ज़रा सोचिए — एक नहर जो पंजाब के सतलज-व्यास नदियों से निकलकर लगभग 650 किलोमीटर का सफ़र तय करके राजस्थान के सबसे सूखे रेगिस्तान (जैसलमेर) तक पानी पहुँचाती है। यही है इंदिरा गांधी नहर परियोजना (IGNP) — जिसे लोग प्यार से 'मरुगंगा' कहते हैं, यानी रेगिस्तान की गंगा! इसने पश्चिमी राजस्थान की तस्वीर ही बदल दी — जहाँ पहले सिर्फ रेत के टीले थे, वहाँ आज गेहूँ व कपास के लहलहाते खेत हैं। और क्या आप जानते हैं कि राजस्थान में एक ऐसी परियोजना भी है, जिसमें खेतों तक पानी नहरों से नहीं, बल्कि पूरी तरह ड्रिप (बूंद-बूंद) और फव्वारा पद्धति से पहुँचाया जाता है? यह है नर्मदा नहर परियोजना — जो राज्य की पहली और एकमात्र ऐसी परियोजना है, जहाँ पानी की एक-एक बूंद सीधे पौधों की जड़ों तक भेजी जाती है, ताकि रेगिस्तान में पानी की एक बूंद भी बर्बाद न हो। सबसे दिलचस्प बात यह है कि सदियों पहले जब कोई बड़ी नहर या बाँध नहीं था, तब भी राजस्थान के लोगों ने बावड़ी, टांका, खड़ीन और जोहड़ जैसी अद्भुत परंपरागत तकनीकों से पानी बचाना सीख लिया था — यही वजह है कि आज भी राजस्थान को जल-प्रबंधन की सबसे समृद्ध परंपरा वाला राज्य माना जाता है। आइए, इस अध्याय में राजस्थान की सभी प्रमुख सिंचाई परियोजनाओं और जल संरक्षण तकनीकों को विस्तार से समझते हैं।
A. सिंचाई के साधन
राजस्थान में खेतों तक पानी पहुँचाने के मुख्यतः 5 साधन हैं। इनमें नलकूप (Tube-well) का योगदान सबसे अधिक है, जो दिखाता है कि राजस्थान की सिंचाई आज भी बहुत हद तक भूजल (ज़मीन के नीचे के पानी) पर निर्भर है।
| साधन | सिंचाई में योगदान | सर्वाधिक जिला | विशेष |
|---|---|---|---|
| नलकूप (Tube-well) | 49.94% | जयपुर | सर्वाधिक योगदान |
| कुएँ (Wells) | 24.41% | जयपुर | — |
| नहर (Canal) | 23.05% (नए आँकड़े: 29.52-29.75%) | श्रीगंगानगर | दूसरा स्थान |
| तालाब (Tank) | 0.43% (नए आँकड़े: 0.40%) | भीलवाड़ा/पाली | सबसे कम योगदान |
| अन्य स्रोत | 2.41% | — | — |
कुल सिंचित क्षेत्र: राजस्थान का कुल सिंचित क्षेत्र 35,47,212 हेक्टेयर है, जबकि कुल खेती योग्य क्षेत्र 2,23,25,051 हेक्टेयर है — यानी अभी भी खेती योग्य ज़मीन का बड़ा हिस्सा सिंचाई से वंचित है। राजस्थान के 13 नदी बेसिनों में कुल आंतरिक सतही जल क्षमता 15.86 MAF (Million Acre Feet) है, जो भारत के कुल जल का मात्र 1.16% है — यानी देश का सबसे बड़ा राज्य (क्षेत्रफल में) भी जल के मामले में बहुत गरीब है। राजस्थान की जल नीति को 17 फरवरी 2010 को राज्य मंत्रिमंडल ने मंज़ूरी दी थी।
B. सिंचाई परियोजनाओं का वर्गीकरण (आकार के अनुसार)
| क्रम | परियोजना का प्रकार | सिंचित क्षेत्र | विशेष |
|---|---|---|---|
| (i) | लघु सिंचाई परियोजना | 0 - 2,000 हेक्टेयर | सर्वाधिक योगदान (संख्या में सबसे ज़्यादा) |
| (ii) | मध्यम सिंचाई परियोजना | 2,000 - 10,000 हेक्टेयर | — |
| (iii) | वृहद सिंचाई परियोजना | 10,000 हेक्टेयर या अधिक | बड़े बाँध/नहर (जैसे IGNP, चंबल) |
बहुउद्देशीय परियोजना (Multi-Purpose Project) वह परियोजना है, जिसके दो या दो से अधिक उद्देश्य हों — जैसे सिंचाई, पेयजल, जल विद्युत आदि एक साथ। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने बहुउद्देशीय परियोजनाओं को 'आधुनिक भारत के मंदिर' (Temples of Modern India) कहा था — क्योंकि जिस तरह मंदिर लोगों की आस्था का केंद्र होते हैं, उसी तरह ये परियोजनाएँ आधुनिक भारत के विकास की आस्था का केंद्र बनीं।
| विश्व की पहली | भारत की पहली | राजस्थान की पहली |
|---|---|---|
| टेनेसी (USA) — 1933 | दामोदर घाटी परियोजना — 1948 | गंग नहर — 1950 के बाद |
(रिक्त मानचित्र में स्वयं अभ्यास करें) मानचित्र — राजस्थान की प्रमुख बहुउद्देशीय परियोजनाओं (नदी घाटी + नहर) की स्थिति
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| सहयोगी राज्य | राजस्थान एवं मध्यप्रदेश — हिस्सेदारी 50:50 |
| नदी | चंबल नदी |
| उद्देश्य | भू-क्षरण एवं बाढ़ की समस्या समाधान + सिंचाई + जल विद्युत |
| कुल जल विद्युत | 386 MW (राजस्थान: 193 MW | मध्यप्रदेश: 193 MW) |
| कुल सिंचित क्षेत्र | 4.5 लाख हेक्टेयर |
| बाँधों का सही क्रम (प्रवाह की दिशा में) | गांधी सागर → राणा प्रताप सागर → जवाहर सागर → कोटा बैराज |
| चरण | बाँध | स्थान | विद्युत (MW) | विशेषताएँ |
|---|---|---|---|---|
