🐄 अध्याय 7/14 — राजस्थान भूगोल

पशुधन

Livestock | RAS Pre + Mains
📋 इस अध्याय में
  1. परिचय — पशुधन का आर्थिक महत्व
  2. 20वीं पशुधन गणना 2019 — संपूर्ण आँकड़े
  3. गौवंश (Cattle) — प्रमुख नस्लें
  4. भैंस (Buffalo) — प्रमुख नस्लें
  5. भेड़ (Sheep) — प्रमुख नस्लें
  6. बकरी (Goat) — प्रमुख नस्लें
  7. ऊँट (Camel) — राज्य पशु एवं नस्लें
  8. अन्य पशु — गधा, घोड़ा एवं मुर्गीपालन
  9. प्रमुख पशु मेले
  10. डेयरी विकास — RCDF एवं सरस ब्रांड
  11. ऊन उत्पादन एवं उद्योग
  12. सरकारी योजनाएँ (पशुपालन एवं डेयरी)
  13. पशु रोग — लंपी स्किन डिज़ीज़ (Lumpy Skin Disease)
  14. नवीनतम अपडेट 2025-26 (Latest Updates — इंटरनेट रिसर्च आधारित)
  15. त्वरित पुनरावृत्ति एवं सारांश (Quick Revision)
🌟 क्या आप जानते हैं?

ज़रा सोचिए — एक ऐसा जानवर जो बिना पानी पिए हफ़्तों तक रेगिस्तान में चल सकता है, अपनी पीठ पर भारी सामान लाद सकता है, और गर्म रेत में भी आराम से बैठ सकता है। यही ऊँट है — जिसे 'रेगिस्तान का जहाज़' कहा जाता है, और यह इतना खास है कि 2014 में राजस्थान सरकार ने इसे विधिवत राज्य पशु का दर्जा दे दिया। और क्या आप जानते हैं कि जिस राज्य में सबसे ज़्यादा रेगिस्तान है, वही राज्य बकरियों की संख्या में पूरे देश में नंबर-1 है, और भैंसों में देश में दूसरे स्थान पर है? यह ऐसा है जैसे सबसे कम पानी वाला इलाका सबसे ज़्यादा जानवर पाल रहा हो — इसका राज़ है यहाँ के लोगों की सदियों पुरानी पशुपालन परंपरा, जो खेती से भी पुरानी मानी जाती है। नागौर के मशहूर पशु मेले में हर साल 75 हज़ार से ज़्यादा जानवर लाए जाते हैं, और पुष्कर का ऊँट मेला तो पूरी दुनिया में मशहूर है — यह सिर्फ एक मेला नहीं, बल्कि राजस्थान की पशुपालन संस्कृति का सबसे बड़ा उत्सव है। आइए, इस अध्याय में राजस्थान के पशुधन — गाय, भैंस, भेड़, बकरी, ऊँट — सबकी नस्लों, आँकड़ों और सरकारी योजनाओं को विस्तार से समझते हैं।

1परिचय — पशुधन का आर्थिक महत्व

पशुधन (Livestock) राजस्थान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है — यह सिर्फ एक सहायक व्यवसाय नहीं, बल्कि यहाँ के लाखों परिवारों की मुख्य आजीविका (जीवनयापन का साधन) है। जैसा हमने अध्याय 6 (कृषि) में पढ़ा, Economic Survey 2025-26 के अनुसार राजस्थान की कुल कृषि-क्षेत्रवार GVA (सकल मूल्यवर्धन) में पशुधन की हिस्सेदारी 49.35% है — यानी फसलों (42.61%) से भी ज़्यादा! इसका मतलब है कि राजस्थान में पशुपालन, खेती से भी बड़ा आर्थिक आधार बन चुका है।

💡 रेगिस्तान में पशुपालन इतना बड़ा उद्योग क्यों है?

