📋 इस अध्याय में
- मेवाड़ रियासत का परिचय — नामकरण, प्रारंभिक राजधानी एवं गुहिल वंश की उत्पत्ति
- गुहिल वंश के प्रारंभिक शासक — गुहिलादित्य, बप्पा रावल, अल्लट
- रावल शाखा का उत्कर्ष एवं अंत — जैत्रसिंह से रानी पद्मिनी तक
- सिसोदिया वंश (राणा शाखा) की स्थापना — राणा हम्मीर से राणा लाखा तक
- महाराणा कुम्भा — मेवाड़ का स्वर्ण युग एवं स्थापत्य कला
- राणा सांगा एवं खानवा का युद्ध
- द्वितीय व तृतीय साका — राणा विक्रमादित्य से राणा उदयसिंह तक, उदयपुर की स्थापना
- महाराणा प्रताप — हल्दीघाटी एवं दिवेर के युद्ध
- अमर सिंह प्रथम से राज सिंह प्रथम तक — मुगलों से संधि एवं धार्मिक संरक्षण
- उत्तरकालीन सिसोदिया शासक, मराठा हस्तक्षेप एवं ब्रिटिश संधि
- मेवाड़ की सांस्कृतिक विरासत
कल्पना कीजिए — एक 3 साल का बालक, जिसके पिता की हत्या हो चुकी है, अपनी विधवा मां के साथ शरण लेने के लिए भटक रहा है। वही बालक आगे चलकर एक ऐसा साम्राज्य खड़ा करता है, जो 1350 वर्षों (6ठी शताब्दी से 1947 ई. तक) तक अजेय रहा — जिसे न दिल्ली सल्तनत झुका सकी, न मुगल साम्राज्य। यह कहानी है बप्पा रावल की, और उस राजवंश की जिसे हम गुहिल-सिसोदिया वंश कहते हैं। यह वही वंश है जिसने राणा सांगा जैसा योद्धा दिया जिसका शरीर 80 घावों का निशान बन गया था, महाराणा प्रताप जैसा स्वाभिमानी शासक दिया जिसने कभी अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की, और तीन बार चित्तौड़ के साके (जौहर) देखे — जहां हज़ारों राजपूत महिलाओं ने मौत को गले लगाया पर सम्मान नहीं खोया। यह अध्याय मेवाड़ की उसी गौरवशाली, बलिदानी और अजेय गाथा की पूरी कहानी है।
1मेवाड़ रियासत का परिचय — नामकरण, प्रारंभिक राजधानी एवं गुहिल वंश की उत्पत्ति
- मेवाड़ रियासत राजस्थान की सबसे प्राचीन रियासतों में से एक है, जिसे प्राचीन काल में मेदपाट, प्राग्वाट व शिवि जनपद के नामों से भी जाना जाता था। इसकी प्रारंभिक राजधानी मध्यमिका (वर्तमान नगरी, चित्तौड़गढ़) थी।
- प्राचीन काल में मेवाड़ पर पहले मालव गणराज्य, फिर उज्जैन के शक शासकों, फिर औलिकर वंश, और बाद में मौर्य वंश ने शासन किया। 8वीं शताब्दी में मौर्य शासक चित्रांग मौर्य ने चित्रकूट पहाड़ी व मेसा के पठार पर एक दुर्ग बनवाया, जो आगे चलकर "चित्तौड़गढ़" के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
- गुहिल वंश को "गहलोत वंश" भी कहा जाता है। मुहणोत नैणसी व कर्नल जेम्स टॉड दोनों ने गुहिलों की 24 शाखाओं का उल्लेख किया है, जबकि कविराज श्यामलदास ने 36 शाखाओं का वर्णन किया है।
A. गुहिल वंश की उत्पत्ति के मत
गुहिलों की उत्पत्ति को लेकर भी इतिहासकारों में मतभेद है, ठीक वैसे ही जैसे पिछले अध्याय में हमने प्रतिहार व परमार वंश की उत्पत्ति के विभिन्न मत देखे थे:
| विद्वान/स्रोत (Scholar/Source) | मत (Opinion) |
|---|
| अबुल फजल | गुहिल ईरान के नौशाखान के वंशज थे |
| कर्नल जेम्स टॉड | गुहिलों का मूल स्थान वल्लभी (गुजरात) माना |
| कवि श्यामलदास | गुहिलों को वल्लभी मूल का बताया |
| डॉ. डी.आर. भंडारकर व डॉ. गोपीनाथ शर्मा | आनंदपुर परंपरा अनुसार ब्राह्मण मूल |
| कुम्भलगढ़ अभिलेख व एकलिंग महात्म्य | गुहिलों को सूर्यवंशी (सूर्य के वंशज) बताया गया |
| डॉ. जी.एच. ओझा | गुहिलों को सूर्यवंशी राजपूत माना — ब्राह्मण-मूल सिद्धांत के विरुद्ध |
| ऐतिहासिक परंपरा | वल्लभी के शासक शिलादित्य को गुहिल का पिता माना जाता है |
B. धार्मिक मान्यताएं एवं राजचिह्न
- मेवाड़ का गुहिल वंश भगवान शिव (एकलिंग जी) का उपासक था। मेवाड़ के शासक एकलिंग जी को अपना राजा मानते थे और स्वयं को उनका "दीवान" (प्रधानमंत्री) कहते थे — इसीलिए राजधानी छोड़ने से पहले एकलिंग जी से स्वीकृति ली जाती थी, जिसे "आसकां" कहा जाता था।
- गुहिल वंश की कुलदेवी "बाण माता" हैं। मेवाड़ के महाराणा को "हिन्दूआ सूरज" कहा जाता है, क्योंकि वे स्वयं को सूर्यवंशी मानते हैं। गुहिल वंश के राजध्वज पर उगता सूरज व धनुष-बाण अंकित हैं, तथा राजचिह्न में राजपूत व भील दोनों अंकित हैं — जो भीलों के साथ मेवाड़ के ऐतिहासिक संबंध को दर्शाता है।
- मेवाड़ का प्रसिद्ध राजवाक्य है — "जो टेढ़ाखै धर्म को, तिहीं राखै करतार" (जो धर्म का साथ नहीं छोड़ता, ईश्वर उसकी रक्षा करता है)। मेवाड़ रियासत के सामंत "उमराव" कहलाते थे; सोलह, बत्तीस व गोल — इनका संबंध मेवाड़ में सामंतों की विभिन्न श्रेणियों से है।
2गुहिल वंश के प्रारंभिक शासक — गुहिलादित्य, बप्पा रावल, अल्लट
- गुहिलादित्य (566 ई.) को गुहिल वंश का संस्थापक, मूल पुरुष व आदि पुरुष माना जाता है — उन्होंने नागदा (उदयपुर) को अपनी राजधानी बनाया।
👑 बप्पा रावल / कालभोज (734-753 ई.) गुहिल साम्राज्य के वास्तविक संस्थापक
- वास्तविक नाम मालभोज/कालभोज था; हारित ऋषि के शिष्य थे और उनकी गौएं चराते थे — ऋषि ने प्रसन्न होकर उन्हें "बप्पा रावल" की उपाधि दी। डॉ. जी.एच. ओझा के अनुसार कालभोज असली नाम था और "बप्पा" एक उपाधि थी।
- 734 ई. में मौर्य शासक मानमोरी/मैनमोरी को हराकर चित्तौड़गढ़ पर अधिकार किया (श्यामलदास के अनुसार 734 ई., टॉड के अनुसार 713 ई.) — इसीलिए इन्हें गुहिल साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक कहा जाता है।
