पिछले अध्याय में हमने पढ़ा कि कैसे एक शिकारी मनुष्य धीरे-धीरे किसान बना। अब कल्पना कीजिए — वही किसान अब अपने खेत में एक चमकती हुई धातु खोदकर निकालता है, जिसे मोड़ा जा सकता है, पिघलाया जा सकता है, और नए औज़ारों में ढाला जा सकता है। यह धातु थी — तांबा (Copper)। जिस दिन राजस्थान के किसी आदि-मानव ने पहली बार पत्थर के साथ-साथ तांबे का उपयोग शुरू किया, उसी दिन से "ताम्रपाषाण काल" (Chalcolithic Age) की शुरुआत हुई। और आगे चलकर जब उसी तांबे में टिन मिलाकर एक और मज़बूत धातु — कांस्य (Bronze) — बनाई गई, तो राजस्थान में कालीबंगा जैसी सुव्यवस्थित, नगर-योजना वाली सभ्यताएं विकसित हुईं। यह अध्याय राजस्थान की उन तीन सबसे प्रसिद्ध ताम्रपाषाणकालीन सभ्यताओं — आहड़, गणेश्वर व कालीबंगा — की पूरी कहानी बताता है, जो हर परीक्षा में सबसे ज़्यादा पूछी जाती हैं।
⏰ काल (Period): ताम्रपाषाण काल, लगभग 2100-1200 ईपू (सामान्यतः स्वीकृत सीमा)
⭐ महत्व (Significance): आहड़/बेड़च नदी के तट पर स्थित यह सभ्यता बनास नदी के निकट होने के कारण "बनास संस्कृति" के नाम से भी जानी जाती है। इसे "ताम्रवती नगरी", "आघाटपुर", "आघाट दुर्ग" व "धूलकोट" जैसे उपनामों से भी जाना जाता है। इसकी खोज 1953 ई. में अक्षय कीर्ति व्यास ने की; प्रमुख उत्खनन आर.सी. अग्रवाल (1955-56) तथा एच.डी. सांकलिया व वी.एन. मिश्र (पूना विश्वविद्यालय, 1961-62) के नेतृत्व में हुआ। यह राजस्थान की एक प्रमुख ग्रामीण ताम्रपाषाणकालीन संस्कृति मानी जाती है — जबकि कालीबंगा एक नगरीय सभ्यता थी।
A. आहड़ की मुख्य विशेषताएं
सोचिए, कालीबंगा में सड़कें व्यवस्थित थीं, दुर्गीकृत व अदुर्गीकृत भाग अलग-अलग थे, जल-निकासी की योजनाबद्ध व्यवस्था थी — यह एक "शहर" जैसा लगता है। लेकिन आहड़ में हमें बिखरे हुए घर, कच्ची ईंटों के मकान व स्थानीय स्तर पर तांबा गलाने की भट्टियां मिलती हैं — यह एक बड़े "गांव" जैसा जीवन दर्शाता है। यही कारण है कि परीक्षा में कालीबंगा को "नगरीय सभ्यता" और आहड़ को "ग्रामीण संस्कृति" कहा जाता है।
B. आहड़-बनास संस्कृति के सहायक स्थल
आहड़ सभ्यता अकेली नहीं थी — उसके आसपास कई और स्थल विकसित हुए, जिन्हें "आहड़-बनास संस्कृति" के अंतर्गत रखा जाता है:
⏰ काल (Period): ताम्रपाषाण काल, बनास नदी तट
⭐ महत्व (Significance): आहड़ संस्कृति की उप-शाखा (sub-branch) मानी जाने वाली यह सभ्यता "मोडिया मगरी" नामक टीले पर स्थित है। पहला उत्खनन बी.बी. लाल के निर्देशन में 1957-58 में हुआ, तथा 1998-2003 में प्रो. वी.एस. शिंदे (पुणे विश्वविद्यालय) व ग्रेगरी पॉसेल (पेन्सिलवेनिया विश्वविद्यालय, अमेरिका) के निर्देशन में विस्तृत उत्खनन हुआ। सबसे महत्वपूर्ण अंतर यह है कि यहां पक्की ईंटों का भरपूर प्रयोग हुआ — जबकि आहड़ में यह नहीं मिलता। अनाज भंडारण कक्ष (granaries), पांच प्रकार के मृदभांड (काले, पॉलिश किए, सादे, भूरे, लाल) व हाथी-दांत की चूड़ियों के अवशेष भी मिले हैं।
