🛕 अध्याय 4/16 — राजस्थान का इतिहास

प्राचीन राजस्थान

Ancient Rajasthan | RAS Pre + Mains
📋 इस अध्याय में
  1. प्राचीन राजस्थान — परिचय
  2. गणराज्य एवं जनपद (Republics & Janapadas)
  3. बैराठ (विराटनगर) — मौर्यकालीन बौद्ध केंद्र
  4. नगरी सभ्यता (मध्यमिका) — चित्तौड़गढ़
  5. नगर एवं रैढ़ — टोंक के प्राचीन केंद्र
  6. अन्य ऐतिहासिक केंद्र
  7. शक-कुषाण एवं गुप्त प्रभाव
  8. धर्म, समाज एवं प्राचीन व्यापार मार्ग

पिछले अध्याय में हमने पढ़ा कि कालीबंगा जैसी कांस्य-युगीन सभ्यताएं जलवायु-शुष्कता के कारण धीरे-धीरे समाप्त हो गईं। लेकिन राजस्थान की धरती खाली नहीं रही — जहां एक सभ्यता का अंत हुआ, वहीं नए जनपदों (छोटे गणतंत्रों जैसे राज्यों) व नगरों का उदय हुआ। कल्पना कीजिए, आज से लगभग 2300 साल पहले जयपुर के पास एक पहाड़ी पर सम्राट अशोक का एक संदेश खुदवाया गया — एक ऐसा संदेश जिसमें अशोक खुद बौद्ध धर्म अपनाने की बात स्वीकार करते हैं। वह जगह थी बैराठ, और वह संदेश था भाब्रू शिलालेख — भारत के सबसे अनोखे शिलालेखों में से एक। इस अध्याय में हम राजस्थान के उन प्राचीन नगरों, जनपदों व गणराज्यों की सैर करेंगे, जिन्होंने मौर्य, शुंग, कुषाण व गुप्त कालों में राजस्थान की पहचान गढ़ी।

1प्राचीन राजस्थान — परिचय

2गणराज्य एवं जनपद (Republics & Janapadas)

प्राचीन भारत में जनपद उन क्षेत्रों को कहा जाता था जहां जनता (लोगों का समूह) मिलकर शासन करती थी — यह आज के गणतंत्र (Republic) की एक प्रारंभिक झलक थी। राजस्थान में ऐसे कई जनपद विकसित हुए:

जनपद/गणराज्यक्षेत्रमुख्य विशेषता
मत्स्य महाजनपद (Matsya)वर्तमान जयपुर (कोटपूतली-बहरोड़), टोंक, अलवर, करौली व भरतपुर तक विस्तारराजधानी विराटनगर (बैराठ); महाभारत काल में पांडवों के अज्ञातवास से जुड़ा
मालव गणराज्य (Malava)टोंक क्षेत्र (नगर/उनियारा)राजधानी संभवतः नगर (मालव प्रदेश); "मालव जनपद" अंकित सिक्के व सीसे की मुहर मिली
यौधेय गणराज्य (Yaudheya)उत्तरी राजस्थानयौधेय जनजाति के सर्वाधिक सिक्के राजस्थान में ही मिले हैं — एक शक्तिशाली प्राचीन गणतंत्र
आर्जुनायन गणराज्य (Arjunayan)पूर्वी राजस्थानअर्जुन के नाम पर आधारित एक प्राचीन गणतंत्र, सिक्कों से जानकारी मिलती है
शिवि जनपद (Shivi)चित्तौड़गढ़ क्षेत्र (नगरी)नगरी (मध्यमिका) से शिवि जनपद के सिक्के प्राप्त हुए हैं
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3बैराठ (विराटनगर) — मौर्यकालीन बौद्ध केंद्र

📍 बैराठ / विराटनगर (Bairat) (कोटपूतली-बहरोड़, जयपुर)

