📋 इस अध्याय में
- केंद्रीय प्रशासन — राजा एवं मंत्रिपरिषद
- प्रधान (प्रधानमंत्री) एवं दीवान व्यवस्था — रियासतवार उपाधियां
- अन्य प्रमुख राजकीय अधिकारी
- जिला (परगना) एवं ग्राम प्रशासन व्यवस्था
- सामंत व्यवस्था (जागीरदारी प्रणाली) — सामान्य संरचना एवं विशेषताएं
- रियासतवार सामंत-वर्गीकरण
- भूमि वर्गीकरण
- राजस्व निर्धारण एवं वसूली की पद्धतियां
- कृषक वर्ग एवं लगान निर्धारण के आधार
- कर एवं लाग-बाग व्यवस्था
- न्याय व्यवस्था
- सैन्य व्यवस्था
- महत्वपूर्ण अभिलेखीय शब्द एवं आधुनिक संदर्भ
कल्पना कीजिए — किसी गांव का एक किसान अपने खेत में हल चला रहा है। उसके सिर पर तीन "मालिक" हैं — गांव का पटवारी जो उसकी उपज नापता है, ठिकाने का सामंत जिसे वह "लाग-बाग" चुकाता है, और दूर बैठा राजा जिसकी सत्ता का यह पूरा ढांचा प्रतीक है। परंतु आश्चर्य की बात यह है कि इस किसान की भूमि पर उसका अपना अधिकार भी उतना ही पक्का था — दुर्भिक्ष में गांव छोड़कर जाने पर भी लौटने पर वही भूमि उसे वापस मिलती थी। यही मध्यकालीन राजस्थान की प्रशासनिक व्यवस्था का सार है — एक ऐसा जटिल किंतु संतुलित तंत्र, जो राजा से लेकर सामंत, हाकिम, पटवारी और अंततः किसान तक फैला था। यह अध्याय इसी केंद्रीय-जिला-ग्राम प्रशासन, सामंत (जागीरदारी) प्रणाली, भू-राजस्व व्यवस्था, न्याय व्यवस्था तथा सैन्य संगठन को विस्तार से समझाता है।
1केंद्रीय प्रशासन — राजा एवं मंत्रिपरिषद
- मध्यकालीन राजस्थान की रियासतों के शासक पूर्ण स्वतंत्र संप्रभु सत्ता के स्वामी थे — वे "महाराजाधिराज" व "राजराजेश्वर" जैसी उपाधियां धारण करते थे। राजा शासन, सैन्य नेतृत्व, न्याय, संधि-निर्माण व राज्य-सुरक्षा का सर्वोच्च उत्तरदायी था — राज्य की रक्षा के दायित्व के कारण उसे "खुम्माण" भी कहा जाता था। राजा की अनुपस्थिति या अल्पवयस्कता में रानियां भी शासन-भार संभालती थीं।
- राजा की सहायता हेतु एक मंत्रिपरिषद (Council of Ministers) होती थी, जिसके सदस्य वंशानुगत रूप से या राजपरिवार से बाहर से भी नियुक्त किए जाते थे। मेवाड़ के सारणेश्वर अभिलेख के अनुसार इस परिषद में निम्नलिखित प्रमुख पद सम्मिलित थे —
| पद (Post) | कार्य/उत्तरदायित्व (Responsibility) |
|---|
| अक्षपटलिक (Akshapatalik) | राज्य की आय-व्यय तथा अनुदानों संबंधी अभिलेखों (रिकॉर्ड) का रखरखाव |
| संधिविग्रहिक (Sandhivigrahik) | युद्ध व संधि संबंधी आदेश तथा विदेश-पत्राचार तैयार करना |
| अमात्य (Amatya) | मंत्रिपरिषद का वरिष्ठतम सदस्य; राजा का प्रमुख सहायक — आधुनिक प्रधानमंत्री तुल्य |
| भिषग्धिराज (Bhishagadhiraja) | राज्य का प्रमुख राजवैद्य (चिकित्सक) |
| वंदिपति (Vandipati) | राजा के गुणों, कार्यों व वंश की प्रशस्ति गायन व लेखन |
| महामंत्री (Mahamantri) | राजा का प्रमुख सलाहकार; अन्य मंत्रियों की देखरेख कर सुचारु प्रशासन सुनिश्चित करना |
| भांडारिक (Bhandarik) | राजकोष का प्रमुख अधिकारी; आगे चलकर "भंडारी" (कोष एवं आपूर्ति व्यवस्था) कहलाया |
| महाप्रतिहार (Mahapratihar) | दरबार में अनुशासन बनाए रखना; आगंतुकों को शिष्टाचार संबंधी निर्देश देना |
| नैमित्तिक (Naimittika) | राजज्योतिषी — शुभ मुहूर्त व ग्रह-नक्षत्र संबंधी परामर्श |
मुगल-प्रभाव: जब राजपूत शासक मुगलों के संपर्क में आए, तो धीरे-धीरे मुगल प्रशासनिक शैली का प्रभाव रियासती प्रशासन पर भी पड़ने लगा — विशेषकर बीकानेर में महाराजा रायसिंह (1574-1612 ई.), मारवाड़ में महाराजा सूरसिंह (1595-1619 ई.) तथा मेवाड़ में महाराणा अमरसिंह प्रथम (जिन्होंने 1615 ई. में मुगलों से संधि की) के शासनकाल में रियासती प्रशासन का पुनर्गठन मुगल मॉडल के आधार पर हुआ।
2प्रधान (प्रधानमंत्री) एवं दीवान व्यवस्था — रियासतवार उपाधियां
- राजा के बाद प्रशासनिक, सैन्य व न्यायिक — तीनों क्षेत्रों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका "प्रधान" (प्रधानमंत्री तुल्य) की होती थी। यह पद आधुनिक मुख्यमंत्री के समकक्ष था, परंतु विभिन्न रियासतों में इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता था —
| रियासत (State) | प्रधानमंत्री की उपाधि (Title) |
|---|
| मेवाड़, मारवाड़, जैसलमेर | प्रधान (Pradhan) |
| जयपुर/आमेर | मुसाहिब (Musahib) |
| कोटा, बूंदी | दीवान (Diwan) |
