राजस्थान इतिहास · अध्याय 10/16

अन्य राजवंश

Other Dynasties · RAS Prelims + Mains
अपडेटेड स्रोत PDF: पृष्ठ 130–144

Other Dynasties — भरतपुर-जाट, करौली, बीकानेर, जैसलमेर-भाटी एवं अन्य रियासतें

अब तक हमने चौहान, राठौड़ व कछवाहा जैसे बड़े राजपूत वंशों की गाथाएं पढ़ीं। परंतु राजस्थान का इतिहास सिर्फ इन्हीं वंशों तक सीमित नहीं है। कल्पना कीजिए — एक साधारण किसान समुदाय, जिसे "कमजोर" व "असंगठित" समझा जाता था, वही समुदाय आगे चलकर मुगल सम्राट औरंगजेब की नींद उड़ा देता है और अंततः आगरा के किले पर भी अधिकार कर लेता है — यह है भरतपुर के जाटों की कहानी, विशेषकर महाराजा सूरजमल की, जिन्हें "जाट जाति का अफलातून" कहा गया। दूसरी ओर करौली के यदुवंशी शासक स्वयं को भगवान श्रीकृ ष्ण का प्रत्यक्ष वंशज मानते हैं। बीकानेर व जैसलमेर जैसी थार मरुस्थल की रियासतों ने रेत के समुद्र में भी अपनी शक्तिशाली सल्तनतें खड़ी कीं। यह अध्याय राजस्थान के इन्हीं "अन्य किंतु समान रूप से महत्वपूर्ण" राजवंशों को समर्पित है।

2. भरतपुर का जाट वंश — उत्पत्ति एवं प्रारंभिक विद्रोह (गोकु ला से चूड़ामन तक) ◆ जाट मूलतः एक कृ षक समुदाय थे, जिनका उदय एक संगठित राजनीतिक शक्ति के रूप में औरंगजेब के शासनकाल में हुआ। मूल स्थान — सिनसिनी गांव (ब्रज क्षेत्र)। शाहजहां के पुत्रों के बीच उत्तराधिकार-युद्ध (1658-59 ई.) का लाभ उठाकर अलीगढ़ परगने के जाटों ने नंदराम के नेतृत्व में लगान देना बंद कर दिया — 1660 ई. में नंदराम ने औरंगजेब के समक्ष आत्मसमर्पण किया।

नेता (Leader) वर्ष (Year) घटना (Event)

गोकु ला (तिलपत का 1669 ई. मथुरा-आगरा क्षेत्र में विद्रोह; औरंगजेब स्वयं दमन हेतु गया; गोकु ला को बंदी बनाकर क्रू रतापूर्वक मार जमींदार) डाला गया

राजाराम (सिनसिनी के 1681 ई. आगरा के मुगल फौजदार मुलाफत खां की हत्या; सिकं दरा (आगरा) में अकबर के मकबरे से हड्डियां खानचंद का पुत्र) निकालकर जलाईं — औरंगजेब अत्यंत क्रु द्ध हुआ; औरंगजेब के सेनापति खान-ए-जहां का दमन-प्रयास असफल रहा

ब्रज — डीग के निकट अऊ गांव की शाही चौकी पर अधिकार

फतेह सिंह (राजाराम का — आमेर के बिशनसिंह ने फतेह सिंह को हराकर सिनसिनी पर कछवाहा नियंत्रण स्थापित किया पुत्र)

👑 चूड़ामन (1695-1721 ई.) भरतपुर के स्वतंत्र जाट राज्य के वास्तविक जनक व वास्तुकार

◆ ब्रज का पुत्र व राजाराम का भतीजा; फतेह सिंह के स्थान पर जाटों का नेता चुना गया; मथुरा-आगरा में मुगल क्षेत्रों पर निरंतर छापे मारकर मुगल सत्ता को गंभीर चुनौती दी। ◆ सोखर, उज्जैन, सोगर, कसोट, अवायर, रसूलपुर आदि स्थानों पर अपनी चौकियां (थाने) स्थापित कीं; थून को अपना सुदृढ़ गढ़ बनाया। ◆ औरंगजेब ने कछवाहा शासक बिशनसिंह को दमन हेतु भेजा — बिशनसिंह ने कू टनीति से जाट नेता "उदा" को अपने पक्ष में किया, परंतु चूड़ामन को पूर्णतः दबा नहीं सके , जिससे नाराज होकर औरंगजेब ने बिशनसिंह को मथुरा की फौजदारी से हटा दिया। ◆ जाजऊ के युद्ध (1707 ई., औरंगजेब की मृत्यु बाद उत्तराधिकार-युद्ध) में आजम की पराजित होती सेना को लूटा, फिर नए बादशाह बहादुरशाह प्रथम की सेवा स्वीकार की — 1500 जात व 500 सवार का मनसब मिला तथा दिल्ली-आगरा शाही मार्ग की सुरक्षा का दायित्व मिला। ◆ 1708 ई. के सांभर युद्ध में मुगल सूबेदार की सहायता कर राजपूतों को हराया; फर्रु खसियर काल में सूबेदार छबीलराम व बाद में खान-ए-दौरां की मध्यस्थता से बादशाह से क्षमादान व "राव" की उपाधि तथा बारामूला-सिकं दरा मार्ग पर राहदारी (चुंगी) वसूलने का अधिकार मिला। ◆ पुनः लूटपाट प्रारंभ करने पर फर्रु खसियर ने सवाई जयसिंह द्वितीय को दमन हेतु भेजा — 1721 ई. में जयसिंह ने चूड़ामन को हराकर थून दुर्ग पर अधिकार किया; चूड़ामन ने विष खाकर आत्महत्या कर ली।

"चूड़ामन एक असफल देशभक्त व सफल विद्रोही था; उसे राजसी सम्मान व उपाधियां तो नहीं मिलीं, परंतु उसके चरित्र में मराठों जैसी चतुराई व राजनीतिक दूरदर्शिता का अद्भुत मिश्रण था।" — इतिहासकार कालिका रंजन कानूनगो

3. महाराजा बदनसिंह एवं महाराजा सूरजमल — भरतपुर का स्वर्णकाल, लोहागढ़ दुर्ग

👑 महाराजा बदनसिंह (1722-1756 ई.) "ब्रजराज" — जाट-कछवाहा शत्रुता समाप्त करने वाले दूरदर्शी शासक

◆ चूड़ामन के भतीजे व भाऊसिंह के पुत्र; चूड़ामन की मृत्यु बाद पुत्र मोहकमसिंह व भतीजे बदनसिंह के बीच सत्ता-संघर्ष में मोहकमसिंह ने बदनसिंह को बंदी बनाया, जो भागकर सवाई जयसिंह द्वितीय की शरण में गए। ◆ अगस्त 1722 ई. में जयसिंह ने थून दुर्ग पर अधिकार कर मोहकमसिंह को हटाया (जो मारवाड़ के अजीत सिंह की शरण में भाग गया); बदनसिंह ने जयसिंह की अधीनता स्वीकार कर उनका सामंत बनना स्वीकार किया — बदले में "ब्रजराज/राजा" की उपाधि व कई जागीरें मिलीं।

