📋 इस अध्याय में
- राठौड़ वंश का परिचय — उत्पत्ति के सिद्धांत, कुलदेवी एवं मूल स्थान
- राव सीहा से राव चूंडा तक — प्रारंभिक संघर्ष एवं मंडोर की प्राप्ति
- राव रणमल एवं राव जोधा — जोधपुर की स्थापना एवं मेहरानगढ़ दुर्ग
- राव गांगा से राव मालदेव तक — मारवाड़ का विस्तार एवं गिरी सुमेल का युद्ध
- राव चंद्रसेन — "मारवाड़ का प्रताप"
- राजा उदयसिंह से महाराजा गजसिंह तक — मुगल अधीनता का दौर
- महाराजा जसवंत सिंह प्रथम — औरंगजेब के उत्तराधिकार युद्ध में भूमिका
- महाराजा अजीत सिंह एवं वीर दुर्गादास राठौड़ — मारवाड़ की रक्षा
- महाराजा अभय सिंह से मानसिंह तक — खेजड़ली आंदोलन एवं उत्तरकालीन शासक
- महाराजा तख्त सिंह से हनवंत सिंह तक — ब्रिटिश काल एवं एकीकरण
- राठौड़ वंश की सांस्कृतिक विरासत, अन्य राठौड़ शाखाएं एवं अध्याय सार
कल्पना कीजिए — एक योद्धा जिसके प्राण दिल्ली के मुगल दरबार में एक कटार के एक ही वार से एक शक्तिशाली सेनापति की जान ले लेते हैं, और फिर भी वह स्वयं वहां से जीवित निकल आता है। यह है अमर सिंह राठौड़ की कहानी। कल्पना कीजिए — एक सेवक जो अपने स्वामी के बालक-पुत्र को औरंगजेब के हरम से बचाकर 30 वर्षों तक मुगल सल्तनत से अकेले जूझता है — यह है वीर दुर्गादास राठौड़ की कहानी, जिन्हें "मारवाड़ का उद्धारक" कहा जाता है। राठौड़ वंश की गाथा शौर्य, बलिदान और अद्भुत राजनीतिक कौशल की गाथा है — सांभर-कन्नौज के पतन के बाद एक शरणार्थी राजकुमार से शुरू होकर, यह वंश जोधपुर (मारवाड़) के अतिरिक्त बीकानेर व किशनगढ़ जैसी शक्तिशाली रियासतों तक फैला। इस अध्याय में हम मुख्यतः मारवाड़ (जोधपुर) शाखा का विस्तृत अध्ययन करेंगे।
1राठौड़ वंश का परिचय — उत्पत्ति के सिद्धांत, कुलदेवी एवं मूल स्थान
- राठौड़ों की कुलदेवी नागणेची माता व आराध्य देवी चामुंडा माता मानी जाती हैं। "राठौड़" शब्द की उत्पत्ति संस्कृत शब्द "राष्ट्रकूट" से मानी जाती है। राजस्थान में राठौड़ों का शासन हस्तिकुंडी, धानोप, वागड़, जोधपुर व बीकानेर में रहा — इनमें जोधपुर व बीकानेर शाखाएं सबसे अधिक प्रसिद्ध हुईं।
| मत/स्रोत (Theory/Source) | उत्पत्ति संबंधी विचार (View on Origin) |
|---|
| भाटों के ग्रंथ | राठौड़ों को हिरण्यकशिपु का वंशज बताया गया |
| दयालदास री ख्यात | राठौड़ सूर्यवंशी व ब्राह्मण-कुल में जन्मे भल्लराव के वंशज, कन्नौज से आए — यही मत नैणसी री ख्यात व पृथ्वीराज रासो में भी मिलता है |
| जोधपुर री ख्यात | राठौड़ों को राजा विश्वुतमन के पुत्र बृहद्बल का वंशज बताया गया |
| कर्नल जेम्स टॉड | राठौड़ों को कन्नौज के जयचंद गहड़वाल का वंशज बताया |
| विश्वेश्वरनाथ रेऊ | जयचंद के वंशज होने के मत का समर्थन किया |
| डॉ. जी.एच. ओझा | राठौड़ों को बदायूं के राठौड़ों का वंशज व दक्षिण भारत के राष्ट्रकूटों से संबद्ध बताया |
2राव सीहा से राव चूंडा तक — प्रारंभिक संघर्ष एवं मंडोर की प्राप्ति
- कन्नौज के जयचंद गहड़वाल के पुत्र हरिश्चंद्र मोहम्मद गौरी से चंदावर के युद्ध में लड़ते हुए कन्नौज की गद्दी पर बैठे थे; 1226 ई. में इल्तुतमिश के आक्रमण के बाद हरिश्चंद्र महुई चले गए। उनके छोटे पुत्र सेतराम के आगे राव सीहा हुए।
👑 राव सीहा (लगभग 13वीं शताब्दी) राठौड़ वंश के वास्तविक संस्थापक
- खेड़-महुली (फर्रुखाबाद) में काली नदी के तट पर दुर्ग बनवाया; फर्रुखाबाद पर मुस्लिम अधिकार के बाद द्वारिका की ओर प्रस्थान किया।
- पुष्कर शिविर में ब्राह्मणों के अनुरोध पर भीनमाल को मुस्लिम आक्रमणकारियों से बचाया; पालीवाल ब्राह्मणों के आग्रह पर पाली को भीलों, मीणाओं व मेरों से बचाकर इसे अपना केंद्र बनाया।
- बिठू गांव (पाली) के 1273 ई. के अभिलेख अनुसार, सिंध के मुस्लिम लुटेरों से लाख झांवर/धौला चौतरा के युद्ध में लड़ते हुए वीरगति प्राप्त हुई; एक संगठित साम्राज्य स्थापित नहीं कर सके।
राव सीहा के उत्तराधिकारी — मंडोर प्राप्ति तक
| शासक (Ruler) | काल (Period) | प्रमुख तथ्य |
|---|
| राव आस्थान | 1273-1291 ई. | गूंदोच गांव को शक्ति-केंद्र बनाया; खेड़ व ईडर पर अधिकार; 1291 ई. में जलालुद्दीन खिलजी के आक्रमण में वीरगति |
