🔥 अध्याय 13/16 — राजस्थान का इतिहास

1857 की क्रांति

Revolution of 1857 in Rajasthan | RAS Pre + Mains
📋 इस अध्याय में
  1. परिचय एवं पृष्ठभूमि (1818-1856)
  2. क्रांति के कारण एवं प्रतीक
  3. राजपूताना की सैन्य छावनियां
  4. राजपूताना एजेंसी एवं राजनीतिक अभिकर्ता (Political Agents)
  5. क्रांति के समय राजस्थान के शासक — रियासतवार तालिका
  6. नसीराबाद छावनी विद्रोह — क्रांति का प्रारंभ
  7. नीमच छावनी विद्रोह
  8. एरिनपुरा विद्रोह एवं बिथौड़ा-चेलावास के युद्ध
  9. आऊवा का विद्रोह — ठाकुर कुशाल सिंह चंपावत
  10. कोटा का विद्रोह
  11. भरतपुर, धौलपुर, टोंक एवं अलवर में विद्रोह
  12. तांत्या टोपे का राजस्थान आगमन
  13. प्रमुख क्रांतिकारी एवं वीरांगना सुधा कंवर
  14. साहित्य एवं संस्मरणों में 1857 की क्रांति
  15. रियासतों की भूमिका — तुलनात्मक विश्लेषण
  16. ब्रिटिश अधिकारियों की टिप्पणियां
  17. विद्रोह की असफलता के कारण एवं परिणाम

कल्पना कीजिए — 28 मई 1857 की एक सुबह, अजमेर के निकट नसीराबाद छावनी में तैनात भारतीय सैनिकों के हाथ में वह बंदूक है जिसके कारतूस को दांतों से काटना पड़ता है, और उनमें गाय व सुअर की चर्बी होने की अफवाह पूरी छावनी में आग की तरह फैल चुकी है। यह सिर्फ एक अफवाह नहीं थी — यह वर्षों से दबे हुए असंतोष, आर्थिक शोषण व सामंतों के अधिकार-हनन का विस्फोट-बिंदु थी। अगले ही कुछ महीनों में नसीराबाद से नीमच, एरिनपुरा से आऊवा और कोटा तक पूरा राजपूताना इस चिंगारी से धधक उठा। यह अध्याय उसी संघर्ष की कहानी है — जहां एक ओर अधिकांश राजपूत शासकों ने अंग्रेजों का साथ दिया, वहीं दूसरी ओर आऊवा के ठाकुर कुशाल सिंह जैसे सामंतों, कोटा के जयदयाल-मेहराबखान जैसे सामान्य नागरिकों तथा सुधा कंवर जैसी वीरांगनाओं ने अपने प्राणों की आहुति देकर यह साबित किया कि स्वतंत्रता की चाहत किसी पद या उपाधि की मोहताज नहीं होती।

1परिचय एवं पृष्ठभूमि (1818-1856)

2क्रांति के कारण एवं प्रतीक

तथ्य (Fact)विवरण (Detail)
क्रांति के प्रतीककमल का फूल (सैन्य टुकड़ियों में भेजा गया) एवं रोटी (गांव-गांव चौकीदारों द्वारा पहुंचाई गई)
निर्धारित तिथि (Scheduled Date)31 मई 1857
वास्तविक प्रारंभ (Actual Start)10 मई 1857 (मेरठ से)
नेतृत्वबहादुरशाह जफर (नाममात्र मुगल सम्राट)
गवर्नर-जनरललॉर्ड कैनिंग
राजस्थान में प्रारंभ28 मई 1857, नसीराबाद (अजमेर)
राजस्थान में अंतसीकर (तांत्या टोपे की गिरफ्तारी के साथ)

