📋 इस अध्याय में
- परिचय एवं पृष्ठभूमि (1818-1856)
- क्रांति के कारण एवं प्रतीक
- राजपूताना की सैन्य छावनियां
- राजपूताना एजेंसी एवं राजनीतिक अभिकर्ता (Political Agents)
- क्रांति के समय राजस्थान के शासक — रियासतवार तालिका
- नसीराबाद छावनी विद्रोह — क्रांति का प्रारंभ
- नीमच छावनी विद्रोह
- एरिनपुरा विद्रोह एवं बिथौड़ा-चेलावास के युद्ध
- आऊवा का विद्रोह — ठाकुर कुशाल सिंह चंपावत
- कोटा का विद्रोह
- भरतपुर, धौलपुर, टोंक एवं अलवर में विद्रोह
- तांत्या टोपे का राजस्थान आगमन
- प्रमुख क्रांतिकारी एवं वीरांगना सुधा कंवर
- साहित्य एवं संस्मरणों में 1857 की क्रांति
- रियासतों की भूमिका — तुलनात्मक विश्लेषण
- ब्रिटिश अधिकारियों की टिप्पणियां
- विद्रोह की असफलता के कारण एवं परिणाम
कल्पना कीजिए — 28 मई 1857 की एक सुबह, अजमेर के निकट नसीराबाद छावनी में तैनात भारतीय सैनिकों के हाथ में वह बंदूक है जिसके कारतूस को दांतों से काटना पड़ता है, और उनमें गाय व सुअर की चर्बी होने की अफवाह पूरी छावनी में आग की तरह फैल चुकी है। यह सिर्फ एक अफवाह नहीं थी — यह वर्षों से दबे हुए असंतोष, आर्थिक शोषण व सामंतों के अधिकार-हनन का विस्फोट-बिंदु थी। अगले ही कुछ महीनों में नसीराबाद से नीमच, एरिनपुरा से आऊवा और कोटा तक पूरा राजपूताना इस चिंगारी से धधक उठा। यह अध्याय उसी संघर्ष की कहानी है — जहां एक ओर अधिकांश राजपूत शासकों ने अंग्रेजों का साथ दिया, वहीं दूसरी ओर आऊवा के ठाकुर कुशाल सिंह जैसे सामंतों, कोटा के जयदयाल-मेहराबखान जैसे सामान्य नागरिकों तथा सुधा कंवर जैसी वीरांगनाओं ने अपने प्राणों की आहुति देकर यह साबित किया कि स्वतंत्रता की चाहत किसी पद या उपाधि की मोहताज नहीं होती।
1परिचय एवं पृष्ठभूमि (1818-1856)
- 1818 ई. में राजपूताना की रियासतों ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से अधीनस्थ संधियां कीं (विस्तार देखें: अध्याय 12)। इसके बाद अंग्रेजों ने रियासतों के आंतरिक शासन में हस्तक्षेप करना प्रारंभ किया — सामंतों (जागीरदारों) के अधिकार सीमित किए गए, तथा किसानों, व्यापारियों व शिल्पकारों का आर्थिक शोषण बढ़ता गया।
- 1832 ई. में राजपूताना एजेंसी की स्थापना अजमेर में हुई (विस्तार देखें: अध्याय 12), जिसके माध्यम से प्रत्येक रियासत में ब्रिटिश राजनीतिक अभिकर्ता (Political Agent) नियुक्त होने लगे — 1857 ई. में गवर्नर-जनरल का एजेंट (ए.जी.जी.) जॉर्ज पैट्रिक लॉरेंस थे।
2क्रांति के कारण एवं प्रतीक
- तत्कालीन तात्कालिक कारण — पुरानी "ब्राउन बेस राइफल" के स्थान पर नई "एनफील्ड रायफल" शुरू की गई, जिसके कारतूस को सैनिकों को मुंह से खोलना पड़ता था। इसमें चिकनाई हेतु प्रयुक्त चर्बी को लेकर हिंदू व मुस्लिम सैनिकों में भ्रामक धारणाएं फैलीं — हिंदू सैनिक इसे गाय की चर्बी व मुस्लिम सैनिक सुअर की चर्बी मानते थे, जिससे दोनों समुदायों की धार्मिक भावनाएं आहत हुईं।
| तथ्य (Fact) | विवरण (Detail) |
|---|
| क्रांति के प्रतीक | कमल का फूल (सैन्य टुकड़ियों में भेजा गया) एवं रोटी (गांव-गांव चौकीदारों द्वारा पहुंचाई गई) |
| निर्धारित तिथि (Scheduled Date) | 31 मई 1857 |
| वास्तविक प्रारंभ (Actual Start) | 10 मई 1857 (मेरठ से) |
| नेतृत्व | बहादुरशाह जफर (नाममात्र मुगल सम्राट) |
