आंदोलन
कल्पना कीजिए — बिजोलिया (भीलवाड़ा) के एक छोटे-से गांव में एक किसान अपने खेत में हल जोत रहा है, परंतु उसकी फसल का बड़ा हिस्सा हर साल लगभग 84 प्रकार के अलग-अलग करों — "लाग-बाग" — में चला जाता है। बेटी के विवाह पर "चंवरी कर", नए जागीरदार के आगमन पर "तलवार बंधाई कर", यहां तक कि हल की संख्या और गाड़ी के पहियों पर भी कर! यही वह घुटन थी जिसने 1897 ई. में एक शांत विरोध को जन्म दिया, जो अगले 44 वर्षों तक चला और अंततः पूरे राजस्थान में किसान चेतना की चिंगारी बन गया। वहीं दूसरी ओर, वागड़-मेवाड़ के घने जंगलों में भील समुदाय अंग्रेजी हुकू मत की बेगार, बोलाई व राखवाली जैसी प्रथाओं से त्रस्त था — गोविंद गुरु के नेतृत्व में 1913 ई. में मानगढ़ की पहाड़ी पर 1500 से अधिक भील शहीद हुए, जिसे इतिहासकार "राजस्थान का जलियांवाला बाग हत्याकांड" कहते हैं। यह अध्याय उन सभी किसान एवं जनजातीय आंदोलनों की कहानी है जिन्होंने रियासती सामंतवाद व ब्रिटिश शोषण के विरुद्ध जन-चेतना जगाई तथा आगे चलकर प्रजामंडल आंदोलन (विस्तार देखें: अध्याय 15) की मजबूत नींव रखी।
1. परिचय — पृष्ठभूमि एवं शब्दावली
◆ 19वीं-20वीं सदी में राजस्थान की रियासतों में किसानों व जनजातियों पर तिहरा शोषण था — सामंत/जागीरदार का लगान, रियासती दरबार का राजस्व एवं अंग्रेजी हस्तक्षेप से उत्पन्न नई मांगें। भू-राजस्व वृद्धि, बेगार (बिना मजदूरी श्रम), तथा दर्जनों अतिरिक्त करों ("लाग-बाग") ने किसानों की कमर तोड़ दी। ◆ ये आंदोलन मुख्यतः स्थानीय व आर्थिक मांगों से प्रारंभ हुए, परंतु शीघ्र ही राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन से जुड़ गए — कांग्रेस के नेता (विजयसिंह पथिक, माणिक्यलाल वर्मा, हरिभाऊ उपाध्याय आदि) व समाचार-पत्रों (प्रताप, राजस्थान के सरी) ने इन्हें राष्ट्रीय मंच दिया। ◆ इन आंदोलनों ने राजस्थान में राजनीतिक चेतना का श्रीगणेश किया। जनजातियों (भील, मीणा, गरासिया) ने अपने परंपरागत अधिकारों का उल्लंघन होने पर विरोध किया — चाहे वह अंग्रेजों के विरुद्ध हो या देशी शासक के । जागीरी क्षेत्र में किसानों का असंतोष मुख्यतः जागीरदारों के जुल्मों के विरुद्ध था, क्योंकि जागीरदार अपने क्षेत्र में लगभग स्वतंत्र थे और उन्हें शासकों व अंग्रेज सरकार का संरक्षण प्राप्त था।
शब्द/कर (Term) अर्थ (Meaning)
लाग-बाग (Lag-Bag) भूमि-कर के अतिरिक्त वसूले जाने वाले दर्जनों प्रकार के अनुचित उपकर — बिजोलिया में इनकी संख्या लगभग 84 तक थी
चंवरी कर (Chanwri Kar) पुत्री के विवाह पर लिया जाने वाला कर
तलवार बंधाई कर (Talwar नए जागीरदार/ठिकानेदार के गद्दी पर बैठने पर वसूला जाने वाला कर Bandhai)
लाटा-कुं ता (Lata-Kunta) अनुमानित उपज के आधार पर अतिरिक्त भू-राजस्व
बेगार (Begar) बिना पारिश्रमिक के जबरन श्रम/सेवा
बोलाई/राखवाली जनजातीय क्षेत्रों में वन-रक्षा व चौकीदारी के बदले वसूला जाने वाला कर/भेंट (Bolai/Rakhwali)
आधा-बरार (Aadha Barar) जनजातीय क्षेत्र में उपज का आधा हिस्सा राज्य को देने की प्रथा
मौताना (Mautana) मृत्यु/हत्या की सूचना न देने या अपराधी न पकड़े जाने पर पूरे गांव/कु टुंब पर लगाया गया सामूहिक दंड
जागीरदारी प्रथा (Jagirdari) सामंतों को भूमि व राजस्व अधिकार — विस्तार देखें: अध्याय 11
🌾 किसान आंदोलनों के सामान्य कारण 🌳 जनजातीय आंदोलनों के सामान्य कारण ◆ अत्यधिक भू-राजस्व एवं दर्जनों लाग-बाग ◆ वन-भूमि पर अधिकार छिनना, बेगार व बोलाई-राखवाली ◆ बेगार प्रथा का दबाव ◆ मौताना जैसी सामूहिक दंड-प्रथाएं ◆ जागीरदारों की मनमानी व अत्याचार ◆ शराबबंदी/आबकारी नीति से आर्थिक चोट ◆ अकाल के समय भी कर-माफी न देना ◆ धार्मिक-सामाजिक कु रीतियां (डाकन प्रथा आदि) ◆ न्याय-व्यवस्था का अभाव ◆ मेवाड़ भील कोर व मेरवाड़ा बटालियन में जबरन भर्ती (1841-32)
2. मेवाड़ जाट आंदोलन — मातृकुं डिया (1880)