इसे ऐसे समझें — जहाँ बारिश कम होती है और खेती अनिश्चित ('मानसून का जुआ') रहती है, वहाँ के लोगों ने सदियों पहले ही समझ लिया था कि पशु (जैसे ऊँट, बकरी, भेड़) कम पानी और कम चारे में भी ज़िंदा रह सकते हैं और फिर भी दूध, ऊन व मांस जैसी नियमित आमदनी देते रहते हैं। यह ठीक वैसे ही है जैसे कोई व्यक्ति अनिश्चित नौकरी के भरोसे न रहकर एक ऐसा साइड-बिज़नेस शुरू करे जो हर मौसम में चले — यही सोच पीढ़ी-दर-पीढ़ी राजस्थान में पशुपालन को मज़बूत बनाती आई है।

220वीं पशुधन गणना 2019 — संपूर्ण आँकड़े

भारत में हर 5 साल में एक बार पशुधन गणना (Livestock Census) होती है, ठीक वैसे ही जैसे इंसानों की जनगणना (Census) हर 10 साल में होती है। नवीनतम यानी 20वीं पशुधन गणना वर्ष 2019 में हुई थी, जिसके अनुसार राजस्थान में कुल पशुधन 56.8 मिलियन (5.68 करोड़) है, जो 2012 की गणना (57.7 मिलियन) से लगभग 1.66% कम है।

पशु2012 (मिलियन)2019 (मिलियन)वृद्धि/कमीराष्ट्रीय स्थान
गौवंश (Cattle)13.313.9+4.41% वृद्धि
भैंस (Buffalo)13.013.7+5.53% वृद्धिद्वितीय स्थान
भेड़ (Sheep)9.17.9-12.95% कमीचतुर्थ स्थान
बकरी (Goat)21.6720.84-3.81% कमीप्रथम स्थान
ऊँट (Camel)3.26 लाख2.13 लाख (0.213)-34.69% भारी कमीप्रथम स्थान

सबसे बड़ी चिंता — ऊँटों की तेज़ी से घटती संख्या: ध्यान दें कि ऊँटों की संख्या में मात्र 7 वर्षों (2012-2019) में 34.69% जितनी भारी कमी आई है — यह सभी पशुओं में सबसे बड़ी गिरावट है। यही वजह है कि इसके बाद सरकार ने ऊँट संरक्षण के लिए विशेष कानून व योजनाएँ शुरू कीं, जिनकी चर्चा आगे 'ऊँट' खंड में विस्तार से की गई है।

💡 गणना में बढ़त और गिरावट का उल्टा रिश्ता क्यों?

गौर करें कि गाय व भैंस (जिनका सीधा संबंध डेयरी/दूध व्यवसाय से है) की संख्या बढ़ी है, जबकि भेड़, बकरी व खासकर ऊँट (जिनका पारंपरिक उपयोग परिवहन, ऊन व मांस के लिए होता था) की संख्या घटी है। इसका सीधा कारण है — जैसे-जैसे गाड़ियाँ व मशीनें बढ़ीं, ऊँट जैसे परिवहन-पशुओं की ज़रूरत कम हुई, जबकि दूध की माँग शहरीकरण के साथ लगातार बढ़ती जा रही है। यह ठीक वैसे ही है जैसे मोबाइल फोन आने के बाद लैंडलाइन फोन की माँग घट गई — ज़रूरत बदलने के साथ पशुओं का महत्व भी बदल जाता है।

(रिक्त मानचित्र में स्वयं अभ्यास करें) मानचित्र — राजस्थान में पशुधन गणना 2019 के अनुसार जिलेवार पशु घनत्व वितरण

3गौवंश (Cattle) — प्रमुख नस्लें

राजस्थान की देशी गायों की नस्लें दूध उत्पादन एवं मेहनत (हल जोतना, बोझ ढोना) दोनों के लिए मशहूर हैं। इनमें से कई नस्लों को उनके मूल क्षेत्र के नाम पर ही जाना जाता है।

