Gurjara-Pratihara & Parmar Dynasties: मंडौर से कन्नौज, आबू से मालवा तक
पिछले अध्याय में हमने पढ़ा कि मौर्य-गुप्त साम्राज्य बिखरने के बाद राजस्थान में छोटे-छोटे जनपद व गणराज्य पनपे। लेकिन 6ठी- 7वीं शताब्दी आते-आते उत्तर भारत के सामने एक नया संकट खड़ा हो गया — पश्चिम से अरब आक्रमणकारियों की लहरें भारत की सरहद तक पहुंचने लगीं। ठीक इसी दौर में, मारवाड़ की धरती पर एक विद्वान गुर्जर-ब्राह्मण हरिश्चंद्र और उसके चार क्षत्रिय पुत्रों ने मंडौर (जोधपुर) में एक ऐसे राजवंश की नींव रखी, जो आगे चलकर 300 से अधिक वर्षों तक उत्तर भारत की सबसे बड़ी शक्ति बना — गुर्जर-प्रतिहार वंश। इन्हीं प्रतिहारों ने अरबों को सिंध से आगे बढ़ने से रोका, इसीलिए इतिहासकार इन्हें "भारत की ढाल" (Shield of India) कहते हैं। लगभग इसी दौर में, आबू पर्वत की तलहटी से एक और राजवंश उभरा — परमार — जिसने राजस्थान से लेकर मालवा (मध्य प्रदेश) तक अपना साम्राज्य फै लाया, और भोज परमार जैसा विद्वान राजा दिया, जिसकी विद्वता के किस्से आज भी "भोजपुर" और "भोपाल" जैसे नामों में जीवित हैं। यह अध्याय इन्हीं दो महान राजवंशों — प्रतिहार व परमार — की पूरी गाथा है।
राजपूत युग एवं राजपूतों की उत्पत्ति (Rise & Origin of Rajputs)
A. पृष्ठभूमि — राजपूत युग कैसे शुरू हुआ? ◆ गुप्तों के पतन के बाद केंद्रीय शक्ति के न रहने से उत्तर भारत में अव्यवस्था फै ल गई। राजस्थान की गणतंत्रीय जातियों ने उत्तर- गुप्तों की कमज़ोरी का लाभ उठाकर स्वयं को स्वतंत्र कर लिया। ◆ इसी समय भारत पर हूण आक्रमण हो रहे थे। हूण नेता मिहिरकु ल ने अपने भयंकर आक्रमणों से राजस्थान को बड़ी क्षति पहुँचाई और बिखरी हुई गणतंत्रीय व्यवस्था को जर्जर कर दिया। मालवा के यशोवर्मन ने लगभग 532 ई. में हूणों को परास्त किया। ◆ राजस्थान में यशोवर्मन के अधिकारी (जो 'राजस्थानी' कहलाते थे) अपने-अपने क्षेत्र में स्वतंत्र होने का प्रयास करने लगे। इसी समय उत्तर भारत में हर्षवर्धन का उदय हुआ; उसके समय राजस्थान में शांति-व्यवस्था की लहर आई, पर बिखरी हुई स्थिति पूरी तरह सुधर नहीं सकी।
◆ दूसरी सदी ईपू से छठी सदी तक राजस्थान में विदेशी जातियाँ (शक, हूण आदि) आती रहीं। इनमें से कई पराजित होकर यहीं बस गईं और यहाँ की शस्त्रधारी (शस्त्रोपजीवी) जातियों से घुल-मिल गईं — छठी शताब्दी तक स्थानीय और विदेशी योद्धाओं का भेद मिट गया। ◆ हर्षवर्धन की मृत्यु (647 ई.) के बाद गुप्तकाल में बनी भारत की राजनीतिक एकता फिर टूट गई और उत्तर भारत में अनेक छोटे-छोटे राज्य बन गए। इन राज्यों के आपसी संघर्ष से जो नए राजवंश उभरे, वे 'राजपूत राजवंश' कहलाए। भारत का पूर्व- मध्यकालीन इतिहास इन्हीं राजवंशों का इतिहास है, इसलिए इस काल को 'राजपूत काल' कहा जाता है। ◆ प्रसिद्ध इतिहासकार वी.ए. स्मिथ (V.A. Smith) के अनुसार हर्ष की मृत्यु से लेकर उत्तर भारत पर मुसलमानों के अधिकार तक राजपूत इतने प्रभावशाली रहे कि सातवीं शताब्दी के मध्य से बारहवीं शताब्दी के अंत तक के समय को 'राजपूत युग' कहा जा सकता है। ◆ राजस्थान के प्रारम्भिक राजपूत कु ल: मेवाड़ के गुहिल, मारवाड़ के गुर्जर-प्रतिहार और राठौड़, सांभर के चौहान, आबू के परमार, आमेर के कछवाहा और जैसलमेर के भाटी। शिलालेखों के अनुसार छठी शताब्दी में मंडौर के आसपास प्रतिहारों का राज्य था, जो आगे चलकर राठौड़ों को मिला; लगभग इसी समय सांभर में चौहान राज्य बना; पाँचवीं-छठी शताब्दी में मेवाड़ में गुहिलों का शासन स्थापित हुआ; दसवीं शताब्दी में अथूणा (वागड़) और आबू में परमार शक्तिशाली हुए; बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी में जालौर, रणथंभौर और हाड़ौती में चौहानों ने फिर से शक्ति संगठित की।
B. 'राजपूत' शब्द का प्रयोग ◆ डॉ. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा के अनुसार 'राजपूत' शब्द नया नहीं है — चाणक्य के 'अर्थशास्त्र', कालिदास के नाटकों तथा बाणभट्ट के 'हर्षचरित' और 'कादम्बरी' में इसका प्रयोग मिलता है। हर्षवर्धन के समय आए चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी राजाओं को कहीं 'क्षत्रिय' और कहीं 'राजपूत' लिखा है। ◆ पर ओझा का यह मत सर्वमान्य नहीं है। एक 'जाति' के अर्थ में 'राजपूत' शब्द का प्रयोग मुसलमानों के आने से पहले नहीं मिलता; हाँ, शासक वर्ग (क्षत्रियों) के लिए 'राजपुत्र' शब्द का प्रयोग अवश्य होता था।
C. उत्पत्ति के प्रमुख सिद्धांत राजपूत कौन थे — यह प्रश्न आज भी उलझा हुआ है। विद्वानों ने कई मत दिए हैं, पर कोई भी मत पूरी तरह सर्वमान्य नहीं है। नीचे तालिका में प्रमुख मत, उनके समर्थक और उनकी आलोचना दी गई है:
सिद्धांत (मत) प्रमुख समर्थक आधार / तर्क आलोचना / खंडन
अग्निकुं ड से उत्पत्ति चंदबरदाई आबू पर ऋषियों के यज्ञ को राक्षस कथानक बनावटी व अव्यावहारिक; ओझा, सी.वी.