◆ 19 जून 1725 ई. को जयसिंह व बदनसिंह के बीच औपचारिक संधि हुई — इनकी सबसे बड़ी उपलब्धि परंपरागत जाट- कछवाहा शत्रुता को समाप्त कर मैत्री-संबंध स्थापित करना था; जयसिंह के आगरा का सूबेदार बनने पर दिल्ली-आगरा-जयपुर शाही मार्गों की सुरक्षा का दायित्व बदनसिंह को मिला। 1730 ई. में मेवात के मेवों का दमन कर जयसिंह को प्रसन्न किया। ◆ डीग को अपना मुख्य निवास बनाया व वहां सुदृढ़ दुर्ग, सुंदर जलमहल व उद्यान बनवाए; डीग , कु म्हेर, भरतपुर व वैर के दुर्गों का निर्माण करवाया; वृंदावन में एक मंदिर बनवाया। जीवनकाल में ही योग्य पुत्र सूरजमल को प्रशासन सौंप दिया — इसका उल्लेख फ्रे जर गॉटलिब की पुस्तक "पर्शियन हिस्ट्री ऑफ द जाट्स" में मिलता है। मृत्यु — 7 जून 1756 ई., डीग में।

👑 महाराजा सूरजमल (1756-1763 ई.) "जाट जाति का अफलातून" — भरतपुर नगर के वास्तविक संस्थापक

◆ बदनसिंह के उत्तराधिकारी; खेमकरण से भरतपुर गढ़ी (मूल दुर्ग 1700 ई. में रुस्तम सोगरिया द्वारा निर्मित) छीनकर भरतपुर नगर बसाया व इसे अपनी राजधानी बनाया — इसीलिए इन्हें भरतपुर नगर का वास्तविक संस्थापक व इसे स्थायी निवास बनाने वाला शासक कहा जाता है। ◆ पिता की नीति अनुसार जयपुर से मैत्री-नीति जारी रखी; 1743 ई. में सवाई जयसिंह द्वितीय के अश्वमेध यज्ञ में भाग लिया; जयसिंह की मृत्यु बाद उत्तराधिकार-युद्ध में ईश्वरी सिंह (1743-50) का समर्थन किया। ◆ सराय शोभाचंद का युद्ध (1750 ई.) — मुगल सेनापति मीर बख्शी सलावत खां को हराया; वजीर सफदरजंग वीरता से प्रभावित होकर मित्र बने; 1750 ई. में ईश्वरी सिंह की सिफारिश पर मुगल बादशाह से "राजा" की उपाधि मिली — भरतपुर के प्रथम औपचारिक "राजा" बने। ◆ 17 मार्च 1754 ई. को खंडेराव होल्कर के कु म्हेर आक्रमण को विफल किया; अगस्त 1754 ई. में जाट-मराठा समझौता हुआ, जिससे दिल्ली-आगरा पर जाट प्रभाव बढ़ा; 26 जुलाई 1755 ई. को नजीब खां को जाटों से संधि करने को विवश किया (शर्तें — अलीगढ़ क्षेत्र सूरजमल के पास रहेगा, 26 लाख रुपये मुगलों को देंगे, सिकं दरा दुर्ग खाली करेंगे)। ◆ अहमदशाह अब्दाली के आक्रमण (1757 ई.) के समय जाटों ने मथुरा की रक्षा में बलिदान दिए; तीसरा पानीपत युद्ध (14 जनवरी 1761 ई., अब्दाली बनाम सदाशिवराव भाऊ) से पूर्व सूरजमल ने भाऊ को गुरिल्ला-युद्ध पद्धति अपनाने की सलाह दी, परंतु भाऊ ने खुले युद्ध पर जोर दिया व इमाद-उल-मुल्क को वजीर बनाने का वादा भी तोड़ा — इससे क्षुब्ध होकर सूरजमल भरतपुर लौट आए; मराठों की करारी हार हुई। ◆ युद्धोपरांत पराजित मराठों को अपने राज्य में शरण दी — बाजीराव के भाई शमशेर बहादुर का उपचार करवाया, मृत्यु पर डीग में उनकी छतरी बनवाई। 12 जून 1761 ई. को आगरा किले (मुगलों की द्वितीय राजधानी) पर अधिकार किया। ◆ 1763 ई. में नजीब खां रोहिला के विरुद्ध युद्ध में वीरगति प्राप्त हुई — नजीब खां ने इनकी मृत्यु की खबर तेरहवीं संस्कार के बाद ही सत्य मानी, जिससे कहावत बनी "जाट को तेरहवीं के बाद ही मरा मानो"। सैयद गुलाम अली नकवी ("इमाद-उस-सादात") ने इन्हें "जाट जाति का अफलातून" कहा; इतिहासकार कालिका रंजन कानूनगो ने इन्हें जाट जाति के सभी गुणों — बल, साहस, चतुराई, निष्ठा व अपराजेय भावना — का प्रतीक बताया। ◆ लोहागढ़ दुर्ग ("लौह दुर्ग") — 1733 ई. में युवराज रहते हुए निर्माण करवाया; उपनाम "राजस्थान का सिंहद्वार" व "पूर्वी सीमा का प्रहरी"; इसे आज तक कोई भी विदेशी शक्ति (अंग्रेज सहित) पूर्ण रूप से जीत नहीं सकी।

4. जवाहर सिंह से रणजीत सिंह तक — भरतपुर का उत्तरकालीन संघर्ष

शासक (Ruler) काल (Period) प्रमुख तथ्य

जवाहर सिंह 1765-1768 ई. सूरजमल के पुत्र; 1764 ई. में मल्हारराव होल्कर की सहायता से नजीब-उद-दौला को हराया; दिल्ली विजय की स्मृति में लोहागढ़ दुर्ग में "जवाहर बुर्ज" बनवाया; 1765 ई. में लाल किले के ऐतिहासिक द्वार निकालकर लोहागढ़ में स्थापित किए — "अष्टधातु द्वार" कहलाया; 1768 ई. में हत्या

रतन सिंह 1768-1769 ई. जवाहर सिंह के भाई; अप्रैल 1769 ई. में वृंदावन में रूपानंद गोसाईं द्वारा हत्या

के हरी सिंह/के सरी सिंह   1769-1775 ई.     रतन सिंह के डेढ़ वर्षीय पुत्र; संरक्षक सेनापति दानशाह; बरसाना का युद्ध (30 अक्टूबर 1773
                                           ई., मुगल सेनापति नजफ खां बनाम नवलसिंह — नवलसिंह पराजित); 1774 ई. में आगरा
                                           किला भी हाथ से निकला

