🐎 अध्याय 8/16 — राजस्थान का इतिहास

राठौड़ वंश (मारवाड़)

Rathore Dynasty of Marwar | RAS Pre + Mains
📋 इस अध्याय में
  1. राठौड़ वंश का परिचय — उत्पत्ति के सिद्धांत, कुलदेवी एवं मूल स्थान
  2. राव सीहा से राव चूंडा तक — प्रारंभिक संघर्ष एवं मंडोर की प्राप्ति
  3. राव रणमल एवं राव जोधा — जोधपुर की स्थापना एवं मेहरानगढ़ दुर्ग
  4. राव गांगा से राव मालदेव तक — मारवाड़ का विस्तार एवं गिरी सुमेल का युद्ध
  5. राव चंद्रसेन — "मारवाड़ का प्रताप"
  6. राजा उदयसिंह से महाराजा गजसिंह तक — मुगल अधीनता का दौर
  7. महाराजा जसवंत सिंह प्रथम — औरंगजेब के उत्तराधिकार युद्ध में भूमिका
  8. महाराजा अजीत सिंह एवं वीर दुर्गादास राठौड़ — मारवाड़ की रक्षा
  9. महाराजा अभय सिंह से मानसिंह तक — खेजड़ली आंदोलन एवं उत्तरकालीन शासक
  10. महाराजा तख्त सिंह से हनवंत सिंह तक — ब्रिटिश काल एवं एकीकरण
  11. राठौड़ वंश की सांस्कृतिक विरासत, अन्य राठौड़ शाखाएं एवं अध्याय सार

कल्पना कीजिए — एक योद्धा जिसके प्राण दिल्ली के मुगल दरबार में एक कटार के एक ही वार से एक शक्तिशाली सेनापति की जान ले लेते हैं, और फिर भी वह स्वयं वहां से जीवित निकल आता है। यह है अमर सिंह राठौड़ की कहानी। कल्पना कीजिए — एक सेवक जो अपने स्वामी के बालक-पुत्र को औरंगजेब के हरम से बचाकर 30 वर्षों तक मुगल सल्तनत से अकेले जूझता है — यह है वीर दुर्गादास राठौड़ की कहानी, जिन्हें "मारवाड़ का उद्धारक" कहा जाता है। राठौड़ वंश की गाथा शौर्य, बलिदान और अद्भुत राजनीतिक कौशल की गाथा है — सांभर-कन्नौज के पतन के बाद एक शरणार्थी राजकुमार से शुरू होकर, यह वंश जोधपुर (मारवाड़) के अतिरिक्त बीकानेर व किशनगढ़ जैसी शक्तिशाली रियासतों तक फैला। इस अध्याय में हम मुख्यतः मारवाड़ (जोधपुर) शाखा का विस्तृत अध्ययन करेंगे।

1राठौड़ वंश का परिचय — उत्पत्ति के सिद्धांत, कुलदेवी एवं मूल स्थान

मत/स्रोत (Theory/Source)उत्पत्ति संबंधी विचार (View on Origin)
भाटों के ग्रंथराठौड़ों को हिरण्यकशिपु का वंशज बताया गया
दयालदास री ख्यातराठौड़ सूर्यवंशी व ब्राह्मण-कुल में जन्मे भल्लराव के वंशज, कन्नौज से आए — यही मत नैणसी री ख्यात व पृथ्वीराज रासो में भी मिलता है
जोधपुर री ख्यातराठौड़ों को राजा विश्वुतमन के पुत्र बृहद्बल का वंशज बताया गया
कर्नल जेम्स टॉडराठौड़ों को कन्नौज के जयचंद गहड़वाल का वंशज बताया
विश्वेश्वरनाथ रेऊजयचंद के वंशज होने के मत का समर्थन किया
डॉ. जी.एच. ओझाराठौड़ों को बदायूं के राठौड़ों का वंशज व दक्षिण भारत के राष्ट्रकूटों से संबद्ध बताया

