🎻 अध्याय 5/13 — राजस्थान की कला एवं संस्कृति

संगीत — शास्त्रीय एवं लोक संगीत तथा वाद्य यंत्र

Classical & Folk Music, Instruments | RAS Pre + Mains
📋 इस अध्याय में
  1. शास्त्रीय संगीत परंपरा — राजस्थान में विकास एवं राजदरबारी संरक्षण
  2. राजस्थान के प्रमुख शास्त्रीय संगीत घराने
  3. लोक संगीत — परिभाषा एवं विशेषताएँ
  4. मांड गायन शैली — राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान
  5. लंगा एवं मांगणियार गायन शैली — गायक जातियाँ
  6. तालबंदी, हवेली संगीत एवं फड़ गायन शैली
  7. राजस्थान के लोक गीतों का वर्गीकरण
  8. संस्कार सम्बन्धी लोक गीत — जन्म, विवाह, विदाई, मृत्यु
  9. त्योहार, ऋतु एवं धार्मिक लोक गीत
  10. लोक वाद्य यंत्र — वर्गीकरण का ढाँचा
  11. तत वाद्य (तार वाद्य) — रावणहत्था, कामायचा, सारंगी, जंतर
  12. सुषिर वाद्य (फूंक वाद्य) — अलगोजा, शहनाई, मोरचंग, पूंगी
  13. अवनद्ध वाद्य (चर्म वाद्य) — ढोल, मांदल, डमरू, नगाड़ा
  14. घन वाद्य (ताल वाद्य) — खड़ताल, मंजीरा, घड़ियाल
  15. प्रमुख कलाकार, पद्मश्री सम्मान एवं नवीनतम अपडेट (2024-26)
  16. अध्याय सारांश

पश्चिमी राजस्थान के रेतीले धोरों में, भोपा जब रात के अंधेरे में पाबूजी की फड़ के सामने बैठता है, तो उसके हाथ में एक अनोखा वाद्य होता है — रावणहत्था। नारियल के खोल पर बकरी की खाल मढ़कर, घोड़े की पूँछ के बालों से बने गज से रगड़कर जो धुन निकलती है, वह किसी वायलिन से कम नहीं लगती। कहते हैं यह राजस्थान का सबसे प्राचीन वाद्य है, और लोक-मान्यता तो इसे लंकापति रावण से भी जोड़ती है। ठीक इसी तरह, थार के रेगिस्तान में मांगणियार समुदाय के एक कलाकार जब कामायचा बजाते हुए गाता है, तो सुनने वाला भूल जाता है कि यह किसी राजा का दरबार नहीं, बल्कि एक आम गाँव की रात है। सकर खान मांगणियार को लोग "कामायचा का जादूगर" कहते थे — उन्हें 2012 में पद्मश्री मिला। यही कहानी हर वाद्य और हर गायन-शैली के पीछे छिपी है — राजस्थान में संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही गायक जातियों (लंगा, मांगणियार) की आजीविका, भक्ति और पहचान का माध्यम रहा है। एक ओर राजदरबारों में ध्रुपद और ख्याल गायकी के भव्य घराने पले-बढ़े, तो दूसरी ओर रेत के टीलों पर मांड और लंगा गायकी ने आम जनजीवन की पीड़ा और खुशी को स्वर दिए। यह अध्याय राजस्थान के इसी दोहरे संगीत-संसार — राजदरबारी शास्त्रीय परंपरा और मरुभूमि की लोक-धुनों — को समझने का प्रयास है।

"लोकगीत किसी संस्कृति के मुँह बोले चित्र हैं" — देवेंद्र सत्यार्थी, लोक-साहित्य विद्वान

1शास्त्रीय संगीत परंपरा — राजस्थान में विकास एवं राजदरबारी संरक्षण

शास्त्रीय संगीत वह संगीत है, जो शास्त्र, राग और ताल पर आधारित एक अनुशासित साधना है, तथा गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी विकसित हुई है। राजस्थान में इसका विकास राजदरबारों के संरक्षण में हुआ, जहाँ जयपुर, टोंक और मेवाड़ जैसे केंद्रों से आगे चलकर विभिन्न संगीत घरानों का उद्भव संभव हुआ।

ध्रुपद गायन शैली

ध्रुपद गायन की चार वाणियाँ

वाणीउत्पत्ति स्थान / जनकविशेषता
गोहर वाणीउत्पत्ति — ग्वालियर; जनक — तानसेनसर्वाधिक प्राचीन व प्रतिष्ठित वाणी, ग्वालियर घराने की मूल परंपरा से संबद्ध
डागर वाणीउत्पत्ति — जयपुर; प्रवर्तक — बृजनंद डागरडागर घराने के ध्रुपद गायकों की विशिष्ट पहचान
खण्डार वाणीउत्पत्ति — उणियारा (टोंक); जनक — खण्डार के शासक समोखनसिंहबंदे अली खां बीनकार इसी वाणी से जुड़े प्रमुख गायक रहे
नौहर वाणीउत्पत्ति — जयपुर; जनक — श्रीचंद नौहरजयपुर क्षेत्र की ध्रुपद परंपरा की चौथी प्रमुख शाखा

2राजस्थान के प्रमुख शास्त्रीय संगीत घराने

राजस्थान के राजदरबारों ने कई प्रमुख शास्त्रीय संगीत घरानों को संरक्षण दिया — इनमें से कुछ का उद्गम राजस्थान में ही हुआ, तथा कुछ अन्य राज्यों से आकर राजस्थानी दरबारों में फले-फूले। परीक्षा में घराने के प्रवर्तक व प्रमुख कलाकार पूछे जाते हैं।

