Ancient Rajasthan: गणराज्य, ऐतिहासिक केंद्र एवं शक-कु षाण-गुप्त प्रभाव
पिछले अध्याय में हमने पढ़ा कि कालीबंगा जैसी कांस्य-युगीन सभ्यताएं जलवायु-शुष्कता के कारण धीरे-धीरे समाप्त हो गईं। लेकिन राजस्थान की धरती खाली नहीं रही — जहां एक सभ्यता का अंत हुआ, वहीं नए जनपदों (छोटे गणतंत्रों जैसे राज्यों) व नगरों का उदय हुआ। कल्पना कीजिए, आज से लगभग 2300 साल पहले जयपुर के पास एक पहाड़ी पर सम्राट अशोक का एक संदेश खुदवाया गया — एक ऐसा संदेश जिसमें अशोक खुद बौद्ध धर्म अपनाने की बात स्वीकार करते हैं। वह जगह थी बैराठ, और वह संदेश था भाब्रू शिलालेख — भारत के सबसे अनोखे शिलालेखों में से एक। इस अध्याय में हम राजस्थान के उन प्राचीन नगरों, जनपदों व गणराज्यों की सैर करेंगे, जिन्होंने मौर्य, शुंग, कु षाण व गुप्त कालों में राजस्थान की पहचान गढ़ी।
1. प्राचीन राजस्थान — परिचय ◆ कांस्य युग (हड़प्पा-कालीन सभ्यताओं) के पतन के बाद राजस्थान में लौह युग (Iron Age) का दौर शुरू हुआ, जिसमें मनुष्य ने कठोर व मज़बूत लोहे के औज़ार बनाना सीखा। ◆ लोहे का ज्ञान और उसका प्रयोग मानव इतिहास की युगांतकारी (युग बदल देने वाली) घटना थी — इससे खेती के औज़ार और हथियार पहले से कहीं अधिक मज़बूत बने और पूरा परिदृश्य बदल गया। ◆ लौह संस्कृति के प्रमुख स्थल: नोह (भरतपुर), जोधपुरा (जयपुर), सुनारी (झुंझुनूं), रैढ़ (टोंक) और ईसवाल (उदयपुर)। नोह से मिले लोहे के अवशेष भारत में लौह युग के आरम्भ की समय-सीमा तय करने के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। जोधपुरा और सुनारी से लोहा गलाने की भट्टियाँ तथा हथियार-औज़ार बनाने के कारखानों के अवशेष मिले हैं। ईसवाल से प्राक् -ऐतिहासिक काल के समृद्ध लौह-उद्योग के साक्ष्य मिले हैं। ◆ सलेटी रंग की चित्रित मृदभांड संस्कृति (Painted Grey Ware — PGW): लौह काल के बाद भारत के अन्य भागों की तरह राजस्थान में भी यह संस्कृति पनपी, जिसमें सलेटी (धूसर) रंग के बर्तनों पर काले रंग से चित्रकारी होती थी। इसके अवशेष विराटनगर, जोधपुरा, सुनारी और नोह से मिले हैं। इसके बाद राजस्थान में भी ऐतिहासिक युग आरम्भ हो जाता है।
◆ इसी दौर में राजस्थान में छोटे-छोटे जनपद (Janapadas) व गणराज्य (Republics) विकसित हुए, जो आगे चलकर मौर्य, शुंग, कु षाण व गुप्त साम्राज्यों के प्रभाव में आए। ◆ इस काल की जानकारी के मुख्य स्रोत उत्खनन से मिले नगर-अवशेष, सिक्के , अभिलेख व विदेशी यात्रियों (जैसे चीनी यात्री ह्वेनसांग) के यात्रा-वृत्तांत हैं।
A. राजस्थान का नामकरण ◆ 1949 ई. से पहले 'राजस्थान' नाम की कोई एक भौगोलिक इकाई नहीं थी — इसके अलग-अलग भाग अलग-अलग नामों से जाने जाते थे। ◆ ऐसा माना जाता है कि 1800 ई. में जॉर्ज थॉमस (George Thomas) ने सबसे पहले इस भू-भाग के लिए 'राजपूताना' शब्द का प्रयोग किया। ◆ 1829 ई. में कर्नल जेम्स टॉड (James Tod) ने अपनी पुस्तक 'एनल्स एण्ड एण्टीक्विटीज़ ऑफ राजस्थान' में इस प्रदेश को 'रायथान' या 'राजस्थान' नाम दिया। ◆ स्वतंत्रता के बाद जब यहाँ की रियासतों का एकीकरण हुआ, तब 30 मार्च 1949 को सर्वसम्मति से इस प्रदेश का नाम 'राजस्थान' रखा गया। (विस्तार: अध्याय 16)