◆ चित्तौड़गढ़ के मातृकुं डिया क्षेत्र में जाट किसानों ने 20-22 जून 1880 ई. को बढ़ते भू-राजस्व व लाग-बाग के विरुद्ध विरोध किया — इसे राजस्थान का सबसे प्रथम संगठित कृ षक विरोध माना जाता है, जो बिजोलिया आंदोलन (1897) से भी लगभग 17 वर्ष पूर्व हुआ। ◆ यद्यपि यह आंदोलन अल्पकालिक व स्थानीय स्तर तक सीमित रहा तथा शीघ्र ही दबा दिया गया, फिर भी इसने आगामी दशकों में राजस्थान में उभरने वाले व्यापक किसान आंदोलनों के लिए एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि तैयार की।
3. बिजोलिया किसान आंदोलन (1897-1941) — प्रथम चरण
✊ बिजोलिया किसान आंदोलन (1897-1941 ई. (लगभग 44 वर्ष)) भीलवाड़ा (मेवाड़ ठिकाना) — राजस्थान का सबसे लंबा एवं सर्वाधिक प्रभावशाली, पूर्णतः अहिंसक किसान आंदोलन
◆ क्षेत्र — बिजोलिया ठिकाना (मेवाड़ राज्य के अंतर्गत), मुख्यतः धाकड़ जाति के किसान। ◆ कारण — लगभग 84 प्रकार के लाग-बाग (चंवरी कर, तलवार बंधाई कर, लाटा-कुं ता आदि) तथा भारी बेगार का बोझ। ◆ प्रथम चरण (1897-1916) — साधु सीतारामदास ("आंदोलन के जनक") ने कर-वृद्धि के विरुद्ध असहयोग प्रारंभ किया; किसानों ने खेती व लगान देना बंद किया। ◆ द्वितीय चरण (1916-1923) — 1916 ई. में साधु सीतारामदास के आग्रह पर विजयसिंह पथिक ने नेतृत्व संभाला; 1916 में "किसान पंच बोर्ड" (अध्यक्ष साधु सीतारामदास) एवं 1917 में "उपरमाल पंच बोर्ड" (13 सदस्य, सरपंच मन्ना पटेल) का गठन हुआ। ◆ तृतीय चरण (1927-1941) — माणिक्यलाल वर्मा के नेतृत्व में आंदोलन पुनः तीव्र हुआ; अंततः 1941 ई. में मेवाड़ महाराणा भूपालसिंह द्वारा प्रमुख मांगें स्वीकार कर आंदोलन समाप्त हुआ। ◆ विजयसिंह पथिक ने ग़नेश शंकर विद्यार्थी के कानपुर से प्रकाशित समाचार-पत्र "प्रताप" के माध्यम से बिजोलिया के मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाया।
4. बिजोलिया आंदोलन — नेतृत्व, चरण एवं समाधान
चरण (Phase) अवधि प्रमुख नेतृत्व मुख्य घटनाएं
प्रथम चरण 1897-1916 साधु सीतारामदास असहयोग व लगान-बंदी की शुरुआत; "बिजोलिया आंदोलन के जनक" की उपाधि
द्वितीय चरण 1916-1923 विजयसिंह पथिक, साधु किसान पंच बोर्ड (1916) व उपरमाल पंच बोर्ड (1917) गठन; बिन्दुलाल सीतारामदास भट्टाचार्य जांच आयोग (1917); मेवाड़ दरबार से समझौता व बाद में
विश्वासघात
तृतीय चरण 1927-1941 माणिक्यलाल वर्मा आंदोलन का पुनरुत्थान; 1941 ई. में महाराणा भूपालसिंह द्वारा प्रमुख लाग- बाग समाप्त, अंतिम समाधान
विशेष तथ्य: बिजोलिया आंदोलन को "राजस्थान का प्रथम संगठित एवं सर्वाधिक दीर्घकालिक किसान आंदोलन" (44 वर्ष, 1897-1941) माना जाता है। यह भारत के उन गिने-चुने किसान आंदोलनों में से एक है जो प्रारंभ से अंत तक पूर्णतः अहिंसक रहा।
5. बेंगू किसान आंदोलन (1921-1925) ◆ मेवाड़ राज्य के बेंगू ठिकाने में किसानों ने बिजोलिया आंदोलन से प्रेरित होकर 1921 ई. में लाग-बाग व बेगार के विरुद्ध आंदोलन प्रारंभ किया — नेतृत्व रामनारायण चौधरी व हरिभाऊ उपाध्याय ने किया, विजयसिंह पथिक का भी मार्गदर्शन मिला। ◆ 13 जुलाई 1923 ई. को गोविंदपुरा (बेंगू) में मेवाड़ राज्य की सेना ने शांतिपूर्वक एकत्र किसानों पर गोलीबारी कर दी, जिसमें अनेक किसान शहीद हुए — इस हत्याकांड में नानकजी भील भी शहीद हुए, जिनकी स्मृति में "नानक भील की अर्जी" नामक लोकगीत रचा गया। ◆ इस दमन के बावजूद आंदोलन 1925 ई. तक चलता रहा तथा अंततः मेवाड़ दरबार को कुछ लाग-बाग समाप्त करने पड़े।
6. बूंदी (बरड़) किसान आंदोलन एवं गुर्जर आंदोलन (1922-1945) ◆ बूंदी रियासत के बरड़ क्षेत्र में किसानों ने अत्यधिक लगान व लाग-बाग के विरुद्ध 1922 ई. में आंदोलन प्रारंभ किया — नेतृत्व नयनूराम शर्मा ने किया, जिन्हें "बूंदी का गांधी" कहा जाता है। ◆ 2 अप्रैल 1923 ई. को डाबी गांव में बूंदी राज्य की सेना ने आंदोलनकारी किसानों पर गोली चलाई, जिसमें कई किसान शहीद हुए — इसे "डाबी हत्याकांड" कहा जाता है। ◆ बाद में 1936-1945 ई. के दौरान बूंदी क्षेत्र में एक पृथक गुर्जर आंदोलन भी हुआ, जिसमें गुर्जर समुदाय ने भूमि-अधिकार व अतिरिक्त करों के विरुद्ध संघर्ष किया।