नस्लमूल क्षेत्र/विस्तारविशेषता
राठीश्रीगंगानगर, बीकानेर, जैसलमेरलाल सिंधी व साहीवाल की मिश्रित नस्ल; इसे 'राजस्थान की कामधेनु' कहा जाता है — सर्वाधिक दूध देने वाली देशी नस्ल
थारपारकरजैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर, सांचौर (जालोर)मूल स्थान मालाणी क्षेत्र (बाड़मेर); अधिक दूध देने के लिए प्रसिद्ध; सफेद/धूसर रंग
कांकरेजबाड़मेर, सिरोही, जालौर, जोधपुर (आंशिक)राजस्थान के दक्षिण-पश्चिमी भाग में पाई जाती है; मज़बूत बैल हल जोतने के लिए प्रसिद्ध
नागौरीनागौर जिले का सुहालक प्रदेश (मूल स्थान)नागौरी बैल तेज़ दौड़ने वाले, मज़बूत व भारवाहक (बोझ ढोने वाले) होते हैं
गिरअजमेर, भीलवाड़ा, किशनगढ़, चित्तौड़गढ़, बूंदीमूल स्थान गुजरात का गिर वन/काठियावाड़ है, लेकिन राजस्थान के इन जिलों में भी पाई जाती है
🐄 विदेशी नस्लें (राजस्थान में पाली जाने वाली)
  • जर्सी
  • हॉलिस्टिन (Holstein)
  • रेड डेन (Red Dane)
📌 अन्य महत्वपूर्ण देशी नस्लें
  • मालवी (हाड़ौती क्षेत्र)
  • मेवाती (भरतपुर-अलवर क्षेत्र)

4भैंस (Buffalo) — प्रमुख नस्लें

भैंसों की संख्या के मामले में राजस्थान देश में दूसरे स्थान पर है। भैंस का दूध गाय के दूध से ज़्यादा गाढ़ा (वसा युक्त) होता है, इसलिए घी बनाने के लिए यह सर्वाधिक उपयुक्त मानी जाती है।

नस्लविस्तार क्षेत्रविशेषता
मुर्राजयपुर, उदयपुर, अलवर, गंगानगर, भरतपुरदूध में वसा (फैट) की मात्रा 7-8% तक — यह भारत की सर्वश्रेष्ठ दुधारू भैंस नस्लों में गिनी जाती है
भदावरीपूर्वी राजस्थान का सीमावर्ती क्षेत्र (मूलतः उत्तर प्रदेश की सीमा से लगा हुआ)छोटे आकार की, लेकिन दूध में वसा की मात्रा अधिक
जाफराबादीराजस्थान में सीमित क्षेत्र (मूल स्थान गुजरात)भारी शरीर, अच्छी दूध देने की क्षमता

5भेड़ (Sheep) — प्रमुख नस्लें

भेड़ों की संख्या के मामले में राजस्थान देश में चौथे स्थान पर है, लेकिन ऊन उत्पादन में राजस्थान की भेड़ें देश में सबसे आगे मानी जाती हैं (राज्य का ऊन उत्पादन में योगदान लगभग 47.53%)।

नस्लविस्तार क्षेत्रविशेषता
मगराबीकानेर, चूरू, नागौर, जोधपुरसफेद रंग की ऊन के लिए प्रसिद्ध, कालीन बनाने में उपयोगी ऊन
पूगलबीकानेर, जैसलमेर (सीमावर्ती क्षेत्र)सबसे अच्छी गुणवत्ता की ऊन देने वाली नस्लों में से एक
मारवाड़ी (चोकला भी कहते हैं)जोधपुर, पाली, नागौरमांस एवं ऊन दोनों के लिए उपयोगी
नालीश्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, चूरूलंबे बाल वाली ऊन, कालीन उद्योग में उपयोग
सोनाड़ी (चनोथर भी कहते हैं)उदयपुर, डूंगरपुर, राजसमंद (दक्षिणी राजस्थान)मुख्यतः मांस उत्पादन के लिए पाली जाती है
📢 विज्ञापन
🔥 सबसे लोकप्रिय
📘

RAS Foundation Course 2026 🕉️

Multiple ValidityTests
₹4,999₹25,000
Join Now →

6बकरी (Goat) — प्रमुख नस्लें

बकरियों की संख्या में राजस्थान पूरे देश में प्रथम स्थान पर है — यानी भारत की हर 100 बकरियों में से लगभग 14 बकरियाँ अकेले राजस्थान में पाई जाती हैं। बकरी को अक्सर 'गरीब की गाय' कहा जाता है, क्योंकि यह कम खर्च में पल जाती है और दूध व मांस दोनों देती है।

