🎨 अध्याय 3/13 — राजस्थान की कला एवं संस्कृति

चित्रकला शैलियाँ एवं हस्तशिल्प

Painting Schools & Handicrafts | RAS Pre + Mains
📋 इस अध्याय में
  1. राजस्थानी चित्रकला — उद्भव एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
  2. चित्रांकन तकनीक, सामग्री एवं भित्ति-चित्रण विधियाँ
  3. मेवाड़ चित्रकला शैली
  4. मारवाड़ चित्रकला शैली (जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर, नागौर)
  5. किशनगढ़ शैली एवं बणी-ठणी — विशेष प्रकरण
  6. ढूंढाड़ चित्रकला शैली (आमेर-जयपुर, अलवर, उणियारा, शेखावाटी)
  7. हाड़ौती चित्रकला शैली (बूंदी, कोटा, झालावाड़)
  8. चारों शैलियों की तुलनात्मक विशेषताएँ (नौ प्रमुख उप-शैलियाँ)
  9. लोक चित्रकला परंपराएँ — फड़, पिछवाई, मांडना, सांझी
  10. अन्य लोक-चित्रण रूप — गोदना, मेहंदी, थापा, भराड़ी आदि
  11. राजस्थान का हस्तशिल्प — परिचय एवं आर्थिक महत्त्व
  12. वस्त्र हस्तशिल्प — बंधेज, लहरिया, सांगानेरी-बगरू प्रिंट, कोटा डोरिया
  13. आभूषण एवं धातु हस्तशिल्प — मीनाकारी, थेवा कला, कोफ्तगिरी, उस्ता कला
  14. मृण्य (मिट्टी) हस्तशिल्प — ब्लू पॉटरी, मोलेला, पोकरण पॉटरी
  15. काष्ठ हस्तशिल्प — कठपुतली, कावड़
  16. GI Tag प्राप्त राजस्थानी उत्पादों की सम्पूर्ण एवं नवीनतम सूची (जनवरी 2026 तक)
  17. अध्याय सारांश

किशनगढ़ के छोटे-से रियासती दरबार में एक राजा था — सावंत सिंह, जिसे लोग "नागरीदास" कहते थे। वह तलवार से जितना कुशल था, कलम और भावों से उतना ही डूबा हुआ भी। उसके दरबार में एक गायिका-कवयित्री थी, जिसका नाम था बणी-ठणी — यानी "सजी-धजी", "पूर्ण रूप से सुसज्जित"। कहा जाता है कि राजा सावंत सिंह उसकी काव्य-प्रतिभा और सौंदर्य से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने अपनी भक्ति और प्रेम, दोनों को राधा-कृष्ण के रूपक में ढाल दिया। इसी भावना को कैनवस पर उतारने का जिम्मा मिला दरबारी चित्रकार निहालचंद को। निहालचंद ने जो चित्र बनाया, वह किसी सामान्य महिला का चित्र नहीं था — लंबी-लंबी अंगुलियाँ, मीन-सी तिरछी और बड़ी आँखें, पतला-लंबा चेहरा, नुकीली नासिका — यह एक आदर्श, दिव्य सौंदर्य की कल्पना थी। लगभग दो सौ वर्ष बाद, कला समीक्षक एरिक डिकिंसन ने जब यह चित्र देखा, तो चकित होकर इसे "भारत की मोनालिसा" कहा — क्योंकि जैसे लियोनार्दो-दा-विंची की मोनालिसा की मुस्कान रहस्यमय है, वैसे ही बणी-ठणी की आँखों में एक ऐसा रहस्य है जो देखने वाले को बांध लेता है। 5 मई 1973 को भारत सरकार ने इस चित्र पर 20 पैसे का डाक टिकट जारी करके इसे राष्ट्रीय गौरव का दर्जा दिया। आज यह मूल चित्र दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में सुरक्षित है — पर इसकी छाप राजस्थान की हर कलात्मक परंपरा में दिखती है। यह अध्याय उसी परंपरा की कहानी है — जहाँ रंग, कूची, कपड़ा, मिट्टी और धातु मिलकर सदियों से राजस्थान की आत्मा को बयान करते आए हैं।

"बणी-ठणी — भारत की मोनालिसा" — एरिक डिकिंसन, कला समीक्षक (1943 में किशनगढ़ शैली को विश्व के सामने लाने का श्रेय)

1राजस्थानी चित्रकला — उद्भव एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

राजस्थानी चित्रकला का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। चंबल नदी के किनारे स्थित आलनिया गाँव (कोटा) से लगभग 5,000 वर्ष पूर्व के शैलचित्र (Rock Paintings) प्राप्त हुए हैं, जिन्हें डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर ने खोजा था। हनुमानगढ़ के कालीबंगा से अलंकृत ईंटों के प्राचीन साक्ष्य मिले हैं। किन्तु "चित्रकला" के व्यवस्थित रूप के प्राचीनतम प्रमाण जयपुर व बैराठ सभ्यता से मिलते हैं, इसीलिए इस काल को "प्राचीन युग की चित्रकला" कहा जाता है। राजस्थान के सबसे पुराने उपलब्ध चित्रित ग्रंथ "औध निर्युक्ति वृत्ति" और "दस वैकालिक सूत्र चूर्णि" (1060 ई.) माने जाते हैं।

राजस्थानी चित्रकला का भौगोलिक-सांस्कृतिक वर्गीकरण

भौगोलिक एवं सांस्कृतिक आधार पर राजस्थानी चित्रकला को चार प्रमुख शैलियों (स्कूल) में विभाजित किया जाता है — प्रत्येक शैली के अंतर्गत कई उप-शैलियाँ व ठिकानों की चित्रकलाएँ सम्मिलित हैं।

शैली (स्कूल)प्रमुख उप-शैलियाँ / ठिकाने
मेवाड़ स्कूलचावंड शैली, उदयपुर शैली, नाथद्वारा शैली, देवगढ़ उपशैली, सावर उपशैली, शाहपुरा उपशैली, बनेरा, बागोर, बेगूं व केलवा जैसे ठिकाने
मारवाड़ स्कूलजोधपुर शैली, बीकानेर शैली, किशनगढ़ शैली, अजमेर शैली, नागौर शैली, सिरोही शैली, जैसलमेर शैली, घाणेराव, रियां, भीनाय व जुनियां ठिकाने
ढूंढाड़ स्कूलआमेर शैली, जयपुर शैली, शेखावाटी शैली, अलवर शैली, उणियारा उपशैली, झिलाय, इसरदा, शाहपुरा व सामोद ठिकाने
हाड़ौती स्कूलबूंदी शैली, कोटा शैली (शिकार शैली), झालावाड़ उपशैली

