Revolution of 1857 in Rajasthan — कारण, छावनी-विद्रोह, आऊवा-कोटा-नीमच, तांत्या टोपे एवं परिणाम
कल्पना कीजिए — 28 मई 1857 की एक सुबह, अजमेर के निकट नसीराबाद छावनी में तैनात भारतीय सैनिकों के हाथ में वह बंदूक है जिसके कारतूस को दांतों से काटना पड़ता है, और उनमें गाय व सुअर की चर्बी होने की अफवाह पूरी छावनी में आग की तरह फै ल चुकी है। यह सिर्फ एक अफवाह नहीं थी — यह वर्षों से दबे हुए असंतोष, आर्थिक शोषण व सामंतों के अधिकार-हनन का विस्फोट- बिंदु थी। अगले ही कुछ महीनों में नसीराबाद से नीमच, एरिनपुरा से आऊवा और कोटा तक पूरा राजपूताना इस चिंगारी से धधक उठा। यह अध्याय उसी संघर्ष की कहानी है — जहां एक ओर अधिकांश राजपूत शासकों ने अंग्रेजों का साथ दिया, वहीं दूसरी ओर आऊवा के ठाकु र कु शाल सिंह जैसे सामंतों, कोटा के जयदयाल-मेहराबखान जैसे सामान्य नागरिकों तथा सुधा कं वर जैसी वीरांगनाओं ने अपने प्राणों की आहुति देकर यह साबित किया कि स्वतंत्रता की चाहत किसी पद या उपाधि की मोहताज नहीं होती।
2. परिचय एवं पृष्ठभूमि (1818-1856) ◆ 1818 ई. में राजपूताना की रियासतों ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कं पनी से अधीनस्थ संधियां कीं (विस्तार देखें: अध्याय 12)। इसके बाद अंग्रेजों ने रियासतों के आंतरिक शासन में हस्तक्षेप करना प्रारंभ किया — सामंतों (जागीरदारों) के अधिकार सीमित किए गए, तथा किसानों, व्यापारियों व शिल्पकारों का आर्थिक शोषण बढ़ता गया।
◆ 1832 ई. में राजपूताना एजेंसी की स्थापना अजमेर में हुई (विस्तार देखें: अध्याय 12), जिसके माध्यम से प्रत्येक रियासत में ब्रिटिश राजनीतिक अभिकर्ता (Political Agent) नियुक्त होने लगे — 1857 ई. में गवर्नर-जनरल का एजेंट (ए.जी.जी.) जॉर्ज पैट्रिक लॉरेंस थे।
A. 1818 की संधियों के दुष्परिणाम — क्रांति की पृष्ठभूमि ◆ 1818 ई. की संधियों से रियासतों को मराठों की लूटमार से छु टकारा मिला और बाहरी सुरक्षा की जिम्मेदारी कं पनी ने ले ली। जो खिराज (Tribute) पहले मराठों को दिया जाता था, वही अब अंग्रेजों को देना था — इसलिए शुरू में राजाओं को ये संधियां आकर्षक लगीं और उन्होंने बिना शंका किए हस्ताक्षर कर दिए। ◆ परंतु जैसे ही कं पनी ने संधि की शर्तें लागू करनी शुरू कीं, राजाओं के वंश-परंपरागत अधिकारों पर चोट होने लगी — उनकी स्थिति कं पनी के सामंत (जागीरदार) जैसी हो गई। राजा, सामंत, किसान, व्यापारी, शिल्पी व मजदूर — सभी वर्ग पीड़ित हुए। यही असंतोष 1857 की पृष्ठभूमि बना।
B. रियासतों के आंतरिक शासन में हस्तक्षेप ◆ संधि के समय अंग्रेजों ने आंतरिक प्रशासन में हस्तक्षेप न करने का आश्वासन दिया था, फिर भी — 1819 ई. में जयपुर के मामलों में हस्तक्षेप किया; 1821 ई. के मांगरोल युद्ध में कोटा महाराव के विरुद्ध अंग्रेज-समर्थक दीवान झाला जालिम सिंह की सहायता की; 1839 ई. में जोधपुर के शासक पर दबाव डालकर जोधपुर किले पर अधिकार कर लिया; 1842-43 ई. में जोधपुर के नाथों की जागीरें जब्त कर उन्हें कै द कर लिया। ◆ मेवाड़ में पॉलिटिकल एजेंट के बार-बार हस्तक्षेप से आर्थिक स्थिति दयनीय हो गई — 1823 ई. में कै प्टन कॉब (Captain Cobb) ने समस्त शासन-प्रबंध अपने हाथ में ले लिया और महाराणा के खर्च के लिए केवल एक हजार रुपये प्रतिदिन तय कर दिए। अब राजा अपने राज्य के संप्रभु स्वामी न रहकर अंग्रेजों की कृ पा पर निर्भर हो गए।
C. उत्तराधिकार के मामलों में हस्तक्षेप ◆ 1826 ई. में अलवर राज्य के दो हिस्से करवाकर बलवंत सिंह व बन्नेसिंह में बांट दिए। इसी वर्ष (1826) भरतपुर के उत्तराधिकार प्रश्न पर लोहागढ़ दुर्ग को घेरकर नष्ट कर दिया तथा बालक राजा बलवंत सिंह को गद्दी पर बिठाकर पॉलिटिकल एजेंट के अधीन एक काउंसिल (Council) बना दी। ◆ जिस रियासत का उत्तराधिकारी नाबालिग (अल्पवयस्क) होता, वहां ए.जी.जी./रेजिडेंट अपने समर्थकों की कौंसिल बनाकर शासन चलाते — 1835 ई. में जयपुर में पॉलिटिकल एजेंट के निर्देशन में सरदारों की समिति बनी; 1844 ई. में बांसवाड़ा में महारावल लक्ष्मणसिंह की नाबालिगी में प्रशासन अंग्रेजी नियंत्रण में रहा। गोद लेने (Adoption) के प्रश्न पर भी अंग्रेज अपना निर्णय थोपते थे।
D. रियासतों की कमजोर आर्थिक स्थिति ◆ खिराज समय पर न चुकाने पर कं पनी चक्रवृद्धि ब्याज (Compound Interest) लगाकर वसूली करती थी; शांति-व्यवस्था और युद्ध के नाम पर भी धन वसूला जाता था। राजाओं को अपने खर्च पर कं पनी के लिए सेना रखनी पड़ती थी — खर्च न दे पाने पर राज्य का कुछ भाग कं पनी ले लेती थी।
वर्ष (Year) अंग्रेजी सैन्य टुकड़ी / आर्थिक बोझ
1822 ई. मेरवाड़ा बटालियन (Merwara Battalion) — खर्च संबंधित राज्यों से वसूला गया
1834 ई. शेखावाटी ब्रिगेड (Shekhawati Brigade) — खर्च संबंधित राज्यों से
1835 ई. जोधपुर लीजियन (Jodhpur Legion) — खर्च हेतु जोधपुर राज्य से 1,15,000 रुपये वार्षिक
