ज़रा सोचिए — अगर आप जैसलमेर की रेत मुट्ठी में उठाएँ और फिर कोटा-बूंदी की काली मिट्टी उठाएँ, तो दोनों एक ही राज्य की मिट्टी होने के बावजूद बिल्कुल अलग महसूस होंगी। एक हाथ से फिसल जाएगी, तो दूसरी हाथ में चिपक जाएगी! यही राजस्थान की मिट्टियों की सबसे बड़ी खासियत है — यहाँ बलुई मिट्टी से लेकर काली, लाल, लवणीय तक, लगभग हर तरह की मिट्टी मौजूद है। और क्या आप जानते हैं कि कोटा-बूंदी की काली मिट्टी खुद-ब-खुद जुत जाती है? जब यह मिट्टी सूखती है तो इसमें इतनी गहरी दरारें पड़ जाती हैं कि हवा अंदर तक पहुँच जाती है और मिट्टी अपने आप पलट जाती है — किसानों को अलग से जुताई करने की ज़रूरत कम पड़ती है, इसीलिए इसे 'स्वजोत' या 'स्वतः जुताई' वाली मिट्टी कहा जाता है! वहीं दूसरी तरफ, श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ के कुछ इलाकों में ठीक इसका उल्टा हो रहा है — नहरों से लगातार सिंचाई के कारण ज़मीन के नीचे पानी इतना भर गया है कि वहाँ 'सैम' (जलाक्रांता) की समस्या पैदा हो गई है, जिसे किसान 'रेंगती मृत्यु' भी कहते हैं। आइए, इस अध्याय में राजस्थान की मिट्टियों की पूरी दुनिया को विस्तार से समझते हैं — इनके प्रकार, इनकी समस्याएँ और इन्हें बचाने के उपाय।
परिभाषा: पृथ्वी की ऊपरी सतह पर पाई जाने वाली असंगठित चट्टानों (यानी टूटी-फूटी, बारीक कणों में बदल चुकी चट्टानों) की परत को मिट्टी या मृदा (Soil) कहते हैं। इसे ऐसे समझें — जब बड़ी-बड़ी चट्टानें हज़ारों-लाखों वर्षों तक धूप, बारिश, हवा और तापमान के बदलावों से टूटती-फूटती रहती हैं, तो वे धीरे-धीरे बारीक कणों में बदल जाती हैं — यही बारीक कण मिलकर मिट्टी बनाते हैं। मिट्टी के अध्ययन को पेडोलॉजी (Pedology) या मृदा विज्ञान कहा जाता है।
अगर हम ज़मीन खोदकर नीचे जाएँ, तो मिट्टी एक जैसी नहीं मिलती — बल्कि यह अलग-अलग परतों (Layers) में बँटी होती है, ठीक वैसे ही जैसे किसी इमारत में अलग-अलग मंज़िलें होती हैं।
| परत | विवरण |
|---|---|
| मृदा (Soil) | सबसे ऊपरी असंगठित परत — पेड़-पौधों को आधार देती है |
| उपमृदा (Sub Soil) | इसमें बारीक कण एवं खनिज तत्व अधिक मात्रा में होते हैं |
| बड़े कंकर-पत्थर | कठोर पदार्थों की परत |
| आधारभूत चट्टानें (Bedrock) | सबसे नीचे की सबसे ठोस/कठोर परत |
मिट्टी कोई एक चीज़ नहीं, बल्कि चार अलग-अलग चीज़ों का मिश्रण है — बिल्कुल वैसे ही जैसे कोई खाना कई सामग्रियों को मिलाकर बनता है। मिट्टी चार घटकों से मिलकर बनती है: खनिज, जल, वायु और जैविक तत्व।
| घटक | प्रतिशत | विशेषता |
|---|---|---|
| खनिज (Minerals) | 45% | सबसे अधिक मात्रा — पत्थर, बालू, चिकनी मिट्टी से बनते हैं |
| जल (Water) | 25% | पौधों की वृद्धि के लिए आवश्यक |
| वायु (Air) | 25% | पौधों की जड़ों को ऑक्सीजन प्रदान करती है |
| जैविक तत्व (Organic Matter) | 5% | ह्यूमस (सड़े-गले पौधे/जीव अवशेष) — उर्वरता का मुख्य स्रोत |