⏰ काल (Period): महाभारत काल से मौर्य-कुषाण-गुप्त काल तक निरंतर बसावट
⭐ महत्व (Significance): बणगंगा नदी के तट पर स्थित बैराठ प्राचीन काल में मत्स्य महाजनपद की राजधानी "विराटनगर" थी। महाभारत के अनुसार पांडवों ने यहीं अपने अज्ञातवास का एक वर्ष व्यतीत किया था। लेकिन बैराठ की सबसे बड़ी पहचान इसका मौर्यकालीन बौद्ध इतिहास है — यहां मिला गोलाकार बौद्ध चैत्य (Circular Chaitya) भारत की सबसे प्राचीन स्वतंत्र-निर्मित (free-standing) बौद्ध संरचना मानी जाती है।

A. भाब्रू (बैराठ) शिलालेख — अशोक का अनूठा संदेश

💡 भाब्रू शिलालेख इतना खास क्यों है?

सोचिए, अशोक के ज़्यादातर शिलालेख प्रजा को नैतिकता व धर्म-नीति (Dhamma) की शिक्षा देते हैं, पर वे कहीं भी सीधे यह नहीं कहते कि "मैं बौद्ध हूं"। लेकिन बैराठ के भाब्रू शिलालेख में अशोक खुलकर कहते हैं कि वे बुद्ध, धम्म व संघ में आस्था रखते हैं, और आगे पढ़ने के लिए विशेष बौद्ध ग्रंथों की सूची भी देते हैं — जैसे कोई शिक्षक अपने विद्यार्थियों को पढ़ने की किताबें सुझाए। यही व्यक्तिगत व सीधा लहजा इस शिलालेख को अशोक के सभी अभिलेखों में सबसे अनोखा बनाता है।

B. उत्खनन एवं अन्य प्रमुख खोजें

करंट अफेयर्स (Latest): हाल ही में बैराठ के इस ऐतिहासिक बौद्ध स्थल को संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है, तथा जल-रिसाव व अन्य क्षति से बचाव हेतु सुरक्षा उपाय व एक प्रवेश-द्वार भी लगाया गया है। इतिहासकार इसे भारत की प्राचीनतम स्वतंत्र-निर्मित बौद्ध संरचना (oldest free-standing Buddhist structure in India) मानते हैं, जिससे यह स्थल बौद्ध-अनुयायी पर्यटकों के लिए भी महत्वपूर्ण तीर्थ बनता जा रहा है।

4नगरी सभ्यता (मध्यमिका) — चित्तौड़गढ़

📍 नगरी (मध्यमिका) (चित्तौड़गढ़ (बेड़च नदी तट))

⏰ काल (Period): मौर्य से गुप्त काल तक
⭐ महत्व (Significance): नगरी का प्राचीन नाम "मध्यमिका" या "मज्झिमिका" था, जिसका उल्लेख पाणिनि की अष्टाध्यायी व महाभाष्य दोनों में मिलता है। यह पहले से ही अध्याय 1 में पढ़े गए घोसुण्डी शिलालेख (वैष्णव धर्म के प्राचीनतम प्रमाण) का भी स्थान है (विस्तार हेतु देखें अध्याय 1)। इसकी खोज 1870 में कार्लाइल ने की, प्रथम उत्खनन 1904 में डॉ. भंडारकर ने तथा विस्तृत उत्खनन 1961-62 में सुंदरराजन व केंद्रीय पुरातत्व विभाग ने किया।

5नगर एवं रैढ़ — टोंक के प्राचीन केंद्र

📍 नगर (Nagar) (उनियारा, टोंक)

⏰ काल (Period): मालव जनपद काल
⭐ महत्व (Significance): नगर का प्राचीन नाम "मालव प्रदेश" था और इसे मालव जनपद की राजधानी माना जाता है। इस स्थल की खोज लगभग 150 वर्ष पहले अंग्रेज़ पुरातत्वविद् ए.सी.एल. कार्लाइल ने की थी; विस्तृत उत्खनन डॉ. के.एन. पुरी के निर्देशन में 1938-40 में हुआ। यहां से "नागवाहा महाजया" व "नागवाहा जया" अंकित सिक्के मिले हैं, जिनके कारण इस स्थल को "नगर" नाम दिया गया। मालव व आहत सिक्कों के साथ-साथ गुप्तकालीन अभिलेख भी यहां से मिले हैं।

