कल्पना कीजिए — साल 1730 ईस्वी की एक सुबह, जोधपुर के पास खेजड़ली नामक एक छोटे से गाँव में राजा के सैनिक पेड़ काटने पहुँचते हैं। अमृतादेवी बिश्नोई नाम की एक महिला पेड़ से लिपट जाती है और कहती है — "सिर सांटे रूंख रहे तो भी सस्तो जाण" यानी अगर एक पेड़ को बचाने के लिए सिर भी कटवाना पड़े, तो यह सौदा सस्ता है। देखते ही देखते 363 लोग पेड़ों से लिपटकर अपनी जान दे देते हैं — यह विश्व का पहला वृक्ष रक्षा आंदोलन था, और यह राजस्थान की धरती पर हुआ था। और क्या आप जानते हैं कि राजस्थान, जिसे ज़्यादातर लोग सिर्फ रेगिस्तान समझते हैं, वहाँ केवलादेव घना जैसा एक ऐसा पक्षी अभयारण्य भी है, जहाँ सर्दियों में हज़ारों किलोमीटर दूर साइबेरिया से सारस उड़कर आते हैं — मानो कोई पक्षी हर साल अपने ननिहाल आता हो! राजस्थान वन्यजीवों की विविधता में देश में दूसरे स्थान पर है (पहला असम) — यानी जो राज्य सबसे ज़्यादा सूखा माना जाता है, वही वन्यजीवों की संख्या में देश के सबसे आगे के राज्यों में गिना जाता है। आइए, इस अध्याय में हम राजस्थान की वनस्पति, यहाँ के जंगलों, वन्यजीव अभयारण्यों, राष्ट्रीय उद्यानों और जैव विविधता संरक्षण की पूरी कहानी विस्तार से समझते हैं।
पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) का सीधा मतलब है — किसी क्षेत्र में पाए जाने वाले जीव-जंतु, वनस्पति एवं वहाँ के वातावरण के बीच का आपसी संबंध। इसे ऐसे समझें — जैसे एक परिवार में हर सदस्य एक-दूसरे पर निर्भर रहता है, वैसे ही किसी क्षेत्र के पौधे, जानवर, मिट्टी, पानी और हवा भी एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं और एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। राजस्थान के भौगोलिक विस्तार में विविधता होने के कारण यहाँ चार अलग-अलग पारिस्थितिकी तंत्र पाए जाते हैं।
जैव विविधता का सुनहरा नियम: जहाँ वनस्पति की सघनता (घनापन) अधिक होती है, वहाँ जैव विविधता (Biodiversity) भी सर्वाधिक होती है — जैसे अरावली पारिस्थितिकी तंत्र में। जलीय क्षेत्रों एवं पूर्वी मैदानों में पक्षी जैव विविधता अधिक होती है। जबकि मरुस्थलीय क्षेत्रों में वर्षा एवं वनस्पति सघनता कम होने के कारण जैव विविधता भी सबसे कम होती है। इसे याद रखने का आसान तरीका है — जितनी हरियाली, उतनी विविधता!
(रिक्त मानचित्र में स्वयं अभ्यास करें) मानचित्र — राजस्थान के 4 पारिस्थितिकी तंत्र (मरु, अरावली, पूर्वी मैदान, हाड़ौती) की सीमाएँ
राजस्थान की जैव विविधता के सामने कई चुनौतियाँ हैं, जिन्हें दो भागों में बाँटा जा सकता है — मानवीय कारण एवं जलवायु/पर्यावरणीय कारण।
रोचक तथ्य: वन्यजीवों की विविधता में असम के बाद राजस्थान देश में दूसरा स्थान रखता है। आज़ादी से पहले राजस्थान को 'शिकारियों का स्वर्ग' कहा जाता था — क्योंकि यहाँ के राजा-महाराजा शिकार के बड़े शौकीन थे, लेकिन आज यही राज्य वन्यजीव संरक्षण में मिसाल कायम कर रहा है।
| वर्ष | नीति | मुख्य प्रावधान |
|---|---|---|
| 1894 | प्रथम वन नीति | औपनिवेशिक काल में वन प्रबंधन |
| 1952 | द्वितीय वन नीति | भौगोलिक क्षेत्र का 33% वनाच्छादित करना (पर्वत 60%, मैदान 20%) |
| 1988 | तृतीय वन नीति (नवीनतम) | पर्यावरण संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता, संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) की अवधारणा |
राष्ट्रीय वन नीति 1952 के अनुसार, देश के कुल भू-भाग के कम-से-कम 33% हिस्से पर वन होने चाहिए, जिसमें पर्वतीय क्षेत्रों में यह लक्ष्य 60% एवं मैदानी क्षेत्रों में 20% रखा गया है। इसे ऐसे समझें — जैसे किसी कक्षा में हर विषय में पास होने के लिए न्यूनतम अंक तय होते हैं, वैसे ही देश के पर्यावरण-संतुलन के लिए यह न्यूनतम वन-प्रतिशत तय किया गया है। हालाँकि राजस्थान अभी भी इस राष्ट्रीय लक्ष्य से काफी दूर है (आगे के आँकड़े देखें)।
| दिनांक | नीति | विशेषता |
|---|---|---|
| 18 फरवरी 2010 | प्रथम राज्य वन एवं पर्यावरण नीति | भौगोलिक क्षेत्र का 20% वृक्षाच्छादित करने का लक्ष्य — देश की प्रथम राज्य वन नीति |
| 5 जून 2023 | राजस्थान वन नीति 2023 | अगले 20 वर्षों में 20% वनावरण का लक्ष्य; जलवायु परिवर्तन नीति 2023 भी साथ में जारी |
महत्वपूर्ण तथ्य: देश में प्रथम राज्य वन नीति राजस्थान द्वारा ही जारी की गई थी (18 फरवरी 2010) — यानी वन नीति के मामले में राजस्थान पूरे देश में अग्रणी (सबसे आगे) रहा है।
राजस्थान में वनों की गणना दो तरीकों से होती है — पहला, सैटेलाइट तस्वीरों के आधार पर वैज्ञानिक तरीके से (ISFR रिपोर्ट), और दूसरा, वन विभाग के अपने रिकॉर्ड (प्रशासनिक प्रतिवेदन) के आधार पर। दोनों के आँकड़े अलग-अलग आ सकते हैं, क्योंकि दोनों की गणना पद्धति अलग है — यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी कक्षा की उपस्थिति गिनने के दो तरीके हों: एक CCTV कैमरे से गिनती (सटीक/वास्तविक) और दूसरा रजिस्टर में दर्ज नाम (कागज़ी रिकॉर्ड)।
A. ISFR रिपोर्ट (Indian State Forest Report)