(अग्निवंशी) ('पृथ्वीराज रासो'); अपवित्र करते थे; वशिष्ठ मुनि ने यज्ञ- वैद्य, दशरथ शर्मा व ईश्वरी प्रसाद ने निराधार बताया;
बाद में मुहणोत कुं ड से पहले परमार, चालुक्य व 16वीं-18वीं सदी में भाटों ने इसका खूब प्रचार किया
नैणसी व सूर्यमल्ल प्रतिहार और फिर सबसे शक्तिशाली
मिश्रण ने इसे बढ़ा- चौहान उत्पन्न किए
चढ़ाकर लिखावैदिक आर्यों (क्षत्रियों) की डॉ. गौरीशंकर प्राचीन क्षत्रियों की तरह अश्व व अस्त्र सबसे अधिक मान्य और लोकप्रिय मत
संतान — हीराचन्द ओझा, की पूजा; यज्ञ-बलि में विश्वास; सुडौल
सूर्यवंशी/चन्द्रवंशी सी.वी. वैद्य शरीर, लम्बी नाक व लम्बा सिर; ओझा
ने अनेक शिलालेखों व ग्रंथों के प्रमाण
दिएविदेशी (शक- कर्नल जेम्स टॉड, सूर्य-पूजा, सती प्रथा, अश्वमेध, ये रिवाज शक-कु षाणों के आने से पहले भी भारत में
सीथियन/हूण) मूल टॉड के संपादक मद्यपान, शस्त्र व घोड़ों की पूजा जैसे थे (सूर्य-पूजा वैदिक काल से, अश्वमेध महाकाव्यों में);
विलियम क्रु क, रीति-रिवाज शक-सीथियन-हूणों से राजपूतों ने स्वयं को कभी विदेशी नहीं कहा — ओझा
वी.ए. स्मिथ (हूणों मिलते हैं; विदेशी विजेताओं को अग्नि- ने खंडन किया
की संतान; 8वीं- संस्कार से शुद्ध कर क्षत्रिय बनाया गया
9वीं सदी में
अचानक प्रकट)गुर्जर मूल डॉ. डी.आर. राजोर अभिलेख में प्रतिहारों को ओझा व वैद्य: 'गुर्जर' जाति नहीं, गुर्जरत्रा (गुजरात)
भंडारकर 'गुर्जर' कहा गया; पुराणों में गुर्जर-हूणों प्रदेश पर अधिकार के कारण पड़ा नाम
का वर्णन विदेशियों के रूप में; गुर्जरों
को श्वेत-हूणों से जोड़ाब्राह्मणों से उत्पत्ति डॉ. डी.आर. बिजौलिया लेख में चौहानों को डॉ. दशरथ शर्मा: राजपूत कई बार अपने पुरोहित का
भंडारकर, डॉ. वत्सगोत्रीय ब्राह्मण कहा; ब्राह्मण गोत्र अपना लेते थे, इसी से यह भ्रम हुआ
गोपीनाथ शर्मा राजशेखर का विवाह चौहान अवन्ति
सुंदरी से; गुहिलों को नागर ब्राह्मण
गुहेदत्त का वंशज माना — महाराणा
कुम्भा ने भी 'गीत गोविन्द' की टीका में
यही स्वीकार कियाD. निष्कर्ष ◆ अधिकांश विद्वान राजपूतों को भारतीय आर्यों का वंशज मानते हैं, जिनमें कुछ विदेशी रक्त भी शामिल है। जो विदेशी जातियाँ भारत आकर स्थायी रूप से बस गईं, उन्होंने भारतीय सभ्यता-संस्कृति अपना ली और हिन्दू समाज ने उन्हें अपने में समा लिया। डॉ. ओझा के मत को सामान्यतः सबसे अधिक मान्यता मिली है — राजपूतों को भारतीय मानना ही उचित है। ◆ डॉ. कानूनगो के शब्दों में — "अग्निकुं ड की कहानी इस प्रगति के युग में नहीं चल सकती; सूर्य अथवा चन्द्र से उत्पत्ति एक काल्पनिक सत्य हो सकता है। राजपूत चाहे किसी भी रूप में जन्मे हों, यह सत्य है कि इतिहास में उन्होंने महाकाव्य-काल के क्षत्रियों की परम्पराओं को बनाए रखा।"
1. गुर्जर-प्रतिहार वंश — उत्पत्ति, नामकरण एवं शाखाएं
A. नामकरण एवं मूल क्षेत्र ◆ डॉ. आर.सी. मजूमदार के अनुसार गुर्जर-प्रतिहार वंश का प्रमुख शासनकाल 6ठी से 11वीं-12वीं शताब्दी तक रहा; इन्होंने लगभग 750 से 1000 ई. के बीच राजस्थान व उत्तरी भारत के बड़े हिस्से पर शासन किया। ◆ "प्रतिहार" शब्द का अर्थ है "द्वारपाल/रक्षक"। मान्यता है कि प्रतिहार स्वयं को भगवान राम के भाई लक्ष्मण का वंशज मानते थे — लक्ष्मण जी ने राम की सेवा में द्वारपाल (प्रतिहार) का कार्य किया था, इसीलिए इस वंश को "प्रतिहार" कहा गया।
◆ गुर्जरात्रा प्रदेश (वर्तमान राजस्थान-गुजरात सीमा क्षेत्र) पर शासन करने के कारण इन्हें "गुर्जर-प्रतिहार" कहा गया। मारवाड़ का मंडौर व जालौर का भीनमाल इस वंश के प्रारंभिक शक्ति-केंद्र रहे; बाद में उज्जैन व कन्नौज इनकी सत्ता के मुख्य केंद्र बने। ◆ अरब यात्रियों ने गुर्जरों को "जुर्ज" कहा; अल-मसूदी ने प्रतिहारों को "अल-गुर्जर" व प्रतिहार राजा को "बोरा" कहा। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपनी कृ ति "सी-यू-की" में गुर्जर राज्य को "कु -ची-लो" तथा भीनमाल (जिसका प्राचीन नाम श्रीमाल भी था) को "पी-लो-मो-लो" कहा। ◆ चालुक्य नरेश पुलके शिन द्वितीय के एहोल अभिलेख (रचयिता रविकीर्ति) में गुर्जर जाति का सबसे पहला स्पष्ट अभिलेखीय उल्लेख मिलता है। ◆ उस समय राजस्थान का यह भाग 'गुर्जरत्रा' कहलाता था, इसलिए चीनी यात्री युवानच्वांग (ह्वेनसांग) ने गुर्जर राज्य की राजधानी पीलोमोलो (भीनमाल) या बाड़मेर बताई है। अनुमान है कि प्रतिहारों ने अपना राज्य सबसे पहले राजस्थान में ही स्थापित किया था, और जोधपुर के शिलालेखों से प्रमाणित होता है कि छठी शताब्दी के दूसरे चरण तक प्रतिहार मारवाड़ में बस चुके थे।
B. उत्पत्ति के विभिन्न मत (Origin Theories) गुर्जर-प्रतिहारों की उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों में मतभेद रहा है — नीचे दी तालिका में प्रमुख विद्वानों के मत दिए गए हैं:
विद्वान (Scholar) मत (Opinion)
के नेडी (Kennedy) ईरानी मूल (Iranian origin)
अलेक्जेंडर कनिंघम (Cunningham) शक व यूएची (Yuezhi) जनजातियों के वंशज
स्मिथ, बूलर, हॉर्नले हूणों (Huns) के वंशज
भंडारकर (Bhandarkar) विदेशी गुर्जर मूल
