कल्पना कीजिए — मुगल सम्राट औरंगजेब की मृत्यु के बाद दिल्ली की सत्ता कमजोर पड़ चुकी है, और राजपूताना की रियासतें आपस में उत्तराधिकार-युद्धों में उलझी हुई हैं। ठीक इसी समय दक्षिण से एक नई शक्ति उभरती है — मराठा। पहले ये केवल छापामार दस्ते थे, परंतु धीरे-धीरे वे राजपूत रियासतों के आंतरिक झगड़ों में मध्यस्थ बनते गए, फिर "चौथ" जैसे भारी कर वसूलने वाले शासक बन बैठे, और अंततः पूरे राजपूताना को लूट व अस्थिरता के दलदल में धकेल दिया। यह अध्याय इसी 18वीं सदी के पतन-काल की कहानी है — कैसे मराठा हस्तक्षेप ने राजपूत रियासतों को आर्थिक व राजनीतिक रूप से कमजोर किया, और कैसे अंततः इसी अस्थिरता से बचने के लिए राजपूत शासकों को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की शरण में जाना पड़ा — जिसका परिणाम था 1817-18 की ऐतिहासिक अधीनस्थ संधियां, जिन्होंने राजपूताना को ब्रिटिश साम्राज्य का एक अधीनस्थ अंग बना दिया।
| कारण (Reason) | विवरण (Description) |
|---|---|
| मुगल सत्ता का पतन | औरंगजेब की मृत्यु (1707 ई.) के बाद मुगल सत्ता कमजोर पड़ी, जिससे उत्तर भारत में एक राजनीतिक शून्यता उत्पन्न हुई |
| पेशवा बाजीराव प्रथम की विस्तारवादी नीति | अटक से कटक तक मराठा प्रभुत्व स्थापित करने का लक्ष्य |
| राजपूत रियासतों की आंतरिक कमजोरी | निरंतर उत्तराधिकार-विवाद व एकता के अभाव ने राजपूताना को बाहरी हस्तक्षेप हेतु संवेदनशील बना दिया |
| चौथ एवं सरदेशमुखी की प्राप्ति | मराठाओं ने राजस्व-दोहन हेतु राजपूत राज्यों को लक्ष्य बनाया |
| स्वयं राजपूत शासकों द्वारा आमंत्रण | आंतरिक प्रतिद्वंद्विता में बूंदी, मारवाड़ व जयपुर जैसे राज्यों के शासकों ने स्वयं मराठा सैन्य सहायता मांगी |
| भौगोलिक महत्व | राजस्थान दिल्ली, पंजाब व महत्वपूर्ण व्यापार-मार्गों तक पहुंचने का रणनीतिक प्रवेशद्वार था |
1732 ई. में सवाई जयसिंह द्वितीय पुनः मालवा के गवर्नर नियुक्त हुए। 1733 ई. में मराठा सेनापतियों मल्हारराव होल्कर व रानोजी सिंधिया ने मंदसौर में जयसिंह को घेर लिया और उनकी रसद-आपूर्ति काट दी, जिससे विवश होकर जयसिंह को समझौता करना पड़ा — उन्होंने 6 लाख रुपये तथा 38 परगने "चौथ" स्वरूप मराठों को सौंपे। इस घटना के बाद मराठों ने मालवा पर अपना नियंत्रण पूर्णतः सुदृढ़ कर लिया — यहीं से राजस्थान में मराठा हस्तक्षेप की वास्तविक शुरुआत मानी जाती है।
मराठों के बढ़ते प्रभाव से चिंतित होकर राजपूत शासकों ने भीलवाड़ा के हुरडा नामक स्थान पर एक सम्मेलन आयोजित किया। दुर्भाग्यवश, यह सम्मेलन केवल एक कागजी समझौता बनकर रह गया — राजपूत शासक अपनी आपसी प्रतिद्वंद्विता के कारण इस संकल्प को व्यवहार में नहीं ला सके, और मराठा हस्तक्षेप निरंतर बढ़ता ही गया।
| रियासत (State) | सम्मिलित शासक (Participating Ruler) |
|---|---|
| मेवाड़ (अध्यक्षता) | महाराणा जगतसिंह द्वितीय |
| जयपुर (आयोजक) | सवाई जयसिंह द्वितीय |
