Chauhan/Chahamana Dynasty — शाकं भरी से रणथंभौर, नाडौल, जालौर व हाड़ौती तक
कल्पना कीजिए — एक 11 साल का बालक अपनी मां की गोद में बैठकर राज्य चलाना सीख रहा है, और आगे चलकर वही बालक "राय पिथौरा" कहलाता है, जिसके नाम से आज भी दिल्ली का एक इलाका "रायपिथौरा" जाना जाता है। यह कहानी है पृथ्वीराज चौहान तृतीय की — भारत के सबसे चर्चित राजपूत शासकों में से एक। परंतु चौहान वंश की गाथा केवल पृथ्वीराज तक सीमित नहीं है — यह वंश सांभर की झील से शुरू होकर अजमेर, दिल्ली, नाडौल, जालौर, रणथंभौर, सिरोही और हाड़ौती (बूंदी-कोटा-झालावाड़) तक फै ला — हर शाखा की अपनी वीरता, अपना बलिदान और अपनी कहानी है। इसी विशाल वंश-वृक्ष को इस अध्याय में हम एक साथ समझेंगे।
1. चौहान वंश का परिचय — उत्पत्ति के सिद्धांत ◆ चौहान वंश राजस्थान के सबसे प्रमुख राजपूत वंशों में से एक है। इनका मूल क्षेत्र सपादलक्ष (जांगलदेश व शाकं भरी/सांभर के आसपास) माना जाता है, और प्रारंभिक राजधानी अहिछत्रपुर (नागौर) थी। चौहान काल की विस्तृत जानकारी हमें बिजौलिया शिलालेख (1170 ई., भीलवाड़ा) से मिलती है।
सिद्धांत (Theory) आधार/समर्थक (Source/Scholar) मुख्य बिंदु (Key Point)
सूर्यवंशी मूल हम्मीर महाकाव्य (नयनचंद्र सूरि), हम्मीर रासो (जोधराज), पृथ्वीराज चौहानों को सूर्यवंशी क्षत्रियों का वंशज बताया विजय (जयानक); समर्थक — डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा गया
चंद्रवंशी मूल हांसी अभिलेख (हरियाणा), अचलेश्वर (आबू) अभिलेख चौहानों को चंद्रवंश से जोड़ा गया
ब्राह्मण मूल बिजौलिया शिलालेख — "विप्र श्री वत्स गोत्र"; समर्थक — डॉ. दशरथ चौहान मूलतः ब्राह्मण गोत्र से थे, बाद में क्षत्रिय शर्मा, कवि जन (कायमखानी रासो) बने
अग्निकु ल सिद्धांत स्रोत — पृथ्वीराज रासो (चंद बरदाई); समर्थक — सूर्यमल्ल मिश्रण, माउंट आबू में वशिष्ठ ऋषि के यज्ञ-कुं ड से
मुहणोत नैणसी, जोधराज परमार, चालुक्य व प्रतिहार के बाद चौथे
योद्धा "चौहान" की उत्पत्ति — पौराणिक मत,
ऐतिहासिक आधार नहींमिश्रित वंश सिद्धांत शक्तिकु मार अभिलेख — मेवाड़ के अल्लट का हूण राजकु मारी हरिया देवी राजपूतों की मिश्रित (देशी-विदेशी) नस्ल का से विवाह; समर्थक — देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय, डॉ. दशरथ शर्मा प्रमाण
2. शाकं भरी-अजमेर के चौहान — प्रारंभिक शासक
👑 वासुदेव चौहान (लगभग 551 ई.) चौहान वंश के प्रथम व वास्तविक संस्थापक
◆ नागौर (अहिच्छत्रपुर) में 551 ई. में राज्य की स्थापना की, फिर राजधानी सांभर स्थानांतरित की; विदेशी आक्रमणकारियों के विरुद्ध लंबे संघर्ष में विजय पाई — जनता ने इन्हें भगवान विष्णु का अवतार माना। ◆ शाकं भरी देवी को कु लदेवी माना; सांभर की खारे पानी की झील का निर्माण करवाया (बिजौलिया शिलालेख में इसका उल्लेख मिलता है)। इतिहासकार डॉ. दशरथ शर्मा वासुदेव को राजस्थान का प्रथम राजपूत शासक मानते हैं।
◆ चौहानों के मूल स्थान के बारे में मान्यता है कि वे सपादलक्ष और जांगल प्रदेश के आसपास रहते थे। एक विवरण के अनुसार चन्दराज की पत्नी रुद्राणी यौगिक क्रियाओं में निपुण थीं और पुष्कर झील में प्रतिदिन एक हज़ार दीपक जलाकर महादेव की उपासना करती थीं। ◆ वाक्पतिराज ने प्रतिहारों को हराकर अपनी शक्ति का परिचय दिया। विग्रहराज द्वितीय एक अन्य शक्तिशाली शासक था, जिसकी विजयों का उल्लेख हर्षनाथ लेख (973 ई.) में है; उसने गुजरात के चालुक्य शासक मूलराज को हराया। उसके बाद दुर्लभराज और गोविन्द तृतीय शासक बने — 'पृथ्वीराज विजय' में गोविन्द तृतीय की उपाधि 'वैरीघट्ट' (शत्रुओं का संहार करने वाला) मिलती है, और फरिश्ता के अनुसार उसने गज़नी के शासक को मारवाड़ में आगे बढ़ने से रोका था।
वासुदेव से सिंहराज तक — प्रारंभिक शासकों की सूची
शासक (Ruler) काल (Period) प्रमुख तथ्य (Key Fact)
समंतराज 684-709 ई. वासुदेव के लगभग 125 वर्ष बाद पुनः चौहान सत्ता मजबूत की; टॉड ने इन्हें "माणिक्य राय" कहा; भाई दुलराज अरबों से युद्ध में वीरगति
नरदेव/पूर्णतल्ल 709 ई. बिजौलिया शिलालेख में "नृप" नाम से उल्लेख
चंद्रराज व गोपेंद्रराज (विग्रहराज — गोपेंद्रराज ने बेग वारिश को हराया — अरब विस्तार को रोका; प्रतिहार-चौहान प्रथम के पुत्र) गठबंधन की शुरुआत
दुर्लभराज प्रथम 784-809 ई. उपाधि "गौड़ रसास्वाद"; गंगासागर तक विजय अभियान; प्रतिहार वत्सराज का सामंत
गूवक प्रथम/गोविंदराज 809-836 ई. हर्षनाथ मंदिर (सीकर) निर्माण; प्रतिहार नागभट्ट द्वितीय से "प्रसिद्धवीर" उपाधि; सी.वी. वैद्य के अनुसार स्वतंत्र शासक
