कल्पना करें — मुगल बादशाह अकबर के दरबार में एक राजस्थानी कवि खड़ा है, और वह ऐसी भाषा में कविता पढ़ रहा है जो हिन्दी नहीं, संस्कृत नहीं, फिर भी दरबार में मौजूद हर राजपूत योद्धा की रगों में उतर जाती है। यह भाषा थी डिंगल — चारण कवियों की वह वीर-भाषा, जिसमें तलवार की चमक और घोड़े की टापों की गूँज दोनों एक साथ सुनाई देती थीं। "चार बांस चौबीस गज अंगुल अष्ट प्रमाण, ऊपर सुल्तान है मत चुके चौहान" — जब चंदबरदाई ने पृथ्वीराज रासो में यह पंक्ति लिखी, तो उन्होंने केवल एक युद्ध का वर्णन नहीं किया, बल्कि एक भाषा को अमर कर दिया। सदियों बाद, उसी धरती पर विजयदान देथा नाम के एक लेखक ने अपने गाँव बोरुंदा में बैठकर लोक-कथाओं का ऐसा खजाना इकट्ठा किया कि उनकी एक कहानी "दुविधा" पर बॉलीवुड में दो-दो फिल्में बन गईं। राजस्थानी भाषा और साहित्य की यह यात्रा — रासो-ख्यात-वचनिका के प्राचीन रूपों से लेकर आधुनिक कहानी-लेखन तक — दिखाती है कि यह भाषा केवल बोलचाल का माध्यम नहीं, बल्कि सदियों के इतिहास, वीरता, भक्ति और मानवीय संवेदना को सहेजने वाला खजाना है। आज भी यह भाषा संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल होने की प्रतीक्षा कर रही है — यह अध्याय इसी भाषा, इसकी बोलियों और इसके साहित्य की समग्र कहानी है।
"पाँच कोस पर पानी बदले, सात कोस पर बाणी" — राजस्थानी लोकोक्ति — प्रदेश की भाषायी विविधता की परिचायक
राजस्थान की मातृभाषा राजस्थानी है, जबकि राजभाषा (शासकीय भाषा) हिन्दी है। 14 सितंबर को "हिन्दी दिवस" तथा 21 फरवरी को "राजस्थानी भाषा दिवस" के रूप में मनाया जाता है। राजस्थानी भाषा की व्यापक बोली-विविधता को उपरोक्त लोकोक्ति ("पाँच कोस पर पानी बदले, सात कोस पर बाणी") बहुत सुंदर ढंग से व्यक्त करती है — अर्थात थोड़ी दूरी पर ही जल का स्वाद और भाषा की बोली दोनों बदल जाते हैं।
अधिकांश भाषा-वैज्ञानिकों के अनुसार राजस्थानी भाषा की उत्पत्ति निम्नलिखित क्रम में हुई: वैदिक संस्कृत → लौकिक संस्कृत → लौकिक संस्कृत के जटिल होने पर पालि → पालि के जटिल होने पर प्राकृत → प्राकृत के जटिल होने पर अपभ्रंश → अपभ्रंश से राजस्थानी भाषा का विकास। राजस्थानी भाषा के विकास से मुख्यतः तीन अपभ्रंश भाषाएँ जुड़ी मानी जाती हैं — शौरसेनी अपभ्रंश, नागर अपभ्रंश तथा मरुगुर्जरी (गुर्जरी) अपभ्रंश — फिर भी अधिकांश विद्वानों के अनुसार राजस्थानी भाषा का मुख्य विकास मरुगुर्जरी अपभ्रंश से हुआ।
| विद्वान | मत — किस अपभ्रंश से राजस्थानी भाषा की उत्पत्ति हुई |
|---|---|
| डॉ. एल.पी. टैस्सीटोरी | शौरसेनी अपभ्रंश |
| महावीर प्रसाद शर्मा | शौरसेनी अपभ्रंश |
| डॉ. जॉर्ज ए. ग्रियर्सन | नागर अपभ्रंश |
| पुरुषोत्तम मेनारिया | नागर अपभ्रंश |
| डॉ. मोतीलाल मेनारिया | मरुगुर्जरी अपभ्रंश |
| के.एम. मुंशी | मरुगुर्जरी अपभ्रंश |
| डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी | सौराष्ट्री अपभ्रंश |
मरुगुर्जरी अपभ्रंश से विकसित होकर राजस्थानी भाषा तीन प्रमुख संरचनाओं में बँट जाती है — (1) शुद्ध राजस्थानी भाषा संरचना, जिसमें डिंगल प्रमुख है, और यह मारवाड़ी बोली का साहित्यिक रूप है (अधिकांश जैन साहित्य व चारण साहित्य इसी में लिखा गया, जैसे रा.सोरठा, वेलि कृष्ण रुक्मणी री); (2) राजस्थानी और ब्रज भाषा का मिश्रण, जिसमें पिंगल शैली प्रमुख है, मुख्यतः भाट कवियों द्वारा रचित (राजरूपक, अचलदास खींची री वचनिका, राव रासो, विजयपाल रासो जैसी रचनाएँ); तथा (3) उपबोलियाँ — शेखावाटी, गोडवाड़ी, मेवाड़ी (मोतीलाल मेनारिया के अनुसार), वागड़ी, नागौरी, ढटकी, ढाटी, थली, देवड़ावाटी, बीकानेरी, सिरोही, नागौरी एवं खैराड़ी।
| ग्रंथ/विद्वान | काल | महत्व |
|---|---|---|
| कुवलयमाला (उद्योतन सूरी) | 8वीं शताब्दी (वि.सं. 835 / 913 ई.) | इसमें हूणों के आक्रमणों के प्रमाण मिलते हैं; ग्रंथ में 18 देशी भाषाओं का उल्लेख है, जिनमें एक मरु भाषा (मारवाड़ी) भी है |