डॉ. गोपीनाथ शर्मा, डॉ. दशरथ शर्मा, के .एम. मुंशी भारतीय/स्वदेशी मूल — सबसे अधिक स्वीकृ त मत
◆ जोधपुर व घटियाला अभिलेखों के अनुसार प्रतिहारों का मूल निवास-स्थान गुर्जरात्रा (पश्चिमी राजस्थान) माना जाता है; एच.सी. रे के अनुसार यह मंडौर (जोधपुर) था। ◆ राष्ट्रकू ट शासक अमोघवर्ष के संजन ताम्रपत्र के अनुसार प्रतिहार मूलतः उज्जैन (अवंति) के द्वारपाल (Pratiharas of Ujjain) थे — अधिकांश विद्वान इनका मूल निवास स्थान अवंति (उज्जैन) मानते हैं। ◆ ग्वालियर प्रशस्ति (मिहिर भोज की देन) में नागभट्ट को भगवान राम के प्रतिहार अर्थात् लक्ष्मण का वंशज कहा गया है।
C. गुर्जर-प्रतिहारों की शाखाएं (Branches) मुहणोत नैणसी ने गुर्जर-प्रतिहारों की 26 शाखाओं का वर्णन किया है, जिनमें मंडौर के प्रतिहार सबसे प्राचीन व महत्वपूर्ण माने गए हैं। प्रमुख शाखाएं इस प्रकार हैं:
शाखा (Branch) संस्थापक (Founder)
मंडौर (सबसे प्राचीन शाखा) हरिश्चंद्र
जालोर / भीनमाल नागभट्ट प्रथम / नाहड़
राजोरगढ़ (अलवर) मंथनदेव
कन्नौज नागभट्ट द्वितीय
उज्जैन नागभट्ट प्रथम
मेड़ता नागभट्ट प्रथम (मंडौर शाखा वाले)
भड़ौच (गुजरात) दद्द / दद्ध
2. मंडौर के प्रतिहार — आरंभिक शाखा
👑 हरिश्चंद्र (गुर्जर-प्रतिहारों के संस्थापक) (6ठी शताब्दी) प्रतिहारों के गुरु, गुर्जर-प्रतिहारों के आदिपुरुष एवं मंडौर शाखा के संस्थापक
◆ घटियाला शिलालेख (861 ई.) के अनुसार हरिश्चंद्र एक विद्वान ब्राह्मण थे, जिन्हें "रोहिलद्धि/रोहिलसिद्ध" (योग में कु शल) की उपाधि प्राप्त थी। ◆ हरिश्चंद्र की दो पत्नियां थीं — ब्राह्मण पत्नी तारा देवी से उत्पन्न संतानें "ब्राह्मण प्रतिहार" तथा क्षत्रिय पत्नी भद्रा देवी से उत्पन्न चार पुत्र (भोगभट्ट, कद्धक, रज्जिल व दह) "क्षत्रिय प्रतिहार" कहलाए। ◆ हरिश्चंद्र व उनके चारों क्षत्रिय पुत्रों ने मिलकर मंडव्यपुर (मंडौर) को जीता तथा वहां प्राचीर (सुरक्षा-दीवार) का निर्माण करवाया — यहीं से गुर्जर-प्रतिहार साम्राज्य की नींव पड़ी और मंडौर हरिश्चंद्र की राजधानी बनी।
◆ हरिश्चंद्र के बाद प्रतिहार वंश की वंशावली रज्जिल से आगे बढ़ती है — 560 ई. में रज्जिल ने मंडौर को राजधानी बनाकर वहां राजसूय यज्ञ का आयोजन किया, जिससे मंडौर में प्रतिहारों की सत्ता सुदृढ़ हुई। ◆ मंडौर शासकों का क्रम इस प्रकार रहा — रज्जिल → नरभट्ट → नागभट्ट (मंडौर से मेड़ता को राजधानी बनाया) → शीलुक (दो रानियां — पद्मिनी व दुर्लभा देवी) → कक्क → बाउक (837 ई. का जोधपुर अभिलेख इन्हीं की देन है) → कक्कु क (861 ई. का घटियाला शिलालेख इन्हीं का है)। ◆ जोधपुर से लगभग 65 किमी दूर स्थित ओसियां में श्वेताम्बर जैन मंदिर, सच्चियाय माता मंदिर, सूर्य मंदिर सहित कु ल 16 से अधिक मंदिर हैं — इनका निर्माण 7वीं से 10वीं शताब्दी के मध्य प्रतिहारों द्वारा हुआ। ◆ लगभग 600 वर्षों के अपने शासनकाल में मंडौर के प्रतिहारों ने सांस्कृ तिक परम्परा निभाते हुए अपने स्वतंत्रता-प्रेम और शौर्य से उज्ज्वल कीर्ति अर्जित की।
मंडौर का अंत — आगे की कड़ी: सहजपाल चौहान के मंडौर अभिलेख (1145 ई.) से पता चलता है कि 12वीं शताब्दी के मध्य तक चौहान शासकों का मंडौर पर प्रभाव स्थापित हो चुका था, फिर भी इंदा शाखा के प्रतिहार वहां किसी तरह टिके रहे। अंततः 1395 ई. के आसपास हम्मीर परिहार के लगातार आक्रमणों से त्रस्त होकर प्रतिहारों ने मंडौर दुर्ग राव वीरम राठौड़ के पुत्र चूंडा को दहेज (विवाह-भेंट) में दे दिया — इसके बाद से मंडौर पर राठौड़ों का आधिपत्य शुरू हुआ (विस्तार के लिए देखें: अध्याय 8 — राठौड़ वंश)।
3. भीनमाल-उज्जैन-कन्नौज के प्रतिहार — साम्राज्य-निर्माता शासक डॉ. ओझा के अनुसार 739 ई. में भीनमाल को चावड़ा राजपूतों से छीना गया, इसके बाद आबू, जालौर व उज्जैन जीते गए और उज्जैन को राजधानी बनाया गया; बाद में कन्नौज जीतकर उसे भी राजधानी बनाया गया। यही शाखा आगे चलकर उत्तर भारत का सबसे बड़ा साम्राज्य बनाती है।
👑 नागभट्ट प्रथम (730-760 ई.) भीनमाल-उज्जैन-कन्नौज शाखा के संस्थापक, "प्रतिहार साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक"
◆ भीनमाल (ह्वेनसांग के अनुसार "पी-लो-मो-लो") को चावड़ा राजपूतों से जीतकर अपनी राजधानी बनाई; इसके बाद आबू, जालौर व उज्जैन (अवंतिका) को जीतकर सत्ता का विस्तार किया। ◆ राष्ट्रकू ट शासक दंतिदुर्ग ने उज्जैन में हिरण्यगर्भ यज्ञ का आयोजन कर नागभट्ट प्रथम को वहां का "प्रतिहार" (द्वारपाल/सामंत) नियुक्त किया था — बाद में नागभट्ट स्वतंत्र शासक बन गए। ◆ ग्वालियर अभिलेख के अनुसार अरब आक्रमणकारियों को पराजित कर सिंध से आगे बढ़ने से रोका; अरब लेखक अल-बलादुरी के अनुसार सिंध के गवर्नर जुनैद को हराया (नौसारी ताम्रपत्र से भी पुष्टि होती है)। ◆ उपाधियां — नागावलोक, म्लेच्छों (विदेशी आक्रांताओं) का नाशक, नारायण; इनके दरबार को "नागावलोक दरबार" कहा जाता था। ◆ गुहिल, चौहान, परमार, राठौड़, चंदेल, कलचुरि, चालुक्य जैसे अनेक राजवंश इनके सामंत (Feudatories) थे — यानी शुरुआती दौर में लगभग सभी प्रमुख राजपूत वंश प्रतिहारों की अधीनता में थे।