| I (प्रथम) | गांधी सागर | मंदसौर, चौरासीगढ़ (M.P.) के निकट | 5×23 = 115 MW | चंबल पर सबसे ऊँचा व बड़ा बाँध; ऊँचाई 62.17 मी; शुरुआत 1959 |
| I (प्रथम) | कोटा बैराज (सिंचाई बाँध) | कोटा (राजस्थान), शुरुआत 1960 | शून्य (0) — सिंचाई मात्र | एकमात्र बाँध जिसमें विद्युत नहीं; कैचमेंट सर्वाधिक; बायीं नहर (कोटा, बूंदी) + दायीं नहर (कोटा, बारां, M.P.); दायीं नहर पर 8 लिफ्ट नहरें राजस्थान में |
| II (द्वितीय) | राणा प्रताप सागर | रावतभाटा, चित्तौड़गढ़ | 4×43 = 172 MW (सर्वाधिक) | राजस्थान का सबसे बड़ा बाँध; भराव क्षमता 113 वर्ग किमी (राज. में सर्वाधिक); रावतभाटा परमाणु विद्युत गृह (कनाडा सहयोग) निकट; शुरुआत 1970; आइकोनिक बाँध |
| III (तृतीय) | जवाहर सागर (कोटा डैम) | कोटा-बूंदी सीमा, शुरुआत 1972 | 3×33 = 99 MW | पिकअप बाँध (गांधी सागर + राणा प्रताप सागर का जल संग्रहण करता है); चंबल का सर्वाधिक प्रदूषण यहीं दर्ज होता है |
कोटा बैराज की लिफ्ट नहरें: कोटा बैराज से कुल 14 लिफ्ट नहरें निकलती हैं — 8 राजस्थान में एवं 6 मध्यप्रदेश में। राजस्थान की 8 लिफ्ट नहरें हैं: दोगोद, जालीपुरा, गठणेश, गणेगंज+अनार, वाणेरावांज, अंता लिफ्ट, अंता माइनर, सीरखंड भोरसन।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| सहयोगी राज्य | राजस्थान (45%) + गुजरात (55%) |
| विद्युत स्वामित्व | 100% विद्युत केवल राजस्थान को (गुजरात का कोई हिस्सा नहीं) |
| मुख्य बाँध | माही बजाज सागर बाँध — बोरखेड़ा गाँव, बाँसवाड़ा | लंबाई: 3109 मीटर (राजस्थान का सबसे लंबा बाँध) |
| गुजरात में बाँध | कड़ाणा बाँध (गुजरात) | जल विद्युत: 240 MW |
| विद्युत उत्पादन (राजस्थान) | प्रथम चरण (1986): 2×25 MW = 50 MW | द्वितीय चरण (1989): 2×45 MW = 90 MW | कुल: 140 MW |
| कागदी पिकअप बाँध | बाँसवाड़ा में स्थित; ऊबड़-खाबड़ भूमि के कारण मुख्य बाँध से सीधी नहरें नहीं निकल पातीं, इसलिए नहरों हेतु यह अलग पिकअप बाँध बनाया गया |
| लाभ | आदिवासी क्षेत्रों में क्रांतिकारी परिवर्तन — सर्वाधिक लाभ बाँसवाड़ा को मिला |
जाखम नदी (माही की सहायक नदी) पर प्रतापगढ़ ज़िले के अनूपपुरा के पास बना यह बाँध ऊँचाई में 81 मीटर एवं लंबाई में 253 मीटर है — यह एशिया का चिनाई (Masonry) से बना सबसे ऊँचा बाँध है, और साथ ही राजस्थान का भी सबसे ऊँचा बाँध है। इसका शिलान्यास 14 मई 1968 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मोहन लाल सुखाड़िया ने किया था। लाभार्थी ज़िले: प्रतापगढ़, चित्तौड़गढ़, सलूंबर, उदयपुर।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| नदी | सतलज नदी |
| सहयोगी राज्य | पंजाब, हरियाणा, राजस्थान (15.22%) |
| भाखड़ा बाँध | बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश | भारत का सबसे ऊँचा गुरुत्वीय (Gravity) बाँध — ऊँचाई 290 मीटर | पीछे बनी झील का नाम: गोविंद सागर झील |
| नांगल बाँध | रोपड़/रूपनगर, पंजाब | बायीं नहर: भाखड़ा नहर (पंजाब, हरियाणा, राजस्थान) | दायीं नहर: बिस्त नहर (पंजाब) |
| राजस्थान का हिस्सा | 15.22% | विद्युत: 227.32 MW | सिंचाई: 2.3 लाख हेक्टेयर |
| सर्वाधिक लाभार्थी | सिंचाई: हनुमानगढ़ | विद्युत: चूरू, गंगानगर, हनुमानगढ़, सीकर, झुंझुनूं, बीकानेर |
नेहरूजी की मशहूर उक्ति: नेहरूजी ने भाखड़ा-नांगल परियोजना को 'आधुनिक/पुनरुत्थित भारत का नवीन मंदिर' एवं 'चमत्कारी विराट वस्तु' कहा था। भाखड़ा-नांगल — भारत एवं राजस्थान दोनों के लिए सबसे बड़ी बहुउद्देशीय परियोजना मानी जाती है।
महत्वपूर्ण समझौते: राजीव गांधी-लोंगोवाल समझौता (1985) एवं इराड़ी कमीशन (1986) — दोनों व्यास परियोजना के जल-बँटवारे से संबंधित महत्वपूर्ण दस्तावेज़ हैं।
| विवरण | रेणुकाजी परियोजना | लखवार (यमुना) परियोजना |
|---|---|---|
| नदी | गिरी नदी (सिरमौर, हिमाचल प्रदेश) | यमुना (देहरादून, उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड) |
| वित्त सहयोग | केंद्र 90 : राज्य 10 | केंद्र 90 : राज्य 10 |
| विद्युत क्षमता | 40 MW (प्रस्तावित) | 300 MW (प्रस्तावित) |
| लाभार्थी राज्य | हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, दिल्ली | हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, दिल्ली |
