राजस्थान इतिहास · अध्याय 15/16

प्रजामंडल आंदोलन

Praja Mandal Movement in Rajasthan · RAS Prelims + Mains
अपडेटेड स्रोत PDF: पृष्ठ 206–223

उत्तरदायी शासन संघर्ष

कल्पना कीजिए — 1938 ई. में जयपुर के नाथमल का कटला में हजारों लोग एकत्र हैं, मंच पर सेठ जमनालाल बजाज अध्यक्षता कर रहे हैं और अगले ही दिन कस्तूरबा गांधी स्वयं महिला-सभा को संबोधित करती हैं। यह कोई साधारण सभा नहीं थी — यह जयपुर प्रजामंडल का प्रथम अधिवेशन था, जो रियासती जनता की सदियों पुरानी चुप्पी को तोड़ने वाला था। बिजोलिया, बेंगू व मानगढ़ जैसे किसान-जनजातीय आंदोलनों ने जो चिंगारी जलाई थी, प्रजामंडल आंदोलन ने उसे एक संगठित, राजनीतिक रूप दिया — "राजा के अधीन उत्तरदायी शासन" (Responsible Government under the Crown) की मांग के साथ। अगले दो दशकों में जयपुर से जैसलमेर तक, हर छोटी-बड़ी रियासत में यह मांग गूंजी, हजारों सत्याग्रहियों ने जेल भरी, कालीबाई जैसी किशोरियों ने बलिदान दिया — और अंततः यही जन-जागृति राजस्थान के एकीकरण का सबसे मजबूत आधार बनी।

1. परिचय — पृष्ठभूमि एवं शब्दावली ◆ प्रजामंडल आंदोलन राजस्थान की देशी रियासतों में चलाया गया वह राजनीतिक आंदोलन था, जिसका उद्देश्य निरंकु श राजतंत्र के स्थान पर "राजा के अधीन उत्तरदायी शासन" (जनता द्वारा चुनी गई जिम्मेदार सरकार) स्थापित करना था। यह

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के व्यापक आंदोलन से प्रेरित तथा जुड़ा हुआ था, परंतु सीधे कांग्रेस का अंग नहीं था क्योंकि रियासतों में कांग्रेस स्वयं कार्य नहीं कर सकती थी। ◆ प्रजामंडल आंदोलनों की जड़ें किसान व जनजातीय आंदोलनों (बिजोलिया, मेव, भील, मीणा ) की उसी असंतोष-भूमि में थीं, परंतु प्रजामंडल आंदोलन ने इसे संगठित राजनीतिक दलों व संविधान-आधारित मांगों का रूप दिया।

2. अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद (AISPC) एवं राजपूताना देशी राज्य लोक परिषद ◆ अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद (All India States Peoples' Conference — AISPC) की स्थापना 1927 ई. में बॉम्बे (मुंबई) में हुई — यह भारत की सभी देशी रियासतों के प्रजामंडलों/लोक परिषदों का सर्वोच्च छत्र-संगठन था। प्रथम अध्यक्ष दीवान रामचंद्र राव थे, उपाध्यक्ष विजयसिंह पथिक तथा राजपूताना व मध्य भारत के सचिव रामनारायण चौधरी बनाए गए। ◆ राजपूताना देशी राज्य लोक परिषद की स्थापना 1928 ई. में हुई; इसका प्रथम अधिवेशन 1931 ई. में अजमेर में आयोजित हुआ, जिसकी अध्यक्षता रामनारायण चौधरी ने की। ◆ 1938 ई. के हरिपुरा अधिवेशन में कांग्रेस ने औपचारिक रूप से प्रजामंडल आंदोलन को समर्थन दिया — उस समय कांग्रेस अध्यक्ष सुभाषचंद्र बोस थे। इससे प्रजामंडल आंदोलनों को राष्ट्रीय मान्यता व गति मिली।

संगठन (Organization) स्थापना (Year) स्थान (Place) प्रमुख व्यक्ति

अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद 1927 ई. बॉम्बे (मुंबई) रामचंद्र राव (अध्यक्ष), विजयसिंह पथिक (AISPC) (उपाध्यक्ष)

राजपूताना देशी राज्य लोक परिषद 1928 ई. अजमेर रामनारायण चौधरी

हरिपुरा अधिवेशन (कांग्रेस समर्थन) 1938 ई. हरिपुरा (गुजरात) सुभाषचंद्र बोस (कांग्रेस अध्यक्ष)

महत्व की तीन कसौटियां: राजनीतिक महत्व — उत्तरदायी शासन की स्थापना, राजनीतिक चेतना का विकास, राष्ट्रीय एकता को बल, राजतंत्र का अंत व लोकतंत्र की स्थापना, राजस्थान के शांतिपूर्ण एकीकरण (अध्याय 16) में योगदान। सामाजिक महत्व — सामाजिक कु रीतियों में कमी, अस्पृश्यता-निवारण, महिला सशक्तिकरण, शिक्षा का प्रसार, नागरिक असमानता का विरोध। आर्थिक महत्व — स्वदेशी वस्तुओं को बढ़ावा, किसान आंदोलनों को समर्थन, भूमि पर किसान के अधिकार, जागीरदारी व बेगार प्रथा की समाप्ति।

3. प्रजामंडल-पूर्व संगठन (1905-1935) — प्रारंभिक जन-जागृति प्रजामंडलों की स्थापना से पूर्व राजस्थान में कई छोटे-छोटे सामाजिक-राजनीतिक संगठन बने, जिन्होंने शिक्षा, समाज-सुधार व राष्ट्रीय चेतना के प्रसार का कार्य किया — इन्हीं संगठनों के कार्यकर्ता आगे चलकर प्रजामंडलों के प्रमुख नेता बने।

संगठन (Organization) वर्ष स्थान संस्थापक/संबंधित व्यक्ति

जैन शिक्षा प्रचारक समिति 1905 ई. जयपुर अर्जुनलाल सेठी

अभिनव भारत समिति 1907 ई. जयपुर अर्जुनलाल सेठी, गोपाल सिंह, के सरी सिंह

सर्वहितकारिणी सभा 1907 ई. चूरू कन्हैयालाल ढूंढ, स्वामी गोपालदास

वर्धमान विद्यालय 1907 ई. जयपुर अर्जुनलाल सेठी

आचार सुधारिणी सभा 1910 ई. धौलपुर यमुना प्रसाद शर्मा

वीर भारत सभा 1910 ई. अजमेर के सरी सिंह बारहठ, गोपाल सिंह

मारुधरा हितकारिणी सभा 1915 ई. जोधपुर जयनारायण व्यास, भंवरलाल

राजपूताना मध्य भारत सभा 1918 ई. दिल्ली जमनालाल बजाज, विजयसिंह पथिक

राजस्थान सेवा संघ 1919 ई. वर्धा (बाद में ब्यावर/अजमेर) विजयसिंह पथिक

राजपूत सेवा संघ 1920 ई. जोधपुर जयनारायण व्यास

अमर सेवा समिति 1922 ई. चिड़ावा पं. प्यारेलाल गुप्ता

अस्पृश्यता निवारण संघ 1923 ई. अलवर हरिनारायण शर्मा

राजस्थान चरखा संघ 1925 ई. अजमेर जमनालाल बजाज

हरिजनोद्धार सभा 1925 ई. कोटा नंदलाल शर्मा

नागरिक प्रचारिणी सभा 1934 ई. धौलपुर ज्वालाप्रसाद जिज्ञासु

खादी आश्रम 1934 ई. डूंगरपुर माणिक्यलाल वर्मा

राजस्थान सेवक मंडल 1935 ई. — भोगीलाल पांड्या

A. राजनीतिक कार्यकर्ताओं की पहली पीढ़ी — चार प्रमुख नेता ◆ राजस्थान में राजनीतिक कार्यकर्ताओं की पहली पीढ़ी में चार नाम प्रमुख हैं — अर्जुनलाल सेठी (1880-1941), के सरीसिंह बारहठ (1872-1941), स्वामी गोपालदास (1882-1939) एवं राव गोपालसिंह खरवा (1872-1956)। इनकी गतिविधियां समाज-सेवा, शिक्षा-प्रोत्साहन व देशप्रेम फै लाने की थीं। ◆ अर्जुनलाल सेठी — इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक; चौमूं के ठाकु र देवीसिंह के निजी सचिव का पद छोड़ा, कुछ समय मथुरा के एक जैन स्कू ल में अध्यापक रहे, 1906 में जयपुर आकर युवकों को क्रांति के लिए तैयार करने लगे। उनकी वर्धमान पाठशाला "क्रांतिकारियों की नर्सरी" थी — प्रतापसिंह बारहठ इसी के छात्र थे। एक महंत की हत्या के झूठे आरोप में जेल गए और 6 वर्ष बाद 1920 में मुक्त होकर राष्ट्रीय आंदोलन में जुट गए। ◆ स्वामी गोपालदास — चूरू के पास जन्मे; बीकानेर की वास्तविक स्थिति जनता को बताने के कारण महाराजा गंगासिंह ने उन्हें बहुत परेशान किया। उन्होंने चूरू में लड़कियों के लिए स्कू ल खोला, तालाबों की मरम्मत कराई और कु एं खुदवाए।

◆ राव गोपालसिंह खरवा — सामंत परिवार में जन्म लेकर भी अपनी पुश्तैनी जागीर देश की आजादी के लिए दांव पर लगा दी। के सरीसिंह बारहठ ने लिखा — "जिस प्रकार पंजाब को लाला लाजपतराय पर और महाराष्ट्र को बाल गंगाधर तिलक पर गर्व है, उसी प्रकार राजस्थान को राव गोपालसिंह खरवा पर गर्व है।" ◆ उस समय के वातावरण को समझिए — रूढ़िवादी व्यवस्था पर टिप्पणी अपराध थी; बाहर से समाचार-पत्र मंगवाना, टाइप मशीन या छापने की मशीन (चक्रमुद्रण यंत्र) रखना भी अपराध माना जाता था; रासबिहारी घोष, महर्षि अरविंद या शचींद्र सान्याल से मिल लेना ही "क्रांतिकारी" माने जाने के लिए काफी था।

