🏰 अध्याय 5/16 — राजस्थान का इतिहास

गुर्जर-प्रतिहार एवं परमार वंश

Gurjara-Pratihara & Parmar Dynasty | RAS Pre + Mains
📋 इस अध्याय में
  1. गुर्जर-प्रतिहार वंश — उत्पत्ति, नामकरण एवं शाखाएं
  2. मंडौर के प्रतिहार — आरंभिक शाखा
  3. भीनमाल-उज्जैन-कन्नौज के प्रतिहार — साम्राज्य-निर्माता शासक
  4. त्रिकोणीय संघर्ष एवं प्रतिहार वंश का पतन
  5. प्रतिहार वास्तुकला — महामारु शैली
  6. परमार वंश — उत्पत्ति एवं शाखाएं
  7. आबू, जालौर एवं किराडू के परमार
  8. वागड़ एवं मालवा के परमार — मुंज व भोज परमार
  9. दोनों वंशों की तुलना एवं सांस्कृतिक योगदान

पिछले अध्याय में हमने पढ़ा कि मौर्य-गुप्त साम्राज्य बिखरने के बाद राजस्थान में छोटे-छोटे जनपद व गणराज्य पनपे। लेकिन 6ठी-7वीं शताब्दी आते-आते उत्तर भारत के सामने एक नया संकट खड़ा हो गया — पश्चिम से अरब आक्रमणकारियों की लहरें भारत की सरहद तक पहुंचने लगीं। ठीक इसी दौर में, मारवाड़ की धरती पर एक विद्वान गुर्जर-ब्राह्मण हरिश्चंद्र और उसके चार क्षत्रिय पुत्रों ने मंडौर (जोधपुर) में एक ऐसे राजवंश की नींव रखी, जो आगे चलकर 300 से अधिक वर्षों तक उत्तर भारत की सबसे बड़ी शक्ति बना — गुर्जर-प्रतिहार वंश। इन्हीं प्रतिहारों ने अरबों को सिंध से आगे बढ़ने से रोका, इसीलिए इतिहासकार इन्हें "भारत की ढाल" (Shield of India) कहते हैं। लगभग इसी दौर में, आबू पर्वत की तलहटी से एक और राजवंश उभरा — परमार — जिसने राजस्थान से लेकर मालवा (मध्य प्रदेश) तक अपना साम्राज्य फैलाया, और भोज परमार जैसा विद्वान राजा दिया, जिसकी विद्वता के किस्से आज भी "भोजपुर" और "भोपाल" जैसे नामों में जीवित हैं। यह अध्याय इन्हीं दो महान राजवंशों — प्रतिहार व परमार — की पूरी गाथा है।

1गुर्जर-प्रतिहार वंश — उत्पत्ति, नामकरण एवं शाखाएं

A. नामकरण एवं मूल क्षेत्र

B. उत्पत्ति के विभिन्न मत (Origin Theories)

गुर्जर-प्रतिहारों की उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों में मतभेद रहा है — नीचे दी तालिका में प्रमुख विद्वानों के मत दिए गए हैं:

विद्वान (Scholar)मत (Opinion)
केनेडी (Kennedy)ईरानी मूल (Iranian origin)
अलेक्जेंडर कनिंघम (Cunningham)शक व यूएची (Yuezhi) जनजातियों के वंशज
स्मिथ, बूलर, हॉर्नलेहूणों (Huns) के वंशज
भंडारकर (Bhandarkar)विदेशी गुर्जर मूल
डॉ. गोपीनाथ शर्मा, डॉ. दशरथ शर्मा, के.एम. मुंशीभारतीय/स्वदेशी मूल — सबसे अधिक स्वीकृत मत

C. गुर्जर-प्रतिहारों की शाखाएं (Branches)

मुहणोत नैणसी ने गुर्जर-प्रतिहारों की 26 शाखाओं का वर्णन किया है, जिनमें मंडौर के प्रतिहार सबसे प्राचीन व महत्वपूर्ण माने गए हैं। प्रमुख शाखाएं इस प्रकार हैं:

शाखा (Branch)संस्थापक (Founder)
मंडौर (सबसे प्राचीन शाखा)हरिश्चंद्र
जालोर / भीनमालनागभट्ट प्रथम / नाहड़
राजोरगढ़ (अलवर)मंथनदेव
कन्नौजनागभट्ट द्वितीय
उज्जैननागभट्ट प्रथम
मेड़तानागभट्ट प्रथम (मंडौर शाखा वाले)
भड़ौच (गुजरात)दद्द / दद्ध
💡 मंडौर के प्रतिहार बनाम भीनमाल-कन्नौज के प्रतिहार — फर्क कैसे समझें?