- मेवाड़ में सर्वप्रथम स्वर्ण सिक्के चलाए। कुम्भलगढ़ अभिलेख (1460 ई.) में बप्पा को "विप्र" (ब्राह्मण) कहा गया है। सी.वी. वैद्य ने बप्पा की तुलना फ्रांसीसी सेनापति चार्ल्स मार्टेल से की।
- अपने इष्टदेव एकलिंग जी (लकुलीश संप्रदाय से संबद्ध) का मंदिर कैलाशपुरी गांव में बनवाया — आज भी मेवाड़ के शासक इसी मंदिर को अपना आराध्य मानते हैं। बप्पा की समाधि नागदा में स्थित है; रावलपिंडी (वर्तमान पाकिस्तान) नगर का नाम भी बप्पा के नाम पर रखा गया माना जाता है।
- अल्लट/आलूराव (977 ई.) ने सबसे पहले आहड़ को अपनी राजधानी बनाया; इनकी जानकारी शक्तिकुमार के आहड़ अभिलेख (977 ई.) से मिलती है, जिसमें इनकी माता का नाम लक्ष्मीवती (राष्ट्रकूट वंश) व पत्नी का नाम हरिया देवी (हूण राजकुमारी) बताया गया है। अल्लट ने मेवाड़ में सर्वप्रथम नौकरशाही (Bureaucratic) व्यवस्था लागू की, जो आज भी किसी न किसी रूप में जारी है; इतिहासकार ओझा के अनुसार अल्लट ने प्रतिहार शासक देवपाल को युद्ध में हराया था।
- शक्तिकुमार के समय मुंज परमार ने आहड़ पर आक्रमण कर उसे नष्ट कर दिया, जिसके बाद शक्तिकुमार ने चित्तौड़गढ़ पर नियंत्रण किया (विस्तार के लिए देखें: अध्याय 5 — गुर्जर-प्रतिहार एवं परमार वंश)। इसके बाद भोज परमार ने चित्तौड़गढ़ में त्रिभुवन नारायण मंदिर बनवाया।
प्रारंभिक गुहिल शासकों की सूची — एक नज़र में
| शासक (Ruler) | काल (Period) | प्रमुख तथ्य (Key Fact) |
|---|
| गुहिलादित्य | 566 ई. | गुहिल वंश के संस्थापक; राजधानी नागदा |
| बप्पा रावल (कालभोज) | 734-753 ई. | मानमोरी मौर्य को हराकर गुहिल साम्राज्य की वास्तविक स्थापना (विस्तार ऊपर dynastyBox में) |
| अल्लट/आलूराव | लगभग 977 ई. | राजधानी आहड़ स्थानांतरित; मेवाड़ में प्रथम नौकरशाही व्यवस्था लागू; प्रतिहार शासक देवपाल को हराया |
| नरवाहन | — | सीमित ऐतिहासिक जानकारी उपलब्ध |
| शक्तिकुमार | — | मुंज परमार द्वारा आहड़ ध्वस्त; राजधानी चित्तौड़गढ़ स्थानांतरित |
3रावल शाखा का उत्कर्ष एवं अंत — जैत्रसिंह से रानी पद्मिनी तक
- रणसिंह (1158 ई.) के शासनकाल में गुहिल वंश दो शाखाओं में बंट गया — रावल शाखा (रणसिंह के पुत्र क्षेमसिंह द्वारा स्थापित, चित्तौड़ पर शासन) और राणा शाखा (रणसिंह के पुत्र सहप द्वारा सिसोदा गांव बसाकर स्थापित — यही आगे चलकर सिसोदिया वंश कहलाई)।
- जैत्रसिंह (1213-1253 ई.) ने इल्तुतमिश के बार-बार आक्रमणों से परेशान होकर राजधानी नागदा से चित्तौड़ स्थानांतरित की। भूताला के युद्ध (1227 ई.) में जैत्रसिंह ने दिल्ली सल्तनत के इल्तुतमिश को पराजित किया — इस युद्ध का उल्लेख जयसिंह सूरि कृत "हम्मीरमदमर्दन" ग्रंथ में मिलता है। जैत्रसिंह ने दिल्ली के 6 सुल्तानों का शासनकाल देखा; इनका काल "मेवाड़ का स्वर्ण युग" कहलाता है।
- तेजसिंह (1253-1273 ई.) के काल में 1260 ई. में मेवाड़ का पहला चित्रित ग्रंथ "श्रावक प्रतिक्रमणसूत्र चूर्णी" कमलचंद्र द्वारा रचा गया। समरसिंह (1273-1302 ई.) के समय एक पुत्र कुंभकरण ने नेपाल में गुहिल वंश की एक शाखा स्थापित की, जबकि दूसरे पुत्र रतनसिंह ने चित्तौड़ पर शासन संभाला।
रावल शाखा के शासक — एक नज़र में
| शासक (Ruler) | काल (Period) | प्रमुख घटना (Key Event) |
|---|
| रणसिंह | 1158 ई. | गुहिल वंश का रावल व राणा (सिसोदिया) शाखाओं में विभाजन |
| जैत्रसिंह | 1213-1253 ई. | राजधानी नागदा से चित्तौड़ स्थानांतरित; भूताला के युद्ध (1227 ई.) में इल्तुतमिश को हराया — "मेवाड़ का स्वर्ण युग" |
| तेजसिंह | 1253-1273 ई. | दिल्ली सुल्तान बलबन के आक्रमण को विफल किया; मेवाड़ का प्रथम चित्रित ग्रंथ (1260 ई.) रचा गया |
| समरसिंह | 1273-1302 ई. | चीरवा अभिलेख में धर्म-संरक्षक बताया गया; अलाउद्दीन खिलजी की सेना से क्षतिपूर्ति वसूली |
| रावल रतनसिंह | 1302-1303 ई. | रावल शाखा के अंतिम शासक — पूर्ण विवरण नीचे dynastyBox में देखें |
👑 रावल रतनसिंह (1302-1303 ई.) गुहिल वंश की रावल शाखा के अंतिम शासक
- समकालीन दिल्ली सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने 28 जनवरी 1303 ई. को चित्तौड़ पर आक्रमण किया। मलिक मोहम्मद जायसी के काल्पनिक ग्रंथ "पद्मावत" (1540 ई.) के अनुसार, राघव चेतन (राजदरबार से निष्कासित ब्राह्मण) के उकसाने पर अलाउद्दीन ने रानी पद्मिनी (सिंहलद्वीप के राजा गंधर्वसेन व रानी चंपावती की पुत्री) को पाने हेतु यह आक्रमण किया।
- युद्ध में रतनसिंह, उनके वीर सेनापति गोरा (पद्मिनी के चाचा) व बादल (पद्मिनी के भाई) वीरगति को प्राप्त हुए। इस युद्ध का सजीव वर्णन अमीर खुसरो ने अपने ग्रंथ "खजाइन-उल-फुतूह" (तारीख-ए-अलाई) में किया है — वे स्वयं उस समय युद्ध-स्थल पर मौजूद थे।
- 26 अगस्त 1303 ई. को महारानी पद्मिनी व नागमती (रतनसिंह की रानियां) के नेतृत्व में लगभग 1600 महिलाओं ने जौहर किया — इसे चित्तौड़ का प्रथम साका कहा जाता है और राजस्थान का सबसे बड़ा साका माना जाता है।
- अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ का नाम बदलकर अपने पुत्र खिज्र खां के नाम पर "खिज्राबाद" रखा तथा उसे वहां का शासक नियुक्त किया — 1303 से 1326 ई. तक चित्तौड़ सीधे दिल्ली सल्तनत के अधीन रहा। इसी के साथ गुहिल वंश की रावल शाखा का पूर्ण अंत हो गया।
💡 साका (Saka) क्या है, और यह जौहर से कैसे अलग है?
