पश्चिमी राजस्थान के रेतीले धोरों में एक ऐसी जनजाति बसती थी, जिसका पुश्तैनी पेशा साँप पकड़ना था — कालबेलिया। ये लोग गाँव-गाँव घूमकर साँप का खेल दिखाकर अपना गुजारा करते थे। लेकिन इनकी औरतों ने अपने पेशे से एक अनोखी कला गढ़ ली — जब वे नाचती थीं, तो उनका पूरा शरीर बिना किसी हड्डी के, ठीक साँप की तरह लहराता था। काले घाघरे पर चांदी की कशीदाकारी, तेज घुमाव, और मोरचंग-पूंगी की धुन — देखने वाला चकित रह जाता था कि यह नृत्य है या सचमुच कोई नागिन थिरक रही है। यही कारण है कि इसे "सर्प नृत्य" भी कहा गया। यह कला सदियों तक केवल मेलों और सड़कों तक सीमित रही, जब तक गुलाबो सपेरा नाम की एक कालबेलिया नर्तकी ने इसे देश-विदेश के मंचों तक नहीं पहुँचा दिया। वर्ष 2010 में यूनेस्को ने "कालबेलिया के लोकगीत व नृत्य" को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (Intangible Cultural Heritage) की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया — यह राजस्थान की किसी भी लोक-कला को मिली सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय पहचान थी। 2016 में गुलाबो सपेरा को पद्मश्री से सम्मानित किया गया। यह कहानी बताती है कि राजस्थान के नृत्य व नाट्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि हर समुदाय, हर जनजाति और हर पेशे की अपनी पहचान और गौरव-गाथा हैं — चाहे वह राजदरबार का घूमर हो या रेत के टीलों पर थिरकती कालबेलिया। यह अध्याय राजस्थान की इसी जीवंत प्रदर्शन-कला परंपरा को समझने का प्रयास है।
"म्हारी घूमर छे नखराली ए माय, घूमर रमवा म्हे जास्यां" — पारंपरिक घूमर लोकगीत — मारवाड़ अंचल
अध्ययन की दृष्टि से राजस्थानी लोक नृत्यों को निम्नलिखित चार वर्गों में विभाजित कर समझा जा सकता है। यह वर्गीकरण याद रखने से किसी भी नए नृत्य को सही श्रेणी में रखना आसान हो जाता है और परीक्षा में वर्गीकरण-आधारित प्रश्नों का उत्तर देना सरल हो जाता है।
| वर्ग | परिभाषा / विशेषता | प्रमुख उदाहरण |
|---|---|---|
| क्षेत्रीय नृत्य | किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र की पहचान बन चुके परंपरागत नृत्य, जो सामान्यतः सभी वर्गों द्वारा किए जाते हैं | घूमर, गैर, चरी, घुड़ला, डांडिया, कच्छी घोड़ी, गीदड़, इंडोणी, थाली नृत्य |
| जनजातीय नृत्य | जनजातीय समुदायों की संस्कृति, उत्सव व धार्मिक विश्वासों से सीधे जुड़े नृत्य | गवरी (भील), वालर (गरासिया), झेला (सहरिया), लांगुरिया (मीणा), मावलिया (कथौड़ी) |
| व्यावसायिक नृत्य | विशेष जाति/समुदाय द्वारा आजीविका हेतु पेशेवर रूप से प्रस्तुत किए जाने वाले नृत्य | कालबेलिया (सपेरा), भवाई (भवाई जाति), तेरहताली (कामड़िया सम्प्रदाय), कच्छी घोड़ी (भाट) |
| सामाजिक-धार्मिक नृत्य | धार्मिक अवसरों, त्योहारों व सामाजिक उत्सवों पर सामूहिक रूप से किए जाने वाले नृत्य | गवरी, गीदड़, चरकुला, झूमर, राई, गणगौर व होली से जुड़े नृत्य |
