राजस्थान इतिहास · अध्याय 12/16

मराठा हस्तक्षेप एवं ब्रिटिश संधियाँ

Maratha Intervention & British Treaties · RAS Prelims + Mains
अपडेटेड स्रोत PDF: पृष्ठ 161–177

18वीं सदी का पतन — मराठा हस्तक्षेप, सहायक संधि प्रणाली एवं 1817-18 की अधीनस्थ संधियां

कल्पना कीजिए — मुगल सम्राट औरंगजेब की मृत्यु के बाद दिल्ली की सत्ता कमजोर पड़ चुकी है, और राजपूताना की रियासतें आपस में उत्तराधिकार-युद्धों में उलझी हुई हैं। ठीक इसी समय दक्षिण से एक नई शक्ति उभरती है — मराठा। पहले ये केवल छापामार दस्ते थे, परंतु धीरे-धीरे वे राजपूत रियासतों के आंतरिक झगड़ों में मध्यस्थ बनते गए, फिर "चौथ" जैसे भारी कर वसूलने वाले शासक बन बैठे , और अंततः पूरे राजपूताना को लूट व अस्थिरता के दलदल में धके ल दिया। यह अध्याय इसी 18वीं सदी के पतन-काल की कहानी है — कैसे मराठा हस्तक्षेप ने राजपूत रियासतों को आर्थिक व राजनीतिक रूप से कमजोर किया, और कैसे अंततः इसी अस्थिरता से बचने के लिए राजपूत शासकों को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कं पनी की शरण में जाना पड़ा — जिसका परिणाम था 1817-18 की ऐतिहासिक अधीनस्थ संधियां, जिन्होंने राजपूताना को ब्रिटिश साम्राज्य का एक अधीनस्थ अंग बना दिया।

2. मराठाओं के राजस्थान आगमन के कारण एवं प्रारंभिक संपर्क

कारण (Reason) विवरण (Description)

मुगल सत्ता का पतन औरंगजेब की मृत्यु (1707 ई.) के बाद मुगल सत्ता कमजोर पड़ी, जिससे उत्तर भारत में एक राजनीतिक शून्यता उत्पन्न हुई

पेशवा बाजीराव प्रथम की विस्तारवादी अटक से कटक तक मराठा प्रभुत्व स्थापित करने का लक्ष्य नीति

राजपूत रियासतों की आंतरिक कमजोरी निरंतर उत्तराधिकार-विवाद व एकता के अभाव ने राजपूताना को बाहरी हस्तक्षेप हेतु संवेदनशील बना दिया

चौथ एवं सरदेशमुखी की प्राप्ति मराठाओं ने राजस्व-दोहन हेतु राजपूत राज्यों को लक्ष्य बनाया

स्वयं राजपूत शासकों द्वारा आमंत्रण आंतरिक प्रतिद्वंद्विता में बूंदी, मारवाड़ व जयपुर जैसे राज्यों के शासकों ने स्वयं मराठा सैन्य सहायता मांगी

भौगोलिक महत्व राजस्थान दिल्ली, पंजाब व महत्वपूर्ण व्यापार-मार्गों तक पहुंचने का रणनीतिक प्रवेशद्वार था

◆ औरंगजेब की मृत्यु (1707 ई.) के बाद मुगल साम्राज्य के पतन के साथ पेशवाओं के नेतृत्व में मराठे शक्ति बढ़ा रहे थे। गुजरात और मालवा पर उनका प्रभाव जम चुका था, पर राजपूताना में प्रवेश का रास्ता उन्हें यहाँ की आपसी गृह-कलह से मिला। राजस्थान में गृह-कलह के तीन मुख्य केंद्र थे — बूंदी, जयपुर और जोधपुर।

◆ राजपूतों का मराठों से प्रथम परिचय तब हुआ जब औरंगजेब ने जोधपुर के जसवंत सिंह व आमेर के जयसिंह को दक्कन में शिवाजी के दमन हेतु भेजा। यद्यपि यह प्रयास असफल रहा, परंतु राजपूत शासकों ने शिवाजी की स्वतंत्रता-भावना, हिंदू संस्कृति की रक्षा हेतु उनके प्रयासों तथा औरंगजेब के विरुद्ध उनकी दृढ़ता की प्रशंसा की। यह संपर्क तब तक दक्कन तक सीमित रहा, जब तक पेशवा बाजीराव प्रथम ने आक्रामक उत्तर-विस्तार अभियान प्रारंभ नहीं किया। ◆ जयपुर के सवाई जयसिंह द्वितीय ने मालवा में मराठा अभियान का गुप्त समर्थन किया, ताकि मालवा में मुगल नियंत्रण कमजोर हो और उनका अपना प्रभाव बढ़े — इसी नीति ने आगे चलकर मराठों को राजस्थान में प्रवेश का मार्ग प्रशस्त किया।

3. मालवा पर मराठा नियंत्रण — मंदसौर का युद्ध (1733) ◆ 1720 ई. में पेशवा बाजीराव ने मालवा व गुजरात की ओर व्यवस्थित उत्तर-विस्तार रणनीति अपनाई। सवाई जयसिंह द्वितीय, जो मालवा के सूबेदार नियुक्त हुए थे, ने प्रारंभ में प्रतिरोध किया, परंतु मराठों को रोक न सके — धीरे-धीरे मालवा मराठा नियंत्रण में आ गया। ◆ 1726 ई. में बाजी भीम ने मेवाड़ पर छापा मारकर "चौथ" वसूला; 1728 ई. में बाजीराव ने डूंगरपुर व बांसवाड़ा के शासकों को खिराज देने पर विवश किया। मराठा सेनाएं मुकुं दरा दर्रे तथा गुजरात से ईडर-जालौर मार्ग से राजस्थान में प्रवेश करती थीं।

4. बूंदी में मराठा हस्तक्षेप एवं हुरडा सम्मेलन (1734)

◆ मराठाओं ने मालवा को राजपूताना में छापों का आधार-शिविर बनाया। सवाई जयसिंह ने बूंदी के बुधसिंह को अपदस्थ कर अपने दामाद दलेल सिंह को बूंदी की गद्दी पर बिठाया। बुधसिंह ने मराठा सहायता मांगी और मल्हारराव होल्कर ने उन्हें पुनः स्थापित किया — परंतु जयसिंह ने पुनः बुधसिंह को हटाकर दलेल सिंह को बहाल किया। बुधसिंह की मृत्यु के बाद उनकी विधवा ने पुनः होल्कर से सहायता मांगी, जिन्होंने जयपुर की सेना को हराकर उम्मेद सिंह को बूंदी का शासक बनाया — बदले में सेवा- शुल्क स्वरूप होल्कर को पाटन पर नियंत्रण मिला। 22 अप्रैल 1734 ई. की यह घटना राजस्थान की राजनीति में मराठों का प्रथम प्रत्यक्ष हस्तक्षेप मानी जाती है। ◆ बूंदी-प्रसंग का विस्तृत घटनाक्रम: बूंदी का राजा बुद्धसिंह सवाई जयसिंह का बहनोई था। 1727 ई. तक दोनों के संबंध अच्छे रहे, फिर बुद्धसिंह अपनी चूंडावत रानी के कहने पर चलने लगा, जयसिंह की बहन (कछवाही रानी) से घृणा करने लगा और उससे उत्पन्न पुत्र भवानीसिंह को अपना पुत्र मानने से इनकार कर दिया। क्रोधित जयसिंह ने बुद्धसिंह की अनुपस्थिति में बूंदी पर अधिकार कर 1730 ई. में करवड़ के जागीरदार हाड़ा सालिमसिंह के दूसरे पुत्र दलेलसिंह को गद्दी पर बैठाया, 1732 ई. में अपनी पुत्री कृ ष्णाकु मारी का विवाह दलेलसिंह से किया और रास्ता साफ़ करने के लिए भवानीसिंह की हत्या भी करवा दी। ◆ इससे कछवाही रानी जयसिंह की विरोधी बन गई और उसने मराठों से मदद माँगी। 18 अप्रैल 1734 को मल्हारराव होल्कर और राणोजी सिंधिया के नेतृत्व में मराठा सेना ने बूंदी पर चढ़ाई की और चार दिन के संघर्ष के बाद 22 अप्रैल को बूंदी पर अधिकार कर लिया; बुद्धसिंह के पुत्र उम्मेदसिंह का शासन स्थापित हुआ (उस समय बुद्धसिंह अफ़ीम-शराब में डूबा रहता था)। कृ तज्ञता जताने के लिए कछवाही रानी ने होल्कर को राखी बाँधकर भाई बनाया। उम्मेदसिंह छोटा होने से शासन-कार्य दलेलसिंह के बड़े भाई प्रतापसिंह को सौंपा गया। राजपूत शासकों के आंतरिक झगड़े में मराठों का यह पहला हस्तक्षेप था।