👑 वत्सराज (783-795 ई.) उपाधि "रणहस्तिन" (युद्ध का हाथी) व "सम्राट", त्रिकोणीय संघर्ष के प्रवर्तक
◆ शैव मतानुयायी थे; इन्हीं के काल से कन्नौज को लेकर गुर्जर-प्रतिहार, पाल वंश व राष्ट्रकू ट वंश के बीच "त्रिकोणीय संघर्ष" (Tripartite Struggle) शुरू हुआ। ◆ दोआब के युद्ध में पाल शासक धर्मपाल को हराया, परंतु राष्ट्रकू ट शासक ध्रुव प्रथम से पराजित होकर जालौर (जाबालिपुर) लौटना पड़ा — फिर भी इस त्रिकोणीय संघर्ष के अंतिम व स्थायी विजेता आगे चलकर नागभट्ट द्वितीय व मिहिर भोज बने। ◆ ओसियां (जोधपुर) में महावीर स्वामी जैन मंदिर व एक सरोवर बनवाया — इसे पश्चिम भारत का प्राचीनतम जैन मंदिर माना जाता है। ◆ दरबारी विद्वान — उद्योतन सूरी ने "कु वलयमाला" तथा जिनसेन सूरी ने "हरिवंश पुराण" की रचना की।
8वीं-9वीं शताब्दी में कन्नौज (वर्तमान उत्तर प्रदेश) गंगा-यमुना दोआब का सबसे समृद्ध शहर व सत्ता का प्रतीक था। इस पर कब्जे के लिए तीन बड़ी शक्तियां — उत्तर-पश्चिम से गुर्जर-प्रतिहार, पूर्व से पाल वंश (बंगाल-बिहार), और दक्षिण से राष्ट्रकू ट वंश (दक्कन) — लगभग दो शताब्दियों तक लगातार भिड़ती रहीं। इसी संघर्ष को इतिहास में "त्रिकोणीय/त्रिदलीय संघर्ष" कहा जाता है। वत्सराज ने इसकी शुरुआत की, राष्ट्रकू टों ने बीच-बीच में दोनों (प्रतिहार व पाल) को हराया, परंतु दक्कन से दूर होने के कारण कन्नौज पर स्थायी कब्जा बरकरार नहीं रख सके । अंततः नागभट्ट द्वितीय व मिहिर भोज के समय प्रतिहारों ने कन्नौज पर सबसे लंबे समय (लगभग दो शताब्दियों) तक राज किया — इसीलिए परीक्षा में अक्सर पूछा जाता है: त्रिकोणीय संघर्ष का अंतिम व स्थायी विजेता कौन था? उत्तर — गुर्जर-प्रतिहार।
👑 नागभट्ट द्वितीय (795-833 ई.) कन्नौज को राजधानी बनाने वाले पहले प्रतिहार शासक
◆ वत्सराज व रानी सुंदर देवी के पुत्र; कन्नौज के शासक चक्रायुध को पराजित कर कन्नौज पर अधिकार किया और उसे अपनी राजधानी बनाया — इसी से कन्नौज शाखा की शुरुआत मानी जाती है। ◆ चक्रायुध पाल शासक धर्मपाल का आश्रित था, अतः धर्मपाल ने आक्रमण किया; मुंगेर (मुदगगिरी, बिहार) के युद्ध में नागभट्ट द्वितीय विजयी हुए, जिससे प्रतिहारों की प्रतिष्ठा पुनः स्थापित हुई। ◆ 806-808 ई. के बीच राष्ट्रकू ट शासक गोविंद तृतीय से युद्ध में इन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। ◆ बुचकला अभिलेख (815 ई., बिलाड़ा-जोधपुर) इन्हीं के शासनकाल का है — इसमें इन्होंने "परमभट्टारक, महाराजाधिराज, परमेश्वर" जैसी उपाधियां धारण कीं। पुष्कर (अजमेर) के घाटों का निर्माण भी करवाया। ◆ 833 ई. में गंगा नदी में जल-समाधि ली; इनके बाद पुत्र रामभद्र (833-836 ई.) प्रतिहार वंश के शासक बने, जिनका शासनकाल पाल वंश से संघर्ष में पराजय व सीमित उपलब्धियों का दौर रहा।
👑 मिहिर भोज / भोज प्रथम (836-885 ई.) प्रतिहार वंश के सबसे शक्तिशाली शासक, साम्राज्य अपने चरम पर
◆ रामभद्र व माता अप्पा देवी के पुत्र; प्रतिहार साम्राज्य इनके शासनकाल में अपनी चरम शक्ति पर पहुंचा और ये उत्तर भारत के सबसे महत्वपूर्ण शासक बने। ◆ उपाधियां — "आदिवराह" (ग्वालियर अभिलेख) व "प्रभास" (दौलतपुर अभिलेख); वैष्णव मतानुयायी थे तथा भगवान विष्णु के उपासक थे। ◆ अरब यात्री सुलेमान ने भारत-यात्रा के दौरान इन्हें "इस्लाम का शत्रु" कहा तथा प्रतिहारों को "इस्लाम की दीवार" (इनके सैन्य बल व संपत्ति की प्रशंसा करते हुए) बताया। ◆ राष्ट्रकू ट शासक कृ ष्ण तृतीय से मालवा जीत लिया; पाल वंश के शासकों देवपाल व विग्रहपाल (नारायणपाल) तथा राष्ट्रकू ट कृ ष्ण तृतीय — दोनों को हराकर कन्नौज पर स्थायी अधिकार स्थापित किया। ◆ मिहिर भोज की महानता व उनके समय की घटनाओं का उल्लेख ग्वालियर शिलालेख तथा सुलेमान के यात्रा-वृत्तांत दोनों में मिलता है।
👑 महेन्द्रपाल प्रथम (885-908 ई.) उपाधि "निर्भय नरेश", साहित्यिक योगदान के लिए प्रसिद्ध
- मिहिर भोज के पुत्र; प्रतिहारों में सबसे पहले "परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर" की उपाधि धारण करने वाले शासक बने।
- दरबारी कवि व गुरु राजशेखर ने इन्हें "रघुकु लतिलक" (रघुकु ल का रत्न) कहा है, जो उनकी रचना "कर्पूरमंजरी" में मिलता है —
राजशेखर ने यह रचना अपनी पत्नी अवन्ति सुंदरी के अनुरोध पर लिखी। ◆ राजशेखर की प्रमुख रचनाएं — कर्पूरमंजरी, काव्यमीमांसा, बालभारत, बालरामायण, विद्धशालभंजिका, हरविलास, प्रचंड पांडव व भुवनकोश। राजशेखर ने महेन्द्रपाल के पुत्र महिपाल को "रघुवंश-मुक्तामणि" तथा "आर्यावर्त का महाराजाधिराज" भी कहा।
4. त्रिकोणीय संघर्ष एवं प्रतिहार वंश का पतन महिपाल प्रथम (913-943 ई.) के शासनकाल से प्रतिहार साम्राज्य का क्रमिक पतन शुरू हो गया। राष्ट्रकू ट शासक इंद्र तृतीय ने मालवा पर आक्रमण कर उज्जैन पर अधिकार किया, यमुना पार कर कन्नौज (महोदय) की राजधानी को तहस-नहस कर दिया। अरब यात्री अल-मसूदी (915 ई. में भारत आए) ने महिपाल ("बउर") व राष्ट्रकू ट शासक ("बल्लहरा") के बीच गहरी शत्रुता का वर्णन किया है। इसके बावजूद गुहिल सामंत भट्ट ने राष्ट्रकू ट शासक गोविंद चतुर्थ को हराया (चाटसू अभिलेख, 813 ई.), जो दिखाता है कि पतन के बावजूद प्रतिहार सामंतों का प्रभाव कुछ समय तक बना रहा। नीचे दी तालिका पतन के अंतिम चरण को दर्शाती है:
शासक (Ruler) काल (Period) मुख्य घटना (Key Event)
महेन्द्रपाल द्वितीय, देवपाल, 943-990 ई. कमजोर उत्तराधिकारी, साम्राज्य लगातार सिकु ड़ता गया विनायकपाल, महिपाल द्वितीय, (क्रमशः) विजयपाल
राज्यपाल 990-1019 ई. 1018-19 ई. में महमूद गजनवी ने कन्नौज पर आक्रमण किया; राज्यपाल भाग गए, जिसकी "कायरता" पर क्रु द्ध होकर अन्य भारतीय राजाओं ने ही उन्हें मृत्युदंड दे दिया
त्रिलोचनपाल 1019-1027 ई. 1019 ई. में महमूद गजनवी से पराजित हुए
यशपाल 1027-1093 ई. प्रतिहार वंश के अंतिम ज्ञात शासक; कड़ा अभिलेख (1036 ई., इलाहाबाद) में इनके दान का उल्लेख मिलता है
प्रतिहार वंश का अंत: 1093 ई. के आसपास प्रतिहारों के सामंत रहे गहड़वाल शासक चंद्रदेव ने कन्नौज पर अधिकार कर प्रतिहारों के अस्तित्व को समाप्त कर दिया — इसके बाद कन्नौज में एक नया स्वतंत्र "गहड़वाल वंश" स्थापित हुआ।
5. प्रतिहार वास्तुकला — महामारु शैली 8वीं शताब्दी में राजस्थान में गुर्जर-प्रतिहार शैली का विकास हुआ, जिसे मारवाड़ क्षेत्र में विकसित होने के कारण "महामारु शैली" भी कहा जाता है। इस शैली के प्रमुख मंदिर इस प्रकार हैं:
मंदिर (Temple) स्थान (Location) विशेषता
सच्चियाय माता, सूर्य व महावीर जैन ओसियां, जोधपुर महावीर मंदिर वत्सराज के काल (783 ई.) का, पश्चिम भारत का मंदिर सहित 16+ मंदिर प्राचीनतम जैन मंदिर
नीलकं ठे श्वर मंदिर के किंद, मेड़ता (नागौर) प्रतिहार-कालीन शिव मंदिर
आदिवराह मंदिर आहड़ (उदयपुर) व आभानेरी (दौसा) मिहिर भोज की उपाधि "आदिवराह" से संबद्ध नामकरण
नीलकं ठ मंदिर राजोरगढ़ (अलवर) प्रतिहार सामंत मथनदेव के क्षेत्र का प्रमुख मंदिर
हरिहर मंदिर औसियां (जोधपुर) शिव-विष्णु के संयुक्त स्वरूप को समर्पित
बरोली मंदिर परिसर रावतभाटा (चित्तौड़गढ़) महामारु शैली के उत्कृ ष्ट उदाहरणों में से एक
◆ मथनदेव गुर्जर-प्रतिहार वंश के एक महत्वपूर्ण सामंत शासक थे, जिनका शासन-क्षेत्र राजोरगढ़ (अलवर) में था — उन्होंने वहीं से अपने शासन का विस्तार किया।
6. परमार वंश — उत्पत्ति एवं शाखाएं
A. नामकरण एवं उत्पत्ति के मत ◆ "परमार" शब्द का शाब्दिक अर्थ है "शत्रु का नाश करने वाला" (Slayer of enemies)। ◆ चंदबरदाई कृ त "पृथ्वीराज रासो" के अनुसार परमार अग्निकुं ड (आबू पर्वत पर हुए यज्ञ की अग्नि-वेदी) से उत्पन्न चार अग्निवंशी क्षत्रिय राजवंशों में से एक हैं — शेष तीन हैं चौहान, चालुक्य (सोलंकी) व प्रतिहार। ◆ ऋषि वशिष्ठ की परंपरा से जुड़ी मान्यता के अनुसार भी परमारों की उत्पत्ति आबू के यज्ञ (अग्निकुं ड) से मानी जाती है — पद्मगुप्त (उपनाम परिमल) कृ त "नवसाहसांकचरित" में परमारों की उत्पत्ति का विस्तृत वर्णन मिलता है। ◆ उदयपुर प्रशस्ति, पिंगल सूत्रवृत्ति व तेजपाल अभिलेख में परमारों को "ब्रह्म-क्षत्रिय" वंश का बताया गया है। ◆ जालौर का लेख (1118 ई.) व किराडू लेख (1161 ई.) — दोनों में परमारों की उत्पत्ति ऋषि वशिष्ठ के आबू-यज्ञ से बताई गई है (विस्तार के लिए देखें: अध्याय 1 — राजस्थान इतिहास के स्रोत)।
B. परमारों की प्रमुख शाखाएं
शाखा (Branch) मुख्य क्षेत्र एवं राजधानी (Region & Capital)
आबू के परमार चंद्रावती राजधानी; सबसे प्रभावशाली राजस्थानी शाखाओं में से एक
जालौर के परमार आबू परमारों की एक छोटी शाखा
मालवा के परमार (मुख्य शाखा) धारानगरी/उज्जैन राजधानी; परमारों की सबसे शक्तिशाली व प्रसिद्ध शाखा
वागड़ के परमार डूंगरपुर-बांसवाड़ा क्षेत्र, अर्थुना राजधानी
मारवाड़, गुजरात, सिंध व किराडू के परमार छोटी स्थानीय शाखाएं , प्रायः सोलंकियों के सामंत
7. आबू, जालौर एवं किराडू के परमार
A. आबू के परमार
◆ प्रारम्भ में परमार आबू के आसपास के प्रदेशों में रहते थे। प्रतिहारों की शक्ति घटने के साथ-साथ परमारों का राजनीतिक प्रभाव बढ़ता गया और धीरे-धीरे इन्होंने मारवाड़, सिंध, गुजरात, वागड़ और मालवा में अपने राज्य स्थापित कर लिए। पड़ोसी होने के कारण आबू के परमारों का गुजरात के शासकों से लगातार संघर्ष चलता रहा। धारावर्ष विक्रमदेव का प्रपौत्र था। ◆ धूम्रराज को आबू परमारों का आदि-पुरुष माना जाता है, परंतु इस शाखा की वास्तविक शुरुआत उत्पलराज से मानी जाती है; राजधानी चंद्रावती थी। ◆ धरणीवराह — सोलंकी शासक मूलराज प्रथम के आक्रमण के समय राष्ट्रकू ट शासक धवल के यहां शरण ली (हस्तिकुं डी अभिलेख, 977 ई. से प्रमाणित); बाद में पुनः आबू पर अधिकार किया (1002 ई. के अभिलेख से ज्ञात)। इसी समय से परमारों ने सोलंकियों की अधीनता (Suzerainty) स्वीकार कर ली। ◆ धंधुक परमार (महिपाल के पुत्र) ने सोलंकी अधीनता से मुक्त होने का प्रयास किया, जिस पर भीमदेव सोलंकी से युद्ध हुआ — विमलशाह ने दोनों पक्षों में सुलह करवाई और आबू के प्रशासक (Administrator) नियुक्त हुए। विमलशाह ने 1031 ई. में देलवाड़ा (आबू) में आदिनाथ जैन मंदिर (विमलशाही मंदिर) बनवाया — यह देलवाड़ा के मंदिरों में सबसे प्राचीन है। ◆ एक अन्य विवरण के अनुसार धंधुक के समय गुजरात के भीमदेव ने आबू को जीतकर वहाँ विमलशाह को दंडपति (सैन्य- प्रशासक) नियुक्त किया था। ◆ धंधुक की विधवा पुत्री लाहिणी ने बसंतगढ़ में सूर्य मंदिर बनवाया तथा सरस्वती बावड़ी का जीर्णोद्धार करवाया — इसीलिए इसे "लाहिणी बावड़ी" भी कहा जाता है।