घरानाप्रवर्तकविशेषता एवं प्रमुख कलाकार
जयपुर (सेनिया) घरानासूरत सेन (तानसेन के पुत्र)मुख्यतः सितार वादन से संबंधित; मुख्य कलाकार — अमृतसेन
जयपुर ख्याल घरानाअल्लादिया खांजयपुर नरेश रामसिंह द्वितीय के दरबारी संगीतकार; जोड़ रागों पर महारत; मुख्य कलाकार — मोहम्मद अली खां (जिन्हें "कोठी वाले" कहा जाता था)
आगरा-अतरौली घरानाभूपत खां (लोकप्रिय नाम — मनरंग)अल्लादिया खां की गौहर वाणी एवं खण्डार वाणी के लिए प्रसिद्ध; मुख्यतः ख्याल गायन शैली; अन्य प्रसिद्ध कलाकार — केसरबाई केरकर, निवृत्तिबाई सरनाइक
डागर घरानाबहराम खां डागरध्रुपद गायकों की डागर वाणी के लिए प्रसिद्ध; प्रवर्तक — अलीबख्श (आलिया) व फतेह अली (फत्तू)
पटियाला घरानाअलीबख्श (आलिया) एवं फतेह अली (फत्तू)जयपुर घराने की उपशाखा — जयपुर से संगीत की शिक्षा लेकर टोंक रहे, फिर पटियाला चले गए; टोंक के नवाब ने आलिया को "जनरल" व फत्तू को "कर्नल" की उपाधि दी; प्रसिद्ध कलाकार — गुलाम अली (पाकिस्तानी गज़ल गायक)
जोधपुर (रंगीला) घरानारमजान खां रंगीले (मियां रंगीले)जोधपुर के गायक इमाम बख्श के शिष्य; जोधपुर दरबार से संरक्षण
बीनकार घरानाबंदे अली खां बीनकार (खण्डार वाणी के गायक)महाराजा रामसिंह द्वितीय के दरबारी संगीतकार; उपशाखा — रज्जब अली खां बीनकार
किराना घरानाबंदे अली खां बीनकार द्वारा स्थापित (केंद्र — किराना, उत्तर प्रदेश)स्वर-शुद्धता के लिए प्रसिद्ध; प्रमुख कलाकार — पंडित भीमसेन जोशी, उस्ताद रज्जब अली, रोशनआरा बेगम, गंगूबाई हंगल
मेवाती घरानाघग्घे नज़ीर खांजोधपुर के जसवंतसिंह जी के दरबारी गायक; जयपुर के ख्याल गायकों को विशिष्ट शैली में विकसित किया; मुख्य कलाकार — पंडित जसराज, पंडित मणिराम, मोतीराम-ज्योतिराम; पंडित जसराज ने मेवाती घराने को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई; अन्य प्रसिद्ध गायिका — किशोरी अमोणकर

3लोक संगीत — परिभाषा एवं विशेषताएँ

लोक संगीत जन-साधारण के सुख-दुःख, प्रेम और भक्ति की सहज संगीतमयी अभिव्यक्ति है। इसकी विशेषता यह है कि यह शास्त्रीय नियमों से मुक्त होता है तथा मौखिक परंपरा पर आधारित होकर पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता है। महात्मा गांधी ने इसे "संस्कृति का पहरेदार" कहा, जबकि रवींद्रनाथ टैगोर के अनुसार यह "संस्कृति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुँचाने वाली कला" है — और लोक-साहित्य विद्वान देवेंद्र सत्यार्थी ने इसे "किसी संस्कृति के मुँह बोले चित्र" की उपमा दी।

4मांड गायन शैली — राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान

🎻 मांड गायन शैली वर्ग: लोक संगीत — श्रृंगार व विरह प्रधान शैली | सामग्री: गायन शैली (वाद्य विशिष्ट नहीं)

5लंगा एवं मांगणियार गायन शैली — गायक जातियाँ

🎻 लंगा गायन शैली वर्ग: लोक संगीत — वीरता, श्रृंगार व सामाजिक भावनाओं का समन्वय | सामग्री: वाद्य: कामायचा, सारंगी

🎻 मांगणियार गायन शैली वर्ग: लोक संगीत — लोकजीवन, राजाश्रय एवं सामाजिक घटनाओं का प्रभाव | सामग्री: वाद्य: कामायचा, खड़ताल, सुरनाई

📢 विज्ञापन
🔥 सबसे लोकप्रिय
📘

RAS Foundation Course 2026 🕉️

Multiple ValidityTests
₹4,999₹25,000
Join Now →

6तालबंदी, हवेली संगीत एवं फड़ गायन शैली

7राजस्थान के लोक गीतों का वर्गीकरण

राजस्थान के लोक गीतों को मुख्यतः तीन आधारों पर वर्गीकृत किया जा सकता है — क्षेत्र-आधारित लोक गीत, संस्कार-सम्बन्धी लोक गीत तथा ऋतु/त्योहार-सम्बन्धी लोक गीत। यह वर्गीकरण याद रखने से किसी भी नए लोकगीत को उसकी उचित श्रेणी में रखना आसान हो जाता है।

क्षेत्रप्रमुख लोक गीतविशेषता
मेवाड़ क्षेत्र (उदयपुर, राजसमंद)हमसीढोभीलों का प्रसिद्ध युगल लोकगीत; श्रावण या फाल्गुन माह में स्त्री-पुरुष दोनों द्वारा गाया जाता है
जालोर, मारोठ, पहाड़ी क्षेत्रमाछरनो-खला, शिकार व सामाजिक दबावों की अभिव्यक्ति
मेवाड़ क्षेत्र (उदयपुर, चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, सिरोही)जलाविवाह अवसर पर स्त्रियों द्वारा; वाद्य यंत्र — मांदल; "जला सैण राजां मायलो राज भलो राठौरी रे..."
जयपुर, अलवर, भरतपुर, कोटा, करौली, धौलपुर (मैदानी क्षेत्र)थारी ऊँटा री असवारीमेवाड़ क्षेत्र का प्रमुख लोकगीत; अन्य लोक गीत — पटेल्या, लालर, बिछयो, नावरी असवारी, नोखला
कोटा, बूंदी, बारां, झालावाड़ (हाड़ौती क्षेत्र)बिछूड़ोकरुण रस पर आधारित; बिच्छू के काटने से पीड़ित स्त्री अपने पति को पुनर्विवाह की सलाह देती है
मेवात क्षेत्रहिचकीविरहणी स्त्री को हिचकी आने पर वह सोचती है कि पति उसे याद कर रहा है