| राव धूहड़ | 1291-1309 ई. | प्रतिहारों को हराकर मंडोर पर अधिकार किया; कर्नाटक से नागणेची माता (चक्रेश्वरी) की मूर्ति लाकर नागणा गांव (बालोतरा) में स्थापित की; 1309 ई. में प्रतिहारों से संघर्ष में वीरगति |
| रायमल, भीम, राईकनकपाल, जालनसी | — | सभी शासकों ने भाटियों व तुर्कों से संघर्ष करते हुए वीरगति प्राप्त की; मंडोर बार-बार हाथ बदलता रहा |
| राव छाड़ा | — | सोढा (उमरकोट), जैसलमेर, जालौर, नागौर, सोजत व भीनमाल के शासकों को हराया; 1344 ई. में सोनगरा व देवड़ा चौहानों से युद्ध में वीरगति |
| राव तीड़ा | — | सोनगरा चौहान, देवड़ा, भाटी, बालेचा चौहान व सोलंकियों को हराया; सिवाना की रक्षा करते हुए तुर्क सेना से युद्ध में वीरगति |
👑 मल्लीनाथ (1358 ई. जन्म) "रावल" उपाधिधारी — मालाणी क्षेत्र के नामकर्ता
- पिता रावल सलारख, माता जानीदे; तुर्कों से "महेवा" छीनकर वहां राठौड़ प्रभुत्व स्थापित किया व "रावल" उपाधि धारण की। 1378 ई. में मालवा के सूबेदार निजामुद्दीन की सेना को हराया।
- 1389 ई. में उगमसी भाटी के शिष्य बनकर योग-साधना ग्रहण की; 1399 ई. में भव्य हरि-कीर्तन का आयोजन किया। इनके नाम पर पश्चिमी जोधपुर के परगने का नाम "मालाणी" पड़ा; तिलवाड़ा (बालोतरा) में इनका प्रसिद्ध मंदिर स्थित है, जहां आज भी विशाल मल्लीनाथ पशु मेला भरता है।
👑 राव चूंडा (1394-1423 ई.) मंडोर को स्थायी राजधानी बनाने वाले शासक
- चाचा मल्लीनाथ द्वारा पालन-पोषण; इंदा शाखा के प्रतिहार शासक ने अपनी पुत्री के दहेज में मंडोर दिया — चूंडा ने मंडोर को अपनी राजधानी बनाया।
- खाटू, डीडवाना, सांभर, अजमेर व नाडोल पर अधिकार किया; 1423 ई. में पूगल के भाटियों द्वारा छल से हत्या कर दी गई। पत्नी चांद कंवर (चांद दे) ने जोधपुर में चांद बावड़ी बनवाई; स्वयं चूंडा ने नागौर में चूंडासर झील बनवाई।
- बड़े पुत्र रणमल की जगह छोटे पुत्र कान्हा को उत्तराधिकारी नियुक्त किया — यह निर्णय आगे मारवाड़-मेवाड़ संबंधों की दिशा तय करने वाला साबित हुआ।
3राव रणमल एवं राव जोधा — जोधपुर की स्थापना एवं मेहरानगढ़ दुर्ग
- कान्हा के शासक बनने से असंतुष्ट रणमल (1427-38 ई.) मेवाड़ चले गए और बहन हंसाबाई का विवाह मेवाड़ के राणा लाखा से करवाया (विस्तार देखें: अध्याय 6)। भांजे मोकल के महाराणा बनने पर रणमल का मेवाड़ प्रशासन में अत्यधिक प्रभाव हो गया, जिससे मेवाड़ी सामंत असंतुष्ट हुए। 1438 ई. में महाराणा कुंभा के मेवाड़ी सामंतों ने रणमल की प्रेमिका भारमली के माध्यम से विष देकर हत्या करवा दी।
👑 राव जोधा (1438-1489 ई.) जोधपुर नगर व मेहरानगढ़ दुर्ग के निर्माता
- पिता रणमल, माता कोडमदे (जिन्होंने बीकानेर में कोडमदेसर बावड़ी बनवाई — पश्चिमी राजस्थान की सबसे प्राचीन बावड़ियों में से एक)।
- 1453 ई. में मंडोर पर पुनः अधिकार किया; महाराणा कुंभा के साथ आंवल-बांवल की संधि, राठौड़-सिसोदिया संधि व मेवाड़-मारवाड़ (खेजड़ी) संधि (1453 ई., केंद्र सोजत) संपन्न की — इसी संधि के तहत रायमल (कुंभा के पुत्र) व श्रृंगार दे (जोधा की पुत्री) का विवाह भी हुआ (विस्तार देखें: अध्याय 6)।
- 1459 ई. में जोधपुर नगर की स्थापना की और इसे अपनी राजधानी बनाया; पत्नी जसमादे ने रानीसर झील बनवाई। दिल्ली के सुल्तान बहलोल लोदी की सेना को भी पराजित किया।
- मेहरानगढ़ दुर्ग का निर्माण करवाया — नाम का अर्थ "विशाल/विराट दुर्ग"; लाल बलुआ पत्थर से निर्मित; करणी माता द्वारा नींव रखी गई मानी जाती है; चिड़ियाटूक पहाड़ी पर स्थित; अन्य नाम — मयूरध्वज व गढ़ चिंतामणि; दो बाह्य द्वार — जयपोल व फतेहपोल।
- राव जोधा के छोटे पुत्र बीका ने 1488 ई. (अक्षय तृतीया) को बीकानेर की स्थापना की — राठौड़ वंश की दूसरी प्रमुख शाखा (विस्तार देखें: अध्याय 10)।
मेहरानगढ़ दुर्ग — एक नज़र में
| पहलू (Aspect) | विवरण (Details) |
|---|
| प्रमुख महल/भवन | मोती महल, फूल महल, तख्त विलास, अजीत विलास, उम्मेद विलास, चोखेलाव महल, बीछला महल, शृंगार चौकी, पुस्तक प्रकाश |
| प्रमुख मंदिर | नागणेची माता, चामुंडा माता, आनंदधन मंदिर, मुरली मनोहर |
| ऐतिहासिक तोपें | किलकिला, शंभूबाण, गजनीखान, जमजमा, कड़क बिजली, नुसरत, गुब्बार, बिच्छू बाण, घुड़घनिड़, मीरबख्श, रहस्य काल, गजक |
| 1544 ई. | शेरशाह सूरी ने दुर्ग पर अधिकार किया |
| अकबर काल | हुसैन कुली बेग के अधीन रहा |
