अब तक हमने चौहान, राठौड़ व कछवाहा जैसे बड़े राजपूत वंशों की गाथाएं पढ़ीं। परंतु राजस्थान का इतिहास सिर्फ इन्हीं वंशों तक सीमित नहीं है। कल्पना कीजिए — एक साधारण किसान समुदाय, जिसे "कमजोर" व "असंगठित" समझा जाता था, वही समुदाय आगे चलकर मुगल सम्राट औरंगजेब की नींद उड़ा देता है और अंततः आगरा के किले पर भी अधिकार कर लेता है — यह है भरतपुर के जाटों की कहानी, विशेषकर महाराजा सूरजमल की, जिन्हें "जाट जाति का अफलातून" कहा गया। दूसरी ओर करौली के यदुवंशी शासक स्वयं को भगवान श्रीकृष्ण का प्रत्यक्ष वंशज मानते हैं। बीकानेर व जैसलमेर जैसी थार मरुस्थल की रियासतों ने रेत के समुद्र में भी अपनी शक्तिशाली सल्तनतें खड़ी कीं। यह अध्याय राजस्थान के इन्हीं "अन्य किंतु समान रूप से महत्वपूर्ण" राजवंशों को समर्पित है।
| नेता (Leader) | वर्ष (Year) | घटना (Event) |
|---|---|---|
| गोकुला (तिलपत का जमींदार) | 1669 ई. | मथुरा-आगरा क्षेत्र में विद्रोह; औरंगजेब स्वयं दमन हेतु गया; गोकुला को बंदी बनाकर क्रूरतापूर्वक मार डाला गया |
| राजाराम (सिनसिनी के खानचंद का पुत्र) | 1681 ई. | आगरा के मुगल फौजदार मुलाफत खां की हत्या; सिकंदरा (आगरा) में अकबर के मकबरे से हड्डियां निकालकर जलाईं — औरंगजेब अत्यंत क्रुद्ध हुआ; औरंगजेब के सेनापति खान-ए-जहां का दमन-प्रयास असफल रहा |
| ब्रज | — | डीग के निकट अऊ गांव की शाही चौकी पर अधिकार |
| फतेह सिंह (राजाराम का पुत्र) | — | आमेर के बिशनसिंह ने फतेह सिंह को हराकर सिनसिनी पर कछवाहा नियंत्रण स्थापित किया |
"चूड़ामन एक असफल देशभक्त व सफल विद्रोही था; उसे राजसी सम्मान व उपाधियां तो नहीं मिलीं, परंतु उसके चरित्र में मराठों जैसी चतुराई व राजनीतिक दूरदर्शिता का अद्भुत मिश्रण था।" — इतिहासकार कालिका रंजन कानूनगो
भरतपुर का लोहागढ़ दुर्ग राजस्थान के उन गिने-चुने दुर्गों में से एक है जिसे कभी पूर्ण रूप से जीता नहीं जा सका — यहां तक कि शक्तिशाली ब्रिटिश सेना भी 1805 ई. में इस दुर्ग पर 5 महीने की घेराबंदी के बावजूद असफल रही थी। मिट्टी की मोटी दीवारों व पानी से भरी खाई के कारण तोपों के गोले भी इस पर विशेष प्रभाव नहीं डाल पाते थे — यही कारण है कि इसे "अजेय दुर्ग" व "लौह दुर्ग" कहा जाता है।
| शासक (Ruler) | काल (Period) | प्रमुख तथ्य |
|---|---|---|
| जवाहर सिंह | 1765-1768 ई. | सूरजमल के पुत्र; 1764 ई. में मल्हारराव होल्कर की सहायता से नजीब-उद-दौला को हराया; दिल्ली विजय की स्मृति में लोहागढ़ दुर्ग में "जवाहर बुर्ज" बनवाया; 1765 ई. में लाल किले के ऐतिहासिक द्वार निकालकर लोहागढ़ में स्थापित किए — "अष्टधातु द्वार" कहलाया; 1768 ई. में हत्या |
| रतन सिंह | 1768-1769 ई. | जवाहर सिंह के भाई; अप्रैल 1769 ई. में वृंदावन में रूपानंद गोसाईं द्वारा हत्या |
| केहरी सिंह/केसरी सिंह | 1769-1775 ई. | रतन सिंह के डेढ़ वर्षीय पुत्र; संरक्षक सेनापति दानशाह; बरसाना का युद्ध (30 अक्टूबर 1773 ई., मुगल सेनापति नजफ खां बनाम नवलसिंह — नवलसिंह पराजित); 1774 ई. में आगरा किला भी हाथ से निकला |