| गवर्नर-जनरल | लॉर्ड कैनिंग |
| राजस्थान में प्रारंभ | 28 मई 1857, नसीराबाद (अजमेर) |
| राजस्थान में अंत | सीकर (तांत्या टोपे की गिरफ्तारी के साथ) |
3राजपूताना की सैन्य छावनियां
- 1857 ई. में राजपूताना में कुल 6 प्रमुख सैन्य छावनियां थीं, जिनमें लगभग 5000 सैनिक तैनात थे — इनमें नसीराबाद सबसे शक्तिशाली छावनी मानी जाती थी।
| छावनी (Cantonment) | स्थान (Location) | तैनात रेजिमेंट (Regiment) | विद्रोह में भागीदारी |
|---|
| नसीराबाद | अजमेर | 15वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री (30वीं का भी साथ) | ✅ प्रत्यक्ष भाग लिया — राजस्थान की प्रथम विद्रोही छावनी |
| नीमच | मध्य प्रदेश (मेवाड़ के निकट) | प्रथम बंगाल कैवेलरी / मालवा-मेवाड़-राजपूताना रेजिमेंट | ✅ प्रत्यक्ष भाग लिया |
| देवली | टोंक | कोटा कंटिनजेंट रेजिमेंट | ✅ प्रत्यक्ष भाग लिया |
| एरिनपुरा | पाली (शिवगंज तहसील, सिरोही) | जोधपुर लीजियन रेजिमेंट (स्थापना 1835) | ✅ प्रत्यक्ष भाग लिया |
| ब्यावर | अजमेर | मेर-मेरवाड़ा बटालियन रेजिमेंट (स्थापना 1822) | ❌ प्रत्यक्ष भाग नहीं लिया |
| खेरवाड़ा | उदयपुर | मेवाड़ भील कोर रेजिमेंट | ❌ प्रत्यक्ष भाग नहीं लिया |
4राजपूताना एजेंसी एवं राजनीतिक अभिकर्ता (Political Agents)
| रियासत (State) | राजनीतिक अभिकर्ता (Political Agent) |
|---|
| जयपुर | कर्नल विलियम ईडन |
| जोधपुर/मारवाड़ | मैक मोसन |
| उदयपुर/मेवाड़ | मेजर शॉवर्स |
| कोटा | मेजर बर्टन |
| भरतपुर | मेजर मॉरिसन (एवं निक्सन) |
| सिरोही | जे.डी. हॉल |
राजपूताना एजेंसी: स्थापना — 1832 ई., अजमेर (विस्तार देखें: अध्याय 12); 1845 ई. में गर्मियों के दौरान मुख्यालय माउंट आबू स्थानांतरित किया गया। राजस्थान के प्रथम ए.जी.जी./रेजिडेंट डेविड ऑक्टरलोनी (कुछ स्रोतों में मिस्टर लॉकेट) थे, जबकि 1857 की क्रांति के समय ए.जी.जी. जॉर्ज पैट्रिक लॉरेंस थे — विद्रोह के दौरान माउंट आबू में मौजूद उनके पुत्र एलेक्जेंडर व कर्नल हॉल घायल हुए थे।
5क्रांति के समय राजस्थान के शासक — रियासतवार तालिका
| रियासत (State) | शासक (Ruler) | भूमिका/विशेष तथ्य |
|---|
| उदयपुर (मेवाड़) | महाराणा स्वरूप सिंह | अंग्रेजों की सहायता की, नीमच से भागे अंग्रेजों को जगमंदिर महल में शरण दी |
| जयपुर | सवाई रामसिंह द्वितीय | तन-मन-धन से अंग्रेजों की सहायता — बदले में "सितार-ए-हिंद" उपाधि व कोटपूतली परगना भेंट में मिला |
| जोधपुर/मारवाड़ | महाराजा तख्तसिंह | अजमेर में अंग्रेजों की सहायता हेतु सेना भेजी |
| कोटा | महाराव रामसिंह द्वितीय | जनविद्रोह के दबाव में रहे, बाद में अंग्रेजों से सहायता मांगी |
| भरतपुर | महाराजा जसवंत सिंह | नाबालिग होने से प्रशासन एजेंट मॉरिसन के हाथ में; जनता विद्रोहियों के साथ, सेना अंग्रेजों के साथ |
| बीकानेर | महाराजा सरदार सिंह | स्वयं सेना लेकर हिसार गए, अंग्रेजों से सहायता की — बदले में 41 परगने/गांव उपहार में मिले |
| सिरोही | महाराजा शिवसिंह | अंग्रेज-समर्थक |
| धौलपुर | महाराजा भगवंत सिंह | अंग्रेज-समर्थक, फिर भी विद्रोहियों ने 2 माह राज्य पर अधिकार रखा |
| करौली | महाराजा मदनपाल | अंग्रेजों की सहायता की |
| टोंक | नवाब वजीरुद्दौला | अंग्रेज-समर्थक, परंतु जनता व सेना विद्रोही रहीं |
