📋 इस अध्याय में
- राजस्थानी चित्रकला — उद्भव एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
- चित्रांकन तकनीक, सामग्री एवं भित्ति-चित्रण विधियाँ
- मेवाड़ चित्रकला शैली
- मारवाड़ चित्रकला शैली (जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर, नागौर)
- किशनगढ़ शैली एवं बणी-ठणी — विशेष प्रकरण
- ढूंढाड़ चित्रकला शैली (आमेर-जयपुर, अलवर, उणियारा, शेखावाटी)
- हाड़ौती चित्रकला शैली (बूंदी, कोटा, झालावाड़)
- चारों शैलियों की तुलनात्मक विशेषताएँ (नौ प्रमुख उप-शैलियाँ)
- लोक चित्रकला परंपराएँ — फड़, पिछवाई, मांडना, सांझी
- अन्य लोक-चित्रण रूप — गोदना, मेहंदी, थापा, भराड़ी आदि
- राजस्थान का हस्तशिल्प — परिचय एवं आर्थिक महत्त्व
- वस्त्र हस्तशिल्प — बंधेज, लहरिया, सांगानेरी-बगरू प्रिंट, कोटा डोरिया
- आभूषण एवं धातु हस्तशिल्प — मीनाकारी, थेवा कला, कोफ्तगिरी, उस्ता कला
- मृण्य (मिट्टी) हस्तशिल्प — ब्लू पॉटरी, मोलेला, पोकरण पॉटरी
- काष्ठ हस्तशिल्प — कठपुतली, कावड़
- GI Tag प्राप्त राजस्थानी उत्पादों की सम्पूर्ण एवं नवीनतम सूची (जनवरी 2026 तक)
- अध्याय सारांश
किशनगढ़ के छोटे-से रियासती दरबार में एक राजा था — सावंत सिंह, जिसे लोग "नागरीदास" कहते थे। वह तलवार से जितना कुशल था, कलम और भावों से उतना ही डूबा हुआ भी। उसके दरबार में एक गायिका-कवयित्री थी, जिसका नाम था बणी-ठणी — यानी "सजी-धजी", "पूर्ण रूप से सुसज्जित"। कहा जाता है कि राजा सावंत सिंह उसकी काव्य-प्रतिभा और सौंदर्य से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने अपनी भक्ति और प्रेम, दोनों को राधा-कृष्ण के रूपक में ढाल दिया। इसी भावना को कैनवस पर उतारने का जिम्मा मिला दरबारी चित्रकार निहालचंद को। निहालचंद ने जो चित्र बनाया, वह किसी सामान्य महिला का चित्र नहीं था — लंबी-लंबी अंगुलियाँ, मीन-सी तिरछी और बड़ी आँखें, पतला-लंबा चेहरा, नुकीली नासिका — यह एक आदर्श, दिव्य सौंदर्य की कल्पना थी। लगभग दो सौ वर्ष बाद, कला समीक्षक एरिक डिकिंसन ने जब यह चित्र देखा, तो चकित होकर इसे "भारत की मोनालिसा" कहा — क्योंकि जैसे लियोनार्दो-दा-विंची की मोनालिसा की मुस्कान रहस्यमय है, वैसे ही बणी-ठणी की आँखों में एक ऐसा रहस्य है जो देखने वाले को बांध लेता है। 5 मई 1973 को भारत सरकार ने इस चित्र पर 20 पैसे का डाक टिकट जारी करके इसे राष्ट्रीय गौरव का दर्जा दिया। आज यह मूल चित्र दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में सुरक्षित है — पर इसकी छाप राजस्थान की हर कलात्मक परंपरा में दिखती है। यह अध्याय उसी परंपरा की कहानी है — जहाँ रंग, कूची, कपड़ा, मिट्टी और धातु मिलकर सदियों से राजस्थान की आत्मा को बयान करते आए हैं।
"बणी-ठणी — भारत की मोनालिसा" — एरिक डिकिंसन, कला समीक्षक (1943 में किशनगढ़ शैली को विश्व के सामने लाने का श्रेय)
1राजस्थानी चित्रकला — उद्भव एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
राजस्थानी चित्रकला का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। चंबल नदी के किनारे स्थित आलनिया गाँव (कोटा) से लगभग 5,000 वर्ष पूर्व के शैलचित्र (Rock Paintings) प्राप्त हुए हैं, जिन्हें डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर ने खोजा था। हनुमानगढ़ के कालीबंगा से अलंकृत ईंटों के प्राचीन साक्ष्य मिले हैं। किन्तु "चित्रकला" के व्यवस्थित रूप के प्राचीनतम प्रमाण जयपुर व बैराठ सभ्यता से मिलते हैं, इसीलिए इस काल को "प्राचीन युग की चित्रकला" कहा जाता है। राजस्थान के सबसे पुराने उपलब्ध चित्रित ग्रंथ "औध निर्युक्ति वृत्ति" और "दस वैकालिक सूत्र चूर्णि" (1060 ई.) माने जाते हैं।
- मेवाड़ को राजस्थानी चित्रकला का प्राचीनतम केंद्र माना जाता है — यह शैली अजंता की भित्ति-चित्रकला परंपरा से प्रेरित मानी जाती है।
- आनंद कुमारस्वामी ने अपनी पुस्तक "राजपूत पेंटिंग" (1916) में राजस्थानी चित्रकला का पहला वैज्ञानिक वर्गीकरण किया — उन्होंने पहाड़ी चित्रशैली को भी "राजस्थान पेंटिंग" के अंतर्गत रखा।
- तिब्बती इतिहासकार लामा तारानाथ ने मरुप्रदेश (मारवाड़) के चित्रकार श्रीधर/श्रृंगधर का उल्लेख किया है, जिन्होंने पश्चिमी भारत में यक्ष शैली को जन्म दिया।
- इतिहासकार जमशेद खंडालावाला ने 17वीं शताब्दी को राजस्थानी चित्रकला का "स्वर्णकाल" माना है, जबकि विलियम लॉरेंस के अनुसार राजस्थानी चित्रशैली "भारतीय चित्रशैली का विशुद्ध रूप" है। कुंदनलाल मिश्रा को राजस्थान की आधुनिक चित्रकला की शुरुआत का श्रेय जाता है।
- अध्ययन-परंपरा (Historiography): राजपूत कला पर मिस्टर ब्राउन, स्मिथ, जी.ए. ग्रियर्सन व जी. थॉमस ने; राजपूत शैली पर आनंद कुमारस्वामी, ओ.सी. गांगुली व हैवेल ने; हिन्दू शैली पर एच.सी. मेहता व नरसिंह राव ने; और राजस्थानी शैली पर रामकृष्ण दास, कर्नल जेम्स टॉड व जी.एस. ओझा ने महत्वपूर्ण अध्ययन प्रस्तुत किए।
राजस्थानी चित्रकला का भौगोलिक-सांस्कृतिक वर्गीकरण
भौगोलिक एवं सांस्कृतिक आधार पर राजस्थानी चित्रकला को चार प्रमुख शैलियों (स्कूल) में विभाजित किया जाता है — प्रत्येक शैली के अंतर्गत कई उप-शैलियाँ व ठिकानों की चित्रकलाएँ सम्मिलित हैं।
| शैली (स्कूल) | प्रमुख उप-शैलियाँ / ठिकाने |
|---|
| मेवाड़ स्कूल | चावंड शैली, उदयपुर शैली, नाथद्वारा शैली, देवगढ़ उपशैली, सावर उपशैली, शाहपुरा उपशैली, बनेरा, बागोर, बेगूं व केलवा जैसे ठिकाने |
| मारवाड़ स्कूल | जोधपुर शैली, बीकानेर शैली, किशनगढ़ शैली, अजमेर शैली, नागौर शैली, सिरोही शैली, जैसलमेर शैली, घाणेराव, रियां, भीनाय व जुनियां ठिकाने |
| ढूंढाड़ स्कूल | आमेर शैली, जयपुर शैली, शेखावाटी शैली, अलवर शैली, उणियारा उपशैली, झिलाय, इसरदा, शाहपुरा व सामोद ठिकाने |
| हाड़ौती स्कूल | बूंदी शैली, कोटा शैली (शिकार शैली), झालावाड़ उपशैली |
2चित्रांकन तकनीक, सामग्री एवं भित्ति-चित्रण विधियाँ
राजस्थानी चित्रकला मुख्यतः दो रूपों में विकसित हुई — भित्ति चित्रण (दीवारों पर बड़े आकार के चित्र, जैसे हवेलियों व महलों में) और लघु चित्रण (कागज/वासली पर छोटे आकार के बारीक चित्र, जैसे पोथी-ग्रंथों का चित्रांकन)। दोनों ही विधियों में स्थानीय रूप से उपलब्ध प्राकृतिक सामग्री का प्रयोग किया जाता था — गेरू, हड़ताल, सिंदूर, इंडिगो (नील) जैसे खनिज व वानस्पतिक रंग, गिलहरी के बालों से बनी कूची (करहला), हाथ से बना कागज (वासली) तथा सोने-चाँदी का वर्क।
भित्ति चित्रण की तीन प्रमुख विधियाँ (Fresco Techniques)
| विधि | तकनीक | स्थानीय नाम / उपयोग |
|---|
| बुऑन फ्रेस्को (Buon Fresco) | गीली चूने की पलस्तर वाली दीवार पर रंग लगाए जाते हैं; रंग दीवार सूखने के साथ स्थायी रूप से जम जाते हैं — सबसे टिकाऊ व पारंपरिक विधि | आरायश, अलगीला, मोरकासी या पणा — शेखावाटी हवेलियों की बाहरी दीवारों पर, मौसम-प्रतिरोधी |
| फ्रेस्को सेको (Fresco Secco) | पूरी तरह सूखी दीवार पर चित्रण; रंग चिपकाने हेतु गोंद/अंडे की जर्दी जैसे बाइंडर का प्रयोग; बुऑन फ्रेस्को से कम टिकाऊ | अंदरूनी दीवारों व छतों पर, टच-अप व सूक्ष्म विवरण (fine detailing) हेतु |
| मेज्जो फ्रेस्को (Mezzo Fresco) | हल्की नम या लगभग सूखी दीवार पर चित्रण; सेको से अधिक मजबूत तथा बुऑन से आसान | बड़े आकार के चित्रों के लिए विशेष रूप से उपयोगी |
प्रमुख चित्रकला संग्रहालय व संस्थाएँ
| संग्रहालय/संस्था | स्थान |
|---|
| जिनभद्र सूरी भण्डार | सोनार दुर्ग (जैसलमेर) |
| पोथीखाना | जयपुर |
| सरस्वती भण्डार | उदयपुर |
| मान प्रकाश पुस्तकालय | मेहरानगढ़ दुर्ग (जोधपुर) |
| पश्चिमी सांस्कृतिक केंद्र | उदयपुर |
| प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप | उदयपुर |
| जवाहर कला केंद्र | जयपुर |
| राजस्थान ललित कला अकादमी | जयपुर |
| क्रिएटिव आर्टिस्ट ग्रुप | जयपुर |
3मेवाड़ चित्रकला शैली
मेवाड़ को राजस्थानी चित्रकला का सबसे प्राचीन एवं प्रमुख केंद्र माना जाता है। इस शैली में पोथी-ग्रंथों का सर्वाधिक चित्रण हुआ। इसके विकास का श्रेय महाराणा कुम्भा को दिया जाता है, जिन्हें "राजस्थान में चित्रकला का जनक" कहा जाता है, तथा इसका स्वर्णकाल महाराणा जगत सिंह प्रथम (1628-1652 ई.) के काल में आया। इस शैली पर अजंता शैली का स्पष्ट प्रभाव है, विशेषकर शिकार के दृश्यों में त्रिआयामी (3D) प्रभाव के रूप में। महाराणा जगत सिंह प्रथम ने राजमहल में "चितेरों की ओवरी" अथवा "तस्वीरां रो कारखाना" नामक चित्रकला विद्यालय की स्थापना की, जिससे चित्रकला को राजकीय संरक्षण प्राप्त हुआ।
| 🎨 श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि (आहड़ (उदयपुर)) | ⏰ काल/निर्माता: 1260-61 ई., महाराणा तेजसिंह का काल, चित्रकार कमलचन्द्र ⭐ विशेषता: मेवाड़ चित्रशैली का सबसे प्राचीन ग्रंथ; ताड़पत्रों पर चित्रित |
|---|
| 🎨 सुपासनाह चरियम् (देलवाड़ा (सिरोही)) | ⏰ काल/निर्माता: 1423 ई., महाराणा मोकल का काल, चित्रकार देवकुल पाठक ⭐ विशेषता: मेवाड़ का दूसरा प्राचीन चित्रित ग्रंथ; जैन व गुजराती शैली का मिश्रण; वर्तमान में सरस्वती संग्रहालय में संरक्षित |