⏰ काल (Period): ताम्रपाषाण काल एवं लौह युग — दो सांस्कृतिक चरण
⭐ महत्व (Significance): बेड़च नदी (बनास की सहायक नदी) के तट पर स्थित इस स्थल की खोज वी.एन. मिश्र ने 1961-62 में की, तथा मुख्य उत्खनन 1993 में उन्हीं के नेतृत्व में हुआ। यहां 11 कमरों वाला एक विशाल दुर्गनुमा भवन मिला है। यहां से मिला लगभग 4000 वर्ष पुराना एक कंकाल भारत में कुष्ठ रोग (Leprosy) का सबसे प्राचीन प्रमाण माना जाता है — यह तथ्य हर परीक्षा में बार-बार पूछा जाता है। योगासन मुद्रा में दफनाए गए शवों के प्रमाण, हाथी व चंद्रमा की आकृति वाले ताम्र उपकरण, तथा 5वीं शताब्दी ईपू का हाथ से बुना कपड़ा भी यहां से मिला है। यहां पांच लौह-गलाने की भट्टियां भी मिली हैं।
⏰ काल (Period): ताम्रपाषाण काल — आहड़ संस्कृति से संबद्ध
⭐ महत्व (Significance): यह स्थल एक विशेष अपवाद है — जहां आहड़ संस्कृति के अन्य सभी स्थल नदी-घाटियों में बसे हैं, वहीं ओझियाना एक पहाड़ी पर स्थित है। इसका उत्खनन बी.आर. मीणा व आलोक त्रिपाठी (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, जयपुर परिक्षेत्र) ने 1999-2001 में किया। यहां से गाय की छोटी मृण्मूर्ति (मीणकृति), पीसने के लिए बड़ा सैडल क्वर्न (saddle quern), तथा कारेलियन, फैयेंस व सीप के मनके मिले हैं।
⏰ काल (Period): ताम्रपाषाण काल (लगभग 2000-1700 ईपू), साथ में हल्की प्रारंभिक-ऐतिहासिक व मध्यकालीन परतें
⭐ महत्व (Significance): यहां पांच टीलों (mounds) में उत्खनन हुआ है (मुख्य उत्खनन सत्र 2014-16 में)। टीला-1 में गिलुण्ड जैसी ही समानांतर-दीवार वाली संरचना (parallel wall structure with bins) मिली है, जो कई चरणों में बनी थी — यह दर्शाता है कि पचमता आहड़-बनास संस्कृति (लगभग 3200-1700 ईपू) की एक महत्वपूर्ण उप-शाखा है।
इनके अतिरिक्त आहड़-बनास व सम्बद्ध ताम्रपाषाणकालीन संस्कृति के कई और छोटे स्थल राजस्थान में मिले हैं, जो नीचे तालिका में दिए गए हैं — परीक्षा में इनके "स्थल-जिला" जोड़े पूछे जा सकते हैं:
| स्थल (Site) | जिला (District) | सांस्कृतिक महत्व |
|---|---|---|
| झाड़ोल (Jhadol) | उदयपुर | ताम्रपाषाणिक उपकरणों के भंडार वाला स्थल — सावणियां (बीकानेर) व कुराड़ा (नागौर) जैसे स्थलों की श्रेणी में आता है |
| पिंड पलाड़िया (Pind Paladiya) | चित्तौड़गढ़ | आहड़-बनास संस्कृति से संबद्ध ताम्रपाषाणकालीन स्थल |
| नंदलालपुरा (Nandlalpura) | जयपुर | जयपुर क्षेत्र के ताम्र-प्रयोगकर्ता ताम्रपाषाणकालीन स्थल-समूह का भाग |
| किराड़ोत (Kiradot) | जयपुर | जयपुर क्षेत्र के ताम्र-प्रयोगकर्ता ताम्रपाषाणकालीन स्थल-समूह का भाग |
| चौथी बारी (Chauthi Bari) | जयपुर | जयपुर क्षेत्र के ताम्र-प्रयोगकर्ता ताम्रपाषाणकालीन स्थल-समूह का भाग |
| पलाना (Palana) | जालौर | ताम्रपाषाणकालीन स्थलों की सूची में शामिल |
