📋 इस अध्याय में
- परिचय — पृष्ठभूमि एवं शब्दावली
- मेवाड़ जाट आंदोलन — मातृकुंडिया (1880)
- बिजोलिया किसान आंदोलन (1897-1941) — प्रथम चरण
- बिजोलिया आंदोलन — नेतृत्व, चरण एवं समाधान
- बेंगू किसान आंदोलन (1921-1925)
- बूंदी (बरड़) किसान आंदोलन एवं गुर्जर आंदोलन (1922-1945)
- मारवाड़ एवं करौली किसान आंदोलन
- शेखावाटी (सीकर-जयपुर) किसान आंदोलन (1922-1947)
- अलवर के किसान आंदोलन — नीमूचाणा हत्याकांड एवं मेव आंदोलन
- भरतपुर एवं बीकानेर किसान आंदोलन
- किसान आंदोलनों की तुलनात्मक तालिका एवं महत्व
- जनजातीय आंदोलन — परिचय, कारण एवं शब्दावली
- भील/भगत आंदोलन — गोविंद गुरु एवं मानगढ़ हत्याकांड (1913)
- एकी आंदोलन (भोमट) — मोतीलाल तेजावत एवं नीमड़ा हत्याकांड (1922)
- मीणा आंदोलन — जरायमपेशा कानून का विरोध
- आंदोलनों से जुड़े समाचार-पत्र, साहित्य एवं गीत
- आंदोलनों का ऐतिहासिक महत्व एवं प्रभाव
- अध्याय सार एवं समय-रेखा
कल्पना कीजिए — बिजोलिया (भीलवाड़ा) के एक छोटे-से गांव में एक किसान अपने खेत में हल जोत रहा है, परंतु उसकी फसल का बड़ा हिस्सा हर साल लगभग 84 प्रकार के अलग-अलग करों — "लाग-बाग" — में चला जाता है। बेटी के विवाह पर "चंवरी कर", नए जागीरदार के आगमन पर "तलवार बंधाई कर", यहां तक कि हल की संख्या और गाड़ी के पहियों पर भी कर! यही वह घुटन थी जिसने 1897 ई. में एक शांत विरोध को जन्म दिया, जो अगले 44 वर्षों तक चला और अंततः पूरे राजस्थान में किसान चेतना की चिंगारी बन गया। वहीं दूसरी ओर, वागड़-मेवाड़ के घने जंगलों में भील समुदाय अंग्रेजी हुकूमत की बेगार, बोलाई व राखवाली जैसी प्रथाओं से त्रस्त था — गोविंद गुरु के नेतृत्व में 1913 ई. में मानगढ़ की पहाड़ी पर 1500 से अधिक भील शहीद हुए, जिसे इतिहासकार "राजस्थान का जलियांवाला बाग हत्याकांड" कहते हैं। यह अध्याय उन सभी किसान एवं जनजातीय आंदोलनों की कहानी है जिन्होंने रियासती सामंतवाद व ब्रिटिश शोषण के विरुद्ध जन-चेतना जगाई तथा आगे चलकर प्रजामंडल आंदोलन (विस्तार देखें: अध्याय 15) की मजबूत नींव रखी।
1परिचय — पृष्ठभूमि एवं शब्दावली
- 19वीं-20वीं सदी में राजस्थान की रियासतों में किसानों व जनजातियों पर तिहरा शोषण था — सामंत/जागीरदार का लगान, रियासती दरबार का राजस्व एवं अंग्रेजी हस्तक्षेप से उत्पन्न नई मांगें। भू-राजस्व वृद्धि, बेगार (बिना मजदूरी श्रम), तथा दर्जनों अतिरिक्त करों ("लाग-बाग") ने किसानों की कमर तोड़ दी।
- ये आंदोलन मुख्यतः स्थानीय व आर्थिक मांगों से प्रारंभ हुए, परंतु शीघ्र ही राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन से जुड़ गए — कांग्रेस के नेता (विजयसिंह पथिक, माणिक्यलाल वर्मा, हरिभाऊ उपाध्याय आदि) व समाचार-पत्रों (प्रताप, राजस्थान केसरी) ने इन्हें राष्ट्रीय मंच दिया।
| शब्द/कर (Term) | अर्थ (Meaning) |
|---|
| लाग-बाग (Lag-Bag) | भूमि-कर के अतिरिक्त वसूले जाने वाले दर्जनों प्रकार के अनुचित उपकर — बिजोलिया में इनकी संख्या लगभग 84 तक थी |
| चंवरी कर (Chanwri Kar) | पुत्री के विवाह पर लिया जाने वाला कर |
| तलवार बंधाई कर (Talwar Bandhai) | नए जागीरदार/ठिकानेदार के गद्दी पर बैठने पर वसूला जाने वाला कर |
| लाटा-कुंता (Lata-Kunta) | अनुमानित उपज के आधार पर अतिरिक्त भू-राजस्व |
| बेगार (Begar) | बिना पारिश्रमिक के जबरन श्रम/सेवा |
| बोलाई/राखवाली (Bolai/Rakhwali) | जनजातीय क्षेत्रों में वन-रक्षा व चौकीदारी के बदले वसूला जाने वाला कर/भेंट |
| आधा-बरार (Aadha Barar) | जनजातीय क्षेत्र में उपज का आधा हिस्सा राज्य को देने की प्रथा |
| मौताना (Mautana) | मृत्यु/हत्या की सूचना न देने या अपराधी न पकड़े जाने पर पूरे गांव/कुटुंब पर लगाया गया सामूहिक दंड |