| 1678 ई. के बाद (जसवंत सिंह प्रथम की मृत्यु पर) | औरंगजेब ने अधिकार किया; औरंगजेब की मृत्यु बाद अजीत सिंह ने जफर कुली खां से पुनः छीना |
| प्रसिद्ध कथन (रुडयार्ड किपलिंग) | "देवताओं, परियों व स्वर्गदूतों द्वारा निर्मित प्रतीत होता है" |
| जल आपूर्ति | रानीसर व पदमसर झीलों से |
| 30 सितंबर 2008 (मेहरानगढ़ त्रासदी) | अश्विन नवरात्रि के दौरान भगदड़ दुर्घटना; जांच हेतु जसराज चोपड़ा समिति गठित |
महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण — UNESCO दर्जा: मेहरानगढ़ दुर्ग "राजस्थान के पहाड़ी दुर्ग" श्रृंखला (2013 UNESCO सूची — चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, आमेर, जैसलमेर, रणथंभौर व गागरोन) में शामिल नहीं है। इसका मुख्य कारण यह है कि मेहरानगढ़ मुख्यतः राजदरबार हेतु सुरक्षित गढ़ था, जहां नागरिक बस्ती (urban settlement) उस रूप में विकसित नहीं थी जैसी अन्य छह दुर्गों में थी। यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है, क्योंकि विद्यार्थी अक्सर मेहरानगढ़ को भी UNESCO सूची में गलती से शामिल मान लेते हैं।
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4राव गांगा से राव मालदेव तक — मारवाड़ का विस्तार एवं गिरी सुमेल का युद्ध
- राव जोधा के बाद सातलदेव (1489-1492 ई., जैसलमेर में सातलमेर नगर बसाया, गूदड़ला नृत्य-परंपरा प्रारंभ) व राव सूजा (1492-1515 ई., जिनके शासनकाल में भाई बीका ने बीकानेर स्थापित किया व वीरमदेव ने मेड़ता को स्वतंत्र राज्य बनाया) मारवाड़ के शासक रहे।
👑 राव गांगा (1515-1531 ई.) खानवा के युद्ध में राणा सांगा के सहयोगी
- समकालीन दिल्ली सल्तनत — सिकंदर लोदी, इब्राहिम लोदी; समकालीन मुगल — बाबर व हुमायूं। 1527 ई. के खानवा युद्ध में पुत्र मालदेव सहित सेना भेजकर राणा सांगा की सहायता की (विस्तार देखें: अध्याय 6)।
- 1529 ई. के सेवकी युद्ध में नागौर के दौलत खां को हराया; जोधपुर में गोगेलाव झील व "गंगा की बावड़ी" का निर्माण करवाया। अंततः पुत्र मालदेव द्वारा ही हत्या करवाई गई।
👑 राव मालदेव (1531/32-1562 ई.) मारवाड़ के सर्वाधिक शक्तिशाली शासकों में से एक — "हश्मत वाला बादशाह"
- पिता की हत्या करवाकर राजगद्दी प्राप्त की; खानवा युद्ध (1527 ई.) में राणा सांगा के पक्ष में भाग लिया; 1532 ई. में बहादुरशाह के मेवाड़ आक्रमण के समय राणा विक्रमादित्य की सहायता की तथा उदयसिंह को राजा बनाने हेतु बनवीर की हत्या में सहयोग दिया।
- राज्य-विस्तार — नागौर, भादराजून, मेड़ता, अजमेर, सिवाना व जालौर पर अधिकार किया; इस दौरान भाई वीरमदेव (मेड़ता) व बीकानेर के राव जैतसी दोनों को पराजित किया।
- साहेबा/पाहेबा का युद्ध (1541 ई.) — राव जैतसी (बीकानेर) की मालदेव से पराजय व मृत्यु; जैतसी के पुत्र कल्याणमल शेरशाह सूरी की शरण में गए।
- गिरी सुमेल का युद्ध (5 जनवरी 1544 ई.) — मालदेव के सेनापति जैता व कुंपा ने शेरशाह सूरी की विशाल सेना के विरुद्ध वीरगति को प्राप्त होकर अद्भुत प्रतिरोध किया; शेरशाह ने कल्याणमल (बीकानेर) व वीरमदेव (मेड़ता) को विजय दिलाई। इस युद्ध की जानकारी अब्बास खां सरवानी/शेखानी कृत "तारीख-ए-शेरशाही" से मिलती है।
- शेरशाह का प्रसिद्ध कथन — "मुट्ठी भर बाजरे के लिए मैं हिंदुस्तान का साम्राज्य खो बैठता।" तथा "काश मेरे पास जैता व कुंपा जैसे सेनापति होते, तो मैं निर्विवाद रूप से हिंदुस्तान पर शासन करता।"
- युद्ध के बाद शेरशाह ने जोधपुर पर अधिकार कर ख्वास खां को सूबेदार नियुक्त किया, परंतु 1545 ई. में शेरशाह की मृत्यु के बाद मालदेव ने जोधपुर, पोकरण, फलौदी, बाड़मेर, कोटड़ा, जालौर व मेड़ता पर पुनः अधिकार कर लिया।
- हरमाड़ा का युद्ध (1557 ई.) में मेवाड़ के राणा उदयसिंह को हराया; फारसी इतिहासकारों (अबुल फजल, निजामुद्दीन आदि) ने इन्हें "हश्मत वाला बादशाह" कहा। मेड़ता, रियां, पोकरण, सोजत व मालकोट (मेड़ता) सहित कई दुर्गों का निर्माण करवाया।
- रानी उमादे (जैसलमेर के राव लूणकरण की पुत्री) "रूठी रानी" के नाम से इतिहास-प्रसिद्ध हैं — मालदेव की मृत्यु पर उन्होंने मालदेव की पगड़ी के साथ अनुवरण (सती) किया।