👑 धारावर्ष (1163-1219 ई.) आबू परमारों के सबसे शक्तिशाली शासक
◆ 1178 ई. में मुहम्मद गौरी ने गुजरात के चालुक्य (सोलंकी) शासक मूलराज द्वितीय पर आक्रमण किया; मूलराज की संरक्षिका (माता) नायिका देवी ने कयाद्रा के युद्ध में गौरी को पराजित किया — इस युद्ध में गुजराती सेना की कमान स्वयं धारावर्ष परमार ने संभाली थी (साथी — आबू के के लहण-नाडौल तथा नाडौल के कीर्तिपाल सोनगरा)। ◆ इस विजय के बाद धारावर्ष सोलंकियों की अधीनता से पूरी तरह मुक्त हो गए; नाडौल के चौहानों से घनिष्ठ संबंध रहे — इनकी दोनों रानियां (शृंगार देवी व मुख्य रानी गिगादेवी) नाडौल-चौहान शासक के लहण की पुत्रियां थीं। ◆ कहा जाता है कि धारावर्ष एक ही बाण से तीन भैंसे भेद सकते थे — आज भी अचलेश्वर मंदिर के निकट मांडाकिनी कुं ड किनारे धनुर्धारी मुद्रा में उनकी प्रतिमा (सामने तीन भैंसे) स्थापित है। दरबारी कवि सोमेश्वर ने "कीर्ति कौमुदी" की रचना की। ◆ धारावर्ष ने पृथ्वीराज चौहान के आबू पर आक्रमण को विफल किया। इनके छोटे भाई प्रह्लाद ने पालनपुर नगर बसाया तथा "पार्थ पराक्रम व्यायोग" नाटक की रचना की।
◆ सोमसिंह — इनके मंत्री तेजपाल ने देलवाड़ा (आबू) में नेमिनाथ जैन मंदिर बनवाया, जिसे "लूणवसही" या "वस्तुपाल-तेजपाल मंदिर" भी कहा जाता है — तेजपाल ने यह मंदिर अपने पुत्र लूणसिंह व पत्नी अनुपमा देवी की स्मृति में बनवाया। ◆ सोमसिंह धारावर्ष का पुत्र था और गुजरात के सोलंकी राजा भीमदेव द्वितीय का सामंत था। धारावर्ष का काल विद्या की उन्नति और जनोपयोगी कार्यों के लिए प्रसिद्ध है; उसका छोटा भाई प्रह्लादनदेव वीर और विद्वान था, जिसने अपने नाम से 'प्रह्लादनपुर' (आज का पालनपुर) बसाकर परमारों का साहित्यिक-सांस्कृ तिक स्तर ऊँ चा उठाया। ◆ प्रताप सिंह — मेवाड़ के जैत्रसिंह (गुहिल शासक) को हराकर चंद्रावती पर पुनः अधिकार किया।
आबू परमारों का अंत: लगभग 1311 ई. में नाडौल के चौहान शासक राव लुम्बा ने आबू परमारों की राजधानी चंद्रावती को जीतकर वहां चौहान शासन स्थापित कर दिया — इसके साथ ही आबू परमार शाखा का अंत हो गया।
B. जालौर एवं किराडू के परमार ◆ जालौर के परमारों की जानकारी जालौर के 1087 ई. के अभिलेख से मिलती है; इस शाखा में कु ल 7 शासक हुए — वाक्पतिराज, चंदन, देवराज, अपराजित, विज्जल, धारावर्ष व विशाल। ◆ वाक्पतिराज (960-985 ई.) जालौर के पहले परमार शासक थे, जिनके समय जालौर में परमारों का शासन स्थापित हुआ — यह शाखा आबू परमारों की एक छोटी उप-शाखा मानी जाती है। ◆ विशाल (7वें/अंतिम शासक) की रानी मेलार देवी ने 1087 ई. में सिंधुराजेश्वर मंदिर में स्वर्ण-कलश चढ़ाया था। जालौर पर आगे चलकर पहले प्रतिहारों का, फिर परमारों का, और अंततः 1181 ई. में चौहान शासक कीर्तिपाल का अधिकार हुआ (विस्तार के लिए देखें: अध्याय 7 — चौहान वंश)। ◆ किराडू (बाड़मेर) के परमारों की जानकारी किराडू शिव मंदिर अभिलेख (1161 ई.) से मिलती है। प्रमुख शासक — कृ ष्णराज, सोच्चराज, उदयराज व सोमेश्वर — ये सभी गुजरात के सोलंकी शासकों के सामंत के रूप में शासन करते थे। ◆ सोमेश्वर परमार ने सोलंकी शासक सिद्धराज की सहायता से सिंध क्षेत्र पुनः प्राप्त किया तथा 1161 ई. में तनोट (जैसलमेर) व नौसर (जोधपुर) के किले जीते। किराडू के पांच मंदिरों में सोमेश्वर मंदिर (शिव को समर्पित) सर्वाधिक सुरक्षित स्थिति में है — यह मंदिर-समूह वर्तमान में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) व INTACH (बाड़मेर चैप्टर) की देखरेख में संरक्षित है।
8. वागड़ एवं मालवा के परमार — मुंज व भोज परमार
A. वागड़ के परमार ◆ वागड़ के परमार, मालवा परमार शासक कृ ष्णराज के दूसरे पुत्र दंबरसिंह के वंशज माने जाते हैं; इनका क्षेत्र डूंगरपुर व बांसवाड़ा (वागड़ क्षेत्र) तक फै ला था, राजधानी अर्थुना (उत्थुणक) थी, जो वर्तमान में खंडहर अवस्था में है। ◆ प्रमुख शासक — धनिक कं कदेव, सत्यराज, मंडलिक व चामुंडराज। चामुंडराज ने 1079 ई. में अर्थुना में मंडलेश्वर मंदिर बनवाया। ◆ अंतिम शासक विजयराज थे; 1119 ई. में गुहिल शासक सामंतसिंह ने वागड़ पर विजय प्राप्त कर परमार शासन को समाप्त कर दिया (विस्तार के लिए देखें: अध्याय 6 — मेवाड़: गुहिल-सिसोदिया वंश)। ◆ वागड़ के परमारों ने बांसवाड़ा के पास अर्थूणा नगर बसाया और वहाँ अनेक मंदिर बनवाकर अपनी शिल्पकला के प्रति निष्ठा का परिचय दिया।
