Chalcolithic & Bronze Age Civilizations | कालीबंगा-आहड़-गणेश्वर
पिछले अध्याय में हमने पढ़ा कि कैसे एक शिकारी मनुष्य धीरे-धीरे किसान बना। अब कल्पना कीजिए — वही किसान अब अपने खेत में एक चमकती हुई धातु खोदकर निकालता है, जिसे मोड़ा जा सकता है, पिघलाया जा सकता है, और नए औज़ारों में ढाला जा सकता है। यह धातु थी — तांबा (Copper)। जिस दिन राजस्थान के किसी आदि-मानव ने पहली बार पत्थर के साथ-साथ तांबे का उपयोग शुरू किया, उसी दिन से "ताम्रपाषाण काल" (Chalcolithic Age) की शुरुआत हुई। और आगे चलकर जब उसी तांबे में टिन मिलाकर एक और मज़बूत धातु — कांस्य (Bronze) — बनाई गई, तो राजस्थान में कालीबंगा जैसी सुव्यवस्थित, नगर-योजना वाली सभ्यताएं विकसित हुईं। यह अध्याय राजस्थान की उन तीन सबसे प्रसिद्ध ताम्रपाषाणकालीन सभ्यताओं — आहड़, गणेश्वर व कालीबंगा — की पूरी कहानी बताता है, जो हर परीक्षा में सबसे ज़्यादा पूछी जाती हैं।
1. ताम्रपाषाण काल — परिचय एवं विशेषताएं (Chalcolithic Age: Meaning & Features) ◆ ताम्रपाषाण काल वह युग है जब मनुष्य ने पत्थर के साथ-साथ तांबे (Copper) का उपयोग करना शुरू किया — यह पाषाण युग व लौह युग के बीच का संक्रमण-काल (Transitional Period) है। ◆ तकनीकी दृष्टि से ताम्रपाषाणकालीन सभ्यताएं हड़प्पा सभ्यता से "पुरानी" (अधिक प्रारंभिक/सरल तकनीक वाली) मानी जाती हैं, यद्यपि कालक्रम (Chronology) की दृष्टि से राजस्थान की अधिकांश ताम्रपाषाणकालीन सभ्यताएं हड़प्पा-काल के बाद तक फली-फू लीं — यह एक महत्वपूर्ण व सूक्ष्म अंतर है जो परीक्षा में अक्सर पूछा जाता है। ◆ इस काल में स्थायी ग्रामीण संस्कृति विकसित हुई — कृषि व पशुपालन जीवन का मुख्य आधार बने। ◆ मृदभांडों (बर्तनों) पर चित्रकारी शुरू हुई — ज्यामितीय (Geometric) व प्राकृ तिक (Natural) डिज़ाइन बनाए जाने लगे। ◆ पक्की (जली हुई) ईंटों का प्रयोग सामान्यतः नहीं होता था; पत्थर के औज़ारों के साथ-साथ धातु (तांबे) के औज़ार भी काम में लिए जाते थे। ◆ ताम्रपाषाणकालीन लोग लेखन-कला से अपरिचित थे — इसलिए इस काल की जानकारी पूरी तरह उत्खनन से मिली सामग्री पर निर्भर करती है।
◆ पतन का मुख्य कारण वर्षा की कमी (जलवायु-शुष्कता) माना जाता है — जल-स्रोत सूखने व कृषि-संकट के कारण ये सभ्यताएं धीरे-धीरे समाप्त हो गईं। ◆ धातु युग की शुरुआत आज से लगभग 6000 वर्ष पहले मानी जाती है। पहले तांबे, फिर पीतल-कांसे और बाद में लोहे का ज्ञान होने पर मनुष्य ने इनसे औज़ार बनाने शुरू किए — इससे खेती और शिल्प (हस्तकला) का काम पहले से बहुत आसान हो गया। ◆ राजस्थान में ताम्रयुगीन सभ्यताओं के दो बड़े समूह पनपे — (1) सरस्वती-दृषद्वती (आज की घग्घर) नदी