधित थे |
| नवल संप्रदाय | मुख्य केंद्र — जोधपुर | संस्थापक — नवलदास जी; पुस्तक — नवलेश्वर अनुभववाणी; अस्पृश्यता, बाल-विवाह व रूढ़िवादी दृष्टिकोण का विरोध |
| अलखिया संप्रदाय | प्रधान पीठ — बीकानेर | संस्थापक — स्वामी लालगिरी (जन्म सुलखनिया गाँव, चूरू); प्रमुख ग्रंथ — अलख स्तुति प्रकाश, कुण्डलियाँ; समाधि — गलताजी (जयपुर) |
| माननाथी संप्रदाय | मुख्य केंद्र — शिकारपुरा (जोधपुर ग्रामीण) | प्रवर्तक — राजाराम जी, पटेल जाति के प्रमुख संत |
| निपख/परनामी संप्रदाय | प्रधान पीठ — पन्ना (मध्य प्रदेश); राजस्थान प्रभाव — आदर्श नगर (जयपुर) | स्थापना — प्राणनाथ द्वारा; निर्गुण विचारधारा |
| संत करमा बाई | खंडेला (सीकर) | भगवान जगन्नाथ की भक्त व कवयित्री; मान्यता — भगवान ने इनके हाथ से खिचड़ा खाया, जिस कारण आज भी जगन्नाथपुरी में भगवान को खिचड़ा परोसा जाता है |
| संत रानी रूपादे | निर्गुण भक्ति उपासिका | अलख को पति रूप में स्वीकार कर ईश्वर के एकत्व का उपदेश दिया |
| संत ताज बेगम | कार्यक्षेत्र — गजगौर (जयपुर) | कृष्ण भक्ति की मुस्लिम संत नारी; वल्लभ संप्रदाय से संबंधित |
| दुलभजी | कार्यक्षेत्र — कोटा | कृष्ण भक्त, "राजस्थान का नरसिंह" कहलाए |
| सुंदरदास जी (काशी वाले) | काशी | काशी के 80 घाटों पर गोस्वामी तुलसीदास के साथ निवास किया |
यद्यपि मीराबाई ने स्वयं किसी संप्रदाय की स्थापना नहीं की, परंतु कालांतर में उनके अनुयायी "मीरा दासी संप्रदाय" के नाम से जाने गए। इसी प्रकार अनेक "-दासी" नाम वाले संदर्भ (जैसे रायदास/रैदास संप्रदाय) परीक्षा में भ्रम पैदा करते हैं — याद रखें, दासी संप्रदाय मीरा की भक्ति-परंपरा से जुड़ा है, जबकि रायदास संप्रदाय संत रैदास की परंपरा से।
⏰ काल/निर्माता: जन्म — 1498 ई., वैशाख शुक्ल तृतीया (आखातीज); पिता — रतनसिंह राठौड़ (बाजोली के जागीरदार); माता — वीरकुँवर; दादा — राव दूदा; विवाह — 1516 ई. में भोजराज से (राणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र); आध्यात्मिक गुरु — गोस्वामी संत रैदास
⭐ विशेषता: बचपन का नाम — पेमल; उपनाम — "राजस्थान की राधा"; मीरा भगवान श्रीकृष्ण के मुरली-मनोहर स्वरूप की आराधना अपने पति रूप में करती थीं; रचनाएँ — पदावली, हरजस, नरसी मेहता की हूंडी, रुक्मिणी मंगल, गीत गोविंद; अंतिम समय द्वारका के रणछोड़राय मंदिर (डाकोरजी) में भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति में विलीन हो गईं — ऐसी मान्यता है; चित्तौड़गढ़ में प्रतिवर्ष आश्विन पूर्णिमा को "मीरा महोत्सव" मनाया जाता है; 10 अक्टूबर 1952 को इनकी 525वीं जयंती पर डाक टिकट व 525 रुपये का सिक्का जारी किया गया
राजस्थान की निर्गुण व सगुण — दोनों भक्ति परंपराओं में महिला संतों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। मीराबाई के अतिरिक्त निम्नलिखित महिला संत भी परीक्षा-दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