3राजपूताना की सैन्य छावनियां

छावनी (Cantonment)स्थान (Location)तैनात रेजिमेंट (Regiment)विद्रोह में भागीदारी
नसीराबादअजमेर15वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री (30वीं का भी साथ)✅ प्रत्यक्ष भाग लिया — राजस्थान की प्रथम विद्रोही छावनी
नीमचमध्य प्रदेश (मेवाड़ के निकट)प्रथम बंगाल कैवेलरी / मालवा-मेवाड़-राजपूताना रेजिमेंट✅ प्रत्यक्ष भाग लिया
देवलीटोंककोटा कंटिनजेंट रेजिमेंट✅ प्रत्यक्ष भाग लिया
एरिनपुरापाली (शिवगंज तहसील, सिरोही)जोधपुर लीजियन रेजिमेंट (स्थापना 1835)✅ प्रत्यक्ष भाग लिया
ब्यावरअजमेरमेर-मेरवाड़ा बटालियन रेजिमेंट (स्थापना 1822)❌ प्रत्यक्ष भाग नहीं लिया
खेरवाड़ाउदयपुरमेवाड़ भील कोर रेजिमेंट❌ प्रत्यक्ष भाग नहीं लिया

4राजपूताना एजेंसी एवं राजनीतिक अभिकर्ता (Political Agents)

रियासत (State)राजनीतिक अभिकर्ता (Political Agent)
जयपुरकर्नल विलियम ईडन
जोधपुर/मारवाड़मैक मोसन
उदयपुर/मेवाड़मेजर शॉवर्स
कोटामेजर बर्टन
भरतपुरमेजर मॉरिसन (एवं निक्सन)
सिरोहीजे.डी. हॉल

राजपूताना एजेंसी: स्थापना — 1832 ई., अजमेर (विस्तार देखें: अध्याय 12); 1845 ई. में गर्मियों के दौरान मुख्यालय माउंट आबू स्थानांतरित किया गया। राजस्थान के प्रथम ए.जी.जी./रेजिडेंट डेविड ऑक्टरलोनी (कुछ स्रोतों में मिस्टर लॉकेट) थे, जबकि 1857 की क्रांति के समय ए.जी.जी. जॉर्ज पैट्रिक लॉरेंस थे — विद्रोह के दौरान माउंट आबू में मौजूद उनके पुत्र एलेक्जेंडर व कर्नल हॉल घायल हुए थे।

5क्रांति के समय राजस्थान के शासक — रियासतवार तालिका

रियासत (State)शासक (Ruler)भूमिका/विशेष तथ्य
उदयपुर (मेवाड़)महाराणा स्वरूप सिंहअंग्रेजों की सहायता की, नीमच से भागे अंग्रेजों को जगमंदिर महल में शरण दी
जयपुरसवाई रामसिंह द्वितीयतन-मन-धन से अंग्रेजों की सहायता — बदले में "सितार-ए-हिंद" उपाधि व कोटपूतली परगना भेंट में मिला
जोधपुर/मारवाड़महाराजा तख्तसिंहअजमेर में अंग्रेजों की सहायता हेतु सेना भेजी
कोटामहाराव रामसिंह द्वितीयजनविद्रोह के दबाव में रहे, बाद में अंग्रेजों से सहायता मांगी
भरतपुरमहाराजा जसवंत सिंहनाबालिग होने से प्रशासन एजेंट मॉरिसन के हाथ में; जनता विद्रोहियों के साथ, सेना अंग्रेजों के साथ
बीकानेरमहाराजा सरदार सिंहस्वयं सेना लेकर हिसार गए, अंग्रेजों से सहायता की — बदले में 41 परगने/गांव उपहार में मिले
सिरोहीमहाराजा शिवसिंहअंग्रेज-समर्थक
धौलपुरमहाराजा भगवंत सिंहअंग्रेज-समर्थक, फिर भी विद्रोहियों ने 2 माह राज्य पर अधिकार रखा
करौलीमहाराजा मदनपालअंग्रेजों की सहायता की
टोंकनवाब वजीरुद्दौलाअंग्रेज-समर्थक, परंतु जनता व सेना विद्रोही रहीं
बूंदीमहाराव रामसिंहअंग्रेज-समर्थक
अलवरमहाराजा विनयसिंह/बन्नेसिंहसेना भेजने का प्रयास किया, परंतु क्रांतिकारियों ने 11 जुलाई 1857 को अछनेरा में दमन किया; दीवान फैजुल्ला खां विद्रोहियों के समर्थक थे
जैसलमेरमहारावल रणजीत सिंहअंग्रेज-समर्थक
झालावाड़राजराणा पृथ्वी सिंहअंग्रेज-समर्थक
प्रतापगढ़महारावल दलपत सिंहअंग्रेज-समर्थक
बांसवाड़ामहारावल लक्ष्मणसिंहअंग्रेज-समर्थक
डूंगरपुरमहारावल उदयसिंह द्वितीयअंग्रेज-समर्थक

