कल्पना कीजिए — आपके पास कोई टाइम मशीन नहीं है, फिर भी आपको यह बताना है कि आज से 2000 साल पहले चित्तौड़गढ़ में कौन राज करता था, वहाँ के लोग किस भगवान को पूजते थे, और बाज़ार में कैसे सिक्के चलते थे। यह जानकारी कहाँ से आएगी? यहीं पर काम आते हैं "स्रोत" (Sources) — यानी वे सबूत जो अतीत ने हमारे लिए पीछे छोड़े हैं: पत्थर पर खुदे हुए शब्द, ज़मीन में दबे सिक्के, राजाओं के दरबार में लिखी गई कविताएं, और सरकारी दफ्तरों में सहेजे गए पुराने कागज़। एक जासूस जैसे छोटे-छोटे सुरागों (clues) से पूरी कहानी जोड़ता है, वैसे ही इतिहासकार इन स्रोतों से राजस्थान के 5000 साल के इतिहास को जोड़ते हैं। यही अध्याय पूरी किताब की नींव है — क्योंकि आगे के हर अध्याय में जो तथ्य हम पढ़ेंगे, वे इन्हीं स्रोतों से निकले हैं।
A. परिभाषा एवं वर्गीकरण
मान लीजिए बिजौलिया (भीलवाड़ा) में मिला एक शिलालेख बताता है कि वहाँ चौहान वंश का शासन था। अब अगर वहीं से चौहान राजाओं के सिक्के भी मिल जाएं, और किसी पुरानी किताब (जैसे पृथ्वीराज रासो) में भी उसी वंश का ज़िक्र मिले — तो तीनों अलग-अलग तरह के सबूत (अभिलेख + सिक्का + साहित्य) मिलकर एक ही सच्चाई की पुष्टि करते हैं। इतिहासकार इसी तरह काम करते हैं।
पुरातात्विक स्रोतों में वे सभी भौतिक वस्तुएं आती हैं जो ज़मीन खोदने (उत्खनन) या पुराने स्थलों की जांच से मिलती हैं — जैसे अभिलेख, सिक्के, मूर्तियां, भवन अवशेष और मिट्टी के बर्तन। ये सबसे विश्वसनीय स्रोत माने जाते हैं क्योंकि ये किसी लेखक की राय पर निर्भर नहीं होते, सीधे उसी काल से आते हैं।
A. अभिलेख (Inscriptions/Shilalekh)
चित्तौड़गढ़ के नगरी गाँव में मिला यह अभिलेख आज से लगभग 2200 साल पुराना है। संस्कृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में लिखे इस लेख में गजवंश के राजा सर्वतात द्वारा अश्वमेध यज्ञ करने और वासुदेव (भगवान विष्णु) की पूजा का उल्लेख है। यह भारत में वैष्णव सम्प्रदाय का सबसे प्राचीन प्रमाण है, इसलिए यह हर परीक्षा में बार-बार पूछा जाता है। इसे सबसे पहले डॉ. डी.आर. भंडारकर ने पढ़ा था, और आज यह उदयपुर संग्रहालय में सुरक्षित है।
नीचे दी तालिका में राजस्थान के प्रमुख अभिलेख उनके स्थान, काल, भाषा-लिपि और महत्व सहित दिए गए हैं — रिवीजन के लिए यह तालिका सबसे उपयोगी है:
| अभिलेख (Inscription) | स्थान (Place) | काल (Period) | भाषा/लिपि | महत्व (Key Points) |
|---|---|---|---|---|
| बड़ली का शिलालेख | बड़ली, भिनाय (अजमेर) | 443 ईपू | ब्राह्मी लिपि | राजस्थान का सबसे प्राचीन अभिलेख; जैन धर्म के प्रसार का उल्लेख; वीर निर्वाण संवत् 84 |
