Sources of Rajasthan History | पुरातात्विक, अभिलेखीय, साहित्यिक स्रोत एवं मुद्राशास्त्र
कल्पना कीजिए — आपके पास कोई टाइम मशीन नहीं है, फिर भी आपको यह बताना है कि आज से 2000 साल पहले चित्तौड़गढ़ में कौन राज करता था, वहाँ के लोग किस भगवान को पूजते थे, और बाज़ार में कैसे सिक्के चलते थे। यह जानकारी कहाँ से आएगी? यहीं पर काम आते हैं "स्रोत" (Sources) — यानी वे सबूत जो अतीत ने हमारे लिए पीछे छोड़े हैं: पत्थर पर खुदे हुए शब्द, ज़मीन में दबे सिक्के , राजाओं के दरबार में लिखी गई कविताएं , और सरकारी दफ्तरों में सहेजे गए पुराने कागज़। एक जासूस जैसे छोटे-छोटे सुरागों (clues) से पूरी कहानी जोड़ता है, वैसे ही इतिहासकार इन स्रोतों से राजस्थान के 5000 साल के इतिहास को जोड़ते हैं। यही अध्याय पूरी किताब की नींव है — क्योंकि आगे के हर अध्याय में जो तथ्य हम पढ़ेंगे, वे इन्हीं स्रोतों से निकले हैं।
1. स्रोत क्या हैं और क्यों ज़रूरी हैं (Meaning & Importance of Sources)
A. परिभाषा एवं वर्गीकरण ◆ स्रोत (Sources) वे सामग्री, दस्तावेज़, वस्तुएं और अभिलेख हैं जिनके आधार पर इतिहासकार अतीत की घटनाओं, जीवन, संस्कृति और समाज को समझते हैं। ◆ राजस्थान इतिहास के स्रोतों को मुख्यतः चार भागों में बांटा जाता है — पुरातात्विक स्रोत, अभिलेखागार स्रोत, साहित्यिक स्रोत तथा मुद्राशास्त्र (सिक्के )। ◆ इनमें से पुरातात्विक स्रोत (जैसे अभिलेख) सबसे प्रामाणिक (authentic) माने जाते हैं क्योंकि इन्हें बदला नहीं जा सकता — जो पत्थर पर एक बार खुद गया, वह वैसा ही रहता है। ◆ साहित्यिक स्रोत (जैसे रासो ग्रंथ) रोचक कहानी तो देते हैं, पर इनमें अतिशयोक्ति (exaggeration) की संभावना रहती है — इसलिए इन्हें अन्य स्रोतों से मिलाकर (cross-check करके ) ही सही माना जाता है।
राजाओं के सिक्के भी मिल जाएं , और किसी पुरानी किताब (जैसे पृथ्वीराज रासो) में भी उसी वंश का ज़िक्र मिले — तो तीनों अलग- अलग तरह के सबूत (अभिलेख + सिक्का + साहित्य) मिलकर एक ही सच्चाई की पुष्टि करते हैं। इतिहासकार इसी तरह काम करते हैं।
2. पुरातात्विक स्रोत (Archaeological Sources) पुरातात्विक स्रोतों में वे सभी भौतिक वस्तुएं आती हैं जो ज़मीन खोदने (उत्खनन) या पुराने स्थलों की जांच से मिलती हैं — जैसे अभिलेख, सिक्के , मूर्तियाँ, भवन अवशेष और मिट्टी के बर्तन। ये सबसे विश्वसनीय स्रोत माने जाते हैं क्योंकि ये किसी लेखक की राय पर निर्भर नहीं होते, सीधे उसी काल से आते हैं।
A. अभिलेख (Inscriptions/Shilalekh) ◆ अभिलेख वे लेख हैं जो पत्थर, धातु, लकड़ी या मिट्टी जैसी ठोस सतह पर खोदकर (उत्कीर्ण करके ) लिखे जाते हैं। ◆ ये स्थायी होते हैं, आसानी से मिटते नहीं — इसलिए तिथि, नाम, स्थान और घटना की जानकारी के लिए सर्वाधिक प्रामाणिक स्रोत माने जाते हैं। ◆ अभिलेखों में मुख्यतः राजाओं की उपलब्धियां, वंशावली, युद्ध, मंदिर-निर्माण, भूमि-दान और प्रशासनिक आदेशों का उल्लेख मिलता है। ◆ राजस्थान का सबसे प्राचीन अभिलेख "बड़ली का शिलालेख" (443 ईपू) माना जाता है, जबकि सबसे प्राचीन वैष्णव धर्म का प्रमाण "घोसुण्डी शिलालेख" (द्वितीय शताब्दी ईपू) देता है। ◆ जैन शिलालेख: नाडौल, आमेर, धुलेव, रणकपुर, आबू और सिरोही जैसे स्थानों से जैन तीर्थंकरों की मूर्तियाँ और जैन धर्म के प्रचार से जुड़े अनेक शिलालेख मिले हैं। इनसे पता चलता है कि राजस्थान में जैन धर्म कितना फै ला हुआ था। ◆ यूप-स्तम्भ लेख: 'यूप' पत्थर का वह खंभा है जो यज्ञ के समय गाड़ा जाता था। तीसरी सदी के नांदसा (भीलवाड़ा) यूप-स्तम्भ तथा कोटा व जयपुर क्षेत्र के अन्य यूप-स्तम्भों से पता चलता है कि उस समय राजस्थान में वैदिक यज्ञों का खूब प्रचलन था। ◆ वंशों की उत्पत्ति व बसावट के प्रमाण: जोधपुर के शिलालेखों से प्रमाणित होता है कि छठी शताब्दी के दूसरे चरण तक प्रतिहार मारवाड़ में बस चुके थे। इसी तरह राठौड़ वंश की उत्पत्ति के बारे में अलग-अलग ताम्रपत्रों, शिलालेखों और पुरानी पुस्तकों में अलग-अलग मत मिलते हैं — यानी एक ही विषय पर कई स्रोतों को मिलाकर पढ़ना ज़रूरी है। ◆ प्राचीन स्थान-नाम भी शिलालेखों से ही पता चलते हैं — जैसे प्राचीन शिलालेखों में जालौर का नाम 'जाबालिपुर' और उसके किले का नाम 'सुवर्णगिरि' मिलता है, जिसे अपभ्रंश (बोलचाल की भाषा) में 'सोनगढ़' कहा गया। (विस्तार: अध्याय 7)
नीचे दी तालिका में राजस्थान के प्रमुख अभिलेख उनके स्थान, काल, भाषा-लिपि और महत्व सहित दिए गए हैं — रिवीजन के लिए यह तालिका सबसे उपयोगी है:
अभिलेख स्थान (Place) काल भाषा/लिपि महत्व (Key Points)
(Inscription) (Period)