इसे ऐसे याद रखें — जैसे किसी थाली में खाना परोसा जाए: सबसे बड़ा हिस्सा (45%) खनिज का, फिर बराबर-बराबर हिस्से (25%-25%) जल और वायु के, और सबसे छोटा हिस्सा (5%) जैविक तत्वों/ह्यूमस का। भले ही ह्यूमस सबसे कम मात्रा में हो, लेकिन यही मिट्टी की उर्वरता (उपजाऊपन) का सबसे बड़ा राज़ है — ठीक वैसे ही जैसे खाने में नमक की मात्रा सबसे कम होती है, लेकिन उसके बिना खाना बेस्वाद रहता है।
राजस्थान (और भारत) की मिट्टियों को समझने के लिए तीन अलग-अलग संस्थाओं ने तीन अलग-अलग तरीकों से वर्गीकरण किया है। तीनों वर्गीकरण अलग-अलग उद्देश्यों के लिए बनाए गए हैं, इसलिए तीनों को अलग-अलग समझना ज़रूरी है।
| वर्गीकरण का आधार | संस्था | प्रकार |
|---|---|---|
| भारत में मुख्य वर्गीकरण | ICAR (1929, नई दिल्ली) | मुख्य — 8 प्रकार, गौण — 27 प्रकार |
| वैज्ञानिक वर्गीकरण | USDA (1982) | 5 प्रकार (मृदा कणों के आकार के आधार पर) |
| राजस्थान कृषि विभाग | राज्य सरकार | 14 प्रकार |
Full Form याद रखें: ICAR — Indian Council of Agricultural Research (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद), स्थापना 1929, नई दिल्ली। USDA — United States Department of Agriculture (संयुक्त राज्य अमेरिका कृषि विभाग), वर्गीकरण वर्ष 1982।
राज्य कृषि विभाग ने राजस्थान की मिट्टियों को स्थानीय स्तर पर और भी बारीकी से समझने के लिए 14 भागों में बाँटा है। यह वर्गीकरण मुख्यतः कृषि नियोजन (खेती की योजना बनाने) के लिए उपयोग होता है।
| क्रम | मिट्टी का प्रकार | प्रमुख जिले |
|---|---|---|
| 1 | साई रोज़ेम्स (Sie Rozems) | श्रीगंगानगर |
| 2 | रेवरिना (Reverina) | श्रीगंगानगर |
| 3 | मरुस्थली मृदा (Desert Soils) | गंगानगर, चूरू, झुंझुनूं, बीकानेर, जैसलमेर, नागौर, बाड़मेर, जोधपुर, सीकर |
| 4 | जिप्सीफेरस (Gypsiferrous) | बीकानेर |
| 5 | धूसर भूरी जलोढ़ मृदा (Gray-Brown Alluvial) | जालौर, पाली, नागौर, अजमेर, सिरोही |
| 6 | नान केल्सिल ब्राउन मृदा (Non Calcil Brown) | जयपुर, सीकर, झुंझुनूं, नागौर, अजमेर, अलवर |
| 7 | नवीन जलोढ़ मृदा (Alluvial Soils of Recent Origin) | अलवर, भरतपुर, सवाई माधोपुर, जयपुर |
| 8 | पीली-भूरी मृदा (Yellowish Brown Soils) | जयपुर, टोंक, स.माधोपुर, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, उदयपुर |
| 9 | नवीन भूरी मृदा (Brown Soils of Recent Origin) | भीलवाड़ा, अजमेर |
| 10 | पर्वतीय मृदा (Hilly Soils) | उदयपुर, कोटा |
| 11 | लाल-लोम (Red Loam) | डूंगरपुर, बाँसवाड़ा |
| 12 | काली गहरी मध्यम मृदा (Deep Medium Black Soils) | कोटा, बूंदी, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, भरतपुर, झालावाड़ |
| 13 | केल्सी ब्राउन मरुस्थली मृदा (Desert Soils Calcie Brown) | जैसलमेर, बीकानेर |
| 14 | मरुस्थल एवं बालूका स्तूप (Desert and Dunes) | जोधपुर, बाड़मेर, जैसलमेर, बीकानेर |
