🪨 अध्याय 13/14 — राजस्थान भूगोल

जियो-हेरिटेज एवं जियो-पार्क

Geo-heritage & Geoparks | RAS Pre + Mains
📋 इस अध्याय में
  1. जियो-हेरिटेज एवं जियो-पार्क की अवधारणा
  2. भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) की भूमिका
  3. राजस्थान के 12 राष्ट्रीय भूवैज्ञानिक स्मारक
  4. पाली जिले के स्थल
  5. उदयपुर जिले के स्थल
  6. चित्तौड़गढ़ जिले का स्थल
  7. जैसलमेर जिले का स्थल
  8. अजमेर जिले का स्थल
  9. जोधपुर जिले के स्थल
  10. बूंदी जिले का स्थल
  11. बारां जिले का स्थल
  12. लाठी सीरीज (Lathi Series)
  13. उदयपुर में नवविकसित जियो-हेरिटेज पर्यटन स्थल
  14. यूनेस्को ग्लोबल जियो-पार्क — अवधारणा एवं स्थिति
  15. संरक्षण के प्रयास एवं चुनौतियाँ
  16. नवीनतम अपडेट 2025-26
🌟 क्या आप जानते हैं?

ज़रा कल्पना कीजिए — उदयपुर के पास स्थित जावर की खदानों में आज से लगभग 2,500-3,000 साल पहले, यानी महाभारत काल के आसपास, हमारे पूर्वज पहले से ही जस्ता (Zinc) को पिघलाकर धातु के रूप में निकालना जानते थे! दुनिया का सबसे पुराना जस्ता प्रगलन (Zinc Smelting) स्थल यहीं जावर में मिलता है — यहाँ आज भी उस प्राचीन तकनीक के अवशेष (रिटॉर्ट व भट्टियाँ) ज़मीन में दबे मिलते हैं। और सिर्फ यही नहीं — उदयपुर के झामरकोतरा में तो धरती पर जीवन की शुरुआत के सबूत मिलते हैं! यहाँ मिलने वाले स्ट्रोमेटोलाइट जीवाश्म लगभग 200 करोड़ साल पुराने हैं, जिनमें सायनोबैक्टीरिया जैसे सबसे प्राचीन जीवों के निशान सुरक्षित हैं — यानी राजस्थान की मिट्टी में पृथ्वी के इतिहास की वो किताब दबी है, जिसे पढ़कर वैज्ञानिक यह समझ पाते हैं कि करोड़ों साल पहले हमारा ग्रह कैसा दिखता था। बारां जिले के रामगढ़ में तो एक ऐसा गोलाकार गड्ढा (Crater) मिलता है, जिसके बारे में माना जाता है कि यह किसी उल्कापिंड (Meteorite) के धरती से टकराने से बना था! सोचिए, आसमान से गिरा एक पत्थर राजस्थान की धरती पर आज भी अपने निशान छोड़े हुए है। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) ने ऐसे ही 12 असाधारण भूवैज्ञानिक स्थलों को राजस्थान में 'राष्ट्रीय भूवैज्ञानिक स्मारक' (National Geological Monuments) घोषित किया है — इन्हें ही 'जियो-हेरिटेज स्थल' कहा जाता है। आइए, इस अध्याय में इन सभी अनोखे स्थलों को विस्तार से जानते हैं, और यह भी समझते हैं कि 'जियो-पार्क' किसे कहते हैं और राजस्थान का अरावली क्षेत्र यूनेस्को जियो-पार्क बनने की दौड़ में क्यों सबसे आगे माना जाता है।

1जियो-हेरिटेज एवं जियो-पार्क की अवधारणा

धरती अपने जन्म (लगभग 450 करोड़ वर्ष पूर्व) से लेकर आज तक की पूरी कहानी अपनी चट्टानों, जीवाश्मों, भू-आकृतियों व खनिजों में लिखकर रखती है। जिस तरह पुरातत्व विभाग हमें प्राचीन इमारतों व मूर्तियों के ज़रिए मानव इतिहास बताता है, उसी तरह भूविज्ञान (Geology) हमें चट्टानों के ज़रिए पृथ्वी का इतिहास बताता है। जो भूवैज्ञानिक स्थल वैज्ञानिक, शैक्षणिक, सौंदर्यपरक या सांस्कृतिक दृष्टि से इतने असाधारण होते हैं कि उन्हें संरक्षित करना ज़रूरी हो जाता है, उन्हें 'जियो-हेरिटेज स्थल' (Geo-heritage Site) या 'राष्ट्रीय भूवैज्ञानिक स्मारक' (National Geological Monument) कहा जाता है।

(A) जियो-हेरिटेज स्थल (Geo-heritage Site) क्या है?

(B) जियो-पार्क (Geopark) क्या है?

💡 आसान भाषा में समझें

सोचिए एक जियो-हेरिटेज स्थल एक 'अनमोल पन्ना' है — जैसे झामरकोतरा का जीवाश्म पार्क — जबकि जियो-पार्क पूरी 'किताब' है, जिसमें ऐसे कई पन्ने (भूवैज्ञानिक स्थल) एक भौगोलिक क्षेत्र में इकट्ठे होकर, वहाँ की प्रकृति, संस्कृति व लोगों की कहानी के साथ मिलकर एक सम्पूर्ण, घूमने-लायक व पढ़ने-लायक अनुभव बनाते हैं।

🪨 जियो-हेरिटेज स्थल
  • एकल, विशिष्ट भूवैज्ञानिक स्थल/संरचना
  • GSI द्वारा घोषित एवं सूचीबद्ध
  • क्षेत्रफल में छोटा (एक चट्टान/खदान/पार्क तक सीमित)
  • मुख्यतः वैज्ञानिक व शैक्षणिक संरक्षण पर केंद्रित
  • उदाहरण: झामरकोतरा जीवाश्म पार्क, रामगढ़ क्रेटर
🌍 जियो-पार्क
  • बड़ा, एकीकृत भौगोलिक क्षेत्र (एक से अधिक स्थल शामिल)
  • यूनेस्को द्वारा वैश्विक मान्यता (4 वर्ष हेतु, फिर पुनर्मूल्यांकन)
  • क्षेत्रफल में बड़ा (पूरा भू-क्षेत्र/जिला स्तर तक)
  • भूविज्ञान + पारिस्थितिकी + संस्कृति + सतत आजीविका, सभी को जोड़ता है
  • उदाहरण: विश्व में 241 जियो-पार्क (51 देशों में), भारत में अभी एक भी नहीं

2भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) की भूमिका

भारत में जियो-हेरिटेज स्थलों को पहचानने, घोषित करने व 'राष्ट्रीय भूवैज्ञानिक स्मारक' का दर्जा देने का कार्य भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (Geological Survey of India — GSI) करता है, जो खान मंत्रालय (Ministry of Mines), भारत सरकार के अधीन कार्य करने वाली एक प्रमुख वैज्ञानिक संस्था है।

सूचकविवरण
स्थापनावर्ष 1851 में — भारत की सबसे पुरानी वैज्ञानिक संस्थाओं में से एक
मूल मंत्रालयखान मंत्रालय (Ministry of Mines), भारत सरकार
मुख्य कार्यभूवैज्ञानिक मानचित्रण, खनिज अन्वेषण, भूकंप व भूस्खलन अध्ययन, तथा राष्ट्रीय भूवैज्ञानिक स्मारकों की घोषणा एवं संरक्षण
जियो-हेरिटेज संबंधी भूमिकादेशभर में वैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण भूवैज्ञानिक स्थलों की पहचान कर उन्हें 'राष्ट्रीय भूवैज्ञानिक स्मारक' घोषित करना तथा उनके संरक्षण हेतु राज्य सरकारों को सिफारिश करना

ध्यान रहे: GSI केवल स्थलों को घोषित करता है — उनके भौतिक संरक्षण व रख-रखाव की ज़िम्मेदारी संबंधित राज्य सरकार (राजस्थान में खान एवं भूविज्ञान विभाग तथा पर्यटन विभाग) की होती है, ठीक उसी तरह जैसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) स्मारकों की पहचान करता है और राज्य पुरातत्व विभाग स्थानीय स्तर पर सहयोग करता है।

3राजस्थान के 12 राष्ट्रीय भूवैज्ञानिक स्मारक

GSI ने राजस्थान में अब तक 12 स्थलों को 'राष्ट्रीय भूवैज्ञानिक स्मारक' अर्थात जियो-हेरिटेज स्थल घोषित किया है। ये स्थल राज्य के 8 जिलों में फैले हैं और अलग-अलग भूवैज्ञानिक कालखंडों — कुछ अरबों वर्ष पुरानी आर्कियन चट्टानों से लेकर करोड़ों वर्ष पुराने जीवाश्मों व हाल के भू-आकृतिक निशानों तक — का प्रतिनिधित्व करते हैं।

क्रमस्थल का नामजिलाप्रमुख प्रकार
1सेंदरा ग्रेनाइट (Sendra Granite)पालीआग्नेय चट्टान (ग्रेनाइट अंतर्वेधन)
2बर्र कांग्लोमरेट (Barr Conglomerate)पालीअवसादी चट्टान (स्तरिकी संधि-चिह्न)
3स्ट्रोमेटोलाइट जीवाश्म पार्क, झामरकोतराउदयपुरप्राचीनतम जीवाश्म (स्ट्रोमेटोलाइट)
4राजपुरा-दरीबा गॉसनउदयपुरखनिज अन्वेषण संकेतक (गॉसन)
5स्ट्रोमेटोलाइट पार्क, भोजुंडाचित्तौड़गढ़प्राचीनतम जीवाश्म (स्ट्रोमेटोलाइट)
6अकाल जीवाश्म काष्ठ उद्यानजैसलमेरजीवाश्म वन (Fossil Wood)
7किशनगढ़ नेफलाइन साइनाइटअजमेरदुर्लभ क्षारीय आग्नेय चट्टान
8वेल्डेड टफजोधपुरज्वालामुखीय चट्टान
9जोधपुर समूह–मालाणी आग्नेय समूह संपर्कजोधपुरभूवैज्ञानिक असंगति (Unconformity)
10सतूर ग्रेट बाउंड्री फॉल्टबूंदीविवर्तनिक भ्रंश (Great Boundary Fault)
11रामगढ़ क्रेटरबारांउल्कापिंड आघात संरचना (Astrobleme)
12जावर सीसा-जस्ता खानउदयपुरप्राचीन खनन एवं प्रगलन स्थल

(रिक्त मानचित्र में स्वयं अभ्यास करें) मानचित्र: राजस्थान के 12 जियो-हेरिटेज स्थलों का जिलावार वितरण — हाथ से चिन्हित करने हेतु रिक्त मानचित्र

स्मरण-सूत्र (Mnemonic): याद रखने के लिए जिलों को समूह में रखें — 'PUC-JAJ-BB': पाली (2), उदयपुर (3), चित्तौड़गढ़ (1), जैसलमेर (1), अजमेर (1), जोधपुर (2), बूंदी (1), बारां (1) — कुल 8 जिलों में 12 स्थल।

4पाली जिले के स्थल

🪨 सेंदरा ग्रेनाइट (Sendra Granite) 📍 जिला: पाली

⏳ भूवैज्ञानिक काल/आयु: लगभग 75-83 करोड़ वर्ष पूर्व (नियोप्रोटेरोज़ोइक काल) — इसे इरिनपुरा ग्रेनाइट समूह का भाग माना जाता है 📝 विवरण: पाली ज़िले के सेंदरा गाँव के पास बड़े पैमाने पर ग्रेनाइट चट्टान के उभार मिलते हैं। यह ग्रेनाइट दिल्ली सुपरग्रुप की तलछटी चट्टानों में अंतर्वेधन (Intrusion) के रूप में पाया जाता है, यानी पिघली हुई मैग्मा पुरानी चट्टानों के अंदर घुसकर ठंडी होकर जमी और ग्रेनाइट बनी। 🎯 महत्व: यह स्थल अरावली क्षेत्र में हुई प्राचीन आग्नेय गतिविधियों (Igneous Activity) व ग्रेनाइट निर्माण प्रक्रिया को समझने के लिए भूवैज्ञानिकों के लिए एक जीवंत प्रयोगशाला है — यह दर्शाता है कि करोड़ों साल पहले धरती के अंदर की गर्मी ने कैसे नई चट्टानें बनाईं।