नस्लविस्तार क्षेत्रविशेषता
सिरोहीसिरोही, पाली, जालौर, राजसमंदमांस उत्पादन के लिए सर्वश्रेष्ठ नस्लों में गिनी जाती है; तेज़ी से बढ़ने वाली नस्ल; इसके आनुवंशिक विकास हेतु सरकार द्वारा चयनित बकरियों पर ₹3,000 प्रोत्साहन राशि दी जाती है (अजमेर, नागौर, सिरोही, राजसमंद, सीकर, चित्तौड़गढ़, जयपुर, चूरू, कुचामन सिटी में)
मारवाड़ीजोधपुर, पाली, बाड़मेरदूध एवं मांस दोनों के लिए उपयोगी, मरुस्थलीय वातावरण में सर्वाधिक अनुकूल
जमुनापारी (सीमित क्षेत्र)भरतपुर क्षेत्र (मूल स्थान उत्तर प्रदेश)सबसे लंबे कान व ऊँचे कद वाली नस्ल, दूध के लिए प्रसिद्ध
बरबरीअलवर, भरतपुरछोटे आकार की, दूध उत्पादन के लिए उपयोगी

(रिक्त मानचित्र में स्वयं अभ्यास करें) मानचित्र — राजस्थान की गाय, भैंस, भेड़, बकरी की प्रमुख नस्लों का जिलेवार वितरण

7ऊँट (Camel) — राज्य पशु एवं नस्लें

ऊँट को 'रेगिस्तान का जहाज़' (Ship of the Desert) कहा जाता है, क्योंकि यह बिना पानी पिए भी हफ़्तों तक रेगिस्तान में चल सकता है — इसके कूबड़ में जमा चर्बी ही इसे लंबे समय तक ऊर्जा देती रहती है। राजस्थान सरकार ने 30 जून 2014 को ऊँट को राजस्थान का राज्य पशु घोषित किया, जिसकी औपचारिक घोषणा 19 सितंबर 2014 को बीकानेर में हुई।

ऊँट की प्रमुख नस्लें

नस्लविस्तार क्षेत्रविशेषता
बीकानेरीबीकानेरदूध उत्पादन में सर्वश्रेष्ठ; भारी शरीर
जैसलमेरीजैसलमेरस्वभाव से फुर्तीले, पूर्ण ऊँचाई व पतली टांगों वाले
नाचनाजैसलमेर (सर्वाधिक)सबसे सुंदर ऊँट माना जाता है; सवारी व तेज़ दौड़ने में सर्वश्रेष्ठ; BSF (सीमा सुरक्षा बल) के जवान इसी नस्ल का उपयोग करते हैं
गोमठजोधपुर की फलौदी तहसील (सर्वाधिक)बोझ ढोने की क्षमता सर्वाधिक
अलवरीअलवरपूर्वी राजस्थान में पाई जाने वाली नस्ल
सिंधी/कच्छीसीमावर्ती क्षेत्र (सिंध/कच्छ से प्रभावित)राजस्थान में सीमित क्षेत्र में पाई जाती हैं

ऊँट संरक्षण नीति एवं कानून

💡 संरक्षण कानून से ही समस्या क्यों बढ़ी?

यह एक दिलचस्प विरोधाभास (Paradox) है — कानून बनाने का मकसद था ऊँटों को बचाना, लेकिन इसके उलट असर भी हुआ। जब ऊँट की खरीद-फरोख्त (बिक्री) पर सख्त प्रतिबंध लगा, तो पशु मेलों में ऊँटों का व्यापार लगभग बंद हो गया, और चूँकि पशुपालकों के लिए ऊँट पालना अब पहले जितना फायदेमंद नहीं रहा, तो उन्होंने ऊँट पालने में रुचि ही कम कर दी। यह ठीक वैसे ही है जैसे किसी चीज़ को बेचने पर रोक लगा दी जाए तो लोग उसे बनाना ही बंद कर दें — भले ही मकसद अच्छा था, नतीजा उल्टा निकला। यही वजह थी कि 2012 में 3.26 लाख ऊँट, घटकर 2019 में सिर्फ 2.13 लाख रह गए।