घाटी का समूह, जैसे कालीबंगा; और (2) बनास नदी के कांठे (किनारे वाले क्षेत्र) का समूह, जैसे आहड़, गिलुण्ड और बागोर। ◆ ताम्रकालीन संस्कृति के प्रमुख स्थल: गणेश्वर (सीकर), कालीबंगा (हनुमानगढ़), गिलुण्ड (राजसमंद), आहड़ व झाड़ोल (उदयपुर), पिंड-पाडलियाँ (चित्तौड़), कु राड़ा (नागौर), साबणिया व पूगल (बीकानेर), नंदलालपुरा, किराड़ोत व चीथवाड़ी (जयपुर), एलाना (जालोर), बूढ़ा पुष्कर (अजमेर), कोल माहोली (सवाई माधोपुर) और मलाह (भरतपुर)। ◆ गणेश्वर, खेतड़ी, दरीबा, ओझियाना और कु राड़ा से मिले तांबे व ताम्र-उपकरणों का उपयोग राजस्थान के अलावा हड़प्पा, मोहनजोदड़ो और रोपड़ जैसे दूर के नगरों में भी होता था। ◆ ये सभ्यताएँ केवल स्थानीय नहीं थीं — चित्रकला, बर्तन बनाने की कला (भांड-शिल्प) और धातु-तकनीक में इनका संपर्क पश्चिमी एशिया, ईराक और अफ्रीका की प्राचीन सभ्यताओं से भी था।
2. आहड़ सभ्यता (Ahar Civilization) — उदयपुर
A. आहड़ की मुख्य विशेषताएं ◆ यहां तांबा गलाने की भट्टी व अनेक ताम्र उपकरण मिले हैं — जिससे इसे "ताम्रवती नगरी" कहा जाता है। ◆ मिट्टी की बनी वृषभ (बैल) आकृ ति, जिसे "बनासियन बुल" (Banasian Bull) कहा जाता है, यहां की पहचान है। ◆ काले-लाल मृदभांड (Black-and-Red Ware) प्रमुख हैं, जिन पर सफे द रंग से ज्यामितीय आकृ तियां उके री गई हैं। ◆ अनाज रखने के लिए बड़े मिट्टी के बर्तन मिले हैं, जिन्हें "गोरे/कोठ/कठे " कहा जाता था; ईरान से आयातित जल-पात्र (Iranian water vessels) व लेपिस लाजुली (ईरान से आयातित रत्न) भी मिले हैं। ◆ घर पत्थर व धूप में सुखाई गई कच्ची ईंटों से बनाए जाते थे — गौरतलब है कि आहड़ में पक्की (जली हुई) ईंटों के प्रमाण नहीं मिले, जबकि इसी संस्कृति की शाखा गिलुण्ड में पक्की ईंटें बहुतायत से मिली हैं। ◆ मृतकों को आभूषणों सहित दफनाया जाता था, सिर उत्तर दिशा की ओर रखकर। ◆ तीसरी से पहली शताब्दी ईपू के 6 यूनानी तांबे के सिक्के , यूनानी देवता अपोलो की मुहर तथा तौल के बाट (weights) मिले हैं — जो व्यापार के विकसित होने का प्रमाण हैं। ◆ एक ही स्थान पर 6-7 चूल्हों के प्रमाण मिले हैं, जो संयुक्त परिवार व्यवस्था का संके त देते हैं। ◆ आहड़ सभ्यता के लोग चांदी धातु से अपरिचित थे — यह भी एक बार-बार पूछा जाने वाला तथ्य है।