- पत्नी स्वरूप दे के प्रभाव में तीसरे पुत्र चंद्रसेन को उत्तराधिकारी घोषित किया — बड़े पुत्रों राम (गूंदोज) व उदयसिंह (फलौदी) को यह स्वीकार नहीं हुआ, जिससे आगे उत्तराधिकार-संघर्ष हुआ।
"मुट्ठी भर बाजरे के लिए मैं हिंदुस्तान का साम्राज्य खो बैठता।" — शेरशाह सूरी — गिरी सुमेल के युद्ध के बाद
5राव चंद्रसेन — "मारवाड़ का प्रताप"
👑 राव चंद्रसेन (1562-1581 ई.) "मारवाड़ का प्रताप", "भूला-बिसरा राजा" — अकबर की अधीनता कभी स्वीकार नहीं की
- पिता मालदेव, माता स्वरूप दे; विश्वेश्वरनाथ रेऊ ने इनकी तुलना महाराणा प्रताप से की — उपाधियां "मारवाड़ का प्रताप" व "भूला-बिसरा राजा"।
- भाइयों राम व उदयसिंह के विरोध का सामना करना पड़ा — 1564 ई. में राम अकबर की शरण में गया; इसी वर्ष अकबर ने हुसैन कुली बेग भेजकर जोधपुर पर अधिकार किया, जिस पर चंद्रसेन भादराजून चले गए और मुगलों से संघर्ष जारी रखा।
- 1570 ई. का नागौर दरबार — उद्देश्य स्थानीय शासकों से अकबर की अधीनता स्वीकार करवाना था; हर्राई भाटी (जैसलमेर), कल्याणसिंह व राय सिंह (बीकानेर), दुर्जनशाल हाड़ा (कोटा), उदयसिंह (फलौदी) सहित कई शासक उपस्थित हुए और अधीनता स्वीकार की, परंतु चंद्रसेन दरबार में आकर भी अकबर का भाइयों राम व उदयसिंह की ओर झुकाव देखकर बिना अधीनता स्वीकारे लौट गए।
- 1573 ई. में अकबर ने शाहकुली खां के नेतृत्व में सेना भेजी, जिसमें राय सिंह भी शामिल थे — इस सेना ने कल्ला राठौड़ को हराकर फत्ता राठौड़ को सिवाना दुर्ग में नियुक्त किया; 1575 ई. में जलाल खां के नेतृत्व में पुनः सेना भेजी गई, परंतु जलाल खां चंद्रसेन व देवदास के हाथों मारा गया।
- चंद्रसेन ने लोहावट के युद्ध में भाई उदयसिंह व नाडोल के युद्ध में भाई राम को पराजित किया। "जोधपुर राज्य री ख्यात" के अनुसार चंद्रसेन व महाराणा प्रताप कोरड़ा गांव में मिले थे और उन्होंने हल्दीघाटी व कुंभलगढ़ के युद्धों में प्रताप को अप्रत्यक्ष सहायता दी थी (विस्तार देखें: अध्याय 6)।
- चंद्रसेन को राजस्थान का पहला ऐसा राजपूत शासक माना जाता है जिसने अपनी रणनीति में दुर्गों की बजाय पहाड़ों व जंगलों को प्राथमिकता दी — एक प्रकृति-प्रेमी योद्धा। "जोधपुर राज्य री ख्यात" के अनुसार उनके सामंत वैरसल ने विश्वासघात कर भोजन में विष मिलाया, जिससे 11 जनवरी 1581 ई. को सांचिया गांव (सरण पहाड़ियां) में उनकी मृत्यु हुई — वहीं इनकी छतरी बनी है।
- 1581-83 ई. के बीच अकबर ने मारवाड़ को "खालसा भूमि" (सीधे केंद्रीय नियंत्रण में) घोषित कर दिया।
6राजा उदयसिंह से महाराजा गजसिंह तक — मुगल अधीनता का दौर
| शासक (Ruler) | काल (Period) | प्रमुख तथ्य |
|---|
| राजा उदयसिंह ("मोटा राजा") | 1583-1595 ई. | चंद्रसेन के भाई; 1583 ई. में मुगल अधीनता स्वीकार करने वाले मारवाड़ के प्रथम शासक; 1587 ई. में पुत्री जोधाबाई/जगत गोसाईं/मणिबाई का विवाह सलीम (जहांगीर) से किया — इसी से शाहजहां का जन्म हुआ; अकबर ने 1000 का मनसबदार बनाया; पुत्र किशनसिंह ने 1609 ई. में किशनगढ़ (राठौड़ों की तीसरी शाखा) स्थापित की |
| सवाई राजा सूरसिंह | 1595-1619 ई. | अकबर से "सवाई राजा" की उपाधि; 1615 ई. की मुगल-मेवाड़ संधि में शहजादा खुर्रम के साथ शामिल; जोधपुर में मोती महल का निर्माण |
| महाराजा गजसिंह | 1619-1638 ई. | उपाधि "दल-थम्मन" (1621 ई., जहांगीर द्वारा) व "महाराजा" (1630 ई., शाहजहां द्वारा); बीजापुर व कंधार अभियानों में वीरता; पुत्र जसवंत सिंह को उत्तराधिकारी नियुक्त किया, जिससे बड़े पुत्र अमरसिंह असंतुष्ट हुए |
💡 अमर सिंह राठौड़ — "कटार का धनी"
गजसिंह द्वारा छोटे भाई जसवंत सिंह को उत्तराधिकारी बनाए जाने से क्रुद्ध अमर सिंह राठौड़ शाहजहां की शरण में गए, जहां उन्हें नागौर की जागीर मिली। एक दिन शाही दरबार में मीर बख्शी सलावत खां के अपमानजनक व्यवहार से क्रोधित होकर अमर सिंह ने उसे अपनी कटार से एक ही वार में मार डाला — इसीलिए इन्हें "कटार का धनी" कहा जाता है। 1644 ई. में बीकानेर के करणसिंह के साथ जाखणिया गांव में हुए युद्ध को "मतीरे री राड़" (तरबूज का युद्ध) कहा जाता है। अंततः अपने ही बहनोई अर्जुनसिंह गौड़ द्वारा हत्या कर दी गई — नागौर में इनकी 16 खंभों वाली छतरी आज भी स्थित है।
7महाराजा जसवंत सिंह प्रथम — औरंगजेब के उत्तराधिकार युद्ध में भूमिका