आंदोलन/घटना तिथि (Date) विवरण
बूंदी (बरड़) आंदोलन प्रारंभ 1922 ई. नयनूराम शर्मा के नेतृत्व में लगान-वृद्धि के विरुद्ध विरोध
डाबी हत्याकांड 2 अप्रैल 1923 ई. बूंदी सेना की गोलीबारी में किसान शहीद
आंदोलन का समापन 1943 ई. आंशिक मांगें स्वीकृ त
गुर्जर आंदोलन 1936-1945 ई. भूमि-अधिकार व करों के विरुद्ध पृथक संघर्ष
7. मारवाड़ एवं करौली किसान आंदोलन ◆ मारवाड़ (जोधपुर) राज्य में किसानों के आर्थिक शोषण के विरुद्ध चंदनमल सुराणा एवं जयनारायण व्यास के नेतृत्व में आंदोलन संगठित हुआ — राज्य से भू-राजस्व नीति में सुधार व लाग-बाग कम करने की मांग रखी गई।
◆ करौली रियासत में 1927 ई. में कुं वर मदनसिंह के नेतृत्व में किसानों ने अत्यधिक भू-राजस्व व बेगार के विरुद्ध आंदोलन किया।
8. शेखावाटी (सीकर-जयपुर) किसान आंदोलन (1922-1947) ◆ जयपुर राज्य के शेखावाटी क्षेत्र (सीकर, जयपुर) में जागीरदारों द्वारा वसूले जाने वाले "जकात" (चुंगी कर) एवं अन्य लाग-बाग के विरुद्ध 1922 ई. से लंबा आंदोलन चला, जो 1947 तक विभिन्न चरणों में जारी रहा। ◆ 25 अप्रैल 1934 ई. को कटराथल में एक ऐतिहासिक महिला सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में किसान महिलाओं ने भाग लिया — यह राजस्थान के किसान आंदोलनों में महिला-भागीदारी का दुर्लभ उदाहरण है। ◆ 21 जून 1934 ई. को जयसिंहपुरा में तथा 25 अप्रैल 1935 ई. को कु दन गांव में जागीरी सेना की गोलीबारी में अनेक किसान शहीद हुए। ◆ 1934 ई. में ही जाट प्रजापति महायज्ञ के आयोजन के माध्यम से जाट किसानों ने सामाजिक-आर्थिक चेतना का प्रसार किया। "पंचपाना जागीर" क्षेत्र के जागीरदारों के विरुद्ध यह आंदोलन विशेष रूप से केंद्रित रहा।
घटना (Event) तिथि (Date) महत्व
कटराथल महिला सम्मेलन 25 अप्रैल 1934 ई. किसान आंदोलन में महिला-भागीदारी का प्रतीक
जयसिंहपुरा गोलीकांड 21 जून 1934 ई. जागीरी सेना की गोलीबारी में किसान शहीद
कु दन गांव हत्याकांड 25 अप्रैल 1935 ई. शेखावाटी आंदोलन का सर्वाधिक रक्तरंजित प्रसंग
जाट प्रजापति महायज्ञ 1934 ई. सामाजिक-आर्थिक जागृति का आयोजन
9. अलवर के किसान आंदोलन — नीमूचाणा हत्याकांड एवं मेव आंदोलन ◆ अलवर रियासत में 1921 ई. में "सुअर-पालन विरोधी आंदोलन" हुआ, जिसमें किसानों ने राज्य द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों व करों का विरोध किया। ◆ 14 मई 1925 ई. को नीमूचाणा गांव (अलवर) में अत्यधिक लगान व बेगार के विरुद्ध एकत्र किसानों पर राज्य-सेना ने गोलीबारी कर दी, जिसमें बड़ी संख्या में किसान शहीद हुए — समकालीन समाचार-पत्रों ने इसकी तुलना जलियांवाला बाग हत्याकांड से की तथा इसे व्यापक रूप से उजागर किया। ◆ 1932-1934 ई. के दौरान अलवर क्षेत्र के मेव किसानों ने भी भारी भू-राजस्व, बेगार तथा सामाजिक-धार्मिक दबाव के विरुद्ध संगठित होकर आंदोलन किया, जिसे "मेव किसान आंदोलन" कहा जाता है — इसने आगे चलकर मेव क्षेत्र में जन- जागृति फै लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
"न हाकिम, न हुकु म — अब हम अपने अधिकारों के लिए स्वयं खड़े होंगे।" — आंदोलनकारी किसानों/जनजातीय समुदायों का सामूहिक उद्घोष
10. भरतपुर एवं बीकानेर किसान आंदोलन
◆ भरतपुर रियासत के जाट किसानों ने भी उच्च भू-राजस्व व बेगार-प्रथा के विरुद्ध समय-समय पर विरोध किया — यहां का आंदोलन 1857 की क्रांति के समय के जन-असंतोष से भी जुड़ा रहा (विस्तार देखें: अध्याय 13)। ◆ बीकानेर रियासत में गंगनहर परियोजना बनने के बाद किसानों पर "आबियाना" (सिंचाई-कर) का भारी बोझ पड़ा — इसके विरुद्ध किसानों ने संगठित होकर विरोध किया। ◆ 1937 ई. में उदासर तथा दूधवाखारा क्षेत्र में आबियाना-विरोधी आंदोलन तेज हुआ; 1946 ई. में रायसिंहनगर व कं गड़ कांड जैसी घटनाओं में किसानों व राज्य-प्रशासन के बीच संघर्ष हुआ।
11. किसान आंदोलनों की तुलनात्मक तालिका एवं महत्व