अन्य तथ्य: राजपूताना के बिशन सिंह व शिवनाथ सिंह जैसे सामंतों ने भी विद्रोह में भाग लिया। सामोद (जयपुर) के रावल शिवसिंह ने मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर को निष्ठा के प्रतीक स्वरूप नज़र भेंट भेजी थी — यह दर्शाता है कि शीर्ष स्तर पर अंग्रेज-निष्ठा के बावजूद निचले स्तर के कई सामंत व सैनिक विद्रोह के पक्ष में थे।

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6नसीराबाद छावनी विद्रोह — क्रांति का प्रारंभ

7नीमच छावनी विद्रोह

"अंग्रेजों ने अपनी शपथ का उल्लंघन किया है; क्या उन्होंने अवध पर कब्जा नहीं किया? इसलिए भारतीयों से यह उम्मीद नहीं रखनी चाहिए कि वे अपनी शपथ का पालन करेंगे।" — मोहम्मद अली बेग (नीमच विद्रोह के नेता)

8एरिनपुरा विद्रोह एवं बिथौड़ा-चेलावास के युद्ध

युद्ध (Battle)तिथि (Date)विवरण (Description)
बिथौड़ा का युद्ध8 सितंबर 1857 ई.कुशालसिंह की सेना बनाम अंग्रेज सेना (ओनाड़ सिंह पंवार, फौजदार राजमल लोढ़ा व हीथकोट के नेतृत्व में) — कुशालसिंह की सेना विजयी रही, ओनाड़ सिंह मारा गया व हीथकोट भाग गया
चेलावास का युद्ध ("काला-गौरा")18 सितंबर 1857 ई.कुशालसिंह ("काला") बनाम पैट्रिक लॉरेंस व मैक मोसन ("गोरा") — क्रांतिकारियों ने जोधपुर एजेंट मैक मोसन का सिर काटकर किले के द्वार पर टांग दिया; जोधपुर लीजियन आगे दिल्ली की ओर बढ़ी

9आऊवा का विद्रोह — ठाकुर कुशाल सिंह चंपावत

⚔️ ठाकुर कुशाल सिंह चंपावत (1857-1860 ई. (विद्रोह काल)) आऊवा (पाली) के ठिकानेदार — राजस्थान के 1857 विद्रोह के सर्वाधिक प्रतिष्ठित नायक

💡 आऊवा — जहां एक ठिकानेदार ने पूरी ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी

कल्पना कीजिए — एक छोटे से ठिकाने का सामंत, जिसके पास न तो कोई बड़ी सेना है, न ही कोई शाही समर्थन, फिर भी वह भागते हुए विद्रोही सैनिकों को शरण देने का साहस दिखाता है। यही थे आऊवा के ठाकुर कुशालसिंह चंपावत। उनकी वीरता इतनी प्रभावशाली थी कि अंग्रेजों को उन्हें कुचलने के लिए विशेष सैन्य अभियान भेजना पड़ा। यहां तक कि विजयी अंग्रेज अधिकारी कैप्टन शॉवर्स ने भी बाद में स्वीकार किया कि तांत्या टोपे जैसे क्रांतिकारियों को फांसी देना इतिहास में ब्रिटिश सरकार का अपराध समझा जाएगा — यह कथन दर्शाता है कि विजेता स्वयं भी इन क्रांतिकारियों के साहस से अछूते नहीं रह सके।