बड़ली का शिलालेख बड़ली, भिनाय 443 ईपू ब्राह्मी लिपि राजस्थान का सबसे प्राचीन अभिलेख; जैन धर्म के (अजमेर) प्रसार का उल्लेख; वीर निर्वाण संवत् 84
भाब्रू (बैराठ) शिलालेख बीजक डूंगरी, बैराठ तीसरी शताब्दी प्राकृ त, ब्राह्मी सम्राट अशोक का लेख; कै प्टन बर्ट द्वारा खोजा गया;
(विराटनगर) ईपू (मौर्यकाल) अशोक के बौद्ध धर्म का अनुयायी होने का सबसे पक्का
प्रमाणघोसुण्डी/हाथीबाड़ा नगरी, चित्तौड़गढ़ द्वितीय शताब्दी संस्कृत, ब्राह्मी वैष्णव सम्प्रदाय का सबसे प्राचीन प्रमाण; अश्वमेध यज्ञ अभिलेख ईपू का उल्लेख; डॉ. भंडारकर द्वारा पठित
बरनाला यूप-स्तम्भ लेख बरनाला, गंगापुर 227 ई. संस्कृत वैष्णव सम्प्रदाय की उपस्थिति; आमेर संग्रहालय में सिटी सुरक्षित
नांदसा यूप-स्तम्भ लेख नांदसा, सहाड़ा 225 ई. संस्कृत क्षत्रियों द्वारा षष्ठिरात्र यज्ञ; तालाब सूखने पर ही पढ़ा जा (भीलवाड़ा) सकता है
बड़वा यूप-स्तम्भ लेख बड़वा, अंता (बारां) 238-239 ई. संस्कृत मौखरी वंश के शासकों की जानकारी; 5 यूप स्तम्भों में से 3 पर लेख
गंगधार का शिलालेख गंगधार, झालावाड़ 423 ई. संस्कृत मंत्री मयूराक्ष द्वारा विष्णु मंदिर निर्माण; तांत्रिक मातृगृह व सामंत व्यवस्था का उल्लेख
भ्रमर माता का लेख छोटी सादड़ी, 490 ई. संस्कृत गौर व औलिकर वंश की जानकारी; रचयिता ब्रह्मसोम प्रतापगढ़
मानमोरी/शंकरघट्टा पूठोली/चित्तौड़गढ़ 713 ई. संस्कृत राजा मानभंग द्वारा सूर्य मंदिर निर्माण; कर्नल जेम्स टॉड शिलालेख द्वारा पठित; मौर्य-राजस्थान संबंध का प्रमाण; चित्तौड़ के पास मानसरोवर तालाब से मिला (वि.सं. 770) — इसमें माहेश्वर, भीम, भोज और मान, इन चार राजाओं के नाम क्रम से दिए गए हैं
कणसवा का लेख कणसवा, कोटा 738 ई. संस्कृत मौर्यवंशी राजा धवल का नाम; राजस्थान में मौर्यवंश का
अंतिम प्रमाण; कोटा के निकट कणसवा (कसुंआ) के
शिवालय से मिला (वि.सं. 795)बुचकला का अभिलेख बुचकला, बिलाड़ा 815 ई. संस्कृत प्रतिहार शासक नागभट्ट द्वितीय के शासनकाल का (जोधपुर) उल्लेख
घटियाला शिलालेख घटियाला, जोधपुर 861 ई. प्राकृ त व संस्कृत प्रतिहार नरेश कक्कु क की वंशावली; सती-प्रथा का प्राचीनतम प्रमाणों में से एक
ग्वालियर प्रशस्ति ग्वालियर लगभग 880 ई. संस्कृत, उत्तरी मिहिरभोज प्रथम की देन; गुर्जर-प्रतिहार वंशावली व ब्राह्मी उपलब्धियों का वर्णन; वंश-प्रवर्तक नागभट्ट को 'म्लेच्छों का नाशक' कहा गया
राजोर अभिलेख राजोरगढ़ (अलवर) 960 ई. संस्कृत प्रतिहारों के सामंत मथनदेव का लेख; इसमें प्रतिहारों
को 'गुर्जर' कहा गया — इसी आधार पर डॉ. डी.आर.
भंडारकर ने प्रतिहार, परमार, चालुक्य व चौहान को
गुर्जर मानाहर्षनाथ मंदिर प्रशस्ति रेवासा, सीकर 973/975 ई. संस्कृत चौहान शासक विग्रहराज व सामंत अल्लट का उल्लेख; पाशुपत सम्प्रदाय
किराडू लेख किराडू, बाड़मेर 1161 ई. संस्कृत परमारों की उत्पत्ति वशिष्ठ ऋषि के आबू-यज्ञ से बताई गई
बिजौलिया का लेख बिजौलिया, 1170 ई. संस्कृत चौहान वंशावली (सांभर से पृथ्वीराज तृतीय तक); भीलवाड़ा वासुदेव चौहान द्वारा सांभर झील निर्माण का उल्लेख; चौहानों को वत्सगोत्रीय ब्राह्मण बताया गया — इसी आधार पर डॉ. भंडारकर ने चौहानों की ब्राह्मणों से उत्पत्ति मानी
चीरवा का शिलालेख चीरवा, उदयपुर 1273 ई. संस्कृत, देवनागरी मेवाड़ के गुहिलवंशीय शासकों (जैत्रसिंह, तेजसिंह, समरसिंह) का उल्लेख; सती-प्रथा
कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति चित्तौड़गढ़ दुर्ग 1460 ई. संस्कृत, देवनागरी महाराणा कुम्भा की उपाधियाँ (हिन्दू सुरताण आदि) व
रचित ग्रंथों का उल्लेख; रचयिता कवि अत्रि व महेश
भट्ट; कुम्भा के अन्य विरुद — महाराजाधिराज,
रावराय, दानगुरु, राजगुरु, परमगुरु, हालगुरु,
अभिनवभरताचार्य; राणा हम्मीर को 'विषमघाटी
पंचानन' (कठिन आक्रमणों में सिंह के समान) कहा
गयारणकपुर प्रशस्ति रणकपुर, पाली 1439 ई. संस्कृत, देवनागरी बप्पा रावल से महाराणा कुम्भा तक के शासकों की उपलब्धियां
एकलिंग प्रशस्ति उदयपुर 1488 ई. संस्कृत बप्पा रावल के संन्यास लेने का उल्लेख; गुहिल वंश परिचय
आबू/लूणवसही प्रशस्ति देलवाड़ा, सिरोही 1230 ई. संस्कृत तेजपाल द्वारा नेमिनाथ मंदिर निर्माण; परमार व वास्तुपाल-तेजपाल वंश का वर्णन
रायसिंह प्रशस्ति बीकानेर दुर्ग 1594 ई. संस्कृत राव बीका से रायसिंह तक बीकानेर शासकों की जानकारी; रचयिता जैता
जगन्नाथ राय प्रशस्ति जगन्नाथ मंदिर, 1652 ई. संस्कृत बप्पा रावल से महाराणा जगतसिंह तक; हल्दीघाटी उदयपुर युद्ध का वर्णन
