Pre-Historic Rajasthan: पुरापाषाण से नवपाषाण काल
कल्पना कीजिए — आज से लगभग 7 लाख साल पहले, जब न कोई शहर था, न कोई भाषा, न कोई लिपि — नागौर के पास डीडवाना की नमक-झील के किनारे एक आदि-मानव पत्थर को पत्थर से टकराकर एक धारदार औज़ार बना रहा था। यही औज़ार आज हमें बताते हैं कि राजस्थान में इंसान की कहानी कोई हज़ार-दो हज़ार साल पुरानी नहीं, बल्कि लाखों साल पुरानी है। इस अध्याय में हम उसी यात्रा को समझेंगे — जब मनुष्य केवल शिकारी था, फिर धीरे-धीरे पशुपालक बना, और अंततः एक जगह बसकर खेती करने वाला किसान बना। यही यात्रा "पाषाण काल" (Stone Age) कहलाती है, और राजस्थान इस यात्रा के हर पड़ाव का जीता- जागता सबूत अपने भीतर समेटे हुए है।
1. पाषाण काल — परिचय एवं वर्गीकरण (Stone Age: Meaning & Classification)
A. वर्गीकरण का आधार ◆ मानव विकास की प्रक्रिया को सरलता से समझने के लिए इतिहासकार दो पैमानों का प्रयोग करते हैं — पहला, मनुष्य के जीवन-यापन के तरीके में बदलाव: शिकारी (Hunter) → पशुपालक (Pastoralist) → कृ षक (Agriculturist); दूसरा, मनुष्य द्वारा उपयोग की गई धातु: पत्थर (Stone) → तांबा (Copper) → कांस्य (Bronze) → लोहा (Iron)। ◆ इसी आधार पर पाषाण काल (Stone Age) को तीन भागों में बांटा गया है — पुरापाषाण काल (Palaeolithic), मध्यपाषाण काल (Mesolithic) और नवपाषाण काल (Neolithic)। ◆ पुरानी पुस्तकों में इन तीनों को क्रमशः पूर्व पाषाण काल, मध्य पाषाण काल और उत्तर पाषाण काल भी कहा गया है — परीक्षा में दोनों तरह के नाम आ सकते हैं। ◆ इसके बाद मनुष्य ने धातुओं का प्रयोग सीखा — ताम्रपाषाण काल (Chalcolithic) व कांस्य युग (Bronze Age) — जिनका विस्तृत अध्ययन अगले अध्याय (अध्याय 3 — कालीबंगा, आहड़, गणेश्वर सभ्यताएं ) में किया जाएगा।
B. राजस्थान में प्रागैतिहासिक शोध की शुरुआत — प्रमुख शोधकर्ता राजस्थान में पाषाणकालीन औज़ारों की खोज का श्रेय कई पीढ़ियों के पुरातत्वविदों को जाता है। नीचे दी तालिका में इस शोध-यात्रा के मील के पत्थर दिए गए हैं:
वर्ष (Year) शोधकर्ता (Researcher) मुख्य कार्य (Key Contribution)
1870 सी.ए. हैके ट जयपुर व इंद्रगढ़ (बूंदी) से हस्त-कु ल्हाड़ (Hand Axe) व क्लीवर प्राप्त किए — वर्तमान में (C.A. Hackett) कलकत्ता संग्रहालय में सुरक्षित
1871 ए.सी.एल. कार्लाइल राजस्थान में पुरातात्विक सर्वेक्षण कार्य प्रारंभ किया; दौसा क्षेत्र से पाषाण उपकरण व मानव (A.C.L. Carlleyle) कं काल अवशेष प्राप्त किए
1908 सेटन कार (Seton Carr) झालावाड़ क्षेत्र से पाषाणकालीन औज़ार खोजे — प्रारंभिक मानव की तकनीकी दक्षता के प्रमाण
1953-54 भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) व चित्तौड़गढ़ की गंभीरी व बेड़च नदियों के तटों से पाषाण उपकरण प्राप्त किए डॉ. वीरेन्द्रनाथ मिश्र