🪨 बर्र कांग्लोमरेट (Barr Conglomerate) 📍 जिला: पाली

⏳ भूवैज्ञानिक काल/आयु: नियोप्रोटेरोज़ोइक काल — दिल्ली सुपरग्रुप के आधार पर स्थित एक महत्वपूर्ण स्तरिकी चिह्नक 📝 विवरण: बर्र नामक स्थान पर मिलने वाला यह कांग्लोमरेट (गोल-गोल कंकड़-पत्थरों से बनी सीमेंट जैसी चट्टान) दिल्ली सुपरग्रुप की सबसे निचली परत में पाया जाता है। यह एक 'असंगति' (Unconformity) को चिन्हित करता है — यानी यह वह सीमा-रेखा है जहाँ पुरानी चट्टानों के कटाव के बाद नई तलछट जमा होनी शुरू हुई। 🎯 महत्व: भूवैज्ञानिकों के लिए यह एक 'प्राकृतिक घड़ी' का काम करता है — इसकी मदद से वैज्ञानिक यह पता लगा पाते हैं कि अरावली क्षेत्र में अलग-अलग शैल-समूहों (Rock Groups) के बनने का क्रम व समय क्या था, जो कि क्षेत्रीय भूवैज्ञानिक इतिहास (Stratigraphy) को समझने की कुंजी है।

5उदयपुर जिले के स्थल

🪨 स्ट्रोमेटोलाइट जीवाश्म पार्क, झामरकोतरा 📍 जिला: उदयपुर

⏳ भूवैज्ञानिक काल/आयु: लगभग 200 करोड़ वर्ष पूर्व (पेलियोप्रोटेरोज़ोइक काल) — पृथ्वी पर जीवन के सबसे प्राचीन प्रमाणों में से एक 📝 विवरण: झामरकोतरा (रॉक फॉस्फेट की खान के लिए प्रसिद्ध) में मिलने वाले स्ट्रोमेटोलाइट जीवाश्म वास्तव में सायनोबैक्टीरिया व आर्की-बैक्टीरिया जैसे अत्यंत प्राचीन सूक्ष्मजीवों की परत-दर-परत जमी हुई कॉलोनियाँ हैं, जो चट्टान में जीवाश्मित हो गईं। इन जीवों को अरावली के अंतर-महाद्वीपीय (Pericontinental) समुद्र किनारे पर फॉस्फेट की उपलब्धता के कारण पनपने का अवसर मिला — यह फॉस्फेट निकट की लगभग 300 करोड़ वर्ष पुरानी चट्टानों से आया। 🎯 महत्व: यह पार्क धरती पर जीवन की उत्पत्ति (Origin of Life) को समझने के लिए विश्व स्तर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि स्ट्रोमेटोलाइट्स ही वे सबसे पुराने साक्ष्य हैं जो दर्शाते हैं कि पृथ्वी पर सूक्ष्म जीवन कब और कैसे शुरू हुआ। सुखाड़िया विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभाग के वैज्ञानिकों ने यहाँ वर्षों तक शोध किया है।

🪨 राजपुरा-दरीबा गॉसन (Rajpura-Dariba Gossan) 📍 जिला: उदयपुर

⏳ भूवैज्ञानिक काल/आयु: प्रोटेरोज़ोइक काल — सल्फाइड खनिज पेटी (Sulphide Belt) से जुड़ा 📝 विवरण: 'गॉसन' उस भूरी-लाल, लोहे से भरपूर परत को कहते हैं जो किसी सल्फाइड खनिज निक्षेप (जैसे सीसा-जस्ता-ताँबा अयस्क) के धरती की सतह के पास ऑक्सीकरण (Oxidation) से बनती है। राजपुरा-दरीबा क्षेत्र में मिलने वाला यह गॉसन नीचे छिपे सीसा-जस्ता खनिजीकरण का सतह पर दिखने वाला प्राकृतिक संकेत-बोर्ड है। 🎯 महत्व: खनिज अन्वेषण (Mineral Exploration) में गॉसन एक बेहद उपयोगी वैज्ञानिक संकेतक है — भूवैज्ञानिक ऐसे गॉसन को देखकर ही यह अनुमान लगा पाते हैं कि नीचे कीमती धात्विक खनिज छिपे हो सकते हैं। राजपुरा-दरीबा-बेठुमनी पेटी आज भी हिंदुस्तान ज़िंक लिमिटेड (HZL) के लिए एक प्रमुख खनन क्षेत्र है।

🪨 जावर सीसा-जस्ता खान (Jawar Lead-Zinc Mine) 📍 जिला: उदयपुर

⏳ भूवैज्ञानिक काल/आयु: प्राचीन खनन गतिविधि लगभग 2,000-3,000 वर्ष पुरानी; भूवैज्ञानिक अयस्क-निक्षेप प्रोटेरोज़ोइक काल का 📝 विवरण: जावर की खदानें विश्व की सबसे पुरानी ज्ञात जस्ता प्रगलन (Zinc Smelting) स्थल मानी जाती हैं। यहाँ प्राचीन काल के खनिकों द्वारा उपयोग की गई रिटॉर्ट (आसवन पात्र), भट्टियों तथा प्रगलन अपशिष्ट (Slag) के अवशेष आज भी मिलते हैं, जो बताते हैं कि हज़ारों साल पहले ही यहाँ के लोग जस्ता, सीसा व चाँदी निकालने व गलाने की तकनीक जानते थे। 🎯 महत्व: जावर सिर्फ भूवैज्ञानिक ही नहीं, बल्कि पुरातात्विक व प्राचीन धातुकर्म (Metallurgy) इतिहास की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है — यह साबित करता है कि प्राचीन भारत धातु-विज्ञान में विश्व में अग्रणी था। आज भी यह क्षेत्र हिंदुस्तान ज़िंक लिमिटेड (HZL) की सक्रिय खनन इकाई है, और अब इसे जियो-हेरिटेज पर्यटन स्थल के रूप में भी विकसित किया जा रहा है (देखें अनुभाग 13)।