किसान आंदोलनों की प्रमुख विशेषताएं ◆ स्वयं के बलबूते — राजस्थान के किसान आंदोलन अपने ही बलबूते पर चले; इनका नेतृत्व पेशेवर नेताओं ने नहीं, बल्कि अत्यंत साधारण किसान वर्ग ने किया। ◆ जातिगत आधार — बिजोलिया में धाकड़ जाति की, सीकर-शेखावाटी में जाट जाति की, मेवाड़ व सिरोही में भील-गरासिया जातियों की तथा अलवर-भरतपुर में मेवों की मुख्य भूमिका रही। इन आंदोलनों को सुनियोजित ढंग से चलाने का श्रेय जाति पंचायतों व जाति संगठनों को दिया जाता है। ◆ स्त्रियों की भागीदारी — बिजोलिया में पुरुषों के साथ स्त्रियों व बालकों ने भी सक्रियता दिखाई; अन्य किसान आंदोलनों में भी स्त्रियों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। ◆ अहिंसक व सामंत-विरोधी स्वरूप — ये आंदोलन सामान्यतः अहिंसक रहे और सामंत-विरोधी थे; इन्होंने आगे चलकर जागीरदारी उन्मूलन की भूमिका और प्रजामंडल आंदोलन की जमीन तैयार की। ◆ बिजोलिया का मूल्यांकन — यह आंदोलन ठिकाने और मेवाड़ राज्य की सम्मिलित शक्ति से जूझता रहा; पूर्णतः स्वावलंबी व अहिंसक था और सामंती व्यवस्था पर भयंकर प्रहार था। यह अपने मूल मंतव्य में पूर्णतः सफल नहीं हो सका, परंतु इसने माणिक्यलाल वर्मा जैसे तेजस्वी नेता को जन्म दिया, जो आगे मेवाड़ में उत्तरदायी सरकार के आंदोलनों के प्रणेता बने।
आंदोलन
अवधि (Period) प्रमुख नेता (Leader) मुख्य कारण/मांग
(Movement)मातृकुं डिया (चित्तौड़) 1880 ई. स्थानीय जाट किसान अतिरिक्त भू-राजस्व — राजस्थान का प्रथम आंदोलन
बिजोलिया 1897-1941 ई. सीतारामदास, विजयसिंह पथिक, 84 लाग-बाग व बेगार — सबसे दीर्घकालिक आंदोलन माणिक्यलाल वर्मा
बेंगू 1921-1925 ई. रामनारायण चौधरी, हरिभाऊ लाग-बाग — गोविंदपुरा हत्याकांड (1923) उपाध्याय
बूंदी (बरड़) 1922-1943 ई. नयनूराम शर्मा अत्यधिक लगान — डाबी हत्याकांड (1923)
शेखावाटी 1922-1947 ई. स्थानीय जाट/किसान नेतृत्व जकात व लाग-बाग — कटराथल महिला सम्मेलन (1934)
नीमूचाणा (अलवर) 1925 ई. स्थानीय किसान अत्यधिक लगान व बेगार — हत्याकांड (14 मई 1925)
नीमराणा (अलवर) 1923-1925 ई. स्थानीय किसान लगान व लाग-बाग का विरोध
मेव (अलवर) 1932-1934 ई. स्थानीय मेव नेतृत्व भू-राजस्व व सामाजिक दबाव
करौली 1927 ई. कुं वर मदनसिंह बेगार व भू-राजस्व
मारवाड़ 1924-1947 ई. चंदनमल सुराणा, जयनारायण भू-राजस्व नीति व लाग-बाग व्यास
बीकानेर (आबियाना) 1937-1946 ई. स्थानीय किसान संगठन गंगनहर सिंचाई-कर (आबियाना)
★ किसान आंदोलन — त्वरित स्मरण-बिंदु ★
1. बिजोलिया आंदोलन राजस्थान का सबसे लंबा (44 वर्ष) एवं पूर्णतः अहिंसक किसान आंदोलन था — इसे "मेवाड़ का बारडोली" भी कहा जाता है। 2. मातृकुं डिया आंदोलन (1880) को राजस्थान का प्रथम कृ षक विरोध माना जाता है, जो बिजोलिया से भी पूर्व हुआ। 3. विजयसिंह पथिक को "राजस्थान के किसान आंदोलनों का जनक/पिता" कहा जाता है — उन्होंने बिजोलिया, बेंगू व अन्य आंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 4. नीमूचाणा हत्याकांड (14 मई 1925, अलवर) को समकालीन प्रेस ने जलियांवाला बाग से जोड़ा। 5. नयनूराम शर्मा को "बूंदी का गांधी" कहा जाता है।
12. जनजातीय आंदोलन — परिचय, कारण एवं शब्दावली राजस्थान जनजातीय जनसंख्या की दृष्टि से भारत में छठे स्थान पर है — यहां मुख्यतः भील, गरासिया, मीणा व सहरिया जनजातियां मेवाड़-वागड़ (उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा) व शेखावाटी-पूर्वी क्षेत्र में केंद्रित हैं। अंग्रेजी हस्तक्षेप व सामंती दमन के विरुद्ध इन समुदायों ने भी सशस्त्र एवं सामाजिक-धार्मिक आंदोलन चलाए, जिनमें भगत/भील आंदोलन, एकी (भोमट) आंदोलन तथा मीणा आंदोलन प्रमुख हैं।
कारण (Cause) विवरण (Detail)
सैन्य भर्ती का बोझ 1832 ई. में मेरवाड़ा बटालियन एवं 1841 ई. में मेवाड़ भील कोर की स्थापना — जबरन भर्ती से आक्रोश
मौताना प्रथा हत्या/अपराध की सूचना न मिलने पर पूरे गांव पर सामूहिक दंड — बाद में समाप्त की गई
डाकन प्रथा प्रतिबंध 1853 ई. में मेवाड़ में डाकन-प्रथा (टोना-टोटका के आरोप में हत्या) पर प्रतिबंध — सामाजिक हस्तक्षेप के रूप में देखा गया