गंग नहर राजस्थान की सिंचाई का इतिहास शुरू करने वाली सबसे पहली परियोजना है — इसे विश्व की सबसे पुरानी व विकसित नहरों में गिना जाता है।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| विशेष दर्जा | विश्व की सबसे पुरानी व विकसित नहर | राजस्थान की प्रथम नहर सिंचाई परियोजना | भारत/राजस्थान की प्रथम पक्की नहर | राजस्थान की प्रथम बहुउद्देशीय परियोजना |
| निर्माता | महाराजा गंगासिंह जी (बीकानेर) — इन्हें 'आधुनिक भारत का भागीरथ' कहा जाता है |
| निर्माण काल | 1921-1927 ई. | नींव: 5 सितंबर 1921 | उद्घाटन: 26 अक्टूबर 1927 (वायसराय लॉर्ड इरविन द्वारा) |
| जल स्रोत | सतलज नदी — हुसैनीवाला, फिरोजपुर (पंजाब) |
| राजस्थान प्रवेश | संखा गाँव, श्रीगंगानगर |
| लंबाई | हुसैनीवाला से शिवपुर = 137 किमी | शिवपुर → श्रीगंगानगर → जोरावरपुर → पदमपुर → स्वरूप शहर |
| विशेष | नहर का पेटा (तल) सीमेंट से निर्मित है | गंगानगर की जीवन रेखा मानी जाती है |
| लिफ्ट नहरें | (i) करणी लिफ्ट (ii) लक्ष्मी नारायण लिफ्ट (iii) लालगढ़ लिफ्ट (iv) समीजा लिफ्ट |
| सर्वाधिक लाभार्थी | श्रीगंगानगर — इसे 'राजस्थान का धान्यागार' कहा जाता है, क्योंकि यहाँ गंग नहर + IGNP दोनों से सिंचाई होती है |
IGNP को 'मरुगंगा', 'पश्चिमी राजस्थान की जीवन रेखा' एवं 'मरुतांगा' जैसे प्यारभरे नामों से पुकारा जाता है — यह भारत की सबसे विशाल बहुउद्देशीय नहर परियोजना है।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| प्रारूप/कल्पनाकार | राय बहादुर कँवर सेन (1948) — उन्होंने 'बीकानेर राज्य के लिए पानी की आवश्यकता' नामक पुस्तक लिखी थी |
| नींव | 31 मार्च 1958 — गोविंद वल्लभ पंत (तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री) द्वारा |
| उद्घाटन | 11 अक्टूबर 1961 — डॉ. एस. राधाकृष्णन (तत्कालीन उपराष्ट्रपति) द्वारा |
| पहला नाम | राजस्थान नहर | नाम परिवर्तन: 2 नवंबर 1982-84 के आसपास इंदिरा गांधी नहर किया गया |
| जल स्रोत | सतलज + व्यास नदी — हरिके बैराज, फिरोजपुर (पंजाब) | ध्यान रहे — यह नहर हरियाणा से होकर नहीं गुज़रती |
| राजस्थान प्रवेश | मसीतावाली गाँव, हनुमानगढ़ |
| कुल लंबाई | 649 किमी | मुख्य नहर: 445 किमी | फीडर नहर: 204 किमी (जिसमें से राजस्थान में सिर्फ 35 किमी) |
| राजस्थान में कुल लंबाई | 445 + 35 = 480 किमी |
| सिंचित क्षेत्र | प्रस्तावित: 19.63 लाख हेक्टेयर | वर्तमान स्वीकृत (2005): 16.17 लाख हेक्टेयर |
| विद्युत क्षमता | 23.85 MW |
| वित्त सहयोग | विश्व बैंक | संभागीय मुख्यालय: बीकानेर |
| चरण | फीडर नहर | मुख्य नहर | विशेष |
|---|---|---|---|
| प्रथम चरण (393 किमी) | 204 किमी: हरिके बैराज → मसीतावाली (हनुमानगढ़) | 189 किमी: मसीतावाली → पूंगल हैड (सत्तासर, बीकानेर) | — |
| द्वितीय चरण (266 किमी) | — | 256 किमी: पूंगल हैड → मोहनगढ़ (जैसलमेर) | मोहनगढ़ = IGNP का 'Zero Point' (अंतिम छोर); बाबा रामदेव उपशाखा: 165 किमी; अंतिम प्रस्ताव: गडरा रोड, बाड़मेर तक विस्तार |
जिला पुनर्गठन के बाद अपडेट: नए जिला पुनर्गठन के बाद फलौदी को सिंचाई + पेयजल दोनों श्रेणी में तथा डीडवाना-कुचामन को सिर्फ पेयजल श्रेणी में शामिल किया गया है। IGNP से सर्वाधिक लाभान्वित जिला बीकानेर है, क्योंकि यहाँ सर्वाधिक लिफ्ट नहरें व शाखाएँ हैं।
लिफ्ट नहर का मतलब है — जहाँ पानी को पंप की मदद से ऊँचाई पर उठाकर ('लिफ्ट' करके) आगे भेजा जाता है, क्योंकि साधारण ढाल (Gravity) से पानी वहाँ नहीं पहुँच सकता। सभी 7 लिफ्ट नहरें IGNP की बायीं ओर स्थित हैं, क्योंकि बायीं ओर का धरातल (ज़मीन) ऊँचा है — इनकी कुल लंबाई 1495 किमी है।
| क्रम | वर्तमान नाम | पुराना नाम | लाभार्थी जिले | विशेषताएँ |
|---|---|---|---|---|
| 1 | चौधरी कुंभाराम आर्य (नोहर-साहवा) | गंधेली-साहवा लिफ्ट | हनुमानगढ़, बीकानेर, चूरू, झुंझुनूं | सहायक नहरों सहित सबसे लंबी; सर्वाधिक जिलों में विस्तृत |
| 2 | कँवरसेन (लूणकरणसर) | लूणकरणसर लिफ्ट | गंगानगर, बीकानेर | IGNP की प्रथम एवं सबसे लंबी लिफ्ट; बीकानेर शहर को पेयजल ('बीकानेर की जीवन रेखा') |
| 3 | पन्नालाल बारूपाल (गजनेर) | गजनेर लिफ्ट | बीकानेर, नागौर | जल स्रोत: हरिके बैराज; जायल डी-फ्लोराइड पेयजल परियोजना (नागौर) इसी पर आधारित |
| 4 | वीर तेजाजी (बांगड़सर) | बांगड़सर लिफ्ट | केवल बीकानेर | IGNP की सबसे छोटी लिफ्ट नहर |
| 5 | डॉ. करणी सिंह (कोलायत) | कोलायत लिफ्ट | बीकानेर, जोधपुर (फलौदी) | — |
| 6 | गुरु जंभेश्वर (फलौदी) | फलौदी लिफ्ट | बीकानेर, जोधपुर, जैसलमेर | — |