| मारवाड़ | महाराजा अभयसिंह |
| नागौर | बख्तसिंह |
| बीकानेर | जोरावर सिंह |
| बूंदी | दलेल सिंह |
| कोटा | दुर्जनशाल |
| किशनगढ़ | राजसिंह |
| करौली | गोपाल पाल |
| युद्ध (Battle) | वर्ष (Year) | पक्ष (Parties) | परिणाम (Result) |
|---|---|---|---|
| राजमहल का युद्ध | 1 मार्च 1747 ई. | ईश्वरी सिंह बनाम माधो सिंह (होल्कर समर्थित) | ईश्वरी सिंह विजयी — दो लाख रुपये देकर मल्हारराव होल्कर का समर्थन प्राप्त किया; विजय-स्मारक स्वरूप जयपुर के त्रिपोलिया बाजार में सात मंजिला ईसरलाट (सरगासूली) बनवाई |
| बगरू का युद्ध | 1 अगस्त 1748 ई. | ईश्वरी सिंह बनाम माधो सिंह (पेशवा, होल्कर, बूंदी, मेवाड़, कोटा समर्थित) | मराठों व माधो सिंह की वास्तविक विजय — ईश्वरी सिंह ने 5 परगने (टोंक, टोडा, मालपुरा, निवाई, राजमहल) माधो सिंह को दिए तथा युद्ध-हर्जाना चुकाया |
| कालेआम हत्याकांड | 10 जनवरी 1751 ई. | जयपुर की जनता बनाम मराठा दल | जयपुर की जनता ने नगर के द्वार बंद कर मंदिर-दर्शन हेतु आए मराठों को मार डाला — जनाक्रोश का प्रतीक |
A. मारवाड़ — राम सिंह बनाम विजय सिंह/बख्त सिंह
| वर्ष (Year) | घटना (Event) |
|---|---|
| 13 जुलाई 1749 ई. | राम सिंह मारवाड़ के शासक घोषित |
| 27 नवंबर 1750 ई. | लूणियावास के युद्ध में बख्त सिंह ने राम सिंह को हराकर गद्दी हथियाई |
| 1752 ई. | बख्त सिंह की मृत्यु; पुत्र विजय सिंह उत्तराधिकारी बने |
| 1753 ई. | राम सिंह ने जयपुर के माधो सिंह की सहायता से मराठों को बुलाया; मराठों ने विजय सिंह पर आक्रमण कर राम सिंह को पुनः स्थापित किया |
| 1755 ई. | मराठा अधिकारी जयप्पा सिंधिया की स्थानीय जनरोष में हत्या |
| 1755 ई. के बाद | मराठों ने पाला बदला — विजय सिंह का समर्थन किया; मल्हारराव होल्कर की सहायता से विजय सिंह ने संघर्ष समाप्त किया |
| 1772 ई. | राम सिंह की निर्वासन में मृत्यु |
B. मेवाड़ — चौथ वसूली की शुरुआत
| युद्ध (Battle) | वर्ष (Year) | पक्ष (Parties) | परिणाम (Result) |
|---|---|---|---|
| भटवाड़ा का युद्ध | नवंबर 1761 ई. | माधो सिंह प्रथम बनाम कोटा के शत्रुशाल (झाला जालिम सिंह के नेतृत्व में) | कारण — रणथंभौर दुर्ग विवाद; शत्रुशाल की विजय |
| मावंडा/मौड़ा-मांडोली का युद्ध | 1767 ई. | माधो सिंह व अलवर के प्रताप सिंह बनाम भरतपुर के जवाहर सिंह (जाट) | जवाहर सिंह विजयी |
| कामां का युद्ध | 1768 ई. | माधो सिंह बनाम जवाहर सिंह (भरतपुर) | जवाहर सिंह विजयी |
| टूंगा का युद्ध | 28 जुलाई 1787 ई. | सवाई प्रताप सिंह (राठौड़-कछवाहा संधि, विजय सिंह मारवाड़ समर्थित) बनाम महादजी सिंधिया | अनिर्णायक, परंतु मराठा सेना पीछे हटने को विवश हुई — बिस्सावा के ठाकुर सूरजमल शेखावत ने इस युद्ध में वीरगति पाई |
