📋 इस अध्याय में
- कछवाहा वंश का परिचय — उत्पत्ति के सिद्धांत एवं कुलदेवी
- दूल्हेराय से कोकिलदेव तक — ढूंढाड़ राज्य की स्थापना एवं आमेर विजय
- पृथ्वीराज कछवाहा से भारमल तक — मुगलों से प्रथम संबंध
- राजा भगवानदास एवं राजा मानसिंह प्रथम — अकबर के नवरत्न
- भाव सिंह से मिर्जा राजा जयसिंह प्रथम तक — पुरंदर की संधि
- राम सिंह प्रथम से बिशन सिंह तक
- सवाई जयसिंह द्वितीय — जयपुर की स्थापना, जंतर मंतर एवं प्रशासनिक सुधार
- सवाई ईश्वरी सिंह से मानसिंह द्वितीय तक — उत्तराधिकार संघर्ष, हवामहल, एकीकरण
- नरूका शाखा — अलवर रियासत का संक्षिप्त परिचय
- कछवाहा वंश की सांस्कृतिक विरासत
कल्पना कीजिए — एक ऐसा राजा जो युद्धभूमि में उतना ही निपुण है जितना खगोलशास्त्र में — जो एक हाथ में तलवार तो दूसरे हाथ में दूरबीन थामे रहता है। यह हैं सवाई जयसिंह द्वितीय, जिन्होंने न केवल जयपुर जैसा भारत का पहला सुनियोजित आधुनिक नगर बसाया, बल्कि आकाश के ग्रह-नक्षत्रों को मापने के लिए जंतर मंतर जैसी अद्भुत वेधशालाएं भी बनवाईं। कछवाहा वंश की कहानी ऐसे ही अनोखे शासकों की गाथा है — राजा मानसिंह प्रथम जैसे सेनापति जिन्होंने अकबर के लिए आधा भारत जीता, तो दूसरी ओर मुगल दरबार में कूटनीति के बल पर अपनी रियासत को सुरक्षित रखने वाले शासक भी। आमेर की पहाड़ियों से शुरू होकर, यह वंश जयपुर के गुलाबी शहर तक पहुंचा — आइए इस पूरी यात्रा को विस्तार से समझें।
1कछवाहा वंश का परिचय — उत्पत्ति के सिद्धांत एवं कुलदेवी
- कछवाहा वंश की कुलदेवी जमवाय माता (जमवा रामगढ़ स्थित) मानी जाती हैं। सामान्य मान्यता के अनुसार कछवाहा भगवान राम के पुत्र कुश के वंशज माने जाते हैं, इसीलिए इन्हें "कुशवाह" या "कछवाहा" कहा गया। आमेर मूलतः मीणाओं के अधिकार में था — 12वीं शताब्दी में कछवाहा वंश के उत्कर्ष का काल माना जाता है।
| मत/स्रोत (Theory/Source) | उत्पत्ति संबंधी विचार (View on Origin) |
|---|
| भाटों की परंपरा | कछवाहा अयोध्या से रोहतास (बिहार) होते हुए, "नल" के नेतृत्व में पश्चिम की ओर आए; नल के 33वें वंशज को नरवर (मध्य प्रदेश) शाखा का संस्थापक माना जाता है |
| कर्नल जेम्स टॉड | नल ने नरवर नगर बसाया; ग्वालियर के सहस्रबाहु मंदिर अभिलेख (1093 ई.) में महिपाल कछवाहा का उल्लेख; लक्ष्मण को ग्वालियर क्षेत्र का प्रथम शासक व वज्रदामन को ग्वालियर-विजेता बताया |
| सूर्यमल्ल मिश्रण | कछवाहा कूर्मवंशी (रघुवंशी शासक "कूर्म" के वंशज) हैं — इसी से "कुशवाह/कछवाहा" नाम पड़ा |
| डॉ. जी.एच. ओझा | मूल पुरुष कछवाहा ही माने गए |
| सामान्य मान्यता | कछवाहा स्वयं को अयोध्या नरेश भगवान राम के पुत्र कुश का वंशज मानते हैं — इसी से "कुशवाह/कछवाहा" नाम प्रचलित हुआ |
2दूल्हेराय से कोकिलदेव तक — ढूंढाड़ राज्य की स्थापना एवं आमेर विजय
- भाटों के अनुसार सोढदेव ने पिता द्वारा निष्कासित किए जाने पर 966 ई. में ढूंढाड़ राज्य की स्थापना की थी। प्रारंभ में कछवाहा चौहानों के सामंत रहे, फिर चौहानों का प्रभाव क्षीण होने तक गुहिलों (मेवाड़) के भी सामंत बने रहे।
👑 दूल्हेराय/ढोलेराय (1137 ई.) ढूंढाड़ राज्य के संस्थापक
- दादा तेजकरण; बड़े भाई ईशसिंह (नरवर) ने पैतृक राज्य भाई को सौंपकर स्वयं करौली में तपस्वी जीवन अपनाया।
- मौड़ (लालसोट) के चौहान शासक रलनसिंह/रलपसी की पुत्री सुजान कंवर से विवाह किया — दहेज में दौसा प्राप्त हुआ; 1137 ई. में दौसा के निकट कछवाहा वंश की स्थापना कर ढूंढाड़ राज्य की नींव रखी — प्रारंभिक राजधानी दौसा (खोह)।
- 1137 ई. में ही दौसा के बड़गूजरों को हराकर ढूंढाड़ क्षेत्र पर नियंत्रण किया; जमवा रामगढ़ के मीणा शासक को हराकर इसे नई राजधानी बनाया तथा जमवाय माता मंदिर बनवाया, जो आगे कछवाहा वंश की कुलदेवी बनीं।
- ससुराल पक्ष (चौहानों) की सहायता से माची (रामगढ़), खोह (दौसा), गैटोर (गैटा मीणा) व झोटवाड़ा (झोटा मीणा) पर अधिकार किया; मृत्यु 1127 ई. (भाटी परंपराओं में तिथि-भ्रम है, परंतु तथ्य स्वीकार्य माने जाते हैं)।
दूल्हेराय के उत्तराधिकारी — कोकिलदेव तक
| शासक (Ruler) | काल (Period) | प्रमुख तथ्य |
|---|
| मालसी, जिल्देव, रामदेव, किल्हन, कुंतल, उदयकरण, नरसिंह, उदरण, चंद्रसेन | — | सभी प्रारंभ में चौहानों, फिर गुहिलों (मेवाड़) के सामंत रहे |