रियासत (State) सम्मिलित शासक (Participating Ruler)

मेवाड़ (अध्यक्षता) महाराणा जगतसिंह द्वितीय

जयपुर (आयोजक) सवाई जयसिंह द्वितीय

मारवाड़ महाराजा अभयसिंह

नागौर बख्तसिंह

बीकानेर जोरावर सिंह

बूंदी दलेल सिंह

कोटा दुर्जनशाल

किशनगढ़ राजसिंह

करौली गोपाल पाल

◆ सम्मेलन का उद्देश्य था — मराठों के बढ़ते प्रभाव को रोकना, उन्हें राजस्थान में हस्तक्षेप का अवसर न देना तथा राजपूतों के बीच एकता बनाए रखना। परंतु आपसी प्रतिद्वंद्विता के कारण यह संकल्प व्यवहार में लागू नहीं हो सका।

◆ हुरड़ा सम्मेलन 16 जुलाई 1734 को शुरू हुआ और 17 जुलाई को सभी शासकों ने समझौते पर हस्ताक्षर किए। शर्तें: (1) सभी शासक एकता बनाए रखेंगे और एक का अपमान सबका अपमान माना जाएगा; (2) कोई राज्य दूसरे राज्य के विद्रोही को शरण नहीं देगा; (3) मराठों के विरुद्ध वर्षा ऋतु के बाद कार्यवाही शुरू होगी, जिसके लिए सभी शासक अपनी सेनाओं के साथ रामपुरा में एकत्र होंगे; (4) कोई शासक स्वयं न आ सके तो अपने पुत्र या भाई को भेजेगा। पर हर शासक के अपने स्वार्थ होने से एकता असंभव थी और सम्मेलन असफल रहा।

5. जयपुर में मराठा हस्तक्षेप — ईश्वरी सिंह बनाम माधो सिंह उत्तराधिकार-युद्ध ◆ 21 सितंबर 1743 ई. को सवाई जयसिंह द्वितीय की मृत्यु के बाद उनके पुत्रों ईश्वरी सिंह व माधो सिंह के बीच उत्तराधिकार- युद्ध छिड़ गया (कारण — देबारी समझौता, विस्तार देखें अध्याय 6)। मेवाड़ के महाराणा जगतसिंह द्वितीय व कोटा के दुर्जनशाल ने माधो सिंह का समर्थन किया, जबकि मुगल बादशाह अहमदशाह व रानोजी सिंधिया ने ईश्वरी सिंह का साथ दिया।

युद्ध (Battle) वर्ष (Year) पक्ष (Parties) परिणाम (Result)

राजमहल का युद्ध 1 मार्च 1747 ई. ईश्वरी सिंह बनाम माधो ईश्वरी सिंह विजयी — दो लाख रुपये देकर मल्हारराव होल्कर का सिंह (होल्कर समर्थित) समर्थन प्राप्त किया; विजय-स्मारक स्वरूप जयपुर के त्रिपोलिया बाजार में सात मंजिला ईसरलाट (सरगासूली) बनवाई

बगरू का युद्ध        1 अगस्त 1748 ई.       ईश्वरी सिंह बनाम माधो       मराठों व माधो सिंह की वास्तविक विजय — ईश्वरी सिंह ने 5 परगने
                                           सिंह (पेशवा, होल्कर,        (टोंक, टोडा, मालपुरा, निवाई, राजमहल) माधो सिंह को दिए तथा युद्ध-
                                           बूंदी,     मेवाड़,   कोटा   हर्जाना चुकाया
                                           समर्थित)
कालेआम               10 जनवरी 1751         जयपुर की जनता बनाम          जयपुर की जनता ने नगर के द्वार बंद कर मंदिर-दर्शन हेतु आए मराठों को
हत्याकांड            ई.                    मराठा दल                    मार डाला — जनाक्रोश का प्रतीक

◆ मराठों की निरंतर बढ़ती वित्तीय मांगों से क्षुब्ध होकर तथा मल्हारराव होल्कर के जयपुर पहुंचने पर 13 दिसंबर 1750 ई. को ईश्वरी सिंह ने ईसरलाट से कू दकर आत्महत्या कर ली। इसके बाद होल्कर ने माधो सिंह प्रथम को जयपुर का शासक नियुक्त किया — यह घटना दर्शाती है कि मराठा हस्तक्षेप किस हद तक राजपूत शासकों के जीवन-मरण तक को प्रभावित करने लगा था। ◆ उत्तराधिकार-विवाद की जड़: 1708 ई. में सवाई जयसिंह ने मेवाड़ के महाराणा अमरसिंह द्वितीय की पुत्री चंद्रकुं वर बाई से विवाह करते समय एक इकरारनामे पर हस्ताक्षर किए थे कि मेवाड़ी राजकु मारी का पुत्र ही — चाहे छोटा हो — जयपुर की गद्दी पर बैठे गा। खींची रानी सूरजकुं वर से ईश्वरीसिंह (1722) और चंद्रकुं वर से माधोसिंह (1728) का जन्म हुआ, इसलिए संघर्ष तय था। ◆ माधोसिंह ने मल्हारराव होल्कर को 20 लाख रुपये के आश्वासन पर अपने पक्ष में किया, जबकि ईश्वरीसिंह ने राणोजी सिंधिया की मदद ली। फरवरी 1745 में माधोसिंह का जयपुर पर आक्रमण विफल रहा; फिर उसने कालपी में प्रतिनिधि भेजकर दो लाख रुपये के वचन पर होल्कर से मदद ली, जिसने अपने पुत्र खांडेराव को एक हज़ार सवारों के साथ भेजा। राजमहल युद्ध तक पेशवा का झुकाव ईश्वरीसिंह की ओर था, पर मेवाड़ के महाराणा जगतसिंह द्वारा अधिक धन के लालच पर ऋण-ग्रस्त पेशवा ने माधोसिंह का पक्ष ले लिया। बगरू युद्ध में जाट शासक सूरजमल ने ईश्वरीसिंह की ओर से लड़ते हुए बड़ा साहस दिखाया; हार के बाद ईश्वरीसिंह को माधोसिंह को परगने देने, उम्मेदसिंह को बूंदी लौटाने और मराठों को भारी धनराशि देने का वादा करना पड़ा।

◆ 10 जनवरी 1751 को लगभग चार हज़ार मराठे नए बने जयपुर नगर के मंदिर-बाज़ार देखने आए थे; दोपहर में माधोसिंह ने नगर के द्वार बंद करवा दिए और राजपूत सैनिकों व नागरिकों ने मराठों का कत्लेआम कर दिया। यहीं से राजपूत-मराठा संघर्ष की एक नई उलझन शुरू हुई, जो दोनों के साथ-साथ राजस्थान के लिए भी घातक सिद्ध हुई।

6. मारवाड़ एवं मेवाड़ में मराठा हस्तक्षेप

A. मारवाड़ — राम सिंह बनाम विजय सिंह/बख्त सिंह ◆ 13 जुलाई 1749 ई. को राम सिंह मारवाड़ के शासक बने, परंतु उनके चाचा बख्त सिंह ने उत्तराधिकार को चुनौती दी। मराठों ने इस पूरे विवाद में बारी-बारी से दोनों पक्षों का साथ दिया — नीचे दी तालिका इस घटनाक्रम को स्पष्ट करती है:

वर्ष (Year) घटना (Event)

13 जुलाई 1749 ई. राम सिंह मारवाड़ के शासक घोषित

27 नवंबर 1750 ई. लूणियावास के युद्ध में बख्त सिंह ने राम सिंह को हराकर गद्दी हथियाई

1752 ई. बख्त सिंह की मृत्यु; पुत्र विजय सिंह उत्तराधिकारी बने

1753 ई. राम सिंह ने जयपुर के माधो सिंह की सहायता से मराठों को बुलाया; मराठों ने विजय सिंह पर आक्रमण कर राम सिंह को पुनः स्थापित किया

1755 ई. मराठा अधिकारी जयप्पा सिंधिया की स्थानीय जनरोष में हत्या

1755 ई. के बाद मराठों ने पाला बदला — विजय सिंह का समर्थन किया; मल्हारराव होल्कर की सहायता से विजय सिंह ने संघर्ष समाप्त किया