📍 रैढ़ (Rairh) (निवाई तहसील, टोंक (ढील नदी तट))

⏰ काल (Period): मालव-हिन्द यवन काल से गुप्त काल तक
⭐ महत्व (Significance): रैढ़ का उत्खनन 1938-40 में दयाराम साहनी व डॉ. के.एन. पुरी के निर्देशन में हुआ। यहां मातृ देवी की मूर्ति व गजमुखी यक्ष की मूर्ति के साथ-साथ भारत के सबसे बड़े सिक्का-भंडारों में से एक मिला है — जिसमें यूनानी शासक अपोलोडोटस का सिक्का व इंडो-सैसेनियन मुद्राएं शामिल हैं (कुल 3075 आहत/पंचमार्क सिक्के — देखें अध्याय 1)। यहां लोहे के औज़ार बड़ी मात्रा में मिलने के कारण इसे "प्राचीन भारत का टाटा नगर" भी कहा जाता है।

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6अन्य ऐतिहासिक केंद्र

इनके अलावा राजस्थान में कई और महत्वपूर्ण प्राचीन ऐतिहासिक केंद्र मिले हैं, जो मौर्य, शुंग, कुषाण व गुप्त कालों की जानकारी देते हैं:

📍 रंगमहल (Rangmahal) (हनुमानगढ़ (घग्घर नदी तट))

⏰ काल (Period): लगभग 1000 ईपू से 300 ई. तक
⭐ महत्व (Significance): स्वीडन के लुंड विश्वविद्यालय की टीम (हैना रीड, होल्गर व आर्बमन के नेतृत्व में) ने 1952-54 में यहां उत्खनन किया। यहां से कुषाण शासक कनिष्क प्रथम व कनिष्क तृतीय के पंचमार्क सिक्के, 105 तांबे के सिक्के, गुरु-शिष्य व गांधार शैली की मूर्तियां, तथा पहियों वाली एक छोटी मिट्टी की खिलौना-गाड़ी मिली है। यहां से मिला कृष्ण-लीला का चित्रण भारत में इस विषय का सबसे प्राचीन साक्ष्य माना जाता है। मुख्य फसल चावल थी और घर ईंटों से बने थे।

📍 नोह (Noh) (भरतपुर (रूपारेल नदी तट))

⏰ काल (Period): लगभग 1100-900 ईपू (रेडियोकार्बन तिथि), 5 सांस्कृतिक चरण
⭐ महत्व (Significance): रतनचंद्र अग्रवाल के निर्देशन में 1963-64 से 1972 तक 7 चरणों में उत्खनन हुआ। यहां की सबसे खास बात यह है कि एक ही स्थान पर ताम्रपाषाणकालीन, वैदिककालीन व महाभारतकालीन — तीनों संस्कृतियों के अवशेष एक साथ मिले हैं। "जाखबाबा" नामक एक विशाल यक्ष-प्रतिमा तथा हुविष्क व वासुदेव कुषाण शासकों के सिक्के भी यहां से प्राप्त हुए हैं। 16 रिंगवेल (गोलाकार कुएं) के अवशेष भी मिले हैं।

📍 भीनमाल (Bhinmal) (जालौर)

⏰ काल (Period): गुप्त-पूर्व से प्रारंभिक प्रतिहार काल तक
⭐ महत्व (Significance): भीनमाल का प्राचीन नाम "श्रीमाल" था। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने इसे "पिलोमोलो" कहकर संबोधित किया। इसका उत्खनन आर.सी. अग्रवाल ने 1953-54 में किया। यहां शक क्षत्रपों के सिक्के, यूनानी सुरापात्र (wine flask) व रोमन मदिरा-पात्र मिले हैं — जो यूनान व रोम से व्यापारिक संबंधों का प्रमाण हैं। भीनमाल प्रसिद्ध गणितज्ञ-खगोलशास्त्री ब्रह्मगुप्त तथा "शिशुपाल वध" महाकाव्य के रचयिता कवि माघ की जन्मस्थली भी है। आगे चलकर यही स्थल गुर्जर-प्रतिहार वंश की प्रारंभिक राजधानी बना (विस्तार हेतु देखें अध्याय 5)।