| कोकिलदेव/कांकिल | 1207 ई. | आमेर को कछवाहाओं की तीसरी नई राजधानी बनाया; आमेर के मीणा शासकों को पराजित किया; यादवों से मेड़ व बैराठ जीता; आमेर में अंबिकेश्वर महादेव मंदिर बनवाया। इनके वंश से नरूका शाखा (फागी-अलवर क्षेत्र) व शेखावत शाखा (शेखावाटी क्षेत्र) निकलीं |
| राजदेव | 1237 ई. | आमेर में प्रसिद्ध कदमी महलों का निर्माण करवाया — यहीं आमेर के शासकों का राज्याभिषेक होता था, बाद में गोविंद देव जी मंदिर निर्माण के बाद यह परंपरा वहां स्थानांतरित हुई |
| पंचनदेव | — | एक शक्तिशाली व वीर शासक माने जाते हैं |
3पृथ्वीराज कछवाहा से भारमल तक — मुगलों से प्रथम संबंध
| शासक (Ruler) | काल (Period) | प्रमुख तथ्य |
|---|
| पृथ्वीराज कछवाहा | 1503-1527 ई. | राणा सांगा के सामंत; मार्च 1527 ई. के खानवा युद्ध में सांगा की ओर से लड़ते हुए वीरगति (विस्तार देखें: अध्याय 6); गलता के रामानुज संप्रदाय के संत कृष्णदास पयहारी के अनुयायी; पत्नी बालाबाई (बीकानेर के राव लूणकरण की पुत्री) |
| पूरनमल कछवाहा | 1527-1533 ई. | पृथ्वीराज व बालाबाई के प्रभाव से छोटे पुत्र होकर भी आमेर की गद्दी पाई |
| भीमदेव कछवाहा | 1533-1536 ई. | पृथ्वीराज के बड़े पुत्र; पूरनमल को हराकर गद्दी प्राप्त की; इनके समय आमेर में गृह-युद्ध जैसी स्थिति बनी |
| रतनसिंह कछवाहा | 1536-1546 ई. | विलासी प्रवृत्ति के शासक — प्रशासन विश्वासपात्र तेजसी रायमलोत के हाथ; शेरशाह सूरी की अधीनता स्वीकार की; चाचा संगा ने सांगानेर नगर बसाया (बीकानेर के राव जैतसी का सहयोग मिला); विष देकर हत्या कर दी गई |
| आस्करण | 1546-1547 ई. | अल्पकालीन शासन; बाद में हटाकर भारमल को शासक बनाया गया |
👑 भारमल (अमीर-उल-उमरा भारमल) (1547-1574 ई.) मुगल अधीनता स्वीकार करने वाले प्रथम राजपूत शासक
- आस्करण शेरशाह के पुत्र सलीम शाह की शरण में गए; शेरशाह के सेनापति हाजी खां पठान की सहायता से भारमल ने आस्करण को नरवर राज्य दिया।
- दिसंबर 1556 ई. में मजनू खां की सहायता से अकबर से घनिष्ठ मित्रता हुई; जनवरी 1562 ई. में अजमेर स्थित ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह से लौटते समय अकबर सांभर के निकट रुका, जहां चगताई खां की मध्यस्थता से भारमल ने अपनी पुत्री हरकूबाई/शाहीबाई/मानमती (आगे "मरियम-उज़-जमानी") का विवाह अकबर से करवाया।
- इसी विवाह से जहांगीर (सलीम) का जन्म हुआ — भारमल मुगलों से वैवाहिक संबंध स्थापित करने वाले प्रथम राजपूत शासक बने। 20 जनवरी 1562 ई. को पुत्र भगवानदास व पौत्र मानसिंह को अकबर की सेवा में भेजा।
- अकबर ने भारमल को "अमीर-उल-उमरा राजा" की उपाधि व 5000 का मनसब दिया; अपनी अनुपस्थिति में अकबर अक्सर राजधानी का प्रबंधन भारमल को सौंपता था।
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4राजा भगवानदास एवं राजा मानसिंह प्रथम — अकबर के नवरत्न
👑 राजा भगवानदास (1574-1589 ई.) "अमीर-उल-उमरा राजा" — कुंवर व शासक दोनों रूपों में मुगल सेवा
- अकबर से "अमीर-उल-उमरा राजा" की उपाधि व 5000 का मनसब प्राप्त किया; 1569 ई. की रणथंभौर संधि में उपस्थित रहे; महाराणा प्रताप के पास भेजे गए तीसरे शिष्टमंडल का नेतृत्व किया (विस्तार देखें: अध्याय 6)।
- सारनाल के युद्ध (गुजरात) में अफगानों (इब्राहिम हुसैन मिर्जा) के विरुद्ध अद्भुत वीरता दिखाई, जिस पर अकबर ने इन्हें नगाड़ा व ध्वज भेंट किया; 1582 ई. में पंजाब के सूबेदार व लाहौर के संयुक्त गवर्नर नियुक्त हुए।
- 1585 ई. में पुत्री मानबाई का विवाह सलीम (जहांगीर) से करवाया; मृत्यु 1589 ई., लाहौर में हुई।
👑 राजा मानसिंह प्रथम (1589-1614 ई.) अकबर के नवरत्नों में से एक — तीन पीढ़ियों से मुगल सेवा में
- जन्म दिसंबर 1550, मौजमाबाद (जयपुर); समकालीन मुगल सम्राट — अकबर व जहांगीर; राज्याभिषेक पर अकबर ने 5000 का मनसब दिया, जो 1605 ई. में बढ़ाकर 7000 (अकबर काल का सर्वोच्च मनसब) कर दिया गया; अकबर ने "फरजंद" (पुत्र-समान) व "मिर्जा राजा/राजा" की उपाधियां दीं।
- 1569 ई. में रणथंभौर के सूरजन हाड़ा को मुगल अधीनता स्वीकार करवाने में मध्यस्थता की; 1572-73 ई. में गुजरात अभियान में शामिल, सारनाल के युद्ध (1573 ई.) में इब्राहिम मिर्जा के विरुद्ध शाही सेना का नेतृत्व किया।
