🏯 अध्याय 10/16 — राजस्थान का इतिहास

अन्य राजवंश एवं रियासतें

Other Dynasties & Princely States | RAS Pre + Mains
📋 इस अध्याय में
  1. भरतपुर का जाट वंश — उत्पत्ति एवं प्रारंभिक विद्रोह (गोकुला से चूड़ामन तक)
  2. महाराजा बदनसिंह एवं महाराजा सूरजमल — भरतपुर का स्वर्णकाल, लोहागढ़ दुर्ग
  3. जवाहर सिंह से रणजीत सिंह तक — भरतपुर का उत्तरकालीन संघर्ष
  4. भरतपुर के उत्तरकालीन शासक — ब्रिटिश संधि से एकीकरण तक
  5. करौली का यदुवंशी (जादौन) राजवंश — विजयपाल से अर्जुनपाल तक
  6. करौली के उत्तरकालीन शासक — गोपालदास से एकीकरण तक
  7. बीकानेर का राठौड़ वंश — राव बीका से महाराजा गंगासिंह तक
  8. जैसलमेर का भाटी वंश — उत्पत्ति एवं रावल जैसल से तीन साकों तक
  9. जैसलमेर के उत्तरकालीन शासक — हर्राई भाटी से जवाहरसिंह तक
  10. अन्य रियासतें — धौलपुर (जाट-राणा) एवं टोंक (नवाबी रियासत)
  11. सांस्कृतिक विरासत

अब तक हमने चौहान, राठौड़ व कछवाहा जैसे बड़े राजपूत वंशों की गाथाएं पढ़ीं। परंतु राजस्थान का इतिहास सिर्फ इन्हीं वंशों तक सीमित नहीं है। कल्पना कीजिए — एक साधारण किसान समुदाय, जिसे "कमजोर" व "असंगठित" समझा जाता था, वही समुदाय आगे चलकर मुगल सम्राट औरंगजेब की नींद उड़ा देता है और अंततः आगरा के किले पर भी अधिकार कर लेता है — यह है भरतपुर के जाटों की कहानी, विशेषकर महाराजा सूरजमल की, जिन्हें "जाट जाति का अफलातून" कहा गया। दूसरी ओर करौली के यदुवंशी शासक स्वयं को भगवान श्रीकृष्ण का प्रत्यक्ष वंशज मानते हैं। बीकानेर व जैसलमेर जैसी थार मरुस्थल की रियासतों ने रेत के समुद्र में भी अपनी शक्तिशाली सल्तनतें खड़ी कीं। यह अध्याय राजस्थान के इन्हीं "अन्य किंतु समान रूप से महत्वपूर्ण" राजवंशों को समर्पित है।

1भरतपुर का जाट वंश — उत्पत्ति एवं प्रारंभिक विद्रोह (गोकुला से चूड़ामन तक)

नेता (Leader)वर्ष (Year)घटना (Event)
गोकुला (तिलपत का जमींदार)1669 ई.मथुरा-आगरा क्षेत्र में विद्रोह; औरंगजेब स्वयं दमन हेतु गया; गोकुला को बंदी बनाकर क्रूरतापूर्वक मार डाला गया
राजाराम (सिनसिनी के खानचंद का पुत्र)1681 ई.आगरा के मुगल फौजदार मुलाफत खां की हत्या; सिकंदरा (आगरा) में अकबर के मकबरे से हड्डियां निकालकर जलाईं — औरंगजेब अत्यंत क्रुद्ध हुआ; औरंगजेब के सेनापति खान-ए-जहां का दमन-प्रयास असफल रहा
ब्रजडीग के निकट अऊ गांव की शाही चौकी पर अधिकार
फतेह सिंह (राजाराम का पुत्र)आमेर के बिशनसिंह ने फतेह सिंह को हराकर सिनसिनी पर कछवाहा नियंत्रण स्थापित किया

👑 चूड़ामन (1695-1721 ई.) भरतपुर के स्वतंत्र जाट राज्य के वास्तविक जनक व वास्तुकार

"चूड़ामन एक असफल देशभक्त व सफल विद्रोही था; उसे राजसी सम्मान व उपाधियां तो नहीं मिलीं, परंतु उसके चरित्र में मराठों जैसी चतुराई व राजनीतिक दूरदर्शिता का अद्भुत मिश्रण था।" — इतिहासकार कालिका रंजन कानूनगो