| आइन-ए-अकबरी (अबुल फज़ल) | मुगलकाल | इसमें मारवाड़ी भाषा का उल्लेख मिलता है |
| पिंगल शिरोमणि (कवि कुशल लाभ) | मध्यकाल | इसमें भी मारवाड़ी भाषा का संदर्भ मिलता है |
| जॉर्ज थॉमस | 1800 ई. | "राजपूताना" शब्द का प्रथम प्रयोग किया |
| कर्नल जेम्स टॉड — "दी एनाल्स एण्ड एंटीक्विटीज़ ऑफ राजस्थान" | 1829 ई. | "राजस्थान" शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग; राजस्थान, रायथान एवं रजवाड़ा जैसे शब्दों का भी उल्लेख किया |
| जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन — "लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया" | 1908 ई. | "राजस्थानी" शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया |
राजस्थानी भाषा की पारंपरिक लिपि "महाजनी" अथवा "मुंडिया" लिपि है, जिसका उपयोग मुख्यतः व्यापारी वर्ग द्वारा लेन-देन के हिसाब-किताब हेतु किया जाता था। मुंडिया लिपि के आविष्कारक टोडरमल माने जाते हैं। वर्तमान में राजस्थानी भाषा को लिखने के लिए मुख्यतः देवनागरी लिपि का ही प्रयोग किया जाता है।
साहित्यिक दृष्टि से राजस्थानी भाषा को दो प्रमुख शैलियों में वर्गीकृत किया जाता है — डिंगल एवं पिंगल। यह वर्गीकरण मुख्यतः रचनाकारों के वर्ग व भौगोलिक क्षेत्र के आधार पर किया गया है, और यह राजस्थानी साहित्य के अध्ययन का सबसे बुनियादी ढाँचा है।
राजस्थानी बोलियों को समझने व वर्गीकृत करने के लिए विभिन्न भाषा-वैज्ञानिकों ने अपनी-अपनी योजनाएँ प्रस्तुत की हैं। परीक्षा में इन तीन प्रमुख वर्गीकरण-योजनाओं के नाम व मुख्य विशेषताएँ पूछी जाती हैं।
| विद्वान / वर्गीकरण योजना | वर्ष | वर्गीकरण का विवरण |
|---|---|---|
| एम. केलॉग — "ए ग्रामर ऑफ द हिन्दी लैंग्वेज" | 1876 ई. | हिन्दी क्षेत्र की बोलियों को छह उपभाषा-समूहों में विभाजित किया, जिनमें मारवाड़ी, मेवाड़ी, जयपुरी व हाड़ौती जैसी राजस्थानी बोलियाँ शामिल हैं; 1875 ई. में ही केलॉग ने "हाड़ौती" शब्द का भाषा के अर्थ में प्रथम प्रयोग किया था |
| डॉ. एल.पी. टैस्सीटोरी | बीसवीं सदी प्रारंभ | राजस्थान व मालवा की बोलियों को दो भागों में विभाजित किया — पश्चिमी राजस्थानी (मारवाड़ी) तथा पूर्वी राजस्थानी (ढूंढाड़ी) |
| डॉ. जॉर्ज ए. ग्रियर्सन — "लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया" | 1908 ई. | राजस्थानी बोलियों का सबसे विस्तृत वर्गीकरण प्रस्तुत किया — पाँच समूह: (1) पश्चिमी राजस्थानी — मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढटकी, थली, बीकानेरी, बागड़ी, शेखावाटी, खैराड़ी, गोडवाड़ी, देवड़ावाटी; (2) उत्तरपूर्वी राजस्थानी — अहीरवाटी, मेवाती; (3) मध्यपूर्वी राजस्थानी — ढूंढाड़ी, तोरावाटी, खड़ी जयपुरी, काठैड़ी, राजावाटी, अजमेरी, किशनगढ़ी, चौरासी, नागरचोल, हाड़ौती (रियाड़ी सहित); (4) दक्षिणपूर्वी राजस्थानी — मालवी (रांगड़ी, सांडवाड़ी); (5) दक्षिणी राजस्थानी — निमाड़ी |
⏰ काल/निर्माता: उत्पत्ति 8वीं सदी में शौरसेनी प्राकृत के गुर्जरी अपभ्रंश से; प्राचीन नाम — मरुभाषा
⭐ विशेषता: क्षेत्रफल की दृष्टि से सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा; राजस्थानी भाषा का मानक रूप माना जाता है; प्राचीनतम प्रमाण कुवलयमाला ग्रंथ से मिलता है; दादूपंथ का अधिकांश साहित्य इसी बोली में रचित; शिल्पगत विशेषता — सोरठा, छंद, मांड राग; उपबोलियाँ — थली, देवड़ावाटी, गोडवाड़ी, ढटकी, ढाटी (बाड़मेर), खैराड़ी, शेखावाटी
⏰ काल/निर्माता: मारवाड़ी के बाद राजस्थान की दूसरी महत्त्वपूर्ण बोली
⭐ विशेषता: "ए" और "ओ" की ध्वनि का विशेष प्रयोग; दो प्रकार — पर्वती मेवाड़ी (पहाड़ी क्षेत्र) व मैदानी मेवाड़ी (मैदानी क्षेत्र); महाराणा कुम्भा के नाटक एवं कीर्तिस्तंभ प्रशस्ति, जगत अंबिका मंदिर का उत्कीर्ण शिलालेख इसी भाषा में है; बावजी चतुरसिंह ने मेवाड़ी में वेगसूत्र, भगवद्गीता व सांख्यकारिका लिखे; धावड़ी उदयपुर की एक बोली है; डॉ. मोतीलाल मेनारिया ने मेवाड़ी को मारवाड़ी की ही एक उपबोली माना है