👑 महाराजा जसवंत सिंह प्रथम (1638-1678 ई.) विद्वान शासक, शाहजहां-औरंगजेब दोनों के समकालीन
- जन्म 1626 ई., बुरहानपुर में; पिता की मृत्यु के समय अपने विवाह हेतु बूंदी में थे। 1638 ई. में शाहजहां ने "राजा" व "टीका" की उपाधि दी; 1640 ई. में जोधपुर में राज्याभिषेक उत्सव मनाया गया।
- 1645 ई. में आगरा का प्रबंधन सौंपा गया; 1648 ई. में कंधार अभियान पर भेजा गया; उत्तराधिकार-युद्ध से पहले शाहजहां ने 7000 जात-सवार का मनसब व मालवा की सूबेदारी प्रदान की।
- धरमत का युद्ध (मध्य प्रदेश, 1658 ई.) — दारा शिकोह की ओर से औरंगजेब के विरुद्ध लड़े, परंतु कासिम खां के विश्वासघात से पराजित हुए; कुछ इतिहासकारों (बर्नियर, मानुची, खफी खां) के अनुसार जोधपुर लौटने पर उदयपुरी रानी (महारानी महामाया) ने महल के द्वार बंद कर दिए — कवि श्यामलदास इसे सत्य व विश्वेश्वरनाथ रेऊ इसे असत्य मानते हैं। खजुआ के युद्ध में शाही शिविर लूटकर जोधपुर लौटे।
- दोराई का युद्ध (1659 ई.) के बाद मिर्जा राजा जयसिंह की मध्यस्थता से औरंगजेब से समझौता हुआ; 1659 ई. में बिना मनसब बदले गुजरात का सूबेदार बनाया गया। 1662 ई. में मराठों के विरुद्ध शाइस्ता खां की सहायता हेतु दक्षिण भेजे गए, विशेष सफलता नहीं मिली।
- 1673 ई. में काबुल भेजा गया, फिर जमरूद (अफगानिस्तान) — जहां 28 नवंबर 1678 ई. को इनकी मृत्यु हुई। औरंगजेब ने कहा — "आज कुफ्र का द्वार ध्वस्त हो गया।"
- स्वयं एक विद्वान व विद्वानों के आश्रयदाता थे — प्रमुख रचनाएं: भाषा-भूषण (अलंकार शास्त्र पर ग्रंथ), आनंद विलास, गीता महात्म्य, अपरोक्ष सिद्धांतसार, सिद्धांत बोध, अनुभव प्रकाश, प्रबोध चंद्रोदय।
- पत्नी अतिरंग दे ने जनसागर झील तथा पत्नी जसवंत दे ने राय का बाग/कल्याण सागर (वर्तमान नाम रातानाडा) बनवाया; धाय मां रूपा धाय हेतु मेड़ती गेट पर बावड़ी बनवाई गई। महाराष्ट्र में "जसवंतपुरा" नामक नगर भी बसाया।
- दरबारी विद्वान मुहणोत नैणसी ने मारवाड़ के राठौड़ों सहित गुर्जर-प्रतिहारों की 26 शाखाओं व गोहिलों की 24 शाखाओं का वर्णन करते हुए राजस्थान की प्रथम "ख्यात" (मारवाड़ रा परगना री विगत) लिखी — कर्ज के बोझ तले दबकर भाई सुंदरदास के साथ जेल में आत्महत्या कर ली।
"आज कुफ्र का द्वार ध्वस्त हो गया।" — औरंगजेब — महाराजा जसवंत सिंह प्रथम की मृत्यु पर
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8महाराजा अजीत सिंह एवं वीर दुर्गादास राठौड़ — मारवाड़ की रक्षा
- जसवंत सिंह प्रथम की मृत्यु की खबर मिलते ही औरंगजेब ने जोधपुर को "खालसा" घोषित कर नागौर के राव अमरसिंह के पौत्र इंद्रसिंह को "राजा" की उपाधि व जागीर दे दी। जसवंत सिंह के बाद उनकी दो संतानें हुईं — अजीत सिंह व दलथंभन; जोधपुर के राठौड़ सरदार दोनों बालकों को जमरूद से दिल्ली लाए, जहां रास्ते में दलथंभन का देहांत हो गया।
👑 वीर दुर्गादास राठौड़ (1638-1718 ई.) "मारवाड़ का उद्धारक", "अनबिंधिया मोती" — कर्नल टॉड द्वारा "राठौड़ों का यूलिसिस"
- सालवा गांव (जोधपुर) के निवासी; पिता आस्करण (जसवंत सिंह प्रथम के मंत्री); जागीर लूणवा।
- गोरा धाय व मुकुंददास खींची की सहायता से अजीत सिंह की रक्षा की; औरंगजेब के शाही हरम से अजीत सिंह को बचाकर कालिंद्री गांव (सिरोही) में जयदेव ब्राह्मण के यहां छिपाकर रखा; मेवाड़ नरेश राज सिंह प्रथम से शरण प्राप्त की — राज सिंह ने 12 गांवों सहित केलवा की जागीर दी तथा सिसोदिया-राठौड़ गठबंधन बना (विस्तार देखें: अध्याय 6)।
- 1678-1708 ई. तक — पूरे 30 वर्षों तक औरंगजेब के विरुद्ध निरंतर संघर्ष किया; ईश्वरदास नागर की सलाह पर शहजादा अकबर के पुत्र-पुत्री (बुलंद अख्तर व राजकुमारी सफियत-उन-निसा) को इस्लामी शिक्षा दिलवाकर सम्मानपूर्वक औरंगजेब को लौटाया।
- अजीत सिंह से मतभेद होने पर मेवाड़ के अमर सिंह द्वितीय के यहां चले गए, जहां विजयपुर व रामपुरा की जागीर मिली; अंतिम समय उज्जैन (शिप्रा नदी तट) में बिताया — 22 नवंबर 1718 ई. को निधन, शिप्रा तट पर ही छतरी बनी है।
👑 महाराजा अजीत सिंह (1708-1724 ई.) देबारी समझौते से मारवाड़ के मान्य शासक बने
- 1708 ई. का देबारी समझौता (उदयपुर) — आमेर के सवाई जयसिंह व मेवाड़ के अमर सिंह द्वितीय के साथ मिलकर त्रिपक्षीय मुगल-विरोधी गठबंधन बनाया, जिससे मारवाड़ के शासक के रूप में मान्यता प्राप्त हुई (विस्तार देखें: अध्याय 6)।