| बीकानेर | मुख्तियार (Mukhtyar) |
| सलूंबर (ठिकाना) | भांजगढ़ (Bhanjgarh) |
- दीवान — जहां "प्रधान" पद रिक्त होता था, वहां दीवान ही सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी की भूमिका निभाता था। दीवान का मुख्य कार्य राजस्व-संग्रहण एवं वित्तीय मामलों का प्रबंधन था; वह "दीवान-ए-हजूरी" कार्यालय में अभिलेख रखता था। राजकीय नियुक्तियों, पदोन्नति व स्थानांतरण में भी उसकी सहमति आवश्यक होती थी।
- मेहकमा-ए-बकायात — दीवान कार्यालय के अंतर्गत कार्यरत यह विभाग परगनों के अधिकारियों को राजस्व-दरों, बकाया-वसूली व दीवान-ए-हजूरी को भेजी जाने वाली राशि संबंधी निर्देश जारी करता था।
3अन्य प्रमुख राजकीय अधिकारी
| पद (Post) | कार्य (Function) |
|---|
| बख्शी (Bakshi) | सैन्य विभाग का प्रधान — सैनिकों के वेतन, आपूर्ति, भर्ती व प्रशिक्षण का दायित्व; राजा का विश्वासपात्र, गोपनीय राजकीय विचार-विमर्श में भाग लेता था; अधीनस्थ — नायब-बख्शी, किलेदार, खबर-नवीस |
| खानसामा (Khan-Sama) | दीवान के अधीन, राजपरिवार के निकटतम अधिकारियों में से एक; राजकीय सामग्री की खरीद व प्रबंधन |
| कोतवाल (Kotwal) | राजधानी व बड़े नगरों में नियुक्त — कानून-व्यवस्था, मूल्य-नियंत्रण, माप-तौल की निगरानी, सड़कों की देखरेख, रात्रि-गश्त व छोटे विवादों का निपटारा |
| सिकदार (Sikdar) | कोतवाल के समान कार्य; मुख्यतः गैर-सैनिक कर्मियों की नियुक्ति संबंधी कार्य देखता था |
| खजांची/कोषपति (Khajanchi/Koshpati) | राजकोष का प्रबंधन — धन प्राप्ति व व्यय; मेवाड़ में इसे "कोषपति" कहा जाता था |
| ड्योढ़ीदार (Dyodhidar) | महल के प्रवेश-द्वार पर तैनात; राजा से भेंट हेतु आगंतुकों को अनुमति देने का अधिकार; यह पद वंशानुगत होता था तथा महल की कुंजियां इसी अधिकारी के पास रहती थीं — दो प्रकार: सामान्य ड्योढ़ीदार (पुरुष विभाग हेतु) व दरोगा ड्योढ़ीदार (महिला विभाग हेतु) |
| मुत्सद्दी (Mutsaddi) | रियासती प्रशासन के विविध कार्यों का संचालन |
| वाकया-नवीस (Waqia-Navis) | महत्वपूर्ण घटनाओं व सूचनाओं के प्रेषण संबंधी विभाग का प्रबंधन |
| दरोगा-ए-डाक चौकी | डाक-व्यवस्था का प्रबंधन |
💡 ड्योढ़ीदार — महल का सबसे भरोसेमंद प्रहरी
सोचिए — राजा के महल में हर दिन दर्जनों लोग भेंट के लिए आते थे, परंतु किसे भीतर जाने देना है और किसे नहीं, यह निर्णय एक ही अधिकारी — ड्योढ़ीदार — के हाथ में था। यह पद इतना संवेदनशील माना जाता था कि इसे वंशानुगत रूप से केवल अत्यंत विश्वसनीय परिवारों को ही सौंपा जाता था, और महल की कुंजियां भी इसी अधिकारी के पास सुरक्षित रहती थीं। यदि कभी ड्योढ़ीदार की निष्ठा पर संदेह होता या वह किसी विवाद में फंसता, तभी उसे पद से हटाया जाता था।
4जिला (परगना) एवं ग्राम प्रशासन व्यवस्था
A. परगना (जिला) स्तरीय प्रशासन
- प्रशासनिक सुविधा हेतु संपूर्ण राज्य को परगनों में बांटा जाता था, जो आगे ग्राम, मंडल व दुर्ग में विभाजित होते थे। प्रत्येक इकाई के प्रधान का अलग-अलग नाम था — ग्राम का प्रधान "ग्रामिक", मंडल का प्रधान "मंडलपति" तथा दुर्ग का प्रधान "दुर्गाधिपति/तलारक्ष" कहलाता था। मारवाड़ में परगना-अधिकारियों को "हाकिम" व "फौजदार" कहा जाता था।
| पद (Post) | कार्य (Function) |
|---|
| हाकिम (Hakim) | परगने का सर्वोच्च अधिकारी — प्रशासनिक व न्यायिक दोनों कार्य देखता था; सहायक अधिकारी — शिकदार, कानूनगो, खजांची, शहना (वेतन अथवा अनाज के बदले कार्यरत) |
| फौजदार (Faujdar) | परगने की पुलिस व सैन्य व्यवस्था का प्रधान; परगने की सीमाओं की सुरक्षा; राजस्व-वसूली में अमलगुजार, आमीन व आमिल की सहायता करता था; अधीनस्थ थानेदार चोर-डाकुओं की धरपकड़ करते थे — मारवाड़ में डाकुओं के विरुद्ध फौजदार के अभियान को "बाहर चढ़ना" कहा जाता था |
| आमिल (Amil) | परगने में भू-राजस्व दरें लागू करना व वसूली करना; सहायक — कानूनगो, पटेल, पटवारी व चौधरी |
| ओहदेदार (Ohdedar) | बड़े परगनों में हाकिम की सहायता हेतु नियुक्त किया जाता था |
| खुफिया-नवीस (Khufia Navis) | परगने की गोपनीय रिपोर्ट तैयार कर दीवान को भेजने का दायित्व |
| पोतदार (Potdar) | परगने की आय-व्यय संबंधी लेखा-जोखा रखना |
B. ग्राम (village) स्तरीय प्रशासन