2चित्रांकन तकनीक, सामग्री एवं भित्ति-चित्रण विधियाँ

राजस्थानी चित्रकला मुख्यतः दो रूपों में विकसित हुई — भित्ति चित्रण (दीवारों पर बड़े आकार के चित्र, जैसे हवेलियों व महलों में) और लघु चित्रण (कागज/वासली पर छोटे आकार के बारीक चित्र, जैसे पोथी-ग्रंथों का चित्रांकन)। दोनों ही विधियों में स्थानीय रूप से उपलब्ध प्राकृतिक सामग्री का प्रयोग किया जाता था — गेरू, हड़ताल, सिंदूर, इंडिगो (नील) जैसे खनिज व वानस्पतिक रंग, गिलहरी के बालों से बनी कूची (करहला), हाथ से बना कागज (वासली) तथा सोने-चाँदी का वर्क।

भित्ति चित्रण की तीन प्रमुख विधियाँ (Fresco Techniques)

विधितकनीकस्थानीय नाम / उपयोग
बुऑन फ्रेस्को (Buon Fresco)गीली चूने की पलस्तर वाली दीवार पर रंग लगाए जाते हैं; रंग दीवार सूखने के साथ स्थायी रूप से जम जाते हैं — सबसे टिकाऊ व पारंपरिक विधिआरायश, अलगीला, मोरकासी या पणा — शेखावाटी हवेलियों की बाहरी दीवारों पर, मौसम-प्रतिरोधी
फ्रेस्को सेको (Fresco Secco)पूरी तरह सूखी दीवार पर चित्रण; रंग चिपकाने हेतु गोंद/अंडे की जर्दी जैसे बाइंडर का प्रयोग; बुऑन फ्रेस्को से कम टिकाऊअंदरूनी दीवारों व छतों पर, टच-अप व सूक्ष्म विवरण (fine detailing) हेतु
मेज्जो फ्रेस्को (Mezzo Fresco)हल्की नम या लगभग सूखी दीवार पर चित्रण; सेको से अधिक मजबूत तथा बुऑन से आसानबड़े आकार के चित्रों के लिए विशेष रूप से उपयोगी

प्रमुख चित्रकला संग्रहालय व संस्थाएँ

संग्रहालय/संस्थास्थान
जिनभद्र सूरी भण्डारसोनार दुर्ग (जैसलमेर)
पोथीखानाजयपुर
सरस्वती भण्डारउदयपुर
मान प्रकाश पुस्तकालयमेहरानगढ़ दुर्ग (जोधपुर)
पश्चिमी सांस्कृतिक केंद्रउदयपुर
प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुपउदयपुर
जवाहर कला केंद्रजयपुर
राजस्थान ललित कला अकादमीजयपुर
क्रिएटिव आर्टिस्ट ग्रुपजयपुर

3मेवाड़ चित्रकला शैली

मेवाड़ को राजस्थानी चित्रकला का सबसे प्राचीन एवं प्रमुख केंद्र माना जाता है। इस शैली में पोथी-ग्रंथों का सर्वाधिक चित्रण हुआ। इसके विकास का श्रेय महाराणा कुम्भा को दिया जाता है, जिन्हें "राजस्थान में चित्रकला का जनक" कहा जाता है, तथा इसका स्वर्णकाल महाराणा जगत सिंह प्रथम (1628-1652 ई.) के काल में आया। इस शैली पर अजंता शैली का स्पष्ट प्रभाव है, विशेषकर शिकार के दृश्यों में त्रिआयामी (3D) प्रभाव के रूप में। महाराणा जगत सिंह प्रथम ने राजमहल में "चितेरों की ओवरी" अथवा "तस्वीरां रो कारखाना" नामक चित्रकला विद्यालय की स्थापना की, जिससे चित्रकला को राजकीय संरक्षण प्राप्त हुआ।

🎨 श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि (आहड़ (उदयपुर))⏰ काल/निर्माता: 1260-61 ई., महाराणा तेजसिंह का काल, चित्रकार कमलचन्द्र ⭐ विशेषता: मेवाड़ चित्रशैली का सबसे प्राचीन ग्रंथ; ताड़पत्रों पर चित्रित
🎨 सुपासनाह चरियम् (देलवाड़ा (सिरोही))⏰ काल/निर्माता: 1423 ई., महाराणा मोकल का काल, चित्रकार देवकुल पाठक ⭐ विशेषता: मेवाड़ का दूसरा प्राचीन चित्रित ग्रंथ; जैन व गुजराती शैली का मिश्रण; वर्तमान में सरस्वती संग्रहालय में संरक्षित

महाराणा उदय सिंह (1535-1572 ई.) के काल में भागवत पुराण का प्रसिद्ध चित्र "पारिजात अवतरण" (1540 ई.) चित्रकार नानाराम द्वारा बनाया गया। महाराणा जगत सिंह प्रथम के समय रामायण का चित्रांकन (1649-1653 ई.) साहबद्दीन एवं मनोहर द्वारा किया गया, तथा भागवत पुराण की भांति रामचरित्र का भी चित्रांकन हुआ। महाराणा हम्मीर सिंह के काल में "बड़े पन्नों" पर चित्र बनाने की परंपरा प्रारंभ हुई। महाराणा संग्राम सिंह द्वितीय के समय प्रमुख चित्रकार नुरुद्दीन था, जिसने विष्णु शर्मा रचित "पंचतंत्र" पर अनेक चित्र बनाए — इसी में "कलीला-दमना" (दो गीदड़ों की कहानी) प्रमुख पात्र हैं।

चावंड चित्रशैली — मेवाड़ की प्रारंभिक उपशैली

नाथद्वारा चित्रशैली — वल्लभ सम्प्रदाय का प्रभाव

देवगढ़ उप-चित्रशैली

4मारवाड़ चित्रकला शैली (जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर, नागौर)

तिब्बती इतिहासकार तारानाथ लामा ने 7वीं सदी में मारू देश (मारवाड़) में चित्रकार श्रृंगधर का उल्लेख किया, जिसने पश्चिमी भारत में यक्ष शैली को जन्म दिया — इसके प्रारंभिक चित्रावशेष प्रतिहारकालीन "ओध निर्युक्ति वृत्ति" में मिलते हैं। इस शैली का मुख्य विषय प्रेमाख्यान रहा। मारवाड़ (जोधपुर) शैली का आरंभ राव मालदेव के काल में हुआ, जब उनके द्वारा चोखेलाव महल (मेहरानगढ़ दुर्ग) में दो चित्र — राम-रावण युद्ध तथा सप्त सती — बनाए गए, जो मारवाड़ शैली के प्रारंभिक चित्र माने जाते हैं।