- 1715 ई. में पुत्री इंद्रा कुंवरी का विवाह मुगल बादशाह फर्रुखसियर से किया — यह अंतिम राजपूत-मुगल वैवाहिक संबंध माना जाता है।
- स्वयं एक विद्वान शासक थे — रचनाएं: गुणसागर, दुर्गापाठ भाषा, निर्वाण दुहा, अजीत सिंह रा कहा दुहा, गज उद्धार। निर्माण कार्य — मूलनायक मंदिर, फतेह महल, घनश्याम मंदिर।
- 1724 ई. में अपने ही पुत्र बख्त सिंह द्वारा हत्या कर दी गई।
गोरा धाय — मारवाड़ की पन्नाधाय: अजीत सिंह की धाय मां गोरा धाय को "मारवाड़ की पन्नाधाय" कहा जाता है — जिस प्रकार मेवाड़ में पन्नाधाय ने उदयसिंह को बचाया था (विस्तार देखें: अध्याय 6), उसी प्रकार गोरा धाय ने बाल अजीत सिंह की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जोधपुर में इनकी भी एक छतरी स्थित है।
9महाराजा अभय सिंह से मानसिंह तक — खेजड़ली आंदोलन एवं उत्तरकालीन शासक
👑 महाराजा अभय सिंह (1724-1749 ई.) खेजड़ली आंदोलन के समकालीन शासक
- गुजरात के सूबेदार सरबुलंद खां को हराया; हुरड़ा सम्मेलन (1734 ई.) में भाग लिया (विस्तार देखें: अध्याय 6)।
- खेजड़ली आंदोलन (28 अगस्त 1730 ई.) — अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में खेजड़ली गांव (जोधपुर) में पेड़ों की रक्षा हेतु 363 लोगों (294 पुरुष सहित) ने बलिदान दिया; इनके सम्मान में "अमृता देवी वन्यजीव संरक्षण पुरस्कार" स्थापित किया गया है — भाद्रपद शुक्ल दशमी को यहां विश्व का एकमात्र "वृक्ष मेला" आयोजित होता है।
- दरबारी विद्वान — करणीदान (सूरज प्रकाश व विषाद श्रृंगार के रचयिता), वीरभान (राजरूपक), जगजीवन भट्ट (अजीतोदय व अभयोदय), सूरति मिश्र (अमरचंद्रिका)।
💡 खेजड़ली — पेड़ों के लिए बलिदान की अमर गाथा
1730 ई. में जोधपुर नरेश अभय सिंह के दीवान गिरधरदास भंडारी ने नए महल हेतु लकड़ी जुटाने के लिए खेजड़ली गांव में सैनिक भेजे। बिश्नोई समुदाय की अमृता देवी ने पेड़ काटने का विरोध करते हुए कहा — "सिर साटे रूंख रहे तो भी सस्तो जाण" (यदि सिर देकर भी पेड़ बच सके, तो यह सस्ता सौदा है)। उन्होंने स्वयं एक पेड़ से लिपटकर अपना बलिदान दिया — उनकी तीन पुत्रियों सहित कुल 363 बिश्नोई स्त्री-पुरुषों ने पेड़ों की रक्षा के लिए प्राण न्योछावर कर दिए। यह घटना भारत के पर्यावरण-संरक्षण आंदोलनों की जननी मानी जाती है — 20वीं सदी के "चिपको आंदोलन" को भी इसी घटना से प्रेरणा मिली।
राम सिंह से भीम सिंह तक — उत्तराधिकार-संघर्ष का दौर
| शासक (Ruler) | काल (Period) | प्रमुख तथ्य |
|---|
| राम सिंह | 1749-1751 ई. | अभय सिंह के पुत्र; जालौर परगने को लेकर चाचा बख्त सिंह से संघर्ष |
| बख्त सिंह | 1751-1752 ई. | पिता अजीत सिंह की हत्या के लिए प्रसिद्ध; राम सिंह से जोधपुर छीना |
| विजय सिंह | 1752-1793 ई. | शाह आलम द्वितीय से टकसाल की अनुमति प्राप्त कर "विजय शाही" सिक्के जारी किए; राठौड़-कछवाहा गठबंधन बनाया; तुंगा का युद्ध (1787 ई.) व पाटन का युद्ध (20 जून 1790 ई.) लड़े; कवि श्यामलदास ने प्रेयसी गुलाब राय को "मारवाड़ की नूरजहां" कहा |
| भीम सिंह | 1793-1803 ई. | मेवाड़ की कृष्णा कुमारी विवाद-प्रकरण से जुड़े (विस्तार देखें: अध्याय 6) |
👑 महाराजा मानसिंह (1803-1843 ई.) "सन्यासी राजा" — नाथ संप्रदाय के संरक्षक
- जोधपुर में महामंदिर का निर्माण करवाया, जो नाथ संप्रदाय की प्रमुख पीठ है — इसीलिए इन्हें "सन्यासी राजा" कहा जाता है।
- गिंगोली का युद्ध (13 मार्च 1807 ई.) — कृष्णा कुमारी विवाद को लेकर लड़ा गया (विस्तार देखें: अध्याय 6); 1803 व 1818 ई. में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से अधीनस्थ संधियां कीं।
- मान पुस्तकालय की स्थापना की; 1835 ई. में जोधपुर लीजन (मुख्यालय एरिनपुरा) की स्थापना; 1839 ई. में जोधपुर में राजनीतिक अभिकरण (Political Agency) स्थापित हुआ; 1832 ई. के अजमेर दरबार से अनुपस्थित रहे।
10महाराजा तख्त सिंह से हनवंत सिंह तक — ब्रिटिश काल एवं एकीकरण
| शासक (Ruler) | काल (Period) | प्रमुख कार्य |
|---|
| तख्त सिंह | 1843-1875 ई. | 1857 के विद्रोह में अंग्रेजों को सैन्य सहायता दी; मेयो कॉलेज को 1 लाख रुपये का दान; राज्य में प्रथम मुद्रणालय व विद्यालय स्थापित किया; प्रशासनिक कारणों से तोप-सलामी 17 से घटाकर 15 की गई |