| रणजीत सिंह | 1775-1805 ई. | 1776 ई. में नजफ खां ने डीग दुर्ग जीता; कुम्हेर को नया केंद्र बनाया; सितंबर 1803 ई. में ब्रिटिश सेनापति लॉर्ड लेक से संधि; अक्टूबर 1804 ई. में संधि तोड़कर होल्कर का समर्थन किया — अंग्रेजों ने भरतपुर की घेराबंदी की, परंतु दुर्ग नहीं जीत सके; अप्रैल 1805 ई. में पुनः अंग्रेजों से नई संधि |
| शासक (Ruler) | काल (Period) | प्रमुख कार्य |
|---|---|---|
| रणधीर सिंह | 1805-1823 ई. | 1814 ई. में फतेहपुर सीकरी में गवर्नर-जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स से भेंट; नेपाल-युद्ध, पिंडारी-दमन व मराठा-विरोधी अभियानों में अंग्रेजों का साथ दिया |
| बलदेव सिंह | 1823-1825 ई. | अल्पकालीन शासन; अंग्रेज अधिकारी डेविड ऑक्टरलोनी से पुत्र बलवंत सिंह को युवराज घोषित करवाया |
| बलवंत सिंह | 1826-1853 ई. | लॉर्ड कॉम्बरमेयर की सहायता से गद्दी पर बैठे; अल्पवयस्कता में मां अमृत कुंवरी की अध्यक्षता में "रीजेंसी काउंसिल"; इसी काल में अंग्रेजों का लोहागढ़ दुर्ग पर पहली बार नियंत्रण हुआ; फतेहपुर सीकरी के बुलंद दरवाजे की शैली पर आधारित भरतपुर की जामा मस्जिद पूर्ण हुई |
| जसवंत/यशवंत सिंह | 1853-1893 ई. | 1857 विद्रोह में भरतपुर के शासक व प्रजा दोनों ने विद्रोह का समर्थन किया, राजनीतिक एजेंट मॉरिसन को भरतपुर छोड़ना पड़ा; 1879 ई. में नमक संधि; 1890 ई. में तोप-सलामी 17 से 19 हुई |
| रामसिंह | 1893-1900 ई. | 1900 ई. में निजी सेवक की हत्या के आरोप में गद्दी से हटाकर दिल्ली कैंटोनमेंट भेजे गए |
| किशन सिंह | 1900-1929 ई. | प्रथम विश्व युद्ध में भरतपुर सेना का उपयोग; 1918 ई. में वायसराय चेम्सफोर्ड की यात्रा पर पूर्ण शासन-अधिकार मिले; उर्दू की जगह हिंदी को राजभाषा व देवनागरी को राजलिपि बनाया; 1925 ई. में पुष्कर में जाट महासम्मेलन की अध्यक्षता |
| बृजेंद्र सिंह | 1929-1947 ई. | भरतपुर जाट वंश के अंतिम शासक; उपाधियां "सवाई" व "बहादुर जंग"; 31 जुलाई 1947 ई. को भारत संघ में विलय-पत्र पर हस्ताक्षर; 18 मार्च 1948 ई. को भरतपुर रियासत का मत्स्य संघ में विलय (विस्तार देखें: अध्याय 16) |
| शासक (Ruler) | काल (Period) | प्रमुख तथ्य |
|---|---|---|
| ताहनपाल/तिमनपाल/त्रिभुवनपाल | 1093-1159 ई. (लगभग) | 66 वर्ष के दीर्घ शासनकाल में डांग, अलवर, भरतपुर, धौलपुर, गुड़गांव, मथुरा, आगरा व ग्वालियर तक विजय; बयाना के निकट 22 किमी दूर ताहनगढ़/तिमनगढ़ दुर्ग बनवाया; उपाधि "परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर" |
| धर्मपाल व हरिहरपाल | — | दोनों कमजोर शासक सिद्ध हुए, पारिवारिक कलह में उलझे रहे; 1196 ई. में मोहम्मद गौरी ने बयाना व ताहनगढ़ दोनों जीत लिए |
| निर्वासन काल | 1196-1327 ई. (लगभग) | मुस्लिम अधिकार के बाद यदुवंशी चंबल नदी पार कर सबलगढ़ के जंगल में "जादोंवाटी" नाम से बसे; कुंवरपाल व उनके वंशजों ने रीवा में शरण ली; यह काल राजनीतिक अस्थिरता का माना जाता है; 1234 ई. में इल्तुतमिश ने बयाना-तिमनगढ़ पर अधिकार कर लिया |