रणजीत सिंह 1775-1805 ई. 1776 ई. में नजफ खां ने डीग दुर्ग जीता; कु म्हेर को नया केंद्र बनाया; सितंबर 1803 ई. में ब्रिटिश सेनापति लॉर्ड लेक से संधि; अक्टूबर 1804 ई. में संधि तोड़कर होल्कर का समर्थन किया — अंग्रेजों ने भरतपुर की घेराबंदी की, परंतु दुर्ग नहीं जीत सके ; अप्रैल 1805 ई. में पुनः अंग्रेजों से नई संधि

5. भरतपुर के उत्तरकालीन शासक — ब्रिटिश संधि से एकीकरण तक

शासक (Ruler) काल (Period) प्रमुख कार्य

रणधीर सिंह 1805-1823 ई. 1814 ई. में फतेहपुर सीकरी में गवर्नर-जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स से भेंट; नेपाल-युद्ध, पिंडारी-दमन व मराठा-विरोधी अभियानों में अंग्रेजों का साथ दिया

बलदेव सिंह 1823-1825 ई. अल्पकालीन शासन; अंग्रेज अधिकारी डेविड ऑक्टरलोनी से पुत्र बलवंत सिंह को युवराज घोषित करवाया

बलवंत सिंह 1826-1853 ई. लॉर्ड कॉम्बरमेयर की सहायता से गद्दी पर बैठे; अल्पवयस्कता में मां अमृत कुं वरी की अध्यक्षता में "रीजेंसी काउंसिल"; इसी काल में अंग्रेजों का लोहागढ़ दुर्ग पर पहली बार नियंत्रण हुआ; फतेहपुर सीकरी के बुलंद दरवाजे की शैली पर आधारित भरतपुर की जामा मस्जिद पूर्ण हुई

जसवंत/यशवंत सिंह          1853-1893 ई.        1857 विद्रोह में भरतपुर के शासक व प्रजा दोनों ने विद्रोह का समर्थन किया, राजनीतिक एजेंट
                                              मॉरिसन को भरतपुर छोड़ना पड़ा; 1879 ई. में नमक संधि; 1890 ई. में तोप-सलामी 17 से
                                              19 हुई

रामसिंह 1893-1900 ई. 1900 ई. में निजी सेवक की हत्या के आरोप में गद्दी से हटाकर दिल्ली कैं टोनमेंट भेजे गए

किशन सिंह 1900-1929 ई. प्रथम विश्व युद्ध में भरतपुर सेना का उपयोग; 1918 ई. में वायसराय चेम्सफोर्ड की यात्रा पर पूर्ण शासन-अधिकार मिले; उर्दू की जगह हिंदी को राजभाषा व देवनागरी को राजलिपि बनाया; 1925 ई. में पुष्कर में जाट महासम्मेलन की अध्यक्षता

बृजेंद्र सिंह             1929-1947 ई.        भरतपुर जाट वंश के अंतिम शासक; उपाधियां "सवाई" व "बहादुर जंग"; 31 जुलाई 1947 ई.
                                              को भारत संघ में विलय-पत्र पर हस्ताक्षर; 18 मार्च 1948 ई. को भरतपुर रियासत का मत्स्य
                                              संघ में विलय (विस्तार देखें: अध्याय 16)

6. करौली का यदुवंशी (जादौन) राजवंश — विजयपाल से अर्जुनपाल तक ◆ करौली रियासत के शासक स्वयं को चंद्रवंशी यदुवंशी क्षत्रिय व भगवान श्रीकृ ष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ का वंशज मानते हैं — इसीलिए ये अपने नाम के आगे "सिंह" के बजाय "पाल" (पालनकर्ता) लिखते हैं, क्योंकि "सिंह" शब्द से गाय के शिकार का भाव जुड़ता है, जो इन्हें स्वीकार्य नहीं था। कु लदेवी अंजनी माता (हनुमान जी की माता) मानी जाती हैं। महाभारत काल में यह क्षेत्र मत्स्य प्रदेश का भाग था; बाद में मौर्य, मालव, यौधेय व गुप्त शासकों का अधिकार रहा।

👑 महाराजा विजयपाल (लगभग 1040 ई.) करौली के यदुवंशी (जादौन) राजवंश के संस्थापक

◆ मथुरा से आकर पूर्वी राजस्थान के पहाड़ी क्षेत्र में बसे; 1040 ई. में विजयमंदिरगढ़ नामक दुर्ग बनवाकर बयाना को राजधानी बनाया; समकालीन अभिलेखों में "परम भट्टारक" कहा गया। ◆ संभवतः 1093 ई. के आसपास गजनवियों ने इस दुर्ग पर अधिकार कर लिया, जिसमें विजयपाल मारे गए या उन्होंने स्वयं आत्मोत्सर्ग किया।

विजयपाल के उत्तराधिकारी — पतन एवं पुनरुत्थान

शासक (Ruler) काल (Period) प्रमुख तथ्य

ताहनपाल/तिमनपाल/        1093-1159          ई.   66 वर्ष के दीर्घ शासनकाल में डांग, अलवर, भरतपुर, धौलपुर, गुड़गांव, मथुरा, आगरा व
त्रिभुवनपाल             (लगभग)                  ग्वालियर तक विजय; बयाना के निकट 22 किमी दूर ताहनगढ़/तिमनगढ़ दुर्ग बनवाया;
                                                उपाधि "परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर"

धर्मपाल व हरिहरपाल — दोनों कमजोर शासक सिद्ध हुए, पारिवारिक कलह में उलझे रहे; 1196 ई. में मोहम्मद गौरी ने बयाना व ताहनगढ़ दोनों जीत लिए

निर्वासन काल            1196-1327          ई.   मुस्लिम अधिकार के बाद यदुवंशी चंबल नदी पार कर सबलगढ़ के जंगल में "जादोंवाटी"
                        (लगभग)                  नाम से बसे; कुं वरपाल व उनके वंशजों ने रीवा में शरण ली; यह काल राजनीतिक अस्थिरता
                                                का माना जाता है; 1234 ई. में इल्तुतमिश ने बयाना-तिमनगढ़ पर अधिकार कर लिया

👑 महाराजा अर्जुनपाल (1327-1361 ई.) करौली के यदुवंशी वंश के सबसे महान शासक — करौली नगर के संस्थापक

◆ गोकु लदेव के पुत्र; मुहम्मद तुगलक के अलोकप्रिय मंदरायल गवर्नर मियां माखन को हराकर मंदरायल पर अधिकार किया और अपने पूर्वजों की भूमि पर पुनः पैर जमाए — इस काल में यह वंश का सबसे महान शासक माना जाता है।