ध्यान रहे — गुर्जर-प्रतिहारों की दो मुख्य धाराएं हैं, जिन्हें अक्सर परीक्षा में गड्ड-मड्ड कर दिया जाता है। पहली — मंडौर के प्रतिहार (हरिश्चंद्र से शुरू, स्थानीय शक्ति, कभी बड़ा साम्राज्य नहीं बना पाए, अंततः राठौड़ों के हाथों मंडौर गंवा बैठे)। दूसरी — भीनमाल-उज्जैन-कन्नौज के प्रतिहार (नागभट्ट प्रथम से शुरू, यही शाखा उत्तर भारत का विशाल साम्राज्य बनाती है और मिहिर भोज जैसा शक्तिशाली सम्राट देती है)। डॉ. ओझा के अनुसार यह दूसरी शाखा भी मूलतः मंडौर परिवार से ही जुड़ी थी, लेकिन इसने स्वतंत्र होकर भीनमाल, आबू व उज्जैन जीते और अंततः कन्नौज तक साम्राज्य फैलाया।

2मंडौर के प्रतिहार — आरंभिक शाखा

👑 हरिश्चंद्र (गुर्जर-प्रतिहारों के संस्थापक) (6ठी शताब्दी) प्रतिहारों के गुरु, गुर्जर-प्रतिहारों के आदिपुरुष एवं मंडौर शाखा के संस्थापक

मंडौर का अंत — आगे की कड़ी: सहजपाल चौहान के मंडौर अभिलेख (1145 ई.) से पता चलता है कि 12वीं शताब्दी के मध्य तक चौहान शासकों का मंडौर पर प्रभाव स्थापित हो चुका था, फिर भी इंदा शाखा के प्रतिहार वहां किसी तरह टिके रहे। अंततः 1395 ई. के आसपास हम्मीर परिहार के लगातार आक्रमणों से त्रस्त होकर प्रतिहारों ने मंडौर दुर्ग राव वीरम राठौड़ के पुत्र चूंडा को दहेज (विवाह-भेंट) में दे दिया — इसके बाद से मंडौर पर राठौड़ों का आधिपत्य शुरू हुआ (विस्तार के लिए देखें: अध्याय 8 — राठौड़ वंश)।

3भीनमाल-उज्जैन-कन्नौज के प्रतिहार — साम्राज्य-निर्माता शासक

डॉ. ओझा के अनुसार 739 ई. में भीनमाल को चावड़ा राजपूतों से छीना गया, इसके बाद आबू, जालौर व उज्जैन जीते गए और उज्जैन को राजधानी बनाया गया; बाद में कन्नौज जीतकर उसे भी राजधानी बनाया गया। यही शाखा आगे चलकर उत्तर भारत का सबसे बड़ा साम्राज्य बनाती है।

👑 नागभट्ट प्रथम (730-760 ई.) भीनमाल-उज्जैन-कन्नौज शाखा के संस्थापक, "प्रतिहार साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक"

👑 वत्सराज (783-795 ई.) उपाधि "रणहस्तिन" (युद्ध का हाथी) व "सम्राट", त्रिकोणीय संघर्ष के प्रवर्तक

💡 त्रिकोणीय संघर्ष — "कन्नौज" वह ताज जिसके लिए तीन ताकतें लड़ीं

8वीं-9वीं शताब्दी में कन्नौज (वर्तमान उत्तर प्रदेश) गंगा-यमुना दोआब का सबसे समृद्ध शहर व सत्ता का प्रतीक था। इस पर कब्जे के लिए तीन बड़ी शक्तियां — उत्तर-पश्चिम से गुर्जर-प्रतिहार, पूर्व से पाल वंश (बंगाल-बिहार), और दक्षिण से राष्ट्रकूट वंश (दक्कन) — लगभग दो शताब्दियों तक लगातार भिड़ती रहीं। इसी संघर्ष को इतिहास में "त्रिकोणीय/त्रिदलीय संघर्ष" कहा जाता है। वत्सराज ने इसकी शुरुआत की, राष्ट्रकूटों ने बीच-बीच में दोनों (प्रतिहार व पाल) को हराया, परंतु दक्कन से दूर होने के कारण कन्नौज पर स्थायी कब्जा बरकरार नहीं रख सके। अंततः नागभट्ट द्वितीय व मिहिर भोज के समय प्रतिहारों ने कन्नौज पर सबसे लंबे समय (लगभग दो शताब्दियों) तक राज किया — इसीलिए परीक्षा में अक्सर पूछा जाता है: त्रिकोणीय संघर्ष का अंतिम व स्थायी विजेता कौन था? उत्तर — गुर्जर-प्रतिहार।