10कोटा का विद्रोह

तिथि (Date)घटना (Event)
14 अक्टूबर 1857 ई.मेजर बर्टन ने महाराव को चेतावनी दी
15 अक्टूबर 1857 ई.जयदयाल (मथुरा निवासी वकील) व मेहराब खां (रिसालदार, करौली निवासी) के नेतृत्व में विद्रोहियों ने पॉलिटिकल एजेंट मेजर बर्टन, उनके दो पुत्रों व डॉ. सैडलर की हत्या कर शहर पर अधिकार कर लिया
15 अक्टूबर 1857 ई. के बादमहाराव रामसिंह द्वितीय पर विवश होकर हस्ताक्षरित पत्र में हत्याओं की जिम्मेदारी स्वीकार करने व जयदयाल को मुख्य प्रशासक घोषित करने की बात कही गई
महाराव रामसिंह द्वितीय ने अंततः अंग्रेजों से सहायता मांगी — रॉबर्ट्स के नेतृत्व में सेना भेजी गई; करौली के राजा मदनपाल ने भी अंग्रेजों की सहायता की — बदले में "ग्रैंड कमांडर ऑफ स्टार ऑफ इंडिया" (G.C.S.I.) की उपाधि व 17 तोपों की सलामी मिली
22 मार्च 1858 ई.जनरल रॉबर्ट्स के नेतृत्व में अंग्रेजों ने कोटा पर पुनः अधिकार किया — जयदयाल व मेहराब खां को फांसी दी गई; कोटा की तोप-सलामी 17 से घटाकर 13 कर दी गई

11भरतपुर, धौलपुर, टोंक एवं अलवर में विद्रोह

रियासत (State)विद्रोह का विवरण (Description)
भरतपुरनाबालिग राजा जसवंत सिंह के कारण प्रशासन पॉलिटिकल एजेंट मॉरिसन के हाथ में था; 31 मई 1857 ई. को गुर्जरों व मेवों ने विद्रोह छेड़ा, जिससे मॉरिसन को आगरा भागना पड़ा — जनता विद्रोहियों के साथ थी, जबकि सेना अंग्रेजों के साथ रही
धौलपुर27 अक्टूबर 1857 ई. को देवा गुर्जर, भवानी शंकर, रामचंद्र व हीरालाल राणा के नेतृत्व में जनता ने विद्रोह कर धौलपुर पर अधिकार कर लिया — ग्वालियर व इंदौर से आए सैनिकों ने भी सहयोग दिया; लगभग 2 माह विद्रोहियों का नियंत्रण रहा; दिसंबर 1857 ई. में दमन हुआ, दो माह बाद पटियाला नरेश के हस्तक्षेप से राजा भगवंत सिंह पुनः स्थापित हुए
टोंकनवाब वजीरुद्दौला स्वयं अंग्रेज-समर्थक थे, परंतु टोंक की जनता व सैनिकों ने मीर आलम खां के नेतृत्व में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया — इस विद्रोह में महिलाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही
अलवरमहाराजा विनयसिंह (बन्नेसिंह) अंग्रेज-समर्थक थे व सेना भेजने का प्रयास किया, जबकि दीवान फैजुल्ला खां विद्रोहियों के समर्थक थे — क्रांतिकारियों ने 11 जुलाई 1857 ई. को अछनेरा में दमन का सामना किया
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12तांत्या टोपे का राजस्थान आगमन

यात्रा (Visit)मार्ग/घटनाक्रम (Route/Events)
प्रथम आगमनमांडलगढ़ (भीलवाड़ा) से प्रवेश → कुआड़ा का युद्ध (पराजय) → बूंदी की ओर प्रस्थान → नाथद्वारा-चित्तौड़गढ़-सिंगोली-बांसवाड़ा-झालावाड़ होते हुए झालावाड़ पर अधिकार किया; सीकर के रावराजा भैरूसिंह ने उन्हें शेखावाटी में प्रवेश से रोका; झालावाड़ के पृथ्वी सिंह को पराजित किया
द्वितीय आगमन (11 सितंबर)बांसवाड़ा में लक्ष्मणसिंह को पराजित किया → सलूंबर-भींडर-टोंक होते हुए नासिर मोहम्मद खां का समर्थन प्राप्त किया → 21 जनवरी को सीकर पहुंचे → मानसिंह नरूका (जागीरदार, नरवर) के विश्वासघात से पकड़े गए
"इतिहास में तांत्या टोपे को फांसी देना ब्रिटिश सरकार का अपराध समझा जाएगा, और आने वाली पीढ़ियां पूछेंगी कि इस सजा के लिए किसने स्वीकृति दी और किसने पुष्टि की।" — कैप्टन शॉवर्स