- गांव को "मौजा" कहा जाता था। पूर्व-स्थापित गांवों को "असली" तथा नवस्थापित गांवों को "दाखिली" कहा जाता था। मेवाड़ में गांव की जनसंख्या-संरचना के आधार पर भी अलग-अलग नाम प्रचलित थे — राजपूत-बहुल गांव "गड़ा", भील-मीणा बहुल गांव "गमेती" तथा महाजन/व्यापारी-बहुल गांव "पटवारी" कहलाते थे।
- ग्राम पंचायत गांव-स्तर पर न्याय, विवाद-निपटारे तथा धार्मिक-सामाजिक कार्यों की देखरेख करती थी, जिसे राज्य की मान्यता प्राप्त थी।
| ग्राम अधिकारी (Village Official) | कार्य (Function) |
|---|
| पटवारी (Patwari) | भूमि-अभिलेखों का रखरखाव तथा राजस्व-संग्रहण |
| कंवारी (Kanwari) | खड़ी फसल की सुरक्षा |
| दफेदार (Dafedar) | राजकीय आय-व्यय का लेखा रखना |
| तलवटी (Talwati) | उपज का माप-तौल |
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5सामंत व्यवस्था (जागीरदारी प्रणाली) — सामान्य संरचना एवं विशेषताएं
- राजपूत शासकों ने अपने विशाल राज्य को अपने संबंधियों व अधिकारियों में छोटे-छोटे भूमि-अनुदानों के रूप में बांट दिया, जिन्हें "सामंत" (Feudal Lords) कहा गया। राजस्थान की सामंत-व्यवस्था यूरोपीय सामंतवाद से भिन्न थी — यूरोप में यह स्वामी-सेवक (overlord-vassal) संबंध पर आधारित थी, जबकि राजस्थान में यह रक्त-संबंध व कुल-निष्ठा (kinship & clan loyalty) पर आधारित थी।
- सामंत कानून-व्यवस्था बनाए रखने, कर-वसूली व न्याय-प्रदान का कार्य करते थे, परंतु उन्हें मृत्युदंड देने, सिक्का ढालने या विदेशी संधि करने का अधिकार नहीं था। राजा व सामंत के बीच संबंध स्वामी-सेवक का नहीं, बल्कि एक आचार-संहिता (code of conduct) पर आधारित था — राजा सामंतों को "काकाजी" या "भाईजी" कहकर संबोधित करता था, तथा सामंत राजा को "बापजी" कहते थे।
| सामंत वर्ग (Category) | विवरण (Description) |
|---|
| राज्वी (Rajvi) | शासक के निकटतम संबंधी व छोटे भाई — राजवंश का प्रत्यक्ष रक्त-संबंध |
| सरदार सामंत (Sardar Samants) | राजवंश के अप्रत्यक्ष/दूरस्थ वंशज — प्रशासनिक व सैन्य सेवा प्रदान करते थे |
| मुत्सद्दी सामंत
(Mutasaddi Samants) | राज्य-प्रशासन में सेवा के बदले जागीर प्राप्त अधिकारी |
| गणायत सामंत
(Ganayat Samants) | राज्य-स्थापना से पूर्व के स्थानीय सामंत, जिन्होंने शासक वंश (जैसे राठौड़) की अधीनता स्वीकार की |
| देश/राज सामंत (Desh/Raj Samants) | राज्य में निवासरत, प्रशासनिक व सैन्य सेवा प्रदान करने वाले सामंत |
| दरबार सामंत (Darbar Samants) | दरबार से निकट संबंध रखने वाले कुलीन व राजवंशीय सामंत |
| भोमिया सामंत (Bhomia Samants) | सीमा-सुरक्षा हेतु प्रदत्त भूमि; प्रायः कर-मुक्त एवं पैतृक भूमि |
सामंतों के विशेषाधिकार (Privileges of Feudal Lords)
- तजीम (Tajim) — दो प्रकार: प्रथम, राजा द्वारा सामंत के स्वागत में स्वयं खड़े होना; द्वितीय, सामंत के कंधे पर हाथ रखने की क्रिया को "बाह पसाव" (Bah Pasav) कहा जाता था।
- सिरोपाव (Seeropav) — सामंतों को वस्त्र या आभूषण के रूप में दिए जाने वाले उपहार।
- कुर्ब परंपरा (Kurb Traditions/अभिवादन) — "हाथ का कुर्ब" में सामंत राजा के घुटनों को स्पर्श करता था और राजा हाथ के इशारे से उत्तर देता था; "सिर का कुर्ब" विशिष्ट सामंतों को अन्य सामंतों से ऊपर बैठने का विशेष सम्मान देता था।
- उत्तराधिकार शुल्क (Succession Fee) — किसी सामंत की मृत्यु के बाद नए सामंत की नियुक्ति पर यह शुल्क लिया जाता था; भुगतान न करने पर जागीर जब्त हो सकती थी — जैसलमेर एकमात्र रियासत थी जहां यह शुल्क नहीं लिया जाता था।
| रियासत (State) | उत्तराधिकार शुल्क का नाम (Succession Fee Name) |
|---|
| मेवाड़ | तलवार बंधाई / कैद खालसा |
| मारवाड़ | हुकमनामा / पेशकशी |
| जयपुर | नज़राना |
| बीकानेर | पेशकशी |
| जैसलमेर | कोई शुल्क नहीं लिया जाता था (एकमात्र अपवाद) |
- रेख (Rekh) — सामंतों/जागीरदारों से वसूले जाने वाले राजस्व का मानक निर्धारण; मारवाड़ में यह दो प्रकार का था — पट्टा रेख (जागीर की अनुमानित वार्षिक आय, जो राजा द्वारा दिए गए पट्टे में उल्लिखित होती थी) एवं भरत/भरतु रेख (पट्टा रेख के आधार पर राजकोष में जमा कराई गई वास्तविक राशि)।
6रियासतवार सामंत-वर्गीकरण
| रियासत (State) | सामंत-वर्गीकरण (Classification) |
|---|