8संस्कार सम्बन्धी लोक गीत — जन्म, विवाह, विदाई, मृत्यु

संस्कार सम्बन्धी लोक गीत जन्म, विवाह, विदाई व सामाजिक रस्मों के अवसर पर स्त्रियों द्वारा सामूहिक रूप से गाए जाते हैं। नीचे दी गई तालिका इन गीतों के नाम, अवसर व भाव को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करती है।

गीतअवसर / भावविशेषता
जच्चा / होलरबालक के जन्म पर स्त्रियों द्वारा सामूहिक गायनलोक समाज में संतान-जन्म का उत्सव व्यक्त करने वाला गीत
बन्ना-बन्नीविवाह से पहले दूल्हा-दुल्हन पर आधारितश्रृंगार, हास्य व सामाजिक अपेक्षाएँ — "अपना बन्ना फूल गुलाबी, बन्नो चम्पा की कली"
हल्दीविवाह पूर्व हल्दी रस्म मेंमंगल, सादियों व रक्षा भाव — "म्हारो हल्दी रो रंग सुरंग"
मायरा (भात)भाई द्वारा बहन को दिया गया भातसामाजिक उत्तरदायित्व व आर्थिक सहयोग, लोक समाज की पारिवारिक संरचना का प्रतीक — "बीरो भात भरण न आसी"
जलोबारात का डेरा देखने के प्रसंग में वधू पक्ष की स्त्रियों द्वारा गाया गीतविवाह की सामाजिक-सांस्कृतिक परंपरा का चित्रण
जुआ-जुइविवाह अवसर पर स्त्रियों द्वारास्त्री की आशंका, भय व उम्मीद की अभिव्यक्ति
पावणादामाद के ससुराल आगमन पर, महिलाएँ भोजन परोसते समय गाती हैंआतिथ्य व सम्मान भाव; "पावणा आया रे, घर आंगण उजियारा"
बिंदोला (बंदोला)विवाह पूर्व वर को रिश्तेदारों के यहाँ आमंत्रित करने व लौटते समयसामाजिक रीति-रिवाज़ की अभिव्यक्ति
कांकण डोरेकांकण डोरे खोलने का गीतहास्य व चुटकीले अंदाज़ में — "तने दूध दही से पाल्यो ले लाड़ा, डोरो नहीं खुले"
दुपट्टा गीतविवाह के समय दुल्हे की सालियों द्वाराहास्य-व्यंग्य प्रधान; पत्नी पति से उसकी विवाह में गाली गीत गाने की प्रार्थना करती है
सीठणे / गालीविवाह में गाए जाने वाले हास्य व व्यंग्य प्रधान गीतसमधी व उसके संबंधियों पर हल्की-फुल्की गालियाँ; सामाजिक तनाव को हल्का करने का माध्यम
ओल्यूं / कोयलबेटी की विदाई पर उसके घर की स्त्रियों द्वाराकरुणा, मातृत्व व वियोग भाव की प्रधानता — "ओल्यूं आवे साजन री, नैणां भर आया"
बिंधुड़ोमृत्युशय्या पर स्त्री द्वारा पति को पुनर्विवाह की सलाहकरुण रस
सुपणापत्नी द्वारा पति के वियोग मेंस्वप्न के माध्यम से भाव व्यक्त
घुड़चढ़ीदूल्हे की बारात के समयपुरुष-प्रधान वीर-उत्साह रस, सामाजिक प्रतिष्ठा व शौर्य का प्रदर्शन — "नवल बन्ना घोड़ी चढ़ गया, गेलै सब भाई"
हिचकीविरहणी स्त्री को हिचकी आने पर"म्हारा पियाजी बुलाइ म्हाने आवै हिचकी"
चिरमीनवविवाहिता दुल्हन द्वारा मायके की याद में गाया गीतविदाई भाव की अभिव्यक्ति
बधावाजन्म, विवाह, गृह प्रवेश जैसे शुभ अवसरों परमंगल भावना, प्रसन्नता व सामूहिक आनंद — "बधावा गाओ सखी, आज आनंद भारी"
कामणविवाह संस्कार से जुड़ा महत्त्वपूर्ण गीत, दूल्हे को बुरी नजर व जादू-टोने से बचाने हेतुलोक विश्वास अनुसार रक्षा-कवच के रूप में माना जाता है — "कामण बांधो रे सखी, दूल्हा राखो राज"
इंडोणीमहिलाओं द्वारा कुएँ से पानी लेने जाते समयसाधारण राग, पर लय व खेल का भाव प्रबल