— बी. ऑलचिन (B. Allchin) जालोर क्षेत्र से पुरापाषाणकालीन उपकरणों की खोज का श्रेय
— आर.सी. अग्रवाल, डॉ. विजय भारतीय पुरातत्व विभाग (नई दिल्ली) और डेक्कन कॉलेज, पुणे के साथ मिलकर योजनाबद्ध कु मार, हरिश्चन्द्र मिश्रा (राजस्थान उत्खनन; राजस्थान की पुरापाषाणकालीन सभ्यता के अलग-अलग पक्षों को सामने लाए पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग)
C. इतिहास का काल-विभाजन — प्राक् , आद्य व ऐतिहासिक युग ◆ मोटे तौर पर मानव के पूरे इतिहास को तीन कालों में बाँटा जाता है — (1) प्राक् युग (प्रागैतिहासिक काल), (2) आद्य युग (आद्य-ऐतिहासिक काल) और (3) ऐतिहासिक युग। ◆ प्राक् युग: वह काल जिसकी जानकारी के लिए कोई लिखित साक्ष्य नहीं है, क्योंकि उस समय मनुष्य लिखना नहीं जानता था। भारत में यह सृष्टि के आरम्भ से हड़प्पा सभ्यता से पहले तक का काल माना जाता है। पाषाण काल इसी युग में आता है। ◆ आद्य युग: वह काल जिसके लिखित साक्ष्य तो मिलते हैं, पर वे अस्पष्ट हैं या उनकी लिपि अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है — जैसे हड़प्पा सभ्यता की लिपि। भारत में यह हड़प्पा सभ्यता से 600 ईपू तक का काल माना जाता है। ◆ ऐतिहासिक युग: वह काल जिसके साफ़ और पढ़े जा सकने वाले लिखित साक्ष्य उपलब्ध हैं। भारत में यह 600 ईपू से आज तक चल रहा है।
◆ राजस्थान मानव-सभ्यता का प्राचीन केंद्र क्यों बना? मानव सभ्यता का उदय नदी-घाटियों में हुआ, क्योंकि वहाँ पानी भरपूर था, अपने आप उगने वाले कं द-मूल-फल मिलते थे और घने जंगलों में शिकार के लिए पशु-पक्षी आसानी से मिल जाते थे। विद्वानों के अनुसार आज का मरुस्थली भाग बहुत पहले समुद्र था और सरस्वती व दृषद्वती नदियाँ इसी में आकर गिरती थीं — यह स्थिति मानव-जीवन के लिए बहुत अनुकू ल थी। इसी कारण राजस्थान को मानव-सभ्यता के जन्म के सबसे प्राचीन भू-भागों में से एक होने का गौरव मिला।
2. पुरापाषाण काल (Palaeolithic Age) पुरापाषाण काल पाषाण युग का सबसे लंबा और सबसे प्राचीन चरण है। इस दौर में मनुष्य पूर्णतः शिकारी था — वह न तो खेती जानता था, न पशुपालन। जीवन गुफाओं व खुले आसमान के नीचे, घूमंतू (Nomadic) रूप में बीतता था। अध्ययन की सुविधा के लिए इसे तीन उप-भागों में बांटा गया है — निम्न पुरापाषाण, मध्य पुरापाषाण व उच्च पुरापाषाण काल।
A. औज़ार एवं तकनीक ◆ मुख्य औज़ार: हस्त-कु ल्हाड़ (Hand Axe), चॉपर-चॉपिंग उपकरण, स्क्रे पर-बोरर, छेदक (Perforator), फलक (Blade) एवं बरिन (Burin)। ◆ औज़ार बनाने के लिए क्वार्टजाइट, चर्ट व जैस्पर जैसे कठोर पत्थरों का प्रयोग किया जाता था। ◆ निम्न पुरापाषाण काल के औज़ार आकार में बड़े व भारी होते थे (जैसे हस्त-कु ल्हाड़), जबकि उच्च पुरापाषाण काल तक आते- आते औज़ार छोटे, हल्के व अधिक नुकीले (जैसे फलक व बरिन) होने लगे — यही तकनीकी विकास दर्शाता है कि मनुष्य धीरे- धीरे अधिक कु शल होता गया। ◆ क्वार्टजाइट