महाराणा उदय सिंह (1535-1572 ई.) के काल में भागवत पुराण का प्रसिद्ध चित्र "पारिजात अवतरण" (1540 ई.) चित्रकार नानाराम द्वारा बनाया गया। महाराणा जगत सिंह प्रथम के समय रामायण का चित्रांकन (1649-1653 ई.) साहबद्दीन एवं मनोहर द्वारा किया गया, तथा भागवत पुराण की भांति रामचरित्र का भी चित्रांकन हुआ। महाराणा हम्मीर सिंह के काल में "बड़े पन्नों" पर चित्र बनाने की परंपरा प्रारंभ हुई। महाराणा संग्राम सिंह द्वितीय के समय प्रमुख चित्रकार नुरुद्दीन था, जिसने विष्णु शर्मा रचित "पंचतंत्र" पर अनेक चित्र बनाए — इसी में "कलीला-दमना" (दो गीदड़ों की कहानी) प्रमुख पात्र हैं।
- मेवाड़ शैली के प्रमुख चित्रकार: भक्ता, साहबद्दीन, मनोहर, शाह उमरा, कमलचन्द, हीरानंद, जीवाराम, भैरुराम, नासिरुद्दीन, कृपाराम, नुरुद्दीन, जगन्नाथ।
चावंड चित्रशैली — मेवाड़ की प्रारंभिक उपशैली
- प्रारंभ: 1585 ई., महाराणा प्रताप का काल; स्वर्णकाल: महाराणा अमरसिंह प्रथम (1597-1620 ई.) के समय।
- 1592 ई. में निसारदीन द्वारा "ढोला-मारू" चित्र बनाया गया (वर्तमान में दिल्ली संग्रहालय में); 1605 ई. में निसारदीन द्वारा ही "रागमाला" ग्रंथ का चित्रण हुआ — यह राजस्थानी चित्रकला के प्राचीनतम सुनिश्चित-तिथि साक्ष्यों में एक है।
- रंग योजना: भारी वस्तुओं को गहरे-तीव्र रंगों से तथा हल्की वस्तुओं को हल्के-न्यून ऊर्जस्विता वाले रंगों से चित्रित किया जाता था — चटकीले रंगों का विशेष प्रयोग हुआ।
- पेड़-पशु-पक्षी: कदम्ब वृक्ष, चकोर, हंस, मोर का चित्रण; आभूषण — कर्णफूल, बाजूबंद, पायल, बोर, कंगन।
नाथद्वारा चित्रशैली — वल्लभ सम्प्रदाय का प्रभाव
- उदयपुर व ब्रज शैली का मिश्रण; प्रारंभ महाराणा राजसिंह के काल (1652-80 ई.) में हुआ, जब वल्लभ सम्प्रदाय की मुख्य पीठ नाथद्वारा में स्थापित हुई (1672 ई. में श्रीनाथजी की मूर्ति स्थापना)।
- प्रमुख विषय: कृष्ण-यशोदा चित्र, कृष्ण की बाल-लीलाएँ, गायों का अंकन, भित्ति चित्र, पिछवाइयाँ तथा श्रीनाथजी का चित्रण।
- प्रमुख चित्रकार: बाबा रामचन्द्र, नारायणजी, रामलिंगजी, चतुर्भुजजी, चम्पालाल, घासीराम, तुलसीराम, उदयराम, हरदेव, हीरालाल, विठ्ठल। महिला चित्रकार: कमलाजी, इलायची।
- महिला चित्रण की विशेषता — प्रौढ़ता व छोटा कद, तिरछी/चकोर आँखें, नथ में मोती, स्थूल शरीर व वात्सल्य भाव, मंगलसूत्र। रंग: हरा व पीला; वृक्ष: केला (कदली)।
देवगढ़ उप-चित्रशैली
- मारवाड़ + जयपुर + मेवाड़ शैली का मिश्रण; प्रारम्भ देवगढ़ के रावल द्वारकादास चूंडावत के समय हुआ; इसे प्रकाश में लाने का श्रेय डॉ. श्रीधर अंधारे को जाता है।
- स्वर्णकाल: द्वारकादास चूंडावत का काल; सर्वाधिक विकास महाराणा जय सिंह के काल में हुआ। इसके भित्ति चित्र "अजारा की ओवरी" व "मोती महल" में देखे जा सकते हैं।
- प्रमुख चित्रकार: बगता, चोखा, कँवला प्रथम, कँवला द्वितीय, हरचंद, नगा, बैजनाथ।
4मारवाड़ चित्रकला शैली (जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर, नागौर)
तिब्बती इतिहासकार तारानाथ लामा ने 7वीं सदी में मारू देश (मारवाड़) में चित्रकार श्रृंगधर का उल्लेख किया, जिसने पश्चिमी भारत में यक्ष शैली को जन्म दिया — इसके प्रारंभिक चित्रावशेष प्रतिहारकालीन "ओध निर्युक्ति वृत्ति" में मिलते हैं। इस शैली का मुख्य विषय प्रेमाख्यान रहा। मारवाड़ (जोधपुर) शैली का आरंभ राव मालदेव के काल में हुआ, जब उनके द्वारा चोखेलाव महल (मेहरानगढ़ दुर्ग) में दो चित्र — राम-रावण युद्ध तथा सप्त सती — बनाए गए, जो मारवाड़ शैली के प्रारंभिक चित्र माने जाते हैं।
- महाराजा अभयसिंह के काल में प्रमुख चित्रकार डालचंद थे; सूरसिंह के समय ढोला-मारू व भागवत पुराण का चित्रण हुआ; वीरजी भाटी ने विठ्ठलदास चंपावत के लिए रागमाला का चित्रण किया।
- महाराजा उदयसिंह प्रथम के काल में विशुद्ध मुगल शैली का प्रभाव रहा, जबकि महाराजा तख्तसिंह के काल में कम्पनी शैली (British Company style) का प्रभाव आया।
- शैली का स्वर्णकाल जसवंतसिंह-I व महाराजा मानसिंह के काल में आया — 1803-1843 तक मुगल प्रभाव रहा; महाराजा अजीतसिंह के समय सर्वाधिक सुंदर व प्राणवान चित्र बने। महाराजा मानसिंह के समय नाथों के मठों में जोधपुर शैली का व्यापक विकास हुआ, तथा महामंदिर व उदयमंदिर में ग्रंथ-चित्रण हुआ।
- 1623 ई. में वीरजीदास भाटी द्वारा "रागमाला" का चित्रांकन; शिव पुराण, दुर्गा पुराण, नाथ चरित्र आदि का भी चित्रण हुआ।
- प्रमुख चित्रकार: वीरजी, दाना भाटी, रतनजी भाटी, माधोदास, शंकरदास, मुन्नालाल, रामकिशन, मुकुन्द, अमरदास, बिशनदास, शिवदास, देवदास, फतेह मोहम्मद, चन्दूलाल, जयकिशन, शिवराम, चाँद तैय्यब, रामसिंह भाटी, जीतमल, रामा, नाथा, छज्जू, सैफू। प्रमुख ग्रंथ/विषय: ढोला-मारू, सूरसागर, रसिकप्रिया, रागमाला (वीरजी)।
बीकानेर चित्रशैली — मुगल व दक्कन शैली का समन्वय
- आरंभ महाराजा रायसिंह के काल में हुआ, जिन्होंने मुगल दरबार से उस्ता अली रज़ा व उस्ता हामिद रुकनुद्दीन को बीकानेर बुलवाया, जिससे "उस्ता शैली" का उद्भव हुआ।
- "भागवत पुराण" बीकानेर शैली का प्रथम चित्रित ग्रंथ है; नूर मोहम्मद इस काल के दरबारी चित्रकार थे। धार्मिक चित्रों का सर्वाधिक चित्रण हुआ; फव्वारा व दरबारी दृश्यों में दक्षिण (दक्कन) शैली का स्पष्ट प्रभाव मिलता है।
- महाराजा अनूपसिंह का काल बीकानेर शैली का स्वर्णकाल माना जाता है — इस काल में सर्वाधिक चित्रों का निर्माण, उस्ता कला व मथैरणा कला का विकास तथा 18वीं सदी में ठेठ राजस्थानी रंगत वाले चित्र बने।
- मथैरणा कला जैन समाज के मथैरणाओं द्वारा विकसित एक विशिष्ट कला है, जिसमें चूने की सतह पर दीवारों पर देवी-देवताओं व धार्मिक कथाओं का चित्रण किया जाता है।
- प्रमुख चित्रकार: चाँद तैय्यब, रामसिंह भाटी, जीतमल, रामा, नाथा, छज्जू, जोशी मेघराज, सैफू — तथा उस्ना व साहिबा (अजमेर) नामक महिला चित्रकारों का भी उल्लेख मिलता है। जुनियां के चाँद द्वारा चित्रित राजा पाबूजी का सन् 1698 ई. का व्यक्ति-चित्र इस शैली का सुंदर उदाहरण है।
जैसलमेर शैली एवं नागौर चित्रशैली
- जैसलमेर शैली के संरक्षणकर्ता महारावल हरराज, अखेसिंह एवं मूलराज भाटी द्वितीय (स्वर्णकाल) रहे। भित्ति चित्र नथमल की हवेली, पटवों की हवेली और सालिमसिंह मेहता की हवेली पर चित्रित हैं। विशेषता — पारदर्शी पहनावा; मूमल का चित्रण व ढोला-मारू का चित्रण इस शैली का मुख्य विषय था।
- नागौर चित्रशैली में बादल महल पर भित्ति चित्र बनाए गए; वृद्धावस्था के चित्र तथा बुझे हुए रंगों का प्रयोग हुआ, तथा पारदर्शी वेशभूषा इस शैली की विशेषता है। लकड़ी के किवाड़ों व किले के भित्ति-चित्रण में मारवाड़ शैली का प्रभाव दिखाई देता है।
- घाणेराव उपशैली — गोड़वाड़ क्षेत्र (जोधपुर के दक्षिण) का प्रमुख ठिकाना; चित्रकार — नारायण, छज्जू व कृपाराम।
मारवाड़/जोधपुर बनाम बीकानेर चित्रशैली — तुलना
मारवाड़/जोधपुर चित्रशैली
- मरुस्थल, घोड़े, झाड़ियों का चित्रण
- प्रेमाख्यानों का चित्रण — ढोला-मारू, महेंद्र-मूमल
- ऊँची पाग जोधपुर शैली की विशिष्ट देन
- रंग: लाल व पीले रंगों की प्रधानता
- नेत्र: बादाम के समान; वृक्ष: आम
बीकानेर चित्रशैली
- बरसते बादलों में सारस-मिथुन का नयन-अभिराम अंकन
- बीकानेरी रहन-सहन, राजपूती संस्कृति तथा मुगल स्कूल का मिश्रित प्रभाव
- चित्रकार चित्र के नीचे अपना नाम व तिथि अंकित करते
- प्रारंभ से ही मुगल शैली का प्रभाव
- महिलाएँ: इकहरी, तन्वंगी व कोमल नारी आकृतियाँ
5किशनगढ़ शैली एवं बणी-ठणी — विशेष प्रकरण
किशनगढ़ शैली को "कागज़ी शैली" व "मांड शैली" भी कहा जाता है। इस शैली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पूर्णतः स्थानीय शैली है — इस पर किसी अन्य चित्रशैली का बाहरी प्रभाव नहीं पड़ा (हालाँकि साहित्यिक दृष्टि से कांगड़ा शैली व ब्रज साहित्य का प्रभाव माना जाता है)। इस शैली का स्वर्णकाल महाराजा सावंत सिंह/नागरीदास (1748-1764 ई.) के काल में आया। इसे प्रकाश में लाने का श्रेय डॉ. फैय्याज़ अली व एरिक डिक्सन (डिकिंसन) को जाता है।
👑 बणी-ठणी (किशनगढ़ (अजमेर-नागौर क्षेत्र))
⏰ काल/निर्माता: लगभग 1750 ई., चित्रकार मोरध्वज निहालचंद, राजा सावंत सिंह "नागरीदास" के काल में
⭐ विशेषता: किशनगढ़ शैली का प्रमुख चित्र; चित्रकार निहालचंद को "भारत का लियोनार्दो-द-विंची" कहा जाता है; 5 मई 1973 को 20 पैसे का डाक टिकट जारी; एरिक डिकिंसन द्वारा "भारत की मोनालिसा" नाम दिया गया; वर्तमान में राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में सुरक्षित
- विशेषताएँ: प्रेम-रस प्रधान शैली; गुलाबी रंग की प्रधानता; कृष्ण-लीलाओं का अधिक चित्रण; नारी सौंदर्य का प्रमुख अंकन। नारी चित्रों में नाक का आभूषण "बेसरी/बेसर" दिखाया गया है।
- आँखें: बादाम जैसी; वृक्ष: मुख्यतः केला; रंग: श्वेत, गुलाबी, स्लेटी, सिंदूरी।
- पुरुष चित्रण: लंबा इकहरा शरीर, नीलाभ छवियुक्त, उन्नत ललाट, श्वेत/मूँगिया मोतीजड़ित पगड़ी। स्त्री चित्रण: तन्वंगी, लंबी, सुराही-सी गर्दन, पतली कमर, खंजन समान आँखें, नुकीली चिबुक।
- प्राकृतिक वातावरण: सिंदूरी बादल, चाँदनी रात में राधा-कृष्ण की क्रीड़ाएँ, केले के वृक्ष, झीलों का अंकन।
- प्रमुख चित्रकार: मोरध्वज निहालचंद, नानकराम, सीताराम, सूरध्वज, लालड़ीदास, सवाईराम, रामनाथ, तुलसीदास, अमरचंद, भंवरलाल, अमरू, सूरजमल, बदनसिंह।
💡 कन्फ्यूजन दूर करें — बणी-ठणी कहाँ सुरक्षित है?