B. मालवा के परमार (मुख्य एवं सबसे शक्तिशाली शाखा) ◆ मालवा परमारों का मूल क्षेत्र मालवा व आबू माना जाता है; राजधानी धारानगरी (धार) या उज्जैन थी। राजस्थान में इनका क्षेत्र कोटा का दक्षिणी भाग, झालावाड़, वागड़ व प्रतापगढ़ के पूर्वी भाग तक फै ला था। ◆ प्रारंभिक दौर में मालवा के परमार राष्ट्रकू टों के सामंत थे। प्रारंभिक शासक-क्रम — उपेन्द्र/कृ ष्णराज (संस्थापक) → वैरीसिंह प्रथम → सीयक प्रथम → सीयक द्वितीय (जिन्होंने मुंज परमार को गोद लिया)।
👑 मुंज परमार (लगभग 972-995 ई.) परमार वंश के सबसे शक्तिशाली शासक
- उपाधियां — वाक्पतिराज, उत्पलराज, अमोघवर्ष, पृथ्वीवल्लभ, श्रीवल्लभ तथा "कवि वृष"।
- मेवाड़ शासक शक्तिसिंह के समय आहड़ को नष्ट किया व चित्तौड़गढ़ पर अधिकार किया।
◆ चालुक्य शासक तैलप द्वितीय को लगातार 6 बार पराजित किया, परंतु 7वीं बार हारकर युद्ध में मारे गए। ◆ विद्वानों व कवियों के महान आश्रयदाता थे — दरबारी विद्वान: हलायुध ("अभिधानमाला"), पद्मगुप्त ("नवसाहसांकचरित"), धनंजय ("दशरूपक") तथा धनिक ("दशरूपावलोक")।
- सिंधुराज — मुंज परमार के भाई तथा भोज परमार के पिता।
👑 भोज परमार (1010-1055 ई.) मालवा परमारों के सबसे प्रसिद्ध व विद्वान शासक
◆ विद्या व कला के महान संरक्षक; प्रमुख रचनाएं — सरस्वती कं ठाभरण, राजमृगांक, राजमार्तंड, विद्वज्जनमनोदला, चम्पूरामायण, श्रृंगारमंजरी कथा, कू र्मशतक व तत्वप्रकाश। ◆ चित्तौड़गढ़ में त्रिभुवन नारायण मंदिर बनवाया (जिसे "मोकल मंदिर"/शिव मंदिर भी कहा जाता है, कुम्भलगढ़ अभिलेख में इसका उल्लेख मिलता है); नागदा (उदयपुर) में भोजसर का निर्माण भी करवाया। ◆ धारानगरी में "सरस्वती कं ठाभरण" नामक विद्यालय स्थापित किया तथा वहां वाग्देवी (सरस्वती) की प्रतिमा स्थापित की — यही प्रतिमा आगे चलकर भारत के ज्ञानपीठ पुरस्कार का प्रतीक-चिन्ह (कांस्य प्रतिमा) बनी। जालौर में भी एक संस्कृत विद्यालय बनवाया। ◆ चंदेल शासक विद्याधरवर्मन से पराजित होकर कुछ समय उनके अधीन भी रहे। मध्य प्रदेश में भोजनगर/भोजपाल (आज का भोपाल) व भोजपुर नगर बसाया। ◆ अबुल फजल ("आईन-ए-अकबरी") के अनुसार भोज के दरबार में लगभग 500 विद्वान थे — प्रमुख दरबारी विद्वान: मेरुतुंग ("प्रबंध चिंतामणि"), वल्लभ, वररुचि, सुबंधु, अमर, माघ, धनपाल, राजशेखर व मानतुंग।
करंट अफे यर्स — भोज परमार व ज्ञानपीठ पुरस्कार: ज्ञानपीठ पुरस्कार 1961 में शुरू हुआ; प्रतीक-चिन्ह वाग्देवी (सरस्वती) की कांस्य प्रतिमा है, साथ में प्रशस्ति-पत्र व वर्तमान पुरस्कार राशि 11 लाख रुपए दी जाती है। प्रथम पुरस्कार 1965 ई. में मलयालम लेखक जी. शंकर कु रुप को मिला था; 58वां ज्ञानपीठ पुरस्कार 2025 में संस्कृत भाषा के जगद्गुरु रामभद्राचार्य को दिया गया। भोज परमार द्वारा धारानगरी में स्थापित वाग्देवी की उसी परंपरा से यह पुरस्कार आज भी प्रतीकात्मक रूप से जुड़ा हुआ है।
C. जयसिंह एवं मालवा परमार वंश का पतन ◆ जयसिंह — भोज परमार के पुत्र व एक सक्षम शासक; वागड़ के शासक मंडलिक इनके सामंत थे। ◆ 1135 ई. में चालुक्य (सोलंकी) शासक सिद्धराज ने मालवा पर अधिकार कर लिया — इसके बाद परमार सत्ता का क्रमिक पतन शुरू हो गया। ◆ अर्जुनवर्मा के समय परमार सत्ता का अल्पकालीन पुनरुत्थान हुआ, परंतु खिलजी आक्रमण ने मालवा के परमार वैभव को पूरी तरह समाप्त कर दिया — बचे हुए परमार अंततः अजमेर की ओर पलायन कर गए।
9. दोनों वंशों की तुलना एवं सांस्कृ तिक योगदान
गुर्जर-प्रतिहार (Pratihar) परमार (Parmar)
◆ मूल शक्ति-केंद्र — मंडौर व भीनमाल (राजस्थान) ◆ मूल शक्ति-केंद्र — आबू व मालवा (धारानगरी/उज्जैन) ◆ साम्राज्य का चरम — मिहिर भोज के काल में, राजधानी कन्नौज ◆ साम्राज्य का चरम — भोज परमार के काल में, राजधानी (उत्तर प्रदेश) धारानगरी (मध्य प्रदेश) ◆ मुख्य पहचान — अरब आक्रमणकारियों से लगभग 200 वर्षों ◆ मुख्य पहचान — विद्या व साहित्य का संरक्षण, भोज परमार तक रक्षा, "भारत की ढाल" स्वयं महान विद्वान-राजा ◆ स्थापत्य शैली — महामारु शैली (ओसियां मंदिर समूह प्रमुख ◆ स्थापत्य शैली — किराडू मंदिर समूह, देलवाड़ा जैन मंदिर (आबू उदाहरण) शाखा से संबद्ध) ◆ अंत — 1093 ई., गहड़वाल शासक चंद्रदेव द्वारा कन्नौज पर ◆ अंत — मालवा शाखा खिलजी आक्रमण से; आबू शाखा 1311 अधिकार ई. में नाडौल चौहानों द्वारा
"अरबों को दो शताब्दियों तक रोकने वाले प्रतिहार, और विद्या को राजसिंहासन के समान सम्मान देने वाले भोज परमार — दोनों ही सिद्ध करते हैं कि राजस्थान की धरती ने तलवार और कलम, दोनों को समान गौरव दिया है।" — राजस्थान इतिहास की सामान्य परंपरा
★ अध्याय सार — महत्वपूर्ण तथ्य ★
