पश्चिमी राजस्थान के रेतीले धोरों में, भोपा जब रात के अंधेरे में पाबूजी की फड़ के सामने बैठता है, तो उसके हाथ में एक अनोखा वाद्य होता है — रावणहत्था। नारियल के खोल पर बकरी की खाल मढ़कर, घोड़े की पूँछ के बालों से बने गज से रगड़कर जो धुन निकलती है, वह किसी वायलिन से कम नहीं लगती। कहते हैं यह राजस्थान का सबसे प्राचीन वाद्य है, और लोक-मान्यता तो इसे लंकापति रावण से भी जोड़ती है। ठीक इसी तरह, थार के रेगिस्तान में मांगणियार समुदाय के एक कलाकार जब कामायचा बजाते हुए गाता है, तो सुनने वाला भूल जाता है कि यह किसी राजा का दरबार नहीं, बल्कि एक आम गाँव की रात है। सकर खान मांगणियार को लोग "कामायचा का जादूगर" कहते थे — उन्हें 2012 में पद्मश्री मिला। यही कहानी हर वाद्य और हर गायन-शैली के पीछे छिपी है — राजस्थान में संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही गायक जातियों (लंगा, मांगणियार) की आजीविका, भक्ति और पहचान का माध्यम रहा है। एक ओर राजदरबारों में ध्रुपद और ख्याल गायकी के भव्य घराने पले-बढ़े, तो दूसरी ओर रेत के टीलों पर मांड और लंगा गायकी ने आम जनजीवन की पीड़ा और खुशी को स्वर दिए। यह अध्याय राजस्थान के इसी दोहरे संगीत-संसार — राजदरबारी शास्त्रीय परंपरा और मरुभूमि की लोक-धुनों — को समझने का प्रयास है।
"लोकगीत किसी संस्कृति के मुँह बोले चित्र हैं" — देवेंद्र सत्यार्थी, लोक-साहित्य विद्वान
शास्त्रीय संगीत वह संगीत है, जो शास्त्र, राग और ताल पर आधारित एक अनुशासित साधना है, तथा गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी विकसित हुई है। राजस्थान में इसका विकास राजदरबारों के संरक्षण में हुआ, जहाँ जयपुर, टोंक और मेवाड़ जैसे केंद्रों से आगे चलकर विभिन्न संगीत घरानों का उद्भव संभव हुआ।
| वाणी | उत्पत्ति स्थान / जनक | विशेषता |
|---|---|---|
| गोहर वाणी | उत्पत्ति — ग्वालियर; जनक — तानसेन | सर्वाधिक प्राचीन व प्रतिष्ठित वाणी, ग्वालियर घराने की मूल परंपरा से संबद्ध |
| डागर वाणी | उत्पत्ति — जयपुर; प्रवर्तक — बृजनंद डागर | डागर घराने के ध्रुपद गायकों की विशिष्ट पहचान |
| खण्डार वाणी | उत्पत्ति — उणियारा (टोंक); जनक — खण्डार के शासक समोखनसिंह | बंदे अली खां बीनकार इसी वाणी से जुड़े प्रमुख गायक रहे |
| नौहर वाणी | उत्पत्ति — जयपुर; जनक — श्रीचंद नौहर | जयपुर क्षेत्र की ध्रुपद परंपरा की चौथी प्रमुख शाखा |
राजस्थान के राजदरबारों ने कई प्रमुख शास्त्रीय संगीत घरानों को संरक्षण दिया — इनमें से कुछ का उद्गम राजस्थान में ही हुआ, तथा कुछ अन्य राज्यों से आकर राजस्थानी दरबारों में फले-फूले। परीक्षा में घराने के प्रवर्तक व प्रमुख कलाकार पूछे जाते हैं।
| घराना | प्रवर्तक | विशेषता एवं प्रमुख कलाकार |
|---|---|---|
| जयपुर (सेनिया) घराना | सूरत सेन (तानसेन के पुत्र) | मुख्यतः सितार वादन से संबंधित; मुख्य कलाकार — अमृतसेन |
| जयपुर ख्याल घराना | अल्लादिया खां | जयपुर नरेश रामसिंह द्वितीय के दरबारी संगीतकार; जोड़ रागों पर महारत; मुख्य कलाकार — मोहम्मद अली खां (जिन्हें "कोठी वाले" कहा जाता था) |
| आगरा-अतरौली घराना | भूपत खां (लोकप्रिय नाम — मनरंग) | अल्लादिया खां की गौहर वाणी एवं खण्डार वाणी के लिए प्रसिद्ध; मुख्यतः ख्याल गायन शैली; अन्य प्रसिद्ध कलाकार — केसरबाई केरकर, निवृत्तिबाई सरनाइक |
| डागर घराना | बहराम खां डागर | ध्रुपद गायकों की डागर वाणी के लिए प्रसिद्ध; प्रवर्तक — अलीबख्श (आलिया) व फतेह अली (फत्तू) |