| घोसुण्डी/हाथीबाड़ा अभिलेख | नगरी, चित्तौड़गढ़ | द्वितीय शताब्दी ईपू | संस्कृत, ब्राह्मी | वैष्णव सम्प्रदाय का सबसे प्राचीन प्रमाण; अश्वमेध यज्ञ का उल्लेख; डॉ. भंडारकर द्वारा पठित |
| बरनाला यूप-स्तम्भ लेख | बरनाला, गंगापुर सिटी | 227 ई. | संस्कृत | वैष्णव सम्प्रदाय की उपस्थिति; आमेर संग्रहालय में सुरक्षित |
| नांदसा यूप-स्तम्भ लेख | नांदसा, सहाड़ा (भीलवाड़ा) | 225 ई. | संस्कृत | क्षत्रियों द्वारा षष्ठिरात्र यज्ञ; तालाब सूखने पर ही पढ़ा जा सकता है |
| बड़वा यूप-स्तम्भ लेख | बड़वा, अंता (बारां) | 238-239 ई. | संस्कृत | मौखरी वंश के शासकों की जानकारी; 5 यूप स्तम्भों में से 3 पर लेख |
| गंगधार का शिलालेख | गंगधार, झालावाड़ | 423 ई. | संस्कृत | मंत्री मयूराक्ष द्वारा विष्णु मंदिर निर्माण; तांत्रिक मातृगृह व सामंत व्यवस्था का उल्लेख |
| भ्रमर माता का लेख | छोटी सादड़ी, प्रतापगढ़ | 490 ई. | संस्कृत | गौर व औलिकर वंश की जानकारी; रचयिता ब्रह्मसोम |
| मानमोरी/शंकरघट्टा शिलालेख | पूठोली/चित्तौड़गढ़ | 713 ई. | संस्कृत | राजा मानभंग द्वारा सूर्य मंदिर निर्माण; कर्नल जेम्स टॉड द्वारा पठित; मौर्य-राजस्थान संबंध का प्रमाण |
| कणसवा का लेख | कणसवा, कोटा | 738 ई. | संस्कृत | मौर्यवंशी राजा धवल का नाम; राजस्थान में मौर्यवंश का अंतिम प्रमाण |
| बुचकला का अभिलेख | बुचकला, बिलाड़ा (जोधपुर) | 815 ई. | संस्कृत | प्रतिहार शासक नागभट्ट द्वितीय के शासनकाल का उल्लेख |
| घटियाला शिलालेख | घटियाला, जोधपुर | 861 ई. | प्राकृत व संस्कृत | प्रतिहार नरेश कक्कुक की वंशावली; सती-प्रथा का प्राचीनतम प्रमाणों में से एक |
| ग्वालियर प्रशस्ति | ग्वालियर | लगभग 880 ई. | संस्कृत, उत्तरी ब्राह्मी | मिहिरभोज प्रथम की देन; गुर्जर-प्रतिहार वंशावली व उपलब्धियों का वर्णन |
| हर्षनाथ मंदिर प्रशस्ति | रेवासा, सीकर | 973/975 ई. | संस्कृत | चौहान शासक विग्रहराज व सामंत अल्लट का उल्लेख; पाशुपत सम्प्रदाय |
| किराडू लेख | किराडू, बाड़मेर | 1161 ई. | संस्कृत | परमारों की उत्पत्ति वशिष्ठ ऋषि के आबू-यज्ञ से बताई गई |
| बिजौलिया का लेख | बिजौलिया, भीलवाड़ा | 1170 ई. | संस्कृत | चौहान वंशावली (सांभर से पृथ्वीराज तृतीय तक); वासुदेव चौहान द्वारा सांभर झील निर्माण का उल्लेख |
| चीरवा का शिलालेख | चीरवा, उदयपुर | 1273 ई. | संस्कृत, देवनागरी | मेवाड़ के गुहिलवंशीय शासकों (जैत्रसिंह, तेजसिंह, समरसिंह) का उल्लेख; सती-प्रथा |
| कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति | चित्तौड़गढ़ दुर्ग | 1460 ई. | संस्कृत, देवनागरी | महाराणा कुम्भा की उपाधियाँ (हिन्दू सुरताण आदि) व रचित ग्रंथों का उल्लेख; रचयिता कवि अत्रि व महेश भट्ट |