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6चित्तौड़गढ़ जिले का स्थल

🪨 स्ट्रोमेटोलाइट पार्क, भोजुंडा (Bhojunda) 📍 जिला: चित्तौड़गढ़

⏳ भूवैज्ञानिक काल/आयु: प्रीकैम्ब्रियन काल — भागवनपुरा चूना-पत्थर संरचना से संबंधित 📝 विवरण: भोजुंडा में मिलने वाले स्ट्रोमेटोलाइट भी झामरकोतरा की तरह प्राचीन शैवाल-सदृश सूक्ष्मजीवों (Algal Mats) की परत-दर-परत संरचनाएँ हैं, जो भागवनपुरा चूना-पत्थर (Limestone) में सुरक्षित हैं। ये संरचनाएँ गुंबदाकार, स्तंभाकार व परतदार रूपों में पाई जाती हैं। 🎯 महत्व: यह पार्क झामरकोतरा के साथ मिलकर राजस्थान को प्रीकैम्ब्रियन काल के जीवन-रूपों के अध्ययन हेतु देश के सबसे समृद्ध क्षेत्रों में से एक बनाता है — विद्यार्थियों व शोधार्थियों के लिए यह खुली प्रयोगशाला जैसा है, जहाँ अरबों साल पुराने जीवन को सीधे चट्टान पर देखा जा सकता है।

7जैसलमेर जिले का स्थल

🪨 अकाल जीवाश्म काष्ठ उद्यान (Akal Fossil Wood Park) 📍 जिला: जैसलमेर

⏳ भूवैज्ञानिक काल/आयु: लगभग 18 करोड़ वर्ष पूर्व (जुरासिक काल) 📝 विवरण: आज जहाँ थार मरुस्थल की तपती रेत फैली है, वहाँ करोड़ों साल पहले घने जंगल हुआ करते थे! अकाल गाँव के पास मिलने वाले विशाल जीवाश्मित वृक्ष-तने (Fossilised Tree Trunks) इसी बात के प्रमाण हैं। समय के साथ इन पेड़ों के कार्बनिक ऊतक खनिजों (मुख्यतः सिलिका) से बदल गए और पत्थर में परिवर्तित हो गए, फिर भी इनकी लकड़ी जैसी बनावट व वलय (Rings) आज भी साफ दिखाई देते हैं। 🎯 महत्व: यह उद्यान राजस्थान सरकार द्वारा संरक्षित है और यह दर्शाता है कि थार मरुस्थल हमेशा से रेगिस्तान नहीं था — जुरासिक काल में यहाँ समृद्ध वनस्पति व नम जलवायु थी। यह जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के दीर्घकालिक भूवैज्ञानिक प्रमाण के रूप में विद्यार्थियों के लिए एक बेहतरीन उदाहरण है।

(रिक्त मानचित्र में स्वयं अभ्यास करें) मानचित्र: थार मरुस्थल क्षेत्र में जीवाश्म एवं भूवैज्ञानिक स्थल — हाथ से चिन्हित करने हेतु रिक्त मानचित्र

8अजमेर जिले का स्थल

🪨 किशनगढ़ नेफलाइन साइनाइट (Kishangarh Nepheline Syenite) 📍 जिला: अजमेर

⏳ भूवैज्ञानिक काल/आयु: प्रीकैम्ब्रियन काल — दुर्लभ क्षारीय (Alkaline) आग्नेय चट्टान 📝 विवरण: किशनगढ़ क्षेत्र में मिलने वाली नेफलाइन साइनाइट एक असामान्य व दुर्लभ आग्नेय चट्टान है, जिसमें सामान्य ग्रेनाइट के विपरीत क्वार्ट्ज़ (Quartz) की जगह नेफलाइन खनिज पाया जाता है। इसका निर्माण असामान्य रासायनिक संरचना वाले मैग्मा से हुआ, जो धरती के भीतर विशेष परिस्थितियों में ही बनता है। 🎯 महत्व: यह चट्टान वैज्ञानिक शोध के लिए दुर्लभ होने के कारण महत्वपूर्ण है, साथ ही व्यावसायिक रूप से इसका उपयोग काँच व चीनी मिट्टी (Ceramics) उद्योग में भी होता है — यानी यह स्थल विज्ञान और उद्योग दोनों दृष्टि से मूल्यवान है।

9जोधपुर जिले के स्थल

🪨 वेल्डेड टफ (Welded Tuff) 📍 जिला: जोधपुर

⏳ भूवैज्ञानिक काल/आयु: लगभग 75 करोड़ वर्ष पूर्व — मालाणी आग्नेय समूह (Malani Igneous Suite) से संबंधित 📝 विवरण: वेल्डेड टफ एक ज्वालामुखीय चट्टान है, जो अत्यधिक गर्म ज्वालामुखीय राख (Volcanic Ash) के तेज़ी से जमा होकर आपस में 'वेल्ड' (जुड़) जाने से बनती है। जोधपुर के आसपास मिलने वाली यह चट्टान मालाणी आग्नेय समूह की विशाल ज्वालामुखीय गतिविधि का प्रत्यक्ष प्रमाण है, जो उस दौर में पूरे पश्चिमी राजस्थान में सक्रिय थी। 🎯 महत्व: यह स्थल दर्शाता है कि आज शांत दिखने वाला पश्चिमी राजस्थान कभी भीषण ज्वालामुखीय विस्फोटों का केंद्र हुआ करता था — मालाणी आग्नेय समूह विश्व की सबसे बड़ी 'एनोरोजेनिक' (गैर-पर्वत-निर्माण संबंधी) ज्वालामुखीय चट्टान श्रृंखलाओं में गिना जाता है, जिससे यह अंतरराष्ट्रीय भूवैज्ञानिक शोध का विषय है।