9त्योहार, ऋतु एवं धार्मिक लोक गीत

गीतसम्बन्ध / अवसरभाव / विशेषता
तेजालोक देवता तेजाजी की आराधनाआशा व शक्ति का भाव
केसरिया बालममांड गायन शैली, वैष्णव परंपरा से जुड़ाभक्तिपूर्ण, उत्साही गीत; अतिथि-सत्कार का प्रतीक — "केसरिया बालम आओ नी, पधारो म्हारे देश"
हरजसईश्वर की महिमा का गानभक्ति भाव
पावड़ेपाबूजी की वीरगाथा, ढाढ़ी जाति द्वारा गायनवीर रस
रामदेवजी के गीतसाम्प्रदायिक सद्भावभक्ति व लोक आस्था
भैरूजी / झुंझारजी / हड़बूजी / सती माता के गीतलोक आस्था आधारितरक्षा, बलिदान व विश्वास
हीड़दीपावली से संबंधितउल्लास व मंगल भाव
धमाल / रसियाहोली पर्वउल्लास व हास्य
कागास्त्री पूजा पर्वविरहणी महिला कौए को संबोधित कर प्रियतम के आने का शगुन मनाती है — "उड़-उड़ रे म्हारा काला रे कागला, जद म्हारा पियजी घर आवै"
गणगौरसौभाग्य व श्रृंगार"खेलन दयो गणगौर, भँवर म्हाने खेलन दयो गणगौर"
तीज / सुवटियां (सुवा)स्त्री भावना व प्रेम — "सुवा" का अर्थ तोता होता हैभील महिलाओं द्वारा गाया जाता है; तोते के माध्यम से पति को संदेश भेजा जाता है
कुरजांविरह गीत — कुरजां एक विदेशी पक्षी है, संदेशवाहक के रूप में प्रस्तुतपत्नी कुरजां पक्षी के माध्यम से पति तक संदेश पहुँचाती है — "कुरजां तू उड़ी जा म्हारे पीव रो देश"
मोरियागणगौर, तीज व विवाह के अवसर पर उस युवती द्वारा गाया जाता है जिसकी सगाई हो चुकी है पर विवाह नहीं हुआविवाह में विलंब से उत्पन्न उत्सुकता व विरह दोनों भावों को दर्शाता है
कांगसियोशाब्दिक अर्थ — कंघा; विरह, प्रेम व इंतज़ार की मार्मिक अभिव्यक्ति"म्हारे छैल भंवर रो कांगसियो पणिहारियां ले गइयां रे..."
झोरावाजैसलमेर क्षेत्र — प्रिय की याद, वियोगविरह भाव
स्यालो / पीपली / उनालो / चौमासा / सावण / कजलीऋतु/मौसमी गीत — क्रमशः शीत ऋतु, पीपल का पेड़-वर्षा ऋतु (मारवाड़-शेखावाटी), ग्रीष्म ऋतु, वर्षा ऋतु, श्रावण मास-प्रेम व विरह, वर्षा ऋतु (लोक में अत्यंत लोकप्रिय)अन्य मौसमी गीत — बिजन, स्यालिया, बारहमासा, बादली, मोर
💡 परीक्षा-टिप — मांड बनाम मारवाड़ी लोकगीत में अंतर न करें

छात्र अक्सर "मांड" को केवल एक गीत समझ लेते हैं, जबकि यह वास्तव में एक सम्पूर्ण गायन-शैली (राग-आधारित प्रस्तुति शैली) है, जिसके अंतर्गत केसरिया बालम, मूमल जैसे कई गीत आते हैं। इसी तरह "लंगा" व "मांगणियार" गायन शैलियाँ नहीं, बल्कि पेशेवर गायक जातियाँ भी हैं, जो अपनी-अपनी विशिष्ट शैलियों में गाती हैं — परीक्षा में "शैली का नाम" व "जाति का नाम" को घुमाकर पूछा जाता है, इसलिए दोनों में स्पष्ट अंतर रखें।

10लोक वाद्य यंत्र — वर्गीकरण का ढाँचा

राजस्थान के लोक वाद्य यंत्रों को उनकी ध्वनि-उत्पत्ति की विधि के आधार पर चार वर्गों में विभाजित किया जाता है — तत (तार) वाद्य, सुषिर (फूंक) वाद्य, अवनद्ध (चर्म) वाद्य तथा घन (ताल) वाद्य। यह वर्गीकरण भारतीय संगीतशास्त्र के मानक वाद्य-वर्गीकरण पर आधारित है, और परीक्षा में किसी भी वाद्य को उसके सही वर्ग में पहचानना एक सामान्य प्रश्न-प्रकार है।

वर्गध्वनि-उत्पत्ति सिद्धांतउदाहरण
तत (तार) वाद्यध्वनि तार के कंपन से उत्पन्न होती है — तार को खींचकर, झंकारकर या गज़ से रगड़कर कंपन पैदा किया जाता है; तार की लंबाई व कसावट से सुर की ऊँचाई-नीचाई तय होती हैरावणहत्था, कामायचा, सारंगी, जंतर, इकतारा, चिकारा, सुरिंदा, वीणा/तानपुरा
सुषिर (फूंक) वाद्यन तार होते हैं, न झिल्ली — केवल खोखली नली या ट्यूब में फूंक मारकर (हवा से) ध्वनि उत्पन्न की जाती हैअलगोजा, शहनाई, मोरचंग, पूंगी/बीन, भपंग, करणा/कण, बांसुरी
अवनद्ध (चर्म) वाद्यचमड़े (खाल) की झिल्ली को पीटकर या थपथपाकर ध्वनि निकाली जाती हैढोल, मांदल, डमरू, नगाड़ा, डेरू, खंजरी, नौबत
घन (ताल) वाद्यठोस धातु या लकड़ी की दो वस्तुओं को आपस में टकराकर ध्वनि उत्पन्न की जाती हैखड़ताल, मंजीरा, घड़ियाल, झांझ, थाली
📢 विज्ञापन
📦

ALL IN ONE Subscription — सम्पूर्ण GK एक ही स्थान पर

Multiple ValidityTests
₹899₹4,999
Join Now →

11तत वाद्य (तार वाद्य) — रावणहत्था, कामायचा, सारंगी, जंतर

🎻 रावणहत्था वर्ग: तत वाद्य (तार वाद्य) | सामग्री: तूमड़ी, बाँस, मोम, नारियल का खोल, बकरी की खाल

🎻 कामायचा वर्ग: तत वाद्य (तार वाद्य) | सामग्री: चर्मपत्र, आँत, इस्पात, धातु, शीशम, घोड़े के बाल