| 7 | जयनारायण व्यास (पोकरण) | पोकरण लिफ्ट | जोधपुर, फलौदी, जैसलमेर | — |
| क्रम | शाखा का नाम | क्रम | शाखा का नाम |
|---|---|---|---|
| 1 | सूरतगढ़ | 5 | बिरसलपुर |
| 2 | अनूपगढ़ | 6 | चारणवाला |
| 3 | पूगलगढ़ | 7 | शहीद बीरबल |
| 4 | दंतोर (दातोर) | 8 | सागरमल गोपा |
निष्कर्ष: ऊपर बताई गई समस्याओं के समाधान के बाद, IGNP राजस्थान के लिए वास्तव में एक वरदान साबित हुई है — यह दिखाता है कि किसी भी बड़ी परियोजना में शुरुआती समस्याएँ आना स्वाभाविक है, लेकिन सही योजना व निरंतर सुधार से उसे वरदान में बदला जा सकता है।
(रिक्त मानचित्र में स्वयं अभ्यास करें) मानचित्र — इंदिरा गांधी नहर परियोजना (IGNP) का पूरा मार्ग, 7 लिफ्ट नहरें एवं 8 शाखाएँ
रोचक तथ्य: मई 1998 में भारत के परमाणु परीक्षण (पोखरण-II) के बाद यूरोपीय संघ ने इस परियोजना को आर्थिक सहयोग देना बंद कर दिया था — यह दिखाता है कि कैसे अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक घटनाएँ स्थानीय विकास परियोजनाओं को भी प्रभावित कर सकती हैं। ध्यान रहे — बीकानेर इस परियोजना से लाभान्वित नहीं होता।
| विवरण | यमुना नहर (प्रस्तावित) | यमुना लिंक/गुड़गाँव नहर |
|---|---|---|
| नदी | यमुना | यमुना (ओखला, दिल्ली) |
| सहयोग | राजस्थान + हरियाणा (MoU: 17 फरवरी 2014) | राजस्थान + हरियाणा | 1966-1985 |
| लाभार्थी जिले | शेखावाटी: चूरू, सीकर, झुंझुनूं | भरतपुर, डीग |
| उद्देश्य | पेयजल: चूरू 35,000 + कुल 70,000 हेक्टेयर; द्वितीय चरण: सिंचाई; यमुना जल: 1917 क्यूसेक (जुलाई-अक्टूबर) | सिंचाई + पेयजल |
भरतपुर नहर: निर्माण: 1964 ई. | सहयोग: राजस्थान + उत्तरप्रदेश | लाभार्थी: भरतपुर | लंबाई: 24 किमी (उत्तर प्रदेश में 15 किमी + राजस्थान में 9 किमी)
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| संयुक्त राज्य | मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान |
| मुख्य बाँध | सरदार सरोवर बाँध (गुजरात) — नर्मदा नदी पर |
| राजस्थान का हिस्सा | 0.50 MAF (नर्मदा जल विवाद प्राधिकरण द्वारा तय) |
| राजस्थान में लंबाई | 74 किमी | कुल लंबाई: 832 किमी (458 गुजरात + 74 राजस्थान + शेष अन्य राज्यों में) |
| राजस्थान प्रवेश | सीलू गाँव, जालौर |
| लाभार्थी जिले | जालौर (76 गाँव) + बाड़मेर (गुढ़ामलानी तहसील) | सिंचित क्षेत्र: 2.46 लाख हेक्टेयर |
| ड्रिप सिंचाई | मूल रूप से इज़राइल की देन — पौधों की जड़ों में सीधे पानी पहुँचाई जाती है |
| लिफ्ट नहरें | (i) सांचौर लिफ्ट (जालौर) (ii) भादरेड़ा लिफ्ट (जालौर) (iii) पनोरिया लिफ्ट (बाड़मेर) |
नर्मदा नहर परियोजना राजस्थान के सबसे शुष्क क्षेत्रों (जालौर, बाड़मेर) तक पानी पहुँचाती है, इसलिए यहाँ हर बूंद कीमती है। पारंपरिक नहर सिंचाई में पानी खेत में बहाकर दिया जाता है, जिसमें काफी पानी वाष्पीकरण (भाप बनकर उड़ने) व रिसाव से बर्बाद हो जाता है। लेकिन ड्रिप सिंचाई में पानी सीधे पौधे की जड़ तक एक पतली पाइप से बूंद-बूंद टपकाया जाता है — ठीक वैसे ही जैसे किसी मरीज़ को ड्रिप (सलाइन) चढ़ाई जाती है, सीधे नस में, बिना एक बूंद बर्बाद किए। यही वजह है कि इसे यहाँ अनिवार्य किया गया, ताकि सीमित पानी से अधिकतम खेती हो सके। ध्यान रहे — बाड़मेर एक ऐसा जिला है जो IGNP एवं नर्मदा नहर, दोनों से लाभान्वित होता है।
(रिक्त मानचित्र में स्वयं अभ्यास करें) मानचित्र — नर्मदा नहर, राजीव गांधी सिद्धमुख-नोहर एवं यमुना/भरतपुर नहरों का मार्ग
पार्वती-कालीसिंध-चंबल (PKC) / पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना (ERCP) राजस्थान की सबसे महत्वाकांक्षी नवीनतम सिंचाई परियोजना है, जिसका उद्देश्य पूर्वी राजस्थान के जल संकट को स्थायी रूप से हल करना है। इसका MoU (समझौता ज्ञापन) 28 जनवरी 2024 को राजस्थान, मध्यप्रदेश एवं केंद्र सरकार के बीच हुआ था — इसे 'राम जल सेतु लिंक परियोजना (RSLP)' भी कहा जाता है।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| उद्देश्य | चंबल बेसिन की नदियों को आपस में जोड़ना; पूर्वी राजस्थान में पेयजल + सिंचाई; DMIC (दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर) को जलापूर्ति; भूजल स्तर में सुधार |
| नदियाँ | कुन्नू, कुराल, कालीसिंध, चाकण, पार्वती, मेज → चंबल, बनास, बाणगंगा, गंभीरी |
| वित्त सहयोग | केंद्र 90 : राज्य 10 | कुल ₹45,000 करोड़ प्रस्तावित |