🪨 जोधपुर समूह–मालाणी आग्नेय समूह संपर्क 📍 जिला: जोधपुर

⏳ भूवैज्ञानिक काल/आयु: नियोप्रोटेरोज़ोइक–कैम्ब्रियन सीमा — एक स्पष्ट असंगति (Unconformity) 📝 विवरण: यह स्थल उस ठीक सीमा-रेखा को दिखाता है जहाँ नीचे की प्राचीन मालाणी आग्नेय चट्टानों (ज्वालामुखीय उत्पत्ति) के ऊपर बाद में जमा हुई जोधपुर समूह की अवसादी (Sedimentary) चट्टानें टिकी हैं। यह संपर्क-रेखा दोनों शैल-समूहों की आयु व निर्माण-क्रम के बीच लाखों वर्षों के अंतराल का प्रमाण है। 🎯 महत्व: भूवैज्ञानिकों के लिए यह एक 'पन्ना पलटने' जैसा अनुभव है — मानो धरती की किताब में एक अध्याय खत्म होकर दूसरा शुरू होता दिख रहा हो। यह क्षेत्रीय भू-विवर्तनिकी (Tectonics) व शैल-अनुक्रम को समझने का महत्वपूर्ण संदर्भ बिंदु है।

10बूंदी जिले का स्थल

🪨 सतूर ग्रेट बाउंड्री फॉल्ट (Satur Great Boundary Fault) 📍 जिला: बूंदी

⏳ भूवैज्ञानिक काल/आयु: प्रीकैम्ब्रियन काल — अरावली प्रणाली व विंध्यन बेसिन के बीच की सीमा 📝 विवरण: 'ग्रेट बाउंड्री फॉल्ट' (GBF) राजस्थान की एक विशाल व अत्यंत महत्वपूर्ण भ्रंश-रेखा (Fault Line) है, जो प्राचीन अरावली-बाड़मेर तंत्र की आर्कियन-प्रोटेरोज़ोइक चट्टानों को उनसे कहीं छोटी उम्र की विंध्यन बेसिन की अवसादी चट्टानों से अलग करती है। सतूर के पास यह भ्रंश स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। 🎯 महत्व: यह भ्रंश-रेखा राजस्थान की दो पूर्णतः अलग-अलग भूवैज्ञानिक इकाइयों — एक बहुत पुरानी क्रिस्टलीय चट्टानों वाली (अरावली) और दूसरी अपेक्षाकृत नई अवसादी चट्टानों वाली (विंध्यन) — के बीच की सीमा को समझने की कुंजी है, और यह राज्य की समग्र विवर्तनिक (Tectonic) संरचना के अध्ययन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण संदर्भ-बिंदु है।

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11बारां जिले का स्थल

🪨 रामगढ़ क्रेटर (Ramgarh Crater) 📍 जिला: बारां

⏳ भूवैज्ञानिक काल/आयु: अनुमानित लगभग 15 करोड़ वर्ष पूर्व (जुरासिक काल के आसपास) 📝 विवरण: रामगढ़ के पास मिलने वाली लगभग गोलाकार संरचना को एक 'एस्ट्रोब्लीम' (Astrobleme) यानी उल्कापिंड आघात संरचना (Meteorite Impact Structure) माना जाता है। यह भारत की उन गिनी-चुनी संरचनाओं में से एक है, जिनके बारे में वैज्ञानिकों का मानना है कि ये अंतरिक्ष से आए किसी पिंड के धरती से टकराने पर बनीं। 🎯 महत्व: ऐसी क्रेटर संरचनाएँ बेहद दुर्लभ होती हैं और इनसे धरती के इतिहास में हुई अंतरिक्षीय घटनाओं (Extraterrestrial Events) को समझने में मदद मिलती है। रामगढ़ क्रेटर भारतीय व अंतरराष्ट्रीय भूवैज्ञानिकों के लिए निरंतर शोध का विषय बना हुआ है।

12लाठी सीरीज (Lathi Series)

यद्यपि लाठी सीरीज को औपचारिक रूप से GSI की 12 राष्ट्रीय भूवैज्ञानिक स्मारकों की सूची में शामिल नहीं किया गया है, लेकिन भूवैज्ञानिक व जल-वैज्ञानिक दृष्टि से इसका महत्व इतना अधिक है कि इसे राजस्थान की भू-धरोहर (Geo-heritage) चर्चा में अवश्य शामिल किया जाता है।

बिंदुविवरण
विस्तारमोहनगढ़ (जैसलमेर) से पोकरण तक फैली भूगर्भिक जलधारा पेटी, जो अजमेर, जैसलमेर, बाड़मेर व जोधपुर जिलों तक विस्तारित मानी जाती है
भूवैज्ञानिक स्वरूपयह एक प्राचीन दबी हुई नदी-तंत्र (Buried/Paleo River Channel) है, जो जुरासिक काल के बलुआ पत्थर (Sandstone) की परतों से बनी है
जल-वैज्ञानिक महत्वइस बलुआ पत्थर की परतों में भारी मात्रा में भूजल संचित है — यह पश्चिमी राजस्थान के अत्यंत शुष्क क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण भूजल भंडार (Aquifer) के रूप में कार्य करती है, जिसने थार मरुस्थल के अनेक क्षेत्रों में पेयजल व सिंचाई जल उपलब्ध कराया है
महत्वयह दर्शाता है कि आज के शुष्कतम मरुस्थलीय क्षेत्र में भी करोड़ों साल पुरानी भूवैज्ञानिक संरचनाएँ आज मानव जीवन को सीधे लाभ पहुँचा रही हैं
💡 रोचक तथ्य