13प्रमुख क्रांतिकारी एवं वीरांगना सुधा कंवर

क्रांतिकारी (Revolutionary)संबंधित क्षेत्र/केंद्र (Region/Centre)
कुशालसिंहआऊवा (पाली)
पृथ्वीसिंहआऊवा (पाली)
लाला जयदयालकोटा
मेहराब खांकोटा
हीरा सिंहनीमच
डूंगजी-जवाहरजीसीकर
अमरचंद बांठियाबीकानेर
तांत्या टोपेसंपूर्ण राजस्थान
💡 सुधा कंवर — राजस्थान की एकमात्र प्रसिद्ध वीरांगना

लाडनूं-डीडवाना-कुचामन क्षेत्र की सुधा कंवर के विषय में उल्लेख मिलता है कि उन्होंने पुरुष वेश धारण कर अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध लड़ा और उन्हें क्षेत्र से खदेड़ने में सफलता पाई। इन्हें प्रायः राजस्थान की 1857 क्रांति की एकमात्र प्रसिद्ध महिला योद्धा के रूप में उल्लेखित किया जाता है — यह घटना दर्शाती है कि 1857 का यह संघर्ष केवल पुरुष-सैनिकों व सामंतों तक सीमित नहीं था, बल्कि सामान्य महिलाएं भी अपने साहस से इस संघर्ष का हिस्सा बनीं।

14साहित्य एवं संस्मरणों में 1857 की क्रांति

रचनाकार/रचना (Author/Work)विवरण (Description)
बांकीदास"आयो अंग्रेज मुलक रे ऊपर" रचना में 1857 की क्रांति का उल्लेख
सूर्यमल्ल मिश्रण"वीर सतसई" (288 दोहे) — क्रांतिकाल की वीर-भावना को समर्पित रचना
विष्णु भट्ट गोडसेमराठी ग्रंथ "माझा प्रवास" में 1857 की क्रांति का आंखों देखा वृत्तांत
सूबेदार सीताराम पांडेसंस्मरण "फ्रॉम सिपाही टू सूबेदार" — अंग्रेजी अनुवाद नॉरगेट द्वारा
नाथूराम खड़गावत"1857 के संघर्ष में राजस्थान की भूमिका" — राजस्थानी ग्रंथागार द्वारा प्रकाशित

15रियासतों की भूमिका — तुलनात्मक विश्लेषण

अंग्रेज-समर्थक शासक/रियासतें
  • उदयपुर (स्वरूप सिंह) — अंग्रेज शरणार्थियों को जगमंदिर महल में शरण
  • जयपुर (रामसिंह द्वितीय) — तन-मन-धन से सहायता, "सितार-ए-हिंद" उपाधि प्राप्त
  • बीकानेर (सरदार सिंह) — स्वयं सेना लेकर हिसार गए, 41 गांव पुरस्कार में मिले
  • जोधपुर, सिरोही, बूंदी, जैसलमेर, झालावाड़, प्रतापगढ़, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, करौली, टोंक (नवाब) — सभी अंग्रेज-समर्थक
जनता/सैनिक/सामंत जिन्होंने विद्रोह किया
  • आऊवा — ठाकुर कुशालसिंह चंपावत व पृथ्वीसिंह
  • कोटा — जयदयाल व मेहराब खां (जनता ने 6 माह जनशासन चलाया)
  • भरतपुर, टोंक, धौलपुर — शासक अंग्रेज-समर्थक होते हुए भी जनता व सैनिक विद्रोही रहे
  • अलवर — दीवान फैजुल्ला खां विद्रोहियों के समर्थक (महाराजा के विपरीत)
  • सीकर — डूंगजी-जवाहरजी, तांत्या टोपे का अंतिम केंद्र

