🪨 अध्याय 2/16 — राजस्थान का इतिहास

प्रागैतिहासिक राजस्थान

Pre-Historic Rajasthan | RAS Pre + Mains
📋 इस अध्याय में
  1. पाषाण काल — परिचय एवं वर्गीकरण (Stone Age: Meaning & Classification)
  2. पुरापाषाण काल (Palaeolithic Age)
  3. मध्यपाषाण काल (Mesolithic Age)
  4. नवपाषाण काल (Neolithic Age)
  5. प्रागैतिहासिक समाज एवं संस्कृति (Society & Culture)

कल्पना कीजिए — आज से लगभग 7 लाख साल पहले, जब न कोई शहर था, न कोई भाषा, न कोई लिपि — नागौर के पास डीडवाना की नमक-झील के किनारे एक आदि-मानव पत्थर को पत्थर से टकराकर एक धारदार औज़ार बना रहा था। यही औज़ार आज हमें बताते हैं कि राजस्थान में इंसान की कहानी कोई हज़ार-दो हज़ार साल पुरानी नहीं, बल्कि लाखों साल पुरानी है। इस अध्याय में हम उसी यात्रा को समझेंगे — जब मनुष्य केवल शिकारी था, फिर धीरे-धीरे पशुपालक बना, और अंततः एक जगह बसकर खेती करने वाला किसान बना। यही यात्रा "पाषाण काल" (Stone Age) कहलाती है, और राजस्थान इस यात्रा के हर पड़ाव का जीता-जागता सबूत अपने भीतर समेटे हुए है।

1पाषाण काल — परिचय एवं वर्गीकरण (Stone Age: Meaning & Classification)

A. वर्गीकरण का आधार

B. राजस्थान में प्रागैतिहासिक शोध की शुरुआत — प्रमुख शोधकर्ता

राजस्थान में पाषाणकालीन औज़ारों की खोज का श्रेय कई पीढ़ियों के पुरातत्वविदों को जाता है। नीचे दी तालिका में इस शोध-यात्रा के मील के पत्थर दिए गए हैं:

वर्ष (Year)शोधकर्ता (Researcher)मुख्य कार्य (Key Contribution)
1870सी.ए. हैकेट (C.A. Hackett)जयपुर व इंद्रगढ़ (बूंदी) से हस्त-कुल्हाड़ (Hand Axe) व क्लीवर प्राप्त किए — वर्तमान में कलकत्ता संग्रहालय में सुरक्षित
1871ए.सी.एल. कार्लाइल (A.C.L. Carlleyle)राजस्थान में पुरातात्विक सर्वेक्षण कार्य प्रारंभ किया; दौसा क्षेत्र से पाषाण उपकरण व मानव कंकाल अवशेष प्राप्त किए
1908सेटन कार (Seton Carr)झालावाड़ क्षेत्र से पाषाणकालीन औज़ार खोजे — प्रारंभिक मानव की तकनीकी दक्षता के प्रमाण
1953-54भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) व डॉ. वीरेन्द्रनाथ मिश्रचित्तौड़गढ़ की गंभीरी व बेड़च नदियों के तटों से पाषाण उपकरण प्राप्त किए
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2पुरापाषाण काल (Palaeolithic Age)

पुरापाषाण काल पाषाण युग का सबसे लंबा और सबसे प्राचीन चरण है। इस दौर में मनुष्य पूर्णतः शिकारी था — वह न तो खेती जानता था, न पशुपालन। जीवन गुफाओं व खुले आसमान के नीचे, घूमंतू (Nomadic) रूप में बीतता था। अध्ययन की सुविधा के लिए इसे तीन उप-भागों में बांटा गया है — निम्न पुरापाषाण, मध्य पुरापाषाण व उच्च पुरापाषाण काल।

A. औज़ार एवं तकनीक

📍 डीडवाना (Didwana) (नागौर)

⏰ काल (Period): निम्न पुरापाषाण से उच्च पुरापाषाण तक — लगभग 7 लाख से 25,000 वर्ष पूर्व
⭐ महत्व (Significance): भारत के प्रागैतिहासिक शोध का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र, जिसे "भारत का ओल्डुवाई गॉर्ज" (India's Olduvai Gorge) भी कहा जाता है। डीडवाना नमक-झील के किनारे प्रो. वी.एन. मिश्र के नेतृत्व में हुए उत्खनन से डीडवाना से जायल तक लगभग 50 किमी क्षेत्र में एश्यूलियन (Acheulian) संस्कृति के 300 से अधिक हस्त-कुल्हाड़ व द्विफलक (biface) औज़ार मिले, जो लगभग 4 लाख से 7 लाख वर्ष पुराने हैं। यहीं मध्य पुरापाषाण काल (लगभग 2 लाख वर्ष पूर्व) व उच्च पुरापाषाण काल (लगभग 25,000-30,000 वर्ष पूर्व) के स्पष्ट प्रमाण भी मिले हैं — यानी डीडवाना एक ही स्थान पर पूरे पुरापाषाण युग की कहानी बयां करता है।

💡 डीडवाना को "भारत का ओल्डुवाई गॉर्ज" क्यों कहा जाता है?