सुधारात्मक कदम: ऊँटों की लगातार घटती संख्या पर राजस्थान हाईकोर्ट ने भी सरकार से जवाब माँगा था। इसके बाद सरकार ने ऊँट पालकों को प्रोत्साहन राशि देना शुरू किया, जिसे जनवरी 2025 में बढ़ाकर ₹20,000 प्रति पशुपालक कर दिया गया (पहले यह ₹10,000 थी) — यानी सरकार अब कानून के साथ-साथ आर्थिक प्रोत्साहन से भी ऊँटों को बचाने की कोशिश कर रही है।

8अन्य पशु — गधा, घोड़ा एवं मुर्गीपालन

9प्रमुख पशु मेले

राजस्थान के पशु मेले सिर्फ पशुओं की खरीद-फरोख्त का स्थान नहीं, बल्कि यहाँ की संस्कृति एवं सामाजिक जीवन का बड़ा हिस्सा हैं — यहाँ पशुपालक अपने पशु बेचने-खरीदने के साथ-साथ मेल-मिलाप, मनोरंजन एवं धार्मिक अनुष्ठान भी करते हैं।

मेलास्थानविशेषता
पुष्कर मेलापुष्कर (अजमेर)राजस्थान का सबसे बड़ा एवं सबसे रंगीन मेला; कार्तिक माह में आयोजित; विश्वप्रसिद्ध ऊँट मेला भी इसी के साथ लगता है
नागौर मेलानागौरजनवरी-फरवरी माह में आयोजित; यहाँ 75 हज़ार से भी अधिक पशु लाए जाते हैं — यह राजस्थान के सबसे बड़े पशु मेलों में गिना जाता है
मल्लीनाथ पशु मेला (तिलवाड़ा)तिलवाड़ा, बालोतरा (पचपदरा तहसील)लूनी नदी के किनारे आयोजित; वीर योद्धा रावल मल्लीनाथ की स्मृति में हर वर्ष चैत्र माह में आयोजित

10डेयरी विकास — RCDF एवं सरस ब्रांड

राजस्थान में डेयरी व्यवसाय एक सुव्यवस्थित सहकारी ढाँचे (Cooperative Structure) के तहत चलता है, जो तीन स्तरों में बँटा है — गाँव स्तर, ज़िला स्तर एवं राज्य स्तर।

💡 सहकारी डेयरी ढाँचा — तीन मंज़िला इमारत की तरह समझें

इसे किसी तीन मंज़िला इमारत की तरह समझें — सबसे नीचे (ज़मीनी स्तर पर) हैं गाँव की दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियाँ, जहाँ किसान अपना दूध जमा कराते हैं। बीच की मंज़िल पर हैं 24 ज़िला दुग्ध उत्पादक संघ, जो गाँवों से आया दूध इकट्ठा करके प्रोसेस करते हैं। और सबसे ऊपर की मंज़िल पर है राजस्थान सहकारी डेयरी फेडरेशन (RCDF), जयपुर — जो पूरे राज्य के डेयरी नेटवर्क का शीर्ष संगठन है और 'सरस' (Saras) ब्रांड नाम से दूध व दुग्ध उत्पाद बेचता है।

📢 विज्ञापन
📦

ALL IN ONE Subscription — सम्पूर्ण GK एक ही स्थान पर

Multiple ValidityTests
₹899₹4,999
Join Now →

11ऊन उत्पादन एवं उद्योग

राजस्थान देश में ऊन उत्पादन का सबसे बड़ा केंद्र है — देश की कुल ऊन का लगभग 47.53% हिस्सा अकेले राजस्थान से आता है, यानी लगभग आधी ऊन। इसकी सबसे बड़ी वजह है भेड़ों की मगरा, पूगल व नाली जैसी नस्लें, जो अच्छी गुणवत्ता की ऊन देती हैं।

12सरकारी योजनाएँ (पशुपालन एवं डेयरी)