राज प्रशस्ति राजसमन्द झील 1676 ई. संस्कृत 25 पाषाणों पर 24 सर्ग उत्कीर्ण; विश्व की सबसे बड़ी प्रशस्ति; रचयिता रणछोड़ भट्ट; महाराणा राजसिंह की उपलब्धियां; गोमती नदी का पानी रोककर (अकाल- राहत हेतु) बनी राजसमंद झील के उत्तरी किनारे 'नौचौकी' पर 25 काले संगमरमर की शिलाओं पर खुदी; इसके अनुसार बप्पा रावल ने 734 ई. में मानमोरी को हराकर चित्तौड़ पर अधिकार किया
आमेर का लेख आमेर, जयपुर 1612 ई. संस्कृत कछवाहा वंश को "रघुवंश तिलक" कहा गया; कछवाहा इतिहास का वर्णन
ध्यान रहे: राज प्रशस्ति (राजसमन्द) को विश्व की सबसे बड़ी प्रशस्ति कहा जाता है और यह हर परीक्षा में बहुत बार पूछी जाती है — इसका स्थान (राजसमन्द झील की पाल), रचयिता (रणछोड़ भट्ट) और वर्ष (1676 ई.) याद रखें।
B. उत्खनन स्थल (Excavation Sites) — संक्षिप्त परिचय
उत्खनन (खुदाई) से प्राप्त पुरास्थल राजस्थान के प्राचीनतम इतिहास का सबसे मज़बूत आधार हैं। यहाँ केवल एक संक्षिप्त परिचय दिया जा रहा है — इनका पूर्ण विस्तृत अध्ययन अध्याय 2 (प्रागैतिहासिक राजस्थान) और अध्याय 3 (ताम्रपाषाण एवं कांस्य युग सभ्यताएं ) में किया जाएगा। ◆ कालीबंगा (हनुमानगढ़): घग्घर नदी तट पर स्थित, सैंधव सभ्यता का प्रमुख स्थल — "जुते खेत" व अग्निवेदियों के लिए प्रसिद्ध। (विस्तार: अध्याय 3) ◆ आहड़ (उदयपुर): ताम्रपाषाणकालीन सभ्यता, "ताम्बवती" नाम से प्रसिद्ध। (विस्तार: अध्याय 3) ◆ गणेश्वर (सीकर): ताम्रयुगीन सभ्यताओं की जननी कही जाती है। (विस्तार: अध्याय 3) ◆ बैराठ (जयपुर): मौर्यकालीन स्थल, अशोक के अभिलेख व यूनानी सिक्कों के लिए प्रसिद्ध। (विस्तार: अध्याय 4) ◆ ओझियाना (भीलवाड़ा), गिलुण्ड (राजसमंद), बालाथल (उदयपुर): आहड़ सभ्यता से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण स्थल। (विस्तार: अध्याय 3)
C. मूर्तिकला एवं भवन अवशेष (Sculptures & Architectural Remains) ◆ कु षाण शासकों ने राजस्थान की मूर्ति-कला को नया मोड़ दिया — इस काल की प्रमुख मूर्तियाँ: अजमेर के नाद की शिव प्रतिमा, सांभर का स्त्री-धड़ अश्व, तथा अजामुख हयग्रीव/अग्नि की मूर्ति। ◆ मंदिर व भवन अवशेष (जैसे नागदा, ओसियां, आबू के मंदिर) वास्तुकला के साथ-साथ उस काल की धार्मिक व सामाजिक स्थिति की जानकारी भी देते हैं — इनका विस्तृत अध्ययन संबंधित राजवंश-अध्यायों में किया जाएगा।
3. अभिलेखागार स्रोत (Archival Sources) अभिलेखागार स्रोत वे सरकारी व प्रशासनिक दस्तावेज़ हैं जो राजाओं, रियासतों और ब्रिटिश शासन के समय के आदेशों, पत्राचार और लेखा-जोखा को सहेजे हुए हैं। ये मध्यकालीन प्रशासन, राजस्व-व्यवस्था और समाज को समझने का सबसे बड़ा खज़ाना हैं।
A. राजस्थान राज्य अभिलेखागार, बीकानेर (Rajasthan State Archives) ◆ स्थापना: वर्ष 1955 में जयपुर में हुई थी; वर्ष 1960 में इसे बीकानेर स्थानांतरित कर दिया गया। ◆ यह देश का पहला "ई-अभिलेखागार" (e-Archive) है — यहाँ के लाखों दस्तावेज़ ऑनलाइन डिजिटाइज़ किए जा चुके हैं। ◆ इसकी शाखाएं जयपुर, अलवर, अजमेर, उदयपुर, कोटा और भरतपुर में स्थित हैं। ◆ यहाँ मुगलकालीन व मध्यकालीन दस्तावेज़ जैसे फरमान, निशान, मंसूर, पट्टा, परवाना, रुक्का और बहियां (लेखा-पंजियां) सुरक्षित हैं — ये मध्यकालीन प्रशासन व राजस्व-व्यवस्था (अध्याय 11) समझने के मुख्य आधार हैं। ◆ इन दस्तावेज़ों के साथ-साथ यहाँ अर्जियाँ (प्रजा द्वारा शासक को दिए गए प्रार्थना-पत्र) भी सुरक्षित हैं, जिनसे आम लोगों की समस्याओं और शिकायतों का पता चलता है। ◆ जनानी ड्योढ़ी तहरीर: अभिलेखागार में इस नाम से एक अलग संग्रह है, जिसमें रनिवास (जनानी ड्योढ़ी) से जुड़े दस्तावेज़ हैं। इससे पता चलता है कि राजपरिवार से जुड़ी महिलाएँ सांस्कृ तिक मूल्यों के साथ-साथ सैन्य शिक्षा भी लेती थीं। ◆ पुराने राजस्थान की शिक्षा-व्यवस्था (हिन्दुओं की पाठशाला-चटशाला, जैनों के उपासरे आदि) की जानकारी भी अभिलेखागार की सामग्री और प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान की पांडुलिपियों के अध्ययन से ही मिलती है।
करंट अफे यर्स (Latest): राजस्थान राज्य अभिलेखागार की वेबसाइट के माध्यम से अब तक बीकानेर रियासत के लगभग 12 लाख, जयपुर रियासत के लगभग 11 लाख और जोधपुर रियासत के लगभग 7.5 लाख ऐतिहासिक दस्तावेज़
("अभिलेख") ऑनलाइन उपलब्ध कराए जा चुके हैं — यह भारत के सबसे बड़े डिजिटलीकृ त अभिलेख-संग्रहों में से एक है।
B. राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान (RORI), जोधपुर ◆ यह संस्थान संस्कृत, प्राकृ त व राजस्थानी भाषा की दुर्लभ हस्तलिखित पांडुलिपियों (Manuscripts) का बड़ा संग्रह-स्थल है। ◆ यहाँ धार्मिक ग्रंथ, ज्योतिष, आयुर्वेद व साहित्य से जुड़ी हज़ारों प्राचीन पांडुलिपियां सुरक्षित हैं, जो साहित्यिक स्रोतों की मूल प्रतियां उपलब्ध कराती हैं। ◆ इसकी स्थापना 1955 ई. में जोधपुर में हुई। यहाँ संस्कृत, प्राकृ त, अपभ्रंश और पाली भाषाओं में लिखी वेद, धर्मशास्त्र, पुराण, दर्शन, ज्योतिष, गणित, आयुर्वेद, व्याकरण और तंत्र-मंत्र से जुड़ी पांडुलिपियों का संरक्षण किया जाता है।