1772 ई. राम सिंह की निर्वासन में मृत्यु

◆ रघुनाथराव ने राम सिंह को फिर गद्दी दिलाने के लिए जयप्पा सिंधिया को जोधपुर भेजा। मेड़ता के पास हुए भीषण युद्ध में विजयसिंह हारकर नागौर दुर्ग में जा छिपा और लंबा मुकाबला न कर सकने से फरवरी 1756 में मराठों से संधि को विवश हुआ। ◆ फरवरी 1756 की संधि की शर्तें: (1) अजमेर और गढ़ बीठली (तारागढ़) मराठों के अधिकार में रहेंगे; (2) जालौर सहित आधा मारवाड़ — जिसमें सांभर, मारोठ, सोजत, परबतसर और के कड़ी के 84 गाँव शामिल थे — राम सिंह को, तथा जोधपुर, नागौर व मेड़ता विजयसिंह को मिले; (3) विजयसिंह ने युद्ध-क्षतिपूर्ति के 50 लाख रुपये (25 लाख पहले वर्ष में, शेष दो किश्तों में) देना स्वीकारा; (4) राम सिंह ने मराठों को 5 लाख रुपये देना स्वीकारा; (5) जोधपुर राज्य मराठों को डेढ़ लाख रुपये वार्षिक कर देगा; (6) राम सिंह द्वारा सीमा-अतिक्रमण पर विजयसिंह सैनिक कार्यवाही के लिए स्वतंत्र होगा।

B. मेवाड़ — चौथ वसूली की शुरुआत ◆ महाराणा संग्राम सिंह द्वितीय (1710-1737 ई.) के काल में मराठों ने पहली बार मेवाड़ से चौथ वसूली — यह राजस्थान में मराठा चौथ वसूली का प्रथम उदाहरण था। संग्राम सिंह द्वितीय के समय ही हुरडा सम्मेलन का प्रस्ताव रखा गया था, परंतु उनकी आकस्मिक मृत्यु के कारण यह उनके जीवनकाल में संपन्न न हो सका — यह सम्मेलन बाद में उनके उत्तराधिकारी जगतसिंह द्वितीय की अध्यक्षता में हुआ। जगतसिंह द्वितीय के काल में पेशवा बाजीराव प्रथम स्वयं मेवाड़ आए तथा चौथ वसूली संबंधी समझौता हुआ।

7. जाट व अन्य रियासतों में मराठा हस्तक्षेप ◆ भरतपुर के जाट शासकों के आंतरिक विवादों में भी मराठों का हस्तक्षेप रहा — जवाहर सिंह बनाम नाहर सिंह के विवाद में माधो सिंह (जयपुर) ने होल्कर व सिंधिया से जवाहर सिंह के विरुद्ध सहायता मांगी। प्रारंभिक असफलताओं के बावजूद जवाहर सिंह ने मारवाड़ के विजय सिंह से गठबंधन कर मराठा हस्तक्षेप का प्रतिरोध किया (जाट वंश का विस्तृत विवरण देखें: अध्याय 10)। ◆ कोटा में महाराव दुर्जनशाल (1723-1756 ई.) के काल में ही मराठा प्रभाव स्थापित हो गया था तथा मुगल प्रभाव समाप्त हुआ। कोटा के दीवान झाला हिम्मत सिंह व उनके पुत्र झाला जालिम सिंह ने आगे चलकर मराठा-कोटा संबंधों में केंद्रीय भूमिका निभाई (विस्तार आगे बिंदु 10 में)।

8. जयपुर के उत्तरकालीन मराठा-युद्ध — टूंगा, पाटन, मालपुरा

युद्ध (Battle) वर्ष (Year) पक्ष (Parties) परिणाम (Result)

भटवाड़ा का युद्ध नवंबर 1761 ई. माधो सिंह प्रथम बनाम कोटा के शत्रुशाल कारण — रणथंभौर दुर्ग विवाद; शत्रुशाल की (झाला जालिम सिंह के नेतृत्व में) विजय

मावंडा/मौड़ा-मांडोली का 1767 ई. माधो सिंह व अलवर के प्रताप सिंह बनाम जवाहर सिंह विजयी युद्ध भरतपुर के जवाहर सिंह (जाट)

कामां का युद्ध 1768 ई. माधो सिंह बनाम जवाहर सिंह (भरतपुर) जवाहर सिंह विजयी

टूंगा का युद्ध 28 जुलाई 1787 ई. सवाई प्रताप सिंह (राठौड़-कछवाहा संधि, अनिर्णायक, परंतु मराठा सेना पीछे हटने को विजय सिंह मारवाड़ समर्थित) बनाम विवश हुई — बिस्सावा के ठाकु र सूरजमल महादजी सिंधिया शेखावत ने इस युद्ध में वीरगति पाई

पाटन का युद्ध 20 जून 1790 ई. प्रताप सिंह, विजय सिंह (मारवाड़) व मराठा विजय — अजमेर पर नियंत्रण स्थापित; अफगान नेता इस्माइल बेग बनाम मराठा अजमेर से भारी युद्ध-क्षतिपूर्ति वसूली गई (महादजी सिंधिया, नेतृत्व — डी बोइन एवं लकवा दादा)

मालपुरा का युद्ध 16 अप्रैल 1800 ई. प्रताप सिंह व भीम सिंह राठौड़ (मारवाड़) मराठा विजय — जयपुर को संधि हेतु विवश बनाम मराठा किया गया

◆ टूंगा (तूंगा) का युद्ध लालसोट के पास हुआ। इसकी पृष्ठभूमि यह थी कि चौथ को लेकर बार-बार विवाद होने पर महादजी सिंधिया के नेतृत्व में मराठे जयपुर राज्य में लूटमार करते थे। जयपुर के प्रतापसिंह ने जोधपुर के विजयसिंह से गठबंधन किया, शिवपुर और करौली के शासकों ने भी सैनिक मदद दी, और महादजी का साथी मुगल फौजदार मोहम्मद बेग हमदानी भी राजपूतों के साथ आ गया।

"यदि मैं जीवित रहा, तो जयपुर को धूल में मिला दूंगा।" — महादजी सिंधिया (टूंगा युद्ध के पश्चात)

◆ इन युद्धों की श्रृंखला ने जयपुर को आर्थिक व सैन्य रूप से पूर्णतः थका दिया — पाटन के युद्ध के बाद तो अजमेर स्वयं मराठा नियंत्रण में चला गया, जो आगे 1818 ई. में ब्रिटिश अधिकार में आया (विस्तार बिंदु 15)।

9. कृ ष्णा कु मारी विवाद एवं गिंगोली का युद्ध (1807)

◆ कृ ष्णा कु मारी की सगाई पहले मारवाड़ के महाराजा भीमसिंह से तय हुई थी, पर विवाह से पहले ही उनकी मृत्यु हो गई; तब मेवाड़ के महाराणा भीमसिंह ने रिश्ता जयपुर के जगतसिंह से तय किया, जिसे मारवाड़ के नए शासक मानसिंह ने अपना अपमान माना। मानसिंह का पक्ष लेकर अमीर खाँ पिंडारी ने मेवाड़ में डेरा डाला और कृ ष्णा कु मारी का विवाह मानसिंह से करने या उसकी हत्या करने का प्रस्ताव रखा, न मानने पर मेवाड़ उजाड़ने की धमकी दी। अंत में 21 जुलाई 1810 को महाराणा भीमसिंह ने अपनी 16 वर्षीय पुत्री को ज़हर पिलाकर उसकी जान ले ली — इसे राजस्थान में मराठा हस्तक्षेप का सबसे काला अध्याय कहा जाता है।

◆ फरवरी 1818 ई. में कर्नल जेम्स टॉड मेवाड़ में ब्रिटिश एजेंट (Political Agent) बनकर उदयपुर पहुंचे — यह घटना मेवाड़ के इतिहास-लेखन की दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई, क्योंकि टॉड ने आगे चलकर "एनल्स एं ड एं टीक्विटीज ऑफ राजस्थान" (1829 ई.) की रचना की (विस्तार देखें: अध्याय 1)।

10. कोटा के झाला जालिम सिंह — मराठा प्रभाव से ब्रिटिश-मैत्री तक

⚔️ झाला जालिम सिंह (लगभग 1770-1824 ई. (दीवान/वास्तविक शासक)) "कोटा का कौटिल्य" — मराठा-कोटा संबंधों का शिल्पकार

◆ महाराव दुर्जनशाल के दीवान झाला हिम्मत सिंह के पुत्र; महाराव उम्मेद सिंह (1770-1819 ई.) के काल में कोटा के वास्तविक शासक की भूमिका निभाई, जबकि नाममात्र सत्ता महाराव के पास रही। ◆ भटवाड़ा के युद्ध (1761 ई.) में कोटा सेना का नेतृत्व कर जयपुर के माधो सिंह प्रथम को पराजित किया। ◆ मराठों के साथ कू टनीतिक संतुलन बनाए रखते हुए कोटा की स्वायत्तता बचाई — इसी कू टनीतिक चातुर्य के कारण इन्हें "कोटा का कौटिल्य" कहा गया। ◆ बदलते समय को पहचानते हुए मराठा-निर्भरता से हटकर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कं पनी से मैत्री की नीति अपनाई — 1817 ई. में कोटा की ओर से ब्रिटिश संधि में सक्रिय भूमिका निभाई (विस्तार बिंदु 14)। ◆ 1824 ई. में झाला जालिम सिंह की मृत्यु हुई — उनके वंशज आगे चलकर झालावाड़ की स्वतंत्र रियासत के शासक बने (विस्तार देखें: अध्याय 7)।