◆ मीणा व पंवार राजपूतों का दमन कर सत्ता सुदृढ़ की; सरमथुरा के निकट 24 गांव बसाए। ◆ विक्रम संवत 1405 (1348 ई.) में कल्याणजी (श्रीकृ ष्ण) का मंदिर बनवाकर "कल्याणपुरी" नगर बसाया, जो आगे "करौली" कहलाया — यही रियासत की राजधानी बनी; तालाबों, बागों व मंदिरों से नगर को सुंदर बनाया। ◆ अंजनी माता मंदिर भी बनवाया, जिसके बाद से करौली के जादौन शासक अंजनी माता को अपनी कु लदेवी मानने लगे (हालांकि सामान्य यदुवंशी कु लदेवी योगमाया/योगेश्वरी मानी जाती हैं, जिन्होंने श्रीकृ ष्ण की कं स से रक्षा की थी)।

7. करौली के उत्तरकालीन शासक — गोपालदास से एकीकरण तक ◆ अर्जुनपाल के बाद विक्रमादित्य, अभयचंद्र, पृथ्वीपाल, रुद्रप्रताप, चंद्रसेन जैसे अपेक्षाकृ त सामान्य शासक हुए, जो पारिवारिक कलह में उलझे रहने से शत्रुओं का प्रभावी प्रतिरोध नहीं कर सके । 1454 ई. में मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी ने करौली पर आक्रमण कर चंद्रसेन को निष्कासित किया — चंद्रसेन ने उंटगिरी में सन्यासी जीवन अपनाया।

👑 राजा गोपालदास (अकबर काल (16वीं सदी उत्तरार्ध)) अकबर के मनसबदार — करौली राज्य के पुनरुद्धारक

◆ चंद्रसेन के पौत्र; अकबर की सेना में सेवा देकर पैतृक राज्य के कुछ भाग पुनः प्राप्त किए; अजमेर के सूबेदार भी रहे; भील जनजातियों का दमन किया तथा मासलपुर व झिरी के दुर्ग बनवाए। ◆ 1566 ई. में अकबर ने राजा गोपालदास के हाथों आगरा किले की नींव रखवाई — यह इनके मुगल-विश्वास का बड़ा प्रमाण है; 1599 ई. में दौलताबाद दुर्ग जीतकर अकबर को प्रसन्न किया, बदले में 2000 का मनसब, कीर्तिचिह्न व नगाड़ा-निशान मिला। ◆ करौली के निकट बहादुरपुर दुर्ग व करौली राजमहल में गोपाल मंदिर बनवाया, जिसमें दौलताबाद से लाई गोपाल जी की मूर्ति स्थापित की; मासलपुर के 84 गांव अपने अधीन किए।

👑 महाराजा गोपाल सिंह (1724 ई. से) करौली के विकास को गति देने वाले प्रभावशाली शासक

◆ शासनकाल में करौली राज्य की सीमा चंबल नदी पार कर ग्वालियर के सिकरवार क्षेत्र तक विस्तृत हुई; मदनमोहन जी का भव्य मंदिर बनवाया, राजप्रासाद का विस्तार व नगर की सुरक्षा हेतु सड़कों-परकोटे का निर्माण करवाया। ◆ 1753 ई. में मुगल बादशाह मुहम्मदशाह के दिल्ली दरबार में "माही मरातिब" की उपाधि से सम्मानित हुए; भद्रावती नदी तट पर इनका देवल (स्मारक) आज भी लोक-आस्था का केंद्र है।

◆ विक्रम संवत 1707 में धर्मपाल द्वितीय ने पहली बार करौली को औपचारिक राजधानी बनाया व यहीं राजमहलों का निर्माण करवाया — करौली क्षेत्र में इन्हें देवता-तुल्य पूजा जाता है। इसके बाद कुं वरपाल द्वितीय, गोपालसिंह, तुरसनपाल, मानकपाल, हरिबक्सपाल, प्रतापपाल, नरसिंहपाल, भरतपाल, मदनपाल, लक्ष्मणपाल, जयसिंहपाल, अर्जुनपाल द्वितीय, भंवरपाल व भूमिपाल जैसे शासक हुए।

◆ करौली का राजवंश स्वयं को मथुरा की शूरसेन शाखा से जोड़ता है। 1852 ई. में महाराजा नरसिंहपाल की मृत्यु के बाद गवर्नर- जनरल डलहौजी ने करौली को कं पनी राज्य में मिलाने की सिफारिश बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स से की, पर डायरेक्टर्स ने अनुमति नहीं दी; लगभग डेढ़ वर्ष के विचार-विमर्श के बाद मदनपाल (1854-1869 ई.) को करौली का शासक बनाया गया।

करौली की ऐतिहासिक विशेषता: करौली राजस्थान की प्रथम रियासत थी जिसने "पृथक्करण की नीति" (Policy of Subordinate Isolation) के अंतर्गत अंग्रेजों से संधि की — 9 नवंबर 1817 ई. को महाराजा हरबख्शपाल सिंह ने यह संधि की, जो राजपूताना की 1817-18 की संधि-श्रृंखला में सबसे पहली संधि मानी जाती है। अंतिम शासक गणेशपाल के समय 1948 ई. में करौली रियासत का मत्स्य संघ में विलय हुआ (विस्तार देखें: अध्याय 16)।

8. बीकानेर का राठौड़ वंश — राव बीका से महाराजा गंगासिंह तक ◆ बीकानेर राठौड़ वंश की दूसरी प्रमुख शाखा है — इसकी स्थापना मारवाड़ के राव जोधा के पुत्र राव बीका ने की (विस्तार देखें: अध्याय 8)। बीकानेर राज्य की स्थापना 1488 ई. में "अक्षय तृतीया" के दिन करणी माता के आशीर्वाद से हुई मानी जाती है — आज भी इस दिन बीकानेर में भव्य उत्सव व पतंगबाजी होती है।

👑 राव बीका (1465-1504 ई.) बीकानेर राठौड़ वंश के संस्थापक

◆ राव जोधा (मारवाड़) के पुत्र; कोडमदेसर (बीकानेर) में भैरव मंदिर बनवाया; पूगल के राव शेखा की पुत्री से विवाह कर राजनीतिक शक्ति सुदृढ़ की — भाटी, चौहान, खींची व कायमखानी स्थानीय शक्तियों की आपसी फू ट का लाभ उठाकर कई गांवों पर नियंत्रण किया। ◆ देशनोक में करणी माता के मूल मंदिर का निर्माण करवाया (वर्तमान भव्य स्वरूप महाराजा सूरतसिंह द्वारा दिया गया); एक मान्यता अनुसार राव बीका व जाट सरदार नरा ने संयुक्त रूप से जांगल प्रदेश जीता, जिसके नाम पर "बीकानेर" नामकरण हुआ।

◆ पिता राव जोधा के व्यंग्य (ताना) से आहत होकर बीका 1465 ई. में जांगल प्रदेश आया; किंवदंती है कि करणी माता की कृ पा से उसे नया राज्य बनाने में सफलता मिली। 1488 ई. में उसने बीकानेर बसाकर उसे राठौड़ सत्ता का दूसरा केंद्र बनाया।