करौली की ऐतिहासिक विशेषता: करौली राजस्थान की प्रथम रियासत थी जिसने "पृथक्करण की नीति" (Policy of Subordinate Isolation) के अंतर्गत अंग्रेजों से संधि की — 9 नवंबर 1817 ई. को महाराजा हरबख्शपाल सिंह ने यह संधि की, जो राजपूताना की 1817-18 की संधि-श्रृंखला में सबसे पहली संधि मानी जाती है। अंतिम शासक गणेशपाल के समय 1948 ई. में करौली रियासत का मत्स्य संघ में विलय हुआ (विस्तार देखें: अध्याय 16)।
| शासक (Ruler) | काल (Period) | प्रमुख तथ्य |
|---|---|---|
| लूणकरण | 1505-1526 ई. | "कलियुग का कर्ण" कहलाए — दानशीलता के लिए प्रसिद्ध; नागौर के मुहम्मद खां व लोद्रवा के मानसिंह को हराया; लूणकरणसर झील बनवाई; 1526 ई. में नारनौल (हरियाणा) के नवाब अबीमीरा से "धोसी के युद्ध" में वीरगति |
| राव जैतसी | 1526-1541 ई. | 1527 ई. के खानवा युद्ध में पुत्र कल्याणमल के नेतृत्व में सेना भेजकर राणा सांगा की सहायता की; 1534 ई. में हुमायूं के भाई कामरान को हराया; साहेबा/पाहेबा युद्ध (1541 ई.) में मारवाड़ के राव मालदेव से युद्ध करते हुए वीरगति (विस्तार देखें: अध्याय 8); दरबारी कवि बीठू सूजा ने "राव जैतसी रो छंद" रचा |
| राव कल्याणमल | 1541-1574 ई. | 1541 ई. में शेरशाह सूरी की अधीनता स्वीकार की; 1570 ई. के नागौर दरबार में अकबर की अधीनता स्वीकार करने वाले प्रथम राठौड़ शासक बने; पुत्र पृथ्वीराज राठौड़ (कवि, "डिंगल का होरेस") व राय सिंह दोनों को अकबर की सेवा में भेजा |
| महाराजा रायसिंह | 1574-1612 ई. | कठौली के युद्ध में इब्राहिम हुसैन मिर्जा को हराया; 1574 ई. में अकबर से "महाराजाधिराज" की उपाधि; जूनागढ़ किले का निर्माण; जहांगीर ने मानसिंह (आमेर) से अधिक विश्वास किया, मनसब 4000 से 5000 किया |
| महाराजा करणसिंह | 1631-1669 ई. | शाहजहां के दक्षिण अभियानों में सक्रिय; 1644 ई. में अमरसिंह राठौड़ (नागौर) के साथ "मतीरे री राड़"; औरंगजेब से "जंगलधर बादशाह" की उपाधि; रचना "साहित्य कल्पद्रुम" |
| महाराजा अनूपसिंह | 1669-1698 ई. | औरंगजेब से "महाराजा" व "माही मरातिब" की उपाधि; बीजापुर-गोलकोंडा अभियानों में भागीदारी; बीकानेर में 33 करोड़ देवी-देवता मंदिर व अनूप संस्कृत पुस्तकालय की स्थापना; बीकानेर चित्रकला का स्वर्णकाल |
| महाराजा सुजानसिंह | 1700-1735 ई. | प्रशासनिक स्थिरता का काल |
| महाराजा गजसिंह | 1746-1787 ई. | नागौर के अमरसिंह के भाई; बीकानेर नगर की चारदीवारी (नागर-कोट) का निर्माण; मुगल बादशाह से "श्री राजराजेश्वर महाराजाधिराज महाराजा शिरोमणि" की उपाधि |
| महाराजा सूरतसिंह | 1787-1828 ई. | 1805 ई. में भटनेर दुर्ग जीतकर मंगलवार (हनुमान का दिन) होने से "हनुमानगढ़" नाम रखा; 21 मार्च 1818 ई. को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि; करणी माता मंदिर को वर्तमान भव्य स्वरूप दिया |