11. मराठा हस्तक्षेप के परिणाम

राजनीतिक एवं सैन्य-प्रशासनिक परिणाम आर्थिक परिणाम

◆ राजपूत संप्रभुता का क्षरण — उत्तराधिकार व प्रशासन में निरंतर ◆ भारी कराधान — चौथ व सरदेशमुखी ने स्थानीय हस्तक्षेप अर्थव्यवस्था को खोखला किया ◆ आंतरिक संघर्षों में वृद्धि — मराठों ने प्रायः प्रतिद्वंद्वी पक्षों का समर्थन ◆ लूटपाट व विनाश — बार-बार के आक्रमणों से ग्रामीण व कर अस्थिरता बढ़ाई नगरीय संपत्ति की भारी क्षति हुई ◆ ब्रिटिश समर्थन की ओर झुकाव — मराठा दबाव से बचने हेतु राजपूत ◆ राजकोष रिक्तीकरण — युद्ध-क्षतिपूर्ति व नज़राने के भार शासकों का ईस्ट इंडिया कं पनी से गठबंधन बढ़ा से रियासतों का खजाना खाली होता गया ◆ मराठा चौकियों व प्रभाव का विस्तार — मराठों ने रियासतों में सैनिक ◆ व्यापार-मार्गों में अवरोध — निरंतर अस्थिरता से व अधिकारी नियुक्त करने शुरू किए वाणिज्यिक गतिविधियां प्रभावित हुईं ◆ केंद्रीकृ त राजपूत सत्ता का पतन — राजपूताना एक विखंडित व विवादित राजनीतिक क्षेत्र बन गया

◆ लगभग सभी रियासतों में मराठों का प्रवेश और हस्तक्षेप हो गया; केवल बीकानेर और जैसलमेर ही मराठों की लूटमार से बचे रहे। आगे चलकर मराठों के सहयोगी रहे पिंडारियों ने अपने स्वतंत्र दल बनाकर राजस्थान में लूटमार शुरू कर दी, जिससे यहाँ के राज्यों की पहले से कमज़ोर आर्थिक दशा और बिगड़ गई।

निष्कर्ष: शिवाजी के नेतृत्व में उभरे मराठा साम्राज्य ने औरंगजेब की मृत्यु के बाद उत्पन्न मुगल-शून्यता का लाभ उठाकर उत्तर भारत में विस्तार किया। प्रारंभ में मध्यस्थ की भूमिका निभाने वाले मराठा धीरे-धीरे कर-वसूलने वाले शोषक शासक बन गए। 1803 से 1823 ई. के मध्य जयपुर, जोधपुर व मेवाड़ सहित लगभग सभी राजपूत रियासतों ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कं पनी से सहायक संधियां कीं — यही राजस्थान में मराठा प्रभाव के अंत तथा ब्रिटिश युग के प्रारंभ का प्रतीक बना।

12. ब्रिटिश प्रारंभिक नीतियां एवं सहायक संधि प्रणाली

गवर्नर-जनरल (Governor- नीति (Policy) विवरण (Description) General)

वारेन             हेस्टिंग्स   रिंग          फें स             नीति   ब्रिटिश क्षेत्रों को प्रमुख शत्रुओं (विशेषकर मराठों) से बचाने हेतु पड़ोसी राज्यों से
(1772-1785 ई.)                 (Policy of Ring Fence)                 मैत्री-संधि कर बफर राज्य बनाना

लॉर्ड कार्नवालिस अहस्तक्षेप नीति (Policy of भारतीय शासकों के आंतरिक मामलों में ब्रिटिश हस्तक्षेप न करने की नीति (1786-1793 ई.) Non-intervention)

लॉर्ड            वेलेजली       सहायक          संधि        प्रणाली     राज्य की आंतरिक सुरक्षा व विदेश-नीति ब्रिटिश नियंत्रण में; संपूर्ण व्यय राज्य वहन
(1798-1805 ई.)                 (Subsidiary              Alliance      करेगा; ब्रिटिश रेजिडेंट नियुक्त; राज्य के खर्च पर सेना बनाए रखी जाएगी — भारत

System) में प्रथम संधि 1798 ई. में हैदराबाद के निज़ाम से हुई

◆ सहायक संधि प्रणाली से पूर्व जयपुर के महाराजा पृथ्वी सिंह ने 1776 ई. में अंग्रेजों से मैत्री की इच्छा व्यक्त की थी, तथा जोधपुर राज्य ने भी प्रयास किए, परंतु दोनों ही प्रयास उस समय सफल नहीं हो सके ।

13. प्रारंभिक संधियां (1803-1805) — भरतपुर, अलवर, जयपुर, जोधपुर ◆ 30 दिसंबर 1803 ई. को आंग्ल-मराठा युद्ध में मराठे पराजित हुए तथा सिंधिया ने अंग्रेजों से सुर्जी-अंजनगांव की संधि की — इस परिणाम ने जयपुर व जोधपुर को ब्रिटिश प्रभाव क्षेत्र में ला दिया, तथा राजपूतों व अंग्रेजों के बीच आगामी संधियों की भूमिका तैयार की।

रियासत संधि तिथि (Treaty शर्तें/विशेष बातें (Conditions/Special Points) (State) Date)

भरतपुर 29 सितंबर 1803 ई. अंग्रेज संरक्षण प्रदान करेंगे, कोई खिराज नहीं लिया जाएगा; 1804 ई. में रणजीत सिंह ने होल्कर को (रणजीत सिंह-वेलेजली) शरण दी — 5 माह की घेराबंदी असफल रही; अप्रैल 1805 ई. में नई संधि — पूर्व स्थिति बहाल, कुछ परगने अलवर को दिए गए, डीग क्षेत्र लौटाया गया (विस्तार अध्याय 10)

अलवर 14 नवंबर 1803 ई. अलवर की स्वतंत्र स्थिति मान्य, आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं, कोई कर नहीं लिया जाएगा, अलवर (महाराजा बख्तावर सिंह) सेना अंग्रेजों की सहायता हेतु उपलब्ध रहेगी; अलवर ने 1803 के लसवाड़ी युद्ध में अंग्रेजों की सहायता की — राजस्थान की प्रथम विस्तृत आक्रामक-रक्षात्मक संधि

जयपुर 12 दिसंबर 1803 ई. अलवर के समान शर्तें; जनरल बार्लो ने 1805 ई. में यह संधि रद्द कर दी (महाराजा जगतसिंह द्वितीय)

जोधपुर 22 दिसंबर 1803 ई. पारस्परिक मैत्री, कोई खिराज नहीं, फ्रांसीसी अधिकारी न रखने की शर्त; 15 जनवरी 1804 ई. को (महाराजा मानसिंह) पुष्टि; मानसिंह ने नई संधि का प्रस्ताव रखा जिसे अंग्रेजों ने अस्वीकार किया — 1804 ई. में संधि रद्द हुई

14. 1817-18 की अधीनस्थ पृथक्करण संधियां — संपूर्ण रियासतवार तालिका ◆ 1817-18 ई. के मध्य ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कं पनी ने राजपूताना की लगभग सभी रियासतों को "अधीनस्थ पृथक्करण नीति" (Policy of Subordinate Isolation) के अंतर्गत संधि-बद्ध कर लिया — इसका मुख्य उद्देश्य मराठा व पिंडारी खतरे से राजपूत राज्यों की रक्षा करना बताया गया, परंतु वास्तविक परिणाम था राजपूताना का ब्रिटिश आधिपत्य में पूर्ण समावेश।

शासक/प्रतिनिधि
  रियासत
                     तिथि (Date)           (Ruler/Representati                              विशेष तथ्य (Special Facts)
 (State)
                                                       ve)

करौली 9 नवंबर 1817 ई. महाराजा हरबख्श पाल सिंह राजस्थान की प्रथम रियासत जिसने अधीनस्थ पृथक्करण नीति स्वीकार की

टोंक 17 नवंबर 1817 ई. नवाब अमीर खां पिंडारी टोंक व रामपुरा स्वतंत्र रियासतें बनीं; अमीर खां को नवाब मान्यता; लूटपाट पर प्रतिबंध (विस्तार अध्याय 10)