16ब्रिटिश अधिकारियों की टिप्पणियां

अधिकारी (Officer)टिप्पणी (Comment)
लॉर्ड कैनिंगराजा-महाराजा इस तूफान के लिए "ब्रेकवाटर" (लहर-अवरोधक) का कार्य कर रहे थे
जॉन लॉरेंसयदि क्रांतिकारियों में नेतृत्व होता, तो हम (अंग्रेज) निश्चित रूप से हार जाते
कैप्टन प्रिचर्डइसे मात्र एक सैनिक-विद्रोह (Military Mutiny) बताया, जनांदोलन नहीं

17विद्रोह की असफलता के कारण एवं परिणाम

असफलता के मुख्य कारण

परिणाम एवं महत्व

बाद के घटनाक्रम — अजमेर दरबार (1870) एवं मेयो कॉलेज: 22 अक्टूबर 1870 ई. को वायसराय लॉर्ड मेयो ने अजमेर में राजाओं हेतु एक दरबार आयोजित किया, जिसमें 1857 में संदिग्ध भूमिका के कारण कोटा महाराव को आमंत्रित नहीं किया गया, तथा जोधपुर नरेश तख्तसिंह जयपुर-उदयपुर शासकों की कुर्सियां आगे लगी होने से नाराज होकर बिना शामिल हुए लौट गए — यह घटना दर्शाती है कि 1857 के बाद भी रियासतों के आपसी संबंध कितने संवेदनशील बने रहे। इसी कालखंड में राजाओं व सामंतों की शिक्षा हेतु रिचर्ड बर्क ने 1875 ई. में अजमेर में मेयो कॉलेज की स्थापना की, जिसके प्रथम विद्यार्थी अलवर के महाराजा मंगल सिंह थे।

★ अध्याय सार — महत्वपूर्ण तथ्य ★

1. राजस्थान में 1857 की क्रांति का प्रारंभ 28 मई 1857 को नसीराबाद छावनी (अजमेर) से हुआ तथा अंत सीकर में तांत्या टोपे की गिरफ्तारी के साथ हुआ। 2. क्रांति के प्रतीक कमल का फूल व रोटी थे; निर्धारित तिथि 31 मई 1857 थी परंतु वास्तविक प्रारंभ 10 मई 1857 को मेरठ से हुआ। 3. राजपूताना में कुल 6 सैन्य छावनियां थीं — नसीराबाद, नीमच, देवली, एरिनपुरा, ब्यावर व खेरवाड़ा — जिनमें से ब्यावर व खेरवाड़ा ने प्रत्यक्ष भाग नहीं लिया। 4. राजपूताना एजेंसी की स्थापना 1832 ई. में अजमेर में हुई; 1857 में ए.जी.जी. जॉर्ज पैट्रिक लॉरेंस थे। 5. नीमच विद्रोह (3 जून 1857) का नेतृत्व मोहम्मद अली बेग व हीरा सिंह ने किया; महाराणा स्वरूपसिंह ने भागे अंग्रेजों को जगमंदिर महल में शरण दी। 6. एरिनपुरा विद्रोह (21 अगस्त 1857) में जोधपुर लीजियन ने विद्रोह किया — बिथौड़ा (8 सितंबर) व चेलावास (18 सितंबर, "काला-गौरा") के युद्ध हुए, जिसमें जोधपुर एजेंट मैक मोसन मारा गया। 7. आऊवा (पाली) के ठाकुर कुशालसिंह चंपावत राजस्थान के 1857 विद्रोह के सबसे प्रतिष्ठित नायक माने जाते हैं — 24 जनवरी 1858 को अंग्रेजों ने आऊवा पर अधिकार किया, कुशालसिंह ने 1860 में आत्मसमर्पण किया। 8. कोटा में कोई सैन्य छावनी न होते हुए भी जयदयाल व मेहराब खां के नेतृत्व में जनविद्रोह हुआ — 15 अक्टूबर 1857 को मेजर बर्टन की हत्या, 22 मार्च 1858 को कोटा पर अंग्रेजों का पुनः अधिकार व दोनों नेताओं को फांसी। 9. धौलपुर (27 अक्टूबर 1857), टोंक व अलवर (11 जुलाई 1857, अछनेरा) में भी विद्रोह की घटनाएं हुईं। 10. तांत्या टोपे दो बार राजस्थान आए — मानसिंह नरूका के विश्वासघात से पकड़े गए, 18 अप्रैल 1859 को शिवपुरी में फांसी दी गई; सीकर में उनकी छतरी स्थित है। 11. सुधा कंवर (लाडनूं-डीडवाना-कुचामन) को राजस्थान की एकमात्र प्रसिद्ध महिला क्रांतिकारी माना जाता है, जिन्होंने पुरुष वेश में युद्ध लड़ा। 12. सूर्यमल्ल मिश्रण की "वीर सतसई" (288 दोहे) व बांकीदास की "आयो अंग्रेज मुलक रे ऊपर" 1857 पर आधारित प्रमुख राजस्थानी साहित्यिक रचनाएं हैं। 13. लॉर्ड कैनिंग ने राजपूत राजाओं को क्रांति के तूफान के लिए "ब्रेकवाटर" (लहर-अवरोधक) कहा था। 14. विद्रोह की असफलता के मुख्य कारण — शासकों की ब्रिटिश-निष्ठा, नेतृत्व व संसाधनों का अभाव तथा सुनियोजित रणनीति का न होना था। 15. यह विद्रोह सैन्य-विद्रोह से आगे बढ़कर जनांदोलन में परिवर्तित हुआ और आगे राष्ट्रीय आंदोलन की नींव बना।