योजनाविवरण
मुख्यमंत्री मंगला पशु बीमा योजना42 लाख स्वदेशी पशुओं (गाय, भैंस, भेड़, बकरी, ऊँट) का पूर्णतः मुफ्त बीमा (2025-26)
मुख्यमंत्री दुग्ध उत्पादक संबल योजनादूध उत्पादकों को ₹5 प्रति लीटर का अनुदान — अब तक ₹519 करोड़ वितरित
सहकारी गोपाल क्रेडिट कार्डडेयरी किसानों को ₹1 लाख तक का ब्याज मुक्त ऋण उपलब्ध
ऊँट संरक्षण योजनाऊँट पालकों को प्रोत्साहन राशि — 2025 में बढ़ाकर ₹20,000 प्रति पशुपालक की गई
सिरोही बकरी आनुवंशिक विकास योजनाचयनित सिरोही नस्ल की बकरियों पर ₹3,000 प्रोत्साहन राशि — अजमेर, नागौर, सिरोही, राजसमंद, सीकर, चित्तौड़गढ़, जयपुर, चूरू, कुचामन सिटी में लागू
गौशाला विकास योजनाराजस्थान गौशाला अधिनियम में पंजीकृत गौशालाओं को अधिकतम ₹10 लाख तक का अनुदान
नंदीशाला योजनाआवारा/बेसहारा नंदी (बैल) के संरक्षण हेतु विशेष अनुदान

13पशु रोग — लंपी स्किन डिज़ीज़ (Lumpy Skin Disease)

लंपी स्किन डिज़ीज़ (LSD) एक विषाणु जनित (वायरस से होने वाली) बीमारी है, जो मुख्यतः गौवंश एवं भैंसों को प्रभावित करती है। यह त्वचा पर गाँठ (Lump) जैसे उभार बनाती है, इसीलिए इसे 'लंपी' कहा जाता है — मच्छर, मक्खी व किलनी (चिचड़ी) के काटने से यह एक पशु से दूसरे पशु में फैलती है।

💡 2022 के प्रकोप का भारी असर

वर्ष 2022 में राजस्थान सहित उत्तर-पश्चिमी राज्यों (गुजरात, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, पश्चिमी उत्तर प्रदेश) में लंपी स्किन डिज़ीज़ का बहुत बड़ा प्रकोप फैला था। राजस्थान में अगस्त 2022 में दूध संग्रहण में 20% से अधिक की गिरावट आई, और सितंबर तक यह गिरावट रोज़ाना 5-6 लाख लीटर तक पहुँच गई थी। बीमार पशुओं में औसतन प्रति पशु 74 लीटर दूध उत्पादन की कमी दर्ज़ हुई। पूरे देश में इस बीमारी से लगभग ₹18,337.76 करोड़ का आर्थिक नुकसान हुआ था।

2025 की स्थिति: मानसून 2025 के बाद देश के कई राज्यों में लंपी स्किन डिज़ीज़ के नए मामले फिर से सामने आए। अक्टूबर 2025 में राजस्थान के 5 ज़िलों के 18 फार्मों पर लगभग 8,930 गौवंश पर एक अध्ययन किया गया, जिसमें पाया गया कि मौजूदा गोटपॉक्स-आधारित टीका (Vaccine) सिर्फ 21.7% प्रभावी है — यानी टीका लगे व बिना टीके वाले पशुओं में बीमारी की दर लगभग बराबर (11.2% बनाम 14.3%) पाई गई। इससे स्पष्ट है कि लंपी स्किन डिज़ीज़ अभी भी राजस्थान के पशुपालन क्षेत्र के लिए एक गंभीर चुनौती बनी हुई है, और बेहतर टीकों पर शोध जारी है।

14नवीनतम अपडेट 2025-26 (Latest Updates — इंटरनेट रिसर्च आधारित)

इस अध्याय को पूरी तरह अद्यतन रखने के लिए जुलाई 2026 तक की स्थिति के अनुसार नवीनतम पशुधन संबंधी घटनाओं व आँकड़ों को यहाँ शामिल किया गया है।