◆ आहड़ सभ्यता आयड़ नदी के किनारे बसी थी और आज से लगभग 4000 वर्ष पुरानी है। 'धूलकोट' का अर्थ है धूल (मिट्टी) का टीला — यह सभ्यता लगभग 500 मीटर लंबे ऐसे ही टीले के नीचे दबी मिली, जिससे तांबे की कु ल्हाड़ियाँ, लोहे के औज़ार, बांस के टुकड़े और हड्डियाँ मिली हैं। ◆ उत्खनन की अलग-अलग परतों से पता चलता है कि यहाँ बसने के समय से लेकर 18वीं सदी तक कई बार बस्ती बसी और उजड़ी। आसपास तांबे की अनेक खानें होने से यहाँ के लोग लगातार तांबे के उपकरण बनाते रहे, इसलिए यह एक ताम्रयुगीन कौशल-केंद्र बन गया। ◆ मकानों की योजना में आँगन, गली या खुला स्थान रखने की व्यवस्था थी। एक ही मकान में कई बड़े चूल्हे मिले हैं, जो बड़े परिवार या सामूहिक भोजन बनाने की व्यवस्था बताते हैं। ◆ उत्खनन में मिले ठप्पों (छापे लगाने वाले साँचों) से अनुमान है कि यहाँ रंगाई-छपाई का व्यवसाय उन्नत था। उत्खनन में सबसे अधिक मिट्टी के बर्तन मिले हैं, जो आहड़ को लाल-काले बर्तनों वाली संस्कृति का प्रमुख केंद्र सिद्ध करते हैं। ◆ मृतकों को गहनों-आभूषणों के साथ दफनाने से पता चलता है कि यहाँ के लोग मृत्यु के बाद के जीवन में विश्वास करते थे। ◆ आहड़ का संपर्क नवदाटोली, हड़प्पा, नागदा, एरन और कायथा की प्राचीन सभ्यताओं से भी था — यह वहाँ के काले-लाल मिट्टी के बर्तनों के आकार और बनाने के कौशल की समानता से पता चलता है। इस बनास सभ्यता का फै लाव गिलुण्ड, बागोर और आसपास के स्थानों से प्रमाणित होता है।
B. आहड़-बनास संस्कृति के सहायक स्थल आहड़ सभ्यता अके ली नहीं थी — उसके आसपास कई और स्थल विकसित हुए, जिन्हें "आहड़-बनास संस्कृति" के अंतर्गत रखा जाता है:
◆ गिलुण्ड कस्बे में बनास नदी के तट पर दो टीलों के उत्खनन से यह सभ्यता सामने आई, इसलिए इसे भी 'बनास संस्कृति' कहा जाता है। उत्खनन से मिले ताम्रयुगीन अवशेषों का समय लगभग 1900-1700 ईपू निर्धारित किया गया है। ◆ यहाँ से मिट्टी के खिलौने, पत्थर की गोलियाँ और हाथी-दाँत की चूड़ियाँ मिली हैं। पाँच प्रकार के बर्तनों में सादे, काले, पॉलिशदार, भूरे और लाल-काले चित्रित मृदभांड शामिल हैं।
- बालाथल की सभ्यता का हड़प्पा सभ्यता से संपर्क होने का पक्का प्रमाण मिलता है।
इनके अतिरिक्त आहड़-बनास व सम्बद्ध ताम्रपाषाणकालीन संस्कृति के कई और छोटे स्थल राजस्थान में मिले हैं, जो नीचे तालिका में दिए गए हैं — परीक्षा में इनके "स्थल-जिला" जोड़े पूछे जा सकते हैं:
स्थल (Site) जिला (District) सांस्कृ तिक महत्व
झाड़ोल (Jhadol) उदयपुर ताम्रपाषाणिक उपकरणों के भंडार वाला स्थल — सावणियां (बीकानेर) व कु राड़ा (नागौर) जैसे स्थलों की श्रेणी में आता है
पिंड पलाड़िया (Pind Paladiya) चित्तौड़गढ़ आहड़-बनास संस्कृति से संबद्ध ताम्रपाषाणकालीन स्थल
नंदलालपुरा (Nandlalpura) जयपुर जयपुर क्षेत्र के ताम्र-प्रयोगकर्ता ताम्रपाषाणकालीन स्थल-समूह का भाग
किराड़ोत (Kiradot) जयपुर जयपुर क्षेत्र के ताम्र-प्रयोगकर्ता ताम्रपाषाणकालीन स्थल-समूह का भाग
चौथी बारी (Chauthi Bari) जयपुर जयपुर क्षेत्र के ताम्र-प्रयोगकर्ता ताम्रपाषाणकालीन स्थल-समूह का भाग