| महिला संत | स्थान / उपनाम | प्रमुख रचना / विशेषता |
|---|---|---|
| दयाबाई | दादूदयाल जी की शिष्या | पुस्तक — "दयाबोध", "विनयमल्लिका" |
| सहजोबाई | दादूदयाल जी की शिष्या | पुस्तक — "सहज प्रकाश", "सोलह तिथि सात वार निर्णय" |
| गवरीबाई | जन्म — डूंगरपुर के नागर कुल में | उपनाम — "वागड़ की मीरा" (कृष्ण को पति रूप में स्वीकार कर भक्ति); डूंगरपुर के महारावल शिवसिंह ने इनके सम्मान में बालमुकुंद मंदिर बनवाया; रचना — कीर्तनमाला |
| रानाबाई | आचार्य परशुराम देवाचार्य के संपर्क में आकर कृष्ण-भक्त बनीं | उपनाम — "राजस्थान की दूसरी मीरा" |
| फूलीबाई | कार्यक्षेत्र — जोधपुर | जोधपुर महाराजा जसवंतसिंह ने फूलीबाई को धर्म-बहन बनाया था |
| संत नन्ही बाई | खेतड़ी की सुप्रसिद्ध गायिका | गुरु — तानरस खाँ (दिल्ली घराना) |
| समान बाई | निर्गुण भक्ति उपासिका | रचनाएँ — पति सतक, कृष्णबाल लीला, सौलो |
| ज्ञानमती बाई | निर्गुण भक्ति उपासिका | "50 वाणियाँ" प्रसिद्ध हैं |
राजस्थान में हिन्दू व सूफी परंपरा के साथ-साथ जैन धर्म का भी गहरा प्रभाव रहा है। श्वेतांबर जैन धर्म के अंतर्गत "तेरापंथ" संप्रदाय की स्थापना राजस्थान में ही हुई थी।
| क्रम | आचार्य | विशेषता |
|---|---|---|
| प्रथम आचार्य | आचार्य भिक्षु (भीखणजी) | जन्म — कंटालिया गाँव (मारवाड़ जंक्शन, पाली); तेरापंथ की स्थापना 1760 ई. में की; भीखणजी के सिद्धांत मानने वाले आरंभिक साधुओं की संख्या 13 थी, इसीलिए यह "तेरापंथ" कहलाया; समाधि — सिरियारी (पाली) |
| नौवें आचार्य | आचार्य तुलसी | जन्म 1914, लाडनूं (डीडवाना); पिता — झूमरमल, माता — वंदना; 1949 में "अणुव्रत" सिद्धांत का प्रतिपादन किया; प्रसिद्ध कथन — "इंसान पहले इंसान, फिर हिन्दू और मुसलमान"; जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय (लाडनूं) की स्थापना की; मर्यादा महोत्सव सरदारशहर से प्रारंभ |
| दसवें आचार्य | आचार्य महाप्रज्ञ | वास्तविक नाम — नथमल चौरड़िया; "प्रेक्षाध्यान" सिद्धांत के प्रवर्तक |
| ग्यारहवें आचार्य | आचार्य महाश्रमण | वास्तविक नाम — मोहन दुग्गड़; तेरापंथ के वर्तमान (वर्तमान 2026 तक) सर्वोच्च आचार्य; अणुव्रत, प्रेक्षाध्यान व जीवन विज्ञान (Jeevan Vigyan) कार्यक्रमों का नेतृत्व कर रहे हैं |
⏰ काल/निर्माता: जन्म — सजरी (फारस/ईरान); इंतकाल — अजमेर में; पिता — हजरत ख्वाजा सैयद, माता — बीबी साहेनूर; गुरु — हजरत शेख उस्मान हारूनी
⭐ विशेषता: पृथ्वीराज चौहान तृतीय के काल में राजस्थान आए तथा अजमेर को कार्यस्थली बनाया, यहीं राजस्थान में चिश्ती संप्रदाय का प्रवर्तन किया; उपाधियाँ — "गरीब नवाज़", "आफताबे हिन्द", तथा मुहम्मद गौरी द्वारा प्रदत्त "सुल्तान-उल-हिन्द"; रचित पुस्तक — "किंजुल इसरार" (1215 ई. में); सिद्धांत — ईश्वर-प्रेम, मानव-सेवा तथा हिन्दू-मुस्लिम सांप्रदायिक सद्भाव; अजमेर में ख्वाजा साहब की दरगाह का निर्माण इल्तुतमिश ने करवाया