चंद्रराज द्वितीय/शशिनृप 836-863 ई. दिल्ली के तंवर शासक रुद्र को हराया व मारा (हर्ष अभिलेख); रानी रुद्राणी ने पुष्कर में 1000 शिवलिंग स्थापित किए
गूवक द्वितीय 863-890 ई. स्वयंवर आयोजित कर बहन कलावती का विवाह कन्नौज के भोज प्रथम से किया
वाक्पतिराज प्रथम — "महाराज" उपाधि धारण करने वाले प्रथम चौहान शासक; पृथ्वीराज विजय अनुसार 188 युद्धों में विजयी; पुष्कर में शिव मंदिर बनवाया
सिंहराज — अजमेर नगर का विस्तार किया; पुत्र अर्णोराज को राजगद्दी सौंपकर पुष्कर में तपस्या हेतु चले गए
3. अजयराज द्वितीय से विग्रहराज चतुर्थ तक — अजमेर व दिल्ली विजय, चौहानों का स्वर्णकाल
👑 अजयराज द्वितीय / अजयपाल चक्री (1113-1133 ई.) अजमेर नगर के संस्थापक
◆ 1113 ई. में अजयमेरु (अजमेर) नगर व अजमेर के तारागढ़ किले की स्थापना की — अखबार-उल-अखबार के अनुसार यह भारत में किसी पहाड़ी पर बना प्रथम दुर्ग था; सांभर से अजमेर राजधानी स्थानांतरित की। ◆ मालवा सम्राट सुल्हण/नरवर्मन के सेनापति को युद्ध में हराया व बंदी बनाया; अजमेर में एक विशाल टकसाल स्थापित की, जहां से चांदी-तांबे के सिक्के जारी होते थे — ये सिक्के मथुरा तक प्रचलित थे। ◆ सिक्कों पर एक तरफ राजा की अश्वारोही छवि व दूसरी तरफ रानी सोमलदेवी का नाम अंकित होता था — रानी के अपने अलग सिक्के भी थे, जिन्हें "अजयप्रियद्रम" कहा जाता था।
◆ अजयराज शैव मत का अनुयायी होते हुए भी धर्म-सहिष्णु शासक था — उसने जैन और वैष्णव धर्म के लोगों का सम्मान किया, अजमेर नगर में जैनों को मंदिर बनाने की अनुमति दी और पार्श्वनाथ मंदिर के लिए स्वर्ण-कलश भेंट किया।
👑 अर्णोराज/आनाजी (1133-1155 ई.) तुर्क आक्रमणकारियों के विजेता
◆ तुर्क आक्रमणकारियों व मालवा के नरवर्मन को पराजित किया; 1137 ई. में तुर्कों पर विजय की स्मृति में आनासागर झील व पुष्कर में वराह मंदिर बनवाया। ◆ चालुक्य नरेश जयसिंह सिद्धराज की पुत्री कांचन देवी से विवाह हुआ, परंतु गुजरात के चालुक्य शासक कु मारपाल से माउंट आबू के निकट युद्ध में पराजित हुए।
◆ अजमेर में खरतरगच्छ अनुयायियों को भूमिदान दिया; दरबारी विद्वान देवबोध व धर्मघोष थे। 1155 ई. में अपने ही पुत्र जग्गदेव द्वारा हत्या कर दी गई — इसीलिए जग्गदेव को "पितृहंता" कहा गया।
👑 विग्रहराज चतुर्थ / बीसलदेव (1158-1163 ई.) "कवि बांधव" — चौहानों का स्वर्णकाल, दिल्ली विजेता
◆ 1158 ई. में भाई जगदेव को हराकर अजमेर पर अधिकार किया; दिल्ली के तंवर शासक को हराकर दिल्ली को चौहान साम्राज्य में मिलाया — दिल्ली जीतने वाले पहले चौहान शासक; कु मारपाल के सामंत सज्जन को हराकर चित्तौड़गढ़ भी अधीन किया। ◆ विद्वानों के आश्रयदाता होने के कारण जयानक कृ त "पृथ्वीराज विजय" में इन्हें "कविबांधव" कहा गया; स्वयं संस्कृत में "हरिके ली नाटक" (शिव-अर्जुन संवाद पर आधारित) की रचना की; अन्य साहित्यिक कृ तियां — सोमदेव कृ त "ललित विग्रहराज", नरपति नाल्ह कृ त "बीसलदेव रासो"। ◆ दिल्ली में 1163 ई. में शिवालिक स्तंभ का निर्माण करवाया; पशु-वध पर प्रतिबंध लगाया; टोंक में बीसलपुर नगर व बीसलपुर बांध का निर्माण (वर्तमान बीसलपुर बांध इसी स्थान पर); अजमेर में सरस्वती कं ठाभरण पाठशाला स्थापित की, जिसे 1198 ई. में कु तुबुद्दीन ऐबक ने तुड़वाकर "अढ़ाई दिन का झोंपड़ा" मस्जिद बनवाया। ◆ डॉ. दशरथ शर्मा ने इनके शासनकाल को "चौहान वंश का स्वर्णकाल" कहा; विद्वान किल्हॉर्न ने इनकी तुलना कालिदास व भवभूति से की।
◆ विग्रहराज चतुर्थ ने गज़नी के खुशरूशाह को भी हराया। अजमेर की संस्कृत पाठशाला की दीवारों पर उसने अपने 'हरके लि' नाटक की पंक्तियाँ खुदवाई थीं। 'पृथ्वीराज विजय' के लेखक के अनुसार विग्रहराज की मृत्यु के बाद 'कविबांधव' की उपाधि ही निरर्थक हो गई, क्योंकि इसे धारण करने की क्षमता किसी में नहीं रही। सोमदेव उसे वीरों के साथ-साथ विद्वानों में भी अग्रणी मानता था, और विद्वान किलहॉर्न (Kielhorn) के अनुसार वह उन हिन्दू शासकों में था जो कालिदास और भवभूति से होड़ कर सकते थे। डॉ. दशरथ शर्मा के अनुसार वह सेनाध्यक्ष, विजेता, साहित्य-संरक्षक, अच्छा कवि और सूझ-बूझ वाला निर्माता था।
विग्रहराज चतुर्थ के बाद के लघु-शासक
शासक (Ruler) काल (Period) प्रमुख तथ्य
अमरगांगेय/अपरगांगेय 1164-1165 ई. विग्रहराज चतुर्थ के पुत्र, अल्पायु; पुत्र पृथ्वीराज द्वितीय द्वारा अपदस्थ
पृथ्वीराज द्वितीय 1165-1168 ई. जनता में लोकप्रिय, "राम का अवतार" कहा गया; अल्प शासनकाल, निःसंतान
सोमेश्वर — उपाधि "प्रताप लंके श्वर"; अजमेर में कल्पवृक्ष रोपित किया; पृथ्वीराज तृतीय के पिता