घूमर राजस्थान का सर्वाधिक प्रतिनिधि नृत्य है — इसे "लोक नृत्यों का सिरमौर", "लोक नृत्यों की आत्मा", "राजसी लोकनृत्य" तथा "रजवाड़ी लोकनृत्य" भी कहा जाता है। इसका नामकरण घाघरे (लहंगे) की गोल घूमती गति ("घूम") के कारण हुआ है। इसकी मूल भावना जल-संरक्षण पर आधारित मानी जाती है, तथा यह मूलतः स्त्रियों द्वारा विवाह, गणगौर, तीज व राजनीतिक-राजकीय समारोहों पर किया जाने वाला नृत्य है। वर्ष 1986 में घूमर को राजस्थान का राज्य नृत्य घोषित किया गया, तथा इसी वर्ष किशनगढ़ की राजकुमारी गोवर्धन कुमारी द्वारा मुंबई में "गणगौर घूमर अकादमी" की स्थापना की गई।
गैर नृत्य केवल पुरुषों द्वारा किया जाने वाला सामूहिक लोकनृत्य है — इसमें महिलाएँ नृत्य में भाग नहीं लेतीं, केवल फाग गीत गाती हैं। प्रारंभ में इसे "घेर" कहा जाता था, बाद में यह "गैर" कहलाने लगा — गोल घेरे में लकड़ी की छड़ियाँ (खांडा) लेकर नृत्य करने के कारण। नर्तक "गैरिये" कहलाते हैं, और यह होली के दूसरे दिन से लगभग 15 दिनों तक किया जाता है।
राजस्थान के कुछ नृत्य विशुद्ध साहस व शारीरिक कौशल के प्रदर्शन के लिए प्रसिद्ध हैं — इनमें अग्नि नृत्य व तेरहताली प्रमुख हैं, जो धार्मिक सम्प्रदायों से जुड़े हुए हैं।
भवाई नृत्य भवाई जाति द्वारा किया जाने वाला पेशेवर लोकनृत्यों में सर्वाधिक लोकप्रिय, मुख्यतः पुरुष-प्रधान नृत्य है (हालाँकि आज महिला कलाकार भी इसकी पहचान बन चुकी हैं)। इसकी विशेषता है — सिर पर पंद्रह-बीस मटके रखकर काँच के टुकड़ों पर नृत्य करना, तलवार पर नृत्य करना, रूमाल मुँह से उठाना तथा थाली के किनारों पर नृत्य करना।
कालबेलिया सपेरा जाति का पारंपरिक नृत्य है, जो युगल रूप में तथा प्रेम-कहानी पर आधारित होता है। वर्ष 2010 में यूनेस्को द्वारा "कालबेलिया के लोकगीत व नृत्य" (Kalbelia folk songs and dances of Rajasthan) को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (Intangible Cultural Heritage) की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया गया — यह राजस्थान के किसी भी नृत्य को मिली सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय मान्यता है। इसके लिए कालबेलिया स्कूल ऑफ डांस एकेडमी आमेर में स्थापित है।
दोनों नृत्य अक्सर एक-दूसरे से गड्डमड्ड कर दिए जाते हैं, पर इनकी जाति व सम्प्रदाय अलग-अलग हैं। तेरहताली कामड़िया सम्प्रदाय (पदराला गाँव, पाली) से जुड़ा है और महिलाएँ बैठकर 13 मंजीरों से ताल देती हैं — यह मूलतः स्थिर मुद्रा में किया जाने वाला नृत्य है। कालबेलिया सपेरा जाति का नृत्य है, जिसमें शरीर की तेज़ लचक व घुमाव प्रमुख हैं, और यह युगल रूप में प्रेम-कहानी पर आधारित होता है। परीक्षा में दोनों की जाति/सम्प्रदाय व वाद्ययंत्र पूछे जाते हैं, इसलिए इन्हें कभी न मिलाएँ।
राजस्थान में उपरोक्त प्रमुख नृत्यों के अतिरिक्त दर्जनों क्षेत्रीय व सामाजिक-धार्मिक नृत्य प्रचलित हैं। परीक्षा में इनके नाम, क्षेत्र व विशेषता पूछे जाते हैं — नीचे दी गई तालिका में इन्हें व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया गया है।
| नृत्य | क्षेत्र / समुदाय | अवसर / विशेषता |
|---|---|---|
| गीदड़ नृत्य | शेखावाटी (केवल पुरुष) | माघ पूर्णिमा से होली तक; पात्र — सेठ-सेठानी, डाकिया-डाकन, दूल्हा-दुल्हन, सरदार, पठान, शिव-पार्वती, राम-कृष्ण के रूप में नृत्य; वाद्य — नगाड़ा, ढोल, डफ, चंग, झांझ |
| चंग नृत्य | शेखावाटी (केवल पुरुष) | होली पर चंग बजाते हुए वृत्ताकार नृत्य |