| बूंदी | महाराव रामसिंह | अंग्रेज-समर्थक |
| अलवर | महाराजा विनयसिंह/बन्नेसिंह | सेना भेजने का प्रयास किया, परंतु क्रांतिकारियों ने 11 जुलाई 1857 को अछनेरा में दमन किया; दीवान फैजुल्ला खां विद्रोहियों के समर्थक थे |
| जैसलमेर | महारावल रणजीत सिंह | अंग्रेज-समर्थक |
| झालावाड़ | राजराणा पृथ्वी सिंह | अंग्रेज-समर्थक |
| प्रतापगढ़ | महारावल दलपत सिंह | अंग्रेज-समर्थक |
| बांसवाड़ा | महारावल लक्ष्मणसिंह | अंग्रेज-समर्थक |
| डूंगरपुर | महारावल उदयसिंह द्वितीय | अंग्रेज-समर्थक |
अन्य तथ्य: राजपूताना के बिशन सिंह व शिवनाथ सिंह जैसे सामंतों ने भी विद्रोह में भाग लिया। सामोद (जयपुर) के रावल शिवसिंह ने मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर को निष्ठा के प्रतीक स्वरूप नज़र भेंट भेजी थी — यह दर्शाता है कि शीर्ष स्तर पर अंग्रेज-निष्ठा के बावजूद निचले स्तर के कई सामंत व सैनिक विद्रोह के पक्ष में थे।
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6नसीराबाद छावनी विद्रोह — क्रांति का प्रारंभ
- 25 जून 1818 ई. को स्थापित नसीराबाद छावनी राजस्थान में 1857 के विद्रोह का प्रथम केंद्र बनी। 28 मई 1857 ई. को मेरठ से आई 15वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री ने बख्तावर सिंह के नेतृत्व में विद्रोह की घोषणा की, जिसमें 30वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री भी शामिल हो गई। इन सैनिकों ने कर्नल न्यूबरी व मेजर स्पॉटिसवुड को मार डाला तथा छावनी को लूट लिया — छावनी को लूटने वाले राजपूत सरदार का नाम "डूंगरसिंह" था। 18 जून 1857 ई. को ये विद्रोही सैनिक दिल्ली पहुंच गए।
7नीमच छावनी विद्रोह
- 3 जून 1857 ई. को मोहम्मद अली बेग व हीरा सिंह के नेतृत्व में नीमच छावनी के सैनिकों ने अंग्रेजों की अधीनता की शपथ लेने से इनकार कर विद्रोह कर दिया — शस्त्रागार में आग लगा दी गई तथा एक ब्रिटिश अधिकारी की पत्नी व बच्चों की हत्या कर दी गई।
"अंग्रेजों ने अपनी शपथ का उल्लंघन किया है; क्या उन्होंने अवध पर कब्जा नहीं किया? इसलिए भारतीयों से यह उम्मीद नहीं रखनी चाहिए कि वे अपनी शपथ का पालन करेंगे।" — मोहम्मद अली बेग (नीमच विद्रोह के नेता)
- विद्रोही सैनिक नीमच से चित्तौड़गढ़-हमीरगढ़-बनेड़ा-शाहपुरा होते हुए 5 जून को देवली छावनी पर अधिकार कर टोंक-आगरा-दिल्ली की ओर बढ़ गए। भागे हुए अंग्रेज अधिकारी व उनके परिवार मेवाड़ पहुंचे — डूंगला गांव (चित्तौड़गढ़) में रुंघाराम किसान के यहां क्रांतिकारियों ने 40 अंग्रेजों को बंदी बना लिया था। मेवाड़ के महाराणा स्वरूपसिंह ने पॉलिटिकल एजेंट शॉवर्स के अनुरोध पर इन अंग्रेजों को पिछोला झील स्थित जगमंदिर महल में शरण दी, जहां गोकुलचंद मेहता ने उनकी देखभाल की। 6 जून 1857 ई. को शॉवर्स व कोटा के एजेंट बर्टन ने मिलकर नीमच छावनी पर पुनः अधिकार कर लिया।
8एरिनपुरा विद्रोह एवं बिथौड़ा-चेलावास के युद्ध
- 21 अगस्त 1857 ई. को नसीराबाद व नीमच में हुए विद्रोह की सूचना मिलते ही जोधपुर लीजियन के सैनिकों ने एरिनपुरा (वर्तमान पाली जिला, तत्कालीन शिवगंज तहसील, सिरोही) में विद्रोह की तैयारी शुरू कर दी। 23 अगस्त को सूबेदार मोती खां, शीतल प्रसाद व तिलकराम के नेतृत्व में सैनिकों ने विद्रोह का बिगुल बजाया, छावनी को लूटा और "चलो दिल्ली, मारो फिरंगी!" का नारा लगाते हुए दिल्ली की ओर कूच किया। रास्ते में खरवा में इन सैनिकों की भेंट आऊवा के ठाकुर कुशाल सिंह से हुई।