| मेवाड़ | "अमरशाही रेख" — संस्थापक अमरसिंह द्वितीय (1697-1709 ई.); श्रेणियां — महाराणा (सर्वोच्च), राजा/शहज़ादा/बनिख, प्रथम श्रेणी 16 उमराव, द्वितीय श्रेणी 32 सामंत, तृतीय श्रेणी 330-332 सामंत — सामूहिक रूप से "सोलह-बत्तीस-गोल सामंत" कहलाते थे; प्रमुख ठिकाने — शाहपुरा, बानेड़ा, सलूंबर, बेदला |
| मारवाड़ | मुख्य श्रेणियां — राज्वी (शासक के निकट संबंधी), सरदार (दायां मिसल-रणमल वंशज व बायां मिसल-जोधा वंशज), मुत्सद्दी (प्रशासनिक अधिकारी), गणायत (प्राचीन क्षेत्रीय सामंत); विशेष कर — अजीत सिंह द्वारा लगाया गया "तगिरात" कर |
| जयपुर/आमेर | पृथ्वीसिंह द्वारा स्थापित "बारह कोटरी प्रणाली" — प्रमुख कोटरी: कछवाहा (राजावत), नाथावत, खंगारोत, नरूका, बनकावत आदि; 12वीं कोटरी विशेष रूप से गुर्जरों के लिए आरक्षित थी |
| जैसलमेर | दो श्रेणियां — दावी मिसल एवं जीवणी मिसल |
| बीकानेर | तीन श्रेणियां — प्रथम व द्वितीय (राव बीका के वंशज, "आसामीदार चाकर पट्टायत" कहलाते थे), तृतीय (शंखला, भाटी आदि स्थानीय/विदेशी अधीनस्थ सामंत) |
| कोटा | दो श्रेणियां — देस्थी (राज्य के भीतर सेवारत सामंत), हजूरी (मुगल दरबार में सेवारत सामंत) |
| भरतपुर | "सोलह कोटरी ठाकुर" — 16 प्रमुख सामंत-समूह |
विशेष तथ्य: मुगल प्रभाव जितना अधिक बढ़ा, रियासतों में केंद्रीकरण उतना ही अधिक हुआ और सामंतों की शक्ति क्रमशः कमजोर होती गई — यह प्रवृत्ति विशेषकर कोटा व अन्य मुगल-प्रभावित रियासतों में स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है।
7भूमि वर्गीकरण
A. स्वामित्व के आधार पर भूमि वर्गीकरण
| भूमि प्रकार (Land Type) | विशेषता (Characteristics) |
|---|
| खालसा (Khalsa) | राज्य के प्रत्यक्ष नियंत्रण में; राजस्व सीधे राजकोष में जमा होता था — इसे केंद्रीय भूमि भी कहा जा सकता है |
| जागीर (Jagir) | सामंतों/जागीरदारों को सैन्य या प्रशासनिक सेवा के बदले प्रदत्त; हस्तांतरण हेतु राजकीय स्वीकृति आवश्यक — चार उपप्रकार: सामंत जागीर (जन्मजात, वंशानुगत), हुकूमत जागीर (मुत्सद्दियों को वेतन-स्वरूप, मृत्यु पर खालसा में परिवर्तित), भौम जागीर (सीमा-सुरक्षा सेवा हेतु, कर-मुक्त), सासण जागीर (धार्मिक/शिक्षा/साहित्य कार्य हेतु चारण-भाटों को प्रदत्त, "माफी जागीर" भी कहलाती थी) |
| भोम (Bhom) | कर-मुक्त भूमि; आपातकाल में भोमिया इसके बदले सेवा प्रदान करते थे |
| सासण (Sasan) | धार्मिक प्रयोजन हेतु अनुदान-स्वरूप प्रदत्त भूमि |
| इनाम (Inam) | राजकीय सेवा हेतु कर-मुक्त भूमि; हस्तांतरणीय नहीं होती थी |
| ग्रास (Grass) | सैन्य सेवा के बदले शासक द्वारा प्रदत्त भूमि |
| आलूफाती (Alufati) | राजपरिवार की महिलाओं के आजीवन निर्वाह हेतु प्रदत्त भूमि |
| डोली (Doli) | धार्मिक प्रयोजन हेतु दान की गई कर-मुक्त भूमि |
| डूंबा (Doomba) | बसाहटकर्ताओं द्वारा विकसित की गई कृषि योग्य भूमि — कर योग्य |
B. उर्वरता एवं सिंचाई के आधार पर भूमि वर्गीकरण
| भूमि प्रकार (Land Type) | विशेषता (Characteristics) |
|---|
| हकत-बकत (Hakat-Bakat) | वास्तव में जोती जाने वाली भूमि |
| कांकड़ (Kankar) | घना वन क्षेत्र; गांव की सीमा हेतु भी प्रयुक्त शब्द |
| गोरमो (Gormo) | गांव के निकट स्थित भूमि |
| पीवल (Pival/Peewal) | तालाब-कुओं से सिंचित भूमि |
| बीड़ (Beed) | नदी-नालों के निकट की भूमि |
| माल (Maal) | काली उपजाऊ मिट्टी वाली सर्वाधिक उपजाऊ भूमि |
| डिमडू (Dimdu) | कुओं/गड्ढों के निकट की भूमि |
| तलाई (Talai) | तालाब की तलहटी की भूमि — अतिरिक्त सिंचाई के बिना ही फसल उगती थी |
| मगरा (Magra) | पहाड़ी क्षेत्र की भूमि |
| बरणी/बारानी (Barani) | पूर्णतः वर्षा-आधारित, असिंचित भूमि |
| चाही (Chahi) | नहर/नदी से सिंचित भूमि |
| चरनोटा/गोचर/ओरण (Charanota/Gochar/Oran) | ग्राम पंचायत के अधीन; पशु-चारण हेतु आरक्षित सार्वजनिक भूमि |
| बंजर (Banjar) | अकृषि-योग्य सार्वजनिक भूमि |
| पसैतिया (Pasatia) | राजकीय सेवा हेतु प्रदत्त; सेवा-समाप्ति पर राज्य को वापस लौटती थी |
8राजस्व निर्धारण एवं वसूली की पद्धतियां
| पद्धति (Method) | विवरण (Description) |
|---|
| बटाई/लाटा विधि
(Batai/Lata) | फसल पकने पर नियुक्त अधिकारी की देखरेख में कटाई की जाती; अनाज साफ होने पर राज्य का भाग तोलकर पृथक कर दिया जाता — उपप्रकार: खेत बटाई (कटाई के समय विभाजन), लंक बटाई (कटाई के बाद विभाजन), रास बटाई (दंवरी/मड़ाई के बाद विभाजन) — सामान्यतः राज्य का भाग लगभग 1/3 होता था |