| जागीरदारी प्रथा (Jagirdari) | सामंतों को भूमि व राजस्व अधिकार — विस्तार देखें: अध्याय 11 |
🌾 किसान आंदोलनों के सामान्य कारण
- अत्यधिक भू-राजस्व एवं दर्जनों लाग-बाग
- बेगार प्रथा का दबाव
- जागीरदारों की मनमानी व अत्याचार
- अकाल के समय भी कर-माफी न देना
- न्याय-व्यवस्था का अभाव
🌳 जनजातीय आंदोलनों के सामान्य कारण
- वन-भूमि पर अधिकार छिनना, बेगार व बोलाई-राखवाली
- मौताना जैसी सामूहिक दंड-प्रथाएं
- शराबबंदी/आबकारी नीति से आर्थिक चोट
- धार्मिक-सामाजिक कुरीतियां (डाकन प्रथा आदि)
- मेवाड़ भील कोर व मेरवाड़ा बटालियन में जबरन भर्ती (1841-32)
2मेवाड़ जाट आंदोलन — मातृकुंडिया (1880)
- चित्तौड़गढ़ के मातृकुंडिया क्षेत्र में जाट किसानों ने 20-22 जून 1880 ई. को बढ़ते भू-राजस्व व लाग-बाग के विरुद्ध विरोध किया — इसे राजस्थान का सबसे प्रथम संगठित कृषक विरोध माना जाता है, जो बिजोलिया आंदोलन (1897) से भी लगभग 17 वर्ष पूर्व हुआ।
- यद्यपि यह आंदोलन अल्पकालिक व स्थानीय स्तर तक सीमित रहा तथा शीघ्र ही दबा दिया गया, फिर भी इसने आगामी दशकों में राजस्थान में उभरने वाले व्यापक किसान आंदोलनों के लिए एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि तैयार की।
3बिजोलिया किसान आंदोलन (1897-1941) — प्रथम चरण
✊ बिजोलिया किसान आंदोलन (1897-1941 ई. (लगभग 44 वर्ष)) भीलवाड़ा (मेवाड़ ठिकाना) — राजस्थान का सबसे लंबा एवं सर्वाधिक प्रभावशाली, पूर्णतः अहिंसक किसान आंदोलन
- क्षेत्र — बिजोलिया ठिकाना (मेवाड़ राज्य के अंतर्गत), मुख्यतः धाकड़ जाति के किसान।
- कारण — लगभग 84 प्रकार के लाग-बाग (चंवरी कर, तलवार बंधाई कर, लाटा-कुंता आदि) तथा भारी बेगार का बोझ।
- प्रथम चरण (1897-1916) — साधु सीतारामदास ("आंदोलन के जनक") ने कर-वृद्धि के विरुद्ध असहयोग प्रारंभ किया; किसानों ने खेती व लगान देना बंद किया।
- द्वितीय चरण (1916-1923) — 1916 ई. में साधु सीतारामदास के आग्रह पर विजयसिंह पथिक ने नेतृत्व संभाला; 1916 में "किसान पंच बोर्ड" (अध्यक्ष साधु सीतारामदास) एवं 1917 में "उपरमाल पंच बोर्ड" (13 सदस्य, सरपंच मन्ना पटेल) का गठन हुआ।
- तृतीय चरण (1927-1941) — माणिक्यलाल वर्मा के नेतृत्व में आंदोलन पुनः तीव्र हुआ; अंततः 1941 ई. में मेवाड़ महाराणा भूपालसिंह द्वारा प्रमुख मांगें स्वीकार कर आंदोलन समाप्त हुआ।
- विजयसिंह पथिक ने ग़नेश शंकर विद्यार्थी के कानपुर से प्रकाशित समाचार-पत्र "प्रताप" के माध्यम से बिजोलिया के मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाया।
💡 84 लाग-बाग — जब हर खुशी और हर जरूरत पर टैक्स लगे
सोचिए — एक किसान की बेटी का विवाह होना है, पर खुशी मनाने से पहले उसे "चंवरी कर" चुकाना पड़ता है। नया ठिकानेदार गद्दी पर बैठे, तो किसान को "तलवार बंधाई कर" देना होता है। यहां तक कि हल जोतने, गाड़ी चलाने और यहां तक कि दांत निकलवाने तक पर कर लगते थे — कुल मिलाकर लगभग 84 प्रकार के ऐसे "लाग-बाग"! बिजोलिया के किसानों ने तय किया — अब बस नहीं। उन्होंने न लगान चुकाया, न खेत जोता — और यह मौन प्रतिरोध पूरे 44 वर्षों तक, बिना किसी हिंसा के चला। यही कारण है कि इतिहासकार बिजोलिया आंदोलन को महात्मा गांधी के "बारडोली सत्याग्रह" से पूर्व का, राजस्थान का अपना "मेवाड़ का बारडोली" कहते हैं।
4बिजोलिया आंदोलन — नेतृत्व, चरण एवं समाधान
| चरण (Phase) | अवधि | प्रमुख नेतृत्व | मुख्य घटनाएं |
|---|
| प्रथम चरण | 1897-1916 | साधु सीतारामदास | असहयोग व लगान-बंदी की शुरुआत; "बिजोलिया आंदोलन के जनक" की उपाधि |