पत्थर के अनेक उपकरणों से ज्ञात होता है कि आज से लगभग डेढ़-दो लाख वर्ष पहले भी राजस्थान में एक मानव- संस्कृति मौजूद थी (डीडवाना के प्रमाण इससे भी कहीं पुराने हैं)। ◆ प्रसार-क्षेत्र: अजमेर, अलवर, चित्तौड़, भीलवाड़ा, जयपुर, झालावाड़, जालोर, जोधपुर, पाली और टोंक — विशेष रूप से चम्बल, बनास व उनकी सहायक नदियों तथा लूनी नदी के किनारों से पुरापाषाणकालीन उपकरण मिले हैं। ◆ चित्तौड़ और उसके पूर्वी क्षेत्र में इतने अधिक औज़ार मिले हैं कि माना जाता है कि यह क्षेत्र उस काल में औज़ार बनाने का प्रमुख केंद्र (एक तरह का कारखाना) रहा होगा। ◆ जालोर क्षेत्र से इस युग के उपकरणों की खोज का श्रेय बी. ऑलचिन (B. Allchin) को जाता है।
डीडवाना के अलावा राजस्थान में पुरापाषाण काल के कई अन्य महत्वपूर्ण स्थल मिले हैं:
स्थल (Site) जिला (District) मुख्य विशेषता (Key Feature)
बूढ़ा पुष्कर अजमेर पुरापाषाणकालीन औज़ारों का महत्वपूर्ण स्थल, पुष्कर झील क्षेत्र से जुड़ा
इंद्रगढ़ बूंदी 1870 में सी.ए. हैके ट द्वारा हस्त-कु ल्हाड़ व क्लीवर प्राप्त, कलकत्ता संग्रहालय में सुरक्षित
वीरातनगर (बैराठ) कोटपूतली-बहरोड़ पुरापाषाण से लेकर ऐतिहासिक काल (मत्स्य महाजनपद) तक निरंतर बसावट के प्रमाण
गोगा खेड़ा राजसमंद पुरापाषाणकालीन औज़ारों की प्राप्ति का उल्लेखनीय स्थल
3. मध्यपाषाण काल (Mesolithic Age) "मध्यपाषाण काल" (Mesolithic Period) शब्द का प्रयोग सबसे पहले होडर माइकल वेस्ट्रोप (H.M. Westropp) ने किया था। यह पुरापाषाण व नवपाषाण काल के बीच का संक्रमण-काल (Transitional Period) है — यानी वह दौर जब मनुष्य शुद्ध शिकारी से थोड़ा आगे बढ़कर पशुपालन की तरफ कदम बढ़ाने लगा।
A. मुख्य विशेषताएं ◆ मनुष्य अब पूर्णतः शिकारी नहीं रहा — उसने पशुपालन शुरू किया, हालांकि यह पशुपालन केवल मांस के लिए था, दूध या घी जैसे डेयरी उत्पादों के लिए नहीं। ◆ मनुष्य ने स्थायी निवास-स्थान खोजने शुरू किए — नदी तटों, शैलाश्रयों (Rock Shelters) व गुफाओं में बसना शुरू हुआ। ◆ प्रक्षेप्य तकनीक (Projectile Technology) का विकास हुआ — मनुष्य ने तीर, भाला, चाकू व धनुष बनाना सीखा। ◆ लघु पाषाण उपकरण (Microliths) — पत्थर को बारीकी से तराशकर बनाए गए छोटे औज़ार — इस काल की पहचान हैं। ◆ शैलाश्रय कला (Rock Shelter Art) की शुरुआत इसी काल में हुई — मनुष्य ने शिकार, नृत्य व दैनिक जीवन के दृश्य पत्थरों पर उके रने शुरू किए। ◆ प्रमुख क्षेत्र: पश्चिमी राजस्थान में लूनी व उसकी सहायक नदियों की घाटियाँ, चित्तौड़ की बेड़च नदी घाटी (व उसकी सहायक नदियाँ) तथा विराटनगर से मध्यपाषाणकालीन उपकरण भरपूर मात्रा में मिले हैं। ◆ ये छोटे, हल्के और कु शलता से बने औज़ार जैस्पर, एगेट, चर्ट, कार्नेलियन, क्वार्टजाइट और कै ल्सेडोनी जैसे पत्थरों से बनाए जाते थे। ◆ प्रमुख लघु उपकरण: ब्लेड (Blade — पतली धार वाला), एं ग्रेवर (Engraver — खुरचकर निशान बनाने वाला), त्रिभुज (Triangle), अर्धचंद्र (Crescent), समलंब (Trapeze), स्क्रे पर (Scraper — खुरचनी) और पॉइंटर (Pointer — नुकीला)।