⏰ काल/निर्माता: प्राचीनतम प्रमाण — 18वीं सदी के ग्रंथ "आठ देस गूजरी" में
⭐ विशेषता: ब्रजभाषा व गुजराती भाषा का प्रभाव; "छे" शब्द का विशेष प्रयोग; इसे "कांइ-कुई" भाषा भी कहा जाता है; उपनाम — झाड़शाही बोली/जयपुरी बोली; उपबोलियाँ — तोरावाटी, राजावाटी, नागरचोल, चौरासी, हाड़ौती, काठेड़ी, उदयपुरवाटी, अजमेरी, किशनगढ़ी आदि
⏰ काल/निर्माता: ढूंढाड़ी की उपबोली; 1875 ई. में एम. केलॉग ने "हिन्दी ग्रामर" में "हाड़ौती" शब्द का भाषा के अर्थ में प्रथम प्रयोग किया
⭐ विशेषता: "छै" शब्द का विशेष प्रयोग; कवि सूर्यमल्ल मिश्रण के काव्य ग्रंथ (वंशभास्कर, वीर सतसई) इसी बोली में रचित; खैराड़ी — ढूंढाड़ी, मेवाड़ी व हाड़ौती का मिश्रण, विशेष रूप से मालपुरा क्षेत्र में प्रचलित (शाहपुरा, बूंदी, दक्षिणी टोंक)
इन प्रमुख बोलियों के अतिरिक्त राजस्थान में कई क्षेत्रीय उपबोलियाँ प्रचलित हैं, जिन्हें परीक्षा में क्षेत्र-पहचान के प्रश्नों में पूछा जाता है — नीचे दी गई तालिका इन्हें व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करती है।
| बोली | क्षेत्र | विशेषता |
|---|---|---|
| अहीरवाटी (राठी) | मुंडावर, बहरोड़, कोटपुतली (बांगड़ व मेवाती का संगम क्षेत्र) | "राठ" नाम अहीर जाति के निवास क्षेत्र (राठ/हीरवाल) से पड़ा; मीणाओं की प्रिय बोली |
| गोडवाड़ी | जालौर, पाली, सिरोही | लूणी नदी के खारे पानी का अपवाह क्षेत्र; प्रमुख केंद्र — बाली (पाली); उपबोलियाँ — सिरोही, बालवी, खणी, महाहड़ी; नरपति नाल्ह कृत "बीसलदेव रासो" इसी बोली की रचना है |
| ढाटी (धाती) | मुख्यतः बाड़मेर क्षेत्र | मारवाड़ी की उपबोली |
| तोरावाटी | मुख्यतः जयपुर व सीकर की बोली | तोरावाटी प्रदेश — कांतली नदी का अपवाह क्षेत्र |
| राजावाटी | जयपुर का पूर्वी भाग, सवाई माधोपुर | ढूंढाड़ी की उपबोली |
| नागरचोल | सवाई माधोपुर के पश्चिमी तथा टोंक के दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र | ढूंढाड़ी की उपबोली |
| जागरोती | करौली क्षेत्र | ढूंढाड़ी की उपबोली |
| अजमेरी | अजमेर जिले के ग्रामीण क्षेत्र | ढूंढाड़ी की उपबोली |
| किशनगढ़ी | किशनगढ़ के सीमावर्ती क्षेत्र | ढूंढाड़ी की उपबोली |
| काठेड़ी | मुख्यतः सवाई माधोपुर, दौसा, दक्षिणी जयपुर | ढूंढाड़ी की उपबोली |
| पचवारी | लालसोट से सवाई माधोपुर के मध्यवर्ती क्षेत्र | ढूंढाड़ी की उपबोली |
| धावड़ी | उदयपुर | मेवाड़ी की उपबोली |
| देवड़ावाटी | सिरोही | सिरोही के देवड़ा शासकों की बोली |
| सांडवाड़ी | झालावाड़ | मालवी की उपबोली |
| चौरासी | जयपुर जिले के दक्षिण-पश्चिमी भाग व टोंक के पश्चिमी भाग (दूदू क्षेत्र) | ढूंढाड़ी की उपबोली |
| थली बोली | बीकानेर के आसपास के क्षेत्र | मारवाड़ी की उपबोली |
परीक्षा में अक्सर किसी उपबोली को गलत मूल-बोली से जोड़कर भ्रामक विकल्प बनाए जाते हैं — जैसे "काठेड़ी" को मारवाड़ी की उपबोली बताना (जबकि यह वास्तव में ढूंढाड़ी की उपबोली है)। इस अध्याय की तालिकाओं को ध्यान से पढ़ें और प्रत्येक उपबोली को उसके सही मूल समूह (मारवाड़ी/मेवाड़ी/ढूंढाड़ी/मालवी) से जोड़कर याद करें — इससे इस प्रकार के भ्रामक प्रश्नों में गलती की संभावना कम हो जाती है।
राजस्थानी साहित्य का इतिहास 11वीं शताब्दी से प्रारंभ होता है। इसे चार प्रमुख कालों में विभाजित किया जाता है, जो राजस्थान के सामाजिक-राजनीतिक इतिहास के साथ स्वाभाविक रूप से जुड़े हुए हैं।
| काल | अवधि | विशेषता |
|---|---|---|
| प्राचीन काल (वीरगाथा काल) | 1050 से 1450 ई. | वीर रस प्रधान रचनाएँ — रासो साहित्य का उद्भव व विकास; युद्ध, वीरता व राजाओं की कीर्ति का वर्णन प्रमुख विषय |
| पूर्व मध्यकाल (भक्ति काल) | 1450 से 1650 ई. | भक्ति भावना प्रधान रचनाएँ — संत साहित्य, परची व साखी जैसी विधाओं का विकास |