C. ताम्रपत्र (Copper Plates) — प्रमुख उदाहरण ताम्रपत्र तांबे की पतली चादरों पर लिखे गए प्राचीन दस्तावेज़ हैं, जिनका प्रयोग मुख्यतः राजकीय आदेश, भूमि-दान और धार्मिक अनुदानों को दर्ज करने के लिए होता था। ये अभिलेखों जितने ही प्रामाणिक माने जाते हैं।
ताम्रपत्र (Copper
वर्ष शासक/संबंध मुख्य विषय
Plate)धुलेव दान पत्र 679 ई. राजा भेटी राजस्थान का प्राचीनतम ताम्रपत्र; धार्मिक भूमि-दान व संवत् व्यवस्था का प्रमाण
माथनदेव ताम्रपत्र 959 ई. माथनदेव मंदिर हेतु भूमि-दान; सामंती व्यवस्था में भूमि-अनुदान की प्रथा
ब्रौंच गुर्जर ताम्रपत्र 978 ई. गुर्जर वंश गुर्जर वंश विस्तार व राजपूतों की उत्पत्ति पर बहस का स्रोत
आहड़ ताम्रपत्र 1206 ई. भीमदेव द्वितीय (सोलंकी) सोलंकी वंशावली; राजस्थान-गुजरात राजनीतिक संबंधों का प्रमाण
खेरोदा ताम्रपत्र 1437 ई. महाराणा कुम्भा 400 टंका की धार्मिक दान-राशि का उल्लेख
परसोली ताम्रपत्र 1473 ई. — कृषि भूमि के प्रकार (पीवाल, गोर्मो, माल, मगरा) की जानकारी
चिकली ताम्रपत्र 1483 ई. — किसानों से वसूली जाने वाली विविध लागतें (टैक्स) का वर्णन
पुर का ताम्रपत्र 1535 ई. महाराणा विक्रमादित्य चित्तौड़ के द्वितीय साके व रानी कर्मावती के जौहर का उल्लेख
ढोल ताम्रपत्र 1574 ई. महाराणा प्रताप सैन्य चौकी हेतु भूमि-अनुदान; प्रशासनिक-सैन्य संगठन का प्रमाण
पिपली ताम्रपत्र 1576 ई. महाराणा प्रताप हल्दीघाटी युद्ध के बाद पुनर्वास व राहत-कार्य का उल्लेख
बेदवास ताम्रपत्र 1559 ई. (सं. — उदयपुर की स्थापना का प्रथम उल्लेख 1616)
राज प्रशस्ति से पूर्व का 1676 ई. प्रतापसिंह धार्मिक शिक्षा व प्रशासनिक वर्ग की जानकारी परानपुर अनुदान
D. स्रोतों को सहेजने वाली अन्य संस्थाएँ ◆ पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग (स्थापना 1950 ई.): यह विभाग राज्य की पुरा-सम्पदा (पुराने स्मारक, मूर्तियाँ, पुरास्थल) की खोज, सर्वेक्षण, प्रचार और संरक्षण का काम करता है। दुर्गों, स्मारकों, हवेलियों, देवालयों और महलों का रासायनिक उपचार (Chemical Treatment) भी यही विभाग करता है। इसकी पत्रिका का नाम 'रिसर्चर' (Researcher) है। ◆ अरबी-फारसी शोध संस्थान, टोंक: यह अरबी और फारसी भाषा की दुर्लभ पुस्तकों व पांडुलिपियों को सहेजता है — मुगलकालीन फारसी स्रोतों को पढ़ने-समझने के लिए यह संस्थान बहुत उपयोगी है। ◆ राजस्थान साहित्य अकादमी (उदयपुर), राजस्थान संस्कृत अकादमी (जयपुर) और लोक संस्कृति शोध संस्थान (चूरू) भी राजस्थान की साहित्यिक विरासत को सहेजने का काम करती हैं। ◆ पूर्व राजा-महाराजा भी अपने फाउंडेशन और ट्रस्ट के माध्यम से अपनी निजी विरासत (महल, पुस्तकालय, पुराने दस्तावेज़ व संग्रह) को सुरक्षित रख रहे हैं।
4. साहित्यिक स्रोत (Literary Sources) साहित्यिक स्रोतों में वे ग्रंथ, कविताएं और चारण-भाट परंपरा की रचनाएं आती हैं जिनमें राजाओं की वीरता, वंशावली और तत्कालीन समाज का वर्णन मिलता है। ये स्रोत कहानी के रूप में होने से रोचक हैं, पर इनमें कवि की कल्पना (अतिशयोक्ति) भी मिल सकती है — इसलिए इन्हें अभिलेखों व सिक्कों से मिलाकर परखा जाता है। ◆ रचनाकारों के आधार पर राजस्थानी साहित्य को चार भागों में बाँटा जाता है — (1) चारण साहित्य, (2) जैन साहित्य, (3) संत साहित्य और (4) लोक साहित्य। ◆ लिखने के रूप (विधा) के आधार पर इसके दो भाग हैं — पद्य साहित्य (दूहा, सोरठा, गीत, कु ण्डलियाँ, छंद, छप्पय आदि) और गद्य साहित्य (वात, वचनिका, ख्यात, दवावैत, वंशावली, पट्टावली, पीढ़ियावली, दफ्तर, विगत और हकीकत आदि)।
A. ख्यात साहित्य (Khyat Literature) ◆ "ख्यात" शब्द का अर्थ है "प्रसिद्ध विवरण" या "इतिहास" — यह प्रमुख व्यक्तियों व घटनाओं का जीवनी-संग्रह है। ◆ ख्यातें राजस्थान के राजवंशों, युद्धों और लोक-कथाओं का वर्णन करती हैं, इसलिए इन्हें इतिहास व संस्कृति का प्रामाणिक साहित्यिक स्रोत माना जाता है। ◆ प्रमुख ख्यातें: बांकीदास री ख्यात, उदयभान चांपावत री ख्यात, जोधपुर राज्य री ख्यात, मारवाड़ री ख्यात, तथा दयालदास री ख्यात (जिसे राजस्थान की अंतिम ख्यात कहा जाता है)।
B. रास साहित्य (Raas Literature)