| डफ नृत्य | सुजानगढ़, चूरू, रामगढ़, लक्ष्मणगढ़, सीकर (केवल पुरुष) | बसंत पंचमी व होली पर; नगाड़ची द्वारा नगाड़े की पूजा के बाद प्रारंभ; वाद्य — डफ, ढोल, थाली, मांदल |
| नाहर नृत्य | मांडल, भीलवाड़ा (केवल पुरुष) | शिकार पर आधारित; इतिहास शाहजहाँ (खुर्रम) के समय से; रुमालनाथ द्वारा बनाया चित्र राजकीय संग्रहालय, भीलवाड़ा में सुरक्षित |
| ढोल नृत्य | जालौर (विवाह अवसर, केवल पुरुष) | ढोल "थाकना शैली" में बजाया जाता है; एक साथ 4-5 ढोल बजाए जाते हैं; जयनारायण व्यास ने इसे प्रसिद्ध किया |
| गरबा नृत्य | जालौर (मूल: गुजरात, केवल महिलाएँ) | शक्ति की आराधना, राधा-कृष्ण प्रेम व्याख्यान; नृत्य प्रवर्तक — बाधाजी जाट के कड़ी (नागोजी) |
| सूकर नृत्य | जालौर व मेवाड़ (मांगलिक कार्य, केवल पुरुष) | भवाई जाति द्वारा; पेशेवर लोकनृत्यों में सर्वाधिक लोकप्रिय, पुरुष-प्रधान |
| बम/रसिया नृत्य | अलवर, मेवात अंचल (केवल पुरुष) | होली व फसल कटाई पर; वाद्य — बम (नगाड़े का परिवर्तित रूप), चिमटा, ढोलक, मंजीरा; रसिक गीत — श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने हेतु |
| खारी नृत्य | मारवाड़/जोधपुर (विवाह, केवल महिलाएँ) | दुल्हन की विदाई के समय सखियों द्वारा सिर पर खारी (बाँस की टोकरी) रखकर नृत्य |
| डांडिया नृत्य | शेखावाटी (होली, केवल पुरुष) | 20-25 पुरुषों की टोली दोनों हाथों में लंबी छड़ियाँ लेकर वृत्ताकार नृत्य करती है; बीच में शहनाई-नगाड़े वाले व गवैये बैठते हैं |
| थाली नृत्य | कोलूमंड, जोधपुर | कलाकारों द्वारा लंबी व ऊँची टेर लगाना ("हेला देना") इसकी पहचान है; आरंभ में बम (बड़ा नगाड़ा) बजाया जाता है; वाद्य — नौबत |
| बिंदोरी नृत्य | हाड़ौती (होली, केवल पुरुष) | गैर नृत्य के समान; वाद्य यंत्र — मादल; वर्ष 2003 में प्रतिबंधित |
| झूमर नृत्य | झालावाड़ (मांगलिक कार्य, केवल महिलाएँ) | गैर नृत्य से भिन्न, हाड़ौती क्षेत्र की विशिष्ट पहचान |
| डांग नृत्य | होली के अवसर पर | नाटक के विभिन्न भागों को जोड़ने के लिए किया जाने वाला नृत्य |
| नेजा नृत्य | बाड़मेर (खेल-नृत्य) | लकड़ी के डंडे पर नारियल बाँधा जाता है — महिलाएँ इसकी रक्षा करती हैं, पुरुष इसे उतारने का प्रयास करते हैं |
| राड़ नृत्य | वागड़ अंचल (होली, पुरुष व महिलाएँ दोनों) | सामान्यतः बिना वाद्य के किया जाने वाला नृत्य |
| इंडोणी नृत्य | सामान्य | महिलाएँ सिर पर पीतल की चरी में जलते कपास के बीज रखकर नृत्य करती हैं |
| चरकुला नृत्य | भरतपुर (राजस्थान में सर्वाधिक प्रचलित, मूलतः उत्तर प्रदेश) | राधा की स्मृति में बैलगाड़ी के पहिए पर 108 दीपक प्रज्वलित कर सिर पर रखकर या चारों ओर घुमाकर नृत्य; प्रसिद्ध कलाकार — मानसी सिंह |
| झांझी नृत्य | मारवाड़ (केवल महिलाएँ, मांगलिक कार्य) | छोटे मटके में छिद्र करके महिलाओं द्वारा सामूहिक पात्र-नृत्य |
| गौर नृत्य | बूंदी की "कजली तीज" में सर्वाधिक (स्त्री व पुरुष दोनों) | वर्ष 1974 में रशीद अहमद पहाड़ी (चांचोड़ा) द्वारा प्रसिद्ध किया गया |
| रायण नृत्य | बंजारा जाति (चाँदनी रात में स्त्री-पुरुष) | सामूहिक गायन के साथ किया जाने वाला नृत्य |