| पाटन का युद्ध | 20 जून 1790 ई. | प्रताप सिंह, विजय सिंह (मारवाड़) व अफगान नेता इस्माइल बेग बनाम मराठा (महादजी सिंधिया, नेतृत्व — डी बोइन एवं लकवा दादा) | मराठा विजय — अजमेर पर नियंत्रण स्थापित; अजमेर से भारी युद्ध-क्षतिपूर्ति वसूली गई |
| मालपुरा का युद्ध | 16 अप्रैल 1800 ई. | प्रताप सिंह व भीम सिंह राठौड़ (मारवाड़) बनाम मराठा | मराठा विजय — जयपुर को संधि हेतु विवश किया गया |
"यदि मैं जीवित रहा, तो जयपुर को धूल में मिला दूंगा।" — महादजी सिंधिया (टूंगा युद्ध के पश्चात)
मेवाड़ के महाराणा भीम सिंह की पुत्री कृष्णा कुमारी अत्यंत सुंदर व गुणवान थीं — इतनी कि उनके विवाह हेतु दो शक्तिशाली रियासतों, जोधपुर के महाराजा मानसिंह व जयपुर के महाराजा जगतसिंह द्वितीय, दोनों ने प्रस्ताव भेजा। मेवाड़ दोनों में से किसी एक को नाराज करने का जोखिम नहीं उठा सकता था। परिणामस्वरूप मार्च 1807 ई. में परबतसर (नागौर) के निकट गिंगोली नामक स्थान पर दोनों रियासतों के बीच भीषण युद्ध हुआ, जिसमें जयसिंह द्वितीय (जयपुर) विजयी रहे। परंतु समस्या का "समाधान" जितना दुखद था उतना ही चौंकाने वाला भी — पिंडारी सरदार अमीर खां व मेवाड़ के सामंत अजीत सिंह चूंडावत की सलाह पर स्वयं कृष्णा कुमारी को विष देकर मार दिया गया, ताकि भविष्य में इस विवाद की कोई गुंजाइश ही न रहे। यह घटना दर्शाती है कि मराठा व पिंडारी हस्तक्षेप के दौर में राजपूत रियासतों की राजनीति कितनी क्रूर व निर्मम हो चुकी थी।
निष्कर्ष: शिवाजी के नेतृत्व में उभरे मराठा साम्राज्य ने औरंगजेब की मृत्यु के बाद उत्पन्न मुगल-शून्यता का लाभ उठाकर उत्तर भारत में विस्तार किया। प्रारंभ में मध्यस्थ की भूमिका निभाने वाले मराठा धीरे-धीरे कर-वसूलने वाले शोषक शासक बन गए। 1803 से 1823 ई. के मध्य जयपुर, जोधपुर व मेवाड़ सहित लगभग सभी राजपूत रियासतों ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से सहायक संधियां कीं — यही राजस्थान में मराठा प्रभाव के अंत तथा ब्रिटिश युग के प्रारंभ का प्रतीक बना।
| गवर्नर-जनरल (Governor-General) | नीति (Policy) | विवरण (Description) |
|---|---|---|
| वारेन हेस्टिंग्स (1772-1785 ई.) | रिंग फेंस नीति (Policy of Ring Fence) | ब्रिटिश क्षेत्रों को प्रमुख शत्रुओं (विशेषकर मराठों) से बचाने हेतु पड़ोसी राज्यों से मैत्री-संधि कर बफर राज्य बनाना |
| लॉर्ड कार्नवालिस (1786-1793 ई.) | अहस्तक्षेप नीति (Policy of Non-intervention) | भारतीय शासकों के आंतरिक मामलों में ब्रिटिश हस्तक्षेप न करने की नीति |
| लॉर्ड वेलेजली (1798-1805 ई.) | सहायक संधि प्रणाली (Subsidiary Alliance System) | राज्य की आंतरिक सुरक्षा व विदेश-नीति ब्रिटिश नियंत्रण में; संपूर्ण व्यय राज्य वहन करेगा; ब्रिटिश रेजिडेंट नियुक्त; राज्य के खर्च पर सेना बनाए रखी जाएगी — भारत में प्रथम संधि 1798 ई. में हैदराबाद के निज़ाम से हुई |
| रियासत (State) | संधि तिथि (Treaty Date) | शर्तें/विशेष बातें (Conditions/Special Points) |
|---|---|---|