4. पृथ्वीराज चौहान तृतीय — तराइन के युद्ध एवं चौहान वंश का पतन
👑 पृथ्वीराज चौहान तृतीय (1177-1192 ई.) "राय पिथौरा", "दलपुंगल/विश्वविजेता" — चौहान वंश के अंतिम प्रतापी शासक
◆ जन्म 1166 ई. (विक्रम संवत् 1223) अन्हिलपाटन (गुजरात) में; पिता सोमेश्वर, माता कर्पूरी देवी (अनंगपाल तंवर की पुत्री); मात्र 11 वर्ष की आयु में शासक बने, प्रारंभ में मां कर्पूरी देवी व मंत्री कदंबवास/कै मास ने शासन संभाला।
◆ अजमेर व दिल्ली दोनों से शासन करने वाले चौहान वंश के अंतिम प्रतापी शासक; उपाधियां "राय पिथौरा" व "दलपुंगल" (विश्व विजेता)। सैन्य सेनापति भुवनमल। ◆ 1182 ई. में भंडानक विद्रोह (भरतपुर-मथुरा क्षेत्र) का दमन किया; महोबा के युद्ध (1182 ई.) में चंदेल शासक परमार्दिदेव को हराया — सेनापति आल्हा व उदल इसी युद्ध में वीरगति पाए, विजय के बाद पंजुनराय को महोबा का उत्तराधिकारी बनाया। ◆ 1184 ई. में गुजरात के चालुक्य शासक भीमदेव द्वितीय के प्रधानमंत्री जगदेव प्रतिहार से नागौर का युद्ध हुआ, जिसके बाद संधि से चालुक्यों से लंबी शत्रुता समाप्त हुई। ◆ तराइन का प्रथम युद्ध (1191 ई., करनाल-हरियाणा) में मोहम्मद गौरी को घायल कर पराजित किया — गौरी घायल होकर भाग निकला; पृथ्वीराज द्वारा गौरी का पीछा न करना इतिहासकारों की दृष्टि में एक बड़ी राजनीतिक भूल मानी जाती है। ◆ तराइन का द्वितीय युद्ध (1192 ई.) में मोहम्मद गौरी से पराजित हुए — कन्नौज के जयचंद गहड़वाल ने सहायता नहीं दी (संयोगिता प्रकरण के कारण वैमनस्य); युद्ध से पहले हसन निजामी कृ त "ताजुल मआसिर" के अनुसार गौरी ने संधि-प्रस्ताव भेजा था, जिसे अस्वीकार किया गया। युद्ध के बाद गौरी का अजमेर व दिल्ली पर अधिकार हो गया। ◆ दरबारी कवि चंदबरदाई (मित्र भी) रचित "पृथ्वीराज रासो" में वीरता का विस्तृत वर्णन है; अन्य दरबारी कवि — जयानक, विद्यापति गौड़, विश्वरूप, पृथ्वीभट्ट, वागीश्वर जनार्दन। ◆ कन्नौज के जयचंद गहड़वाल की पुत्री संयोगिता से गंधर्व विवाह हुआ — स्वयंवर में आमंत्रित न किए जाने पर पृथ्वीराज ने संयोगिता का हरण किया, जिससे जयचंद-पृथ्वीराज वैमनस्य और गहरा हुआ। ◆ दिल्ली में अनंगपाल तंवर द्वारा निर्मित लालकोट किले को जीतकर इन्होंने इसका नाम "रायपिथौरा किला" रखा — इसे "दिल्ली का पहला शहर" कहा जाता है। दिल्ली व अजमेर पर प्रशासनिक नियंत्रण खोने से उत्तर भारत में मुस्लिम शासन का मार्ग प्रशस्त हुआ।
संयोगिता-प्रसंग एवं उसकी ऐतिहासिकता ◆ कथा: कन्नौज के गहड़वाल शासक जयचंद ने राजसूय यज्ञ किया और अपनी पुत्री संयोगिता का स्वयंवर रखा, जिसमें पृथ्वीराज को नहीं बुलाया गया; उसे अपमानित करने के लिए स्वयंवर-स्थल के बाहर द्वारपाल के रूप में पृथ्वीराज की मूर्ति रख दी गई। संयोगिता ने वरमाला उसी मूर्ति के गले में डाल दी; उसी समय पहुँचे पृथ्वीराज संयोगिता को अजमेर ले आए और वहाँ विवाह किया — इससे जयचंद और पृथ्वीराज की शत्रुता और बढ़ गई। ◆ शत्रुता के वास्तविक कारण: दिल्ली को लेकर जयचंद का चौहानों से पुराना वैमनस्य था, और पृथ्वीराज भी अपनी दिग्विजय में कन्नौज को शामिल करना चाहता था — यानी दोनों की महत्वाकांक्षा ही वैमनस्य का कारण बनी; 'पृथ्वीराज रासो' इसका कारण संयोगिता को बताता है। ◆ ऐतिहासिकता पर मतभेद: डॉ. ओझा इसे कपोल-कल्पना मानते हैं, क्योंकि प्रबंध कोष, हम्मीर महाकाव्य, पृथ्वीराज प्रबंध और प्रबंध चिंतामणि जैसे समकालीन ग्रंथों तथा समकालीन फारसी तवारीखों में इसका उल्लेख नहीं है; डॉ. रोमिला थापर और डॉ. आर.एस. त्रिपाठी भी इसे सही नहीं मानते। पर अबुल फजल ने इसका वर्णन किया है, और डॉ. दशरथ शर्मा, सी.वी. वैद्य व डॉ. गोपीनाथ शर्मा इसे स्वीकार करते हैं — दशरथ शर्मा के अनुसार हम्मीर महाकाव्य व रंभामंजरी में कई गलतियाँ हैं, इसलिए उनमें वर्णन न होने से पूरी घटना को काल्पनिक मानना उचित नहीं। ◆ तराइन के द्वितीय युद्ध (1192 ई.) में हार का एक मुख्य कारण राजपूतों का परम्परागत (पुराना) सैन्य संगठन माना जाता है। पृथ्वीराज ने अधीन (आश्रित) शासक बनने के बजाय आत्म-सम्मान के साथ मृत्यु को चुना। तराइन के दूसरे युद्ध के अलावा वह अपने सभी युद्धों में विजेता रहा। इस युद्ध से चौहान राज्य का पतन हुआ और भारत में तुर्की शासन की नींव पड़ी — पर चौहानों की शक्ति समाप्त नहीं हुई: अगली लगभग एक शताब्दी तक चौहानों की शाखाएँ रणथंभौर, जालौर, हाड़ौती, नाडौल, चंद्रावती और आबू में शासन करती रहीं और दिल्ली सुल्तानों का मुकाबला करती रहीं।
"चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण। ता ऊपर सुल्तान है, मत चूके चौहान।" — चंदबरदाई की प्रसिद्ध उक्ति — पृथ्वीराज रासो
ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती का आगमन: सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती मोहम्मद गौरी के साथ, पृथ्वीराज चौहान तृतीय के शासनकाल में ही राजस्थान पहुंचे — आगे चलकर अजमेर उनकी दरगाह के कारण भारत के सबसे बड़े सूफी तीर्थ-स्थलों में गिना जाने लगा।
5. नाडौल के चौहान
👑 राव लक्ष्मण/राव लाखन (लगभग 950 ई. के आसपास) नाडौल शाखा के संस्थापक
◆ शाकं भरी नरेश वाक्पतिराज प्रथम के तीन पुत्रों में से एक; बड़े भाई सिंहराज (944 ई.) सांभर के शासक बने, जबकि लक्ष्मण नाडौल पहुंचकर अपने बल-पौरुष से स्वतंत्र राज्य स्थापित किया। ◆ नाडौल व मारवाड़ क्षेत्र में आतंक मचाने वाले मेवातियों का दमन किया; कु लदेवी आशापुरा माता की कृ पा से विजय व राज्य- स्थापना की मान्यता है; नाडौल पहाड़ी पर सुदृढ़ दुर्ग व भव्य महल बनवाया तथा मुख्य द्वार पर आशापुरा माता मंदिर स्थापित किया। ◆ नाडौल में प्रसिद्ध सूरजपोल का निर्माण भी करवाया; एक प्राचीन अभिलेख के अनुसार राव लाखन इतने शक्तिशाली थे कि गुजरात की राजधानी पाटन से चुंगी वसूलते थे तथा मेवाड़ शासक इन्हें कर देते थे। नीलकं ठ महादेव मंदिर अभिलेख (वि.सं. 1025) में इनके द्वारा लक्ष्मण-स्वामी विष्णु मंदिर बनवाने का उल्लेख है। सुंधा पर्वत अभिलेख में इन्हें "शाकं भरीरिद्ध" व "शाकं भरीमाणिक्य" कहा गया है।
नाडौल शाखा के शासकों की सूची
शासक (Ruler) काल (Period) प्रमुख तथ्य
सोभित लगभग 982-990 ई. मालवा के धारा नगर पर विजय; सेवाड़ी ताम्रपत्र अभिलेख (वि.सं. 1076) में उल्लेख
बलराज लगभग 990-996 ई. परमार शासक मुंज (974-995 ई.) की सेना को हराया
विग्रहपाल लगभग 996 ई. अल्प शासनकाल
महेंद्र लगभग 994-1005 ई. बहन का विवाह चालुक्य दुर्लभराज से करवाया — "द्वयाश्रय काव्य" में उल्लेख
अश्वपाल लगभग 1005-1015 ई. अश्वालेश्वर शिव मंदिर बनवाया
अहिल व अन्हिल लगभग 1015-1055 ई. अन्हिल ने महमूद गजनवी के विरुद्ध युद्ध किया; नाडौल शाखा के सबसे शक्तिशाली शासक माने जाते हैं
बालप्रसाद लगभग 1055-1070 ई. नाडौल शाखा पर सबसे लंबे समय तक शासन किया
जेंद्रराज/जेंदुराज लगभग 1070-1110 ई. जेंद्रराजेश्वर मंदिर (नाडौल) बनवाया
पृथ्वीपाल लगभग 1110-1120 ई. पृथ्वीपालेश्वर मंदिर बनवाया
जोजलदेव लगभग 1120-1140 ई. धार्मिक सहिष्णुता के आदेश जारी किए
अशराज लगभग 1140-1160 ई. चालुक्य सिद्धराज जयसिंह के अधीन सामंत बने
रायपाल लगभग 1160-1180 ई. नाडौल पर पुनः अधिकार किया
अल्हणदेव लगभग 1140-1163 ई. पशु-वध निषेध आदेश जारी किया; पुत्र कीर्तिपाल ने जालौर शाखा स्थापित की
के ल्हणदेव लगभग 1163-1178 ई. 1178 ई. में कासहरदा (क्यासरा) में मोहम्मद गौरी को हराया — विजय-स्मृति में सोमनाथ को स्वर्ण द्वार अर्पित किया
जयसिंह लगभग 1178-1197 ई. कु तुबुद्दीन ऐबक से पराजित — 1197 ई. में नाडौल शाखा का अंत
6. जालौर के सोनगरा चौहान ◆ जालौर का प्राचीन नाम "जाबालिपुर" व दुर्ग का नाम "सुवर्णगिरि" था, जो अपभ्रंश में "सोनगढ़" कहलाया — इसी पर्वत के नाम पर चौहानों की यह शाखा "सोनगरा चौहान" कहलाई। प्रारंभ में जाबालिपुर पर प्रतिहारों का शासन था; प्रतिहारों के कन्नौज चले जाने के बाद परमारों से छीनकर 1181 ई. में कीर्तिपाल चौहान ने यहां चौहान वंश की स्थापना की।
◆ जालौर का महत्व: दिल्ली से गुजरात और मालवा जाने वाले मार्ग पर स्थित होने के कारण जालौर पर अधिकार करना दिल्ली के हर शासक के लिए ज़रूरी था। दिल्ली सल्तनत काल (1206-1526 ई.) में जालौर पर चौहानों का अधिकार था। इसी सुवर्णगिरि (सोनगढ़) पर्वत के नाम से चौहानों की यह शाखा 'सोनगरा' कहलाई।
👑 कीर्तिपाल चौहान (1181 ई. (वि.सं. 1238)) जालौर (सोनगरा) शाखा के संस्थापक
◆ नाडौल शासक अल्हणदेव के सबसे छोटे पुत्र, माता अणलदेवी; वि.सं. 1218 में अल्हणदेव से नाडोलाई की 12 गांवों की जागीर मिली। ◆ मेवाड़ शासक समंतसिंह को हराकर मेवाड़ पर अधिकार किया; परमार शासक कुं तलपाल को हराकर जालौर व सिवाना जीता तथा वि.सं. 1238 में जालौर (सोनगिरि) राज्य की स्थापना की। ◆ मोहम्मद गौरी को भी युद्ध में पराजित किया; सूर्य, शिव व अग्नि के उपासक थे तथा जैन धर्म के भी संरक्षक थे। मुहणोत नैणसी ने इन्हें "कीतू एक महान राजा" कहा।
जालौर शाखा के अन्य प्रमुख शासक
शासक (Ruler) काल (Period) प्रमुख तथ्य
समरसिंह — कीर्तिपाल के पुत्र व उत्तराधिकारी
उदयसिंह — सुल्तान इल्तुतमिश से संधि; अरामशाह व इल्तुतमिश दोनों को हराया; सिंध के राजा को भी पराजित किया — जालौर के चौहान शासकों में सबसे शक्तिशाली माने जाते हैं