B. प्राचीन साहित्य व अभिलेखों में क्षेत्रीय नाम प्राचीन साहित्य और अभिलेखों में आज के राजस्थान के अलग-अलग क्षेत्रों के अलग-अलग नाम मिलते हैं। कुछ क्षेत्रों के नाम उनकी भौगोलिक विशेषताओं के आधार पर और कुछ के नाम वहाँ बसी जातियों के नाम पर पड़े। मरु, धन्व, जांगल, मत्स्य और शूरसेन जैसे कुछ नाम तो ऋग्वेद और महाभारत तक में मिलते हैं:
प्राचीन नाम वर्तमान क्षेत्र नाम का आधार / विशेष तथ्य
मरु / धन्व → मरुवार → मारवाड़ जोधपुर संभाग मरु व धन्व — दोनों का अर्थ मरुस्थल; ऋग्वेद में उल्लेख; जोधपुर राज्य को मरु अथवा मारवाड़ कहा गया
जांगल देश बीकानेर, नागौर व आसपास (महाभारत जहाँ शमी, कै र, पीलू जैसे पेड़ हों; इसी कारण बीकानेर के राजा स्वयं काल में जोधपुर का भाग भी) को 'जंगलधर बादशाह' कहते थे
सपादलक्ष अजमेर और नागौर का मध्य भाग जांगल देश का निकटवर्ती भाग; यहाँ चौहानों का अधिकार था
मत्स्य देश जयपुर, अलवर (दक्षिणी-पश्चिमी भाग) महाभारत में राज्य के रूप में उल्लेख; राजधानी विराटनगर व भरतपुर तक
शूरसेन भरतपुर, धौलपुर व करौली का अधिकांश मथुरा से सटा क्षेत्र; राजधानी मथुरा; महाभारत में उल्लेख भाग
कु रु देश अलवर का उत्तरी भाग राजधानी इन्द्रप्रस्थ
शिव / शिवि उदयपुर-चित्तौड़ क्षेत्र राजधानी मध्यमिका (मज्झमिका), जिसे आज 'नगरी' कहते हैं
मेदपाट / प्राग्वाट मेवाड़ यहाँ मेव (मेद) जाति का अधिकार रहने के कारण यह नाम पड़ा
वागड़ (बागड़) डूंगरपुर-बांसवाड़ा
गुर्जरत्रा जोधपुर का दक्षिणी भाग
अर्बुद देश सिरोही (आबू क्षेत्र) आबू पर्वत (अर्बुद) के नाम पर
माड / माँड जैसलमेर
हाड़ौती कोटा-बूंदी हाड़ा चौहानों के नाम पर
मालव देश झालावाड़ का दक्षिणी भाग
कांठल प्रतापगढ़ माही नदी के कांठे (किनारे) पर स्थित होने के कारण
छप्पन का मैदान प्रतापगढ़-बांसवाड़ा के बीच का भाग 56 गाँवों का समूह होने के कारण
ऊपरमाल भैंसरोडगढ़ से बिजौलिया तक पठारी (ऊँ चा) क्षेत्र होने के कारण
गिरवा उदयपुर के आसपास का क्षेत्र पहाड़ियों (गिरि) की अधिकता के कारण
शेखावाटी सीकर, झुंझुनूं व चूरू शेखावत राजपूतों के नाम पर
C. राजस्थान में आर्य (वैदिक) संस्कृति का प्रसार ◆ हड़प्पा सभ्यता के पतन के बाद भारतीय इतिहास में वैदिक सभ्यता का समय शुरू होता है। इसके बारे में जानने के मुख्य स्रोत चार वेद हैं — ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। राजस्थान में इस सभ्यता के अवशेष अनूपगढ़, तरखानवाला डेरा और चक-64 से मिले हैं। ◆ मरुधरा की सरस्वती और दृषद्वती नदियाँ आर्यों की प्राचीन बस्तियों की शरणस्थली रहीं। माना जाता है कि यहीं से आर्य बस्तियाँ आगे चलकर दोआब की ओर बढ़ीं। इन्द्र और सोम की पूजा के मंत्रों की रचना, यज्ञ के महत्व की स्वीकृ ति और जीवन- मुक्ति का ज्ञान