👑 नागभट्ट द्वितीय (795-833 ई.) कन्नौज को राजधानी बनाने वाले पहले प्रतिहार शासक

👑 मिहिर भोज / भोज प्रथम (836-885 ई.) प्रतिहार वंश के सबसे शक्तिशाली शासक, साम्राज्य अपने चरम पर

👑 महेन्द्रपाल प्रथम (885-908 ई.) उपाधि "निर्भय नरेश", साहित्यिक योगदान के लिए प्रसिद्ध

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4त्रिकोणीय संघर्ष एवं प्रतिहार वंश का पतन

महिपाल प्रथम (913-943 ई.) के शासनकाल से प्रतिहार साम्राज्य का क्रमिक पतन शुरू हो गया। राष्ट्रकूट शासक इंद्र तृतीय ने मालवा पर आक्रमण कर उज्जैन पर अधिकार किया, यमुना पार कर कन्नौज (महोदय) की राजधानी को तहस-नहस कर दिया। अरब यात्री अल-मसूदी (915 ई. में भारत आए) ने महिपाल ("बउर") व राष्ट्रकूट शासक ("बल्लहरा") के बीच गहरी शत्रुता का वर्णन किया है। इसके बावजूद गुहिल सामंत भट्ट ने राष्ट्रकूट शासक गोविंद चतुर्थ को हराया (चाटसू अभिलेख, 813 ई.), जो दिखाता है कि पतन के बावजूद प्रतिहार सामंतों का प्रभाव कुछ समय तक बना रहा। नीचे दी तालिका पतन के अंतिम चरण को दर्शाती है:

शासक (Ruler)काल (Period)मुख्य घटना (Key Event)
महेन्द्रपाल द्वितीय, देवपाल, विनायकपाल, महिपाल द्वितीय, विजयपाल943-990 ई. (क्रमशः)कमजोर उत्तराधिकारी, साम्राज्य लगातार सिकुड़ता गया
राज्यपाल990-1019 ई.1018-19 ई. में महमूद गजनवी ने कन्नौज पर आक्रमण किया; राज्यपाल भाग गए, जिसकी "कायरता" पर क्रुद्ध होकर अन्य भारतीय राजाओं ने ही उन्हें मृत्युदंड दे दिया
त्रिलोचनपाल1019-1027 ई.1019 ई. में महमूद गजनवी से पराजित हुए
यशपाल1027-1093 ई.प्रतिहार वंश के अंतिम ज्ञात शासक; कड़ा अभिलेख (1036 ई., इलाहाबाद) में इनके दान का उल्लेख मिलता है

प्रतिहार वंश का अंत: 1093 ई. के आसपास प्रतिहारों के सामंत रहे गहड़वाल शासक चंद्रदेव ने कन्नौज पर अधिकार कर प्रतिहारों के अस्तित्व को समाप्त कर दिया — इसके बाद कन्नौज में एक नया स्वतंत्र "गहड़वाल वंश" स्थापित हुआ।

5प्रतिहार वास्तुकला — महामारु शैली

8वीं शताब्दी में राजस्थान में गुर्जर-प्रतिहार शैली का विकास हुआ, जिसे मारवाड़ क्षेत्र में विकसित होने के कारण "महामारु शैली" भी कहा जाता है। इस शैली के प्रमुख मंदिर इस प्रकार हैं:

मंदिर (Temple)स्थान (Location)विशेषता
सच्चियाय माता, सूर्य व महावीर जैन मंदिर सहित 16+ मंदिरओसियां, जोधपुरमहावीर मंदिर वत्सराज के काल (783 ई.) का, पश्चिम भारत का प्राचीनतम जैन मंदिर
नीलकंठेश्वर मंदिरकेकिंद, मेड़ता (नागौर)प्रतिहार-कालीन शिव मंदिर
आदिवराह मंदिरआहड़ (उदयपुर) व आभानेरी (दौसा)मिहिर भोज की उपाधि "आदिवराह" से संबद्ध नामकरण
नीलकंठ मंदिरराजोरगढ़ (अलवर)प्रतिहार सामंत मथनदेव के क्षेत्र का प्रमुख मंदिर
हरिहर मंदिरऔसियां (जोधपुर)शिव-विष्णु के संयुक्त स्वरूप को समर्पित
बरोली मंदिर परिसररावतभाटा (चित्तौड़गढ़)महामारु शैली के उत्कृष्ट उदाहरणों में से एक