2महाराजा बदनसिंह एवं महाराजा सूरजमल — भरतपुर का स्वर्णकाल, लोहागढ़ दुर्ग

👑 महाराजा बदनसिंह (1722-1756 ई.) "ब्रजराज" — जाट-कछवाहा शत्रुता समाप्त करने वाले दूरदर्शी शासक

👑 महाराजा सूरजमल (1756-1763 ई.) "जाट जाति का अफलातून" — भरतपुर नगर के वास्तविक संस्थापक

💡 लोहागढ़ दुर्ग — जिसे अंग्रेज भी नहीं जीत सके

भरतपुर का लोहागढ़ दुर्ग राजस्थान के उन गिने-चुने दुर्गों में से एक है जिसे कभी पूर्ण रूप से जीता नहीं जा सका — यहां तक कि शक्तिशाली ब्रिटिश सेना भी 1805 ई. में इस दुर्ग पर 5 महीने की घेराबंदी के बावजूद असफल रही थी। मिट्टी की मोटी दीवारों व पानी से भरी खाई के कारण तोपों के गोले भी इस पर विशेष प्रभाव नहीं डाल पाते थे — यही कारण है कि इसे "अजेय दुर्ग" व "लौह दुर्ग" कहा जाता है।

3जवाहर सिंह से रणजीत सिंह तक — भरतपुर का उत्तरकालीन संघर्ष

शासक (Ruler)काल (Period)प्रमुख तथ्य
जवाहर सिंह1765-1768 ई.सूरजमल के पुत्र; 1764 ई. में मल्हारराव होल्कर की सहायता से नजीब-उद-दौला को हराया; दिल्ली विजय की स्मृति में लोहागढ़ दुर्ग में "जवाहर बुर्ज" बनवाया; 1765 ई. में लाल किले के ऐतिहासिक द्वार निकालकर लोहागढ़ में स्थापित किए — "अष्टधातु द्वार" कहलाया; 1768 ई. में हत्या
रतन सिंह1768-1769 ई.जवाहर सिंह के भाई; अप्रैल 1769 ई. में वृंदावन में रूपानंद गोसाईं द्वारा हत्या
केहरी सिंह/केसरी सिंह1769-1775 ई.रतन सिंह के डेढ़ वर्षीय पुत्र; संरक्षक सेनापति दानशाह; बरसाना का युद्ध (30 अक्टूबर 1773 ई., मुगल सेनापति नजफ खां बनाम नवलसिंह — नवलसिंह पराजित); 1774 ई. में आगरा किला भी हाथ से निकला
रणजीत सिंह1775-1805 ई.1776 ई. में नजफ खां ने डीग दुर्ग जीता; कुम्हेर को नया केंद्र बनाया; सितंबर 1803 ई. में ब्रिटिश सेनापति लॉर्ड लेक से संधि; अक्टूबर 1804 ई. में संधि तोड़कर होल्कर का समर्थन किया — अंग्रेजों ने भरतपुर की घेराबंदी की, परंतु दुर्ग नहीं जीत सके; अप्रैल 1805 ई. में पुनः अंग्रेजों से नई संधि
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4भरतपुर के उत्तरकालीन शासक — ब्रिटिश संधि से एकीकरण तक