कोटा 26 दिसंबर 1817 ई. महाराव उम्मेद सिंह प्रथम; गवर्नर-जनरल के विशेष प्रतिनिधि — चार्ल्स मेटकाफ; अन्य दीवान झाला जालिम सिंह की प्रतिनिधि — शिवदान सिंह, सेठ जीवनराम, लाला हुकु मचंद सक्रिय भूमिका

जोधपुर 6 जनवरी 1818 ई. महाराजा मानसिंह प्रतिनिधि — आसोपा बिशनराम, व्यास अभयराम; ब्रिटिश पक्ष से चार्ल्स मेटकाफ

मेवाड़ 23 जनवरी 1818 ई. महाराणा भीम सिंह प्रतिनिधि — ठाकु र अजीत सिंह (आसींद); उदयपुर को अपनी आय (उदयपुर) का 25% खिराज देना पड़ा, जो बाद में 3/8 निश्चित किया गया

बूंदी 10 फरवरी 1818 ई. महाराव विष्णु सिंह वार्षिक 80,000 रुपये खिराज देना स्वीकार किया

बीकानेर 21 मार्च 1818 ई. महाराजा सूरत सिंह प्रतिनिधि — ओझा काशीनाथ, चार्ल्स मेटकाफ; लॉर्ड हेस्टिंग्स द्वारा पातरसा घाट (घग्घर नदी) पर पुष्टि

किशनगढ़ 7 अप्रैल 1818 ई. महाराजा कल्याण सिंह खिराज से मुक्त — क्योंकि यह पूर्व में मराठों को चौथ नहीं देता था

जयपुर 2 अप्रैल 1818 ई. महाराजा जगतसिंह द्वितीय प्रतिनिधि — चार्ल्स मेटकाफ व ठाकु र रावल बरीसाल नाथावत; 15 अप्रैल 1818 ई. को स्वीकृ त

प्रतापगढ़ 5 अक्टूबर 1818 ई. महारावल सामंत सिंह —

डूंगरपुर 11 दिसंबर 1818 ई. महारावल जसवंत सिंह द्वितीय —

जैसलमेर 12 दिसंबर 1818 ई. महारावल मूलराज द्वितीय अंग्रेजों को खिराज या शुल्क देने का कोई प्रावधान नहीं (विस्तार अध्याय 10)

बांसवाड़ा 25 दिसंबर 1818 ई. महारावल उम्मेद सिंह —

सिरोही 11 सितंबर 1823 ई. महाराजा शिव सिंह सबसे अंतिम हस्ताक्षरित संधि — जोधपुर राज्य के भू-क्षेत्रीय दावों के कारण विलंब हुआ

सहायक संधि प्रणाली की मुख्य विशेषताएं ◆ स्थानीय सेना का विघटन एवं ब्रिटिश सेना की नियुक्ति — संधि करने वाले शासकों को अपनी सेना भंग करनी पड़ती थी तथा राज्य में एक ब्रिटिश सैन्य टुकड़ी तैनात रहती थी। ◆ व्यय का प्रावधान — शासक को ब्रिटिश सेना के रखरखाव का संपूर्ण खर्च वहन करना पड़ता था; भुगतान में असफल रहने पर राज्य का कुछ भू-भाग अंग्रेजों को सौंपा जाता था। ◆ सुरक्षा का वचन — अंग्रेजों ने बाहरी आक्रमणों व आंतरिक विद्रोहों से राज्य की रक्षा का वचन दिया। ◆ आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप — सिद्धांततः अंग्रेजों ने हस्तक्षेप न करने का वचन दिया, परंतु व्यवहार में वे बार-बार हस्तक्षेप करते थे — राज्य की आंतरिक स्थिति पर नज़र रखने हेतु एक ब्रिटिश रेजिडेंट नियुक्त किया जाता था। ◆ विदेशी व आंतरिक संधियों पर प्रतिबंध — राज्य ब्रिटिश अनुमति के बिना किसी अन्य विदेशी शक्ति या भारतीय रियासत से राजनीतिक संपर्क या संधि नहीं कर सकता था।

15. अजमेर का ब्रिटिश अधिग्रहण एवं राजपूताना एजेंसी (1832) ◆ पाटन के युद्ध (1790 ई.) के बाद से अजमेर मराठा नियंत्रण में था। 25 जून 1818 ई. को एक संधि के माध्यम से दौलतराव सिंधिया ने अजमेर क्षेत्र अंग्रेजों को सौंप दिया — 29 जून 1818 ई. को दिल्ली के रेजिडेंट जनरल सर डेविड ऑक्टरलोनी व कर्नल निक्सन पैदल सेना की आठ रेजिमेंटों सहित अजमेर पहुंचे और औपचारिक रूप से नियंत्रण संभाला।

◆ 1832 ई. में गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक ने अजमेर को राजपूताना क्षेत्र में ब्रिटिश गतिविधियों का मुख्यालय घोषित किया — यहीं "राजपूताना एजेंसी" (Rajputana Agency) की स्थापना हुई, जिसे दिल्ली रेजिडेंसी के नियंत्रण से मुक्त कर एक पृथक एजेंसी बनाया गया। इस एजेंसी का मुख्य अधिकारी "गवर्नर-जनरल का एजेंट" (Agent to the Governor- General/A.G.G.) कहलाता था। 1857 ई. के पश्चात इस एजेंसी का मुख्यालय माउंट आबू स्थानांतरित कर दिया गया।

महत्व: अजमेर का ब्रिटिश अधिग्रहण व राजपूताना एजेंसी की स्थापना राजस्थान में ब्रिटिश प्रशासनिक नियंत्रण की स्थायी नींव साबित हुई — यहीं से प्रत्येक रियासत में नियुक्त "राजनीतिक अभिकर्ता" (Political Agent) राजपूताना एजेंसी के अधीन कार्य करने लगे, जिनकी भूमिका आगे 1857 की क्रांति के समय अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुई (विस्तार देखें: अध्याय 13)।

16. ब्रिटिश काल में सामाजिक सुधार (Social Reforms, 1818-1947) 19वीं सदी में भारत के पुनर्जागरण (Renaissance) का असर राजस्थान पर भी पड़ा। उस समय यहाँ के समाज में सती प्रथा, कन्या वध, बाल-विवाह, अनमेल विवाह, दास प्रथा, डाकन प्रथा, मानव-व्यापार, समाधि आदि कु प्रथाएँ जड़ें जमा चुकी थीं। प्राचीन काल की वर्ण-व्यवस्था, जो श्रम-विभाजन पर आधारित थी, जातिगत ऊँ च-नीच में बदल गई थी। 1818 की संधियों के बाद (और 1857 के बाद ब्रिटिश ताज के शासन में) सुधार के प्रयास दो तरफ से हुए — सरकारी और सामाजिक।

A. अंग्रेज़ों की नीति ◆ 1844 ई. तक कं पनी ने 'अहस्तक्षेप की नीति' अपनाई — वह सीधे आम जनता और धार्मिक मामलों में दखल नहीं देना चाहती थी; पहले प्रशासनिक, न्यायिक व आर्थिक बदलाव करके और शिक्षा को बढ़ावा देकर सुधार का वातावरण बनाया गया। ◆ समाज-सुधारकों का प्रभाव-काल 1840-1919 माना जाता है; 1919 से 1947 तक समाज-सुधार का काम राजनीतिक आंदोलनकारियों के मार्गदर्शन में चला।

B. प्रमुख कु प्रथाएँ और उनके उन्मूलन के प्रयास

कु प्रथा उन्मूलन के प्रमुख प्रयास वर्ष/विशेष तथ्य

सती प्रथा               मध्यकाल में मुहम्मद बिन तुगलक व अकबर ने रोकने का           1839 में जयपुर में पॉलिटिकल एजेंट की अध्यक्षता में
                         प्रयास किया; राजा राममोहन राय से प्रेरित होकर लॉर्ड        संरक्षक समिति बनी; 1844 में इसी समिति ने सती-
                         विलियम बैंटिक ने 1829 में कानून बनाया और                   उन्मूलन विधेयक पारित किया — राजस्थान का पहला
                         राजपूताना की रियासतों को पत्र लिखे; कै प्टन रिचर्डसन ने    वैधानिक प्रयास
                         बूंदी, कोटा, झालावाड़ को खरीता (आदेश) भेजा
सती प्रथा (आगे)         ए.जी.जी. के निर्देश पर अन्य रियासतों में नियम बने;         1846 — डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़; 1848 — कोटा,
                         1861 में भारत सचिव चार्ल्स वुड के निर्देश पर जुर्माने की   जोधपुर; 1860 — मेवाड़; 19वीं सदी के अंत तक प्रथा
                         जगह कारावास, शासक को पद से हटाने, गाँव को                  नियंत्रित; सितंबर 1987 में राजस्थान उच्च न्यायालय ने भी
                         खालसा करने और तोपों की सलामी घटाने जैसे कठोर               इसे विधि-सम्मत नहीं माना
                         नियम