"साका" शब्द राजपूत परंपरा में एक संपूर्ण घटना-चक्र के लिए प्रयोग होता है — जब किला हारना निश्चित हो जाए, तब पहले महिलाएं व बच्चे "जौहर" (सामूहिक अग्नि-समाधि) द्वारा अपने सम्मान की रक्षा करते हैं, और फिर पुरुष योद्धा केसरिया वस्त्र धारण कर शत्रु-सेना पर टूट पड़ते हैं, यह जानते हुए भी कि अब जीवित लौटना संभव नहीं — इसे "केसरिया करना" कहा जाता है। चित्तौड़गढ़ के इतिहास में ऐसे तीन साके हुए — 1303 ई. (अलाउद्दीन खिलजी के विरुद्ध, रानी पद्मिनी), 1535 ई. (बहादुरशाह के विरुद्ध, रानी कर्णावती) व 1568 ई. (अकबर के विरुद्ध, फूल कंवर) — तीनों की पूरी तुलना आगे इसी अध्याय में एक तालिका में दी गई है।
📢 विज्ञापन
🔥 सबसे लोकप्रिय
📘
RAS Foundation Course 2026 🕉️
4सिसोदिया वंश (राणा शाखा) की स्थापना — राणा हम्मीर से राणा लाखा तक
- 1311 से 1326 ई. तक चित्तौड़ पर दिल्ली सल्तनत के सामंत मालदेव सोनगरा का शासन रहा। इसी दौरान अरिसिंह (राणा शाखा के एक शासक) के सात पुत्रों ने 1303 ई. के चित्तौड़ युद्ध में वीरगति प्राप्त की थी।
👑 राणा हम्मीर सिसोदिया (1326-1364 ई.) "मेवाड़ का उद्धारक" एवं सिसोदिया वंश के वास्तविक संस्थापक
- सिसोदा गांव के निवासी थे; मालदेव सोनगरा के पुत्र जैसा/जयसिंह (ओझा के अनुसार) अथवा बनवीर (रणकपुर-पाली शिलालेख के अनुसार) को हराकर मेवाड़ को स्वतंत्र कराया और सिसोदिया वंश (राणा शाखा) की स्थापना की — इसीलिए इन्हें "मेवाड़ का उद्धारक" कहा जाता है।
- कीर्ति स्तंभ में इन्हें "विषम घाटी पंचानन" (विकट संकटों में सिंह के समान) कहा गया है; गीत गोविंद की टीका "रसिक प्रिया" में इन्हें "वीर राजा" की उपाधि दी गई। इनके समय से ही चित्तौड़ के शासकों के नाम आगे "राणा" उपाधि लगनी शुरू हुई।
- 1336 ई. में सिंगोली के युद्ध (वर्तमान नीमच, मध्य प्रदेश) में दिल्ली सल्तनत के मुहम्मद बिन तुगलक को पराजित किया — यह विजय मेवाड़ की संपूर्ण राजनीतिक स्वतंत्रता का प्रतीक मानी जाती है।
- राणा क्षेत्रसिंह/खेता (1364-1382 ई.) के समय मेवाड़-मालवा संघर्ष शुरू हुआ; इन्होंने मालवा के दिलावर खान को हराया, परंतु 1382 ई. में बूंदी से युद्ध में वीरगति प्राप्त हुई।
- राणा लाखा/लक्षसिंह (1382-1421 ई.) ने वृद्धावस्था में मारवाड़ के राव चूंडा की पुत्री व रणमल राठौड़ की बहन हंसाबाई से एक शर्त पर विवाह किया — कि हंसाबाई से उत्पन्न पुत्र ही मेवाड़ का उत्तराधिकारी बनेगा; इसी से पुत्र मोकल का जन्म हुआ। इनके शासनकाल में जावर (उदयपुर) की चांदी-सीसे की खान की खोज हुई, जिसे एशिया की सबसे बड़ी चांदी की खानों में गिना जाता है और जिसने राज्य की आय में भारी वृद्धि की।
- राणा लाखा के बड़े पुत्र चूंडा ने हंसाबाई के पुत्र (मोकल) को राजगद्दी देने की भीष्म-प्रतिज्ञा लेकर स्वयं राजसिंहासन त्याग दिया — इसीलिए उन्हें "मेवाड़ का भीष्म पितामह" व "राजस्थान का भीष्म" कहा जाता है। बदले में चूंडा को मेवाड़ के 16 प्रथम-श्रेणी ठिकानों में सबसे बड़ा ठिकाना सलूम्बर मिला — सलूम्बर के सामंत को ही आगे राणा के राज्याभिषेक का अधिकार व प्रधान सेनापति का पद मिलता रहा।
- राणा मोकल (1421-1433 ई.) की जीलवाड़ा (चारभुजा, राजसमंद) में 1433 ई. में हत्या हुई — हत्यारे चाचा व मेरा, राणा क्षेत्रसिंह की प्रेमिका कर्मा की अनौरस संतानें थीं।
सिसोदिया वंश के प्रारंभिक शासक — एक नज़र में
| शासक (Ruler) | काल (Period) | प्रमुख कार्य/घटना |
|---|
| राणा हम्मीर | 1326-1364 ई. | सिसोदिया वंश की वास्तविक स्थापना; सिंगोली का युद्ध (1336 ई.) — पूर्ण विवरण ऊपर dynastyBox में |
| राणा क्षेत्रसिंह/खेता | 1364-1382 ई. | मालवा के दिलावर खान को हराया; बूंदी से युद्ध में वीरगति |
| राणा लाखा/लक्षसिंह | 1382-1421 ई. | जावर चांदी-सीसे खान की खोज; पिछोला झील निर्माण (बंजारा छीतर द्वारा); हंसा देवी से विवाह |
| राणा चूंडा | — | हंसा देवी के पुत्र मोकल हेतु राजसिंहासन त्याग — "मेवाड़ का भीष्म पितामह"; सलूम्बर ठिकाना प्राप्त |
| राणा मोकल | 1421-1433 ई. | 1428 ई. में गुजरात के अहमदशाह को हराया; चाचा-मेरा द्वारा हत्या (1433 ई.) |
5महाराणा कुम्भा — मेवाड़ का स्वर्ण युग एवं स्थापत्य कला
👑 महाराणा कुम्भा (1433-1468 ई.) "राजस्थानी स्थापत्य कला के जनक", मेवाड़ के सबसे महान शासकों में से एक
- राणा मोकल व परमार राजकुमारी सौभाग्य देवी के पुत्र; जन्म 1423 ई., राज्याभिषेक 1433 ई. में हुआ। उपाधियां — हिन्दू सुरताण, अभिनवभरताचार्य (संगीत ज्ञान हेतु), राणा रासो, हालगुरु (गिरि-दुर्गों का निर्माता), राजगुरु, शैलगुरु, चापगुरु व सुरग्रामणी।
- सारंगपुर के युद्ध (1437 ई.) में मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी प्रथम को पराजित किया, और इसी विजय की स्मृति में चित्तौड़गढ़ में विश्व-प्रसिद्ध विजय स्तंभ (कीर्ति स्तंभ) का निर्माण करवाया (1440-1448 ई., 9 मंजिला, भगवान विष्णु को समर्पित, 122 फीट ऊंचा, 157 सीढ़ियां)।
- आंवल-बांवल की संधि (1453 ई.) से कुम्भा व राव जोधा (मारवाड़) के बीच मेवाड़-मारवाड़ की सीमा तय हुई (मध्य-बिंदु सोजत); राव जोधा ने अपनी पुत्री श्रृंगार देवी का विवाह कुम्भा के पुत्र रायमल से किया। चम्पानेर की संधि (1456 ई., मालवा व गुजरात सुल्तानों के बीच, कुम्भा के विरुद्ध) को कुम्भा ने विफल कर दिया। बदनौर/बैराठगढ़ के युद्ध (1457 ई.) में महमूद खिलजी को हराकर कुशाल माता मंदिर बनवाया।
- श्यामलदास के अनुसार कुम्भा ने मेवाड़ के 84 दुर्गों में से 32 दुर्गों का निर्माण करवाया — प्रमुख हैं कुम्भलगढ़ (राजसमंद), अचलगढ़ (माउंट आबू), बसंतगढ़, भोमट दुर्ग (भीलों पर नियंत्रण हेतु) व मचान दुर्ग (मेरों पर नियंत्रण हेतु) — इसीलिए इन्हें "राजस्थानी स्थापत्य कला का जनक" कहा जाता है।
- संगीत व साहित्य में गहरी रुचि रखते थे — "संगीतराज" (5 भागों में — पाठ्य, वाद्य, नृत्य, गीत व रस रत्नकोश), "संगीत मीमांसा", "सूड़/सुधा प्रबंध", "कामराज रतिसार" जैसे ग्रंथ रचे; "गीत गोविंद" पर "रसिक प्रिया" टीका तथा "चंडीशतक" व "संगीत रत्नाकर" पर भी टीकाएं लिखीं। इनके शिल्पी मंडन ने वास्तुकला पर "रूपमंडन", "वास्तुमंडन", "राजवल्लभ मंडन" जैसे ग्रंथ रचे।
