🗡️ अध्याय 6/16 — राजस्थान का इतिहास

मेवाड़ — गुहिल-सिसोदिया वंश

Mewar: Guhila-Sisodia Dynasty | RAS Pre + Mains
📋 इस अध्याय में
  1. मेवाड़ रियासत का परिचय — नामकरण, प्रारंभिक राजधानी एवं गुहिल वंश की उत्पत्ति
  2. गुहिल वंश के प्रारंभिक शासक — गुहिलादित्य, बप्पा रावल, अल्लट
  3. रावल शाखा का उत्कर्ष एवं अंत — जैत्रसिंह से रानी पद्मिनी तक
  4. सिसोदिया वंश (राणा शाखा) की स्थापना — राणा हम्मीर से राणा लाखा तक
  5. महाराणा कुम्भा — मेवाड़ का स्वर्ण युग एवं स्थापत्य कला
  6. राणा सांगा एवं खानवा का युद्ध
  7. द्वितीय व तृतीय साका — राणा विक्रमादित्य से राणा उदयसिंह तक, उदयपुर की स्थापना
  8. महाराणा प्रताप — हल्दीघाटी एवं दिवेर के युद्ध
  9. अमर सिंह प्रथम से राज सिंह प्रथम तक — मुगलों से संधि एवं धार्मिक संरक्षण
  10. उत्तरकालीन सिसोदिया शासक, मराठा हस्तक्षेप एवं ब्रिटिश संधि
  11. मेवाड़ की सांस्कृतिक विरासत

कल्पना कीजिए — एक 3 साल का बालक, जिसके पिता की हत्या हो चुकी है, अपनी विधवा मां के साथ शरण लेने के लिए भटक रहा है। वही बालक आगे चलकर एक ऐसा साम्राज्य खड़ा करता है, जो 1350 वर्षों (6ठी शताब्दी से 1947 ई. तक) तक अजेय रहा — जिसे न दिल्ली सल्तनत झुका सकी, न मुगल साम्राज्य। यह कहानी है बप्पा रावल की, और उस राजवंश की जिसे हम गुहिल-सिसोदिया वंश कहते हैं। यह वही वंश है जिसने राणा सांगा जैसा योद्धा दिया जिसका शरीर 80 घावों का निशान बन गया था, महाराणा प्रताप जैसा स्वाभिमानी शासक दिया जिसने कभी अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की, और तीन बार चित्तौड़ के साके (जौहर) देखे — जहां हज़ारों राजपूत महिलाओं ने मौत को गले लगाया पर सम्मान नहीं खोया। यह अध्याय मेवाड़ की उसी गौरवशाली, बलिदानी और अजेय गाथा की पूरी कहानी है।

1मेवाड़ रियासत का परिचय — नामकरण, प्रारंभिक राजधानी एवं गुहिल वंश की उत्पत्ति

A. गुहिल वंश की उत्पत्ति के मत

गुहिलों की उत्पत्ति को लेकर भी इतिहासकारों में मतभेद है, ठीक वैसे ही जैसे पिछले अध्याय में हमने प्रतिहार व परमार वंश की उत्पत्ति के विभिन्न मत देखे थे:

विद्वान/स्रोत (Scholar/Source)मत (Opinion)
अबुल फजलगुहिल ईरान के नौशाखान के वंशज थे
कर्नल जेम्स टॉडगुहिलों का मूल स्थान वल्लभी (गुजरात) माना
कवि श्यामलदासगुहिलों को वल्लभी मूल का बताया
डॉ. डी.आर. भंडारकर व डॉ. गोपीनाथ शर्माआनंदपुर परंपरा अनुसार ब्राह्मण मूल
कुम्भलगढ़ अभिलेख व एकलिंग महात्म्यगुहिलों को सूर्यवंशी (सूर्य के वंशज) बताया गया
डॉ. जी.एच. ओझागुहिलों को सूर्यवंशी राजपूत माना — ब्राह्मण-मूल सिद्धांत के विरुद्ध
ऐतिहासिक परंपरावल्लभी के शासक शिलादित्य को गुहिल का पिता माना जाता है