🏛️ बागोर (Bagor) खोज 1967 में हाइडलबर्ग विश्वविद्यालय के डॉ. एल.सी. लेश्निक ने की थी, और मुख्य उत्खनन 1967-68 से 1970 तक वी.एन. मिश्र व डेक्कन कॉलेज, पुणे के सहयोग से हुआ (आगे 1973-77 में भी उत्खनन जारी रहा)। इसे "महासतियों का टीला" व "प्रारंभिक संस्कृति का संग्रहालय" उपनाम भी (भीलवाड़ा) दिए गए हैं। यहां पशुपालन के प्राचीनतम प्रमाण, बड़ी संख्या में लघु पाषाण उपकरण (Microliths), तथा मृतकों के साथ भोजन व मृदभांड रखने की परंपरा (परलोक में विश्वास का प्रमाण) मिली है। शव उत्तर-दक्षिण दिशा में लिटाए जाते थे। उत्खनन में तीन सांस्कृ तिक चरण (मध्यपाषाण, ताम्रपाषाण व लौह युग) मिले हैं — इसीलिए बागोर को भारत में सबसे लंबी निरंतर उत्खनन-अवधि वाला स्थल कहा जाता है। ध्यान रहे: बागोर में नवपाषाण काल के प्रमाण नहीं मिले हैं — मध्यपाषाण के तुरंत बाद सीधे ताम्रपाषाणकालीन साक्ष्य मिलते हैं।
करंट अफे यर्स (Latest Research): वर्ष 2017 में जनार्दन राय नगर राजस्थान विद्यापीठ, उदयपुर के साहित्य संस्थान की टीम द्वारा किए गए नवीनतम उत्खनन में बागोर व आसपास के उप-स्थलों से 5,000 से लेकर लगभग 2,00,000 वर्ष पुराने तक के लघु पाषाण उपकरण (Microliths) मिले हैं — इससे बागोर क्षेत्र में मानव-बसावट की समय-सीमा और भी पीछे तक विस्तारित होने के संके त मिलते हैं। बागोर में घरेलू कु त्ते (Domestic Dog) के सबसे प्राचीन प्रमाण भी मिले हैं, तथा यह भारत का एकमात्र क्षैतिज रूप से उत्खनित (horizontally excavated) मध्यपाषाणकालीन स्थल है।
◆ बागोर से तांबे के उपकरण भी मिले हैं, जिनमें छेद वाली सुई सबसे महत्वपूर्ण है। यहाँ के अवशेष लगभग 4000-5000 ईपू के माने जाते हैं, और यहाँ से कृषि व पशुपालन — दोनों के प्राचीनतम साक्ष्य मिले हैं। बड़ी संख्या में माइक्रोलिथ मिलना बताता है कि यहाँ के लोग आखेटक (शिकारी) भी थे।
◆ अन्य महत्वपूर्ण मध्यपाषाणकालीन स्थल: सोजत (पाली), निम्बाहेड़ा (चित्तौड़गढ़) व पंचपदरा (बाड़मेर) — इन स्थलों से भी माइक्रोलिथ्स व मानव-बसावट के प्रमाण मिले हैं।
4. नवपाषाण काल (Neolithic Age) "नवपाषाण" (Neolithic) शब्द का प्रयोग सबसे पहले जॉन लुबॉक (John Lubbock) ने किया था। यह पाषाण युग का अंतिम व सबसे क्रांतिकारी चरण है, क्योंकि इसी काल में मनुष्य ने घूमंतू जीवन छोड़कर स्थायी बसावट अपनाई।