पलाना (Palana) जालौर ताम्रपाषाणकालीन स्थलों की सूची में शामिल (कुछ पुस्तकों में इस स्थल का नाम
'एलाना' मिलता है)
कोल महोली (Kol Maholi) सवाई माधोपुर ताम्रपाषाणकालीन स्थलों की सूची में शामिल
मालाह (Malah) भरतपुर ताम्रपाषाणकालीन स्थलों की सूची में शामिल
बूढ़ा पुष्कर (Budha Pushkar) अजमेर ताम्रकालीन संस्कृति का प्राचीन स्थल (पुरापाषाणकालीन औज़ार भी यहीं से मिले)
खेतड़ी व दरीबा (Khetri & झुंझुनूं व राजसमंद तांबे के प्रमुख प्राचीन स्रोत; यहाँ का तांबा हड़प्पा, मोहनजोदड़ो व रोपड़ तक Dariba) पहुँचता था
3. गणेश्वर सभ्यता (Ganeshwar Civilization) — सीकर
◆ गणेश्वर के निवासी हड़प्पा सभ्यता को तांबे की आपूर्ति (Export) करते थे — यह दर्शाता है कि गणेश्वर व हड़प्पा के बीच व्यापारिक संबंध थे। ◆ यहां मिली ताम्र वस्तुओं में 99% शुद्ध तांबा पाया गया है — बाण, मछली पकड़ने के कांटे, भाले, अंगूठियां, उस्तरे के फलक तथा दोहरे सर्पिल सिरे (double spiral head) वाली एक विशिष्ट ताम्र पिन प्रमुख हैं। ◆ यहां तांबा गलाने की भट्टी (smelting furnace) के प्रमाण नहीं मिले — यानी कच्चा माल यहां संसाधित तो होता था, पर भट्टियों के अवशेष अब तक नहीं मिले हैं। यह एक रोचक व परीक्षा-उपयोगी विरोधाभास है। ◆ काली व नीली सज्जा वाले मृदभांड (गैरिक/ochre रंग के मृदभांड) मिले हैं; एक पत्थर के बांध (Stone Dam) के भी प्रमाण मिले हैं — जो जल-प्रबंधन की प्रारंभिक समझ दर्शाता है। ◆ यहां के घर पत्थरों से बनाए जाते थे, ईंटों के प्रयोग के प्रमाण नहीं मिले। ◆ गणेश्वर कांतली नदी के उद्गम (शुरुआत वाले स्थान) पर स्थित है। तांबे के बहुत अधिक आयुध (हथियार) व उपकरण मिलने के कारण इसे ताम्रयुगीन सभ्यताओं में सबसे प्राचीन माना जाता है। ◆ यहाँ से मिले मिट्टी के बर्तन 'कपिषवर्णी मृदपात्र' कहलाते हैं, जिन्हें काले व नीले रंग से सजाया गया है। यहाँ का तांबा हड़प्पा के साथ-साथ मोहनजोदड़ो को भी भेजा जाता था।
करंट रिसर्च: वर्ष 2006 में गणेश्वर क्षेत्र में हुई खुदाई में बड़ी संख्या में अतिरिक्त ताम्र उपकरण प्राप्त हुए, जिससे गणेश्वर के व्यापक तांबा-उत्पादन केंद्र होने की पुष्टि और मज़बूत हुई है।
4. कांस्य युग — कालीबंगा सभ्यता (Bronze Age — Kalibangan Civilization) कांस्य युग (Bronze Age) वह दौर है जब मनुष्य ने तांबे में टिन मिलाकर एक अधिक मज़बूत धातु — कांस्य — बनाना सीखा। राजस्थान में इस युग की सबसे बड़ी व सबसे प्रसिद्ध सभ्यता कालीबंगा है, जो सिंधु घाटी सभ्यता (हड़प्पा सभ्यता) का ही एक हिस्सा है।