बीकानेर चित्रशैली — मुगल व दक्कन शैली का समन्वय

जैसलमेर शैली एवं नागौर चित्रशैली

मारवाड़/जोधपुर बनाम बीकानेर चित्रशैली — तुलना

मारवाड़/जोधपुर चित्रशैली
  • मरुस्थल, घोड़े, झाड़ियों का चित्रण
  • प्रेमाख्यानों का चित्रण — ढोला-मारू, महेंद्र-मूमल
  • ऊँची पाग जोधपुर शैली की विशिष्ट देन
  • रंग: लाल व पीले रंगों की प्रधानता
  • नेत्र: बादाम के समान; वृक्ष: आम
बीकानेर चित्रशैली
  • बरसते बादलों में सारस-मिथुन का नयन-अभिराम अंकन
  • बीकानेरी रहन-सहन, राजपूती संस्कृति तथा मुगल स्कूल का मिश्रित प्रभाव
  • चित्रकार चित्र के नीचे अपना नाम व तिथि अंकित करते
  • प्रारंभ से ही मुगल शैली का प्रभाव
  • महिलाएँ: इकहरी, तन्वंगी व कोमल नारी आकृतियाँ

5किशनगढ़ शैली एवं बणी-ठणी — विशेष प्रकरण

किशनगढ़ शैली को "कागज़ी शैली" व "मांड शैली" भी कहा जाता है। इस शैली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पूर्णतः स्थानीय शैली है — इस पर किसी अन्य चित्रशैली का बाहरी प्रभाव नहीं पड़ा (हालाँकि साहित्यिक दृष्टि से कांगड़ा शैली व ब्रज साहित्य का प्रभाव माना जाता है)। इस शैली का स्वर्णकाल महाराजा सावंत सिंह/नागरीदास (1748-1764 ई.) के काल में आया। इसे प्रकाश में लाने का श्रेय डॉ. फैय्याज़ अली व एरिक डिक्सन (डिकिंसन) को जाता है।

👑 बणी-ठणी (किशनगढ़ (अजमेर-नागौर क्षेत्र))

⏰ काल/निर्माता: लगभग 1750 ई., चित्रकार मोरध्वज निहालचंद, राजा सावंत सिंह "नागरीदास" के काल में
⭐ विशेषता: किशनगढ़ शैली का प्रमुख चित्र; चित्रकार निहालचंद को "भारत का लियोनार्दो-द-विंची" कहा जाता है; 5 मई 1973 को 20 पैसे का डाक टिकट जारी; एरिक डिकिंसन द्वारा "भारत की मोनालिसा" नाम दिया गया; वर्तमान में राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में सुरक्षित

💡 कन्फ्यूजन दूर करें — बणी-ठणी कहाँ सुरक्षित है?

कई कोचिंग नोट्स में "अजमेर संग्रहालय" लिखा मिलता है, जो एक सामान्य भ्रम है। असल कहानी यह है कि कला समीक्षक एरिक डिकिंसन, जो अजमेर के मेयो कॉलेज में प्राध्यापक थे, ने 1943 में किशनगढ़ राजमहल के संग्रह को दुनिया के सामने लाया — इसीलिए "अजमेर" नाम इस चित्र से जुड़ गया। परंतु सबसे प्रसिद्ध व मूल बणी-ठणी चित्र, जिस पर 1973 का डाक टिकट बना, वह राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में सुरक्षित है — परीक्षा के लिए यही सही उत्तर है। किशनगढ़ शैली के अन्य संबंधित लघुचित्र किशनगढ़ के राजमहल संग्रह व अन्य संग्रहालयों में भी बिखरे हैं, जिससे यह भ्रम और गहरा हो जाता है।

📢 विज्ञापन
🔥 सबसे लोकप्रिय
📘

RAS Foundation Course 2026 🕉️

Multiple ValidityTests
₹4,999₹25,000
Join Now →

6ढूंढाड़ चित्रकला शैली (आमेर-जयपुर, अलवर, उणियारा, शेखावाटी)

ढूंढाड़ शैली पर आरंभ से ही मुगल शैली का सर्वाधिक प्रभाव पड़ा, क्योंकि आमेर (कच्छवाहा) राजवंश के मुगल दरबार से घनिष्ठ वैवाहिक व राजनीतिक संबंध थे। बैराठ के मुगल गार्डन व मौजमाबाद के भित्ति चित्रों में यह प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है। आमेर चित्रशैली का प्रारंभ मानसिंह व मिर्ज़ा राजा जयसिंह के काल में हुआ, तथा इसका स्वर्णकाल मिर्ज़ा राजा जयसिंह प्रथम के काल में आया। चित्रकार पुष्पदत्त ने "आदिपुराण" (1606) नामक ग्रंथ का चित्रण किया था; प्रमुख चित्रकार पुष्पदत्त, हुक्मचंद व मुरली थे।

जयपुर चित्रशैली — ढूंढाड़ स्कूल का शिखर

अलवर चित्रशैली एवं उणियारा चित्रशैली

शेखावाटी चित्रकला — "खुली आर्ट गैलरी"

7हाड़ौती चित्रकला शैली (बूंदी, कोटा, झालावाड़)

हाड़ौती स्कूल में बूंदी शैली की शुरुआत राव सुरजन के समय हुई। राव शत्रुशाल (छत्रशाल) के काल में चित्रशैली का व्यापक विकास हुआ, तथा "रंगमहल" सुंदर भित्ति चित्रों के लिए विश्व-प्रसिद्ध है। इस शैली का स्वर्णकाल राव उम्मेदसिंह के काल में आया, जिनके नाम पर "रणशाला/चित्रशाला महल" प्रसिद्ध है — इसे "भित्ति चित्रों का स्वर्ग" कहा जाता है, और यहाँ बूंदी शैली के सर्वाधिक चित्र मिलते हैं। राव उम्मेदसिंह का प्रसिद्ध चित्र "जंगली सुअर का शिकार" है।

कोटा चित्रशैली — "शिकार शैली"

8चारों शैलियों की तुलनात्मक विशेषताएँ (नौ प्रमुख उप-शैलियाँ)