| पटियाला घराना | अलीबख्श (आलिया) एवं फतेह अली (फत्तू) | जयपुर घराने की उपशाखा — जयपुर से संगीत की शिक्षा लेकर टोंक रहे, फिर पटियाला चले गए; टोंक के नवाब ने आलिया को "जनरल" व फत्तू को "कर्नल" की उपाधि दी; प्रसिद्ध कलाकार — गुलाम अली (पाकिस्तानी गज़ल गायक) |
| जोधपुर (रंगीला) घराना | रमजान खां रंगीले (मियां रंगीले) | जोधपुर के गायक इमाम बख्श के शिष्य; जोधपुर दरबार से संरक्षण |
| बीनकार घराना | बंदे अली खां बीनकार (खण्डार वाणी के गायक) | महाराजा रामसिंह द्वितीय के दरबारी संगीतकार; उपशाखा — रज्जब अली खां बीनकार |
| किराना घराना | बंदे अली खां बीनकार द्वारा स्थापित (केंद्र — किराना, उत्तर प्रदेश) | स्वर-शुद्धता के लिए प्रसिद्ध; प्रमुख कलाकार — पंडित भीमसेन जोशी, उस्ताद रज्जब अली, रोशनआरा बेगम, गंगूबाई हंगल |
| मेवाती घराना | घग्घे नज़ीर खां | जोधपुर के जसवंतसिंह जी के दरबारी गायक; जयपुर के ख्याल गायकों को विशिष्ट शैली में विकसित किया; मुख्य कलाकार — पंडित जसराज, पंडित मणिराम, मोतीराम-ज्योतिराम; पंडित जसराज ने मेवाती घराने को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई; अन्य प्रसिद्ध गायिका — किशोरी अमोणकर |
लोक संगीत जन-साधारण के सुख-दुःख, प्रेम और भक्ति की सहज संगीतमयी अभिव्यक्ति है। इसकी विशेषता यह है कि यह शास्त्रीय नियमों से मुक्त होता है तथा मौखिक परंपरा पर आधारित होकर पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता है। महात्मा गांधी ने इसे "संस्कृति का पहरेदार" कहा, जबकि रवींद्रनाथ टैगोर के अनुसार यह "संस्कृति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुँचाने वाली कला" है — और लोक-साहित्य विद्वान देवेंद्र सत्यार्थी ने इसे "किसी संस्कृति के मुँह बोले चित्र" की उपमा दी।
राजस्थान के लोक गीतों को मुख्यतः तीन आधारों पर वर्गीकृत किया जा सकता है — क्षेत्र-आधारित लोक गीत, संस्कार-सम्बन्धी लोक गीत तथा ऋतु/त्योहार-सम्बन्धी लोक गीत। यह वर्गीकरण याद रखने से किसी भी नए लोकगीत को उसकी उचित श्रेणी में रखना आसान हो जाता है।
| क्षेत्र | प्रमुख लोक गीत | विशेषता |
|---|---|---|
| मेवाड़ क्षेत्र (उदयपुर, राजसमंद) | हमसीढो | भीलों का प्रसिद्ध युगल लोकगीत; श्रावण या फाल्गुन माह में स्त्री-पुरुष दोनों द्वारा गाया जाता है |
| जालोर, मारोठ, पहाड़ी क्षेत्र | माछर | नो-खला, शिकार व सामाजिक दबावों की अभिव्यक्ति |
| मेवाड़ क्षेत्र (उदयपुर, चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, सिरोही) | जला | विवाह अवसर पर स्त्रियों द्वारा; वाद्य यंत्र — मांदल; "जला सैण राजां मायलो राज भलो राठौरी रे..." |
| जयपुर, अलवर, भरतपुर, कोटा, करौली, धौलपुर (मैदानी क्षेत्र) | थारी ऊँटा री असवारी | मेवाड़ क्षेत्र का प्रमुख लोकगीत; अन्य लोक गीत — पटेल्या, लालर, बिछयो, नावरी असवारी, नोखला |
| कोटा, बूंदी, बारां, झालावाड़ (हाड़ौती क्षेत्र) | बिछूड़ो | करुण रस पर आधारित; बिच्छू के काटने से पीड़ित स्त्री अपने पति को पुनर्विवाह की सलाह देती है |
| मेवात क्षेत्र | हिचकी | विरहणी स्त्री को हिचकी आने पर वह सोचती है कि पति उसे याद कर रहा है |
संस्कार सम्बन्धी लोक गीत जन्म, विवाह, विदाई व सामाजिक रस्मों के अवसर पर स्त्रियों द्वारा सामूहिक रूप से गाए जाते हैं। नीचे दी गई तालिका इन गीतों के नाम, अवसर व भाव को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करती है।
| गीत | अवसर / भाव | विशेषता |
|---|---|---|
| जच्चा / होलर | बालक के जन्म पर स्त्रियों द्वारा सामूहिक गायन | लोक समाज में संतान-जन्म का उत्सव व्यक्त करने वाला गीत |
| बन्ना-बन्नी | विवाह से पहले दूल्हा-दुल्हन पर आधारित | श्रृंगार, हास्य व सामाजिक अपेक्षाएँ — "अपना बन्ना फूल गुलाबी, बन्नो चम्पा की कली" |