| रणकपुर प्रशस्ति | रणकपुर, पाली | 1439 ई. | संस्कृत, देवनागरी | बप्पा रावल से महाराणा कुम्भा तक के शासकों की उपलब्धियां |
| एकलिंग प्रशस्ति | उदयपुर | 1488 ई. | संस्कृत | बप्पा रावल के संन्यास लेने का उल्लेख; गुहिल वंश परिचय |
| आबू/लूणवसही प्रशस्ति | देलवाड़ा, सिरोही | 1230 ई. | संस्कृत | तेजपाल द्वारा नेमिनाथ मंदिर निर्माण; परमार व वास्तुपाल-तेजपाल वंश का वर्णन |
| रायसिंह प्रशस्ति | बीकानेर दुर्ग | 1594 ई. | संस्कृत | राव बीका से रायसिंह तक बीकानेर शासकों की जानकारी; रचयिता जैता |
| जगन्नाथ राय प्रशस्ति | जगन्नाथ मंदिर, उदयपुर | 1652 ई. | संस्कृत | बप्पा रावल से महाराणा जगतसिंह तक; हल्दीघाटी युद्ध का वर्णन |
| राज प्रशस्ति | राजसमन्द झील | 1676 ई. | संस्कृत | 25 पाषाणों पर 24 सर्ग उत्कीर्ण; विश्व की सबसे बड़ी प्रशस्ति; रचयिता रणछोड़ भट्ट; महाराणा राजसिंह की उपलब्धियां |
| आमेर का लेख | आमेर, जयपुर | 1612 ई. | संस्कृत | कछवाहा वंश को "रघुवंश तिलक" कहा गया; कछवाहा इतिहास का वर्णन |
ध्यान रहे: राज प्रशस्ति (राजसमन्द) को विश्व की सबसे बड़ी प्रशस्ति कहा जाता है और यह हर परीक्षा में बहुत बार पूछी जाती है — इसका स्थान (राजसमन्द झील की पाल), रचयिता (रणछोड़ भट्ट) और वर्ष (1676 ई.) याद रखें।
B. उत्खनन स्थल (Excavation Sites) — संक्षिप्त परिचय
उत्खनन (खुदाई) से प्राप्त पुरास्थल राजस्थान के प्राचीनतम इतिहास का सबसे मज़बूत आधार हैं। यहाँ केवल एक संक्षिप्त परिचय दिया जा रहा है — इनका पूर्ण विस्तृत अध्ययन अध्याय 2 (प्रागैतिहासिक राजस्थान) और अध्याय 3 (ताम्रपाषाण एवं कांस्य युग सभ्यताएं) में किया जाएगा।
C. मूर्तिकला एवं भवन अवशेष (Sculptures & Architectural Remains)
अभिलेखागार स्रोत वे सरकारी व प्रशासनिक दस्तावेज़ हैं जो राजाओं, रियासतों और ब्रिटिश शासन के समय के आदेशों, पत्राचार और लेखा-जोखा को सहेजे हुए हैं। ये मध्यकालीन प्रशासन, राजस्व-व्यवस्था और समाज को समझने का सबसे बड़ा खज़ाना हैं।
A. राजस्थान राज्य अभिलेखागार, बीकानेर (Rajasthan State Archives)
करंट अफेयर्स (Latest): राजस्थान राज्य अभिलेखागार की वेबसाइट के माध्यम से अब तक बीकानेर रियासत के लगभग 12 लाख, जयपुर रियासत के लगभग 11 लाख और जोधपुर रियासत के लगभग 7.5 लाख ऐतिहासिक दस्तावेज़ ("अभिलेख") ऑनलाइन उपलब्ध कराए जा चुके हैं — यह भारत के सबसे बड़े डिजिटलीकृत अभिलेख-संग्रहों में से एक है।
B. राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान (RORI), जोधपुर
C. ताम्रपत्र (Copper Plates) — प्रमुख उदाहरण
ताम्रपत्र तांबे की पतली चादरों पर लिखे गए प्राचीन दस्तावेज़ हैं, जिनका प्रयोग मुख्यतः राजकीय आदेश, भूमि-दान और धार्मिक अनुदानों को दर्ज करने के लिए होता था। ये अभिलेखों जितने ही प्रामाणिक माने जाते हैं।