| द्वितीय चरण | 1916-1923 | विजयसिंह पथिक, साधु सीतारामदास | किसान पंच बोर्ड (1916) व उपरमाल पंच बोर्ड (1917) गठन; बिन्दुलाल भट्टाचार्य जांच आयोग (1917); मेवाड़ दरबार से समझौता व बाद में विश्वासघात |
| तृतीय चरण | 1927-1941 | माणिक्यलाल वर्मा | आंदोलन का पुनरुत्थान; 1941 ई. में महाराणा भूपालसिंह द्वारा प्रमुख लाग-बाग समाप्त, अंतिम समाधान |
विशेष तथ्य: बिजोलिया आंदोलन को "राजस्थान का प्रथम संगठित एवं सर्वाधिक दीर्घकालिक किसान आंदोलन" (44 वर्ष, 1897-1941) माना जाता है। यह भारत के उन गिने-चुने किसान आंदोलनों में से एक है जो प्रारंभ से अंत तक पूर्णतः अहिंसक रहा।
5बेंगू किसान आंदोलन (1921-1925)
- मेवाड़ राज्य के बेंगू ठिकाने में किसानों ने बिजोलिया आंदोलन से प्रेरित होकर 1921 ई. में लाग-बाग व बेगार के विरुद्ध आंदोलन प्रारंभ किया — नेतृत्व रामनारायण चौधरी व हरिभाऊ उपाध्याय ने किया, विजयसिंह पथिक का भी मार्गदर्शन मिला।
- 13 जुलाई 1923 ई. को गोविंदपुरा (बेंगू) में मेवाड़ राज्य की सेना ने शांतिपूर्वक एकत्र किसानों पर गोलीबारी कर दी, जिसमें अनेक किसान शहीद हुए — इस हत्याकांड में नानकजी भील भी शहीद हुए, जिनकी स्मृति में "नानक भील की अर्जी" नामक लोकगीत रचा गया।
- इस दमन के बावजूद आंदोलन 1925 ई. तक चलता रहा तथा अंततः मेवाड़ दरबार को कुछ लाग-बाग समाप्त करने पड़े।
6बूंदी (बरड़) किसान आंदोलन एवं गुर्जर आंदोलन (1922-1945)
- बूंदी रियासत के बरड़ क्षेत्र में किसानों ने अत्यधिक लगान व लाग-बाग के विरुद्ध 1922 ई. में आंदोलन प्रारंभ किया — नेतृत्व नयनूराम शर्मा ने किया, जिन्हें "बूंदी का गांधी" कहा जाता है।
- 2 अप्रैल 1923 ई. को डाबी गांव में बूंदी राज्य की सेना ने आंदोलनकारी किसानों पर गोली चलाई, जिसमें कई किसान शहीद हुए — इसे "डाबी हत्याकांड" कहा जाता है।
- बाद में 1936-1945 ई. के दौरान बूंदी क्षेत्र में एक पृथक गुर्जर आंदोलन भी हुआ, जिसमें गुर्जर समुदाय ने भूमि-अधिकार व अतिरिक्त करों के विरुद्ध संघर्ष किया।
| आंदोलन/घटना | तिथि (Date) | विवरण |
|---|
| बूंदी (बरड़) आंदोलन प्रारंभ | 1922 ई. | नयनूराम शर्मा के नेतृत्व में लगान-वृद्धि के विरुद्ध विरोध |
| डाबी हत्याकांड | 2 अप्रैल 1923 ई. | बूंदी सेना की गोलीबारी में किसान शहीद |
| आंदोलन का समापन | 1943 ई. | आंशिक मांगें स्वीकृत |
| गुर्जर आंदोलन | 1936-1945 ई. | भूमि-अधिकार व करों के विरुद्ध पृथक संघर्ष |
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7मारवाड़ एवं करौली किसान आंदोलन
- मारवाड़ (जोधपुर) राज्य में किसानों के आर्थिक शोषण के विरुद्ध चंदनमल सुराणा एवं जयनारायण व्यास के नेतृत्व में आंदोलन संगठित हुआ — राज्य से भू-राजस्व नीति में सुधार व लाग-बाग कम करने की मांग रखी गई।
- करौली रियासत में 1927 ई. में कुंवर मदनसिंह के नेतृत्व में किसानों ने अत्यधिक भू-राजस्व व बेगार के विरुद्ध आंदोलन किया।
8शेखावाटी (सीकर-जयपुर) किसान आंदोलन (1922-1947)
- जयपुर राज्य के शेखावाटी क्षेत्र (सीकर, जयपुर) में जागीरदारों द्वारा वसूले जाने वाले "जकात" (चुंगी कर) एवं अन्य लाग-बाग के विरुद्ध 1922 ई. से लंबा आंदोलन चला, जो 1947 तक विभिन्न चरणों में जारी रहा।
- 25 अप्रैल 1934 ई. को कटराथल में एक ऐतिहासिक महिला सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में किसान महिलाओं ने भाग लिया — यह राजस्थान के किसान आंदोलनों में महिला-भागीदारी का दुर्लभ उदाहरण है।
- 21 जून 1934 ई. को जयसिंहपुरा में तथा 25 अप्रैल 1935 ई. को कुदन गांव में जागीरी सेना की गोलीबारी में अनेक किसान शहीद हुए।
- 1934 ई. में ही जाट प्रजापति महायज्ञ के आयोजन के माध्यम से जाट किसानों ने सामाजिक-आर्थिक चेतना का प्रसार किया। "पंचपाना जागीर" क्षेत्र के जागीरदारों के विरुद्ध यह आंदोलन विशेष रूप से केंद्रित रहा।