शासक (Ruler)काल (Period)प्रमुख कार्य
रणधीर सिंह1805-1823 ई.1814 ई. में फतेहपुर सीकरी में गवर्नर-जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स से भेंट; नेपाल-युद्ध, पिंडारी-दमन व मराठा-विरोधी अभियानों में अंग्रेजों का साथ दिया
बलदेव सिंह1823-1825 ई.अल्पकालीन शासन; अंग्रेज अधिकारी डेविड ऑक्टरलोनी से पुत्र बलवंत सिंह को युवराज घोषित करवाया
बलवंत सिंह1826-1853 ई.लॉर्ड कॉम्बरमेयर की सहायता से गद्दी पर बैठे; अल्पवयस्कता में मां अमृत कुंवरी की अध्यक्षता में "रीजेंसी काउंसिल"; इसी काल में अंग्रेजों का लोहागढ़ दुर्ग पर पहली बार नियंत्रण हुआ; फतेहपुर सीकरी के बुलंद दरवाजे की शैली पर आधारित भरतपुर की जामा मस्जिद पूर्ण हुई
जसवंत/यशवंत सिंह1853-1893 ई.1857 विद्रोह में भरतपुर के शासक व प्रजा दोनों ने विद्रोह का समर्थन किया, राजनीतिक एजेंट मॉरिसन को भरतपुर छोड़ना पड़ा; 1879 ई. में नमक संधि; 1890 ई. में तोप-सलामी 17 से 19 हुई
रामसिंह1893-1900 ई.1900 ई. में निजी सेवक की हत्या के आरोप में गद्दी से हटाकर दिल्ली कैंटोनमेंट भेजे गए
किशन सिंह1900-1929 ई.प्रथम विश्व युद्ध में भरतपुर सेना का उपयोग; 1918 ई. में वायसराय चेम्सफोर्ड की यात्रा पर पूर्ण शासन-अधिकार मिले; उर्दू की जगह हिंदी को राजभाषा व देवनागरी को राजलिपि बनाया; 1925 ई. में पुष्कर में जाट महासम्मेलन की अध्यक्षता
बृजेंद्र सिंह1929-1947 ई.भरतपुर जाट वंश के अंतिम शासक; उपाधियां "सवाई" व "बहादुर जंग"; 31 जुलाई 1947 ई. को भारत संघ में विलय-पत्र पर हस्ताक्षर; 18 मार्च 1948 ई. को भरतपुर रियासत का मत्स्य संघ में विलय (विस्तार देखें: अध्याय 16)

5करौली का यदुवंशी (जादौन) राजवंश — विजयपाल से अर्जुनपाल तक

👑 महाराजा विजयपाल (लगभग 1040 ई.) करौली के यदुवंशी (जादौन) राजवंश के संस्थापक

विजयपाल के उत्तराधिकारी — पतन एवं पुनरुत्थान

शासक (Ruler)काल (Period)प्रमुख तथ्य
ताहनपाल/तिमनपाल/त्रिभुवनपाल1093-1159 ई. (लगभग)66 वर्ष के दीर्घ शासनकाल में डांग, अलवर, भरतपुर, धौलपुर, गुड़गांव, मथुरा, आगरा व ग्वालियर तक विजय; बयाना के निकट 22 किमी दूर ताहनगढ़/तिमनगढ़ दुर्ग बनवाया; उपाधि "परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर"
धर्मपाल व हरिहरपालदोनों कमजोर शासक सिद्ध हुए, पारिवारिक कलह में उलझे रहे; 1196 ई. में मोहम्मद गौरी ने बयाना व ताहनगढ़ दोनों जीत लिए
निर्वासन काल1196-1327 ई. (लगभग)मुस्लिम अधिकार के बाद यदुवंशी चंबल नदी पार कर सबलगढ़ के जंगल में "जादोंवाटी" नाम से बसे; कुंवरपाल व उनके वंशजों ने रीवा में शरण ली; यह काल राजनीतिक अस्थिरता का माना जाता है; 1234 ई. में इल्तुतमिश ने बयाना-तिमनगढ़ पर अधिकार कर लिया

👑 महाराजा अर्जुनपाल (1327-1361 ई.) करौली के यदुवंशी वंश के सबसे महान शासक — करौली नगर के संस्थापक

6करौली के उत्तरकालीन शासक — गोपालदास से एकीकरण तक

👑 राजा गोपालदास (अकबर काल (16वीं सदी उत्तरार्ध)) अकबर के मनसबदार — करौली राज्य के पुनरुद्धारक

👑 महाराजा गोपाल सिंह (1724 ई. से) करौली के विकास को गति देने वाले प्रभावशाली शासक

करौली की ऐतिहासिक विशेषता: करौली राजस्थान की प्रथम रियासत थी जिसने "पृथक्करण की नीति" (Policy of Subordinate Isolation) के अंतर्गत अंग्रेजों से संधि की — 9 नवंबर 1817 ई. को महाराजा हरबख्शपाल सिंह ने यह संधि की, जो राजपूताना की 1817-18 की संधि-श्रृंखला में सबसे पहली संधि मानी जाती है। अंतिम शासक गणेशपाल के समय 1948 ई. में करौली रियासत का मत्स्य संघ में विलय हुआ (विस्तार देखें: अध्याय 16)।