- 1573 ई. में महाराणा प्रताप के पास भेजे गए दूसरे शिष्टमंडल का नेतृत्व किया (विस्तार देखें: अध्याय 6); 1576 ई. में हल्दीघाटी के युद्ध में मुगल सेना के सेनापति रहे — यह इनके सैन्य जीवन की सबसे चर्चित भूमिका है।
- 1574 ई. में बिहार में दाऊद खां का विद्रोह दबाया; 1581 ई. में काबुल में मिर्जा हकीम का विद्रोह दबाया; 1587 ई. में बिहार के गवर्नर नियुक्त हुए; 1594 ई. में बंगाल के गवर्नर बनकर राजधानी तांडा से राजमहल (अकबरपुर) स्थानांतरित की; उड़ीसा को मुगल साम्राज्य में मिलाया।
- 15 जनवरी 1589 ई. को पटना में औपचारिक राज्याभिषेक हुआ, बाद में आमेर में दूसरा राज्याभिषेक हुआ, जहां अकबर से "राजा" की उपाधि व 5000 मनसब मिला। मृत्यु 1614 ई., एलिचपुर (महाराष्ट्र) में; छतरी हाड़ीपुर (आमेर) में स्थित है।
- सांस्कृतिक योगदान — आमेर महल के प्रमुख निर्माता; आमेर में शिला देवी मंदिर बनवाया — जैसोर (बंगाल) के शासक केदार को हराकर शिला माता की मूर्ति लाए थे; वृंदावन में गोविंद देव जी मंदिर व आमेर झील का निर्माण करवाया; लाहौर से मीनाकारी (Enamelling) कला आमेर लाए।
- दरबारी विद्वान — पुंडरीक (रागमाला, दूनी प्रकाश), मुरारीदान (मान-प्रकाश), कवि जगन्नाथ (मानसिंह कीर्ति-मुक्तावली); संत दादू दयाल की रचनाएं (वाणियां) भी इनके समय की मानी जाती हैं।
"हल्दीघाटी युद्ध में मुगल सेना के सेनापति राजा मानसिंह प्रथम थे — यह भूमिका आज भी इतिहास की सबसे विवादित व चर्चित भूमिकाओं में एक मानी जाती है।" — राजस्थान इतिहास — हल्दीघाटी युद्ध विश्लेषण
5भाव सिंह से मिर्जा राजा जयसिंह प्रथम तक — पुरंदर की संधि
- भाव सिंह (1614-1621 ई.), राजा मानसिंह प्रथम के पुत्र, निःसंतान निधन हो गए।
👑 मिर्जा राजा जयसिंह प्रथम (1621-1667 ई.) 46 वर्ष का दीर्घ शासनकाल — तीन मुगल बादशाहों की सेवा
- 11 वर्ष की आयु में शासक बने; पिता महासिंह (मानसिंह प्रथम के पौत्र), माता दमयंती; जन्म 1611 ई.; जहांगीर, शाहजहां व औरंगजेब — तीनों की सेवा की। आमेर के वकील राय मुकुंददास ने जहांगीर से इनका राजतिलक करवाया।
- 1623 ई. में मात्र 12 वर्ष की आयु में मलिक अंबर को हराकर अहमदनगर पर नियंत्रण किया; 1625 ई. में दलेल खां पठान को हराया; शाहजहां काल में महावन के जाट विद्रोह व 1629 ई. के उज़्बेक विद्रोह को दबाया; 1630 ई. में खान-ए-जहां लोदी का विद्रोह दबाया।
- 1636 ई. में बीजापुर-गोलकोंडा (दक्षिण) अभियान में भाग लिया; 1637 ई. में शाहजहां ने "मिर्जा राजा" की उपाधि देकर कंधार अभियान पर भेजा; 1647 ई. में मध्य एशिया अभियान में भाग लिया; 1651 ई. में कंधार अभियान में सदुल्लाह खां के साथ हरावल का नेतृत्व किया।
- शाहजहां के उत्तराधिकार-युद्ध में — बहादुरपुर का युद्ध (1658 ई.) दारा शिकोह के पुत्र सुलेमान शिकोह के साथ मिलकर शाह शुजा को हराया; धरमत व सामूगढ़ में हार के बाद आमेर लौटे; 25 जून 1658 ई. को मथुरा में औरंगजेब से मिलकर सहयोग का वचन दिया; देवराई का युद्ध (अजमेर, 1659 ई.) औरंगजेब की ओर से दारा के विरुद्ध लड़ा तथा भागते हुए दारा को पकड़कर औरंगजेब को सौंपा — पुत्र रामसिंह ने सुलेमान शिकोह को पकड़ा।
- औरंगजेब ने प्रसन्न होकर 7000 का मनसब व दक्षिण में नियुक्ति दी — मुख्य कार्य मराठा नेता शिवाजी को नियंत्रित करना था। पुरंदर की संधि (11 जून 1665 ई.) — शिवाजी ने मुगल अधीनता स्वीकार की, स्वयं दरबार में उपस्थित होने से छूट मिली, पुत्र संभाजी को 5000 का मनसब मिला, 35 में से 23 दुर्ग मुगलों को सौंपे (12 अपने पास रखे), बीजापुर-गोलकोंडा में चौथ वसूलने का अधिकार मिला।
- जयसिंह के आग्रह पर ही शिवाजी आगरा दरबार पहुंचे थे, जहां बाद में उन्हें बंदी बनाया गया और वे जयपुर भवन (आगरा) से भागने में सफल रहे। बीजापुर अभियान में पूर्ण सफलता न मिलने से औरंगजेब को इन पर संदेह हुआ। मृत्यु — बुरहानपुर के निकट (1667 ई.), दक्षिण अभियान से लौटते समय।
- स्थापत्य — आमेर महलों का व्यापक विस्तार करवाया; जयगढ़ दुर्ग निर्माण को लेकर मतभेद है — डॉ. जगदीश सिंह व डॉ. गोपीनाथ शर्मा जयसिंह प्रथम को मूल निर्माता मानते हैं, जबकि अन्य मत अनुसार मूल निर्माण मानसिंह प्रथम का व वर्तमान स्वरूप जयसिंह द्वितीय का माना जाता है।