- पुत्री रमाबाई एक प्रसिद्ध संगीतज्ञा थीं, उपाधि "वागीश्वरी"; कुंभा के संगीत गुरु सारंग व्यास थे और वे स्वयं एक कुशल वीणा-वादक थे। कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति (1460 ई., रचयिता महेश भट्ट) में उल्लेख है कि कुंभा द्वारा रचित 4 नाटकों में मेवाड़ी भाषा का प्रयोग हुआ।
- 1468 ई. में कुंभलगढ़ के भीतरी कटारगढ़ दुर्ग में स्वयं के पुत्र ऊदा (उदयकरण) द्वारा हत्या कर दी गई — इसीलिए ऊदा को "पितृहंता" कहा जाता है।
महाराणा कुंभा द्वारा निर्मित प्रमुख दुर्ग एवं स्मारक
| दुर्ग/स्मारक (Fort/Monument) | स्थान (District) | विशेषता (Significance) |
|---|
| कुंभलगढ़ | राजसमंद | 36 किमी लंबी दीवार — "भारत की महान दीवार"; प्रताप का जन्मस्थान; UNESCO सूची (2013) में शामिल |
| विजय स्तंभ (चित्तौड़गढ़) | चित्तौड़गढ़ | 1440-1448 ई., 9 मंजिला, सारंगपुर-विजय की स्मृति में निर्मित |
| अचलगढ़ | माउंट आबू, सिरोही | कुंभा द्वारा पुनर्निर्मित दुर्ग |
| बसंतगढ़ | सिरोही | कुंभा द्वारा निर्मित दुर्ग |
| भोमट दुर्ग | उदयपुर | भीलों पर नियंत्रण हेतु निर्मित |
| मचान दुर्ग | मेवाड़ क्षेत्र | मेरों पर नियंत्रण हेतु निर्मित |
रायमल एवं उत्तराधिकार: पितृहंता ऊदा को मेवाड़ के सरदारों ने हटाकर रायमल (1473-1509 ई., कुंभा के पुत्र) को शासक बनाया — इसे "दाड़िमपुर की विजय" कहा जाता है। रायमल के बड़े पुत्र पृथ्वीराज सिसोदिया "उड़ना राजकुमार" नाम से प्रसिद्ध थे, परंतु राजगद्दी रायमल के तीसरे पुत्र संग्राम सिंह (राणा सांगा) को मिली।
6राणा सांगा एवं खानवा का युद्ध
👑 महाराणा सांगा (संग्राम सिंह प्रथम) (1509-1528 ई.) "हिन्दूपत" व "सैनिकों का भग्नावशेष" — भारत के सबसे घायल योद्धा-राजाओं में से एक
- जन्म 12 अप्रैल 1482 ई., राज्याभिषेक 24 मई 1509 ई.; पिता राणा रायमल, माता श्रृंगार देवी। कर्नल जेम्स टॉड ने इन्हें "सिपाही का अंश" (Military Ruins) कहा — क्योंकि युद्धों में इनकी एक आंख, एक हाथ व एक टांग बेकार हो गई थी, फिर भी शरीर पर 80 से अधिक घाव लिए ये लड़ते रहे।
- खातौली का युद्ध (1517 ई., कोटा/बूंदी) व बाड़ी का युद्ध (1518 ई., धौलपुर) दोनों में दिल्ली सल्तनत के इब्राहिम लोदी को हराया। गागरोन का युद्ध (1519 ई., झालावाड़) में मालवा के महमूद खिलजी द्वितीय को हराया, और उदारतापूर्वक कुछ महीनों बाद रिहा भी कर दिया — निजामुद्दीन अहमद ने "तबकात-ए-अकबरी" में इस उदारता की प्रशंसा की।
- बयाना का युद्ध (16 फरवरी 1527 ई., भरतपुर) में सांगा की सेना ने बाबर के सेनापति (व बहनोई) मेहदी ख्वाजा को हराया।
- खानवा का युद्ध (17 मार्च 1527 ई.) — यह भारत के इतिहास के सबसे बड़े युद्धों में गिना जाता है। सांगा की सेना में हसन खां मेवाती, महमूद लोदी, राव मालदेव (मारवाड़), पृथ्वीराज कछवाहा (आमेर), भारमल (ईडर), मेदिनी राय (चंदेरी) सहित अनेक राजपूत शासक शामिल थे। सलहदी तंवर (रायसीन) व खानजादा (नागौर) ने अंतिम समय पक्ष बदलकर बाबर का साथ दिया, जिससे राजपूत सेना कमजोर पड़ी। बाबर ने अपनी सेना में "तुलुगमा पद्धति", तोप-बंदूकों का प्रयोग व "जिहाद" की घोषणा की। घायल सांगा को युद्ध-भूमि से बाहर ले जाने पर झाला अज्जा (सादड़ी) ने उनका राजमुकुट धारण कर सेना का नेतृत्व करते हुए वीरगति पाई — सेना को सांगा के न होने की भ्रामक खबर से मनोबल टूटा और अंततः बाबर विजयी हुआ।
- 30 जनवरी 1528 ई. को कालपी (मध्य प्रदेश) में अपने ही कुछ साथियों द्वारा (क्योंकि वे हार के बाद भी दोबारा युद्ध जारी रखना चाहते थे) विष देकर हत्या कर दी गई। दाह-संस्कार मांडलगढ़ (भीलवाड़ा) में हुआ, जहां उनकी छतरी है; एक स्मारक बसवा (दौसा) में भी स्थित है।
महाराणा सांगा के प्रमुख युद्ध — एक नज़र में
| युद्ध (Battle) | वर्ष | प्रतिद्वंद्वी (Opponent) | परिणाम (Result) |
|---|
| खातौली का युद्ध | 1517 ई. | इब्राहिम लोदी (दिल्ली सल्तनत) | सांगा विजयी, परंतु स्वयं गंभीर घायल (एक आंख व हाथ बेकार) |
| बाड़ी का युद्ध | 1518 ई. | इब्राहिम लोदी (सेनापति मियां मखन/हुसैन) | सांगा विजयी |
| गागरोन का युद्ध | 1519 ई. | महमूद खिलजी द्वितीय (मालवा) | सांगा विजयी; बाद में उदारतापूर्वक रिहा किया |
| बयाना का युद्ध | 16 फरवरी 1527 ई. | बाबर (सेनापति मेहदी ख्वाजा) | सांगा विजयी |
| खानवा का युद्ध | 17 मार्च 1527 ई. | बाबर (स्वयं) | सांगा पराजित — झाला अज्जा वीरगति |
"जब तक शत्रुओं को पराजित नहीं करूंगा, तब तक चित्तौड़ के फाटक में प्रवेश नहीं करूंगा।" — महाराणा सांगा की प्रतिज्ञा
7द्वितीय व तृतीय साका — राणा विक्रमादित्य से राणा उदयसिंह तक, उदयपुर की स्थापना
- राणा रतनसिंह द्वितीय (1528-1531 ई.) की मृत्यु बूंदी के सूरजमल हाड़ा से आखेट (शिकार) उत्सव के दौरान हुए विवाद में हुई। राणा विक्रमादित्य (1531-1536 ई.) कम उम्र में गद्दी पर बैठे, अतः राजकाज उनकी मां हाड़ी रानी कर्मावती (कर्णावती) संभालती थीं।
👑 चित्तौड़ का द्वितीय साका (1535 ई.) गुजरात के बहादुरशाह के विरुद्ध, रानी कर्मावती के नेतृत्व में
- 1533 ई. में गुजरात के बहादुरशाह ने चित्तौड़ पर पहला आक्रमण किया, तब रानी कर्मावती ने संधि कर उसे लौटा दिया। 1534-35 ई. में बहादुरशाह ने पुनः आक्रमण किया।
- रानी कर्मावती ने मुगल बादशाह हुमायूं को राखी भेजकर सहायता मांगी, परंतु हुमायूं समय पर नहीं पहुंच सका। इसी बीच बालक विक्रमादित्य व उदयसिंह को सुरक्षा हेतु बूंदी (ननिहाल) भेज दिया गया।
- देवलिया (प्रतापगढ़) के रावत बाघसिंह के नेतृत्व में मेवाड़ी सैनिकों ने केसरिया धारण कर वीरगति पाई; 8 मार्च 1535 ई. को रानी कर्मावती के नेतृत्व में लगभग 1200 महिलाओं ने जौहर किया — यह चित्तौड़ का द्वितीय साका था।
- बहादुरशाह ने किले पर अस्थायी अधिकार किया, परंतु हुमायूं के आने की खबर सुनकर चित्तौड़ छोड़ दिया — 1536 ई. में विक्रमादित्य पुनः चित्तौड़ के शासक बने। बाद में पृथ्वीराज सिसोदिया की दासी पूतलदे के पुत्र बनवीर ने विक्रमादित्य की हत्या कर दी और स्वयं शासक बन बैठा।
💡 पन्नाधाय का बलिदान — मेवाड़ की सबसे मार्मिक कहानी