1835 ई. शेखावाटी में राजमाता-समर्थक सामंतों को दबाने हेतु जयपुर को सैनिक सहायता — बदले में सांभर झील अंग्रेजों के अधीन
1825-30 ई. मेवाड़ में भील विद्रोह दबाने का सैनिक खर्च महाराणा के नाम ऋण लिखकर 6% ब्याज सहित वसूला
1841 ई. मेवाड़ भील कोर (Mewar Bhil Corps) — मेवाड़ राज्य के खर्च पर; नियंत्रण अंग्रेजों का
E. शिथिल प्रशासन एवं जनसाधारण की दुर्दशा ◆ बाहरी आक्रमण का भय न रहने से राजा रेजिडेंट की इच्छा पर चलने वाले "रबर की मोहर" मात्र रह गए। रेजिडेंटों ने अपने समर्थक नियुक्त किए — बांसवाड़ा का शासन मुंशी शहामत अली खां (1844-56 ई.) के हाथ में, अलवर का अहमदबख्श खां (1815-26 ई.) के नियंत्रण में, तथा जयपुर में 1835 ई. में अंग्रेज-समर्थक जेठाराम सर्वेसर्वा बन गया। शासक भोग-विलास व विदेश-यात्राओं में डूब गए। ◆ राज्यों का सारा खर्च भूमि-कर (Land Revenue) पर आ पड़ा — अकाल में भी किसान को नकद लगान देना पड़ता, जिससे वह साहूकार के शिकं जे में फं सता गया; पहली बार किसानों को भूमि से बेदखल भी किया जाने लगा; चराई-कर, सिंचाई- कर जैसे नए कर लगे। ◆ रेलों से कच्चा माल बाहर जाने लगा, अकाल में भी अनाज का निर्यात हुआ, बाजार ब्रिटिश माल से भर गए — व्यापारी पलायन कर गए और संरक्षण खो चुके दस्तकार अपना पुश्तैनी काम छोड़कर मजदूर बन गए। राजा-प्रजा के सम्मानजनक संबंध अब "शोषक और शोषित" में बदल गए।
3. क्रांति के कारण एवं प्रतीक ◆ तत्कालीन तात्कालिक कारण — पुरानी "ब्राउन बेस राइफल" के स्थान पर नई "एनफील्ड रायफल" शुरू की गई, जिसके कारतूस को सैनिकों को मुंह से खोलना पड़ता था। इसमें चिकनाई हेतु प्रयुक्त चर्बी को लेकर हिंदू व मुस्लिम सैनिकों में भ्रामक धारणाएं फै लीं — हिंदू सैनिक इसे गाय की चर्बी व मुस्लिम सैनिक सुअर की चर्बी मानते थे, जिससे दोनों समुदायों की धार्मिक भावनाएं आहत हुईं।
तथ्य (Fact) विवरण (Detail)
क्रांति के प्रतीक कमल का फू ल (सैन्य टुकड़ियों में भेजा गया) एवं रोटी (गांव-गांव चौकीदारों द्वारा पहुंचाई गई)
निर्धारित तिथि (Scheduled Date) 31 मई 1857
वास्तविक प्रारंभ (Actual Start) 10 मई 1857 (मेरठ से)
नेतृत्व बहादुरशाह जफर (नाममात्र मुगल सम्राट)
गवर्नर-जनरल लॉर्ड कै निंग
राजस्थान में प्रारंभ 28 मई 1857, नसीराबाद (अजमेर)
राजस्थान में अंत सीकर (तांत्या टोपे की गिरफ्तारी के साथ)
4. राजपूताना की सैन्य छावनियां ◆ 1857 ई. में राजपूताना में कु ल 6 प्रमुख सैन्य छावनियां थीं, जिनमें लगभग 5000 सैनिक तैनात थे — इनमें नसीराबाद सबसे शक्तिशाली छावनी मानी जाती थी।
छावनी स्थान तैनात रेजिमेंट (Regiment) विद्रोह में भागीदारी (Cantonment) (Location)
नसीराबाद अजमेर 15वीं बंगाल नेटिव इन्फैं ट्री (30वीं का भी साथ) ✅ प्रत्यक्ष भाग लिया — राजस्थान की प्रथम विद्रोही छावनी
नीमच मध्य प्रदेश (मेवाड़ के प्रथम बंगाल कै वेलरी / मालवा-मेवाड़- ✅ प्रत्यक्ष भाग लिया निकट) राजपूताना रेजिमेंट
देवली टोंक कोटा कं टिनजेंट रेजिमेंट ✅ प्रत्यक्ष भाग लिया
एरिनपुरा पाली (शिवगंज जोधपुर लीजियन रेजिमेंट (स्थापना 1835) ✅ प्रत्यक्ष भाग लिया
तहसील, सिरोही)ब्यावर अजमेर मेर-मेरवाड़ा बटालियन रेजिमेंट (स्थापना ❌ प्रत्यक्ष भाग नहीं लिया 1822)
खेरवाड़ा उदयपुर मेवाड़ भील कोर रेजिमेंट ❌ प्रत्यक्ष भाग नहीं लिया
5. राजपूताना एजेंसी एवं राजनीतिक अभिकर्ता (Political Agents)
रियासत (State) राजनीतिक अभिकर्ता (Political Agent)
जयपुर कर्नल विलियम ईडन
जोधपुर/मारवाड़ मैक मोसन
उदयपुर/मेवाड़ मेजर शॉवर्स
कोटा मेजर बर्टन
भरतपुर मेजर मॉरिसन (एवं निक्सन)
सिरोही जे.डी. हॉल
राजपूताना एजेंसी: स्थापना — 1832 ई., अजमेर (विस्तार देखें: अध्याय 12); 1845 ई. में गर्मियों के दौरान मुख्यालय माउंट आबू स्थानांतरित किया गया। राजस्थान के प्रथम ए.जी.जी./रेजिडेंट डेविड ऑक्टरलोनी (कुछ स्रोतों में मिस्टर लॉके ट) थे, जबकि 1857 की क्रांति के समय ए.जी.जी. जॉर्ज पैट्रिक लॉरेंस थे — विद्रोह के दौरान माउंट आबू में मौजूद उनके पुत्र एलेक्जेंडर व कर्नल हॉल घायल हुए थे।
6. क्रांति के समय राजस्थान के शासक — रियासतवार तालिका
रियासत (State) शासक (Ruler) भूमिका/विशेष तथ्य
उदयपुर (मेवाड़) महाराणा स्वरूप सिंह अंग्रेजों की सहायता की, नीमच से भागे अंग्रेजों को जगमंदिर महल में शरण दी
जयपुर सवाई रामसिंह द्वितीय तन-मन-धन से अंग्रेजों की सहायता — बदले में "सितार-ए-हिंद" उपाधि व कोटपूतली परगना भेंट में मिला
जोधपुर/मारवाड़ महाराजा तख्तसिंह अजमेर में अंग्रेजों की सहायता हेतु सेना भेजी
कोटा महाराव रामसिंह द्वितीय जनविद्रोह के दबाव में रहे, बाद में अंग्रेजों से सहायता मांगी
भरतपुर महाराजा जसवंत सिंह नाबालिग होने से प्रशासन एजेंट मॉरिसन के हाथ में; जनता विद्रोहियों के साथ, सेना अंग्रेजों के साथ