| हल्दी | विवाह पूर्व हल्दी रस्म में | मंगल, सादियों व रक्षा भाव — "म्हारो हल्दी रो रंग सुरंग" |
| मायरा (भात) | भाई द्वारा बहन को दिया गया भात | सामाजिक उत्तरदायित्व व आर्थिक सहयोग, लोक समाज की पारिवारिक संरचना का प्रतीक — "बीरो भात भरण न आसी" |
| जलो | बारात का डेरा देखने के प्रसंग में वधू पक्ष की स्त्रियों द्वारा गाया गीत | विवाह की सामाजिक-सांस्कृतिक परंपरा का चित्रण |
| जुआ-जुइ | विवाह अवसर पर स्त्रियों द्वारा | स्त्री की आशंका, भय व उम्मीद की अभिव्यक्ति |
| पावणा | दामाद के ससुराल आगमन पर, महिलाएँ भोजन परोसते समय गाती हैं | आतिथ्य व सम्मान भाव; "पावणा आया रे, घर आंगण उजियारा" |
| बिंदोला (बंदोला) | विवाह पूर्व वर को रिश्तेदारों के यहाँ आमंत्रित करने व लौटते समय | सामाजिक रीति-रिवाज़ की अभिव्यक्ति |
| कांकण डोरे | कांकण डोरे खोलने का गीत | हास्य व चुटकीले अंदाज़ में — "तने दूध दही से पाल्यो ले लाड़ा, डोरो नहीं खुले" |
| दुपट्टा गीत | विवाह के समय दुल्हे की सालियों द्वारा | हास्य-व्यंग्य प्रधान; पत्नी पति से उसकी विवाह में गाली गीत गाने की प्रार्थना करती है |
| सीठणे / गाली | विवाह में गाए जाने वाले हास्य व व्यंग्य प्रधान गीत | समधी व उसके संबंधियों पर हल्की-फुल्की गालियाँ; सामाजिक तनाव को हल्का करने का माध्यम |
| ओल्यूं / कोयल | बेटी की विदाई पर उसके घर की स्त्रियों द्वारा | करुणा, मातृत्व व वियोग भाव की प्रधानता — "ओल्यूं आवे साजन री, नैणां भर आया" |
| बिंधुड़ो | मृत्युशय्या पर स्त्री द्वारा पति को पुनर्विवाह की सलाह | करुण रस |
| सुपणा | पत्नी द्वारा पति के वियोग में | स्वप्न के माध्यम से भाव व्यक्त |
| घुड़चढ़ी | दूल्हे की बारात के समय | पुरुष-प्रधान वीर-उत्साह रस, सामाजिक प्रतिष्ठा व शौर्य का प्रदर्शन — "नवल बन्ना घोड़ी चढ़ गया, गेलै सब भाई" |
| हिचकी | विरहणी स्त्री को हिचकी आने पर | "म्हारा पियाजी बुलाइ म्हाने आवै हिचकी" |
| चिरमी | नवविवाहिता दुल्हन द्वारा मायके की याद में गाया गीत | विदाई भाव की अभिव्यक्ति |
| बधावा | जन्म, विवाह, गृह प्रवेश जैसे शुभ अवसरों पर | मंगल भावना, प्रसन्नता व सामूहिक आनंद — "बधावा गाओ सखी, आज आनंद भारी" |
| कामण | विवाह संस्कार से जुड़ा महत्त्वपूर्ण गीत, दूल्हे को बुरी नजर व जादू-टोने से बचाने हेतु | लोक विश्वास अनुसार रक्षा-कवच के रूप में माना जाता है — "कामण बांधो रे सखी, दूल्हा राखो राज" |
| इंडोणी | महिलाओं द्वारा कुएँ से पानी लेने जाते समय | साधारण राग, पर लय व खेल का भाव प्रबल |
| गीत | सम्बन्ध / अवसर | भाव / विशेषता |
|---|---|---|
| तेजा | लोक देवता तेजाजी की आराधना | आशा व शक्ति का भाव |
| केसरिया बालम | मांड गायन शैली, वैष्णव परंपरा से जुड़ा | भक्तिपूर्ण, उत्साही गीत; अतिथि-सत्कार का प्रतीक — "केसरिया बालम आओ नी, पधारो म्हारे देश" |
| हरजस | ईश्वर की महिमा का गान | भक्ति भाव |
| पावड़े | पाबूजी की वीरगाथा, ढाढ़ी जाति द्वारा गायन | वीर रस |
| रामदेवजी के गीत | साम्प्रदायिक सद्भाव | भक्ति व लोक आस्था |
| भैरूजी / झुंझारजी / हड़बूजी / सती माता के गीत | लोक आस्था आधारित | रक्षा, बलिदान व विश्वास |
| हीड़ | दीपावली से संबंधित | उल्लास व मंगल भाव |
| धमाल / रसिया | होली पर्व | उल्लास व हास्य |
| कागा | स्त्री पूजा पर्व | विरहणी महिला कौए को संबोधित कर प्रियतम के आने का शगुन मनाती है — "उड़-उड़ रे म्हारा काला रे कागला, जद म्हारा पियजी घर आवै" |
| गणगौर | सौभाग्य व श्रृंगार | "खेलन दयो गणगौर, भँवर म्हाने खेलन दयो गणगौर" |