चाचिगदेव 1257-1282 ई. उपाधियां महाराजाधिराज व महामंडलेश्वर; नासिरुद्दीन महमूद व बलबन के समय कोई आक्रमण नहीं झेला; ब्राह्मणों को कर-मुक्त किया
समंतसिंह — पुत्र कान्हड़देव को प्रशासन में सहभागी बनाया
👑 कान्हड़देव चौहान (1305-1311 ई.) सोनगरा चौहान वंश के अंतिम व सबसे प्रतापी शासक
◆ जानकारी पद्मनाभ रचित "कान्हड़दे प्रबंध" से मिलती है; समकालीन दिल्ली सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी (1296-1316) ने गुजरात अभियान हेतु जालौर से मार्ग मांगा, जिसे कान्हड़देव ने अस्वीकार कर दिया। ◆ 1305 ई. में अलाउद्दीन ने आइन-उल-मुल्क मुल्तानी के नेतृत्व में सेना भेजी, जिससे समझौता होकर पुत्र वीरमदेव को दिल्ली दरबार में नियुक्त किया गया — दरबार में वीरमदेव को देख अलाउद्दीन की पुत्री शहजादी फिरोजा ने विवाह प्रस्ताव भेजा, जिसे वीरमदेव ने ठुकरा दिया। ◆ क्रोधित अलाउद्दीन ने सेना भेजी, जिसने रास्ते में 1308 ई. में सिवाना दुर्ग (बालोतरा) पर अधिकार कर उसका नाम "खैराबाद" रखा — सिवाना के रक्षक सातलदेव व सोम वीरगति को प्राप्त हुए। ◆ 1311 ई. में अलाउद्दीन ने स्वयं जालौर दुर्ग पर आक्रमण किया; अंतिम भीषण युद्ध में कान्हड़देव व पुत्र वीरमदेव दोनों वीरगति को प्राप्त हुए — अलाउद्दीन ने जालौर पर अधिकार कर इसका नाम "जलालाबाद" रखा। इस युद्ध की जानकारी "कान्हड़दे प्रबंध" व "वीरमदेव सोनगरा री वात" से मिलती है।
◆ सिवाना दुर्ग के पतन का कारण भावले नामक एक राजद्रोही सैनिक का विश्वासघात था; सिवाना जीतकर अलाउद्दीन ने कमालुद्दीन गुर्ग को वहाँ का प्रतिनिधि बनाया। 1311 ई. में जालौर के घेरे में भी सफलता न मिलने पर अंत में कान्हड़देव के दहिया सरदार बीका के विश्वासघात से दुर्ग पर अलाउद्दीन का अधिकार हुआ; कान्हड़देव लड़ते हुए मारे गए और किले की महिलाओं ने जौहर किया। सिवाना के रक्षक सातलदेव ने कई स्थानों पर तुर्कों को छकाया था, जिससे उसकी वीरता की धाक पूरे राजस्थान में जम गई थी।
7. रणथंभौर के चौहान — हम्मीर देव व राजस्थान का प्रथम जल जौहर ◆ गोविंदराज चौहान (पृथ्वीराज तृतीय के पुत्र) को मोहम्मद गौरी की अधीनता स्वीकार करने के बाद, पृथ्वीराज के चाचा हरिराज ने अजमेर से निष्कासित कर दिया — गोविंदराज रणथंभौर पहुंचकर 1194 ई. में स्वतंत्र राज्य स्थापित किया, जिसे कु तुबुद्दीन ऐबक ने भी मान्यता दी। इसके बाद वाल्हणदेव, प्रह्लादनदेव, वीरनारायण (इल्तुतमिश द्वारा धोखे से विष देकर हत्या), वाग्भट्ट (मिन्हाज-उस-सिराज द्वारा "भारत का सबसे शक्तिशाली राजा" कहा गया) व जैत्रसिंह जैसे शासकों ने रणथंभौर की सत्ता संभाली।
👑 हम्मीर देव चौहान (1282-1301 ई.) रणथंभौर के चौहानों में सबसे प्रतापी व अंतिम शासक
◆ पिता जैत्रसिंह, माता हीरादेवी, पत्नी रंगदेवी, पुत्री देवलदे; अपने हठ के लिए प्रसिद्ध — प्रसिद्ध उक्ति "सिंह सुवन सत्पुरुष वचन, कदली फलत एक बार। तिरिया तेल, हम्मीर हठ, चढ़े न दूजी बार।" ◆ कु ल 17 युद्ध लड़े — 16 में विजयी रहे, केवल अंतिम युद्ध में वीरगति पाई; मालवा के परमार शासक अर्जुन को हराया तथा मंदलगढ़, उज्जैन, आबू, चित्तौड़गढ़, पुष्कर सहित कई क्षेत्रों से कर वसूला। "कोटियज्ञ" (अश्वमेध-सदृश यज्ञ) का आयोजन किया। ◆ शरणागत-रक्षा नीति — 1298 ई. में अलाउद्दीन खिलजी के विश्वासघाती विद्रोहियों मोहम्मदशाह, कहब्रू व कमीजी को शरण दी और कहा — "शरणागत की रक्षा करना क्षत्रिय का धर्म है" — यही अलाउद्दीन के आक्रमण का मुख्य कारण बना। ◆ जलालुद्दीन खिलजी के दो आक्रमण (1290, 1292 ई.) विफल रहे। 1299 ई. में अलाउद्दीन का सेनापति उलूग खां बनास नदी तट पर पराजित हुआ — सेनापति भीमसिंह ने उलूग खां के नगाड़े व हाथी छीने, परंतु प्रधानमंत्री धर्मसिंह की गलत सलाह से भीमसिंह वीरगति को प्राप्त हुए।
◆ 1300-1301 ई. में अलाउद्दीन ने स्वयं आक्रमण किया — विश्वासघाती सेनापति रतिपाल व रणमल को लालच देकर अपनी ओर मिला लिया, जिससे दुर्ग की सुरक्षा कमजोर पड़ी; लंबी घेराबंदी में अनाज समाप्त हुआ। ◆ 12 जुलाई 1301 ई. — मोहम्मदशाह (शरणागत) ने पहले अपने परिवार का बलिदान दिया, फिर रानी रंगदेवी, पुत्री देवलदे व अन्य महिलाओं ने जौहर किया — यह राजस्थान का प्रथम जल जौहर व साका माना जाता है। हम्मीर ने के सरिया वस्त्र धारण कर अंतिम युद्ध लड़ा और बंदी बनने से पूर्व स्वयं अपनी तलवार से अपना सिर काट लिया। ◆ अलाउद्दीन ने विश्वासघाती रतिपाल की खाल उधड़वाकर हत्या करवाई तथा रणमल व साथियों को तलवार से मरवाया — विश्वासघात के बावजूद गद्दारों को क्षमा नहीं किया गया।