| प्रकार | क्षेत्रफल (वर्ग किमी) | प्रतिशत |
|---|---|---|
| कुल वन + वृक्षावरण | 27,389.33 | 8.00% |
| वनावरण (Forest Cover) | 16,548.21 | 4.84% |
| वृक्षावरण (Tree Cover) | 10,841.12 | 3.16% |
| वन प्रकार | मानदंड (छत्र घनत्व) | राजस्थान % | सर्वाधिक जिला |
|---|---|---|---|
| अति सघन वन (Very Dense) | 70% से अधिक छत्र | 0.07% | अलवर |
| मध्यम सघन वन (Moderately Dense) | 40-70% छत्र | 1.24% | उदयपुर |
| खुले वन (Open Forest) | 10-40% छत्र | 3.53% | उदयपुर |
| झाड़ी (Scrub) | 10% से कम | 1.60% | पाली (453.45 वर्ग किमी) |
झाड़ी की परिभाषा: झाड़ी (Scrub) उन वनों को कहा जाता है जो 10% से कम वन-क्षेत्र (छत्र घनत्व) पर पाए जाते हैं — यानी सबसे विरल (पतले) वन। ISFR 2023 के अनुसार राजस्थान में कुल झाड़ी क्षेत्र 5476.75 वर्ग किमी (1.60%) है, जिसमें सर्वाधिक पाली (453.45 किमी²), अलवर (321.11 किमी²) व जयपुर (318.60 किमी²) में है, जबकि न्यूनतम श्रीगंगानगर (16.38 किमी²) में।
ISFR 2023 का रुझान: ISFR 2023 (18वीं रिपोर्ट) के अनुसार राजस्थान के 7 जिलों में वनावरण बढ़ा है (सर्वाधिक बढ़ोतरी: सीकर, बाड़मेर, अलवर), जबकि 8 जिलों में कमी आई है (सर्वाधिक कमी: बारां, प्रतापगढ़, अजमेर)।
B. प्रशासनिक प्रतिवेदन (31 मार्च 2024) के अनुसार अभिलेखित वन
| वन श्रेणी | क्षेत्रफल (किमी²) | प्रतिशत | सर्वाधिक जिला |
|---|---|---|---|
| आरक्षित वन (Reserved Forest) | 12,198.67 | 36.95% | उदयपुर |
| रक्षित वन (Protected Forest) | 18,629.80 | 56.43% | बारां |
| अवर्गीकृत वन (Unclassified Forest) | 2,185.53 | 6.62% | बीकानेर |
| कुल अभिलेखित वन | 33,014 किमी² | 9.61% | — |
(रिक्त मानचित्र में स्वयं अभ्यास करें) मानचित्र — जिलेवार वनावरण घनत्व (सर्वाधिक: उदयपुर, न्यूनतम: चूरू)
| तथ्य | आँकड़ा |
|---|---|
| देश के कुल वनों में राजस्थान का हिस्सा | 3.10% |
| अभिलेखित वनों में देश में राजस्थान का स्थान | 15वाँ |
| प्रति व्यक्ति वनावरण एवं वृक्षावरण | 0.037 हैक्टेयर |
| कुल कार्बन स्टॉक (ISFR 2023) | 110.171 मिलियन टन |
| प्रादेशिक वन मंडल | 38 |
| वन्य जीव मंडल | 16 |
A. कानूनी/प्रशासनिक वर्गीकरण (राज्य वन अधिनियम 1953)
| वन प्रकार | क्षेत्रफल (किमी²) | प्रतिशत | सर्वाधिक जिला | प्रतिबंध |
|---|---|---|---|---|
| आरक्षित वन (Reserved Forest) | 12,198.67 | 36.95% | उदयपुर | लकड़ी काटना, आखेट एवं पशुचारण — पूर्णतः प्रतिबंधित |
| रक्षित/संरक्षित वन (Protected Forest) | 18,629.80 | 56.43% | बारां | लकड़ी काटना एवं पशुचारण पर सीमित छूट |
| अवर्गीकृत वन (Unclassified Forest) | 2,185.53 | 6.62% | बीकानेर | लकड़ी काटना एवं पशुचारण पर कोई प्रतिबंध नहीं |
B. भौगोलिक वर्गीकरण (वर्षा, तापमान एवं ऊँचाई के आधार पर)
राजस्थान में वर्षा की मात्रा के अनुसार वनों को 5 प्रमुख भौगोलिक प्रकारों में बाँटा गया है — जैसे-जैसे वर्षा बढ़ती है, वनों का घनत्व एवं प्रकार भी बदलता जाता है, ठीक वैसे ही जैसे अध्याय 3 में हमने जलवायु के सामान्य वर्गीकरण में देखा था।
| वन प्रकार | वर्षा (सेमी) | कुल वन का % | विस्तार क्षेत्र |
|---|---|---|---|
| A. उपोष्ण सदाबहार वन | 150+ | 1% | मुख्यतः माउंट आबू (सिरोही) — ऊँचाई 1500 मी+ |
| B. उष्ण सागवान वन (Dry Teak) | 75-110 | 7% | वागड़ (डूंगरपुर, बाँसवाड़ा, प्रतापगढ़) व हाड़ौती (कोटा, बारां, झालावाड़) |
| C. उष्ण शुष्क मानसूनी/पतझड़ वन | 50-80 | 28% | मेवाड़ (राजसमंद, उदयपुर, भीलवाड़ा, चित्तौड़) व पूर्वी मैदान (अलवर, भरतपुर, करौली, धौलपुर) |
| D. उष्ण धोक वन (सर्वाधिक) | 30-60 | 58% | अर्द्धशुष्क मरुस्थल, अरावली क्षेत्र, सवाई माधोपुर, करौली |
| E. उष्ण कंटीले/मरुद्भिद वन | 0-30 | 6% | जैसलमेर, बीकानेर, बाड़मेर, जोधपुर |
वर्षा: 150 सेमी से अधिक | ऊँचाई: 1500 मीटर से अधिक | विस्तार: माउंट आबू (सिरोही) — कुल भौगोलिक वनों का 1%। प्रमुख वृक्ष/घास: डिक्लिप्टेरा आबूऐंसिस (अम्बरतरी — विश्व में केवल यहीं पाया जाने वाला पौधा), बाँस, जामुन। विशेषता: यहाँ जैव विविधता सर्वाधिक है, लेकिन ध्यान रहे राजस्थान में कोणधारी (Coniferous), अल्पाइन (Alpine) या मैंग्रोव (Mangrove) वन बिल्कुल नहीं पाए जाते — इनके लिए बहुत अधिक ठंड, बर्फ या समुद्र तट चाहिए, जो राजस्थान में नहीं है।
वर्षा: 75-110 सेमी | ऊँचाई: 250-450 मीटर | विस्तार: वागड़ व हाड़ौती — कुल वन का 7%। प्रमुख वृक्ष: सागवान (सर्वाधिक बाँसवाड़ा में), गूलर, महुआ, तेंदू। महत्व: औद्योगिक दृष्टि से सर्वाधिक उपयोगी — फर्नीचर व दरवाज़ों की चौखट बनाने में।
वर्षा: 50-80 सेमी | विस्तार: मेवाड़ क्षेत्र व पूर्वी मैदान — कुल वन का 28%। प्रमुख वृक्ष: साल, सागवान, शीशम, रोज़वुड, खैर, पलाश, आम, चंदन। महत्व: फर्नीचर उद्योग में सर्वाधिक उपयोग होता है।