अजमेर में ख्वाजा साहब का प्रतिवर्ष "उर्स" रज्जब माह की 1 से 6 तारीख तक मनाया जाता है — यह भारत के सबसे बड़े सूफी सामूहिक-आयोजनों में से एक है, जिसमें देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु शिरकत करते हैं। ख्वाजा साहब की दरगाह पर हिन्दू व मुस्लिम — दोनों समुदायों के लोग समान श्रद्धा से चादर चढ़ाते हैं, जो इसे राष्ट्रीय एकता व साम्प्रदायिक सद्भाव का प्रतीक बनाता है।
| पीर / संत | दरगाह स्थान | संप्रदाय / विशेषता |
|---|---|---|
| शेख हमीदुद्दीन नागौरी | नागौर (सुवाल गाँव) | चिश्ती परंपरा के अनुयायी, उपाधि — "सुल्तान-उल-तारिकीन"; केवल कृषि से जीविकोपार्जन करते थे; इल्तुतमिश द्वारा प्रदत्त "शेख-उल-इस्लाम" पद अस्वीकार कर दिया |
| हजरत शक्कर बाबा (नरहड़ पीर) | नरहड़ ग्राम (चिड़ावा, झुंझुनू) | अन्य नाम — "बागड़ के धणी"; इस दरगाह को भावात्मक राष्ट्रीय व सामाजिक एकता का प्रतीक माना जाता है |
| सैयदना फखरुद्दीन (Fakhruddin Shaheed) | गलियाकोट (डूंगरपुर) | दाऊदी बोहरा समुदाय के प्रमुख आराध्य पीर; गलियाकोट दरगाह दाऊदी बोहरा समुदाय का प्रमुख धार्मिक तीर्थ-स्थल है |
| मीठेशाह पीर | गागरोन दुर्ग (झालावाड़) | दुर्ग परिसर में स्थित प्रसिद्ध सूफी दरगाह |
| मलिक शाह पीर | जालौर | जालौर क्षेत्र की प्रसिद्ध सूफी दरगाह |
| दुलेशाह (चोटिला पीर) | पाली | पाली क्षेत्र की प्रमुख सूफी दरगाह |
| खुदाबक्श बाबा | सादड़ी (पाली) | सादड़ी क्षेत्र की सूफी दरगाह |
| अमीर अली शाह पीर | दूदू (जयपुर) | दूदू क्षेत्र की सूफी दरगाह |
परीक्षा में संत व उनके ग्रंथ का सही मिलान अत्यंत महत्वपूर्ण है। नीचे दी गई तालिका इस अध्याय में वर्णित सभी प्रमुख संतों के ग्रंथों को एक स्थान पर व्यवस्थित करती है।
| संत | प्रमुख ग्रंथ / रचनाएँ |
|---|---|
| जांभोजी (बिश्नोई संप्रदाय) | जम्भसागर, जम्भवाणी, जम्भसंहिता/जम्भगीता, विश्नोई धर्म प्रकाश |
| दादू दयाल | दादू जी रो दूहा, दादू जी री वाणी, दादू हरडेवाणी, अंग वधू दादू, कायाबेल |
| रज्जब जी | रज्जब वाणी, सर्वांगी |
| सुंदरदास जी | सुंदर ग्रंथावली, ज्ञान समुद्र, सुंदरसार, सुंदर विलास, ज्ञान समुन्दर, बावनी |
| जगन्नाथ दास / संतदास | हरड़ेवाणी, गुणगंजनामा, गीतसार, विशिष्ठसार |
| संत मावजी | मावजी के चौपड़े (सामसागर, मेघसागर, रत्नसागर, प्रेमसागर, अनंतसागर) |
| प्राणनाथ जी | कुंजलम स्वरूपम् |
| स्वामी लालगिरी | अलख स्तुति प्रकाश |
| मंगलाराम जी | सुंदरोदय |
| नवलदास जी | नवलेश्वर अनुभववाणी |
| गरीबदास जी | आध्यात्म प्रबोध, अनभै प्रबोध, साखी |
| रामचरण जी | अणभवाणी, रामरस अम्बुधि |