कई कोचिंग नोट्स में "अजमेर संग्रहालय" लिखा मिलता है, जो एक सामान्य भ्रम है। असल कहानी यह है कि कला समीक्षक एरिक डिकिंसन, जो अजमेर के मेयो कॉलेज में प्राध्यापक थे, ने 1943 में किशनगढ़ राजमहल के संग्रह को दुनिया के सामने लाया — इसीलिए "अजमेर" नाम इस चित्र से जुड़ गया। परंतु सबसे प्रसिद्ध व मूल बणी-ठणी चित्र, जिस पर 1973 का डाक टिकट बना, वह राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में सुरक्षित है — परीक्षा के लिए यही सही उत्तर है। किशनगढ़ शैली के अन्य संबंधित लघुचित्र किशनगढ़ के राजमहल संग्रह व अन्य संग्रहालयों में भी बिखरे हैं, जिससे यह भ्रम और गहरा हो जाता है।
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6ढूंढाड़ चित्रकला शैली (आमेर-जयपुर, अलवर, उणियारा, शेखावाटी)
ढूंढाड़ शैली पर आरंभ से ही मुगल शैली का सर्वाधिक प्रभाव पड़ा, क्योंकि आमेर (कच्छवाहा) राजवंश के मुगल दरबार से घनिष्ठ वैवाहिक व राजनीतिक संबंध थे। बैराठ के मुगल गार्डन व मौजमाबाद के भित्ति चित्रों में यह प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है। आमेर चित्रशैली का प्रारंभ मानसिंह व मिर्ज़ा राजा जयसिंह के काल में हुआ, तथा इसका स्वर्णकाल मिर्ज़ा राजा जयसिंह प्रथम के काल में आया। चित्रकार पुष्पदत्त ने "आदिपुराण" (1606) नामक ग्रंथ का चित्रण किया था; प्रमुख चित्रकार पुष्पदत्त, हुक्मचंद व मुरली थे।
- चित्रित ग्रंथ: यशोधरा चरित्र (इस शैली के प्रारंभिक काल का चित्रित ग्रंथ), रज्मनामा की प्रति (अकबर के लिए जयपुर सूरतखाना में — 1588, 169 बड़े आकार के चित्र), बिहारी सतसई (चित्रकार मुरली), रसिकप्रिया व कृष्ण-रुक्मणी वेल (1639 ई., मिर्ज़ा राजा जयसिंह प्रथम द्वारा अपनी रानी चंद्रावती के लिए)।
- मदरसा-ए-हुनरी/राजस्थान स्कूल आर्ट एण्ड क्राफ्ट की स्थापना का परिणाम — भित्ति चित्रों में फ्रेस्को का प्रयोग (स्थानीय भाषा में आला-गीला, अरायश या मोराकसी)।
जयपुर चित्रशैली — ढूंढाड़ स्कूल का शिखर
- सवाई जयसिंह प्रथम के समय शैली का प्रारम्भ हुआ, जिन्होंने "छत्तीस कारखानों" की स्थापना की, जिसमें "सूरतखाना" (चित्रकारी हेतु) भी एक था। मोहम्मद शाह (सवाई जयसिंह द्वितीय के दरबारी चित्रकार) ने "रज्मनामा" ग्रंथ चित्रित करके सवाई जयसिंह द्वितीय को भेंट किया।
- रागमाला (1785-90) — संपूर्ण सेट जिसमें 34 चित्र उपलब्ध हैं (छत्तीस राग-रागिनियों पर आधारित)। सवाई ईश्वरी सिंह के समय सूरतखाना आमेर से जयपुर लाया गया — साहबराम ने ईश्वरी सिंह का आदमकद चित्र (राजस्थान में इस शैली का प्रथम) बनाया।
- सवाई प्रताप सिंह का काल जयपुर चित्रशैली का स्वर्णकाल रहा — राधाकृष्ण लीला, नायिका भेद, राग-रागिनी, बारहमासा का चित्रण हुआ। इनके काल में "गंधर्व बाईसी" (22 चित्रकार, 22 कवि, 22 संगीतकार, 22 विद्वानों की मंडली) संगठित थी। प्रताप सिंह ने हवामहल में "सूरतखाना" चित्रकला विभाग बनाया, जिसमें 50 से अधिक कलाकार कार्य करते थे।
- जयपुर चित्रशैली की विशेषता: हाशिये में गहरा लाल रंग, सोना-चाँदी का भी प्रयोग। चित्र विषय — वात्स्यायन कृत कामसूत्र, फकीरों को भिक्षा देती नारी, कुरान पढ़ती शहज़ादी, हाथी-घोड़ों के दंगल, लैला-मजनूं। मुगल प्रभाव व व्यक्तियों के यथार्थवादी-सटीक चित्रण के कारण इसे "शबीह शैली" (प्रतिरूप/समानता) भी कहा जाता है।
- प्रमुख चित्रकार: छोटेलाल (परदाज़/स्टिपलिंग में दक्ष), जमनालाल, सालिगराम, बकसाराम, नंदराम, बलदेव, रामसेवक, गोपाल, चिमना, हुकमा, लाल चित्तेरा।
अलवर चित्रशैली एवं उणियारा चित्रशैली
- अलवर शैली का प्रारंभ (1775 ई.) राव राजा प्रतापसिंह के काल में हुआ — चित्रकार शिवकुमार व डालूराम को जयपुर से अलवर लाया गया। राव बख्तावरसिंह के समय राजगढ़ के महलों में "शीशमहल" का चित्रण हुआ।
- महाराजा विनयसिंह का काल अलवर चित्रशैली का स्वर्णकाल था — इन्होंने "गुलिस्तां" (सूफी संत शेख सादी की पुस्तक) के संस्करण का चित्रांकन कराया। महाराजा शिवदानसिंह के काल में "कामशास्त्र" आधारित चित्रण व वैश्याओं के चित्र सर्वाधिक बने। हाथी-दाँत पर चित्रकारी इस शैली की विशिष्टता रही, तथा प्रधान रंग कत्थई, नीले व गुलाबी थे।
- उणियारा चित्रशैली — जयपुर रियासत का ठिकाना (वर्तमान में टोंक जिले में); नरूका ठिकाने (रावराजा सरदार सिंह) द्वारा विकसित; जयपुर व बूंदी शैली का मिश्रण। पशुओं व पक्षियों का चित्रण होने के कारण इसे "पक्षी शैली" भी कहा जाता है (चिंघाड़ते हाथी, सर्प, सारस, कबूतर, दौड़ते सिंह, नाचते मोर)। प्रमुख चित्रकार: काशीराम, राम-लखन, मीरबक्श, धीमा।
शेखावाटी चित्रकला — "खुली आर्ट गैलरी"
- यह कला स्थानीय साहूकारों, सेठों तथा जागीरदारों द्वारा हवेलियों पर चित्रण करवाकर विकसित की गई। भित्ति-चित्रण (फ्रेस्को) के लिए विशेष प्रसिद्ध (जयपुर शैली का प्रभाव), इसीलिए इसे "ओपन आर्ट गैलरी" भी कहते हैं।
- नवलगढ़, लक्ष्मणगढ़, मुकुन्दगढ़, रामगढ़, पिलानी, बिसाऊ, मण्डावा आदि भित्ति-चित्रण (फ्रेस्को) के लिए विशेष प्रसिद्ध हैं।
- विशेषता: भित्ति चित्रों के नीचे तिथि व नाम अंकित; 19वीं सदी के संक्रमण-काल के बदलते परिवेश, परिवहन साधन (रेलगाड़ी, मोटरकार जैसे नए यूरोपीय विषय अंग्रेजों के प्रभाव से), सामान्य जनजीवन का चित्रण, बड़े-बड़े हाथी-घोड़े। राग-रागिनी, कामकला, गौ-दोहन, मल्लयुद्ध, साधु-संत व लोककथाओं का विशेष अंकन (छज्जों के नीचे तोड़ों के मध्य)।
7हाड़ौती चित्रकला शैली (बूंदी, कोटा, झालावाड़)
हाड़ौती स्कूल में बूंदी शैली की शुरुआत राव सुरजन के समय हुई। राव शत्रुशाल (छत्रशाल) के काल में चित्रशैली का व्यापक विकास हुआ, तथा "रंगमहल" सुंदर भित्ति चित्रों के लिए विश्व-प्रसिद्ध है। इस शैली का स्वर्णकाल राव उम्मेदसिंह के काल में आया, जिनके नाम पर "रणशाला/चित्रशाला महल" प्रसिद्ध है — इसे "भित्ति चित्रों का स्वर्ग" कहा जाता है, और यहाँ बूंदी शैली के सर्वाधिक चित्र मिलते हैं। राव उम्मेदसिंह का प्रसिद्ध चित्र "जंगली सुअर का शिकार" है।
- विशेषताएँ: ईरानी + मुगल + जयपुर की चित्रकला का समन्वय। पुरुष: आम आकृति का मुख; महिलाएँ: ठिगने कद, उठी हुई वेणियाँ। सुंदर बेल-बूंटों वाली वस्लियों (चित्र-फलकों) का निर्माण, योगासन चित्रण व लघु-चित्रण — चित्रों में "बॉर्डर" को विशेष महत्त्व दिया जाता है, जिस कारण इसे "बैसलो शैली" (1750 ई.) कहते हैं।