7बीकानेर का राठौड़ वंश — राव बीका से महाराजा गंगासिंह तक

👑 राव बीका (1465-1504 ई.) बीकानेर राठौड़ वंश के संस्थापक

बीकानेर के प्रमुख शासक — एक नज़र में

शासक (Ruler)काल (Period)प्रमुख तथ्य
लूणकरण1505-1526 ई."कलियुग का कर्ण" कहलाए — दानशीलता के लिए प्रसिद्ध; नागौर के मुहम्मद खां व लोद्रवा के मानसिंह को हराया; लूणकरणसर झील बनवाई; 1526 ई. में नारनौल (हरियाणा) के नवाब अबीमीरा से "धोसी के युद्ध" में वीरगति
राव जैतसी1526-1541 ई.1527 ई. के खानवा युद्ध में पुत्र कल्याणमल के नेतृत्व में सेना भेजकर राणा सांगा की सहायता की; 1534 ई. में हुमायूं के भाई कामरान को हराया; साहेबा/पाहेबा युद्ध (1541 ई.) में मारवाड़ के राव मालदेव से युद्ध करते हुए वीरगति (विस्तार देखें: अध्याय 8); दरबारी कवि बीठू सूजा ने "राव जैतसी रो छंद" रचा
राव कल्याणमल1541-1574 ई.1541 ई. में शेरशाह सूरी की अधीनता स्वीकार की; 1570 ई. के नागौर दरबार में अकबर की अधीनता स्वीकार करने वाले प्रथम राठौड़ शासक बने; पुत्र पृथ्वीराज राठौड़ (कवि, "डिंगल का होरेस") व राय सिंह दोनों को अकबर की सेवा में भेजा
महाराजा रायसिंह1574-1612 ई.कठौली के युद्ध में इब्राहिम हुसैन मिर्जा को हराया; 1574 ई. में अकबर से "महाराजाधिराज" की उपाधि; जूनागढ़ किले का निर्माण; जहांगीर ने मानसिंह (आमेर) से अधिक विश्वास किया, मनसब 4000 से 5000 किया
महाराजा करणसिंह1631-1669 ई.शाहजहां के दक्षिण अभियानों में सक्रिय; 1644 ई. में अमरसिंह राठौड़ (नागौर) के साथ "मतीरे री राड़"; औरंगजेब से "जंगलधर बादशाह" की उपाधि; रचना "साहित्य कल्पद्रुम"
महाराजा अनूपसिंह1669-1698 ई.औरंगजेब से "महाराजा" व "माही मरातिब" की उपाधि; बीजापुर-गोलकोंडा अभियानों में भागीदारी; बीकानेर में 33 करोड़ देवी-देवता मंदिर व अनूप संस्कृत पुस्तकालय की स्थापना; बीकानेर चित्रकला का स्वर्णकाल
महाराजा सुजानसिंह1700-1735 ई.प्रशासनिक स्थिरता का काल
महाराजा गजसिंह1746-1787 ई.नागौर के अमरसिंह के भाई; बीकानेर नगर की चारदीवारी (नागर-कोट) का निर्माण; मुगल बादशाह से "श्री राजराजेश्वर महाराजाधिराज महाराजा शिरोमणि" की उपाधि
महाराजा सूरतसिंह1787-1828 ई.1805 ई. में भटनेर दुर्ग जीतकर मंगलवार (हनुमान का दिन) होने से "हनुमानगढ़" नाम रखा; 21 मार्च 1818 ई. को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि; करणी माता मंदिर को वर्तमान भव्य स्वरूप दिया
महाराजा गंगासिंह1887-1943 ई.1900 ई. में प्रसिद्ध ऊंट-दस्ता "गंगा रिसाला" चीन के बॉक्सर विद्रोह-दमन हेतु भेजा; प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटिश सहयोग; 1919 ई. में पेरिस शांति सम्मेलन में भाग लेने वाले एकमात्र भारतीय शासक; नरेंद्र मंडल (चैंबर ऑफ प्रिंसेज) के प्रथम चांसलर; तीनों गोलमेज सम्मेलनों में भाग लेने वाले एकमात्र भारतीय शासक; 1922-27 ई. में गंगनहर का निर्माण (लॉर्ड इरविन द्वारा उद्घाटन) — "राजस्थान का भगीरथ" व "आधुनिक भारत का भगीरथ" कहलाए; मुख्य अभियंता कंवर सेन थे
महाराजा शार्दूलसिंह1943-1949 ई.बीकानेर राठौड़ वंश के अंतिम शासक; 7 अगस्त 1947 ई. को भारतीय संघ में विलय-पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले प्रथम भारतीय शासक बने
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8जैसलमेर का भाटी वंश — उत्पत्ति एवं रावल जैसल से तीन साकों तक