बीकानेर के प्रमुख शासक — एक नज़र में

शासक (Ruler) काल (Period) प्रमुख तथ्य

लूणकरण 1505-1526 ई. "कलियुग का कर्ण" कहलाए — दानशीलता के लिए प्रसिद्ध; नागौर के मुहम्मद खां व लोद्रवा के मानसिंह को हराया; लूणकरणसर झील बनवाई; 1526 ई. में नारनौल (हरियाणा) के नवाब अबीमीरा से "धोसी के युद्ध" में वीरगति

राव जैतसी 1526-1541 ई. 1527 ई. के खानवा युद्ध में पुत्र कल्याणमल के नेतृत्व में सेना भेजकर राणा सांगा की सहायता की; 1534 ई. में हुमायूं के भाई कामरान को हराया; साहेबा/पाहेबा युद्ध (1541 ई.) में मारवाड़ के राव मालदेव से युद्ध करते हुए वीरगति (विस्तार देखें: अध्याय 8); दरबारी कवि बीठू सूजा ने "राव जैतसी रो छंद" रचा

राव कल्याणमल 1541-1574 ई. 1541 ई. में शेरशाह सूरी की अधीनता स्वीकार की; 1570 ई. के नागौर दरबार में अकबर की अधीनता स्वीकार करने वाले प्रथम राठौड़ शासक बने; पुत्र पृथ्वीराज राठौड़ (कवि, "डिंगल का होरेस") व राय सिंह दोनों को अकबर की सेवा में भेजा

महाराजा रायसिंह 1574-1612 ई. कठौली के युद्ध में इब्राहिम हुसैन मिर्जा को हराया; 1574 ई. में अकबर से "महाराजाधिराज" की उपाधि; जूनागढ़ किले का निर्माण; जहांगीर ने मानसिंह (आमेर) से अधिक विश्वास किया, मनसब

4000 से 5000 किया

महाराजा करणसिंह 1631-1669 ई. शाहजहां के दक्षिण अभियानों में सक्रिय; 1644 ई. में अमरसिंह राठौड़ (नागौर) के साथ "मतीरे री राड़"; औरंगजेब से "जंगलधर बादशाह" की उपाधि; रचना "साहित्य कल्पद्रुम"

महाराजा अनूपसिंह 1669-1698 ई. औरंगजेब से "महाराजा" व "माही मरातिब" की उपाधि; बीजापुर-गोलकोंडा अभियानों में भागीदारी; बीकानेर में 33 करोड़ देवी-देवता मंदिर व अनूप संस्कृत पुस्तकालय की स्थापना; बीकानेर चित्रकला का स्वर्णकाल

महाराजा सुजानसिंह 1700-1735 ई. प्रशासनिक स्थिरता का काल

महाराजा गजसिंह 1746-1787 ई. नागौर के अमरसिंह के भाई; बीकानेर नगर की चारदीवारी (नागर-कोट) का निर्माण; मुगल बादशाह से "श्री राजराजेश्वर महाराजाधिराज महाराजा शिरोमणि" की उपाधि

महाराजा सूरतसिंह 1787-1828 ई. 1805 ई. में भटनेर दुर्ग जीतकर मंगलवार (हनुमान का दिन) होने से "हनुमानगढ़" नाम रखा; 21 मार्च 1818 ई. को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कं पनी से संधि; करणी माता मंदिर को वर्तमान भव्य स्वरूप दिया

महाराजा गंगासिंह 1887-1943 ई. 1900 ई. में प्रसिद्ध ऊं ट-दस्ता "गंगा रिसाला" चीन के बॉक्सर विद्रोह-दमन हेतु भेजा; प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटिश सहयोग; 1919 ई. में पेरिस शांति सम्मेलन में भाग लेने वाले एकमात्र भारतीय शासक; नरेंद्र मंडल (चैंबर ऑफ प्रिंसेज) के प्रथम चांसलर; तीनों गोलमेज सम्मेलनों में भाग लेने वाले एकमात्र भारतीय शासक; 1922-27 ई. में गंगनहर का निर्माण (लॉर्ड इरविन द्वारा उद्घाटन) — "राजस्थान का भगीरथ" व "आधुनिक भारत का भगीरथ" कहलाए; मुख्य अभियंता कं वर सेन थे

महाराजा शार्दूलसिंह 1943-1949 ई. बीकानेर राठौड़ वंश के अंतिम शासक; 7 अगस्त 1947 ई. को भारतीय संघ में विलय-पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले प्रथम भारतीय शासक बने

◆ लूणकरण की दानशीलता की तुलना 'कर्मचंद्रवंशोत्कीर्तनकाव्यम्' में कर्ण से की गई है, और बीठू सूजा ने 'राव जैतसी रो छंद' में उसे 'कलियुग का कर्ण' कहा है। ◆ मालदेव के बीकानेर-आक्रमण के समय राव जैतसी ने अपने मंत्री नागराज को शेरशाह से मदद लेने भेजा था, पर मदद आने से पहले ही 1541 ई. में साहेबा (पाहेबा) के युद्ध में जैतसी वीरगति को प्राप्त हुआ। कल्याणमल ने 1544 ई. के गिरि-सुमेल युद्ध में मालदेव के विरुद्ध शेरशाह की ओर से भाग लिया और भटनेर के किले पर अधिकार किया। कल्याणमल के पुत्र पृथ्वीराज राठौड़ अकबर के दरबारी कवि थे, जिन्होंने 'बेलि किसन रुकमणी री' की रचना की। ◆ रायसिंह: अकबर के 1570 ई. के नागौर दरबार के समय मुगल सेना में शामिल हुआ; गुजरात, काबुल और कं धार अभियानों में वीरता दिखाई; 1572 ई. में अकबर ने उसे जोधपुर का प्रशासक नियुक्त किया। जूनागढ़ दुर्ग के दरवाज़े पर उसने जयमल- फत्ता की पाषाण मूर्तियाँ लगवाईं और किले के भीतर 'रायसिंह प्रशस्ति' खुदवाई। उसके समय पड़े भीषण अकाल में उसने बहुत धन खर्च किया; उसकी उदारता और दानशीलता के कारण मुंशी देवीप्रसाद ने उसे 'राजपूताने का कर्ण' कहा। बीकानेर दुर्ग पर मुगल स्थापत्य का प्रभाव दिखता है। ◆ महाराजा दलपतसिंह का आचरण जहाँगीर के अनुकू ल न होने पर जहाँगीर ने उसे कै द कर मृत्युदंड दिया। ◆ करणसिंह: नागौर के अमरसिंह से 'मतीरे री राड़' (1642-44 ई.) का कारण जाखणियाँ गाँव का सीमा-विवाद था। मुगल उत्तराधिकार-युद्ध में वह पहले तटस्थ रहा, पर औरंगजेब का पलड़ा भारी देखकर अपने पुत्रों पद्मसिंह और के सरीसिंह को उसकी सहायता के लिए भेजा। चिंतामणि भट्ट के ग्रंथ 'शुकसप्तति' में करणसिंह को 'जांगलधर बादशाह' कहा गया है — यह उपाधि आगे बीकानेर के सभी शासक प्रयोग करने लगे। उसके दरबारी विद्वान गंगानंद मैथिल ने 'कर्णभूषण' और 'काव्य डाकिनी' ग्रंथ लिखे। ◆ अनूपसिंह वीर, कू टनीतिज्ञ और विद्यानुरागी शासक था। उसने 'अनूपविवेक', 'कामप्रबोध', 'श्राद्धप्रयोग चिंतामणि' और गीत गोविंद पर 'अनूपोदय' टीका लिखी; संगीत से उसे प्रेम था। दक्षिण में रहते हुए उसने नष्ट होते अनेक ग्रंथ खरीदकर अपने