💡 गौशालाओं को रिकॉर्ड सहायता — 2025-26

राजस्थान सरकार ने वर्ष 2025-26 में राज्य की 3,174 पात्र गौशालाओं (जिनमें गौवंश संधारित/रखा जाता है) को कुल ₹784.43 करोड़ की सहायता प्रदान की है। यह राशि राज्य सरकार द्वारा स्टाम्प ड्यूटी एवं शराब पर लगने वाले अधिभार (Cess) से प्राप्त राजस्व से दी जाती है — यानी यह एक स्थायी वित्तीय व्यवस्था है, न कि सिर्फ एकबारगी अनुदान। इसके अतिरिक्त नंदीशाला योजना के तहत भी ₹1.57 करोड़ का अनुदान दिया गया है।

💡 ऊँट अधिनियम 2015 के नियम — जुलाई 2025

पशुपालन विभाग द्वारा जुलाई 2025 में राजस्थान ऊँट (वध का प्रतिषेध और अस्थायी प्रव्रजन या निर्यात का विनियमन) अधिनियम, 2015 के तहत विस्तृत नियम (Rules) बनाने की प्रक्रिया शुरू की गई है, ताकि इस कानून को और स्पष्ट व प्रभावी तरीके से लागू किया जा सके। यह कदम ऊँटों के संरक्षण एवं कानून के बेहतर क्रियान्वयन दोनों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

💡 नंद बाबा दुग्ध मिशन — स्वदेशी गौ-संवर्धन की नई पहल

केंद्र सरकार व राज्य स्तर पर मुख्यमंत्री स्वदेशी गौ-संवर्धन (नंद बाबा दुग्ध मिशन) जैसी नई योजनाएँ शुरू की गई हैं, जिनके तहत किसानों को 2 स्वदेशी गायों की खरीद पर लगभग ₹80,000 तक की सब्सिडी उपलब्ध कराई जा रही है — इसका उद्देश्य विदेशी नस्लों की बजाय राठी, थारपारकर, गिर जैसी भारतीय देशी नस्लों को बढ़ावा देना है, जो जलवायु के अनुकूल भी होती हैं और रोग-प्रतिरोधक क्षमता में भी बेहतर मानी जाती हैं।

(रिक्त मानचित्र में स्वयं अभ्यास करें) मानचित्र — 2025-26 की नई पशुपालन योजनाओं (गौशाला सहायता, ऊँट संरक्षण) से लाभान्वित क्षेत्र

15त्वरित पुनरावृत्ति एवं सारांश (Quick Revision)