आर्यों को संभवतः इन्हीं नदी-घाटियों में रहते हुए हुआ। ◆ रामायण में राजस्थान: कथा है कि जब दक्षिणी सागर ने अपने ऊपर सेतु बनवाना स्वीकार नहीं किया, तो भगवान राम ने उसे डराने के लिए खींचा हुआ अपना अमोघ अस्त्र राजस्थान की ओर छोड़ा, जिससे यहाँ समुद्र की जगह मरुस्थल बन गया। आज के वैज्ञानिक युग में यह कथा स्वीकार नहीं की जाती, पर इससे यह ज़रूर प्रमाणित होता है कि रामायण के रचयिता राजस्थान के भू- भाग से परिचित थे। ◆ महाभारत में राजस्थान: जांगल देश (बीकानेर) कौरव-पांडव राज्य के अधीन था और मत्स्य राज्य उनका मित्र या अधीनस्थ था। पांडवों ने अज्ञातवास का एक वर्ष भेष बदलकर मत्स्य नरेश विराट के दरबार में बिताया था, और महाभारत युद्ध में विराट पांडवों की ओर से लड़ते हुए मारा गया। महाभारत व पौराणिक कथाओं से यह भी पता चलता है कि आर्यों की यादव शाखा से जुड़े बलराम और कृ ष्ण जांगल (बीकानेर) और मरुकांतार (मारवाड़) से होकर गुज़रे थे। ◆ महाभारत युद्ध के बाद से महात्मा बुद्ध के समय तक का राजस्थान का इतिहास 'अंधकारमय' है, क्योंकि इस समय के पर्याप्त पुरातात्विक व लिखित साक्ष्य नहीं मिलते। बुद्ध के समय (छठी शताब्दी ईपू) से भारत की राजनीति में दो प्रवृत्तियाँ दिखती हैं — पहली, जनपदों का उदय और दूसरी, साम्राज्य-विस्तार के लिए जनपदों के बीच संघर्ष।
2. गणराज्य एवं जनपद (Republics & Janapadas)
प्राचीन भारत में जनपद उन क्षेत्रों को कहा जाता था जहां जनता (लोगों का समूह) मिलकर शासन करती थी — यह आज के गणतंत्र (Republic) की एक प्रारंभिक झलक थी। राजस्थान में ऐसे कई जनपद विकसित हुए: ◆ बौद्ध ग्रंथ 'अंगुत्तर निकाय' में 16 महाजनपदों की सूची मिलती है। इनमें से मत्स्य जनपद तो राजस्थान में ही था, और राजस्थान के कई भाग कु रु, शूरसेन और अवन्ति महाजनपदों के अंतर्गत आते थे। चित्तौड़ के आसपास का क्षेत्र शिवि जनपद कहलाता था। ◆ 327 ईपू में सिकं दर (Alexander) के आक्रमणों से अपनी सुरक्षा और स्वतंत्रता बचाने के लिए पश्चिमोत्तर सीमा (दक्षिण पंजाब) के मालव, शिवि, यौधेय और आर्जुनायन जैसे वीर कबीले राजस्थान में आकर बस गए। 300 ईपू से 300 ई. के बीच राजस्थान में मालव, आर्जुनायन और यौधेयों की प्रभुता रही।
जनपद/गणराज्य क्षेत्र मुख्य विशेषता
मत्स्य महाजनपद (Matsya) वर्तमान जयपुर (कोटपूतली-बहरोड़), राजधानी विराटनगर (बैराठ); महाभारत काल में पांडवों के
टोंक, अलवर, करौली व भरतपुर तक अज्ञातवास से जुड़ा
विस्तारमालव गणराज्य (Malava) टोंक क्षेत्र (नगर/उनियारा) राजधानी संभवतः नगर (मालव प्रदेश); "मालव जनपद" अंकित सिक्के व सीसे की मुहर मिली; शक्ति का प्रारम्भिक केंद्र जयपुर के निकट, बाद में अजमेर, टोंक व मेवाड़ तक विस्तार
यौधेय गणराज्य (Yaudheya) उत्तरी राजस्थान यौधेय जनजाति के सर्वाधिक सिक्के राजस्थान में ही मिले हैं — एक
शक्तिशाली प्राचीन गणतंत्र; रुद्रदामन के लेख से पता चलता है कि
यौधेय संभवतः उत्तरी राजस्थान की कु षाण शक्ति को नष्ट करने में