- हिंदी, संस्कृत, उर्दू, फारसी, तुर्की व अरबी भाषाओं के ज्ञाता थे; दरबारी विद्वान — बिहारी (बिहारी सतसई, हर उत्कृष्ट दोहे पर स्वर्ण मुद्रा पुरस्कार मिलता था), कुलपति मिश्र (लगभग 52 ग्रंथों के रचयिता), रायकवि (जयसिंह चरित्र)। इतिहासकार यदुनाथ सरकार ने इनकी मृत्यु की तुलना इंग्लैंड की रानी एलिजाबेथ के दरबारी वाल्सिंघम से की।
6राम सिंह प्रथम से बिशन सिंह तक
| शासक (Ruler) | काल (Period) | प्रमुख तथ्य |
|---|
| राम सिंह प्रथम | 1667-1688 ई. | औरंगजेब ने असम विद्रोह दबाने भेजा; दरबारी साहित्य — कुलपति मिश्र (रस रहस्य), दलपतिराम (चागता पादशाही), शंकर भट्ट (वैद्य विनोद संहिता) |
| बिशन सिंह/विष्णु सिंह | 1688-1700 ई. | राम सिंह प्रथम के पौत्र; पिता किशन सिंह की मृत्यु दक्षिण भारत में हुई; भरतपुर क्षेत्र के जाट विद्रोही चूड़ामन को दबाने हेतु औरंगजेब द्वारा नियुक्त किए गए, कूटनीति से जाट नेता उदा को अपनी ओर मिलाया परंतु चूड़ामन को पूर्णतः दबा नहीं सके — इसी कारण मथुरा की फौजदारी से हटाए गए (विस्तार देखें: अध्याय 10) |
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7सवाई जयसिंह द्वितीय — जयपुर की स्थापना, जंतर मंतर एवं प्रशासनिक सुधार
👑 सवाई जयसिंह द्वितीय (1700-1743 ई.) "चाणक्य-राजा" — महान खगोलशास्त्री, राजनीतिज्ञ एवं नगर-नियोजन विशेषज्ञ
- सात मुगल बादशाहों (औरंगजेब, बहादुरशाह प्रथम, जहांदारशाह, फर्रुखसियर, रफी-उद-दर्जात, रफी-उद-दौला, मुहम्मदशाह "रंगीला") के समकालीन; औरंगजेब ने वीरता व वाक्पटुता से प्रसन्न होकर "सवाई" की उपाधि दी। डॉ. जी.एच. ओझा ने इनकी तुलना राणा कुंभा व राजा भोज से की।
- जाजऊ का युद्ध (1707 ई.) — औरंगजेब की मृत्यु बाद उत्तराधिकार-युद्ध में आजम का साथ दिया, परंतु मुअज्जम (बहादुरशाह प्रथम) विजयी हुए — बदले में बहादुरशाह ने जयसिंह को हटाकर विजयसिंह को आमेर का शासक बनाया तथा फौजदार सैयद हुसैन खां ने आमेर का नाम "इस्लामाबाद/मोमिनाबाद" रख दिया।
- देबारी समझौता (1708 ई.) — मारवाड़ के अजीत सिंह व मेवाड़ के अमर सिंह द्वितीय के साथ गठबंधन बनाकर पुनः आमेर पर अधिकार किया (विस्तार देखें: अध्याय 6, 8); 1710 ई. में औपचारिक रूप से पुनः आमेर के शासक बने।
- मालवा के सूबेदार (तीन बार — फर्रुखसियर काल, लगभग 1730 व मुहम्मदशाह काल) रहे; भरतपुर क्षेत्र के जाट विद्रोह दबाए — 1715 ई. में चूड़ामन से संधि, फिर पुत्रों मोकल-वीर-रूमा के विद्रोह दबाए; चूड़ामन के बाद बदनसिंह की सहायता से विद्रोह कुचला, बदले में डीग की जागीर व "ब्रिजराज/राजा" की उपाधि दी (विस्तार देखें: अध्याय 10)।
- इस सफलता पर मुहम्मदशाह ने "राज राजेश्वर श्री राजाधिराज सवाई" की उपाधि दी; 1729 ई. में बूंदी की राजनीति में हस्तक्षेप किया, जिससे मराठा प्रभाव बढ़ा। हुरड़ा सम्मेलन (17 जुलाई 1734 ई.) का उद्देश्य मराठा शक्ति पर अंकुश लगाना था (विस्तार देखें: अध्याय 6)।
- धौलपुर समझौता (18 फरवरी 1741 ई.) — मुगलों की ओर से सवाई जयसिंह व मराठों की ओर से पेशवा बाजीराव प्रथम के बीच; पेशवा को मालवा की सूबेदारी मिली, मराठों की 500 सैनिकों की स्थायी टुकड़ी मुगल सेना में रखने पर सहमति; सिंधिया व होल्कर ने लिखित रूप से आश्वासन दिया कि यदि पेशवा विश्वासघात करें तो वे उनका साथ छोड़ देंगे।
जयपुर की स्थापना, जंतर मंतर एवं खगोलशास्त्र
| निर्माण/उपलब्धि (Construction/Achievement) | वर्ष/विवरण (Year/Details) |
|---|
| जयपुर नगर की स्थापना | 18 नवंबर 1727 ई.; वास्तुकार विद्याधर भट्टाचार्य; शिलान्यास जगन्नाथ सम्राट द्वारा; 9-वर्ग (Varga) की चौपड़ योजना पर आधारित; भारत का प्रथम सुनियोजित आधुनिक नगर; 2019 में UNESCO विश्व धरोहर नगर (World Heritage City) घोषित |
| गोविंद देव जी मंदिर (आमेर/जयपुर) | मूर्ति वृंदावन से लाकर 1714 ई. में स्थापित; गौड़ीय संप्रदाय की प्रमुख पीठ; जयपुर शासकों के राज्याभिषेक का स्थल |
| नाहरगढ़ दुर्ग | लगभग 1734 ई.; अन्य नाम सुदर्शनगढ़/"जयपुर का मुकुट"; मराठा आक्रमणों से सुरक्षा हेतु निर्मित |
| जलमहल | मानसागर झील में स्थित; अश्वमेध यज्ञ हेतु विकसित |