याद रखने का आसान तरीका: साई रोज़ेम्स और रेवरिना → श्रीगंगानगर (दोनों एक ही जिले में) | जिप्सीफेरस → बीकानेर | पर्वतीय मृदा → उदयपुर, कोटा | लाल-लोम → डूंगरपुर, बाँसवाड़ा (यह वागड़ क्षेत्र है, याद रहे यह अध्याय 4 में पढ़े वागड़ प्रदेश से मेल खाता है)।
(रिक्त मानचित्र में स्वयं अभ्यास करें) मानचित्र — राज्य कृषि विभाग वर्गीकरण अनुसार राजस्थान के 14 मिट्टी-प्रकारों का जिलेवार वितरण
USDA (1982) द्वारा किया गया यह वर्गीकरण सबसे वैज्ञानिक माना जाता है, क्योंकि इसका आधार मिट्टी के कणों का आकार (Particle Size) है। इसे ऐसे समझें — जैसे रेत के कण मोटे और बड़े होते हैं, जबकि चिकनी मिट्टी (क्ले) के कण बहुत बारीक होते हैं, ठीक उसी तरह मिट्टी के कणों का आकार नापकर उसे वैज्ञानिक तरीके से वर्गीकृत किया जाता है।
| मृदा क्रम | स्थानीय नाम | जलवायु | स्थिति |
|---|---|---|---|
| 1. एंटीसॉल (Entisol) | रेगिस्तानी मिट्टी क्षेत्र | शुष्क एवं अर्द्धशुष्क | उत्तरी-पश्चिमी राजस्थान |
| 2. एरिडीसॉल (Aridisol) | बालू मिट्टी क्षेत्र | शुष्क (Arid) | पश्चिमी राजस्थान |
| 3. अल्फीसॉल (Alfisol) | जलोढ़ मिट्टी क्षेत्र | उपआर्द्र एवं आर्द्र | पूर्वी मैदान |
| 4. इनसेप्टीसॉल (Inceptisol) | पथरीली मिट्टी क्षेत्र | अर्द्धशुष्क से आर्द्र | दक्षिणी राजस्थान |
| 5. वर्टीसॉल (Vertisol) | काली मिट्टी क्षेत्र | आर्द्र एवं अतिआर्द्र | दक्षिण-पूर्वी राजस्थान (हाड़ौती) |
क्रम याद रखें: ऊपर तालिका में क्रम जान-बूझकर एंटीसॉल को पहले रखा गया है, क्योंकि राजस्थान में सर्वाधिक पाई जाने वाली मिट्टी एंटीसॉल है, उसके बाद एरिडीसॉल दूसरे स्थान पर है — यह परीक्षा में बार-बार पूछा जाने वाला तथ्य है।
परीक्षा में महत्वपूर्ण: एंटीसॉल → राजस्थान में सर्वाधिक पाई जाती है | एरिडीसॉल → दूसरे स्थान पर। दोनों ही पश्चिमी राजस्थान में मिलती हैं, इसलिए इन्हें अक्सर एक-दूसरे से गड़बड़ा दिया जाता है — याद रखें, एंटीसॉल = 'रेगिस्तानी' (नंबर 1), एरिडीसॉल = 'बालू' (नंबर 2)।
USDA — Quick Revision Chart: एंटीसॉल → सर्वाधिक (पश्चिमी राजस्थान) | एरिडीसॉल → दूसरी सर्वाधिक (पश्चिमी राजस्थान) | अल्फीसॉल → पूर्वी राजस्थान | इनसेप्टीसॉल → दक्षिणी राजस्थान | वर्टीसॉल → हाड़ौती (दक्षिण-पूर्वी राजस्थान)। याद रखने का शॉर्टकट: 'EEAIV' — क्रमशः पश्चिम-पश्चिम-पूर्व-दक्षिण-दक्षिण/पूर्व की दिशा में जाता है।
(रिक्त मानचित्र में स्वयं अभ्यास करें) मानचित्र — USDA वर्गीकरण अनुसार राजस्थान की 5 मृदा-श्रेणियों (एंटीसॉल, एरिडीसॉल, अल्फीसॉल, इनसेप्टीसॉल, वर्टीसॉल) का वितरण
यह वर्गीकरण सबसे ज़्यादा प्रचलित एवं परीक्षा में सबसे ज़्यादा पूछा जाने वाला है, क्योंकि इसमें हर मिट्टी को उसके रंग, बनावट एवं स्थानीय पहचान के आधार पर समझाया गया है — यह वर्गीकरण आम बोलचाल की भाषा के सबसे करीब है।