1. गुर्जर-प्रतिहार वंश के संस्थापक हरिश्चंद्र थे, जिन्होंने मंडौर (जोधपुर) को राजधानी बनाया; भीनमाल-उज्जैन-कन्नौज शाखा के वास्तविक साम्राज्य-निर्माता नागभट्ट प्रथम (730-760 ई.) माने जाते हैं। 2. मुहणोत नैणसी ने गुर्जर-प्रतिहारों की 26 शाखाओं का वर्णन किया है, जिनमें मंडौर की शाखा सबसे प्राचीन मानी जाती है। 3. वत्सराज (783-795 ई.) के समय कन्नौज को लेकर प्रतिहार, पाल व राष्ट्रकू ट वंशों के बीच लगभग दो शताब्दियों तक चला "त्रिकोणीय संघर्ष" शुरू हुआ। 4. नागभट्ट द्वितीय (795-833 ई.) पहले प्रतिहार शासक थे जिन्होंने कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया। 5. मिहिर भोज (836-885 ई.) प्रतिहार वंश के सबसे शक्तिशाली शासक थे; उपाधि "आदिवराह"; अरब यात्री सुलेमान ने प्रतिहारों को "इस्लाम की दीवार" कहा। 6. महेन्द्रपाल प्रथम के दरबारी कवि राजशेखर ने उन्हें "रघुकु लतिलक" कहा; राजशेखर की प्रसिद्ध रचना कर्पूरमंजरी है। 7. 1018-19 ई. में महमूद गजनवी ने कन्नौज पर आक्रमण किया; राज्यपाल के भाग जाने पर क्रु द्ध भारतीय राजाओं ने ही उन्हें मृत्युदंड दिया। 8. यशपाल प्रतिहार वंश के अंतिम ज्ञात शासक थे; 1093 ई. में गहड़वाल शासक चंद्रदेव ने कन्नौज छीनकर प्रतिहार वंश का अंत किया। 9. ओसियां (जोधपुर) का महावीर स्वामी जैन मंदिर वत्सराज ने बनवाया — पश्चिम भारत का प्राचीनतम जैन मंदिर माना जाता है। 10. गुर्जर-प्रतिहार शैली को "महामारु शैली" भी कहा जाता है; प्रमुख उदाहरण — ओसियां मंदिर समूह, आभानेरी व आहड़ के आदिवराह मंदिर, बरोली मंदिर परिसर। 11. परमार शब्द का अर्थ "शत्रु का नाश करने वाला" है; चंदबरदाई के अनुसार परमार अग्निकुं ड से उत्पन्न 4 अग्निवंशी क्षत्रिय वंशों (चौहान, चालुक्य, प्रतिहार सहित) में से एक हैं। 12. आबू परमारों की राजधानी चंद्रावती थी; धारावर्ष (1163-1219 ई.) इस शाखा के सबसे शक्तिशाली शासक थे और मुहम्मद गौरी के विरुद्ध कयाद्रा युद्ध में गुजराती सेना का नेतृत्व किया।
13. विमलशाह ने 1031 ई. में देलवाड़ा (आबू) में आदिनाथ जैन मंदिर बनवाया — देलवाड़ा के मंदिरों में सबसे प्राचीन। 14. मुंज परमार वंश के सबसे शक्तिशाली शासक माने जाते हैं; चालुक्य तैलप द्वितीय को 6 बार हराया पर 7वीं बार हारकर मारे गए। 15. भोज परमार (1010-1055 ई.) मालवा परमारों के सबसे प्रसिद्ध शासक थे; इनके द्वारा स्थापित "सरस्वती कं ठाभरण" विद्यालय की वाग्देवी प्रतिमा आगे चलकर ज्ञानपीठ पुरस्कार का प्रतीक-चिन्ह बनी। 16. भोज परमार ने चित्तौड़गढ़ में त्रिभुवन नारायण मंदिर तथा मध्य प्रदेश में भोजपुर/भोजनगर (वर्तमान भोपाल) बसाया। 17. किराडू (बाड़मेर) के मंदिर परमार-कालीन स्थापत्य के उत्कृ ष्ट उदाहरण हैं; वर्तमान में ASI व INTACH द्वारा संरक्षित हैं। 18. वागड़ के परमार शासन का अंत 1119 ई. में गुहिल शासक सामंतसिंह ने किया। 19. आबू परमारों का अंत लगभग 1311 ई. में हुआ, जब नाडौल के चौहान राव लुम्बा ने चंद्रावती जीत ली। 20. जालौर पर क्रमशः प्रतिहार, फिर परमार, तथा अंततः 1181 ई. में चौहान शासक कीर्तिपाल का अधिकार हुआ — तीनों वंशों की परस्पर सत्ता-प्रतिस्पर्धा का यह अच्छा उदाहरण है।
नीचे दी समय-रेखा (Timeline) इस अध्याय के सभी महत्वपूर्ण वर्षों को एक साथ जोड़ती है — रिवीजन के लिए इसे ज़रूर दोहराएं:
वर्ष (Year) घटना/Event महत्व
लगभग 532 ई. मालवा के यशोवर्मन द्वारा हूणों की पराजय हूण आक्रमणों का अंत, राजपूत युग की पृष्ठभूमि
560 ई. रज्जिल द्वारा मंडौर में प्रतिहार सत्ता की स्थापना मंडौर शाखा की मजबूती का प्रारंभ (राजसूय यज्ञ)
647 ई. हर्षवर्धन की मृत्यु राजनीतिक एकता टूटी, राजपूत राजवंशों का उदय
730-760 ई. नागभट्ट प्रथम का शासन भीनमाल-उज्जैन-कन्नौज शाखा की स्थापना, अरब आक्रमण का प्रतिरोध
783-795 ई. वत्सराज का शासन त्रिकोणीय संघर्ष का प्रारंभ, ओसियां जैन मंदिर निर्माण
795-833 ई. नागभट्ट द्वितीय का शासन कन्नौज को राजधानी बनाया
815 ई. बुचकला अभिलेख नागभट्ट द्वितीय के शासनकाल का प्रमाण
833 ई. नागभट्ट द्वितीय की गंगा में जल-समाधि रामभद्र का उत्तराधिकार
836-885 ई. मिहिर भोज का शासन प्रतिहार साम्राज्य अपने चरम पर, उपाधि "आदिवराह"
837 ई. जोधपुर अभिलेख (बाउक द्वारा) मंडौर शाखा की वंशावली का प्रमाण
861 ई. घटियाला शिलालेख (कक्कु क द्वारा) मंडौर शाखा का प्रमुख अभिलेख
885-908 ई. महेन्द्रपाल प्रथम का शासन राजशेखर का साहित्यिक योगदान
960-985 ई. वाक्पतिराज का शासन जालौर परमार शाखा की स्थापना
977 ई. हस्तिकुं डी अभिलेख आबू परमार धरणीवराह से संबंधित
1010-1055 ई. भोज परमार का शासन धारानगरी में सरस्वती कं ठाभरण, चित्तौड़ त्रिभुवन नारायण मंदिर
1018-19 ई. महमूद गजनवी का कन्नौज पर आक्रमण प्रतिहार पतन तीव्र हुआ
1031 ई. विमलशाह द्वारा देलवाड़ा आदिनाथ मंदिर निर्माण आबू परमार क्षेत्र की स्थापत्य उपलब्धि
1093 ई. गहड़वाल चंद्रदेव द्वारा कन्नौज पर अधिकार गुर्जर-प्रतिहार वंश का अंत
1119 ई. गुहिल सामंतसिंह द्वारा वागड़ विजय वागड़ परमार शासन का अंत
1135 ई. सिद्धराज सोलंकी द्वारा मालवा विजय मालवा परमार पतन का प्रारंभ
1163-1219 ई. धारावर्ष का शासन (आबू परमार) आबू परमार शाखा का चरम काल
1178 ई. कयाद्रा का युद्ध मुहम्मद गौरी बनाम गुजरात-राजस्थान संयुक्त सेना, धारावर्ष नेतृत्व
1181 ई. कीर्तिपाल चौहान द्वारा जालौर विजय जालौर में परमार शासन का अंत
1311 ई. राव लुम्बा (नाडौल चौहान) द्वारा चंद्रावती विजय आबू परमार शासन का अंत