आबकारी नीति महुए की शराब पर कर व नियंत्रण — जनजातीय आजीविका व परंपरा पर सीधा प्रभाव
बेगार, बोलाई व राखवाली वन-भूमि व चौकीदारी से जुड़े अनुचित कर एवं जबरन श्रम
13. भील/भगत आंदोलन — गोविंद गुरु एवं मानगढ़ हत्याकांड (1913)
✊ गोविंद गुरु (1858-1913 ई. (आंदोलन काल)) भगत/संप सभा आंदोलन के प्रवर्तक — मेवाड़-वागड़ भील समुदाय के महानायक
- जन्म — 1858 ई., बेडसा/बांसिया (डूंगरपुर) में एक बंजारा परिवार में; आर्यसमाज व दयानंद सरस्वती के विचारों से प्रभावित;
कोटा-बूंदी अखाड़े के साधु राजगिरी के शिष्य रहे। ◆ 1883 ई. में सिरोही में "संप सभा" (प्रेम सभा/दशनामी संप्रदाय) की स्थापना की — उद्देश्य: नैतिक सुधार, एके श्वरवाद, चोरी- शराब का त्याग तथा पंचायती व्यवस्था का प्रचार। ◆ 1903 ई. में मानगढ़ पहाड़ी (बांसवाड़ा) पर संप सभा का प्रथम बड़ा अधिवेशन हुआ; 1910 ई. में 33-सूत्रीय मांग-पत्र तैयार किया गया, जिसमें बेगार-समाप्ति, कर-कमी व भील स्वशासन जैसी मांगें शामिल थीं। ◆ 17 नवंबर 1913 ई. को मानगढ़ पहाड़ी (बांसवाड़ा) पर एकत्र हजारों भीलों पर अंग्रेज अधिकारी मेजर बेली के आदेश पर गोलीबारी की गई — 1500 से अधिक भील शहीद हुए। ◆ इस नरसंहार को इतिहासकार "राजस्थान/वागड़ का जलियांवाला बाग हत्याकांड" कहते हैं — यह जलियांवाला बाग हत्याकांड (1919) से भी लगभग 6 वर्ष पूर्व घटित हुआ था। ◆ गोविंद गुरु को गिरफ्तार कर अहमदाबाद जेल भेजा गया; बाद का जीवन उन्होंने कांबोई (गुजरात) में व्यतीत किया — वे आजीवन अहिंसा के समर्थक रहे तथा श्वेत ध्वज को शांति के प्रतीक के रूप में अपनाया।
◆ संप सभा का विस्तार — गोविंद गुरु ने मेवाड़, डूंगरपुर, ईडर, मालवा आदि क्षेत्रों के भीलों व गरासियों को संप सभा के माध्यम से संगठित किया। एक ओर उन्होंने सामाजिक बुराइयां दूर करने का प्रयास किया, दूसरी ओर उन्हें अपने मूल अधिकारों का एहसास कराया। ◆ मानगढ़ की शपथ — संप सभा के अधिवेशन में गोविंद गुरु के प्रवचनों से प्रभावित होकर हजारों भील-गरासियों ने शराब छोड़ने, बच्चों को पढ़ाने और आपसी झगड़े अपनी पंचायत में ही सुलझाने की शपथ ली; गोविंद गुरु ने बैठ-बेगार और गैर-वाजिब लागतें न देने का आह्वान किया। इसके बाद हर वर्ष आश्विन शुक्ल पूर्णिमा को मानगढ़ पहाड़ी पर संप सभा का अधिवेशन होने लगा। ◆ भीलों की बढ़ती जागृति से पड़ोसी राज्य चिंतित हो गए और उन्होंने ब्रिटिश सरकार से इस संगठन को सख्ती से दबाने की प्रार्थना की — इसी का परिणाम 1913 का मानगढ़ हत्याकांड था। गिरफ्तारी के बाद गोविंद गुरु को फांसी की सजा सुनाई गई, परंतु भीलों में प्रतिक्रिया के डर से इसे 20 वर्ष के कारावास में बदल दिया गया; अंततः वे 10 वर्ष में ही रिहा हो गए। आज भी भील समाज में गोविंद गुरु का पूजनीय स्थान है।
14. एकी आंदोलन (भोमट) — मोतीलाल तेजावत एवं नीमड़ा हत्याकांड (1922)
✊ मोतीलाल तेजावत (1921-1936 ई. (आंदोलन काल)) "बावजी" / "आदिवासियों के मसीहा" / "मेवाड़ के गांधी" — एकी (भोमट) आंदोलन के प्रणेता
◆ जन्म — 1886-87 ई. में कोल्यारी (उदयपुर) के एक ओसवाल परिवार में; बिजोलिया आंदोलन से प्रेरित होकर मेवाड़ के भोमट क्षेत्र (गोगुंदा, झाड़ोल, कोटड़ा) में सक्रिय हुए। ◆ 1921 ई. में मातृकुं डिया (चित्तौड़गढ़) से आंदोलन प्रारंभ किया — 21-सूत्रीय मांग-पत्र "मेवाड़ की पुकार" के नाम से प्रस्तुत किया, जिसमें बेगार-समाप्ति व कर-कमी की मांगें शामिल थीं।
◆ नारा दिया — "न हाकिम, न हुकु म" — अर्थात न कोई अधिकारी, न कोई आदेश स्वीकार्य, केवल स्वशासन। ◆ 12 अप्रैल 1922 ई. को सियावा में 3 गरासियों की गोलीबारी में मृत्यु हुई; 5-6 मई 1922 ई. को भूला-बलोलिया में लगभग 50 लोग मारे गए व 150 घायल हुए — राजस्थान सेवा संघ ने इसकी जांच कर "तरुण राजस्थान" समाचार-पत्र में रिपोर्ट प्रकाशित की। ◆ 6/7 मार्च 1922 ई. को नीमड़ा (विजयनगर) में मेजर सटन के नेतृत्व में अंग्रेज-मेवाड़ सेना ने एकत्र भीलों पर गोलीबारी की — लगभग 1200 भील शहीद हुए, जिसे "मेवाड़/राजस्थान का द्वितीय जलियांवाला बाग" कहा जाता है। ◆ जनवरी 1922 ई. में सिरोही में भी भील-गरासिया समुदाय ने तेजावत के आह्वान पर संगठित होकर आंदोलन किया। ◆ बाद में तेजावत भूमिगत हो गए तथा गांधीजी की सलाह पर 1929 ई. में आत्मसमर्पण किया; 1936 ई. में इस शर्त पर रिहा किए गए कि वे भविष्य में कोई आंदोलन नहीं चलाएं गे — उन्होंने 1936 ई. में "वनवासी संघ" की स्थापना कर जनजातीय कल्याण कार्य जारी रखा।