► राजस्थान में सर्वाधिक पाई जाने वाली मिट्टी — राज्य के लगभग दो-तिहाई भाग में फैली हुई
► कैल्शियम (Ca) की मात्रा अधिक
► कण सर्वाधिक मोटे होने के कारण बार-बार सिंचाई आवश्यक (जैसे छलनी से पानी जल्दी निकल जाए)
► रंग: हल्का पीला-भूरा (कभी-कभी लाल भी)
► नाइट्रोजन व कार्बनिक लवणों की कमी
बलुई मिट्टी के कण बहुत मोटे और ढीले होते हैं, इसलिए पानी इसमें रुकता नहीं — सीधे नीचे रिसकर निकल जाता है, ठीक वैसे ही जैसे छलनी में पानी डालने पर वह तुरंत बह जाए। इसीलिए इस मिट्टी को बार-बार पानी चाहिए होता है, मानो यह हमेशा 'प्यासी' रहती हो।
► फॉस्फेट (Phosphate) की मात्रा अधिक
► नाइट्रेट की उपस्थिति से उर्वरता बढ़ती है
► लेकिन नाइट्रोजन व कार्बनिक तत्वों की कमी से कुल उर्वरा शक्ति कम रहती है
► रेत के छोटे-छोटे टीलों वाले भाग में पाई जाती है
► NaCl (सोडियम क्लोराइड) की मात्रा अधिक
► राजस्थान की न्यूनतम उपजाऊ मिट्टी
► केवल चरागाह व झाड़ियाँ ही उग पाती हैं
► मिट्टी की ऊपरी सतह पर सफेद परत (नमक की तह) बन जाती है
► उपचार: जिप्सम का प्रयोग + निक्षालन (Leaching — यानी अतिरिक्त पानी से नमक को धोकर बहा देना)
► भारत एवं राजस्थान — दोनों में सर्वाधिक उपजाऊ मिट्टी
► पोटाश (Potash) की मात्रा अधिक; जल संचयन क्षमता सर्वाधिक
► नाइट्रोजन की मात्रा अपेक्षाकृत कम
► चूना, पोटाश, लौह कण, कैल्शियम की अधिकता
► भारत में सबसे व्यापक रूप से पाई जाने वाली मिट्टी भी यही है
जब नदी बहती है, तो वह अपने साथ ऊपरी इलाकों की सबसे उपजाऊ मिट्टी (गाद) बहाकर लाती है और मैदानी इलाकों में जमा कर देती है — यह ठीक वैसे ही है जैसे कोई हलवाई सबसे अच्छी सामग्री छानकर एक जगह इकट्ठा कर दे। इसी वजह से नदियों के किनारे बनी जलोढ़ मिट्टी में पोषक तत्वों की भरमार होती है, और यही कारण है कि दुनिया की ज़्यादातर बड़ी सभ्यताएँ (जैसे सिंधु घाटी) नदियों के किनारे ही बसी थीं।
► क्ले/चीका (Clay) की मात्रा सर्वाधिक; जलधारण क्षमता भी सर्वाधिक
► लोहा (Fe), एल्युमिनियम (Al), चूना (CaCO₃) की अधिकता
► गंधक, कैल्शियम, लोहा भरपूर मात्रा में एवं नाइट्रोजन पर्याप्त मात्रा में
► गीली होने पर फूलती है, सूखने पर सिकुड़ती है — इससे गहरी दरारें पड़ जाती हैं
► स्वयं जुताई (Self-Ploughing) का अनोखा गुण — इसे 'स्वजोत' कहा जाता है
► कपास की खेती के लिए राजस्थान की सर्वाधिक उपयुक्त मिट्टी
काली मिट्टी में चीका (Clay) की मात्रा बहुत ज़्यादा होती है, जो पानी सोखकर फूल जाती है और सूखने पर सिकुड़ जाती है — ठीक वैसे ही जैसे गीली रोटी सूखने पर सिकुड़कर उसमें दरारें पड़ जाती हैं। जब ये गहरी दरारें पड़ती हैं, तो ऊपर की मिट्टी नीचे गिरती है और नीचे की मिट्टी ऊपर आ जाती है — यानी बिना किसी हल-बैल के मिट्टी अपने आप 'पलट' जाती है। यही 'स्वजोत' या 'स्वयं जुताई' का जादू है, जो किसानों की मेहनत को कुछ हद तक कम कर देता है।
► आयरन ऑक्साइड (Fe₂O₃) की अधिकता के कारण इसका रंग लाल होता है