राजस्थान की प्रत्येक प्रमुख जनजाति का अपना विशिष्ट नृत्य-भंडार है, जो उनके इतिहास, संघर्ष व सामाजिक जीवन को दर्शाता है। जनजातियों का विस्तृत सामाजिक-सांस्कृतिक अध्ययन अध्याय 12 (जनजातियाँ एवं उनकी परंपराएँ) में किया जाएगा — यहाँ केवल नृत्य-पक्ष प्रस्तुत है।
| जनजाति | प्रमुख नृत्य | विशेषता |
|---|---|---|
| भील जनजाति | गवरी, हाथीमना नृत्य, द्विचक्र नृत्य, युद्ध नृत्य | भील नृत्य को राजस्थान का सबसे प्राचीन नृत्य माना जाता है; क्षेत्र — मेवाड़ अंचल; हाथीमना नृत्य में घुटनों के बल बैठकर तलवारों के साथ नृत्य होता है; द्विचक्र नृत्य में भीतरी वृत्त में महिलाएँ व बाहरी वृत्त में पुरुष विपरीत दिशा में घूमते हैं |
| गरासिया जनजाति | वालर नृत्य, मोरिया नृत्य, लूर नृत्य, कूद नृत्य, गौर नृत्य | क्षेत्र — जालौर, आबू, पाली, सिरोही (पिंडवाड़ा, आबू रोड); वालर सामान्यतः बिना वाद्य का नृत्य है (पुरुषों का वालर — ढोल सहित, महिलाओं का वालर — वाद्यविहीन); प्रसिद्ध कलाकार जवाहरमल गरासिया; 30 अप्रैल 1991 को डाक टिकट जारी |
| सहरिया जनजाति | झेला नृत्य, स्वांग नृत्य | क्षेत्र — शाहबाद (बारां); झेला नृत्य आषाढ़ माह में फसल पकने पर पुरुषों द्वारा किया जाने वाला फसली नृत्य है, जिसका गीत भी "झेला" कहलाता है; स्वांग नृत्य होली पर सहरिया पुरुषों द्वारा |
| मीणा जनजाति | लांगुरिया नृत्य, इंद्रपरी नृत्य, जवारा नृत्य, कन्हैया ख्याल | क्षेत्र — पूर्वी राजस्थान (अलवर, भरतपुर, करौली); लांगुरिया नृत्य नवरात्रों में नौ दिनों तक पुरुषों द्वारा; कैला माँ — हनुमानजी की माता अंजना देवी का अवतार मानी जाती हैं, लांगुरिया हनुमानजी का लोक-स्वरूप है; वाद्य — नफीरी, नौबत |
| कथौड़ी जनजाति | मावलिया नृत्य | होली के अवसर पर 5 दिन तक; महिलाओं द्वारा गोल घेरे में — महिलाएँ एक-दूसरे के कंधों पर चढ़कर पिरामिड बनाती हैं; इस समय "फड़का साड़ी" पहनी जाती है |
| डामोर जनजाति | भरटिया नृत्य (शोक नृत्य), पर्णिया नृत्य | भरटिया मृत्यु पर किया जाने वाला शोक-नृत्य है; पर्णिया विवाह के अवसर पर किया जाने वाला नृत्य है |
| कंजर जनजाति | चकरी नृत्य, धाकड़ नृत्य | क्षेत्र — किशनगंज (बारां), छबड़ा; चकरी कंजर जनजाति की अविवाहित महिलाओं द्वारा तेज गति से चक्राकार घूमते हुए किया जाता है (अन्य नाम — फंदी); धाकड़ कंजर पुरुषों का नृत्य है |
| गुर्जर जाति के नृत्य | पणिहारी नृत्य, चरी नृत्य | किशनगढ़ (अजमेर) क्षेत्र में गुर्जर महिलाओं द्वारा; पणिहारी नृत्य में महिलाएँ सिर पर घड़े रखकर पणिहारी गीत गाते हुए नृत्य करती हैं |
| मेव जाति के नृत्य | रतवई नृत्य, रणबाजा नृत्य | मेव स्त्रियों द्वारा सिर पर इंडोनी रखकर नृत्य; वाद्य — अलगोजा, दमामी; प्रसिद्ध नृत्यांगना — फलकू बाई |
| बंजारा जाति के नृत्य | रायण नृत्य, मछली नृत्य | रायण चाँदनी रात में स्त्री-पुरुषों द्वारा सामूहिक गायन के साथ; मछली नृत्य (बाड़मेर) एक तरुणी, जलदेवता व मछली की कहानी पर आधारित है, जो हर्षोल्लास से प्रारंभ होकर करुणापूर्ण वातावरण में समाप्त होता है |
लोक नाटक जनसाधारण के मनोरंजन हेतु विकसित हुए नाट्य-रूप हैं — ये सरल, आडंबरहीन एवं लोकजीवन से गहराई से जुड़े होते हैं। इनका मंच कोई भव्य थिएटर नहीं, बल्कि गाँव का चौराहा, देवालय-प्रांगण, चबूतरा या खुला आँगन होता है। ऐतिहासिक, धार्मिक व पौराणिक कथाओं को पद्यबद्ध गीतों में प्रस्तुत करने की परंपरा के कारण अधिकांश राजस्थानी लोक नाट्य "संगीत-प्रधान लोकनाट्य" कहलाते हैं।