| उत्तर मध्यकाल (श्रृंगार, रीति एवं नीति परक काल) | 1650 से 1850 ई. | श्रृंगार रस व नीति-संबंधी रचनाएँ प्रमुख; दरबारी संरक्षण में साहित्य का विस्तार |
| आधुनिक काल | 1850 ई. से अद्यतन | विविध विषयों व विधाओं (कहानी, उपन्यास, नाटक) से युक्त साहित्य; विजयदान देथा, कन्हैयालाल सेठिया जैसे आधुनिक साहित्यकारों का उदय |
राजस्थानी साहित्य में कई विशिष्ट साहित्यिक विधाएँ (रूप) विकसित हुई हैं, जिनकी अपनी परिभाषा, शैली व उदाहरण-ग्रंथ हैं। ये विधाएँ परीक्षा में सर्वाधिक बार पूछी जाने वाली अवधारणाओं में शामिल हैं।
| विधा | अर्थ / परिभाषा | उदाहरण |
|---|---|---|
| रासो (Raso) | ऐसा साहित्य जिसमें किसी राजा की कीर्ति, विजय व युद्धों-संग्रामों में वीरता का विस्तृत वर्णन हो | पृथ्वीराज रासो (चंदबरदाई), बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह), हम्मीर रासो (जोधराज), खुमाण रासो (दलपत विजय), सगत रासो (गिरधर आसिया) |
| ख्यात (Khyat) | संस्कृत "ख्याति" से लिया गया शब्द, अर्थ — लोकप्रियता या प्रसिद्धि; प्रारंभ मुगल बादशाह अकबर (1556-1605 ई.) के शासनकाल से माना जाता है; दो प्रकार — वात संग्रह (ऐतिहासिक घटनाओं का स्वतंत्र वर्णन) व सलंग्न ख्यात (राजाओं का क्रमानुसार इतिहास वर्णन) | बांकीदास री ख्यात, मुहणौत नैणसी री ख्यात, बीकानेर रा राठौड़ां री ख्यात (दयालदास) |
| विगत (Vigat) | शासक, परिवार, राज्यक्षेत्र के प्रमुख व्यक्ति और सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों की जानकारी देने वाला साहित्य | मारवाड़ रा परगना री विगत (मुहणौत नैणसी) |
| वचनिका (Vachnika) | मिश्रित राजस्थानी में रचित साहित्य, जिसमें महान शासक या राजवंश की उपलब्धियाँ वर्णित होती हैं; शैली — गद्य-पद्य मिश्रित काव्य | अचलदास खींची री वचनिका, राठौड़ रतनसिंह महेसदासोत री वचनिका |
| मरस्या (Marsya) | किसी राजा या वीर पुरुष की मृत्यु के बाद शोक व्यक्त करने हेतु रचना; इसमें प्रेरणादायक कार्य व चारित्रिक गुणों का वर्णन होता है | राणे जगपत रा मरस्या (मेवाड़ महाराणा जगतसिंह पर आधारित) |
| परची (Parchi) | राजस्थानी पद्यबद्ध साहित्य, जिसमें संत-महात्माओं का जीवन परिचय मिलता है | मीराबाई री परची, कबीर री परची, संत दादू री परची |
| सिलोका (Siloka) | संस्कृत शब्द "श्लोक" का बिगड़ा हुआ रूप; साधारण पढ़े-लिखे लोगों द्वारा लिखा गया, जो जनसाधारण की भावनाओं को आमजन तक पहुँचाता है | राठौड़ कुशलसिंह रो सिलोको, राव अमरसिंह रा सिलोका |
| रूपक (Roopak) | किसी वंश या व्यक्ति विशेष की उपलब्धियों या घटना का वर्णन | सूरजप्रकाश (करणीदान), राजप्रकाश (किशोरदास), महायशप्रकाश (आसिया मानसिंह) |
| साखी (Sakhi) | "साक्षी" शब्द से बना, अर्थ — "आँखों देखी बात का वर्णन करना"; संत कवियों ने अपने द्वारा अनुभव किए गए ज्ञान का वर्णन किया; छंद — सोरठा | कबीर की साखियाँ |
| दवावैत (Davavait) | ऐसे ग्रंथ जिनमें उर्दू और फारसी शब्दावलियों का प्रयोग होता है; शैली — कलात्मक गद्य + तुकांत वर्णन; विषय — नायक का गुणगान, राज्य, वैभव, युद्ध, आखेट | राजा जयसिंह री दवावैत, अखैराज देवड़ा री दवावैत |
| वात (Vaat) | कथावाचक निरंतर कहानी सुनाता है और श्रोता उसका समर्थन या "हुंकारा" देता है | वीरमदेव सोनगरा री वात (पद्मनाभ), पाबूजी री वात, ढोलामारू री वात (कुशालचंद), कान्हड़दे री वात |
| बही (Bahi) | एक विशेष प्रकार की बनावट का रजिस्टर, जिसमें इतिहास सम्बन्धी उपयोगी सामग्री दर्ज होती है; राव व बड़वे अपनी बही में आश्रयदाताओं के नाम व उपलब्धियों का ब्यौरा लिखते थे — यह कार्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहा | चित्तौड़-उदयपुर पट्टानामा री बही, पाबूदान री बही, जोधपुर राणी मंगा री बही |