बनवीर अब सिंहासन का एकमात्र दावेदार खत्म करना चाहता था — छोटे राजकुमार उदयसिंह को भी मारना चाहता था। उदयसिंह की धाय मां पन्नाधाय ने एक असंभव फैसला लिया — उसने अपने ही पुत्र चंदन को उदयसिंह के पालने में सुलाकर बनवीर की तलवार का शिकार होने दिया, और सच्चे राजकुमार उदयसिंह को टोकरी में छिपाकर रातों-रात कुंभलगढ़ पहुंचा दिया, जहां कीरत व वारीन दंपति ने उसकी परवरिश की। एक धाय मां की इस कुर्बानी ने मेवाड़ को उसका भावी सबसे प्रतिष्ठित उत्तराधिकारी — महाराणा प्रताप का पिता उदयसिंह — बचा लिया। यही कारण है कि पन्नाधाय को आज भी मेवाड़ की सबसे पूजनीय वीरांगनाओं में गिना जाता है।
👑 महाराणा उदयसिंह (1540-1572 ई.) उदयपुर के संस्थापक, महाराणा प्रताप के पिता
- जन्म राणा सांगा व रानी कर्मावती के पुत्र के रूप में चित्तौड़गढ़ दुर्ग में; 1537 ई. में कुंभलगढ़ में राज्याभिषेक; 1540 ई. में राव मालदेव (मारवाड़) की सहायता से बनवीर को हराकर चित्तौड़ पर अधिकार किया।
- 1544 ई. में उदयसिंह मेवाड़ के पहले शासक बने जिन्होंने अफगान शासक शेरशाह सूरी की अधीनता स्वीकार की और बिना युद्ध के चित्तौड़गढ़ की चाबियां भेज दीं। हरमाड़ा के युद्ध (25 जनवरी 1557 ई.) में शेरशाह के सेनानायक हाजी खां से पराजित हुए।
- 1559 ई. में धूणी नामक स्थान पर उदयपुर नगर की स्थापना की, जो आगे मेवाड़ की स्थायी राजधानी बनी।
- 1567-68 ई. में अकबर के आक्रमण के समय चित्तौड़ की जिम्मेदारी जयमल (मेड़ता) व फत्ता/फतेह सिंह (अमेट) को सौंपकर स्वयं गोगुंदा की पहाड़ियों में चले गए — यह रणनीति आगे चलकर महाराणा प्रताप की भी नीति बनी।
👑 चित्तौड़ का तृतीय एवं अंतिम साका (1567-1568 ई.) अकबर के विरुद्ध, जयमल-फत्ता के नेतृत्व में
- 12 अक्टूबर 1567 ई. को अकबर ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया। दीवार की मरम्मत करते समय अकबर की "संग्राम" नामक बंदूक से जयमल वीरगति को प्राप्त हुए; फत्ता भी युद्ध में वीरगति पाए। फत्ता की पत्नी फूल कंवर के नेतृत्व में रानियों ने जौहर किया — यह चित्तौड़ का तीसरा व अंतिम साका था।
- 25 फरवरी 1568 ई. को अकबर ने चित्तौड़ पर अधिकार कर इसे "मुहम्मदाबाद" नाम दिया तथा लगभग 30,000 निर्दोष नागरिकों का नरसंहार करवाया — यह इतिहास पर एक कलंक माना जाता है। इस विजय की स्मृति में अकबर ने जयमल व फत्ता की संगमरमर की गजारूढ़ (हाथी पर सवार) प्रतिमाएं आगरा किले के बाहर लगवाईं — इसका उल्लेख फ्रांसीसी यात्री फ्रांस्वा बर्नियर ने भी किया है।
चित्तौड़ के तीनों साकों की तुलना
| साका (Saka) | वर्ष | आक्रमणकारी | मेवाड़ का नेतृत्व |
|---|
| प्रथम साका | 1303 ई. | अलाउद्दीन खिलजी (दिल्ली सल्तनत) | रावल रतनसिंह, रानी पद्मिनी (जौहर), वीर गोरा-बादल |
| द्वितीय साका | 8 मार्च 1535 ई. | बहादुरशाह (गुजरात) | राणा विक्रमादित्य (अवयस्क), रानी कर्मावती (जौहर) |
| तृतीय साका | 25 फरवरी 1568 ई. | अकबर (मुगल) | जयमल-फत्ता (रक्षक), फूल कंवर (जौहर) |
📢 विज्ञापन
📦
ALL IN ONE Subscription — सम्पूर्ण GK एक ही स्थान पर
8महाराणा प्रताप — हल्दीघाटी एवं दिवेर के युद्ध
👑 महाराणा प्रताप (1572-1597 ई.) "मेवाड़ का रक्षक", "हल्दीघाटी का शेर" — जिसने कभी मुगल अधीनता स्वीकार नहीं की
- जन्म 9 मई 1540 ई. को कुंभलगढ़ दुर्ग (बादल महल) में; पिता महाराणा उदयसिंह, माता जयवंता बाई (पाली नरेश अखैराज सोनगरा की पुत्री); बचपन का नाम "कीका" (भीलों द्वारा दिया गया)।
- उदयसिंह ने प्रिय पुत्र जगमाल को उत्तराधिकारी घोषित किया था, परंतु सरदारों (अखैराज जालौर, रामसिंह तंवर ग्वालियर आदि) के विरोध पर जगमाल को हटाकर 28 फरवरी 1572 ई. को गोगुंदा में प्रताप का प्रथम राज्याभिषेक हुआ (औपचारिक राज्याभिषेक कुंभलगढ़ में); ये सिसोदिया वंश के 54वें शासक घोषित हुए। असंतुष्ट जगमाल अकबर की शरण में चला गया।
- अकबर ने प्रताप को अधीनता स्वीकार कराने हेतु चार शिष्टमंडल भेजे — जलाल खां कोरची (1572), मानसिंह कछवाहा (जून 1573), भगवानदास (अक्टूबर 1573) व टोडरमल (दिसंबर 1573) — चारों असफल रहे।
- हल्दीघाटी का युद्ध (18/21 जून 1576 ई.) — मानसिंह कछवाहा के नेतृत्व में मुगल सेना व प्रताप की सेना (लगभग 20,000, मुगल सेना लगभग 80,000 वीर विनोद अनुसार) के बीच लड़ा गया। कर्नल टॉड ने इसे "मेवाड़ का थर्मोपाइले" कहा; अबुल फजल ने "खमनौर का युद्ध"; बदायूंनी ने "गोगुंदा का युद्ध" कहा। झाला मन्ना/बीदा ने घायल प्रताप को बचाने हेतु उनका राजमुकुट धारण कर वीरगति पाई। युद्ध का परिणाम अधिकांश इतिहासकारों (डॉ. गोपीनाथ शर्मा सहित) के अनुसार अनिर्णायक रहा, परंतु राजस्थान सरकार के अनुसार व राजप्रशस्ति, राजप्रकाश व जगदीश मंदिर प्रशस्ति में प्रताप को विजयी बताया गया है।
- हल्दीघाटी के बाद भी संघर्ष जारी रहा — शाहबाज खां ने कुंभलगढ़ पर तीन बार (1578-79) आक्रमण किया, अंततः असफल रहा। भामाशाह ने चूलिया गांव में प्रताप से भेंट कर 20,000 स्वर्ण मुद्राओं की आर्थिक सहायता दी — इसीलिए इन्हें "दानवीर" व "मेवाड़ का उद्धारक" कहा जाता है।
- दिवेर का युद्ध (अक्टूबर 1582 ई., राजसमंद) — प्रताप के पुत्र अमर सिंह ने अकबर के किलेदार सुल्तान खां को पराजित किया; कर्नल टॉड ने इसे "मेवाड़ का मैराथन" कहा, क्योंकि यहीं से प्रताप की विजय-यात्रा शुरू हुई और मुगलों को मेवाड़ की 36 चौकियां बंद करनी पड़ीं। इसके बाद प्रताप ने मांडलगढ़ व चित्तौड़गढ़ को छोड़कर लगभग पूरे मेवाड़ पर अपना शासन पुनर्स्थापित कर लिया।
- 1585 ई. में चावंड (सलूम्बर तहसील) को अपनी आपातकालीन राजधानी बनाया, जहां चामुंडा माता मंदिर व महल बनवाए; यहीं "चावंड शैली" की चित्रकला विकसित हुई। 19 जनवरी 1597 ई. को चावंड में धनुष चढ़ाते समय निधन हुआ (आयु 57 वर्ष); दाह-संस्कार बांडोली (सराड़ा, सलूम्बर) में हुआ; उनके घोड़े चेतक का स्मारक बलीचा गांव (राजसमंद) में स्थित है। प्रताप ने भीलों को सेना में पहली बार उच्च पद दिए — प्रमुख भील सेनापति पूंजा भील थे।
अकबर द्वारा भेजे गए 4 शिष्टमंडल — एक नज़र में
| दूत (Envoy) | वर्ष (Year) | परिणाम (Result) |
|---|
| जलाल खां कोरची | अगस्त/नवंबर 1572 ई. | असफल |
| मानसिंह कछवाहा | जून 1573 ई. | असफल |
| भगवानदास | अक्टूबर 1573 ई. | असफल |