A. कालीबंगा की अनूठी खोजें ◆ जुते हुए खेत के प्रमाण (Ploughed Field) — यह विश्व में इस काल का एकमात्र ऐसा प्रमाण है, जहां दो फसलें (चना व सरसों) एक साथ उगाई गई मिलीं। यह तथ्य कालीबंगा को दुनिया-भर में विशिष्ट बनाता है। ◆ भूकं प के प्राचीनतम साक्ष्य यहीं से मिले हैं — यानी कालीबंगा दुनिया के सबसे पुराने ज्ञात भूकं प-प्रमाणों में से एक है। ◆ 7 अग्निवेदियां (हवन कुं ड) मिली हैं, जो धार्मिक अनुष्ठानों का प्रमाण देती हैं; मृदभांडों पर स्वस्तिक चिह्न भी मिले हैं। ◆ मृतकों को दफनाने की तीन विधियां प्रचलित थीं — पूर्ण शव-दफन, आंशिक दफन तथा दाह-संस्कार (cremation)। ◆ लकड़ी व ईंटों से बनी नालियां (drains), मिट्टी के चबूतरे, गाय के मुख वाले प्याले, तांबे के बैल, कांस्य का दर्पण, हाथीदांत की कं घी, ऊं ट की हड्डियां व कांच की मणियां भी मिली हैं। ◆ मुहरें: यहां मिली सेलखड़ी (Steatite) व मिट्टी की मुहरों पर बनी आकृ तियां मेसोपोटामिया व यूनानी बेलनाकार मुहरों से मिलती-जुलती हैं — जो विदेशी व्यापार का संके त हैं। ◆ फसलें: जौ, बाजरा, गेहूं, चना व सरसों के प्रमाण मिले हैं — परंतु चावल का कोई प्रमाण नहीं मिला, यह याद रखने योग्य तथ्य है। ◆ मृदभांड: लाल पृष्ठभूमि पर काले ज्यामितीय डिज़ाइन वाले बर्तन मिलते हैं, जो पाकिस्तान की कोट डिजी संस्कृति के मृदभांडों से मिलते-जुलते हैं। ◆ नाम का अर्थ: पंजाबी भाषा में 'बंगा' का अर्थ है चूड़ी — यहाँ खुदाई में मिली काली चूड़ियों के कारण इसका नाम 'कालीबंगा' पड़ा। ◆ कालक्रम: एक मत के अनुसार यहाँ की संस्कृति 2400-2250 ईपू की है, जबकि हड़प्पा से पहले के दो स्तरों के कारण इसे आज से 6000 वर्ष से भी अधिक पुराना माना जाता है। इसी आधार पर कालीबंगा की सभ्यता को दो भागों में बाँटा जाता है — प्राक् -हड़प्पा सभ्यता और हड़प्पा सभ्यता; यहाँ से उत्तर-हड़प्पाकालीन साक्ष्य भी मिले हैं। 1952 में खोज के बाद 1961-62 में बी.बी. लाल व बी.के . थापर ने यहाँ उत्खनन शुरू करवाया। ◆ दो टीले: पूर्वी टीला 'नगर टीला' था, जहाँ साधारण लोगों की बस्ती थी; पश्चिमी टीला 'दुर्ग टीला' था। दोनों टीलों के चारों ओर सुरक्षा-दीवार (प्राचीर) बनी हुई थी। नगर-योजना सिंधु घाटी के नगरों जैसी ही थी। ◆ भवन व सफाई: पत्थर न मिलने के कारण दीवारें धूप में पकाई कच्ची ईंटों से बनती थीं, जिन्हें मिट्टी से जोड़ा जाता था। व्यक्तिगत व सार्वजनिक नालियाँ और कू ड़ा डालने के मिट्टी के बर्तन नगर की असाधारण सफाई-व्यवस्था बताते हैं। ◆ बर्तन व लिपि: यहाँ के बर्तन पतले और हल्के हैं, पर उनमें सुंदरता व सुडौलता कम है; लाल रंग के बर्तनों पर काली व सफे द रेखाएँ खींची गई हैं। बर्तनों और मुहरों पर मिली लिपि सैंधव (सिंधु) लिपि से मिलती-जुलती है, जिसे अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है।