| युद्ध (Battle) | तिथि (Date) | विवरण (Description) |
|---|
| बिथौड़ा का युद्ध | 8 सितंबर 1857 ई. | कुशालसिंह की सेना बनाम अंग्रेज सेना (ओनाड़ सिंह पंवार, फौजदार राजमल लोढ़ा व हीथकोट के नेतृत्व में) — कुशालसिंह की सेना विजयी रही, ओनाड़ सिंह मारा गया व हीथकोट भाग गया |
| चेलावास का युद्ध
("काला-गौरा") | 18 सितंबर 1857 ई. | कुशालसिंह ("काला") बनाम पैट्रिक लॉरेंस व मैक मोसन ("गोरा") — क्रांतिकारियों ने जोधपुर एजेंट मैक मोसन का सिर काटकर किले के द्वार पर टांग दिया; जोधपुर लीजियन आगे दिल्ली की ओर बढ़ी |
- 16 नवंबर 1857 ई. को नारनौल (हरियाणा) में अंग्रेजों ने शेष एरिनपुरा विद्रोही सैनिकों को आत्मसमर्पण हेतु विवश कर दिया।
9आऊवा का विद्रोह — ठाकुर कुशाल सिंह चंपावत
⚔️ ठाकुर कुशाल सिंह चंपावत (1857-1860 ई. (विद्रोह काल)) आऊवा (पाली) के ठिकानेदार — राजस्थान के 1857 विद्रोह के सर्वाधिक प्रतिष्ठित नायक
- एरिनपुरा के विद्रोही सैनिकों को खरवा में शरण व सहायता दी, जिससे मारवाड़ के महाराजा तख्तसिंह व अंग्रेज दोनों उनसे नाराज हो गए।
- बिथौड़ा के युद्ध (8 सितंबर 1857) में अंग्रेज सेना को पराजित किया।
- चेलावास के "काला-गौरा" युद्ध (18 सितंबर 1857) में जोधपुर एजेंट मैक मोसन मारा गया।
- अंग्रेजों ने कर्नल होम्स के नेतृत्व में बॉम्बे लांसर्स व जोधपुर सेना 20 जनवरी 1858 ई. को आऊवा भेजी — 24 जनवरी 1858 ई. को अंग्रेजों ने आऊवा पर अधिकार कर भारी लूटपाट की तथा "सुगाली माता" की मूर्ति अजमेर ले गए, जो वर्तमान में पाली के बागड़ संग्रहालय में सुरक्षित है।
- कुशालसिंह ने सलूंबर के केसरीसिंह व कोठारिया के रावत जोधसिंह के यहां शरण ली।
- 8 अगस्त 1860 ई. को कुशालसिंह ने आत्मसमर्पण किया — "मेजर टेलर आयोग" की जांच में साक्ष्य के अभाव में उन्हें निर्दोष मानकर रिहा कर दिया गया।
- 25 जुलाई 1864 ई. को उदयपुर में कुशालसिंह का निधन हुआ। विशेष तथ्य — पाली में 1857 की क्रांति के दो विजय-स्तंभ स्थित हैं।
💡 आऊवा — जहां एक ठिकानेदार ने पूरी ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी
कल्पना कीजिए — एक छोटे से ठिकाने का सामंत, जिसके पास न तो कोई बड़ी सेना है, न ही कोई शाही समर्थन, फिर भी वह भागते हुए विद्रोही सैनिकों को शरण देने का साहस दिखाता है। यही थे आऊवा के ठाकुर कुशालसिंह चंपावत। उनकी वीरता इतनी प्रभावशाली थी कि अंग्रेजों को उन्हें कुचलने के लिए विशेष सैन्य अभियान भेजना पड़ा। यहां तक कि विजयी अंग्रेज अधिकारी कैप्टन शॉवर्स ने भी बाद में स्वीकार किया कि तांत्या टोपे जैसे क्रांतिकारियों को फांसी देना इतिहास में ब्रिटिश सरकार का अपराध समझा जाएगा — यह कथन दर्शाता है कि विजेता स्वयं भी इन क्रांतिकारियों के साहस से अछूते नहीं रह सके।
10कोटा का विद्रोह
- कोटा में कोई सैनिक छावनी नहीं थी, फिर भी वहां की जनता ने स्वयं विद्रोह किया — यह राजस्थान के 1857 विद्रोह का एक अनूठा उदाहरण है, जहां लगभग छह महीने तक जनशासन स्थापित रहा।
| तिथि (Date) | घटना (Event) |
|---|
| 14 अक्टूबर 1857 ई. | मेजर बर्टन ने महाराव को चेतावनी दी |