| प्रशस्ति (Prashasti) | राजस्थान में मंदिरों, दुर्ग-द्वारों, कीर्तिस्तंभों आदि पर राजाओं की उपलब्धियों का उत्कीर्ण वृत्तांत; इनमें राजाओं का वंशक्रम, युद्ध अभियान, पड़ोसी राज्यों से संबंध, मंदिर-जलाशय-बाग-बगीचे-राजप्रासाद निर्माण का वर्णन मिलता है — यद्यपि अतिश्योक्तिपूर्ण वर्णन मिलता है, फिर भी इतिहास-निर्माण में ये उपयोगी हैं | कीर्तिस्तंभ प्रशस्ति (चित्तौड़गढ़) |
| झूलणा (Jhoolna) | राजस्थानी काव्य का मात्रिक छंद; इसमें चौबीस अक्षर के वर्णिक छंद के अंत में यगण (छंदशास्त्र द्वारा प्रतिपादित आठ गणों में से एक) होता है | अमरसिंह राठौड़ रा झूलणा, राजा गजसिंह रा झूलणा |
| झमाल (Jhamal) | राजस्थानी काव्य का एक अन्य मात्रिक छंद; इसमें पहले पूरा दोहा, फिर पाँचवें चरण में दोहे के अंतिम चरण की पुनरावृत्ति होती है; छठे चरण में दस मात्राएँ होती हैं | राव इन्द्रसिंह री झमाल |
| कक्का (Kakka) | वे रचनाएँ, जिनमें वर्णमाला के बावन वर्णों में से प्रत्येक वर्ण से रचना का प्रारंभ किया जाता है | — |
राजस्थानी साहित्य के इतिहास में सैंकड़ों ग्रंथ रचे गए, जिनमें से कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण व बार-बार परीक्षा में पूछे जाने वाले ग्रंथों को नीचे तालिका में प्रस्तुत किया गया है — ग्रंथ, रचनाकार तथा ऐतिहासिक महत्व तीनों एक साथ याद रखना आवश्यक है।
| ग्रंथ | रचनाकार / काल | विषय / ऐतिहासिक महत्व |
|---|---|---|
| भरतेश्वर बाहुबली घोर | वज्रसेन सूरि, 1168 ई. | राजस्थानी भाषा का प्राचीनतम उपलब्ध ग्रंथ |
| भरतेश्वर बाहुबली रास | शालिभद्र सूरी | संवत उल्लेख के साथ प्रथम राजस्थानी रचना; 15वीं सदी की वास्तुकला, नगर, द्वार, मंदिर, बाज़ार, राजप्रासाद का वर्णन |
| राजविनोद | सदाशिव भट्ट, 16वीं सदी | बीकानेर नरेश कल्याणमल के शासनकाल की जानकारी |
| हम्मीर महाकाव्य | नयनचन्द्र सूरी | रणथम्भौर के चौहान वंश का इतिहास, अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण (1299-1301 ई.), हम्मीरदेव चौहान की वीरता का वर्णन |
| राजरत्नाकर | सदाशिव भट्ट | महाराणा राजसिंह के समय का सामाजिक चित्रण एवं दरबारी जीवन का वर्णन |
| हम्मीर रासो | शारंगधर (16वीं सदी) | रणथम्भौर के राजा हम्मीर व मुस्लिम शासक अलाउद्दीन खिलजी के बीच हुए युद्ध का विवरण |
| राजविलास | मान कवि | उदयपुर नगर-निर्माण व राजसमंद झील के निर्माण की जानकारी |
| हम्मीरायण | भाण्डऊ व्यास | बीकानेर के राठौड़ों का इतिहास, बीकानेर दुर्ग का निर्माण, राज्य-विस्तार तथा दान-पुण्य संस्थाओं की जानकारी |
| पृथ्वीराज रासो | चंदबरदाई (पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि); दत्तक पुत्र जल्हण ने पूरा किया | पिंगल भाषा का यह ग्रंथ हिन्दी भाषा का प्रथम उपलब्ध महाकाव्य है; प्रसिद्ध विरोक्ति — "चार बांस चौबीस गज अंगुल अष्ट प्रमाण, ऊपर सुल्तान है मत चुके चौहान" |
| बीसलदेव रासो | नरपति नाल्ह, 12वीं सदी | सांभर के राजा बीसलदेव तथा मालवा के राजा भोज की पुत्री राजमती की प्रेमकथा; इसे टैस्सीटोरी ने "डिंगल का हैरोस" कहा; गोडवाड़ी बोली की मुख्य रचना; राजस्थान की सर्वश्रेष्ठ वचनिका मानी जाती है |
| मुहणौत नैणसी री ख्यात | मुहणौत नैणसी, जोधपुर नरेश जसवंतसिंह के दरबारी | राजपूतों की 36 शाखाओं का वर्णन; मुंशी देवीप्रसाद ने नैणसी को "राजपूताने का अबुल फज़ल" कहा |
| वंशभास्कर | सूर्यमल्ल मिश्रण (हाड़ौती बोली में रचित) | बूंदी राज्य का विस्तृत इतिहास; अन्य प्रमुख ग्रंथ — वीर सतसई (डिंगल भाषा) |
| पद्मावत | मलिक मोहम्मद जायसी, 1540 ई. | रत्नसिंह एवं अलाउद्दीन खिलजी के मध्य युद्ध (1301 ई.) का वर्णन; इसे राजस्थानी महाकाव्य भी कहा जाता है |
| खुमाण रासो | दलपत विजय | वि.सं. 1767-1790 तक मेवाड़ के गुहिल राजाओं की वंशावली, बप्पा रावल से राजसिंह तक |
| सौभाग्य सोम महाकाव्य | सोम सूरी (15वीं सदी) | महाराणा कुम्भा का काल, तत्कालीन शिक्षा प्रणाली, मेवाड़ी चित्रकला शैली के उद्भव-विकास तथा देलवाड़ा के देवकुल की जानकारी |