बीकानेर महाराजा सरदार सिंह स्वयं सेना लेकर हिसार गए, अंग्रेजों से सहायता की — बदले में 41 परगने/गांव उपहार में मिले; राजस्थान का अके ला शासक जो सेना लेकर राज्य से बाहर (पंजाब) विद्रोह दबाने गया, अंग्रेजों को शरण भी दी
सिरोही महाराजा शिवसिंह अंग्रेज-समर्थक
धौलपुर महाराजा भगवंत सिंह अंग्रेज-समर्थक, फिर भी विद्रोहियों ने 2 माह राज्य पर अधिकार रखा
करौली महाराजा मदनपाल अंग्रेजों की सहायता की; अपनी सेना अंग्रेजों को सौंपी, कोटा महाराव की मदद को सेना भेजी और जनता से विद्रोह में भाग न लेने की अपील की
टोंक नवाब वजीरुद्दौला अंग्रेज-समर्थक, परंतु जनता व सेना विद्रोही रहीं
बूंदी महाराव रामसिंह अंग्रेज-समर्थक
अलवर महाराजा सेना भेजने का प्रयास किया, परंतु क्रांतिकारियों ने 11 जुलाई 1857 को अछनेरा में दमन विनयसिंह/बन्नेसिंह किया; दीवान फै जुल्ला खां विद्रोहियों के समर्थक थे
जैसलमेर महारावल रणजीत सिंह अंग्रेज-समर्थक
झालावाड़ राजराणा पृथ्वी सिंह अंग्रेज-समर्थक
प्रतापगढ़ महारावल दलपत सिंह अंग्रेज-समर्थक
बांसवाड़ा महारावल लक्ष्मणसिंह अंग्रेज-समर्थक; तांत्या टोपे के बांसवाड़ा पर अधिकार करने पर राजधानी छोड़कर भागे
डूंगरपुर महारावल उदयसिंह द्वितीय अंग्रेज-समर्थक
अन्य तथ्य: राजपूताना के बिशन सिंह व शिवनाथ सिंह जैसे सामंतों ने भी विद्रोह में भाग लिया। सामोद (जयपुर) के रावल शिवसिंह ने मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर को निष्ठा के प्रतीक स्वरूप नज़र भेंट भेजी थी — यह दर्शाता है कि शीर्ष स्तर पर अंग्रेज-निष्ठा के बावजूद निचले स्तर के कई सामंत व सैनिक विद्रोह के पक्ष में थे।
7. नसीराबाद छावनी विद्रोह — क्रांति का प्रारंभ ◆ 25 जून 1818 ई. को स्थापित नसीराबाद छावनी राजस्थान में 1857 के विद्रोह का प्रथम केंद्र बनी। 28 मई 1857 ई. को मेरठ से आई 15वीं बंगाल नेटिव इन्फैं ट्री ने बख्तावर सिंह के नेतृत्व में विद्रोह की घोषणा की, जिसमें 30वीं बंगाल नेटिव इन्फैं ट्री भी शामिल हो गई। इन सैनिकों ने कर्नल न्यूबरी व मेजर स्पॉटिसवुड को मार डाला तथा छावनी को लूट लिया — छावनी को लूटने वाले राजपूत सरदार का नाम "डूंगरसिंह" था। 18 जून 1857 ई. को ये विद्रोही सैनिक दिल्ली पहुंच गए। ◆ मेरठ विद्रोह (10 मई 1857) की सूचना ए.जी.जी. जॉर्ज पैट्रिक लॉरेंस को 19 मई 1857 को मिली। उन्होंने सभी शासकों को अपने राज्य में शांति बनाए रखने, विद्रोहियों को प्रवेश न देने और घुस आने पर तुरंत बंदी बनाने के निर्देश दिए। उनकी सबसे बड़ी चिंता अजमेर थी, जहां भारी गोला-बारूद और सरकारी खजाना रखा था।
◆ अजमेर में हाल ही में मेरठ से आई 15वीं बंगाल नेटिव इन्फैं ट्री की दो कं पनियों पर संदेह होने से ए.जी.जी. ने उन्हें नसीराबाद भेज दिया, ब्यावर से दो मेर रेजिमेंट अजमेर बुला लीं और डीसा (गुजरात) से यूरोपीय सेना भेजने को लिखा।
राजस्थान में क्रांति नसीराबाद से ही क्यों शुरू हुई? ◆ (1) अविश्वास के कारण 15वीं बंगाल इन्फैं ट्री को अजमेर से नसीराबाद भेजा गया — इस अपमान से सैनिकों में असंतोष पनपा। (2) अंग्रेज अधिकारियों ने वफादार समझी जाने वाली फर्स्ट बॉम्बे लांसर्स (First Bombay Lancers) से छावनी में गश्त शुरू कराई और तोपें तैयार रखीं — भारतीय सैनिकों ने समझा कि यह सब उन्हें कु चलने के लिए है। (3) बंगाल व दिल्ली से आए साधु-वेशधारी (छद्मवेशी) प्रचारकों ने चर्बी वाले कारतूसों के विरुद्ध प्रचार किया, जिससे अफवाहें फै लीं और क्रांति निर्धारित तिथि से पहले शुरू हो गई। ◆ नसीराबाद से भागकर ब्यावर जा रहे अंग्रेजों पर रास्ते में ग्रामीण हमले के लिए खड़े थे — कै प्टन प्रिचर्ड ने स्वीकार किया कि बॉम्बे लांसर्स साथ न होते तो उनका बचना कठिन था, मार्ग में किसी भारतीय ने सहानुभूति नहीं दिखाई और घरेलू नौकरों तक में उपेक्षा का भाव था।
8. नीमच छावनी विद्रोह ◆ 3 जून 1857 ई. को मोहम्मद अली बेग व हीरा सिंह के नेतृत्व में नीमच छावनी के सैनिकों ने अंग्रेजों की अधीनता की शपथ लेने से इनकार कर विद्रोह कर दिया — शस्त्रागार में आग लगा दी गई तथा एक ब्रिटिश अधिकारी की पत्नी व बच्चों की हत्या कर दी गई।
"अंग्रेजों ने अपनी शपथ का उल्लंघन किया है; क्या उन्होंने अवध पर कब्जा नहीं किया? इसलिए भारतीयों से यह उम्मीद नहीं रखनी चाहिए कि वे अपनी शपथ का पालन करेंगे।" — मोहम्मद अली बेग (नीमच विद्रोह के नेता)