◆ एक बच्चे की खोपड़ी में छह छेद मिले हैं, जिसे मस्तिष्क-शोथ (दिमाग़ की सूजन वाली बीमारी) के इलाज यानी प्राचीन शल्य- चिकित्सा का प्रमाण माना जाता है। ◆ खिलौना बैलगाड़ी, तांबे के कृषि-औज़ार (आर्थिक उन्नति के प्रमाण), कब्रिस्तान से मिली तीन प्रकार की समाधियाँ और लकड़ी की नालियाँ भी यहाँ की महत्वपूर्ण खोजें हैं।
B. संग्रहालय एवं पतन के कारण ◆ कालीबंगा पुरातत्व संग्रहालय की स्थापना 1983 में हुई (कुछ स्रोतों में 1985-86 दर्ज है) — यहां 1961-69 के उत्खनन में प्राप्त सामग्री प्रदर्शित है। वर्ष 2017 में जीर्णोद्धार के बाद इसे पुनः खोला गया। ◆ पतन के कारण: के .यू.आर. कै नेडी के अनुसार संक्रामक रोग (infectious disease) पतन का प्रमुख कारण था; अन्य इतिहासकार प्राकृ तिक आपदाओं व सरस्वती/घग्घर नदी के सूखने को भी बड़ा कारण मानते हैं।
5. कालीबंगा से जुड़े अन्य स्थल — बरोड़, सोथी/पुंगल कालीबंगा अके ला स्थल नहीं था — घग्घर नदी की घाटी में उत्तरी राजस्थान में कई और सम्बंधित स्थल मिले हैं, जो सिंधु-सरस्वती सभ्यता की व्यापकता को दर्शाते हैं:
जिला
स्थल (Site) खोजकर्ता/उत्खननकर्ता मुख्य विशेषता
(District)बरोड़ (Baror) श्रीगंगानगर पहचान: एल.पी. टेसिटोरी (1916- हड़प्पा-पूर्व एवं हड़प्पा-समकालीन; एक ही बर्तन में
17); उत्खनन 2003 से प्रारंभ लगभग 8000 सेलखड़ी मनके मिले; अफगानिस्तान
से आयातित लेपिस लाजुली मनकेसोथी/पुंगल बीकानेर खोज: एल.पी. टेसिटोरी; उत्खनन घग्घर व चौतंग नदियों के तट पर; अलग उप-संस्कृति
(Sothi/Pungal) निर्देशन: अमलानंद घोष (1953) के रूप में वर्गीकृ त; "कालीबंगा प्रथम" भी कहा जाता
है; पीपल पत्ती व मछली-शल्क डिज़ाइन वाले मृदभांडसावणियां (Sawaniyan) बीकानेर — झाड़ोल व कु राड़ा जैसे स्थलों की तरह यहां भी ताम्रपाषाणिक उपकरणों के भंडार मिले
कु राड़ा (Kurada) नागौर (परबतसर- 1934 में ताम्र सामग्री की प्राप्ति इसे "तांबे के औज़ारों की नगरी" कहा जाता है कु चामन क्षेत्र)
लोद्रवा (Lodhrawa) जैसलमेर — प्राचीन सरस्वती नदी तट पर स्थित; हड़प्पा व कालीबंगा सभ्यता का समकालीन माना जाता है
तरखानवाला डेरा व चक श्रीगंगानगर क्षेत्र — सिंधु-सरस्वती सभ्यता से जुड़े उत्तरी घग्घर-क्षेत्रीय 86 (घग्घर मैदान) स्थल
6. सभ्यताओं की तुलना, पतन के कारण एवं परीक्षा-उपयोगी तथ्य
कालीबंगा — नगरीय सभ्यता आहड़ — ग्रामीण संस्कृति
- सुव्यवस्थित नगर-योजना, दुर्गीकृ त व अदुर्गीकृ त भाग ◆ बिखरी हुई बसावट, कच्ची ईंटों/पत्थर के मकान
- लकड़ी-ईंट की नालियां (जल-निकासी व्यवस्था) ◆ स्थानीय स्तर पर तांबा-प्रगलन (गांव-आधारित उद्योग)
- मुहरें, तौल-बाट — विकसित व्यापार व्यवस्था ◆ सीमित व्यापार, स्थानीय आवश्यकता हेतु उत्पादन