स्थलजिलामुख्य विशेषता
नलियासर (Naliyasar)सांभर, जयपुर ग्रामीणशाकंभरी के निकट स्थित; यहां से प्रतिहारकालीन मंदिर व चौहान-पूर्व युग की जानकारी तथा इंडो-ग्रीक सिक्के मिले हैं
जोधपुरा (Jodhpura)कोटपूतली-बहरोड़, जयपुरसाबी नदी तट पर स्थित; 1972-73 में आर.सी. अग्रवाल व विजय कुमार द्वारा उत्खनन; प्रारंभिक कालखंड में लौह धातु व घोड़े से रथ खींचने के प्रमाण मिले
सुनारी (Sunari)खेतड़ी, झुंझुनूं (कांतली नदी)यहां लौह-प्रगलन (Iron Smelting) की राजस्थान की प्राचीनतम भट्टियां मिली हैं; चावल की खेती व घोड़ा-रथ के प्रमाण; शुंग-मौर्य-कुषाण कालीन अवशेष
बयाना/श्रीपंथ (Bayana)भरतपुरगुप्तकालीन स्वर्ण सिक्कों का विशाल भंडार (देखें अध्याय 1); नील की खेती के भी प्रमाण मिले हैं

7शक-कुषाण एवं गुप्त प्रभाव

8धर्म, समाज एवं प्राचीन व्यापार मार्ग

"एक पहाड़ी पर खुदा हुआ राजा का संदेश, एक टूटे सिक्के पर अंकित यूनानी देवता का चेहरा, और मिट्टी में दबी एक बौद्ध भिक्षु की स्मृति — राजस्थान की धरती सदियों से दुनिया-भर की सभ्यताओं से बातचीत करती आई है।" — प्राचीन राजस्थान अध्ययन का सामान्य सिद्धांत

★ अध्याय सार — महत्वपूर्ण तथ्य ★

1. बैराठ (विराटनगर) — मत्स्य महाजनपद की राजधानी; महाभारत काल में पांडवों के अज्ञातवास से जुड़ा स्थल। 2. भाब्रू (बैराठ) शिलालेख — अशोक का एकमात्र अभिलेख जिसमें वे स्वयं को बौद्ध घोषित करते हैं; 1837 में कैप्टन बर्ट द्वारा खोजा गया। 3. बैराठ का गोलाकार बौद्ध चैत्य भारत की सबसे प्राचीन स्वतंत्र-निर्मित बौद्ध संरचना मानी जाती है — हाल ही में इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है। 4. नगरी (चित्तौड़गढ़) का प्राचीन नाम मध्यमिका/मज्झिमिका था — पाणिनि की अष्टाध्यायी में उल्लेखित; शिवि जनपद के सिक्के यहीं से मिले। 5. नगर (टोंक) — मालव जनपद की संभावित राजधानी; "नागवाहा" अंकित सिक्कों से नाम पड़ा। 6. रैढ़ (टोंक) — भारत के सबसे बड़े सिक्का-भंडारों में से एक; प्रचुर लौह-उपकरणों के कारण "प्राचीन भारत का टाटा नगर" कहा जाता है। 7. रंगमहल (हनुमानगढ़) — कुषाण शासकों (कनिष्क) के सिक्के व भारत में कृष्ण-लीला चित्रण का प्राचीनतम साक्ष्य यहीं मिला। 8. नोह (भरतपुर) — ताम्रपाषाण, वैदिक व महाभारतकालीन — तीनों संस्कृतियों के अवशेष एक साथ मिलने वाला दुर्लभ स्थल। 9. सुनारी (झुंझुनूं) — राजस्थान की प्राचीनतम लौह-प्रगलन भट्टियां यहीं मिली हैं। 10. भीनमाल (जालौर) — प्राचीन नाम श्रीमाल; गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त व कवि माघ की जन्मस्थली; गुर्जर-प्रतिहार वंश की प्रारंभिक राजधानी। 11. मत्स्य, मालव, यौधेय, आर्जुनायन व शिवि — राजस्थान के प्रमुख प्राचीन जनपद/गणराज्य थे, जिनकी जानकारी मुख्यतः सिक्कों से मिलती है। 12. शक, कुषाण व गुप्त — तीनों बाहरी शक्तियों का सांस्कृतिक व आर्थिक प्रभाव राजस्थान के विभिन्न भागों में सिक्कों व मंदिर-अवशेषों के रूप में मिलता है। 13. बयाना (भरतपुर) से मिला गुप्तकालीन स्वर्ण सिक्कों का भंडार गुप्त साम्राज्य के आर्थिक प्रभाव का प्रमुख प्रमाण है। 14. भीनमाल से मिले यूनानी व रोमन मदिरा-पात्र प्राचीन राजस्थान के अंतरराष्ट्रीय व्यापार-संपर्कों को दर्शाते हैं।