अफ्रीका में तंज़ानिया के "ओल्डुवाई गॉर्ज" (Olduvai Gorge) को मानव-विकास के अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है, क्योंकि वहां प्रारंभिक मानव के सबसे पुराने औज़ार मिले थे। डीडवाना में भी वैसा ही हुआ — यहां एक साथ निम्न, मध्य व उच्च — तीनों पुरापाषाण चरणों के औज़ार मिले, जिससे वैज्ञानिकों को भारत में मानव-विकास को समझने की एक सम्पूर्ण "समय-सीढ़ी" (timeline) मिल गई। इसीलिए डीडवाना को भारत के प्रागैतिहासिक शोध की राजधानी कहा जाता है, और यह हर परीक्षा में अवश्य पूछा जाता है।

डीडवाना के अलावा राजस्थान में पुरापाषाण काल के कई अन्य महत्वपूर्ण स्थल मिले हैं:

स्थल (Site)जिला (District)मुख्य विशेषता (Key Feature)
बूढ़ा पुष्करअजमेरपुरापाषाणकालीन औज़ारों का महत्वपूर्ण स्थल, पुष्कर झील क्षेत्र से जुड़ा
इंद्रगढ़बूंदी1870 में सी.ए. हैकेट द्वारा हस्त-कुल्हाड़ व क्लीवर प्राप्त, कलकत्ता संग्रहालय में सुरक्षित
वीरातनगर (बैराठ)कोटपूतली-बहरोड़पुरापाषाण से लेकर ऐतिहासिक काल (मत्स्य महाजनपद) तक निरंतर बसावट के प्रमाण
गोगा खेड़ाराजसमंदपुरापाषाणकालीन औज़ारों की प्राप्ति का उल्लेखनीय स्थल

3मध्यपाषाण काल (Mesolithic Age)

"मध्यपाषाण काल" (Mesolithic Period) शब्द का प्रयोग सबसे पहले होडर माइकल वेस्ट्रोप (H.M. Westropp) ने किया था। यह पुरापाषाण व नवपाषाण काल के बीच का संक्रमण-काल (Transitional Period) है — यानी वह दौर जब मनुष्य शुद्ध शिकारी से थोड़ा आगे बढ़कर पशुपालन की तरफ कदम बढ़ाने लगा।

A. मुख्य विशेषताएं

📍 बागोर (Bagor) (भीलवाड़ा)

⏰ काल (Period): लगभग 5000 ईपू से 500 ईपू (भारत में सबसे लंबी निरंतर उत्खनन-अवधि वाला स्थल)
⭐ महत्व (Significance): कोठारी नदी (बनास की सहायक नदी) के तट पर स्थित बागोर भारत का सबसे बड़ा मध्यपाषाणकालीन स्थल है, जो लगभग 10,000 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैला है। इसकी खोज 1967 में हाइडलबर्ग विश्वविद्यालय के डॉ. एल.सी. लेश्निक ने की थी, और मुख्य उत्खनन 1967-68 से 1970 तक वी.एन. मिश्र व डेक्कन कॉलेज, पुणे के सहयोग से हुआ (आगे 1973-77 में भी उत्खनन जारी रहा)। इसे "महासतियों का टीला" व "प्रारंभिक संस्कृति का संग्रहालय" उपनाम भी दिए गए हैं। यहां पशुपालन के प्राचीनतम प्रमाण, बड़ी संख्या में लघु पाषाण उपकरण (Microliths), तथा मृतकों के साथ भोजन व मृदभांड रखने की परंपरा (परलोक में विश्वास का प्रमाण) मिली है। शव उत्तर-दक्षिण दिशा में लिटाए जाते थे। उत्खनन में तीन सांस्कृतिक चरण (मध्यपाषाण, ताम्रपाषाण व लौह युग) मिले हैं — इसीलिए बागोर को भारत में सबसे लंबी निरंतर उत्खनन-अवधि वाला स्थल कहा जाता है। ध्यान रहे: बागोर में नवपाषाण काल के प्रमाण नहीं मिले हैं — मध्यपाषाण के तुरंत बाद सीधे ताम्रपाषाणकालीन साक्ष्य मिलते हैं।