| तीज / सुवटियां (सुवा) | स्त्री भावना व प्रेम — "सुवा" का अर्थ तोता होता है | भील महिलाओं द्वारा गाया जाता है; तोते के माध्यम से पति को संदेश भेजा जाता है |
| कुरजां | विरह गीत — कुरजां एक विदेशी पक्षी है, संदेशवाहक के रूप में प्रस्तुत | पत्नी कुरजां पक्षी के माध्यम से पति तक संदेश पहुँचाती है — "कुरजां तू उड़ी जा म्हारे पीव रो देश" |
| मोरिया | गणगौर, तीज व विवाह के अवसर पर उस युवती द्वारा गाया जाता है जिसकी सगाई हो चुकी है पर विवाह नहीं हुआ | विवाह में विलंब से उत्पन्न उत्सुकता व विरह दोनों भावों को दर्शाता है |
| कांगसियो | शाब्दिक अर्थ — कंघा; विरह, प्रेम व इंतज़ार की मार्मिक अभिव्यक्ति | "म्हारे छैल भंवर रो कांगसियो पणिहारियां ले गइयां रे..." |
| झोरावा | जैसलमेर क्षेत्र — प्रिय की याद, वियोग | विरह भाव |
| स्यालो / पीपली / उनालो / चौमासा / सावण / कजली | ऋतु/मौसमी गीत — क्रमशः शीत ऋतु, पीपल का पेड़-वर्षा ऋतु (मारवाड़-शेखावाटी), ग्रीष्म ऋतु, वर्षा ऋतु, श्रावण मास-प्रेम व विरह, वर्षा ऋतु (लोक में अत्यंत लोकप्रिय) | अन्य मौसमी गीत — बिजन, स्यालिया, बारहमासा, बादली, मोर |
छात्र अक्सर "मांड" को केवल एक गीत समझ लेते हैं, जबकि यह वास्तव में एक सम्पूर्ण गायन-शैली (राग-आधारित प्रस्तुति शैली) है, जिसके अंतर्गत केसरिया बालम, मूमल जैसे कई गीत आते हैं। इसी तरह "लंगा" व "मांगणियार" गायन शैलियाँ नहीं, बल्कि पेशेवर गायक जातियाँ भी हैं, जो अपनी-अपनी विशिष्ट शैलियों में गाती हैं — परीक्षा में "शैली का नाम" व "जाति का नाम" को घुमाकर पूछा जाता है, इसलिए दोनों में स्पष्ट अंतर रखें।
राजस्थान के लोक वाद्य यंत्रों को उनकी ध्वनि-उत्पत्ति की विधि के आधार पर चार वर्गों में विभाजित किया जाता है — तत (तार) वाद्य, सुषिर (फूंक) वाद्य, अवनद्ध (चर्म) वाद्य तथा घन (ताल) वाद्य। यह वर्गीकरण भारतीय संगीतशास्त्र के मानक वाद्य-वर्गीकरण पर आधारित है, और परीक्षा में किसी भी वाद्य को उसके सही वर्ग में पहचानना एक सामान्य प्रश्न-प्रकार है।
| वर्ग | ध्वनि-उत्पत्ति सिद्धांत | उदाहरण |
|---|---|---|
| तत (तार) वाद्य | ध्वनि तार के कंपन से उत्पन्न होती है — तार को खींचकर, झंकारकर या गज़ से रगड़कर कंपन पैदा किया जाता है; तार की लंबाई व कसावट से सुर की ऊँचाई-नीचाई तय होती है | रावणहत्था, कामायचा, सारंगी, जंतर, इकतारा, चिकारा, सुरिंदा, वीणा/तानपुरा |
| सुषिर (फूंक) वाद्य | न तार होते हैं, न झिल्ली — केवल खोखली नली या ट्यूब में फूंक मारकर (हवा से) ध्वनि उत्पन्न की जाती है | अलगोजा, शहनाई, मोरचंग, पूंगी/बीन, भपंग, करणा/कण, बांसुरी |
| अवनद्ध (चर्म) वाद्य | चमड़े (खाल) की झिल्ली को पीटकर या थपथपाकर ध्वनि निकाली जाती है | ढोल, मांदल, डमरू, नगाड़ा, डेरू, खंजरी, नौबत |
| घन (ताल) वाद्य | ठोस धातु या लकड़ी की दो वस्तुओं को आपस में टकराकर ध्वनि उत्पन्न की जाती है | खड़ताल, मंजीरा, घड़ियाल, झांझ, थाली |
| सारंगी का प्रकार | तार / विशेषता |
|---|---|
| ढाणी सारंगी | निहालदे की कथा सुनाने वाले जोगी बजाते हैं |
| गुजराती सारंगी | 7 तार; "लंगा" समुदाय द्वारा प्रयुक्त |
| जोगिया सारंगी | 4 तार; अलवर-भरतपुर के भर्तृहरि जोगियों द्वारा भर्तृहरि गायन के साथ प्रयुक्त |
| जड़ी की सारंगी (प्यालेदार सारंगी) | जैसलमेर जिले के मांगणियारों द्वारा प्रयुक्त |
| सिंधी सारंगी | पश्चिमी राजस्थान-लंगा समुदाय द्वारा प्रयुक्त |
| वाद्य यंत्र | सामग्री / संरचना | क्षेत्र / कलाकार / विशेषता |
|---|---|---|