| वीर विनोद | श्यामलदास (महाराणा सज्जनसिंह के काल में रचित) | मेवाड़ महाराणा राजसिंह की उपलब्धियों का वर्णन; श्यामलदास "केसर-ए-हिंद" के नाम से प्रसिद्ध |
| दयालदास री ख्यात | दयालदास (15वीं सदी) | जैसलमेर राज्य की राजनीतिक व सामाजिक स्थिति; अन्य नाम — "बीकानेर के राठौड़ां री ख्यात" — राव बीका से महाराजा सरदारसिंह के राज्यारोहण तक का विस्तृत प्रबंध |
| राजस्थानी शब्दकोश | सीताराम लालस | राजस्थानी भाषा का प्रमाणिक व सर्वाधिक व्यापक शब्दकोश |
| प्राचीन लिपिमाला | जी.एच. ओझा | राजस्थान की प्राचीन लिपियों का शास्त्रीय अध्ययन |
"हम्मीर रासो" नाम से एक से अधिक ग्रंथ रचे गए हैं — शारंगधर के अतिरिक्त महेश व कवि जोधराज ने भी अपने-अपने "हम्मीर रासो" की रचना की। इसी तरह "खुमाण रासो" के भी संस्करण भिन्न-भिन्न हैं। परीक्षा में जब भी "हम्मीर रासो" या "खुमाण रासो" का रचनाकार पूछा जाए, तो प्रश्न में दिए गए अन्य संकेतों (जैसे रचनाकाल या विषयवस्तु) से यह सुनिश्चित करें कि किस विशेष संस्करण की बात हो रही है।
⏰ काल/निर्माता: जन्म — 1928; रूपायन शोध संस्थान (बोरुंदा) के सह-संस्थापक (कोमल कोठारी के साथ)
⭐ विशेषता: प्रमुख कृतियाँ — बाताँ री फुलवारी (लोक-कथाओं का विशाल संग्रह), अलेखूं हिटलर, बापू के तीन हत्यारे, चौधरायण की चतुराई; इनकी कहानियों पर बनी प्रसिद्ध फिल्में — दुविधा, चरणदास चोर, परिणति, पहेली; सम्मान — केंद्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार 1974 (बाताँ री फुलवारी हेतु), बिहारी पुरस्कार 2002, पद्मश्री 2007, तथा 2012 में राजस्थान सरकार द्वारा स्थापित सर्वोच्च नागरिक सम्मान "राजस्थान रत्न" के उद्घाटन बैच में सम्मानित
⏰ काल/निर्माता: जन्म — 11 सितंबर 1919
⭐ विशेषता: प्रमुख कृतियाँ — लीलटांस, सबद, निग्रंथ, सतवाणी, धरती धोरां री (प्रसिद्ध पंक्ति — "धरती धोरां री" राजस्थान की पहचान बन गई पंक्ति है); सम्मान — केंद्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार 1976 (लीलटांस हेतु), सूर्यमल्ल मिश्रण पुरस्कार 1987 (सबद हेतु), मूर्ति देवी पुरस्कार 1988/भारतीय ज्ञानपीठ (निग्रंथ हेतु), पद्मश्री 2004, राजस्थान रत्न 2012; सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार 1965 (गजबण — रूसी कथाओं का राजस्थानी अनुवाद हेतु); 1978 में संयुक्त राष्ट्र संघ के निरस्त्रीकरण सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व किया
⏰ काल/निर्माता: जन्म — 1916
⭐ विशेषता: प्रमुख कृतियाँ — कैरे चकवा बात, अमोलक बातां, लव स्टोरीज ऑफ राजस्थान, टाबरां री बातां, हुंकारो दो सा, मूमल, हिन्दुकुश के उस पार, सूली रा सूया माथे, रजवाड़ों के रीति-रिवाज — इन्होंने विशेष रूप से राजस्थानी लोक-कथाओं व स्त्री-जीवन पर लेखन किया
राजस्थानी भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची (Eighth Schedule) में शामिल करने की माँग दशकों से उठती रही है — इस अनुसूची में शामिल होने पर किसी भाषा को औपचारिक राष्ट्रीय भाषा का दर्जा प्राप्त होता है। वर्तमान में संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाएँ सूचीबद्ध हैं, परंतु राजस्थानी अभी भी इसमें शामिल नहीं है।
नवीनतम स्थिति (जुलाई 2026 तक): राजस्थान विधानसभा ने वर्ष 2003 में केंद्र सरकार से राजस्थानी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने का आग्रह करते हुए एक सर्वसम्मत प्रस्ताव पास किया था। इसके बाद राज्य के मुख्यमंत्रियों ने 2009, 2015, 2017, 2019, 2020 व 2023 में केंद्र सरकार को बार-बार पत्र लिखे, परंतु अभी तक कोई ठोस केंद्रीय कार्यवाही नहीं हुई है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस संबंध में दायर एक जनहित याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि यह एक