| कोल महोली (Kol Maholi) | सवाई माधोपुर | ताम्रपाषाणकालीन स्थलों की सूची में शामिल |
| मालाह (Malah) | भरतपुर | ताम्रपाषाणकालीन स्थलों की सूची में शामिल |
⏰ काल (Period): लगभग 2800 ईपू — पूर्व-हड़प्पाकालीन ताम्रयुगीन सभ्यता
⭐ महत्व (Significance): कांतली नदी के तट पर विकसित गणेश्वर सभ्यता को "ताम्र सभ्यता की जननी" (Mother of Copper Cultures) कहा जाता है, क्योंकि यहां भारत के सबसे प्राचीन तांबे के औज़ार (लगभग 2800 ईपू) मिले हैं। इसकी खोज 1972 में आर.सी. अग्रवाल ने की; प्रारंभिक उत्खनन 1977 में तथा विस्तृत उत्खनन 1978-79 में विजय कुमार के नेतृत्व में हुआ।
करंट रिसर्च: वर्ष 2006 में गणेश्वर क्षेत्र में हुई खुदाई में बड़ी संख्या में अतिरिक्त ताम्र उपकरण प्राप्त हुए, जिससे गणेश्वर के व्यापक तांबा-उत्पादन केंद्र होने की पुष्टि और मज़बूत हुई है।
कांस्य युग (Bronze Age) वह दौर है जब मनुष्य ने तांबे में टिन मिलाकर एक अधिक मज़बूत धातु — कांस्य — बनाना सीखा। राजस्थान में इस युग की सबसे बड़ी व सबसे प्रसिद्ध सभ्यता कालीबंगा है, जो सिंधु घाटी सभ्यता (हड़प्पा सभ्यता) का ही एक हिस्सा है।
⏰ काल (Period): कांस्य युग / सैंधव सभ्यता — लगभग 2500 ईपू (हड़प्पा-समकालीन)
⭐ महत्व (Significance): घग्घर नदी (प्राचीन सरस्वती नदी) के तट पर स्थित कालीबंगा को "काले रंग की चूड़ियों" के कारण यह नाम मिला (यहां से बड़ी संख्या में काली चूड़ियां मिली हैं)। इसकी खोज अमलानंद घोष ने 1952 में (कुछ स्रोतों में 1951-52) की, तथा मुख्य उत्खनन 1961-69 के बीच बी.बी. लाल, बी.के. थापर, एम.डी./डी. खरे, के.एम. श्रीवास्तव, एस.पी. जैन व जे.पी. जोशी के नेतृत्व में हुआ। प्रसिद्ध इतिहासकार दशरथ शर्मा ने कालीबंगा को "सिंधु घाटी साम्राज्य की तीसरी राजधानी" कहा है। यह स्वतंत्र भारत का प्रारंभिक व्यवस्थित रूप से उत्खनित पुरातात्विक स्थलों में से एक था। यहां 5 सांस्कृतिक चरण मिले हैं — पहले दो चरण हड़प्पा-पूर्व (Pre-Harappan) के हैं, जबकि बाकी तीन चरण हड़प्पा-समकालीन (Mature Harappan) हैं। नगर दो भागों में बंटा था — दुर्गीकृत (Fortified) व अदुर्गीकृत (Unfortified) भाग।
A. कालीबंगा की अनूठी खोजें
ज़रा सोचिए — आज से करीब 4500 साल पहले, किसी किसान ने अपने खेत में हल चलाया और वह खेत आज भी वैसा ही मिला, मानो कल की बात हो! यह इसलिए संभव हुआ क्योंकि उस खेत के ऊपर एक नई परत बन गई और वह हज़ारों साल तक सुरक्षित रह गया। यह दुनिया में इस काल का इकलौता ऐसा प्रमाण है जहां जुताई की दिशा और दो फसलों (चना-सरसों) की एक साथ खेती दोनों साफ़ दिखती हैं। यही वजह है कि "कालीबंगा का जुता खेत" राजस्थान इतिहास की परीक्षाओं में सबसे ज़्यादा पूछा जाने वाला तथ्य है।
B. संग्रहालय एवं पतन के कारण
कालीबंगा अकेला स्थल नहीं था — घग्घर नदी की घाटी में उत्तरी राजस्थान में कई और सम्बंधित स्थल मिले हैं, जो सिंधु-सरस्वती सभ्यता की व्यापकता को दर्शाते हैं:
| स्थल (Site) | जिला (District) | खोजकर्ता/उत्खननकर्ता | मुख्य विशेषता |
|---|---|---|---|
| बरोड़ (Baror) | श्रीगंगानगर | पहचान: एल.पी. टेसिटोरी (1916-17); उत्खनन 2003 से प्रारंभ | हड़प्पा-पूर्व एवं हड़प्पा-समकालीन; एक ही बर्तन में लगभग 8000 सेलखड़ी मनके मिले; अफगानिस्तान से आयातित लेपिस लाजुली मनके |
| सोथी/पुंगल (Sothi/Pungal) | बीकानेर | खोज: एल.पी. टेसिटोरी; उत्खनन निर्देशन: अमलानंद घोष (1953) | घग्घर व चौतंग नदियों के तट पर; अलग उप-संस्कृति के रूप में वर्गीकृत; "कालीबंगा प्रथम" भी कहा जाता है; पीपल पत्ती व मछली-शल्क डिज़ाइन वाले मृदभांड |
| सावणियां (Sawaniyan) | बीकानेर | — | झाड़ोल व कुराड़ा जैसे स्थलों की तरह यहां भी ताम्रपाषाणिक उपकरणों के भंडार मिले |
| कुराड़ा (Kurada) | नागौर (परबतसर-कुचामन क्षेत्र) | 1934 में ताम्र सामग्री की प्राप्ति | इसे "तांबे के औज़ारों की नगरी" कहा जाता है |
| लोद्रवा (Lodhrawa) | जैसलमेर | — | प्राचीन सरस्वती नदी तट पर स्थित; हड़प्पा व कालीबंगा सभ्यता का समकालीन माना जाता है |
| तरखानवाला डेरा व चक 86 | श्रीगंगानगर क्षेत्र (घग्घर मैदान) | — | सिंधु-सरस्वती सभ्यता से जुड़े उत्तरी घग्घर-क्षेत्रीय स्थल |
"एक जुता हुआ खेत, एक तांबे का बाण, और चूड़ियों का एक ढेर — ये तीन चीज़ें भर बता देती हैं कि राजस्थान की धरती पर सभ्यता कितनी पुरानी और कितनी समृद्ध रही है।" — राजस्थान पुरातत्व अध्ययन का सामान्य सिद्धांत
1. आहड़ सभ्यता — उदयपुर, बेड़च/आहड़ नदी तट; "ताम्रवती नगरी" के नाम से प्रसिद्ध; खोजकर्ता अक्षय कीर्ति व्यास (1953)। 2. आहड़ को "ग्रामीण संस्कृति" व कालीबंगा को "नगरीय सभ्यता" कहा जाता है — दोनों की तुलना याद रखने योग्य है। 3. गिलुण्ड (राजसमंद) — आहड़ की उपशाखा, यहां पक्की ईंटों का भरपूर प्रयोग हुआ (आहड़ में नहीं)। 4. बालाथल (उदयपुर) से मिला 4000 वर्ष पुराना कंकाल — भारत में कुष्ठ रोग का सबसे प्राचीन प्रमाण। 5. ओझियाना (ब्यावर) — आहड़ संस्कृति का एकमात्र स्थल जो नदी-घाटी की बजाय पहाड़ी पर स्थित है। 6. पचमता (राजसमंद) — यहां गिलुण्ड जैसी ही समानांतर-दीवार संरचना मिली है (उत्खनन 2014-16); आहड़-बनास संस्कृति की उप-शाखा। 7. नंदलालपुरा, किराड़ोत व चौथी बारी (तीनों जयपुर) तथा पिंड पलाड़िया (चित्तौड़गढ़), झाड़ोल (उदयपुर) — आहड़-बनास से जुड़े अन्य छोटे ताम्रपाषाणकालीन स्थल, जिनके स्थल-जिला जोड़े परीक्षा में पूछे जाते हैं। 8. गणेश्वर (सीकर, कांतली नदी) — "ताम्र सभ्यता की जननी"; भारत के सबसे प्राचीन तांबे के औज़ार (लगभग 2800 ईपू) यहीं मिले। 9. गणेश्वर हड़प्पा सभ्यता को तांबे की आपूर्ति करता था, परंतु यहां तांबा गलाने की भट्टी के प्रमाण नहीं मिले। 10. कालीबंगा (हनुमानगढ़, घग्घर/प्राचीन सरस्वती नदी) — "काली चूड़ियों" के कारण नामकरण; खोजकर्ता अमलानंद घोष (1952)। 11. दशरथ शर्मा ने कालीबंगा को "सिंधु घाटी साम्राज्य की तीसरी राजधानी" कहा। 