लाठी सीरीज को कभी-कभी पश्चिमी राजस्थान की 'भूमिगत जीवन-रेखा' भी कहा जाता है — इंदिरा गांधी नहर से दूर पड़ने वाले जैसलमेर-बाड़मेर के कई क्षेत्रों के लिए यही भूगर्भिक पेटी पीने व सिंचाई के पानी का प्रमुख स्रोत रही है, जो साबित करती है कि भूविज्ञान केवल किताबी विषय नहीं बल्कि लोगों के रोज़मर्रा के जीवन से सीधा जुड़ा है।

13उदयपुर में नवविकसित जियो-हेरिटेज पर्यटन स्थल

जनवरी 2025 में राजस्थान पर्यटन विभाग ने घोषणा की कि उदयपुर के निकट जावर व झामर कोटड़ा खनन क्षेत्रों को नई जियो-हेरिटेज पर्यटन साइट्स के रूप में विकसित किया जाएगा। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की मंशा के अनुरूप ज़िला प्रशासन ने पर्यटन विभाग को इन स्थलों के विकास हेतु भूमि आवंटित की है, ताकि उदयपुर के पर्यटन सर्किट में एक नया, अनोखा आयाम जोड़ा जा सके।

⛏️ जावर — प्राचीन खनन पर्यटन स्थल
  • लगभग 3,000 वर्ष पुरानी प्राचीन जस्ता, सीसा व चाँदी खनन व प्रगलन तकनीक को दर्शाने वाला स्थल
  • विश्व का सबसे पुराना जस्ता प्रगलन स्थल — यहाँ रिटॉर्ट व अन्य प्रगलन सामग्री के अवशेष मिलते हैं
  • सुखाड़िया विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभाग द्वारा वर्षों के मैपिंग व खनिज-खोज शोध का केंद्र
🦴 झामर कोटड़ा — फॉसिल पार्क
  • लगभग 200 करोड़ वर्ष पुराने स्ट्रोमेटोलाइट जीवाश्मों का संरक्षण व अध्ययन-केंद्र प्रस्तावित
  • पृथ्वी की प्राचीनतम जीवन-संरचना व पारिस्थितिकी तंत्र की जानकारी देने वाला प्रस्तावित फॉसिल पार्क
  • भू-विज्ञान एवं खान विभाग तथा पर्यटन विभाग की संयुक्त कार्ययोजना के अंतर्गत विकास
बिंदुविवरण
कार्यकारी एजेंसीराजस्थान पर्यटन विकास निगम (RTDC)
DPR निर्माणPDCOR द्वारा विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (Detailed Project Report) तैयार
अपेक्षित लाभउदयपुर पर्यटन सर्किट में नया आकर्षण, स्थानीय रोज़गार सृजन, पर्यटकों के ठहराव में वृद्धि, तथा शहर के बाहरी क्षेत्रों में संतुलित पर्यटन विकास
प्रमुख शोधकर्ता (भूविज्ञान)प्रो. डी.एस. चौहान, प्रो. ए.बी. रॉय, प्रो. एम.के. पंडिया, प्रो. बी.एल. शर्मा, प्रो. पी.एस. राणावत, प्रो. एन.के. चौहान, प्रो. विनोद अग्रवाल व डॉ. रितेश पुरोहित (सुखाड़िया विश्वविद्यालय)

(रिक्त मानचित्र में स्वयं अभ्यास करें) मानचित्र: उदयपुर जियो-टूरिज्म सर्किट (जावर व झामर कोटड़ा) — हाथ से चिन्हित करने हेतु रिक्त मानचित्र

14यूनेस्को ग्लोबल जियो-पार्क — अवधारणा एवं स्थिति

यूनेस्को ग्लोबल जियो-पार्क कार्यक्रम

यूनेस्को (UNESCO) का 'इंटरनेशनल जियोसाइंस एंड जियोपार्क्स प्रोग्राम' (IGGP) विश्वभर के ऐसे भौगोलिक क्षेत्रों को मान्यता देता है जहाँ अंतरराष्ट्रीय महत्व की भूवैज्ञानिक धरोहर, संरक्षण, शिक्षा व सतत विकास को एक साथ जोड़ा गया हो। यह मान्यता एक 'बॉटम-अप' (नीचे से ऊपर की ओर) प्रक्रिया है, यानी स्थानीय समुदायों, वैज्ञानिकों व सरकार की मज़बूत साझेदारी व दीर्घकालिक राजनीतिक समर्थन के बिना यह संभव नहीं है।

सूचकआँकड़ा (जुलाई 2026 तक)
विश्व में कुल यूनेस्को ग्लोबल जियो-पार्क241 जियो-पार्क, 51 देशों में फैले
हाल की वृद्धियूनेस्को ग्लोबल जियो-पार्क्स की 10वीं वर्षगांठ (2025) पर 11 देशों में 16 नए स्थलों को नेटवर्क में जोड़ा गया
मान्यता अवधिप्रत्येक जियो-पार्क को 4 वर्षों के लिए मान्यता मिलती है, इसके बाद पुनर्मूल्यांकन (Revalidation) प्रक्रिया से गुज़रना पड़ता है
भारत की स्थितिभारत में अभी तक एक भी यूनेस्को ग्लोबल जियो-पार्क नहीं है — भारत अभी जियो-पार्क विकसित करने की संभावनाएँ तलाश रहा है

राजस्थान/अरावली की संभावनाएँ

विशेषज्ञों व भूवैज्ञानिकों के अनुसार राजस्थान की अरावली पर्वतमाला यूनेस्को ग्लोबल जियो-पार्क बनने की दौड़ में देश के सबसे मज़बूत दावेदारों में से एक मानी जाती है। इसकी वजह यह है कि अरावली विश्व की सबसे प्राचीन वलित पर्वत श्रृंखलाओं (Fold Mountain Ranges) में गिनी जाती है — इसकी आयु लगभग 250-300 करोड़ वर्ष आँकी जाती है, जो हिमालय (लगभग 5 करोड़ वर्ष) से भी कई गुना पुरानी है।