◆ हम्मीर ने राज्यारोहण (1282 ई.) के बाद दिग्विजय की नीति अपनाई और आबू, काठियावाड़, पुष्कर, चम्पा व धार जैसे राज्यों को अधीनता स्वीकारने पर मजबूर किया तथा मेवाड़ के शासक समरसिंह को हराया। रणथंभौर शाखा में गोविंदराज के बाद क्रमशः वाल्हण, प्रह्लादन और वीरनारायण शासक बने — वीरनारायण इल्तुतमिश से संघर्ष में मारा गया; वागभट्ट ने दिल्ली के तुर्क अधिकारियों से पैतृक राज्य बचाया और उसके पुत्र जैत्रसिंह ने नासिरुद्दीन की सेना को रणथंभौर नहीं जीतने दिया, पर उसे कर देना पड़ा। ◆ हम्मीर के साथ ही रणथंभौर के चौहानों का राज्य समाप्त हो गया।
"ऐसे 10 दुर्गों को मैं मुसलमान के एक बाल के बराबर महत्व नहीं देता।" — जलालुद्दीन खिलजी — रणथंभौर पर असफल आक्रमण के बाद (हम्मीर देव की वीरता के संदर्भ में)
साहित्यिक स्रोत: रणथंभौर के चौहान शासकों की जानकारी नयनचंद्र सूरि रचित "हम्मीर महाकाव्य", जोधराज रचित "हम्मीर रासो", चंद्रशेखर रचित "हम्मीर हठ" तथा अमीर खुसरो व जियाउद्दीन बर्नी के फारसी विवरणों से मिलती है।
8. सिरोही के देवड़ा चौहान
वर्ष/शासक (Year/Ruler) घटना (Event)
1311 ई. — राव लुंबा चौहानों की देवड़ा शाखा द्वारा सिरोही राज्य की स्थापना; प्रारंभिक राजधानी चंद्रावती
1425 ई. — सहसमल सिरोही नगर की स्थापना कर इसे राजधानी बनाया
1823 ई. — शिवसिंह ईस्ट इंडिया कं पनी से संधि — राज्य की सुरक्षा का दायित्व अंग्रेजों को सौंपा
26 जनवरी 1950 सिरोही राज्य का राजस्थान में विलय
◆ सिरोही का नाम "सिरवई" नामक स्थान से प्रेरित होकर रखा गया माना जाता है। सिरोही की तलवारें अपनी गुणवत्ता व धार के लिए देशभर में प्रसिद्ध रहीं — "सिरोही तलवार" आज भी एक प्रसिद्ध शिल्प-पहचान है। चंद्रावती आज एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक/पुरातात्विक स्थल है।
9. हाड़ौती के हाड़ा चौहान — बूंदी, कोटा एवं झालावाड़
◆ राजस्थान के दक्षिण-पूर्वी भाग (कोटा, बूंदी, बारां व झालावाड़) को "हाड़ौती" कहा जाता है — यह क्षेत्र प्रारंभ में मीणाओं के अधीन था।
◆ प्राचीन काल में हाड़ौती क्षेत्र पर मीणाओं का अधिकार था; माना जाता है कि बूंदा मीणा के नाम पर ही 'बूंदी' का नाम पड़ा। कुम्भाकालीन राणपुर (रणकपुर) के लेख में बूंदी का नाम 'वृन्दावती' मिलता है।
👑 देवसिंह हाड़ा (देवजी) (1241 ई.) बूंदी में हाड़ा चौहान शासन के संस्थापक
◆ मेवाड़ के महाराणा की सहायता से मीणा सरदार जैता मीणा को हराकर बूंदी पर अधिकार किया — यहीं से बूंदी में हाड़ा वंश के शासन का प्रारंभ हुआ। 1273 ई. में पुत्र समरसिंह ने कोटिया भील को हराकर कोटा क्षेत्र भी प्राप्त किया।
बूंदी के हाड़ा चौहान — प्रमुख शासक
शासक (Ruler) काल (Period) प्रमुख कार्य
बरसिंह 1296-1323 ई. तारागढ़ किला (बूंदी, ऊं चाई लगभग 1426 फीट) निर्माण; मालवा के महमूद खिलजी के आक्रमण झेले
राव सुर्जन 1554-1585 ई. रणथंभौर के किलेदार नियुक्त; 1569 ई. में अकबर द्वारा रणथंभौर विजय के बदले काशी क्षेत्र में जागीर प्राप्त की
राव भोज 1585-1607 ई. अकबर के दरबार में सेवा; बादल महल, फू ल महल, फू ल सागर तालाब का निर्माण
राव रतन 1607-1631 ई. जहांगीर के प्रिय सेनापति; रतन दौलतखाना, रतन विलास, खरबूजा महल का निर्माण
शत्रुशाल 1631-1658 ई. 52 युद्धों में भाग लिया; सामूगढ़ के युद्ध (1658 ई.) में वीरगति; दरबारी कवि भूषण
बुद्ध सिंह 1695-1729 ई. औरंगजेब की मृत्यु बाद जाजऊ के युद्ध में मुअज्जम (बहादुरशाह प्रथम) का साथ दिया; बदले में "महाराव राणा" उपाधि प्राप्त की
उम्मेद सिंह प्रथम 1748-1770 ई. जयपुर-कोटा-मराठा राजनीति में संतुलन बनाकर स्वतंत्र शासन पुनर्स्थापित किया; चित्रशाला महल का निर्माण — बूंदी चित्रकला शैली को पहचान दी; प्रसिद्ध इराकी घोड़ा "हुंजा" रखते थे
राव रामसिंह 1804-1889 ई. दीर्घकालीन शासन — बूंदी में सांस्कृ तिक पुनर्जागरण का काल; लगभग 40 संस्कृत पाठशालाओं के कारण बूंदी "छोटी काशी" कहलाई; 1857 के विद्रोह में अंग्रेजों का समर्थन नहीं किया
◆ बूंदी की प्रसिद्ध चौरासी खंभों की छतरी शत्रुसाल (छत्रसाल) हाड़ा का स्मारक है, जो 1658 ई. में सामूगढ़ के युद्ध में औरंगजेब के विरुद्ध शाही सेना की ओर से लड़ते हुए मारा गया। तारागढ़ (बूंदी) ऐतिहासिक काल में भित्ति-चित्रों के लिए प्रसिद्ध रहा है। ◆ कोटा में ऐतिहासिक काल से कृ ष्ण-भक्ति का प्रभाव रहा है, इसलिए कोटा का एक नाम 'नन्दग्राम' भी मिलता है। बूंदी-कोटा की चित्रशैलियाँ प्रसिद्ध हैं — बूंदी शैली में पशु-पक्षियों का श्रेष्ठ अंकन हुआ है, जबकि कोटा शैली शिकार के चित्रों के लिए प्रसिद्ध है।