सफल हुएआर्जुनायन गणराज्य पूर्वी राजस्थान अर्जुन के नाम पर आधारित एक प्राचीन गणतंत्र, सिक्कों से
(Arjunayan) जानकारी मिलती है; भरतपुर-अलवर क्षेत्र के आर्जुनायन अपनी
विजयों के लिए प्रसिद्ध रहेशिवि जनपद (Shivi) चित्तौड़गढ़ क्षेत्र (नगरी) नगरी (मध्यमिका) से शिवि जनपद के सिक्के प्राप्त हुए हैं
शाल्व जनपद (Shalva) अलवर के कुछ भाग मत्स्य जनपद का पड़ोसी; अस्पष्ट सीमा को लेकर दोनों में प्रायः संघर्ष होता रहता था
राजन्य जनपद (Rajanya) भरतपुर क्षेत्र मत्स्य के साथ भरतपुर क्षेत्र का एक प्रमुख जनपद
कु रु व शूरसेन महाजनपद (अंश) अलवर का उत्तरी भाग (कु रु); भरतपुर- कु रु की राजधानी इन्द्रप्रस्थ, शूरसेन की राजधानी मथुरा धौलपुर-करौली (शूरसेन)
A. मत्स्य जनपद — विस्तार से ◆ आर्य 'जन' के रूप में मत्स्य जाति का उल्लेख सबसे पहले ऋग्वेद में हुआ है, जो इसकी प्राचीनता का प्रमाण है। शतपथ ब्राह्मण और कौषीतकी उपनिषद् में भी मत्स्य जन का उल्लेख है, और महाभारत में इसे भारत के प्रमुख जनपदों में गिना गया है। ◆ विस्तार: दक्षिण में चम्बल की पहाड़ियों तक और पश्चिम में पंजाब में सरस्वती नदी के जंगलों तक। इसमें आज के जयपुर, अलवर, धौलपुर, करौली और भरतपुर के कुछ भाग शामिल थे। ◆ महाभारत काल में मत्स्य का शासक विराट था, जिसने जयपुर से लगभग 85 किलोमीटर दूर विराटनगर (बैराठ) बसाकर उसे राजधानी बनाया। विराट की पुत्री उत्तरा का विवाह अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु से हुआ था, और इन्हीं का पुत्र परीक्षित आगे चलकर पांडवों के राज्य का उत्तराधिकारी बना।
◆ डॉ. गोपीनाथ शर्मा के मत में महाभारत के बाद कु रु और यादव जनपद कमज़ोर हो गए, जिसका लाभ उठाकर मत्स्य शक्तिशाली बना और विराटनगर की समृद्धि बढ़ी। ◆ संघर्ष: मत्स्य का पड़ोसी चेदि जनपद था। एक बार चेदि ने पूरी शक्ति से आक्रमण कर मत्स्य को अपने में मिला लिया, पर कुछ समय बाद मत्स्य ने फिर स्वतंत्रता पा ली। बाद में मगध की साम्राज्यवादी नीति के चलते मगध ने इसे जीतकर अपने साम्राज्य में मिला लिया; मौर्य काल में मत्स्य मौर्य साम्राज्य का भाग था — विराटनगर से मिला अशोक का शिलालेख और अन्य मौर्ययुगीन अवशेष इसकी पुष्टि करते हैं।
3. बैराठ (विराटनगर) — मौर्यकालीन बौद्ध केंद्र
A. भाब्रू (बैराठ) शिलालेख — अशोक का अनूठा संदेश ◆ 1837 ई. में कै प्टन बर्ट ने बीजक की पहाड़ी से अशोक के भाब्रू शिलालेख की खोज की — यह शंख लिपि में उत्कीर्ण है और वर्तमान में कोलकाता (एशियाटिक सोसाइटी) में सुरक्षित है। ◆ यह अशोक का इकलौता ऐसा अभिलेख है जिसमें वे स्पष्ट रूप से स्वयं को बौद्ध धर्म का अनुयायी घोषित करते हैं और बौद्ध, धम्म व संघ — इन तीन रत्नों की चर्चा करते हैं; साथ ही अध्ययन हेतु सात बौद्ध ग्रंथों की सिफारिश भी करते हैं। ◆ 1871-72 में कार्लाइल को बैराठ से एक दूसरा (लघु) शिलालेख भी मिला, जो अशोक के रूपनाथ व सहस्राम अभिलेखों की प्रतिलिपि है — यह भी ब्राह्मी लिपि में है, पर अब समय के प्रभाव से अस्पष्ट हो चुका है।