परीक्षा हेतु स्पष्टता: यह ध्यान रखें कि 'राष्ट्रीय भूवैज्ञानिक स्मारक' (जिनकी संख्या राजस्थान में 12 है) पहले से घोषित व वास्तविक हैं, जबकि 'यूनेस्को ग्लोबल जियो-पार्क' का दर्जा राजस्थान या भारत के किसी भी क्षेत्र को अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है — अरावली सिर्फ एक संभावित उम्मीदवार (Potential Candidate) के रूप में चर्चा में है।

15संरक्षण के प्रयास एवं चुनौतियाँ

संरक्षण के प्रयास

1. राजस्थान सरकार पुरातात्विक स्मारकों की तर्ज़ पर राज्य के भू-विरासत स्थलों (Geo-heritage Sites) के लिए भी एक औपचारिक संरक्षण कार्ययोजना (Protection Action Plan) तैयार करने पर विचार कर रही है, ताकि इन स्थलों को कानूनी सुरक्षा मिल सके।

2. खान एवं भूविज्ञान विभाग इन स्थलों को अवैध खनन व अतिक्रमण जैसे खतरों से बचाने हेतु एक रणनीति पर काम कर रहा है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ जियो-हेरिटेज स्थल सक्रिय खनन क्षेत्रों (जैसे जावर) के निकट स्थित हैं।

3. पर्यटन विभाग व RTDC द्वारा जावर व झामर कोटड़ा जैसे स्थलों को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करना भी एक अप्रत्यक्ष संरक्षण रणनीति है — जब किसी स्थल का आर्थिक व सामाजिक महत्व बढ़ता है, तो उसके संरक्षण की संभावना भी बढ़ जाती है।

4. विश्वविद्यालयों (जैसे मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर) के भूविज्ञान विभाग निरंतर शोध व दस्तावेज़ीकरण के माध्यम से इन स्थलों के वैज्ञानिक महत्व को रेखांकित करते रहते हैं, जिससे इनके संरक्षण की आवश्यकता को बल मिलता है।

चुनौतियाँ

A. कानूनी संरक्षण का अभाव — पुरातात्विक स्मारकों के विपरीत जियो-हेरिटेज स्थलों के लिए राजस्थान में अभी कोई समर्पित कानून नहीं है, जिससे इनका संरक्षण मुख्यतः प्रशासनिक इच्छाशक्ति पर निर्भर रहता है।

B. सक्रिय खनन क्षेत्रों से निकटता — जावर व राजपुरा-दरीबा जैसे कई स्थल आज भी सक्रिय व्यावसायिक खनन क्षेत्रों के पास या भीतर स्थित हैं, जिससे इनके भौतिक स्वरूप को नुकसान पहुँचने का खतरा बना रहता है।

C. जन-जागरूकता की कमी — आम जनता व यहाँ तक कि स्थानीय प्रशासन में भी इन स्थलों के वैज्ञानिक महत्व को लेकर पर्याप्त जागरूकता नहीं है, जिससे संरक्षण के प्रयासों को राजनीतिक व सामाजिक समर्थन मिलने में कठिनाई होती है।

D. अवसंरचना व वित्तीय सीमाएँ — दूरस्थ स्थानों पर स्थित इन स्थलों तक पर्यटकों व शोधार्थियों की पहुँच आसान बनाने तथा उचित संरक्षण-अवसंरचना (बाड़, सूचना-पट्ट, संग्रहालय आदि) खड़ी करने के लिए पर्याप्त बजट व दीर्घकालिक योजना की आवश्यकता है।

16नवीनतम अपडेट 2025-26

💡 जावर व झामर कोटड़ा — जियो-टूरिज्म परियोजना (जनवरी 2025)

राजस्थान पर्यटन विभाग ने आधिकारिक रूप से घोषणा की कि उदयपुर के निकट जावर (प्राचीन खनन पर्यटन स्थल) व झामर कोटड़ा (प्रस्तावित फॉसिल पार्क) को नई 'लेज़र नॉन-टूरिज्म साइट्स' (Lesser Non-Tourism Sites) श्रेणी के अंतर्गत विकसित करने हेतु भूमि आवंटित कर दी गई है। कार्यकारी एजेंसी RTDC होगी और विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) PDCOR द्वारा तैयार की जा रही है — यह राजस्थान में जियो-टूरिज्म को औपचारिक नीतिगत समर्थन मिलने का पहला बड़ा उदाहरण है।

💡 यूनेस्को ग्लोबल जियो-पार्क नेटवर्क का विस्तार (अप्रैल 2025)

यूनेस्को ग्लोबल जियो-पार्क कार्यक्रम की 10वीं वर्षगांठ के अवसर पर अप्रैल 2025 में 11 देशों के 16 नए स्थलों को वैश्विक जियो-पार्क नेटवर्क (Global Geoparks Network — GGN) में शामिल किया गया, जिससे विश्व में कुल जियो-पार्क की संख्या 241 हो गई। भारत अभी भी इस सूची से अनुपस्थित है, जिससे विशेषज्ञों में अरावली जैसे संभावित भारतीय स्थलों के लिए औपचारिक आवेदन प्रक्रिया शुरू करने की माँग को बल मिला है।

💡 खान विभाग की सतर्कता — जियो-हेरिटेज स्थलों की सुरक्षा (2025-26)

राजस्थान के खान एवं भूविज्ञान विभाग द्वारा राज्य के भू-विरासत स्थलों को अवैध खनन व अन्य मानवजनित खतरों से बचाने हेतु एक सुरक्षा रणनीति पर काम किया जा रहा है, जो पुरातात्विक स्मारकों के संरक्षण मॉडल से प्रेरित है। साथ ही राज्य द्वारा गार्नेट, चूना-पत्थर व पोटाश जैसे खनिज ब्लॉकों की नीलामी हेतु केंद्र से अनुमति माँगी जा रही है, जिसमें भू-विरासत स्थलों के निकट खनन गतिविधियों के लिए पर्यावरणीय व वैज्ञानिक सुरक्षा-उपायों को भी शामिल करने पर बल दिया जा रहा है, ताकि आर्थिक विकास व भूवैज्ञानिक संरक्षण के बीच संतुलन बना रहे।