| 15 अक्टूबर 1857 ई. | जयदयाल (मथुरा निवासी वकील) व मेहराब खां (रिसालदार, करौली निवासी) के नेतृत्व में विद्रोहियों ने पॉलिटिकल एजेंट मेजर बर्टन, उनके दो पुत्रों व डॉ. सैडलर की हत्या कर शहर पर अधिकार कर लिया |
| 15 अक्टूबर 1857 ई. के बाद | महाराव रामसिंह द्वितीय पर विवश होकर हस्ताक्षरित पत्र में हत्याओं की जिम्मेदारी स्वीकार करने व जयदयाल को मुख्य प्रशासक घोषित करने की बात कही गई |
| — | महाराव रामसिंह द्वितीय ने अंततः अंग्रेजों से सहायता मांगी — रॉबर्ट्स के नेतृत्व में सेना भेजी गई; करौली के राजा मदनपाल ने भी अंग्रेजों की सहायता की — बदले में "ग्रैंड कमांडर ऑफ स्टार ऑफ इंडिया" (G.C.S.I.) की उपाधि व 17 तोपों की सलामी मिली |
| 22 मार्च 1858 ई. | जनरल रॉबर्ट्स के नेतृत्व में अंग्रेजों ने कोटा पर पुनः अधिकार किया — जयदयाल व मेहराब खां को फांसी दी गई; कोटा की तोप-सलामी 17 से घटाकर 13 कर दी गई |
11भरतपुर, धौलपुर, टोंक एवं अलवर में विद्रोह
| रियासत (State) | विद्रोह का विवरण (Description) |
|---|
| भरतपुर | नाबालिग राजा जसवंत सिंह के कारण प्रशासन पॉलिटिकल एजेंट मॉरिसन के हाथ में था; 31 मई 1857 ई. को गुर्जरों व मेवों ने विद्रोह छेड़ा, जिससे मॉरिसन को आगरा भागना पड़ा — जनता विद्रोहियों के साथ थी, जबकि सेना अंग्रेजों के साथ रही |
| धौलपुर | 27 अक्टूबर 1857 ई. को देवा गुर्जर, भवानी शंकर, रामचंद्र व हीरालाल राणा के नेतृत्व में जनता ने विद्रोह कर धौलपुर पर अधिकार कर लिया — ग्वालियर व इंदौर से आए सैनिकों ने भी सहयोग दिया; लगभग 2 माह विद्रोहियों का नियंत्रण रहा; दिसंबर 1857 ई. में दमन हुआ, दो माह बाद पटियाला नरेश के हस्तक्षेप से राजा भगवंत सिंह पुनः स्थापित हुए |
| टोंक | नवाब वजीरुद्दौला स्वयं अंग्रेज-समर्थक थे, परंतु टोंक की जनता व सैनिकों ने मीर आलम खां के नेतृत्व में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया — इस विद्रोह में महिलाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही |
| अलवर | महाराजा विनयसिंह (बन्नेसिंह) अंग्रेज-समर्थक थे व सेना भेजने का प्रयास किया, जबकि दीवान फैजुल्ला खां विद्रोहियों के समर्थक थे — क्रांतिकारियों ने 11 जुलाई 1857 ई. को अछनेरा में दमन का सामना किया |
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12तांत्या टोपे का राजस्थान आगमन
- नानासाहब के स्वामीभक्त सेनापति तांत्या टोपे 1857-59 ई. के दौरान दो बार राजस्थान आए — दोनों ही यात्राओं में उन्होंने राजस्थान के विभिन्न भागों में क्रांति की ज्वाला प्रज्ज्वलित रखने का प्रयास किया।
| यात्रा (Visit) | मार्ग/घटनाक्रम (Route/Events) |
|---|
| प्रथम आगमन | मांडलगढ़ (भीलवाड़ा) से प्रवेश → कुआड़ा का युद्ध (पराजय) → बूंदी की ओर प्रस्थान → नाथद्वारा-चित्तौड़गढ़-सिंगोली-बांसवाड़ा-झालावाड़ होते हुए झालावाड़ पर अधिकार किया; सीकर के रावराजा भैरूसिंह ने उन्हें शेखावाटी में प्रवेश से रोका; झालावाड़ के पृथ्वी सिंह को पराजित किया |
| द्वितीय आगमन
(11 सितंबर) | बांसवाड़ा में लक्ष्मणसिंह को पराजित किया → सलूंबर-भींडर-टोंक होते हुए नासिर मोहम्मद खां का समर्थन प्राप्त किया → 21 जनवरी को सीकर पहुंचे → मानसिंह नरूका (जागीरदार, नरवर) के विश्वासघात से पकड़े गए |