| लाभार्थी जनसंख्या | 3.38 करोड़ |
| लाभार्थी जिले | 17 जिले (पुराने विभाजन में 13 थे) — कोटा, बूंदी, बारां, झालावाड़, टोंक, सवाई माधोपुर, दौसा, करौली, अलवर, धौलपुर, भरतपुर, डीग, खैरथल-तिजारा, कोटपूतली-बहरोड़, जयपुर, ब्यावर, अजमेर |
| सिंचित क्षेत्र | राजस्थान: 2.80 लाख हेक्टेयर (राजस्थान+मध्यप्रदेश कुल 5.6 लाख हेक्टेयर) |
| जल वितरण | राजस्थान: 4102 MCM | मध्यप्रदेश: 3120 MCM |
| बजट स्वीकृति (प्रथम चरण) | ₹9,600 करोड़ (बजट 2024-25) — रामगढ़, महलपुर व नवनेरा बैराज से बीसलपुर + ईसरदा बाँध भरे जाएँगे |
| क्रम | संरचना | नदी | जिला |
|---|---|---|---|
| 1 | रामगढ़ बैराज | कूल नदी | बारां |
| 2 | महलपुर बैराज | पार्वती नदी | बारां |
| 3 | नवनेरा बैराज (सर्वाधिक भराव क्षमता) | कालीसिंध नदी | दीगोद, कोटा |
| 4 | मेज बैराज | मेज नदी | बूंदी |
| 5 | राठौड़ बैराज | बनास नदी | सवाई माधोपुर |
| 6 | डूंगरी बाँध (जल संग्रहण) | बनास नदी | सवाई माधोपुर |
| 7 | ईसरदा बाँध | बनास नदी | सवाई माधोपुर/टोंक |
बैराज बनाम बाँध — अंतर याद रखें: बैराज (Barrage) मुख्यतः जल अपवर्तन (यानी नदी के पानी की दिशा मोड़कर नहर में भेजने) के लिए बनाया जाता है, जबकि बाँध (Dam) जल संग्रहण (यानी बड़ी मात्रा में पानी इकट्ठा करके रखने) के लिए बनाया जाता है — यह ठीक वैसे ही है जैसे बैराज एक 'रास्ता बदलने वाला गेट' हो और बाँध एक 'बड़ा टैंक' हो। ERCP से राजस्थान को अगले 3-4 दशक तक पेयजल सुरक्षा मिलने की उम्मीद है।
(रिक्त मानचित्र में स्वयं अभ्यास करें) मानचित्र — PKC-ERCP परियोजना के अंतर्गत प्रस्तावित बैराज एवं बाँधों की स्थिति तथा लाभार्थी 17 जिले
बनास, खारी एवं डाई नदियों के त्रिवेणी संगम पर बनी यह परियोजना (1987-1999 के दौरान निर्मित) राजस्थान का एकमात्र कंक्रीट बाँध है। स्थान: बीसलपुर गाँव, देवली (टोंक)। लाभार्थी: जयपुर, ब्यावर, अजमेर, टोंक। इसे NABARD/RIDF से वित्तीय सहायता मिली थी, और ब्राह्मणी-बनास परियोजना (बजट 2018-19) से इसमें पानी की आवक और बढ़ेगी।
'मारवाड़ का अमृतसरोवर' कहलाने वाला यह बाँध पाली ज़िले में जवाई नदी पर बना है। इसकी नींव 13 मई 1946 को जोधपुर के महाराजा उम्मेदसिंह ने रखी थी, और इसे इंजीनियर एडगर व फर्ग्यूसन ने डिज़ाइन किया था। पेयजल: जोधपुर + पाली को मिलता है, जबकि सिंचाई: जालौर + पाली में होती है। सेई परियोजना के तहत कोटड़ा (उदयपुर) से सुरंग बनाकर जवाई बाँध तक पानी लाया जाता है।
परवन नदी पर, खानपुर (झालावाड़) के ग्राम अकावद कलाँ में स्थित यह परियोजना — पेयजल: 1821 गाँवों को, सिंचाई: 2,01,400 हेक्टेयर (झालावाड़, बारां, कोटा के 637 गाँव) में उपलब्ध कराती है। इसे 2023 तक पूर्ण करने का लक्ष्य रखा गया था।
नीचे दी गई तालिका में राजस्थान के प्रत्येक प्रमुख जिले के महत्वपूर्ण बाँधों/जलाशयों की सूची दी गई है — यह परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण खंड है।
| जिला | प्रमुख बाँध/परियोजनाएँ |
|---|---|
| कोटा | नवनेरा/नौनेरा बाँध (कालीसिंध, दीगोद), गोपालपुरा, तकली (धानक्या, रामगंज मंडी), सावन-भादो (सांगोद), आलनिया, हरिश्चंद्र सागर (33 गेटों वाला, कालीसिंध-झालावाड़) |
| झालावाड़ | भीमसागर (उजाड़ नदी), हरिश्चंद्र सागर, छापी, गागरीन (कालापीपल-पिड़ावा), पीपलाद/पिप्पलाद (सूलिया चौकी, अकलेरा), चौली, राजगढ़, मनोहरयाना, रेवा, परवन, कालीसिंध परियोजना |
| बारां | ल्हासी (खजुरिया, छीपाबड़ौद), परवन लिफ्ट, बिलास (कनवास/किशनगढ़), बेथली, खिरिया, अहमदी, रामगढ़ बैराज (PKC), महलपुर बैराज (PKC), अंधेरी, हथियादेह |
| बूंदी | गरड़दा (पोलासपुरा — 2.90 लाख लोग लाभान्वित), गुढ़ा, चाकन, जैत सागर, नवल सागर, जिगजैग बाँध (लाखेरी), हिंडोली तालाब, मेज बैराज (PKC), बारदड़ा — राज्य में सर्वाधिक बावड़ियाँ बूंदी में ही हैं |
| सवाई माधोपुर | ईसरदा बाँध (काफर डैम), इंदिरा लिफ्ट परियोजना, पीपलदा, मोरेल, राठौड़ बैराज (PKC), डूंगरी बाँध (PKC) |
| दौसा | माधोसागर, काला खोह (सबसे बड़ा बाँध), चिरमिरी, झिलमिली, रेडियो सागर |
| टोंक | बीसलपुर परियोजना, बालवा डैम, टोरड़ी सागर, मोरा सागर बाँध |
| भरतपुर | बंध बारेठा (कुकुंद नदी, 1897, राजा रामसिंह के समय, जहाज़ जैसी बनावट), मोती झील (भरतपुर की जीवन रेखा), भरतपुर नहर |
| धौलपुर | तालाब-ए-शाही, धौलपुर लिफ्ट (चंबल, सागरपाडा), पार्वती बाँध, कालितीर परियोजना (चंबल से पार्वती-रामसागर में जलापूर्ति) |