| अग्रदास जी | श्रीराम भजन मंजरी, हितोपदेश भाषा, उपासना बावनी, ध्यान मंजरी, अग्रसार |
| कृष्णदास पयहारी | जुगल मैन चरित्र, ब्रह्म गीता |
| हरिरामदास जी (रामस्नेही) | निशानी |
| गवरीबाई | कीर्तनमाला |
| लालदास जी | लालदास जी री वाणी (साखी, सबद), लालदास जी री चेतावनियाँ, लालदास जी री कथा |
| हरिदास जी (निरंजनी) | मंत्र राजप्रकाश, हरिपुरुष जी वाणी, साखी |
| चरणदास जी | ब्रह्म ज्ञान सागर, ब्रह्म ज्ञान चरित्र, नासकेत लीला |
| रैदास | रैदास की परची (उपदेश-संकलन) |
| वल्लभाचार्य | अणुभाष्य |
| रामानुजाचार्य | श्री भाष्य |
| रामानंद जी | रामरक्षास्तोत्र, ज्ञानलीला, ज्ञानतिलक |
| निम्बार्काचार्य | वेदांत पारिजात भाष्य, दशश्लोकी |
| मध्वाचार्य | पूर्णप्रज्ञ भाष्य |
| मीराबाई | पदावली, हरजस, नरसी मेहता की हूंडी, रुक्मिणी मंगल, गीत गोविंद |
| ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती | किंजुल इसरार |
नवीनतम अपडेट: अजमेर में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती का 814वाँ वार्षिक उर्स वर्ष 2026 में 11 से 19 दिसंबर के मध्य (इस्लामी माह रज्जब के अनुसार) आयोजित होना निर्धारित है — उर्स के छठे दिन को "छठी शरीफ" कहा जाता है, जिसे आध्यात्मिक दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। जैन श्वेतांबर तेरापंथ संप्रदाय के वर्तमान (2026 तक) सर्वोच्च आचार्य आचार्य महाश्रमण हैं, जिन्हें 23 मई 2010 को 11वें आचार्य के रूप में पदस्थापित किया गया था — वे निरंतर अणुव्रत, प्रेक्षाध्यान व जीवन विज्ञान कार्यक्रमों के माध्यम से देश-विदेश में पदयात्राएँ कर रहे हैं। बिश्नोई संप्रदाय के खेजड़ली बलिदान (1730 ई., अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में 363 बिश्नोई शहीद) की स्मृति में केंद्र सरकार द्वारा "अमृता देवी बिश्नोई राष्ट्रीय वन्यजीव संरक्षण पुरस्कार" प्रतिवर्ष 11 सितंबर (राष्ट्रीय वन शहीद दिवस) को प्रदान किया जाता है — यह पुरस्कार वन्यजीव संरक्षण में उत्कृष्ट योगदान देने वाले व्यक्तियों/संस्थाओं को केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा दिया जाता है।
1. राजस्थान में वैष्णव धर्म का प्राचीनतम अभिलेखीय प्रमाण घोसुण्डी अभिलेख (लगभग 2 ईसा पूर्व) है। 2. वैष्णव धर्म के पाँच प्रमुख संप्रदाय — रामानुज, रामानंदी, निम्बार्क, वल्लभ व गौड़ीय — राजस्थान में सक्रिय रहे। 3. निम्बार्क संप्रदाय की प्रधान पीठ सलेमाबाद (अजमेर) में है; दर्शन — द्वैताद्वैत/भेदाभेद। 4. वल्लभ संप्रदाय (पुष्टिमार्ग) की प्रधान पीठ श्रीनाथजी, नाथद्वारा (राजसमंद) में है; सूरदास को "पुष्टिमार्ग का जहाज़" कहा जाता है। 5. शैव धर्म चार संप्रदायों — पाशुपत, कापालिक, लिंगायत व काश्मीरक — में विभाजित है; पाशुपत संप्रदाय का प्रमुख मंदिर एकलिंगजी (उदयपुर) है। 