B. उत्खनन एवं अन्य प्रमुख खोजें ◆ पहला व्यवस्थित उत्खनन 1936-37 में दयाराम साहनी के निर्देशन में हुआ; पुनः उत्खनन 1962-63 में नीलरत्न बनर्जी व कै लाशनाथ दीक्षित ने किया। ◆ बीजक की पहाड़ी पर मिले गोलाकार चैत्य में 26 लकड़ी के स्तंभ थे, जो ईंट व पत्थर से घिरे थे — यह लगभग 300 ईपू से 300 ई. के बीच का माना जाता है। 1999 में यहां से भारत में सर्वप्रथम बौद्ध मंदिर के अवशेष मिले। ◆ खुदाई में 36 सिक्के मिले (सूती कपड़े में लिपटे हुए) — इनमें से 28 इंडो-ग्रीक शासकों के (16 मिनांडर के ) व 8 आहत (पंचमार्क ) सिक्के थे।
◆ जयपुर नरेश राजा रामसिंह द्वितीय के काल में हुई खुदाई में एक स्वर्ण मंजूषा (कलश) मिला था, जिसमें भगवान बुद्ध की अस्थियां रखी थीं। ◆ चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपनी यात्रा में बैराठ के 8 बौद्ध मठों का उल्लेख किया — उसने अपनी पुस्तक "सी-यू-की" में बैराठ व भीनमाल (जिसे उसने "पिलोमोलो" कहा) दोनों का वर्णन किया है। ◆ मुगल काल में अकबर के सेनापति मानसिंह ने यहां एक द्वार (मुगल गेट) बनवाया; बैराठ अकबर का प्रिय शिकारगाह भी था, तथा यहां मुगलकालीन टकसाल (सिक्के बनाने का स्थान) भी थी। ◆ बैराठ की पुरातात्विक पहाड़ियों में बीजक डूंगरी, भीम डूंगरी, मोती डूंगरी और महादेव जी की डूंगरी प्रसिद्ध हैं, जिनसे हड़प्पा सभ्यता और मौर्यकाल — दोनों के अवशेष मिले हैं। माना जाता है कि हूण आक्रांता मिहिरकु ल ने बैराठ का विध्वंस कर दिया था।
करंट अफे यर्स (Latest): हाल ही में बैराठ के इस ऐतिहासिक बौद्ध स्थल को संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है, तथा जल-रिसाव व अन्य क्षति से बचाव हेतु सुरक्षा उपाय व एक प्रवेश-द्वार भी लगाया गया है। इतिहासकार इसे भारत की प्राचीनतम स्वतंत्र-निर्मित बौद्ध संरचना (oldest free-standing Buddhist structure in India) मानते हैं, जिससे यह स्थल बौद्ध-अनुयायी पर्यटकों के लिए भी महत्वपूर्ण तीर्थ बनता जा रहा है।
4. नगरी सभ्यता (मध्यमिका) — चित्तौड़गढ़
◆ यहां से शिवि जनपद के सिक्के प्राप्त हुए हैं, जो इस क्षेत्र में एक स्वतंत्र गणराज्य के अस्तित्व का प्रमाण देते हैं। ◆ कु षाण-कालीन सुरक्षा-दीवार (Defensive Wall) के अवशेष तथा गुप्तकालीन शिव मंदिर के अवशेष भी यहां मिले हैं। ◆ यूनानी-रोमन प्रभाव दिखाने वाला एक पुरुष-मस्तक (Male Head) भी यहां से प्राप्त हुआ है — जो विदेशी सांस्कृ तिक संपर्कों का संके त देता है।
5. नगर एवं रैढ़ — टोंक के प्राचीन केंद्र
(निवाई तहसील, टोंक (ढील नदी सिक्का-भंडारों में से एक मिला है — जिसमें यूनानी शासक अपोलोडोटस का सिक्का व इंडो-सैसेनियन तट)) मुद्राएं शामिल हैं (कु ल 3075 आहत/पंचमार्क सिक्के — देखें अध्याय 1)। यहां लोहे के औज़ार बड़ी मात्रा में मिलने के कारण इसे "प्राचीन भारत का टाटा नगर" भी कहा जाता है।