◆ आदिवासियों पर हो रहे जुल्मों से व्यथित होकर तेजावत ने ठिकाने की नौकरी छोड़ दी और 1921 में भीलों को जागीरदारों की बैठ-बेगार व लाग-बाग के प्रश्न पर संगठित करना शुरू किया। धीरे-धीरे यह आंदोलन सिरोही, ईडर, पालनपुर, विजयनगर आदि राज्यों तक फै ल गया। उन्होंने आदिवासियों का जिस प्रकार विश्वास जीता, वह अकल्पनीय माना जाता है। ◆ नीमड़ा (विजयनगर राज्य) के विराट भील सम्मेलन पर गोलीबारी में तेजावत के पैर में गोली लगी; लोग उन्हें सुरक्षित स्थान ले गए। भूमिगत रहने के कारण मेवाड़-सिरोही की पुलिस उन्हें पकड़ नहीं सकी — 8 वर्ष बाद 1929 में गांधीजी की सलाह पर उन्होंने स्वयं को ईडर पुलिस के सुपुर्द किया। इसके बाद भी नजरबंदी व जेल का सिलसिला चलता रहा, पर उन्होंने सामाजिक सरोकारों से मुंह नहीं मोड़ा। 5 दिसंबर 1963 को उनका निधन हुआ।
हत्याकांड (Massacre) तिथि (Date) विवरण
सियावा हत्याकांड 12 अप्रैल 1922 ई. 3 गरासियों की गोलीबारी में मृत्यु
भूला-बलोलिया हत्याकांड 5-6 मई 1922 ई. लगभग 50 मृत, 150 घायल — राजस्थान सेवा संघ की जांच
नीमड़ा (विजयनगर) हत्याकांड 6/7 मार्च 1922 ई. मेजर सटन के नेतृत्व में गोलीबारी, लगभग 1200 भील शहीद — "मेवाड़ का द्वितीय जलियांवाला बाग"
15. मीणा आंदोलन — जरायमपेशा कानून का विरोध ◆ 1924 ई. में ब्रिटिश सरकार द्वारा पारित "आपराधिक जनजाति अधिनियम" (Criminal Tribes Act) के अंतर्गत मीणा जाति को "अपराधी जनजाति" घोषित कर प्रतिदिन थाने में हाजिरी लगाने हेतु बाध्य किया गया — 1930 ई. में जयपुर राज्य ने भी "जरायमपेशा कानून" लागू किया, जिससे मीणा समुदाय में गहरा आक्रोश फै ला। ◆ 1933 ई. में "मीणा क्षेत्रीय महासभा" का गठन हुआ, जिसने इस अपमानजनक कानून के विरुद्ध संगठित आंदोलन प्रारंभ किया। ◆ 1944 ई. में "मीणा जाति सुधार समिति" द्वारा नीम का थाना (सीकर) में एक बड़ा सम्मेलन आयोजित हुआ — इसी दौर में जैन मुनि मगनसागर ने "मीण पुराण" नामक ग्रंथ की रचना कर मीणा समुदाय के गौरवशाली इतिहास को उजागर किया। ◆ 28 अक्टूबर 1946 ई. को बगावास सम्मेलन में लगभग 26,000 मीणा चौकीदारों ने सामूहिक रूप से त्याग-पत्र दे दिया — इस ऐतिहासिक घटना को "मुक्ति दिवस" के रूप में मनाया जाता है। ◆ स्वतंत्रता के बाद हीरालाल शास्त्री व टीकाराम पालीवाल के प्रयासों से 1952 ई. में जरायमपेशा कानून पूर्णतः समाप्त कर दिया गया। ◆ इससे पूर्व 1851-1860 ई. के दौरान जहाजपुर (भीलवाड़ा) क्षेत्र में भी मीणा समुदाय का एक पृथक सशस्त्र विद्रोह हुआ था, जो कर-वृद्धि व प्रशासनिक दमन के विरुद्ध था।
वर्ष (Year) घटना (Event)
1851-1860 ई. जहाजपुर मीणा विद्रोह
1924 ई. आपराधिक जनजाति अधिनियम (Criminal Tribes Act)
1930 ई. जयपुर राज्य में जरायमपेशा कानून लागू
1933 ई. मीणा क्षेत्रीय महासभा का गठन
1944 ई. नीम का थाना सम्मेलन; "मीण पुराण" ग्रंथ की रचना (मुनि मगनसागर)
28 अक्टूबर 1946 ई. बगावास सम्मेलन — 26,000 चौकीदारों का सामूहिक त्याग-पत्र, "मुक्ति दिवस"
1952 ई. जरायमपेशा कानून पूर्णतः समाप्त (हीरालाल शास्त्री-टीकाराम पालीवाल)
🏔️ भगत आंदोलन (गोविंद गुरु) ⛰️ एकी आंदोलन (मोतीलाल तेजावत) ◆ क्षेत्र — मेवाड़-वागड़ (बांसवाड़ा-डूंगरपुर) ◆ क्षेत्र — भोमट (गोगुंदा-झाड़ोल-कोटड़ा) ◆ संगठन — संप सभा (स्थापना 1883) ◆ नारा — "न हाकिम, न हुकु म" ◆ चरम घटना — मानगढ़ हत्याकांड (17 नवंबर 1913) ◆ चरम घटना — नीमड़ा हत्याकांड (6/7 मार्च 1922) ◆ लगभग 1500 भील शहीद ◆ लगभग 1200 भील शहीद