2राव सीहा से राव चूंडा तक — प्रारंभिक संघर्ष एवं मंडोर की प्राप्ति

👑 राव सीहा (लगभग 13वीं शताब्दी) राठौड़ वंश के वास्तविक संस्थापक

राव सीहा के उत्तराधिकारी — मंडोर प्राप्ति तक

शासक (Ruler)काल (Period)प्रमुख तथ्य
राव आस्थान1273-1291 ई.गूंदोच गांव को शक्ति-केंद्र बनाया; खेड़ व ईडर पर अधिकार; 1291 ई. में जलालुद्दीन खिलजी के आक्रमण में वीरगति
राव धूहड़1291-1309 ई.प्रतिहारों को हराकर मंडोर पर अधिकार किया; कर्नाटक से नागणेची माता (चक्रेश्वरी) की मूर्ति लाकर नागणा गांव (बालोतरा) में स्थापित की; 1309 ई. में प्रतिहारों से संघर्ष में वीरगति
रायमल, भीम, राईकनकपाल, जालनसीसभी शासकों ने भाटियों व तुर्कों से संघर्ष करते हुए वीरगति प्राप्त की; मंडोर बार-बार हाथ बदलता रहा
राव छाड़ासोढा (उमरकोट), जैसलमेर, जालौर, नागौर, सोजत व भीनमाल के शासकों को हराया; 1344 ई. में सोनगरा व देवड़ा चौहानों से युद्ध में वीरगति
राव तीड़ासोनगरा चौहान, देवड़ा, भाटी, बालेचा चौहान व सोलंकियों को हराया; सिवाना की रक्षा करते हुए तुर्क सेना से युद्ध में वीरगति

👑 मल्लीनाथ (1358 ई. जन्म) "रावल" उपाधिधारी — मालाणी क्षेत्र के नामकर्ता

👑 राव चूंडा (1394-1423 ई.) मंडोर को स्थायी राजधानी बनाने वाले शासक

3राव रणमल एवं राव जोधा — जोधपुर की स्थापना एवं मेहरानगढ़ दुर्ग

👑 राव जोधा (1438-1489 ई.) जोधपुर नगर व मेहरानगढ़ दुर्ग के निर्माता

मेहरानगढ़ दुर्ग — एक नज़र में

पहलू (Aspect)विवरण (Details)
प्रमुख महल/भवनमोती महल, फूल महल, तख्त विलास, अजीत विलास, उम्मेद विलास, चोखेलाव महल, बीछला महल, शृंगार चौकी, पुस्तक प्रकाश
प्रमुख मंदिरनागणेची माता, चामुंडा माता, आनंदधन मंदिर, मुरली मनोहर
ऐतिहासिक तोपेंकिलकिला, शंभूबाण, गजनीखान, जमजमा, कड़क बिजली, नुसरत, गुब्बार, बिच्छू बाण, घुड़घनिड़, मीरबख्श, रहस्य काल, गजक
1544 ई.शेरशाह सूरी ने दुर्ग पर अधिकार किया
अकबर कालहुसैन कुली बेग के अधीन रहा
1678 ई. के बाद (जसवंत सिंह प्रथम की मृत्यु पर)औरंगजेब ने अधिकार किया; औरंगजेब की मृत्यु बाद अजीत सिंह ने जफर कुली खां से पुनः छीना
प्रसिद्ध कथन (रुडयार्ड किपलिंग)"देवताओं, परियों व स्वर्गदूतों द्वारा निर्मित प्रतीत होता है"
जल आपूर्तिरानीसर व पदमसर झीलों से
30 सितंबर 2008 (मेहरानगढ़ त्रासदी)अश्विन नवरात्रि के दौरान भगदड़ दुर्घटना; जांच हेतु जसराज चोपड़ा समिति गठित

महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण — UNESCO दर्जा: मेहरानगढ़ दुर्ग "राजस्थान के पहाड़ी दुर्ग" श्रृंखला (2013 UNESCO सूची — चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, आमेर, जैसलमेर, रणथंभौर व गागरोन) में शामिल नहीं है। इसका मुख्य कारण यह है कि मेहरानगढ़ मुख्यतः राजदरबार हेतु सुरक्षित गढ़ था, जहां नागरिक बस्ती (urban settlement) उस रूप में विकसित नहीं थी जैसी अन्य छह दुर्गों में थी। यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है, क्योंकि विद्यार्थी अक्सर मेहरानगढ़ को भी UNESCO सूची में गलती से शामिल मान लेते हैं।