नीतिगत विषय है, जो न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता — यह केंद्र सरकार व संसद का विषय है। हालाँकि, सर्वोच्च न्यायालय ने एक अलग मामले में राजस्थान सरकार को सरकारी व निजी विद्यालयों में राजस्थानी भाषा को एक विषय के रूप में पढ़ाने का निर्देश दिया है (मातृभाषा-आधारित शिक्षा से संबंधित मामला)। मार्च 2023 में राज्य सरकार ने राजस्थानी को राज्य की द्वितीय राजभाषा का दर्जा देने की संभावना तलाशने हेतु एक समिति गठित की (छत्तीसगढ़-झारखंड मॉडल का अध्ययन) — यह राज्य-स्तरीय राजभाषा का मामला है, जो केंद्रीय आठवीं अनुसूची की माँग से भिन्न है। जुलाई 2026 तक यह माँग अभी भी अनिर्णीत/लंबित है, और 2024-2026 की अवधि में किसी नई संसदीय या केंद्रीय कार्यवाही की पुष्टि नहीं हुई है।
विजयदान देथा व कन्हैयालाल सेठिया दोनों के पुरस्कार-वर्षों को लेकर विभिन्न स्रोतों में भिन्नता मिलती है (जैसे साहित्य अकादमी पुरस्कार 1974 या 1976, पद्मश्री 2004 या 2007)। इस अध्याय में नवीनतम शोध व प्रमाणिक स्रोतों (विकिपीडिया, आधिकारिक जीवनी) के आधार पर सबसे व्यापक रूप से स्वीकृत तिथियाँ दी गई हैं — देथा को साहित्य अकादमी 1974 व पद्मश्री 2007 में, तथा सेठिया को साहित्य अकादमी 1976 व पद्मश्री 2004 में मिला। दोनों को राजस्थान रत्न 2012 के उद्घाटन बैच में सम्मानित किया गया था।
1. राजस्थान की मातृभाषा राजस्थानी है, राजभाषा हिन्दी है; 21 फरवरी को राजस्थानी भाषा दिवस मनाया जाता है। 2. राजस्थानी भाषा का प्राचीनतम ग्रंथ "भरतेश्वर बाहुबली घोर" (वज्रसेन सूरि, 1168 ई.) है। 3. अधिकांश विद्वानों के अनुसार राजस्थानी भाषा का विकास मरुगुर्जरी अपभ्रंश से हुआ; डॉ. जॉर्ज ए. ग्रियर्सन ने "नागर अपभ्रंश" से उत्पत्ति मानी। 4. जॉर्ज थॉमस ने 1800 ई. में "राजपूताना" शब्द का, कर्नल जेम्स टॉड ने 1829 ई. में "राजस्थान" शब्द का, तथा जॉर्ज ए. ग्रियर्सन ने 1908 ई. में "राजस्थानी" शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया। 5. राजस्थानी भाषा की पारंपरिक लिपि महाजनी/मुंडिया है, जिसके आविष्कारक टोडरमल माने जाते हैं। 6. डिंगल — पश्चिमी राजस्थान की चारण कवियों द्वारा रचित, गुर्जरी अपभ्रंश से विकसित शैली है; पिंगल — पूर्वी राजस्थान की भाट कवियों द्वारा रचित, शौरसेनी अपभ्रंश से विकसित शैली है। 7. एम. केलॉग ने 1876 में, डॉ. एल.पी. टैस्सीटोरी ने बीसवीं सदी प्रारंभ में, तथा जॉर्ज ए. ग्रियर्सन ने 1908 में राजस्थानी बोलियों का वर्गीकरण प्रस्तुत किया — ग्रियर्सन का वर्गीकरण सबसे विस्तृत (5 समूह) है। 8. मारवाड़ी क्षेत्रफल की दृष्टि से सर्वाधिक बोली जाने वाली बोली है तथा इसे राजस्थानी भाषा का मानक रूप माना जाता है; इसका प्राचीन नाम मरुभाषा था। 9. मेवाड़ी बोली में "ए" व "ओ" ध्वनि का विशेष प्रयोग होता है; डॉ. मोतीलाल मेनारिया इसे मारवाड़ी की उपबोली मानते हैं। 10. ढूंढाड़ी बोली को "झाड़शाही/जयपुरी बोली" भी कहा जाता है; इस पर ब्रजभाषा व गुजराती का प्रभाव है, तथा इसमें "छे" शब्द का विशेष प्रयोग होता है। 11. हाड़ौती बोली ढूंढाड़ी की उपबोली है; कवि सूर्यमल्ल मिश्रण के काव्य ग्रंथ (वंशभास्कर, वीर सतसई) इसी बोली में रचित हैं। 12. वागड़ी/बागड़ी बोली को ग्रियर्सन ने "भीली बोली" नाम दिया; संत मावजी की रचनाएँ इसी बोली में हैं। 13. पृथ्वीराज रासो (चंदबरदाई) हिन्दी भाषा का प्रथम उपलब्ध महाकाव्य है, जो पिंगल भाषा में रचित है। 14. बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह) को टैस्सीटोरी ने "डिंगल का हैरोस" कहा; यह राजस्थान की सर्वश्रेष्ठ वचनिका मानी जाती है। 15. मुहणौत नैणसी को मुंशी देवीप्रसाद ने "राजपूताने का अबुल फज़ल" कहा; इनकी रचना "मुहणौत नैणसी री ख्यात" राजपूतों की 36 शाखाओं का वर्णन करती है। 16. वात (Vaat) विधा में कथावाचक कहानी सुनाता है और श्रोता "हुंकारा" देता है — पाबूजी री वात, ढोलामारू री वात इसके प्रमुख उदाहरण हैं। 