नीचे दी समय-रेखा (Timeline) इस अध्याय के सभी महत्वपूर्ण वर्षों व तथ्यों को एक साथ जोड़ती है — रिवीजन के लिए इसे ज़रूर दोहराएं:

वर्ष (Year)घटना/Eventमहत्व
लगभग 300 ईपूअशोक का भाब्रू शिलालेख व बैराठ का गोलाकार चैत्यमौर्यकालीन बौद्ध धर्म का प्रत्यक्ष प्रमाण
लगभग 250-100 ईपूमालव, यौधेय, आर्जुनायन व शिवि जनपदों का उत्कर्षप्राचीन गणतांत्रिक व्यवस्था का उदाहरण
1837कैप्टन बर्ट द्वारा भाब्रू शिलालेख की खोजअशोक के बौद्ध होने का प्रत्यक्ष प्रमाण मिला
1870कार्लाइल द्वारा नगरी सभ्यता की खोजमध्यमिका/नगरी स्थल की पहचान
1871-72कार्लाइल को बैराठ से दूसरा शिलालेख प्राप्तअशोक के अन्य अभिलेखों की प्रतिलिपि की पुष्टि
1904डॉ. भंडारकर द्वारा नगरी का प्रथम उत्खननमध्यमिका सभ्यता का वैज्ञानिक अध्ययन प्रारंभ
1936-37दयाराम साहनी द्वारा बैराठ का प्रथम उत्खननगोलाकार चैत्य व स्तूप अवशेषों की खोज
1938-40नगर व रैढ़ का उत्खनन (साहनी व डॉ. के.एन. पुरी)मालव जनपद व विशाल सिक्का-भंडार की पहचान
1952-54स्वीडिश दल द्वारा रंगमहल का उत्खननकुषाणकालीन सिक्कों व कला की खोज
1953-54आर.सी. अग्रवाल द्वारा भीनमाल का उत्खननयूनान-रोम व्यापार संपर्कों का प्रमाण मिला
1961-62सुंदरराजन द्वारा नगरी का विस्तृत उत्खननकुषाण सुरक्षा-दीवार व गुप्त मंदिर की खोज
1962-63नीलरत्न बनर्जी व कैलाशनाथ दीक्षित द्वारा बैराठ का पुनः उत्खननबौद्ध अवशेषों का विस्तृत अध्ययन
1963-72रतनचंद्र अग्रवाल द्वारा नोह का उत्खनन (7 चरण)तीन संस्कृतियों के एक साथ मिलने वाला दुर्लभ स्थल
1972-73जोधपुरा का उत्खनन (आर.सी. अग्रवाल व विजय कुमार)लौह युग व रथ-प्रयोग के प्रमाण
1999बीजक की पहाड़ी से बौद्ध मंदिर अवशेषभारत में सर्वप्रथम बौद्ध मंदिर अवशेष की पुष्टि
हाल के वर्षबैराठ बौद्ध स्थल संरक्षित स्मारक घोषितसंरक्षण व पर्यटन विकास (करंट अफेयर्स)
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