15.1 Super Important Quick Facts

प्रश्न/तथ्यउत्तर
राजस्थान का राज्य पशु कौनसा है और कब घोषित हुआ?ऊँट — 30 जून 2014 (घोषणा 19 सितंबर 2014, बीकानेर में)
बकरियों की संख्या में राजस्थान का राष्ट्रीय स्थान?प्रथम स्थान
भैंसों की संख्या में राजस्थान का राष्ट्रीय स्थान?द्वितीय स्थान
भेड़ों की संख्या में राजस्थान का राष्ट्रीय स्थान?चतुर्थ स्थान
'राजस्थान की कामधेनु' किस नस्ल को कहते हैं?राठी (गाय की नस्ल)
सर्वाधिक सुंदर एवं तेज़ दौड़ने वाला ऊँट कौनसी नस्ल है?नाचना (जैसलमेर)
BSF के जवान किस ऊँट नस्ल का उपयोग करते हैं?नाचना ऊँट
मुर्रा भैंस के दूध में वसा की मात्रा कितनी होती है?7-8%
मांस के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी जाने वाली बकरी नस्ल कौनसी है?सिरोही
ऊन उत्पादन में राजस्थान का राष्ट्रीय योगदान कितना है?लगभग 47.53%
दूध उत्पादन में राजस्थान का राष्ट्रीय योगदान कितना है?लगभग 14.51%
राजस्थान सहकारी डेयरी फेडरेशन (RCDF) कहाँ स्थित है?जयपुर — 'सरस' ब्रांड का संचालन करती है
राजस्थान में कुल कितने ज़िला दुग्ध उत्पादक संघ हैं?24
ऊँट संरक्षण कानून किस वर्ष लागू हुआ?2015 (राजस्थान ऊँट अधिनियम)
नागौर पशु मेले में कितने पशु लाए जाते हैं?75,000 से अधिक
🔑 इस अध्याय के महत्वपूर्ण तथ्य
1. राजस्थान की कृषि-क्षेत्रवार GVA में पशुधन की हिस्सेदारी (49.35%) फसलों (42.61%) से भी अधिक है — यानी पशुपालन अब राज्य की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा स्तंभ बन चुका है 2. 20वीं पशुधन गणना (2019) के अनुसार गाय व भैंस की संख्या बढ़ी है, जबकि भेड़, बकरी व विशेषकर ऊँट (34.69% भारी कमी) की संख्या घट रही है — यह शहरीकरण व बदलती ज़रूरतों का सीधा असर है 3. राठी (गाय), मुर्रा (भैंस), सिरोही (बकरी), मगरा-पूगल (भेड़) एवं नाचना-गोमठ-बीकानेरी (ऊँट) — ये राजस्थान की सबसे प्रसिद्ध देशी पशु-नस्लें हैं, जिनमें से हर एक अपने क्षेत्र की जलवायु के अनुकूल विकसित हुई है 4. ऊँट को 2014 में राज्य पशु घोषित करने के बावजूद 2015 के संरक्षण कानून का उल्टा असर हुआ (व्यापार बंद होने से पालन में रुचि कम हुई), जिसे सुधारने के लिए अब सरकार प्रोत्साहन राशि (₹20,000, 2025) जैसे आर्थिक उपाय अपना रही है 5. राजस्थान देश में ऊन उत्पादन में लगभग आधा (47.53%) एवं दूध उत्पादन में लगभग सातवाँ हिस्सा (14.51%) देता है — RCDF/सरस डेयरी जैसा मज़बूत सहकारी ढाँचा इस सफलता की बुनियाद है 6. 2025-26 के नवीनतम आँकड़े — गौशालाओं को ₹784.43 करोड़ की रिकॉर्ड सहायता, ऊँट अधिनियम 2015 के नए नियम, नंद बाबा दुग्ध मिशन जैसी योजनाएँ — दिखाते हैं कि सरकार पशुधन क्षेत्र में निवेश व सुधार दोनों पर तेज़ी से काम कर रही है, हालाँकि लंपी स्किन डिज़ीज़ जैसी बीमारियाँ अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई हैं

📝 पिछले वर्षों के प्रश्न (All Exams) 📝

Q1. राजस्थान का राज्य पशु कौनसा है तथा इसे कब घोषित किया गया? Q2. राजस्थान में बकरियों की संख्या के मामले में राष्ट्रीय स्थान बताइए। Q3. 'राजस्थान की कामधेनु' किस गाय की नस्ल को कहा जाता है? Q4. मुर्रा भैंस की विशेषताएँ बताइए एवं यह राजस्थान के किन जिलों में पाई जाती है? Q5. नाचना एवं गोमठ ऊँट की नस्लों में अंतर स्पष्ट कीजिए। Q6. राजस्थान ऊँट अधिनियम 2015 के प्रावधान एवं इसके प्रभावों की विवेचना कीजिए। Q7. राजस्थान में डेयरी विकास के सहकारी ढाँचे (RCDF) का वर्णन कीजिए। Q8. लंपी स्किन डिज़ीज़ क्या है? इसका राजस्थान की डेयरी अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ा? Q9. राजस्थान के प्रमुख पशु मेलों की सूची एवं उनकी विशेषताएँ बताइए। Q10. 20वीं पशुधन गणना 2019 के मुख्य निष्कर्ष क्या हैं?

📌 अध्याय सारांश (Chapter Summary)

📢 विज्ञापन
🔥 सबसे लोकप्रिय
📘

RAS Foundation Course 2026 🕉️

Multiple ValidityTests
₹4,999₹25,000
Join Now →
← अध्याय 6: कृषि — प्रमुख फसलें, उत्पादन एवं वितरण अध्याय 8: सिंचाई →