B. धार्मिक मान्यताएं एवं राजचिह्न

2गुहिल वंश के प्रारंभिक शासक — गुहिलादित्य, बप्पा रावल, अल्लट

👑 बप्पा रावल / कालभोज (734-753 ई.) गुहिल साम्राज्य के वास्तविक संस्थापक

प्रारंभिक गुहिल शासकों की सूची — एक नज़र में

शासक (Ruler)काल (Period)प्रमुख तथ्य (Key Fact)
गुहिलादित्य566 ई.गुहिल वंश के संस्थापक; राजधानी नागदा
बप्पा रावल (कालभोज)734-753 ई.मानमोरी मौर्य को हराकर गुहिल साम्राज्य की वास्तविक स्थापना (विस्तार ऊपर dynastyBox में)
अल्लट/आलूरावलगभग 977 ई.राजधानी आहड़ स्थानांतरित; मेवाड़ में प्रथम नौकरशाही व्यवस्था लागू; प्रतिहार शासक देवपाल को हराया
नरवाहनसीमित ऐतिहासिक जानकारी उपलब्ध
शक्तिकुमारमुंज परमार द्वारा आहड़ ध्वस्त; राजधानी चित्तौड़गढ़ स्थानांतरित

3रावल शाखा का उत्कर्ष एवं अंत — जैत्रसिंह से रानी पद्मिनी तक

रावल शाखा के शासक — एक नज़र में

शासक (Ruler)काल (Period)प्रमुख घटना (Key Event)
रणसिंह1158 ई.गुहिल वंश का रावल व राणा (सिसोदिया) शाखाओं में विभाजन
जैत्रसिंह1213-1253 ई.राजधानी नागदा से चित्तौड़ स्थानांतरित; भूताला के युद्ध (1227 ई.) में इल्तुतमिश को हराया — "मेवाड़ का स्वर्ण युग"
तेजसिंह1253-1273 ई.दिल्ली सुल्तान बलबन के आक्रमण को विफल किया; मेवाड़ का प्रथम चित्रित ग्रंथ (1260 ई.) रचा गया
समरसिंह1273-1302 ई.चीरवा अभिलेख में धर्म-संरक्षक बताया गया; अलाउद्दीन खिलजी की सेना से क्षतिपूर्ति वसूली
रावल रतनसिंह1302-1303 ई.रावल शाखा के अंतिम शासक — पूर्ण विवरण नीचे dynastyBox में देखें

👑 रावल रतनसिंह (1302-1303 ई.) गुहिल वंश की रावल शाखा के अंतिम शासक

💡 साका (Saka) क्या है, और यह जौहर से कैसे अलग है?

"साका" शब्द राजपूत परंपरा में एक संपूर्ण घटना-चक्र के लिए प्रयोग होता है — जब किला हारना निश्चित हो जाए, तब पहले महिलाएं व बच्चे "जौहर" (सामूहिक अग्नि-समाधि) द्वारा अपने सम्मान की रक्षा करते हैं, और फिर पुरुष योद्धा केसरिया वस्त्र धारण कर शत्रु-सेना पर टूट पड़ते हैं, यह जानते हुए भी कि अब जीवित लौटना संभव नहीं — इसे "केसरिया करना" कहा जाता है। चित्तौड़गढ़ के इतिहास में ऐसे तीन साके हुए — 1303 ई. (अलाउद्दीन खिलजी के विरुद्ध, रानी पद्मिनी), 1535 ई. (बहादुरशाह के विरुद्ध, रानी कर्णावती) व 1568 ई. (अकबर के विरुद्ध, फूल कंवर) — तीनों की पूरी तुलना आगे इसी अध्याय में एक तालिका में दी गई है।

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4सिसोदिया वंश (राणा शाखा) की स्थापना — राणा हम्मीर से राणा लाखा तक

👑 राणा हम्मीर सिसोदिया (1326-1364 ई.) "मेवाड़ का उद्धारक" एवं सिसोदिया वंश के वास्तविक संस्थापक