- विदेशी (मेसोपोटामिया) व्यापारिक संपर्क के प्रमाण ◆ हड़प्पा सभ्यता से स्वतंत्र, समानांतर विकास
- हड़प्पा सभ्यता का प्रत्यक्ष हिस्सा ◆ हड़प्पा सभ्यता से भिन्न, स्थानीय क्षेत्रीय संस्कृति
पतन के सामान्य कारण (सभी ताम्रपाषाणकालीन सभ्यताओं हेतु) ◆ जलवायु-शुष्कता (Climatic Aridity) — वर्षा में कमी व जल-स्रोतों का सूखना मुख्य कारण माना जाता है। ◆ कृषि-संकट — पानी की कमी से खेती प्रभावित हुई, जिससे जनसंख्या को अन्यत्र पलायन करना पड़ा। ◆ सरस्वती/घग्घर नदी के मार्ग-परिवर्तन व सूखने से कालीबंगा जैसी नदी-तटीय सभ्यताएं विशेष रूप से प्रभावित हुईं। ◆ कालीबंगा के मामले में के .यू.आर. कै नेडी द्वारा सुझाया गया संक्रामक रोग (Infectious Disease) का सिद्धांत भी एक प्रमुख व्याख्या है।
"एक जुता हुआ खेत, एक तांबे का बाण, और चूड़ियों का एक ढेर — ये तीन चीज़ें भर बता देती हैं कि राजस्थान की धरती पर सभ्यता कितनी पुरानी और कितनी समृद्ध रही है।" — राजस्थान पुरातत्व अध्ययन का सामान्य सिद्धांत
★ अध्याय सार — महत्वपूर्ण तथ्य ★
1. आहड़ सभ्यता — उदयपुर, बेड़च/आहड़ नदी तट; "ताम्रवती नगरी" के नाम से प्रसिद्ध; खोजकर्ता अक्षय कीर्ति व्यास (1953)। 2. आहड़ को "ग्रामीण संस्कृति" व कालीबंगा को "नगरीय सभ्यता" कहा जाता है — दोनों की तुलना याद रखने योग्य है। 3. गिलुण्ड (राजसमंद) — आहड़ की उपशाखा, यहां पक्की ईंटों का भरपूर प्रयोग हुआ (आहड़ में नहीं)। 4. बालाथल (उदयपुर) से मिला 4000 वर्ष पुराना कं काल — भारत में कु ष्ठ रोग का सबसे प्राचीन प्रमाण। 5. ओझियाना (ब्यावर) — आहड़ संस्कृति का एकमात्र स्थल जो नदी-घाटी की बजाय पहाड़ी पर स्थित है। 6. पचमता (राजसमंद) — यहां गिलुण्ड जैसी ही समानांतर-दीवार संरचना मिली है (उत्खनन 2014-16); आहड़-बनास संस्कृति की उप-शाखा। 7. नंदलालपुरा, किराड़ोत व चौथी बारी (तीनों जयपुर) तथा पिंड पलाड़िया (चित्तौड़गढ़), झाड़ोल (उदयपुर) — आहड़-बनास से जुड़े अन्य छोटे ताम्रपाषाणकालीन स्थल, जिनके स्थल-जिला जोड़े परीक्षा में पूछे जाते हैं। 8. गणेश्वर (सीकर, कांतली नदी) — "ताम्र सभ्यता की जननी"; भारत के सबसे प्राचीन तांबे के औज़ार (लगभग 2800 ईपू)
यहीं मिले। 9. गणेश्वर हड़प्पा सभ्यता को तांबे की आपूर्ति करता था, परंतु यहां तांबा गलाने की भट्टी के प्रमाण नहीं मिले। 10. कालीबंगा (हनुमानगढ़, घग्घर/प्राचीन सरस्वती नदी) — "काली चूड़ियों" के कारण नामकरण; खोजकर्ता अमलानंद घोष (1952)। 11. दशरथ शर्मा ने कालीबंगा को "सिंधु घाटी साम्राज्य की तीसरी राजधानी" कहा। 12. कालीबंगा से जुते हुए खेत (Ploughed Field) का विश्व में एकमात्र प्रमाण मिला है — साथ ही भूकं प का प्राचीनतम साक्ष्य भी। 