6. नाथ संप्रदाय के प्रवर्तक नाथ मुनि तथा हठयोग के जनक गुरु गोरखनाथ माने जाते हैं; राजस्थान में बैराग व मान्नाथी — दो प्रमुख शाखाएँ हैं। 7. संत पीपाजी गागरोन दुर्ग (झालावाड़) में जन्मे तथा वैराग्य के बाद सिलाई का कार्य करते थे — इसी कारण दर्जी समुदाय इन्हें आराध्य मानता है। 8. संत रैदास चर्मकार जाति से थे; कबीर ने इन्हें "संतों का संत" कहा; इनकी छतरी चित्तौड़ दुर्ग में स्थित है। 9. बिश्नोई संप्रदाय के प्रवर्तक जांभोजी ने 1485 ई. में समराथल (बीकानेर) में 29 सिद्धांतों की स्थापना की — इसी से "बिश्नोई" (बिस+नौ) नाम पड़ा। 10. खेजड़ली बलिदान (1730 ई.) में अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में 363 बिश्नोइयों ने पेड़ बचाने हेतु प्राण त्यागे — 11 सितंबर को "राष्ट्रीय वन शहीद दिवस" मनाया जाता है। 11. जसनाथी संप्रदाय के संत जसनाथजी कतरियासर (बीकानेर) से जुड़े हैं; इनके अनुयायी अग्नि-नृत्य करते हैं। 12. दादू दयाल जी को "राजस्थान का कबीर" कहा जाता है; इनकी प्रधान पीठ नरैना (दूदू, जयपुर) में है; दादू पंथ पाँच शाखाओं में विभक्त है। 13. सुंदरदास जी को "राजस्थान का शंकराचार्य" कहा जाता है; इन्होंने 42 ग्रंथों की रचना की। 14. रामस्नेही संप्रदाय के प्रवर्तक संत रामचरण जी की प्रधान पीठ शाहपुरा (भीलवाड़ा) में है; इस संप्रदाय की चार शाखाएँ हैं — शाहपुरा, रैण, सिंहथल व खेड़ापा। 15. निष्कलंक संप्रदाय के संत मावजी को "विष्णु का कल्कि अवतार" माना जाता है; बेणेश्वर धाम (सोम-माही-जाखम संगम) में माघ पूर्णिमा को "आदिवासियों का कुंभ" लगता है। 16. मीराबाई का जन्म 1498 ई. में हुआ था; 1952 में उनकी 525वीं जयंती पर डाक टिकट व सिक्का जारी किया गया। 17. ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने पृथ्वीराज चौहान तृतीय के काल में अजमेर को अपनी कर्मस्थली बनाया; इल्तुतमिश ने उनकी दरगाह का निर्माण करवाया। 18. गलियाकोट (डूंगरपुर) दरगाह दाऊदी बोहरा समुदाय के पीर सैयदना फखरुद्दीन से संबंधित प्रमुख तीर्थ-स्थल है। 19. जैन श्वेतांबर तेरापंथ के प्रवर्तक आचार्य भिक्षु थे (स्थापना 1760 ई.); वर्तमान 11वें आचार्य महाश्रमण हैं। 20. आचार्य तुलसी (तेरापंथ के 9वें आचार्य) ने "अणुव्रत" सिद्धांत का प्रतिपादन किया तथा जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय (लाडनूं) की स्थापना की।
राजस्थान का धार्मिक जीवन विविधता में एकता का अद्भुत उदाहरण है — यहाँ वैष्णव धर्म के पाँच संप्रदाय (रामानुज, रामानंदी, निम्बार्क, वल्लभ, गौड़ीय), शैव धर्म के चार संप्रदाय (पाशुपत, कापालिक, लिंगायत, काश्मीरक) तथा नाथ संप्रदाय — सभी ने राजस्थान की धार्मिक चेतना को समृद्ध किया। परंतु इससे भी अधिक महत्वपूर्ण रहा निर्गुण भक्ति आंदोलन — जिसने संत पीपा (दर्जी), संत धन्ना (जाट), संत रैदास (चर्मकार) व संत जांभोजी (जाट किसान) जैसे विविध सामाजिक पृष्ठभूमि के संतों के माध्यम से यह संदेश दिया कि ईश्वर-भक्ति में जाति-भेद का कोई स्थान नहीं है। जांभोजी के बिश्नोई संप्रदाय ने तो पर्यावरण-संरक्षण को धर्म का अभिन्न अंग बना दिया — जिसका सर्वोच्च उदाहरण खेजड़ली बलिदान है, जो आज भी विश्व में पर्यावरण-आंदोलनों को प्रेरित करता है।