पुस्तकालय में पहुँचाए — कुम्भा के संगीत-ग्रंथों का पूरा संग्रह भी उसी ने करवाया; आज अनूप संस्कृत पुस्तकालय दुर्लभ पुस्तकों का भंडार है। दक्षिण से बचाई गई मूर्तियों का संग्रह बीकानेर के 'तैंतीस करोड़ देवताओं के मंदिर' में सुरक्षित है।

9. जैसलमेर का भाटी वंश — उत्पत्ति एवं रावल जैसल से तीन साकों तक ◆ भाटी वंश स्वयं को चंद्रवंशी यदुवंशी व भगवान श्रीकृ ष्ण का वंशज मानता है — इसीलिए "छत्राला यादवपति" भी कहलाते हैं। वंश का नाम "भाटी/भट्टी" संस्थापक भट्टी के नाम पर पड़ा।

शासक (Ruler) काल (Period) प्रमुख तथ्य

भट्टी/भट्टी (संस्थापक) लगभग 285 ई. भटनेर दुर्ग (वर्तमान राजस्थान-हरियाणा सीमा) बनवाया

मंगलराव भाटी लगभग 4थी-5वीं सदी तनोट को भाटी वंश की दूसरी राजधानी बनाया; तनोट दुर्ग के वास्तुकार के हर

देवराज भाटी लगभग 5वीं सदी परमारों से लोद्रवा छीनकर राजधानी बनाई

राज व गज 6-7वीं सदी मूल क्षेत्र पंजाब; वल्लामध मरुस्थल में निवास; भाटी वंश के प्रवर्तक माने जाते हैं; लोद्रवा अभिलेख (1157 ई.) में इनका वंशावली-उल्लेख मिलता है

विजयराज भाटी लगभग 1165 ई. भाटियों का अपेक्षाकृ त सुव्यवस्थित इतिहास यहीं से प्रारंभ होता है; धनावा अभिलेख (1176 ई.)

भोज भाटी 12वीं सदी उत्तरार्ध विजयराज के पुत्र; गौरियों से युद्ध करते हुए वीरगति

👑 रावल जैसल (1153-1168 ई. (लगभग)) जैसलमेर नगर व दुर्ग के संस्थापक

◆ 1156 ई. में जैसलमेर नगर की स्थापना की; त्रिकु टा पहाड़ी पर जैसलमेर दुर्ग का निर्माण प्रारंभ करवाया; राजधानी लोद्रवा से जैसलमेर स्थानांतरित की।

◆ रावल सलिवाहन (12वीं सदी उत्तरार्ध) ने जैसलमेर दुर्ग का निर्माण पूर्ण करवाया — पीले बलुआ पत्थर से निर्मित यह दुर्ग आगे "सोनार किला" (स्वर्ण दुर्ग) के नाम से विश्वविख्यात हुआ। 8वीं से 12वीं सदी के बीच तनोट, देवल, लोद्रवा व जैसलमेर में भाटी बस्तियों का विस्तार हुआ, जिससे संपूर्ण मरुस्थल पर भाटी प्रभुत्व स्थापित हुआ।

जैसलमेर दुर्ग के तीन साके — एक नज़र में

साका (Saka) वर्ष (लगभग) आक्रमणकारी शासक/नायक

प्रथम साका 1294 ई. अलाउद्दीन खिलजी रावल मूलराज प्रथम — जौहर हुआ

द्वितीय साका 1357 ई. फिरोजशाह तुगलक रावल दूदा, त्रिलोकसी सहित अन्य भाटी योद्धा — जौहर हुआ

तृतीय साका (अर्ध 1550 ई. (लगभग) अमीर अली (छल से, अकबर रावल लूणकरण — जौहर नहीं हुआ, केवल पुरुषों ने

साका) काल) के सरिया/साका किया, इसीलिए इसे "अर्ध साका" कहा जाता है

10. जैसलमेर के उत्तरकालीन शासक — हर्राई भाटी से जवाहरसिंह तक

शासक (Ruler) काल (Period) प्रमुख तथ्य

हर्राई भाटी 1570 ई. नागौर दरबार में अकबर की अधीनता स्वीकार की; अपनी पुत्री का विवाह अकबर से करवाया — भाटी वंश के मुगलों से वैवाहिक संबंध का प्रमाण

महारावल अमरसिंह 17वीं सदी (औरंगजेब काल) "अमरकड़ा" नहर का निर्माण करवाकर सिंधु नदी का पानी जैसलमेर तक पहुंचाया

महारावल मूलराज द्वितीय 1813-1846 ई. 12 दिसंबर 1818 ई. को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कं पनी से संरक्षण-संधि — जैसलमेर ब्रिटिश-संरक्षित रियासत बनी

महारावल जवाहर सिंह       1947-1949 ई.               भाटी वंश के अंतिम शासक; प्रारंभ में जोधपुर के हनवंत सिंह के साथ पाकिस्तान में
                                                    विलय का प्रयास किया; 30 मार्च 1949 ई. को जैसलमेर रियासत का भारतीय संघ में
                                                    विलय हुआ (विस्तार देखें: अध्याय 16)

स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ाव — सागरमल गोपा: 1942 ई. के भारत छोड़ो आंदोलन में जैसलमेर रियासत ने औपचारिक भागीदारी नहीं की, परंतु जैसलमेर के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी, लेखक व पत्रकार सागरमल गोपा ने ब्रिटिश शासन व रियासती अत्याचारों के विरुद्ध निरंतर लेखनी चलाई — इनकी प्रमुख रचनाएं "जैसलमेर राज्य का इतिहास", "राजस्थान में रियासती अत्याचार", "राजपूताने की स्थिति", "मारवाड़ की दुर्दशा" व "राजस्थान के शासकों की वास्तविकता" हैं। रियासती प्रशासन ने उन्हें बंदी बनाकर अमानवीय यातनाएं दीं — 3 अप्रैल 1946 ई. को जयपुर जेल में उनकी मृत्यु हुई (विस्तार देखें: अध्याय 15)।