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4राव गांगा से राव मालदेव तक — मारवाड़ का विस्तार एवं गिरी सुमेल का युद्ध

👑 राव गांगा (1515-1531 ई.) खानवा के युद्ध में राणा सांगा के सहयोगी

👑 राव मालदेव (1531/32-1562 ई.) मारवाड़ के सर्वाधिक शक्तिशाली शासकों में से एक — "हश्मत वाला बादशाह"

"मुट्ठी भर बाजरे के लिए मैं हिंदुस्तान का साम्राज्य खो बैठता।" — शेरशाह सूरी — गिरी सुमेल के युद्ध के बाद

5राव चंद्रसेन — "मारवाड़ का प्रताप"

👑 राव चंद्रसेन (1562-1581 ई.) "मारवाड़ का प्रताप", "भूला-बिसरा राजा" — अकबर की अधीनता कभी स्वीकार नहीं की

6राजा उदयसिंह से महाराजा गजसिंह तक — मुगल अधीनता का दौर

शासक (Ruler)काल (Period)प्रमुख तथ्य
राजा उदयसिंह ("मोटा राजा")1583-1595 ई.चंद्रसेन के भाई; 1583 ई. में मुगल अधीनता स्वीकार करने वाले मारवाड़ के प्रथम शासक; 1587 ई. में पुत्री जोधाबाई/जगत गोसाईं/मणिबाई का विवाह सलीम (जहांगीर) से किया — इसी से शाहजहां का जन्म हुआ; अकबर ने 1000 का मनसबदार बनाया; पुत्र किशनसिंह ने 1609 ई. में किशनगढ़ (राठौड़ों की तीसरी शाखा) स्थापित की
सवाई राजा सूरसिंह1595-1619 ई.अकबर से "सवाई राजा" की उपाधि; 1615 ई. की मुगल-मेवाड़ संधि में शहजादा खुर्रम के साथ शामिल; जोधपुर में मोती महल का निर्माण
महाराजा गजसिंह1619-1638 ई.उपाधि "दल-थम्मन" (1621 ई., जहांगीर द्वारा) व "महाराजा" (1630 ई., शाहजहां द्वारा); बीजापुर व कंधार अभियानों में वीरता; पुत्र जसवंत सिंह को उत्तराधिकारी नियुक्त किया, जिससे बड़े पुत्र अमरसिंह असंतुष्ट हुए
💡 अमर सिंह राठौड़ — "कटार का धनी"

गजसिंह द्वारा छोटे भाई जसवंत सिंह को उत्तराधिकारी बनाए जाने से क्रुद्ध अमर सिंह राठौड़ शाहजहां की शरण में गए, जहां उन्हें नागौर की जागीर मिली। एक दिन शाही दरबार में मीर बख्शी सलावत खां के अपमानजनक व्यवहार से क्रोधित होकर अमर सिंह ने उसे अपनी कटार से एक ही वार में मार डाला — इसीलिए इन्हें "कटार का धनी" कहा जाता है। 1644 ई. में बीकानेर के करणसिंह के साथ जाखणिया गांव में हुए युद्ध को "मतीरे री राड़" (तरबूज का युद्ध) कहा जाता है। अंततः अपने ही बहनोई अर्जुनसिंह गौड़ द्वारा हत्या कर दी गई — नागौर में इनकी 16 खंभों वाली छतरी आज भी स्थित है।

7महाराजा जसवंत सिंह प्रथम — औरंगजेब के उत्तराधिकार युद्ध में भूमिका

👑 महाराजा जसवंत सिंह प्रथम (1638-1678 ई.) विद्वान शासक, शाहजहां-औरंगजेब दोनों के समकालीन