6. अन्य ऐतिहासिक केंद्र इनके अलावा राजस्थान में कई और महत्वपूर्ण प्राचीन ऐतिहासिक केंद्र मिले हैं, जो मौर्य, शुंग, कु षाण व गुप्त कालों की जानकारी देते हैं:
स्थल जिला मुख्य विशेषता
नलियासर (Naliyasar) सांभर, जयपुर ग्रामीण शाकं भरी के निकट स्थित; यहां से प्रतिहारकालीन मंदिर व चौहान-पूर्व युग की जानकारी तथा इंडो-ग्रीक सिक्के मिले हैं
जोधपुरा (Jodhpura) कोटपूतली-बहरोड़, साबी नदी तट पर स्थित; 1972-73 में आर.सी. अग्रवाल व विजय कु मार द्वारा उत्खनन; जयपुर प्रारंभिक कालखंड में लौह धातु व घोड़े से रथ खींचने के प्रमाण मिले
सुनारी (Sunari) खेतड़ी, झुंझुनूं (कांतली यहां लौह-प्रगलन (Iron Smelting) की राजस्थान की प्राचीनतम भट्टियां मिली हैं; नदी) चावल की खेती व घोड़ा-रथ के प्रमाण; शुंग-मौर्य-कु षाण कालीन अवशेष
बयाना/श्रीपंथ (Bayana) भरतपुर गुप्तकालीन स्वर्ण सिक्कों का विशाल भंडार (देखें अध्याय 1); नील की खेती के भी प्रमाण मिले हैं
7. शक-कु षाण एवं गुप्त प्रभाव ◆ मौर्य प्रभाव: राजस्थान के कुछ भाग मौर्यों के अधीन या उनके प्रभाव-क्षेत्र में थे। अशोक का बैराठ शिलालेख तथा अशोक के उत्तराधिकारी कु णाल के पुत्र सम्प्रति द्वारा बनवाए गए मंदिर मौर्य प्रभाव की पुष्टि करते हैं। 'कु मारपाल प्रबंध' और अन्य जैन ग्रंथों के अनुसार चित्तौड़ का किला और चित्रांग तालाब मौर्य राजा चित्रांगद ने बनवाए थे। मानमोरी (वि.सं. 770) और कणसवा (वि.सं. 795) के शिलालेख भी मौर्यवंशी राजाओं का अस्तित्व बताते हैं। (देखें अध्याय 1) ◆ शकों का प्रभाव: पश्चिमी क्षत्रप (Western Kshatrapas) शासकों का प्रभाव राजस्थान के पश्चिमी व दक्षिणी भागों (जैसे भीनमाल) में देखने को मिलता है, जहां शक क्षत्रपों के सिक्के प्राप्त हुए हैं। ◆ कु षाण प्रभाव: नोह (भरतपुर) से हुविष्क व वासुदेव कु षाण के सिक्के , रंगमहल (हनुमानगढ़) से कनिष्क प्रथम व तृतीय के सिक्के , तथा नगरी (चित्तौड़गढ़) से कु षाणकालीन सुरक्षा-दीवार मिली है — यानी कु षाण प्रभाव राजस्थान के उत्तर से लेकर दक्षिण तक फै ला हुआ था। ◆ गुप्त प्रभाव: बयाना (भरतपुर) से गुप्तकालीन स्वर्ण सिक्कों (मुख्यतः चंद्रगुप्त द्वितीय "विक्रमादित्य" के ) का विशाल भंडार मिला है; नगरी में गुप्तकालीन शिव मंदिर के अवशेष तथा नगर (टोंक) में गुप्तकालीन अभिलेख भी मिले हैं — यह दर्शाता है कि गुप्त साम्राज्य का सांस्कृ तिक व आर्थिक प्रभाव राजस्थान के कई हिस्सों तक पहुंचा था, भले ही राजनीतिक नियंत्रण सीमित रहा हो। ◆ गुप्त राजाओं ने इन जनपदीय गणतंत्रों को समाप्त नहीं किया, बल्कि उन्हें अर्द्ध-आश्रित (आधे-अधीन) रूप में बनाए रखा। पर ये गणतंत्र हूण आक्रमणों का धक्का सहन नहीं कर पाए और छठी शताब्दी आते-आते राजस्थान से सदियों पुरानी गणतंत्रीय व्यवस्था हमेशा के लिए समाप्त हो गई।