| करौली | पाँचना बाँध (मिट्टी से निर्मित — भद्रावती, माची, अटा, बरखेड़ा, भैंसावट नदियों का संगम), शाही कुंड, इंदिरा गांधी परियोजना |
| भीलवाड़ा | मेजा बाँध (कोठारी नदी, 1972, मेजा पार्क विकसित) — सिंचाई में तालाबों से सर्वाधिक योगदान |
| उदयपुर | सोम-कागदर (ऋषभदेव), मानसी वाकल (उदयपुर को 24 ML पेयजल + 30% हिन्दुस्तान जिंक को; अरावली की दूसरी सुरंग, पहली 1973 में देवास नाई सुरंग), मदार बाँध (बेड़च नदी), टिड्डी बाँध — राज्य में सर्वाधिक झीलें उदयपुर में ही हैं |
| डूंगरपुर | सोम-कमला-अंबा (सोम नदी, आसपुर तहसील + सलूंबर), गैब सागर/गैप सागर, भीखाभाई सागवाड़ा नहर (माही साइफन), कडाना बैक वाटर |
| बाँसवाड़ा | माही बजाज सागर (राज्य का सबसे लंबा बाँध: 3109 मी), कागदी पिकअप बाँध, अनास बाँध (अनास नदी) |
| प्रतापगढ़ | जाखम बाँध (81 मी ऊँचा, 253 मी लंबा) — एशिया का चिनाई वाला सर्वोच्च बाँध; पिपलखूंत नहर (माही के दायीं ओर) |
| पाली | जवाई बाँध (पश्चिमी राजस्थान का सबसे बड़ा), हेमावास, रामेलाव तालाब (सोजत), सेई परियोजना |
| जालौर | बाँकली सिंचाई परियोजना (सुकड़ी नदी), बाँडी-सेदडा, नर्मदा नहर, सांचौर + भादरेड़ा लिफ्ट |
| चित्तौड़गढ़ | मातृकुंडिया बाँध (राज्य में सर्वाधिक 52 गेट), घोसुंडा बाँध, ओराई |
| अजमेर | नारायण सागर बाँध (खारी नदी — 'अजमेर का समुद्र', ब्यावर की जीवन रेखा) |
| राजसमंद | नंदसमंद बाँध (राजसमंद की जीवन रेखा) |
| जयपुर | बीसलपुर परियोजना, कानोता बाँध (सर्वाधिक मछली उत्पादन), हिंगोनिया बाँध, पन्ना मीना कुंड, द्रव्यवती नदी (जयपुर की जीवन रेखा) |
| अलवर | साँकड़ा + मनसासागर (तरुण भारत संघ सहयोग — भाँवता, गढ़बसई गाँव) |
| झुंझुनूं | सरजू सागर/कोट बाँध (शाकंभरी पहाड़ियाँ, उदयपुरवाटी से 13 किमी), पन्नाशाह तालाब (खेतड़ी) |
| सीकर | कोटड़ी बाँध (कांटली नदी, खंडेला — निर्माणाधीन) |
| जोधपुर | पिचियाक बाँध/जसवंत सागर, तख्त सागर, फतेहसागर, रानीसर (टाँका), पदमसर |
| जैसलमेर | गढ़सीसर/गढ़ीसर (1340 ई., रावल गड़सीसिंह — प्रवासी कुरजा पक्षी यहाँ आते हैं; 1909 में टीलां वेश्या का प्रवेश द्वार बना; लोक सांस्कृतिक संग्रहालय भी है), अमर सागर |
| सिरोही | बत्तीसा नाला, सुकली सेलवाड़ा, दूध बावड़ी, लाहिनी बावड़ी |
(रिक्त मानचित्र में स्वयं अभ्यास करें) मानचित्र — राजस्थान के सभी 33 जिलों के प्रमुख बाँध व जलाशयों की स्थिति
बड़ी नहरों व बाँधों से बहुत पहले, राजस्थान के लोगों ने पानी बचाने के लिए कई अद्भुत परंपरागत तकनीकें विकसित कर ली थीं — ये तकनीकें आज भी राजस्थान की जल-प्रबंधन संस्कृति की मिसाल मानी जाती हैं। इन्हें दो भागों में समझा जा सकता है — वर्षा जल आधारित एवं भूजल आधारित।
बावड़ी को ऐसे समझें जैसे किसी उल्टे पिरामिड (सीढ़ीदार सिनेमाघर) की तरह ज़मीन के अंदर बनी एक सुंदर इमारत हो — जहाँ हर मंज़िल पर सीढ़ियाँ नीचे जल स्तर तक जाती हैं। गर्मियों में जब पानी का स्तर नीचे चला जाता है, तब लोग सबसे निचली सीढ़ियों तक जाकर पानी लेते हैं, और मानसून के बाद जब पानी ऊपर आ जाता है, तब ऊपरी सीढ़ियों से ही पानी मिल जाता है — यही इसकी सबसे बड़ी खूबी है।
राजेंद्र सिंह, जिन्हें प्यार से 'जोहड़ वाले बाबा' कहा जाता है, ने राजस्थान के सूखे इलाकों में सैकड़ों पुराने जोहड़ों को फिर से ज़िंदा किया (पुनर्जीवित किया), जिससे कई सूखी नदियाँ फिर से बहने लगीं। इस अद्भुत काम के लिए उन्हें रमन मैग्सेसे पुरस्कार (जिसे 'एशिया का नोबेल पुरस्कार' भी कहा जाता है) मिला। उन्होंने 1975 में जयपुर में 'तरुण भारत संघ' नामक संस्था स्थापित की, जो आज भी जल संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय है — यह कहानी दिखाती है कि कैसे एक व्यक्ति की मेहनत से पूरे इलाके की तस्वीर बदल सकती है।
महत्वपूर्ण शब्द — नेहटा/नेष्टा: नाड़ी या तालाब से अतिरिक्त जल की निकासी के लिए बनाई गई 'पाइप' या 'नाली' को नेहटा/नेष्टा कहते हैं — यह अतिरिक्त पानी को बाढ़ जैसी स्थिति से बचाने के लिए बनाई जाती है।
| बावड़ी | जिला |
|---|---|
| दूध बावड़ी | सिरोही |
| लाहिनी बावड़ी | सिरोही |
| भूत बावड़ी | — |
| त्रिमुखी बावड़ी | उदयपुर |
| चाँद बावड़ी (आभानेरी) | दौसा |
| बड़ी/छोटी बावड़ी | — |
| नौ मंज़िला बावड़ी | नीमराणा (अलवर) |
| नवलखा बावड़ी | डूंगरपुर |
| अनारकली बावड़ी | बूंदी |