सिसोदिया वंश के प्रारंभिक शासक — एक नज़र में

शासक (Ruler)काल (Period)प्रमुख कार्य/घटना
राणा हम्मीर1326-1364 ई.सिसोदिया वंश की वास्तविक स्थापना; सिंगोली का युद्ध (1336 ई.) — पूर्ण विवरण ऊपर dynastyBox में
राणा क्षेत्रसिंह/खेता1364-1382 ई.मालवा के दिलावर खान को हराया; बूंदी से युद्ध में वीरगति
राणा लाखा/लक्षसिंह1382-1421 ई.जावर चांदी-सीसे खान की खोज; पिछोला झील निर्माण (बंजारा छीतर द्वारा); हंसा देवी से विवाह
राणा चूंडाहंसा देवी के पुत्र मोकल हेतु राजसिंहासन त्याग — "मेवाड़ का भीष्म पितामह"; सलूम्बर ठिकाना प्राप्त
राणा मोकल1421-1433 ई.1428 ई. में गुजरात के अहमदशाह को हराया; चाचा-मेरा द्वारा हत्या (1433 ई.)

5महाराणा कुम्भा — मेवाड़ का स्वर्ण युग एवं स्थापत्य कला

👑 महाराणा कुम्भा (1433-1468 ई.) "राजस्थानी स्थापत्य कला के जनक", मेवाड़ के सबसे महान शासकों में से एक

महाराणा कुंभा द्वारा निर्मित प्रमुख दुर्ग एवं स्मारक

दुर्ग/स्मारक (Fort/Monument)स्थान (District)विशेषता (Significance)
कुंभलगढ़राजसमंद36 किमी लंबी दीवार — "भारत की महान दीवार"; प्रताप का जन्मस्थान; UNESCO सूची (2013) में शामिल
विजय स्तंभ (चित्तौड़गढ़)चित्तौड़गढ़1440-1448 ई., 9 मंजिला, सारंगपुर-विजय की स्मृति में निर्मित
अचलगढ़माउंट आबू, सिरोहीकुंभा द्वारा पुनर्निर्मित दुर्ग
बसंतगढ़सिरोहीकुंभा द्वारा निर्मित दुर्ग
भोमट दुर्गउदयपुरभीलों पर नियंत्रण हेतु निर्मित
मचान दुर्गमेवाड़ क्षेत्रमेरों पर नियंत्रण हेतु निर्मित

रायमल एवं उत्तराधिकार: पितृहंता ऊदा को मेवाड़ के सरदारों ने हटाकर रायमल (1473-1509 ई., कुंभा के पुत्र) को शासक बनाया — इसे "दाड़िमपुर की विजय" कहा जाता है। रायमल के बड़े पुत्र पृथ्वीराज सिसोदिया "उड़ना राजकुमार" नाम से प्रसिद्ध थे, परंतु राजगद्दी रायमल के तीसरे पुत्र संग्राम सिंह (राणा सांगा) को मिली।

6राणा सांगा एवं खानवा का युद्ध

👑 महाराणा सांगा (संग्राम सिंह प्रथम) (1509-1528 ई.) "हिन्दूपत" व "सैनिकों का भग्नावशेष" — भारत के सबसे घायल योद्धा-राजाओं में से एक

महाराणा सांगा के प्रमुख युद्ध — एक नज़र में

युद्ध (Battle)वर्षप्रतिद्वंद्वी (Opponent)परिणाम (Result)
खातौली का युद्ध1517 ई.इब्राहिम लोदी (दिल्ली सल्तनत)सांगा विजयी, परंतु स्वयं गंभीर घायल (एक आंख व हाथ बेकार)
बाड़ी का युद्ध1518 ई.इब्राहिम लोदी (सेनापति मियां मखन/हुसैन)सांगा विजयी
गागरोन का युद्ध1519 ई.महमूद खिलजी द्वितीय (मालवा)सांगा विजयी; बाद में उदारतापूर्वक रिहा किया
बयाना का युद्ध16 फरवरी 1527 ई.बाबर (सेनापति मेहदी ख्वाजा)सांगा विजयी
खानवा का युद्ध17 मार्च 1527 ई.बाबर (स्वयं)सांगा पराजित — झाला अज्जा वीरगति
"जब तक शत्रुओं को पराजित नहीं करूंगा, तब तक चित्तौड़ के फाटक में प्रवेश नहीं करूंगा।" — महाराणा सांगा की प्रतिज्ञा