नीचे दी समय-रेखा (Timeline) इस अध्याय के संपूर्ण घटनाक्रम को स्पष्ट करती है — रिवीजन के लिए इसे ज़रूर दोहराएं:

तिथि (Date)घटना/Eventमहत्व
10 मई 1857मेरठ से क्रांति का वास्तविक प्रारंभअखिल भारतीय विद्रोह की शुरुआत
28 मई 1857नसीराबाद छावनी विद्रोहराजस्थान में क्रांति का प्रारंभ
31 मई 1857भरतपुर में गुर्जर-मेव विद्रोहमॉरिसन आगरा भागे
3 जून 1857नीमच छावनी विद्रोहमोहम्मद अली बेग-हीरा सिंह नेतृत्व
5 जून 1857देवली छावनी पर विद्रोहियों का अधिकारमालवा-मेवाड़ मार्ग पर नियंत्रण
21 अगस्त 1857एरिनपुरा विद्रोहजोधपुर लीजियन का विद्रोह
8 सितंबर 1857बिथौड़ा का युद्धकुशालसिंह की प्रथम विजय
18 सितंबर 1857चेलावास का युद्ध ("काला-गौरा")मैक मोसन की हत्या
14-15 अक्टूबर 1857कोटा विद्रोह, मेजर बर्टन की हत्याराजस्थान का एकमात्र जन-नेतृत्व विद्रोह
27 अक्टूबर 1857धौलपुर विद्रोहजनता का 2 माह नियंत्रण
16 नवंबर 1857नारनौल में एरिनपुरा सैनिकों का आत्मसमर्पणएरिनपुरा विद्रोह का अंत
20-24 जनवरी 1858आऊवा पर अंग्रेजों का आक्रमण व अधिकारआऊवा विद्रोह का दमन
22 मार्च 1858कोटा पर अंग्रेजों का पुनः अधिकारजयदयाल-मेहराब खां को फांसी
18 अप्रैल 1859तांत्या टोपे को शिवपुरी में फांसीराजस्थान से जुड़े क्रांतिकारी का बलिदान
8 अगस्त 1860कुशालसिंह का आत्मसमर्पणआऊवा विद्रोह की अंतिम कड़ी
22 अक्टूबर 1870अजमेर दरबार (लॉर्ड मेयो)1857 की स्मृतियों का रियासती राजनीति पर प्रभाव
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