वर्षा: 30-60 सेमी | विस्तार: अर्द्धशुष्क मरुस्थल, अरावली, सवाई माधोपुर, करौली — कुल वन का 58%, यानी हर 2 में से 1 पेड़ धोक वन का ही है! प्रमुख वृक्ष: धोक (एनोगेसस पेण्डुला), खेजड़ी, रोहिड़ा, बबूल, कैर, बेर। महत्व: ईंधन की लकड़ी व कोयला बनाने में उपयोगी, इसलिए इन्हें 'धौंकड़ा वन' भी कहा जाता है।
वर्षा: 0-30 सेमी | विस्तार: जैसलमेर, बीकानेर, बाड़मेर, जोधपुर — कुल वन का 6%। प्रमुख वनस्पति: कंटीली झाड़ियाँ, कैक्टस, डंडा थोर, खेजड़ी, बबूल, थूहर, केर, रोहिड़ा, फोग। महत्व: मरुस्थलीकरण रोकने में सहायक — जैसे किसी दीवार पर लगी बेल दीवार को टूटने से बचाती है, वैसे ही ये पौधे रेत को उड़ने और फैलने से रोकते हैं।
ऊँचाई: 450 मीटर से अधिक (अरावली की उच्च श्रेणियाँ) | विस्तार: राजसमंद, चित्तौड़गढ़, पाली, अलवर, सिरोही, उदयपुर, अजमेर (ध्यान रहे — जैसलमेर में नहीं पाया जाता)। प्रमुख वृक्ष: सालर, धौंक, धावड़ — ये गोंद (Gum) का बहुत अच्छा स्रोत हैं।
ISFR 2023 अनुसार वन-प्रकारवार अतिरिक्त प्रतिशत: उत्तरी शुष्क मिश्रित पर्णपाती वन: 38.78% | धौंकड़ा वन: 14.78% | शुष्क पर्णपाती झाड़ी वन: 10.92% | अति शुष्क सागवान वन: 4.92%
(रिक्त मानचित्र में स्वयं अभ्यास करें) मानचित्र — राजस्थान के भौगोलिक वन-प्रकार (A से F तक, वर्षा-आधारित वितरण)
राजस्थान के वनों में कई ऐसे वृक्ष हैं जो न सिर्फ पर्यावरण के लिए बल्कि यहाँ के लोगों की आजीविका (जीवनयापन) के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण हैं। नीचे दी गई तालिका में हर वृक्ष का वैज्ञानिक/स्थानीय नाम, सर्वाधिक क्षेत्र एवं उपयोग बताया गया है।
| वृक्ष | वैज्ञानिक/अन्य नाम | सर्वाधिक क्षेत्र | उपयोग/विशेषता |
|---|---|---|---|
| खेजड़ी | प्रोसोपिस सिनेरेरिया; 'जांटी' (स्थानीय); राज्य वृक्ष (1983) | पश्चिमी राजस्थान (सर्वाधिक जोधपुर) | राज्य का कल्पवृक्ष; गोगाजी के थान इसी नीचे; दशहरे पर पूजा की जाती है |
| रोहिड़ा | टीकोमेला अंडुलेटा; राज्य पुष्प (1983); 'मरुस्थल का सागवान' | पश्चिमी राजस्थान (जोधपुर) | फर्नीचर बनाने में उपयोगी; मरुभूमि के वन का गौरव |
| महुआ | मधुका लोंगिफोलिया; आदिवासियों का कल्पवृक्ष | डूंगरपुर (सर्वाधिक) | फूल से देसी शराब (मोकड़) बनती है; बीज से तेल; छाल औषधि के काम आती है |
| पलाश/ढाक/खाखरा | ब्युटिया मोनोस्पर्मा; 'जंगल की ज्वाला' | अरावली (राजसमंद, अजमेर, अलवर) | फूलों से प्राकृतिक रंग बनता है; दोने-पत्तल बनाने में; गोंद का स्रोत |
| डिक्लिप्टेरा आबूऐंसिस (अम्बरतरी) | एकमात्र माउंट आबू में पाया जाने वाला औषधीय पादप | माउंट आबू (सिरोही) — विश्व में केवल यहीं | अति दुर्लभ औषधीय पादप, बहुत विशिष्ट |
| खैर | अकेसिया कटेचु; 'कत्था' का स्रोत | उदयपुर, चित्तौड़गढ़ | छाल से 'कत्था' बनता है (हांडी प्रणाली द्वारा); कचौड़ी जनजाति इसमें कुशल |
| शहतूत | रेशमकीट पालन — सेरीकल्चर से जुड़ा | उदयपुर (सर्वाधिक) | रेशम उत्पादन — रेशमकीट इसी वृक्ष की पत्तियों पर पलते हैं |
| तेंदू | 'टीमरू'/'वागड़ का चीकू' (वागड़ में); 1974 में राष्ट्रीयकरण | प्रतापगढ़, चित्तौड़गढ़, हाड़ौती | पत्तियाँ बीड़ी बनाने में इस्तेमाल होती हैं; फल का नाम टिमरू है |
| जामुन | सर्वाधिक माउंट आबू, सिरोही, अजमेर | माउंट आबू | मधुमेह (डायबिटीज) के रोगियों के लिए बहुत उपयोगी फल |
| सागवान | टेक्टोना ग्रैंडिस; 'इमारती लकड़ी का राजा' | बाँसवाड़ा (सर्वाधिक) | फर्नीचर व दरवाज़े बनाने में; आर्थिक दृष्टि से बेहद मूल्यवान लकड़ी |
| साल/सालर | बोसवेलिया सेराटा; गोंद का स्रोत | अरावली क्षेत्र — अलवर, अजमेर, राजसमंद, सिरोही | 450 मीटर से अधिक ऊँचाई पर मिलता है; पैकिंग बॉक्स बनाने व गोंद के लिए उपयोगी |
| अश्वगंधा | विदानिया कुल; Anti-Tumor व Anti-Biotic गुण | — | आयुर्वेदिक उपचार में इस्तेमाल; शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है |
| बबूल | फैबेसी परिवार; 'गम अरबी का पेड़' | पश्चिमी राजस्थान | चारकोल (कोयला) बनाने में; बहुत दृढ़/मज़बूत लकड़ी (घनत्व 1170 किग्रा/घनमीटर) |
गोंद के प्रमुख स्रोत: सालर, पलाश, पीपल, नीम, खेजड़ी, बबूल, ढाक — इन वृक्षों से गोंद निकाला जाता है। बाड़मेर का चौहटन क्षेत्र गोंद उत्पादन के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इसके अतिरिक्त, अर्जुन का वृक्ष मुख्यतः भवानी मंडी (झालावाड़) में मिलता है, और यह रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में उपयोगी माना जाता है।
रेगिस्तानी इलाकों में जहाँ बड़े वृक्ष कम उगते हैं, वहाँ घास ही पशुओं के चारे और भूमि को बचाए रखने का सबसे बड़ा सहारा होती है। राजस्थान में कई प्रकार की घासें पाई जाती हैं, जिनमें से कुछ बेहद उपयोगी हैं तो कुछ हानिकारक भी।
| घास | वैज्ञानिक नाम | सर्वाधिक क्षेत्र | उपयोग/विशेषता |
|---|---|---|---|
| सेवण (रेगिस्तानी घासों का राजा) | लेसियुरस सिंडिकस | जैसलमेर (लाठी सीरिज क्षेत्र) | दुधारू पशुओं का उत्तम चारा; गोडावण की शरणस्थली; मरुस्थलीकरण रोकने में सहायक |
| धामण | सेन्क्रस सेटीजेस्स | जैसलमेर | दुधारू पशुओं का चारा; बाँसवाड़ा, डूंगरपुर में भी मिलती है |