शासक (Ruler)काल (Period)प्रमुख तथ्य
भट्टी/भट्टी (संस्थापक)लगभग 285 ई.भटनेर दुर्ग (वर्तमान राजस्थान-हरियाणा सीमा) बनवाया
मंगलराव भाटीलगभग 4थी-5वीं सदीतनोट को भाटी वंश की दूसरी राजधानी बनाया; तनोट दुर्ग के वास्तुकार केहर
देवराज भाटीलगभग 5वीं सदीपरमारों से लोद्रवा छीनकर राजधानी बनाई
राज व गज6-7वीं सदीमूल क्षेत्र पंजाब; वल्लामध मरुस्थल में निवास; भाटी वंश के प्रवर्तक माने जाते हैं; लोद्रवा अभिलेख (1157 ई.) में इनका वंशावली-उल्लेख मिलता है
विजयराज भाटीलगभग 1165 ई.भाटियों का अपेक्षाकृत सुव्यवस्थित इतिहास यहीं से प्रारंभ होता है; धनावा अभिलेख (1176 ई.)
भोज भाटी12वीं सदी उत्तरार्धविजयराज के पुत्र; गौरियों से युद्ध करते हुए वीरगति

👑 रावल जैसल (1153-1168 ई. (लगभग)) जैसलमेर नगर व दुर्ग के संस्थापक

जैसलमेर दुर्ग के तीन साके — एक नज़र में

साका (Saka)वर्ष (लगभग)आक्रमणकारीशासक/नायक
प्रथम साका1294 ई.अलाउद्दीन खिलजीरावल मूलराज प्रथम — जौहर हुआ
द्वितीय साका1357 ई.फिरोजशाह तुगलकरावल इंद्रपाल, त्रिलोकसी सहित अन्य भाटी योद्धा — जौहर हुआ
तृतीय साका (अर्ध साका)1550 ई. (लगभग)अमीर अली (छल से, अकबर काल)रावल लूणकरण — जौहर नहीं हुआ, केवल पुरुषों ने केसरिया/साका किया, इसीलिए इसे "अर्ध साका" कहा जाता है
💡 जैसलमेर का "अर्ध साका" — एक अनोखी घटना

सामान्यतः राजपूत परंपरा में किसी दुर्ग के पतन से पहले महिलाएं जौहर (सामूहिक अग्नि-समाधि) करती थीं और फिर पुरुष केसरिया धारण कर शत्रु-सेना पर टूट पड़ते थे। परंतु जैसलमेर के तीसरे साके (लगभग 1550 ई., रावल लूणकरण के समय) में छल से हुए आक्रमण की गति इतनी तीव्र थी कि महिलाओं को जौहर का समय ही नहीं मिल सका — केवल पुरुषों ने ही केसरिया धारण कर बलिदान दिया। इसीलिए इतिहास में इसे पूर्ण साका न मानकर "अर्ध साका" कहा जाता है — जो दर्शाता है कि राजस्थान के हर साके की अपनी अलग व मार्मिक कहानी है।

9जैसलमेर के उत्तरकालीन शासक — हर्राई भाटी से जवाहरसिंह तक

शासक (Ruler)काल (Period)प्रमुख तथ्य
हर्राई भाटी1570 ई.नागौर दरबार में अकबर की अधीनता स्वीकार की; अपनी पुत्री का विवाह अकबर से करवाया — भाटी वंश के मुगलों से वैवाहिक संबंध का प्रमाण
महारावल अमरसिंह17वीं सदी (औरंगजेब काल)"अमरकड़ा" नहर का निर्माण करवाकर सिंधु नदी का पानी जैसलमेर तक पहुंचाया
महारावल मूलराज द्वितीय1813-1846 ई.12 दिसंबर 1818 ई. को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से संरक्षण-संधि — जैसलमेर ब्रिटिश-संरक्षित रियासत बनी
महारावल जवाहर सिंह1947-1949 ई.भाटी वंश के अंतिम शासक; प्रारंभ में जोधपुर के हनवंत सिंह के साथ पाकिस्तान में विलय का प्रयास किया; 30 मार्च 1949 ई. को जैसलमेर रियासत का भारतीय संघ में विलय हुआ (विस्तार देखें: अध्याय 16)