ख्याल राजस्थान का सबसे लोकप्रिय व व्यापक लोक-नाट्य रूप है, जिसका प्रचलन 18वीं शताब्दी से माना जाता है। यह कविता, संगीत, नृत्य व अभिनय का सुंदर संतुलन प्रस्तुत करता है, तथा कई क्षेत्रीय शैलियों में विकसित हुआ — प्रत्येक शैली की अपनी भाषा, वाद्य-यंत्र व प्रस्तुति-शैली है।
| ख्याल का प्रकार | क्षेत्र | प्रवर्तक / प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|
| कुचामनी ख्याल | कुचामन (नागौर) | प्रवर्तक — लच्छीराम; ओपेरा शैली, खुले मंच पर प्रस्तुति; रचनाएँ — चाँद-नील गिरि, राव रिड़मल, गोगा चौहान, मीरा मंगल; प्रमुख कलाकार — उगमराज; स्त्री पात्रों की भूमिका पुरुष निभाते हैं; वाद्य — ढोल, सारंगी, शहनाई, ढोलक |
| जयपुरी ख्याल | जयपुर | स्त्री पात्रों की भूमिका स्वयं स्त्रियाँ निभाती हैं; कविता-संगीत-नृत्य-अभिनय का संतुलित समन्वय; उदाहरण — जोगी-जोगन, कानगूजरी, मियाँ-बीबी, पठान, रसीली तंबोलन |
| अली बख्शी ख्याल | अलवर | तुर्रा-कलंगी परंपरा से संबद्ध; अलवर क्षेत्र की विशिष्ट शैली |
| तुर्रा-कलंगी ख्याल | घोसुंडा, चित्तौड़गढ़, निम्बाहेड़ा, नीमच | प्रवर्तक — संत तुकनगीर (हिन्दू) एवं शाह अली (मुस्लिम); राजस्थान में प्रारंभ — सहदेव सिंह (तुर्रा) तथा हमीद बेग (कलंगी); प्रतीकात्मक अर्थ — तुर्रा शिव व कलंगी पार्वती का प्रतीक; विशेषताएँ — कवितामय शास्त्रार्थ "दंगल", संवादों को "बोल" कहा जाता है, गैर-व्यावसायिक लोकनाट्य, आमने-सामने 15-20 फीट ऊँचे दो मंच, दर्शक भी नाटक में भागीदारी निभाते हैं; प्रमुख वाद्य — चंग; प्रसिद्ध कलाकार — जयदयाल सोनी, चेतराम, हमीद बेग, ताराचंद, ठाकुर आंकार सिंह |
| हेला ख्याल | दौसा, लालसोट, सवाई माधोपुर | कलाकारों द्वारा लंबी व ऊँची टेर लगाना ("हेला देना") इसकी पहचान; आरंभ में बम (बड़ा नगाड़ा) बजाया जाता है; वाद्य — नौबत |
| कन्हैया ख्याल | करौली, सवाई माधोपुर, धौलपुर, भरतपुर, दौसा | मूल रूप से मीणा जाति में प्रचलित; मुख्य कथा को "किहन" कहा जाता है; प्रमुख पात्र — "मेड़िया"; वाद्य — हारमोनियम, सारंगी, शहनाई, बाँसुरी, नगाड़ा, ढोलक |
शाब्दिक तात्पर्य — "खेल"; रम्मत खेलने वाले को "खेलार" कहते हैं। प्रस्तुति चौमासा (वर्षा ऋतु का वर्णन) एवं गणपति-वंदना से होती है — विषयवस्तु में होली-सावन की लोक-काव्य, राजस्थान के लोकनायकों की ऐतिहासिक व वीर गाथाएँ शामिल हैं। प्रमुख वाद्य: ढोल, नगाड़ा, तबला, झांझ, चिमटा, तंदूरा, ढोलक, हारमोनियम। गायक बैठकर गाते हैं और दर्शक चारों ओर बैठे रहते हैं, पात्र अभिनय करते हैं। "तेरिये" — ताल पर नृत्य करने वाले पात्र कहलाते हैं।
गवरी (जिसे राई अथवा मेरु भी कहते हैं) मेवाड़ के भीलों का प्रसिद्ध धार्मिक लोकनाट्य है, जो शिव-भस्मासुर की कथा पर आधारित है। यह भारत का एकमात्र लोकनाट्य है, जो दिन में प्रदर्शित होता है और इसे "लोकनाट्यों का मेरु नाट्य" कहा जाता है।
| कलाकार | नृत्य/नाट्य रूप | सम्मान / योगदान |
|---|---|---|
| गुलाबो सपेरा | कालबेलिया नृत्य | पद्मश्री 2016; कालबेलिया को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँचाने का श्रेय |