कोटा एवं झालावाड़ रियासतों की स्थापना
वर्ष (Year) घटना (Event)
1631 ई. मुगल बादशाह शाहजहां ने कोटा को बूंदी से पृथक कर राव रतन के पुत्र माधोसिंह को कोटा का प्रथम शासक बनाया — माधोसिंह ने राज्य को 43 परगनों तक विस्तृत किया
1769-1823 ई. झाला जालिम सिंह — कोटा के फौजदार व कु शल कू टनीतिज्ञ; दिसंबर 1817 ई. में ईस्ट इंडिया कं पनी से संधि; 20 फरवरी 1818 ई. को गुप्त संधि — प्रशासनिक अधिकार झाला वंश को, शासन का अधिकार महाराव उम्मेदसिंह वंश को
अक्टूबर 1821 ई. मांगरोल का युद्ध — महाराव किशोरसिंह व झाला जालिम सिंह के बीच सत्ता-संघर्ष; अंग्रेजों ने झाला जालिम सिंह का समर्थन किया; 22 नवंबर 1821 ई. महाराणा भीमसिंह (मेवाड़) की मध्यस्थता से समझौता
1838 ई. अंग्रेजों ने झाला जालिम सिंह के पौत्र मदनसिंह को 17 परगने देकर कोटा से पृथक कर झालावाड़ को स्वतंत्र रियासत का दर्जा दिया — राजधानी झालरापाटन; 1817 ई. में टोंक के बाद अंग्रेजों द्वारा बनाई गई राजस्थान की दूसरी व अंतिम रियासत
करंट अफे यर्स — UNESCO विश्व धरोहर: गागरोन दुर्ग (झालावाड़) — जल दुर्ग, आहू व कालीसिंध नदियों के संगम पर स्थित, 13वीं शताब्दी में हाड़ा-पूर्व खींची चौहानों द्वारा निर्मित — "राजस्थान के पहाड़ी दुर्ग" श्रृंखला के अंतर्गत रणथंभौर दुर्ग सहित वर्ष 2013 में UNESCO विश्व धरोहर सूची में शामिल हुआ। झालरापाटन को इसके प्राचीन मंदिरों के कारण "मंदिरों का शहर" कहा जाता है और झालावाड़ क्षेत्र को कृषि-वैविध्य के कारण "राजस्थान का चेरापूंजी" भी कहा जाता है।
10. चौहान वंश की सांस्कृ तिक एवं साहित्यिक विरासत
A. स्थापत्य कला
स्थान
स्मारक (Monument) निर्माता (Builder) विशेषता (Significance)
(Location)अढ़ाई दिन का झोंपड़ा अजमेर मूलतः सरस्वती कं ठाभरण पाठशाला जॉन मार्शल द्वारा नामकरण; भारत की प्राचीनतम (विग्रहराज चतुर्थ); 1198 ई. में कु तुबुद्दीन मस्जिदों में से एक ऐबक ने मस्जिद में बदला
आनासागर झील अजमेर अर्णोराज, 1137 ई. तुर्क विजय की स्मृति में निर्मित
तारागढ़ किला (अजमेर) अजमेर अजयराज द्वितीय भारत में पहाड़ी पर बना प्रथम दुर्ग (अखबार-उल- अखबार के अनुसार)
तारागढ़ किला (बूंदी) बूंदी बरसिंह हाड़ा, 1354 ई. लगभग 1426 फीट ऊं चा
रणथंभौर दुर्ग सवाई माधोपुर रणथंभौर चौहान शासक UNESCO विश्व धरोहर सूची (2013)
गागरोन दुर्ग झालावाड़ खींची चौहान, 13वीं सदी जल दुर्ग; UNESCO विश्व धरोहर सूची (2013)
चित्रशाला महल बूंदी उम्मेद सिंह प्रथम बूंदी चित्रकला शैली की पहचान
B. साहित्यिक स्रोत
ग्रंथ (Work) रचयिता (Author) संबंधित विषय (Related Topic)
पृथ्वीराज रासो चंदबरदाई पृथ्वीराज तृतीय की वीरता का विस्तृत वर्णन
पृथ्वीराज विजय जयानक भट्ट अजयराज से पृथ्वीराज तृतीय तक के शासकों का वर्णन
हम्मीर महाकाव्य नयनचंद्र सूरि रणथंभौर के हम्मीर देव चौहान का वर्णन
हम्मीर रासो जोधराज हम्मीर देव चौहान की वीरगाथा
कान्हड़दे प्रबंध पद्मनाभ जालौर के कान्हड़देव व अलाउद्दीन खिलजी का युद्ध
बीसलदेव रासो नरपति नाल्ह विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) का जीवन-वर्णन
हरिके ली नाटक विग्रहराज चतुर्थ (स्वयं) शिव-अर्जुन संवाद पर आधारित संस्कृत नाटक
बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) उत्कीर्णक — लोलक चौहान वंश की उत्पत्ति व प्रारंभिक शासकों का प्रामाणिक विवरण
चौहान वंश की उपलब्धियां (Achievements) चौहान वंश की चुनौतियां (Challenges)
◆ सांभर, अजमेर व दिल्ली — तीन प्रमुख नगरों की ◆ राजपूत राज्यों में एकता का अभाव — जयचंद जैसे प्रतिद्वंद्वी स्थापना/विजय ◆ तराइन द्वितीय युद्ध की पराजय से उत्तर भारत में मुस्लिम सत्ता ◆ अढ़ाई दिन का झोंपड़ा व आनासागर जैसी स्थापत्य धरोहर का मार्ग खुला ◆ पृथ्वीराज रासो व हम्मीर महाकाव्य जैसे कालजयी साहित्य ◆ आंतरिक विश्वासघात (रतिपाल, रणमल) से रणथंभौर व जालौर ◆ रणथंभौर व जालौर के अंतिम-सांस तक प्रतिरोध — साका व का पतन जौहर की परंपरा ◆ निरंतर युद्धों से आर्थिक व प्रशासनिक संसाधन क्षीण हुए
★ अध्याय सार — महत्वपूर्ण तथ्य ★