स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ाव — सागरमल गोपा: 1942 ई. के भारत छोड़ो आंदोलन में जैसलमेर रियासत ने औपचारिक भागीदारी नहीं की, परंतु जैसलमेर के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी, लेखक व पत्रकार सागरमल गोपा ने ब्रिटिश शासन व रियासती अत्याचारों के विरुद्ध निरंतर लेखनी चलाई — इनकी प्रमुख रचनाएं "जैसलमेर राज्य का इतिहास", "राजस्थान में रियासती अत्याचार", "राजपूताने की स्थिति", "मारवाड़ की दुर्दशा" व "राजस्थान के शासकों की वास्तविकता" हैं। रियासती प्रशासन ने उन्हें बंदी बनाकर अमानवीय यातनाएं दीं — 3 अप्रैल 1946 ई. को जयपुर जेल में उनकी मृत्यु हुई (विस्तार देखें: अध्याय 15)।

करंट अफेयर्स — जैसलमेर दुर्ग का UNESCO दर्जा: जैसलमेर दुर्ग (सोनार किला) "राजस्थान के पहाड़ी दुर्ग" श्रृंखला के अंतर्गत चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, रणथंभौर, आमेर व गागरोन सहित वर्ष 2013 में UNESCO विश्व धरोहर सूची में शामिल हुआ (विस्तार देखें: अध्याय 6-7)। यह विश्व के बहुत कम "जीवंत दुर्गों" में से एक है, जहां आज भी लगभग 3000-4000 लोग दुर्ग के भीतर निवास करते हैं — इसीलिए इसे कभी-कभी "जीवित दुर्ग" (Living Fort) भी कहा जाता है।

10अन्य रियासतें — धौलपुर (जाट-राणा) एवं टोंक (नवाबी रियासत)

A. धौलपुर — जाट-राणा वंश (गोहद मूल)

शासक/तथ्य (Ruler/Fact)वर्ष (Year)विवरण (Details)
मूल स्थान16वीं सदीगोहद गांव (वर्तमान मध्य प्रदेश); जाट शासक महासिंह ने गोहद में सुदृढ़ दुर्ग बनवाया
राणा भीमसिंह (गोहद)1761 ई.तीसरे पानीपत युद्ध के दौरान मराठों का ध्यान उत्तर भारत में उलझा देखकर ग्वालियर सहित 10 मराठा दुर्गों पर अधिकार किया
राणा कीरतसिंह1805-1836 ई.17 जनवरी 1804 ई. को कंपनी सरकार ने महादजी सिंधिया को हराकर गोहद पुनः दिलाया; 1805 ई. में गोहद, बारी व राजाखेड़ा परगने अलग कर धौलपुर रियासत बनाई; धौलपुर के प्रथम शासक बने — उपाधि "गोहद के राणा" से बदलकर "धौलपुर के राणा" हुई
राणा भगवंत सिंह1836-1873 ई.1857 विद्रोह के समय धौलपुर के शासक
राणा निहालसिंह1873-1901 ई.उपनाम "प्यारे राजा साहब"; 1877 ई. में आधुनिक राजस्व-बंदोबस्त (Land Settlement) की नींव रखी
राणा उदयभान सिंह1911-1948 ई.धौलपुर के अंतिम शासक; प्रथम गोलमेज सम्मेलन में भागीदारी; 18 मार्च 1948 ई. को धौलपुर का मत्स्य संघ में विलय, स्वयं मत्स्य संघ के राजप्रमुख नियुक्त हुए

B. टोंक — राजस्थान की एकमात्र नवाबी (मुस्लिम) रियासत

क्रॉस-रेफरेंस — पहले से कवर की गई अन्य रियासतें: अलवर (नरूका शाखा — कछवाहा वंश की उपशाखा) का विवरण अध्याय 9 में, सिरोही (देवड़ा शाखा — चौहान वंश की उपशाखा) व हाड़ौती (बूंदी-कोटा-झालावाड़ — हाड़ा चौहान शाखा) का विवरण अध्याय 7 में, तथा किशनगढ़ (राठौड़ वंश की उपशाखा) का विवरण अध्याय 8 में दिया गया है — कृपया संपूर्ण चित्र हेतु उन अध्यायों का भी अध्ययन करें।