| रामदयाल शर्मा (डीग) | नौटंकी | पद्मश्री 2022 |
| जानकी लाल भांड (भीलवाड़ा) | स्वांग/भांड परंपरा | पद्मश्री 2024 |
| देवीलाल सामर | कठपुतली, गवरी, कच्छी घोड़ी, भवाई (संरक्षण) | पद्मश्री 1968; भारतीय लोक कला मंडल, उदयपुर के संस्थापक (1952) |
| भूरचंद जैन (बाड़मेर) | गैर नृत्य | गैर नृत्य के संरक्षण व प्रचार में विशेष योगदान |
| शकुंतला रावत | घूमर नृत्य | घूमर की प्रमुख कलाकार के रूप में विख्यात |
| जवाहरमल गरासिया | गरासिया नृत्य-गीत | 30 अप्रैल 1991 को डाक टिकट जारी |
| मांगी बाई (चित्तौड़गढ़) | तेरहताली नृत्य | 1990, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार |
| अस्मिता काला (जयपुर) | भवाई नृत्य | 111 घड़े सिर पर रखकर नृत्य — लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में शामिल |
| स्वरूप पंवार - तारा शर्मा (बाड़मेर) | भवाई नृत्य | प्रमुख भवाई कलाकार जोड़ी |
संरक्षक संस्थाएँ: रूपायन संस्थान, बोरूंदा (जोधपुर) — 1960 में कोमल कोठारी व विजयदान देथा द्वारा स्थापित, राजस्थानी लोक-कला व लोक-साहित्य के दस्तावेज़ीकरण हेतु समर्पित। भारतीय लोक कला मंडल, उदयपुर — 1952 में देवीलाल सामर द्वारा स्थापित, कठपुतली-गवरी-कच्छी घोड़ी जैसी विधाओं को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने वाली संस्था। राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, जोधपुर — शिक्षा विभाग द्वारा 16 दिसंबर 1957 को स्थापित तथा 12 जनवरी 1959 को राज्यपाल के आदेश से स्वायत्त दर्जा प्राप्त; यह लोक-संगीत महोत्सव, लोकरंजन मेले व गैर नृत्य महोत्सव जैसे आयोजन करती है।
नवीनतम अपडेट: कालबेलिया के अतिरिक्त राजस्थान की किसी अन्य प्रदर्शन कला को अब तक (2026 तक) यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल नहीं किया गया है — कालबेलिया अभी भी राजस्थान की इकलौती यूनेस्को-सूचीबद्ध प्रदर्शन कला है। जोधपुर रिफ (Jodhpur RIFF) — मेहरानगढ़ दुर्ग में शरद पूर्णिमा के समय आयोजित होने वाला विश्व-प्रसिद्ध लोक-संगीत व नृत्य महोत्सव — अपने नवीनतम संस्करणों में सतत आयोजित हो रहा है (2025 संस्करण अक्टूबर में आयोजित हुआ)। मारवाड़ महोत्सव (जोधपुर, आश्विन माह) राज्य का प्रमुख लोक-नृत्य व लोक-संस्कृति महोत्सव बना हुआ है। जानकी लाल भांड (स्वांग परंपरा, 2024) को मिला पद्मश्री इस बात का प्रमाण है कि राजस्थान की कम-चर्चित लोकनाट्य परंपराओं को भी निरंतर राष्ट्रीय पहचान मिल रही है।
अधिकांश कोचिंग सामग्री व स्रोत घूमर को 1986 में राजस्थान का राज्य नृत्य घोषित होना बताते हैं (उसी वर्ष गणगौर घूमर अकादमी, मुंबई की स्थापना भी हुई) — परीक्षा में यही सर्वाधिक स्वीकृत उत्तर है। हालाँकि इस तिथि की किसी एक आधिकारिक राजपत्र-अधिसूचना से पुष्टि दुर्लभ है, इसलिए उत्तर लिखते समय "परंपरागत रूप से 1986 में घोषित" जैसा वाक्यांश प्रयोग करना अधिक सुरक्षित रहेगा।