6परमार वंश — उत्पत्ति एवं शाखाएं

A. नामकरण एवं उत्पत्ति के मत

B. परमारों की प्रमुख शाखाएं

शाखा (Branch)मुख्य क्षेत्र एवं राजधानी (Region & Capital)
आबू के परमारचंद्रावती राजधानी; सबसे प्रभावशाली राजस्थानी शाखाओं में से एक
जालौर के परमारआबू परमारों की एक छोटी शाखा
मालवा के परमार (मुख्य शाखा)धारानगरी/उज्जैन राजधानी; परमारों की सबसे शक्तिशाली व प्रसिद्ध शाखा
वागड़ के परमारडूंगरपुर-बांसवाड़ा क्षेत्र, अर्थुना राजधानी
मारवाड़, गुजरात, सिंध व किराडू के परमारछोटी स्थानीय शाखाएं, प्रायः सोलंकियों के सामंत
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7आबू, जालौर एवं किराडू के परमार

A. आबू के परमार

👑 धारावर्ष (1163-1219 ई.) आबू परमारों के सबसे शक्तिशाली शासक

आबू परमारों का अंत: लगभग 1311 ई. में नाडौल के चौहान शासक राव लुम्बा ने आबू परमारों की राजधानी चंद्रावती को जीतकर वहां चौहान शासन स्थापित कर दिया — इसके साथ ही आबू परमार शाखा का अंत हो गया।

B. जालौर एवं किराडू के परमार

8वागड़ एवं मालवा के परमार — मुंज व भोज परमार

A. वागड़ के परमार

B. मालवा के परमार (मुख्य एवं सबसे शक्तिशाली शाखा)

👑 मुंज परमार (लगभग 972-995 ई.) परमार वंश के सबसे शक्तिशाली शासक

👑 भोज परमार (1010-1055 ई.) मालवा परमारों के सबसे प्रसिद्ध व विद्वान शासक

करंट अफेयर्स — भोज परमार व ज्ञानपीठ पुरस्कार: ज्ञानपीठ पुरस्कार 1961 में शुरू हुआ; प्रतीक-चिन्ह वाग्देवी (सरस्वती) की कांस्य प्रतिमा है, साथ में प्रशस्ति-पत्र व वर्तमान पुरस्कार राशि 11 लाख रुपए दी जाती है। प्रथम पुरस्कार 1965 ई. में मलयालम लेखक जी. शंकर कुरुप को मिला था; 58वां ज्ञानपीठ पुरस्कार 2025 में संस्कृत भाषा के जगद्गुरु रामभद्राचार्य को दिया गया। भोज परमार द्वारा धारानगरी में स्थापित वाग्देवी की उसी परंपरा से यह पुरस्कार आज भी प्रतीकात्मक रूप से जुड़ा हुआ है।

C. जयसिंह एवं मालवा परमार वंश का पतन

9दोनों वंशों की तुलना एवं सांस्कृतिक योगदान

गुर्जर-प्रतिहार (Pratihar)
  • मूल शक्ति-केंद्र — मंडौर व भीनमाल (राजस्थान)
  • साम्राज्य का चरम — मिहिर भोज के काल में, राजधानी कन्नौज (उत्तर प्रदेश)
  • मुख्य पहचान — अरब आक्रमणकारियों से लगभग 200 वर्षों तक रक्षा, "भारत की ढाल"
  • स्थापत्य शैली — महामारु शैली (ओसियां मंदिर समूह प्रमुख उदाहरण)
  • अंत — 1093 ई., गहड़वाल शासक चंद्रदेव द्वारा कन्नौज पर अधिकार
परमार (Parmar)
  • मूल शक्ति-केंद्र — आबू व मालवा (धारानगरी/उज्जैन)
  • साम्राज्य का चरम — भोज परमार के काल में, राजधानी धारानगरी (मध्य प्रदेश)
  • मुख्य पहचान — विद्या व साहित्य का संरक्षण, भोज परमार स्वयं महान विद्वान-राजा
  • स्थापत्य शैली — किराडू मंदिर समूह, देलवाड़ा जैन मंदिर (आबू शाखा से संबद्ध)
  • अंत — मालवा शाखा खिलजी आक्रमण से; आबू शाखा 1311 ई. में नाडौल चौहानों द्वारा
"अरबों को दो शताब्दियों तक रोकने वाले प्रतिहार, और विद्या को राजसिंहासन के समान सम्मान देने वाले भोज परमार — दोनों ही सिद्ध करते हैं कि राजस्थान की धरती ने तलवार और कलम, दोनों को समान गौरव दिया है।" — राजस्थान इतिहास की सामान्य परंपरा