"आज कुफ्र का द्वार ध्वस्त हो गया।" — औरंगजेब — महाराजा जसवंत सिंह प्रथम की मृत्यु पर
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8महाराजा अजीत सिंह एवं वीर दुर्गादास राठौड़ — मारवाड़ की रक्षा

👑 वीर दुर्गादास राठौड़ (1638-1718 ई.) "मारवाड़ का उद्धारक", "अनबिंधिया मोती" — कर्नल टॉड द्वारा "राठौड़ों का यूलिसिस"

👑 महाराजा अजीत सिंह (1708-1724 ई.) देबारी समझौते से मारवाड़ के मान्य शासक बने

गोरा धाय — मारवाड़ की पन्नाधाय: अजीत सिंह की धाय मां गोरा धाय को "मारवाड़ की पन्नाधाय" कहा जाता है — जिस प्रकार मेवाड़ में पन्नाधाय ने उदयसिंह को बचाया था (विस्तार देखें: अध्याय 6), उसी प्रकार गोरा धाय ने बाल अजीत सिंह की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जोधपुर में इनकी भी एक छतरी स्थित है।

9महाराजा अभय सिंह से मानसिंह तक — खेजड़ली आंदोलन एवं उत्तरकालीन शासक

👑 महाराजा अभय सिंह (1724-1749 ई.) खेजड़ली आंदोलन के समकालीन शासक

💡 खेजड़ली — पेड़ों के लिए बलिदान की अमर गाथा

1730 ई. में जोधपुर नरेश अभय सिंह के दीवान गिरधरदास भंडारी ने नए महल हेतु लकड़ी जुटाने के लिए खेजड़ली गांव में सैनिक भेजे। बिश्नोई समुदाय की अमृता देवी ने पेड़ काटने का विरोध करते हुए कहा — "सिर साटे रूंख रहे तो भी सस्तो जाण" (यदि सिर देकर भी पेड़ बच सके, तो यह सस्ता सौदा है)। उन्होंने स्वयं एक पेड़ से लिपटकर अपना बलिदान दिया — उनकी तीन पुत्रियों सहित कुल 363 बिश्नोई स्त्री-पुरुषों ने पेड़ों की रक्षा के लिए प्राण न्योछावर कर दिए। यह घटना भारत के पर्यावरण-संरक्षण आंदोलनों की जननी मानी जाती है — 20वीं सदी के "चिपको आंदोलन" को भी इसी घटना से प्रेरणा मिली।

राम सिंह से भीम सिंह तक — उत्तराधिकार-संघर्ष का दौर

शासक (Ruler)काल (Period)प्रमुख तथ्य
राम सिंह1749-1751 ई.अभय सिंह के पुत्र; जालौर परगने को लेकर चाचा बख्त सिंह से संघर्ष
बख्त सिंह1751-1752 ई.पिता अजीत सिंह की हत्या के लिए प्रसिद्ध; राम सिंह से जोधपुर छीना
विजय सिंह1752-1793 ई.शाह आलम द्वितीय से टकसाल की अनुमति प्राप्त कर "विजय शाही" सिक्के जारी किए; राठौड़-कछवाहा गठबंधन बनाया; तुंगा का युद्ध (1787 ई.) व पाटन का युद्ध (20 जून 1790 ई.) लड़े; कवि श्यामलदास ने प्रेयसी गुलाब राय को "मारवाड़ की नूरजहां" कहा
भीम सिंह1793-1803 ई.मेवाड़ की कृष्णा कुमारी विवाद-प्रकरण से जुड़े (विस्तार देखें: अध्याय 6)