| ताम्रपत्र (Copper Plate) | वर्ष | शासक/संबंध | मुख्य विषय |
|---|---|---|---|
| धुलेव दान पत्र | 679 ई. | राजा भेटी | राजस्थान का प्राचीनतम ताम्रपत्र; धार्मिक भूमि-दान व संवत् व्यवस्था का प्रमाण |
| माथनदेव ताम्रपत्र | 959 ई. | माथनदेव | मंदिर हेतु भूमि-दान; सामंती व्यवस्था में भूमि-अनुदान की प्रथा |
| ब्रौंच गुर्जर ताम्रपत्र | 978 ई. | गुर्जर वंश | गुर्जर वंश विस्तार व राजपूतों की उत्पत्ति पर बहस का स्रोत |
| आहड़ ताम्रपत्र | 1206 ई. | भीमदेव द्वितीय (सोलंकी) | सोलंकी वंशावली; राजस्थान-गुजरात राजनीतिक संबंधों का प्रमाण |
| खेरोदा ताम्रपत्र | 1437 ई. | महाराणा कुम्भा | 400 टंका की धार्मिक दान-राशि का उल्लेख |
| परसोली ताम्रपत्र | 1473 ई. | — | कृषि भूमि के प्रकार (पीवाल, गोर्मो, माल, मगरा) की जानकारी |
| चिकली ताम्रपत्र | 1483 ई. | — | किसानों से वसूली जाने वाली विविध लागतें (टैक्स) का वर्णन |
| पुर का ताम्रपत्र | 1535 ई. | महाराणा विक्रमादित्य | चित्तौड़ के द्वितीय साके व रानी कर्मावती के जौहर का उल्लेख |
| ढोल ताम्रपत्र | 1574 ई. | महाराणा प्रताप | सैन्य चौकी हेतु भूमि-अनुदान; प्रशासनिक-सैन्य संगठन का प्रमाण |
| पिपली ताम्रपत्र | 1576 ई. | महाराणा प्रताप | हल्दीघाटी युद्ध के बाद पुनर्वास व राहत-कार्य का उल्लेख |
| बेदवास ताम्रपत्र | 1559 ई. (सं. 1616) | — | उदयपुर की स्थापना का प्रथम उल्लेख |
| राज प्रशस्ति से पूर्व का परानपुर अनुदान | 1676 ई. | प्रतापसिंह | धार्मिक शिक्षा व प्रशासनिक वर्ग की जानकारी |
साहित्यिक स्रोतों में वे ग्रंथ, कविताएं और चारण-भाट परंपरा की रचनाएं आती हैं जिनमें राजाओं की वीरता, वंशावली और तत्कालीन समाज का वर्णन मिलता है। ये स्रोत कहानी के रूप में होने से रोचक हैं, पर इनमें कवि की कल्पना (अतिशयोक्ति) भी मिल सकती है — इसलिए इन्हें अभिलेखों व सिक्कों से मिलाकर परखा जाता है।
A. ख्यात साहित्य (Khyat Literature)
B. रास साहित्य (Raas Literature)
C. चारण साहित्य (Charan Literature)
| ग्रंथ (Text) | लेखक (Author) | विषय (Subject) |
|---|---|---|
| पृथ्वीराज रासो | चंदबरदाई | पृथ्वीराज चौहान तृतीय की वीरता व शौर्य का विस्तृत वर्णन |
| बीसलदेव रासो | नरपति नाल्ह | चौहान शासक विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) के शासनकाल का वर्णन |
| खुमाण रासो | दलपत विजय | हल्दीघाटी युद्ध, प्रताप-शक्तिसिंह भेंट व मेवाड़-मुगल संबंधों का वर्णन |
| हम्मीर रासो / हम्मीर काव्य | — | रणथंभौर के शासक हम्मीरदेव चौहान की वीरता व बलिदान का वर्णन |