- प्रमुख विषय: पशुओं व पक्षियों का चित्रण — इसे "पक्षी शैली" भी कहते हैं (चिंघाड़ते हाथी, सर्प, सारस, कबूतर, दौड़ते सिंह, नाचते मोर, हाथियों की लड़ाई)। नाचते हुए मोर का चित्रण केवल बूंदी शैली में हुआ है — यह एक विशिष्ट परीक्षा-योग्य तथ्य है।
- प्राकृतिक दृश्य: उमड़ते काले बादल, घनघोर वर्षा, बिजली की चमक, हरे-भरे वृक्ष, नाचते मयूर, हिंडोलों के चित्रण, इन्द्रधनुष। वृक्ष: खजूर। इतिहासकार खंडालावाला ने बूंदी शैली पर अध्ययन कर "बूंदी ग्रंथावली" नामक ग्रंथ लिखा।
- प्रमुख चित्रकार: सुजान, श्रीकिशन, नूर मोहम्मद, रामलाल, साधुराम, अहमद अली, रतनसिंह, लच्छीराम।
कोटा चित्रशैली — "शिकार शैली"
- बूंदी एवं मुगल शैली का मिश्रण; शुरुआत महाराव रामसिंह प्रथम (1661-1705 ई.) के काल में हुई; इसे प्रकाश में लाने का श्रेय कर्नल डी.जी. गैयर एंडरसन (1952) को जाता है।
- शैली का स्वर्णकाल महाराव उम्मेदसिंह-I व महाराव भीमसिंह के समय आया। वल्लभ सम्प्रदाय के प्रभाव से कृष्ण-लीलाओं का भी चित्रण हुआ। चित्रकार डालू ने "रागमाला" (1768) नामक ग्रंथ का चित्रण किया, जिसमें अधिकांश चित्र शिकार पर आधारित हैं — भगवान कृष्ण की लीला व राजा की शबीह (व्यक्ति-चित्र) भी शामिल हैं। "झालाओं की हवेली" में कोटा शैली के सर्वाधिक भित्ति चित्र मिलते हैं।
- विशेषताएँ: सर्वाधिक चित्र शिकार पर, राजाओं के साथ रानियों को भी शिकार करते हुए दर्शाया गया है — नारी सौंदर्य का विशेष चित्रण। रंग: हल्का हरा, पीला व नीला। स्त्रियाँ: छोटी नाक, पतली कमर, बड़ी आँखें, बड़ा ललाट, ऊँचे लहंगे। पुरुष: मांसल शरीर, भरी दाढ़ी-मूँछें, तलवार-कटार युक्त वेशभूषा, चौड़े कंधे।
- प्रमुख चित्रकार: डालू, लच्छीराम, रामजीराम, गोविन्दराम, नूर मोहम्मद, रघुनाथ। आधुनिक कोटा चित्रकार: कैलाशचंद्र जैन (ज्योतिस्वरूप श्रृंखला), प्रतिभा पाण्डे, जगमोहन माथोड़िया, किशनलाल शर्मा (राईंस का चित्रकार), प्रदीप मुखर्जी (फड़ चित्रण के चित्रेता), शिल्पगुरु बाबूलाल (मिनिएचर पेंटिंग), एस. शाकिर अली (मुगल शैली)।
- झालावाड़ उपशैली — झालावाड़ के राजमहलों में श्रीनाथजी, राधाकृष्ण लीला, रामलीला व राजसी वैभव के भित्ति चित्र मिलते हैं, जिनके आधार पर स्वतंत्र झालावाड़ शैली का निर्धारण अभी भी शोध का विषय है। "दुगारी चित्र शैली" का संबंध बूंदी चित्रकला शैली से माना जाता है।
8चारों शैलियों की तुलनात्मक विशेषताएँ (नौ प्रमुख उप-शैलियाँ)
राजस्थान की प्रमुख चित्रशैलियों की पहचान परीक्षा में अक्सर रंग-योजना, आँखों की बनावट, प्रिय वृक्ष तथा पशु-पक्षी के आधार पर पूछी जाती है। नीचे दी गई तालिका इन सूक्ष्म अंतरों को स्पष्ट करती है — यह इस अध्याय की सर्वाधिक परीक्षा-उपयोगी तालिकाओं में एक है।
| शैली | प्रमुख रंग | आँखें | वृक्ष | पशु-पक्षी |
|---|
| मेवाड़ | लाल व पीला | मृग के समान | कदम्ब | हाथी, चकोर |
| जोधपुर (मारवाड़) | पीला | बादाम के समान | आम | ऊँट, कौआ व चील |
| बीकानेर | पीला | तीर-कमान के समान | आम | ऊँट, कौआ व चील |
| जयपुर + अलवर | हरा | मछली के समान | पीपल / बरगद | अश्व, मोर |
| कोटा | नीला | आम के समान | खजूर | हिरण, शेर, बतख |
| बूंदी | सुनहरा | आम के समान | खजूर | हिरण, शेर, बतख |
| किशनगढ़ | श्वेत/गुलाबी | खंजर के तीर-कमान के समान | केला | गाय, मोर, हंस, बतख |
| नाथद्वारा | हरा व पीला | हिरण व गाय के समान | केला | गाय, मोर |
9लोक चित्रकला परंपराएँ — फड़, पिछवाई, मांडना, सांझी
फड़ चित्रण — भोपों की "चलती-फिरती कथा-पताका"
फड़ चित्रण में लोक देवताओं की ऐतिहासिक, धार्मिक व पौराणिक जीवन-गाथाओं को कपड़े पर चित्रित स्वरूप में उकेरा जाता है। विधि: मोटे कपड़े (खादी या रेजी) पर गेहूँ या चावल के माँड़ में गोंद मिलाकर लेप किया जाता है, फिर उसे घोंटकर चिकना किया जाता है। फड़ का उद्गम मेवाड़ चित्रशैली से माना जाता है, और इसका मुख्य केंद्र शाहपुरा (भीलवाड़ा) है, जहाँ जोशी परिवार पीढ़ियों से इस कला में संलग्न है। फड़ को कथावाचक भोपा-भोपी साथ लेकर रात्रिकालीन "फड़ बांचना" (कथा-वाचन) करते हैं।
- मुख्य कलाकार: श्रीलाल जोशी (2006, पद्मश्री) व पांचोजी जोशी (सर्वप्रथम चित्रण-कार्य)। वर्तमान कलाकार: दुर्गेश जोशी, शांतिलाल जोशी, विजय जोशी, पार्वती जोशी (फड़-चित्रेता महिला), गौतली देवी, प्रदीप मुखर्जी।
- विशेषताएँ: लंबाई लगभग 30 फीट व चौड़ाई 5 फीट; सात रंग — नारंगी, लाल, पीला, काला, नीला, हरा, भूरा। रंगों का प्रतीकात्मक प्रयोग — देवियाँ नीले, देवता लाल, राक्षस काले तथा ऋषि श्वेत/पीले रंग में चित्रित होते हैं। चित्र-संयोजन में मुख्य आकृति को सबसे बड़ा बनाकर प्रधानता दी जाती है।
- चातुर्मास (श्रावण से कार्तिक) में फड़ चित्रण नहीं होता, क्योंकि माना जाता है देवता इस दौरान सो जाते हैं — देवउठनी ग्यारस (कार्तिक शुक्ल एकादशी) से पुनः कार्य आरंभ होता है। "फड़ ठंडी करना" — फड़ के फट जाने/जीर्ण-शीर्ण होने पर उसे पुष्कर सरोवर में विसर्जित किया जाता है, जिस अवसर पर भोपा समाज "सवामणी" का आयोजन करता है।
| फड़ | वाचन करने वाली जाति / वाद्ययंत्र | विशेषता |
|---|
| रामदेवजी की फड़ | कामड़ जाति के भोपा — रावणहत्था वाद्ययंत्र के साथ | सर्वप्रथम चित्रांकन चौथमल चितेरे द्वारा |
| पाबूजी की फड़ | थोरी/नायक जाति के भोपा — रावणहत्था वाद्ययंत्र के साथ, रात्रिकालीन वाचन | पाबूजी की घोड़ी "केसर कालमी" को काले रंग से चित्रित; युद्ध-दृश्य; भाला मुख के सामने |
| देवनारायणजी की फड़ | गुर्जर जाति के भोपा — "जंतर" वाद्ययंत्र के साथ | सर्वाधिक चित्रांकन वाली, सबसे पुरानी व सबसे लंबी फड़ (24 हाथ); मौखिक साहित्य-गायन-नाट्य-चित्रकला का समिश्रण; डाक टिकट 2 सितंबर 1992; घोड़ी "लीलागर" हरे रंग से चित्रित |
| भैंसासुर की फड़ | बागरी/बावरी जाति द्वारा चोरी के समय शकुन हेतु पूजी जाती है | इस फड़ का वाचन नहीं होता, केवल दर्शन किए जाते हैं |
| रामदला-कृष्णदला की फड़ | हाड़ौती क्षेत्र के भाट जाति के भोपा — दिन में, बिना वाद्ययंत्र के | राम व कृष्ण भगवान के प्रसंगों पर आधारित |
| गोगाजी की फड़ | डेरू वाद्ययंत्र के साथ वाचन | धूलजी चितेरे द्वारा सर्वप्रथम चित्रांकन |
💡 रोचक तथ्य — फड़ पर अमिताभ बच्चन!