B. क्रांतिकारी गतिविधियां ◆ बंगाल के क्रांतिकारियों ने राजपूताना में संपर्क बनाकर कार्यक्षेत्र बढ़ाया। प्रमुख क्रांतिकारी — विजयसिंह पथिक, अर्जुनलाल सेठी, के सरीसिंह बारहठ, प्रतापसिंह बारहठ व राव गोपालसिंह खरवा। अगस्त 1909 में वायसराय लॉर्ड मिंटो ने राजाओं को क्रांतिकारी साहित्य-समाचार पत्रों पर रोक लगाने और क्रांतिकारी गतिविधियां कु चलने के निर्देश दिए, पर ये प्रतिबंध कारगर नहीं हुए। फिर भी क्रांतिकारी आंदोलन जनसाधारण में अपनी जमीन नहीं बना सका — राजस्थान में भी गांधीवादी तरीके ही लोकप्रिय रहे। ◆ शाहपुरा का बारहठ परिवार राजस्थान के क्रांतिकारियों का जनक माना जाता है। 1903 में ठाकु र के सरीसिंह बारहठ ने "चेतावनी रा चूंगट्या" नामक सोरठे मेवाड़ महाराणा फतहसिंह को भेजे, जिसके कारण महाराणा ने दिल्ली दरबार में भाग नहीं लिया। क्रांति के लिए धन जुटाने हेतु कोटा के महंत साधु प्यारेलाल की हत्या के मामले में उन्हें 20 वर्ष की सजा हुई और बिहार की हजारीबाग जेल में रखा गया; 1919 में मुक्त होकर कोटा पहुंचे तो पुत्र प्रतापसिंह की शहादत का समाचार मिला। बाद में गांधीजी के संपर्क से वे अहिंसा के पक्षधर हो गए। ◆ खरवा ठाकु र गोपालसिंह ने रासबिहारी बोस व बंगाल के क्रांतिकारियों के संपर्क में आकर 21 फरवरी 1915 को राजस्थान में सशस्त्र क्रांति शुरू करने का उत्तरदायित्व लिया। योजना असफल होने पर उन्हें टाडगढ़ में नजरबंद किया गया, वहां से फरार हुए, पुनः पकड़कर अजमेर जेल में रखे गए और 1920 में मुक्त होकर शांतिपूर्ण राजनीति में लग गए। ◆ 1931 में भगतसिंह को फांसी के बाद उग्रवादी फिर सक्रिय हुए — अजमेर व पुष्कर की दीवारों पर "भगतसिंह जिंदाबाद" लिखा गया; चिरंजीलाल ने क्रांतिकारी दल बनाया, ज्वालाप्रसाद शर्मा व रमेशचंद्र व्यास जैसे लोग इससे जुड़े।

C. अजमेर में प्रारंभिक राष्ट्रीय गतिविधियां (1920-1921) ◆ 1920 में अजमेर में जमनालाल बजाज की अध्यक्षता में "राजपूताना मध्य भारत सभा" का आयोजन हुआ, जिसमें अर्जुनलाल सेठी, के सरीसिंह बारहठ, राव गोपालसिंह खरवा व विजयसिंह पथिक ने भाग लिया। इसी वर्ष अजमेर में खिलाफत समिति की बैठक हुई (डॉ. अंसारी, शेख अब्बास अली, चांदकरण शारदा)। अक्टूबर 1920 में राजस्थान सेवा संघ वर्धा से अजमेर लाया गया। ◆ 15 मार्च 1921 को अजमेर में द्वितीय राजनीतिक कॉन्फ्रें स हुई — अध्यक्षता मौलाना शौकत अली ने की, मोतीलाल नेहरू उपस्थित थे और विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार का आह्वान हुआ। पं. गौरीशंकर भार्गव ने अजमेर में विदेशी वस्त्र-बहिष्कार की अगुवाई कर "प्रथम गांधीवादी" बनने का गौरव पाया। 28 नवंबर 1921 को प्रिंस ऑफ वेल्स के अजमेर आगमन पर स्वागत की जगह बहिष्कार, हड़ताल व दुकानें बंद रखी गईं।

D. जन-जागरण के अन्य तत्व ◆ आर्य समाज — स्वामी दयानंद सरस्वती पहली बार 1865 में करौली के राजकीय अतिथि बनकर आए और किशनगढ़, जयपुर, पुष्कर व अजमेर में उपदेश दिए; दूसरी बार 1881 में भरतपुर होते हुए जयपुर, अजमेर, ब्यावर, मसूदा, बनेड़ा से चित्तौड़ पहुंचे, जहां कविराज श्यामलदास ने स्वागत किया। महाराणा सज्जनसिंह (1874-1884) के अनुरोध पर उदयपुर गए; अगस्त 1882 में पुनः उदयपुर पहुंचकर "सत्यार्थ प्रकाश" के द्वितीय संस्करण की भूमिका लिखी और फरवरी 1883 में उनके सान्निध्य में "परोपकारिणी सभा" बनी। 1883 में जोधपुर में महाराजा जसवंतसिंह, सर प्रतापसिंह व रावराजा तेजसिंह उनसे प्रभावित हुए; नन्हीजान प्रसंग के बाद बीमार होकर अजमेर में 1883 में उनका देहांत हुआ।

◆ दयानंद ने स्वधर्म, स्वराज्य, स्वदेशी व स्वभाषा पर जोर दिया; अजमेर में आर्य समाज की स्थापना हुई और मेवाड़ में विष्णुलाल पंड्या ने आर्य समाज स्थापित किया। आर्य समाज ने हिंदी, वैदिक धर्म, स्वदेशी, खादी-प्रचार, हरिजन-उद्धार व शिक्षा-प्रसार को मिशन बनाया — अजमेर में हरविलास शारदा व चांदकरण शारदा ने कु रीतियों के विरुद्ध आवाज उठाई; भरतपुर के मास्टर आदित्येंद्र व जुगलकिशोर चतुर्वेदी आर्य समाज के ही कार्यकर्ता थे। ◆ प्रगतिशील शासक — मेवाड़ के महाराणा फतहसिंह, अलवर के महाराजा जयसिंह और भरतपुर के महाराजा कृ ष्णसिंह (किशनसिंह) अपनी राष्ट्रीय विचारधारा व अंग्रेजी दखल रोकने के कारण ब्रिटिश सरकार के कोपभाजन बने। "तरुण राजस्थान" (10 जनवरी 1924) ने अपदस्थ महाराणा के बारे में लिखा — "यदि महाराणा गोरी सरकार के अंधभक्त होते तो शायद मेवाड़ के प्राचीन गौरव का नाश करने वाला यह अत्याचारपूर्ण हस्तक्षेप न हुआ होता।" अलवर के जयसिंह ने 1903 के आसपास बाल- विवाह, अनमेल विवाह व मृत्युभोज पर रोक लगाई, हिंदी को राजभाषा बनाया, पंचायतों का जाल बिछाया और बी.एच.यू., अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय व सनातन धर्म कॉलेज लाहौर को आर्थिक सहायता दी — अंततः उन्हें निर्वासित होना पड़ा। ◆ व्यापारी वर्ग — प्रथम विश्वयुद्ध के बाद व्यापारियों की सोच सत्ता-विरोधी होने लगी; कलकत्ता का मारवाड़ी मंडल राष्ट्रीय विचारों को प्रोत्साहन दे रहा था। प्रमुख नाम — बीकानेर में खूबराम सर्राफ व सत्यनारायण सर्राफ; जोधपुर में आनंदराज सुराणा, चांदमल सुराणा, भंवरलाल सर्राफ, प्रयागराज भंडारी; जयपुर में टीकाराम पालीवाल व गुलाबचंद कासलीवाल। ◆ सेठ दामोदरदास राठी (ब्यावर) — कु शल उद्योगपति होते हुए भी अर्जुनलाल सेठी, के सरीसिंह बारहठ, राव गोपालसिंह खरवा व विजयसिंह पथिक के साथ क्रांति-मार्ग पर रहे। 1914 में अपनी कृ ष्णा मिल के बहीखाते व सारा काम हिंदी में करने का संकल्प लिया; ब्यावर में "नागरी प्रचारिणी सभा" स्थापित की और अजमेर-मेरवाड़ा की अदालतों में नागरी लिपि-हिंदी के प्रयोग का आंदोलन चलाया, जिसके बाद अंग्रेज कमिश्नर ने राजकीय कार्य हिंदी में करना स्वीकार किया। ◆ खादी — गांधीजी के रचनात्मक कार्यक्रम पर निरंकु श शासक भी आपत्ति नहीं कर पाते थे और खादी गांव के गरीबों के लिए रोजगार का साधन थी; इसलिए गांधी टोपी व खादी स्वतंत्रता आंदोलन के प्रतीक बन गए। इसकी देखरेख जमनालाल बजाज के जिम्मे थी; गोकु लभाई भट्ट व अन्य खादी कार्यकर्ताओं का योगदान उल्लेखनीय रहा। ◆ कवियों का योगदान — भरतपुर के ब्राह्मण कवि हुलासी ने 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में ही वीर-रस के गीतों से अंग्रेजों के विरोध का आह्वान किया; भरतपुर के राजनीतिक आंदोलनों पर सबसे अधिक रचनाएं ग्रामीण कवि पूर्णसिंह की हैं, जो 1939-1947 के सभी आंदोलनों में सक्रिय रहे। जन-जागरण का हुंकार फूं कने वालों में बूंदी के सूर्यमल्ल मीसण (1815-1868) व मारवाड़ के शंकरदान सामोर (1824-1878) विशेष उल्लेखनीय हैं।