| यज्ञ | पुरोहित पुंडरीक रत्नाकर के निर्देशन में अश्वमेध, वाजपेय व राजसूय यज्ञ संपन्न करवाए |
| जंतर मंतर (5 वेधशालाएं) | जयपुर (सबसे बड़ी, 2010 से UNESCO विश्व धरोहर), दिल्ली, उज्जैन, मथुरा व वाराणसी में निर्मित |
| जयगढ़ दुर्ग | वर्तमान स्वरूप सवाई जयसिंह द्वितीय द्वारा; भीतर विजयगढ़ी उपदुर्ग, दीया बुर्ज, तोप-ढलाई शाला व विशाल "जयवाण तोप" (पहिये रामसिंह द्वितीय काल से) स्थित |
| हरमाड़ा नहर | जयपुर की पेयजल आपूर्ति हेतु निर्मित |
| अन्य निर्माण | सिसोदिया रानी महल, बृजनाथ मंदिर, आनंद कृष्ण मंदिर |
खगोलशास्त्र, गणित एवं साहित्य में योगदान
| ग्रंथ/कार्य (Work) | रचयिता/विवरण (Author/Details) |
|---|
| जिज मुहम्मदशाही (1733 ई.) | सवाई जयसिंह द्वितीय स्वयं — ग्रहों की गति पर आधारित |
| जयसिंह करिका | सवाई जयसिंह द्वितीय स्वयं — खगोलशास्त्र पर |
| सिद्धांत सम्राट | गुरु पंडित जगन्नाथ — यूक्लिड की ज्यामिति का संस्कृत अनुवाद भी किया |
| विभाग सारणी | केवलराम — लघुगणक (Logarithm) सारणी का संस्कृत अनुवाद |
| जयसिंह कल्पद्रुम | पुंडरीक रत्नाकर |
| रघव-गीतम् | कृष्ण भट्ट (उपाधि "रामरसाचार्य") |
- सामाजिक सुधार — सती प्रथा को नियंत्रित करने का प्रयास किया; विधवा-पुनर्विवाह को मान्यता देने वाले प्रथम राजपूत शासक बने; ब्राह्मणों में परस्पर भेदभाव ("छायणत") कम करने के प्रयास किए; "सूरतखाना" (चित्रकला विभाग) की स्थापना की। मृत्यु — 1743 ई.
करंट अफेयर्स — जयपुर का UNESCO दर्जा: जयपुर नगर को 2019 में UNESCO विश्व धरोहर नगर का दर्जा मिला था, परंतु हाल के वर्षों (2023 व 2025) में UNESCO ने वालेड सिटी (परकोटा क्षेत्र) में अवैध निर्माण व अतिक्रमण को लेकर चिंता जताई है। जयपुर को दिसंबर 2026 तक आवश्यक सुधार व संरक्षण प्रतिवेदन (State of Conservation Report) प्रस्तुत करना है, अन्यथा यह दर्जा खतरे में पड़ सकता है — जबकि जंतर मंतर (2010 से सूचीबद्ध) पर फिलहाल ऐसी कोई चिंता नहीं जताई गई है।
8सवाई ईश्वरी सिंह से मानसिंह द्वितीय तक — उत्तराधिकार संघर्ष, हवामहल, एकीकरण
- सवाई जयसिंह द्वितीय के बाद उनके पुत्रों ईश्वरी सिंह (माता सूरज कंवर) व माधोसिंह प्रथम (माता चंद्रकंवर, मेवाड़ राजकुमारी) के बीच लंबा उत्तराधिकार-युद्ध चला।
| युद्ध (Battle) | वर्ष (Year) | पक्ष एवं परिणाम (Sides & Result) |
|---|
| राजमहल का युद्ध | 1 मार्च 1747 ई. | ईश्वरी सिंह (सहयोगी — मुगल बादशाह अहमदशाह, रणोजी सिंधिया, सेनापति हरगोविंद नातानी) बनाम माधोसिंह (सहयोगी — होल्कर) — ईश्वरी सिंह विजयी; विजय-स्मृति में जयपुर के त्रिपोलिया बाजार में 7 मंजिला ईसरलाट/सरगासूली मीनार बनवाई |
| बगरू का युद्ध | 1 अगस्त 1748 ई. | ईश्वरी सिंह (सहयोगी — भरतपुर राजकुमार सूरजमल) बनाम माधोसिंह (सहयोगी — पेशवा, होल्कर, बूंदी के उम्मेद सिंह, मेवाड़ के जगत सिंह द्वितीय, कोटा के दुर्जनशाल) — वस्तुतः मराठों व माधोसिंह की विजय; समझौते में ईश्वरी सिंह ने 5 परगने (टोंक, टोडा, मालपुरा, निवाई, राजमहल) माधोसिंह को दिए, युद्ध-हर्जाना भी चुकाया |
💡 ईश्वरी सिंह का अंत — मराठा दबाव की त्रासदी
बगरू युद्ध के बाद ईश्वरी सिंह मराठों की बढ़ती आर्थिक मांगों से अत्यंत त्रस्त हो गए। जब मल्हारराव होल्कर स्वयं जयपुर पहुंचे, तो असहनीय दबाव में 13 दिसंबर 1750 ई. को ईश्वरी सिंह ने अपनी ही विजय-स्मारक मीनार "ईसरलाट" से कूदकर आत्महत्या कर ली — एक ऐसी घटना जो दर्शाती है कि 18वीं शताब्दी में मराठा हस्तक्षेप ने राजस्थान की रियासतों को किस हद तक असहाय बना दिया था (विस्तार देखें: अध्याय 12)। उल्लेखनीय है कि इसी ईश्वरी सिंह ने 1748 ई. में अहमदशाह अब्दाली की सेना को मानपुर के युद्ध में परास्त भी किया था।
👑 महाराजा माधोसिंह प्रथम (1751-1768 ई.) "बब्बर शेर" — मराठा संकट के दौर के शासक
- ईश्वरी सिंह की मृत्यु बाद मराठों की सहायता से शासक बने; 10 जनवरी 1751 ई. — "कल्ले-आम" नरसंहार में जयपुर की जनता ने मंदिर-दर्शन के बहाने नगर में घुसे मराठा सैनिकों को नगर-द्वार बंद कर मार डाला।