◆ रास साहित्य राजस्थानी भाषा का एक प्राचीन व विशिष्ट रूप है, जिसमें नृत्य, संगीत और नाट्य — तीनों कलाओं का मिश्रण मिलता है। ◆ इस विधा में जैन कवियों का विशेष योगदान रहा है — रिपुदारण रास (लगभग 905 ई., भीनमाल), भरतेश्वर बाहुबली रास (1150 ई., ब्रजसेन सूरि), बाहुबली रास (1184 ई., शालिभद्र सूरि) तथा वृद्ध नवकार रास (13वीं सदी, जिनवल्लभ सूरि) प्रमुख रचनाएं हैं।
C. चारण साहित्य (Charan Literature) ◆ चारण कवियों ने वीर रस, त्याग, बलिदान और देशभक्ति की भावना से भरपूर साहित्य रचा — यह राजपूत दरबारों की वीर- गाथा परंपरा है। ◆ डिंगल भाषा (पश्चिमी राजस्थान, चारण कवियों की) में वीर रस प्रधान काव्य रचे गए, जबकि पिंगल भाषा (पूर्वी राजस्थान, भाट कवियों की) में वंशावली व इतिहास-प्रधान काव्य रचे गए। ◆ चारण साहित्य राजस्थानी भाषा का सबसे समृद्ध साहित्य है और वीर रस से भरा हुआ है। यह प्रबंध काव्य, गीत, दोहे, सोरठे , कु ण्डलियाँ, छप्पय और सवैये जैसे छंदों में मिलता है। इसकी प्रमुख रचनाएँ हैं — अचलदास खींची री वचनिका, पृथ्वीराज रासो, सूरज प्रकाश, वंश भास्कर और बांकीदास ग्रंथावली।
ग्रंथ (Text) लेखक (Author) विषय (Subject)
पृथ्वीराज रासो चंदबरदाई पृथ्वीराज चौहान तृतीय की वीरता व शौर्य का विस्तृत वर्णन
बीसलदेव रासो नरपति नाल्ह चौहान शासक विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) के शासनकाल का वर्णन
खुमाण रासो दलपत विजय हल्दीघाटी युद्ध, प्रताप-शक्तिसिंह भेंट व मेवाड़-मुगल संबंधों का वर्णन
हम्मीर रासो / हम्मीर काव्य — रणथंभौर के शासक हम्मीरदेव चौहान की वीरता व बलिदान का वर्णन
कान्हड़दे प्रबंध पद्मनाभ जालौर के शासक कान्हड़देव व अलाउद्दीन खिलजी के युद्ध का वर्णन
अचलदास खींची री वचनिका गदन शिवदास मांडू के सुल्तान होशंगशाह व राजा अचलदास खींची के युद्ध व जौहर का वर्णन
वंश भास्कर सूर्यमल मिश्रण बूंदी सहित राजस्थान व भारत के इतिहास का विस्तृत, चम्पू-शैली में वर्णन
वीर सतसई सूर्यमल मिश्रण ब्रिटिश शासन के विरुद्ध निष्क्रिय राजपूत शासकों को जगाने हेतु रचित काव्य
मारवाड़ रा परगना री विगत मुहणोत नैणसी 17वीं सदी में मारवाड़ की राजनीतिक, भौगोलिक व आर्थिक स्थिति का विवरण
राजप्रकाश किशोरदास मेवाड़ वंश की उत्पत्ति, हल्दीघाटी युद्ध व मेवाड़-मुगल संधि (1615 ई.) का वर्णन
बुद्धिविलास बख्तराम शाह जयपुर की स्थापना (1727 ई.) व नगर-योजना की जानकारी
राजविनोद सदाशिव भट्ट बीकानेर के शासक राव कल्याणमल के शासनकाल का वर्णन
हमीरायण भांडउ व्यास रणथंभौर के शासक हम्मीरदेव चौहान की वीरता का वर्णन
हाला झाला री कु ण्डलियाँ ईसरदास हाला और झाला सरदारों के बीच हुए युद्ध का वीर-रस से भरा वर्णन
अजीतसिंह चरित हरिदास भाट मारवाड़ के महाराजा अजीतसिंह का जीवन-चरित
सूरज प्रकाश करणीदान कविया जोधपुर के महाराजा अभयसिंह की वीरता व उपलब्धियों का वर्णन
वीर विनोद कविराज श्यामलदास मेवाड़ का विशाल इतिहास-ग्रंथ; इसमें 2 जुलाई 1877 को उदयपुर में बनी 'देश हितैषिणी
सभा' का भी उल्लेख है (श्यामलदास स्वयं इसके सदस्य थे)
◆ कुछ अन्य ग्रंथ और उनके रचनाकार: उदयराम बारहठ — अवधान माला (डिंगल शब्दकोश); कविराज मुरारिदास — डिंगल कोश; दुरसा आढ़ा (अकबर के समकालीन; प्रताप व राव चन्द्रसेन के देश-प्रेम का यशोगान) — विरुद छहत्तरी (सबसे प्रसिद्ध), किरतार बावनी, वीरमदेव सोलंकी रा दूहा; दयालदास (जन्म कु ड़िया गाँव, बीकानेर) — दयालदास री ख्यात (बीकानेर रै राठौड़ां री ख्यात: राठौड़ों की उत्पत्ति से महाराजा सरदारसिंह के राज्यारोहण तक; फरमान-निशान के राजस्थानी अनुवाद व बीकानेर की प्रशासनिक व्यवस्था के लिए उपयोगी); बांकीदास — बांकीदास री ख्यात; पद्मनाभ — कान्हड़दे प्रबंध; दलपत विजय — खुमाण रासो; नरपति नाल्ह — बीसलदेव रासो।
D. जैन साहित्य (Jain Literature) ◆ प्रबंध चिंतामणि (आचार्य मेरुतुंग): चौहान शासक पृथ्वीराज के प्रशासन की जानकारी देता है। ◆ मुहणोत नैणसी री ख्यात: मारवाड़ के इतिहासकार मुहणोत नैणसी द्वारा रचित, राजस्थान के इतिहास-लेखन का एक स्तंभ ग्रंथ माना जाता है। ◆ कु वलयमाला (उद्योतन सूरि): जैन साहित्य की प्रसिद्ध रचना, तत्कालीन समाज व संस्कृति पर प्रकाश डालती है। ◆ प्राचीनतम राजस्थानी जैन ग्रंथों में वज्रसेन सूरि कृ त 'भरतेश्वर बाहुबलि घोर' और शालिभद्र सूरि कृ त 'भरतेश्वर बाहुबलि रास' गिने जाते हैं। बाद में बुद्धि रास, जंबूस्वामी चरित, आबू रास, स्थूलिभद्र रास, रेवंतगिरि रास, जीवदया रास और चंदनबाला रास की रचना हुई; कवि धर्म ने 'जम्बूस्वामी रास' लिखा। ◆ जैन साहित्य वह साहित्य है जो जैन मुनियों (साधुओं) ने लिखा। जैन मुनि उपासरों में रहकर ग्रंथ लिखते और उनकी प्रतियाँ बनाते थे, इसलिए राजस्थान के जैन भंडारों में बहुत पुरानी पांडुलिपियाँ सुरक्षित मिलती हैं।