★ अध्याय सार — महत्वपूर्ण तथ्य ★

1. गुर्जर-प्रतिहार वंश के संस्थापक हरिश्चंद्र थे, जिन्होंने मंडौर (जोधपुर) को राजधानी बनाया; भीनमाल-उज्जैन-कन्नौज शाखा के वास्तविक साम्राज्य-निर्माता नागभट्ट प्रथम (730-760 ई.) माने जाते हैं। 2. मुहणोत नैणसी ने गुर्जर-प्रतिहारों की 26 शाखाओं का वर्णन किया है, जिनमें मंडौर की शाखा सबसे प्राचीन मानी जाती है। 3. वत्सराज (783-795 ई.) के समय कन्नौज को लेकर प्रतिहार, पाल व राष्ट्रकूट वंशों के बीच लगभग दो शताब्दियों तक चला "त्रिकोणीय संघर्ष" शुरू हुआ। 4. नागभट्ट द्वितीय (795-833 ई.) पहले प्रतिहार शासक थे जिन्होंने कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया। 5. मिहिर भोज (836-885 ई.) प्रतिहार वंश के सबसे शक्तिशाली शासक थे; उपाधि "आदिवराह"; अरब यात्री सुलेमान ने प्रतिहारों को "इस्लाम की दीवार" कहा। 6. महेन्द्रपाल प्रथम के दरबारी कवि राजशेखर ने उन्हें "रघुकुलतिलक" कहा; राजशेखर की प्रसिद्ध रचना कर्पूरमंजरी है। 7. 1018-19 ई. में महमूद गजनवी ने कन्नौज पर आक्रमण किया; राज्यपाल के भाग जाने पर क्रुद्ध भारतीय राजाओं ने ही उन्हें मृत्युदंड दिया। 8. यशपाल प्रतिहार वंश के अंतिम ज्ञात शासक थे; 1093 ई. में गहड़वाल शासक चंद्रदेव ने कन्नौज छीनकर प्रतिहार वंश का अंत किया। 9. ओसियां (जोधपुर) का महावीर स्वामी जैन मंदिर वत्सराज ने बनवाया — पश्चिम भारत का प्राचीनतम जैन मंदिर माना जाता है। 10. गुर्जर-प्रतिहार शैली को "महामारु शैली" भी कहा जाता है; प्रमुख उदाहरण — ओसियां मंदिर समूह, आभानेरी व आहड़ के आदिवराह मंदिर, बरोली मंदिर परिसर। 11. परमार शब्द का अर्थ "शत्रु का नाश करने वाला" है; चंदबरदाई के अनुसार परमार अग्निकुंड से उत्पन्न 4 अग्निवंशी क्षत्रिय वंशों (चौहान, चालुक्य, प्रतिहार सहित) में से एक हैं। 12. आबू परमारों की राजधानी चंद्रावती थी; धारावर्ष (1163-1219 ई.) इस शाखा के सबसे शक्तिशाली शासक थे और मुहम्मद गौरी के विरुद्ध कयाद्रा युद्ध में गुजराती सेना का नेतृत्व किया। 13. विमलशाह ने 1031 ई. में देलवाड़ा (आबू) में आदिनाथ जैन मंदिर बनवाया — देलवाड़ा के मंदिरों में सबसे प्राचीन। 14. मुंज परमार वंश के सबसे शक्तिशाली शासक माने जाते हैं; चालुक्य तैलप द्वितीय को 6 बार हराया पर 7वीं बार हारकर मारे गए। 15. भोज परमार (1010-1055 ई.) मालवा परमारों के सबसे प्रसिद्ध शासक थे; इनके द्वारा स्थापित "सरस्वती कंठाभरण" विद्यालय की वाग्देवी प्रतिमा आगे चलकर ज्ञानपीठ पुरस्कार का प्रतीक-चिन्ह बनी। 16. भोज परमार ने चित्तौड़गढ़ में त्रिभुवन नारायण मंदिर तथा मध्य प्रदेश में भोजपुर/भोजनगर (वर्तमान भोपाल) बसाया। 17. किराडू (बाड़मेर) के मंदिर परमार-कालीन स्थापत्य के उत्कृष्ट उदाहरण हैं; वर्तमान में ASI व INTACH द्वारा संरक्षित हैं। 18. वागड़ के परमार शासन का अंत 1119 ई. में गुहिल शासक सामंतसिंह ने किया। 19. आबू परमारों का अंत लगभग 1311 ई. में हुआ, जब नाडौल के चौहान राव लुम्बा ने चंद्रावती जीत ली। 20. जालौर पर क्रमशः प्रतिहार, फिर परमार, तथा अंततः 1181 ई. में चौहान शासक कीर्तिपाल का अधिकार हुआ — तीनों वंशों की परस्पर सत्ता-प्रतिस्पर्धा का यह अच्छा उदाहरण है।