| कान्हड़दे प्रबंध | पद्मनाभ | जालौर के शासक कान्हड़देव व अलाउद्दीन खिलजी के युद्ध का वर्णन |
| अचलदास खींची री वचनिका | गदन शिवदास | मांडू के सुल्तान होशंगशाह व राजा अचलदास खींची के युद्ध व जौहर का वर्णन |
| वंश भास्कर | सूर्यमल मिश्रण | बूंदी सहित राजस्थान व भारत के इतिहास का विस्तृत, चम्पू-शैली में वर्णन |
| वीर सतसई | सूर्यमल मिश्रण | ब्रिटिश शासन के विरुद्ध निष्क्रिय राजपूत शासकों को जगाने हेतु रचित काव्य |
| मारवाड़ रा परगना री विगत | मुहणोत नैणसी | 17वीं सदी में मारवाड़ की राजनीतिक, भौगोलिक व आर्थिक स्थिति का विवरण |
| राजप्रकाश | किशोरदास | मेवाड़ वंश की उत्पत्ति, हल्दीघाटी युद्ध व मेवाड़-मुगल संधि (1615 ई.) का वर्णन |
| बुद्धिविलास | बख्तराम शाह | जयपुर की स्थापना (1727 ई.) व नगर-योजना की जानकारी |
| राजविनोद | सदाशिव भट्ट | बीकानेर के शासक राव कल्याणमल के शासनकाल का वर्णन |
D. जैन साहित्य (Jain Literature)
E. संत साहित्य (Saint Literature)
F. फारसी एवं अन्य स्रोत (Persian & Other Sources)
सोचिए, अगर आप सिर्फ पृथ्वीराज रासो पढ़ें तो तराइन के युद्धों की कहानी एकतरफा (राजपूत नज़रिए से) मिलेगी। लेकिन अगर आप तारीख-ए-फिरोजशाही जैसे फारसी स्रोत भी साथ पढ़ें, तो सल्तनत पक्ष की जानकारी भी मिलेगी। इतिहासकार दोनों तरफ के स्रोतों को मिलाकर ही सही तस्वीर बनाते हैं — यही "cross-referencing" कहलाता है।
सिक्कों के अध्ययन को "मुद्राशास्त्र" (Numismatics) कहा जाता है। सिक्के केवल लेन-देन का माध्यम नहीं, बल्कि किसी काल की राजनीतिक, धार्मिक व आर्थिक स्थिति के प्रबल प्रमाण भी होते हैं — सिक्कों पर अंकित राजा का नाम, चिह्न व भाषा से उस वंश, धर्म और शासन-व्यवस्था की जानकारी मिलती है।
A. सिक्कों का ऐतिहासिक विकास
B. प्रमुख रियासतों के सिक्के
राजस्थान की हर रियासत के अपने अलग नाम वाले सिक्के प्रचलित थे — नीचे प्रमुख रियासतों व उनके सिक्कों के नाम दिए गए हैं:
| रियासत (State) | प्रमुख सिक्के (Major Coins) |
|---|---|
| मेवाड़ | ढींगला, भिलाड़ी, चांदौड़ी, चित्तौड़ी, स्वरूपशाही, त्रिशूलिया, एलची (मुगल सिक्का), गधिया (तांबा) |
| जोधपुर (मारवाड़) | विजयशाही, भीमशाही, गजशाही, गधिया, फदिया, ढब्बूशाही (तांबा), मोहर (स्वर्ण) |
| जयपुर (आमेर) | झाड़शाही, मुहम्मदशाही, हाली, रासकपुरी — स्थापना 1728 ई. में सवाई जयसिंह द्वितीय द्वारा; टकसाल चिह्न: छह-शाखा वृक्ष |
| बीकानेर | गंगाशाही (विक्टोरिया की छवि सहित), गजशाही, आलमशाही (मुगलिया) |
| जैसलमेर | अखैशाही, मुहम्मदशाही, डोडिया/डोलिया (तांबा) |
| अलवर | रावशाही, अखैशाही टकसाल (राजगढ़) |