E. संत साहित्य (Saint Literature) ◆ संत परंपरा ने भक्ति व समता के भाव से राजस्थानी साहित्य को समृद्ध किया — मीराबाई की पदावली में प्रेम, भक्ति व समर्पण की भावना प्रमुख है। ◆ दादू के शिष्य रज्जब की रचनाएं (वाणी व सर्वांगी) भी संत साहित्य की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। ◆ भक्ति आंदोलन के समय दादूपंथी और रामस्नेही संतों ने बहुत साहित्य रचा। नाभादास ने वैष्णव भक्तों के जीवन-चरित लिखे। महाकवि वृंद के दोहे, पृथ्वीराज राठौड़ (पीथल) की 'वेलि क्रिसन रुकमणी री', सुन्दर कुं वरी के 'राम रहस्य' पद तथा सुन्दरदास और जांभोजी की रचनाएँ भी इसी साहित्य की महत्वपूर्ण कड़ियाँ हैं।
F. फारसी एवं अन्य स्रोत (Persian & Other Sources) ◆ तारीख-ए-अलाई एवं तारीख-ए-फिरोजशाही: दिल्ली सल्तनत काल के फारसी इतिहास-ग्रंथ, जिनमें राजस्थान पर सल्तनत आक्रमणों (जैसे रणथंभौर व चित्तौड़ पर आक्रमण) का वर्णन मिलता है — ये मुस्लिम-दृष्टिकोण से लिखे गए समकालीन विवरण हैं, इसलिए इतिहासकार इन्हें राजपूत स्रोतों से मिलाकर पढ़ते हैं।
को मिलाकर ही सही तस्वीर बनाते हैं — यही "cross-referencing" कहलाता है।
G. लोक साहित्य (Folk Literature) ◆ लोक साहित्य वह साहित्य है जो आम जनता के बीच पीढ़ी-दर-पीढ़ी मुँह-ज़बानी (मौखिक रूप से) चलता आया है। इसमें लोकगीत, लोकगाथाएँ , लोकनाट्य, पहेलियाँ, प्रेम-कथाएँ और फड़ शामिल हैं। ◆ तीज-त्योहार, विवाह, जन्म, देव-पूजन और मेलों पर गाए जाने वाले अधिकतर गीत लोक साहित्य का हिस्सा हैं। ◆ फड़: कपड़े पर लोक देवता का चित्र बनाकर उसके सहारे ऐतिहासिक व पौराणिक कथा सुनाने को 'फड़' कहते हैं — जैसे देवनारायण जी की फड़ और पाबूजी की फड़। लोकगाथाएँ और फड़ लोक-नायकों की याद को ज़िंदा रखती हैं, इसलिए इतिहासकार इन्हें इतिहास के 'लोक-पक्ष' को जानने का स्रोत मानते हैं।
H. आधुनिक इतिहासकार एवं इतिहास-लेखन (Modern Historians) ख्यातों और रासो ग्रंथों के बाद 19वीं-20वीं सदी में राजस्थान का इतिहास आधुनिक ढंग से — यानी शिलालेखों, सिक्कों और दस्तावेज़ों के प्रमाणों के साथ — लिखा जाने लगा। इन इतिहासकारों के नाम और मत परीक्षा में बार-बार पूछे जाते हैं: ◆ जॉर्ज थॉमस (George Thomas): ऐसा माना जाता है कि 1800 ई. में सबसे पहले इन्होंने इस प्रदेश के लिए 'राजपूताना' शब्द का प्रयोग किया। ◆ कर्नल जेम्स टॉड (James Tod): 1829 ई. में अपनी पुस्तक 'एनल्स एण्ड एण्टीक्विटीज़ ऑफ राजस्थान' (Annals and Antiquities of Rajasthan) में इस प्रदेश को 'रायथान' या 'राजस्थान' नाम दिया। टॉड ने राजपूतों को शक और सीथियन (विदेशी) जातियों का वंशज बताया, वीर दुर्गादास राठौड़ को 'राठौड़ों का यूलीसीज़' (Ulysses) कहा और बाड़ोली (चित्तौड़गढ़) के मंदिरों से लोगों का परिचय सबसे पहले कराया। मानमोरी शिलालेख भी इन्हें ही मिला था। टॉड की पुस्तक के संपादक विलियम क्रु क (William Crooke) ने भी राजपूतों के विदेशी मूल वाले मत का समर्थन किया। ◆ गौरीशंकर हीराचन्द ओझा (जन्म 1863 ई., रोहिड़ा, सिरोही): प्राचीन लिपियों के अच्छे जानकार; इन्होंने 'भारतीय प्राचीन लिपिमाला' ग्रंथ लिखा और अंग्रेज़ों ने इन्हें 'महामहोपाध्याय' व 'रायबहादुर' की उपाधि दी। इन्होंने राजपूतों को प्राचीन सूर्यवंशी व चन्द्रवंशी क्षत्रियों का वंशज माना और टॉड के विदेशी-मूल वाले मत का खंडन किया; गुहिलों को भी विशुद्ध सूर्यवंशी बताया। राजपूतों की उत्पत्ति पर ओझा का मत ही सबसे अधिक मान्य है। ओझा, सी.वी. वैद्य, दशरथ शर्मा और ईश्वरी प्रसाद ने 'अग्निकुं ड से उत्पत्ति' वाली कथा को निराधार बताया। (विस्तार: अध्याय 5) ◆ डॉ. डी.आर. भंडारकर (D.R. Bhandarkar): राजोर अभिलेख के आधार पर राजपूतों को गुर्जर माना और बिजौलिया शिलालेख के आधार पर चौहानों को वत्सगोत्रीय ब्राह्मणों से तथा गुहिलों को नागर ब्राह्मणों से उत्पन्न बताया। ◆ डॉ. दशरथ शर्मा: चौहानों की उत्पत्ति ब्राह्मण वंश से मानी। ◆ कविराज श्यामलदास (जन्म 1836 ई., धोंकलिया, भीलवाड़ा): मेवाड़ के महाराणा शम्भूसिंह और सज्जनसिंह के दरबारी कवि। महाराणा शम्भूसिंह के आदेश पर मेवाड़ का इतिहास लिखना शुरू किया, जो 'वीर विनोद' ग्रंथ में संकलित है। ब्रिटिश सरकार ने इन्हें 'के सर-ए-हिंद' और महाराणा ने 'कविराजा' की उपाधि दी। मुंशी देवीप्रसाद: बीकानेर के रायसिंह को 'राजपूताने का कर्ण' कहा। ◆ बीसवीं सदी के आरम्भ में गौरीशंकर हीराचन्द ओझा, मुंशी देवीप्रसाद और चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी' — इन तीन विद्वानों की 'त्रयी' बहुत सक्रिय थी। इसी दौर में पुराने ग्रंथों के शोध और संपादन में मुनि जिनविजय ने बहुत महत्वपूर्ण काम किया।