राजस्थान की प्रमुख चित्रशैलियों की पहचान परीक्षा में अक्सर रंग-योजना, आँखों की बनावट, प्रिय वृक्ष तथा पशु-पक्षी के आधार पर पूछी जाती है। नीचे दी गई तालिका इन सूक्ष्म अंतरों को स्पष्ट करती है — यह इस अध्याय की सर्वाधिक परीक्षा-उपयोगी तालिकाओं में एक है।

शैलीप्रमुख रंगआँखेंवृक्षपशु-पक्षी
मेवाड़लाल व पीलामृग के समानकदम्बहाथी, चकोर
जोधपुर (मारवाड़)पीलाबादाम के समानआमऊँट, कौआ व चील
बीकानेरपीलातीर-कमान के समानआमऊँट, कौआ व चील
जयपुर + अलवरहरामछली के समानपीपल / बरगदअश्व, मोर
कोटानीलाआम के समानखजूरहिरण, शेर, बतख
बूंदीसुनहराआम के समानखजूरहिरण, शेर, बतख
किशनगढ़श्वेत/गुलाबीखंजर के तीर-कमान के समानकेलागाय, मोर, हंस, बतख
नाथद्वाराहरा व पीलाहिरण व गाय के समानकेलागाय, मोर

9लोक चित्रकला परंपराएँ — फड़, पिछवाई, मांडना, सांझी

फड़ चित्रण — भोपों की "चलती-फिरती कथा-पताका"

फड़ चित्रण में लोक देवताओं की ऐतिहासिक, धार्मिक व पौराणिक जीवन-गाथाओं को कपड़े पर चित्रित स्वरूप में उकेरा जाता है। विधि: मोटे कपड़े (खादी या रेजी) पर गेहूँ या चावल के माँड़ में गोंद मिलाकर लेप किया जाता है, फिर उसे घोंटकर चिकना किया जाता है। फड़ का उद्गम मेवाड़ चित्रशैली से माना जाता है, और इसका मुख्य केंद्र शाहपुरा (भीलवाड़ा) है, जहाँ जोशी परिवार पीढ़ियों से इस कला में संलग्न है। फड़ को कथावाचक भोपा-भोपी साथ लेकर रात्रिकालीन "फड़ बांचना" (कथा-वाचन) करते हैं।

फड़वाचन करने वाली जाति / वाद्ययंत्रविशेषता
रामदेवजी की फड़कामड़ जाति के भोपा — रावणहत्था वाद्ययंत्र के साथसर्वप्रथम चित्रांकन चौथमल चितेरे द्वारा
पाबूजी की फड़थोरी/नायक जाति के भोपा — रावणहत्था वाद्ययंत्र के साथ, रात्रिकालीन वाचनपाबूजी की घोड़ी "केसर कालमी" को काले रंग से चित्रित; युद्ध-दृश्य; भाला मुख के सामने
देवनारायणजी की फड़गुर्जर जाति के भोपा — "जंतर" वाद्ययंत्र के साथसर्वाधिक चित्रांकन वाली, सबसे पुरानी व सबसे लंबी फड़ (24 हाथ); मौखिक साहित्य-गायन-नाट्य-चित्रकला का समिश्रण; डाक टिकट 2 सितंबर 1992; घोड़ी "लीलागर" हरे रंग से चित्रित
भैंसासुर की फड़बागरी/बावरी जाति द्वारा चोरी के समय शकुन हेतु पूजी जाती हैइस फड़ का वाचन नहीं होता, केवल दर्शन किए जाते हैं
रामदला-कृष्णदला की फड़हाड़ौती क्षेत्र के भाट जाति के भोपा — दिन में, बिना वाद्ययंत्र केराम व कृष्ण भगवान के प्रसंगों पर आधारित
गोगाजी की फड़डेरू वाद्ययंत्र के साथ वाचनधूलजी चितेरे द्वारा सर्वप्रथम चित्रांकन
💡 रोचक तथ्य — फड़ पर अमिताभ बच्चन!

सामान्यतः फड़ में लोक देवताओं की गाथा चित्रित होती है, परंतु चित्रकार रामलाल व पतासी देवी ने प्रयोगात्मक रूप से अभिनेता अमिताभ बच्चन की फड़ का भी निर्माण किया — यह दर्शाता है कि फड़ चित्रण अब पारंपरिक धार्मिक विषयों से आगे बढ़कर समकालीन विषयों को भी अपना रहा है। देवनारायणजी की फड़ (श्रीलाल जोशी द्वारा निर्मित) आज जर्मनी के एक संग्रहालय में सुरक्षित रखी गई है, जो फड़ कला की अंतरराष्ट्रीय पहचान का प्रमाण है।

पिछवाई, मांडना एवं सांझी

10अन्य लोक-चित्रण रूप — गोदना, मेहंदी, थापा, भराड़ी आदि

कला रूपमाध्यम / तकनीकअवसर / उद्देश्य
गोदनातीखे औजार से त्वचा खोदकर काला रंग भरना — स्थायी निशानजनजातीय समाज में प्रचलित; आकृतियाँ — त्रिशूल, ओम, स्वस्तिक, राम-लक्ष्मण, सूर्य-चंद्र-फूल; अंधविश्वास — अनगुदा शरीर असुरक्षित माना जाता है; कार्य नट जाति द्वारा
मेहंदीहाथ-पैरों पर लगाया जाने वाला हरा रंगविवाह व शुभ अवसरों पर; हरा रंग समृद्धि व लाल रंग प्रेम का प्रतीक; सोजत (पाली) प्रसिद्ध केंद्र — GI Tag सितंबर 2021; गलुंड-रेलमगरा (राजसमंद) की मेहंदी भी प्रसिद्ध
थापाहाथ व अंगुलियों के छापों से बना लोक-चित्रणग्रामीण क्षेत्रों में शुभ अवसरों पर परंपरागत रंगों के मिश्रण से हाथों द्वारा छापे गए चित्र; देवी-देवताओं के प्रतीक स्वरूप बनाए जाते हैं
ओका-नाकागोबर से निर्मित कलाकृतिचेचक निकलने पर गुणा (देवी) पूजी जाती है
भराड़ीचावल के विविध रंगी घोल से दीवार पर चित्रणभील जनजाति में विवाह अवसर पर जमाई द्वारा भराड़ी माता का चित्र बनाया जाता है
गोड़लियालोहे की गर्म छड़/मिट्टी की ढकनी से पशुओं को दागनाउद्देश्य — पशुओं की पहचान व चुराए गए पशुओं की शिनाख्त
पगल्यादेहरी पर लकड़ी की कलाकृति (चिड़ा/तोता युक्त)विवाह के समय वधू के घर के मुख्य प्रवेश द्वार पर बाँधी जाती है
तोरणद्वार पर बाँधी जाने वाली सजावटी झालरशक्ति का प्रतीक; शुभ अवसरों पर द्वार-सज्जा हेतु
वीलबाँस की खपच्चियों पर मिट्टी का लेप — विभिन्न खानों वाला पात्रअनाज-फसल संग्रहण हेतु — पश्चिमी राजस्थान (विशेषतः जैसलमेर) में प्रचलित
बटेवड़े/थापड़ागोबर से बनी आकृतियाँ (उपलों को सुरक्षित रखने हेतु)साज-सज्जा व घरेलू ईंधन-संग्रहण उपयोग