भील-गरासिया क्षेत्रों के अन्य जन-नेता ◆ गोविंद गुरु व तेजावत के बाद भील-गरासियों के हितों के लिए माणिक्यलाल वर्मा, भोगीलाल पंड्या, मामा बालेश्वर दयाल, बलवंतसिंह मेहता, हरिदेव जोशी, गौरीशंकर उपाध्याय आदि ने कार्य किया — इन्होंने भील क्षेत्रों में शिक्षण संस्थाएं, प्रौढ़ शालाएं व छात्रावास (हॉस्टल) स्थापित किए तथा आदिवासियों को कु प्रथाएं छोड़ने के लिए प्रेरित किया।
दलित आंदोलन ◆ स्वतंत्रता-पूर्व राजस्थान में दलितों में भी सक्रिय जागरण दिखाई देता है — उन्होंने प्रजामंडल आंदोलनों में सक्रिय भाग लेकर आजादी के आंदोलन को व्यापक सामाजिक आधार दिया। 1920 और 1934 के समय दलितों ने अजमेर-मेरवाड़ा के राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भाग लिया। ◆ कोटा, जयपुर, धौलपुर व भरतपुर रियासतों में दलितों की बड़ी संख्या थी, इसलिए यहां उन्होंने सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई और इन राज्यों को उनकी मांगों पर ध्यान देना पड़ा। 1945-46 में उणियारा (टोंक) में बैरवा जाति ने नागरिक असमानता-विरोधी आंदोलन चलाकर अपनी सक्रियता का परिचय दिया।
16. आंदोलनों से जुड़े समाचार-पत्र, साहित्य एवं गीत इन आंदोलनों को जन-जन तक पहुंचाने तथा राष्ट्रीय चेतना से जोड़ने में समकालीन समाचार-पत्रों व लोक-साहित्य की निर्णायक भूमिका रही — इन्होंने रियासती दमन को उजागर कर सार्वजनिक दबाव बनाया।
समाचार-पत्र/रचना प्रकाशन स्थान/रचनाकार महत्व
प्रताप कानपुर (गणेश शंकर विद्यार्थी), 1910 बिजोलिया आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित किया
राजस्थान के सरी वर्धा (विजयसिंह पथिक) किसान आंदोलनों की खबरें व विश्लेषण
नवीन राजस्थान अजमेर, 1922 (1923 में प्रतिबंधित) रियासती दमन का पर्दाफाश
तरुण राजस्थान अजमेर/ब्यावर, 1923 भूला-बलोलिया हत्याकांड की जांच-रिपोर्ट प्रकाशित
अग्नि-बाण ब्यावर, 1932 प्रथम राजस्थानी भाषा का राजनीतिक समाचार-पत्र
रियासत — नीमूचाणा हत्याकांड की तुलना जलियांवाला बाग से की
उपरमाल का डंका बिजोलिया क्षेत्र स्थानीय स्तर पर आंदोलन-प्रचार
पछीदा (गीत) माणिक्यलाल वर्मा किसान शोषण पर आधारित लोकगीत
पीड़ितों का पछीदा (गीत) विजयसिंह पथिक किसान पीड़ा को समर्पित रचना
नानक भील की अर्जी (गीत) अज्ञात रचनाकार गोविंदपुरा हत्याकांड में शहीद नानकजी भील की स्मृति में
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: राजपूताना का प्रथम समाचार-पत्र "मजहरुल सरूर" 1849 ई. में भरतपुर से प्रकाशित हुआ था; "मारवाड़ गजट" (1866) व "सज्जन कीर्ति सुधाकर" (उदयपुर, 1876/79) भी प्रारंभिक महत्वपूर्ण पत्र थे — इन्होंने आगे चलकर किसान व जनजातीय आंदोलनों की खबरों को जन-जन तक पहुंचाने की परंपरा स्थापित की।
17. आंदोलनों का ऐतिहासिक महत्व एवं प्रभाव ◆ इन आंदोलनों ने रियासती जनता में राजनीतिक चेतना जगाई तथा उन्हें संगठित प्रतिरोध की शक्ति का एहसास कराया — यह चेतना आगे चलकर प्रजामंडल आंदोलन (विस्तार देखें: अध्याय 15) का आधार बनी। ◆ बिजोलिया, बेंगू, बूंदी व शेखावाटी जैसे किसान आंदोलनों ने लाग-बाग व बेगार जैसी शोषणकारी प्रथाओं को समाप्त/सीमित करवाने में सफलता पाई, जिससे रियासती प्रशासन में सुधार को बल मिला। ◆ भील व मीणा आंदोलनों ने जनजातीय समुदाय की सामाजिक-राजनीतिक भागीदारी को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा — गोविंद गुरु व मोतीलाल तेजावत आज भी जनजातीय अस्मिता के प्रतीक माने जाते हैं। ◆ मानगढ़ धाम (बांसवाड़ा) को राष्ट्रीय स्मारक स्वरूप मान्यता दिलाने तथा प्रतिवर्ष वहां स्मृति-आयोजन करने की मांग जनजातीय समुदाय द्वारा निरंतर उठाई जाती रही है — यह इन आंदोलनों की आज भी जीवंत विरासत को दर्शाता है।
"हमने न कभी हथियार उठाया, न कभी झुके — हमारी लड़ाई केवल अपने हक की थी।" — बिजोलिया आंदोलन से जुड़ी परंपरा (44 वर्षों तक पूर्णतः अहिंसक संघर्ष)
18. अध्याय सार एवं समय-रेखा
★ अध्याय सार — महत्वपूर्ण तथ्य ★
1. राजस्थान का प्रथम कृ षक विरोध — मातृकुं डिया (चित्तौड़गढ़), जून 1880 ई.