👑 महाराजा मानसिंह (1803-1843 ई.) "सन्यासी राजा" — नाथ संप्रदाय के संरक्षक

10महाराजा तख्त सिंह से हनवंत सिंह तक — ब्रिटिश काल एवं एकीकरण

शासक (Ruler)काल (Period)प्रमुख कार्य
तख्त सिंह1843-1875 ई.1857 के विद्रोह में अंग्रेजों को सैन्य सहायता दी; मेयो कॉलेज को 1 लाख रुपये का दान; राज्य में प्रथम मुद्रणालय व विद्यालय स्थापित किया; प्रशासनिक कारणों से तोप-सलामी 17 से घटाकर 15 की गई
जसवंत सिंह द्वितीय1873-1895 ई.अंग्रेजों के प्रति निष्ठावान शासक; 1884 ई. में नगरपालिका स्थापित; 1885 ई. में बाल-विवाह पर प्रतिबंध; 1883 ई. में जोधपुर में आर्य समाज की स्थापना — इसी वर्ष दयानंद सरस्वती को जोधपुर में विष दिया गया, 30 अक्टूबर 1883 ई. को अजमेर में निधन; 1881 ई. में प्रथम जनगणना; 1892 ई. में जसवंत सागर बांध का निर्माण
सरदार सिंह1895-1911 ई.जोधपुर पोलो खेल का केंद्र बना; राज्य में टेलीफोन सेवा प्रारंभ; जसवंत महिला चिकित्सालय की स्थापना; 1900 ई. में चीन के बॉक्सर विद्रोह में भाग लिया; 1910 ई. में एडवर्ड राहत कोष का गठन
सुमेर सिंह1911-1918 ई.1911 ई. के दिल्ली दरबार में उपस्थित; प्रथम विश्व युद्ध में भागीदारी; काशी हिंदू विश्वविद्यालय को 2 लाख रुपये की आर्थिक सहायता
उम्मेद सिंह1918-1947 ई.वास्तविक सत्ता दीवान डोनाल्ड फील्ड के हाथ में; 1929 ई. में उम्मेद भवन पैलेस का निर्माण प्रारंभ
हनवंत सिंह1947-1949 ई.प्रारंभ में पाकिस्तान में विलय का प्रयास किया; 9 अगस्त 1947 ई. को भारत के साथ विलय-पत्र (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर किए; अंततः वृहत् राजस्थान में मारवाड़ का विलय हुआ (विस्तार देखें: अध्याय 16); संविधान सभा में प्रतिनिधि — जय नारायण व्यास; 1945 ई. में विधान सभा का गठन

11राठौड़ वंश की सांस्कृतिक विरासत, अन्य राठौड़ शाखाएं एवं अध्याय सार

A. राठौड़ काल के प्रमुख साहित्यकार

साहित्यकार (Scholar)संबंधित शासक/कालप्रमुख रचनाएं
मुहणोत नैणसीजसवंत सिंह प्रथममारवाड़ रा परगना री विगत (राजस्थान का गजेटियर), मारवाड़ की प्रथम "ख्यात"
पृथ्वीराज राठौड़ ("पीथल")अकबर के दरबारी कवि, बीकानेर शाखावेलि क्रिसन रुक्मणी री (डिंगल भाषा का श्रेष्ठ काव्य, कवि दुरसा आढ़ा द्वारा "पांचवां वेद" कहा गया)
इसरदास जीराव मालदेव के दरबारी कविहाला झाला री कुंडलियां (सूर सतसई), हरिरास
केसरी सिंह बारहठ"रूठी रानी" ग्रंथ के रचयिता

B. अन्य राठौड़ शाखाएं — संक्षिप्त परिचय

शाखा (Branch)संस्थापक (Founder)स्थापना वर्षविशेष तथ्य
बीकानेरराव बीका (राव जोधा के पुत्र)1488 ई. (अक्षय तृतीया)राठौड़ों का दूसरा प्रमुख केंद्र; करणी माता की कृपा से स्थापना; पूर्ण विवरण अध्याय 10 में देखें
किशनगढ़किशन सिंह (राजा उदयसिंह के पुत्र)1609 ई.राठौड़ों की तीसरी शाखा; प्रसिद्ध शासक सावंत सिंह (नागरीदास) व बणी-ठणी चित्रकला के लिए विख्यात
💡 बणी-ठणी — "भारत की मोनालिसा"