11राजस्थान का हस्तशिल्प — परिचय एवं आर्थिक महत्त्व

राजस्थान ऐतिहासिक रूप से हस्तशिल्प कलाओं के विकास में अत्यंत समृद्ध रहा है। इसका प्राचीन प्रमाण तीसरी शताब्दी ई.पू. के आहत सिक्कों (नगर से प्राप्त) तथा विराटनगर के बौद्ध चैत्य में उपयोग किए गए 26 काष्ठ-स्तंभों से मिलता है। वर्तमान में राजस्थानी बांधनी, कुंदन-मीनाकारी आभूषण, हैंड ब्लॉक प्रिंटिंग वस्त्र, कीमती हीरे-जवाहरात व जड़ाऊ आभूषण, तथा ब्लू पॉटरी हस्तकला के क्षेत्र में विश्व-प्रसिद्ध हैं। इन्हीं कलाओं की गुणवत्ता व मौलिकता को कानूनी संरक्षण देने के लिए भारत सरकार द्वारा GI Tag (भौगोलिक संकेतक) प्रदान किए जाते हैं — राजस्थान अब तक 23 से अधिक GI Tag प्राप्त कर चुका है (जनवरी 2026 तक), जो इसे हस्तशिल्प वैविध्य में देश के अग्रणी राज्यों में स्थान देता है।

📢 विज्ञापन
📦

ALL IN ONE Subscription — सम्पूर्ण GK एक ही स्थान पर

Multiple ValidityTests
₹899₹4,999
Join Now →

12वस्त्र हस्तशिल्प — बंधेज, लहरिया, सांगानेरी-बगरू प्रिंट, कोटा डोरिया

दाबू प्रिंट एवं छपाई तकनीकें

रंगाई-छपाई के दौरान जिस स्थान पर कपड़े में रंग नहीं चढ़ाना हो, उसे "लुई या लुगदी" से दबा दिया जाता है, और इसी लुई/लुगदी को "दाबू" कहा जाता है। दाबू प्रिंट का प्रयोग बेडशीट, चूँदड़ी व साड़ियों पर होता है, और इसकी रंगाई-छपाई मुम्बई के सफेद लट्ठे पर की जाती है। दाबू के कई प्रकार प्रचलित हैं — मोम का दाबू (सवाई माधोपुर), गेहूँ के बंधण का दाबू (सांगानेर, बगरू), मिट्टी का दाबू (बालोतरा), करियाना पद्धति दाबू (बालोतरा), ग्वार+मिट्टी का दाबू (आकोला, चित्तौड़गढ़), चूना+गोंद का दाबू (भीलवाड़ा), तथा मेण का दाबू (उदयपुर)।

सांगानेरी हैंड ब्लॉक प्रिंट बनाम बगरू हैंड ब्लॉक प्रिंट

सांगानेरी प्रिंट का प्रसिद्ध केंद्र छिपों का आकोला गाँव (चित्तौड़गढ़) व सांगानेर (जयपुर) है, जिसे 2010 में GI Tag प्राप्त हुआ — प्रसिद्ध कलाकार मुन्नालाल गोयल व अवधेश कुमार पाण्डे हैं। बगरू प्रिंट (2012 में GI Tag प्राप्त) में दाबू तकनीक की प्रधानता है — दोनों की तुलना छात्रों के लिए एक क्लासिक परीक्षा-प्रश्न है।

सांगानेरी प्रिंट
  • निर्माण लकड़ी के छापों द्वारा (दाबू का प्रयोग नहीं)
  • कपड़े का आधार रंग सफेद होता है
  • प्राकृतिक रंगों का प्रयोग आवश्यक नहीं
  • GI Tag — 2010
  • तुर्की शैली का अधिक प्रभाव; नीले-लाल रंगों की प्रधानता
बगरू प्रिंट
  • निर्माण में दाबू तकनीक का अनिवार्य प्रयोग
  • कपड़े का आधार रंग नीला/काला/मटमैला होता है
  • प्राकृतिक रंगों का प्रयोग आवश्यक (अनिवार्य)
  • GI Tag — 2012
  • नामदेव छीपा कारीगरों (तुक्या छीपा — मुस्लिम छीपा कारीगर) द्वारा निर्मित

बंधेज (बांधनी) — "Tie & Dye" की कला

लहरिया, पोमचा, चूनड़ी एवं कोटा डोरिया

13आभूषण एवं धातु हस्तशिल्प — मीनाकारी, थेवा कला, कोफ्तगिरी, उस्ता कला

मीनाकारी — जयपुर की विश्वप्रसिद्ध कला

मीनाकारी अर्थात सोने-चाँदी पर की गई नक्काशी में रंगीन काँच के पाउडर की सहायता से भरकर किया गया रंग-बिरंगा काम। यह कला कच्छवाहा शासक राजा मानसिंह प्रथम द्वारा लाहौर से जयपुर लाई गई थी, तथा लाहौर में यह कला मुगलों द्वारा फारस से लाई गई थी। मुख्य रंग लाल व हरा हैं। प्रमुख कलाकार: कुदरतसिंह (1988, पद्मश्री), मुन्नालाल, दुर्गासिंह, काशीनाथ, कैलाशचंद्र — तथा पंजाब से जयपुर आकर बसने वाले कलाकार हरिसिंह, अमरसिंह, किशनसिंह, गोभासिंह, श्यामसिंह, घीसासिंह।

सतहमीनाकारी का केंद्र
सोने पर मीनाकारीप्रतापगढ़
चाँदी पर मीनाकारीनाथद्वारा
ताँबा पर मीनाकारीभीलवाड़ा
पीतल पर मीनाकारीजयपुर व अलवर
ज़िंक पर मीनाकारीजोधपुर
कागज पर मीनाकारीअलवर
लाख पर मीनाकारीबीकानेर
चंदन पर मीनाकारीचूरू
काँच पर मीनाकारीरेतवाल (कोटा)
मार्बल पर मीनाकारीजयपुर