| भरतपुर | 29 सितंबर 1803 ई. (रणजीत सिंह-वेलेजली) | अंग्रेज संरक्षण प्रदान करेंगे, कोई खिराज नहीं लिया जाएगा; 1804 ई. में रणजीत सिंह ने होल्कर को शरण दी — 5 माह की घेराबंदी असफल रही; अप्रैल 1805 ई. में नई संधि — पूर्व स्थिति बहाल, कुछ परगने अलवर को दिए गए, डीग क्षेत्र लौटाया गया (विस्तार अध्याय 10) |
| अलवर | 14 नवंबर 1803 ई. (महाराजा बख्तावर सिंह) | अलवर की स्वतंत्र स्थिति मान्य, आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं, कोई कर नहीं लिया जाएगा, अलवर सेना अंग्रेजों की सहायता हेतु उपलब्ध रहेगी; अलवर ने 1803 के लसवाड़ी युद्ध में अंग्रेजों की सहायता की — राजस्थान की प्रथम विस्तृत आक्रामक-रक्षात्मक संधि |
| जयपुर | 12 दिसंबर 1803 ई. (महाराजा जगतसिंह द्वितीय) | अलवर के समान शर्तें; जनरल बार्लो ने 1805 ई. में यह संधि रद्द कर दी |
| जोधपुर | 22 दिसंबर 1803 ई. (महाराजा मानसिंह) | पारस्परिक मैत्री, कोई खिराज नहीं, फ्रांसीसी अधिकारी न रखने की शर्त; 15 जनवरी 1804 ई. को पुष्टि; मानसिंह ने नई संधि का प्रस्ताव रखा जिसे अंग्रेजों ने अस्वीकार किया — 1804 ई. में संधि रद्द हुई |
| रियासत (State) | तिथि (Date) | शासक/प्रतिनिधि (Ruler/Representative) | विशेष तथ्य (Special Facts) |
|---|---|---|---|
| करौली | 9 नवंबर 1817 ई. | महाराजा हरबख्श पाल सिंह | राजस्थान की प्रथम रियासत जिसने अधीनस्थ पृथक्करण नीति स्वीकार की |
| टोंक | 17 नवंबर 1817 ई. | नवाब अमीर खां पिंडारी | टोंक व रामपुरा स्वतंत्र रियासतें बनीं; अमीर खां को नवाब मान्यता; लूटपाट पर प्रतिबंध (विस्तार अध्याय 10) |
| कोटा | 26 दिसंबर 1817 ई. | महाराव उम्मेद सिंह प्रथम; दीवान झाला जालिम सिंह की सक्रिय भूमिका | गवर्नर-जनरल के विशेष प्रतिनिधि — चार्ल्स मेटकाफ; अन्य प्रतिनिधि — शिवदान सिंह, सेठ जीवनराम, लाला हुकुमचंद |
| जोधपुर | 6 जनवरी 1818 ई. | महाराजा मानसिंह | प्रतिनिधि — आसोपा बिशनराम, व्यास अभयराम; ब्रिटिश पक्ष से चार्ल्स मेटकाफ |
| मेवाड़ (उदयपुर) | 23 जनवरी 1818 ई. | महाराणा भीम सिंह | प्रतिनिधि — ठाकुर अजीत सिंह (आसींद); उदयपुर को अपनी आय का 25% खिराज देना पड़ा, जो बाद में 3/8 निश्चित किया गया |
| बूंदी | 10 फरवरी 1818 ई. | महाराव विष्णु सिंह | वार्षिक 80,000 रुपये खिराज देना स्वीकार किया |
| बीकानेर | 21 मार्च 1818 ई. | महाराजा सूरत सिंह | प्रतिनिधि — ओझा काशीनाथ, चार्ल्स मेटकाफ; लॉर्ड हेस्टिंग्स द्वारा पातरसा घाट (घग्घर नदी) पर पुष्टि |
| किशनगढ़ | 7 अप्रैल 1818 ई. | महाराजा कल्याण सिंह | खिराज से मुक्त — क्योंकि यह पूर्व में मराठों को चौथ नहीं देता था |
| जयपुर | 2 अप्रैल 1818 ई. | महाराजा जगतसिंह द्वितीय | प्रतिनिधि — चार्ल्स मेटकाफ व ठाकुर रावल बरीसाल नाथावत; 15 अप्रैल 1818 ई. को स्वीकृत |
| प्रतापगढ़ | 5 अक्टूबर 1818 ई. | महारावल सामंत सिंह | — |