टॉड = 'विदेशी' मत (शक-सीथियन); ओझा = 'देशी' मत (सूर्यवंशी-चन्द्रवंशी क्षत्रिय); भंडारकर = 'गुर्जर' व 'ब्राह्मण' मत (राजोर + बिजौलिया लेख)। जैसे अदालत में तीन वकील एक ही मामले पर अलग-अलग दलील देते हैं, वैसे ही ये तीनों इतिहासकार राजपूतों की उत्पत्ति पर अलग-अलग प्रमाण रखते हैं।
5. मुद्राशास्त्र (Numismatics) सिक्कों के अध्ययन को "मुद्राशास्त्र" (Numismatics) कहा जाता है। सिक्के केवल लेन-देन का माध्यम नहीं, बल्कि किसी काल की राजनीतिक, धार्मिक व आर्थिक स्थिति के प्रबल प्रमाण भी होते हैं — सिक्कों पर अंकित राजा का नाम, चिह्न व भाषा से उस वंश, धर्म और शासन-व्यवस्था की जानकारी मिलती है।
A. सिक्कों का ऐतिहासिक विकास ◆ आहत सिक्के (Punch-Marked Coins): भारत के प्राचीनतम सिक्के , जिन पर पेड़, मछली, सांड, हाथी व अर्द्धचंद्र जैसे पंचमार्क चिह्न अंकित होते थे — कौटिल्य के अर्थशास्त्र में इन्हें "पण" या "कार्षापण" कहा गया है। इनका काल 600 ईपू से 200 ईपू माना जाता है। सन् 1835 में जेम्स प्रिंसेप ने इन्हें "आहत सिक्का" नाम दिया। राजस्थान में इनके पहले साक्ष्य मिले हैं। ◆ कु षाण काल (पहली-तीसरी सदी): कु षाण शासक विम कै डफिसस ने पहली बार सोने के सिक्कों का प्रचलन शुरू किया — इस काल को भारतीय मुद्रा-व्यवस्था के "स्वर्ण-युग" की शुरुआत माना जाता है। ◆ गुप्त काल (चौथी-छठी सदी): स्वर्ण सिक्कों का असली स्वर्ण-युग — मुख्य सिक्का "दीनार" कहलाता था। इन सिक्कों के सर्वाधिक साक्ष्य बयाना (भरतपुर) से मिले हैं, जिन पर लक्ष्मी, गरुड़ व अश्वमेध यज्ञ जैसे प्रतीक अंकित मिलते हैं। ◆ राजपूत काल (8वीं-12वीं सदी): राजस्थान की रियासतों में सिक्कों का विशेष महत्व रहा — चौहान काल में रूपक (चांदी) व दीनार (सोना), प्रतिहार काल में वराह, द्रम्म व विशोपक सिक्के प्रचलित थे। ◆ अजयराज चौहान की रानी सोमलदेवी ने भी तांबे व चांदी के सिक्के चलवाए थे — यह तथ्य दर्शाता है कि राजपूत काल में रानियां भी मुद्रा-व्यवस्था में सक्रिय भूमिका निभाती थीं।
B. प्रमुख रियासतों के सिक्के राजस्थान की हर रियासत के अपने अलग नाम वाले सिक्के प्रचलित थे — नीचे प्रमुख रियासतों व उनके सिक्कों के नाम दिए गए हैं
रियासत (State) प्रमुख सिक्के (Major Coins)
मेवाड़ ढींगला, भिलाड़ी, चांदौड़ी, चित्तौड़ी, स्वरूपशाही, त्रिशूलिया, एलची (मुगल सिक्का), गधिया (तांबा)
जोधपुर (मारवाड़) विजयशाही, भीमशाही, गजशाही, गधिया, फदिया, ढब्बूशाही (तांबा), मोहर (स्वर्ण)
जयपुर (आमेर) झाड़शाही, मुहम्मदशाही, हाली, रासकपुरी — स्थापना 1728 ई. में सवाई जयसिंह द्वितीय द्वारा; टकसाल चिह्न: छह-शाखा वृक्ष
बीकानेर गंगाशाही (विक्टोरिया की छवि सहित), गजशाही, आलमशाही (मुगलिया)
जैसलमेर अखैशाही, मुहम्मदशाही, डोडिया/डोलिया (तांबा)
अलवर रावशाही, अखैशाही टकसाल (राजगढ़)
धौलपुर तमंचाशाही (पिस्तौल के चिह्न सहित); सिक्का प्रचलन 1804 ई. से
करौली माणकशाही, कटार-झाड़शाही
कोटा झालिमशाही, लक्ष्मणशाही, गुमानशाही, मदनशाही, हाली
बूंदी रामशाही, ग्यारहसना, कटारशाही, चेहरेशाही
डूंगरपुर त्रिशूलिया, पंत्रीसिरिया, चित्तौड़ी, सालिमशाही, उदयशाही
बांसवाड़ा व झालावाड़ सालिमशाही, लक्ष्मणशाही, मदनशाही
प्रतापगढ़ व किशनगढ़ आलमशाही, नया-सालिमशाही, शाहआलमशाही
रोचक तथ्य: जयपुर रियासत ऐसी पहली रियासत थी जिसे मुगलों ने अपनी स्वतंत्र टकसाल (सिक्के बनाने का कारखाना) स्थापित करने की अनुमति दी थी। सलूम्बर (मेवाड़ की एकमात्र जागीर जिसे सिक्के ढालने का अधिकार मिला) भी परीक्षा में पूछा जाने वाला महत्वपूर्ण तथ्य है।
C. प्रमुख सिक्का-भंडार खोजें (Major Coin Hoards) ◆ रैढ़ (टोंक): यहाँ से 3075 चांदी के आहत (पंचमार्क ) सिक्के मिले — भारत में किसी एक स्थल से मिला सबसे बड़ा सिक्का- भंडार, इसीलिए रैढ़ को "सिक्कों की दृष्टि से भारत का पेरिस" कहा जाता है। ◆ बयाना (भरतपुर): गुप्तकालीन स्वर्ण सिक्कों का भंडार, लगभग 1800 सिक्के मिले — अधिकांश सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय "विक्रमादित्य" के हैं। ◆ रंगमहल (हनुमानगढ़): यहाँ से 105 तांबे के सिक्के मिले, जिनमें एक सिक्का कु षाण शासक कनिष्क का भी है। ◆ बैराठ (जयपुर): यहाँ से 36 सिक्के मिले — 8 आहत (पंचमार्क ) व 28 इंडो-ग्रीक सिक्के ; इंडो-ग्रीक सिक्कों के साक्ष्य नलियासर व नगरी से भी मिले हैं। ◆ आहड़ (उदयपुर): यहाँ से यूनानी देवता अपोलो की आकृ ति वाले 6 तांबे के सिक्के मिले हैं।