थेवा कला — प्रतापगढ़ की सोनी परिवार की गुप्त कला

कोफ्तगिरी, उस्ता कला, तारकशी एवं अन्य धातु-शिल्प

📍 ⚔️ कोफ्तगिरी (उदयपुर (मुख्यतः मेवाड़ के सिकलीगर), चित्तौड़गढ़, अलवर, जयपुर)

⏰ काल/निर्माता: मुगलकालीन शस्त्र-अलंकरण परंपरा से विकसित
⭐ विशेषता: लोहे पर सोने या चाँदी की सूक्ष्म कशीदाकारी, मुख्यतः हथियारों (तलवार, ढाल, खंजर) के अलंकरण हेतु; कलाकार को "कोफ्तगार" कहते हैं; GI Tag — 2023

📍 🐫 उस्ता कला (बीकानेर)

⏰ काल/निर्माता: महाराजा रायसिंह के काल में मुगल दरबार से उस्ता अली रज़ा व हामिद रुकनुद्दीन के आने से प्रारंभ
⭐ विशेषता: ऊँट की खाल एवं कूम्पा (नारियल के खोल) पर सोने की नक्काशी व मीनाकारी; प्रमुख कलाकार अलीरज़ा, रुकनुद्दीन, हसामुद्दीन उस्ता (पद्मश्री), नाथू उमरानी, क़ासम उमरानी; GI Tag — 2023; गणतंत्र दिवस 2026 की झांकी में प्रदर्शित

14मृण्य (मिट्टी) हस्तशिल्प — ब्लू पॉटरी, मोलेला, पोकरण पॉटरी

ब्लू पॉटरी — जयपुर की फारसी-तुर्की विरासत

ब्लू पॉटरी मूलतः चीन व फारस की कला है, जो मुगलकाल में भारत आई तथा राजस्थान में इसकी शुरुआत जयपुर में सवाई रामसिंह द्वितीय (1835-1880 ई.) के काल में हुई — जयपुर निवासी चूड़ामन व कालू कुम्हार ने यह कला दिल्ली के कलाकार भोला से सीखकर राजस्थान में प्रारंभ की। विधि: बर्तनों पर काँच, कथीरा, सागी, क्वार्ट्ज पाउडर और मुल्तानी मिट्टी का घोल चढ़ाया जाता है, फिर फूल-पत्तियों, देवी-देवताओं व अन्य दृश्यों के चित्र बनाए जाते हैं, और तैयार पॉटरी को लगभग 800°C तापमान पर पकाया जाता है।

मोलेला मृण्य कला (टेराकोटा रिलीफ)

ब्लैक पॉटरी, पोकरण पॉटरी एवं अन्य मृद्भांड परंपराएँ

15काष्ठ हस्तशिल्प — कठपुतली, कावड़

कठपुतली — कठपुतली कला का उद्भव-स्थल राजस्थान

कठपुतली का उद्भव-स्थल राजस्थान को माना जाता है। कठपुतली कला का जनक देवीलाल सामर को माना जाता है, जिन्होंने लोककला मंडल, उदयपुर के माध्यम से इस कला को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलाने का कार्य किया — इसके लिए उन्हें 1968 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया।

कावड़ — "चलता-फिरता देवघर"

16GI Tag प्राप्त राजस्थानी उत्पादों की सम्पूर्ण एवं नवीनतम सूची (जनवरी 2026 तक)

भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication) टैग किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र से जुड़े परंपरागत उत्पाद की मौलिकता व गुणवत्ता को कानूनी मान्यता देता है। राजस्थान को अब तक (जनवरी 2026 तक) 23 GI Tag प्राप्त हो चुके हैं — जिनमें हस्तशिल्प, चित्रकला व कृषि-खाद्य उत्पाद शामिल हैं। नीचे दी गई तालिका कालानुक्रम में पूर्ण एवं सत्यापित सूची प्रस्तुत करती है।

क्रमउत्पादजिला/क्षेत्रश्रेणीवर्ष
1कोटा डोरिया (शब्द)कोटा-बूंदीहस्तशिल्प (वस्त्र)2006
2ब्लू पॉटरी (शब्द)जयपुरहस्तशिल्प (मृद्भांड)2009
3मोलेला मृण्य कला (शब्द+लोगो)राजसमंदहस्तशिल्प (मृद्भांड)2009
4राजस्थान की कठपुतली (शब्द)उदयपुर/जयपुरहस्तशिल्प (काष्ठ)2009
5बिकानेरी भुजियाबीकानेरखाद्य उत्पाद2010 (अधिसूचना 2021)
6सांगानेरी हैंड ब्लॉक प्रिंटजयपुर (सांगानेर)हस्तशिल्प (वस्त्र मुद्रण)2010
7कोटा डोरिया (लोगो)कोटा-बूंदीहस्तशिल्प (वस्त्र)2011
8फुलकारी (त्रि-राज्य संयुक्त)शेखावाटी सहितहस्तशिल्प (कशीदाकारी)2010-11
9बंधेज (जयपुर)जयपुरहस्तशिल्प (वस्त्र रंगाई)2012
10बगरू हैंड ब्लॉक प्रिंटजयपुर (बगरू)हस्तशिल्प (वस्त्र मुद्रण)2012
11थेवा कलाप्रतापगढ़हस्तशिल्प (आभूषण)2014
12मकराना मार्बलनागौरखनिज हस्तशिल्प2015
13ब्लू पॉटरी (लोगो)जयपुरहस्तशिल्प (मृद्भांड)2017
14कठपुतली (लोगो)उदयपुर/जयपुरहस्तशिल्प (काष्ठ)2017
15पोकरण पॉटरीजैसलमेरहस्तशिल्प (मृद्भांड)2018
16सोजत मेहंदीपालीकृषि/हस्तशिल्पसितंबर 2021
17नाथद्वारा पिछवाई चित्रकलाराजसमंदचित्रकला2023
18उदयपुर कोफ्तगिरीउदयपुरहस्तशिल्प (धातु)2023
19बीकानेरी कशीदाकारीबीकानेरहस्तशिल्प (कशीदाकारी)2023
20जोधपुरी बंधेज कलाजोधपुरहस्तशिल्प (वस्त्र रंगाई)2023
21बीकानेर उस्ता कलाबीकानेरहस्तशिल्प (चित्रकारी+शिल्प)2023
22केर सांगरीथार मरुक्षेत्रखाद्य/कृषि उत्पादअप्रैल 2025
23नागौरी अश्वगंधानागौरकृषि उत्पादजनवरी 2026