सारंगी के प्रकार

सारंगी का प्रकारतार / विशेषता
ढाणी सारंगीनिहालदे की कथा सुनाने वाले जोगी बजाते हैं
गुजराती सारंगी7 तार; "लंगा" समुदाय द्वारा प्रयुक्त
जोगिया सारंगी4 तार; अलवर-भरतपुर के भर्तृहरि जोगियों द्वारा भर्तृहरि गायन के साथ प्रयुक्त
जड़ी की सारंगी (प्यालेदार सारंगी)जैसलमेर जिले के मांगणियारों द्वारा प्रयुक्त
सिंधी सारंगीपश्चिमी राजस्थान-लंगा समुदाय द्वारा प्रयुक्त
वाद्य यंत्रसामग्री / संरचनाक्षेत्र / कलाकार / विशेषता
जंतररोहिड़ा/सागवान लकड़ी, 27 तारदो तुमड़ी + बाँस; केंद्र में बारह उभरी हुई लकड़ी की सरिकाएँ; गर्दन में लटकाकर खड़े होकर बजाया जाता है; भोपाओं द्वारा देवनारायणजी की फड़ वाचन के समय, बगड़ावतों की कथा में प्रयुक्त
इकताराबाँस, चर्मपत्र, इस्पातनारदजी से संबद्ध; 1 तार; एक हाथ में वादन, दूसरे में करताल
गुजरीलकड़ी, इस्पात, घोड़े के बालकामायचा जैसी; 5 तार; पश्चिमी राजस्थान में प्रचलित
चिकाराचर्मपत्र, लकड़ी, इस्पात, प्यालेनुमा सिरा, 3 तारक्षेत्र — गरासिया (सिरोही), मेव (अलवर)
सुरिंदाबाँस, तूमड़ी के खोल, धातुसारंगी जैसा; 5/6 तार; गज़ से वादन; तंतु वाद्यों में श्रेष्ठ माना जाता है; प्रसिद्ध वादक — रामनारायण (उदयपुर), उस्ताद सुल्तान खान ("सारंगी का अलबेला सुल्तान", सीकर)
वीणा/तानपुरा/तंदूरा/चौतारा/निशानलकड़ी, इस्पात, धातु, पीतलसितार व तानपुरे की शक्ल का; 4 तार (तानपुरा — तीन इस्पात+एक पीतल); रामदेवजी का प्रिय वाद्य; कलाकार — रामनाथ चौधरी (जयपुर, नाक से बजाते हैं)
रबाब/रवाजलकड़ी, इस्पातसारंगी जैसा परंतु 12 तार; भाट या रावल जाति का वाद्य

12सुषिर वाद्य (फूंक वाद्य) — अलगोजा, शहनाई, मोरचंग, पूंगी

🎻 अलगोजा वर्ग: सुषिर वाद्य (फूंक वाद्य) | सामग्री: बाँस

🎻 शहनाई / नफीरी / सुंदरी वर्ग: सुषिर वाद्य (फूंक वाद्य) | सामग्री: लकड़ी, इस्पात

🎻 मोरचंग (अपंग) वर्ग: सुषिर वाद्य यंत्रों में सबसे छोटा | सामग्री: लोहा, धातु

🎻 भपंग वर्ग: सुषिर वाद्य (फूंक + तार का मिश्रित सिद्धांत) | सामग्री: पीतल, कपास, लकड़ी, धातु, चर्मपत्र, तूमड़ी

वाद्य यंत्रसामग्री / संरचनाक्षेत्र / कलाकार / विशेषता
करणा/कणपीतलराजस्थान का सबसे लंबा सुषिर वाद्य; एक लंबी पीतल की तुरही, जो दो भागों में बनी होती है; युद्धभूमि व राजदरबारों में उपयोग
भुंगल/रणभेरीकाँसायुद्ध में बजाए जाने के कारण "रणभेरी" कहा जाता है; भवाई जाति व भवाई नृत्य में प्रयुक्त
बांकियाकाँसादो भागों में निर्मित एक काँसे की तुरही, बिगुल का बड़ा रूप; शोभायात्राओं, धार्मिक व सामाजिक समारोहों में उपयोग
मशक/मशकबीनबकरी की खाल, मोमस्कॉटिश बैगपाइप जैसा; नली बाँस से बनी, पाँच अंगुल छिद्र
बरगूकाँसाकप के आकार की घंटी, संकरी मुखनाल सहित "एस" आकार की नली; मेवात — भैरूजी के भोपाओं द्वारा प्रयुक्त
नागफनीकाँसा/पीतल धातुकाँसे की सर्पिल नली, घंटी (बेल) साँप के फन (हुड) के आकार की होती है, जिसमें धातु की कंपन करने वाली पत्ती लगी होती है
पावरी/तारफा/तारपीलकड़ी, सूखी तूमड़ी, गाय का सींगपूंगी का बड़ा रूप; तले की ओर छह छिद्र, ऊपरी हिस्से में एक चाँच जैसी संरचना; कथौड़ी जाति द्वारा प्रयुक्त
बांसुरी (मुरली/मुरला/हरणाई/शंख/टोटो/बगू)लकड़ीलंबी लकड़ी की बेलनाकार नली, दूसरा छोर खुला जहाँ छह छिद्र; मुख्य कलाकार — पंडित हरिप्रसाद चौरसिया, पन्नालाल घोष
पेलीबाँसएक छोटी बाँसुरी; इसकी ध्वनि पर रतवई गीत को उच्च स्वर में गाया जाता है
नड़कगौर की लकड़ी से बनी नलीचार अंगुल छिद्र होते हैं; ऊपरी छोर से फूंक देकर बजाया जाता है; प्रसिद्ध कलाकार — करणा भील
हारमोनियमलकड़ी, धातु, पीतल, कपड़ाउत्पत्ति पश्चिम बंगाल में हुई; सुवाह्य लकड़ी की पेटी, 10 छिद्र जो वायु को धौंकनी से गुज़रने देते हैं; मुख्य कलाकार — महमूद धौलपुरी, उस्ताद अल्लादिया खां (जयपुर घराना)
पूंगी/बीनतूमड़ी, बाँस, मोमकालबेलिया/सपेरों द्वारा साँप पकड़ने हेतु; पूंगी में 2 नलियाँ, बीन में 1 नली