7द्वितीय व तृतीय साका — राणा विक्रमादित्य से राणा उदयसिंह तक, उदयपुर की स्थापना

👑 चित्तौड़ का द्वितीय साका (1535 ई.) गुजरात के बहादुरशाह के विरुद्ध, रानी कर्मावती के नेतृत्व में

💡 पन्नाधाय का बलिदान — मेवाड़ की सबसे मार्मिक कहानी

बनवीर अब सिंहासन का एकमात्र दावेदार खत्म करना चाहता था — छोटे राजकुमार उदयसिंह को भी मारना चाहता था। उदयसिंह की धाय मां पन्नाधाय ने एक असंभव फैसला लिया — उसने अपने ही पुत्र चंदन को उदयसिंह के पालने में सुलाकर बनवीर की तलवार का शिकार होने दिया, और सच्चे राजकुमार उदयसिंह को टोकरी में छिपाकर रातों-रात कुंभलगढ़ पहुंचा दिया, जहां कीरत व वारीन दंपति ने उसकी परवरिश की। एक धाय मां की इस कुर्बानी ने मेवाड़ को उसका भावी सबसे प्रतिष्ठित उत्तराधिकारी — महाराणा प्रताप का पिता उदयसिंह — बचा लिया। यही कारण है कि पन्नाधाय को आज भी मेवाड़ की सबसे पूजनीय वीरांगनाओं में गिना जाता है।

👑 महाराणा उदयसिंह (1540-1572 ई.) उदयपुर के संस्थापक, महाराणा प्रताप के पिता

👑 चित्तौड़ का तृतीय एवं अंतिम साका (1567-1568 ई.) अकबर के विरुद्ध, जयमल-फत्ता के नेतृत्व में

चित्तौड़ के तीनों साकों की तुलना

साका (Saka)वर्षआक्रमणकारीमेवाड़ का नेतृत्व
प्रथम साका1303 ई.अलाउद्दीन खिलजी (दिल्ली सल्तनत)रावल रतनसिंह, रानी पद्मिनी (जौहर), वीर गोरा-बादल
द्वितीय साका8 मार्च 1535 ई.बहादुरशाह (गुजरात)राणा विक्रमादित्य (अवयस्क), रानी कर्मावती (जौहर)
तृतीय साका25 फरवरी 1568 ई.अकबर (मुगल)जयमल-फत्ता (रक्षक), फूल कंवर (जौहर)
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8महाराणा प्रताप — हल्दीघाटी एवं दिवेर के युद्ध

👑 महाराणा प्रताप (1572-1597 ई.) "मेवाड़ का रक्षक", "हल्दीघाटी का शेर" — जिसने कभी मुगल अधीनता स्वीकार नहीं की

अकबर द्वारा भेजे गए 4 शिष्टमंडल — एक नज़र में

दूत (Envoy)वर्ष (Year)परिणाम (Result)
जलाल खां कोरचीअगस्त/नवंबर 1572 ई.असफल
मानसिंह कछवाहाजून 1573 ई.असफल
भगवानदासअक्टूबर 1573 ई.असफल
टोडरमलदिसंबर 1573 ई.असफल

हल्दीघाटी बनाम दिवेर — तुलनात्मक तालिका

युद्ध (Battle)वर्ष (Year)मुगल नेतृत्व (Mughal Leader)परिणाम (Result)
हल्दीघाटी का युद्ध18/21 जून 1576 ई.मानसिंह कछवाहाअधिकांश इतिहासकारों अनुसार अनिर्णायक; राजस्थान सरकार व राजप्रशस्ति अनुसार प्रताप विजयी
दिवेर का युद्धअक्टूबर 1582 ई.सुल्तान खां (किलेदार)प्रताप की निर्णायक विजय — "मेवाड़ का मैराथन"; 36 मुगल चौकियां मुक्त
"यदि राणा सांगा व महाराणा प्रताप के बीच उदयसिंह न होते, तो मेवाड़ का इतिहास और भी गौरवशाली होता।" — कर्नल जेम्स टॉड

9अमर सिंह प्रथम से राज सिंह प्रथम तक — मुगलों से संधि एवं धार्मिक संरक्षण

👑 महाराणा अमर सिंह प्रथम (1597-1620 ई.) मेवाड़ के पहले शासक जिन्होंने मुगल अधीनता स्वीकार की