4. जयपुर प्रजामंडल (1931) — राजस्थान का प्रथम प्रजामंडल

✊ जयपुर प्रजामंडल (1931-1947 ई.) राजस्थान का प्रथम प्रजामंडल — संस्थापक कपूरचंद पाटनी एवं जमनालाल बजाज

◆ स्थापना — 1931 ई., संस्थापक कपूरचंद पाटनी (जमनालाल बजाज के सहयोग से) — यह राजस्थान की प्रथम रियासत का प्रथम प्रजामंडल था। ◆ 5 अप्रैल 1931 — जयपुर में "मोतीलाल दिवस" मनाया गया; 1936 ई. में जयपुर ने शेखावाटी किसान आंदोलन (अध्याय 14) को समर्थन दिया। ◆ पुनर्गठन (1936-37) — जमनालाल बजाज के प्रयासों से वनस्थली से हीरालाल शास्त्री को आमंत्रित कर प्रधानमंत्री बनाया गया, चिरंजीलाल मिश्र सभापति व सचिव नियुक्त हुए। ◆ प्रथम अधिवेशन — 8-9 मई 1938 ई., नाथमल का कटला (जयपुर), अध्यक्ष जमनालाल बजाज; 10 मई 1938 ई. को कस्तूरबा गांधी ने महिला-सभा को संबोधित किया। ◆ जयपुर राज्य ने प्रजामंडल पर प्रतिबंध लगाया — इसके विरुद्ध सत्याग्रह हुआ, जमनालाल बजाज गिरफ्तार हुए; 1940 ई. में हीरालाल शास्त्री प्रजामंडल के अध्यक्ष बने।

◆ "जेंटलमैन एग्रीमेंट" — 17 सितंबर 1942 ई., जयपुर के प्रधानमंत्री मिर्जा इस्माइल एवं हीरालाल शास्त्री के बीच समझौता: उत्तरदायी शासन की स्थापना, अंग्रेजों को सहायता न देना, विद्रोहियों को गिरफ्तार न करना, शांतिपूर्ण आंदोलन की अनुमति — बदले में प्रजामंडल भारत छोड़ो आंदोलन में भाग नहीं लेगा। जयपुर की एम.आई. रोड मिर्जा इस्माइल के नाम पर रखी गई। ◆ "आजाद मोर्चा" — बाबा हरिश्चंद्र के नेतृत्व में गठित, इसने भारत छोड़ो आंदोलन (1942) में सक्रिय भाग लिया (अन्य नेता — रामकरण जोशी, दौलतमल भंडारी, गुलाबचंद कासलीवाल); 1945 ई. में यह जयपुर प्रजामंडल में विलीन हो गया। ◆ देवीशंकर तिवाड़ी — 1943 ई. में "लोकवाणी" समाचार-पत्र प्रकाशित किया, बाद में जयपुर प्रजामंडल अध्यक्ष बने; 1946 ई. में जयपुर राज्य के मंत्री बने — राजस्थान के प्रथम गैर-सरकारी (लोकनिर्वाचित प्रकृ ति के ) मंत्री।

◆ भारत छोड़ो आंदोलन में जयपुर की भूमिका विवादास्पद रही — प्रजामंडल का एक वर्ग (बाबा हरिश्चंद्र, रामकरण जोशी, दौलतमल भंडारी) आंदोलन से अलग नहीं रहना चाहता था। हीरालाल शास्त्री ने 17 अगस्त 1942 की शाम जयपुर की सार्वजनिक सभा में आंदोलन की घोषणा का आश्वासन दिया था, पर सभा में घोषणा की जगह सरकार से हुई समझौता-वार्ता की जानकारी दी — संभवतः प्रधानमंत्री मिर्जा इस्माइल से मैत्री व महाराजा के आश्वासनों के कारण। इसकी राज्य के भीतर-बाहर आलोचना हुई। आजाद मोर्चा का कार्यालय गुलाबचंद कासलीवाल के घर पर था और जयपुर के छात्रों ने शिक्षण संस्थाओं में हड़ताल करवा दी।

5. मारवाड़ (जोधपुर) प्रजामंडल — जयनारायण व्यास का योगदान

✊ जयनारायण व्यास (1899-1963 ई.) "लोकनायक" / "शेर-ए-राजस्थान" / "मास्साब" — मारवाड़ प्रजामंडल के प्रमुख निर्माता, राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री

◆ जन्म — 1899 ई., जोधपुर; 1915 ई. में मारुधरा हितकारिणी सभा तथा 1920 ई. में राजपूत सेवा संघ, जोधपुर की स्थापना में सक्रिय भूमिका निभाई। ◆ मारवाड़ देशी राज्य लोक परिषद की स्थापना 1929 ई. में की — प्रथम अधिवेशन 1931 ई. में पुष्कर (अजमेर) में हुआ, अध्यक्ष चांदकरण शारदा, प्रतिभागी मणिलाल कोठारी, काका कालेलकर व कस्तूरबा गांधी। ◆ 10 मई 1931 ई. को "मारवाड़ युवक लीग" की स्थापना की, जिसका बाद में नाम "बाल भारत सभा" रखा गया। ◆ 1936 ई. में अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद (AISPC) के महासचिव बने; भारत छोड़ो आंदोलन (1942) के दौरान सिवाना दुर्ग में नजरबंद रखे गए। ◆ ग्रंथ रचना — "मारवाड़ की अवस्था", "पोपाबाई की पोल", "मार्च से संघर्ष क्यों?"। ◆ बाद में राजस्थान के मनोनीत तथा फिर निर्वाचित मुख्यमंत्री बने — दोनों रूपों में मुख्यमंत्री रहने वाले वे राजस्थान के एकमात्र नेता हैं।

घटना/संगठन (Event/Org) वर्ष (Year) विवरण (Detail)

मारवाड़ हितकारिणी सभा 1918 ई. संस्थापक चांदमल सुराणा

मारवाड़ सेवा संघ 1920 ई. स्थापना

मारवाड़ प्रजामंडल पुनर्गठन 1923/1934 ई. जयनारायण व्यास द्वारा पुनर्गठित, अध्यक्ष भंवरलाल सर्राफ

चांदी तिरंगा फहराव 1932 ई. छगनराज चोपासनीवाला ने जोधपुर में तिरंगा फहराया

तौल आंदोलन (Weight — 100 तोला के स्थान पर 80 तोला 1 सेर करने के विरुद्ध आंदोलन Movement)

कृ ष्ण दिवस 1936 ई., बॉम्बे कृ ष्ण-अपहरण मामले के विरुद्ध मनाया गया

शिक्षा दिवस 1936 ई., जोधपुर स्कू ल फीस वृद्धि के विरुद्ध

चांडावल कांड (पाली) 28 मार्च 1942 ई. किसान सभा पर लाठीचार्ज

डाबड़ा कांड (नागौर) 13 मार्च 1947 ई. शहीद मोतीराम-चुन्नीलाल; घायल माथुरादास माथुर

◆ शहीद बालमुकुं द बिस्सा — डीडवाना तहसील के पीलवा गांव में जन्मे बिस्सा ने 1934 में गांधीजी से प्रेरित होकर जोधपुर में खादी भंडार खोला; उनका "जवाहर खादी भंडार" जल्द ही राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बन गया। 1942 के उत्तरदायी शासन आंदोलन में गिरफ्तार हुए और जेल में भूख-हड़ताल व यातनाओं से शहीद हो गए — उनसे प्रेरित होकर अनेक युवा प्रजामंडल आंदोलन में कू द पड़े। ◆ भारत छोड़ो आंदोलन में जोधपुर — राजस्थान में 1942 के आंदोलन में जोधपुर राज्य का योगदान महत्वपूर्ण रहा; लगभग 400 व्यक्ति जेल गए। जेल जाने वालों में मथुरादास माथुर, देवनारायण व्यास, गणेशीलाल व्यास, सुमनेश जोशी, अचलेश्वर प्रसाद शर्मा, छगनराज चौपासनीवाला, स्वामी कृ ष्णानंद, द्वारका प्रसाद पुरोहित आदि थे; विद्यार्थियों ने बम बनाकर सरकारी संपत्ति नष्ट की। महिलाओं में गोरजा देवी जोशी, सावित्री देवी भाटी, सिरेकं वल व्यास व राजकौर व्यास ने गिरफ्तारियां दीं। दमन से आंदोलन कुछ समय शिथिल पड़ा, पर जयनारायण व्यास आंदोलन समाप्त करने के दबाव के आगे नहीं झुके ।

6. मेवाड़ प्रजामंडल (1938) — माणिक्यलाल वर्मा एवं सारदा किला

✊ मेवाड़ प्रजामंडल (1938-1947 ई.) स्थापना 24 अप्रैल 1938 — अध्यक्ष बलवंत सिंह मेहता, महामंत्री माणिक्यलाल वर्मा