करंट अफे यर्स — जैसलमेर दुर्ग का UNESCO दर्जा: जैसलमेर दुर्ग (सोनार किला) "राजस्थान के पहाड़ी दुर्ग" श्रृंखला के अंतर्गत चित्तौड़गढ़, कुं भलगढ़, रणथंभौर, आमेर व गागरोन सहित वर्ष 2013 में UNESCO विश्व धरोहर सूची में शामिल हुआ (विस्तार देखें: अध्याय 6-7)। यह विश्व के बहुत कम "जीवंत दुर्गों" में से एक है, जहां आज भी लगभग 3000-4000 लोग दुर्ग के भीतर निवास करते हैं — इसीलिए इसे कभी-कभी "जीवित दुर्ग" (Living Fort) भी कहा जाता है।

11. अन्य रियासतें — धौलपुर (जाट-राणा) एवं टोंक (नवाबी रियासत)

A. धौलपुर — जाट-राणा वंश (गोहद मूल)

शासक/तथ्य वर्ष (Year) विवरण (Details) (Ruler/Fact)

मूल स्थान 16वीं सदी गोहद गांव (वर्तमान मध्य प्रदेश); जाट शासक महासिंह ने गोहद में सुदृढ़ दुर्ग बनवाया

राणा भीमसिंह (गोहद) 1761 ई. तीसरे पानीपत युद्ध के दौरान मराठों का ध्यान उत्तर भारत में उलझा देखकर ग्वालियर सहित 10 मराठा दुर्गों पर अधिकार किया

राणा कीरतसिंह 1805-1836 ई. 17 जनवरी 1804 ई. को कं पनी सरकार ने महादजी सिंधिया को हराकर गोहद पुनः दिलाया; 1805 ई. में गोहद, बारी व राजाखेड़ा परगने अलग कर धौलपुर रियासत बनाई; धौलपुर के प्रथम शासक बने — उपाधि "गोहद के राणा" से बदलकर "धौलपुर के राणा" हुई

राणा भगवंत सिंह 1836-1873 ई. 1857 विद्रोह के समय धौलपुर के शासक

राणा निहालसिंह 1873-1901 ई. उपनाम "प्यारे राजा साहब"; 1877 ई. में आधुनिक राजस्व-बंदोबस्त (Land Settlement) की नींव रखी

राणा उदयभान सिंह 1911-1948 ई. धौलपुर के अंतिम शासक; प्रथम गोलमेज सम्मेलन में भागीदारी; 18 मार्च 1948 ई. को धौलपुर का मत्स्य संघ में विलय, स्वयं मत्स्य संघ के राजप्रमुख नियुक्त हुए

B. टोंक — राजस्थान की एकमात्र नवाबी (मुस्लिम) रियासत

◆ टोंक राजस्थान की एकमात्र ऐसी रियासत थी जिस पर मुस्लिम नवाब का शासन था — इसकी स्थापना पिंडारी सरदार अमीर खां ने की। 17 नवंबर 1817 ई. को अंग्रेजों से संधि के बाद टोंक व रामपुरा को स्वतंत्र रियासतों का दर्जा मिला तथा अमीर खां को "नवाब" के रूप में मान्यता मिली — बदले में लूटपाट बंद करने की शर्त रखी गई। टोंक झालावाड़ रियासत से पहले, 1817 ई. में ही अंग्रेजों द्वारा मान्यता प्राप्त करने वाली प्रथम नई रियासत थी (विस्तार तुलना हेतु देखें: अध्याय 7 — झालावाड़)।

क्रॉस-रेफरेंस — पहले से कवर की गई अन्य रियासतें: अलवर (नरूका शाखा — कछवाहा वंश की उपशाखा) का विवरण अध्याय 9 में, सिरोही (देवड़ा शाखा — चौहान वंश की उपशाखा) व हाड़ौती (बूंदी-कोटा-झालावाड़ — हाड़ा चौहान शाखा) का विवरण अध्याय 7 में, तथा किशनगढ़ (राठौड़ वंश की उपशाखा) का विवरण अध्याय 8 में दिया गया है — कृ पया संपूर्ण चित्र हेतु उन अध्यायों का भी अध्ययन करें।

12. सांस्कृ तिक विरासत

स्मारक (Monument) रियासत (State) निर्माता/विशेषता (Builder/Significance)

लोहागढ़ दुर्ग भरतपुर महाराजा सूरजमल, 1733 ई.; कभी पूर्ण रूप से पराजित नहीं हुआ

डीग जल महल व उद्यान भरतपुर महाराजा बदनसिंह व सूरजमल

केवलादेव घना पक्षी विहार भरतपुर सूरजमल काल में विकसित शिकारगाह, आज UNESCO विश्व धरोहर राष्ट्रीय उद्यान

जैसलमेर दुर्ग (सोनार किला) जैसलमेर रावल जैसल व सलिवाहन; पीले बलुआ पत्थर से निर्मित; UNESCO विश्व धरोहर (2013); "जीवित दुर्ग"

जूनागढ़ दुर्ग बीकानेर महाराजा रायसिंह; मैदानी क्षेत्र में बना दुर्ग (पहाड़ी नहीं)

करणी माता मंदिर, देशनोक बीकानेर मूल निर्माण राव बीका, वर्तमान स्वरूप सूरतसिंह; "चूहों का मंदिर" के नाम से विश्वप्रसिद्ध

गंगनहर बीकानेर महाराजा गंगासिंह, 1922-27 ई.; मरुस्थल में हरियाली लाने वाली प्रथम बड़ी नहर परियोजना

करौली राजमहल व करौली गोपाल सिंह व अन्य जादौन शासक मदनमोहन मंदिर

इन रियासतों की समान विशेषताएं (Common विशिष्ट पहचान (Distinct Identities) Features)

◆ सभी ने मुगल सत्ता के पतन के दौर (17वीं-18वीं सदी) में अपनी ◆ भरतपुर — एकमात्र जाट-शासित प्रमुख रियासत, "अजेय" स्वतंत्र पहचान मजबूत की लोहागढ़ दुर्ग ◆ भरतपुर व करौली दोनों कृ षक/स्थानीय शक्तियों से उभरकर ◆ करौली — यदुवंशी (श्रीकृ ष्ण-वंशज) पहचान, "पाल" उपाधि राजसी सत्ता तक पहुंचे परंपरा ◆ बीकानेर व जैसलमेर दोनों ने मरुस्थल की चुनौतियों के बीच ◆ बीकानेर — करणी माता की कृ पा से स्थापना, ऊं ट-दस्ते की समृद्ध सभ्यता विकसित की सैन्य विशेषज्ञता ◆ सभी ने अंततः 1817-18 या 1818 ई. के आसपास ब्रिटिश ◆ जैसलमेर — तीन साकों की गाथा, विश्व के गिने-चुने "जीवित अधीनस्थ संधि व्यवस्था स्वीकार की दुर्गों" में से एक