2. सबसे दीर्घकालिक व पूर्णतः अहिंसक किसान आंदोलन — बिजोलिया (1897-1941, 44 वर्ष)। 3. बिजोलिया के तीन चरण — साधु सीतारामदास (1897-1916), विजयसिंह पथिक (1916-1923), माणिक्यलाल वर्मा (1927-1941)। 4. बिजोलिया में लगभग 84 प्रकार के लाग-बाग वसूले जाते थे — चंवरी कर, तलवार बंधाई कर, लाटा-कुं ता प्रमुख। 5. गोविंदपुरा हत्याकांड (बेंगू) — 13 जुलाई 1923 ई., नानकजी भील शहीद। 6. डाबी हत्याकांड (बूंदी) — 2 अप्रैल 1923 ई., नेतृत्व नयनूराम शर्मा ("बूंदी का गांधी")। 7. कटराथल महिला सम्मेलन (शेखावाटी) — 25 अप्रैल 1934 ई., किसान आंदोलन में महिला-भागीदारी का प्रतीक। 8. नीमूचाणा हत्याकांड (अलवर) — 14 मई 1925 ई., समकालीन प्रेस द्वारा जलियांवाला बाग से तुलना। 9. गोविंद गुरु का जन्म — 1858 ई., बेडसा/बांसिया (डूंगरपुर); संप सभा की स्थापना — 1883 ई., सिरोही। 10. मानगढ़ हत्याकांड — 17 नवंबर 1913 ई., लगभग 1500 भील शहीद — "राजस्थान/वागड़ का जलियांवाला बाग" (जलियांवाला बाग से भी 6 वर्ष पूर्व)। 11. मोतीलाल तेजावत — "आदिवासियों के मसीहा"; नारा — "न हाकिम, न हुकु म"; आंदोलन प्रारंभ 1921 ई., मातृकुं डिया से। 12. नीमड़ा हत्याकांड (एकी आंदोलन) — 6/7 मार्च 1922 ई., लगभग 1200 भील शहीद — "मेवाड़ का द्वितीय जलियांवाला बाग"। 13. सियावा हत्याकांड — 12 अप्रैल 1922 ई.; भूला-बलोलिया हत्याकांड — 5-6 मई 1922 ई.। 14. मीणा आंदोलन — 1924 ई. आपराधिक जनजाति अधिनियम व 1930 ई. जरायमपेशा कानून का विरोध। 15. बगावास सम्मेलन ("मुक्ति दिवस") — 28 अक्टूबर 1946 ई., 26,000 मीणा चौकीदारों का सामूहिक त्याग-पत्र। 16. जरायमपेशा कानून पूर्णतः समाप्त — 1952 ई. (हीरालाल शास्त्री-टीकाराम पालीवाल)। 17. प्रताप (कानपुर, गणेश शंकर विद्यार्थी) ने बिजोलिया आंदोलन को राष्ट्रीय मंच दिया। 18. ये सभी आंदोलन आगे चलकर प्रजामंडल आंदोलन (अध्याय 15) की नींव बने।
नीचे दी समय-रेखा (Timeline) इस अध्याय के संपूर्ण घटनाक्रम को स्पष्ट करती है — रिवीजन के लिए इसे ज़रूर दोहराएं :
वर्ष/तिथि घटना/Event महत्व
20-22 जून 1880 मातृकुं डिया (चित्तौड़) जाट आंदोलन राजस्थान का प्रथम कृ षक विरोध
1897 बिजोलिया आंदोलन प्रारंभ साधु सीतारामदास का नेतृत्व
1913 मानगढ़ हत्याकांड — गोविंद गुरु गिरफ्तार फांसी की सजा 20 वर्ष कारावास में बदली
1916 किसान पंच बोर्ड गठन विजयसिंह पथिक का नेतृत्व प्रारंभ
1917 उपरमाल पंच बोर्ड गठन 13-सदस्यीय संगठन, सरपंच मन्ना पटेल
1921 एकी आंदोलन प्रारंभ (मातृकुं डिया से) मोतीलाल तेजावत का नेतृत्व
12 अप्रैल 1922 सियावा हत्याकांड 3 गरासी शहीद
6/7 मार्च 1922 नीमड़ा हत्याकांड लगभग 1200 भील शहीद
5-6 मई 1922 भूला-बलोलिया हत्याकांड लगभग 50 मृत, 150 घायल
1922 बूंदी (बरड़) आंदोलन प्रारंभ नयनूराम शर्मा का नेतृत्व
2 अप्रैल 1923 डाबी हत्याकांड (बूंदी) किसान आंदोलन का दमन
13 जुलाई 1923 गोविंदपुरा हत्याकांड (बेंगू) नानकजी भील शहीद
1927 करौली किसान आंदोलन कुं वर मदनसिंह का नेतृत्व
1929 तेजावत का ईडर पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण गांधीजी की सलाह पर
25 अप्रैल 1934 कटराथल महिला सम्मेलन शेखावाटी आंदोलन में महिला-भागीदारी
21 जून 1934 जयसिंहपुरा गोलीकांड शेखावाटी आंदोलन का दमन
25 अप्रैल 1935 कु दन गांव हत्याकांड शेखावाटी आंदोलन का सर्वाधिक रक्तरंजित प्रसंग
1941 बिजोलिया आंदोलन का अंतिम समाधान महाराणा भूपालसिंह द्वारा मांगें स्वीकार
1945-46 उणियारा में बैरवा जाति का आंदोलन दलित जागृति — नागरिक असमानता का विरोध
28 अक्टूबर 1946 बगावास सम्मेलन ("मुक्ति दिवस") 26,000 मीणा चौकीदारों का त्याग-पत्र
1952 जरायमपेशा कानून समाप्त मीणा आंदोलन की अंतिम सफलता