| धौलपुर | तमंचाशाही (पिस्तौल के चिह्न सहित); सिक्का प्रचलन 1804 ई. से |
| करौली | माणकशाही, कटार-झाड़शाही |
| कोटा | झालिमशाही, लक्ष्मणशाही, गुमानशाही, मदनशाही, हाली |
| बूंदी | रामशाही, ग्यारहसना, कटारशाही, चेहरेशाही |
| डूंगरपुर | त्रिशूलिया, पंत्रीसिरिया, चित्तौड़ी, सालिमशाही, उदयशाही |
| बांसवाड़ा व झालावाड़ | सालिमशाही, लक्ष्मणशाही, मदनशाही |
| प्रतापगढ़ व किशनगढ़ | आलमशाही, नया-सालिमशाही, शाहआलमशाही |
रोचक तथ्य: जयपुर रियासत ऐसी पहली रियासत थी जिसे मुगलों ने अपनी स्वतंत्र टकसाल (सिक्के बनाने का कारखाना) स्थापित करने की अनुमति दी थी। सलूम्बर (मेवाड़ की एकमात्र जागीर जिसे सिक्के ढालने का अधिकार मिला) भी परीक्षा में पूछा जाने वाला महत्वपूर्ण तथ्य है।
C. प्रमुख सिक्का-भंडार खोजें (Major Coin Hoards)
पेरिस को दुनिया में फैशन और खूबसूरत चीज़ों के लिए जाना जाता है। टोंक जिले के रैढ़ नामक छोटे से स्थान से जब पुरातत्वविदों को एक ही जगह से 3075 प्राचीन सिक्के मिले — जो भारत में अब तक का सबसे बड़ा सिक्का-भंडार है — तो इतिहासकारों ने चुटकी में इसे "सिक्कों की दुनिया का पेरिस" कह दिया। यही वजह है कि रैढ़ का नाम राजस्थान इतिहास की परीक्षाओं में बार-बार आता है।
"सिक्के इतिहास के वे मूक गवाह हैं जो कभी झूठ नहीं बोलते — क्योंकि इन पर अंकित हर चिह्न उसी काल की छाप है, जिस काल में वे ढाले गए थे।" — मुद्राशास्त्र का सामान्य सिद्धांत
1. घोसुण्डी शिलालेख (चित्तौड़गढ़, द्वितीय शताब्दी ईपू) — भारत में वैष्णव सम्प्रदाय का सबसे प्राचीन प्रमाण। 2. बड़ली का शिलालेख (443 ईपू) — राजस्थान का सबसे प्राचीन अभिलेख। 3. राज प्रशस्ति (राजसमन्द, 1676 ई.) — विश्व की सबसे बड़ी प्रशस्ति, रचयिता रणछोड़ भट्ट, 25 पाषाणों पर 24 सर्ग। 4. कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति (चित्तौड़गढ़, 1460 ई.) — महाराणा कुम्भा की उपाधियों व रचित ग्रंथों का उल्लेख। 5. बिजौलिया लेख (भीलवाड़ा, 1170 ई.) — चौहान वंशावली का प्रमुख स्रोत, दिगंबर जैन श्रावक लोलक द्वारा स्थापित। 6. राजस्थान राज्य अभिलेखागार की स्थापना 1955 (जयपुर), 1960 में बीकानेर स्थानांतरित — देश का पहला ई-अभिलेखागार। 7. दयालदास री ख्यात — राजस्थान की अंतिम ख्यात मानी जाती है। 8. पृथ्वीराज रासो के रचयिता चंदबरदाई हैं — पृथ्वीराज चौहान तृतीय के दरबारी कवि। 9. डिंगल भाषा — पश्चिमी राजस्थान, चारण कवियों की वीर-रस प्रधान शैली; पिंगल भाषा — पूर्वी राजस्थान, भाट कवियों की वंशावली-प्रधान शैली। 10. तारीख-ए-अलाई व तारीख-ए-फिरोजशाही — दिल्ली सल्तनत कालीन फारसी स्रोत, राजस्थान पर सल्तनत आक्रमणों का विवरण। 