- केसरीसिंह (सलूंबर) व जोधसिंह (कोठारिया) ने तांत्या टोपे की सहायता की थी। पकड़े जाने के बाद 8 अप्रैल को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई तथा 18 अप्रैल 1859 ई. को शिवपुरी में उन्हें फांसी दे दी गई। सीकर में तांत्या टोपे की एक छतरी (स्मारक) आज भी स्थित है।
"इतिहास में तांत्या टोपे को फांसी देना ब्रिटिश सरकार का अपराध समझा जाएगा, और आने वाली पीढ़ियां पूछेंगी कि इस सजा के लिए किसने स्वीकृति दी और किसने पुष्टि की।" — कैप्टन शॉवर्स
13प्रमुख क्रांतिकारी एवं वीरांगना सुधा कंवर
| क्रांतिकारी (Revolutionary) | संबंधित क्षेत्र/केंद्र (Region/Centre) |
|---|
| कुशालसिंह | आऊवा (पाली) |
| पृथ्वीसिंह | आऊवा (पाली) |
| लाला जयदयाल | कोटा |
| मेहराब खां | कोटा |
| हीरा सिंह | नीमच |
| डूंगजी-जवाहरजी | सीकर |
| अमरचंद बांठिया | बीकानेर |
| तांत्या टोपे | संपूर्ण राजस्थान |
💡 सुधा कंवर — राजस्थान की एकमात्र प्रसिद्ध वीरांगना
लाडनूं-डीडवाना-कुचामन क्षेत्र की सुधा कंवर के विषय में उल्लेख मिलता है कि उन्होंने पुरुष वेश धारण कर अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध लड़ा और उन्हें क्षेत्र से खदेड़ने में सफलता पाई। इन्हें प्रायः राजस्थान की 1857 क्रांति की एकमात्र प्रसिद्ध महिला योद्धा के रूप में उल्लेखित किया जाता है — यह घटना दर्शाती है कि 1857 का यह संघर्ष केवल पुरुष-सैनिकों व सामंतों तक सीमित नहीं था, बल्कि सामान्य महिलाएं भी अपने साहस से इस संघर्ष का हिस्सा बनीं।
- डूंगजी व जवाहरजी — सीकर के बठोठ-पाटोदा के कछवाहा राजपूत, आपस में काका-भतीजे के रिश्ते में — इन लोकदेवताओं ने बीकानेर व जोधपुर रियासतों की सेनाओं के विरुद्ध संघर्ष किया। लोटिया/लोठ जाट (जन्म 1804, रींगस गांव, सीकर) ने स्वांग रचकर जासूसी की तथा दिसंबर 1846 ई. में आगरा किले पर हमला कर डूंगरसिंह सहित 300 क्रांतिकारियों को मुक्त कराया था।
14साहित्य एवं संस्मरणों में 1857 की क्रांति
| रचनाकार/रचना (Author/Work) | विवरण (Description) |
|---|
| बांकीदास | "आयो अंग्रेज मुलक रे ऊपर" रचना में 1857 की क्रांति का उल्लेख |
| सूर्यमल्ल मिश्रण | "वीर सतसई" (288 दोहे) — क्रांतिकाल की वीर-भावना को समर्पित रचना |
| विष्णु भट्ट गोडसे | मराठी ग्रंथ "माझा प्रवास" में 1857 की क्रांति का आंखों देखा वृत्तांत |
| सूबेदार सीताराम पांडे | संस्मरण "फ्रॉम सिपाही टू सूबेदार" — अंग्रेजी अनुवाद नॉरगेट द्वारा |
| नाथूराम खड़गावत | "1857 के संघर्ष में राजस्थान की भूमिका" — राजस्थानी ग्रंथागार द्वारा प्रकाशित |
15रियासतों की भूमिका — तुलनात्मक विश्लेषण
अंग्रेज-समर्थक शासक/रियासतें
- उदयपुर (स्वरूप सिंह) — अंग्रेज शरणार्थियों को जगमंदिर महल में शरण
- जयपुर (रामसिंह द्वितीय) — तन-मन-धन से सहायता, "सितार-ए-हिंद" उपाधि प्राप्त
- बीकानेर (सरदार सिंह) — स्वयं सेना लेकर हिसार गए, 41 गांव पुरस्कार में मिले
- जोधपुर, सिरोही, बूंदी, जैसलमेर, झालावाड़, प्रतापगढ़, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, करौली, टोंक (नवाब) — सभी अंग्रेज-समर्थक
जनता/सैनिक/सामंत जिन्होंने विद्रोह किया
- आऊवा — ठाकुर कुशालसिंह चंपावत व पृथ्वीसिंह