| घटना (Event) | तिथि (Date) | महत्व |
|---|
| कटराथल महिला सम्मेलन | 25 अप्रैल 1934 ई. | किसान आंदोलन में महिला-भागीदारी का प्रतीक |
| जयसिंहपुरा गोलीकांड | 21 जून 1934 ई. | जागीरी सेना की गोलीबारी में किसान शहीद |
| कुदन गांव हत्याकांड | 25 अप्रैल 1935 ई. | शेखावाटी आंदोलन का सर्वाधिक रक्तरंजित प्रसंग |
| जाट प्रजापति महायज्ञ | 1934 ई. | सामाजिक-आर्थिक जागृति का आयोजन |
9अलवर के किसान आंदोलन — नीमूचाणा हत्याकांड एवं मेव आंदोलन
- अलवर रियासत में 1921 ई. में "सुअर-पालन विरोधी आंदोलन" हुआ, जिसमें किसानों ने राज्य द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों व करों का विरोध किया।
- 14 मई 1925 ई. को नीमूचाणा गांव (अलवर) में अत्यधिक लगान व बेगार के विरुद्ध एकत्र किसानों पर राज्य-सेना ने गोलीबारी कर दी, जिसमें बड़ी संख्या में किसान शहीद हुए — समकालीन समाचार-पत्रों ने इसकी तुलना जलियांवाला बाग हत्याकांड से की तथा इसे व्यापक रूप से उजागर किया।
- 1932-1934 ई. के दौरान अलवर क्षेत्र के मेव किसानों ने भी भारी भू-राजस्व, बेगार तथा सामाजिक-धार्मिक दबाव के विरुद्ध संगठित होकर आंदोलन किया, जिसे "मेव किसान आंदोलन" कहा जाता है — इसने आगे चलकर मेव क्षेत्र में जन-जागृति फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
"न हाकिम, न हुकुम — अब हम अपने अधिकारों के लिए स्वयं खड़े होंगे।" — आंदोलनकारी किसानों/जनजातीय समुदायों का सामूहिक उद्घोष
10भरतपुर एवं बीकानेर किसान आंदोलन
- भरतपुर रियासत के जाट किसानों ने भी उच्च भू-राजस्व व बेगार-प्रथा के विरुद्ध समय-समय पर विरोध किया — यहां का आंदोलन 1857 की क्रांति के समय के जन-असंतोष से भी जुड़ा रहा (विस्तार देखें: अध्याय 13)।
- बीकानेर रियासत में गंगनहर परियोजना बनने के बाद किसानों पर "आबियाना" (सिंचाई-कर) का भारी बोझ पड़ा — इसके विरुद्ध किसानों ने संगठित होकर विरोध किया।
- 1937 ई. में उदासर तथा दूधवाखारा क्षेत्र में आबियाना-विरोधी आंदोलन तेज हुआ; 1946 ई. में रायसिंहनगर व कंगड़ कांड जैसी घटनाओं में किसानों व राज्य-प्रशासन के बीच संघर्ष हुआ।
11किसान आंदोलनों की तुलनात्मक तालिका एवं महत्व
| आंदोलन (Movement) | अवधि (Period) | प्रमुख नेता (Leader) | मुख्य कारण/मांग |
|---|
| मातृकुंडिया (चित्तौड़) | 1880 ई. | स्थानीय जाट किसान | अतिरिक्त भू-राजस्व — राजस्थान का प्रथम आंदोलन |
| बिजोलिया | 1897-1941 ई. | सीतारामदास, विजयसिंह पथिक, माणिक्यलाल वर्मा | 84 लाग-बाग व बेगार — सबसे दीर्घकालिक आंदोलन |
| बेंगू | 1921-1925 ई. | रामनारायण चौधरी, हरिभाऊ उपाध्याय | लाग-बाग — गोविंदपुरा हत्याकांड (1923) |
| बूंदी (बरड़) | 1922-1943 ई. | नयनूराम शर्मा | अत्यधिक लगान — डाबी हत्याकांड (1923) |
| शेखावाटी | 1922-1947 ई. | स्थानीय जाट/किसान नेतृत्व | जकात व लाग-बाग — कटराथल महिला सम्मेलन (1934) |
| नीमूचाणा (अलवर) | 1925 ई. | स्थानीय किसान | अत्यधिक लगान व बेगार — हत्याकांड (14 मई 1925) |
| मेव (अलवर) | 1932-1934 ई. | स्थानीय मेव नेतृत्व | भू-राजस्व व सामाजिक दबाव |
| करौली | 1927 ई. | कुंवर मदनसिंह | बेगार व भू-राजस्व |
| बीकानेर (आबियाना) | 1937-1946 ई. | स्थानीय किसान संगठन | गंगनहर सिंचाई-कर (आबियाना) |
★ किसान आंदोलन — त्वरित स्मरण-बिंदु ★