| बाँस (आदिवासियों का हरा सोना) | बम्बूसा वल्गरिस (सर्वाधिक लंबी घास) | बाँसवाड़ा (सर्वाधिक), सिरोही में भी | आदिवासियों की इमारती लकड़ी; कागज़, टोकरी, चारपाई, लाठी बनाने में |
| खस (सुगंधित घास) | वेटीवेरिया जिजेनियोइडस | सवाई माधोपुर, भरतपुर, अजमेर, टोंक | जड़ों से सुगंधित तेल (इत्र) बनता है; शरबत में; तनों से टाटियाँ (कूलर के लिए) |
| बुर (सुगंधित घास) | — | बीकानेर (सर्वाधिक) | सुगंधित घास — इत्र उद्योग में उपयोगी |
| मोचिया घास | — | तालछापर (चूरू) | चूरू जिले में सर्वाधिक पाई जाने वाली घास |
| काँग्रेस घास (हानिकारक) | पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस | जयपुर जिला (सर्वाधिक प्रभावित) | अमेरिका से आयातित खरपतवार — चर्म रोग व अस्थमा का वाहक (नुकसानदायक) |
अन्य महत्वपूर्ण जानकारी: राजस्थान की अन्य घासें: अंजन, करड़, भरूट, मुरात, लवण, सिरकानियाँ। स्थानीय घास के मैदानों/चारागाहों को बीकानेर, जोधपुर, फलौदी, सीकर, झुंझुनूं व चूरू में 'बीड़' या 'ओरण' कहते हैं। इनसे जुड़े स्थानीय शब्द हैं — रखत (बिना जुती भूमि), कांकड़, डांग, रुद।
समय-समय पर राजस्थान सरकार व केंद्र सरकार ने मिलकर कई वृक्षारोपण एवं वानिकी योजनाएँ चलाई हैं। इनका मुख्य उद्देश्य मरुस्थलीकरण रोकना, वन क्षेत्र बढ़ाना एवं स्थानीय लोगों को वनों से जोड़ना रहा है।
| कार्यक्रम/योजना | शुरुआत | सहयोग | उद्देश्य/विशेषता |
|---|---|---|---|
| मरुस्थल वृक्षारोपण कार्यक्रम | 1977-78 | केंद्र:राज्य = 75:25 (10 जिले) | मरुस्थल विकास कार्यक्रम — 16 जिले; भागीदारी 75:25 |
| ऑपरेशन खेजड़ी | 1991 | राज्य सरकार | मरुस्थलीकरण रोकना; खेजड़ी वृक्ष का संरक्षण |
| अरावली वृक्षारोपण योजना | 1 अप्रैल 1992 (1992-2000) | जापान (OECF) — 10 जिले | 10 जिले: अलवर, जयपुर, सीकर, झुंझुनूं, नागौर, पाली, सिरोही, उदयपुर, चित्तौड़, बाँसवाड़ा (ध्यान रहे — अजमेर शामिल नहीं) |
| राज्य वानिकी क्रियान्वयन योजना | 1996-2016 (20 वर्षीय) | राज्य सरकार | राज्य में वानिकी को बढ़ावा देना |
| राज्य वानिकी एवं जैव विविधता कार्यक्रम (RFBP-JICA) | अप्रैल 2003 | JICA (जापान) व AFD (फ्राँस) | फेज-I (2003-10): 18 जिले; फेज-II (2011-22): 15 जिले; फेज-III (2023): 13 जिले (10 मरु + 3 गैर-मरु) |
| हरित राजस्थान कार्यक्रम | 18 जून 2009 | राज्य सरकार | पंचवर्षीय वृक्षारोपण योजना; 2022-23 में 5 करोड़ पौधे — ₹42 करोड़ लागत |
| वन धन योजना (राज्य) | 12 अगस्त 2015 | राज्य सरकार | वन क्षेत्रों के निकट रहने वाले लोगों का विकास; वनों पर निर्भरता कम करना; रोज़गार प्रदान करना |
| वन धन विकास योजना (केंद्र) | 14 अप्रैल 2018 | केंद्र सरकार (TRIFED) | गैर-लकड़ी आधारित उत्पादों द्वारा आदिवासियों की आय बढ़ाना |
| घर-घर औषधि योजना | 1 अगस्त 2021 (2021-27) | राज्य सरकार | 4 पौधे: तुलसी, अश्वगंधा, कालमेघ, गिलोय; रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना |
| TOFIR (Tree Outside Forest in Rajasthan) | 2023-24 | राज्य सरकार | 5 करोड़ पौधे/वर्ष: 1 करोड़ गोचर/ओरण + 1 करोड़ शहरी + 3 करोड़ जन साधारण |
सहयोग: फ्रांस की एजेंसी AFD (70%) + राज्यांश (30%) | लागत: ₹1693.91 करोड़ | अवधि: अप्रैल 2023 से मार्च 2028 | जिले: 13 (अलवर, बारां, भीलवाड़ा, भरतपुर, बूंदी, दौसा, धौलपुर, जयपुर, झालावाड़, करौली, कोटा, सवाई माधोपुर, टोंक) | क्षेत्र: रामगढ़ विषधारी, भैंसरोड़गढ़, केवलादेव, बीसलपुर, उम्मेदगंज व मुकंदरा हिल्स
सहयोग: जापान की एजेंसी JICA — ₹1569.19 करोड़ | कुल लागत: ₹1803.42 करोड़ (19 जिले)
आधार: राष्ट्रीय वन नीति 1988 | राजस्थान में शुरुआत: 15 मार्च 1991 | वर्तमान में यह वन सुरक्षा एवं प्रबंध समितियों (VFPMC) के माध्यम से काम करता है — यानी स्थानीय ग्रामीणों को ही वन की रक्षा में भागीदार बनाया जाता है, ताकि वे वनों को अपना समझें और उनकी रक्षा करें।
वर्ष: 1730 ई. (भाद्रपद शुक्ला दशमी को) | स्थान: खेजड़ली गाँव — जोधपुर जिला | कारण: जोधपुर रियासत के राजा के आदेश पर खेजड़ी वृक्ष काटे जाने के विरुद्ध विरोध | नेतृत्व: अमृतादेवी बिश्नोई + उनकी तीन पुत्रियाँ + 363 अन्य बिश्नोई अनुयायी | बलिदान: कुल 363 लोगों ने पेड़ों से लिपटकर अपने प्राण दिए — इसे 'साका-खडाना' कहा जाता है | विश्व प्रसिद्धि: यह विश्व का प्रथम पेड़ बचाओ आंदोलन माना जाता है, जो चिपको आंदोलन (1973, उत्तराखंड) से भी सैकड़ों साल पहले हुआ था।
याद रखें: खेजड़ी को 'राज्य का कल्पवृक्ष' कहा जाता है — कल्पवृक्ष का अर्थ है ऐसा वृक्ष जो हर ज़रूरत पूरी करे (जैसे पौराणिक कथाओं में कल्पवृक्ष हर इच्छा पूरी करता था)। खेजड़ी भी मरुस्थल में पशुओं का चारा, ईंधन की लकड़ी, छाया व मिट्टी की उर्वरता — सब कुछ देता है, इसीलिए इसे यह नाम मिला।
| पुरस्कार | शुरुआत | राशि | विशेषता |
|---|---|---|---|
| अमृता देवी बिश्नोई पुरस्कार | 1994 | ₹50,000 (तीन श्रेणियाँ) | व्यक्तिगत वन संरक्षण + वन्यजीव संरक्षण + संस्थागत वन सुरक्षा — तीनों श्रेणियों में दिया जाता है |