◆ स्थापना — 24 अप्रैल 1938 ई., साहित्य कु टीर (उदयपुर) — अध्यक्ष बलवंत सिंह मेहता, उपाध्यक्ष भूरेलाल बया, महामंत्री माणिक्यलाल वर्मा; प्रथम सत्याग्रही रमेशचंद्र व्यास बने। ◆ उदयपुर सरकार ने 24 सितंबर 1938 ई. को मेवाड़ प्रजामंडल को गैर-कानूनी घोषित किया — माणिक्यलाल वर्मा को मेवाड़ से निष्कासित किया गया तथा सभा-जुलूस पर प्रतिबंध लगाया गया। ◆ भूरेलाल बया को सारदा किले (उदयपुर) में नजरबंद किया गया — इसी कारण सारदा किले को "मेवाड़ का कालापानी" कहा जाता है। ◆ 22 फरवरी 1941 ई. को प्रतिबंध हटा — प्रजामंडल ने सदस्यता अभियान चलाया; 25-26 नवंबर 1941 ई. को प्रथम अधिवेशन उदयपुर में हुआ, अध्यक्ष माणिक्यलाल वर्मा। ◆ 7वां अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद (AISPC) अधिवेशन — 1946 ई., सालेटिया मैदान (उदयपुर), अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू — मेवाड़ प्रजामंडल के राष्ट्रीय कद का प्रमाण। ◆ बलवंत सिंह मेहता (जन्म 1900, उदयपुर) — 1915 ई. में प्रताप सभा की स्थापना में सहभागी रहे; 1943 ई. में उदयपुर में "वनवासी छात्रावास" स्थापित किया, जिसमें जनजातीय छात्रों की शिक्षा पर बल दिया गया।

"सारदा किला — जहां दीवारें कै द कर सकती थीं, पर विचारों को नहीं।" — मेवाड़ प्रजामंडल की स्मृति परंपरा ("मेवाड़ का कालापानी")

◆ माणिक्यलाल वर्मा प्रजामंडल की स्थापना के लिए साइकिल पर निकल पड़े थे। भारत छोड़ो आंदोलन पर इंदौर में पूछे जाने पर उन्होंने कहा — "भाई हम तो मेवाड़ी हैं, हर बार हर-हर महादेव बोलते आए हैं, इस बार भी बोलेंगे।" बम्बई से लौटकर उन्होंने 20 अगस्त 1942 को महाराणा को ब्रिटिश सरकार से संबंध तोड़ने का अल्टीमेटम दिया; महाराणा ने ध्यान नहीं दिया और अगले दिन वर्मा गिरफ्तार कर लिए गए। ◆ इसके बाद उदयपुर में भूरेलाल बया, बलवंतसिंह मेहता, मोहनलाल सुखाड़िया, मोतीलाल तेजावत, शिवचरण माथुर, हीरालाल कोठारी, प्यारचंद विश्नोई, रोशनलाल बोर्दिया आदि गिरफ्तार हुए। नारायणी देवी वर्मा अपने 6 माह के पुत्र को गोद में लेकर जेल गईं; प्यारचंद विश्नोई की पत्नी भगवती देवी भी जेल गईं। महाराणा कॉलेज सहित शिक्षण संस्थाएं कई दिन बंद रहीं और लगभग 600 छात्र गिरफ्तार हुए। नाथद्वारा संघर्ष का दूसरा बड़ा केंद्र था; भीलवाड़ा व चित्तौड़ भी केंद्र रहे — मेवाड़ प्रजामंडल के प्रथम सत्याग्रही रमेशचंद्र व्यास (भीलवाड़ा) आंदोलन शुरू होते ही गिरफ्तार हुए।

7. बीकानेर प्रजामंडल एवं प्रजा परिषद ◆ बीकानेर प्रजामंडल की स्थापना 4 अक्टूबर 1936 ई. को कलकत्ता (कोलकाता) में प्रवासी बीकानेरवासियों द्वारा वैद्य मघाराम की अध्यक्षता में हुई — अन्य सहयोगी लक्ष्मीदेवी आचार्य, मुक्तप्रसाद, रघुवरदयाल गोयल, भिक्षालाल बोहरा व शेराराम थे। ◆ 1942 ई. में रघुवीरदयाल गोयल ने बीकानेर में पृथक "बीकानेर राज्य प्रजा परिषद" का गठन किया — यह बीकानेर की आंतरिक राजनीति में सक्रिय एक समानांतर संगठन था। ◆ 26 अक्टूबर 1944 ई. को "बीकानेर दमन-विरोधी दिवस" (Anti-Repression Day) मनाया गया — 1932 ई. के "बीकानेर षड्यंत्र के स" में स्वामी गोपालदास, चंदनमल बहड़, सत्यनारायण सर्राफ व खूबराम सर्राफ गिरफ्तार हुए थे। ◆ 1 जुलाई 1946 ई. को रायसिंहनगर गोलीकांड में तिरंगा-जुलूस पर पुलिस गोलीबारी हुई, जिसमें बीरबल सिंह शहीद हुए — इंदिरा गांधी नहर की एक शाखा को उनकी स्मृति में "बीरबल शाखा" नाम दिया गया है (बीकानेर के किसान आंदोलनों — उदासर, दूधवाखारा, कांगड़ आदि का विस्तृत विवरण अध्याय 14 में देखें)। ◆ सर्वहितकारिणी सभा (1907, चूरू) — संस्थापक कन्हैयालाल ढूंढ व स्वामी गोपालदास — कबीर पाठशाला व पुत्री पाठशाला जैसी संस्थाएं स्थापित कीं; 26 जनवरी 1930 ई. को चूरू में तिरंगा फहराया गया। ◆ भारत छोड़ो आंदोलन में बीकानेर — यहां विशेष प्रभाव नहीं दिखा, क्योंकि प्रजा परिषद के नेता रघुवरदयाल गोयल पहले से ही राज्य से निर्वासित थे; बाद में उनके साथी गंगादास कौशिक व दाऊदयाल आचार्य गिरफ्तार हुए। नेमीचंद आंचलिया ने अजमेर के एक साप्ताहिक में बीकानेर के दमन की निंदा करने वाला लेख लिखा, तो उन्हें 7 वर्ष कठोर कारावास की सजा दी गई। राज्य में तिरंगा फहराना अपराध था, इसलिए कार्यकर्ताओं ने "झंडा सत्याग्रह" चलाया।

8. बूंदी, कोटा एवं हाड़ौती प्रजामंडल

प्रजामंडल स्थापना वर्ष संस्थापक/नेता विशेष तथ्य

बूंदी प्रजामंडल        1931 ई.          नित्यानंद, कांतिलाल, ऋषिदत्त मेहता     "राजस्थान" समाचार-पत्र (1923, ब्यावर) से जुड़ाव;
                                                                               बूंदी देशी राज्य लोक परिषद (ऋषिदत्त मेहता का
                                                                               संगठन)

हाड़ौती प्रजामंडल 1934 ई. पं. नयनूराम शर्मा, हाजी फै ज मोहम्मद बेगार-विरोधी आंदोलन का नेतृत्व (नयनूराम शर्मा —

अध्याय 14 में भी उल्लेखित)

कोटा प्रजामंडल 1939 ई. नयनूराम शर्मा, अभिन्न हरि, प्रथम अधिवेशन 1939 मांगरोल; द्वितीय अधिवेशन तनसुखलाल मित्तल 1940 कोटा

◆ कोटा में जन-जागृति के जनक पं. नयनूराम शर्मा थे — उन्होंने थानेदार के पद से इस्तीफा देकर सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया, विजयसिंह पथिक के राजस्थान सेवा संघ के सक्रिय सदस्य बने और कोटा में बेगार-विरोधी आंदोलन चलाया, जिससे बेगार की प्रताड़ना कम हुई। 1939 में उन्होंने पं. अभिन्न हरि के साथ उत्तरदायी शासन के उद्देश्य से कोटा राज्य प्रजामंडल बनाया; पहला अधिवेशन उन्हीं की अध्यक्षता में मांगरोल (बारां) में हुआ। ◆ भारत छोड़ो आंदोलन में कोटा — बम्बई से लौटते ही पं. अभिन्न हरि 13 अगस्त 1942 को गिरफ्तार हुए; प्रजामंडल अध्यक्ष मोतीलाल जैन ने 17 अगस्त को महाराव को अंग्रेजों से संबंध तोड़ने का अल्टीमेटम दिया, जिस पर शंभूदयाल सक्सेना, बेणीमाधव शर्मा, मोतीलाल जैन, हीरालाल जैन आदि गिरफ्तार हुए और नाथूलाल जैन ने बागडोर संभाली। विद्यार्थियों (छात्राओं सहित) ने पुलिस को बैरकों में बंद कर रामपुरा शहर कोतवाली पर अधिकार (14-16 अगस्त 1942) कर तिरंगा फहराया और जनता ने नगर-प्रशासन अपने हाथ में ले लिया; लगभग 2 सप्ताह बाद महाराव के दमन न करने के आश्वासन पर शासन लौटाया गया और गिरफ्तार कार्यकर्ता रिहा हुए।

9. अलवर, भरतपुर, धौलपुर एवं करौली प्रजामंडल

प्रजामंडल स्थापना वर्ष संस्थापक/नेता विशेष तथ्य

अलवर प्रजामंडल 1938 ई. हरिनारायण शर्मा भारत छोड़ो आंदोलन (1942) में भाग नहीं लिया; प्रथम अधिवेशन 1944, अध्यक्ष भवानीशंकर शर्मा

भरतपुर प्रजामंडल     1938 ई.           गोपीलाल यादव                        स्थापना रेवाड़ी में; जुगलकिशोर चतुर्वेदी — "राजस्थान के
                                                                           नेहरू"; समाचार-पत्र "वैभव"; जापान दिवस (16-17 अगस्त
                                                                           1945), इंडोनेशिया दिवस (28 अक्टूबर 1945)

धौलपुर प्रजामंडल 1936 ई. ज्वालाप्रसाद जिज्ञासु, कृ ष्णदत्त तासीमो कांड — 11 अप्रैल 1947 ई., शहीद पंचमसिंह- पालीवाल छत्तरसिंह