| जंतर | रोहिड़ा/सागवान लकड़ी, 27 तार | दो तुमड़ी + बाँस; केंद्र में बारह उभरी हुई लकड़ी की सरिकाएँ; गर्दन में लटकाकर खड़े होकर बजाया जाता है; भोपाओं द्वारा देवनारायणजी की फड़ वाचन के समय, बगड़ावतों की कथा में प्रयुक्त |
| इकतारा | बाँस, चर्मपत्र, इस्पात | नारदजी से संबद्ध; 1 तार; एक हाथ में वादन, दूसरे में करताल |
| गुजरी | लकड़ी, इस्पात, घोड़े के बाल | कामायचा जैसी; 5 तार; पश्चिमी राजस्थान में प्रचलित |
| चिकारा | चर्मपत्र, लकड़ी, इस्पात, प्यालेनुमा सिरा, 3 तार | क्षेत्र — गरासिया (सिरोही), मेव (अलवर) |
| सुरिंदा | बाँस, तूमड़ी के खोल, धातु | सारंगी जैसा; 5/6 तार; गज़ से वादन; तंतु वाद्यों में श्रेष्ठ माना जाता है; प्रसिद्ध वादक — रामनारायण (उदयपुर), उस्ताद सुल्तान खान ("सारंगी का अलबेला सुल्तान", सीकर) |
| वीणा/तानपुरा/तंदूरा/चौतारा/निशान | लकड़ी, इस्पात, धातु, पीतल | सितार व तानपुरे की शक्ल का; 4 तार (तानपुरा — तीन इस्पात+एक पीतल); रामदेवजी का प्रिय वाद्य; कलाकार — रामनाथ चौधरी (जयपुर, नाक से बजाते हैं) |
| रबाब/रवाज | लकड़ी, इस्पात | सारंगी जैसा परंतु 12 तार; भाट या रावल जाति का वाद्य |
| वाद्य यंत्र | सामग्री / संरचना | क्षेत्र / कलाकार / विशेषता |
|---|---|---|
| करणा/कण | पीतल | राजस्थान का सबसे लंबा सुषिर वाद्य; एक लंबी पीतल की तुरही, जो दो भागों में बनी होती है; युद्धभूमि व राजदरबारों में उपयोग |
| भुंगल/रणभेरी | काँसा | युद्ध में बजाए जाने के कारण "रणभेरी" कहा जाता है; भवाई जाति व भवाई नृत्य में प्रयुक्त |
| बांकिया | काँसा | दो भागों में निर्मित एक काँसे की तुरही, बिगुल का बड़ा रूप; शोभायात्राओं, धार्मिक व सामाजिक समारोहों में उपयोग |
| मशक/मशकबीन | बकरी की खाल, मोम | स्कॉटिश बैगपाइप जैसा; नली बाँस से बनी, पाँच अंगुल छिद्र |
| बरगू | काँसा | कप के आकार की घंटी, संकरी मुखनाल सहित "एस" आकार की नली; मेवात — भैरूजी के भोपाओं द्वारा प्रयुक्त |
| नागफनी | काँसा/पीतल धातु | काँसे की सर्पिल नली, घंटी (बेल) साँप के फन (हुड) के आकार की होती है, जिसमें धातु की कंपन करने वाली पत्ती लगी होती है |
| पावरी/तारफा/तारपी | लकड़ी, सूखी तूमड़ी, गाय का सींग | पूंगी का बड़ा रूप; तले की ओर छह छिद्र, ऊपरी हिस्से में एक चाँच जैसी संरचना; कथौड़ी जाति द्वारा प्रयुक्त |
| बांसुरी (मुरली/मुरला/हरणाई/शंख/टोटो/बगू) | लकड़ी | लंबी लकड़ी की बेलनाकार नली, दूसरा छोर खुला जहाँ छह छिद्र; मुख्य कलाकार — पंडित हरिप्रसाद चौरसिया, पन्नालाल घोष |
| पेली | बाँस | एक छोटी बाँसुरी; इसकी ध्वनि पर रतवई गीत को उच्च स्वर में गाया जाता है |
| नड़ | कगौर की लकड़ी से बनी नली | चार अंगुल छिद्र होते हैं; ऊपरी छोर से फूंक देकर बजाया जाता है; प्रसिद्ध कलाकार — करणा भील |
| हारमोनियम | लकड़ी, धातु, पीतल, कपड़ा | उत्पत्ति पश्चिम बंगाल में हुई; सुवाह्य लकड़ी की पेटी, 10 छिद्र जो वायु को धौंकनी से गुज़रने देते हैं; मुख्य कलाकार — महमूद धौलपुरी, उस्ताद अल्लादिया खां (जयपुर घराना) |
| पूंगी/बीन | तूमड़ी, बाँस, मोम | कालबेलिया/सपेरों द्वारा साँप पकड़ने हेतु; पूंगी में 2 नलियाँ, बीन में 1 नली |
| वाद्य यंत्र | सामग्री / संरचना | क्षेत्र / कलाकार / विशेषता |
|---|---|---|
| डफली | लकड़ी, चर्मपत्र, चमड़ा, काला लेप | एकमुखी बेलनाकार ढोल, एक सिरे पर बकरी की खाल मढ़ी, एक छड़ी से बजाया जाता है; होली पर उपयोग; डफ — इसका बड़ा रूप |
| मृदंग / पखावज | लकड़ी, पारदर्शी चर्मपत्र | दाहिने सिरे पर काला लेप, बाएँ सिरे पर बारीक गेहूँ का आटा लेप; उपयोग — "ध्रुपद" और "धमार" संगीत शैली के साथ; कलाकार — पुरुषोत्तम दास (राजसमंद), भवानीशंकर कथक (चूरू) |