| इंदिरा प्रियदर्शनी वृक्ष मित्र पुरस्कार | 1986 | ₹2,50,000 | भारत सरकार — पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा; वनीकरण व बंजर भूमि विकास हेतु |
| राजीव गाँधी पर्यावरण संरक्षण पुरस्कार | 2012 | ₹2-5 लाख + रजत कमल | 5 जून को दिया जाता है; व्यक्तिगत (₹2 लाख) + नगरीय निकाय (₹3 लाख) + संस्थागत (₹5 लाख) |
| कैलाश सांखला वन्यजीव संरक्षण पुरस्कार | 2010 | ₹50,000 | वन्यजीवों की सुरक्षा हेतु दिया जाता है |
| वनपाल पुरस्कार | — | — | सरकारी वन रक्षक एवं वन विभाग कर्मचारियों को दिया जाता है |
| व्यक्तिगत वन संरक्षण | व्यक्तिगत वन्यजीव संरक्षण | संस्थागत वन सुरक्षा |
|---|---|---|
| ओम सिंह राजावत (2014) | सतनाम सिंह (2018) | वंडर सीमेंट कंपनी, चित्तौड़ (2014) |
| नारायण लाल कुमावत (2019) | गजेंद्र सिंह मांझी (2010) | मानव सेवा संस्थान, हनुमानगढ़ (2018) |
| श्याम सुंदर पालीवाल (2010) | पदम सिंह राठौड़ (2021) | वन सुरक्षा समिति, पाटिया, उदयपुर (2018) |
| अभिलाषा एवं बच्चू सिंह वर्मा (2021) | मोहित शर्मा एवं दिव्या शर्मा (2022) | वन सुरक्षा समिति, सती की चौरी, उदयपुर (2020) |
| अधिनियम/परियोजना | वर्ष | विशेषता |
|---|---|---|
| वन्यजीव संरक्षण अधिनियम | 1972 (संशोधन 2022, लागू 1 अप्रैल 2023) | वन्यजीवों के शिकार पर रोक; CITES (अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव व्यापार संधि) का अनुपालन |
| बाघ संरक्षण परियोजना (Project Tiger) | 1973 | रणथम्भौर, सरिस्का राजस्थान में इसी परियोजना के तहत आते हैं |
| मगरमच्छ संरक्षण परियोजना | 1975 | चंबल नदी में मगरमच्छ संरक्षण हेतु |
| वन संरक्षण अधिनियम | 1980 (संशोधित 1988) | वनभूमि को गैर-वन उद्देश्यों (जैसे खनन/निर्माण) हेतु उपयोग करने के लिए केंद्र सरकार की अनुमति अनिवार्य |
| पर्यावरण संरक्षण अधिनियम (EPA) | 1986 | पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण हेतु — इसे 'EPA' के नाम से भी जाना जाता है |
| हाथी संरक्षण परियोजना | 1992 | Project Elephant के नाम से जानी जाती है |
| जैव विविधता संरक्षण अधिनियम | 2002 (नियम 2010) | जैव विविधता संधि (CBD) के तहत; राज्य जैव विविधता बोर्ड का गठन इसी के अंतर्गत हुआ |
| डॉल्फिन संरक्षण अधिनियम | 2001 | गांगेय डॉल्फिन को राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया गया (2010 में) |
| दिनांक | दिवस |
|---|---|
| 14-31 जनवरी | जीव जंतु पखवाड़ा |
| 2 फरवरी | रामसर / विश्व आर्द्रभूमि दिवस (World Wetlands Day) |
| 21 मार्च | विश्व वानिकी दिवस (World Forestry Day) |
| 22 मार्च | विश्व जल दिवस (World Water Day) |
| 23 मार्च | विश्व मौसम विज्ञान दिवस |
| 22 अप्रैल | विश्व पृथ्वी दिवस (World Earth Day) |
| 22 मई | विश्व जैव विविधता दिवस |
| 5 जून | विश्व पर्यावरण दिवस (World Environment Day) |
| 1-7 जुलाई | वन महोत्सव / वन सप्ताह |
| 12 सितंबर | खेजड़ली दिवस (राजस्थान) / राज्य वन महोत्सव |
| 16 सितंबर | ओज़ोन दिवस |
| 1-7 अक्टूबर | वन्य जीव सप्ताह (Wildlife Week) |
| संस्थान | स्थापना | स्थान | विशेषता |
|---|---|---|---|
| CAZRI (Central Arid Zone Research Institute) | 1959 | जोधपुर | 5 उपकेंद्र: बीकानेर, जैसलमेर, पाली, भुज (कच्छ, गुजरात), लेह (लद्दाख) |
| AFRI (Arid Forest Research Institute) | 1987 | जोधपुर | शुष्क वन अनुसंधान संस्थान — वन विभाग के अंतर्गत |
| राजस्थान राज्य जैव विविधता बोर्ड | 14 सितंबर 2010 | जयपुर | जैव विविधता अधिनियम 2002 के अंतर्गत स्थापित |
| FSI (Forest Survey of India) | 1981 | देहरादून (उत्तराखंड) | ISFR रिपोर्ट तैयार करती है — प्रति 2 वर्ष में एक बार |
| उद्यान | स्थान | विशेषता |
|---|---|---|
| सज्जनगढ़ जैविक उद्यान | उदयपुर | उदयपुर के प्रसिद्ध राजमहल के निकट स्थित |
| माचिया सफारी पार्क | जोधपुर | मरु वातावरण में जीव संरक्षण |
| नाहरगढ़ जैविक उद्यान | जयपुर | जयपुर का प्रमुख पर्यटन स्थल |
| अभेड़ा जैविक उद्यान | कोटा (नांता) | कोटा के नांता क्षेत्र में स्थित |
निर्माणाधीन: मरुघरा जैव उद्यान — बीकानेर के बीछवाल में निर्माणाधीन है।
| थीम पार्क | स्थान | विशेषता |
|---|---|---|
| कैक्टस गार्डन | कुलधरा (जैसलमेर) | कैक्टस की विभिन्न प्रजातियाँ प्रदर्शित की जाती हैं |
| बटरफ्लाई पार्क | उदयपुर (अजमेर में प्रस्तावित) | बटरफ्लाई वैली — कुलिश स्मृति वन (जयपुर) में भी |
| बोगनवेलिया थीम पार्क | उदयपुर एवं जयपुर | — |
| जैव विविधता पार्क | तामधर (उदयपुर) | — |
| किशनबाग (जयपुर के धोरे) | जयपुर | थार मरुस्थल की झलक दिखाता है |
| प्रकृति पार्क | चूरू, लक्ष्मणगढ़ (सीकर) | — |
| सिटी पार्क एवं फाउंटेन पार्क | जयपुर (मानसरोवर) | — |
| संविधान पार्क | जयपुर | — |
| ऑक्सीजन पार्क | कोटा | ₹100 करोड़ की लागत से विकसित |