1. बिजोलिया आंदोलन राजस्थान का सबसे लंबा (44 वर्ष) एवं पूर्णतः अहिंसक किसान आंदोलन था — इसे "मेवाड़ का बारडोली" भी कहा जाता है। 2. मातृकुंडिया आंदोलन (1880) को राजस्थान का प्रथम कृषक विरोध माना जाता है, जो बिजोलिया से भी पूर्व हुआ। 3. विजयसिंह पथिक को "राजस्थान के किसान आंदोलनों का जनक/पिता" कहा जाता है — उन्होंने बिजोलिया, बेंगू व अन्य आंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 4. नीमूचाणा हत्याकांड (14 मई 1925, अलवर) को समकालीन प्रेस ने जलियांवाला बाग से जोड़ा। 5. नयनूराम शर्मा को "बूंदी का गांधी" कहा जाता है।
12जनजातीय आंदोलन — परिचय, कारण एवं शब्दावली
राजस्थान जनजातीय जनसंख्या की दृष्टि से भारत में छठे स्थान पर है — यहां मुख्यतः भील, गरासिया, मीणा व सहरिया जनजातियां मेवाड़-वागड़ (उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा) व शेखावाटी-पूर्वी क्षेत्र में केंद्रित हैं। अंग्रेजी हस्तक्षेप व सामंती दमन के विरुद्ध इन समुदायों ने भी सशस्त्र एवं सामाजिक-धार्मिक आंदोलन चलाए, जिनमें भगत/भील आंदोलन, एकी (भोमट) आंदोलन तथा मीणा आंदोलन प्रमुख हैं।
| कारण (Cause) | विवरण (Detail) |
|---|
| सैन्य भर्ती का बोझ | 1832 ई. में मेरवाड़ा बटालियन एवं 1841 ई. में मेवाड़ भील कोर की स्थापना — जबरन भर्ती से आक्रोश |
| मौताना प्रथा | हत्या/अपराध की सूचना न मिलने पर पूरे गांव पर सामूहिक दंड — बाद में समाप्त की गई |
| डाकन प्रथा प्रतिबंध | 1853 ई. में मेवाड़ में डाकन-प्रथा (टोना-टोटका के आरोप में हत्या) पर प्रतिबंध — सामाजिक हस्तक्षेप के रूप में देखा गया |
| आबकारी नीति | महुए की शराब पर कर व नियंत्रण — जनजातीय आजीविका व परंपरा पर सीधा प्रभाव |
| बेगार, बोलाई व राखवाली | वन-भूमि व चौकीदारी से जुड़े अनुचित कर एवं जबरन श्रम |
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13भील/भगत आंदोलन — गोविंद गुरु एवं मानगढ़ हत्याकांड (1913)
✊ गोविंद गुरु (1858-1913 ई. (आंदोलन काल)) भगत/संप सभा आंदोलन के प्रवर्तक — मेवाड़-वागड़ भील समुदाय के महानायक
- जन्म — 1858 ई., बेडसा/बांसिया (डूंगरपुर) में एक बंजारा परिवार में; आर्यसमाज व दयानंद सरस्वती के विचारों से प्रभावित; कोटा-बूंदी अखाड़े के साधु राजगिरी के शिष्य रहे।
- 1883 ई. में सिरोही में "संप सभा" (प्रेम सभा/दशनामी संप्रदाय) की स्थापना की — उद्देश्य: नैतिक सुधार, एकेश्वरवाद, चोरी-शराब का त्याग तथा पंचायती व्यवस्था का प्रचार।
- 1903 ई. में मानगढ़ पहाड़ी (बांसवाड़ा) पर संप सभा का प्रथम बड़ा अधिवेशन हुआ; 1910 ई. में 33-सूत्रीय मांग-पत्र तैयार किया गया, जिसमें बेगार-समाप्ति, कर-कमी व भील स्वशासन जैसी मांगें शामिल थीं।
- 17 नवंबर 1913 ई. को मानगढ़ पहाड़ी (बांसवाड़ा) पर एकत्र हजारों भीलों पर अंग्रेज अधिकारी मेजर बेली के आदेश पर गोलीबारी की गई — 1500 से अधिक भील शहीद हुए।
- इस नरसंहार को इतिहासकार "राजस्थान/वागड़ का जलियांवाला बाग हत्याकांड" कहते हैं — यह जलियांवाला बाग हत्याकांड (1919) से भी लगभग 6 वर्ष पूर्व घटित हुआ था।
- गोविंद गुरु को गिरफ्तार कर अहमदाबाद जेल भेजा गया; बाद का जीवन उन्होंने कांबोई (गुजरात) में व्यतीत किया — वे आजीवन अहिंसा के समर्थक रहे तथा श्वेत ध्वज को शांति के प्रतीक के रूप में अपनाया।
💡 मानगढ़ — जब पहाड़ी पर प्रार्थना करते भीलों पर गोलियां चलीं
सोचिए — हजारों भील स्त्री-पुरुष-बच्चे मानगढ़ की पहाड़ी पर गोविंद गुरु के नेतृत्व में एकत्र हैं, हाथ में कोई हथियार नहीं, केवल अपने अधिकारों की शांतिपूर्ण मांग। 17 नवंबर 1913 की उस सुबह अंग्रेज सेना ने चारों ओर से पहाड़ी को घेर लिया और बिना किसी चेतावनी के गोलीबारी शुरू कर दी — 1500 से अधिक निर्दोष भील वहीं शहीद हो गए। यह घटना जलियांवाला बाग हत्याकांड से छह वर्ष पहले हुई, फिर भी लंबे समय तक इतिहास की किताबों में उपेक्षित रही। आज मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक के रूप में मान्यता देने की मांग जनजातीय समुदाय द्वारा निरंतर उठाई जाती रही है।