1. घूमर को 1986 में राजस्थान का राज्य नृत्य घोषित किया गया; इसी वर्ष किशनगढ़ की राजकुमारी गोवर्धन कुमारी द्वारा मुंबई में गणगौर घूमर अकादमी स्थापित हुई। 2. घूमर के तीन रूप हैं — घूमर, लूर तथा झूमरियो (बालिकाओं द्वारा); प्रमुख कलाकार शकुंतला रावत हैं। 3. गैर नृत्य केवल पुरुषों द्वारा किया जाता है; इसके चार प्रकार हैं — आंगिया/आंगी-बांगी, भाटा गैर, तलवारों की गैर व घूमर गैर। 4. अग्नि नृत्य बीकानेर के कतरियासर गाँव में जसनाथी सम्प्रदाय द्वारा किया जाता है, जिसमें जलते अंगारों में प्रवेश किया जाता है। 5. तेरहताली नृत्य पदराला गाँव (पाली) के कामड़िया सम्प्रदाय से जुड़ा है — महिलाएँ 13 मंजीरे पहनकर नृत्य करती हैं। 6. चरी नृत्य किशनगढ़ (अजमेर) की गुर्जर महिलाओं द्वारा सिर पर जलती चरी रखकर किया जाता है। 7. भवाई नृत्य में सिर पर मटके रखकर काँच व तलवार पर नृत्य किया जाता है; अस्मिता काला (जयपुर) का 111 घड़ों का रिकॉर्ड लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है। 8. कालबेलिया नृत्य को 2010 में यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल किया गया — यह राजस्थान की एकमात्र यूनेस्को-सूचीबद्ध प्रदर्शन कला है; गुलाबो सपेरा को 2016 में पद्मश्री मिला। 9. घुड़ला नृत्य नागौर क्षेत्र (कुचामन, परबतसर, डीडवाना) में केवल महिलाओं द्वारा किया जाता है, जो शीतला अष्टमी से गणगौर तक चलता है। 10. भील जनजाति का नृत्य राजस्थान का सबसे प्राचीन नृत्य माना जाता है; गवरी (मेवाड़ के भीलों का धार्मिक लोकनाट्य) भारत का एकमात्र दिन में प्रदर्शित होने वाला लोकनाट्य है। 11. मीणा जनजाति का लांगुरिया नृत्य कैला माँ (अंजना देवी) की उपासना से जुड़ा है, तथा यह नवरात्रों में नौ दिनों तक किया जाता है। 12. ख्याल राजस्थान का सबसे लोकप्रिय लोकनाट्य रूप है, जिसका प्रचलन 18वीं शताब्दी से माना जाता है; इसके प्रमुख प्रकार — कुचामनी, जयपुरी, अली बख्शी, तुर्रा-कलंगी, हेला व कन्हैया ख्याल हैं। 13. तुर्रा-कलंगी ख्याल में तुर्रा शिव का व कलंगी पार्वती का प्रतीक है; इसके प्रवर्तक संत तुकनगीर (हिन्दू) व शाह अली (मुस्लिम) माने जाते हैं। 14. रम्मत जैसलमेर-बीकानेर की प्रसिद्ध लोकनाट्य परंपरा है; रम्मत खेलने वाले को "खेलार" कहा जाता है; बीकानेर की रम्मतों की विशेषता "पाटा संस्कृति" है। 15. तमाशा मूलतः महाराष्ट्र से आया जयपुर का लोकनाट्य है, जिसका प्रारंभ महाराजा मानसिंह के समय मोहन कवि रचित "धमाका मंजरी" नाटक से हुआ। 16. नौटंकी टोंक की प्रसिद्ध परंपरा है, जिसे कव्वाली के समकक्ष माना जाता है; रामदयाल शर्मा (डीग) को 2022 में इसके लिए पद्मश्री मिला। 17. जानकी लाल भांड (भीलवाड़ा) को स्वांग/भांड परंपरा हेतु 2024 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। 18. गवरी 45 दिनों तक चलने वाला भीलों का लोकनाट्य है, जिसमें मदिरा, मांस व हरी सब्जियों का निषेध रहता है; इसे "राई" या "मेरु" भी कहा जाता है। 19. देवीलाल सामर (1968, पद्मश्री) ने 1952 में उदयपुर में भारतीय लोक कला मंडल की स्थापना की, जिसने कठपुतली, गवरी व कच्छी घोड़ी को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। 20. रूपायन संस्थान, बोरूंदा (जोधपुर) की स्थापना 1960 में कोमल कोठारी व विजयदान देथा ने की; राजस्थान संगीत नाटक अकादमी की स्थापना 16 दिसंबर 1957 को हुई तथा 12 जनवरी 1959 को इसे स्वायत्त दर्जा मिला — यह जोधपुर में स्थित है, जयपुर में नहीं।