- कोटा — जयदयाल व मेहराब खां (जनता ने 6 माह जनशासन चलाया)
- भरतपुर, टोंक, धौलपुर — शासक अंग्रेज-समर्थक होते हुए भी जनता व सैनिक विद्रोही रहे
- अलवर — दीवान फैजुल्ला खां विद्रोहियों के समर्थक (महाराजा के विपरीत)
- सीकर — डूंगजी-जवाहरजी, तांत्या टोपे का अंतिम केंद्र
16ब्रिटिश अधिकारियों की टिप्पणियां
| अधिकारी (Officer) | टिप्पणी (Comment) |
|---|
| लॉर्ड कैनिंग | राजा-महाराजा इस तूफान के लिए "ब्रेकवाटर" (लहर-अवरोधक) का कार्य कर रहे थे |
| जॉन लॉरेंस | यदि क्रांतिकारियों में नेतृत्व होता, तो हम (अंग्रेज) निश्चित रूप से हार जाते |
| कैप्टन प्रिचर्ड | इसे मात्र एक सैनिक-विद्रोह (Military Mutiny) बताया, जनांदोलन नहीं |
17विद्रोह की असफलता के कारण एवं परिणाम
असफलता के मुख्य कारण
- ब्रिटिश निष्ठा — राजपूताना के अधिकांश शासकों ने ब्रिटिश सत्ता के प्रति स्वामीभक्ति प्रदर्शित की।
- सहयोग की कमी — स्थानीय शासकों ने क्रांतिकारियों का साथ नहीं दिया।
- नेतृत्व की कमी — क्रांतिकारियों में रणनीति व कूटनीति में दक्ष नेतृत्व का अभाव था।
- भावना पर आधारित क्रांति — यह विद्रोह सुनियोजित रणनीति के बजाय भावना पर आधारित था।
- संसाधनों की कमी — क्रांतिकारियों के पास समन्वय, अखिल भारतीय दृष्टिकोण, धन, रसद व हथियारों का अभाव था।
परिणाम एवं महत्व
- यद्यपि यह विद्रोह सैन्य दृष्टि से असफल रहा, परंतु यह एक सैन्य-विद्रोह से आगे बढ़कर एक जनांदोलन में परिवर्तित हो गया — जनता, किसान, गुर्जर, भील व मेव — सभी ने किसी न किसी रूप में इसमें भाग लिया। यह संघर्ष आगे चलकर राष्ट्रीय आंदोलन की नींव बना।
बाद के घटनाक्रम — अजमेर दरबार (1870) एवं मेयो कॉलेज: 22 अक्टूबर 1870 ई. को वायसराय लॉर्ड मेयो ने अजमेर में राजाओं हेतु एक दरबार आयोजित किया, जिसमें 1857 में संदिग्ध भूमिका के कारण कोटा महाराव को आमंत्रित नहीं किया गया, तथा जोधपुर नरेश तख्तसिंह जयपुर-उदयपुर शासकों की कुर्सियां आगे लगी होने से नाराज होकर बिना शामिल हुए लौट गए — यह घटना दर्शाती है कि 1857 के बाद भी रियासतों के आपसी संबंध कितने संवेदनशील बने रहे। इसी कालखंड में राजाओं व सामंतों की शिक्षा हेतु रिचर्ड बर्क ने 1875 ई. में अजमेर में मेयो कॉलेज की स्थापना की, जिसके प्रथम विद्यार्थी अलवर के महाराजा मंगल सिंह थे।
★ अध्याय सार — महत्वपूर्ण तथ्य ★
1. राजस्थान में 1857 की क्रांति का प्रारंभ 28 मई 1857 को नसीराबाद छावनी (अजमेर) से हुआ तथा अंत सीकर में तांत्या टोपे की गिरफ्तारी के साथ हुआ। 2. क्रांति के प्रतीक कमल का फूल व रोटी थे; निर्धारित तिथि 31 मई 1857 थी परंतु वास्तविक प्रारंभ 10 मई 1857 को मेरठ से हुआ। 3. राजपूताना में कुल 6 सैन्य छावनियां थीं — नसीराबाद, नीमच, देवली, एरिनपुरा, ब्यावर व खेरवाड़ा — जिनमें से ब्यावर व खेरवाड़ा ने प्रत्यक्ष भाग नहीं लिया। 4. राजपूताना एजेंसी की स्थापना 1832 ई. में अजमेर में हुई; 1857 में ए.जी.जी. जॉर्ज पैट्रिक लॉरेंस थे। 5. नीमच विद्रोह (3 जून 1857) का नेतृत्व मोहम्मद अली बेग व हीरा सिंह ने किया; महाराणा स्वरूपसिंह ने भागे अंग्रेजों को जगमंदिर महल में शरण दी। 6. एरिनपुरा विद्रोह (21 अगस्त 1857) में जोधपुर लीजियन ने विद्रोह किया — बिथौड़ा (8 सितंबर) व चेलावास (18 सितंबर, "काला-गौरा") के युद्ध हुए, जिसमें जोधपुर एजेंट मैक मोसन मारा गया। 