A. मुख्य विशेषताएं ◆ कृषि (Agriculture) की शुरुआत — मनुष्य ने पहली बार बीज बोना व फसल उगाना सीखा। ◆ जंगली पशुओं का पालतूकरण (Domestication of Wild Animals)। ◆ स्थायी ग्रामीण जीवन (Stable Rural Life) की शुरुआत। ◆ मृदभांड निर्माण (Pottery Manufacturing) व कु म्हार के चाक (Potter's Wheel) का प्रयोग शुरू हुआ। ◆ पॉलिश किए हुए (चमकाए हुए) पत्थर के औज़ारों का प्रयोग — मुख्य औज़ार: कु ल्हाड़ी, छेनी, एडज (Adze) व पीसने के उपकरण। ◆ मानवीय मूल्यों का विकास भी इसी काल में माना जाता है — उदारता, नैतिकता, दया जैसे भाव समाज में विकसित होने लगे, क्योंकि अब मनुष्य समूह में स्थायी रूप से रहने लगा था।
◆ प्रमुख स्थल: वीरातनगर (कोटपूतली-बहरोड़), हम्मीरगढ़ (भीलवाड़ा), भरनी (टोंक), सोहनपुरा (सीकर), हरसोरा (अलवर), सांदड़िया (बालोतरा) व अलनिया (कोटा)। ◆ अन्य क्षेत्र: अजमेर, नागौर, सीकर, झुंझुनूं, जयपुर, उदयपुर, चित्तौड़, जोधपुर, कोटा, बूंदी और टोंक से भी नवपाषाणकालीन (उत्तर पाषाणकालीन) उपकरण मिले हैं।
5. प्रागैतिहासिक समाज एवं संस्कृति (Society & Culture)
A. जीवन-शैली में क्रमिक बदलाव
पुरापाषाण काल का जीवन नवपाषाण काल का जीवन
- पूर्णतः शिकारी व घुमंतू (Nomadic) जीवन ◆ कृ षक व पशुपालक — स्थायी जीवन
- गुफाओं व खुले आसमान के नीचे निवास ◆ गांवों में स्थायी घरों में निवास
- बड़े व भारी पत्थर के औज़ार (हस्त-कु ल्हाड़) ◆ छोटे, पॉलिश किए हुए औज़ार
- कोई स्थायी बसावट नहीं ◆ स्थायी ग्रामीण बसावट की शुरुआत
- भोजन-संग्रह पर पूर्ण निर्भरता ◆ भोजन-उत्पादन (खेती) पर निर्भरता
B. धार्मिक विश्वास एवं कला ◆ बागोर में मृतकों के साथ भोजन व मृदभांड रखने की प्रथा यह दर्शाती है कि मध्यपाषाणकालीन मनुष्य मृत्यु के बाद के जीवन (Afterlife) में विश्वास करता था।
◆ शैलाश्रय कला (Rock Shelter Art) की शुरुआत मध्यपाषाण काल में हुई — शिकार के दृश्य, नृत्य व सामूहिक जीवन की झलक इन चित्रों में मिलती है, जो मनुष्य की पहली कलात्मक अभिव्यक्ति मानी जाती है। ◆ बागोर से मिला घरेलू कु त्ते का साक्ष्य दर्शाता है कि मानव-पशु सहअस्तित्व (Man-Animal Coexistence) की शुरुआत भी इसी काल में हो चुकी थी।
"एक हस्त-कु ल्हाड़ केवल एक पत्थर का टुकड़ा नहीं, बल्कि उस पहले इंसान की सोच का प्रमाण है जिसने प्रकृ ति को अपने हाथों से आकार देना सीखा।" — प्रागैतिहासिक पुरातत्व का सामान्य सिद्धांत
★ अध्याय सार — महत्वपूर्ण तथ्य ★
1. डीडवाना (नागौर) को "भारत का ओल्डुवाई गॉर्ज" कहा जाता है — यहां तीनों पुरापाषाण चरणों (निम्न, मध्य, उच्च) के प्रमाण मिलते हैं। 2. डीडवाना-जायल क्षेत्र (50 किमी) से एश्यूलियन संस्कृति के 300 से अधिक हस्त-कु ल्हाड़ मिले, जो 4-7 लाख वर्ष पुराने हैं। 3. बागोर (भीलवाड़ा) — भारत का सबसे बड़ा व सबसे लंबी अवधि तक उत्खनित मध्यपाषाणकालीन स्थल, कोठारी नदी तट पर स्थित। 4. बागोर की खोज 1967 में डॉ. एल.सी. लेश्निक (हाइडलबर्ग विश्वविद्यालय) ने की; मुख्य उत्खनन वी.एन. मिश्र व डेक्कन कॉलेज पुणे द्वारा। 5. बागोर में मध्यपाषाण, ताम्रपाषाण व लौह-युग — तीन सांस्कृ तिक चरण मिले हैं, परंतु नवपाषाण काल के प्रमाण नहीं मिले। 