11सांस्कृतिक विरासत

स्मारक (Monument)रियासत (State)निर्माता/विशेषता (Builder/Significance)
लोहागढ़ दुर्गभरतपुरमहाराजा सूरजमल, 1733 ई.; कभी पूर्ण रूप से पराजित नहीं हुआ
डीग जल महल व उद्यानभरतपुरमहाराजा बदनसिंह व सूरजमल
केवलादेव घना पक्षी विहारभरतपुरसूरजमल काल में विकसित शिकारगाह, आज UNESCO विश्व धरोहर राष्ट्रीय उद्यान
जैसलमेर दुर्ग (सोनार किला)जैसलमेररावल जैसल व सलिवाहन; पीले बलुआ पत्थर से निर्मित; UNESCO विश्व धरोहर (2013); "जीवित दुर्ग"
जूनागढ़ दुर्गबीकानेरमहाराजा रायसिंह; मैदानी क्षेत्र में बना दुर्ग (पहाड़ी नहीं)
करणी माता मंदिर, देशनोकबीकानेरमूल निर्माण राव बीका, वर्तमान स्वरूप सूरतसिंह; "चूहों का मंदिर" के नाम से विश्वप्रसिद्ध
गंगनहरबीकानेरमहाराजा गंगासिंह, 1922-27 ई.; मरुस्थल में हरियाली लाने वाली प्रथम बड़ी नहर परियोजना
करौली राजमहल व मदनमोहन मंदिरकरौलीगोपाल सिंह व अन्य जादौन शासक
इन रियासतों की समान विशेषताएं (Common Features)
  • सभी ने मुगल सत्ता के पतन के दौर (17वीं-18वीं सदी) में अपनी स्वतंत्र पहचान मजबूत की
  • भरतपुर व करौली दोनों कृषक/स्थानीय शक्तियों से उभरकर राजसी सत्ता तक पहुंचे
  • बीकानेर व जैसलमेर दोनों ने मरुस्थल की चुनौतियों के बीच समृद्ध सभ्यता विकसित की
  • सभी ने अंततः 1817-18 या 1818 ई. के आसपास ब्रिटिश अधीनस्थ संधि व्यवस्था स्वीकार की
विशिष्ट पहचान (Distinct Identities)
  • भरतपुर — एकमात्र जाट-शासित प्रमुख रियासत, "अजेय" लोहागढ़ दुर्ग
  • करौली — यदुवंशी (श्रीकृष्ण-वंशज) पहचान, "पाल" उपाधि परंपरा
  • बीकानेर — करणी माता की कृपा से स्थापना, ऊंट-दस्ते की सैन्य विशेषज्ञता
  • जैसलमेर — तीन साकों की गाथा, विश्व के गिने-चुने "जीवित दुर्गों" में से एक

★ अध्याय सार — महत्वपूर्ण तथ्य ★

1. भरतपुर के जाट वंश की नींव चूड़ामन (1695-1721 ई.) ने रखी, जिसे सवाई जयसिंह द्वितीय ने 1721 ई. में पराजित किया। 2. महाराजा बदनसिंह ने जाट-कछवाहा शत्रुता समाप्त कर मैत्री-संबंध स्थापित किए; महाराजा सूरजमल (1756-1763 ई.) को "जाट जाति का अफलातून" कहा जाता है — इन्होंने भरतपुर नगर व अजेय लोहागढ़ दुर्ग की स्थापना की। 3. बृजेंद्र सिंह भरतपुर जाट वंश के अंतिम शासक थे — 1948 ई. में मत्स्य संघ में विलय हुआ। 4. करौली के यदुवंशी (जादौन) राजवंश की स्थापना महाराजा विजयपाल ने लगभग 1040 ई. में की; महाराजा अर्जुनपाल (1327-1361 ई.) ने 1348 ई. में करौली नगर बसाया — वंश के सबसे महान शासक माने जाते हैं। 5. करौली राजस्थान की प्रथम रियासत थी जिसने 9 नवंबर 1817 ई. को अंग्रेजों से "पृथक्करण नीति" संधि की। 6. बीकानेर राठौड़ वंश की स्थापना राव बीका (राव जोधा के पुत्र) ने 1488 ई. में की; महाराजा गंगासिंह (1887-1943 ई.) ने गंगनहर बनवाकर "राजस्थान का भगीरथ" उपाधि पाई तथा पेरिस शांति सम्मेलन में भाग लेने वाले एकमात्र भारतीय शासक बने। 7. महाराजा शार्दूलसिंह बीकानेर के अंतिम शासक थे — 7 अगस्त 1947 ई. को भारतीय संघ में विलय-पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले प्रथम भारतीय शासक बने। 8. जैसलमेर के भाटी वंश की स्थापना भट्टी (लगभग 285 ई.) ने की; रावल जैसल ने 1156 ई. में जैसलमेर नगर व दुर्ग की स्थापना की। 9. जैसलमेर दुर्ग ने तीन साके देखे — 1294 ई. (अलाउद्दीन खिलजी), 1357 ई. (फिरोजशाह तुगलक) व लगभग 1550 ई. (अर्ध साका, अमीर अली का छल)। 10. जैसलमेर व रणथंभौर सहित 6 दुर्ग "राजस्थान के पहाड़ी दुर्ग" श्रृंखला के अंतर्गत 2013 में UNESCO सूची में शामिल हैं। 11. धौलपुर रियासत गोहद (मध्य प्रदेश) के जाट-राणा वंश से निकली — 1805 ई. में स्वतंत्र रियासत बनी, अंतिम शासक उदयभान सिंह मत्स्य संघ के राजप्रमुख बने। 12. टोंक राजस्थान की एकमात्र नवाबी (मुस्लिम-शासित) रियासत थी — संस्थापक पिंडारी सरदार अमीर खां। 13. सागरमल गोपा (जैसलमेर) रियासती अत्याचारों के विरुद्ध लेखनी चलाने वाले प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे — 1946 ई. में जयपुर जेल में यातना से मृत्यु।