| जसवंत सिंह द्वितीय | 1873-1895 ई. | अंग्रेजों के प्रति निष्ठावान शासक; 1884 ई. में नगरपालिका स्थापित; 1885 ई. में बाल-विवाह पर प्रतिबंध; 1883 ई. में जोधपुर में आर्य समाज की स्थापना — इसी वर्ष दयानंद सरस्वती को जोधपुर में विष दिया गया, 30 अक्टूबर 1883 ई. को अजमेर में निधन; 1881 ई. में प्रथम जनगणना; 1892 ई. में जसवंत सागर बांध का निर्माण |
| सरदार सिंह | 1895-1911 ई. | जोधपुर पोलो खेल का केंद्र बना; राज्य में टेलीफोन सेवा प्रारंभ; जसवंत महिला चिकित्सालय की स्थापना; 1900 ई. में चीन के बॉक्सर विद्रोह में भाग लिया; 1910 ई. में एडवर्ड राहत कोष का गठन |
| सुमेर सिंह | 1911-1918 ई. | 1911 ई. के दिल्ली दरबार में उपस्थित; प्रथम विश्व युद्ध में भागीदारी; काशी हिंदू विश्वविद्यालय को 2 लाख रुपये की आर्थिक सहायता |
| उम्मेद सिंह | 1918-1947 ई. | वास्तविक सत्ता दीवान डोनाल्ड फील्ड के हाथ में; 1929 ई. में उम्मेद भवन पैलेस का निर्माण प्रारंभ |
| हनवंत सिंह | 1947-1949 ई. | प्रारंभ में पाकिस्तान में विलय का प्रयास किया; 9 अगस्त 1947 ई. को भारत के साथ विलय-पत्र (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर किए; अंततः वृहत् राजस्थान में मारवाड़ का विलय हुआ (विस्तार देखें: अध्याय 16); संविधान सभा में प्रतिनिधि — जय नारायण व्यास; 1945 ई. में विधान सभा का गठन |
11राठौड़ वंश की सांस्कृतिक विरासत, अन्य राठौड़ शाखाएं एवं अध्याय सार
A. राठौड़ काल के प्रमुख साहित्यकार
| साहित्यकार (Scholar) | संबंधित शासक/काल | प्रमुख रचनाएं |
|---|
| मुहणोत नैणसी | जसवंत सिंह प्रथम | मारवाड़ रा परगना री विगत (राजस्थान का गजेटियर), मारवाड़ की प्रथम "ख्यात" |
| पृथ्वीराज राठौड़ ("पीथल") | अकबर के दरबारी कवि, बीकानेर शाखा | वेलि क्रिसन रुक्मणी री (डिंगल भाषा का श्रेष्ठ काव्य, कवि दुरसा आढ़ा द्वारा "पांचवां वेद" कहा गया) |
| इसरदास जी | राव मालदेव के दरबारी कवि | हाला झाला री कुंडलियां (सूर सतसई), हरिरास |
| केसरी सिंह बारहठ | — | "रूठी रानी" ग्रंथ के रचयिता |
B. अन्य राठौड़ शाखाएं — संक्षिप्त परिचय
| शाखा (Branch) | संस्थापक (Founder) | स्थापना वर्ष | विशेष तथ्य |
|---|
| बीकानेर | राव बीका (राव जोधा के पुत्र) | 1488 ई. (अक्षय तृतीया) | राठौड़ों का दूसरा प्रमुख केंद्र; करणी माता की कृपा से स्थापना; पूर्ण विवरण अध्याय 10 में देखें |
| किशनगढ़ | किशन सिंह (राजा उदयसिंह के पुत्र) | 1609 ई. | राठौड़ों की तीसरी शाखा; प्रसिद्ध शासक सावंत सिंह (नागरीदास) व बणी-ठणी चित्रकला के लिए विख्यात |
💡 बणी-ठणी — "भारत की मोनालिसा"
किशनगढ़ के महाराजा सावंत सिंह (साहित्यिक नाम "नागरीदास") भगवान कृष्ण की भक्ति में इतने लीन हो गए कि उन्होंने राजपाट त्याग कर वृंदावन में निवास किया। उनकी प्रेयसी व काव्य-प्रेरणा विष्णुप्रिया आगे "बणी-ठणी" (सुसज्जित/श्रृंगारित) के नाम से प्रसिद्ध हुईं — चित्रकार निहालचंद द्वारा बनाया गया उनका विश्व-प्रसिद्ध चित्र आज "भारत की मोनालिसा" कहलाता है, जो किशनगढ़ शैली की चित्रकला की सबसे बड़ी पहचान है।
राठौड़ वंश की उपलब्धियां (Achievements)
- जोधपुर, बीकानेर व किशनगढ़ — तीन शक्तिशाली रियासतों की स्थापना
- मेहरानगढ़ जैसे अभेद्य दुर्ग व जोधपुर जैसी सुनियोजित नगर-रचना
- गिरी सुमेल में जैता-कुंपा का अद्वितीय बलिदान
- 30 वर्षों तक दुर्गादास राठौड़ का मुगलों से अकेले संघर्ष
- खेजड़ली का पर्यावरण-बलिदान — विश्व के लिए प्रेरणा
राठौड़ वंश की चुनौतियां (Challenges)
- चंद्रसेन जैसे स्वाभिमानी शासक का "खालसा भूमि" में बदला जाना
- भाइयों के बीच बार-बार उत्तराधिकार-संघर्ष (राम-उदयसिंह-चंद्रसेन, राम सिंह-बख्त सिंह)
- दरबारी षड्यंत्रों से कई शासकों की हत्या (रणमल, अजीत सिंह, चंद्रसेन को विष)
- मुगल दबाव में लंबे समय तक अधीनता स्वीकारनी पड़ी
★ अध्याय सार — महत्वपूर्ण तथ्य ★