13अवनद्ध वाद्य (चर्म वाद्य) — ढोल, मांदल, डमरू, नगाड़ा

🎻 ढोल वर्ग: अवनद्ध वाद्य (चर्म वाद्य) | सामग्री: लकड़ी, चमड़ा, चर्मपत्र

🎻 मांदल वर्ग: अवनद्ध वाद्य (चर्म वाद्य) | सामग्री: पकी हुई चिकनी मिट्टी, चमड़ा

🎻 डेरू / ढाक वर्ग: अवनद्ध वाद्य (चर्म वाद्य) | सामग्री: लोहा, चमड़ा

वाद्य यंत्रसामग्री / संरचनाक्षेत्र / कलाकार / विशेषता
डफलीलकड़ी, चर्मपत्र, चमड़ा, काला लेपएकमुखी बेलनाकार ढोल, एक सिरे पर बकरी की खाल मढ़ी, एक छड़ी से बजाया जाता है; होली पर उपयोग; डफ — इसका बड़ा रूप
मृदंग / पखावजलकड़ी, पारदर्शी चर्मपत्रदाहिने सिरे पर काला लेप, बाएँ सिरे पर बारीक गेहूँ का आटा लेप; उपयोग — "ध्रुपद" और "धमार" संगीत शैली के साथ; कलाकार — पुरुषोत्तम दास (राजसमंद), भवानीशंकर कथक (चूरू)
खंजरीलकड़ी, पारदर्शी चर्मपत्रचंग जैसा, एक सिरे पर लकड़ी की किनारी, दूसरे पर पारदर्शी चर्मपत्र; बाएँ हाथ में पकड़ा जाता है, दाहिने हाथ की हथेली व अंगुलियों से बजाया जाता है; निर्गुण संत परंपरा, कालबेलिया द्वारा प्रयुक्त
डमरूपीतल, कपासचमड़े से ढका रेतघड़ी के आकार का खोखला पीतल खोल; मदारियों द्वारा उपयोग
नौबतभैंसे की खालअर्ध-अण्डाकार कुंडी की एक जोड़ी जिनके मुख भैंसे की खाल से ढके होते हैं; दो छड़ियों से एक साथ बजाया जाता है; उपयोग — प्राचीन युद्ध, महल-द्वार, आजकल मंदिरों में
नगाड़ा / बम / डमामघंटा धातु, कपासअवनद्ध वाद्यों में सबसे बड़ा; राणा/ढोली जाति द्वारा; नगारची — नगाड़ा बजाने वाला; कलाकार — रामकिशन सोलंकी (अजमेर); उपयोग — प्राचीन युद्ध, मंदिर, कच्छी घोड़ी नृत्य, आरती के समय
निशानलोहे की चादरलोहे की चादरों को जोड़कर बर्तन जैसा आकार, खुला हुआ भाग मोटे चमड़े से ढका; एक लकड़ी की छड़ी जिसके सिरों पर लोहे की जंजीरें व पीतल की छोटी-छोटी गोलाकार पत्तियाँ होती हैं; गरासियों का वाद्य यंत्र
पाबूजी-के-माटेपकी हुई चिकनी मिट्टी, चर्मपत्रजोड़ी मोटे पेट वाले बड़े आकार के मटके, छोटी गर्दन व चौड़े मुख; उपयोग — "थोरी" व "नायक" समुदाय द्वारा स्थानीय नायक व पाबूजी के जीवन का वर्णन करते समय
दमामा / टामकलोहाकढ़ाई के आकार का बहुत बड़ा नगाड़ा; मुख्यतः मेवात क्षेत्र में (भरतपुर में रसिया गीत के साथ)
भरनीमिट्टी का घड़ा, कांसे की प्लेटमिट्टी के मटके के संकरे मुख पर कांसे की प्लेट मढ़कर दो डंडियों से बजाया जाता है; पूर्वी राजस्थान में सर्पदंश उपचार अनुष्ठान, लोक देवताओं के स्थान पर प्रयुक्त

14घन वाद्य (ताल वाद्य) — खड़ताल, मंजीरा, घड़ियाल

🎻 खड़ताल / करताल वर्ग: घन वाद्य (ताल वाद्य) | सामग्री: कैर, शीशम, बबूल की लकड़ी

वाद्य यंत्रसामग्री / संरचनाक्षेत्र / विशेषता
मंजीरा / कांसियापीतल+तांबा+काँसे की मिश्र-धातुकरताल/खरताल व मंजीरा सामान्यतः एक ही प्रकार के; उपयोग — कामड़िया सम्प्रदाय द्वारा तेरहताली नृत्य के समय
झांझ / झांझरधातुमंजीरे का बड़ा रूप, किनारे फैले हुए; धातु की बनी दो मध्यम आकार की चकतियाँ, कपास की रस्सी से बंधी हुई; चिमटा नामक दो डंडियों से बजाया जाता है
घड़ियाल / घंटी / वीरघंटा / जालरपीतल, तांबा, काँसा या जस्ताबनावट घंटा/घड़ियाल जैसी; सुबह-शाम मंदिर में आरती के समय, विद्यालयों में भी प्रयुक्त
श्रीमंडल / टिकोरीबनावट झाड़ीनुमा पौधे के समानचांद की तरह के गोल-गोल छोटे-बड़े टंकोर लगे रहते हैं; दो पतली डंडियों की सहायता से बजाया जाता है
रमझोलघुँघरुओं की पट्टी, चमड़ाघुँघरुओं की नीचे से घुटनों तक बंधी हुई चमड़े की पट्टी; नर्तकियों द्वारा पैरों में बाँधकर नृत्य के समय, उत्सव-त्योहार व गैर नृत्य के समय
मटकीबाँस की खपच्चीपाँच-छह अंगुल लंबी बांस की खपच्ची से बना; मटकी को दाएँ हाथ से तबली पर एवं बायाँ हाथ खुले सिरे के कोर पर झंकृत किया जाता है
घुरालियोपकी हुई चिकनी मिट्टीएक ओर से छिलकर मुख पर धागा बांध दिया जाता है; दाँतों के बीच दबाकर धागे को ढील व तनाव देकर या छड़ी दबाकर बजाया जाता है; कालबेलिया व गरासिया जनजाति का प्रमुख वाद्य
शास्त्रीय संगीत
  • राग-ताल के शास्त्रीय नियमों पर आधारित
  • राजदरबारों में गुरु-शिष्य परंपरा से विकसित
  • उदाहरण: ध्रुपद, ख्याल, घराने (जयपुर, मेवाती, डागर)
लोक संगीत
  • शास्त्रीय नियमों से मुक्त, मौखिक परंपरा पर आधारित
  • गायक जातियों (लंगा, मांगणियार) द्वारा जनसाधारण के बीच विकसित
  • उदाहरण: मांड, लंगा गायन, मांगणियार गायन, तालबंदी