12. कालीबंगा से जुते हुए खेत (Ploughed Field) का विश्व में एकमात्र प्रमाण मिला है — साथ ही भूकंप का प्राचीनतम साक्ष्य भी। 13. कालीबंगा में 5 सांस्कृतिक चरण मिले — पहले दो हड़प्पा-पूर्व, बाकी तीन हड़प्पा-समकालीन। 14. कालीबंगा से चावल का कोई प्रमाण नहीं मिला — जौ, बाजरा, गेहूं, चना व सरसों के प्रमाण मिले हैं। 15. कालीबंगा पुरातत्व संग्रहालय की स्थापना 1983 में हुई, 2017 में जीर्णोद्धार के बाद पुनः खोला गया। 16. बरोड़ (श्रीगंगानगर) से एक बर्तन में लगभग 8000 सेलखड़ी मनके मिले — अफगानिस्तान से आयातित लेपिस लाजुली भी मिला। 17. सोथी/पुंगल (बीकानेर) को "कालीबंगा प्रथम" भी कहा जाता है। 18. ताम्रपाषाणकालीन सभ्यताओं के पतन का मुख्य कारण जलवायु-शुष्कता (वर्षा में कमी) माना जाता है।
नीचे दी समय-रेखा (Timeline) इस अध्याय के सभी महत्वपूर्ण वर्षों व तथ्यों को एक साथ जोड़ती है — रिवीजन के लिए इसे ज़रूर दोहराएं:
| वर्ष (Year) | घटना/Event | महत्व |
|---|---|---|
| लगभग 2800 ईपू | गणेश्वर सभ्यता में तांबे के औज़ारों का निर्माण | भारत के प्राचीनतम तांबे के औज़ार |
| लगभग 2500 ईपू | कालीबंगा सभ्यता का हड़प्पा-समकालीन उत्कर्ष | सिंधु घाटी सभ्यता की तीसरी राजधानी |
| लगभग 2100-1200 ईपू | आहड़ सभ्यता का काल | बनास संस्कृति का उत्कर्ष |
| 1916-17 | एल.पी. टेसिटोरी द्वारा बरोड़ स्थल की पहचान | सरस्वती-घग्घर सभ्यता क्षेत्र का प्रारंभिक सर्वेक्षण |
| 1934 | कुराड़ा (नागौर) में ताम्र सामग्री की प्राप्ति | "तांबे के औज़ारों की नगरी" की पहचान |
| 1952 | अमलानंद घोष द्वारा कालीबंगा की खोज | कालीबंगा सभ्यता की पहचान |
| 1953 | अक्षय कीर्ति व्यास द्वारा आहड़ की खोज | आहड़ सभ्यता की पहचान |
| 1953 | अमलानंद घोष के निर्देशन में सोथी/पुंगल का उत्खनन | कालीबंगा प्रथम संस्कृति की पहचान |
| 1957-58 | बी.बी. लाल द्वारा गिलुण्ड का उत्खनन प्रारंभ | आहड़ की उपशाखा सभ्यता की पहचान |
| 1961-62 | वी.एन. मिश्र द्वारा बालाथल की खोज | कुष्ठ रोग के प्राचीनतम प्रमाण वाले स्थल की पहचान |
| 1961-69 | कालीबंगा का विस्तृत उत्खनन (बी.बी. लाल आदि) | 5 सांस्कृतिक चरणों की पहचान, जुता खेत जैसी अनूठी खोजें |
| 1972 | आर.सी. अग्रवाल द्वारा गणेश्वर की खोज | ताम्र सभ्यता की जननी की पहचान |
| 1983 | कालीबंगा पुरातत्व संग्रहालय की स्थापना | उत्खनित सामग्री का संरक्षण व प्रदर्शन |
| 1993 | वी.एन. मिश्र द्वारा बालाथल का मुख्य उत्खनन | कुष्ठ रोग प्रमाण व दुर्गनुमा भवन की खोज |
| 1998-2003 | गिलुण्ड का विस्तृत उत्खनन (वी.एस. शिंदे व जी. पॉसेल) | अंतरराष्ट्रीय सहयोग से नवीन शोध |
| 1999-2001 | ओझियाना का उत्खनन (बी.आर. मीणा व आलोक त्रिपाठी) | पहाड़ी स्थल पर आहड़ संस्कृति के प्रमाण |
| 2017 | कालीबंगा संग्रहालय का जीर्णोद्धार के बाद पुनः उद्घाटन | संग्रहालय आधुनिकीकरण (करंट अफेयर्स) |