◆ विद्रोही सैनिक नीमच से चित्तौड़गढ़-हमीरगढ़-बनेड़ा-शाहपुरा होते हुए 5 जून को देवली छावनी पर अधिकार कर टोंक- आगरा-दिल्ली की ओर बढ़ गए। भागे हुए अंग्रेज अधिकारी व उनके परिवार मेवाड़ पहुंचे — डूंगला गांव (चित्तौड़गढ़) में रुं घाराम किसान के यहां क्रांतिकारियों ने 40 अंग्रेजों को बंदी बना लिया था। मेवाड़ के महाराणा स्वरूपसिंह ने पॉलिटिकल एजेंट शॉवर्स के अनुरोध पर इन अंग्रेजों को पिछोला झील स्थित जगमंदिर महल में शरण दी, जहां गोकु लचंद मेहता ने उनकी देखभाल की। 6 जून 1857 ई. को शॉवर्स व कोटा के एजेंट बर्टन ने मिलकर नीमच छावनी पर पुनः अधिकार कर लिया। ◆ नीमच के विद्रोहियों को रास्ते में भारी जन-समर्थन मिला — शाहपुरा के सामंत ने रसद दी, निम्बाहेड़ा की जनता ने स्वागत किया, देवली छावनी के सैनिक भी साथ हो गए, और टोंक की जनता ने नवाब के आदेशों की परवाह न करते हुए उनका स्वागत किया। पीछा करती मेवाड़ की सेना और कप्तान शॉवर्स जब शाहपुरा पहुंचे, तो शाहपुरा के शासक ने किले के दरवाजे नहीं खोले। ◆ कै प्टन शॉवर्स ने कोटा, बूंदी और मेवाड़ की सेनाओं की सहायता से नीमच पर पुनः अधिकार किया। नसीराबाद के विद्रोही सैनिकों ने 18 जून 1857 को दिल्ली पहुंचकर दिल्ली का घेरा डाले अंग्रेज पलटन को पराजित किया।
9. एरिनपुरा विद्रोह एवं बिथौड़ा-चेलावास के युद्ध ◆ 21 अगस्त 1857 ई. को नसीराबाद व नीमच में हुए विद्रोह की सूचना मिलते ही जोधपुर लीजियन के सैनिकों ने एरिनपुरा (वर्तमान पाली जिला, तत्कालीन शिवगंज तहसील, सिरोही) में विद्रोह की तैयारी शुरू कर दी। 23 अगस्त को सूबेदार मोती खां,
शीतल प्रसाद व तिलकराम के नेतृत्व में सैनिकों ने विद्रोह का बिगुल बजाया, छावनी को लूटा और "चलो दिल्ली, मारो फिरंगी!" का नारा लगाते हुए दिल्ली की ओर कू च किया। रास्ते में खरवा में इन सैनिकों की भेंट आऊवा के ठाकु र कु शाल सिंह से हुई। ◆ जोधपुर लीजियन की पृष्ठभूमि — 1835 ई. में अंग्रेजों ने जोधपुर सेना के सवारों पर अकु शल होने का आरोप लगाकर जोधपुर लीजियन बनाई, जिसका केंद्र एरिनपुरा रखा गया। विद्रोह के समय लीजियन के सैनिकों ने पहले आबू में अंग्रेज सैनिकों पर हमला किया, फिर एरिनपुरा आकर छावनी लूटी और शेष सैनिकों को साथ मिलाकर दिल्ली की ओर चले।
युद्ध (Battle) तिथि (Date) विवरण (Description)
बिथौड़ा का युद्ध 8 सितंबर 1857 ई. कु शालसिंह की सेना बनाम अंग्रेज सेना (ओनाड़ सिंह पंवार, फौजदार राजमल लोढ़ा व हीथकोट के नेतृत्व में) — कु शालसिंह की सेना विजयी रही, ओनाड़ सिंह मारा गया व हीथकोट भाग गया
चेलावास का युद्ध 18 सितंबर 1857 ई. कु शालसिंह ("काला") बनाम पैट्रिक लॉरेंस व मैक मोसन ("गोरा") — क्रांतिकारियों ने
("काला-गौरा") जोधपुर एजेंट मैक मोसन का सिर काटकर किले के द्वार पर टांग दिया; जोधपुर लीजियन
आगे दिल्ली की ओर बढ़ी◆ 16 नवंबर 1857 ई. को नारनौल (हरियाणा) में अंग्रेजों ने शेष एरिनपुरा विद्रोही सैनिकों को आत्मसमर्पण हेतु विवश कर दिया।
10. आऊवा का विद्रोह — ठाकु र कु शाल सिंह चंपावत
⚔️ ठाकु र कु शाल सिंह चंपावत (1857-1860 ई. (विद्रोह काल)) आऊवा (पाली) के ठिकानेदार — राजस्थान के 1857 विद्रोह के सर्वाधिक प्रतिष्ठित नायक
◆ एरिनपुरा के विद्रोही सैनिकों को खरवा में शरण व सहायता दी, जिससे मारवाड़ के महाराजा तख्तसिंह व अंग्रेज दोनों उनसे नाराज हो गए। ◆ बिथौड़ा के युद्ध (8 सितंबर 1857) में अंग्रेज सेना को पराजित किया। ◆ चेलावास के "काला-गौरा" युद्ध (18 सितंबर 1857) में जोधपुर एजेंट मैक मोसन मारा गया। ◆ अंग्रेजों ने कर्नल होम्स के नेतृत्व में बॉम्बे लांसर्स व जोधपुर सेना 20 जनवरी 1858 ई. को आऊवा भेजी — 24 जनवरी 1858 ई. को अंग्रेजों ने आऊवा पर अधिकार कर भारी लूटपाट की तथा "सुगाली माता" की मूर्ति अजमेर ले गए, जो वर्तमान में पाली के बागड़ संग्रहालय में सुरक्षित है। ◆ कु शालसिंह ने सलूंबर के के सरीसिंह व कोठारिया के रावत जोधसिंह के यहां शरण ली। ◆ 8 अगस्त 1860 ई. को कु शालसिंह ने आत्मसमर्पण किया — "मेजर टेलर आयोग" की जांच में साक्ष्य के अभाव में उन्हें निर्दोष मानकर रिहा कर दिया गया। ◆ 25 जुलाई 1864 ई. को उदयपुर में कु शालसिंह का निधन हुआ। विशेष तथ्य — पाली में 1857 की क्रांति के दो विजय-स्तंभ स्थित हैं।
प्रभावशाली थी कि अंग्रेजों को उन्हें कु चलने के लिए विशेष सैन्य अभियान भेजना पड़ा। यहां तक कि विजयी अंग्रेज अधिकारी कै प्टन शॉवर्स ने भी बाद में स्वीकार किया कि तांत्या टोपे जैसे क्रांतिकारियों को फांसी देना इतिहास में ब्रिटिश सरकार का अपराध समझा जाएगा — यह कथन दर्शाता है कि विजेता स्वयं भी इन क्रांतिकारियों के साहस से अछू ते नहीं रह सके ।
◆ ठाकु र कु शालसिंह अंग्रेजों व जोधपुर महाराजा — दोनों से नाराज थे, इसलिए उन्होंने एरिनपुरा के विद्रोहियों का नेतृत्व स्वीकार किया। उनके आह्वान पर आसोप, गूलर व खेजड़ली के सामंत सेना सहित आऊवा पहुंचे, तथा मेवाड़ के सलूंबर, रूपनगर व लसाणी के सामंतों ने सेनाएं भेजकर सहायता की — मारवाड़ के साथ मेवाड़ के सामंतों व जनसाधारण का ऐसा समर्थन मिलना असाधारण बात थी। ◆ अक्टूबर 1857 में जोधपुर लीजियन के सैनिक दिल्ली की ओर चले गए। होम्स की सेना के आक्रमण के बाद विजय की आशा न रहने पर कु शालसिंह सलूंबर चले गए और ठाकु र पृथ्वीसिंह ने नेतृत्व संभाला। अंत में अंग्रेजों ने आऊवा के किलेदार को रिश्वत देकर अपनी ओर मिला लिया और किले पर अधिकार कर अमानवीय अत्याचार किए। ◆ जोधपुर के सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार जब ए.जी.जी. लॉरेंस ने आऊवा पर चढ़ाई की, तो सबसे पहला आक्रमण गांव वालों की ओर से हुआ — सैनिकों के जाने के बाद भी आऊवा की जनता लड़ती रही। मारवाड़ में बड़े अधिकारी की मृत्यु पर किले में नौबत बजाना बंद कर राजकीय शोक मनाया जाता था, पर कै प्टन मॉक मेसन की मृत्यु पर ऐसा नहीं किया गया, जबकि किलेदार अनाड़सिंह की मृत्यु पर नौबत बंद रखी गई — यह जन-भावना का स्पष्ट प्रमाण है।