करंट अफेयर्स (Latest Research): वर्ष 2017 में जनार्दन राय नगर राजस्थान विद्यापीठ, उदयपुर के साहित्य संस्थान की टीम द्वारा किए गए नवीनतम उत्खनन में बागोर व आसपास के उप-स्थलों से 5,000 से लेकर लगभग 2,00,000 वर्ष पुराने तक के लघु पाषाण उपकरण (Microliths) मिले हैं — इससे बागोर क्षेत्र में मानव-बसावट की समय-सीमा और भी पीछे तक विस्तारित होने के संकेत मिलते हैं। बागोर में घरेलू कुत्ते (Domestic Dog) के सबसे प्राचीन प्रमाण भी मिले हैं, तथा यह भारत का एकमात्र क्षैतिज रूप से उत्खनित (horizontally excavated) मध्यपाषाणकालीन स्थल है।

📍 तिलवाड़ा (Tilwara) (बालोतरा (बाड़मेर))

⏰ काल (Period): मध्यपाषाण काल, लूनी नदी तट
⭐ महत्व (Significance): लूनी नदी के तट पर स्थित इस स्थल का उत्खनन 1967-68 में वी.एन. मिश्र, विजय कुमार व एल.सी. लेश्निक (हाइडलबर्ग विश्वविद्यालय) के नेतृत्व में हुआ। यहां से पशुपालन के प्राचीनतम साक्ष्यों में से एक मिला है, साथ ही मानव अस्थियों की राख (bone ash), गोलाकार अग्नि-कुंड (Circular Fire Pits) तथा पांच अलग-अलग बसावट-स्थलों (habitation sites) के प्रमाण भी मिले हैं।

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4नवपाषाण काल (Neolithic Age)

"नवपाषाण" (Neolithic) शब्द का प्रयोग सबसे पहले जॉन लुबॉक (John Lubbock) ने किया था। यह पाषाण युग का अंतिम व सबसे क्रांतिकारी चरण है, क्योंकि इसी काल में मनुष्य ने घूमंतू जीवन छोड़कर स्थायी बसावट अपनाई।

A. मुख्य विशेषताएं

💡 शिकारी से किसान बनने की कहानी

सोचिए, पुरापाषाण काल का मनुष्य हर दिन शिकार की तलाश में भटकता था — आज यहां, कल वहां। लेकिन नवपाषाण काल में जब उसने पहली बार गेहूं का बीज ज़मीन में डाला और महीनों बाद फसल पाई, तो उसे एहसास हुआ कि अब भटकने की ज़रूरत नहीं — वह एक ही जगह रहकर अपना भोजन खुद उगा सकता है। यही एक बीज बोने की घटना इंसानी सभ्यता की सबसे बड़ी क्रांतियों में से एक बनी — इसी नींव पर आगे चलकर कालीबंगा, आहड़ जैसी बड़ी सभ्यताएं विकसित हुईं, जिन्हें हम अगले अध्याय में पढ़ेंगे।

5प्रागैतिहासिक समाज एवं संस्कृति (Society & Culture)

A. जीवन-शैली में क्रमिक बदलाव

पुरापाषाण काल का जीवन
  • पूर्णतः शिकारी व घुमंतू (Nomadic) जीवन
  • गुफाओं व खुले आसमान के नीचे निवास
  • बड़े व भारी पत्थर के औज़ार (हस्त-कुल्हाड़)
  • कोई स्थायी बसावट नहीं
  • भोजन-संग्रह पर पूर्ण निर्भरता
नवपाषाण काल का जीवन
  • कृषक व पशुपालक — स्थायी जीवन
  • गांवों में स्थायी घरों में निवास
  • छोटे, पॉलिश किए हुए औज़ार
  • स्थायी ग्रामीण बसावट की शुरुआत
  • भोजन-उत्पादन (खेती) पर निर्भरता

B. धार्मिक विश्वास एवं कला

"एक हस्त-कुल्हाड़ केवल एक पत्थर का टुकड़ा नहीं, बल्कि उस पहले इंसान की सोच का प्रमाण है जिसने प्रकृति को अपने हाथों से आकार देना सीखा।" — प्रागैतिहासिक पुरातत्व का सामान्य सिद्धांत