किशनगढ़ के महाराजा सावंत सिंह (साहित्यिक नाम "नागरीदास") भगवान कृष्ण की भक्ति में इतने लीन हो गए कि उन्होंने राजपाट त्याग कर वृंदावन में निवास किया। उनकी प्रेयसी व काव्य-प्रेरणा विष्णुप्रिया आगे "बणी-ठणी" (सुसज्जित/श्रृंगारित) के नाम से प्रसिद्ध हुईं — चित्रकार निहालचंद द्वारा बनाया गया उनका विश्व-प्रसिद्ध चित्र आज "भारत की मोनालिसा" कहलाता है, जो किशनगढ़ शैली की चित्रकला की सबसे बड़ी पहचान है।

राठौड़ वंश की उपलब्धियां (Achievements)
  • जोधपुर, बीकानेर व किशनगढ़ — तीन शक्तिशाली रियासतों की स्थापना
  • मेहरानगढ़ जैसे अभेद्य दुर्ग व जोधपुर जैसी सुनियोजित नगर-रचना
  • गिरी सुमेल में जैता-कुंपा का अद्वितीय बलिदान
  • 30 वर्षों तक दुर्गादास राठौड़ का मुगलों से अकेले संघर्ष
  • खेजड़ली का पर्यावरण-बलिदान — विश्व के लिए प्रेरणा
राठौड़ वंश की चुनौतियां (Challenges)
  • चंद्रसेन जैसे स्वाभिमानी शासक का "खालसा भूमि" में बदला जाना
  • भाइयों के बीच बार-बार उत्तराधिकार-संघर्ष (राम-उदयसिंह-चंद्रसेन, राम सिंह-बख्त सिंह)
  • दरबारी षड्यंत्रों से कई शासकों की हत्या (रणमल, अजीत सिंह, चंद्रसेन को विष)
  • मुगल दबाव में लंबे समय तक अधीनता स्वीकारनी पड़ी

★ अध्याय सार — महत्वपूर्ण तथ्य ★

1. राव सीहा को राठौड़ वंश का वास्तविक संस्थापक माना जाता है; राव चूंडा (1394-1423 ई.) ने मंडोर को राजधानी बनाया। 2. राव जोधा ने 1459 ई. में जोधपुर नगर की स्थापना की तथा मेहरानगढ़ दुर्ग का निर्माण करवाया — यह दुर्ग UNESCO सूची में शामिल नहीं है (यह Hill Forts of Rajasthan श्रृंखला से बाहर है)। 3. राव जोधा के पुत्र बीका ने 1488 ई. में बीकानेर की स्थापना की — राठौड़ों की दूसरी प्रमुख शाखा। 4. राव मालदेव (1531-1562 ई.) के समय गिरी सुमेल का युद्ध (1544 ई.) हुआ, जिसमें सेनापति जैता व कुंपा ने शेरशाह सूरी की सेना के विरुद्ध वीरगति पाई। 5. राव चंद्रसेन (1562-1581 ई.) को "मारवाड़ का प्रताप" कहा जाता है — उन्होंने अकबर की अधीनता कभी स्वीकार नहीं की। 6. राजा उदयसिंह ("मोटा राजा") मुगल अधीनता स्वीकार करने वाले मारवाड़ के प्रथम शासक थे; इनकी पुत्री जोधाबाई का विवाह जहांगीर से हुआ। 7. महाराजा जसवंत सिंह प्रथम ने धरमत के युद्ध (1658 ई.) में दारा शिकोह का साथ दिया; उनकी मृत्यु के बाद औरंगजेब ने मारवाड़ को खालसा घोषित किया। 8. वीर दुर्गादास राठौड़ ने 30 वर्षों तक (1678-1708 ई.) औरंगजेब से संघर्ष कर बालक अजीत सिंह की रक्षा की — इन्हें "मारवाड़ का उद्धारक" कहा जाता है। 9. महाराजा अजीत सिंह ने 1708 ई. के देबारी समझौते से मारवाड़ के शासक की मान्यता प्राप्त की। 10. खेजड़ली आंदोलन (28 अगस्त 1730 ई.) — अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में 363 बिश्नोइयों का पर्यावरण-रक्षा हेतु बलिदान, महाराजा अभय सिंह के शासनकाल में हुआ। 11. महाराजा मानसिंह को "सन्यासी राजा" कहा जाता है — उन्होंने जोधपुर में महामंदिर (नाथ संप्रदाय की पीठ) बनवाया। 12. महाराजा उम्मेद सिंह के समय 1929 ई. में उम्मेद भवन पैलेस का निर्माण शुरू हुआ। 13. महाराजा हनवंत सिंह ने 9 अगस्त 1947 ई. को भारत के साथ विलय-पत्र पर हस्ताक्षर किए — मारवाड़ का वृहत् राजस्थान में विलय हुआ। 14. राठौड़ वंश की तीसरी शाखा किशनगढ़ (स्थापना 1609 ई.) अपनी बणी-ठणी चित्रकला के लिए प्रसिद्ध है — "भारत की मोनालिसा"। 15. मुहणोत नैणसी ने "मारवाड़ रा परगना री विगत" लिखकर राजस्थान की प्रथम "ख्यात" की रचना की।