14एकी आंदोलन (भोमट) — मोतीलाल तेजावत एवं नीमड़ा हत्याकांड (1922)
✊ मोतीलाल तेजावत (1921-1936 ई. (आंदोलन काल)) "बावजी" / "आदिवासियों के मसीहा" / "मेवाड़ के गांधी" — एकी (भोमट) आंदोलन के प्रणेता
- जन्म — 1886-87 ई. में कोल्यारी (उदयपुर) के एक ओसवाल परिवार में; बिजोलिया आंदोलन से प्रेरित होकर मेवाड़ के भोमट क्षेत्र (गोगुंदा, झाड़ोल, कोटड़ा) में सक्रिय हुए।
- 1921 ई. में मातृकुंडिया (चित्तौड़गढ़) से आंदोलन प्रारंभ किया — 21-सूत्रीय मांग-पत्र "मेवाड़ की पुकार" के नाम से प्रस्तुत किया, जिसमें बेगार-समाप्ति व कर-कमी की मांगें शामिल थीं।
- नारा दिया — "न हाकिम, न हुकुम" — अर्थात न कोई अधिकारी, न कोई आदेश स्वीकार्य, केवल स्वशासन।
- 12 अप्रैल 1922 ई. को सियावा में 3 गरासियों की गोलीबारी में मृत्यु हुई; 5-6 मई 1922 ई. को भूला-बलोलिया में लगभग 50 लोग मारे गए व 150 घायल हुए — राजस्थान सेवा संघ ने इसकी जांच कर "तरुण राजस्थान" समाचार-पत्र में रिपोर्ट प्रकाशित की।
- 6/7 मार्च 1922 ई. को नीमड़ा (विजयनगर) में मेजर सटन के नेतृत्व में अंग्रेज-मेवाड़ सेना ने एकत्र भीलों पर गोलीबारी की — लगभग 1200 भील शहीद हुए, जिसे "मेवाड़/राजस्थान का द्वितीय जलियांवाला बाग" कहा जाता है।
- जनवरी 1922 ई. में सिरोही में भी भील-गरासिया समुदाय ने तेजावत के आह्वान पर संगठित होकर आंदोलन किया।
- बाद में तेजावत भूमिगत हो गए तथा गांधीजी की सलाह पर 1929 ई. में आत्मसमर्पण किया; 1936 ई. में इस शर्त पर रिहा किए गए कि वे भविष्य में कोई आंदोलन नहीं चलाएंगे — उन्होंने 1936 ई. में "वनवासी संघ" की स्थापना कर जनजातीय कल्याण कार्य जारी रखा।
| हत्याकांड (Massacre) | तिथि (Date) | विवरण |
|---|
| सियावा हत्याकांड | 12 अप्रैल 1922 ई. | 3 गरासियों की गोलीबारी में मृत्यु |
| भूला-बलोलिया हत्याकांड | 5-6 मई 1922 ई. | लगभग 50 मृत, 150 घायल — राजस्थान सेवा संघ की जांच |
| नीमड़ा (विजयनगर) हत्याकांड | 6/7 मार्च 1922 ई. | मेजर सटन के नेतृत्व में गोलीबारी, लगभग 1200 भील शहीद — "मेवाड़ का द्वितीय जलियांवाला बाग" |
15मीणा आंदोलन — जरायमपेशा कानून का विरोध
- 1924 ई. में ब्रिटिश सरकार द्वारा पारित "आपराधिक जनजाति अधिनियम" (Criminal Tribes Act) के अंतर्गत मीणा जाति को "अपराधी जनजाति" घोषित कर प्रतिदिन थाने में हाजिरी लगाने हेतु बाध्य किया गया — 1930 ई. में जयपुर राज्य ने भी "जरायमपेशा कानून" लागू किया, जिससे मीणा समुदाय में गहरा आक्रोश फैला।
- 1933 ई. में "मीणा क्षेत्रीय महासभा" का गठन हुआ, जिसने इस अपमानजनक कानून के विरुद्ध संगठित आंदोलन प्रारंभ किया।
- 1944 ई. में "मीणा जाति सुधार समिति" द्वारा नीम का थाना (सीकर) में एक बड़ा सम्मेलन आयोजित हुआ — इसी दौर में जैन मुनि मगनसागर ने "मीण पुराण" नामक ग्रंथ की रचना कर मीणा समुदाय के गौरवशाली इतिहास को उजागर किया।
- 28 अक्टूबर 1946 ई. को बगावास सम्मेलन में लगभग 26,000 मीणा चौकीदारों ने सामूहिक रूप से त्याग-पत्र दे दिया — इस ऐतिहासिक घटना को "मुक्ति दिवस" के रूप में मनाया जाता है।
- स्वतंत्रता के बाद हीरालाल शास्त्री व टीकाराम पालीवाल के प्रयासों से 1952 ई. में जरायमपेशा कानून पूर्णतः समाप्त कर दिया गया।
- इससे पूर्व 1851-1860 ई. के दौरान जहाजपुर (भीलवाड़ा) क्षेत्र में भी मीणा समुदाय का एक पृथक सशस्त्र विद्रोह हुआ था, जो कर-वृद्धि व प्रशासनिक दमन के विरुद्ध था।
| वर्ष (Year) | घटना (Event) |
|---|
| 1851-1860 ई. | जहाजपुर मीणा विद्रोह |
| 1924 ई. | आपराधिक जनजाति अधिनियम (Criminal Tribes Act) |
| 1930 ई. | जयपुर राज्य में जरायमपेशा कानून लागू |