1. राव सीहा को राठौड़ वंश का वास्तविक संस्थापक माना जाता है; राव चूंडा (1394-1423 ई.) ने मंडोर को राजधानी बनाया। 2. राव जोधा ने 1459 ई. में जोधपुर नगर की स्थापना की तथा मेहरानगढ़ दुर्ग का निर्माण करवाया — यह दुर्ग UNESCO सूची में शामिल नहीं है (यह Hill Forts of Rajasthan श्रृंखला से बाहर है)। 3. राव जोधा के पुत्र बीका ने 1488 ई. में बीकानेर की स्थापना की — राठौड़ों की दूसरी प्रमुख शाखा। 4. राव मालदेव (1531-1562 ई.) के समय गिरी सुमेल का युद्ध (1544 ई.) हुआ, जिसमें सेनापति जैता व कुंपा ने शेरशाह सूरी की सेना के विरुद्ध वीरगति पाई। 5. राव चंद्रसेन (1562-1581 ई.) को "मारवाड़ का प्रताप" कहा जाता है — उन्होंने अकबर की अधीनता कभी स्वीकार नहीं की। 6. राजा उदयसिंह ("मोटा राजा") मुगल अधीनता स्वीकार करने वाले मारवाड़ के प्रथम शासक थे; इनकी पुत्री जोधाबाई का विवाह जहांगीर से हुआ। 7. महाराजा जसवंत सिंह प्रथम ने धरमत के युद्ध (1658 ई.) में दारा शिकोह का साथ दिया; उनकी मृत्यु के बाद औरंगजेब ने मारवाड़ को खालसा घोषित किया। 8. वीर दुर्गादास राठौड़ ने 30 वर्षों तक (1678-1708 ई.) औरंगजेब से संघर्ष कर बालक अजीत सिंह की रक्षा की — इन्हें "मारवाड़ का उद्धारक" कहा जाता है। 9. महाराजा अजीत सिंह ने 1708 ई. के देबारी समझौते से मारवाड़ के शासक की मान्यता प्राप्त की। 10. खेजड़ली आंदोलन (28 अगस्त 1730 ई.) — अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में 363 बिश्नोइयों का पर्यावरण-रक्षा हेतु बलिदान, महाराजा अभय सिंह के शासनकाल में हुआ। 11. महाराजा मानसिंह को "सन्यासी राजा" कहा जाता है — उन्होंने जोधपुर में महामंदिर (नाथ संप्रदाय की पीठ) बनवाया। 12. महाराजा उम्मेद सिंह के समय 1929 ई. में उम्मेद भवन पैलेस का निर्माण शुरू हुआ। 13. महाराजा हनवंत सिंह ने 9 अगस्त 1947 ई. को भारत के साथ विलय-पत्र पर हस्ताक्षर किए — मारवाड़ का वृहत् राजस्थान में विलय हुआ। 14. राठौड़ वंश की तीसरी शाखा किशनगढ़ (स्थापना 1609 ई.) अपनी बणी-ठणी चित्रकला के लिए प्रसिद्ध है — "भारत की मोनालिसा"। 15. मुहणोत नैणसी ने "मारवाड़ रा परगना री विगत" लिखकर राजस्थान की प्रथम "ख्यात" की रचना की।
नीचे दी समय-रेखा (Timeline) इस अध्याय के सभी महत्वपूर्ण वर्षों को एक साथ जोड़ती है — रिवीजन के लिए इसे ज़रूर दोहराएं:
| वर्ष (Year) | घटना/Event | महत्व |
|---|
| 1273 ई. | राव सीहा की लाख झांवर युद्ध में वीरगति | बिठू अभिलेख से प्रमाणित |
| 1394-1423 ई. | राव चूंडा का शासनकाल — मंडोर राजधानी बनी | राठौड़ शक्ति का सुदृढ़ीकरण |
| 1453 ई. | आंवल-बांवल की संधि (राव जोधा-महाराणा कुंभा) | मेवाड़-मारवाड़ सीमा निर्धारण |
| 1459 ई. | जोधपुर नगर की स्थापना (राव जोधा) | मारवाड़ की स्थायी राजधानी |
| 1488 ई. | राव बीका द्वारा बीकानेर की स्थापना | राठौड़ों की दूसरी शाखा |
| 1541 ई. | साहेबा/पाहेबा का युद्ध | राव मालदेव की राव जैतसी पर विजय |
| 5 जनवरी 1544 ई. | गिरी सुमेल का युद्ध | जैता-कुंपा का बलिदान, शेरशाह की कठिन विजय |
| 1557 ई. | हरमाड़ा का युद्ध | मालदेव की उदयसिंह (मेवाड़) पर विजय |
| 1570 ई. | नागौर दरबार | अधिकांश राजपूत शासकों की अकबर के प्रति अधीनता; चंद्रसेन ने अस्वीकार किया |
| 1581-83 ई. | मारवाड़ "खालसा भूमि" घोषित | चंद्रसेन की मृत्यु के बाद मुगल सीधा नियंत्रण |
| 1583 ई. | राजा उदयसिंह की मुगल अधीनता स्वीकृति | मारवाड़ के प्रथम मुगल-अधीन शासक |
| 1609 ई. | किशनगढ़ रियासत की स्थापना | राठौड़ों की तीसरी शाखा |
| 1658 ई. | धरमत का युद्ध | जसवंत सिंह प्रथम की दारा शिकोह पक्ष में भागीदारी |
| 1678-1708 ई. | दुर्गादास राठौड़ का औरंगजेब से संघर्ष | 30 वर्षों तक मारवाड़ की रक्षा |
| 1708 ई. | देबारी समझौता | अजीत सिंह को मारवाड़ के शासक की मान्यता |
| 28 अगस्त 1730 ई. | खेजड़ली आंदोलन | अमृता देवी बिश्नोई सहित 363 बलिदान |
| 1803, 1818 ई. | मानसिंह की ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से संधियां | ब्रिटिश अधीनस्थ संधि व्यवस्था लागू |
| 1857 ई. | तख्त सिंह द्वारा अंग्रेजों को सैन्य सहायता | 1857 विद्रोह में मारवाड़ की भूमिका |
| 1929 ई. | उम्मेद भवन पैलेस निर्माण प्रारंभ | आधुनिक जोधपुर की पहचान |
| 9 अगस्त 1947 ई. | हनवंत सिंह का भारत विलय-पत्र पर हस्ताक्षर | मारवाड़ का भारतीय संघ में विलय |
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