कन्या वध सबसे पहले मेवाड़ के महाराणा ने ब्रिटिश एजेंट पर दबाव कर्नल टॉड ने दहेज को इसका प्रमुख कारण माना; 1888 डालकर कानून बनवाया, फिर कोटा ने; 1839 में जोधपुर के बाद घटनाएँ लगभग समाप्त महाराजा ने 'कोड ऑफ रूल्स' बनाए; 1844 में जयपुर महाराजा ने कन्या वध अनुचित घोषित किया; बीकानेर महाराजा ने 1839 में गया-यात्रा के समय सामंतों को

शपथ दिलाई

बाल-विवाह व अनमेल      स्वामी दयानंद सरस्वती ने आवाज़ उठाई; अलवर रियासत           10 दिसंबर 1903 (अलवर); अनमेल विवाह का मुख्य
विवाह                  ने बाल-विवाह व अनमेल विवाह निषेध कानून बनाया               कारण आर्थिक परेशानी थी
                       और राजपरिवारों से भी कड़ाई से पालन करवाया

डाकन प्रथा अंधविश्वास पर आधारित इस प्रथा को ब्रिटिश 1853 में मेवाड़ रेज़ीडेंट कर्नल ईडन के परामर्श पर अधिकारियों ने गंभीर कु प्रथा माना; ए.जी.जी. ने कानून महाराणा जवानसिंह (स्वरूपसिंह काल की घटना के रूप में बनाने का दबाव डाला भी उल्लेख) ने इसे गैरकानूनी घोषित किया

दास प्रथा              दासों की संख्या से कु ल-प्रतिष्ठा आँकी जाती थी; दास चार    बिना शासक की अनुमति दास विवाह नहीं कर सकते थे;
                       प्रकार के थे — युद्ध-बंदी, दहेज में दिए गए स्त्री-पुरुष,   उनकी सामाजिक स्थिति अच्छी नहीं थी
                       स्थानीय सेवक-सेविकाएँ और वंशानुगत सेवक

C. सुधार संस्थाएँ — देश हितैषिणी सभा व वाल्टरकृ त राजपूत हितकारिणी सभा ◆ देश हितैषिणी सभा (2 जुलाई 1877, उदयपुर): कविराज श्यामलदास ने 'वीर विनोद' में इसका उल्लेख किया है और वे स्वयं इसके सदस्य थे। यह मेवाड़ तक सीमित थी और इसका उद्देश्य विवाह से जुड़ी कठिनाइयाँ दूर करना था — इसने राजपूतों के विवाह-खर्च सीमित करने और बहुविवाह निषेध के नियम बनाए। ब्रिटिश सरकार का पूरा सहयोग न मिलने से यह पूर्ण सफल नहीं हुई, पर यह रियासतों का पहला आंशिक सफल कदम था; 1886 की मेवाड़ रेज़ीडेंट की रिपोर्ट के अनुसार अन्य रियासतों ने भी इसके नियमों में बदलाव कर ऐसी सभाएँ बनाईं। ◆ वाल्टरकृ त राजपूत हितकारिणी सभा: 1887 में ए.जी.जी. बने वाल्टर ने अक्टूबर 1887 में पॉलिटिकल एजेंटों को राजपूतों के विवाह-खर्च पर नियम बनाने का परिपत्र भेजा। 10 मार्च 1888 को अजमेर में सम्मेलन हुआ, जिसमें भरतपुर, धौलपुर और बांसवाड़ा को छोड़कर 41 प्रतिनिधि आए; जनवरी 1889 के दूसरे सम्मेलन (20 सदस्य) में इसका नाम 'वाल्टरकृ त राजपूत हितकारिणी सभा' रखा गया। मुख्य नियम — बहुविवाह पूरी तरह समाप्त हो; विवाह-आयु लड़की की कम से कम 14 और लड़के की 18 वर्ष; 'टीका' (लड़की पक्ष का उपहार) और 'रीत' (लड़के पक्ष का उपहार) पर प्रतिबंध; मृत्यु-भोज पर खर्च नियंत्रण। यह सभा धीरे-धीरे नौकरशाही संस्था बनकर रह गई, पर शासक वर्ग को सुधार के लिए मानसिक रूप से तैयार करने में सफल रही; 1938 में इसे भंग किया गया।

D. सामाजिक प्रयास — दयानंद, विवेकानंद एवं गांधीवादी कार्यकर्ता ◆ स्वामी विवेकानंद की 1891 की राजपूताना यात्रा से नई जागृति आई — धर्म के नाम पर चल रही कु प्रथाओं को लोग तर्क के आधार पर मानने से इनकार करने लगे। ◆ राजपूताना पर सबसे अधिक प्रभाव स्वामी दयानंद सरस्वती और आर्य समाज का पड़ा। उन्होंने शास्त्रों के आधार पर सती प्रथा को अमानवीय बताया; जाति-प्रथा, छु आछू त, बाल-विवाह व अनमेल विवाह का विरोध और विधवा-विवाह का समर्थन किया; महिला-शिक्षा पर बल दिया; वाद-विवाद और गोष्ठियों से समाज में तार्किक शक्ति जगाई; शासक व कु लीन वर्ग की भूमिका पर विशेष ज़ोर दिया। आर्य समाज और परोपकारिणी सभा (अजमेर) के सदस्य संगठित रूप से सक्रिय हुए। ◆ 1919-1947 के बीच राजस्थान सेवा संघ और कांग्रेस के कार्यकर्ता ग्रामीण व आदिवासी क्षेत्रों तक पहुँचे — जगह-जगह शिक्षण संस्थाएँ खोलीं, हरिजनों की शिक्षा और मंदिर-प्रवेश के लिए आंदोलन किए, स्वयं सफ़ाई जैसे काम करके श्रम की गरिमा दिखाई और कई कार्यकर्ताओं ने विधवाओं से विवाह कर उदाहरण रखा। ये सुधार केवल उपदेशात्मक नहीं, बल्कि प्रयोगात्मक थे और गांधीजी के रचनात्मक कार्यक्रम से प्रेरित थे।

17. स्वतंत्रता-पूर्व राजस्थान का शैक्षिक परिदृश्य (Education before Independence)

A. देशी शिक्षा (Indigenous Education) ◆ 1818 से पहले की शिक्षा को ब्रिटिश दस्तावेज़ों में 'देशी शिक्षा' कहा गया और बाद की शिक्षा को 'आधुनिक शिक्षा'। देशी शिक्षा धर्म, ज्ञानार्जन, व्यक्तिगत कल्याण और जीवन-निर्वाह से प्रेरित थी; परिवार शिक्षा का प्रमुख केंद्र था। औपचारिक शिक्षा हिन्दुओं में उपनयन और मुसलमानों में बिस्मिल्लाह रस्म के बाद शुरू होती थी। ◆ प्राथमिक शिक्षा के केंद्र — हिन्दुओं की पाठशाला-चटशाला, जैनों के उपासरे व वानिका, मुसलमानों के मकतब; साथ ही मंदिर-मस्जिद के आँगन, चौपाल और शिक्षक का घर। उच्च शिक्षा के केंद्र — हिन्दुओं के मठ, जैनों के उपासरे और मुसलमानों के मदरसे। शिक्षक पाठशाला में 'गुरु' या 'जोशीजी', मठ-अस्थल में 'आचार्य' व 'महंत', उपासरे में 'भट्टारक' और मकतब-मदरसे में 'मौलवी' व 'उलेमा' कहलाते थे। ◆ पाठ्यक्रम: प्राथमिक स्तर पर पढ़ना-लिखना और हिसाब (1 से 100 तक गिनती, पहाड़े, ढय्या-सवाया, माप-तोल, ब्याज) तथा बही-खाता — इसे 'महाजनी' या 'वाणियावाटी' लिपि-गणित कहते थे, जिसमें संके तों का प्रयोग होता था। पाठशाला में हिन्दी-संस्कृत, उपासरे में हिन्दी-प्राकृ त और मकतब में फारसी-उर्दू पढ़ाई जाती थी; पढ़ाने की विधि लयात्मक (गाकर याद कराना) थी। उच्च स्तर पर धर्म के साथ भूगोल, इतिहास, भाषा-विज्ञान, गणित, खगोल विद्या, आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सा भी पढ़ाई जाती थी; जयपुर का जंतर-मंतर तकनीकी शिक्षा की बड़ी उपलब्धि था, और कर्नल टॉड को जावर क्षेत्र में धातु पिघलाने के मिट्टी के 'भमके ' मिले थे। ◆ शिक्षा का कोई निश्चित प्रशासन नहीं था — प्रवेश, परीक्षा, प्रमाण-पत्र की आज जैसी व्यवस्था नहीं थी; शुल्क के रूप में 'सीधा' (अनाज-भोजन सामग्री) और अंत में गुरु-दक्षिणा दी जाती थी। शासक स्व-प्रेरणा से शिक्षकों को कर-मुक्त भूमि देते थे — हिन्दुओं को 'माफ़ी जागीर' और मुसलमानों को 'मदद-ए-माश जागीर'। ◆ महिला शिक्षा: राजपरिवार, कु लीन वर्ग, चारण महिलाओं, जैन साध्वियों और राजपरिवार से जुड़ी दास-दासियों में शिक्षा प्रचलित थी; जैन साध्वियाँ भाषा, साहित्य और अनुवाद में निपुण थीं और महिला शिक्षा की सबसे मज़बूत कड़ी थीं।