🔑 इस अध्याय के महत्वपूर्ण तथ्य
1. GSI (स्थापना 1851, खान मंत्रालय के अधीन) ही भारत में जियो-हेरिटेज स्थलों/राष्ट्रीय भूवैज्ञानिक स्मारकों को घोषित करने वाली नोडल एजेंसी है 2. राजस्थान में GSI द्वारा घोषित कुल 12 राष्ट्रीय भूवैज्ञानिक स्मारक हैं, जो 8 जिलों (पाली, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, जैसलमेर, अजमेर, जोधपुर, बूंदी, बारां) में फैले हैं 3. उदयपुर जिले में सबसे अधिक (3) जियो-हेरिटेज स्थल हैं — झामरकोतरा स्ट्रोमेटोलाइट पार्क, राजपुरा-दरीबा गॉसन एवं जावर सीसा-जस्ता खान 4. जियो-हेरिटेज स्थल एक अकेली संरचना होती है (GSI घोषित), जबकि जियो-पार्क एक बड़ा एकीकृत क्षेत्र होता है जिसे यूनेस्को मान्यता देता है (4 वर्ष हेतु, फिर पुनर्मूल्यांकन) 5. झामरकोतरा (उदयपुर) व भोजुंडा (चित्तौड़गढ़) के स्ट्रोमेटोलाइट जीवाश्म लगभग 200 करोड़ वर्ष पुराने हैं — ये धरती पर जीवन के सबसे प्राचीन प्रमाणों में से हैं 6. जावर (उदयपुर) विश्व का सबसे पुराना ज्ञात जस्ता प्रगलन (Zinc Smelting) स्थल है — यहाँ लगभग 2,000-3,000 वर्ष पुरानी खनन तकनीक के अवशेष मिलते हैं 7. अकाल जीवाश्म काष्ठ उद्यान (जैसलमेर) लगभग 18 करोड़ वर्ष पुराना है (जुरासिक काल) और साबित करता है कि थार मरुस्थल कभी घने जंगलों से ढका था 8. रामगढ़ क्रेटर (बारां) भारत के गिने-चुने उल्कापिंड आघात संरचना (Astrobleme) स्थलों में से एक है 9. सतूर ग्रेट बाउंड्री फॉल्ट (बूंदी) अरावली प्रणाली को विंध्यन बेसिन से अलग करने वाली प्रमुख भ्रंश-रेखा है 10. सेंदरा ग्रेनाइट व बर्र कांग्लोमरेट (दोनों पाली) इरिनपुरा ग्रेनाइट व दिल्ली सुपरग्रुप की भूवैज्ञानिक कहानी को दर्शाते हैं 11. किशनगढ़ नेफलाइन साइनाइट (अजमेर) एक दुर्लभ क्षारीय आग्नेय चट्टान है, जिसका उपयोग काँच व चीनी मिट्टी उद्योग में भी होता है 12. जोधपुर में दो स्थल हैं — वेल्डेड टफ (ज्वालामुखीय) व जोधपुर समूह-मालाणी आग्नेय समूह संपर्क (असंगति), दोनों मालाणी आग्नेय समूह की विशाल ज्वालामुखीय गतिविधि से जुड़े हैं 13. लाठी सीरीज (मोहनगढ़-पोकरण, जैसलमेर) एक प्राचीन दबी नदी-तंत्र है, जो पश्चिमी राजस्थान का महत्वपूर्ण भूजल भंडार (Aquifer) है, यद्यपि यह GSI की 12 की आधिकारिक सूची में शामिल नहीं है 14. जनवरी 2025 में जावर व झामर कोटड़ा को RTDC द्वारा जियो-टूरिज्म स्थल के रूप में विकसित करने हेतु भूमि आवंटित की गई 15. विश्व में कुल 241 यूनेस्को ग्लोबल जियो-पार्क हैं (51 देशों में, अप्रैल 2025 तक 16 नए जुड़े) — भारत में अभी एक भी नहीं है 16. अरावली पर्वतमाला (आयु लगभग 250-300 करोड़ वर्ष) को यूनेस्को ग्लोबल जियो-पार्क का संभावित सबसे मज़बूत भारतीय दावेदार माना जाता है, परंतु अभी तक कोई औपचारिक आवेदन नहीं हुआ है 17. जियो-हेरिटेज स्थलों के लिए राजस्थान में अभी कोई समर्पित कानूनी संरक्षण अधिनियम नहीं है — यह इनके सामने सबसे बड़ी चुनौती है

📝 पिछले वर्षों के प्रश्न (All Exams) 📝

Q1. राजस्थान में GSI द्वारा घोषित राष्ट्रीय भूवैज्ञानिक स्मारकों (जियो-हेरिटेज स्थलों) की कुल संख्या कितनी है? Q2. विश्व का सबसे पुराना जस्ता प्रगलन स्थल राजस्थान के किस जिले में स्थित है? Q3. झामरकोतरा (उदयपुर) में मिलने वाले स्ट्रोमेटोलाइट जीवाश्म लगभग कितने करोड़ वर्ष पुराने हैं? Q4. अकाल जीवाश्म काष्ठ उद्यान राजस्थान के किस जिले में स्थित है, तथा यह किस भूवैज्ञानिक काल का है? Q5. राजस्थान में 'ग्रेट बाउंड्री फॉल्ट' किन दो शैल-प्रणालियों को अलग करता है, और यह किस जिले में देखा जा सकता है? Q6. रामगढ़ क्रेटर की उत्पत्ति के बारे में वैज्ञानिकों की क्या मान्यता है? Q7. जियो-हेरिटेज स्थल एवं जियो-पार्क में क्या अंतर है? Q8. लाठी सीरीज का भूजल की दृष्टि से क्या महत्व है, और यह किन जिलों में विस्तारित है?

📌 अध्याय सारांश (Chapter Summary)

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