★ अध्याय सार — महत्वपूर्ण तथ्य ★

1. डीडवाना (नागौर) को "भारत का ओल्डुवाई गॉर्ज" कहा जाता है — यहां तीनों पुरापाषाण चरणों (निम्न, मध्य, उच्च) के प्रमाण मिलते हैं। 2. डीडवाना-जायल क्षेत्र (50 किमी) से एश्यूलियन संस्कृति के 300 से अधिक हस्त-कुल्हाड़ मिले, जो 4-7 लाख वर्ष पुराने हैं। 3. बागोर (भीलवाड़ा) — भारत का सबसे बड़ा व सबसे लंबी अवधि तक उत्खनित मध्यपाषाणकालीन स्थल, कोठारी नदी तट पर स्थित। 4. बागोर की खोज 1967 में डॉ. एल.सी. लेश्निक (हाइडलबर्ग विश्वविद्यालय) ने की; मुख्य उत्खनन वी.एन. मिश्र व डेक्कन कॉलेज पुणे द्वारा। 5. बागोर में मध्यपाषाण, ताम्रपाषाण व लौह-युग — तीन सांस्कृतिक चरण मिले हैं, परंतु नवपाषाण काल के प्रमाण नहीं मिले। 6. तिलवाड़ा (बालोतरा) — लूनी नदी तट पर स्थित, पशुपालन के प्राचीनतम साक्ष्यों में से एक। 7. "मध्यपाषाण काल" शब्द का प्रवर्तक एच.एम. वेस्ट्रोप और "नवपाषाण काल" शब्द का प्रवर्तक जॉन लुबॉक है। 8. निम्न पुरापाषाण काल का प्रमुख औज़ार हस्त-कुल्हाड़ (Hand Axe) है; मध्यपाषाण काल की पहचान लघु पाषाण उपकरण (Microliths) हैं। 9. बागोर में घरेलू कुत्ते (Domestic Dog) के भारत के सबसे प्राचीन साक्ष्यों में से एक मिले हैं। 10. सी.ए. हैकेट (1870) ने जयपुर व इंद्रगढ़ (बूंदी) से हस्त-कुल्हाड़ प्राप्त किए, जो कलकत्ता संग्रहालय में सुरक्षित हैं। 11. ए.सी.एल. कार्लाइल (1871) ने राजस्थान में पुरातात्विक सर्वेक्षण कार्य की शुरुआत की। 12. मध्यपाषाणकालीन मनुष्य पशुपालन केवल मांस के लिए करता था, दूध/घी जैसे डेयरी उत्पादों के लिए नहीं। 13. शैलाश्रय कला (Rock Shelter Art) की शुरुआत मध्यपाषाण काल में हुई थी। 14. नवपाषाणकालीन प्रमुख स्थल वीरातनगर (कोटपूतली-बहरोड़) पुरापाषाण से लेकर ऐतिहासिक काल तक निरंतर बसावट का दुर्लभ उदाहरण है।

नीचे दी समय-रेखा (Timeline) इस अध्याय के सभी महत्वपूर्ण वर्षों को एक साथ जोड़ती है — रिवीजन के लिए इसे ज़रूर दोहराएं:

काल/वर्षघटना/Eventमहत्व
लगभग 7-4 लाख वर्ष पूर्वडीडवाना-जायल क्षेत्र में एश्यूलियन हस्त-कुल्हाड़ों का निर्माणनिम्न पुरापाषाण काल का प्रमाण
लगभग 2 लाख वर्ष पूर्वडीडवाना में मध्य पुरापाषाणकालीन औज़ारमध्य पुरापाषाण काल का प्रमाण
लगभग 30,000-25,000 वर्ष पूर्वडीडवाना में उच्च पुरापाषाणकालीन साक्ष्यउच्च पुरापाषाण काल का प्रमाण
लगभग 5000 ईपूबागोर व तिलवाड़ा में मध्यपाषाणकालीन बसावट प्रारंभमध्यपाषाण काल की शुरुआत
1870सी.ए. हैकेट द्वारा जयपुर व इंद्रगढ़ से हस्त-कुल्हाड़ प्राप्तराजस्थान में पुरापाषाण शोध की शुरुआत
1871ए.सी.एल. कार्लाइल द्वारा दौसा से पाषाण उपकरण व कंकाल प्राप्तव्यवस्थित पुरातात्विक सर्वेक्षण प्रारंभ
1908सेटन कार द्वारा झालावाड़ से पाषाणकालीन औज़ार खोजे गएपुरापाषाण शोध का विस्तार
1953-54ASI व डॉ. वी.एन. मिश्र द्वारा चित्तौड़गढ़ (गंभीरी-बेड़च) से औज़ार प्राप्तआधुनिक वैज्ञानिक उत्खनन पद्धति की शुरुआत
1967डॉ. एल.सी. लेश्निक द्वारा बागोर की खोजभारत के सबसे बड़े मध्यपाषाणकालीन स्थल की पहचान
1967-68तिलवाड़ा का उत्खनन (वी.एन. मिश्र, विजय कुमार, एल.सी. लेश्निक)लूनी नदी तट पर मध्यपाषाणकालीन साक्ष्य
1967-68 से 1970बागोर का मुख्य उत्खनन (वी.एन. मिश्र व डेक्कन कॉलेज, पुणे)तीन सांस्कृतिक चरणों की पहचान
1973-77बागोर में आगे का उत्खनन कार्यअतिरिक्त सांस्कृतिक साक्ष्यों की प्राप्ति
2017जरा विद्यापीठ उदयपुर द्वारा बागोर क्षेत्र में नवीन उत्खननमाइक्रोलिथ्स की समय-सीमा 2,00,000 वर्ष तक विस्तारित
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