7. आऊवा (पाली) के ठाकुर कुशालसिंह चंपावत राजस्थान के 1857 विद्रोह के सबसे प्रतिष्ठित नायक माने जाते हैं — 24 जनवरी 1858 को अंग्रेजों ने आऊवा पर अधिकार किया, कुशालसिंह ने 1860 में आत्मसमर्पण किया। 8. कोटा में कोई सैन्य छावनी न होते हुए भी जयदयाल व मेहराब खां के नेतृत्व में जनविद्रोह हुआ — 15 अक्टूबर 1857 को मेजर बर्टन की हत्या, 22 मार्च 1858 को कोटा पर अंग्रेजों का पुनः अधिकार व दोनों नेताओं को फांसी। 9. धौलपुर (27 अक्टूबर 1857), टोंक व अलवर (11 जुलाई 1857, अछनेरा) में भी विद्रोह की घटनाएं हुईं। 10. तांत्या टोपे दो बार राजस्थान आए — मानसिंह नरूका के विश्वासघात से पकड़े गए, 18 अप्रैल 1859 को शिवपुरी में फांसी दी गई; सीकर में उनकी छतरी स्थित है। 11. सुधा कंवर (लाडनूं-डीडवाना-कुचामन) को राजस्थान की एकमात्र प्रसिद्ध महिला क्रांतिकारी माना जाता है, जिन्होंने पुरुष वेश में युद्ध लड़ा। 12. सूर्यमल्ल मिश्रण की "वीर सतसई" (288 दोहे) व बांकीदास की "आयो अंग्रेज मुलक रे ऊपर" 1857 पर आधारित प्रमुख राजस्थानी साहित्यिक रचनाएं हैं। 13. लॉर्ड कैनिंग ने राजपूत राजाओं को क्रांति के तूफान के लिए "ब्रेकवाटर" (लहर-अवरोधक) कहा था। 14. विद्रोह की असफलता के मुख्य कारण — शासकों की ब्रिटिश-निष्ठा, नेतृत्व व संसाधनों का अभाव तथा सुनियोजित रणनीति का न होना था। 15. यह विद्रोह सैन्य-विद्रोह से आगे बढ़कर जनांदोलन में परिवर्तित हुआ और आगे राष्ट्रीय आंदोलन की नींव बना।
नीचे दी समय-रेखा (Timeline) इस अध्याय के संपूर्ण घटनाक्रम को स्पष्ट करती है — रिवीजन के लिए इसे ज़रूर दोहराएं:
| तिथि (Date) | घटना/Event | महत्व |
|---|
| 10 मई 1857 | मेरठ से क्रांति का वास्तविक प्रारंभ | अखिल भारतीय विद्रोह की शुरुआत |
| 28 मई 1857 | नसीराबाद छावनी विद्रोह | राजस्थान में क्रांति का प्रारंभ |
| 31 मई 1857 | भरतपुर में गुर्जर-मेव विद्रोह | मॉरिसन आगरा भागे |
| 3 जून 1857 | नीमच छावनी विद्रोह | मोहम्मद अली बेग-हीरा सिंह नेतृत्व |
| 5 जून 1857 | देवली छावनी पर विद्रोहियों का अधिकार | मालवा-मेवाड़ मार्ग पर नियंत्रण |
| 21 अगस्त 1857 | एरिनपुरा विद्रोह | जोधपुर लीजियन का विद्रोह |
| 8 सितंबर 1857 | बिथौड़ा का युद्ध | कुशालसिंह की प्रथम विजय |
| 18 सितंबर 1857 | चेलावास का युद्ध ("काला-गौरा") | मैक मोसन की हत्या |
| 14-15 अक्टूबर 1857 | कोटा विद्रोह, मेजर बर्टन की हत्या | राजस्थान का एकमात्र जन-नेतृत्व विद्रोह |
| 27 अक्टूबर 1857 | धौलपुर विद्रोह | जनता का 2 माह नियंत्रण |
| 16 नवंबर 1857 | नारनौल में एरिनपुरा सैनिकों का आत्मसमर्पण | एरिनपुरा विद्रोह का अंत |
| 20-24 जनवरी 1858 | आऊवा पर अंग्रेजों का आक्रमण व अधिकार | आऊवा विद्रोह का दमन |
| 22 मार्च 1858 | कोटा पर अंग्रेजों का पुनः अधिकार | जयदयाल-मेहराब खां को फांसी |
| 18 अप्रैल 1859 | तांत्या टोपे को शिवपुरी में फांसी | राजस्थान से जुड़े क्रांतिकारी का बलिदान |
| 8 अगस्त 1860 | कुशालसिंह का आत्मसमर्पण | आऊवा विद्रोह की अंतिम कड़ी |
| 22 अक्टूबर 1870 | अजमेर दरबार (लॉर्ड मेयो) | 1857 की स्मृतियों का रियासती राजनीति पर प्रभाव |
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