करण सिंह एवं जगत सिंह प्रथम — एक नज़र में

शासक (Ruler)काल (Period)प्रमुख कार्य (Key Achievement)
करण सिंह1620-1628 ई.मुगल दरबार में स्वयं उपस्थित होने वाले पहले मेवाड़ शासक; जहांगीर से "राणा" उपाधि व सम्मान-वस्त्र; शहजादा खुर्रम को जगमंदिर में शरण दी
जगत सिंह प्रथम1628-1652 ई.मेवाड़ चित्रकला का स्वर्ण युग; जगदीश मंदिर व जगमंदिर पूर्ण; 1631 ई. में प्रतापगढ़ पृथक रियासत बनी

👑 महाराणा राज सिंह प्रथम (1652-1680 ई.) उपाधि "विजयकटकत्तु" — मंदिर-निर्माता एवं औरंगजेब के प्रबल विरोधी

10उत्तरकालीन सिसोदिया शासक, मराठा हस्तक्षेप एवं ब्रिटिश संधि

राज सिंह प्रथम के बाद के शासकों के समय मेवाड़ को क्रमशः मुगल दबाव, मराठा हस्तक्षेप व अंततः ब्रिटिश अधीनता का सामना करना पड़ा — यह पूरा घटनाक्रम आगे अध्याय 12 (मराठा हस्तक्षेप एवं ब्रिटिश संधियाँ) में विस्तार से पढ़ेंगे; यहां केवल मेवाड़-विशिष्ट प्रमुख घटनाएं दी जा रही हैं:

शासक (Ruler)काल (Period)प्रमुख घटना (Key Event)
जय सिंह1680-1698 ई.औरंगजेब के साथ जजिया-कर संधि (24 जून 1681 ई.); जयसमंद झील का निर्माण (1687-1691 ई., गोमती नदी पर)
अमर सिंह द्वितीय1698-1710 ई.देबारी समझौता (1708 ई., उदयपुर) — आमेर के सवाई जयसिंह व मारवाड़ के अजीत सिंह के साथ मुगलों-विरोधी त्रिपक्षीय संधि; दुर्गादास राठौड़ को शरण व विजयपुर की जागीर
संग्राम सिंह द्वितीय1710-1734 ई.सहेलियों की बाड़ी (उदयपुर) व वैद्यनाथ मंदिर (सिसारमा) का निर्माण; हुरड़ा सम्मेलन की मूल योजना (मृत्यु से पहले)
जगत सिंह द्वितीय1734-1751 ई.हुरड़ा सम्मेलन की अध्यक्षता (17 जुलाई 1734, भीलवाड़ा) — मराठा-विरोधी राजपूत एकता का प्रयास, जो शासकों की आपसी स्वार्थ-भावना के कारण असफल रहा; जगनिवास महल (पिछोला झील) का निर्माण
महाराणा भीम सिंह1778-1828 ई.कृष्णा कुमारी विवाद — जोधपुर व जयपुर दोनों के दावों के चलते गिंगोली का युद्ध (1807 ई.); कृष्णा कुमारी को अंततः विष देकर मरवा दिया गया; ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि (13 जनवरी 1818 ई.)
महाराणा स्वरूप सिंह1842-1861 ई.सामाजिक सुधार — कन्या-वध प्रतिबंध (1844), डाकन प्रथा समाप्त (1853), सती प्रथा प्रतिबंध (15 अगस्त 1861); निधन पर पासवान एंजाबाई का सती होना मेवाड़ की अंतिम सती-घटना मानी जाती है; 1857 के विद्रोह में ब्रिटिश सरकार का समर्थन किया

आगे की कड़ी: 19वीं-20वीं शताब्दी में मेवाड़ में हुए बिजोलिया किसान आंदोलन, भील आंदोलन (गोविंद गुरु) व मेवाड़ प्रजामंडल आंदोलन का विस्तृत वर्णन आगे अध्याय 14 (किसान एवं जनजातीय आंदोलन) व अध्याय 15 (प्रजामंडल आंदोलन) में मिलेगा; मेवाड़ के भारत में विलय (1949) का वर्णन अध्याय 16 (राजस्थान का एकीकरण) में है।