सामान्यतः फड़ में लोक देवताओं की गाथा चित्रित होती है, परंतु चित्रकार रामलाल व पतासी देवी ने प्रयोगात्मक रूप से अभिनेता अमिताभ बच्चन की फड़ का भी निर्माण किया — यह दर्शाता है कि फड़ चित्रण अब पारंपरिक धार्मिक विषयों से आगे बढ़कर समकालीन विषयों को भी अपना रहा है। देवनारायणजी की फड़ (श्रीलाल जोशी द्वारा निर्मित) आज जर्मनी के एक संग्रहालय में सुरक्षित रखी गई है, जो फड़ कला की अंतरराष्ट्रीय पहचान का प्रमाण है।
पिछवाई, मांडना एवं सांझी
- पिछवाई: कृष्ण मंदिरों में प्रतिमा के पीछे लगने वाले कपड़ों पर कृष्ण-लीलाओं का चित्रण। नाथद्वारा की पिछवाइयाँ सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं (श्रीकृष्ण-लीला, बाल-गोपाल, यशोदा, गोपियों का चित्रांकन) — इन्हें 2023 में GI Tag प्राप्त हुआ।
- मांडना: घर की देहरी, आँगन, चौक व पूजन-स्थलों को सजाने हेतु महिलाओं द्वारा गेरू व खड़िया मिट्टी से बनाए जाने वाले अलंकरण। विषय — विवाह पर गणेश-लक्ष्मी के चरण-चिह्न व स्वस्तिक, मोर-मोरनी, फूलदान; तीर्थयात्रा से लौटने पर "पैड़ी" व "पथवारी"; बच्चे के जन्म पर "साढ़ा/सातिये मांडणा"। आकृतियाँ त्रिभुज, वर्ग, षट्भुज, अष्टभुज व वृत्त जैसी ज्यामितीय होती हैं — इनकी इकाइयों को बेलभरत, फुलड़ी, झंबरा आदि नामों से जाना जाता है।
- सांझी: भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या (श्राद्ध पक्ष) तक कुँवारी कन्याओं द्वारा गोबर से निर्मित पूजास्थल, माता पार्वती के रूप में बनाया जाता है — उद्देश्य सुयोग्य वर की कामना है। प्रसिद्ध सांझी स्थल: उदयपुर का मत्स्येन्द्रनाथ मंदिर (जिसे "संझ्या मंदिर" भी कहते हैं), नाथद्वारा के श्रीनाथजी मंदिर की "केले की सांझी" (कदली पत्तों की सांझी, पूरे देश में प्रसिद्ध), तथा जयपुर के लाडलीजी मंदिर की सांझी।
10अन्य लोक-चित्रण रूप — गोदना, मेहंदी, थापा, भराड़ी आदि
| कला रूप | माध्यम / तकनीक | अवसर / उद्देश्य |
|---|
| गोदना | तीखे औजार से त्वचा खोदकर काला रंग भरना — स्थायी निशान | जनजातीय समाज में प्रचलित; आकृतियाँ — त्रिशूल, ओम, स्वस्तिक, राम-लक्ष्मण, सूर्य-चंद्र-फूल; अंधविश्वास — अनगुदा शरीर असुरक्षित माना जाता है; कार्य नट जाति द्वारा |
| मेहंदी | हाथ-पैरों पर लगाया जाने वाला हरा रंग | विवाह व शुभ अवसरों पर; हरा रंग समृद्धि व लाल रंग प्रेम का प्रतीक; सोजत (पाली) प्रसिद्ध केंद्र — GI Tag सितंबर 2021; गलुंड-रेलमगरा (राजसमंद) की मेहंदी भी प्रसिद्ध |
| थापा | हाथ व अंगुलियों के छापों से बना लोक-चित्रण | ग्रामीण क्षेत्रों में शुभ अवसरों पर परंपरागत रंगों के मिश्रण से हाथों द्वारा छापे गए चित्र; देवी-देवताओं के प्रतीक स्वरूप बनाए जाते हैं |
| ओका-नाका | गोबर से निर्मित कलाकृति | चेचक निकलने पर गुणा (देवी) पूजी जाती है |
| भराड़ी | चावल के विविध रंगी घोल से दीवार पर चित्रण | भील जनजाति में विवाह अवसर पर जमाई द्वारा भराड़ी माता का चित्र बनाया जाता है |
| गोड़लिया | लोहे की गर्म छड़/मिट्टी की ढकनी से पशुओं को दागना | उद्देश्य — पशुओं की पहचान व चुराए गए पशुओं की शिनाख्त |
| पगल्या | देहरी पर लकड़ी की कलाकृति (चिड़ा/तोता युक्त) | विवाह के समय वधू के घर के मुख्य प्रवेश द्वार पर बाँधी जाती है |
| तोरण | द्वार पर बाँधी जाने वाली सजावटी झालर | शक्ति का प्रतीक; शुभ अवसरों पर द्वार-सज्जा हेतु |
| वील | बाँस की खपच्चियों पर मिट्टी का लेप — विभिन्न खानों वाला पात्र | अनाज-फसल संग्रहण हेतु — पश्चिमी राजस्थान (विशेषतः जैसलमेर) में प्रचलित |
| बटेवड़े/थापड़ा | गोबर से बनी आकृतियाँ (उपलों को सुरक्षित रखने हेतु) | साज-सज्जा व घरेलू ईंधन-संग्रहण उपयोग |
11राजस्थान का हस्तशिल्प — परिचय एवं आर्थिक महत्त्व
राजस्थान ऐतिहासिक रूप से हस्तशिल्प कलाओं के विकास में अत्यंत समृद्ध रहा है। इसका प्राचीन प्रमाण तीसरी शताब्दी ई.पू. के आहत सिक्कों (नगर से प्राप्त) तथा विराटनगर के बौद्ध चैत्य में उपयोग किए गए 26 काष्ठ-स्तंभों से मिलता है। वर्तमान में राजस्थानी बांधनी, कुंदन-मीनाकारी आभूषण, हैंड ब्लॉक प्रिंटिंग वस्त्र, कीमती हीरे-जवाहरात व जड़ाऊ आभूषण, तथा ब्लू पॉटरी हस्तकला के क्षेत्र में विश्व-प्रसिद्ध हैं। इन्हीं कलाओं की गुणवत्ता व मौलिकता को कानूनी संरक्षण देने के लिए भारत सरकार द्वारा GI Tag (भौगोलिक संकेतक) प्रदान किए जाते हैं — राजस्थान अब तक 23 से अधिक GI Tag प्राप्त कर चुका है (जनवरी 2026 तक), जो इसे हस्तशिल्प वैविध्य में देश के अग्रणी राज्यों में स्थान देता है।
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12वस्त्र हस्तशिल्प — बंधेज, लहरिया, सांगानेरी-बगरू प्रिंट, कोटा डोरिया
दाबू प्रिंट एवं छपाई तकनीकें
रंगाई-छपाई के दौरान जिस स्थान पर कपड़े में रंग नहीं चढ़ाना हो, उसे "लुई या लुगदी" से दबा दिया जाता है, और इसी लुई/लुगदी को "दाबू" कहा जाता है। दाबू प्रिंट का प्रयोग बेडशीट, चूँदड़ी व साड़ियों पर होता है, और इसकी रंगाई-छपाई मुम्बई के सफेद लट्ठे पर की जाती है। दाबू के कई प्रकार प्रचलित हैं — मोम का दाबू (सवाई माधोपुर), गेहूँ के बंधण का दाबू (सांगानेर, बगरू), मिट्टी का दाबू (बालोतरा), करियाना पद्धति दाबू (बालोतरा), ग्वार+मिट्टी का दाबू (आकोला, चित्तौड़गढ़), चूना+गोंद का दाबू (भीलवाड़ा), तथा मेण का दाबू (उदयपुर)।
सांगानेरी हैंड ब्लॉक प्रिंट बनाम बगरू हैंड ब्लॉक प्रिंट
सांगानेरी प्रिंट का प्रसिद्ध केंद्र छिपों का आकोला गाँव (चित्तौड़गढ़) व सांगानेर (जयपुर) है, जिसे 2010 में GI Tag प्राप्त हुआ — प्रसिद्ध कलाकार मुन्नालाल गोयल व अवधेश कुमार पाण्डे हैं। बगरू प्रिंट (2012 में GI Tag प्राप्त) में दाबू तकनीक की प्रधानता है — दोनों की तुलना छात्रों के लिए एक क्लासिक परीक्षा-प्रश्न है।
सांगानेरी प्रिंट
- निर्माण लकड़ी के छापों द्वारा (दाबू का प्रयोग नहीं)
- कपड़े का आधार रंग सफेद होता है
- प्राकृतिक रंगों का प्रयोग आवश्यक नहीं
- GI Tag — 2010
- तुर्की शैली का अधिक प्रभाव; नीले-लाल रंगों की प्रधानता
बगरू प्रिंट
- निर्माण में दाबू तकनीक का अनिवार्य प्रयोग
- कपड़े का आधार रंग नीला/काला/मटमैला होता है
- प्राकृतिक रंगों का प्रयोग आवश्यक (अनिवार्य)
- GI Tag — 2012
- नामदेव छीपा कारीगरों (तुक्या छीपा — मुस्लिम छीपा कारीगर) द्वारा निर्मित
- अन्य प्रिंट केंद्र: टुकड़ी छपाई (जालोर, मारोठ-नागौर); तिरंगा प्रिंट (आलूदा-दौसा, लाडनूं-नागौर); मलीर प्रिंट (बालोतरा — काले व कत्थई रंग की प्रधानता, कलाकार मो. यासीन); अजरक प्रिंट (तुर्की शैली प्रभाव, नीले-लाल रंग); रूपहली/सुनहरी छपाई (किशनगढ़, चित्तौड़गढ़); चूनरी-मोतियों की छपाई (आहड़, भीलवाड़ा)।
बंधेज (बांधनी) — "Tie & Dye" की कला
- कपड़े को बाँधकर रंगना ही बंधेज कहलाता है; अन्य नाम — मोठड़ा, दानेदार बंधाई, Tie & Dye। बंधेज (जयपुर) को 2012 में GI Tag मिला; अलग से जोधपुरी बंधेज कला को 2023 में स्वतंत्र GI Tag प्राप्त हुआ। बंधेज करने वाले व्यक्ति को "बंधारा, चढ़ावा व रंगरेज" कहा जाता है।
- सीकर के फूल भाटी व बाघ भाटी को बंधेज कला की नींव रखने का श्रेय जाता है। प्रमुख वस्त्र: घाघरा, चूँदड़ी (ओढ़नी), साफे, पगड़ी। घटचोला साड़ी बंधेज कार्य की प्रसिद्ध साड़ी है। रेटा — सिंधी मुसलमान स्त्रियों द्वारा पहनी जाने वाली गहरे लाल/काले रंग की सफेद टिपणी वाली चूनरी है, जिसे भी 2023 में GI Tag मिला।
- प्रमुख कलाकार: रंगरेज मो. तैय्यब खान (जोधपुर), मुबारक छीपा व खाजू छीपा (सुजानगढ़, चूरू), मो. यासीन। बाटिक (कपड़े पर मोम की परत चढ़ाकर चित्रण) के प्रमुख कलाकार: उमेशचंद्र शर्मा (खंडेला), आर.बी. रायजादा, अब्दुल मजीद।
लहरिया, पोमचा, चूनड़ी एवं कोटा डोरिया
- लहरिया: एक, दो, तीन, पाँच व सात रंगों में बनाया जाता है। लहरिया में आड़ी धारियाँ केवल एक ओर से होती हैं, जबकि मोठड़ा में धारियाँ दोनों ओर से एक-दूसरे को काटती हैं। "राजशाही लहरिया" व "समुद्र लहर" प्रसिद्ध प्रकार हैं (जयपुर)। प्रमुख केंद्र: जयपुर (लहरिया व पोमचा), बीकानेर (लहरिया व मोठड़ा दोनों)।
- पोमचा: बच्चे के जन्म पर नवजात शिशु की माँ के लिए मातृपक्ष द्वारा भेजा जाने वाला ओढ़ने का वस्त्र। दो प्रकार — लाल-पीला पोमचा (बेटे के जन्म पर) व लाल-गुलाबी पोमचा (बेटी के जन्म पर); चीड़ का पोमचा (काले रंग का, विधवा स्त्री द्वारा, हाड़ौती में)।