राजस्थान की लोक नृत्य परंपरा एक विशाल और विविधतापूर्ण संसार है — जहाँ राजदरबार का गरिमामय घूमर, होली की उन्मुक्त गैर, जसनाथी सम्प्रदाय का साहसिक अग्नि नृत्य, कामड़िया सम्प्रदाय की एकाग्र तेरहताली और सपेरा जाति की लचीली कालबेलिया — सभी एक साथ राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान गढ़ते हैं। हर जनजाति का अपना नृत्य-भंडार है — भील का गवरी, गरासिया का वालर, मीणा का लांगुरिया, सहरिया का झेला — जो उनके इतिहास, आस्था व सामाजिक जीवन का जीवंत दस्तावेज़ हैं। इन नृत्यों में से कालबेलिया को 2010 में मिली यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की मान्यता ने राजस्थान की लोक-कला को वैश्विक मंच पर स्थापित किया।
नृत्य के समानांतर, राजस्थान की लोक नाट्य परंपरा भी उतनी ही समृद्ध है — ख्याल की छह से अधिक क्षेत्रीय शैलियाँ (कुचामनी से कन्हैया तक), जैसलमेर-बीकानेर की रम्मत, जयपुर का तमाशा, टोंक की नौटंकी, तथा मेवाड़ के भीलों की गवरी — यह सभी सिद्ध करते हैं कि राजस्थान में मनोरंजन कभी भी धर्म, इतिहास व सामाजिक शिक्षा से अलग नहीं रहा। देवीलाल सामर, कोमल कोठारी व विजयदान देथा जैसे विद्वानों ने इन कलाओं को न केवल संरक्षित किया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँचाया — गुलाबो सपेरा, रामदयाल शर्मा व जानकी लाल भांड जैसे कलाकारों को मिला पद्मश्री सम्मान इसी निरंतर प्रयास का प्रतिफल है।
परीक्षा की दृष्टि से यह अध्याय तथ्यात्मक (नृत्य/नाट्य का नाम, क्षेत्र, जाति, वाद्य यंत्र, कलाकार) व विश्लेषणात्मक (सामाजिक-आर्थिक महत्त्व, संरक्षण की चुनौतियाँ) — दोनों प्रकार के प्रश्नों के लिए महत्वपूर्ण है। अगले अध्याय में हम राजस्थान के शास्त्रीय व लोक संगीत तथा वाद्य यंत्रों — मांड गायन से लेकर रावणहत्था तक — का विस्तृत अध्ययन करेंगे, जो इसी प्रदर्शन-कला श्रृंखला की स्वाभाविक अगली कड़ी है।
| जिला/क्षेत्र | प्रमुख नृत्य / नाट्य | सम्बद्ध जाति/सम्प्रदाय |
|---|---|---|
| समस्त राजस्थान (मारवाड़-मेवाड़) | घूमर (राज्य नृत्य) | सामान्य (महिलाएँ) |
| मेवाड़, बाड़मेर, शेखावाटी | गैर नृत्य | सामान्य (पुरुष) |
| बीकानेर (कतरियासर) | अग्नि नृत्य | जसनाथी सम्प्रदाय |
| पाली (पदराला गाँव) | तेरहताली नृत्य | कामड़िया सम्प्रदाय |
| किशनगढ़ (अजमेर) | चरी नृत्य, पणिहारी नृत्य | गुर्जर जाति |
| अलवर-भरतपुर-धौलपुर | भवाई नृत्य | भवाई जाति |
| पश्चिमी राजस्थान (आमेर) | कालबेलिया नृत्य (यूनेस्को 2010) | सपेरा जाति |
| नागौर (कुचामन-परबतसर) | घुड़ला नृत्य | सामान्य (महिलाएँ) |
| मेवाड़ अंचल | गवरी (राई/मेरु), भील नृत्य | भील जनजाति |
| सिरोही-जालौर-आबू | वालर, मोरिया, लूर नृत्य | गरासिया जनजाति |
| बारां (शाहबाद) | झेला नृत्य | सहरिया जनजाति |
| अलवर-भरतपुर-करौली | लांगुरिया नृत्य, कन्हैया ख्याल | मीणा जनजाति |
| कुचामन (नागौर) | कुचामनी ख्याल | सामान्य |
| घोसुंडा-चित्तौड़गढ़-निम्बाहेड़ा | तुर्रा-कलंगी ख्याल | हिन्दू-मुस्लिम संयुक्त परंपरा |
| जैसलमेर-बीकानेर | रम्मत | खेलार समुदाय |
| जयपुर | तमाशा, जयपुरी ख्याल | भट्ट परंपरा |
| टोंक | नौटंकी, निहंग | मुस्लिम-हिन्दू संयुक्त परंपरा |
| उदयपुर | कठपुतली नाट्य, भारतीय लोक कला मंडल | भाट/नट जाति |