13. कालीबंगा में 5 सांस्कृ तिक चरण मिले — पहले दो हड़प्पा-पूर्व, बाकी तीन हड़प्पा-समकालीन। 14. कालीबंगा से चावल का कोई प्रमाण नहीं मिला — जौ, बाजरा, गेहूं, चना व सरसों के प्रमाण मिले हैं। 15. कालीबंगा पुरातत्व संग्रहालय की स्थापना 1983 में हुई, 2017 में जीर्णोद्धार के बाद पुनः खोला गया। 16. बरोड़ (श्रीगंगानगर) से एक बर्तन में लगभग 8000 सेलखड़ी मनके मिले — अफगानिस्तान से आयातित लेपिस लाजुली भी मिला। 17. सोथी/पुंगल (बीकानेर) को "कालीबंगा प्रथम" भी कहा जाता है। 18. ताम्रपाषाणकालीन सभ्यताओं के पतन का मुख्य कारण जलवायु-शुष्कता (वर्षा में कमी) माना जाता है।
नीचे दी समय-रेखा (Timeline) इस अध्याय के सभी महत्वपूर्ण वर्षों व तथ्यों को एक साथ जोड़ती है — रिवीजन के लिए इसे ज़रूर दोहराएं :
वर्ष (Year) घटना/Event महत्व
लगभग 2800 ईपू गणेश्वर सभ्यता में तांबे के औज़ारों का निर्माण भारत के प्राचीनतम तांबे के औज़ार
लगभग 2500 ईपू कालीबंगा सभ्यता का हड़प्पा-समकालीन उत्कर्ष सिंधु घाटी सभ्यता की तीसरी राजधानी
लगभग 2100- आहड़ सभ्यता का काल बनास संस्कृति का उत्कर्ष 1200 ईपू
लगभग 1900- गिलुण्ड की ताम्रयुगीन सभ्यता बनास संस्कृति की शाखा 1700 ईपू
1916-17 एल.पी. टेसिटोरी द्वारा बरोड़ स्थल की पहचान सरस्वती-घग्घर सभ्यता क्षेत्र का प्रारंभिक सर्वेक्षण
1934 कु राड़ा (नागौर) में ताम्र सामग्री की प्राप्ति "तांबे के औज़ारों की नगरी" की पहचान
1952 अमलानंद घोष द्वारा कालीबंगा की खोज कालीबंगा सभ्यता की पहचान
1953 अक्षय कीर्ति व्यास द्वारा आहड़ की खोज आहड़ सभ्यता की पहचान
1953 अमलानंद घोष के निर्देशन में सोथी/पुंगल का उत्खनन कालीबंगा प्रथम संस्कृति की पहचान
1957-58 बी.बी. लाल द्वारा गिलुण्ड का उत्खनन प्रारंभ आहड़ की उपशाखा सभ्यता की पहचान
1961-62 वी.एन. मिश्र द्वारा बालाथल की खोज कु ष्ठ रोग के प्राचीनतम प्रमाण वाले स्थल की पहचान
1961-69 कालीबंगा का विस्तृत उत्खनन (बी.बी. लाल आदि) 5 सांस्कृ तिक चरणों की पहचान, जुता खेत जैसी अनूठी खोजें
1972 आर.सी. अग्रवाल द्वारा गणेश्वर की खोज ताम्र सभ्यता की जननी की पहचान
1983 कालीबंगा पुरातत्व संग्रहालय की स्थापना उत्खनित सामग्री का संरक्षण व प्रदर्शन
1993 वी.एन. मिश्र द्वारा बालाथल का मुख्य उत्खनन कु ष्ठ रोग प्रमाण व दुर्गनुमा भवन की खोज
1998-2003 गिलुण्ड का विस्तृत उत्खनन (वी.एस. शिंदे व जी. पॉसेल) अंतरराष्ट्रीय सहयोग से नवीन शोध
1999-2001 ओझियाना का उत्खनन (बी.आर. मीणा व आलोक त्रिपाठी) पहाड़ी स्थल पर आहड़ संस्कृति के प्रमाण
2017 कालीबंगा संग्रहालय का जीर्णोद्धार के बाद पुनः उद्घाटन संग्रहालय आधुनिकीकरण (करंट अफे यर्स)