| खंजरी | लकड़ी, पारदर्शी चर्मपत्र | चंग जैसा, एक सिरे पर लकड़ी की किनारी, दूसरे पर पारदर्शी चर्मपत्र; बाएँ हाथ में पकड़ा जाता है, दाहिने हाथ की हथेली व अंगुलियों से बजाया जाता है; निर्गुण संत परंपरा, कालबेलिया द्वारा प्रयुक्त |
| डमरू | पीतल, कपास | चमड़े से ढका रेतघड़ी के आकार का खोखला पीतल खोल; मदारियों द्वारा उपयोग |
| नौबत | भैंसे की खाल | अर्ध-अण्डाकार कुंडी की एक जोड़ी जिनके मुख भैंसे की खाल से ढके होते हैं; दो छड़ियों से एक साथ बजाया जाता है; उपयोग — प्राचीन युद्ध, महल-द्वार, आजकल मंदिरों में |
| नगाड़ा / बम / डमाम | घंटा धातु, कपास | अवनद्ध वाद्यों में सबसे बड़ा; राणा/ढोली जाति द्वारा; नगारची — नगाड़ा बजाने वाला; कलाकार — रामकिशन सोलंकी (अजमेर); उपयोग — प्राचीन युद्ध, मंदिर, कच्छी घोड़ी नृत्य, आरती के समय |
| निशान | लोहे की चादर | लोहे की चादरों को जोड़कर बर्तन जैसा आकार, खुला हुआ भाग मोटे चमड़े से ढका; एक लकड़ी की छड़ी जिसके सिरों पर लोहे की जंजीरें व पीतल की छोटी-छोटी गोलाकार पत्तियाँ होती हैं; गरासियों का वाद्य यंत्र |
| पाबूजी-के-माटे | पकी हुई चिकनी मिट्टी, चर्मपत्र | जोड़ी मोटे पेट वाले बड़े आकार के मटके, छोटी गर्दन व चौड़े मुख; उपयोग — "थोरी" व "नायक" समुदाय द्वारा स्थानीय नायक व पाबूजी के जीवन का वर्णन करते समय |
| दमामा / टामक | लोहा | कढ़ाई के आकार का बहुत बड़ा नगाड़ा; मुख्यतः मेवात क्षेत्र में (भरतपुर में रसिया गीत के साथ) |
| भरनी | मिट्टी का घड़ा, कांसे की प्लेट | मिट्टी के मटके के संकरे मुख पर कांसे की प्लेट मढ़कर दो डंडियों से बजाया जाता है; पूर्वी राजस्थान में सर्पदंश उपचार अनुष्ठान, लोक देवताओं के स्थान पर प्रयुक्त |
| वाद्य यंत्र | सामग्री / संरचना | क्षेत्र / विशेषता |
|---|---|---|
| मंजीरा / कांसिया | पीतल+तांबा+काँसे की मिश्र-धातु | करताल/खरताल व मंजीरा सामान्यतः एक ही प्रकार के; उपयोग — कामड़िया सम्प्रदाय द्वारा तेरहताली नृत्य के समय |
| झांझ / झांझर | धातु | मंजीरे का बड़ा रूप, किनारे फैले हुए; धातु की बनी दो मध्यम आकार की चकतियाँ, कपास की रस्सी से बंधी हुई; चिमटा नामक दो डंडियों से बजाया जाता है |
| घड़ियाल / घंटी / वीरघंटा / जालर | पीतल, तांबा, काँसा या जस्ता | बनावट घंटा/घड़ियाल जैसी; सुबह-शाम मंदिर में आरती के समय, विद्यालयों में भी प्रयुक्त |
| श्रीमंडल / टिकोरी | बनावट झाड़ीनुमा पौधे के समान | चांद की तरह के गोल-गोल छोटे-बड़े टंकोर लगे रहते हैं; दो पतली डंडियों की सहायता से बजाया जाता है |
| रमझोल | घुँघरुओं की पट्टी, चमड़ा | घुँघरुओं की नीचे से घुटनों तक बंधी हुई चमड़े की पट्टी; नर्तकियों द्वारा पैरों में बाँधकर नृत्य के समय, उत्सव-त्योहार व गैर नृत्य के समय |
| मटकी | बाँस की खपच्ची | पाँच-छह अंगुल लंबी बांस की खपच्ची से बना; मटकी को दाएँ हाथ से तबली पर एवं बायाँ हाथ खुले सिरे के कोर पर झंकृत किया जाता है |
| घुरालियो | पकी हुई चिकनी मिट्टी | एक ओर से छिलकर मुख पर धागा बांध दिया जाता है; दाँतों के बीच दबाकर धागे को ढील व तनाव देकर या छड़ी दबाकर बजाया जाता है; कालबेलिया व गरासिया जनजाति का प्रमुख वाद्य |
| कलाकार | वाद्य/गायन शैली | सम्मान / वर्ष |
|---|---|---|
| सकर खां मांगणियार | कामायचा | पद्मश्री 2012; संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 1991 |
| सिद्दीक खां मांगणियार | खड़ताल | पद्मश्री |
| अनवर खां मांगणियार | लोक संगीत (मांगणियार गायन) | पद्मश्री 2020; संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 2017 |