| महाराजा गंगासिंह | 1887-1943 ई. | 1900 ई. में प्रसिद्ध ऊंट-दस्ता "गंगा रिसाला" चीन के बॉक्सर विद्रोह-दमन हेतु भेजा; प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटिश सहयोग; 1919 ई. में पेरिस शांति सम्मेलन में भाग लेने वाले एकमात्र भारतीय शासक; नरेंद्र मंडल (चैंबर ऑफ प्रिंसेज) के प्रथम चांसलर; तीनों गोलमेज सम्मेलनों में भाग लेने वाले एकमात्र भारतीय शासक; 1922-27 ई. में गंगनहर का निर्माण (लॉर्ड इरविन द्वारा उद्घाटन) — "राजस्थान का भगीरथ" व "आधुनिक भारत का भगीरथ" कहलाए; मुख्य अभियंता कंवर सेन थे |
| महाराजा शार्दूलसिंह | 1943-1949 ई. | बीकानेर राठौड़ वंश के अंतिम शासक; 7 अगस्त 1947 ई. को भारतीय संघ में विलय-पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले प्रथम भारतीय शासक बने |
| शासक (Ruler) | काल (Period) | प्रमुख तथ्य |
|---|---|---|
| भट्टी/भट्टी (संस्थापक) | लगभग 285 ई. | भटनेर दुर्ग (वर्तमान राजस्थान-हरियाणा सीमा) बनवाया |
| मंगलराव भाटी | लगभग 4थी-5वीं सदी | तनोट को भाटी वंश की दूसरी राजधानी बनाया; तनोट दुर्ग के वास्तुकार केहर |
| देवराज भाटी | लगभग 5वीं सदी | परमारों से लोद्रवा छीनकर राजधानी बनाई |
| राज व गज | 6-7वीं सदी | मूल क्षेत्र पंजाब; वल्लामध मरुस्थल में निवास; भाटी वंश के प्रवर्तक माने जाते हैं; लोद्रवा अभिलेख (1157 ई.) में इनका वंशावली-उल्लेख मिलता है |
| विजयराज भाटी | लगभग 1165 ई. | भाटियों का अपेक्षाकृत सुव्यवस्थित इतिहास यहीं से प्रारंभ होता है; धनावा अभिलेख (1176 ई.) |
| भोज भाटी | 12वीं सदी उत्तरार्ध | विजयराज के पुत्र; गौरियों से युद्ध करते हुए वीरगति |
| साका (Saka) | वर्ष (लगभग) | आक्रमणकारी | शासक/नायक |
|---|---|---|---|
| प्रथम साका | 1294 ई. | अलाउद्दीन खिलजी | रावल मूलराज प्रथम — जौहर हुआ |
| द्वितीय साका | 1357 ई. | फिरोजशाह तुगलक | रावल इंद्रपाल, त्रिलोकसी सहित अन्य भाटी योद्धा — जौहर हुआ |
| तृतीय साका (अर्ध साका) | 1550 ई. (लगभग) | अमीर अली (छल से, अकबर काल) | रावल लूणकरण — जौहर नहीं हुआ, केवल पुरुषों ने केसरिया/साका किया, इसीलिए इसे "अर्ध साका" कहा जाता है |
सामान्यतः राजपूत परंपरा में किसी दुर्ग के पतन से पहले महिलाएं जौहर (सामूहिक अग्नि-समाधि) करती थीं और फिर पुरुष केसरिया धारण कर शत्रु-सेना पर टूट पड़ते थे। परंतु जैसलमेर के तीसरे साके (लगभग 1550 ई., रावल लूणकरण के समय) में छल से हुए आक्रमण की गति इतनी तीव्र थी कि महिलाओं को जौहर का समय ही नहीं मिल सका — केवल पुरुषों ने ही केसरिया धारण कर बलिदान दिया। इसीलिए इतिहास में इसे पूर्ण साका न मानकर "अर्ध साका" कहा जाता है — जो दर्शाता है कि राजस्थान के हर साके की अपनी अलग व मार्मिक कहानी है।
| शासक (Ruler) | काल (Period) | प्रमुख तथ्य |
|---|---|---|
| हर्राई भाटी | 1570 ई. | नागौर दरबार में अकबर की अधीनता स्वीकार की; अपनी पुत्री का विवाह अकबर से करवाया — भाटी वंश के मुगलों से वैवाहिक संबंध का प्रमाण |