11. कोटा का विद्रोह ◆ कोटा में कोई सैनिक छावनी नहीं थी, फिर भी वहां की जनता ने स्वयं विद्रोह किया — यह राजस्थान के 1857 विद्रोह का एक अनूठा उदाहरण है, जहां लगभग छह महीने तक जनशासन स्थापित रहा।
तिथि (Date) घटना (Event)
14 अक्टूबर 1857 ई. मेजर बर्टन ने महाराव को चेतावनी दी
15 अक्टूबर 1857 ई. जयदयाल (मथुरा निवासी वकील) व मेहराब खां (रिसालदार, करौली निवासी) के नेतृत्व में विद्रोहियों ने पॉलिटिकल एजेंट मेजर बर्टन, उनके दो पुत्रों व डॉ. सैडलर की हत्या कर शहर पर अधिकार कर लिया
15 अक्टूबर 1857 ई. के महाराव रामसिंह द्वितीय पर विवश होकर हस्ताक्षरित पत्र में हत्याओं की जिम्मेदारी स्वीकार करने व जयदयाल को मुख्य बाद प्रशासक घोषित करने की बात कही गई
— महाराव रामसिंह द्वितीय ने अंततः अंग्रेजों से सहायता मांगी — रॉबर्ट्स के नेतृत्व में सेना भेजी गई; करौली के राजा मदनपाल ने भी अंग्रेजों की सहायता की — बदले में "ग्रैंड कमांडर ऑफ स्टार ऑफ इंडिया" (G.C.S.I.) की उपाधि व 17 तोपों की सलामी मिली
22 मार्च 1858 ई. जनरल रॉबर्ट्स के नेतृत्व में अंग्रेजों ने कोटा पर पुनः अधिकार किया — जयदयाल व मेहराब खां को फांसी दी गई; कोटा की तोप-सलामी 17 से घटाकर 13 कर दी गई
◆ विद्रोहियों ने राज्य के भंडार, राजकीय बंगले, दुकानें, शस्त्रागार, कोषागार व कोतवाली पर अधिकार कर लिया; महाराव एक प्रकार से अपने ही महल के कै दी बन गए। जयदयाल व मेहराब खां ने पूरा प्रशासन अपने हाथ में लेकर जिला अधिकारियों को राजस्व-वसूली के आदेश दिए। कोटा के अधिकांश अधिकारी व किलेदार भी विद्रोहियों के साथ थे — वे चाहते थे कि महाराव अंग्रेजों के विरुद्ध हो जाएं तो वे उनका नेतृत्व स्वीकार कर लें, पर महाराव सहमत नहीं हुए। ◆ जनवरी 1858 में करौली से सैनिक सहायता मिलने पर महाराव के सैनिकों ने विद्रोहियों को गढ़ (महल) से खदेड़ दिया, पर शहर 22 मार्च 1858 को ही मुक्त हुआ। दमन के बाद जयदयाल व मेहराब खां को एजेंसी के निकट नीम के पेड़ पर सरेआम फांसी दी गई।
◆ अंग्रेजों के जांच आयोग ने मेजर बर्टन व उसके पुत्रों की हत्या के लिए महाराव रामसिंह द्वितीय को "निरपराध किंतु उत्तरदायी" घोषित किया और दंडस्वरूप उनकी तोपों की सलामी घटा दी। कोटा, टोंक, बांसवाड़ा व भरतपुर पर कुछ समय तक विद्रोहियों का जन-समर्थित अधिकार रहा — इनमें कोटा सर्वाधिक प्रभावित स्थान था।
12. भरतपुर, धौलपुर, टोंक एवं अलवर में विद्रोह
रियासत (State) विद्रोह का विवरण (Description)
भरतपुर नाबालिग राजा जसवंत सिंह के कारण प्रशासन पॉलिटिकल एजेंट मॉरिसन के हाथ में था; 31 मई 1857 ई. को गुर्जरों व मेवों ने विद्रोह छेड़ा, जिससे मॉरिसन को आगरा भागना पड़ा — जनता विद्रोहियों के साथ थी, जबकि सेना अंग्रेजों के साथ रही
धौलपुर 27 अक्टूबर 1857 ई. को देवा गुर्जर, भवानी शंकर, रामचंद्र व हीरालाल राणा के नेतृत्व में जनता ने विद्रोह कर धौलपुर पर अधिकार कर लिया — ग्वालियर व इंदौर से आए सैनिकों ने भी सहयोग दिया; लगभग 2 माह विद्रोहियों का नियंत्रण रहा; दिसंबर 1857 ई. में दमन हुआ, दो माह बाद पटियाला नरेश के हस्तक्षेप से राजा भगवंत सिंह पुनः स्थापित हुए
टोंक नवाब वजीरुद्दौला स्वयं अंग्रेज-समर्थक थे, परंतु टोंक की जनता व सैनिकों ने मीर आलम खां के नेतृत्व में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया — इस विद्रोह में महिलाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही
अलवर महाराजा विनयसिंह (बन्नेसिंह) अंग्रेज-समर्थक थे व सेना भेजने का प्रयास किया, जबकि दीवान फै जुल्ला खां विद्रोहियों के समर्थक थे — क्रांतिकारियों ने 11 जुलाई 1857 ई. को अछनेरा में दमन का सामना किया
टोंक (अतिरिक्त मीर आलम खां नवाब के मामा थे; विद्रोही सैनिकों ने नीमच के सैनिकों के साथ नवाब का किला घेरकर अपना वेतन वसूला तथ्य) और दिल्ली चले गए। 1858 के प्रारंभ में तांत्या टोपे के टोंक आने पर जनता व जागीरदार नासिर मुहम्मद खां ने उनका साथ दिया, जबकि नवाब किले में बंद हो गए; जन-आक्रोश के कारण नवाब को अंग्रेजों से अपनी सीमा से न गुजरने को कहना पड़ा