| अल्लाह जिलाई बाई | मांड गायन (बीकानेर) | पद्मश्री 1982 |
| तागा राम भील | अलगोजा (जैसलमेर) | पद्मश्री 2026 |
| गफरुद्दीन मेवाती जोगी | भपंग (अलवर/भरतपुर-मेवात) | पद्मश्री 2026 |
| बतूल बेगम | मांड गायन (जयपुर) | नारी शक्ति पुरस्कार 2021 (प्रदत्त — 8 मार्च 2022) |
| पंडित जसराज | शास्त्रीय गायन (मेवाती घराना) | मेवाती घराने को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई |
| उस्ताद सुल्तान खान | सुरिंदा/सारंगी (सीकर) | "सारंगी का अलबेला सुल्तान" उपाधि |
नवीनतम अपडेट (2025-26): वर्ष 2026 के पद्मश्री सम्मान में राजस्थान के लोक-वाद्य वादकों को विशेष प्रतिनिधित्व मिला — तागा राम भील (जैसलमेर, अलगोजा) व गफरुद्दीन मेवाती जोगी (मेवात क्षेत्र, भपंग) दोनों को कला श्रेणी में पद्मश्री प्रदान किया गया, जो राजस्थान की कम-चर्चित लोक-वाद्य परंपराओं को मिली महत्वपूर्ण राष्ट्रीय पहचान है। 25 जून 2020 को भारतीय डाक विभाग ने "घुमंतू मनोरंजनकर्ताओं के वाद्य यंत्र" (Musical Instruments of Wandering Minstrels) शीर्षक से 6 संयुक्त डाक टिकटों की शृंखला जारी की थी, जिसमें कामायचा, रावणहत्था, सुरिंदा, अलगोजा, बुर्राकथा व इकतारा शामिल हैं — यह राजस्थान व निकटवर्ती क्षेत्रों के लोक-वाद्यों को मिली एक बड़ी राष्ट्रीय पहचान है। ध्यान रहे — "केसरिया बालम/मांड गायन शैली" को लोकप्रिय रूप से "राजस्थान का राज्य गीत" कहा जाता है, परंतु इसकी कोई आधिकारिक सरकारी अधिसूचना उपलब्ध नहीं है — परीक्षा में यह जानकारी सावधानीपूर्वक "परंपरागत मान्यता" के रूप में प्रस्तुत करें।
1. ध्रुपद गायन शैली के जनक मानसिंह तोमर (ग्वालियर) माने जाते हैं; दरबारी संगीतज्ञ बैजू बावरा के सहयोग से इसका प्रारंभ हुआ; राज्य की एकमात्र ध्रुपद गायिका मधुभट्ट तैलंग हैं। 2. ध्रुपद की चार वाणियाँ हैं — गोहर वाणी (ग्वालियर, तानसेन), डागर वाणी (जयपुर, बृजनंद डागर), खण्डार वाणी (उणियारा-टोंक, समोखनसिंह) व नौहर वाणी (जयपुर, श्रीचंद नौहर)। 3. मेवाती घराने के प्रवर्तक घग्घे नज़ीर खां थे; पंडित जसराज ने इस घराने को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। 4. किराना घराने की स्थापना बंदे अली खां बीनकार ने की; यह स्वर-शुद्धता के लिए प्रसिद्ध है, केंद्र उत्तर प्रदेश में स्थित है। 5. मांड जैसलमेर का प्राचीन नाम था, इसीलिए मांड गायन शैली का विकास वहीं हुआ; केसरिया बालम इस शैली का सबसे प्रसिद्ध गीत है (लोकप्रिय रूप से "राजस्थान का राज्य गीत" कहा जाता है, आधिकारिक अधिसूचना उपलब्ध नहीं)। 6. लंगा गायन शैली जैसलमेर-बाड़मेर के लंगा समुदाय द्वारा विकसित हुई; इसका प्रमुख गीत "निम्बुड़ा" है। 7. मांगणियार गायन शैली में 6 राग व 36 रागिनियों का प्रयोग होता है; सकर खां ("कामायचा के जादूगर") व सिद्दीक खां ("खड़ताल के जादूगर") इसके प्रमुख कलाकार रहे। 8. तालबंदी गायन शैली का विकास औरंगजेब द्वारा संगीत-प्रतिबंध के काल में मथुरा से आए साधु-संन्यासियों द्वारा हुआ। 9. हवेली संगीत नाथद्वारा-जयपुर-किशनगढ़-कोटा में गाया जाता है, परंतु इसे संगीत घराने का दर्जा प्राप्त नहीं है। 10. अलगोजा राजस्थान का "राज्य वाद्य" (State Instrument) है — दो बाँस की बांसुरियों की जोड़ी होती है, जिसे एक साथ फूंका जाता है। 11. रावणहत्था राजस्थान का प्राचीनतम तत वाद्य है, जो पाबूजी की फड़ वाचन में प्रयुक्त होता है। 12. कामायचा मांगणियार समुदाय (जैसलमेर-बाड़मेर) का प्रमुख वाद्य है, जिसमें 16 या 27 तार होते हैं। 13. 