| महारावल अमरसिंह | 17वीं सदी (औरंगजेब काल) | "अमरकड़ा" नहर का निर्माण करवाकर सिंधु नदी का पानी जैसलमेर तक पहुंचाया |
| महारावल मूलराज द्वितीय | 1813-1846 ई. | 12 दिसंबर 1818 ई. को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से संरक्षण-संधि — जैसलमेर ब्रिटिश-संरक्षित रियासत बनी |
| महारावल जवाहर सिंह | 1947-1949 ई. | भाटी वंश के अंतिम शासक; प्रारंभ में जोधपुर के हनवंत सिंह के साथ पाकिस्तान में विलय का प्रयास किया; 30 मार्च 1949 ई. को जैसलमेर रियासत का भारतीय संघ में विलय हुआ (विस्तार देखें: अध्याय 16) |
स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ाव — सागरमल गोपा: 1942 ई. के भारत छोड़ो आंदोलन में जैसलमेर रियासत ने औपचारिक भागीदारी नहीं की, परंतु जैसलमेर के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी, लेखक व पत्रकार सागरमल गोपा ने ब्रिटिश शासन व रियासती अत्याचारों के विरुद्ध निरंतर लेखनी चलाई — इनकी प्रमुख रचनाएं "जैसलमेर राज्य का इतिहास", "राजस्थान में रियासती अत्याचार", "राजपूताने की स्थिति", "मारवाड़ की दुर्दशा" व "राजस्थान के शासकों की वास्तविकता" हैं। रियासती प्रशासन ने उन्हें बंदी बनाकर अमानवीय यातनाएं दीं — 3 अप्रैल 1946 ई. को जयपुर जेल में उनकी मृत्यु हुई (विस्तार देखें: अध्याय 15)।
करंट अफेयर्स — जैसलमेर दुर्ग का UNESCO दर्जा: जैसलमेर दुर्ग (सोनार किला) "राजस्थान के पहाड़ी दुर्ग" श्रृंखला के अंतर्गत चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, रणथंभौर, आमेर व गागरोन सहित वर्ष 2013 में UNESCO विश्व धरोहर सूची में शामिल हुआ (विस्तार देखें: अध्याय 6-7)। यह विश्व के बहुत कम "जीवंत दुर्गों" में से एक है, जहां आज भी लगभग 3000-4000 लोग दुर्ग के भीतर निवास करते हैं — इसीलिए इसे कभी-कभी "जीवित दुर्ग" (Living Fort) भी कहा जाता है।
A. धौलपुर — जाट-राणा वंश (गोहद मूल)
| शासक/तथ्य (Ruler/Fact) | वर्ष (Year) | विवरण (Details) |
|---|---|---|
| मूल स्थान | 16वीं सदी | गोहद गांव (वर्तमान मध्य प्रदेश); जाट शासक महासिंह ने गोहद में सुदृढ़ दुर्ग बनवाया |
| राणा भीमसिंह (गोहद) | 1761 ई. | तीसरे पानीपत युद्ध के दौरान मराठों का ध्यान उत्तर भारत में उलझा देखकर ग्वालियर सहित 10 मराठा दुर्गों पर अधिकार किया |
| राणा कीरतसिंह | 1805-1836 ई. | 17 जनवरी 1804 ई. को कंपनी सरकार ने महादजी सिंधिया को हराकर गोहद पुनः दिलाया; 1805 ई. में गोहद, बारी व राजाखेड़ा परगने अलग कर धौलपुर रियासत बनाई; धौलपुर के प्रथम शासक बने — उपाधि "गोहद के राणा" से बदलकर "धौलपुर के राणा" हुई |
| राणा भगवंत सिंह | 1836-1873 ई. | 1857 विद्रोह के समय धौलपुर के शासक |
| राणा निहालसिंह | 1873-1901 ई. | उपनाम "प्यारे राजा साहब"; 1877 ई. में आधुनिक राजस्व-बंदोबस्त (Land Settlement) की नींव रखी |
| राणा उदयभान सिंह | 1911-1948 ई. | धौलपुर के अंतिम शासक; प्रथम गोलमेज सम्मेलन में भागीदारी; 18 मार्च 1948 ई. को धौलपुर का मत्स्य संघ में विलय, स्वयं मत्स्य संघ के राजप्रमुख नियुक्त हुए |