करौली प्रजामंडल 1938 ई. त्रिलोकचंद माथुर, चिरंजीलाल कुं वर मदनसिंह — करौली किसान आंदोलन (1927, अध्याय वर्मा, कुं वर मदनसिंह 14) से भी जुड़े

◆ भरतपुर में जन-जागृति — जगन्नाथदास अधिकारी व गंगाप्रसाद शास्त्री ने 1912 में "हिंदी साहित्य समिति" स्थापित की, जो शीघ्र ही एक विशाल पुस्तकालय बन गई। महाराजा किशनसिंह ने हिंदी को राजभाषा बनाया, गांवों-नगरों में स्वायत्तशासी संस्थाएं विकसित कीं, राज्य में अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन का अधिवेशन करवाया और उत्तरदायी शासन के पक्षधर थे — इसलिए अंग्रेजों ने उन्हें गद्दी छोड़ने को विवश किया। नए शासक ने सभाओं-प्रकाशनों पर रोक लगा दी और राष्ट्रीय नेताओं के चित्र रखना तक अपराध बना दिया; फिर भी गोपीलाल यादव, मास्टर आदित्येंद्र, जुगलकिशोर चतुर्वेदी के नेतृत्व में प्रजामंडल सक्रिय रहा। ◆ भारत छोड़ो आंदोलन में भरतपुर — प्रजा परिषद के मास्टर आदित्येंद्र, युगलकिशोर चतुर्वेदी, जगपतिसिंह, रेवतीशरण, हुक्मचंद, गौरीशंकर मित्तल, रमेश शर्मा आदि गिरफ्तार हुए; दो युवक डाकखानों व रेलवे स्टेशनों में तोड़फोड़ की योजना बनाते पकड़े गए। इसी बीच राज्य में बाढ़ आने पर प्रजा परिषद ने आंदोलन स्थगित कर राहत-कार्य शुरू किया; वार्ता के बाद राजनीतिक कै दी रिहा हुए और सरकार ने निर्वाचित सदस्यों के बहुमत वाली विधानसभा बनाना स्वीकार किया।

10. सिरोही एवं किशनगढ़ प्रजामंडल — गोकु लभाई भट्ट

✊ गोकु लभाई भट्ट (1939 ई. से सक्रिय) "राजस्थान के गांधी" — सिरोही प्रजामंडल के संस्थापक

◆ किशनगढ़ प्रजामंडल की स्थापना 1939 ई. में कांतिलाल चौथानी व जमालशाह के नेतृत्व में हुई — इसने भी उत्तरदायी शासन व नागरिक अधिकारों की मांग को आगे बढ़ाया।

11. शाहपुरा प्रजामंडल — राजस्थान की प्रथम उत्तरदायी सरकार ◆ शाहपुरा प्रजामंडल की स्थापना 1938 ई. में लादूराम व्यास व रमेशचंद्र ओझा के नेतृत्व में हुई। ◆ शाहपुरा को यह ऐतिहासिक गौरव प्राप्त है कि यहां राजस्थान की सबसे पहली उत्तरदायी सरकार (Responsible Government) की स्थापना हुई — गोकु ललाल असावा को इसका प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया। ◆ माणिक्यलाल वर्मा मेवाड़ प्रजामंडल हेतु साइकिल-यात्रा में शाहपुरा से गुजरे, तब उन्हें रमेशचंद्र ओझा व लादूराम व्यास जैसे उत्साही युवक मिले — उन्हीं की प्रेरणा से इन्होंने 1938 में शाहपुरा प्रजामंडल बनाया। शाहपुरा राज्य ने प्रजामंडल की गतिविधियों में अनावश्यक दखल नहीं दिया। भारत छोड़ो आंदोलन शुरू होते ही प्रजामंडल ने राज्य को अंग्रेजों से संबंध तोड़ने का अल्टीमेटम दिया, जिस पर रमेशचंद्र ओझा, लादूराम व्यास व लक्ष्मीनारायण कौटिया गिरफ्तार हुए; शाहपुरा के गोकु ललाल असावा पहले ही अजमेर में गिरफ्तार हो चुके थे।

विशेष उपलब्धि: शाहपुरा (छोटी सी ठिकानेदारी होते हुए भी) राजस्थान की उन गिनी-चुनी रियासतों में अग्रणी रही जहां प्रजामंडल आंदोलन ने व्यवहारिक रूप से उत्तरदायी शासन स्थापित करवाया — यह झालावाड़ में भी बाद में दोहराया गया (देखें अनुभाग 13)।

12. वागड़ क्षेत्र के प्रजामंडल — डूंगरपुर, बांसवाड़ा, कु शलगढ़, प्रतापगढ़

✊ भोगीलाल पांड्या (1935 ई. से सक्रिय) "वागड़ के गांधी" — डूंगरपुर प्रजामंडल के प्रमुख संस्थापक

◆ डूंगरपुर प्रजामंडल की स्थापना 1 अगस्त 1944 ई. को भोगीलाल पांड्या, हरिदेव जोशी व गौरीशंकर उपाध्याय के नेतृत्व में हुई — इससे पूर्व 1935 ई. में "राजस्थान सेवक मंडल" व 1938 ई. में "डूंगरपुर सेवा संघ" की स्थापना कर चुके थे। ◆ रास्तापाल कांड — 19 जून 1947 ई. को डूंगरपुर के रास्तापाल गांव में अपने शिक्षक सेंगाभाई को बचाते हुए भील किशोरी कालीबाई पुलिस की गोली से शहीद हुईं; साथ में नानाभाई भी शहीद हुए। ◆ कालीबाई के बलिदान की स्मृति में रास्तापाल में स्मारक बना; राजस्थान सरकार आज भी बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने हेतु "कालीबाई भील मेधावी छात्रा स्कू टी/छात्रवृत्ति योजना" संचालित करती है — यह इस बलिदान की जीवंत विरासत है। ◆ हरिदेव जोशी — राजस्थान के एकमात्र नेता जो राज्यपाल व मुख्यमंत्री दोनों पदों पर (मुख्यमंत्री पद पर दो बार) रहे।

◆ डूंगरपुर में 1935 में भोगीलाल पंड्या ने "हरिजन सेवा समिति" बनाई; उसी वर्ष शोभालाल गुप्त ने राजस्थान सेवक मंडल की ओर से हरिजनों व भीलों के हित में सागवाड़ा में आश्रम स्थापित किया। माणिक्यलाल वर्मा ने जनजातियों में काम हेतु डूंगरपुर आकर "बागड़ सेवा मंदिर" के माध्यम से भीलों में साक्षरता व कु रीति-निवारण का कार्य किया, पर राज्य सरकार ने इसकी रचनात्मक गतिविधियों पर जल्द नियंत्रण कर दिया। जेल में भोगीलाल पंड्या से अमानुषिक व्यवहार का गोकु लभाई भट्ट, माणिक्यलाल वर्मा, हीरालाल शास्त्री, रमेशचंद्र व्यास आदि ने जमकर विरोध किया, जिससे महारावल को पंड्या सहित अनेक कार्यकर्ताओं को छोड़ना पड़ा।

प्रजामंडल स्थापना वर्ष संस्थापक/नेता विशेष तथ्य

बांसवाड़ा प्रजामंडल 1943 ई. मणिशंकर नागर, धूलजी भाई विजया बहन भावसार ने "महिला मंडल" की स्थापना भावसार, भूपेंद्रनाथ त्रिवेदी की

कु शलगढ़ प्रजामंडल 1942 ई. भंवरलाल निगम वागड़ क्षेत्र की छोटी ठिकानेदारी में प्रजामंडल गतिविधि

प्रतापगढ़ प्रजामंडल 1945 ई. अमृतलाल पायक, चुन्नीलाल प्रभाकर, वागड़-मालवा सीमा क्षेत्र में उत्तरदायी शासन की मांग ठक्कर बापा

13. जैसलमेर एवं झालावाड़ प्रजामंडल ◆ जैसलमेर प्रजामंडल की स्थापना 1945 ई. में मीठालाल व्यास के नेतृत्व में हुई — विशेष तथ्य यह है कि जैसलमेर से दूर, जोधपुर में इसकी स्थापना की गई, क्योंकि जैसलमेर में स्वयं संगठन बनाना कठिन था।

सागरमल गोपा — जैसलमेर का अमर शहीद ◆ जैसलमेर रेगिस्तान के बीच एक पिछड़ी छोटी रियासत थी। सागरमल गोपा ने महारावल जवाहरसिंह के निरंकु श व दमनकारी शासन के विरुद्ध जनता को जगाया और 1940 में "जैसलमेर में गुंडाराज" नामक पुस्तक छपवाकर बंटवाई, जिस पर महारावल ने उन्हें राज्य से निर्वासित कर दिया। गोपा नागपुर से प्रचार करते रहे। ◆ मार्च 1941 में पिता के देहांत पर ब्रिटिश रेजिडेंट के आश्वासन (कि उन पर कोई आरोप नहीं है) के बाद वे जैसलमेर आए, पर लगभग दो माह बाद लौटते समय 22 मई 1941 को अचानक बंदी बना लिए गए। अमानवीय यातनाओं के बाद राजद्रोह में 6 वर्ष कठोर कारावास की सजा दी गई; जेल में थानेदार गुमानसिंह उन्हें लगातार यातनाएं देता रहा। ◆ गोपा के पत्रों पर जयनारायण व्यास ने रेजिडेंट से जांच का आग्रह किया; रेजिडेंट ने 6 अप्रैल 1946 को जैसलमेर जाने का कार्यक्रम बनाया, पर उससे पहले 3 अप्रैल 1946 को जेल में गोपा पर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी गई। लगभग 20 घंटे तड़पने के बाद 4 अप्रैल को वे चल बसे। शासन ने रिश्तेदारों तक को मिलने नहीं दिया; पूरा नगर "सागरमल गोपा जिंदाबाद" से गूंज उठा और पं. नेहरू व जयनारायण व्यास सहित अनेक नेताओं ने इस कांड की भर्त्सना की।