मेवाड़ (उदयपुर) महाराणा स्वरूपसिंह ने सेना अंग्रेजों की सहायता हेतु भेजी और अनेक अंग्रेजों को शरण दी, परंतु जनता में रोष था — जनता ने रेजिडेंट को गालियां देकर गुस्सा प्रकट किया और कप्तान शॉवर्स को बुरा-भला कहा; सलूंबर व कोठारिया के सामंतों ने कु शालसिंह व तांत्या टोपे की सहायता की; शाहपुरा ठिकाने ने विद्रोहियों को सहयोग दिया
बांसवाड़ा महारावल लक्ष्मणसिंह अंग्रेजों के सहयोगी रहे; 11 दिसंबर को तांत्या टोपे ने बांसवाड़ा पर अधिकार कर लिया, महारावल राजधानी छोड़कर भाग गए और राज्य के सरदारों ने विद्रोहियों का साथ दिया
चूरू ठाकु र शिवसिंह ने अंग्रेजों का विरोध किया; अंग्रेजों ने बीकानेर की सेना के साथ चूरू दुर्ग को घेरकर तोपों से गोले बरसाए। दुर्ग में गोले बनाने का शीशा खत्म होने पर सेठ-साहूकारों व जनता ने अपने घरों से चांदी लाकर दी — चांदी के गोले छू टने पर शत्रु सेना ने जनता की भावना का सम्मान करते हुए घेरा उठा लिया
भरतपुर व अलवर भरतपुर की सेना विद्रोहियों को दबाने भेजी गई, पर मेव व गुर्जर जनता क्रांतिकारियों के साथ रही; जन-आक्रोश के कारण (अतिरिक्त तथ्य) भरतपुर शासक ने स्वयं मॉरिसन को राज्य छोड़ने की सलाह दी और विद्रोहियों के जाने के बाद भी तनाव बना रहा। अलवर में महाराजा बन्नेसिंह ने आगरा सेना भेजी, पर अलवर की गुर्जर जनता की सहानुभूति क्रांतिकारियों के साथ थी
13. तांत्या टोपे का राजस्थान आगमन ◆ नानासाहब के स्वामीभक्त सेनापति तांत्या टोपे 1857-59 ई. के दौरान दो बार राजस्थान आए — दोनों ही यात्राओं में उन्होंने राजस्थान के विभिन्न भागों में क्रांति की ज्वाला प्रज्ज्वलित रखने का प्रयास किया।
यात्रा (Visit) मार्ग/घटनाक्रम (Route/Events)
प्रथम आगमन मांडलगढ़ (भीलवाड़ा) से प्रवेश → कु आड़ा का युद्ध (पराजय) → बूंदी की ओर प्रस्थान → नाथद्वारा-चित्तौड़गढ़-सिंगोली- बांसवाड़ा-झालावाड़ होते हुए झालावाड़ पर अधिकार किया; सीकर के रावराजा भैरूसिंह ने उन्हें शेखावाटी में प्रवेश से रोका; झालावाड़ के पृथ्वी सिंह को पराजित किया
द्वितीय आगमन बांसवाड़ा में लक्ष्मणसिंह को पराजित किया → सलूंबर-भींडर-टोंक होते हुए नासिर मोहम्मद खां का समर्थन प्राप्त किया → (11 सितंबर) 21 जनवरी को सीकर पहुंचे → मानसिंह नरूका (जागीरदार, नरवर) के विश्वासघात से पकड़े गए
◆ के सरीसिंह (सलूंबर) व जोधसिंह (कोठारिया) ने तांत्या टोपे की सहायता की थी। पकड़े जाने के बाद 8 अप्रैल को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई तथा 18 अप्रैल 1859 ई. को शिवपुरी में उन्हें फांसी दे दी गई। सीकर में तांत्या टोपे की एक छतरी (स्मारक) आज भी स्थित है। ◆ तांत्या टोपे ने राजस्थान के सामंतों व जनसाधारण में उत्साह का संचार किया — वे जहां भी गए, जनता ने उनका अभिनंदन किया और रसद दी। फिर भी शासकों के सहयोग के अभाव में उन्हें स्थान-स्थान पर भटकना पड़ा। उधर क्रांति का अंत सबसे पहले दिल्ली में हुआ, जहां 21 सितंबर 1857 को मुगल बादशाह को परिवार सहित बंदी बना लिया गया, और जून 1858 तक अंग्रेजों ने अधिकांश स्थानों पर पुनः नियंत्रण कर लिया।
"इतिहास में तांत्या टोपे को फांसी देना ब्रिटिश सरकार का अपराध समझा जाएगा, और आने वाली पीढ़ियां पूछेंगी कि इस सजा के लिए किसने स्वीकृ ति दी और किसने पुष्टि की।" — कै प्टन शॉवर्स
14. प्रमुख क्रांतिकारी एवं वीरांगना सुधा कं वर
क्रांतिकारी (Revolutionary) संबंधित क्षेत्र/केंद्र (Region/Centre)
कु शालसिंह आऊवा (पाली)
पृथ्वीसिंह आऊवा (पाली)
लाला जयदयाल कोटा
मेहराब खां कोटा
हीरा सिंह नीमच
डूंगजी-जवाहरजी सीकर
अमरचंद बांठिया बीकानेर
तांत्या टोपे संपूर्ण राजस्थान
महिलाएं भी अपने साहस से इस संघर्ष का हिस्सा बनीं।
◆ डूंगजी व जवाहरजी — सीकर के बठोठ-पाटोदा के कछवाहा राजपूत, आपस में काका-भतीजे के रिश्ते में — इन लोकदेवताओं ने बीकानेर व जोधपुर रियासतों की सेनाओं के विरुद्ध संघर्ष किया। लोटिया/लोठ जाट (जन्म 1804, रींगस गांव, सीकर) ने स्वांग रचकर जासूसी की तथा दिसंबर 1846 ई. में आगरा किले पर हमला कर डूंगरसिंह सहित 300 क्रांतिकारियों को मुक्त कराया था।
15. साहित्य एवं संस्मरणों में 1857 की क्रांति
रचनाकार/रचना विवरण (Description) (Author/Work)
बांकीदास "आयो अंग्रेज मुलक रे ऊपर" रचना में 1857 की क्रांति का उल्लेख; अंग्रेजों की गुलामी करने वाले राजपूत शासकों को धिक्कारा
चारणों के गीत आऊवा, सलूंबर आदि ठाकु रों ने चारणों से ऐसे गीत रचवाए जिनमें उनकी अंग्रेज-विरोधी छवि उभरती है; आऊवा ठाकु र कु शालसिंह के संघर्ष को उस समय के साहित्य में सर्वोच्च स्थान मिला
सूर्यमल्ल मिश्रण "वीर सतसई" (288 दोहे) — क्रांतिकाल की वीर-भावना को समर्पित रचना; पीपल्या के ठाकु र फू लसिंह को लिखे पत्र में राजपूत शासकों की गुलामी की मनोवृत्ति की कटु आलोचना की
विष्णु भट्ट गोडसे मराठी ग्रंथ "माझा प्रवास" में 1857 की क्रांति का आंखों देखा वृत्तांत
सूबेदार सीताराम पांडे संस्मरण "फ्रॉम सिपाही टू सूबेदार" — अंग्रेजी अनुवाद नॉरगेट द्वारा