| कूंता विधि (Kunta) | खड़ी फसल को देखकर अनुमानित लगान निर्धारित करना; इसमें कोई तोल-माप नहीं होता था, जिससे विवाद की संभावना अधिक रहती थी |
| मुकाता (Mukata) | प्रत्येक खेत के लिए निश्चित (फिक्स्ड) राजस्व राशि तय करना |
| डोरी (Dori) | मापी गई भूमि के आधार पर नकद राजस्व वसूलना — मुद्रा-आधारित कर-प्रणाली |
| घूघरी (Ghughri) | शासक/सामंत/जागीरदार द्वारा किसान को दिए गए बीज (घूघरी) के अनुपात में ही अनाज वसूला जाता था; एक अन्य रूप में प्रति कुआं या खेत की पैदावर पर निर्भरता होती थी |
| हल पद्धति (Hal System) | एक हल से जोती जाने वाली भूमि (लगभग 15-30 बीघा) के आधार पर राजस्व निर्धारण |
| बिघोड़ी (Bighodi) | अफीम, कपास जैसी नकदी फसलों पर प्रति बीघा कर |
| जब्ती (Jabti) | नकदी फसलों पर बीघा के आधार पर नकद राजस्व |
| नकद/भेजा (Cash/Bheja) | पूर्वी राजस्थान में नकद राजस्व को "भेजा" कहा जाता था |
| भींट की भाषा (Bhint Ki Bhasa) | बीकानेर में घरों की संख्या के आधार पर लगाया जाने वाला कर |
- सामान्यतः उपज का 1/3 या 1/4 भाग राजस्व के रूप में लिया जाता था, परंतु परंपरागत राजपूताना में यह दर कहीं-कहीं 1/7 या 1/8 भी रहती थी। "बिघोड़ी" शब्द प्रति बीघा कर के लिए प्रयुक्त होता था, तथा जब्त (सरकारी) व रैयती (किसान-स्वामित्व) भूमि में कर-वसूली में अंतर रखा जाता था। सभी करों के भुगतान के बाद किसान के पास उपज का लगभग 2/5 भाग ही शेष बचता था।
| अतिरिक्त कृषि-कर (Additional Tax) | विवरण (Description) |
|---|
| उद्रंग (Udrang) | उपज का 1/6, 1/8 या 1/10 भाग — उन किसानों से वसूला जाता था जो भूमि को अपनी पैतृक संपत्ति मानते थे |
| भाग (Bhag) | उस भूमि पर लगाया जाता था जहां कोई भी खेती कर सकता था; राज्य पूर्व-निर्धारित भाग लेता था — दर उद्रंग से कहीं अधिक होती थी |
| हिरण्य (Hiranya) | जब राज्य अपना हिस्सा उपज के बजाय नकद रूप में वसूलता था, तो उसे "हिरण्य" कहा जाता था |
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9कृषक वर्ग एवं लगान निर्धारण के आधार
| कृषक वर्ग (Category) | विवरण (Description) |
|---|
| बापीदार/खुदकाश्तकार (Bapidar) | भूमि के स्थायी एवं वंशानुगत स्वामी; भूमि पर पूर्ण अधिकार — दुर्भिक्ष के समय गांव छोड़कर जाने पर भी लौटने पर भूमि सुरक्षित रहती थी; खेत की लकड़ी व कुओं पर भी स्वामित्व |
| गैर-बापीदार/शिकमी काश्तकार (Gair-Bapidar) | वंशानुगत अधिकार नहीं; भूमि के स्वामी नहीं — भूमिहीन खेतिहर मजदूर के समान |
| रैयती (Rayati) | अस्थायी/मौसमी पट्टे पर भूमि रखने वाले किसान |
| पाहीकाश्त (Pahikasht) | अन्य गांव में जाकर खेती करने वाले किसान |
| रियायती (Riayati) | विशेष सुविधा-प्राप्त किसान |
| गेवती (Gewati) | गांव के स्थायी निवासी किसान |
- लगान निर्धारण में मुख्यतः तीन तत्व ध्यान में रखे जाते थे — प्रथम, भूमि का स्वरूप (बारानी अर्थात् वर्षा-सिंचित या उन्नाव अर्थात् तालाब-कुओं से सिंचित); द्वितीय, फसल की गुणवत्ता (बाजार-भाव व भूमि की उत्पादकता); तृतीय, काश्तकार की जाति — मान्यता थी कि राजपूतों व विश्नोइयों की तुलना में जाटों से अधिक कर लिया जाता था, जबकि राजपूत, ब्राह्मण व महाजन किसानों को विशेष छूट दी जाती थी। लगान निर्धारण व वसूली में पटेल या चौधरी मध्यस्थ की भूमिका निभाते थे — ध्यान रहे, ये सरकारी कर्मचारी नहीं होते थे।
💡 कर्नल जेम्स टॉड की प्रसिद्ध कहावत
"भोग रा धणी राज हो, भोम रा धणी मा छो" — इस राजस्थानी कहावत का अर्थ है: भूमि (भोम) का स्वामी वह है जो उसे जोतता है, जबकि राजा केवल उपज के भाग (भोग) का अधिकारी है। कर्नल जेम्स टॉड ने इस कहावत के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि मध्यकालीन राजस्थान में भूमि पर वास्तविक स्वामित्व सदैव किसान का ही माना जाता था, राजा केवल उस पर कर वसूलने का अधिकारी था — यह तथ्य दर्शाता है कि किसान की भूमि-सुरक्षा उस युग में भी एक स्थापित सिद्धांत थी।
💡 महाराजा सूरजमल की कृषि-नीति — भरतपुर का उदाहरण