नीचे दी समय-रेखा (Timeline) इस अध्याय के सभी महत्वपूर्ण वर्षों को एक साथ जोड़ती है — रिवीजन के लिए इसे ज़रूर दोहराएं:

वर्ष (Year)घटना/Eventमहत्व
1273 ई.राव सीहा की लाख झांवर युद्ध में वीरगतिबिठू अभिलेख से प्रमाणित
1394-1423 ई.राव चूंडा का शासनकाल — मंडोर राजधानी बनीराठौड़ शक्ति का सुदृढ़ीकरण
1453 ई.आंवल-बांवल की संधि (राव जोधा-महाराणा कुंभा)मेवाड़-मारवाड़ सीमा निर्धारण
1459 ई.जोधपुर नगर की स्थापना (राव जोधा)मारवाड़ की स्थायी राजधानी
1488 ई.राव बीका द्वारा बीकानेर की स्थापनाराठौड़ों की दूसरी शाखा
1541 ई.साहेबा/पाहेबा का युद्धराव मालदेव की राव जैतसी पर विजय
5 जनवरी 1544 ई.गिरी सुमेल का युद्धजैता-कुंपा का बलिदान, शेरशाह की कठिन विजय
1557 ई.हरमाड़ा का युद्धमालदेव की उदयसिंह (मेवाड़) पर विजय
1570 ई.नागौर दरबारअधिकांश राजपूत शासकों की अकबर के प्रति अधीनता; चंद्रसेन ने अस्वीकार किया
1581-83 ई.मारवाड़ "खालसा भूमि" घोषितचंद्रसेन की मृत्यु के बाद मुगल सीधा नियंत्रण
1583 ई.राजा उदयसिंह की मुगल अधीनता स्वीकृतिमारवाड़ के प्रथम मुगल-अधीन शासक
1609 ई.किशनगढ़ रियासत की स्थापनाराठौड़ों की तीसरी शाखा
1658 ई.धरमत का युद्धजसवंत सिंह प्रथम की दारा शिकोह पक्ष में भागीदारी
1678-1708 ई.दुर्गादास राठौड़ का औरंगजेब से संघर्ष30 वर्षों तक मारवाड़ की रक्षा
1708 ई.देबारी समझौताअजीत सिंह को मारवाड़ के शासक की मान्यता
28 अगस्त 1730 ई.खेजड़ली आंदोलनअमृता देवी बिश्नोई सहित 363 बलिदान
1803, 1818 ई.मानसिंह की ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से संधियांब्रिटिश अधीनस्थ संधि व्यवस्था लागू
1857 ई.तख्त सिंह द्वारा अंग्रेजों को सैन्य सहायता1857 विद्रोह में मारवाड़ की भूमिका
1929 ई.उम्मेद भवन पैलेस निर्माण प्रारंभआधुनिक जोधपुर की पहचान
9 अगस्त 1947 ई.हनवंत सिंह का भारत विलय-पत्र पर हस्ताक्षरमारवाड़ का भारतीय संघ में विलय
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