नाथूराम खड़गावत "1857 के संघर्ष में राजस्थान की भूमिका" — राजस्थानी ग्रंथागार द्वारा प्रकाशित
16. रियासतों की भूमिका — तुलनात्मक विश्लेषण
अंग्रेज-समर्थक शासक/रियासतें जनता/सैनिक/सामंत जिन्होंने विद्रोह किया
◆ उदयपुर (स्वरूप सिंह) — अंग्रेज शरणार्थियों को जगमंदिर महल ◆ आऊवा — ठाकु र कु शालसिंह चंपावत व पृथ्वीसिंह में शरण ◆ कोटा — जयदयाल व मेहराब खां (जनता ने 6 माह जनशासन ◆ जयपुर (रामसिंह द्वितीय) — तन-मन-धन से सहायता, "सितार- चलाया) ए-हिंद" उपाधि प्राप्त ◆ भरतपुर, टोंक, धौलपुर — शासक अंग्रेज-समर्थक होते हुए भी ◆ बीकानेर (सरदार सिंह) — स्वयं सेना लेकर हिसार गए, 41 गांव जनता व सैनिक विद्रोही रहे पुरस्कार में मिले ◆ अलवर — दीवान फै जुल्ला खां विद्रोहियों के समर्थक (महाराजा ◆ जोधपुर, सिरोही, बूंदी, जैसलमेर, झालावाड़, प्रतापगढ़, के विपरीत) बांसवाड़ा, डूंगरपुर, करौली, टोंक (नवाब) — सभी अंग्रेज-समर्थक ◆ सीकर — डूंगजी-जवाहरजी, तांत्या टोपे का अंतिम केंद्र
17. ब्रिटिश अधिकारियों की टिप्पणियां
अधिकारी (Officer) टिप्पणी (Comment)
लॉर्ड कै निंग राजा-महाराजा इस तूफान के लिए "ब्रेकवाटर" (लहर-अवरोधक) का कार्य कर रहे थे
जॉन लॉरेंस यदि क्रांतिकारियों में नेतृत्व होता, तो हम (अंग्रेज) निश्चित रूप से हार जाते
कै प्टन प्रिचर्ड इसे मात्र एक सैनिक-विद्रोह (Military Mutiny) बताया, जनांदोलन नहीं; पर यह भी स्वीकार किया कि भागते अंग्रेजों को मार्ग में किसी भारतीय ने सहानुभूति नहीं दिखाई और बॉम्बे लांसर्स के बिना उनका बचना कठिन था
18. विद्रोह की असफलता के कारण एवं परिणाम
असफलता के मुख्य कारण ◆ ब्रिटिश निष्ठा — राजपूताना के अधिकांश शासकों ने ब्रिटिश सत्ता के प्रति स्वामीभक्ति प्रदर्शित की। ◆ सहयोग की कमी — स्थानीय शासकों ने क्रांतिकारियों का साथ नहीं दिया। ◆ नेतृत्व की कमी — क्रांतिकारियों में रणनीति व कू टनीति में दक्ष नेतृत्व का अभाव था। ◆ भावना पर आधारित क्रांति — यह विद्रोह सुनियोजित रणनीति के बजाय भावना पर आधारित था। ◆ संसाधनों की कमी — क्रांतिकारियों के पास समन्वय, अखिल भारतीय दृष्टिकोण, धन, रसद व हथियारों का अभाव था।
परिणाम एवं महत्व ◆ यद्यपि यह विद्रोह सैन्य दृष्टि से असफल रहा, परंतु यह एक सैन्य-विद्रोह से आगे बढ़कर एक जनांदोलन में परिवर्तित हो गया — जनता, किसान, गुर्जर, भील व मेव — सभी ने किसी न किसी रूप में इसमें भाग लिया। यह संघर्ष आगे चलकर राष्ट्रीय आंदोलन की नींव बना। ◆ नरेशों को पुरस्कार व नीति-परिवर्तन — शासक अंग्रेजों के लिए उपयोगी सिद्ध हुए, इसलिए उन्हें पुरस्कृ त किया गया; उन्हें संतुष्ट करने हेतु "गोद निषेध" (Doctrine of Lapse) का सिद्धांत समाप्त किया गया और राजकु मारों के लिए अंग्रेजी शिक्षा की व्यवस्था हुई। ◆ ताज का सीधा शासन — रियासतें कं पनी के स्थान पर सीधे ब्रिटिश क्राउन (Crown) के नियंत्रण में आ गईं। महारानी विक्टोरिया की घोषणा (1858) द्वारा आश्वासन दिया गया कि देशी राज्यों का अस्तित्व बना रहेगा। नरेशों की जीवन-शैली पर पाश्चात्य प्रभाव बढ़ा और वे अंग्रेजों की प्रशंसा व सेवा में सम्मान पाने के आदी हो गए। ◆ सामंतों पर प्रहार — सामंतों ने खुलकर विरोध किया था, इसलिए अंग्रेजी नीति उन्हें प्रभावहीन बनाने की रही: सैनिकों को नकद वेतन देने को बाध्य किया गया, उनके न्यायिक अधिकार सीमित किए गए और विशेषाधिकारों पर चोट की गई, ताकि जागीर-क्षेत्र की जनता में उनकी प्रतिष्ठा घटे। ◆ अन्य परिणाम — रेलवे व सड़कों का जाल बिछाया गया ताकि आवागमन तेज हो; मध्यम वर्ग में शिक्षा फै लाकर अपने लिए उपयोगी शिक्षित वर्ग खड़ा किया गया; अर्थतंत्र की मजबूती हेतु वैश्य (व्यापारी) समुदाय को संरक्षण दिया गया, जो आगे चलकर अधिक प्रभावी बना। इस क्रांति ने अंग्रेजों की यह धारणा भी गलत सिद्ध कर दी कि मुगलों-मराठों की लूट से त्रस्त राजस्थान की जनता ब्रिटिश शासन की समर्थक है।
1857 की क्रांति का स्वरूप (Nature of the Revolt) ◆ लंबे समय तक 1857 को "सैनिक विद्रोह" या "विप्लव" कहा गया — ब्रिटिश इतिहासकारों ने इसे सैनिक विद्रोह माना, जबकि आर.सी. मजूमदार, सुरेंद्रनाथ सेन व अशोक मेहता जैसे भारतीय इतिहासकारों ने इसे जनसाधारण का राष्ट्रीय आंदोलन
कहा, जिसमें हिंदू-मुस्लिम सबने मिलकर विरोध किया। 2007 में पूरे राष्ट्र द्वारा इसकी 150वीं जयंती मनाना इसके महत्व को दर्शाता है। ◆ राजस्थान के संदर्भ में — नसीराबाद, नीमच व एरिनपुरा की घटनाएं भारतव्यापी क्रांति का अंग थीं, जबकि कोटा व आऊवा की घटनाएं स्थानीय परिस्थितियों का परिणाम थीं, जिनमें ब्रिटिश-विरोधी भावना निर्विवाद थी। जोधपुर में कप्तान सदरलैंड के स्मारक पर पत्थर बरसाए गए; कोटा महाराव ने मेजर बर्टन को कोटा न आने को कहा था। जनता अंग्रेजों को "फिरंगी" कहती थी — इसीलिए इस क्रांति को राजस्थान का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहना अनुचित नहीं है।