भरतपुर के महाराजा सूरजमल (विस्तार देखें: अध्याय 10) ने कृषि की उन्नति हेतु अत्यंत सुदृढ़ नीति अपनाई — परिणामस्वरूप उनके शासनकाल के अंतिम वर्ष 1763 ई. में भरतपुर राज्य की कृषि से वार्षिक आय 17.5 लाख रुपये तक पहुंच गई। इस आय का एक बड़ा भाग उन्होंने शिक्षा व साहित्य के विकास में लगाया। उनकी मान्यता थी कि यदि राज्य आर्थिक दृष्टि से सुदृढ़ है, तो वह विपरीत परिस्थितियों में भी मजबूती से खड़ा रह सकता है — यही सुदृढ़ कृषि-नीति भरतपुर की समृद्धि का आधार बनी।
10कर एवं लाग-बाग व्यवस्था
- मध्यकालीन राजस्थान में भू-राजस्व के अतिरिक्त भी अनेक प्रकार के कर व सामाजिक अवसरों पर वसूले जाने वाले "लाग-बाग" प्रचलित थे — कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं:
| कर/लाग (Tax/Levy) | अर्थ एवं संदर्भ (Meaning & Context) |
|---|
| खम्स (Khams) | युद्ध में प्राप्त लूट पर कर — सामान्यतः राज्य को 20% व सैनिकों को 80% मिलता था; अलाउद्दीन खिलजी व मुहम्मद बिन तुगलक ने स्वयं 80% भाग रखा था |
| खराज/खिराज (Kharaj/Khiraj) | इस्लामी शासन में गैर-मुस्लिमों पर लगाया गया भूमि-कर — जजिया से भिन्न |
| नज़र/नज़राना (Nazar/Nazrana) | विजित सामंत/सरदार द्वारा शासक को सम्मान-स्वरूप दी गई भेंट |
| घूघरी टैक्स (Ghughri Tax) | दिए गए बीज के अनुपात में वसूला जाने वाला अनाज-कर |
| दस्तूर (Dastoor) | राजस्व-कर्मचारियों द्वारा अवैध रूप से वसूला जाने वाला अतिरिक्त शुल्क |
| न्यौता लाग (Nyauta Lag) | सामंतों के परिवार में होने वाले उत्सवों पर वसूला जाने वाला कर |
| चंवरी लाग (Chavari Lag) | सामंतों की पुत्रियों के विवाह अवसर पर वसूला जाने वाला कर |
| खिचड़ी लाग (Khichdi Lag) | सामंतों की यात्रा/भ्रमण अवसर पर वसूला जाने वाला कर |
| बाईजी लाग (Baiji Lag) | पुत्री के जन्म अवसर पर वसूला जाने वाला कर |
| सिगोंटी (Sigonti) | पशुओं की बिक्री पर लगाया जाने वाला कर |
| जाजम लाग (Jajam Lag) | भूमि की बिक्री पर लगाया जाने वाला कर |
| कुंवरजी का घोड़ा (Kunwarji ka Ghoda) | युवराज के अश्व-प्रशिक्षण हेतु वसूला जाने वाला कर |
| इदरार (Idrar) | धार्मिक व विद्वान व्यक्तियों को दी जाने वाली वित्तीय सहायता/वृत्ति — यह कर नहीं था |
| खिलअत (Khilat) | निष्ठा या सम्मान के प्रतीक-स्वरूप दिया गया विशेष वस्त्र — राजनीतिक प्रतिष्ठा का प्रतीक |
- इनके अतिरिक्त भी अनेक "लाग" प्रचलित थीं — जैसे चूड़ा लाग (सामंत-महिलाओं की नई चूड़ियों पर), हलमा (जुताई हेतु श्रम-कर), मालवा (सेवकों के व्यय हेतु सामंतों पर कर), कामठा लाग (दुर्ग-निर्माण हेतु), दाण (अंतर-राज्यीय माल पर कर), नूता (सामंतों के उत्सव/शोक अवसर पर), कर्ज खर्च (सामंत-परिवार में मृत्यु पर) तथा कागली/नाता (विधवा-पुनर्विवाह अवसर पर)।
11न्याय व्यवस्था
- मध्यकालीन राजस्थान की न्याय व्यवस्था पारंपरिक थी — राजा सर्वोच्च न्यायाधीश होता था, जबकि सामंत अपनी जागीर में प्रमुख न्यायाधीश की भूमिका निभाता था। इसके अतिरिक्त गांवों में ग्राम पंचायतें भी न्याय-कार्य संपन्न करती थीं। खालसा क्षेत्र में न्याय हाकिमों द्वारा तथा जागीर क्षेत्र में जागीरदार द्वारा किया जाता था।
- छोटी चोरियों व सामाजिक अपराधों से संबंधित झगड़े जाति-पंचायत व ग्राम-पंचायत द्वारा सुलझाए जाते थे; वहां समाधान न होने पर मामला हाकिम या जागीरदार के न्यायालय में जाता था। भूमि-विवाद संबंधी झगड़े भी आवश्यकता पड़ने पर हाकिम या जागीरदार के न्यायालय में प्रस्तुत होते थे। बड़े अपराध व मृत्युदंड संबंधी विवादों में अंतिम निर्णय राजा का ही होता था।
- न्याय का आधार परंपरागत सामाजिक व धार्मिक व्यवस्था थी। मुकदमों का कोई लिखित अभिलेख नहीं रखा जाता था, तथा गवाही संबंधी कोई पृथक कानून भी नहीं था।
- सामंतों को "सरणा" (शरणागत-रक्षा) का विशेष अधिकार प्राप्त था — यदि कोई व्यक्ति सामंत की शरण में चला जाता, तो उसकी रक्षा करना सामंत की प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाता था। कई बार अपराधी भी इसी अधिकार का लाभ उठाकर सामंत की शरण ले लेते थे, जिसका न्याय-व्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव भी पड़ता था।
"अपराध को व्यक्ति के विरुद्ध अपराध माना जाता था, समाज के विरुद्ध नहीं। कानून के समक्ष सब बराबर नहीं थे — एक ही अपराध के लिए दंड देते समय अपराधी व पीड़ित दोनों की सामाजिक स्थिति देखकर ही दंड निर्धारित किया जाता था।" — डॉ. एम.एस. जैन