- मुगल बादशाह अहमदशाह, भरतपुर के सूरजमल व अवध के नवाब सफदरजंग के बीच समझौता करवाया — बदले में रणथंभौर दुर्ग प्राप्त हुआ (पूर्व में कोटा के अधीन)। भटवाड़ा का युद्ध (नवंबर 1761 ई.) — कोटा के शत्रुशाल (सेनापति झाला जालिम सिंह) से रणथंभौर विवाद पर युद्ध, कोटा विजयी।
- 1763 ई. में सवाई माधोपुर नगर बसाया; मौंडा/मांडोली का युद्ध (1767 ई.) व कामां का युद्ध (1768 ई.) — दोनों में भरतपुर के जाट शासक जवाहर सिंह से पराजित हुए (विस्तार देखें: अध्याय 10)।
- सिटी पैलेस संग्रहालय (जयपुर) में इनका विशाल कुर्ता, गाउन व पायजामा आज भी संरक्षित है — इनके विशाल कद-काठी का प्रमाण।
पृथ्वी सिंह से जगत सिंह द्वितीय तक — संक्षिप्त सूची
| शासक (Ruler) | काल (Period) | प्रमुख तथ्य |
|---|
| सवाई पृथ्वी सिंह | 1768-1778 ई. | अपेक्षाकृत स्थिर शासनकाल |
| सवाई प्रताप सिंह | 1778-1803 ई. | तुंगा का युद्ध (28 जुलाई 1787 ई., महादजी सिंधिया के विरुद्ध, राठौड़-कछवाहा गठबंधन — मारवाड़ के विजय सिंह का समर्थन, बिस्सू के सूरजमल शेखावत वीरगति) — परिणाम अनिर्णायक रहा परंतु मराठों को पीछे हटना पड़ा; पाटन का युद्ध (20 जून 1790 ई., मराठों की विजय, अजमेर पर मराठा नियंत्रण); मालपुरा का युद्ध (16 अप्रैल 1800 ई., मराठों की विजय); हवामहल का निर्माण (1799 ई., वास्तुकार उस्ताद लाल चंद, भगवान विष्णु को समर्पित, 5 मंजिला, 953 झरोखे, बिना नींव खड़ी संरचना); जयपुर चित्रकला का स्वर्णकाल; काव्य-नाम "ब्रजनिधि" |
| सवाई जगत सिंह द्वितीय | 1803-1818 ई. | दिसंबर 1803 ई. में वेलेजली से अधीनस्थ संधि; 15 अप्रैल 1816 ई. को लॉर्ड हेस्टिंग्स से पुनः अधीनस्थ संधि (मराठा-पिंडारियों से सुरक्षा हेतु); कृष्णा कुमारी विवाद में मारवाड़ के मानसिंह से टकराव — गिंगोली का युद्ध (1807 ई., विस्तार देखें: अध्याय 6, 8); दरबारी वेश्या "रासकपूर" के प्रभाव से राजकोष लगभग समाप्त हो गया |
जयसिंह तृतीय से मानसिंह द्वितीय तक — ब्रिटिश काल एवं एकीकरण
| शासक (Ruler) | काल (Period) | प्रमुख कार्य |
|---|
| सवाई जयसिंह तृतीय | 1818-1835 ई. | ब्रिटिश रेजिडेंट का प्रभाव अत्यधिक बढ़ा; भट्टियानी रानी व रेजिडेंट के बीच तीव्र संघर्ष से दरबारी राजनीति प्रभावित |
| सवाई रामसिंह द्वितीय | 1835-1880 ई. | अल्पवयस्कता में ब्रिटिश संरक्षण में शासन; सामाजिक सुधार — समाधि प्रथा, सती प्रथा, कन्या वध व दास-प्रथा पर प्रतिबंध; 1857 विद्रोह में अंग्रेजों की सहायता की, बदले में "सितार-ए-हिंद" उपाधि व कोटपूतली परगना मिला; 1857 ई. में "मदरसा-ए-हुनरी" स्थापित (आगे राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स); 1844 ई. में महाराजा कॉलेज, महारानी कॉलेज व संस्कृत पाठशाला स्थापित; 1866 ई. में राजस्थान का प्रथम बालिका विद्यालय; 1876 ई. में रामप्रकाश थिएटर (उत्तर भारत का प्रथम रंगमंच); 1868 ई. में प्रिंस ऑफ वेल्स की यात्रा हेतु नगर को गुलाबी रंग से रंगा गया — यहीं से "पिंक सिटी" नाम प्रचलित हुआ; अल्बर्ट हॉल संग्रहालय की नींव रखी (वास्तुकार सैमुअल स्विंटन जैकब, पूर्णता माधोसिंह द्वितीय काल में) |
| सवाई माधोसिंह द्वितीय | 1880-1922 ई. | उपाधि "बब्बर शेर"; 1902 ई. में एडवर्ड सप्तम राज्याभिषेक हेतु इंग्लैंड यात्रा में गंगाजल भरकर ले गए दो विशाल चांदी के पात्र — गिनीज बुक में विश्व के सबसे बड़े चांदी के पात्र दर्ज; 1904 ई. में जयपुर राजस्थान की प्रथम रियासत बनी जिसने अपनी डाक टिकट व पोस्टकार्ड सेवा शुरू की; मुबारक महल का निर्माण (हिंदू-ईसाई-इस्लामी शैलियों का मिश्रण); नाहरगढ़ में अपनी 9 पासवानों हेतु 9 समरूप महल बनवाए; बनारस हिंदू विश्वविद्यालय को लगभग 5 लाख रुपये का दान दिया |
| महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय | 1922-1949 ई. | माधोसिंह द्वितीय के दत्तक पुत्र (मूल नाम "मोर मुकुट सिंह", ईसरदा ठिकाने के ठाकुर सवाई सिंह के पुत्र); कछवाहा वंश के अंतिम शासक तथा राजस्थान के एकीकरण के बाद राजस्थान के प्रथम व अंतिम राजप्रमुख (1949-1956); शिक्षा — मेयो कॉलेज (अजमेर) व रॉयल मिलिट्री एकेडमी (वूलविच, इंग्लैंड); प्रधानमंत्री मिर्जा इस्माइल "आधुनिक जयपुर के वास्तुकार" कहलाए, जयपुर की एम.आई. रोड इन्हीं के नाम पर; सिटी पैलेस संग्रहालय की स्थापना की; 30 मार्च 1949 ई. को जयपुर का भारतीय संघ (वृहत् राजस्थान) में विलय करवाया (विस्तार देखें: अध्याय 16); 1962 ई. में राज्यसभा सदस्य व 1965 ई. में स्पेन में भारत के राजदूत नियुक्त हुए; SMS अस्पताल, SMS स्टेडियम व SMS मेडिकल कॉलेज इन्हीं के नाम पर; विवाह कूचबिहार की राजकुमारी गायत्री देवी से — गायत्री देवी 1962 ई. में लोकसभा सदस्य बनने वाली जयपुर राजपरिवार की प्रथम महिला बनीं |