बाद के घटनाक्रम — अजमेर दरबार (1870) एवं मेयो कॉलेज: 22 अक्टूबर 1870 ई. को वायसराय लॉर्ड मेयो ने अजमेर में राजाओं हेतु एक दरबार आयोजित किया, जिसमें 1857 में संदिग्ध भूमिका के कारण कोटा महाराव को आमंत्रित नहीं किया गया, तथा जोधपुर नरेश तख्तसिंह जयपुर-उदयपुर शासकों की कु र्सियां आगे लगी होने से नाराज होकर बिना शामिल हुए लौट गए — यह घटना दर्शाती है कि 1857 के बाद भी रियासतों के आपसी संबंध कितने संवेदनशील बने रहे। इसी कालखंड में राजाओं व सामंतों की शिक्षा हेतु रिचर्ड बर्क ने 1875 ई. में अजमेर में मेयो कॉलेज की स्थापना की, जिसके प्रथम विद्यार्थी अलवर के महाराजा मंगल सिंह थे।
★ अध्याय सार — महत्वपूर्ण तथ्य ★
1. राजस्थान में 1857 की क्रांति का प्रारंभ 28 मई 1857 को नसीराबाद छावनी (अजमेर) से हुआ तथा अंत सीकर में तांत्या टोपे की गिरफ्तारी के साथ हुआ। 2. क्रांति के प्रतीक कमल का फू ल व रोटी थे; निर्धारित तिथि 31 मई 1857 थी परंतु वास्तविक प्रारंभ 10 मई 1857 को मेरठ से हुआ। 3. राजपूताना में कु ल 6 सैन्य छावनियां थीं — नसीराबाद, नीमच, देवली, एरिनपुरा, ब्यावर व खेरवाड़ा — जिनमें से ब्यावर व खेरवाड़ा ने प्रत्यक्ष भाग नहीं लिया। 4. राजपूताना एजेंसी की स्थापना 1832 ई. में अजमेर में हुई; 1857 में ए.जी.जी. जॉर्ज पैट्रिक लॉरेंस थे। 5. नीमच विद्रोह (3 जून 1857) का नेतृत्व मोहम्मद अली बेग व हीरा सिंह ने किया; महाराणा स्वरूपसिंह ने भागे अंग्रेजों को जगमंदिर महल में शरण दी। 6. एरिनपुरा विद्रोह (21 अगस्त 1857) में जोधपुर लीजियन ने विद्रोह किया — बिथौड़ा (8 सितंबर) व चेलावास (18 सितंबर, "काला-गौरा") के युद्ध हुए, जिसमें जोधपुर एजेंट मैक मोसन मारा गया। 7. आऊवा (पाली) के ठाकु र कु शालसिंह चंपावत राजस्थान के 1857 विद्रोह के सबसे प्रतिष्ठित नायक माने जाते हैं — 24 जनवरी 1858 को अंग्रेजों ने आऊवा पर अधिकार किया, कु शालसिंह ने 1860 में आत्मसमर्पण किया। 8. कोटा में कोई सैन्य छावनी न होते हुए भी जयदयाल व मेहराब खां के नेतृत्व में जनविद्रोह हुआ — 15 अक्टूबर 1857 को मेजर बर्टन की हत्या, 22 मार्च 1858 को कोटा पर अंग्रेजों का पुनः अधिकार व दोनों नेताओं को फांसी। 9. धौलपुर (27 अक्टूबर 1857), टोंक व अलवर (11 जुलाई 1857, अछनेरा) में भी विद्रोह की घटनाएं हुईं। 10. तांत्या टोपे दो बार राजस्थान आए — मानसिंह नरूका के विश्वासघात से पकड़े गए, 18 अप्रैल 1859 को शिवपुरी में फांसी दी गई; सीकर में उनकी छतरी स्थित है। 11. सुधा कं वर (लाडनूं-डीडवाना-कु चामन) को राजस्थान की एकमात्र प्रसिद्ध महिला क्रांतिकारी माना जाता है, जिन्होंने पुरुष वेश में युद्ध लड़ा। 12. सूर्यमल्ल मिश्रण की "वीर सतसई" (288 दोहे) व बांकीदास की "आयो अंग्रेज मुलक रे ऊपर" 1857 पर आधारित प्रमुख राजस्थानी साहित्यिक रचनाएं हैं। 13. लॉर्ड कै निंग ने राजपूत राजाओं को क्रांति के तूफान के लिए "ब्रेकवाटर" (लहर-अवरोधक) कहा था।
14. विद्रोह की असफलता के मुख्य कारण — शासकों की ब्रिटिश-निष्ठा, नेतृत्व व संसाधनों का अभाव तथा सुनियोजित रणनीति का न होना था। 15. यह विद्रोह सैन्य-विद्रोह से आगे बढ़कर जनांदोलन में परिवर्तित हुआ और आगे राष्ट्रीय आंदोलन की नींव बना।
नीचे दी समय-रेखा (Timeline) इस अध्याय के संपूर्ण घटनाक्रम को स्पष्ट करती है — रिवीजन के लिए इसे ज़रूर दोहराएं :
तिथि (Date) घटना/Event महत्व
10 मई 1857 मेरठ से क्रांति का वास्तविक प्रारंभ अखिल भारतीय विद्रोह की शुरुआत
19 मई 1857 ए.जी.जी. लॉरेंस को मेरठ विद्रोह की सूचना शासकों को शांति बनाए रखने के निर्देश
28 मई 1857 नसीराबाद छावनी विद्रोह राजस्थान में क्रांति का प्रारंभ
31 मई 1857 भरतपुर में गुर्जर-मेव विद्रोह मॉरिसन आगरा भागे
3 जून 1857 नीमच छावनी विद्रोह मोहम्मद अली बेग-हीरा सिंह नेतृत्व
5 जून 1857 देवली छावनी पर विद्रोहियों का अधिकार मालवा-मेवाड़ मार्ग पर नियंत्रण
21 अगस्त 1857 एरिनपुरा विद्रोह जोधपुर लीजियन का विद्रोह
8 सितंबर 1857 बिथौड़ा का युद्ध कु शालसिंह की प्रथम विजय
18 सितंबर 1857 चेलावास का युद्ध ("काला-गौरा") मैक मोसन की हत्या
21 सितंबर 1857 दिल्ली में मुगल बादशाह परिवार सहित बंदी क्रांति का अंत सर्वप्रथम दिल्ली में
14-15 अक्टूबर 1857 कोटा विद्रोह, मेजर बर्टन की हत्या राजस्थान का एकमात्र जन-नेतृत्व विद्रोह
27 अक्टूबर 1857 धौलपुर विद्रोह जनता का 2 माह नियंत्रण
16 नवंबर 1857 नारनौल में एरिनपुरा सैनिकों का आत्मसमर्पण एरिनपुरा विद्रोह का अंत
20-24 जनवरी 1858 आऊवा पर अंग्रेजों का आक्रमण व अधिकार आऊवा विद्रोह का दमन
22 मार्च 1858 कोटा पर अंग्रेजों का पुनः अधिकार जयदयाल-मेहराब खां को फांसी
1858 महारानी विक्टोरिया की घोषणा रियासतें कं पनी से सीधे क्राउन के अधीन; गोद निषेध समाप्त