| मंकी वैली | गलता जी (जयपुर) | बंदरों का प्राकृतिक आवास |
वन्यजीवों को बचाने के लिए मुख्यतः दो वैज्ञानिक तरीके अपनाए जाते हैं — स्वः स्थाने (In-Situ) एवं बाह्य स्थाने (Ex-Situ)। इन दोनों के बीच का अंतर एक आसान उदाहरण से समझें।
स्वः स्थाने संरक्षण (In-Situ) मतलब किसी जीव को उसके प्राकृतिक (असली) घर यानी जंगल में ही सुरक्षित रखना — जैसे कोई बच्चा अपने घर में रहकर पढ़ाई करे, अपने परिवार व माहौल के साथ। इसके विपरीत, बाह्य स्थाने संरक्षण (Ex-Situ) मतलब किसी जीव को उसके प्राकृतिक आवास से बाहर निकालकर किसी खास, सुरक्षित जगह (जैसे चिड़ियाघर) में रखना — जैसे कोई बच्चा हॉस्टल में जाकर पढ़े, अपने घर से दूर लेकिन विशेष देखभाल में।
क्षेत्रफल: 282.03 वर्ग किमी (बाघ परियोजना क्षेत्र सहित 1530.23 वर्ग किमी) | राजस्थान का प्रथम राष्ट्रीय उद्यान | 'बाघों का घर' — राजस्थान की प्रथम बाघ परियोजना (1973-74) | प्रमुख बाघिन: मछली (T-16) एवं एरोहेड | धोक वृक्ष की अधिकता | प्रमुख स्थल: त्रिनेत्र गणेश मंदिर, जोगी महल, कुक्कर घाटी (Dog Valley) | तालाब: काला तालाब, जंगली तालाब, सुख तालाब | नदियाँ: चंबल + बनास | पर्वतमालाएँ: विंध्याचल + अरावली | India Eco Development Project (विश्व बैंक सहयोग से) | घोषणा: 28 दिसंबर 2007, बफर घोषणा: 6 जुलाई 2012 | जिले: सवाई माधोपुर, करौली, बूंदी, टोंक
क्षेत्रफल: 28.73 वर्ग किमी (राजस्थान का सबसे छोटा राष्ट्रीय उद्यान) | UNESCO विश्व प्राकृतिक धरोहर (1985) — राज्य की एकमात्र प्राकृतिक धरोहर | 'पक्षियों का स्वर्ग' — भारत का सबसे बड़ा पक्षी अभयारण्य | शीतकाल में साइबेरियन सारस यहाँ आते हैं | रामसर सूची में शामिल (1 अक्टूबर 1981) | अजान बाँध इसी अभयारण्य में स्थित है | डॉ. सलीम अली (प्रसिद्ध पक्षी वैज्ञानिक) की कर्मस्थली | 'ऐंचा' घास + 'यूट्रीकुलेरिया' (दुर्लभ मांसाहारी वनस्पति) पाई जाती है | भगवान शिव (केवलादेव) के प्राचीन मंदिर से नामकरण | गंभीरी + बाणगंगा नदियों के संगम पर स्थित | 'भरतपुर बर्ड पैराडाइज' पुस्तक के लेखक मार्टिन इवांस हैं | ऑस्ट्रियन कंपनी Swarovski की मदद से डॉ. सलीम अली इंटरप्रेटेशन सेंटर बनाया गया
क्षेत्रफल: 200.43 वर्ग किमी (राजस्थान का सबसे बड़ा राष्ट्रीय उद्यान, कुछ स्रोतों में 217.63 वर्ग किमी) | राजस्थान का नवीनतम राष्ट्रीय उद्यान | राजस्थान की तीसरी बाघ परियोजना (2013) | गागरोनी (हीरामन) तोते एवं बाघों के लिए प्रसिद्ध | सागवान वनस्पति की अधिकता | जिले: कोटा, बूंदी, झालावाड़, चित्तौड़गढ़ | घोषणा: 9 अप्रैल 2013, बफर घोषणा: 9 अप्रैल 2013 | अबली मीणी का महल, गुप्तकालीन हूणों का शिव मंदिर स्थित है | बाघ परियोजना क्षेत्र: 1135.78 वर्ग किमी | राष्ट्रीय उद्यान + दर्रा + चंबल + जवाहर सागर अभयारण्य को मिलाकर बना
| उद्यान | वर्ष | जिला | क्षेत्र | विशेषता |
|---|---|---|---|---|
| रणथम्भौर | 1980 | सवाई माधोपुर | 282.03 किमी² | प्रथम / बाघों का घर |
| केवलादेव | 1981 | भरतपुर | 28.73 किमी² | UNESCO + सबसे छोटा |
| मुकुंदरा हिल्स | 2012 | कोटा-चित्तौड़ | 200.43 किमी² | नवीनतम + सबसे बड़ा |
(रिक्त मानचित्र में स्वयं अभ्यास करें) मानचित्र — राजस्थान के 3 राष्ट्रीय उद्यान (रणथम्भौर, केवलादेव, मुकुंदरा हिल्स) की स्थिति
| क्रम | अभयारण्य | जिला | वर्ष | क्षेत्र (किमी²) | विशेषता |
|---|---|---|---|---|---|
| 1 | राष्ट्रीय मरु उद्यान | जैसलमेर, बाड़मेर | 1981 | 3162 | गोडावण, जीवावशेष पार्क, सेवण घास, पीवणा साँप, रेसल्स वाइपर |
| 2 | सरिस्का | अलवर | 1955 | — | दूसरी बाघ परियोजना, हरे कबूतर, रीसस बंदर, मोर |
| 3 | कैलादेवी | करौली, स.माधोपुर | 1983 | 676.82 | सर्वाधिक धोक वन, दूसरा सबसे बड़ा अभयारण्य |
| 4 | कुंभलगढ़ | उदयपुर, पाली, राजसमंद | 1971 | 610.53 | भेड़िये, रणकपुर जैन मंदिर |
| 5 | राष्ट्रीय चंबल | कोटा, बूंदी, करौली, धौलपुर | 1979 | 564 | घड़ियाल, डॉल्फिन, मगर |
| 6 | सीतामाता | प्रतापगढ़, चित्तौड़, सलूंबर | 2017 | — | उड़न गिलहरी, चौसिंगा, सागवान, पैंगोलिन, सर्वाधिक जैव विविधता |
| 7 | रणथम्भौर (अभयारण्य) | सवाई माधोपुर | 1955 | — | प्रथम बाघ परियोजना का हिस्सा |
| 8 | जवाहर सागर | बूंदी, कोटा, चित्तौड़ | 1975 | — | मगरमच्छ, उत्तरी भारत का प्रथम सर्प उद्यान |
| 9 | भैंसरोड़गढ़ | चित्तौड़गढ़ | 1983 | — | घड़ियाल, चंबल + ब्राह्मणी नदी |
| 10 | शेरगढ़ | बारां | 1983 | — | 'साँपों की शरणस्थली', परवन नदी |
| 11 | जयसमंद | सलूंबर (उदयपुर) | 1955 | — | 'जलचरों की बस्ती', बघेरे, रूठी रानी का महल |
| 12 | तालछापर | चूरू | 1962 | 7.19 | काले हिरण, कुरजा, मोचिया घास, वन्यजीव प्रशिक्षण केंद्र |
| 13 | रामगढ़ विषधारी | बूंदी | 1982 | — | अजगर, मेज नदी, कनक सागर झील, चौथी बाघ परियोजना (2022) |
| 14 | जमवारामगढ़ | जयपुर | 1982 | — | चौथी बाघ परियोजना, धोक वन |
| 15 | टॉडगढ़ रावली | ब्यावर, पाली, राजसमंद | 1983 | — | धोक वन, दिवेर में महाराणा प्रताप विजय स्मारक, तेंदुआ |