8. धर्म, समाज एवं प्राचीन व्यापार मार्ग ◆ इस काल में राजस्थान में वैदिक धर्म, बौद्ध धर्म व जैन धर्म — तीनों साथ-साथ फल-फू ल रहे थे। बैराठ बौद्ध धर्म का केंद्र था, जबकि घोसुण्डी शिलालेख (नगरी) वैष्णव (वैदिक) धर्म के प्रसार का प्राचीनतम प्रमाण देता है (विस्तार हेतु देखें अध्याय 1)। ◆ लगभग दूसरी सदी ईपू से तीसरी सदी ईस्वी तक राजस्थान के केंद्रीय भागों में बौद्ध धर्म का काफ़ी प्रचार था, पर यौधेयों और मालवों के यहाँ आने से ब्राह्मण धर्म को प्रोत्साहन मिला और बौद्ध धर्म के पतन के चिह्न दिखने लगे। ◆ नांदसा यूप-स्तंभ लेख (भीलवाड़ा) से क्षत्रियों द्वारा वैदिक यज्ञ किए जाने की जानकारी मिलती है — यह भी वैदिक धर्म की मज़बूत उपस्थिति दर्शाता है (विस्तार हेतु देखें अध्याय 1)। ◆ व्यापार मार्ग: भीनमाल से मिले यूनानी व रोमन मदिरा-पात्र तथा बैराठ व नगरी से मिले इंडो-ग्रीक सिक्के दर्शाते हैं कि राजस्थान प्राचीन काल में पश्चिम एशिया व यूरोप तक फै ले व्यापार-मार्गों से जुड़ा हुआ था। ◆ गणेश्वर (अध्याय 3) से हड़प्पा को तांबे की आपूर्ति तथा बरोड़ में अफगानिस्तान से आयातित लेपिस लाजुली के प्रमाण भी बताते हैं कि यह व्यापार-नेटवर्क सदियों पुराना व सुव्यवस्थित था।
"एक पहाड़ी पर खुदा हुआ राजा का संदेश, एक टूटे सिक्के पर अंकित यूनानी देवता का चेहरा, और मिट्टी में
दबी एक बौद्ध भिक्षु की स्मृति — राजस्थान की धरती सदियों से दुनिया-भर की सभ्यताओं से बातचीत करती आई है।" — प्राचीन राजस्थान अध्ययन का सामान्य सिद्धांत
★ अध्याय सार — महत्वपूर्ण तथ्य ★
1. बैराठ (विराटनगर) — मत्स्य महाजनपद की राजधानी; महाभारत काल में पांडवों के अज्ञातवास से जुड़ा स्थल। 2. भाब्रू (बैराठ) शिलालेख — अशोक का एकमात्र अभिलेख जिसमें वे स्वयं को बौद्ध घोषित करते हैं; 1837 में कै प्टन बर्ट द्वारा खोजा गया। 3. बैराठ का गोलाकार बौद्ध चैत्य भारत की सबसे प्राचीन स्वतंत्र-निर्मित बौद्ध संरचना मानी जाती है — हाल ही में इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है। 4. नगरी (चित्तौड़गढ़) का प्राचीन नाम मध्यमिका/मज्झिमिका था — पाणिनि की अष्टाध्यायी में उल्लेखित; शिवि जनपद के सिक्के यहीं से मिले। 5. नगर (टोंक) — मालव जनपद की संभावित राजधानी; "नागवाहा" अंकित सिक्कों से नाम पड़ा। 6. रैढ़ (टोंक) — भारत के सबसे बड़े सिक्का-भंडारों में से एक; प्रचुर लौह-उपकरणों के कारण "प्राचीन भारत का टाटा नगर" कहा जाता है। 7. रंगमहल (हनुमानगढ़) — कु षाण शासकों (कनिष्क) के सिक्के व भारत में कृ ष्ण-लीला चित्रण का प्राचीनतम साक्ष्य यहीं मिला। 8. नोह (भरतपुर) — ताम्रपाषाण, वैदिक व महाभारतकालीन — तीनों संस्कृतियों के अवशेष एक साथ मिलने वाला दुर्लभ स्थल। 9. सुनारी (झुंझुनूं) — राजस्थान की प्राचीनतम लौह-प्रगलन भट्टियां यहीं मिली हैं। 10. भीनमाल (जालौर) — प्राचीन नाम श्रीमाल; गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त व कवि माघ की जन्मस्थली; गुर्जर-प्रतिहार वंश की प्रारंभिक राजधानी। 11. मत्स्य, मालव, यौधेय, आर्जुनायन व शिवि — राजस्थान के प्रमुख प्राचीन जनपद/गणराज्य थे, जिनकी जानकारी मुख्यतः सिक्कों से मिलती है। 