| 1933 ई. | मीणा क्षेत्रीय महासभा का गठन |
| 1944 ई. | नीम का थाना सम्मेलन; "मीण पुराण" ग्रंथ की रचना (मुनि मगनसागर) |
| 28 अक्टूबर 1946 ई. | बगावास सम्मेलन — 26,000 चौकीदारों का सामूहिक त्याग-पत्र, "मुक्ति दिवस" |
| 1952 ई. | जरायमपेशा कानून पूर्णतः समाप्त (हीरालाल शास्त्री-टीकाराम पालीवाल) |
🏔️ भगत आंदोलन (गोविंद गुरु)
- क्षेत्र — मेवाड़-वागड़ (बांसवाड़ा-डूंगरपुर)
- संगठन — संप सभा (स्थापना 1883)
- चरम घटना — मानगढ़ हत्याकांड (17 नवंबर 1913)
- लगभग 1500 भील शहीद
⛰️ एकी आंदोलन (मोतीलाल तेजावत)
- क्षेत्र — भोमट (गोगुंदा-झाड़ोल-कोटड़ा)
- नारा — "न हाकिम, न हुकुम"
- चरम घटना — नीमड़ा हत्याकांड (6/7 मार्च 1922)
- लगभग 1200 भील शहीद
16आंदोलनों से जुड़े समाचार-पत्र, साहित्य एवं गीत
इन आंदोलनों को जन-जन तक पहुंचाने तथा राष्ट्रीय चेतना से जोड़ने में समकालीन समाचार-पत्रों व लोक-साहित्य की निर्णायक भूमिका रही — इन्होंने रियासती दमन को उजागर कर सार्वजनिक दबाव बनाया।
| समाचार-पत्र/रचना | प्रकाशन स्थान/रचनाकार | महत्व |
|---|
| प्रताप | कानपुर (गणेश शंकर विद्यार्थी), 1910 | बिजोलिया आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित किया |
| राजस्थान केसरी | वर्धा (विजयसिंह पथिक) | किसान आंदोलनों की खबरें व विश्लेषण |
| नवीन राजस्थान | अजमेर, 1922 (1923 में प्रतिबंधित) | रियासती दमन का पर्दाफाश |
| तरुण राजस्थान | अजमेर/ब्यावर, 1923 | भूला-बलोलिया हत्याकांड की जांच-रिपोर्ट प्रकाशित |
| अग्नि-बाण | ब्यावर, 1932 | प्रथम राजस्थानी भाषा का राजनीतिक समाचार-पत्र |
| रियासत | — | नीमूचाणा हत्याकांड की तुलना जलियांवाला बाग से की |
| उपरमाल का डंका | बिजोलिया क्षेत्र | स्थानीय स्तर पर आंदोलन-प्रचार |
| पछीदा (गीत) | माणिक्यलाल वर्मा | किसान शोषण पर आधारित लोकगीत |
| पीड़ितों का पछीदा (गीत) | विजयसिंह पथिक | किसान पीड़ा को समर्पित रचना |
| नानक भील की अर्जी (गीत) | अज्ञात रचनाकार | गोविंदपुरा हत्याकांड में शहीद नानकजी भील की स्मृति में |
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: राजपूताना का प्रथम समाचार-पत्र "मजहरुल सरूर" 1849 ई. में भरतपुर से प्रकाशित हुआ था; "मारवाड़ गजट" (1866) व "सज्जन कीर्ति सुधाकर" (उदयपुर, 1876/79) भी प्रारंभिक महत्वपूर्ण पत्र थे — इन्होंने आगे चलकर किसान व जनजातीय आंदोलनों की खबरों को जन-जन तक पहुंचाने की परंपरा स्थापित की।
17आंदोलनों का ऐतिहासिक महत्व एवं प्रभाव
- इन आंदोलनों ने रियासती जनता में राजनीतिक चेतना जगाई तथा उन्हें संगठित प्रतिरोध की शक्ति का एहसास कराया — यह चेतना आगे चलकर प्रजामंडल आंदोलन (विस्तार देखें: अध्याय 15) का आधार बनी।
- बिजोलिया, बेंगू, बूंदी व शेखावाटी जैसे किसान आंदोलनों ने लाग-बाग व बेगार जैसी शोषणकारी प्रथाओं को समाप्त/सीमित करवाने में सफलता पाई, जिससे रियासती प्रशासन में सुधार को बल मिला।
- भील व मीणा आंदोलनों ने जनजातीय समुदाय की सामाजिक-राजनीतिक भागीदारी को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा — गोविंद गुरु व मोतीलाल तेजावत आज भी जनजातीय अस्मिता के प्रतीक माने जाते हैं।
- मानगढ़ धाम (बांसवाड़ा) को राष्ट्रीय स्मारक स्वरूप मान्यता दिलाने तथा प्रतिवर्ष वहां स्मृति-आयोजन करने की मांग जनजातीय समुदाय द्वारा निरंतर उठाई जाती रही है — यह इन आंदोलनों की आज भी जीवंत विरासत को दर्शाता है।
"हमने न कभी हथियार उठाया, न कभी झुके — हमारी लड़ाई केवल अपने हक की थी।" — बिजोलिया आंदोलन से जुड़ी परंपरा (44 वर्षों तक पूर्णतः अहिंसक संघर्ष)
18अध्याय सार एवं समय-रेखा
★ अध्याय सार — महत्वपूर्ण तथ्य ★