| 16 | फुलवारी की नाल | उदयपुर (कोटड़ा) | 1983 | — | सोम, मानसी, वाकल नदियाँ; देश का प्रथम ह्यूमन एनाटॉमी पार्क |
| 17 | सीतामाता (अभयारण्य) | प्रतापगढ़, चित्तौड़ | 1979 | — | चीतल की मातृभूमि, 5 नदियों का संगम |
| 18 | सवाई माधोपुर | सवाई माधोपुर | 1955 | — | रणथम्भौर NP से आच्छादित |
| 19 | सवाई मानसिंह | सवाई माधोपुर | 1984 | — | चिड़ीखोह पर्यटक स्थल |
| 20 | दर्रा (मुकुंदरा) | कोटा, झालावाड़ | 1955 | — | गागरोनी तोते, अबली मीणी महल |
| 21 | नाहरगढ़ | जयपुर | 1980 | — | तीसरा जैविक उद्यान, लॉयन सफारी, घड़ियाल प्रजनन केंद्र |
| 22 | माउंट आबू | सिरोही | 2004/2008 | — | जंगली मुर्गे, डिक्लिप्टेरा आबूऐंसिस, इको सेंसिटिव जोन |
| 23 | बंध बारेठा | भरतपुर | 1985 | — | 'परिंदों का घर', जरखे, बंध बारेठा झील |
| 24 | सज्जनगढ़ | उदयपुर | 1987 | 5.19 | राज्य का सबसे छोटा अभयारण्य, प्रथम जैविक उद्यान, बाँसदरा पहाड़ी |
| 25 | बस्सी | चित्तौड़गढ़ | 1988 | — | चीतलों की चहल-पहल, ओरई-बामनी उद्गम |
| 26 | रामसागर | धौलपुर | 1955 | — | — |
| 27 | वन विहार | धौलपुर | 1955 | — | वन विहार कोठी स्थित है |
| 28 | केसरबाग | धौलपुर | 1955 | 14.76 | मिलिट्री स्कूल स्थित है |
(रिक्त मानचित्र में स्वयं अभ्यास करें) मानचित्र — राजस्थान के 26 वन्यजीव अभयारण्यों की जिलेवार स्थिति
| क्रम | नाम | घोषणा | जिले | क्षेत्र (किमी²) | विशेष |
|---|---|---|---|---|---|
| 1 | रणथम्भौर | 28.12.2007 | स.माधोपुर, करौली, बूंदी, टोंक | 1530.23 | देश की पहली टाइगर रिजर्व में से एक; राष्ट्रीय उद्यान + स.माधोपुर + कैलादेवी + चंबल अभयारण्य मिलाकर बना |
| 2 | सरिस्का | 28.12.2007 | अलवर, जयपुर, कोटपुतली-बहरोड़ | 1213.34 | सरिस्का + जमवारामगढ़ अभयारण्य मिलाकर बना; देश की पहली टाइगर रिजर्व जहाँ बाघों का पुनर्स्थापन (Reintroduction) हुआ |
| 3 | मुकुंदरा हिल्स | 9.4.2013 | कोटा, बूंदी, झालावाड़, चित्तौड़ | 1135.78 | मुकुंदरा NP + दर्रा + चंबल + जवाहर सागर मिलाकर बना |
| 4 | रामगढ़ विषधारी | 16 मई 2022 | बूंदी, कोटा, भीलवाड़ा | 1496.49 | राजस्थान की चौथी, देश की 52वीं टाइगर रिजर्व — 16 मई 2022 को अधिसूचित |
| 5 | धौलपुर-करौली | 28.9.2023 | धौलपुर, करौली | 599.64 | राजस्थान की 5वीं, देश की 55वीं टाइगर रिजर्व — 6 अक्टूबर 2023 को नोटिफिकेशन जारी |
प्रस्तावित 6वाँ टाइगर रिजर्व: कुंभलगढ़ टाइगर रिजर्व (राजसमंद क्षेत्र) — प्रस्तावित; NTCA की सैद्धांतिक मंज़ूरी 22 अगस्त 2023 को मिली थी। ताज़ा स्थिति के लिए 'नवीनतम अपडेट' खंड देखें, जहाँ इसकी 2025-26 की प्रगति बताई गई है।
रामसर कन्वेंशन (संधि) वर्ष 1971 में ईरान के 'रामसर' शहर में हस्ताक्षरित हुई थी — यह आर्द्रभूमियों (Wetlands, यानी वो क्षेत्र जहाँ पानी व ज़मीन दोनों मिलते हैं, जैसे झील/दलदल) के संरक्षण के लिए एक अंतरराष्ट्रीय संधि है। जिन आर्द्रभूमियों को इस सूची में शामिल किया जाता है, उन्हें वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण एवं संरक्षित घोषित किया जाता है।
| क्रम | साइट का नाम | शामिल वर्ष | जिला | विशेष प्रजाति |
|---|---|---|---|---|
| 1 | केवलादेव (घना) | 1 अक्टूबर 1981 | भरतपुर | साइबेरियन सारस |
| 2 | सांभर झील | 23 मार्च 1990 | जयपुर | कुरजा + राजहंस |
| 3 | मेनार | 5 जून 2023 | उदयपुर | 'पक्षी गाँव' (Bird Village) |
| 4 | खींचन | 5 जून 2023 | फलौदी | कुरजा (डेमोइसेल क्रेन) |
| 5 | सिलीसेढ़ झील | दिसंबर 2025 🆕 | अलवर | अरावली की पहाड़ियों में स्थित कृत्रिम झील |
(रिक्त मानचित्र में स्वयं अभ्यास करें) मानचित्र — राजस्थान के 5 रामसर स्थल (केवलादेव, सांभर, मेनार, खींचन, सिलीसेढ़)
| रिजर्व का नाम (वर्ष) | जिला |
|---|---|
| बीसलपुर (2008) | टोंक |
| जोड़बीड़ गढ़वाला (2008) | बीकानेर |
| सुंधा माता (2008) | जालौर, सिरोही |
| गुढ़ा विश्नोईयान (2011) | जोधपुर |
| शाकंभरी (2012) | सीकर, झुंझुनूं |
| गोगेलाव (2012) | नागौर |
| बीड़ झुंझुनूं (2012) | झुंझुनूं |
| रोटू (2012) | नागौर |
| उम्मेदगंज पक्षी विहार (2012) | कोटा |
| जवाई बाँध लेपर्ड-I (2013) | पाली |
| बांसियाल-खेतड़ी (2017) | झुंझुनूं |
| बांसियाल-खेतड़ी बागोर (2018) | झुंझुनूं |
| जवाई बाँध लेपर्ड-II (2018) | पाली |
| मनसा माता (2019) | झुंझुनूं |
| शाहबाद (2021) | बारां |
| रणखार (2022) | जालौर |
| शाहबाद तलहटी (2022) | बारां |
| बीड़ घास फूलिया खुर्द (2022) | भीलवाड़ा |
| बाघदड़ा क्रोकोडाइल (2022) | उदयपुर |
| वाडाखेड़ा बीड़ (2022) | सिरोही |
| झालाना-आमागढ़ (2023) | जयपुर |
| रामगढ़ कुंजी सुनवास (2023) | बारां |
| खरमोर-अरवर गाँव (2023) | अजमेर |
| सोरसन-I, II, III (2023) | बारां |
| हमीरगढ़ (2023) | भीलवाड़ा |
| खींचन (2023) | फलौदी |
| बांझ आमली (2023) | बारां |
| महशीर (2023) | उदयपुर |
| बीड़ फतेहपुर (2023) | सीकर |
| गंगा भैरव घाटी (2023) | अजमेर |