◆ झालावाड़ प्रजामंडल की स्थापना 1946 ई. में मांगीलाल भव्य, मकबूल आलम, कन्हैयालाल मित्तल व रतनलाल के नेतृत्व में हुई — झालावाड़ के अंतिम शासक राजराणा हरिश्चंद्र (1943-1948) ने स्वयं प्रजामंडल आंदोलन का समर्थन किया, जिसके फलस्वरूप झालावाड़ में भी उत्तरदायी शासन स्थापित हुआ (शाहपुरा के समान — देखें अनुभाग 11)।

14. सभी प्रजामंडलों की तुलनात्मक तालिका नीचे दी तालिका राजस्थान की सभी प्रमुख रियासतों के प्रजामंडलों को एक साथ प्रस्तुत करती है — रिवीजन व त्वरित तुलना के लिए यह तालिका सर्वाधिक उपयोगी है:

प्रजामंडल (रियासत) स्थापना वर्ष संस्थापक/प्रमुख नेता विशेष तथ्य

जयपुर प्रजामंडल 1931 ई. कपूरचंद पाटनी, जमनालाल बजाज राजस्थान का प्रथम प्रजामंडल; 1936-37 में हीरालाल शास्त्री द्वारा पुनर्गठित

बूंदी प्रजामंडल 1931 ई. नित्यानंद, कांतिलाल, ऋषिदत्त "राजस्थान" समाचार-पत्र (1923) से जुड़ाव मेहता

मारवाड़ प्रजामंडल 1934 ई. (पुनर्गठन) जयनारायण व्यास, भंवरलाल "तौल आंदोलन" के लिए प्रसिद्ध सर्राफ

हाड़ौती प्रजामंडल 1934 ई. नयनूराम शर्मा, हाजी फै ज मोहम्मद बेगार-विरोधी आंदोलन

सिरोही प्रजामंडल 1939 ई. गोकु लभाई भट्ट गोकु लभाई — "राजस्थान के गांधी"

बीकानेर प्रजामंडल 1936 ई., कलकत्ता वैद्य मघाराम 1944 — दमन-विरोधी दिवस मनाया गया

कोटा प्रजामंडल 1939 ई. नयनूराम शर्मा प्रथम अधिवेशन मांगरोल में हुआ

मेवाड़ प्रजामंडल 1938 ई. माणिक्यलाल वर्मा, बलवंत सिंह सारदा किला — "मेवाड़ का कालापानी" मेहता

अलवर प्रजामंडल 1938 ई. हरिनारायण शर्मा भारत छोड़ो आंदोलन में भाग नहीं लिया

भरतपुर प्रजामंडल 1938 ई. गोपीलाल यादव जुगलकिशोर चतुर्वेदी — "राजस्थान के नेहरू"

शाहपुरा प्रजामंडल 1938 ई. लादूराम व्यास राजस्थान की प्रथम उत्तरदायी सरकार स्थापित

धौलपुर प्रजामंडल 1936 ई. ज्वालाप्रसाद जिज्ञासु तासीमो कांड (1947)

करौली प्रजामंडल 1938 ई. त्रिलोकचंद माथुर कुं वर मदनसिंह भी संस्थापकों में शामिल

किशनगढ़ प्रजामंडल 1939 ई. कांतिलाल चौथानी, जमालशाह —

कु शलगढ़ प्रजामंडल 1942 ई. भंवरलाल निगम वागड़ की छोटी ठिकानेदारी

बांसवाड़ा प्रजामंडल 1943 ई. मणिशंकर नागर, धूलजी भावसार विजया बहन भावसार — महिला मंडल की स्थापना

डूंगरपुर प्रजामंडल 1944 ई. (1 अगस्त) भोगीलाल पांड्या कालीबाई का बलिदान (1947, रास्तापाल)

जैसलमेर प्रजामंडल 1945 ई. मीठालाल व्यास जोधपुर में स्थापित

प्रतापगढ़ प्रजामंडल 1945 ई. अमृतलाल पायक —

झालावाड़ प्रजामंडल 1946 ई. मांगीलाल भव्य शासक राजराणा हरिश्चंद्र का समर्थन, उत्तरदायी

शासन स्थापित

★ प्रजामंडल — त्वरित स्मरण-बिंदु ★

  1. जयपुर प्रजामंडल (1931) राजस्थान का प्रथम प्रजामंडल था; बूंदी प्रजामंडल भी उसी वर्ष 1931 ई. में स्थापित हुआ।
  2. शाहपुरा व झालावाड़ — दोनों रियासतों में प्रजामंडल आंदोलन ने व्यवहारिक रूप से उत्तरदायी शासन स्थापित करवाया।
  3. मेवाड़ प्रजामंडल का सारदा किला ("मेवाड़ का कालापानी") — भूरेलाल बया की नजरबंदी का स्थान।
  4. गोकु लभाई भट्ट (सिरोही) को "राजस्थान के गांधी" तथा भोगीलाल पांड्या (डूंगरपुर) को "वागड़ के गांधी" कहा जाता है।
  5. जयपुर के "जेंटलमैन एग्रीमेंट" (17 सितंबर 1942) के तहत प्रजामंडल भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल नहीं हुआ था।

15. महिलाओं की भूमिका — प्रजामंडल आंदोलन में नारी शक्ति प्रजामंडल आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी न केवल सहयोगी रही, बल्कि कई अवसरों पर उन्होंने स्वतंत्र नेतृत्व भी किया — सत्याग्रह, जेल-यात्रा, महिला-संगठनों की स्थापना व शिक्षा-प्रसार में उनका योगदान अविस्मरणीय है।

महिला नेत्री संबंध/क्षेत्र योगदान

किशोरी देवी पत्नी, सरदार हरलाल सिंह 25 अप्रैल 1934 कटराथल सम्मेलन की अध्यक्षता (विस्तार अध्याय 14)

प्रकाशवती सिन्हा अजमेर राजनीतिक चेतना व नागरिक अधिकारों के आंदोलनों में विशेष उल्लेखनीय नाम; 1930-1947 के बीच अनेक महिलाएं जेल गईं

नारायणी देवी वर्मा पत्नी, माणिक्यलाल वर्मा 1944 भीलवाड़ा में महिला आश्रम स्थापित; डूंगरपुर के खांडलाई क्षेत्र में भील शिक्षा- प्रसार; 1970-76 राज्यसभा सदस्य

स्नेहलता वर्मा पुत्री, माणिक्यलाल वर्मा पिता के नेतृत्व में बिजोलिया किसान आंदोलन में भागीदारी

रतन शास्त्री पत्नी, हीरालाल शास्त्री 1939 जयपुर प्रजामंडल सत्याग्रह; 1942 भारत छोड़ो आंदोलन में भूमिगत सेवा; 1955 पद्मश्री, 1975 पद्मभूषण

अंजना देवी चौधरी पत्नी, रामनारायण चौधरी बिजोलिया-बूंदी किसान सत्याग्रह में लगभग 500 महिलाओं का नेतृत्व; 1930 नमक सत्याग्रह, 6 माह कारावास

नागेंद्र बाला पौत्री, के सरी सिंह बारहठ 1941-47 किसान आंदोलनों में सक्रिय; स्वतंत्रता बाद कोटा की प्रथम महिला जिला प्रमुख

जानकी देवी बजाज पत्नी, जमनालाल बजाज 1944 जयपुर प्रजामंडल अधिवेशन की अध्यक्षता; भूदान आंदोलन; 1956 पद्मविभूषण

शांता त्रिवेदी उदयपुर निवासी 1947 उदयपुर में "राजस्थान महिला परिषद" की स्थापना

कालीबाई (भील रास्तापाल, डूंगरपुर 19 जून 1947 शिक्षक की रक्षा हेतु बलिदान — आज भी "कालीबाई भील छात्रवृत्ति किशोरी) योजना" के रूप में जीवंत विरासत

गोरजा       देवी   जोशी,     जोधपुर                          भारत छोड़ो आंदोलन (1942) में गिरफ्तारियां दीं
 सावित्री    देवी     भाटी,
 सिरेकं वल          व्यास,

राजकौर व्यास

भगवती देवी विश्नोई पत्नी, प्यारचंद विश्नोई (उदयपुर) भारत छोड़ो आंदोलन (1942) में जेल गईं

लक्ष्मीदेवी आचार्य बीकानेर प्रजामंडल संस्थापक सदस्य व अध्यक्ष; सविनय अवज्ञा व स्वदेशी आंदोलन में सक्रिय

विजया बहन भावसार पत्नी, धूलजी भावसार "महिला मंडल" की स्थापना (बांसवाड़ा)

सत्यभामा पुत्रवधू, नित्यानंद नागर (बूंदी) 1932 ब्यावर-अजमेर आंदोलन का नेतृत्व; गांधीजी की "मानस पुत्री"

◆ इन आंदोलनों का नेतृत्व करने वाली अधिकतर साधारण गृहिणियां थीं, जो अपने कार्यों से असाधारण बन गईं। जन-चेतना के विकास में रमादेवी पांडे, सुमित्रा देवी भार्गव, इंदिरा देवी शास्त्री, विद्या देवी, गौतमी देवी भार्गव, मनोरमा पंडित, मनोरमा टंडन, प्रियंवदा चतुर्वेदी और विजयाबाई का योगदान भी उल्लेखनीय रहा। 1942 की अगस्त क्रांति में छात्राओं ने अद्भुत शौर्य दिखाया — कोटा की रामपुरा पुलिस कोतवाली पर अधिकार करने वालों में छात्राएं भी शामिल थीं।