इसी समांतर परंपरा में दादू पंथ, रामस्नेही संप्रदाय, निरंजनी संप्रदाय व चरणदासी संप्रदाय जैसे अनेक निर्गुण संप्रदायों ने समाज-सुधार व भक्ति का संदेश फैलाया, तो दूसरी ओर मीराबाई जैसी सगुण भक्त ने राजसत्ता व सामाजिक बंधनों को त्यागकर कृष्ण-भक्ति को अमर बना दिया। इसी बीच फारस से आए ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने अजमेर को सूफी परंपरा का केंद्र बनाकर हिन्दू-मुस्लिम सांप्रदायिक सद्भाव की एक जीवंत मिसाल कायम की, जो आज भी अजमेर की दरगाह पर हर धर्म के श्रद्धालुओं के रूप में दिखाई देती है।
परीक्षा की दृष्टि से यह अध्याय अत्यंत तथ्य-सघन है — संत, उनके ग्रंथ, संप्रदाय की पीठ व स्थापना-वर्ष जैसे प्रत्यक्ष तथ्यात्मक प्रश्नों के साथ-साथ, निर्गुण भक्ति आंदोलन के सामाजिक-सुधारवादी प्रभाव व सूफी-भक्ति समन्वय जैसे विश्लेषणात्मक मुख्य परीक्षा प्रश्नों के लिए भी यह अध्याय अत्यंत उपयोगी है। अगले अध्याय में हम राजस्थान के लोक देवता, लोक देवियाँ एवं धार्मिक प्रथाओं का अध्ययन करेंगे — जो इसी भक्ति-परंपरा की स्वाभाविक अगली कड़ी है, जहाँ पाबूजी, गोगाजी, रामदेवजी व तेजाजी जैसे वीर योद्धा भक्ति व बलिदान के माध्यम से लोक देवत्व को प्राप्त हुए।
| संप्रदाय/संत | क्षेत्र/केंद्र | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|
| रामानुज/रामानंदी संप्रदाय | गलताजी (जयपुर) | विशिष्टाद्वैतवाद; जाति-भेद विरोधी |
| निम्बार्क संप्रदाय | सलेमाबाद (अजमेर) | द्वैताद्वैत; राधा-कृष्ण युगल उपासना |
| वल्लभ संप्रदाय (पुष्टिमार्ग) | नाथद्वारा (राजसमंद) | शुद्धाद्वैतवाद; अष्टछाप कवि परंपरा |
| नाथ संप्रदाय | महामंदिर (जोधपुर), राताडूंगा (पुष्कर) | हठयोग; गुरु गोरखनाथ |
| बिश्नोई संप्रदाय (जांभोजी) | मुकाम (नोखा, बीकानेर) | 29 सिद्धांत; पर्यावरण-संरक्षण; खेजड़ली बलिदान |
| दादू पंथ (दादू दयाल) | नरैना (दूदू, जयपुर) | "राजस्थान का कबीर"; 5 शाखाएँ |
| रामस्नेही संप्रदाय (रामचरण जी) | शाहपुरा (भीलवाड़ा) | निर्गुण राम-भक्ति; 4 शाखाएँ |
| निष्कलंक संप्रदाय (संत मावजी) | बेणेश्वर धाम (डूंगरपुर) | आदिवासियों का कुंभ; कल्कि अवतार मान्यता |
| मीराबाई | चित्तौड़गढ़, मेड़ता, द्वारका | कृष्ण-भक्ति; "राजस्थान की राधा" |
| तेरापंथ (जैन) | लाडनूं (डीडवाना) | आचार्य भिक्षु प्रवर्तित; अणुव्रत सिद्धांत |
| सूफी परंपरा (ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती) | अजमेर | चिश्ती संप्रदाय; हिन्दू-मुस्लिम सद्भाव |