12. शक, कु षाण व गुप्त — तीनों बाहरी शक्तियों का सांस्कृ तिक व आर्थिक प्रभाव राजस्थान के विभिन्न भागों में सिक्कों व मंदिर-अवशेषों के रूप में मिलता है। 13. बयाना (भरतपुर) से मिला गुप्तकालीन स्वर्ण सिक्कों का भंडार गुप्त साम्राज्य के आर्थिक प्रभाव का प्रमुख प्रमाण है। 14. भीनमाल से मिले यूनानी व रोमन मदिरा-पात्र प्राचीन राजस्थान के अंतरराष्ट्रीय व्यापार-संपर्कों को दर्शाते हैं।
नीचे दी समय-रेखा (Timeline) इस अध्याय के सभी महत्वपूर्ण वर्षों व तथ्यों को एक साथ जोड़ती है — रिवीजन के लिए इसे ज़रूर दोहराएं :
वर्ष (Year) घटना/Event महत्व
लगभग 300 ईपू अशोक का भाब्रू शिलालेख व बैराठ का गोलाकार चैत्य मौर्यकालीन बौद्ध धर्म का प्रत्यक्ष प्रमाण
लगभग 250-100 मालव, यौधेय, आर्जुनायन व शिवि जनपदों का उत्कर्ष प्राचीन गणतांत्रिक व्यवस्था का उदाहरण ईपू
327 ईपू सिकं दर के आक्रमण से मालव, शिवि, यौधेय व आर्जुनायन गणराज्यों का राजस्थान में बसना कबीले राजस्थान आए
300 ईपू – 300 ई. मालव, आर्जुनायन व यौधेयों की प्रभुता गणतंत्रीय व्यवस्था का उत्कर्ष
छठी शताब्दी ई. हूण आक्रमणों से गणतंत्रों का अंत गणतंत्रीय व्यवस्था की समाप्ति
1800 जॉर्ज थॉमस द्वारा 'राजपूताना' शब्द का प्रयोग प्रदेश का पहला सामूहिक नाम
1829 कर्नल टॉड ने 'रायथान'/'राजस्थान' नाम दिया 'एनल्स एण्ड एण्टीक्विटीज़ ऑफ राजस्थान'
1837 कै प्टन बर्ट द्वारा भाब्रू शिलालेख की खोज अशोक के बौद्ध होने का प्रत्यक्ष प्रमाण मिला
1870 कार्लाइल द्वारा नगरी सभ्यता की खोज मध्यमिका/नगरी स्थल की पहचान
1871-72 कार्लाइल को बैराठ से दूसरा शिलालेख प्राप्त अशोक के अन्य अभिलेखों की प्रतिलिपि की पुष्टि
1904 डॉ. भंडारकर द्वारा नगरी का प्रथम उत्खनन मध्यमिका सभ्यता का वैज्ञानिक अध्ययन प्रारंभ
1936-37 दयाराम साहनी द्वारा बैराठ का प्रथम उत्खनन गोलाकार चैत्य व स्तूप अवशेषों की खोज
1938-40 नगर व रैढ़ का उत्खनन (साहनी व डॉ. के .एन. पुरी) मालव जनपद व विशाल सिक्का-भंडार की पहचान
30 मार्च 1949 प्रदेश का नाम 'राजस्थान' रखा गया रियासतों के एकीकरण के बाद
1952-54 स्वीडिश दल द्वारा रंगमहल का उत्खनन कु षाणकालीन सिक्कों व कला की खोज
1953-54 आर.सी. अग्रवाल द्वारा भीनमाल का उत्खनन यूनान-रोम व्यापार संपर्कों का प्रमाण मिला
1961-62 सुंदरराजन द्वारा नगरी का विस्तृत उत्खनन कु षाण सुरक्षा-दीवार व गुप्त मंदिर की खोज
1962-63 नीलरत्न बनर्जी व कै लाशनाथ दीक्षित द्वारा बैराठ का पुनः बौद्ध अवशेषों का विस्तृत अध्ययन उत्खनन
1963-72 रतनचंद्र अग्रवाल द्वारा नोह का उत्खनन (7 चरण) तीन संस्कृतियों के एक साथ मिलने वाला दुर्लभ स्थल
1972-73 जोधपुरा का उत्खनन (आर.सी. अग्रवाल व विजय कु मार) लौह युग व रथ-प्रयोग के प्रमाण
1999 बीजक की पहाड़ी से बौद्ध मंदिर अवशेष भारत में सर्वप्रथम बौद्ध मंदिर अवशेष की पुष्टि
हाल के वर्ष बैराठ बौद्ध स्थल संरक्षित स्मारक घोषित संरक्षण व पर्यटन विकास (करंट अफे यर्स)