★ अध्याय सार — महत्वपूर्ण तथ्य ★

1. भरतपुर के जाट वंश की नींव चूड़ामन (1695-1721 ई.) ने रखी, जिसे सवाई जयसिंह द्वितीय ने 1721 ई. में पराजित किया। 2. महाराजा बदनसिंह ने जाट-कछवाहा शत्रुता समाप्त कर मैत्री-संबंध स्थापित किए; महाराजा सूरजमल (1756-1763 ई.) को "जाट जाति का अफलातून" कहा जाता है — इन्होंने भरतपुर नगर व अजेय लोहागढ़ दुर्ग की स्थापना की। 3. बृजेंद्र सिंह भरतपुर जाट वंश के अंतिम शासक थे — 1948 ई. में मत्स्य संघ में विलय हुआ। 4. करौली के यदुवंशी (जादौन) राजवंश की स्थापना महाराजा विजयपाल ने लगभग 1040 ई. में की; महाराजा अर्जुनपाल (1327-1361 ई.) ने 1348 ई. में करौली नगर बसाया — वंश के सबसे महान शासक माने जाते हैं। 5. करौली राजस्थान की प्रथम रियासत थी जिसने 9 नवंबर 1817 ई. को अंग्रेजों से "पृथक्करण नीति" संधि की। 6. बीकानेर राठौड़ वंश की स्थापना राव बीका (राव जोधा के पुत्र) ने 1488 ई. में की; महाराजा गंगासिंह (1887-1943 ई.) ने गंगनहर बनवाकर "राजस्थान का भगीरथ" उपाधि पाई तथा पेरिस शांति सम्मेलन में भाग लेने वाले एकमात्र भारतीय शासक बने। 7. महाराजा शार्दूलसिंह बीकानेर के अंतिम शासक थे — 7 अगस्त 1947 ई. को भारतीय संघ में विलय-पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले प्रथम भारतीय शासक बने। 8. जैसलमेर के भाटी वंश की स्थापना भट्टी (लगभग 285 ई.) ने की; रावल जैसल ने 1156 ई. में जैसलमेर नगर व दुर्ग की स्थापना की।

9. जैसलमेर दुर्ग ने तीन साके देखे — 1294 ई. (अलाउद्दीन खिलजी), 1357 ई. (फिरोजशाह तुगलक) व लगभग 1550 ई. (अर्ध साका, अमीर अली का छल)। 10. जैसलमेर व रणथंभौर सहित 6 दुर्ग "राजस्थान के पहाड़ी दुर्ग" श्रृंखला के अंतर्गत 2013 में UNESCO सूची में शामिल हैं। 11. धौलपुर रियासत गोहद (मध्य प्रदेश) के जाट-राणा वंश से निकली — 1805 ई. में स्वतंत्र रियासत बनी, अंतिम शासक उदयभान सिंह मत्स्य संघ के राजप्रमुख बने। 12. टोंक राजस्थान की एकमात्र नवाबी (मुस्लिम-शासित) रियासत थी — संस्थापक पिंडारी सरदार अमीर खां। 13. सागरमल गोपा (जैसलमेर) रियासती अत्याचारों के विरुद्ध लेखनी चलाने वाले प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे — 1946 ई. में जयपुर जेल में यातना से मृत्यु।

नीचे दी समय-रेखा (Timeline) इस अध्याय के सभी महत्वपूर्ण वर्षों को एक साथ जोड़ती है — रिवीजन के लिए इसे ज़रूर दोहराएं:

वर्ष (Year) घटना/Event महत्व

285 ई. (लगभग) भट्टी द्वारा भटनेर दुर्ग निर्माण भाटी वंश का प्रारंभिक इतिहास

1040 ई. विजयपाल द्वारा करौली यदुवंशी राज्य की स्थापना करौली रियासत का प्रारंभ (बयाना)

1156 ई. रावल जैसल द्वारा जैसलमेर नगर व दुर्ग की स्थापना भाटी वंश की स्थायी राजधानी

1294 ई. जैसलमेर का प्रथम साका (अलाउद्दीन खिलजी) भाटी वंश का पहला बड़ा जौहर

1348 ई. अर्जुनपाल द्वारा करौली नगर की स्थापना यदुवंशी वंश की स्थायी राजधानी

1357 ई. जैसलमेर का द्वितीय साका (फिरोजशाह तुगलक) भाटी वंश का दूसरा जौहर

1488 ई. राव बीका द्वारा बीकानेर की स्थापना राठौड़ों की दूसरी प्रमुख शाखा

1550 ई. (लगभग) जैसलमेर का तृतीय (अर्ध) साका छल से आक्रमण, केवल पुरुष-बलिदान

1721 ई. सवाई जयसिंह द्वारा चूड़ामन की पराजय (थून दुर्ग) भरतपुर जाट राज्य की नींव की तैयारी

1733 ई. सूरजमल द्वारा लोहागढ़ दुर्ग निर्माण अजेय जाट दुर्ग का प्रारंभ

1756 ई. सूरजमल भरतपुर के औपचारिक शासक बने भरतपुर नगर की स्थापना

12 जून 1761 ई. सूरजमल द्वारा आगरा किले पर अधिकार जाट शक्ति की पराकाष्ठा

1763 ई. सूरजमल की वीरगति (नजीब खां रोहिला से युद्ध) भरतपुर के स्वर्णकाल का अंत

1805 ई. धौलपुर रियासत की स्थापना (गोहद से पृथक) जाट-राणा वंश की नई पहचान

9 नवंबर 1817 ई. करौली-ब्रिटिश संधि राजस्थान की प्रथम अधीनस्थ संधि

17 नवंबर 1817 ई. टोंक की स्वतंत्र नवाबी रियासत की मान्यता राजस्थान की एकमात्र मुस्लिम रियासत

21 मार्च 1818 ई. बीकानेर-ब्रिटिश संधि ब्रिटिश अधीनस्थ संधि व्यवस्था लागू

12 दिसंबर 1818 ई. जैसलमेर-ब्रिटिश संधि ब्रिटिश संरक्षित रियासत

1922-1927 ई. गंगासिंह द्वारा गंगनहर निर्माण बीकानेर में कृषि-क्रांति

1947-1949 ई. सभी रियासतों का भारतीय संघ में विलय राजस्थान के एकीकरण की अंतिम कड़ी (विस्तार अध्याय 16)

स्रोत: आपके द्वारा दी गई “राजस्थान इतिहास अपडेटेड — Version 2.0” PDF, पृष्ठ 130–144। तालिकाओं की column layout पढ़ने के लिए horizontally scroll की जा सकती है।

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