17. बही एक विशेष रजिस्टर है, जिसमें राव व बड़वे आश्रयदाताओं का इतिहास पीढ़ी-दर-पीढ़ी दर्ज करते थे। 18. विजयदान देथा ("बिज्जी") को साहित्य अकादमी 1974/1976 (स्रोत-भेद), पद्मश्री 2007 तथा राजस्थान रत्न 2012 (उद्घाटन बैच) में सम्मानित किया गया। 19. कन्हैयालाल सेठिया को पद्मश्री 2004 व राजस्थान रत्न 2012 में मिला; इनकी पंक्ति "धरती धोरां री" राजस्थान की पहचान बन गई है। 20. राजस्थानी भाषा अभी भी संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं है (जुलाई 2026 तक); सर्वोच्च न्यायालय ने इसे नीतिगत विषय मानते हुए संबंधित जनहित याचिका खारिज कर दी थी।
राजस्थानी भाषा की कहानी वैदिक संस्कृत से शुरू होकर, प्राकृत-अपभ्रंश के रास्तों से गुज़रते हुए, आज की समृद्ध बहु-बोली परंपरा तक पहुँचती है — मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूंढाड़ी, हाड़ौती, मेवाती, मालवी, वागड़ी और शेखावाटी जैसी दर्जनों बोलियाँ इस भाषा की जीवंतता की गवाही देती हैं। केलॉग, टैस्सीटोरी व ग्रियर्सन जैसे भाषा-वैज्ञानिकों ने इस विविधता को वर्गीकृत करने का प्रयास किया, जबकि डिंगल-पिंगल के रूप में साहित्यिक दृष्टि से भी इसे दो प्रमुख शैलियों में बाँटा गया — डिंगल की वीरता और पिंगल का लालित्य दोनों राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान के दो पहलू हैं।
साहित्य की दृष्टि से भी यह परंपरा अत्यंत समृद्ध है — रासो, ख्यात, वचनिका, वात, बही जैसी अनूठी साहित्यिक विधाओं ने न केवल कला बल्कि इतिहास-लेखन का भी काम किया। पृथ्वीराज रासो से लेकर वंशभास्कर तक, दर्जनों ग्रंथों ने राजस्थान के राजनीतिक व सामाजिक इतिहास को संरक्षित रखा। आधुनिक काल में विजयदान देथा, कन्हैयालाल सेठिया व लक्ष्मी कुमारी चुंडावत जैसे साहित्यकारों ने इस परंपरा को नई ऊँचाई दी — देथा की लोक-कथाओं ने फिल्मों के माध्यम से राष्ट्रीय पहचान पाई, तो सेठिया की "धरती धोरां री" पंक्ति राजस्थान की अनौपचारिक पहचान-वाक्य बन गई।
परंतु इस समृद्ध भाषा-साहित्य परंपरा के बावजूद, राजस्थानी भाषा आज भी संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल होने की प्रतीक्षा कर रही है — यह इस अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण समसामयिक पक्ष है। परीक्षा की दृष्टि से यह अध्याय तथ्यात्मक (बोली-क्षेत्र-ग्रंथ-रचनाकार) व समसामयिक (मान्यता की माँग की वर्तमान स्थिति) दोनों प्रकार के प्रश्नों के लिए महत्वपूर्ण है। अगले अध्याय में हम राजस्थान की लोक गाथाएँ व लोक कथाएँ — ढोला-मारू, मूमल-महेंद्र, वीर तेजाजी गाथा से लेकर पाबूजी की फड़ तक — का अध्ययन करेंगे, जो इस भाषा-साहित्य परंपरा की मौखिक व लोक-मूल कड़ी है।
| बोली/क्षेत्र | मुख्य जिले | प्रमुख साहित्य/विशेषता |
|---|---|---|
| मारवाड़ी | जोधपुर, नागौर, जैसलमेर, पाली | राजस्थानी का मानक रूप; दादूपंथ साहित्य |
| मेवाड़ी | उदयपुर, राजसमंद, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा | कीर्तिस्तंभ प्रशस्ति, जगत अंबिका मंदिर शिलालेख |
| ढूंढाड़ी | जयपुर, टोंक, दूदू, किशनगढ़ | "आठ देस गूजरी" (18वीं सदी) |
| हाड़ौती | कोटा, बूंदी, बारां, झालावाड़ | वंशभास्कर, वीर सतसई (सूर्यमल्ल मिश्रण) |
| मेवाती | अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली | संत लालदास-चरणदास-दयाबाई की रचनाएँ |
| मालवी | प्रतापगढ़, कोटा, झालावाड़ | गुजराती-मराठी प्रभाव |
| वागड़ी/बागड़ी | डूंगरपुर, बांसवाड़ा | संत मावजी की रचनाएँ; ग्रियर्सन-नामित "भीली बोली" |
| शेखावाटी | सीकर, चूरू, झुंझुनूं | हम्मीर रासो (जोधराज), भीमविलास (शंकरराव) |
| गोडवाड़ी | जालौर, पाली, सिरोही | बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह) |
| अहीरवाटी/राठी | मुंडावर, बहरोड़, कोटपुतली | मीणाओं की प्रिय बोली |