| डूंगरपुर | 11 दिसंबर 1818 ई. | महारावल जसवंत सिंह द्वितीय | — |
| जैसलमेर | 12 दिसंबर 1818 ई. | महारावल मूलराज द्वितीय | अंग्रेजों को खिराज या शुल्क देने का कोई प्रावधान नहीं (विस्तार अध्याय 10) |
| बांसवाड़ा | 25 दिसंबर 1818 ई. | महारावल उम्मेद सिंह | — |
| सिरोही | 11 सितंबर 1823 ई. | महाराजा शिव सिंह | सबसे अंतिम हस्ताक्षरित संधि — जोधपुर राज्य के भू-क्षेत्रीय दावों के कारण विलंब हुआ |
महत्व: अजमेर का ब्रिटिश अधिग्रहण व राजपूताना एजेंसी की स्थापना राजस्थान में ब्रिटिश प्रशासनिक नियंत्रण की स्थायी नींव साबित हुई — यहीं से प्रत्येक रियासत में नियुक्त "राजनीतिक अभिकर्ता" (Political Agent) राजपूताना एजेंसी के अधीन कार्य करने लगे, जिनकी भूमिका आगे 1857 की क्रांति के समय अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुई (विस्तार देखें: अध्याय 13)।
1. राजस्थान में मराठा चौथ-वसूली का प्रथम उदाहरण महाराणा संग्राम सिंह द्वितीय (मेवाड़) के काल में मिलता है। 2. मंदसौर के युद्ध (1733 ई.) में सवाई जयसिंह द्वितीय की पराजय के बाद मालवा पूर्णतः मराठा नियंत्रण में आया — यहीं से राजस्थान में मराठा हस्तक्षेप की वास्तविक शुरुआत मानी जाती है। 3. 22 अप्रैल 1734 ई. की बूंदी उत्तराधिकार घटना राजस्थान की राजनीति में मराठों का प्रथम प्रत्यक्ष हस्तक्षेप मानी जाती है। 4. हुरडा सम्मेलन (17 जुलाई 1734, भीलवाड़ा) — अध्यक्षता महाराणा जगतसिंह द्वितीय, आयोजन सवाई जयसिंह द्वितीय — मराठा-विरोध हेतु राजपूत एकता का प्रयास था, जो व्यवहार में असफल रहा। 5. जयपुर में ईश्वरी सिंह-माधो सिंह उत्तराधिकार-युद्ध (राजमहल 1747, बगरू 1748) में मराठों ने निर्णायक भूमिका निभाई — ईश्वरी सिंह ने अंततः 1750 ई. में आत्महत्या कर ली। 6. मारवाड़ में राम सिंह बनाम विजय सिंह विवाद में 1755 ई. में जयप्पा सिंधिया की हत्या हुई, जिसके बाद मराठों ने पाला बदला। 7. सवाई प्रताप सिंह (जयपुर) के काल में टूंगा (1787), पाटन (1790) व मालपुरा (1800) के युद्ध हुए — पाटन युद्ध के बाद अजमेर मराठा नियंत्रण में चला गया। 8. मेवाड़ की राजकुमारी कृष्णा कुमारी के विवाह-विवाद में गिंगोली का युद्ध (मार्च 1807, परबतसर) हुआ, जिसके बाद अमीर खां पिंडारी व अजीत सिंह चूंडावत की सलाह पर कृष्णा कुमारी को विष देकर मार डाला गया। 9. कोटा के दीवान झाला जालिम सिंह ने मराठा-कोटा संबंधों में केंद्रीय भूमिका निभाई और आगे चलकर ब्रिटिश-मैत्री की नीति अपनाई। 10. ब्रिटिश प्रारंभिक नीतियां — वारेन हेस्टिंग्स की "रिंग फेंस नीति", कार्नवालिस की "अहस्तक्षेप नीति" तथा वेलेजली की "सहायक संधि प्रणाली" (भारत में प्रथम प्रयोग 1798, हैदराबाद निज़ाम)। 11. 30 दिसंबर 1803 ई. की सुर्जी-अंजनगांव संधि (सिंधिया-अंग्रेज) ने जयपुर-जोधपुर को ब्रिटिश प्रभाव में ला दिया। 12. 