► फॉस्फोरस, नाइट्रोजन, कैल्शियम लवणों की कमी
► कण बारीक होते हैं; कृषि के लिए पर्याप्त उपजाऊ नहीं
► लेटेराइट मिट्टी में लौह-ऑक्साइड एवं पोटाश की अधिकता होती है
► लेटेराइट का निर्माण उच्च तापमान, भारी वर्षा एवं उच्च आर्द्रता वाले क्षेत्रों में होता है
► यह लाल मृदा मालवा पठार (मध्य प्रदेश) की काली मृदा का ही विस्तार मानी जाती है
► फॉस्फेट, नाइट्रोजन, कैल्शियम, कार्बनिक पदार्थों की कमी
► यह बलुई मटियार या बलुई दोमट के रूप में मिलती है
► लौह ऑक्साइड के जलयोजन (पानी के साथ मिश्रण) की उच्च मात्रा से लाल व पीला रंग बनता है
► कैल्शियम कार्बोनेट व ह्यूमस नगण्य (बहुत कम) मात्रा में
► नाइट्रोजन तथा जैविक कारकों की अल्पता (कमी)
(रिक्त मानचित्र में स्वयं अभ्यास करें) मानचित्र — राजस्थान की 8 मुख्य मिट्टियों (बलुई, भूरी-रेतीली, लवणीय, जलोढ़, काली, लाल दोमट, लाल-काली, लाल-पीली) का वितरण
| मिट्टी | सर्वाधिक क्षेत्र | मुख्य फसल | विशेष गुण |
|---|---|---|---|
| बलुई/रेतीली | जैसलमेर, बीकानेर, बाड़मेर | बाजरा, चना | राज्य में सर्वाधिक (2/3 भाग) |
| भूरी-रेतीली | पाली, जोधपुर, नागौर | जीरा, ईसबगोल | फॉस्फेट अधिक |
| लवणीय | श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ | चावल, अनार | न्यूनतम उपजाऊ |
| जलोढ़ | अलवर, भरतपुर, टोंक | सरसों, गेहूँ | सर्वाधिक उपजाऊ |
| काली | कोटा, बूंदी, बारां | कपास, सोयाबीन | स्वजोत (स्वयं जुताई) |
| लाल दोमट | बाँसवाड़ा, डूंगरपुर | मक्का, चावल | लौह-ऑक्साइड अधिक (लाल रंग) |
| लाल-काली | बूंदी, भीलवाड़ा | मक्का, कपास, अफीम | मालवा पठार का विस्तार |
| लाल-पीली | बनास बेसिन (मेवाड़) | सरसों, ज्वार | ह्यूमस नगण्य |
राजस्थान की मिट्टी को कई तरह की समस्याएँ प्रभावित करती हैं, जिनमें से हर एक का कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं उपाय अलग-अलग है। इन्हें अच्छी तरह समझना ज़रूरी है क्योंकि ये परीक्षा में सबसे ज़्यादा पूछी जाने वाली टॉपिक है।
| समस्या | कारण | प्रभावित क्षेत्र | उपाय |
|---|---|---|---|
| 1. अपरदन (Erosion) — 'रेंगती मृत्यु' | वनों की कटाई, अति पशुचारण (पश्चिमी राजस्थान में मुख्य), अवैज्ञानिक कृषि, खनन | राजस्थान में हवा (मुख्य कारण); भारत/विश्व में जल (मुख्य कारण) | वृक्षारोपण, खेत की मेड़बंदी, चारागाहों का विस्तार, वैज्ञानिक खनन |
| 2. सैम/जलाक्रांता (Waterlogging) — पारिस्थितिकी परिवर्तन | अधिक सिंचाई, जल रिसाव, नहर तल के नीचे कठोर चट्टानें | हनुमानगढ़, बड़ोपल गाँव, श्रीगंगानगर (भीषणतम); IGNP क्षेत्र में प्रमुख | सफेदा/यूकेलिप्टस वृक्षारोपण (इंडो-डच प्रोग्राम — नीदरलैंड सहयोग); राजाड़ परियोजना (1992-93, कनाडा सहयोग — चंबल) |
| 3. लवणीयता (Salinity) | शुष्क क्षेत्रों में अधिक सिंचाई → सफेद परत का निर्माण | श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, बीकानेर, जालौर, सांचौर, बाड़मेर | जिप्सम का प्रयोग (दीर्घकालीन हल); उर्वरक कम करें; निक्षालन (Leaching) |