नीचे दी समय-रेखा (Timeline) इस अध्याय के सभी महत्वपूर्ण वर्षों को एक साथ जोड़ती है — रिवीजन के लिए इसे ज़रूर दोहराएं:

वर्ष (Year)घटना/Eventमहत्व
285 ई. (लगभग)भट्टी द्वारा भटनेर दुर्ग निर्माणभाटी वंश का प्रारंभिक इतिहास
1040 ई.विजयपाल द्वारा करौली यदुवंशी राज्य की स्थापना (बयाना)करौली रियासत का प्रारंभ
1156 ई.रावल जैसल द्वारा जैसलमेर नगर व दुर्ग की स्थापनाभाटी वंश की स्थायी राजधानी
1294 ई.जैसलमेर का प्रथम साका (अलाउद्दीन खिलजी)भाटी वंश का पहला बड़ा जौहर
1348 ई.अर्जुनपाल द्वारा करौली नगर की स्थापनायदुवंशी वंश की स्थायी राजधानी
1357 ई.जैसलमेर का द्वितीय साका (फिरोजशाह तुगलक)भाटी वंश का दूसरा जौहर
1488 ई.राव बीका द्वारा बीकानेर की स्थापनाराठौड़ों की दूसरी प्रमुख शाखा
1550 ई. (लगभग)जैसलमेर का तृतीय (अर्ध) साकाछल से आक्रमण, केवल पुरुष-बलिदान
1721 ई.सवाई जयसिंह द्वारा चूड़ामन की पराजय (थून दुर्ग)भरतपुर जाट राज्य की नींव की तैयारी
1733 ई.सूरजमल द्वारा लोहागढ़ दुर्ग निर्माणअजेय जाट दुर्ग का प्रारंभ
1756 ई.सूरजमल भरतपुर के औपचारिक शासक बनेभरतपुर नगर की स्थापना
12 जून 1761 ई.सूरजमल द्वारा आगरा किले पर अधिकारजाट शक्ति की पराकाष्ठा
1763 ई.सूरजमल की वीरगति (नजीब खां रोहिला से युद्ध)भरतपुर के स्वर्णकाल का अंत
1805 ई.धौलपुर रियासत की स्थापना (गोहद से पृथक)जाट-राणा वंश की नई पहचान
9 नवंबर 1817 ई.करौली-ब्रिटिश संधिराजस्थान की प्रथम अधीनस्थ संधि
17 नवंबर 1817 ई.टोंक की स्वतंत्र नवाबी रियासत की मान्यताराजस्थान की एकमात्र मुस्लिम रियासत
21 मार्च 1818 ई.बीकानेर-ब्रिटिश संधिब्रिटिश अधीनस्थ संधि व्यवस्था लागू
12 दिसंबर 1818 ई.जैसलमेर-ब्रिटिश संधिब्रिटिश संरक्षित रियासत
1922-1927 ई.गंगासिंह द्वारा गंगनहर निर्माणबीकानेर में कृषि-क्रांति
1947-1949 ई.सभी रियासतों का भारतीय संघ में विलयराजस्थान के एकीकरण की अंतिम कड़ी (विस्तार अध्याय 16)
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