25 जून 2020 को भारतीय डाक विभाग ने कामायचा, रावणहत्था, सुरिंदा, अलगोजा, बुर्राकथा व इकतारा पर संयुक्त डाक टिकट शृंखला जारी की। 14. भपंग को "बोलने वाला डमरू" कहा जाता है; यह मेवात क्षेत्र में मेवाती जोगी समुदाय का प्रमुख वाद्य है। 15. मोरचंग को "ज्यू हार्प" भी कहते हैं — यह होठों के बीच रखकर बजाया जाने वाला सबसे छोटा सुषिर वाद्य है। 16. चार वाद्य वर्ग हैं — तत (तार), सुषिर (फूंक), अवनद्ध (चर्म) व घन (ताल) — यह वर्गीकरण ध्वनि-उत्पत्ति की विधि पर आधारित है। 17. नगाड़ा/बम/डमाम अवनद्ध वाद्यों में सबसे बड़ा है; राणा/ढोली जाति द्वारा बजाया जाता है। 18. खड़ताल साधु-संन्यासियों का घन वाद्य है, जो इकतारा के साथ बजाया जाता है — सिद्दीक खां मांगणियार को "खड़ताल के जादूगर" कहा जाता था। 19. तागा राम भील (जैसलमेर, अलगोजा) व गफरुद्दीन मेवाती जोगी (मेवात, भपंग) दोनों को 2026 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। 20. फड़ गायन में देवनारायणजी की फड़ जंतर वाद्य के साथ तथा पाबूजी की फड़ रावणहत्था वाद्य के साथ बांची जाती है (हस्तशिल्प पक्ष अध्याय 3 में विस्तृत है)।
राजस्थान का संगीत-संसार दो समांतर धाराओं में बहता है — एक ओर राजदरबारों की शास्त्रीय परंपरा, जिसने ध्रुपद गायन, चार वाणियों और जयपुर-मेवाती-डागर-पटियाला जैसे प्रतिष्ठित घरानों को जन्म दिया; दूसरी ओर आम जनजीवन की लोक-धुनें, जो मांड, लंगा, मांगणियार, तालबंदी व हवेली संगीत जैसी शैलियों में गूँजती रहीं। इन दोनों धाराओं के बीच सेतु का काम किया गायक जातियों ने — लंगा व मांगणियार समुदाय, जिन्होंने पीढ़ियों तक संगीत को अपनी आजीविका व पहचान बनाया, और सकर खां, सिद्दीक खां, अनवर खां जैसे कलाकारों के माध्यम से इसे राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँचाया।
वाद्य यंत्रों की दुनिया भी उतनी ही समृद्ध है — रावणहत्था और कामायचा जैसे तत वाद्य, अलगोजा और शहनाई जैसे सुषिर वाद्य, ढोल और मांदल जैसे अवनद्ध वाद्य, तथा खड़ताल और मंजीरा जैसे घन वाद्य — प्रत्येक का अपना समुदाय, अपना अवसर और अपनी विशिष्ट धुन है। लोकगीतों का विशाल भंडार — जन्म से मृत्यु तक, हर ऋतु और हर त्योहार के लिए एक अलग गीत — यह सिद्ध करता है कि राजस्थान में संगीत जीवन के हर पड़ाव का साथी रहा है, महज मनोरंजन का साधन नहीं।
परीक्षा की दृष्टि से यह अध्याय अत्यंत तथ्य-सघन है — घराने, वाणियाँ, गायन शैलियाँ, वाद्य यंत्र व उनके कलाकार सभी प्रत्यक्ष प्रश्नों के लिए महत्वपूर्ण हैं, जबकि लोकगीतों का वर्गीकरण व सामाजिक महत्त्व विश्लेषणात्मक प्रश्नों के लिए उपयोगी है। अगले अध्याय में हम राजस्थानी भाषा, बोलियों एवं साहित्य — डिंगल-पिंगल से लेकर चारण साहित्य तक — का अध्ययन करेंगे, जो इसी सांस्कृतिक अभिव्यक्ति की अगली महत्वपूर्ण कड़ी है।
| जिला/क्षेत्र | गायन शैली / वाद्य यंत्र | सम्बद्ध समुदाय |
|---|---|---|
| जैसलमेर-बाड़मेर | मांड, लंगा व मांगणियार गायन; कामायचा, अलगोजा, खड़ताल | लंगा, मांगणियार समुदाय |
| बीकानेर | मांड गायन (अल्लाह जिलाई बाई) | सामान्य |
| जोधपुर | रंगीला घराना, गवरी देवी (मांड) | सामान्य |
| जयपुर | जयपुर सेनिया घराना, ख्याल घराना, हारमोनियम परंपरा | सामान्य |
| टोंक-उणियारा | खण्डार वाणी (ध्रुपद) | सामान्य |
| मेवात (अलवर-भरतपुर) | तालबंदी, भपंग, करणा | मेवाती जोगी समुदाय |
| नाथद्वारा-किशनगढ़-कोटा | हवेली संगीत | वैष्णव सम्प्रदाय |
| सिरोही (गरासिया) | चिकारा, घुरालियो, निशान | गरासिया जनजाति |
| उदयपुर-राजसमंद | हमसीढो लोकगीत, सुरिंदा (रामनारायण) | भील समुदाय |
| सीकर | सुरिंदा/सारंगी (उस्ताद सुल्तान खान) | सामान्य |