11. आहत (पंचमार्क) सिक्कों को 1835 में जेम्स प्रिंसेप ने नाम दिया; इनके पहले साक्ष्य राजस्थान में मिले। 12. रैढ़ (टोंक) — 3075 चांदी के आहत सिक्कों का भंडार, भारत में एकल स्थल से सबसे बड़ा — "भारत का पेरिस"। 13. बयाना (भरतपुर) — गुप्तकालीन स्वर्ण सिक्कों का भंडार (लगभग 1800 सिक्के), अधिकांश चंद्रगुप्त द्वितीय के। 14. जयपुर रियासत — मुगलों से स्वतंत्र टकसाल स्थापित करने की अनुमति पाने वाली राजपूताने की पहली रियासत। 15. सलूम्बर (मेवाड़) — सिक्के ढालने का अधिकार पाने वाली मेवाड़ की एकमात्र जागीर। 16. कणसवा का लेख (कोटा, 738 ई.) — राजस्थान में मौर्यवंश का अंतिम प्रमाण माना जाता है। 17. राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान (RORI), जोधपुर — संस्कृत-प्राकृत हस्तलिखित पांडुलिपियों का प्रमुख संग्रहालय।
नीचे दी समय-रेखा (Timeline) इस अध्याय के सभी महत्वपूर्ण वर्षों को एक साथ जोड़ती है — रिवीजन के लिए इसे ज़रूर दोहराएं:
| वर्ष (Year) | घटना/Event | महत्व |
|---|---|---|
| 443 ईपू | बड़ली का शिलालेख उत्कीर्ण हुआ | राजस्थान का सबसे प्राचीन अभिलेख |
| द्वितीय शताब्दी ईपू | घोसुण्डी शिलालेख | वैष्णव सम्प्रदाय का सबसे प्राचीन प्रमाण |
| 600-200 ईपू | आहत (पंचमार्क) सिक्कों का प्रचलन काल | राजस्थान में सर्वप्रथम साक्ष्य |
| 713 ई. | मानमोरी/शंकरघट्टा शिलालेख | कर्नल टॉड द्वारा पठित, मौर्य संबंध का प्रमाण |
| 738 ई. | कणसवा का लेख | राजस्थान में मौर्यवंश का अंतिम प्रमाण |
| 861 ई. | घटियाला शिलालेख | सती-प्रथा का प्राचीनतम प्रमाणों में से एक |
| 1170 ई. | बिजौलिया का लेख | चौहान वंशावली का प्रमुख स्रोत |
| 1460 ई. | कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति | महाराणा कुम्भा की उपाधियां व ग्रंथ |
| 1676 ई. | राज प्रशस्ति | विश्व की सबसे बड़ी प्रशस्ति |
| 1835 | जेम्स प्रिंसेप ने "आहत सिक्का" नाम दिया | मुद्राशास्त्र अध्ययन की नींव |
| 1893 | विलियम विल्फ्रेड की पुस्तक प्रकाशित | राजपूताना रियासतों की मुद्राओं पर प्रामाणिक ग्रंथ |
| 1955 | राजस्थान राज्य अभिलेखागार की स्थापना (जयपुर) | अभिलेखागार स्रोतों का केंद्रीय संग्रहण प्रारंभ |
| 1958 | राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर की स्थापना | साहित्यिक स्रोतों के संरक्षण व मीरा पुरस्कार |
| 1960 | अभिलेखागार बीकानेर स्थानांतरित | वर्तमान मुख्यालय की स्थापना |
| 1983 | राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर | सूर्यमल मीसण पुरस्कार व "जगती जोत" पत्रिका |
| 2003 | राजस्थान विधानसभा द्वारा 8वीं अनुसूची हेतु प्रस्ताव पारित | राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता की मांग |