B. टोंक — राजस्थान की एकमात्र नवाबी (मुस्लिम) रियासत
क्रॉस-रेफरेंस — पहले से कवर की गई अन्य रियासतें: अलवर (नरूका शाखा — कछवाहा वंश की उपशाखा) का विवरण अध्याय 9 में, सिरोही (देवड़ा शाखा — चौहान वंश की उपशाखा) व हाड़ौती (बूंदी-कोटा-झालावाड़ — हाड़ा चौहान शाखा) का विवरण अध्याय 7 में, तथा किशनगढ़ (राठौड़ वंश की उपशाखा) का विवरण अध्याय 8 में दिया गया है — कृपया संपूर्ण चित्र हेतु उन अध्यायों का भी अध्ययन करें।
| स्मारक (Monument) | रियासत (State) | निर्माता/विशेषता (Builder/Significance) |
|---|---|---|
| लोहागढ़ दुर्ग | भरतपुर | महाराजा सूरजमल, 1733 ई.; कभी पूर्ण रूप से पराजित नहीं हुआ |
| डीग जल महल व उद्यान | भरतपुर | महाराजा बदनसिंह व सूरजमल |
| केवलादेव घना पक्षी विहार | भरतपुर | सूरजमल काल में विकसित शिकारगाह, आज UNESCO विश्व धरोहर राष्ट्रीय उद्यान |
| जैसलमेर दुर्ग (सोनार किला) | जैसलमेर | रावल जैसल व सलिवाहन; पीले बलुआ पत्थर से निर्मित; UNESCO विश्व धरोहर (2013); "जीवित दुर्ग" |
| जूनागढ़ दुर्ग | बीकानेर | महाराजा रायसिंह; मैदानी क्षेत्र में बना दुर्ग (पहाड़ी नहीं) |
| करणी माता मंदिर, देशनोक | बीकानेर | मूल निर्माण राव बीका, वर्तमान स्वरूप सूरतसिंह; "चूहों का मंदिर" के नाम से विश्वप्रसिद्ध |
| गंगनहर | बीकानेर | महाराजा गंगासिंह, 1922-27 ई.; मरुस्थल में हरियाली लाने वाली प्रथम बड़ी नहर परियोजना |
| करौली राजमहल व मदनमोहन मंदिर | करौली | गोपाल सिंह व अन्य जादौन शासक |
1. भरतपुर के जाट वंश की नींव चूड़ामन (1695-1721 ई.) ने रखी, जिसे सवाई जयसिंह द्वितीय ने 1721 ई. में पराजित किया। 2. महाराजा बदनसिंह ने जाट-कछवाहा शत्रुता समाप्त कर मैत्री-संबंध स्थापित किए; महाराजा सूरजमल (1756-1763 ई.) को "जाट जाति का अफलातून" कहा जाता है — इन्होंने भरतपुर नगर व अजेय लोहागढ़ दुर्ग की स्थापना की। 3. बृजेंद्र सिंह भरतपुर जाट वंश के अंतिम शासक थे — 1948 ई. में मत्स्य संघ में विलय हुआ। 4. करौली के यदुवंशी (जादौन) राजवंश की स्थापना महाराजा विजयपाल ने लगभग 1040 ई. में की; महाराजा अर्जुनपाल (1327-1361 ई.) ने 1348 ई. में करौली नगर बसाया — वंश के सबसे महान शासक माने जाते हैं। 5. करौली राजस्थान की प्रथम रियासत थी जिसने 9 नवंबर 1817 ई. को अंग्रेजों से "पृथक्करण नीति" संधि की। 6. बीकानेर राठौड़ वंश की स्थापना राव बीका (राव जोधा के पुत्र) ने 1488 ई. में की; महाराजा गंगासिंह (1887-1943 ई.) ने गंगनहर बनवाकर "राजस्थान का भगीरथ" उपाधि पाई तथा पेरिस शांति सम्मेलन में भाग लेने वाले एकमात्र भारतीय शासक बने। 7. महाराजा शार्दूलसिंह बीकानेर के अंतिम शासक थे — 7 अगस्त 1947 ई. को भारतीय संघ में विलय-पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले प्रथम भारतीय शासक बने। 8. जैसलमेर के भाटी वंश की स्थापना भट्टी (लगभग 285 ई.) ने की; रावल जैसल ने 1156 ई. में जैसलमेर नगर व दुर्ग की स्थापना की। 