15प्रमुख कलाकार, पद्मश्री सम्मान एवं नवीनतम अपडेट (2024-26)

कलाकारवाद्य/गायन शैलीसम्मान / वर्ष
सकर खां मांगणियारकामायचापद्मश्री 2012; संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 1991
सिद्दीक खां मांगणियारखड़तालपद्मश्री
अनवर खां मांगणियारलोक संगीत (मांगणियार गायन)पद्मश्री 2020; संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 2017
अल्लाह जिलाई बाईमांड गायन (बीकानेर)पद्मश्री 1982
तागा राम भीलअलगोजा (जैसलमेर)पद्मश्री 2026
गफरुद्दीन मेवाती जोगीभपंग (अलवर/भरतपुर-मेवात)पद्मश्री 2026
बतूल बेगममांड गायन (जयपुर)नारी शक्ति पुरस्कार 2021 (प्रदत्त — 8 मार्च 2022)
पंडित जसराजशास्त्रीय गायन (मेवाती घराना)मेवाती घराने को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई
उस्ताद सुल्तान खानसुरिंदा/सारंगी (सीकर)"सारंगी का अलबेला सुल्तान" उपाधि

नवीनतम अपडेट (2025-26): वर्ष 2026 के पद्मश्री सम्मान में राजस्थान के लोक-वाद्य वादकों को विशेष प्रतिनिधित्व मिला — तागा राम भील (जैसलमेर, अलगोजा) व गफरुद्दीन मेवाती जोगी (मेवात क्षेत्र, भपंग) दोनों को कला श्रेणी में पद्मश्री प्रदान किया गया, जो राजस्थान की कम-चर्चित लोक-वाद्य परंपराओं को मिली महत्वपूर्ण राष्ट्रीय पहचान है। 25 जून 2020 को भारतीय डाक विभाग ने "घुमंतू मनोरंजनकर्ताओं के वाद्य यंत्र" (Musical Instruments of Wandering Minstrels) शीर्षक से 6 संयुक्त डाक टिकटों की शृंखला जारी की थी, जिसमें कामायचा, रावणहत्था, सुरिंदा, अलगोजा, बुर्राकथा व इकतारा शामिल हैं — यह राजस्थान व निकटवर्ती क्षेत्रों के लोक-वाद्यों को मिली एक बड़ी राष्ट्रीय पहचान है। ध्यान रहे — "केसरिया बालम/मांड गायन शैली" को लोकप्रिय रूप से "राजस्थान का राज्य गीत" कहा जाता है, परंतु इसकी कोई आधिकारिक सरकारी अधिसूचना उपलब्ध नहीं है — परीक्षा में यह जानकारी सावधानीपूर्वक "परंपरागत मान्यता" के रूप में प्रस्तुत करें।

🎯 संगीत — शास्त्रीय एवं लोक संगीत तथा वाद्य यंत्र — उत्तर लेखन कोण (RAS Mains) 5-अंक: 60-70 शब्द | 10-अंक: लगभग 120 शब्द

📌 महत्वपूर्ण तथ्य

1. ध्रुपद गायन शैली के जनक मानसिंह तोमर (ग्वालियर) माने जाते हैं; दरबारी संगीतज्ञ बैजू बावरा के सहयोग से इसका प्रारंभ हुआ; राज्य की एकमात्र ध्रुपद गायिका मधुभट्ट तैलंग हैं। 2. ध्रुपद की चार वाणियाँ हैं — गोहर वाणी (ग्वालियर, तानसेन), डागर वाणी (जयपुर, बृजनंद डागर), खण्डार वाणी (उणियारा-टोंक, समोखनसिंह) व नौहर वाणी (जयपुर, श्रीचंद नौहर)। 3. मेवाती घराने के प्रवर्तक घग्घे नज़ीर खां थे; पंडित जसराज ने इस घराने को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। 4. किराना घराने की स्थापना बंदे अली खां बीनकार ने की; यह स्वर-शुद्धता के लिए प्रसिद्ध है, केंद्र उत्तर प्रदेश में स्थित है। 5. मांड जैसलमेर का प्राचीन नाम था, इसीलिए मांड गायन शैली का विकास वहीं हुआ; केसरिया बालम इस शैली का सबसे प्रसिद्ध गीत है (लोकप्रिय रूप से "राजस्थान का राज्य गीत" कहा जाता है, आधिकारिक अधिसूचना उपलब्ध नहीं)। 6. लंगा गायन शैली जैसलमेर-बाड़मेर के लंगा समुदाय द्वारा विकसित हुई; इसका प्रमुख गीत "निम्बुड़ा" है। 7. मांगणियार गायन शैली में 6 राग व 36 रागिनियों का प्रयोग होता है; सकर खां ("कामायचा के जादूगर") व सिद्दीक खां ("खड़ताल के जादूगर") इसके प्रमुख कलाकार रहे। 8. तालबंदी गायन शैली का विकास औरंगजेब द्वारा संगीत-प्रतिबंध के काल में मथुरा से आए साधु-संन्यासियों द्वारा हुआ। 9. हवेली संगीत नाथद्वारा-जयपुर-किशनगढ़-कोटा में गाया जाता है, परंतु इसे संगीत घराने का दर्जा प्राप्त नहीं है। 10. अलगोजा राजस्थान का "राज्य वाद्य" (State Instrument) है — दो बाँस की बांसुरियों की जोड़ी होती है, जिसे एक साथ फूंका जाता है। 11. रावणहत्था राजस्थान का प्राचीनतम तत वाद्य है, जो पाबूजी की फड़ वाचन में प्रयुक्त होता है। 12. कामायचा मांगणियार समुदाय (जैसलमेर-बाड़मेर) का प्रमुख वाद्य है, जिसमें 16 या 27 तार होते हैं। 13. 25 जून 2020 को भारतीय डाक विभाग ने कामायचा, रावणहत्था, सुरिंदा, अलगोजा, बुर्राकथा व इकतारा पर संयुक्त डाक टिकट शृंखला जारी की। 14. भपंग को "बोलने वाला डमरू" कहा जाता है; यह मेवात क्षेत्र में मेवाती जोगी समुदाय का प्रमुख वाद्य है। 15. मोरचंग को "ज्यू हार्प" भी कहते हैं — यह होठों के बीच रखकर बजाया जाने वाला सबसे छोटा सुषिर वाद्य है। 16. चार वाद्य वर्ग हैं — तत (तार), सुषिर (फूंक), अवनद्ध (चर्म) व घन (ताल) — यह वर्गीकरण ध्वनि-उत्पत्ति की विधि पर आधारित है। 17. नगाड़ा/बम/डमाम अवनद्ध वाद्यों में सबसे बड़ा है; राणा/ढोली जाति द्वारा बजाया जाता है। 18. खड़ताल साधु-संन्यासियों का घन वाद्य है, जो इकतारा के साथ बजाया जाता है — सिद्दीक खां मांगणियार को "खड़ताल के जादूगर" कहा जाता था। 19. तागा राम भील (जैसलमेर, अलगोजा) व गफरुद्दीन मेवाती जोगी (मेवात, भपंग) दोनों को 2026 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। 20. फड़ गायन में देवनारायणजी की फड़ जंतर वाद्य के साथ तथा पाबूजी की फड़ रावणहत्था वाद्य के साथ बांची जाती है (हस्तशिल्प पक्ष अध्याय 3 में विस्तृत है)।