- मध्यकालीन न्याय व्यवस्था की मुख्य विशेषता यह थी कि यह सस्ती व शीघ्र होती थी — दंडविधान भी सामान्यतः कठोर नहीं होते थे।
12सैन्य व्यवस्था
- राजपूत सेना मुख्यतः दो भागों में विभाजित थी — अहदी (शासक की व्यक्तिगत सेना, जिसकी भर्ती, प्रशिक्षण व वेतन दीवान व मीर बख्शी द्वारा प्रबंधित होता था) एवं जमीयत (सामंतों/जागीरदारों की अपनी सेना, जो उन्हीं के द्वारा प्रबंधित होती थी)।
| सैन्य विभाग (Division) | संरचना (Structure) |
|---|
| पैदल सेना (Pyade) | राजपूत सेना का सबसे बड़ा भाग — दो प्रकार: अहशाम सैनिक (धनुष, तलवार व कटार से सुसज्जित) एवं सिहाबंदी सैनिक (राजस्व-वसूली हेतु अस्थायी रूप से नियुक्त सैनिक) |
| अश्वारोही सेना (Cavalry) | घुड़सवार व शुतरसवार (ऊंट-सवार) सैनिक — राजपूत सेना की रीढ़; बरगीर (राज्य द्वारा घोड़ा व हथियार प्रदत्त सैनिक) एवं सिलेदार (स्वयं अपने साधन जुटाने वाला सैनिक) |
अश्वारोहियों का वर्गीकरण (Classification of Horsemen)
| वर्ग (Category) | विवरण (Description) |
|---|
| यक अस्पा (Yak Aspa) | एक घोड़े का स्वामी सैनिक |
| दु अस्पा (Du Aspa) | दो घोड़ों का स्वामी सैनिक |
| सिह अस्पा (Sih Aspa) | तीन घोड़ों का स्वामी सैनिक |
| निम अस्पा (Nim Aspa) | दो सैनिक मिलकर एक घोड़े का उपयोग करते थे |
13महत्वपूर्ण अभिलेखीय शब्द एवं आधुनिक संदर्भ
| शब्द (Term) | अर्थ/संदर्भ (Meaning/Context) |
|---|
| अड़सट्टा/अरसट्टा (Adasatta/Arsatta) | जयपुर रियासत का भूमि संबंधी रिकॉर्ड — इसमें परगनों के सभी मौजों (गांवों) की भूमि, उत्पादन आदि का विस्तृत विवरण दर्ज होता था |
| चतुण्ड (Chatund) | मेवाड़ में सामंतों द्वारा अपनी आय का 1/6 भाग राज्य को देने की व्यवस्था |
| सायर (Sayar) | जयपुर में आयात-निर्यात शुल्क, सीमा-शुल्क व चुंगी-कर का सम्मिलित/सामान्य नाम |
| साद पद्धति (Saad System) | ब्रिटिश काल में मेवाड़ क्षेत्र में लागू व्यवस्था — इसमें किसानों को भू-राजस्व चुकाना पड़ता था तथा राज्य भुगतान की गारंटी हेतु स्थानीय महाजनों (साहूकारों) पर निर्भर रहता था; इस व्यवस्था के कारण किसान क्रमशः महाजनों के ऋणजाल में फंसते गए |
| दाखला (Dakhla) | किसानों को दी जाने वाली भूमि का पट्टा, जो जागीरदार के रजिस्टर में दर्ज रहता था |
आधुनिक संदर्भ — मध्यकाल से वर्तमान तक की यात्रा: मध्यकालीन "अरसट्टा", "पटवारी" व "दाखला" जैसी अवधारणाएं आज भी राजस्थान की भू-राजस्व व्यवस्था में जीवंत हैं — आधुनिक "जमाबंदी" व "खतौनी" उन्हीं परंपराओं के विकसित रूप हैं। आज राजस्थान सरकार का "अपना खाता" (apnaakhata.com) व "भूलेख राजस्थान" पोर्टल इन्हीं भूमि-अभिलेखों को डिजिटल रूप में उपलब्ध कराता है — यह दर्शाता है कि मध्यकालीन भू-प्रशासन के मूल सिद्धांत आज भी किसी न किसी रूप में हमारी राजस्व-व्यवस्था का आधार बने हुए हैं।
मध्यकालीन व्यवस्था की सकारात्मक विशेषताएं
- किसान भूमि का वास्तविक स्वामी माना जाता था, दुर्भिक्ष में भी उसका भूमि-अधिकार सुरक्षित रहता था
- न्याय सस्ता व शीघ्र था, दंडविधान सामान्यतः कठोर नहीं होते थे
- अकाल के समय किसानों को लगान से छूट मिलती थी
- ग्राम पंचायत स्तर पर ही अधिकांश विवाद सुलझ जाते थे
व्यवस्था की सीमाएं व चुनौतियां
- जाति के आधार पर लगान-दरों में भेदभाव होता था (जाटों से अधिक, राजपूत-ब्राह्मण-महाजन को छूट)
- कानून के समक्ष सब बराबर नहीं थे — दंड सामाजिक स्थिति पर निर्भर करता था
- अनेक प्रकार के "लाग-बाग" किसानों पर अतिरिक्त बोझ डालते थे
- ब्रिटिश काल की "साद पद्धति" ने किसानों को महाजनों के ऋणजाल में फंसा दिया
★ अध्याय सार — महत्वपूर्ण तथ्य ★
1. मेवाड़ के सारणेश्वर अभिलेख के अनुसार मंत्रिपरिषद में अक्षपटलिक, संधिविग्रहिक, अमात्य व भिषग्धिराज जैसे प्रमुख पद सम्मिलित थे। 2. प्रधानमंत्री-तुल्य पद को मेवाड़/मारवाड़/जैसलमेर में "प्रधान", जयपुर में "मुसाहिब", कोटा-बूंदी में "दीवान" तथा बीकानेर में "मुख्तियार" कहा जाता था। 3. राज्य परगनों में तथा परगने ग्राम-मंडल-दुर्ग में विभाजित थे; परगने का प्रधान अधिकारी हाकिम व सैन्य-पुलिस प्रधान फौजदार कहलाता था। 4. मेवाड़ में जनसंख्या-संरचना अनुसार गांवों के नाम भिन्न थे — गड़ा (राजपूत-बहुल), गमेती (भील-मीणा बहुल), पटवारी (महाजन-बहुल)। 