B. आधुनिक शिक्षा का विकास ◆ उद्देश्य व कारण: 1824 में कं पनी ने कोलकाता की 'जनरल कमेटी ऑफ पब्लिक इंस्ट्रक्शन' को राजपूताना में चार स्कू ल खोलने को कहा। अप्रत्यक्ष कारण थे — प्रशासनिक पत्र-व्यवहार की कठिनाई, अंग्रेज़ी जानने वाले कर्मचारियों की ज़रूरत, व्यापार व सुरक्षा के लिए संपर्क -भाषा, विजेता की संस्कृति फै लाना, और नियुक्तियों का वंश के बजाय योग्यता पर होना। आधुनिक शिक्षा का विकास तीन माध्यमों से हुआ — ब्रिटिश सरकार, ईसाई मिशनरी और निजी-सार्वजनिक संस्थाएँ । ◆ कक्षा-व्यवस्था: प्राथमिक (1-5, वर्नाक्युलर), मिडिल (6-8) और हाई स्कू ल (9-10, एं ग्लो-वर्नाक्युलर); कॉलेज में इंटरमीडिएट (11-12), स्नातक (13-14) और स्नातकोत्तर (15-16) — यानी 10+2+2+2 व्यवस्था।

वर्ष घटना / संस्था महत्व

1819 रेज़ीडेंट ऑक्टरलोनी के निर्देश पर जेबेज़ कै री ने अजमेर, जनता के विरोध से 1831 में बंद करने पड़े फिर पुष्कर, भिनाय व के कड़ी में अंग्रेज़ी स्कू ल खोले

1836 अजमेर में पहला सरकारी स्कू ल (1835 में अंग्रेज़ी 1851 में हाई स्कू ल, 1868 में इंटरमीडिएट, 1869 में राजभाषा बनने के बाद) स्नातक कॉलेज

1842 अलवर में महाराजा बन्नेसिंह की प्रेरणा से पं. रूपनारायण रियासतों में आधुनिक शिक्षा की शुरुआत ने स्कू ल खोला; फिर भरतपुर के बलवंतसिंह ने

1844 जयपुर में स्कू ल (हवामहल के सामने मदनमोहन मंदिर में) 1868 इंटरमीडिएट, 1888 स्नातक, 1900 स्नातकोत्तर — आधुनिक परीक्षा प्रणाली अपनाने वाला पहला; आगे — राजस्थान में पहली पी.जी. पढ़ाई महाराजा कॉलेज

1861 नसीराबाद में मिशनरी का पहला गर्ल्स वर्नाक्युलर स्कू ल गर्ल्स गाइड यहीं शुरू; 1894 में तीन छात्राएँ छात्रवृत्ति से आगरा मेडिकल कॉलेज भेजी गईं

1863 टॉडगढ़ में मिशनरी का पहला स्कू ल (पहाड़ी/आदिवासी कमज़ोर वर्ग की शिक्षा का पहला कदम लोगों के लिए)

1866                    पुष्कर में पहला सरकारी कन्या स्कू ल; 7 मई 1866 को          रियासतों में महिला शिक्षा का पहला कदम; बाद में भरतपुर,
                        जयपुर महाराजा रामसिंह ने कान्तिचंद्र मुखर्जी के परामर्श    उदयपुर (1866), अलवर-कोटा (1872), झालावाड़
                        पर कन्या विद्यालय खोला                                     (1883) में कन्या स्कू ल

1872/1875 अजमेर में मेयो कॉलेज (प्रथम सत्र 1875-76, 23 छात्र) शासक-सामंत परिवारों के लिए अलग शिक्षा — वाल्टर की योजना, वायसराय मेयो का समर्थन

1883 टोंक नवाब ने सरकारी स्कू ल खोला 19वीं सदी के अंत तक जैसलमेर को छोड़ सभी रियासतों में राजकीय स्कू ल

1887 इलाहाबाद विश्वविद्यालय की घोषणा (23 सितंबर) राजपूताना की संस्थाएँ कलकत्ता (1857) के बजाय इलाहाबाद से संबद्ध हुईं

1893 जोधपुर में जसवंत कॉलेज (स्नातक) बीकानेर (डूंगर कॉलेज) 1928 व उदयपुर 1935 में स्नातक स्तर

1929 'बोर्ड ऑफ हाई स्कू ल एं ड इंटरमीडिएट एजुके शन, प्रथम अध्यक्ष के .पी. किचलू; 1930 में पहली परीक्षा (70 राजपूताना, अजमेर-मेरवाड़ा, सेंट्रल इंडिया एं ड ग्वालियर' हाई स्कू ल, 12 इंटर कॉलेज) की स्थापना (मुख्यालय अजमेर)

1933 उदयपुर में आयुर्वेद कॉलेज राजपूताना का पहला तकनीकी कॉलेज

1935 वनस्थली विद्यापीठ (अक्टूबर) पंचमुखी शिक्षा; चरखा-खादी पर बल

1941 उदयपुर (विद्या भवन) व अजमेर में टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज; शिक्षक-प्रशिक्षण का विकास 1946 में बीकानेर में

1946 भूपाल नोबल्स कॉलेज, उदयपुर में एल.एल.बी. कक्षाएँ विधि शिक्षा की शुरुआत

1947 जनवरी 1947 में जयपुर में राजपूताना विश्वविद्यालय; रियासतों (उदयपुर, जोधपुर, बीकानेर, अलवर, जयपुर) के इसी वर्ष सवाई मानसिंह मेडिकल कॉलेज सामूहिक सहयोग से बना विश्वविद्यालय

C. मिशनरी, आर्य समाज एवं राष्ट्रीय संस्थाओं का योगदान ◆ मिशनरी: प्रेस्बिटेरियन, रोमन कै थोलिक, मेथोडिस्ट, चर्च मिशनरी सोसाइटी आदि ने अजमेर, ब्यावर, नसीराबाद, पिपलोदा (कोटा), राजगढ़ (अलवर) और बांदीकु ई में स्कू ल खोले; नसीराबाद व ब्यावर में शिक्षक-प्रशिक्षण (नॉर्मल) कक्षाएँ भी सबसे पहले मिशनरियों ने शुरू कीं। ◆ आर्य समाज: दयानंद ने 'सत्यार्थ प्रकाश' के तीसरे अध्याय में महिला शिक्षा का महत्व बताया और अजमेर में परोपकारिणी सभा बनाई। उदयपुर में आर्य समाजियों की माँग पर संस्कृत कक्षाएँ शुरू हुईं — 1891 में संस्कृत स्कू ल, 1930 में संस्कृत कॉलेज; अजमेर का सावित्री कॉलेज (1913) भी आर्य समाज से प्रेरित माना जाता है। ◆ राष्ट्रीय आंदोलन के दौर में स्वयंसेवी संस्थाएँ खुलीं — इसकी शुरुआत बिजौलिया किसान आंदोलन से हुई। 1921 के संगासी (शेखावाटी) सम्मेलन में महिला शिक्षा को कार्यक्रम बनाया गया; 1927 में हटूंडी (अजमेर) में गांधी आश्रम बना, जो 1945 में

महिला शिक्षा सदन बना; नवंबर 1938 में उदयपुर में महिला मंडल बना। शेखावाटी में बिड़ला एजुके शन ट्रस्ट ने कई संस्थाएँ खोलीं। ◆ शासकों के लिए अलग शिक्षा की नीति का असली उद्देश्य शासकों को आम जनता से अलग रखना था, ताकि भविष्य में जनता और शासक मिलकर ब्रिटिश राज के विरुद्ध खड़े न हो सकें — सर वाल्टर ने विदेश सचिव को यही तर्क लिखा था और वायसराय मेयो ने इसका समर्थन किया। भारत में शासक परिवारों के लिए चार कॉलेज खुले — राजकोट, अजमेर (मेयो), लाहौर (एचीसन, 1886) और इंदौर (डेली)।