| रानी की बावड़ी | बूंदी |
| गुलाब बावड़ी | बूंदी |
| हाड़ी रानी की बावड़ी | टोडारायसिंह (दौसा) |
| बंगाली बाबा बावड़ी | जयपुर |
| काला हनुमानजी बावड़ी | जयपुर |
| तालाब | स्थान | विशेषता |
|---|---|---|
| पदम तालाब | रणथम्भौर | जंगली जानवरों के पानी पीने का स्थान |
| काला तालाब | खारा (भीलवाड़ा) | — |
| पद्म सर/रानी सर | जोधपुर | — |
| सुख तालाब | मांडल (भीलवाड़ा) | राजस्थान का सबसे बड़ा तालाब |
राष्ट्रीय झील संरक्षण परियोजना: शुरुआत: 2001 | बजट अनुपात: केंद्र:राज्य = 60:40 | इसमें राजस्थान की 6 झीलें शामिल हैं: (i) फतेह सागर (ii) पिछोला (iii) आनासागर (iv) पुष्कर (v) नक्की (vi) मानसागर
(रिक्त मानचित्र में स्वयं अभ्यास करें) मानचित्र — राजस्थान की पारंपरिक जल संरक्षण संरचनाओं (बावड़ी, नाड़ी, खड़ीन, टांका) का वितरण
पारंपरिक तकनीकों के साथ-साथ आज राजस्थान में कई आधुनिक (वैज्ञानिक) जल संरक्षण विधियाँ भी अपनाई जा रही हैं, जो कम पानी में अधिकतम फ़ायदा देने पर केंद्रित हैं।
| योजना/अभियान | मुख्य विवरण |
|---|---|
| राजीव गांधी जल संचय योजना | शुरुआत: 20 अगस्त 2007 | दो चरण: (i) 20 अगस्त 2011 (ii) 29 मार्च 2013 | उद्देश्य: पेयजलापूर्ति, वर्षा जल संग्रहण, भूजल स्तर सुधार, कृषि क्षेत्र वृद्धि |
| मिशन अमृत सरोवर | शुरुआत: 24 अप्रैल 2022 | उद्देश्य: आज़ादी के अमृत महोत्सव (75 वर्ष) के उपलक्ष्य में हर जिले में 75 अमृत सरोवर (तालाब) बनाना |
| नीरांचल परियोजना | विश्व बैंक पोषित | PMKSY (वाटरशेड कंपोनेंट) के तहत | 9 राज्यों में लागू | राजस्थान के चयनित जिले: जोधपुर + उदयपुर |
| स्वजल धारा योजना | शुरुआत: 2003 | केंद्र सरकार द्वारा | ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल आपूर्ति हेतु |
| एकीकृत जलग्रहण विकास कार्यक्रम | शुरुआत: 1989 | समाप्ति: 31 मार्च 2013 |
| आपणी योजना | जर्मनी द्वारा पोषित | क्षेत्र: झुंझुनूं, चूरू, हनुमानगढ़ |
| जीवन धारा योजना | शुरुआत: 1996-97 | गरीबी रेखा से नीचे के SC/ST लघु व सीमांत किसानों को कुओं के निर्माण हेतु 100% अनुदान |
| अमृतम् जलम् | राजस्थान पत्रिका (समाचार-पत्र) द्वारा चलाया गया एक जल संरक्षण जन-जागरूकता अभियान |
A. भूजल संसाधन मूल्यांकन (2023)
भूजल (ज़मीन के नीचे का पानी) के स्तर के आधार पर राजस्थान के सभी ब्लॉकों (छोटे प्रशासनिक क्षेत्रों) को 5 श्रेणियों में बाँटा गया है — यह वर्गीकरण दिखाता है कि किस इलाके में पानी की स्थिति कितनी गंभीर है।
| श्रेणी | विवरण | ब्लॉकों की संख्या | विशेष |
|---|---|---|---|
| अतिदोहित (Over-Exploited) | जहाँ भूजल का दोहन (निकालना) उसकी पुनःपूर्ति से कहीं ज़्यादा हो चुका है | 216 | सर्वाधिक ब्लॉक इसी श्रेणी में — यह सबसे चिंताजनक स्थिति है |
| विषम/गंभीर (Critical) | — | 23 | — |
| अर्द्ध विषम (Semi-Critical) | — | 22 | — |
| सुरक्षित (Safe) | — | 38 | — |
| लवणीय (Saline) | — | 3 | तारानगर, खाजूवाला, रावतसर |
चिंताजनक तथ्य: राजस्थान के कुल 302 ब्लॉकों में से 216 (यानी लगभग 71%) 'अतिदोहित' श्रेणी में आते हैं — इसका मतलब है कि राज्य के ज़्यादातर हिस्सों में भूजल का इस्तेमाल उसके प्राकृतिक भरने की गति से कहीं तेज़ हो रहा है। सबसे ध्यान देने वाली बात यह है कि राज्य में कोई भी ब्लॉक 'न्यून संदोहित' (यानी बहुत कम इस्तेमाल वाली) श्रेणी में नहीं है — यानी हर जगह पानी का दबाव किसी-न-किसी स्तर पर मौजूद है। इसी समस्या को हल करने के लिए 5 अक्टूबर 2021 से जोधपुर में भूजल प्रबंधन हेतु 'हेली-बोर्न सर्वेक्षण तकनीक' शुरू की गई थी।
B. राजस्थान राज्य जल नीति
जब पानी की कमी होती है, तो सरकार तय करती है कि किसे पहले पानी मिलेगा — इसके लिए एक स्पष्ट प्राथमिकता-क्रम बनाया गया है।
| क्रम | उपयोग |
|---|---|
| 1 | मानव पेयजल (सबसे पहली प्राथमिकता) |
| 2 | पशु पेयजल |
| 3 | घरेलू कार्यों के लिए जलापूर्ति |
| 4 | कृषि कार्यों के लिए जलापूर्ति |
इसे ऐसे याद रखें — जैसे किसी आपातकालीन स्थिति (Emergency) में सबसे पहले इंसानों को बचाया जाता है, फिर जानवरों को, फिर घर-गृहस्थी के काम, और आखिर में खेती — क्योंकि इंसान व जानवर बिना पानी के तुरंत मुसीबत में पड़ सकते हैं, जबकि खेती में कुछ दिन की देरी झेली जा सकती है। यही सोच इस प्राथमिकता-क्रम के पीछे है।