| 4. क्षारीयता (Alkalinity) | रासायनिक उर्वरकों/खादों का अधिक उपयोग | pH मान 8 से अधिक होने पर क्षारीय समस्या पैदा होती है | जिप्सम + तवार व कैंचा की हरी खाद |
| 5. मृदा अवकर्षण (Soil Degradation) | रासायनिक खादों का अधिक उपयोग | भौतिक, रासायनिक व जैविक गुणवत्ता में कमी | जैविक खादों का उपयोग |
दोनों नाम सुनने में एक जैसे लगते हैं, लेकिन दोनों अलग समस्याएँ हैं। लवणीयता (Salinity) का मतलब है मिट्टी में नमक (NaCl) की अधिकता — यह ठीक वैसे ही है जैसे समुद्र का खारा पानी ज़मीन में भर जाए। जबकि क्षारीयता (Alkalinity) का मतलब है मिट्टी का pH मान (अम्लीय-क्षारीय पैमाना) 8 से ऊपर चला जाना — यह रासायनिक खादों के ज़्यादा इस्तेमाल से होता है, जैसे किसी चीज़ में बहुत ज़्यादा साबुन/सोडा मिला दिया जाए। दोनों ही समस्याओं का एक साझा इलाज है — जिप्सम का प्रयोग।
| प्रकार | विशेषता | सर्वाधिक क्षेत्र |
|---|---|---|
| परतदार अपरदन (Sheet Erosion) | मिट्टी की ऊपरी परत का एक समान (बराबर मात्रा में) कटाव | पश्चिमी राजस्थान (जैसलमेर) |
| चादरी अपरदन (Rill Erosion) | ज़मीन पर छोटी-छोटी नालियाँ बन जाना | सिरोही, राजसमंद |
| अवनालिका अपरदन (Gully Erosion/बीहड़) | गहरी घाटियाँ व खड्डे बन जाना — इसे 'बीहड़ भूमि' कहते हैं | चंबल बेसिन/हाड़ौती पठार — कोटा, करौली, धौलपुर, सवाई माधोपुर, बूंदी (सर्वाधिक बीहड़ यहीं) |
इन तीनों को एक क्रम में समझें — जैसे किसी दीवार पर पहले हल्की खरोंच आती है (परतदार अपरदन — बस ऊपरी परत घिसती है), फिर धीरे-धीरे उसमें लकीरें/नालियाँ बन जाती हैं (चादरी अपरदन), और अगर समय रहते नहीं रोका जाए तो अंत में गहरी खाइयाँ व खड्डे बन जाते हैं (अवनालिका अपरदन/बीहड़) — जिन्हें ठीक करना लगभग नामुमकिन हो जाता है। चंबल के बीहड़ इसी सबसे बुरी अवस्था का उदाहरण हैं, जहाँ पहले खेती लायक ज़मीन अब गहरी खाइयों में बदल चुकी है।
महत्वपूर्ण तथ्य — सैम (जलाक्रांता): बड़ोपल गाँव (हनुमानगढ़ जिला, पीलीबंगा तहसील) सैम की समस्या के लिए सबसे प्रसिद्ध है। IGNP (इंदिरा गांधी नहर परियोजना) क्षेत्र में सैम की समस्या का मुख्य कारण है — नहर तल के नीचे की चट्टानों का बहुत कठोर होना, जिससे पानी नीचे रिस नहीं पाता और सतह के पास ही जमा होकर जलभराव कर देता है।
(रिक्त मानचित्र में स्वयं अभ्यास करें) मानचित्र — राजस्थान में मृदा अपरदन के प्रकार एवं जलाक्रांता/लवणीयता प्रभावित क्षेत्रों का वितरण
जिप्सम मिट्टी की दो सबसे बड़ी समस्याओं — लवणीयता एवं क्षारीयता — दोनों का दीर्घकालीन (लंबे समय तक चलने वाला) हल है। यह राजस्थान में सर्वाधिक नागौर जिले में पाया जाता है। जिप्सम केवल कृषि में ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य (जैसे प्लास्टर ऑफ पेरिस बनाने में) एवं निर्माण उद्योग (जैसे सीमेंट बनाने में) में भी बहुत उपयोगी है।