1. वासुदेव चौहान (551 ई.) ने नागौर/सांभर में चौहान वंश की स्थापना की — इन्हें चौहान वंश का आदिपुरुष व वास्तविक संस्थापक माना जाता है। 2. बिजौलिया शिलालेख (1170 ई., भीलवाड़ा) चौहान वंश के इतिहास का सबसे प्रामाणिक स्रोत है। 3. अजयराज द्वितीय ने 1113 ई. में अजमेर नगर व तारागढ़ किले की स्थापना की — सांभर से अजमेर राजधानी स्थानांतरित हुई। 4. अर्णोराज ने 1137 ई. में आनासागर झील बनवाई; पुत्र जग्गदेव द्वारा हत्या के कारण उसे "पितृहंता" कहा गया। 5. विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) ने दिल्ली पर विजय पाई — चौहान वंश की पहली दिल्ली-विजय; इनका काल "चौहान वंश का स्वर्णकाल" कहलाता है। 6. पृथ्वीराज चौहान तृतीय ने तराइन के प्रथम युद्ध (1191 ई.) में मोहम्मद गौरी को हराया, परंतु तराइन के द्वितीय युद्ध (1192 ई.) में स्वयं पराजित हुए — इसी के साथ दिल्ली सल्तनत की नींव पड़ी। 7. नाडौल शाखा की स्थापना राव लक्ष्मण/लाखन ने की; अंतिम शासक जयसिंह 1197 ई. में कु तुबुद्दीन ऐबक से पराजित हुए। 8. जालौर की सोनगरा शाखा की स्थापना 1181 ई. में कीर्तिपाल चौहान ने की; अंतिम शासक कान्हड़देव व पुत्र वीरमदेव 1311 ई. में अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। 9. रणथंभौर शाखा की स्थापना गोविंदराज चौहान ने 1194 ई. में की; अंतिम शासक हम्मीर देव चौहान (1282-1301 ई.) के समय 12 जुलाई 1301 ई. को राजस्थान का प्रथम जल जौहर व साका हुआ।
10. सिरोही की देवड़ा चौहान शाखा की स्थापना 1311 ई. में राव लुंबा ने की — प्रारंभिक राजधानी चंद्रावती थी। 11. हाड़ौती (बूंदी) में हाड़ा चौहान शासन की स्थापना देवसिंह हाड़ा ने 1241 ई. में की; 1631 ई. में कोटा को बूंदी से पृथक कर स्वतंत्र रियासत बनाया गया। 12. झालावाड़ रियासत 1838 ई. में कोटा से पृथक होकर बनी — अंग्रेजों द्वारा 1817 ई. में टोंक के बाद बनाई गई राजस्थान की दूसरी रियासत। 13. रणथंभौर व गागरोन दुर्ग दोनों "राजस्थान के पहाड़ी दुर्ग" श्रृंखला के अंतर्गत वर्ष 2013 में UNESCO विश्व धरोहर सूची में शामिल हुए। 14. चंदबरदाई कृ त "पृथ्वीराज रासो" व नयनचंद्र सूरि कृ त "हम्मीर महाकाव्य" चौहान वंश के सबसे प्रसिद्ध साहित्यिक स्रोत हैं। 15. अग्निकु ल सिद्धांत के अनुसार चौहान चार अग्निकु ल राजपूत वंशों (परमार, चालुक्य, प्रतिहार, चौहान) में से एक हैं — यह एक पौराणिक/सांस्कृ तिक मत है, ऐतिहासिक तथ्य नहीं।
नीचे दी समय-रेखा (Timeline) इस अध्याय के सभी महत्वपूर्ण वर्षों को एक साथ जोड़ती है — रिवीजन के लिए इसे ज़रूर दोहराएं:
वर्ष (Year) घटना/Event महत्व
551 ई. वासुदेव चौहान द्वारा चौहान वंश की स्थापना (नागौर/सांभर) चौहान वंश का प्रारंभ
1113 ई. अजयराज द्वितीय द्वारा अजमेर नगर की स्थापना राजधानी सांभर से अजमेर स्थानांतरित
1137 ई. अर्णोराज द्वारा आनासागर झील निर्माण तुर्क विजय की स्मृति
1158 ई. विग्रहराज चतुर्थ द्वारा दिल्ली विजय चौहान वंश का स्वर्णकाल प्रारंभ
1170 ई. बिजौलिया शिलालेख चौहान वंश का सबसे प्रामाणिक ऐतिहासिक स्रोत
1181 ई. कीर्तिपाल चौहान द्वारा जालौर (सोनगरा) शाखा की स्थापना सोनगरा चौहान वंश का प्रारंभ
1191 ई. तराइन का प्रथम युद्ध — पृथ्वीराज तृतीय की विजय मोहम्मद गौरी पराजित
1192 ई. तराइन का द्वितीय युद्ध — पृथ्वीराज तृतीय पराजित दिल्ली सल्तनत की नींव
1194 ई. गोविंदराज द्वारा रणथंभौर शाखा की स्थापना रणथंभौर चौहान वंश का प्रारंभ
1197 ई. कु तुबुद्दीन ऐबक द्वारा नाडौल पर विजय नाडौल शाखा का अंत
1198 ई. कु तुबुद्दीन ऐबक द्वारा सरस्वती पाठशाला का मस्जिद में रूपांतरण अढ़ाई दिन का झोंपड़ा का निर्माण
1241 ई. देवसिंह हाड़ा द्वारा बूंदी पर अधिकार हाड़ौती में हाड़ा चौहान शासन का प्रारंभ
1290-1292 ई. जलालुद्दीन खिलजी के रणथंभौर पर असफल आक्रमण हम्मीर देव की सैन्य क्षमता का प्रमाण
1301 ई. रणथंभौर का पतन — राजस्थान का प्रथम जल जौहर व साका हम्मीर देव व रानी रंगदेवी का बलिदान
1308 ई. अलाउद्दीन खिलजी द्वारा सिवाना दुर्ग पर विजय सिवाना का नाम "खैराबाद" रखा गया
1311 ई. राव लुंबा द्वारा सिरोही (देवड़ा चौहान) की स्थापना सिरोही रियासत का प्रारंभ
1311 ई. अलाउद्दीन खिलजी द्वारा जालौर पर विजय — कान्हड़देव वीरगति सोनगरा चौहान वंश का अंत
1425 ई. सहसमल द्वारा सिरोही नगर की स्थापना सिरोही की नई राजधानी
1631 ई. शाहजहां द्वारा कोटा को बूंदी से पृथक करना कोटा रियासत की स्थापना (माधोसिंह)
1817-18 ई. कोटा व सिरोही की ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कं पनी से संधियां ब्रिटिश अधीनस्थ संधि व्यवस्था लागू
1838 ई. झालावाड़ रियासत की स्थापना (कोटा से पृथक) मदनसिंह झाला को स्वतंत्र रियासत
26 जनवरी सिरोही राज्य का राजस्थान में विलय राजस्थान एकीकरण की अंतिम कड़ियों में से एक 1950
2013 ई. रणथंभौर व गागरोन दुर्ग UNESCO सूची में शामिल "राजस्थान के पहाड़ी दुर्ग" को अंतरराष्ट्रीय मान्यता