👩 राजनीतिक भागीदारी 📚 सामाजिक योगदान ◆ प्रजामंडल अधिवेशनों की अध्यक्षता (जानकी देवी बजाज, ◆ बलिदान — कालीबाई (1947, रास्तापाल) किशोरी देवी) ◆ शिक्षा-प्रसार — नारायणी देवी वर्मा (भील क्षेत्र) ◆ सत्याग्रह व जेल-यात्रा (रतन शास्त्री, अंजना देवी) ◆ राजनीतिक प्रतिनिधित्व — नारायणी देवी (राज्यसभा), नागेंद्र ◆ महिला-संगठनों की स्थापना (शांता त्रिवेदी, विजया बहन बाला (जिला प्रमुख) भावसार)

16. समाचार-पत्र एवं साहित्य ◆ प्रजामंडल आंदोलनों ने रियासती जनता तक अपनी बात पहुंचाने हेतु अनेक समाचार-पत्रों व पत्रिकाओं का सहारा लिया — इनमें से कई पत्र रियासती दरबारों द्वारा प्रतिबंधित भी किए गए। ◆ समाचार-पत्रों ने राजस्थान की समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर उजागर किया, रियासती आंदोलनों को बहस का हिस्सा बनाया और शोषण-अत्याचार का पर्दाफाश किया। शिक्षित वर्ग कम होते हुए भी लोग दूसरों से अखबार सुनने में बड़ी रुचि लेने लगे। इसका सबसे बड़ा प्रमाण बिजोलिया आंदोलन है — "प्रताप" में वहां के अत्याचार छपते ही पूरे देश में चर्चा होने लगी। विजयसिंह पथिक, रामनारायण चौधरी, जयनारायण व्यास आदि ने समाचार-पत्रों के माध्यम से राज्यों की समस्याओं पर चर्चा प्रारंभ की।

समाचार-पत्र/पत्रिका प्रकाशन स्थान/भाषा महत्व

राजपूताना गजट 1885 प्रारंभिक समाचार-पत्र — थोड़े समय बाद ही बंद हो गया

राजस्थान समाचार 1889 प्रारंभिक समाचार-पत्र — थोड़े समय बाद ही बंद हो गया

1920, पहले वर्धा फिर राजस्थान के सरी किसान आंदोलनों की खबरें अजमेर (विजयसिंह पथिक)

आदिवासी व किसान आंदोलनों का समर्थन; 1923 में बंद होकर "तरुण नवीन राजस्थान 1922, राजस्थान सेवा संघ राजस्थान" नाम से पुनः प्रकाशित

राजस्थान ब्यावर, 1923 (साप्ताहिक) हाड़ौती क्षेत्र की खबरें प्रकाशित; बूंदी प्रजामंडल से जुड़ाव; ऋषिदत्त मेहता द्वारा

प्रारंभ साप्ताहिक

अखंड भारत बॉम्बे, हिंदी जयनारायण व्यास द्वारा 1936 ई. में प्रारंभ

तरुण राजस्थान           अजमेर/ब्यावर, हिंदी, 1923                राजस्थान सेवा संघ द्वारा प्रारंभ (विस्तार अध्याय 14); "नवीन राजस्थान" पर
                                                                 प्रतिबंध के बाद निकला — संपादन में शोभालाल गुप्त, रामनारायण चौधरी,
                                                                 जयनारायण व्यास का योगदान; जोधपुर-सिरोही आदि के निरंकु श शासकों के
                                                                 विरुद्ध आवाज उठाई

पीप (Peep) दिल्ली, अंग्रेजी राष्ट्रीय स्तर पर रियासती मुद्दों का प्रचार

अंगीबाण ब्यावर, राजस्थानी प्रथम राजस्थानी भाषा राजनीतिक पत्र

त्याग भूमि अजमेर, 1927 (हरिभाऊ गांधीवादी विचारधारा व रचनात्मक कार्यक्रम; देशभक्ति, समाज-सुधार व स्त्री- उपाध्याय) उत्थान के लेख

नवज्योति, नवजीवन, 1930 के बाद 1930 के बाद समाचार-पत्रों की संख्या बढ़ी जयपुर समाचार

लोकवाणी जयपुर, हिंदी, 1943 देवीशंकर तिवाड़ी द्वारा प्रकाशित

वैभव भरतपुर भरतपुर प्रजामंडल का मुखपत्र

दैनिक नवज्योति — कै प्टन दुर्गाप्रसाद चौधरी बाद में संपादक बने

प्रकाश — कमला देवी (राजस्थान की प्रथम महिला पत्रकार) की लेखन-यात्रा का प्रारंभिक पत्र

17. प्रजामंडल आंदोलन का ऐतिहासिक महत्व एवं प्रभाव ◆ प्रजामंडल आंदोलनों ने राजस्थान की बिखरी हुई 19 से अधिक रियासतों की जनता में एक समान राजनीतिक चेतना का संचार किया — "उत्तरदायी शासन" की मांग सभी रियासतों में एक सूत्र में बंध गई। ◆ शाहपुरा व झालावाड़ जैसी रियासतों में उत्तरदायी शासन का व्यावहारिक क्रियान्वयन यह सिद्ध करता है कि यह आंदोलन केवल मांग-पत्रों तक सीमित नहीं रहा, अपितु ठोस राजनीतिक परिणाम भी लाया। ◆ प्रजामंडल आंदोलनों में प्रशिक्षित नेतृत्व — जयनारायण व्यास, माणिक्यलाल वर्मा, हीरालाल शास्त्री, मोहनलाल सुखाड़िया, टीकाराम पालीवाल, हरिदेव जोशी — स्वतंत्रता के बाद राजस्थान के प्रथम मुख्यमंत्रियों व मंत्रियों के रूप में राज्य के निर्माण में सीधे भागीदार बने। ◆ यही व्यापक जन-चेतना व संगठनात्मक अनुभव आगे चलकर राजस्थान के एकीकरण (विस्तार देखें: अध्याय 16) की सात- चरणीय प्रक्रिया (मार्च 1948-नवंबर 1956) में निर्णायक सिद्ध हुआ — मेवाड़ महाराणा भूपाल सिंह द्वारा प्रस्तावित "राजस्थान संघ" की अवधारणा भी इसी जन-दबाव व राजनीतिक परिपक्वता का परिणाम थी।

भारत छोड़ो आंदोलन (1942) और राजस्थान ◆ भारत छोड़ो प्रस्ताव 8 अगस्त 1942 को पारित हुआ और 9 अगस्त से "करो या मरो" के साथ आंदोलन शुरू हुआ। गांधीजी की गिरफ्तारी के विरोध में राजस्थान में भी जुलूस, सभाएं व हड़तालें हुईं; विद्यार्थी शिक्षण संस्थाओं से बाहर आ गए, कहीं रेल की पटरियां उखाड़ी गईं, तार-टेलीफोन काटे गए और स्थानीय जनता ने समानांतर सरकारें बनाईं। जवाब में भारी दमन हुआ — गोलियां चलीं, हजारों गिरफ्तार हुए।

रियासत/क्षेत्र मुख्य घटना प्रमुख नाम विशेष तथ्य

जोधपुर सत्याग्रह, छात्रों द्वारा जयनारायण व्यास, लगभग 400 लोग जेल गए — राजस्थान में सबसे

बम से सरकारी मथुरादास माथुर महत्वपूर्ण योगदान संपत्ति नष्ट

मेवाड़ 20 अगस्त 1942 माणिक्यलाल वर्मा, नाथद्वारा दूसरा प्रमुख केंद्र का अल्टीमेटम, 600 नारायणी देवी वर्मा छात्र गिरफ्तार

जयपुर                                         आंदोलन की घोषणा            हीरालाल        शास्त्री;   भूमिका विवादास्पद
                                              नहीं           (जेंटलमैन   बाबा          हरिश्चंद्र
                                              एग्रीमेंट)                 (आजाद मोर्चा)
कोटा                                          रामपुरा कोतवाली पर         अभिन्न            हरि,     लगभग 2 सप्ताह जनता का शासन
                                              अधिकार          (14-16     मोतीलाल           जैन,
                                              अगस्त)                     नाथूलाल जैन
भरतपुर                                        गिरफ्तारियां; बाढ़ के      मास्टर      आदित्येंद्र,   निर्वाचित बहुमत वाली विधानसभा स्वीकार
                                              कारण           आंदोलन      युगलकिशोर चतुर्वेदी
                                              स्थगित

शाहपुरा संबंध-विच्छेद का रमेशचंद्र ओझा, गोकु ललाल असावा अजमेर में गिरफ्तार अल्टीमेटम लादूराम व्यास

अजमेर                                         कांग्रेस के आह्वान पर      बालकृ ष्ण        कौल,      प्रकाशचंद ने गीत रचे; जेल-कु प्रबंध पर बालकृ ष्ण
                                              गिरफ्तारियां               हरिभाऊ उपाध्याय,           कौल की भूख-हड़ताल
                                                                         रामनारायण चौधरी,
                                                                         मुकु टबिहारी भार्गव,
                                                                         अंबालाल         माथुर,
                                                                         मौलाना         अब्दुल
                                                                         गफू र,      शोभालाल
                                                                         गुप्त
बीकानेर                                       झंडा सत्याग्रह             गंगादास      कौशिक,        विशेष प्रभाव नहीं; आंचलिया को 7 वर्ष कारावास
                                                                         दाऊदयाल आचार्य,
                                                                         नेमीचंद आंचलिया

अलवर, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, सिरोही, झालावाड़ सार्वजनिक सभाएं , स्थानीय कांग्रेस नेता आंदोलन की आग यहां भी फै ली हड़तालें, जुलूस