9नरूका शाखा — अलवर रियासत का संक्षिप्त परिचय
- नरूका शाखा कछवाहा वंश के कोकिलदेव के वंशज नारू से निकली — मिर्जा राजा जयसिंह प्रथम ने नरूका कल्याणसिंह को माचेड़ी की जागीर दी, जिससे आगे चलकर अलवर रियासत का उदय हुआ।
| शासक (Ruler) | काल (Period) | प्रमुख तथ्य |
|---|
| प्रताप सिंह | 1775-1790 ई. | मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय से "राव राजा" उपाधि व 5000 मनसब (1774 ई.); 25 दिसंबर 1775 ई. को अलवर के स्वतंत्र शासक बने; हवामहल जैसी अलवर स्थापत्य शैली विकसित की |
| बख्तावर सिंह | 1790-1815 ई. | लसवाड़ी का युद्ध (1803 ई., मराठों से, ब्रिटिश सहयोगी लॉर्ड लेक — मराठों की विजय); 14 नवंबर 1803 ई. को लॉर्ड वेलेजली से अधीनस्थ संधि; तिजारा, टपूकरा व कठूमर परगने अलवर राज्य में मिले |
| विनयसिंह (बन्ने सिंह) | 1815-1857 ई. | 1845 ई. में सिलीसेढ़ झील व महल का निर्माण ("राजस्थान का नंदन कानन" कहलाया); 1857 विद्रोह में ब्रिटिश समर्थक रहे |
| महाराजा जयसिंह | 1892-1937 ई. | 1925 ई. में नीमूचणा हत्याकांड (किसान आंदोलन के दमन में); बाल-विवाह व मृत्युभोज पर प्रतिबंध; हिंदी को राजभाषा घोषित किया; 1933 ई. में तिजारा दंगों के बाद अंग्रेजों द्वारा गद्दी से हटाए गए |
| तेजसिंह | 1937-1948 ई. | अलवर के अंतिम शासक; 18 मार्च 1948 ई. को अलवर राज्य का मत्स्य संघ में विलय (विस्तार देखें: अध्याय 16) |
क्रॉस-रेफरेंस: अलवर (नरूका शाखा) के साथ-साथ भरतपुर (जाट वंश), करौली, बीकानेर (राठौड़ शाखा) व जैसलमेर (भाटी वंश) सहित राजस्थान की अन्य प्रमुख रियासतों का पूर्ण विस्तृत विवरण अध्याय 10 (अन्य राजवंश) में दिया गया है।
10कछवाहा वंश की सांस्कृतिक विरासत
A. प्रमुख स्थापत्य स्मारक
| स्मारक (Monument) | निर्माता (Builder) | विशेषता (Significance) |
|---|
| आमेर महल व शिला माता मंदिर | राजा मानसिंह प्रथम | कछवाहा वंश की पहली राजधानी के मुख्य भवन |
| जगत शिरोमणि मंदिर (आमेर) | मानसिंह प्रथम की पत्नी श्रृंगार दे/कनकावती | पुत्र जगत सिंह की स्मृति में; मीरा द्वारा पूजित श्याम-वर्ण कृष्ण प्रतिमा स्थापित |
| जयगढ़ दुर्ग | मानसिंह प्रथम (आरंभ), जयसिंह द्वितीय (वर्तमान स्वरूप) | विशाल "जयवाण तोप" व तोप-ढलाई शाला के लिए प्रसिद्ध |
| जयपुर नगर | सवाई जयसिंह द्वितीय, वास्तुकार विद्याधर भट्टाचार्य | 1727 ई., भारत का प्रथम सुनियोजित आधुनिक नगर, 2019 UNESCO विश्व धरोहर नगर |
| जंतर मंतर (जयपुर) | सवाई जयसिंह द्वितीय | विश्व की सबसे बड़ी पत्थर की वेधशाला, 2010 से UNESCO विश्व धरोहर |
| हवामहल | सवाई प्रताप सिंह, वास्तुकार उस्ताद लाल चंद | 1799 ई., 953 झरोखे, बिना नींव की 5 मंजिला संरचना |
| अल्बर्ट हॉल संग्रहालय | रामसिंह द्वितीय (नींव), माधोसिंह द्वितीय (पूर्णता) | इंडो-सारसेनिक शैली, वास्तुकार सैमुअल स्विंटन जैकब |
कछवाहा वंश की उपलब्धियां (Achievements)
- मुगलों से वैवाहिक संबंध स्थापित करने वाला प्रथम राजपूत वंश
- मानसिंह प्रथम जैसे सेनापति जिन्होंने मुगल साम्राज्य का विस्तार किया
- जयपुर जैसा भारत का प्रथम सुनियोजित आधुनिक नगर
- जंतर मंतर जैसी विश्व-प्रसिद्ध खगोलीय वेधशालाएं
कछवाहा वंश की आलोचनाएं (Criticisms)
- मानसिंह प्रथम की हल्दीघाटी में मुगल पक्ष से भूमिका को लेकर विवाद
- मुगल सेवा में अत्यधिक भागीदारी से अन्य राजपूत राज्यों से दूरी
- 18वीं सदी में उत्तराधिकार-संघर्षों से मराठा हस्तक्षेप को बढ़ावा
- ईश्वरी सिंह जैसे शासकों की मराठा दबाव में दुखद मृत्यु
★ अध्याय सार — महत्वपूर्ण तथ्य ★