| टोडरमल | दिसंबर 1573 ई. | असफल |
हल्दीघाटी बनाम दिवेर — तुलनात्मक तालिका
| युद्ध (Battle) | वर्ष (Year) | मुगल नेतृत्व
(Mughal Leader) | परिणाम (Result) |
|---|
| हल्दीघाटी का युद्ध | 18/21 जून 1576 ई. | मानसिंह कछवाहा | अधिकांश इतिहासकारों अनुसार अनिर्णायक; राजस्थान सरकार व राजप्रशस्ति अनुसार प्रताप विजयी |
| दिवेर का युद्ध | अक्टूबर 1582 ई. | सुल्तान खां (किलेदार) | प्रताप की निर्णायक विजय — "मेवाड़ का मैराथन"; 36 मुगल चौकियां मुक्त |
"यदि राणा सांगा व महाराणा प्रताप के बीच उदयसिंह न होते, तो मेवाड़ का इतिहास और भी गौरवशाली होता।" — कर्नल जेम्स टॉड
9अमर सिंह प्रथम से राज सिंह प्रथम तक — मुगलों से संधि एवं धार्मिक संरक्षण
👑 महाराणा अमर सिंह प्रथम (1597-1620 ई.) मेवाड़ के पहले शासक जिन्होंने मुगल अधीनता स्वीकार की
- 1597-1605 तक अकबर व 1605-1615 तक जहांगीर से संघर्ष जारी रखा। अंततः 5 फरवरी 1615 ई. को चित्तौड़ की संधि हुई (मुगलों की ओर से शहजादा खुर्रम/शाहजहां, शिराजी, सुंदरदास; मेवाड़ की ओर से हरिदास झाला, शुभकरण) — शर्तें: अमर सिंह को स्वयं मुगल दरबार में उपस्थित होने की आवश्यकता नहीं, पुत्र करण सिंह दरबार में रहेंगे, 1000 घुड़सवारों सहित मुगलों की सेवा को तैयार रहेंगे, चित्तौड़गढ़ लौटाया जाएगा परंतु उसकी मरम्मत/किलेबंदी नहीं होगी।
- सर टॉमस रो के अनुसार जहांगीर ने कहा — "बादशाह ने मेवाड़ के राणा को समझौते से अधीन किया, बल से नहीं।" संधि से असंतुष्ट होकर अमर सिंह प्रथम ने राजकाज पुत्र करण सिंह को सौंप दिया और स्वयं वैराग्य जैसा जीवन अपनाया; निधन के बाद अंत्येष्टि आहड़ (उदयपुर) में हुई, जो आगे मेवाड़ के राणाओं का पारंपरिक महासतियां (राजकीय श्मशान) स्थल बना।
- करण सिंह (1620-1628 ई.) मुगल दरबार में स्वयं उपस्थित होने वाले मेवाड़ के पहले शासक थे तथा जहांगीर से "राणा" की उपाधि व सम्मान-वस्त्र पाने वाले पहले शासक भी। इन्होंने शहजादा खुर्रम (भावी शाहजहां) को 1622 ई. के विद्रोह के समय पिछोला झील के जगमंदिर महल में शरण दी — कहा जाता है इसी महल को देखकर शाहजहां ने आगे चलकर मुमताज की स्मृति में ताजमहल बनवाने की प्रेरणा ली।
- जगत सिंह प्रथम (1628-1652 ई.) का काल "मेवाड़ चित्रकला का स्वर्ण युग" कहलाता है; इन्होंने उदयपुर में जगदीश/जगन्नाथ मंदिर (1650 ई., वास्तुकार भाना-मुकुंद, अर्जुन की देखरेख में, नागर/पंचायतन शैली) बनवाया, जिस पर कृष्णभट्ट रचित जगन्नाथ प्रशस्ति उत्कीर्ण है। 1631 ई. में शाहजहां ने मेवाड़ से प्रतापगढ़ को अलग कर स्वतंत्र रियासत का दर्जा दिया।
करण सिंह एवं जगत सिंह प्रथम — एक नज़र में
| शासक (Ruler) | काल (Period) | प्रमुख कार्य (Key Achievement) |
|---|
| करण सिंह | 1620-1628 ई. | मुगल दरबार में स्वयं उपस्थित होने वाले पहले मेवाड़ शासक; जहांगीर से "राणा" उपाधि व सम्मान-वस्त्र; शहजादा खुर्रम को जगमंदिर में शरण दी |
| जगत सिंह प्रथम | 1628-1652 ई. | मेवाड़ चित्रकला का स्वर्ण युग; जगदीश मंदिर व जगमंदिर पूर्ण; 1631 ई. में प्रतापगढ़ पृथक रियासत बनी |
👑 महाराणा राज सिंह प्रथम (1652-1680 ई.) उपाधि "विजयकटकत्तु" — मंदिर-निर्माता एवं औरंगजेब के प्रबल विरोधी
- शाहजहां व औरंगजेब दोनों के समकालीन; औरंगजेब के उत्तराधिकार-युद्ध में औरंगजेब का समर्थन किया, जिसके बदले 6000 जात-सवार का मनसब मिला। चित्तौड़गढ़ की परकोटा-दीवार का पुनर्निर्माण करवाया, जिसे शाहजहां ने सदुल्लाह खां भेजकर पुनः ध्वस्त करवाया। "टीका-दौड़" प्रथा चलाकर आसपास के ठिकानों को अपने राज्य में मिलाया तथा गागरोन, डूंगरपुर व बांसवाड़ा के परगने प्राप्त किए।
- 1669 ई. में औरंगजेब ने हिंदू मंदिर तोड़ने का आदेश दिया — इसके विपरीत राज सिंह ने श्रीनाथजी मंदिर (सिहाड़/नाथद्वारा, राजसमंद — मूर्ति मथुरा से लाई गई, वल्लभ संप्रदाय की प्रमुख पीठ), द्वारकाधीश मंदिर (कांकरोली) व अंबिका माता मंदिर (जगत, उदयपुर — "मेवाड़ का खजुराहो" उपनाम) जैसे भव्य मंदिर बनवाए।
- चारुमती प्रकरण (1659 ई., किशनगढ़ राजकुमारी, जिनका विवाह राज सिंह ने स्वयं की इच्छा पर किया जबकि औरंगजेब चाहता था वह उससे विवाह करे) — यही औरंगजेब-राज सिंह वैमनस्य का मुख्य कारण बना।
- 1678 ई. में मारवाड़ नरेश जसवंत सिंह की मृत्यु पर औरंगजेब ने मारवाड़ को खालसा (सीधे मुगल नियंत्रण) घोषित कर दिया, जिसे राज सिंह ने राजपूत-नीति का उल्लंघन माना। दुर्गादास राठौड़ के प्रयासों से सिसोदिया-राठौड़ गठबंधन बना; राज सिंह ने बालक अजीत सिंह को शरण देकर 12 गांवों सहित केलवा की जागीर दी। औरंगजेब ने पुत्र शहजादा अकबर को भेजा, पर अकबर ने ही विद्रोह कर दिया। राज सिंह की मृत्यु 1680 ई. में कुंभलगढ़ में हुई, जिसके बाद भी दुर्गादास राठौड़ ने औरंगजेब से लगभग 30 वर्षों तक संघर्ष जारी रखा (विस्तार के लिए देखें: अध्याय 8 — राठौड़ वंश)।
- राजसमंद झील (1 जनवरी 1662 – 14 जनवरी 1676 ई., गोमती नदी पर बांध बनाकर निर्मित) अकाल-राहत हेतु बनी भारत की एकमात्र झील मानी जाती है — इसी के नाम पर राजसमंद जिला बना; झील तट पर स्थापित राजप्रशस्ति अभिलेख (रचयिता रणछोड़ भट्ट तैलंग) विश्व का सबसे बड़ा शिलालेख माना जाता है (विस्तार के लिए देखें: अध्याय 1 — राजस्थान इतिहास के स्रोत)।
- हाड़ी रानी का बलिदान — कवि मेघराज "मुकुल" की कविता "चूड़ावत मांगे सेनानी" में वर्णित है कि हाड़ी रानी सहल कंवर (बूंदी के सामंत संग्रामसिंह हाड़ा की पुत्री) ने अपने पति रतनसिंह चूंडावत (सलूम्बर सामंत) को युद्ध हेतु प्रेरित करने के लिए स्वयं अपना सिर काटकर उन तक भिजवा दिया था — राजस्थान पुलिस की एक महिला बटालियन आज भी इन्हीं के नाम पर है।
10उत्तरकालीन सिसोदिया शासक, मराठा हस्तक्षेप एवं ब्रिटिश संधि
राज सिंह प्रथम के बाद के शासकों के समय मेवाड़ को क्रमशः मुगल दबाव, मराठा हस्तक्षेप व अंततः ब्रिटिश अधीनता का सामना करना पड़ा — यह पूरा घटनाक्रम आगे अध्याय 12 (मराठा हस्तक्षेप एवं ब्रिटिश संधियाँ) में विस्तार से पढ़ेंगे; यहां केवल मेवाड़-विशिष्ट प्रमुख घटनाएं दी जा रही हैं:
| शासक (Ruler) | काल (Period) | प्रमुख घटना (Key Event) |
|---|