★ अध्याय सार — महत्वपूर्ण तथ्य ★

1. राजस्थान में मराठा चौथ-वसूली का प्रथम उदाहरण महाराणा संग्राम सिंह द्वितीय (मेवाड़) के काल में मिलता है। 2. मंदसौर के युद्ध (1733 ई.) में सवाई जयसिंह द्वितीय की पराजय के बाद मालवा पूर्णतः मराठा नियंत्रण में आया — यहीं से राजस्थान में मराठा हस्तक्षेप की वास्तविक शुरुआत मानी जाती है। 3. 22 अप्रैल 1734 ई. की बूंदी उत्तराधिकार घटना राजस्थान की राजनीति में मराठों का प्रथम प्रत्यक्ष हस्तक्षेप मानी जाती है। 4. हुरडा सम्मेलन (17 जुलाई 1734, भीलवाड़ा) — अध्यक्षता महाराणा जगतसिंह द्वितीय, आयोजन सवाई जयसिंह द्वितीय — मराठा-विरोध हेतु राजपूत एकता का प्रयास था, जो व्यवहार में असफल रहा। 5. जयपुर में ईश्वरी सिंह-माधो सिंह उत्तराधिकार-युद्ध (राजमहल 1747, बगरू 1748) में मराठों ने निर्णायक भूमिका निभाई — ईश्वरी सिंह ने अंततः 1750 ई. में आत्महत्या कर ली। 6. मारवाड़ में राम सिंह बनाम विजय सिंह विवाद में 1755 ई. में जयप्पा सिंधिया की हत्या हुई, जिसके बाद मराठों ने पाला बदला। 7. सवाई प्रताप सिंह (जयपुर) के काल में टूंगा (1787), पाटन (1790) व मालपुरा (1800) के युद्ध हुए — पाटन युद्ध के बाद अजमेर मराठा नियंत्रण में चला गया। 8. मेवाड़ की राजकु मारी कृ ष्णा कु मारी के विवाह-विवाद में गिंगोली का युद्ध (मार्च 1807, परबतसर) हुआ, जिसके बाद अमीर खां पिंडारी व अजीत सिंह चूंडावत की सलाह पर कृ ष्णा कु मारी को विष देकर मार डाला गया। 9. कोटा के दीवान झाला जालिम सिंह ने मराठा-कोटा संबंधों में केंद्रीय भूमिका निभाई और आगे चलकर ब्रिटिश-मैत्री की नीति अपनाई। 10. ब्रिटिश प्रारंभिक नीतियां — वारेन हेस्टिंग्स की "रिंग फें स नीति", कार्नवालिस की "अहस्तक्षेप नीति" तथा वेलेजली की "सहायक संधि प्रणाली" (भारत में प्रथम प्रयोग 1798, हैदराबाद निज़ाम)। 11. 30 दिसंबर 1803 ई. की सुर्जी-अंजनगांव संधि (सिंधिया-अंग्रेज) ने जयपुर-जोधपुर को ब्रिटिश प्रभाव में ला दिया। 12. 1803-05 की प्रारंभिक संधियां — भरतपुर (29 सितंबर 1803), अलवर (14 नवंबर 1803, राजस्थान की प्रथम विस्तृत संधि), जयपुर (12 दिसंबर 1803, बाद में रद्द), जोधपुर (22 दिसंबर 1803, बाद में रद्द)। 13. करौली राजस्थान की प्रथम रियासत थी जिसने 9 नवंबर 1817 ई. को अधीनस्थ पृथक्करण नीति स्वीकार की। 14. सिरोही (11 सितंबर 1823) सबसे अंतिम रियासत थी जिसने ब्रिटिश संधि पर हस्ताक्षर किए — जोधपुर के भू-क्षेत्रीय दावों के कारण विलंब हुआ। 15. मेवाड़ को अपनी आय का 25% खिराज देना पड़ा (बाद में 3/8 निश्चित), जबकि किशनगढ़ व जैसलमेर खिराज से मुक्त थे। 16. 25 जून 1818 ई. को दौलतराव सिंधिया ने अजमेर अंग्रेजों को सौंपा; 1832 ई. में लॉर्ड विलियम बैंटिक ने अजमेर में राजपूताना एजेंसी स्थापित की।

नीचे दी समय-रेखा (Timeline) इस अध्याय के संपूर्ण घटनाक्रम को स्पष्ट करती है — रिवीजन के लिए इसे ज़रूर दोहराएं :

वर्ष (Year) घटना/Event महत्व

1707 ई. औरंगजेब की मृत्यु मुगल सत्ता के पतन व राजनीतिक शून्यता का प्रारंभ

1708 ई. सवाई जयसिंह-चंद्रकुं वर विवाह का इकरारनामा जयपुर उत्तराधिकार संघर्ष की जड़

1711 ई. मराठों का मेवाड़ में प्रथम प्रवेश राजस्थान में मराठा हस्तक्षेप की शुरुआत

1726-1728 ई. मेवाड़, डूंगरपुर, बांसवाड़ा से चौथ वसूली मराठा आर्थिक शोषण का प्रारंभ

1733 ई. मंदसौर का युद्ध मालवा पर मराठा नियंत्रण स्थापित

22 अप्रैल 1734 ई. बूंदी में मराठा हस्तक्षेप राजस्थान में प्रथम प्रत्यक्ष मराठा राजनीतिक हस्तक्षेप

17 जुलाई 1734 ई. हुरडा सम्मेलन (भीलवाड़ा) राजपूत एकता का असफल प्रयास

1747-1751 ई. जयपुर उत्तराधिकार-युद्ध (राजमहल, बगरू, कालेआम) मराठा हस्तक्षेप की पराकाष्ठा, ईश्वरी सिंह की आत्महत्या

1755 ई. जयप्पा सिंधिया की हत्या (मारवाड़) मराठा नीति में परिवर्तन का कारण

1787-1800 ई. टूंगा, पाटन, मालपुरा के युद्ध (जयपुर-मराठा) अजमेर पर मराठा नियंत्रण, जयपुर की आर्थिक क्षति

मार्च 1807 ई. गिंगोली का युद्ध व कृ ष्णा कु मारी का विषपान मेवाड़-जोधपुर-जयपुर त्रिकोणीय संघर्ष की पराकाष्ठा

30 दिसंबर 1803 ई. सुर्जी-अंजनगांव संधि (सिंधिया-अंग्रेज) जयपुर-जोधपुर पर ब्रिटिश प्रभाव का मार्ग प्रशस्त

1803-1805 ई. भरतपुर, अलवर, जयपुर, जोधपुर की प्रारंभिक संधियां सहायक संधि प्रणाली का प्रारंभिक प्रयोग

9 नवंबर 1817 ई. करौली-ब्रिटिश संधि राजस्थान की प्रथम अधीनस्थ पृथक्करण संधि

1817-1818 ई. अधिकांश राजपूत रियासतों की ब्रिटिश संधियां राजपूताना का ब्रिटिश अधीनस्थ तंत्र में समावेश

25 जून 1818 ई. दौलतराव सिंधिया द्वारा अजमेर अंग्रेजों को सौंपा गया मराठा प्रभाव के अंत व ब्रिटिश केंद्र की स्थापना

11 सितंबर 1823 ई. सिरोही-ब्रिटिश संधि राजपूताना की अंतिम रियासती संधि

1832 ई. राजपूताना एजेंसी की स्थापना (अजमेर) राजस्थान में स्थायी ब्रिटिश प्रशासनिक ढांचे का प्रारंभ (विस्तार अध्याय 13)

1844 ई. जयपुर संरक्षक समिति द्वारा सती-उन्मूलन विधेयक सती निषेध का पहला वैधानिक प्रयास

1853 ई. मेवाड़ में डाकन प्रथा गैरकानूनी घोषित अंधविश्वास पर प्रहार

2 जुलाई 1877 ई. उदयपुर में देश हितैषिणी सभा विवाह-खर्च सीमा व बहुविवाह निषेध

1888-1889 ई. वाल्टरकृ त राजपूत हितकारिणी सभा विवाह-आयु (लड़की 14, लड़का 18), टीका-रीत पर रोक

10 दिसंबर 1903 ई. अलवर में बाल-विवाह व अनमेल विवाह निषेध कानून समाज सुधार का वैधानिक कदम

स्रोत: आपके द्वारा दी गई “राजस्थान इतिहास अपडेटेड — Version 2.0” PDF, पृष्ठ 161–177। तालिकाओं की column layout पढ़ने के लिए horizontally scroll की जा सकती है।

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