जैविक कृषि का मतलब है बिना रासायनिक खाद व कीटनाशकों के, प्राकृतिक तरीकों (जैसे गोबर खाद, वर्मी कम्पोस्ट) से खेती करना। यह मिट्टी की सेहत को लंबे समय तक बनाए रखने का सबसे अच्छा तरीका माना जाता है — क्योंकि जैसा हमने ऊपर पढ़ा, रासायनिक खादों का अधिक उपयोग ही मृदा अवकर्षण व क्षारीयता जैसी समस्याओं की जड़ है।
| स्तर | प्रथम जैविक स्थान |
|---|---|
| राज्य (देश में) | सिक्किम — भारत का पहला पूर्ण जैविक राज्य |
| राजस्थान में जिला | डूंगरपुर |
| राजस्थान में गाँव | घाटी गाँव (सलूंबर) |
इस अध्याय को पूरी तरह अद्यतन रखने के लिए जुलाई 2026 तक की स्थिति के अनुसार नवीनतम मृदा संबंधी योजनाओं व आँकड़ों को यहाँ शामिल किया गया है।
मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना (Soil Health Card Scheme) की शुरुआत 19 फरवरी 2015 को राजस्थान के सूरतगढ़ (श्रीगंगानगर) से हुई थी — यानी यह योजना भी राजस्थान से ही शुरू हुई, ठीक वैसे ही जैसे देश की प्रथम राज्य वन नीति भी राजस्थान से जारी हुई थी (अध्याय 4 में पढ़ा)। वर्ष 2025 में इस योजना ने अपने 10 वर्ष पूरे किए। इस योजना के तहत हर किसान को हर 2 वर्ष में एक मृदा स्वास्थ्य कार्ड दिया जाता है, जिसमें मिट्टी के 12 पोषक तत्वों (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश जैसे मुख्य तत्व एवं अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व) की जानकारी होती है — बिल्कुल वैसे ही जैसे इंसान का हेल्थ चेकअप होता है, ठीक वैसे ही यह मिट्टी का हेल्थ चेकअप है। फरवरी 2025 तक देश भर के 17 राज्यों में 665 ग्राम-स्तरीय मृदा परीक्षण प्रयोगशालाएँ (VLSTL) स्थापित की जा चुकी हैं।
नवीनतम शोध आँकड़ों के अनुसार राजस्थान का लगभग 67% भू-भाग मरुस्थलीकरण (Desertification) से प्रभावित है — यानी राज्य का हर तीन में से दो हिस्सा किसी-न-किसी स्तर पर मिट्टी के बिगड़ने की समस्या झेल रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण वायु अपरदन (Wind Erosion) है, जो कुल मृदा क्षरण का लगभग 44.2% हिस्सा है, उसके बाद जल अपरदन (11.2%), वनस्पति क्षरण (6.25%) एवं लवणीकरण (1.07%) का स्थान आता है। पश्चिमी राजस्थान में तो वायु अपरदन कुल बिगड़ी हुई भूमि का लगभग 56% हिस्सा है — यह इस अध्याय में पहले पढ़े गए तथ्य की पुष्टि करता है कि राजस्थान में अपरदन का मुख्य कारण 'हवा' ही है (जबकि पूरी दुनिया में मुख्यतः 'पानी' अपरदन का मुख्य कारण होता है)।
राजस्थान सरकार ने 'गोवर्धन जैविक खाद योजना' के तहत राज्यभर में 50,000 स्थायी वर्मी-कम्पोस्ट (केंचुआ खाद) इकाइयाँ स्थापित करने का लक्ष्य रखा है, ताकि किसानों की रासायनिक खाद पर निर्भरता कम हो। वर्ष 2025-26 के बजट में कृषि विभाग को फार्म पौंड, कुएँ, वर्मी-कम्पोस्ट इकाइयों व तारबंदी जैसी योजनाओं के लिए ₹250 करोड़ का आवंटन किया गया है। इसका ज़मीनी असर भी दिखने लगा है — जनवरी 2026 में कोटपुतली-बहरोड़ जिले के नांगलहेड़ी गाँव पंचायत के लगभग 800 सदस्यों ने रासायनिक खाद व कीटनाशकों का पूरी तरह त्याग करने की शपथ ली, जो दर्शाता है कि जैविक खेती की तरफ राजस्थान के किसानों का रुझान लगातार बढ़ रहा है।