11मेवाड़ की सांस्कृतिक विरासत

A. वास्तुकला — विश्व धरोहर स्थल

मेवाड़ के प्रमुख स्थापत्य स्मारक — एक नज़र में

स्मारक (Monument)स्थान (Location)निर्माता/काल (Builder/Period)विशेषता (Significance)
कुंभलगढ़ दुर्गराजसमंदमहाराणा कुंभा, 1443-58 ई.36 किमी दीवार; UNESCO सूची (2013)
विजय स्तंभचित्तौड़गढ़महाराणा कुंभा, 1440-48 ई.9 मंजिला, विष्णु को समर्पित
जैन कीर्ति स्तंभचित्तौड़गढ़जीजाशाह बघेरवाल, 12वीं सदी7 मंजिला, आदिनाथ को समर्पित
रणकपुर जैन मंदिरपालीधरणा शाह, शिल्पी देपाक1444 खंभे — "स्तंभों का संग्रहालय"
जगदीश/जगन्नाथ मंदिरउदयपुरजगत सिंह प्रथम, 1650 ई.नागर/पंचायतन शैली
श्रीनाथजी मंदिरनाथद्वारा, राजसमंदराज सिंह प्रथमवल्लभ/पुष्टिमार्ग संप्रदाय की प्रमुख पीठ
द्वारकाधीश मंदिरकांकरोली, राजसमंदराज सिंह प्रथमद्वारकाधीश स्वरूप को समर्पित
अंबिका माता मंदिरजगत, उदयपुर"मेवाड़ का खजुराहो" उपनाम

करंट अफेयर्स — UNESCO विश्व धरोहर: "राजस्थान के पहाड़ी दुर्ग" (Hill Forts of Rajasthan) — चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, आमेर, जैसलमेर, रणथंभौर व गागरोन — छह दुर्गों का समूह वर्ष 2013 में UNESCO विश्व धरोहर सूची में शामिल हुआ। इनमें से चित्तौड़गढ़ व कुंभलगढ़ दोनों मेवाड़ (गुहिल-सिसोदिया वंश) की देन हैं।

B. साहित्य, संगीत एवं भक्ति परंपरा

मेवाड़ से संबंधित प्रमुख साहित्यिक स्रोत — एक नज़र में

ग्रंथ/स्रोत (Work/Source)रचयिता (Author)संबंधित विषय (Related Topic)
संगीतराज, कीर्ति स्तंभ प्रशस्तिमहाराणा कुंभा, महेश भट्टकुंभा का संगीत व साहित्यिक योगदान
विश्ववल्लभ, राज्याभिषेक पद्धतिचक्रपाणि मिश्रमहाराणा प्रताप के दरबारी ग्रंथ
गौरा-बादल पद्मिनी चरित चौपाईहेमरत्न सूरि (जैन मुनि)प्रथम साका व रानी पद्मिनी
विरुद्ध छिहत्तरीदुरसा आढ़ामहाराणा प्रताप की प्रशस्ति
मुंतखब-उल-तवारीख (फारसी)अब्दुल कादिर बदायूंनीहल्दीघाटी युद्ध का वर्णन
अकबरनामा/आईने अकबरी (फारसी)अबुल फजलहल्दीघाटी युद्ध व अकबर-मेवाड़ संबंध
राजप्रशस्ति, वंशावलीरणछोड़ भट्ट तैलंगराज सिंह प्रथम व राजसमंद झील
जगन्नाथ प्रशस्तिकृष्णभट्टजगदीश मंदिर व हल्दीघाटी में प्रताप की विजय का दावा
रावल शाखा (Rawal Branch)
  • क्षेमसिंह द्वारा स्थापित (1158 ई.)
  • राजधानी — चित्तौड़
  • अंतिम शासक — रावल रतनसिंह (1303 ई. में अंत)
  • प्रथम साका इसी शाखा के अधीन हुआ
राणा/सिसोदिया शाखा (Rana/Sisodia Branch)
  • सहप द्वारा स्थापित, सिसोदा गांव में (1158 ई.)
  • वास्तविक स्थापना राणा हम्मीर द्वारा (1326 ई.)
  • द्वितीय व तृतीय साका इसी शाखा के अधीन हुए
  • 1947 ई. तक निरंतर शासन — भारत में विलय तक