- चूनड़ी: जोधपुरी व शेखावाटी (बारीक बंधेज की) चूनड़ी प्रसिद्ध है। मामा चूनड़ी — भांजी को मामा की ओर से विवाह अवसर पर भेजी जाती है; बड़ूली चूनड़ी — वधू को वर पक्ष की ओर से भेजी जाती है। प्रकार: सुआ, बेल, मोठड़ा, चौखाना, धनक।
- पीळा: पीले रंग की ओढ़नी, जिसके पल्लों पर डब्बीदार/दानेदार बंधाई होती है व बीच में लाल रंग का बड़ा वृत्त होता है (स्थानीय भाषा में लड्डू/पीळा व सेवरा) — नामकरण अवसर पर जापे वाली स्त्री द्वारा पीहर पक्ष से प्राप्त पीली ओढ़नी पहनी जाती है।
- कोटा डोरिया (मसूरिया साड़ी): 1761 ई. में कोटा के दीवान झाला ज़ालिमसिंह ने मैसूर के बुनकर अहमद मसूरिया को कोटा बुलवाया और हथकरघा उद्योग स्थापित कर साड़ी बुनना शुरू करवाया — इसी नाम पर इसे "मसूरिया साड़ी" कहा गया। दो प्रकार — डोरिया (सूती-सादी, डोरा कोटा से मंगाया जाता) व मसूरिया (बारीक रेशम, चौकड़ी मसूर दाल के दाने के बराबर)। कैथून (कोटा) व मांगरोल (बारां) प्रमुख बुनकर केंद्र हैं। यह GI Tag प्राप्त करने वाली राजस्थान की पहली हस्तकला है (2006), तथा इसके लोगो को भी GI Tag मिला (2011)।
- अन्य वस्त्र हस्तकला: दरी (टांकला-नागौर, सालावास-जोधपुर, लवाण-दौसा; जेल की दरियाँ जयपुर-बीकानेर की जेलों के कैदियों द्वारा बुनी जाती हैं); गलीचा-कालीन (मूलतः ईरान से भारत आई कला, जयपुर में महाराजा मानसिंह प्रथम के समय प्रारंभ; बीकानेर के वियना/फारसी गलीचे प्रसिद्ध; धौलपुर की कांता देवी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त की); नमदा (ऊनी गलीचा/चटाई, प्रसिद्ध केंद्र टोंक व बीकानेर); शॉल-पटु-लोइयाँ (जैसलमेर की हीरावल शॉल, जसोल गाँव-बाड़मेर की जट पट्टी, नापासर-बीकानेर की लोई)।
13आभूषण एवं धातु हस्तशिल्प — मीनाकारी, थेवा कला, कोफ्तगिरी, उस्ता कला
मीनाकारी — जयपुर की विश्वप्रसिद्ध कला
मीनाकारी अर्थात सोने-चाँदी पर की गई नक्काशी में रंगीन काँच के पाउडर की सहायता से भरकर किया गया रंग-बिरंगा काम। यह कला कच्छवाहा शासक राजा मानसिंह प्रथम द्वारा लाहौर से जयपुर लाई गई थी, तथा लाहौर में यह कला मुगलों द्वारा फारस से लाई गई थी। मुख्य रंग लाल व हरा हैं। प्रमुख कलाकार: कुदरतसिंह (1988, पद्मश्री), मुन्नालाल, दुर्गासिंह, काशीनाथ, कैलाशचंद्र — तथा पंजाब से जयपुर आकर बसने वाले कलाकार हरिसिंह, अमरसिंह, किशनसिंह, गोभासिंह, श्यामसिंह, घीसासिंह।
| सतह | मीनाकारी का केंद्र |
|---|
| सोने पर मीनाकारी | प्रतापगढ़ |
| चाँदी पर मीनाकारी | नाथद्वारा |
| ताँबा पर मीनाकारी | भीलवाड़ा |
| पीतल पर मीनाकारी | जयपुर व अलवर |
| ज़िंक पर मीनाकारी | जोधपुर |
| कागज पर मीनाकारी | अलवर |
| लाख पर मीनाकारी | बीकानेर |
| चंदन पर मीनाकारी | चूरू |
| काँच पर मीनाकारी | रेतवाल (कोटा) |
| मार्बल पर मीनाकारी | जयपुर |
थेवा कला — प्रतापगढ़ की सोनी परिवार की गुप्त कला
- थेवा कला अर्थात काँच पर सोने का सूक्ष्म चित्रांकन। प्रारंभ नाथूजी सोनी द्वारा (1707 ई.), राजा सावंतसिंह द्वारा प्रोत्साहन (1765 ई.) — नाथूजी को "राजसोनी" की उपाधि व जागीर प्रदान की गई। प्रारंभ में हीरे-पन्नों पर, वर्तमान में रंगीन बेल्जियम काँच का प्रयोग होता है (काँच का रंग — लाल, नीला या हरा)।
- विशिष्टता: यह कला केवल प्रतापगढ़ के सोनी परिवार के पुरुषों द्वारा बंद कमरे में की जाती है — यह परिवार इस कला को इतना गोपनीय रखता है कि परिवार की बेटियों को भी यह कला नहीं सिखाई जाती। GI Tag — नवंबर 2014; नवंबर 2002 में डाक टिकट भी जारी हुआ।
- राजस्थान की एकमात्र ऐसी कला, जिसका नाम एनसाइक्लोपीडिया ऑफ ब्रिटैनिका में दर्ज है — यह दावा अनेक लोकप्रिय स्रोतों व सरकारी दस्तावेज़ों में दोहराया जाता है। जस्टिन विक द्वारा इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रियता मिली। प्रमुख कलाकार: जगदीश सोनी, गिरीश कुमार सोनी, महेशराज सोनी (2015, पद्मश्री), रामप्रसाद सोनी, बेनीराम सोनी, रामविलास सोनी।
कोफ्तगिरी, उस्ता कला, तारकशी एवं अन्य धातु-शिल्प
📍 ⚔️ कोफ्तगिरी (उदयपुर (मुख्यतः मेवाड़ के सिकलीगर), चित्तौड़गढ़, अलवर, जयपुर)
⏰ काल/निर्माता: मुगलकालीन शस्त्र-अलंकरण परंपरा से विकसित
⭐ विशेषता: लोहे पर सोने या चाँदी की सूक्ष्म कशीदाकारी, मुख्यतः हथियारों (तलवार, ढाल, खंजर) के अलंकरण हेतु; कलाकार को "कोफ्तगार" कहते हैं; GI Tag — 2023
📍 🐫 उस्ता कला (बीकानेर)
⏰ काल/निर्माता: महाराजा रायसिंह के काल में मुगल दरबार से उस्ता अली रज़ा व हामिद रुकनुद्दीन के आने से प्रारंभ
⭐ विशेषता: ऊँट की खाल एवं कूम्पा (नारियल के खोल) पर सोने की नक्काशी व मीनाकारी; प्रमुख कलाकार अलीरज़ा, रुकनुद्दीन, हसामुद्दीन उस्ता (पद्मश्री), नाथू उमरानी, क़ासम उमरानी; GI Tag — 2023; गणतंत्र दिवस 2026 की झांकी में प्रदर्शित
- बीकानेरी कशीदाकारी — GI Tag 2023; पश्चिमी राजस्थान में कशीदाकारी को "भरत" कहते हैं (मोची भरत - बाड़मेर, मोती भरत - जालौर)। हुरमजी/कच्छी भरत — सिंध सीमावर्ती क्षेत्र में प्रचलित, मिरर-वर्क का प्रयोग; बाड़मेर की रमाबाई को इसके लिए राज्यस्तरीय पुरस्कार मिला।
- तारकशी — चाँदी के पतले तारों द्वारा आभूषण बनाने की कला; प्रमुख केंद्र नाथद्वारा व जयपुर।
- कलई गिरी — ताँबा-पीतल के बर्तनों पर चमक लाने व ऑक्सीडाइज़ेशन रोकने की प्रक्रिया; कारीगर को "कलईगर" कहा जाता है।
- बादले/बरक — सोने-चाँदी को अत्यंत पतली झिल्ली-सी बनाकर "पत्तर" बनाना; बनाने वाले को "बरकसाज" कहते हैं; प्रमुख केंद्र जोधपुर। तबक/वर्क — चाँदी के तार को हिरण की खाल के मध्य रखकर पीटने से बनने वाला बारीक पत्तर।
- मुरादाबादी काम — जयपुर में पीतल के बर्तनों पर खुदाई करके की जाने वाली नक्काशी; कलाकार — नूर मोहम्मद, गफूर खान, रज़्ज़ाक़ कुरैशी। जड़ाई — सोने-चाँदी के आभूषणों में नग/नगीना लगाने की क्रिया (जयपुर प्रसिद्ध); जड़िया — नगों की जड़ाई करने वाला कारीगर; पटवा — आभूषणों को डोर में पोकर पहनने योग्य बनाने वाला कारीगर; कुंदन कला — सोने-प्लेटिनम आभूषणों में रत्नों की जड़ाई।
- गोटा-किनारी — लप्पा (चौड़ा गोटा), लप्पी (कम चौड़ाई का), किरण, बांकड़ी, गोखरू, बिजिया (गोटे के फूल), मुकेश, नक्शी आदि प्रकार। जयपुर का "गुलाल गोटा" देशभर में प्रसिद्ध है; प्रमुख केंद्र जयपुर व सीकर (खंडेला)। जरदोज़ी — सुनहरे धागों से निर्मित कढ़ाई; कामदानी — बादले से छोटी-छोटी बिंदकों की कढ़ाई।
14मृण्य (मिट्टी) हस्तशिल्प — ब्लू पॉटरी, मोलेला, पोकरण पॉटरी
ब्लू पॉटरी — जयपुर की फारसी-तुर्की विरासत
ब्लू पॉटरी मूलतः चीन व फारस की कला है, जो मुगलकाल में भारत आई तथा राजस्थान में इसकी शुरुआत जयपुर में सवाई रामसिंह द्वितीय (1835-1880 ई.) के काल में हुई — जयपुर निवासी चूड़ामन व कालू कुम्हार ने यह कला दिल्ली के कलाकार भोला से सीखकर राजस्थान में प्रारंभ की। विधि: बर्तनों पर काँच, कथीरा, सागी, क्वार्ट्ज पाउडर और मुल्तानी मिट्टी का घोल चढ़ाया जाता है, फिर फूल-पत्तियों, देवी-देवताओं व अन्य दृश्यों के चित्र बनाए जाते हैं, और तैयार पॉटरी को लगभग 800°C तापमान पर पकाया जाता है।
- पात्र सामान्यतः सफेद रंग के होते हैं, अलंकरण की पृष्ठभूमि में नीला, आसमानी या पीला रंग दिया जाता है — नीले रंग के अतिरिक्त 25 अन्य रंगों का भी प्रयोग होता है। कृपाल सिंह शेखावत ने इस कला को देश-विदेश में पहचान दिलाई (1974, पद्मश्री) — उनकी शैली को "ब्लू पॉटरी की कृपाल शैली" कहा जाता है। GI Tag (शब्द) — 2009; GI Tag (लोगो) — 2017।
मोलेला मृण्य कला (टेराकोटा रिलीफ)
- राजसमंद जिले का मोलेला गाँव प्रसिद्ध; स्थानीय लोकदेवताओं (देवनारायणजी आदि) की मूर्तियाँ बनाई जाती हैं — साँचों का प्रयोग नहीं होता, हाथ व साधारण औज़ार से ही आकृति उभारी जाती है।
- विधि: बनास नदी की काली चिकनी मिट्टी में 25% गधे की लीद मिलाकर उसे ज़मीन पर थापा जाता है; एक सप्ताह सुखाने के बाद 800°C ताप पर पकाकर गेरू रंग से अलंकृत किया जाता है। मिट्टी अवला तालाब तथा सोलह की छापर (बनास नदी के निकट) से निकाली जाती है।
- प्रसिद्ध महिला कलाकार: स्वर्गीय नाथी बाई — जिन्हें कमलादेवी चट्टोपाध्याय व राजमाता गायत्री देवी द्वारा भी समर्थन मिला। वर्तमान कलाकार: त्रिलोकचंद, दुर्गालाल, गिरिराज, हनुमानसहाय, भगवानसहाय, भैरू खारवाड़, गगन बिहारी दाधीच ("मोलेला आर्ट का जादूगर"), खेमराज कुम्हार, मोहनलाल कुम्हार (पद्मश्री), राजेंद्र कुम्हार। GI Tag — मोलेला मृण्य शिल्पकला व इसका लोगो — 2009।