नीचे दी समय-रेखा (Timeline) इस अध्याय के सभी महत्वपूर्ण वर्षों को एक साथ जोड़ती है — रिवीजन के लिए इसे ज़रूर दोहराएं:

वर्ष (Year)घटना/Eventमहत्व
560 ई.रज्जिल द्वारा मंडौर में प्रतिहार सत्ता की स्थापना (राजसूय यज्ञ)मंडौर शाखा की मजबूती का प्रारंभ
730-760 ई.नागभट्ट प्रथम का शासनभीनमाल-उज्जैन-कन्नौज शाखा की स्थापना, अरब आक्रमण का प्रतिरोध
783-795 ई.वत्सराज का शासनत्रिकोणीय संघर्ष का प्रारंभ, ओसियां जैन मंदिर निर्माण
795-833 ई.नागभट्ट द्वितीय का शासनकन्नौज को राजधानी बनाया
815 ई.बुचकला अभिलेखनागभट्ट द्वितीय के शासनकाल का प्रमाण
833 ई.नागभट्ट द्वितीय की गंगा में जल-समाधिरामभद्र का उत्तराधिकार
836-885 ई.मिहिर भोज का शासनप्रतिहार साम्राज्य अपने चरम पर, उपाधि "आदिवराह"
837 ई.जोधपुर अभिलेख (बाउक द्वारा)मंडौर शाखा की वंशावली का प्रमाण
861 ई.घटियाला शिलालेख (कक्कुक द्वारा)मंडौर शाखा का प्रमुख अभिलेख
885-908 ई.महेन्द्रपाल प्रथम का शासनराजशेखर का साहित्यिक योगदान
960-985 ई.वाक्पतिराज का शासनजालौर परमार शाखा की स्थापना
977 ई.हस्तिकुंडी अभिलेखआबू परमार धरणीवराह से संबंधित
1010-1055 ई.भोज परमार का शासनधारानगरी में सरस्वती कंठाभरण, चित्तौड़ त्रिभुवन नारायण मंदिर
1018-19 ई.महमूद गजनवी का कन्नौज पर आक्रमणप्रतिहार पतन तीव्र हुआ
1031 ई.विमलशाह द्वारा देलवाड़ा आदिनाथ मंदिर निर्माणआबू परमार क्षेत्र की स्थापत्य उपलब्धि
1093 ई.गहड़वाल चंद्रदेव द्वारा कन्नौज पर अधिकारगुर्जर-प्रतिहार वंश का अंत
1119 ई.गुहिल सामंतसिंह द्वारा वागड़ विजयवागड़ परमार शासन का अंत
1135 ई.सिद्धराज सोलंकी द्वारा मालवा विजयमालवा परमार पतन का प्रारंभ
1163-1219 ई.धारावर्ष का शासन (आबू परमार)आबू परमार शाखा का चरम काल
1178 ई.कयाद्रा का युद्धमुहम्मद गौरी बनाम गुजरात-राजस्थान संयुक्त सेना, धारावर्ष नेतृत्व
1181 ई.कीर्तिपाल चौहान द्वारा जालौर विजयजालौर में परमार शासन का अंत
1311 ई.राव लुम्बा (नाडौल चौहान) द्वारा चंद्रावती विजयआबू परमार शासन का अंत
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