9. जैसलमेर दुर्ग ने तीन साके देखे — 1294 ई. (अलाउद्दीन खिलजी), 1357 ई. (फिरोजशाह तुगलक) व लगभग 1550 ई. (अर्ध साका, अमीर अली का छल)। 10. जैसलमेर व रणथंभौर सहित 6 दुर्ग "राजस्थान के पहाड़ी दुर्ग" श्रृंखला के अंतर्गत 2013 में UNESCO सूची में शामिल हैं। 11. धौलपुर रियासत गोहद (मध्य प्रदेश) के जाट-राणा वंश से निकली — 1805 ई. में स्वतंत्र रियासत बनी, अंतिम शासक उदयभान सिंह मत्स्य संघ के राजप्रमुख बने। 12. टोंक राजस्थान की एकमात्र नवाबी (मुस्लिम-शासित) रियासत थी — संस्थापक पिंडारी सरदार अमीर खां। 13. सागरमल गोपा (जैसलमेर) रियासती अत्याचारों के विरुद्ध लेखनी चलाने वाले प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे — 1946 ई. में जयपुर जेल में यातना से मृत्यु।
नीचे दी समय-रेखा (Timeline) इस अध्याय के सभी महत्वपूर्ण वर्षों को एक साथ जोड़ती है — रिवीजन के लिए इसे ज़रूर दोहराएं:
| वर्ष (Year) | घटना/Event | महत्व |
|---|---|---|
| 285 ई. (लगभग) | भट्टी द्वारा भटनेर दुर्ग निर्माण | भाटी वंश का प्रारंभिक इतिहास |
| 1040 ई. | विजयपाल द्वारा करौली यदुवंशी राज्य की स्थापना (बयाना) | करौली रियासत का प्रारंभ |
| 1156 ई. | रावल जैसल द्वारा जैसलमेर नगर व दुर्ग की स्थापना | भाटी वंश की स्थायी राजधानी |
| 1294 ई. | जैसलमेर का प्रथम साका (अलाउद्दीन खिलजी) | भाटी वंश का पहला बड़ा जौहर |
| 1348 ई. | अर्जुनपाल द्वारा करौली नगर की स्थापना | यदुवंशी वंश की स्थायी राजधानी |
| 1357 ई. | जैसलमेर का द्वितीय साका (फिरोजशाह तुगलक) | भाटी वंश का दूसरा जौहर |
| 1488 ई. | राव बीका द्वारा बीकानेर की स्थापना | राठौड़ों की दूसरी प्रमुख शाखा |
| 1550 ई. (लगभग) | जैसलमेर का तृतीय (अर्ध) साका | छल से आक्रमण, केवल पुरुष-बलिदान |
| 1721 ई. | सवाई जयसिंह द्वारा चूड़ामन की पराजय (थून दुर्ग) | भरतपुर जाट राज्य की नींव की तैयारी |
| 1733 ई. | सूरजमल द्वारा लोहागढ़ दुर्ग निर्माण | अजेय जाट दुर्ग का प्रारंभ |
| 1756 ई. | सूरजमल भरतपुर के औपचारिक शासक बने | भरतपुर नगर की स्थापना |
| 12 जून 1761 ई. | सूरजमल द्वारा आगरा किले पर अधिकार | जाट शक्ति की पराकाष्ठा |
| 1763 ई. | सूरजमल की वीरगति (नजीब खां रोहिला से युद्ध) | भरतपुर के स्वर्णकाल का अंत |
| 1805 ई. | धौलपुर रियासत की स्थापना (गोहद से पृथक) | जाट-राणा वंश की नई पहचान |
| 9 नवंबर 1817 ई. | करौली-ब्रिटिश संधि | राजस्थान की प्रथम अधीनस्थ संधि |
| 17 नवंबर 1817 ई. | टोंक की स्वतंत्र नवाबी रियासत की मान्यता | राजस्थान की एकमात्र मुस्लिम रियासत |
| 21 मार्च 1818 ई. | बीकानेर-ब्रिटिश संधि | ब्रिटिश अधीनस्थ संधि व्यवस्था लागू |
| 12 दिसंबर 1818 ई. | जैसलमेर-ब्रिटिश संधि | ब्रिटिश संरक्षित रियासत |
| 1922-1927 ई. | गंगासिंह द्वारा गंगनहर निर्माण | बीकानेर में कृषि-क्रांति |
| 1947-1949 ई. | सभी रियासतों का भारतीय संघ में विलय | राजस्थान के एकीकरण की अंतिम कड़ी (विस्तार अध्याय 16) |