★ अध्याय सार — महत्वपूर्ण तथ्य ★

1. गुहिलादित्य (566 ई.) गुहिल वंश के संस्थापक माने जाते हैं; बप्पा रावल (734-753 ई.) ने मानमोरी मौर्य को हराकर गुहिल साम्राज्य की वास्तविक नींव रखी। 2. रणसिंह (1158 ई.) के समय गुहिल वंश रावल शाखा (क्षेमसिंह) व राणा/सिसोदिया शाखा (सहप) में बंटा। 3. चित्तौड़ का प्रथम साका (1303 ई.) अलाउद्दीन खिलजी के विरुद्ध रावल रतनसिंह व रानी पद्मिनी के नेतृत्व में हुआ — इसी के साथ रावल शाखा समाप्त हो गई। 4. राणा हम्मीर (1326-1364 ई.) को सिसोदिया वंश का वास्तविक संस्थापक व "मेवाड़ का उद्धारक" कहा जाता है; 1336 ई. में सिंगोली के युद्ध में मुहम्मद बिन तुगलक को हराया। 5. महाराणा कुंभा (1433-1468 ई.) ने चित्तौड़गढ़ में विजय स्तंभ बनवाया व कुंभलगढ़ सहित 32 दुर्गों का निर्माण करवाया — "राजस्थानी स्थापत्य कला के जनक"। 6. राणा सांगा (1509-1528 ई.) खानवा के युद्ध (1527 ई.) में बाबर से पराजित हुए; इनकी सेना में लगभग सभी प्रमुख राजपूत राज्य शामिल थे। 7. चित्तौड़ का द्वितीय साका (1535 ई.) बहादुरशाह (गुजरात) के विरुद्ध रानी कर्मावती के नेतृत्व में हुआ; तृतीय व अंतिम साका (1568 ई.) अकबर के विरुद्ध जयमल-फत्ता व रानी फूल कंवर के नेतृत्व में हुआ। 8. राणा उदयसिंह ने 1559 ई. में उदयपुर की स्थापना की, जो आगे मेवाड़ की स्थायी राजधानी बनी। 9. महाराणा प्रताप (1572-1597 ई.) ने हल्दीघाटी युद्ध (1576 ई.) व दिवेर के युद्ध (1582 ई., "मेवाड़ का मैराथन") में अकबर से संघर्ष किया और कभी मुगल अधीनता स्वीकार नहीं की। 10. भामाशाह ने प्रताप को आर्थिक सहायता देकर संघर्ष जारी रखने में मदद की — इन्हें "मेवाड़ का उद्धारक" कहा जाता है। 11. महाराणा अमर सिंह प्रथम मेवाड़ के पहले शासक थे जिन्होंने मुगलों से संधि (चित्तौड़ की संधि, 1615 ई.) की। 12. महाराणा राज सिंह प्रथम (1652-1680 ई.) ने औरंगजेब की मंदिर-विध्वंस नीति के विरुद्ध श्रीनाथजी, द्वारकाधीश व अंबिका माता मंदिर बनवाए तथा राजसमंद झील का निर्माण करवाया, जहां विश्व का सबसे बड़ा शिलालेख (राजप्रशस्ति) स्थापित है। 13. दुर्गादास राठौड़ की सहायता से सिसोदिया-राठौड़ गठबंधन बना, जिसने औरंगजेब का लंबे समय तक विरोध किया। 14. हाड़ी रानी व पन्नाधाय — मेवाड़ के इतिहास की दो सबसे बड़ी बलिदान-गाथाएं हैं। 15. मीरा बाई (महाराणा कुंभा के पुत्र भोजराज की पत्नी) भक्ति-काल की प्रमुख कृष्ण-भक्त कवयित्री थीं। 16. महाराणा भीम सिंह ने 1818 ई. में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि की; महाराणा स्वरूप सिंह ने 1861 ई. में सती प्रथा पर प्रतिबंध लगाया। 17. "राजस्थान के पहाड़ी दुर्ग" (चित्तौड़गढ़ व कुंभलगढ़ सहित 6 दुर्ग) वर्ष 2013 में UNESCO विश्व धरोहर सूची में शामिल हुए।