| जय सिंह | 1680-1698 ई. | औरंगजेब के साथ जजिया-कर संधि (24 जून 1681 ई.); जयसमंद झील का निर्माण (1687-1691 ई., गोमती नदी पर) |
| अमर सिंह द्वितीय | 1698-1710 ई. | देबारी समझौता (1708 ई., उदयपुर) — आमेर के सवाई जयसिंह व मारवाड़ के अजीत सिंह के साथ मुगलों-विरोधी त्रिपक्षीय संधि; दुर्गादास राठौड़ को शरण व विजयपुर की जागीर |
| संग्राम सिंह द्वितीय | 1710-1734 ई. | सहेलियों की बाड़ी (उदयपुर) व वैद्यनाथ मंदिर (सिसारमा) का निर्माण; हुरड़ा सम्मेलन की मूल योजना (मृत्यु से पहले) |
| जगत सिंह द्वितीय | 1734-1751 ई. | हुरड़ा सम्मेलन की अध्यक्षता (17 जुलाई 1734, भीलवाड़ा) — मराठा-विरोधी राजपूत एकता का प्रयास, जो शासकों की आपसी स्वार्थ-भावना के कारण असफल रहा; जगनिवास महल (पिछोला झील) का निर्माण |
| महाराणा भीम सिंह | 1778-1828 ई. | कृष्णा कुमारी विवाद — जोधपुर व जयपुर दोनों के दावों के चलते गिंगोली का युद्ध (1807 ई.); कृष्णा कुमारी को अंततः विष देकर मरवा दिया गया; ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि (13 जनवरी 1818 ई.) |
| महाराणा स्वरूप सिंह | 1842-1861 ई. | सामाजिक सुधार — कन्या-वध प्रतिबंध (1844), डाकन प्रथा समाप्त (1853), सती प्रथा प्रतिबंध (15 अगस्त 1861); निधन पर पासवान एंजाबाई का सती होना मेवाड़ की अंतिम सती-घटना मानी जाती है; 1857 के विद्रोह में ब्रिटिश सरकार का समर्थन किया |
आगे की कड़ी: 19वीं-20वीं शताब्दी में मेवाड़ में हुए बिजोलिया किसान आंदोलन, भील आंदोलन (गोविंद गुरु) व मेवाड़ प्रजामंडल आंदोलन का विस्तृत वर्णन आगे अध्याय 14 (किसान एवं जनजातीय आंदोलन) व अध्याय 15 (प्रजामंडल आंदोलन) में मिलेगा; मेवाड़ के भारत में विलय (1949) का वर्णन अध्याय 16 (राजस्थान का एकीकरण) में है।
11मेवाड़ की सांस्कृतिक विरासत
A. वास्तुकला — विश्व धरोहर स्थल
- कुंभलगढ़ दुर्ग — भारत की "महान दीवार" कहलाती है, दीवार की लंबाई लगभग 36 किमी (चीन की दीवार के बाद विश्व की दूसरी सबसे लंबी दीवार); महाराणा प्रताप का जन्म-स्थल; निर्माण/पुनर्निर्माण 1448-1458 ई., वास्तुकार मंडन।
- चित्तौड़गढ़ का विजय स्तंभ (कीर्ति स्तंभ) व जैन कीर्ति स्तंभ (12वीं शताब्दी, जैन व्यापारी जीजाशाह बघेरवाल द्वारा निर्मित, आदिनाथ को समर्पित, 7 मंजिला) दोनों प्रसिद्ध हैं।
- रणकपुर जैन मंदिर (पाली) — निर्माता धरणा शाह, शिल्पी देपाक, आदिनाथ को समर्पित, 1444 खंभों के कारण "स्तंभों का संग्रहालय" कहलाता है।
मेवाड़ के प्रमुख स्थापत्य स्मारक — एक नज़र में
| स्मारक (Monument) | स्थान (Location) | निर्माता/काल (Builder/Period) | विशेषता (Significance) |
|---|
| कुंभलगढ़ दुर्ग | राजसमंद | महाराणा कुंभा, 1443-58 ई. | 36 किमी दीवार; UNESCO सूची (2013) |
| विजय स्तंभ | चित्तौड़गढ़ | महाराणा कुंभा, 1440-48 ई. | 9 मंजिला, विष्णु को समर्पित |
| जैन कीर्ति स्तंभ | चित्तौड़गढ़ | जीजाशाह बघेरवाल, 12वीं सदी | 7 मंजिला, आदिनाथ को समर्पित |
| रणकपुर जैन मंदिर | पाली | धरणा शाह, शिल्पी देपाक | 1444 खंभे — "स्तंभों का संग्रहालय" |
| जगदीश/जगन्नाथ मंदिर | उदयपुर | जगत सिंह प्रथम, 1650 ई. | नागर/पंचायतन शैली |
| श्रीनाथजी मंदिर | नाथद्वारा, राजसमंद | राज सिंह प्रथम | वल्लभ/पुष्टिमार्ग संप्रदाय की प्रमुख पीठ |
| द्वारकाधीश मंदिर | कांकरोली, राजसमंद | राज सिंह प्रथम | द्वारकाधीश स्वरूप को समर्पित |
| अंबिका माता मंदिर | जगत, उदयपुर | — | "मेवाड़ का खजुराहो" उपनाम |
करंट अफेयर्स — UNESCO विश्व धरोहर: "राजस्थान के पहाड़ी दुर्ग" (Hill Forts of Rajasthan) — चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, आमेर, जैसलमेर, रणथंभौर व गागरोन — छह दुर्गों का समूह वर्ष 2013 में UNESCO विश्व धरोहर सूची में शामिल हुआ। इनमें से चित्तौड़गढ़ व कुंभलगढ़ दोनों मेवाड़ (गुहिल-सिसोदिया वंश) की देन हैं।
B. साहित्य, संगीत एवं भक्ति परंपरा
- मीरा बाई — मेवाड़ की राजवधू (महाराणा कुंभा के पुत्र भोजराज की पत्नी) एवं भक्ति-काल की सबसे प्रसिद्ध कवयित्री। इनकी पदावली में प्रेम, भक्ति व ईश्वर के प्रति समर्पण का भाव प्रधान है; इन्हें कृष्ण-भक्ति शाखा (सगुण भक्ति) की प्रमुख संत-कवयित्री माना जाता है। मीरा द्वारा चित्तौड़ में पूजी गई श्याम-वर्ण कृष्ण-प्रतिमा को आगे चलकर आमेर के मानसिंह प्रथम द्वारा जगत शिरोमणि मंदिर (आमेर) में स्थापित किया गया।
- चक्रपाणि मिश्र (महाराणा प्रताप के दरबारी विद्वान) की रचनाएं — विश्ववल्लभ, मुहूर्तमाला, राज्याभिषेक पद्धति, व्यवहारदर्श। जैन मुनि हेमरत्न सूरि रचित "गौरा-बादल पद्मिनी चरित चौपाई"। कवि दुरसा आढ़ा ने प्रताप पर "विरुद्ध छिहत्तरी" लिखी।
- हल्दीघाटी युद्ध के वर्णन के प्रमुख स्रोत — अब्दुल कादिर बदायूंनी कृत "मुंतखब-उल-तवारीख" (फारसी) व अबुल फजल कृत "अकबरनामा/आईने अकबरी"।
मेवाड़ से संबंधित प्रमुख साहित्यिक स्रोत — एक नज़र में
| ग्रंथ/स्रोत (Work/Source) | रचयिता (Author) | संबंधित विषय (Related Topic) |
|---|
| संगीतराज, कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति | महाराणा कुंभा, महेश भट्ट | कुंभा का संगीत व साहित्यिक योगदान |
| विश्ववल्लभ, राज्याभिषेक पद्धति | चक्रपाणि मिश्र | महाराणा प्रताप के दरबारी ग्रंथ |
| गौरा-बादल पद्मिनी चरित चौपाई | हेमरत्न सूरि (जैन मुनि) | प्रथम साका व रानी पद्मिनी |
| विरुद्ध छिहत्तरी | दुरसा आढ़ा | महाराणा प्रताप की प्रशस्ति |
| मुंतखब-उल-तवारीख (फारसी) | अब्दुल कादिर बदायूंनी | हल्दीघाटी युद्ध का वर्णन |
| अकबरनामा/आईने अकबरी (फारसी) | अबुल फजल | हल्दीघाटी युद्ध व अकबर-मेवाड़ संबंध |
| राजप्रशस्ति, वंशावली | रणछोड़ भट्ट तैलंग | राज सिंह प्रथम व राजसमंद झील |
| जगन्नाथ प्रशस्ति | कृष्णभट्ट | जगदीश मंदिर व हल्दीघाटी में प्रताप की विजय का दावा |
रावल शाखा (Rawal Branch)
- क्षेमसिंह द्वारा स्थापित (1158 ई.)
- राजधानी — चित्तौड़
- अंतिम शासक — रावल रतनसिंह (1303 ई. में अंत)
- प्रथम साका इसी शाखा के अधीन हुआ
राणा/सिसोदिया शाखा (Rana/Sisodia Branch)
- सहप द्वारा स्थापित, सिसोदा गांव में (1158 ई.)
- वास्तविक स्थापना राणा हम्मीर द्वारा (1326 ई.)