इस अध्याय को पूरी तरह अद्यतन रखने के लिए जुलाई 2026 तक की स्थिति के अनुसार नवीनतम सिंचाई व जल संरक्षण संबंधी घटनाओं व आँकड़ों को यहाँ शामिल किया गया है।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने संशोधित पार्वती-कालीसिंध-चंबल पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना (PKC-ERCP) का शिलान्यास (नींव पत्थर रखने का समारोह) सितंबर 2025 में किया। परियोजना का लक्ष्य पार्वती, नेवज़ एवं कालीसिंध नदियों के अतिरिक्त (सरप्लस) पानी को चंबल नदी में भेजना है, ताकि पूर्वी राजस्थान के 13 से बढ़कर अब 17 ज़िलों को पेयजल व औद्योगिक जल मिल सके — जिसमें अलवर, भरतपुर, सवाई माधोपुर व जयपुर जैसे प्रमुख ज़िले शामिल हैं। परियोजना के प्रथम चरण को पूरा करने का लक्ष्य वर्ष 2028 रखा गया है, जिसमें डूंगरी बाँध, 5 बैराज (कूल, पार्वती, कालीसिंध, मेज, बनास नदियों पर) तथा ईसरदा बाँध का नवीनीकरण शामिल है।
पर्यावरणीय चिंता: PKC-ERCP परियोजना के कारण रणथम्भौर टाइगर रिज़र्व (अध्याय 4 में विस्तार से पढ़ा) का लगभग 37 वर्ग किमी हिस्सा जलमग्न (डूब) हो सकता है, जिससे टाइगर रिज़र्व व्यावहारिक रूप से दो हिस्सों में बँट सकता है — यह पर्यावरणविदों के लिए एक गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है। इस तरह यह परियोजना विकास (जल सुरक्षा) एवं पर्यावरण संरक्षण (वन्यजीव सुरक्षा) के बीच के जटिल संतुलन को उजागर करती है।
31 मार्च 2024 तक राजस्थान में लगभग 50.99 लाख कार्यशील घरेलू नल कनेक्शन (Functional Household Tap Connections) दिए जा चुके थे, तथा 36,000 से अधिक गाँवों के लगभग 87 लाख परिवारों को 'हर घर जल' कनेक्शन की मंज़ूरी मिल चुकी है। राज्य के बजट 2024-25 में जल जीवन मिशन के लिए ₹15,000 करोड़ का आवंटन किया गया था, जिसका लक्ष्य 25 लाख ग्रामीण घरों को नल कनेक्शन देना था — यह दिखाता है कि हर घर तक शुद्ध पेयजल पहुँचाने की दिशा में राजस्थान लगातार तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, हालाँकि पूर्ण कवरेज (सभी गाँवों में हर घर नल) का लक्ष्य अभी भी कुछ वर्ष दूर है, इसीलिए मिशन की अवधि अब 2034 तक बढ़ा दी गई है।
(रिक्त मानचित्र में स्वयं अभ्यास करें) मानचित्र — 2025-26 की PKC-ERCP शिलान्यास एवं जल जीवन मिशन प्रगति से जुड़े जिले
| प्रश्न/तथ्य | उत्तर |
|---|---|
| राजस्थान की प्रथम नहर सिंचाई परियोजना कौनसी है? | गंग नहर (बीकानेर नहर) |
| राजस्थान की सबसे विशाल बहुउद्देशीय नहर परियोजना कौनसी है? | इंदिरा गांधी नहर परियोजना (IGNP) |
| IGNP की परिकल्पना किसने की थी? | राय बहादुर कँवर सेन (1948) |
| राजस्थान का सबसे बड़ा बाँध कौनसा है? | राणा प्रताप सागर (चंबल परियोजना) |
| राजस्थान का सबसे लंबा बाँध कौनसा है? | माही बजाज सागर बाँध (3109 मीटर) |
| एशिया का चिनाई वाला सबसे ऊँचा बाँध कौनसा है? | जाखम बाँध (प्रतापगढ़) — 81 मीटर ऊँचा |
| राजस्थान का एकमात्र कंक्रीट बाँध कौनसा है? | बीसलपुर बाँध |
| पश्चिमी राजस्थान का सबसे बड़ा बाँध कौनसा है? | जवाई बाँध (पाली) |
| राज्य की एकमात्र पूर्णतः ड्रिप/फव्वारा सिंचाई परियोजना कौनसी है? | नर्मदा नहर परियोजना |
| भारत/राजस्थान की सबसे बड़ी बहुउद्देशीय परियोजना कौनसी है? | भाखड़ा-नांगल परियोजना |
| राजस्थान में IGNP की कुल कितनी लिफ्ट नहरें हैं? | 7 |
| 'बावड़ियों का शहर' किसे कहा जाता है? | बूंदी |
| खड़ीन तकनीक किसने विकसित की? | पालीवाल ब्राह्मणों ने (15वीं सदी में) |
| 'जोहड़ वाले बाबा' किसे कहा जाता है? | राजेंद्र सिंह (तरुण भारत संघ के संस्थापक) |
| PKC-ERCP परियोजना का MoU कब हुआ? | 28 जनवरी 2024 |
Q1. IGNP की परिकल्पना किसने और कब की थी? इसके प्रमुख चरणों की व्याख्या कीजिए। Q2. चंबल बहुउद्देशीय परियोजना के 4 बाँधों का वर्णन कीजिए। Q3. राजस्थान की पारंपरिक जल संरक्षण तकनीकों (बावड़ी, खड़ीन, टांका) का वर्णन कीजिए। Q4. PKC-ERCP परियोजना के उद्देश्य एवं प्रमुख घटकों की व्याख्या कीजिए। Q5. IGNP के लाभ एवं हानियों की विवेचना कीजिए। Q6. नर्मदा नहर परियोजना की विशेषताएँ बताइए। इसमें ड्रिप सिंचाई अनिवार्य क्यों है? Q7. राजस्थान में भूजल संसाधन मूल्यांकन 2023 के अनुसार ब्लॉकों का वर्गीकरण बताइए। Q8. जल जीवन मिशन एवं मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान की तुलना कीजिए। Q9. राजस्थान की जल उपलब्धता प्राथमिकता क्रम क्या है? Q10. बीसलपुर एवं जवाई बाँध की तुलना कीजिए।