1. दूल्हेराय ने 1137 ई. में ढूंढाड़ राज्य की स्थापना की; कुलदेवी जमवाय माता मानी जाती हैं। 2. कोकिलदेव ने 1207 ई. में आमेर को कछवाहाओं की राजधानी बनाया — इनके वंश से नरूका (अलवर) व शेखावत (शेखावाटी) शाखाएं निकलीं। 3. भारमल मुगल अधीनता स्वीकार करने वाले तथा मुगलों से वैवाहिक संबंध (पुत्री का विवाह अकबर से) स्थापित करने वाले प्रथम राजपूत शासक थे। 4. राजा मानसिंह प्रथम अकबर के नवरत्नों में से एक थे — हल्दीघाटी युद्ध (1576 ई.) में मुगल सेना के सेनापति रहे; आमेर महल व शिला माता मंदिर के निर्माता। 5. मिर्जा राजा जयसिंह प्रथम ने पुरंदर की संधि (1665 ई.) से शिवाजी को मुगल अधीनता स्वीकार करवाई। 6. सवाई जयसिंह द्वितीय ने 1727 ई. में जयपुर नगर की स्थापना की — भारत का प्रथम सुनियोजित आधुनिक नगर, जिसे 2019 में UNESCO विश्व धरोहर नगर का दर्जा मिला। 7. सवाई जयसिंह द्वितीय ने जयपुर, दिल्ली, उज्जैन, मथुरा व वाराणसी में पांच जंतर मंतर वेधशालाएं बनवाईं — जयपुर की वेधशाला 2010 से UNESCO सूची में है। 8. सवाई जयसिंह द्वितीय विधवा-पुनर्विवाह को मान्यता देने वाले प्रथम राजपूत शासक थे। 9. ईश्वरी सिंह व माधोसिंह प्रथम के बीच उत्तराधिकार-युद्ध (राजमहल व बगरू के युद्ध) से मराठा हस्तक्षेप बढ़ा — ईश्वरी सिंह ने अंततः आत्महत्या कर ली। 10. सवाई प्रताप सिंह ने 1799 ई. में हवामहल का निर्माण करवाया — 953 झरोखों वाली अनूठी संरचना। 11. रामसिंह द्वितीय के काल में 1868 ई. में जयपुर को "पिंक सिटी" का उपनाम मिला — प्रिंस ऑफ वेल्स के स्वागत हेतु नगर को गुलाबी रंग से रंगा गया। 12. महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय कछवाहा वंश के अंतिम शासक थे — 30 मार्च 1949 ई. को जयपुर का वृहत् राजस्थान में विलय करवाया तथा राजस्थान के प्रथम व अंतिम राजप्रमुख बने। 13. नरूका शाखा (कोकिलदेव के वंशज नारू से) ने अलवर रियासत की स्थापना की — 18 मार्च 1948 ई. को अलवर का मत्स्य संघ में विलय हुआ। 14. जयपुर की वर्तमान UNESCO विश्व धरोहर स्थिति संरक्षण-चिंताओं के कारण दिसंबर 2026 तक की समयसीमा के अधीन है।
नीचे दी समय-रेखा (Timeline) इस अध्याय के सभी महत्वपूर्ण वर्षों को एक साथ जोड़ती है — रिवीजन के लिए इसे ज़रूर दोहराएं:
| वर्ष (Year) | घटना/Event | महत्व |
|---|
| 1137 ई. | दूल्हेराय द्वारा ढूंढाड़ राज्य की स्थापना (दौसा) | कछवाहा वंश का प्रारंभ |
| 1207 ई. | कोकिलदेव द्वारा आमेर विजय | कछवाहा वंश की स्थायी राजधानी |
| 1527 ई. | खानवा युद्ध में पृथ्वीराज कछवाहा की वीरगति | राणा सांगा के पक्ष में बलिदान |
| 1562 ई. | भारमल की पुत्री का अकबर से विवाह | मुगलों से प्रथम राजपूत वैवाहिक संबंध |
| 1576 ई. | हल्दीघाटी युद्ध में मानसिंह प्रथम का नेतृत्व | मुगल-कछवाहा सैन्य सहयोग का प्रमाण |
| 1614 ई. | राजा मानसिंह प्रथम का निधन | आमेर महल के निर्माण का पूर्ण होना |
| 11 जून 1665 ई. | पुरंदर की संधि (जयसिंह प्रथम-शिवाजी) | मराठा शक्ति पर मुगल-कछवाहा संयुक्त नियंत्रण |
| 1700 ई. | सवाई जयसिंह द्वितीय का राज्याभिषेक | कछवाहा वंश के सबसे प्रतिष्ठित शासक का प्रारंभ |
| 1708 ई. | देबारी समझौता | जयसिंह द्वितीय की आमेर पर पुनः स्थापना |
| 18 नवंबर 1727 ई. | जयपुर नगर की स्थापना | भारत का प्रथम सुनियोजित आधुनिक नगर |
| 1727-1734 ई. | पांच जंतर मंतर वेधशालाओं का निर्माण | खगोलशास्त्र में अद्वितीय योगदान |
| 17 जुलाई 1734 ई. | हुरड़ा सम्मेलन | मराठा-विरोधी राजपूत एकता का प्रयास |
| 1743 ई. | सवाई जयसिंह द्वितीय का निधन | उत्तराधिकार-संघर्ष व मराठा हस्तक्षेप का दौर प्रारंभ |
| 13 दिसंबर 1750 ई. | ईश्वरी सिंह की आत्महत्या (ईसरलाट से) | मराठा दबाव की पराकाष्ठा |
| 1799 ई. | हवामहल का निर्माण (प्रताप सिंह) | जयपुर की सबसे प्रतिष्ठित पहचान |
| दिसंबर 1803 ई. | जगत सिंह द्वितीय की वेलेजली से अधीनस्थ संधि | ब्रिटिश अधीनस्थ संधि व्यवस्था लागू |
| 1868 ई. | जयपुर "पिंक सिटी" के रूप में प्रसिद्ध हुआ | प्रिंस ऑफ वेल्स की यात्रा की स्मृति में |
| 1904 ई. | जयपुर की स्वतंत्र डाक टिकट सेवा | राजस्थान में प्रथम रियासत |
| 30 मार्च 1949 ई. | जयपुर का वृहत् राजस्थान में विलय | कछवाहा शासन का औपचारिक अंत |
| 2010 व 2019 ई. | जंतर मंतर व जयपुर नगर UNESCO सूची में शामिल | कछवाहा स्थापत्य विरासत को अंतरराष्ट्रीय मान्यता |
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