- द्वितीय व तृतीय साका इसी शाखा के अधीन हुए
- 1947 ई. तक निरंतर शासन — भारत में विलय तक
★ अध्याय सार — महत्वपूर्ण तथ्य ★
1. गुहिलादित्य (566 ई.) गुहिल वंश के संस्थापक माने जाते हैं; बप्पा रावल (734-753 ई.) ने मानमोरी मौर्य को हराकर गुहिल साम्राज्य की वास्तविक नींव रखी। 2. रणसिंह (1158 ई.) के समय गुहिल वंश रावल शाखा (क्षेमसिंह) व राणा/सिसोदिया शाखा (सहप) में बंटा। 3. चित्तौड़ का प्रथम साका (1303 ई.) अलाउद्दीन खिलजी के विरुद्ध रावल रतनसिंह व रानी पद्मिनी के नेतृत्व में हुआ — इसी के साथ रावल शाखा समाप्त हो गई। 4. राणा हम्मीर (1326-1364 ई.) को सिसोदिया वंश का वास्तविक संस्थापक व "मेवाड़ का उद्धारक" कहा जाता है; 1336 ई. में सिंगोली के युद्ध में मुहम्मद बिन तुगलक को हराया। 5. महाराणा कुंभा (1433-1468 ई.) ने चित्तौड़गढ़ में विजय स्तंभ बनवाया व कुंभलगढ़ सहित 32 दुर्गों का निर्माण करवाया — "राजस्थानी स्थापत्य कला के जनक"। 6. राणा सांगा (1509-1528 ई.) खानवा के युद्ध (1527 ई.) में बाबर से पराजित हुए; इनकी सेना में लगभग सभी प्रमुख राजपूत राज्य शामिल थे। 7. चित्तौड़ का द्वितीय साका (1535 ई.) बहादुरशाह (गुजरात) के विरुद्ध रानी कर्मावती के नेतृत्व में हुआ; तृतीय व अंतिम साका (1568 ई.) अकबर के विरुद्ध जयमल-फत्ता व रानी फूल कंवर के नेतृत्व में हुआ। 8. राणा उदयसिंह ने 1559 ई. में उदयपुर की स्थापना की, जो आगे मेवाड़ की स्थायी राजधानी बनी। 9. महाराणा प्रताप (1572-1597 ई.) ने हल्दीघाटी युद्ध (1576 ई.) व दिवेर के युद्ध (1582 ई., "मेवाड़ का मैराथन") में अकबर से संघर्ष किया और कभी मुगल अधीनता स्वीकार नहीं की। 10. भामाशाह ने प्रताप को आर्थिक सहायता देकर संघर्ष जारी रखने में मदद की — इन्हें "मेवाड़ का उद्धारक" कहा जाता है। 11. महाराणा अमर सिंह प्रथम मेवाड़ के पहले शासक थे जिन्होंने मुगलों से संधि (चित्तौड़ की संधि, 1615 ई.) की। 12. महाराणा राज सिंह प्रथम (1652-1680 ई.) ने औरंगजेब की मंदिर-विध्वंस नीति के विरुद्ध श्रीनाथजी, द्वारकाधीश व अंबिका माता मंदिर बनवाए तथा राजसमंद झील का निर्माण करवाया, जहां विश्व का सबसे बड़ा शिलालेख (राजप्रशस्ति) स्थापित है। 13. दुर्गादास राठौड़ की सहायता से सिसोदिया-राठौड़ गठबंधन बना, जिसने औरंगजेब का लंबे समय तक विरोध किया। 14. हाड़ी रानी व पन्नाधाय — मेवाड़ के इतिहास की दो सबसे बड़ी बलिदान-गाथाएं हैं। 15. मीरा बाई (महाराणा कुंभा के पुत्र भोजराज की पत्नी) भक्ति-काल की प्रमुख कृष्ण-भक्त कवयित्री थीं। 16. महाराणा भीम सिंह ने 1818 ई. में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि की; महाराणा स्वरूप सिंह ने 1861 ई. में सती प्रथा पर प्रतिबंध लगाया। 17. "राजस्थान के पहाड़ी दुर्ग" (चित्तौड़गढ़ व कुंभलगढ़ सहित 6 दुर्ग) वर्ष 2013 में UNESCO विश्व धरोहर सूची में शामिल हुए।
नीचे दी समय-रेखा (Timeline) इस अध्याय के सभी महत्वपूर्ण वर्षों को एक साथ जोड़ती है — रिवीजन के लिए इसे ज़रूर दोहराएं:
| वर्ष (Year) | घटना/Event | महत्व |
|---|
| 566 ई. | गुहिलादित्य द्वारा गुहिल वंश की स्थापना (नागदा) | गुहिल वंश का प्रारंभ |
| 734 ई. | बप्पा रावल द्वारा मानमोरी मौर्य की पराजय | गुहिल साम्राज्य की वास्तविक स्थापना |
| 977 ई. | अल्लट का आहड़ अभिलेख | आहड़ राजधानी बनने व नौकरशाही प्रणाली का प्रमाण |
| 1158 ई. | रणसिंह के समय गुहिल वंश का विभाजन | रावल व राणा (सिसोदिया) शाखाओं की शुरुआत |
| 1227 ई. | भूताला का युद्ध — जैत्रसिंह बनाम इल्तुतमिश | मेवाड़ के "स्वर्ण युग" की शुरुआत |
| 26 अगस्त 1303 ई. | चित्तौड़ का प्रथम साका — रानी पद्मिनी का जौहर | रावल शाखा का अंत, अलाउद्दीन खिलजी की विजय |
| 1336 ई. | सिंगोली का युद्ध — राणा हम्मीर की विजय | सिसोदिया वंश की स्वतंत्रता की स्थापना |
| 1437 ई. | सारंगपुर का युद्ध व विजय स्तंभ निर्माण प्रारंभ | महाराणा कुंभा की सबसे बड़ी विजय |
| 1453 ई. | आंवल-बांवल की संधि | मेवाड़-मारवाड़ सीमा निर्धारण |
| 1460 ई. | कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति | कुंभा के साहित्यिक-सांगीतिक योगदान का प्रमाण |
| 1468 ई. | ऊदा द्वारा महाराणा कुंभा की हत्या | कुंभा के स्वर्णयुग का अंत |
| 17 मार्च 1527 ई. | खानवा का युद्ध — राणा सांगा बनाम बाबर | राजपूत संघ की पराजय, मुगल सत्ता की नींव |
| 8 मार्च 1535 ई. | चित्तौड़ का द्वितीय साका — रानी कर्मावती का जौहर | बहादुरशाह की अस्थायी विजय |
| 1559 ई. | उदयपुर नगर की स्थापना | मेवाड़ की नई स्थायी राजधानी |
| 25 फरवरी 1568 ई. | चित्तौड़ का तृतीय व अंतिम साका | अकबर की चित्तौड़ पर विजय |
| 18/21 जून 1576 ई. | हल्दीघाटी का युद्ध — प्रताप बनाम मानसिंह | मेवाड़ के प्रतिरोध का प्रतीक युद्ध |
| अक्टूबर 1582 ई. | दिवेर का युद्ध ("मेवाड़ का मैराथन") | प्रताप की सैन्य पुनर्वापसी का प्रारंभ |
| 19 जनवरी 1597 ई. | महाराणा प्रताप का निधन (चावंड) | मुगल-अधीनता कभी स्वीकार न करने वाले शासक का अंत |
| 5 फरवरी 1615 ई. | चित्तौड़ की संधि — अमर सिंह प्रथम व मुगल | मेवाड़ द्वारा पहली बार मुगल अधीनता स्वीकार |
| 1 जनवरी 1662 – 14 जनवरी 1676 ई. | राजसमंद झील का निर्माण (राज सिंह प्रथम) | अकाल-राहत हेतु निर्मित एकमात्र झील |
| 1679 ई. | औरंगजेब द्वारा जजिया कर पुनः लागू | राज सिंह-औरंगजेब वैमनस्य चरम पर |
| 17 जुलाई 1734 ई. | हुरड़ा सम्मेलन (भीलवाड़ा) | मराठा-विरोधी राजपूत एकता का असफल प्रयास |
| 13 जनवरी 1818 ई. | महाराणा भीम सिंह की ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि | मेवाड़ पर ब्रिटिश अधीनस्थ संधि लागू |
| 15 अगस्त 1861 ई. | महाराणा स्वरूप सिंह द्वारा सती प्रथा पर प्रतिबंध | मेवाड़ में सामाजिक सुधार की दिशा में बड़ा कदम |
| 2013 ई. | "राजस्थान के पहाड़ी दुर्ग" UNESCO सूची में शामिल | चित्तौड़गढ़ व कुंभलगढ़ को अंतरराष्ट्रीय मान्यता |
📢 विज्ञापन
🔥 सबसे लोकप्रिय
📘
RAS Foundation Course 2026 🕉️