नीचे दी समय-रेखा (Timeline) इस अध्याय के सभी महत्वपूर्ण वर्षों को एक साथ जोड़ती है — रिवीजन के लिए इसे ज़रूर दोहराएं:

वर्ष (Year)घटना/Eventमहत्व
566 ई.गुहिलादित्य द्वारा गुहिल वंश की स्थापना (नागदा)गुहिल वंश का प्रारंभ
734 ई.बप्पा रावल द्वारा मानमोरी मौर्य की पराजयगुहिल साम्राज्य की वास्तविक स्थापना
977 ई.अल्लट का आहड़ अभिलेखआहड़ राजधानी बनने व नौकरशाही प्रणाली का प्रमाण
1158 ई.रणसिंह के समय गुहिल वंश का विभाजनरावल व राणा (सिसोदिया) शाखाओं की शुरुआत
1227 ई.भूताला का युद्ध — जैत्रसिंह बनाम इल्तुतमिशमेवाड़ के "स्वर्ण युग" की शुरुआत
26 अगस्त 1303 ई.चित्तौड़ का प्रथम साका — रानी पद्मिनी का जौहररावल शाखा का अंत, अलाउद्दीन खिलजी की विजय
1336 ई.सिंगोली का युद्ध — राणा हम्मीर की विजयसिसोदिया वंश की स्वतंत्रता की स्थापना
1437 ई.सारंगपुर का युद्ध व विजय स्तंभ निर्माण प्रारंभमहाराणा कुंभा की सबसे बड़ी विजय
1453 ई.आंवल-बांवल की संधिमेवाड़-मारवाड़ सीमा निर्धारण
1460 ई.कीर्ति स्तंभ प्रशस्तिकुंभा के साहित्यिक-सांगीतिक योगदान का प्रमाण
1468 ई.ऊदा द्वारा महाराणा कुंभा की हत्याकुंभा के स्वर्णयुग का अंत
17 मार्च 1527 ई.खानवा का युद्ध — राणा सांगा बनाम बाबरराजपूत संघ की पराजय, मुगल सत्ता की नींव
8 मार्च 1535 ई.चित्तौड़ का द्वितीय साका — रानी कर्मावती का जौहरबहादुरशाह की अस्थायी विजय
1559 ई.उदयपुर नगर की स्थापनामेवाड़ की नई स्थायी राजधानी
25 फरवरी 1568 ई.चित्तौड़ का तृतीय व अंतिम साकाअकबर की चित्तौड़ पर विजय
18/21 जून 1576 ई.हल्दीघाटी का युद्ध — प्रताप बनाम मानसिंहमेवाड़ के प्रतिरोध का प्रतीक युद्ध
अक्टूबर 1582 ई.दिवेर का युद्ध ("मेवाड़ का मैराथन")प्रताप की सैन्य पुनर्वापसी का प्रारंभ
19 जनवरी 1597 ई.महाराणा प्रताप का निधन (चावंड)मुगल-अधीनता कभी स्वीकार न करने वाले शासक का अंत
5 फरवरी 1615 ई.चित्तौड़ की संधि — अमर सिंह प्रथम व मुगलमेवाड़ द्वारा पहली बार मुगल अधीनता स्वीकार
1 जनवरी 1662 – 14 जनवरी 1676 ई.राजसमंद झील का निर्माण (राज सिंह प्रथम)अकाल-राहत हेतु निर्मित एकमात्र झील
1679 ई.औरंगजेब द्वारा जजिया कर पुनः लागूराज सिंह-औरंगजेब वैमनस्य चरम पर
17 जुलाई 1734 ई.हुरड़ा सम्मेलन (भीलवाड़ा)मराठा-विरोधी राजपूत एकता का असफल प्रयास
13 जनवरी 1818 ई.महाराणा भीम सिंह की ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से संधिमेवाड़ पर ब्रिटिश अधीनस्थ संधि लागू
15 अगस्त 1861 ई.महाराणा स्वरूप सिंह द्वारा सती प्रथा पर प्रतिबंधमेवाड़ में सामाजिक सुधार की दिशा में बड़ा कदम
2013 ई."राजस्थान के पहाड़ी दुर्ग" UNESCO सूची में शामिलचित्तौड़गढ़ व कुंभलगढ़ को अंतरराष्ट्रीय मान्यता
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