1. राजस्थान का प्रथम कृषक विरोध — मातृकुंडिया (चित्तौड़गढ़), जून 1880 ई. 2. सबसे दीर्घकालिक व पूर्णतः अहिंसक किसान आंदोलन — बिजोलिया (1897-1941, 44 वर्ष)। 3. बिजोलिया के तीन चरण — साधु सीतारामदास (1897-1916), विजयसिंह पथिक (1916-1923), माणिक्यलाल वर्मा (1927-1941)। 4. बिजोलिया में लगभग 84 प्रकार के लाग-बाग वसूले जाते थे — चंवरी कर, तलवार बंधाई कर, लाटा-कुंता प्रमुख। 5. गोविंदपुरा हत्याकांड (बेंगू) — 13 जुलाई 1923 ई., नानकजी भील शहीद। 6. डाबी हत्याकांड (बूंदी) — 2 अप्रैल 1923 ई., नेतृत्व नयनूराम शर्मा ("बूंदी का गांधी")। 7. कटराथल महिला सम्मेलन (शेखावाटी) — 25 अप्रैल 1934 ई., किसान आंदोलन में महिला-भागीदारी का प्रतीक। 8. नीमूचाणा हत्याकांड (अलवर) — 14 मई 1925 ई., समकालीन प्रेस द्वारा जलियांवाला बाग से तुलना। 9. गोविंद गुरु का जन्म — 1858 ई., बेडसा/बांसिया (डूंगरपुर); संप सभा की स्थापना — 1883 ई., सिरोही। 10. मानगढ़ हत्याकांड — 17 नवंबर 1913 ई., लगभग 1500 भील शहीद — "राजस्थान/वागड़ का जलियांवाला बाग" (जलियांवाला बाग से भी 6 वर्ष पूर्व)। 11. मोतीलाल तेजावत — "आदिवासियों के मसीहा"; नारा — "न हाकिम, न हुकुम"; आंदोलन प्रारंभ 1921 ई., मातृकुंडिया से। 12. नीमड़ा हत्याकांड (एकी आंदोलन) — 6/7 मार्च 1922 ई., लगभग 1200 भील शहीद — "मेवाड़ का द्वितीय जलियांवाला बाग"। 13. सियावा हत्याकांड — 12 अप्रैल 1922 ई.; भूला-बलोलिया हत्याकांड — 5-6 मई 1922 ई.। 14. मीणा आंदोलन — 1924 ई. आपराधिक जनजाति अधिनियम व 1930 ई. जरायमपेशा कानून का विरोध। 15. बगावास सम्मेलन ("मुक्ति दिवस") — 28 अक्टूबर 1946 ई., 26,000 मीणा चौकीदारों का सामूहिक त्याग-पत्र। 16. जरायमपेशा कानून पूर्णतः समाप्त — 1952 ई. (हीरालाल शास्त्री-टीकाराम पालीवाल)। 17. प्रताप (कानपुर, गणेश शंकर विद्यार्थी) ने बिजोलिया आंदोलन को राष्ट्रीय मंच दिया। 18. ये सभी आंदोलन आगे चलकर प्रजामंडल आंदोलन (अध्याय 15) की नींव बने।
नीचे दी समय-रेखा (Timeline) इस अध्याय के संपूर्ण घटनाक्रम को स्पष्ट करती है — रिवीजन के लिए इसे ज़रूर दोहराएं:
| वर्ष/तिथि | घटना/Event | महत्व |
|---|
| 20-22 जून 1880 | मातृकुंडिया (चित्तौड़) जाट आंदोलन | राजस्थान का प्रथम कृषक विरोध |
| 1897 | बिजोलिया आंदोलन प्रारंभ | साधु सीतारामदास का नेतृत्व |
| 1916 | किसान पंच बोर्ड गठन | विजयसिंह पथिक का नेतृत्व प्रारंभ |
| 1917 | उपरमाल पंच बोर्ड गठन | 13-सदस्यीय संगठन, सरपंच मन्ना पटेल |
| 1921 | एकी आंदोलन प्रारंभ (मातृकुंडिया से) | मोतीलाल तेजावत का नेतृत्व |
| 12 अप्रैल 1922 | सियावा हत्याकांड | 3 गरासी शहीद |
| 6/7 मार्च 1922 | नीमड़ा हत्याकांड | लगभग 1200 भील शहीद |
| 5-6 मई 1922 | भूला-बलोलिया हत्याकांड | लगभग 50 मृत, 150 घायल |
| 1922 | बूंदी (बरड़) आंदोलन प्रारंभ | नयनूराम शर्मा का नेतृत्व |
| 2 अप्रैल 1923 | डाबी हत्याकांड (बूंदी) | किसान आंदोलन का दमन |
| 13 जुलाई 1923 | गोविंदपुरा हत्याकांड (बेंगू) | नानकजी भील शहीद |
| 1927 | करौली किसान आंदोलन | कुंवर मदनसिंह का नेतृत्व |
| 25 अप्रैल 1934 | कटराथल महिला सम्मेलन | शेखावाटी आंदोलन में महिला-भागीदारी |
| 21 जून 1934 | जयसिंहपुरा गोलीकांड | शेखावाटी आंदोलन का दमन |
| 25 अप्रैल 1935 | कुदन गांव हत्याकांड | शेखावाटी आंदोलन का सर्वाधिक रक्तरंजित प्रसंग |
| 1941 | बिजोलिया आंदोलन का अंतिम समाधान | महाराणा भूपालसिंह द्वारा मांगें स्वीकार |
| 28 अक्टूबर 1946 | बगावास सम्मेलन ("मुक्ति दिवस") | 26,000 मीणा चौकीदारों का त्याग-पत्र |
| 1952 | जरायमपेशा कानून समाप्त | मीणा आंदोलन की अंतिम सफलता |
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