नवीनतम अपडेट (2025-26): सबसे नए दो GI Tag कृषि श्रेणी के हैं — केर सांगरी (थार मरुक्षेत्र की प्रसिद्ध सूखी सब्जी, अप्रैल 2025) व नागौरी अश्वगंधा (जनवरी 2026)। इसके अतिरिक्त, गणतंत्र दिवस 2026 की झांकी में बीकानेर की उस्ता कला (ऊँट की खाल पर सोने का वर्क) को राष्ट्रीय मंच पर प्रदर्शित किया गया, जो GI Tag मिलने (2023) के बावजूद संघर्षरत इस कला के लिए एक बड़ी पहचान है। हाल के वर्षों (2025-26) में राजस्थान की कला-संस्कृति से जुड़ी पद्मश्री सम्मान सूची में तागा राम भील (2026, कला) व बेगम बतूल (2025, कला) तथा बैजनाथ महाराज (2025, अन्य) के नाम प्रमुख हैं।

💡 परीक्षा-टिप — "फुलकारी राजस्थान की नहीं, पंजाब की है" — यह भ्रम न रखें

फुलकारी को आमतौर पर पंजाब की कशीदाकारी कला समझा जाता है, और यह गलत भी नहीं है — परंतु तकनीकी रूप से फुलकारी का GI Tag पंजाब, हरियाणा और राजस्थान — तीनों राज्यों को संयुक्त रूप से मिला हुआ है (शेखावाटी क्षेत्र में भी फुलकारी कशीदाकारी की परंपरा रही है)। परीक्षा में यदि "फुलकारी किस राज्य की GI है" पूछा जाए, तो "पंजाब सहित तीन राज्यों की संयुक्त GI" कहना सबसे सुरक्षित व सटीक उत्तर होगा — केवल राजस्थान कहना गलत होगा।

🎯 चित्रकला शैलियाँ एवं हस्तशिल्प — उत्तर लेखन कोण (RAS Mains) 5-अंक: 60-70 शब्द | 10-अंक: लगभग 120 शब्द

📌 महत्वपूर्ण तथ्य

1. मेवाड़ राजस्थानी चित्रकला का प्राचीनतम केंद्र माना जाता है; महाराणा कुम्भा को "राजस्थान में चित्रकला का जनक" कहा जाता है। 2. मेवाड़ शैली का स्वर्णकाल महाराणा जगत सिंह प्रथम (1628-1652 ई.) का काल है; कुंदनलाल मिश्रा को आधुनिक राजस्थानी चित्रकला की शुरुआत का श्रेय जाता है। 3. चावंड चित्रशैली (महाराणा प्रताप का काल, 1585 ई.) में निसारदीन ने 1605 ई. में "रागमाला" ग्रंथ का चित्रण किया। 4. नाथद्वारा शैली उदयपुर + ब्रज शैली का मिश्रण है, जो वल्लभ सम्प्रदाय की मुख्य पीठ स्थापना (1672 ई.) से जुड़ी है। 5. बीकानेर शैली में उस्ता अली रज़ा व हामिद रुकनुद्दीन के आने से "उस्ता शैली" का उद्भव हुआ; महाराजा अनूपसिंह का काल स्वर्णकाल रहा। 6. किशनगढ़ शैली को "कागज़ी शैली" व "मांड शैली" भी कहते हैं — यह पूर्णतः स्थानीय है, किसी बाहरी शैली से अप्रभावित। 7. बणी-ठणी चित्र (चित्रकार निहालचंद, राजा सावंत सिंह/नागरीदास का काल) एरिक डिकिंसन द्वारा "भारत की मोनालिसा" कहलाया गया; मूल चित्र राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में सुरक्षित है। 8. जयपुर चित्रशैली का स्वर्णकाल सवाई प्रतापसिंह का काल था; उन्होंने हवामहल में "सूरतखाना" स्थापित किया, जिसमें 50 से अधिक कलाकार कार्य करते थे। 9. अलवर चित्रशैली का प्रारंभ (1775 ई.) राव राजा प्रतापसिंह के काल में हुआ; स्वर्णकाल महाराजा विनयसिंह का रहा। 10. बूंदी शैली में नाचते हुए मोर का चित्रण एक विशिष्ट पहचान है — यह विशेषता केवल बूंदी शैली में मिलती है। 11. कोटा शैली को "शिकार शैली" कहा जाता है; इसे प्रकाश में लाने का श्रेय कर्नल डी.जी. गैयर एंडरसन (1952) को जाता है। 12. फड़ चित्रण का मुख्य केंद्र शाहपुरा (भीलवाड़ा) है — जोशी परिवार व श्रीलाल जोशी (2006, पद्मश्री) इस कला के प्रमुख संरक्षक रहे हैं। 13. देवनारायणजी की फड़ सबसे पुरानी, सबसे लंबी (24 हाथ) व सर्वाधिक चित्रांकन वाली फड़ है; इसका डाक टिकट 2 सितंबर 1992 को जारी हुआ। 14. सोजत (पाली) मेहंदी को सितंबर 2021 में GI Tag प्राप्त हुआ; कोटा डोरिया राजस्थान की सबसे पहली GI-प्राप्त हस्तकला (2006) है। 15. सांगानेरी प्रिंट (2010, GI) में दाबू का प्रयोग नहीं होता व आधार रंग सफेद है, जबकि बगरू प्रिंट (2012, GI) में दाबू तकनीक अनिवार्य है व आधार रंग गहरा। 16. मीनाकारी कला राजा मानसिंह प्रथम द्वारा लाहौर से जयपुर लाई गई; सोने पर मीनाकारी प्रतापगढ़ में तथा चाँदी पर मीनाकारी नाथद्वारा में प्रसिद्ध है। 17. थेवा कला केवल प्रतापगढ़ के सोनी परिवार के पुरुषों द्वारा गुप्त रूप से की जाती है; यह एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका में दर्ज एकमात्र राजस्थानी कला मानी जाती है (GI 2014)। 18. ब्लू पॉटरी को कृपाल सिंह शेखावत (1974, पद्मश्री) ने पुनर्जीवित किया; इसमें क्वार्ट्ज पाउडर व मुल्तानी मिट्टी के मिश्रण से बना "डो पेस्ट" प्रयुक्त होता है, मिट्टी का उपयोग नहीं होता। 19. कठपुतली कला का जनक देवीलाल सामर (1968, पद्मश्री) को माना जाता है; कठपुतली को 2009 में तथा इसके लोगो को 2017 में GI Tag मिला। 20. राजस्थान को जनवरी 2026 तक कुल 23 GI Tag प्राप्त हो चुके हैं — नवीनतम दो कृषि श्रेणी के हैं: केर सांगरी (अप्रैल 2025) व नागौरी अश्वगंधा (जनवरी 2026)।