5. राजस्थान की सामंत-व्यवस्था रक्त-संबंध व कुल-निष्ठा पर आधारित थी, न कि यूरोपीय स्वामी-सेवक संबंध पर — राजा सामंतों को "काकाजी/भाईजी" व सामंत राजा को "बापजी" कहते थे। 6. जैसलमेर एकमात्र रियासत थी जहां सामंतों से उत्तराधिकार-शुल्क नहीं लिया जाता था। 7. मेवाड़ की "अमरशाही रेख" व्यवस्था में सामंत तीन श्रेणियों में विभाजित थे — 16 उमराव, 32 सामंत व 330-332 सामंत ("सोलह-बत्तीस-गोल")। 8. जयपुर में पृथ्वीसिंह द्वारा स्थापित "बारह कोटरी प्रणाली" में राजावत, नाथावत, खंगारोत, नरूका आदि कोटरियां तथा 13वीं कोटरी गुर्जरों की थी। 9. भूमि स्वामित्व के आधार पर खालसा, जागीर (4 उपप्रकार), भोम, सासण, इनाम, ग्रास जैसे वर्ग तथा उर्वरता-सिंचाई आधार पर माल, बीड़, बारानी, चरनोटा जैसे वर्ग प्रचलित थे। 10. राजस्व वसूली की प्रमुख विधियां — बटाई/लाटा (लगभग 1/3 भाग), कूंता (अनुमान आधारित), मुकाता, डोरी, घूघरी व हल पद्धति थीं। 11. सामान्यतः उपज का 1/3-1/4 भाग राजस्व होता था, परंतु परंपरागत राजपूताना दर कहीं-कहीं 1/7-1/8 भी थी — सभी कर चुकाने के बाद किसान के पास लगभग 2/5 भाग शेष बचता था। 12. कर्नल जेम्स टॉड ने "भोग रा धणी राज हो, भोम रा धणी मा छो" कहावत से किसान की भूमि-स्वामित्व की सुरक्षा को स्पष्ट किया। 13. भरतपुर के सूरजमल की सुदृढ़ कृषि-नीति से 1763 ई. में राज्य की कृषि-आय 17.5 लाख रुपये वार्षिक तक पहुंची। 14. न्याय व्यवस्था में राजा सर्वोच्च न्यायाधीश, सामंत अपनी जागीर में न्यायाधीश तथा ग्राम-जाति पंचायतें छोटे विवाद सुलझाती थीं — मुकदमों का कोई लिखित अभिलेख नहीं रखा जाता था। 15. सैन्य व्यवस्था में अहदी (शासक की सेना) व जमीयत (सामंतों की सेना) मुख्य विभाजन था; अश्वारोहियों को यक-अस्पा, दु-अस्पा, सिह-अस्पा व निम-अस्पा में वर्गीकृत किया जाता था। 16. जयपुर का "अड़सट्टा/अरसट्टा" रिकॉर्ड परगनों की भूमि व उत्पादन का विस्तृत लेखा-जोखा रखता था — यह आज की जमाबंदी का पूर्वज माना जा सकता है। 17. ब्रिटिश काल में मेवाड़ में लागू "साद पद्धति" ने किसानों को महाजनों (साहूकारों) के ऋणजाल में फंसा दिया, जो आगे चलकर किसान आंदोलनों के कारणों में से एक बनी (विस्तार अध्याय 14)।
नीचे दी समय-रेखा (Timeline) इस अध्याय के प्रशासनिक विकास-क्रम को स्पष्ट करती है — रिवीजन के लिए इसे ज़रूर दोहराएं:
| काल/वर्ष (Period/Year) | घटना/विकास (Event/Development) | महत्व |
|---|
| 1574-1612 ई. | बीकानेर में महाराजा रायसिंह के शासनकाल में मुगल-प्रभावित प्रशासनिक मॉडल का प्रभाव प्रारंभ | मुगल प्रशासनिक शैली का रियासतों में प्रवेश |
| 1595-1619 ई. | मारवाड़ में महाराजा सूरसिंह के शासनकाल में मुगल-प्रभावित प्रशासनिक पुनर्गठन | राजस्थानी प्रशासन का आधुनिकीकरण प्रारंभ |
| 1615 ई. | मेवाड़-मुगल संधि (महाराणा अमरसिंह प्रथम) | मेवाड़ प्रशासन में भी मुगल मॉडल का प्रभाव प्रारंभ |
| 1697-1709 ई. | महाराणा अमरसिंह द्वितीय द्वारा मेवाड़ की "अमरशाही रेख" सामंत-वर्गीकरण व्यवस्था स्थापित | मेवाड़ की सामंत-व्यवस्था का औपचारिक ढांचा |
| 18वीं सदी पूर्वार्ध | जयपुर में सवाई प्रताप सिंह से पूर्व पृथ्वीसिंह द्वारा "बारह कोटरी" सामंत-व्यवस्था लागू | जयपुर की सामंत-व्यवस्था का आधार |
| 18वीं सदी | मारवाड़ में अजीत सिंह द्वारा विशेष "तगिरात" कर लगाया गया | सामंतों पर अतिरिक्त आर्थिक भार |
| 1763 ई. | भरतपुर के महाराजा सूरजमल की कृषि-राजस्व नीति से 17.5 लाख रुपये वार्षिक आय (विस्तार अध्याय 10) | सुदृढ़ कृषि-नीति का सफल उदाहरण |
| 1817-1818 ई. | अधिकांश राजपूत रियासतों की ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से अधीनस्थ संधियां | प्रशासन पर ब्रिटिश प्रभाव का प्रारंभ (विस्तार अध्याय 12) |
| 19वीं सदी | मेवाड़ क्षेत्र में ब्रिटिश काल की "साद पद्धति" लागू, किसान महाजनों के ऋणजाल में फंसे | किसान आंदोलनों की पृष्ठभूमि तैयार (विस्तार अध्याय 14) |
| 1947-1949 ई. | रियासतों का भारतीय संघ में विलय प्रारंभ | जागीरदारी/सामंती ढांचे के औपचारिक अंत की शुरुआत (विस्तार अध्याय 16) |
| 1952-1959 ई. | राजस्थान में जागीरदारी उन्मूलन अधिनियम व चरणबद्ध जागीर उन्मूलन | मध्यकालीन भू-व्यवस्था का पूर्ण अंत, आधुनिक भू-राजस्व व्यवस्था का प्रारंभ |
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