16अध्याय सारांश

राजस्थान का संगीत-संसार दो समांतर धाराओं में बहता है — एक ओर राजदरबारों की शास्त्रीय परंपरा, जिसने ध्रुपद गायन, चार वाणियों और जयपुर-मेवाती-डागर-पटियाला जैसे प्रतिष्ठित घरानों को जन्म दिया; दूसरी ओर आम जनजीवन की लोक-धुनें, जो मांड, लंगा, मांगणियार, तालबंदी व हवेली संगीत जैसी शैलियों में गूँजती रहीं। इन दोनों धाराओं के बीच सेतु का काम किया गायक जातियों ने — लंगा व मांगणियार समुदाय, जिन्होंने पीढ़ियों तक संगीत को अपनी आजीविका व पहचान बनाया, और सकर खां, सिद्दीक खां, अनवर खां जैसे कलाकारों के माध्यम से इसे राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँचाया।

वाद्य यंत्रों की दुनिया भी उतनी ही समृद्ध है — रावणहत्था और कामायचा जैसे तत वाद्य, अलगोजा और शहनाई जैसे सुषिर वाद्य, ढोल और मांदल जैसे अवनद्ध वाद्य, तथा खड़ताल और मंजीरा जैसे घन वाद्य — प्रत्येक का अपना समुदाय, अपना अवसर और अपनी विशिष्ट धुन है। लोकगीतों का विशाल भंडार — जन्म से मृत्यु तक, हर ऋतु और हर त्योहार के लिए एक अलग गीत — यह सिद्ध करता है कि राजस्थान में संगीत जीवन के हर पड़ाव का साथी रहा है, महज मनोरंजन का साधन नहीं।

परीक्षा की दृष्टि से यह अध्याय अत्यंत तथ्य-सघन है — घराने, वाणियाँ, गायन शैलियाँ, वाद्य यंत्र व उनके कलाकार सभी प्रत्यक्ष प्रश्नों के लिए महत्वपूर्ण हैं, जबकि लोकगीतों का वर्गीकरण व सामाजिक महत्त्व विश्लेषणात्मक प्रश्नों के लिए उपयोगी है। अगले अध्याय में हम राजस्थानी भाषा, बोलियों एवं साहित्य — डिंगल-पिंगल से लेकर चारण साहित्य तक — का अध्ययन करेंगे, जो इसी सांस्कृतिक अभिव्यक्ति की अगली महत्वपूर्ण कड़ी है।

जिला/क्षेत्रगायन शैली / वाद्य यंत्रसम्बद्ध समुदाय
जैसलमेर-बाड़मेरमांड, लंगा व मांगणियार गायन; कामायचा, अलगोजा, खड़ताललंगा, मांगणियार समुदाय
बीकानेरमांड गायन (अल्लाह जिलाई बाई)सामान्य
जोधपुररंगीला घराना, गवरी देवी (मांड)सामान्य
जयपुरजयपुर सेनिया घराना, ख्याल घराना, हारमोनियम परंपरासामान्य
टोंक-उणियाराखण्डार वाणी (ध्रुपद)सामान्य
मेवात (अलवर-भरतपुर)तालबंदी, भपंग, करणामेवाती जोगी समुदाय
नाथद्वारा-किशनगढ़-कोटाहवेली संगीतवैष्णव सम्प्रदाय
सिरोही (गरासिया)चिकारा, घुरालियो, निशानगरासिया जनजाति
उदयपुर-राजसमंदहमसीढो लोकगीत, सुरिंदा (रामनारायण)भील समुदाय
सीकरसुरिंदा/सारंगी (उस्ताद सुल्तान खान)सामान्य
📢 विज्ञापन
🔥 सबसे लोकप्रिय
📘

RAS Foundation Course 2026 🕉️

Multiple ValidityTests
₹4,999₹25,000
Join Now →
← अध्याय 4: लोक नृत्य एवं लोक नाट्य अध्याय 6: राजस्थानी भाषा, बोलियाँ एवं साहित्य →