ब्लैक पॉटरी, पोकरण पॉटरी एवं अन्य मृद्भांड परंपराएँ
- ब्लैक पॉटरी — कोटा व सवाई माधोपुर; चीनी मिट्टी के बर्तनों पर काले रंग की चित्रकारी; राजस्थान की सबसे सस्ती पॉटरी मानी जाती है; उपयोग — कप, प्लेट, गमले, कूड़ेदान आदि बनाने में।
- पोकरण पॉटरी — परमाणु नगरी पोकरण (जैसलमेर) की स्थानीय टेराकोटा कला; विशेषता स्थानीय लाल मिट्टी है, जिससे बने बर्तनों को लकड़ी के "अवाड़ा" (परंपरागत भट्टी) में पकाया जाता है — पकने के बाद रंग हल्का गुलाबी हो जाता है। पकाने से पूर्व खड़िया, गेरू व काले रंग से पारंपरिक शैली में अलंकरण किया जाता है। GI Tag प्राप्त — 2018।
- कागज़ी पॉटरी — अलवर व जयपुर; बर्तनों पर अत्यंत महीन जालीदार काम, इनमें तरल पदार्थ नहीं रखे जा सकते। सुनहरी पॉटरी — बीकानेर की सुनहरी पॉटरी प्रसिद्ध है। लाख पॉटरी — बीकानेर। हरी पॉटरी — जोधपुर। हिंगाण — देवी-देवताओं की मिट्टी से बनी मूर्तियाँ।
- अन्य प्रसिद्ध केंद्र: हरजी (जालौर — मामाजी के घोड़े), बसवा (दौसा — कुंजा के लिए प्रसिद्ध मृद्भांड), बू-नरावता (मिट्टी के खिलौने, गुलदस्ते, गमले), मेहटोली (भरतपुर — मृत्तिका शिल्प), निम्बला गाँव (बाड़मेर — सेलडी से बनी मूर्तियाँ)।
15काष्ठ हस्तशिल्प — कठपुतली, कावड़
कठपुतली — कठपुतली कला का उद्भव-स्थल राजस्थान
कठपुतली का उद्भव-स्थल राजस्थान को माना जाता है। कठपुतली कला का जनक देवीलाल सामर को माना जाता है, जिन्होंने लोककला मंडल, उदयपुर के माध्यम से इस कला को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलाने का कार्य किया — इसके लिए उन्हें 1968 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
- कठपुतली की प्रमुख कहानियाँ: पृथ्वीराज-संयोगिता, राजा विक्रमादित्य की सिंहासन बत्तीसी, तथा अमरसिंह राठौड़ का खेल। अरडू की लकड़ियों से कठपुतलियाँ बनाई जाती हैं। प्रमुख केंद्र: उदयपुर, चित्तौड़गढ़ तथा जयपुर की त्रिपोलिया बाज़ार।
- मांगीलाल मिस्त्री, द्वारका व सत्यनारायण जैसे प्रमुख चित्रकार/कारीगर इस परंपरा से जुड़े रहे हैं। 2009 में इस कला (राजस्थान की कठपुतलियाँ) को GI Tag मिला, तथा 2017 में इसके लोगो को GI Tag प्राप्त हुआ।
कावड़ — "चलता-फिरता देवघर"
- कावड़ लकड़ी से निर्मित मंदिरनुमा काष्ठ कलाकृति है, जिसमें कई कपाट व द्वार होते हैं, जिन पर देवी-देवताओं के धार्मिक व पौराणिक कथाओं से संबंधित प्रसंग चित्रित होते हैं। कथावाचन के साथ-साथ कावड़ के द्वार खुलते जाते हैं, और अंतिम द्वार खुलने पर राम-लक्ष्मण व सीता माता की मूर्ति दिखाई देती है — इसीलिए इसे "चलता-फिरता देवघर" भी कहा जाता है।
- कावड़ को पूरा लाल रंग से रंगा जाता है, जिस पर काले रंग से धार्मिक-पौराणिक कथाओं को चित्रित किया जाता है — रोहिड़े व खिरणी की लकड़ी (उदयपुर) का प्रयोग होता है। निर्माण मुख्यतः खैरादी (बढ़ई) जाति के लोगों द्वारा — प्रमुख स्थल बस्सी (चित्तौड़गढ़) गाँव। जनदाता प्रभात सुथार को माना जाता है, तथा यह क्षेत्र पीपाड़ (जोधपुर), जैतारण व बाड़मेर तक फैला है।
- श्वेताम्बर जैन समुदाय द्वारा भी एक विशेष काष्ठ-पात्र (पातरे-तिरपणी) का उपयोग किया जाता है। अन्य काष्ठ हस्तशिल्प: बेवाण (ठाकुरजी की मूर्ति के श्रृंगार हेतु लकड़ी का सिंहासन, अनंत चतुर्दशी व देवझूलनी एकादशी पर झांकी निकाली जाती है), बाजोट (चतुष्कोणीय छोटी मेज, भोजन/पूजा हेतु), पलाणी (ऊँट पर बैठने/सामान लादने की काठी, शेखावाटी में "खटाल्या" कहते हैं), गोफण (गुलेल जैसी चमड़े की पट्टी, पक्षी भगाने हेतु), खाण्डा (होली पर बनाई जाने वाली तलवारनुमा काष्ठकृति), चौपड़े (शुभ अवसरों पर कुंकुम-चावल-अक्षत रखने का बहु-खण्डीय काष्ठ पात्र), तथा तोरण (खेजड़ी/बेर की लकड़ी से निर्मित, शक्ति का प्रतीक)।
16GI Tag प्राप्त राजस्थानी उत्पादों की सम्पूर्ण एवं नवीनतम सूची (जनवरी 2026 तक)
भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication) टैग किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र से जुड़े परंपरागत उत्पाद की मौलिकता व गुणवत्ता को कानूनी मान्यता देता है। राजस्थान को अब तक (जनवरी 2026 तक) 23 GI Tag प्राप्त हो चुके हैं — जिनमें हस्तशिल्प, चित्रकला व कृषि-खाद्य उत्पाद शामिल हैं। नीचे दी गई तालिका कालानुक्रम में पूर्ण एवं सत्यापित सूची प्रस्तुत करती है।
| क्रम | उत्पाद | जिला/क्षेत्र | श्रेणी | वर्ष |
|---|
| 1 | कोटा डोरिया (शब्द) | कोटा-बूंदी | हस्तशिल्प (वस्त्र) | 2006 |
| 2 | ब्लू पॉटरी (शब्द) | जयपुर | हस्तशिल्प (मृद्भांड) | 2009 |
| 3 | मोलेला मृण्य कला (शब्द+लोगो) | राजसमंद | हस्तशिल्प (मृद्भांड) | 2009 |
| 4 | राजस्थान की कठपुतली (शब्द) | उदयपुर/जयपुर | हस्तशिल्प (काष्ठ) | 2009 |
| 5 | बिकानेरी भुजिया | बीकानेर | खाद्य उत्पाद | 2010 (अधिसूचना 2021) |
| 6 | सांगानेरी हैंड ब्लॉक प्रिंट | जयपुर (सांगानेर) | हस्तशिल्प (वस्त्र मुद्रण) | 2010 |
| 7 | कोटा डोरिया (लोगो) | कोटा-बूंदी | हस्तशिल्प (वस्त्र) | 2011 |
| 8 | फुलकारी (त्रि-राज्य संयुक्त) | शेखावाटी सहित | हस्तशिल्प (कशीदाकारी) | 2010-11 |
| 9 | बंधेज (जयपुर) | जयपुर | हस्तशिल्प (वस्त्र रंगाई) | 2012 |
| 10 | बगरू हैंड ब्लॉक प्रिंट | जयपुर (बगरू) | हस्तशिल्प (वस्त्र मुद्रण) | 2012 |
| 11 | थेवा कला | प्रतापगढ़ | हस्तशिल्प (आभूषण) | 2014 |
| 12 | मकराना मार्बल | नागौर | खनिज हस्तशिल्प | 2015 |
| 13 | ब्लू पॉटरी (लोगो) | जयपुर | हस्तशिल्प (मृद्भांड) | 2017 |
| 14 | कठपुतली (लोगो) | उदयपुर/जयपुर | हस्तशिल्प (काष्ठ) | 2017 |
| 15 | पोकरण पॉटरी | जैसलमेर | हस्तशिल्प (मृद्भांड) | 2018 |
| 16 | सोजत मेहंदी | पाली | कृषि/हस्तशिल्प | सितंबर 2021 |
| 17 | नाथद्वारा पिछवाई चित्रकला | राजसमंद | चित्रकला | 2023 |
| 18 | उदयपुर कोफ्तगिरी | उदयपुर | हस्तशिल्प (धातु) | 2023 |
| 19 | बीकानेरी कशीदाकारी | बीकानेर | हस्तशिल्प (कशीदाकारी) | 2023 |
| 20 | जोधपुरी बंधेज कला | जोधपुर | हस्तशिल्प (वस्त्र रंगाई) | 2023 |
| 21 | बीकानेर उस्ता कला | बीकानेर | हस्तशिल्प (चित्रकारी+शिल्प) | 2023 |
| 22 | केर सांगरी | थार मरुक्षेत्र | खाद्य/कृषि उत्पाद | अप्रैल 2025 |
| 23 | नागौरी अश्वगंधा | नागौर | कृषि उत्पाद | जनवरी 2026 |
नवीनतम अपडेट (2025-26): सबसे नए दो GI Tag कृषि श्रेणी के हैं — केर सांगरी (थार मरुक्षेत्र की प्रसिद्ध सूखी सब्जी, अप्रैल 2025) व नागौरी अश्वगंधा (जनवरी 2026)। इसके अतिरिक्त, गणतंत्र दिवस 2026 की झांकी में बीकानेर की उस्ता कला (ऊँट की खाल पर सोने का वर्क) को राष्ट्रीय मंच पर प्रदर्शित किया गया, जो GI Tag मिलने (2023) के बावजूद संघर्षरत इस कला के लिए एक बड़ी पहचान है। हाल के वर्षों (2025-26) में राजस्थान की कला-संस्कृति से जुड़ी पद्मश्री सम्मान सूची में तागा राम भील (2026, कला) व बेगम बतूल (2025, कला) तथा बैजनाथ महाराज (2025, अन्य) के नाम प्रमुख हैं।
💡 परीक्षा-टिप — "फुलकारी राजस्थान की नहीं, पंजाब की है" — यह भ्रम न रखें
फुलकारी को आमतौर पर पंजाब की कशीदाकारी कला समझा जाता है, और यह गलत भी नहीं है — परंतु तकनीकी रूप से फुलकारी का GI Tag पंजाब, हरियाणा और राजस्थान — तीनों राज्यों को संयुक्त रूप से मिला हुआ है (शेखावाटी क्षेत्र में भी फुलकारी कशीदाकारी की परंपरा रही है)। परीक्षा में यदि "फुलकारी किस राज्य की GI है" पूछा जाए, तो "पंजाब सहित तीन राज्यों की संयुक्त GI" कहना सबसे सुरक्षित व सटीक उत्तर होगा — केवल राजस्थान कहना गलत होगा।
🎯 चित्रकला शैलियाँ एवं हस्तशिल्प — उत्तर लेखन कोण (RAS Mains) 5-अंक: 60-70 शब्द | 10-अंक: लगभग 120 शब्द
- राजस्थानी चित्रकला की चार प्रमुख शैलियों (मेवाड़, मारवाड़, ढूंढाड़, हाड़ौती) के भौगोलिक विस्तार, संरक्षक शासकों व विशिष्ट पहचान-चिह्नों (रंग, आँख, वृक्ष) को तालिका के रूप में याद रखें — तुलनात्मक प्रश्नों में यह रूपरेखा उत्तर को संरचित बनाती है।
- किशनगढ़ शैली व बणी-ठणी पर प्रश्न बहुत सम्भावित है — चित्रकार (निहालचंद), संरक्षक (सावंत सिंह/नागरीदास), सही संग्रहालय-स्थान (राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली — अजमेर नहीं) व 1973 के डाक टिकट का उल्लेख अवश्य करें।
- फड़ चित्रण पर उत्तर देते समय भोपा-भोपी परंपरा, माध्यम (कपड़ा), मुख्य केंद्र (शाहपुरा) व श्रीलाल जोशी के योगदान को जोड़कर "लोक कला और लोक धर्म के अंतर्संबंध" के आयाम से जवाब को समृद्ध करें।