17अध्याय सारांश

राजस्थान की चित्रकला परंपरा हजारों वर्ष पुरानी है — चंबल किनारे के शैलचित्रों से शुरू होकर, जैन ग्रंथों के लघु-चित्रण से गुज़रते हुए, यह मेवाड़, मारवाड़, ढूंढाड़ व हाड़ौती जैसी चार महान शैलियों में परिपक्व हुई। हर शैली का अपना रंग, अपनी आँख की बनावट, अपना प्रिय वृक्ष और अपनी कहानी है — मेवाड़ का लाल-पीला वैभव, मारवाड़ की मरुस्थली सादगी, किशनगढ़ की गुलाबी रूमानियत (बणी-ठणी के रूप में अमर) और हाड़ौती के घने जंगल व शिकार के रोमांचक दृश्य। इन दरबारी शैलियों के साथ-साथ, आम लोगों की अपनी लोक-चित्रकला भी फली-फूली — फड़ पर लिखी गई लोक देवताओं की गाथाएँ, नाथद्वारा की पिछवाइयाँ, महिलाओं द्वारा बनाई गई मांडना व सांझी — यह सब मिलकर सिद्ध करता है कि राजस्थान में कला केवल दरबारों तक सीमित नहीं रही, बल्कि हर घर, हर देहरी तक पहुँची।

इसी सृजनशीलता ने हस्तशिल्प के क्षेत्र में भी राजस्थान को विश्व-मानचित्र पर स्थापित किया। बंधेज व लहरिया के इंद्रधनुषी रंग, सांगानेरी-बगरू के हाथ-नक्काशीदार ब्लॉक-प्रिंट, कोटा डोरिया की हल्की बुनावट, मीनाकारी व थेवा कला की आभूषण-कारीगरी, ब्लू पॉटरी की नीली सुंदरता, मोलेला की मिट्टी की मूर्तियाँ, और कठपुतली-कावड़ की काष्ठ-कथाएँ — यह सभी परंपराएँ पीढ़ियों से चली आ रही कारीगरी की जीवित मिसाल हैं। GI Tag जैसी आधुनिक कानूनी व्यवस्था ने इन परंपराओं को न केवल पहचान दी है, बल्कि नकल से सुरक्षा व बाज़ार में उचित मूल्य भी सुनिश्चित किया है — राजस्थान की 23 GI Tag की सूची स्वयं इस राज्य की सांस्कृतिक व आर्थिक समृद्धि का प्रमाण है।

परीक्षा की दृष्टि से यह अध्याय दो प्रकार से महत्वपूर्ण है — पहला, चित्रशैलियों व हस्तशिल्पों के तथ्यात्मक विवरण (चित्रकार, काल, केंद्र, GI वर्ष) प्रत्यक्ष प्रश्नों के लिए, और दूसरा, कला-संस्कृति-अर्थव्यवस्था के अंतर्संबंध को समझने के लिए, जो विश्लेषणात्मक मुख्य परीक्षा प्रश्नों में उपयोगी है। अगले अध्याय में हम राजस्थान की लोक नृत्य व लोक नाट्य परंपरा — घूमर से कालबेलिया तक — का अध्ययन करेंगे, जो इसी सांस्कृतिक श्रृंखला की अगली कड़ी है।

जिला/क्षेत्रचित्रकला शैली / हस्तशिल्पप्रमुख विशेषता
उदयपुर (मेवाड़)मेवाड़ चित्रशैली, कठपुतलीसाहबद्दीन-मनोहर का चित्रांकन; लोककला मंडल, देवीलाल सामर
चित्तौड़गढ़चावंड शैली, कावड़, आकोला दाबू प्रिंटनिसारदीन की रागमाला (1605); बस्सी गाँव की कावड़
राजसमंदनाथद्वारा शैली-पिछवाई, मोलेला मृण्य कलाश्रीनाथजी की पिछवाइयाँ (GI 2023); देवनारायणजी की मूर्तियाँ (GI 2009)
जोधपुर (मारवाड़)जोधपुर चित्रशैली, जोधपुरी बंधेजऊँची पाग परंपरा; बंधेज कला GI 2023
बीकानेरबीकानेर चित्रशैली, उस्ता कला, कशीदाकारीउस्ता अली रज़ा-रुकनुद्दीन; उस्ता कला व कशीदाकारी GI 2023
अजमेर-नागौर (किशनगढ़)किशनगढ़ शैली (बणी-ठणी)चित्रकार निहालचंद; "भारत की मोनालिसा"
जयपुर (ढूंढाड़)जयपुर शैली, ब्लू पॉटरी, सांगानेरी प्रिंट, मीनाकारी, गोटासूरतखाना (36 कारखाने); ब्लू पॉटरी GI 2009
अलवरअलवर चित्रशैलीहाथी-दाँत पर चित्रकारी; महाराजा विनयसिंह का स्वर्णकाल
झुंझुनूं-सीकर (शेखावाटी)शेखावाटी भित्ति-चित्रण"खुली आर्ट गैलरी"; नवलगढ़-मण्डावा की हवेलियाँ
बूंदी-कोटा (हाड़ौती)बूंदी-कोटा चित्रशैली, कोटा डोरियानाचते मोर का चित्रण (बूंदी विशिष्ट); कोटा डोरिया प्रथम GI (2006)
भीलवाड़ाफड़ चित्रणशाहपुरा — जोशी परिवार, श्रीलाल जोशी (पद्मश्री 2006)
प्रतापगढ़थेवा कलासोनी परिवार की गुप्त कला; एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका में उल्लेख; GI 2014
जैसलमेरजैसलमेर शैली, पोकरण पॉटरीपारदर्शी पहनावा; पोकरण पॉटरी GI 2018
पालीसोजत मेहंदीGI Tag सितंबर 2021
नागौरमकराना मार्बल, नागौरी अश्वगंधामार्बल GI 2015; अश्वगंधा GI जनवरी 2026 (नवीनतम)
📢 विज्ञापन
🔥 सबसे लोकप्रिय
📘

RAS Foundation Course 2026 🕉️

Multiple ValidityTests
₹4,999₹25,000
Join Now →
← अध्याय 2: स्मारक, जलाशय एवं विरासत स्थल अध्याय 4: लोक नृत्य एवं लोक नाट्य →