6. तिलवाड़ा (बालोतरा) — लूनी नदी तट पर स्थित, पशुपालन के प्राचीनतम साक्ष्यों में से एक। 7. "मध्यपाषाण काल" शब्द का प्रवर्तक एच.एम. वेस्ट्रोप और "नवपाषाण काल" शब्द का प्रवर्तक जॉन लुबॉक है। 8. निम्न पुरापाषाण काल का प्रमुख औज़ार हस्त-कु ल्हाड़ (Hand Axe) है; मध्यपाषाण काल की पहचान लघु पाषाण उपकरण (Microliths) हैं। 9. बागोर में घरेलू कु त्ते (Domestic Dog) के भारत के सबसे प्राचीन साक्ष्यों में से एक मिले हैं। 10. सी.ए. हैके ट (1870) ने जयपुर व इंद्रगढ़ (बूंदी) से हस्त-कु ल्हाड़ प्राप्त किए, जो कलकत्ता संग्रहालय में सुरक्षित हैं। 11. ए.सी.एल. कार्लाइल (1871) ने राजस्थान में पुरातात्विक सर्वेक्षण कार्य की शुरुआत की। 12. मध्यपाषाणकालीन मनुष्य पशुपालन केवल मांस के लिए करता था, दूध/घी जैसे डेयरी उत्पादों के लिए नहीं। 13. शैलाश्रय कला (Rock Shelter Art) की शुरुआत मध्यपाषाण काल में हुई थी। 14. नवपाषाणकालीन प्रमुख स्थल वीरातनगर (कोटपूतली-बहरोड़) पुरापाषाण से लेकर ऐतिहासिक काल तक निरंतर बसावट का दुर्लभ उदाहरण है।
नीचे दी समय-रेखा (Timeline) इस अध्याय के सभी महत्वपूर्ण वर्षों को एक साथ जोड़ती है — रिवीजन के लिए इसे ज़रूर दोहराएं:
काल/वर्ष घटना/Event महत्व
लगभग 7-4 लाख वर्ष पूर्व डीडवाना-जायल क्षेत्र में एश्यूलियन हस्त-कु ल्हाड़ों का निम्न पुरापाषाण काल का प्रमाण निर्माण
लगभग 2 लाख वर्ष पूर्व डीडवाना में मध्य पुरापाषाणकालीन औज़ार मध्य पुरापाषाण काल का प्रमाण
लगभग 30,000-25,000 डीडवाना में उच्च पुरापाषाणकालीन साक्ष्य उच्च पुरापाषाण काल का प्रमाण वर्ष पूर्व
लगभग 5000 ईपू बागोर व तिलवाड़ा में मध्यपाषाणकालीन बसावट प्रारंभ मध्यपाषाण काल की शुरुआत
600 ईपू भारत में ऐतिहासिक युग की शुरुआत स्पष्ट लिखित साक्ष्यों वाला काल प्रारंभ
1870 सी.ए. हैके ट द्वारा जयपुर व इंद्रगढ़ से हस्त-कु ल्हाड़ प्राप्त राजस्थान में पुरापाषाण शोध की शुरुआत
1871 ए.सी.एल. कार्लाइल द्वारा दौसा से पाषाण उपकरण व व्यवस्थित पुरातात्विक सर्वेक्षण प्रारंभ कं काल प्राप्त
1908 सेटन कार द्वारा झालावाड़ से पाषाणकालीन औज़ार पुरापाषाण शोध का विस्तार खोजे गए
1953-54 ASI व डॉ. वी.एन. मिश्र द्वारा चित्तौड़गढ़ (गंभीरी-बेड़च) आधुनिक वैज्ञानिक उत्खनन पद्धति की शुरुआत से औज़ार प्राप्त
1967 डॉ. एल.सी. लेश्निक द्वारा बागोर की खोज भारत के सबसे बड़े मध्यपाषाणकालीन स्थल की पहचान
1967-68 तिलवाड़ा का उत्खनन (वी.एन. मिश्र, विजय कु मार, लूनी नदी तट पर मध्यपाषाणकालीन साक्ष्य एल.सी. लेश्निक)
1967-68 से 1970 बागोर का मुख्य उत्खनन (वी.एन. मिश्र व डेक्कन तीन सांस्कृ तिक चरणों की पहचान कॉलेज, पुणे)
1973-77 बागोर में आगे का उत्खनन कार्य अतिरिक्त सांस्कृ तिक साक्ष्यों की प्राप्ति
2017 जरा विद्यापीठ उदयपुर द्वारा बागोर क्षेत्र में नवीन उत्खनन माइक्रोलिथ्स की समय-सीमा 2,00,000 वर्ष तक विस्तारित