(रिक्त मानचित्र में स्वयं अभ्यास करें) मानचित्र — राजस्थान में मरुस्थलीकरण-प्रभावित क्षेत्र (67%) एवं जैविक खेती के अग्रणी जिले
| तथ्य | उत्तर |
|---|---|
| राजस्थान में सर्वाधिक पाई जाने वाली मिट्टी | एंटीसॉल (Entisol) — बलुई/रेतीली |
| दूसरी सर्वाधिक मिट्टी | एरिडीसॉल (Aridisol) |
| सर्वाधिक उपजाऊ मिट्टी | जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil) |
| कपास के लिए सर्वोत्तम मिट्टी | काली मिट्टी (वर्टीसॉल) |
| न्यूनतम उपजाऊ मिट्टी | लवणीय मिट्टी |
| स्वयं जुताई (स्वजोत) वाली मिट्टी | काली मिट्टी |
| हाड़ौती पठार की मिट्टी | मध्यम काली मिट्टी/वर्टीसॉल |
| राजस्थान के दो-तिहाई भाग में कौनसी मिट्टी | रेतीली एवं बलुई दोमट मिट्टी |
| सर्वाधिक बेकार/बंजर भूमि किस जिले में | जैसलमेर (68.34%) |
| चंबल बेसिन की खंड भूमि को क्या कहते हैं | अवनालिकाएँ (Gullies/बीहड़) |
| वायु अपरदन सर्वाधिक किस जिले में (राजस्थान) | जैसलमेर |
| जल अपरदन सर्वाधिक किस क्षेत्र में | चंबल प्रदेश |
| पर्वतीय मृदा को क्या कहते हैं | अपरिपक्व मिट्टी/लिथोसोल्स |
| कुबड़पट्टी/बांका पट्टी कहाँ है | नागौर-अजमेर (फ्लोराइड युक्त पानी → फ्लोरोसिस रोग) |
| जिप्सीफेरस मृदा किस जिले में | बीकानेर |
| रेवरिना मृदा किस जिले में | श्रीगंगानगर |
| जलधारण क्षमता सर्वाधिक किस मिट्टी में | काली मिट्टी |
| pH > 8 किस समस्या को दर्शाता है | क्षारीय समस्या |
| पेडोलॉजी क्या है | मृदा विज्ञान का अध्ययन |
| ICAR की स्थापना कब व कहाँ | 1929, नई दिल्ली |
Q1. नई वैज्ञानिक पद्धति (USDA) से राजस्थान की अधिकांश मिट्टी किस मृदा-क्रम से संबंधित है? — Raj. Police Constable 2020 Q2. वर्टीसोल मृदा मुख्य रूप से कहाँ पाई जाती है? — Asst. Statistical Officer 2022 Q3. राजस्थान के सर्वाधिक क्षेत्र पर कौनसी मृदा पाई जाती है? — JEN 2016 Q4. हाड़ौती पठार की मिट्टी किस प्रकार की है? — RAS Pre 1998 Q5. कपास के लिए सर्वाधिक उपयुक्त मृदा कौनसी है? — Lab Assistant 2022 Q6. राजस्थान की सर्वाधिक उपजाऊ मृदा कौनसी है? — JEN 2020 Q7. 'रेंगती मृत्यु' किसे कहते हैं? — Lab Assistant 2022 Q8. सैम (SAM) किस स्थिति से संबंधित है? — RAS 2007 Q9. बड़ोपल गाँव किसके लिए जाना जाता है? — E.O. Exam 2007 Q10. मिट्टी की लवणता का दीर्घकालीन हल क्या है? — RAS 1998 Q11. जिप्सम सर्वाधिक कहाँ पाया जाता है? — E.O. Exam 2007 Q12. कुबड़पट्टी कहाँ स्थित है? — RAS Pre 2007 Q13. राजस्थान में सर्वाधिक बेकार भूमि किस जिले में है? — RAS 1999, 2003