- GI Tag से संबंधित प्रश्न में केवल सूची न गिनाएँ — यह भी लिखें कि GI Tag क्यों आवश्यक है (मौलिकता संरक्षण, नकल रोकना, कारीगरों को कानूनी अधिकार व बाज़ार में प्रीमियम मूल्य) तथा यह ग्रामीण-आदिवासी अर्थव्यवस्था व महिला सशक्तीकरण (जैसे मीनाकारी, बंधेज में महिला कारीगर) से कैसे जुड़ा है।
- हस्तशिल्प के सामाजिक-आर्थिक महत्त्व पर 10-अंक के उत्तर में चार आयाम शामिल करें — रोज़गार सृजन (ग्रामीण/अर्ध-शहरी), निर्यात आय, सांस्कृतिक पहचान/पर्यटन, तथा संरक्षण की चुनौतियाँ (कारीगरों का पलायन, मशीनी उत्पादन से प्रतिस्पर्धा)।
- यदि प्रश्न "राजस्थान की किसी एक हस्तकला के पुनरुद्धार" पर पूछा जाए, तो ब्लू पॉटरी (कृपाल सिंह शेखावत), फड़ चित्रण (श्रीलाल जोशी) या कठपुतली कला (देवीलाल सामर) में से किसी एक को उदाहरण बनाकर विस्तार से लिखें — व्यक्ति-केंद्रित उदाहरण उत्तर को प्रभावी बनाते हैं।
📌 महत्वपूर्ण तथ्य
1. मेवाड़ राजस्थानी चित्रकला का प्राचीनतम केंद्र माना जाता है; महाराणा कुम्भा को "राजस्थान में चित्रकला का जनक" कहा जाता है। 2. मेवाड़ शैली का स्वर्णकाल महाराणा जगत सिंह प्रथम (1628-1652 ई.) का काल है; कुंदनलाल मिश्रा को आधुनिक राजस्थानी चित्रकला की शुरुआत का श्रेय जाता है। 3. चावंड चित्रशैली (महाराणा प्रताप का काल, 1585 ई.) में निसारदीन ने 1605 ई. में "रागमाला" ग्रंथ का चित्रण किया। 4. नाथद्वारा शैली उदयपुर + ब्रज शैली का मिश्रण है, जो वल्लभ सम्प्रदाय की मुख्य पीठ स्थापना (1672 ई.) से जुड़ी है। 5. बीकानेर शैली में उस्ता अली रज़ा व हामिद रुकनुद्दीन के आने से "उस्ता शैली" का उद्भव हुआ; महाराजा अनूपसिंह का काल स्वर्णकाल रहा। 6. किशनगढ़ शैली को "कागज़ी शैली" व "मांड शैली" भी कहते हैं — यह पूर्णतः स्थानीय है, किसी बाहरी शैली से अप्रभावित। 7. बणी-ठणी चित्र (चित्रकार निहालचंद, राजा सावंत सिंह/नागरीदास का काल) एरिक डिकिंसन द्वारा "भारत की मोनालिसा" कहलाया गया; मूल चित्र राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में सुरक्षित है। 8. जयपुर चित्रशैली का स्वर्णकाल सवाई प्रतापसिंह का काल था; उन्होंने हवामहल में "सूरतखाना" स्थापित किया, जिसमें 50 से अधिक कलाकार कार्य करते थे। 9. अलवर चित्रशैली का प्रारंभ (1775 ई.) राव राजा प्रतापसिंह के काल में हुआ; स्वर्णकाल महाराजा विनयसिंह का रहा। 10. बूंदी शैली में नाचते हुए मोर का चित्रण एक विशिष्ट पहचान है — यह विशेषता केवल बूंदी शैली में मिलती है। 11. कोटा शैली को "शिकार शैली" कहा जाता है; इसे प्रकाश में लाने का श्रेय कर्नल डी.जी. गैयर एंडरसन (1952) को जाता है। 12. फड़ चित्रण का मुख्य केंद्र शाहपुरा (भीलवाड़ा) है — जोशी परिवार व श्रीलाल जोशी (2006, पद्मश्री) इस कला के प्रमुख संरक्षक रहे हैं। 13. देवनारायणजी की फड़ सबसे पुरानी, सबसे लंबी (24 हाथ) व सर्वाधिक चित्रांकन वाली फड़ है; इसका डाक टिकट 2 सितंबर 1992 को जारी हुआ। 14. सोजत (पाली) मेहंदी को सितंबर 2021 में GI Tag प्राप्त हुआ; कोटा डोरिया राजस्थान की सबसे पहली GI-प्राप्त हस्तकला (2006) है। 15. सांगानेरी प्रिंट (2010, GI) में दाबू का प्रयोग नहीं होता व आधार रंग सफेद है, जबकि बगरू प्रिंट (2012, GI) में दाबू तकनीक अनिवार्य है व आधार रंग गहरा। 16. मीनाकारी कला राजा मानसिंह प्रथम द्वारा लाहौर से जयपुर लाई गई; सोने पर मीनाकारी प्रतापगढ़ में तथा चाँदी पर मीनाकारी नाथद्वारा में प्रसिद्ध है। 17. थेवा कला केवल प्रतापगढ़ के सोनी परिवार के पुरुषों द्वारा गुप्त रूप से की जाती है; यह एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका में दर्ज एकमात्र राजस्थानी कला मानी जाती है (GI 2014)। 18. ब्लू पॉटरी को कृपाल सिंह शेखावत (1974, पद्मश्री) ने पुनर्जीवित किया; इसमें क्वार्ट्ज पाउडर व मुल्तानी मिट्टी के मिश्रण से बना "डो पेस्ट" प्रयुक्त होता है, मिट्टी का उपयोग नहीं होता। 19. कठपुतली कला का जनक देवीलाल सामर (1968, पद्मश्री) को माना जाता है; कठपुतली को 2009 में तथा इसके लोगो को 2017 में GI Tag मिला। 20. राजस्थान को जनवरी 2026 तक कुल 23 GI Tag प्राप्त हो चुके हैं — नवीनतम दो कृषि श्रेणी के हैं: केर सांगरी (अप्रैल 2025) व नागौरी अश्वगंधा (जनवरी 2026)।
17अध्याय सारांश
राजस्थान की चित्रकला परंपरा हजारों वर्ष पुरानी है — चंबल किनारे के शैलचित्रों से शुरू होकर, जैन ग्रंथों के लघु-चित्रण से गुज़रते हुए, यह मेवाड़, मारवाड़, ढूंढाड़ व हाड़ौती जैसी चार महान शैलियों में परिपक्व हुई। हर शैली का अपना रंग, अपनी आँख की बनावट, अपना प्रिय वृक्ष और अपनी कहानी है — मेवाड़ का लाल-पीला वैभव, मारवाड़ की मरुस्थली सादगी, किशनगढ़ की गुलाबी रूमानियत (बणी-ठणी के रूप में अमर) और हाड़ौती के घने जंगल व शिकार के रोमांचक दृश्य। इन दरबारी शैलियों के साथ-साथ, आम लोगों की अपनी लोक-चित्रकला भी फली-फूली — फड़ पर लिखी गई लोक देवताओं की गाथाएँ, नाथद्वारा की पिछवाइयाँ, महिलाओं द्वारा बनाई गई मांडना व सांझी — यह सब मिलकर सिद्ध करता है कि राजस्थान में कला केवल दरबारों तक सीमित नहीं रही, बल्कि हर घर, हर देहरी तक पहुँची।
इसी सृजनशीलता ने हस्तशिल्प के क्षेत्र में भी राजस्थान को विश्व-मानचित्र पर स्थापित किया। बंधेज व लहरिया के इंद्रधनुषी रंग, सांगानेरी-बगरू के हाथ-नक्काशीदार ब्लॉक-प्रिंट, कोटा डोरिया की हल्की बुनावट, मीनाकारी व थेवा कला की आभूषण-कारीगरी, ब्लू पॉटरी की नीली सुंदरता, मोलेला की मिट्टी की मूर्तियाँ, और कठपुतली-कावड़ की काष्ठ-कथाएँ — यह सभी परंपराएँ पीढ़ियों से चली आ रही कारीगरी की जीवित मिसाल हैं। GI Tag जैसी आधुनिक कानूनी व्यवस्था ने इन परंपराओं को न केवल पहचान दी है, बल्कि नकल से सुरक्षा व बाज़ार में उचित मूल्य भी सुनिश्चित किया है — राजस्थान की 23 GI Tag की सूची स्वयं इस राज्य की सांस्कृतिक व आर्थिक समृद्धि का प्रमाण है।
परीक्षा की दृष्टि से यह अध्याय दो प्रकार से महत्वपूर्ण है — पहला, चित्रशैलियों व हस्तशिल्पों के तथ्यात्मक विवरण (चित्रकार, काल, केंद्र, GI वर्ष) प्रत्यक्ष प्रश्नों के लिए, और दूसरा, कला-संस्कृति-अर्थव्यवस्था के अंतर्संबंध को समझने के लिए, जो विश्लेषणात्मक मुख्य परीक्षा प्रश्नों में उपयोगी है। अगले अध्याय में हम राजस्थान की लोक नृत्य व लोक नाट्य परंपरा — घूमर से कालबेलिया तक — का अध्ययन करेंगे, जो इसी सांस्कृतिक श्रृंखला की अगली कड़ी है।
| जिला/क्षेत्र | चित्रकला शैली / हस्तशिल्प | प्रमुख विशेषता |
|---|
| उदयपुर (मेवाड़) | मेवाड़ चित्रशैली, कठपुतली | साहबद्दीन-मनोहर का चित्रांकन; लोककला मंडल, देवीलाल सामर |
| चित्तौड़गढ़ | चावंड शैली, कावड़, आकोला दाबू प्रिंट | निसारदीन की रागमाला (1605); बस्सी गाँव की कावड़ |
| राजसमंद | नाथद्वारा शैली-पिछवाई, मोलेला मृण्य कला | श्रीनाथजी की पिछवाइयाँ (GI 2023); देवनारायणजी की मूर्तियाँ (GI 2009) |
| जोधपुर (मारवाड़) | जोधपुर चित्रशैली, जोधपुरी बंधेज | ऊँची पाग परंपरा; बंधेज कला GI 2023 |
| बीकानेर | बीकानेर चित्रशैली, उस्ता कला, कशीदाकारी | उस्ता अली रज़ा-रुकनुद्दीन; उस्ता कला व कशीदाकारी GI 2023 |
| अजमेर-नागौर (किशनगढ़) | किशनगढ़ शैली (बणी-ठणी) | चित्रकार निहालचंद; "भारत की मोनालिसा" |
| जयपुर (ढूंढाड़) | जयपुर शैली, ब्लू पॉटरी, सांगानेरी प्रिंट, मीनाकारी, गोटा | सूरतखाना (36 कारखाने); ब्लू पॉटरी GI 2009 |
| अलवर | अलवर चित्रशैली | हाथी-दाँत पर चित्रकारी; महाराजा विनयसिंह का स्वर्णकाल |
| झुंझुनूं-सीकर (शेखावाटी) | शेखावाटी भित्ति-चित्रण | "खुली आर्ट गैलरी"; नवलगढ़-मण्डावा की हवेलियाँ |
| बूंदी-कोटा (हाड़ौती) | बूंदी-कोटा चित्रशैली, कोटा डोरिया | नाचते मोर का चित्रण (बूंदी विशिष्ट); कोटा डोरिया प्रथम GI (2006) |
| भीलवाड़ा | फड़ चित्रण | शाहपुरा — जोशी परिवार, श्रीलाल जोशी (पद्मश्री 2006) |
| प्रतापगढ़ | थेवा कला | सोनी परिवार की गुप्त कला; एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका में उल्लेख; GI 2014 |
| जैसलमेर | जैसलमेर शैली, पोकरण पॉटरी | पारदर्शी पहनावा; पोकरण पॉटरी GI 2018 |
| पाली | सोजत मेहंदी | GI Tag सितंबर 2021 |
| नागौर | मकराना मार्बल, नागौरी अश्वगंधा | मार्बल GI 2015; अश्वगंधा GI जनवरी 2026 (नवीनतम) |
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