1803-05 की प्रारंभिक संधियां — भरतपुर (29 सितंबर 1803), अलवर (14 नवंबर 1803, राजस्थान की प्रथम विस्तृत संधि), जयपुर (12 दिसंबर 1803, बाद में रद्द), जोधपुर (22 दिसंबर 1803, बाद में रद्द)। 13. करौली राजस्थान की प्रथम रियासत थी जिसने 9 नवंबर 1817 ई. को अधीनस्थ पृथक्करण नीति स्वीकार की। 14. सिरोही (11 सितंबर 1823) सबसे अंतिम रियासत थी जिसने ब्रिटिश संधि पर हस्ताक्षर किए — जोधपुर के भू-क्षेत्रीय दावों के कारण विलंब हुआ। 15. मेवाड़ को अपनी आय का 25% खिराज देना पड़ा (बाद में 3/8 निश्चित), जबकि किशनगढ़ व जैसलमेर खिराज से मुक्त थे। 16. 25 जून 1818 ई. को दौलतराव सिंधिया ने अजमेर अंग्रेजों को सौंपा; 1832 ई. में लॉर्ड विलियम बैंटिक ने अजमेर में राजपूताना एजेंसी स्थापित की।
नीचे दी समय-रेखा (Timeline) इस अध्याय के संपूर्ण घटनाक्रम को स्पष्ट करती है — रिवीजन के लिए इसे ज़रूर दोहराएं:
| वर्ष (Year) | घटना/Event | महत्व |
|---|---|---|
| 1707 ई. | औरंगजेब की मृत्यु | मुगल सत्ता के पतन व राजनीतिक शून्यता का प्रारंभ |
| 1711 ई. | मराठों का मेवाड़ में प्रथम प्रवेश | राजस्थान में मराठा हस्तक्षेप की शुरुआत |
| 1726-1728 ई. | मेवाड़, डूंगरपुर, बांसवाड़ा से चौथ वसूली | मराठा आर्थिक शोषण का प्रारंभ |
| 1733 ई. | मंदसौर का युद्ध | मालवा पर मराठा नियंत्रण स्थापित |
| 22 अप्रैल 1734 ई. | बूंदी में मराठा हस्तक्षेप | राजस्थान में प्रथम प्रत्यक्ष मराठा राजनीतिक हस्तक्षेप |
| 17 जुलाई 1734 ई. | हुरडा सम्मेलन (भीलवाड़ा) | राजपूत एकता का असफल प्रयास |
| 1747-1751 ई. | जयपुर उत्तराधिकार-युद्ध (राजमहल, बगरू, कालेआम) | मराठा हस्तक्षेप की पराकाष्ठा, ईश्वरी सिंह की आत्महत्या |
| 1755 ई. | जयप्पा सिंधिया की हत्या (मारवाड़) | मराठा नीति में परिवर्तन का कारण |
| 1787-1800 ई. | टूंगा, पाटन, मालपुरा के युद्ध (जयपुर-मराठा) | अजमेर पर मराठा नियंत्रण, जयपुर की आर्थिक क्षति |
| मार्च 1807 ई. | गिंगोली का युद्ध व कृष्णा कुमारी का विषपान | मेवाड़-जोधपुर-जयपुर त्रिकोणीय संघर्ष की पराकाष्ठा |
| 30 दिसंबर 1803 ई. | सुर्जी-अंजनगांव संधि (सिंधिया-अंग्रेज) | जयपुर-जोधपुर पर ब्रिटिश प्रभाव का मार्ग प्रशस्त |
| 1803-1805 ई. | भरतपुर, अलवर, जयपुर, जोधपुर की प्रारंभिक संधियां | सहायक संधि प्रणाली का प्रारंभिक प्रयोग |
| 9 नवंबर 1817 ई. | करौली-ब्रिटिश संधि | राजस्थान की प्रथम अधीनस्थ पृथक्करण संधि |
| 1817-1818 ई. | अधिकांश राजपूत रियासतों की ब्रिटिश संधियां | राजपूताना का ब्रिटिश अधीनस्थ तंत्र में समावेश |
| 25 जून 1818 ई. | दौलतराव सिंधिया द्वारा अजमेर अंग्रेजों को सौंपा गया | मराठा प्रभाव के अंत व ब्रिटिश केंद्र की स्थापना |
| 11 सितंबर 1823 ई. | सिरोही-ब्रिटिश संधि | राजपूताना की अंतिम रियासती संधि |
| 1832 ई. | राजपूताना एजेंसी की स्थापना (अजमेर) | राजस्थान में स्थायी ब्रिटिश प्रशासनिक ढांचे का प्रारंभ (विस्तार अध्याय 13) |