रियासती जन-आंदोलनों का सिंहावलोकन ◆ रियासती जनता को तीन शक्तियों — राजा, ठिकानेदार और ब्रिटिश सरकार — का एक साथ सामना करना पड़ा, जो मिलकर संघर्ष का दमन करती रहीं। फिर भी इन आंदोलनों ने सिद्ध कर दिया कि रियासतों की जनता भी ब्रिटिश भारत की जनता के साथ कं धे से कं धा मिलाकर देश को आजाद कराना चाहती है। जयपुर में जमनालाल बजाज व हीरालाल शास्त्री, जोधपुर में जयनारायण व्यास और सिरोही में गोकु लभाई भट्ट इसके शीर्ष नेता रहे। ◆ किसान व जनजातीय आंदोलन स्वस्फू र्त थे और इन्होंने सामंती व्यवस्था की कमजोरियां उजागर कीं; आजादी के बाद राजतंत्र व सामंत-प्रथा के अंत में इनकी भूमिका भुलाई नहीं जा सकती। बालमुकुं द बिस्सा व सागरमल गोपा जैसे बलिदान प्रेरणा-स्रोत बने। प्रजामंडलों ने अपने रचनात्मक कार्यों से सामाजिक सुधार, शिक्षा-प्रसार व बेगार-उन्मूलन की दिशा में कदम उठाए। ◆ यह कहना ठीक नहीं कि रियासती आंदोलन केवल संवैधानिक अधिकारों व उत्तरदायी शासन के लिए थे, स्वतंत्रता के लिए नहीं। डॉ. एम.एस. जैन के अनुसार — "स्वतंत्रता संघर्ष केवल बाह्य नियंत्रण के विरुद्ध ही नहीं होता, बल्कि निरंकु श सत्ता के विरुद्ध संघर्ष भी इसी श्रेणी में आते हैं।" दोहरी गुलामी झेल रही रियासती जनता के लिए उत्तरदायी शासन से बढ़कर कुछ नहीं

था। कई रियासतों में खादी-प्रचार व स्वदेशी शिक्षण संस्थाओं जैसे रचनात्मक कार्य तक प्रतिबंधित थे; कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन (1938) के समर्थन के बाद ही रियासती आंदोलन राष्ट्र की मुख्य धारा से जुड़ सका।

"राजा के अधीन उत्तरदायी शासन — यही हमारा एकमात्र लक्ष्य है, न विद्रोह, न विध्वंस, केवल जनता का अधिकार।" — प्रजामंडल आंदोलन की मूल भावना

18. अध्याय सार एवं समय-रेखा

★ अध्याय सार — महत्वपूर्ण तथ्य ★

1. अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद (AISPC) — स्थापना 1927 ई., बॉम्बे; प्रथम अध्यक्ष रामचंद्र राव। 2. राजपूताना देशी राज्य लोक परिषद — स्थापना 1928 ई., अजमेर; प्रथम अधिवेशन 1931 ई.। 3. जयपुर प्रजामंडल (1931) — राजस्थान का प्रथम प्रजामंडल, संस्थापक कपूरचंद पाटनी व जमनालाल बजाज। 4. जयपुर "जेंटलमैन एग्रीमेंट" — 17 सितंबर 1942, मिर्जा इस्माइल-हीरालाल शास्त्री के बीच। 5. मारवाड़ प्रजामंडल — जयनारायण व्यास, "तौल आंदोलन" के लिए प्रसिद्ध; भारत छोड़ो आंदोलन में सिवाना दुर्ग में नजरबंद। 6. मेवाड़ प्रजामंडल — स्थापना 24 अप्रैल 1938; प्रतिबंध 24 सितंबर 1938; प्रतिबंध समाप्ति 22 फरवरी 1941। 7. सारदा किला — "मेवाड़ का कालापानी", भूरेलाल बया की नजरबंदी स्थल। 8. 7वां AISPC अधिवेशन — 1946, सालेटिया मैदान (उदयपुर), अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू। 9. बीकानेर प्रजामंडल — स्थापना 4 अक्टूबर 1936, कलकत्ता, संस्थापक वैद्य मघाराम। 10. शाहपुरा व झालावाड़ — दोनों में प्रजामंडल आंदोलन से उत्तरदायी शासन व्यावहारिक रूप से स्थापित हुआ। 11. गोकु लभाई भट्ट — "राजस्थान के गांधी" (सिरोही प्रजामंडल, 1939)। 12. भोगीलाल पांड्या — "वागड़ के गांधी" (डूंगरपुर प्रजामंडल, 1 अगस्त 1944)। 13. रास्तापाल कांड — 19 जून 1947, कालीबाई व नानाभाई शहीद — आज भी बालिका-शिक्षा योजना के रूप में जीवंत। 14. तासीमो कांड (धौलपुर) — 11 अप्रैल 1947, शहीद पंचमसिंह-छत्तरसिंह। 15. देवीशंकर तिवाड़ी — राजस्थान के प्रथम गैर-सरकारी मंत्री (1946, जयपुर राज्य)। 16. प्रजामंडल आंदोलनों से प्रशिक्षित नेतृत्व ही स्वतंत्र राजस्थान के प्रथम मुख्यमंत्री व मंत्री बने। 17. प्रजामंडल आंदोलन राजस्थान के एकीकरण (अध्याय 16) की राजनीतिक-वैचारिक नींव बना।

नीचे दी समय-रेखा (Timeline) इस अध्याय के संपूर्ण घटनाक्रम को स्पष्ट करती है — रिवीजन के लिए इसे ज़रूर दोहराएं :

वर्ष/तिथि घटना/Event महत्व

1903 के सरीसिंह बारहठ के "चेतावनी रा चूंगट्या" महाराणा फतहसिंह दिल्ली दरबार में नहीं गए

अगस्त 1909 लॉर्ड मिंटो के क्रांतिकारी साहित्य पर रोक के निर्देश क्रांतिकारी गतिविधियों के दमन का प्रयास

1912 भरतपुर में हिंदी साहित्य समिति जगन्नाथदास अधिकारी व गंगाप्रसाद शास्त्री

21 फरवरी 1915 राव गोपालसिंह खरवा की सशस्त्र क्रांति योजना असफल; टाडगढ़ में नजरबंद

28 नवंबर 1921 प्रिंस ऑफ वेल्स के अजमेर आगमन का बहिष्कार हड़ताल व दुकानें बंद

1927 AISPC की स्थापना (बॉम्बे) सभी प्रजामंडलों का छत्र-संगठन

1928 राजपूताना देशी राज्य लोक परिषद की स्थापना अजमेर में क्षेत्रीय समन्वय

1931 जयपुर व बूंदी प्रजामंडल की स्थापना राजस्थान के प्रथम प्रजामंडल

1934 मारवाड़ व हाड़ौती प्रजामंडल पुनर्गठन जयनारायण व्यास, नयनूराम शर्मा का नेतृत्व

1936 बीकानेर व धौलपुर प्रजामंडल की स्थापना कलकत्ता व स्थानीय स्तर पर संगठन

1938 मेवाड़, अलवर, भरतपुर, करौली, शाहपुरा प्रजामंडल सर्वाधिक प्रजामंडल एक ही वर्ष में स्थापित

1938 कांग्रेस का हरिपुरा अधिवेशन रियासती आंदोलनों को समर्थन — मुख्य धारा से जुड़ाव

24 सितंबर 1938 मेवाड़ प्रजामंडल पर प्रतिबंध माणिक्यलाल वर्मा निष्कासित

1939 कोटा, किशनगढ़, सिरोही प्रजामंडल गोकु लभाई भट्ट का नेतृत्व प्रारंभ

22 फरवरी 1941 मेवाड़ प्रजामंडल पर से प्रतिबंध हटा पुनः सक्रियता

22 मई 1941 सागरमल गोपा बंदी बनाए गए राजद्रोह में 6 वर्ष कारावास

25-26 नवंबर 1941 मेवाड़ प्रजामंडल प्रथम अधिवेशन (उदयपुर) अध्यक्ष माणिक्यलाल वर्मा

1942 कु शलगढ़ प्रजामंडल; बीकानेर प्रजा परिषद की स्थापना रघुवीरदयाल गोयल का नेतृत्व

14-16 अगस्त 1942 कोटा के छात्रों का रामपुरा कोतवाली पर अधिकार भारत छोड़ो आंदोलन का साहसिक प्रसंग

20 अगस्त 1942 माणिक्यलाल वर्मा का महाराणा को अल्टीमेटम अगले दिन गिरफ्तारी

17 सितंबर 1942 जयपुर जेंटलमैन एग्रीमेंट मिर्जा इस्माइल-हीरालाल शास्त्री समझौता

1943 बांसवाड़ा प्रजामंडल की स्थापना —

26 अक्टूबर 1944 बीकानेर दमन-विरोधी दिवस जन-प्रतिरोध का प्रतीक

1 अगस्त 1944 डूंगरपुर प्रजामंडल की स्थापना भोगीलाल पांड्या का नेतृत्व

1945 जैसलमेर व प्रतापगढ़ प्रजामंडल —

1946 7वां AISPC अधिवेशन (उदयपुर); झालावाड़ प्रजामंडल अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू

3-4 अप्रैल 1946 सागरमल गोपा को जेल में जलाया गया, शहादत जैसलमेर के अमर शहीद

11 अप्रैल 1947 तासीमो कांड (धौलपुर) शहीद पंचमसिंह-छत्तरसिंह

19 जून 1947 रास्तापाल कांड (डूंगरपुर) कालीबाई व नानाभाई शहीद

स्रोत: आपके द्वारा दी गई “राजस्थान इतिहास अपडेटेड — Version 2.0” PDF, पृष्ठ 206–223। तालिकाओं की column layout पढ़ने के लिए horizontally scroll की जा सकती है।

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