"सिक्के इतिहास के वे मूक गवाह हैं जो कभी झूठ नहीं बोलते — क्योंकि इन पर अंकित हर चिह्न उसी काल की छाप है, जिस काल में वे ढाले गए थे।" — मुद्राशास्त्र का सामान्य सिद्धांत
★ अध्याय सार — महत्वपूर्ण तथ्य ★
- घोसुण्डी शिलालेख (चित्तौड़गढ़, द्वितीय शताब्दी ईपू) — भारत में वैष्णव सम्प्रदाय का सबसे प्राचीन प्रमाण।
- बड़ली का शिलालेख (443 ईपू) — राजस्थान का सबसे प्राचीन अभिलेख।
- राज प्रशस्ति (राजसमन्द, 1676 ई.) — विश्व की सबसे बड़ी प्रशस्ति, रचयिता रणछोड़ भट्ट, 25 पाषाणों पर 24 सर्ग।
4. कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति (चित्तौड़गढ़, 1460 ई.) — महाराणा कुम्भा की उपाधियों व रचित ग्रंथों का उल्लेख। 5. बिजौलिया लेख (भीलवाड़ा, 1170 ई.) — चौहान वंशावली का प्रमुख स्रोत, दिगंबर जैन श्रावक लोलक द्वारा स्थापित। 6. राजस्थान राज्य अभिलेखागार की स्थापना 1955 (जयपुर), 1960 में बीकानेर स्थानांतरित — देश का पहला ई- अभिलेखागार। 7. दयालदास री ख्यात — राजस्थान की अंतिम ख्यात मानी जाती है। 8. पृथ्वीराज रासो के रचयिता चंदबरदाई हैं — पृथ्वीराज चौहान तृतीय के दरबारी कवि। 9. डिंगल भाषा — पश्चिमी राजस्थान, चारण कवियों की वीर-रस प्रधान शैली; पिंगल भाषा — पूर्वी राजस्थान, भाट कवियों की वंशावली-प्रधान शैली। 10. तारीख-ए-अलाई व तारीख-ए-फिरोजशाही — दिल्ली सल्तनत कालीन फारसी स्रोत, राजस्थान पर सल्तनत आक्रमणों का विवरण। 11. आहत (पंचमार्क ) सिक्कों को 1835 में जेम्स प्रिंसेप ने नाम दिया; इनके पहले साक्ष्य राजस्थान में मिले। 12. रैढ़ (टोंक) — 3075 चांदी के आहत सिक्कों का भंडार, भारत में एकल स्थल से सबसे बड़ा — "भारत का पेरिस"। 13. बयाना (भरतपुर) — गुप्तकालीन स्वर्ण सिक्कों का भंडार (लगभग 1800 सिक्के ), अधिकांश चंद्रगुप्त द्वितीय के । 14. जयपुर रियासत — मुगलों से स्वतंत्र टकसाल स्थापित करने की अनुमति पाने वाली राजपूताने की पहली रियासत। 15. सलूम्बर (मेवाड़) — सिक्के ढालने का अधिकार पाने वाली मेवाड़ की एकमात्र जागीर। 16. कणसवा का लेख (कोटा, 738 ई.) — राजस्थान में मौर्यवंश का अंतिम प्रमाण माना जाता है। 17. राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान (RORI), जोधपुर — संस्कृत-प्राकृ त हस्तलिखित पांडुलिपियों का प्रमुख संग्रहालय।
नीचे दी समय-रेखा (Timeline) इस अध्याय के सभी महत्वपूर्ण वर्षों को एक साथ जोड़ती है — रिवीजन के लिए इसे ज़रूर दोहराएं:
वर्ष (Year) घटना/Event महत्व
443 ईपू बड़ली का शिलालेख उत्कीर्ण हुआ राजस्थान का सबसे प्राचीन अभिलेख
तीसरी शताब्दी ईपू अशोक का भाब्रू (बैराठ) शिलालेख अशोक के बौद्ध धर्म का अनुयायी होने का प्रमाण
द्वितीय शताब्दी ईपू घोसुण्डी शिलालेख वैष्णव सम्प्रदाय का सबसे प्राचीन प्रमाण
600-200 ईपू आहत (पंचमार्क ) सिक्कों का प्रचलन काल राजस्थान में सर्वप्रथम साक्ष्य
713 ई. मानमोरी/शंकरघट्टा शिलालेख कर्नल टॉड द्वारा पठित, मौर्य संबंध का प्रमाण
738 ई. कणसवा का लेख राजस्थान में मौर्यवंश का अंतिम प्रमाण
861 ई. घटियाला शिलालेख सती-प्रथा का प्राचीनतम प्रमाणों में से एक
960 ई. राजोर अभिलेख (अलवर) प्रतिहारों को 'गुर्जर' कहा गया
1170 ई. बिजौलिया का लेख चौहान वंशावली का प्रमुख स्रोत
1460 ई. कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति महाराणा कुम्भा की उपाधियां व ग्रंथ
1676 ई. राज प्रशस्ति विश्व की सबसे बड़ी प्रशस्ति
1800 जॉर्ज थॉमस ने 'राजपूताना' शब्द का प्रयोग किया प्रदेश के लिए पहला सामूहिक नाम
1829 कर्नल टॉड की 'एनल्स एण्ड एण्टीक्विटीज़ ऑफ राजस्थान' प्रदेश को 'राजस्थान' नाम मिला प्रकाशित
1835 जेम्स प्रिंसेप ने "आहत सिक्का" नाम दिया मुद्राशास्त्र अध्ययन की नींव
1893 विलियम विल्फ्रे ड की पुस्तक प्रकाशित राजपूताना रियासतों की मुद्राओं पर प्रामाणिक ग्रंथ
1950 पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग की स्थापना पुरा-सम्पदा की खोज व संरक्षण
1955 राजस्थान राज्य अभिलेखागार की स्थापना (जयपुर) अभिलेखागार स्रोतों का केंद्रीय संग्रहण प्रारंभ
1955 राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर प्राचीन पांडुलिपियों का संरक्षण
1958 राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर की स्थापना साहित्यिक स्रोतों के संरक्षण व मीरा पुरस्कार
1960 अभिलेखागार बीकानेर स्थानांतरित वर्तमान मुख्यालय की स्थापना
1983 राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर सूर्यमल मीसण पुरस्कार व "जगती जोत" पत्रिका
2003 राजस्थान विधानसभा द्वारा 8वीं अनुसूची हेतु प्रस्ताव पारित राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता की मांग