| बीड़ मुहाना-I (2023) | जयपुर |
| बीड़ मुहाना-II (2023) | जयपुर (सबसे छोटा) |
| बालेश्वर (2023) | सीकर (सबसे बड़ा) |
| अमरख महादेव लेपर्ड (2023) | उदयपुर |
| आसोप (27 अगस्त 2024) | भीलवाड़ा (नवीनतम में से एक) |
| मोकला-पारेवर (2025) | जैसलमेर |
| बुचारा मेन (2025) | जयपुर (कोटपुतली-बहरोड़) |
आखेट निषेध क्षेत्र वे स्थान हैं जहाँ शिकार करना पूर्णतः प्रतिबंधित है — इनका उद्देश्य किसी खास प्रजाति (जैसे काला हिरण, गोडावण) को शिकारियों से बचाना है।
| जिला | क्षेत्र | प्रमुख विशेषता/वन्यजीव |
|---|---|---|
| जोधपुर | होली, गुढ़ा विश्नोई, लोहावट, डोली, साथीन, फिटकासनी | विश्नोई समुदाय — काला हिरण, कुरजा (सर्वाधिक शिकार-निषिद्ध क्षेत्र यहीं हैं) |
| बीकानेर | जोड़बीड़, मुकाम, बज्जू, देरानोक, संवत्सर-कोटसर | स्तनधारी जीव, चिंकारा, कुरजा |
| अजमेर | सोंखलिया, तिलोरा | गोडावण (सोंखलिया में) |
| जयपुर | संयाल, महला | जल पक्षी |
(रिक्त मानचित्र में स्वयं अभ्यास करें) मानचित्र — कंजर्वेशन रिजर्व एवं आखेट निषेध क्षेत्रों का जिलेवार वितरण
| जंतुआलय | स्थापना | विशेषता |
|---|---|---|
| जयपुर जंतुआलय | 1876 ई. | महाराजा रामसिंह-II द्वारा स्थापित, रामनिवास बाग → अब नाहरगढ़ में स्थानांतरित; घड़ियाल प्रजनन केंद्र भी है |
| उदयपुर जंतुआलय | 1878 ई. | गुलाबबाग (उदयपुर) → अब सज्जनगढ़ जैविक उद्यान में स्थानांतरित |
| बीकानेर जंतुआलय | 1922 ई. | — |
| जोधपुर जंतुआलय | 1936 ई. | पक्षीशाला + गोडावन प्रजनन केंद्र भी है |
| कोटा जंतुआलय | 1954 ई. | — |
| मृग उद्यान | जिला |
|---|---|
| अशोक मृग उद्यान | जयपुर |
| संजय मृग उद्यान | जयपुर |
| अमृता देवी मृग उद्यान | जोधपुर |
| माचिया सफारी मृग उद्यान | जोधपुर |
| पुष्कर मृग उद्यान | अजमेर |
| सज्जनगढ़ मृग उद्यान | उदयपुर |
| दुर्ग मृग उद्यान | चित्तौड़गढ़ |
| जैविक उद्यान | उद्घाटन | विशेष |
|---|---|---|
| सज्जनगढ़ जैविक उद्यान, उदयपुर | 12 अप्रैल 2015 | प्रथम बायोलॉजिकल पार्क |
| माचिया जैविक उद्यान, जोधपुर | 20 जनवरी 2016 | — |
| नाहरगढ़ जैविक उद्यान, जयपुर | 4 जून 2016 | तीसरा जैविक उद्यान |
| अभेड़ा जैविक उद्यान, कोटा | 18 दिसंबर 2021 | — |
| मरुधरा बायोलॉजिकल पार्क, बीकानेर | निर्माणाधीन | — |
| पुष्कर जैविक उद्यान, अजमेर | निर्माणाधीन | — |
बजट 2024-25 की घोषणा: अलवर में एक नया बायोलॉजिकल पार्क स्थापित करने की घोषणा हुई है। साथ ही, किशनबाग रेगिस्तान पार्क — जयपुर (विद्याधर नगर, 64.30 हेक्टेयर क्षेत्र में) भी विकसित किया जा रहा है।
मार्च 2016 से राजस्थान वन विभाग ने हर जिले को एक विशेष वन्यजीव 'शुभंकर' (Mascot) के रूप में गोद दिया, ताकि लोगों में उस जीव के प्रति लगाव व जागरूकता बढ़े — यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी स्कूल या टीम का एक चिह्न (Mascot) होता है, जिससे सब उससे जुड़ाव महसूस करते हैं। ध्यान रहे, नवगठित जिलों के शुभंकर अभी घोषित नहीं हुए हैं।
| जिला | शुभंकर |
|---|---|
| अजमेर | खरमोर पक्षी |
| अलवर | सांभर हिरण |
| बाँसवाड़ा | जलपीपी |
| बारां | मगरमच्छ |
| बीकानेर | भट्ट तीतर (बटबड़) |
| बाड़मेर | मरू लोमड़ी |
| बूंदी | सुर्खाब |
| भीलवाड़ा | मोर |
| चित्तौड़गढ़ | चौसिंगा |
| चूरू | काला हिरण |
| दौसा | खरगोश |
| धौलपुर | पंछीरा (इंडियन स्कीमर) |
| डूंगरपुर | जांघिल |
| हनुमानगढ़ | छोटा किलकिला |
| जैसलमेर | गोडावण |
| जालौर | भालू |
| झालावाड़ | गागरोनी तोता |
| झुंझुनूं | काला तीतर |
| जोधपुर | कुरजाँ (डेमोइसेल क्रेन) |
| करौली | घड़ियाल |
| कोटा | उद्बिलाव |
| नागौर | राजहंस (Flamingo) |
| पाली | तेंदुआ |
| प्रतापगढ़ | उड़न गिलहरी |
| राजसमंद | भेड़िया |
| सीकर | शाहीन (बाज) |
| उदयपुर | कब्र बिज्जू |
| सवाई माधोपुर | बाघ |
| श्रीगंगानगर | चिंकारा |
| सिरोही | जंगली मुर्गी |
| टोंक | हंस |
| जयपुर | चीतल |
| भरतपुर | साइबेरियन सारस |
वैज्ञानिक नाम: सही वैज्ञानिक नाम 'Gazella bennettii' (गजेला बेनेटी) है, हालाँकि पुराने स्रोतों में 'Gazella Gazella' भी मिलता है। राज्य पशु घोषित: 1981 | प्रमुख स्थान: नाहरगढ़ अभयारण्य + राष्ट्रीय मरुस्थल अभयारण्य
वैज्ञानिक नाम: Ardeotis nigriceps | राज्य पक्षी घोषित: 1981 | अन्य नाम: 'सोन चिड़िया' | सर्वाधिक: जैसलमेर (मरू उद्यान), अजमेर (सोंखलिया), बारां (सोरसन) | कृत्रिम प्रजनन केंद्र: जैसलमेर (रामदेवरा), जोधपुर, बारां (सोरसन) | सर्वोच्च न्यायालय ने 'प्रोजेक्ट टाइगर' की तर्ज़ पर गोडावण के लिए भी विशेष कार्ययोजना बनाने का सुझाव दिया है, क्योंकि गोडावण अब गंभीर रूप से संकटग्रस्त (Critically Endangered) प्रजाति है — बिजली की हाई-टेंशन तारों से टकराकर होने वाली मौतें इसकी घटती संख्या का एक बड़ा कारण हैं।
(रिक्त मानचित्र में स्वयं अभ्यास करें) मानचित्र — राज्य पशु-पक्षी (चिंकारा, गोडावण) एवं प्रमुख प्रवासी पक्षियों के आगमन स्थल
इस अध्याय को पूरी तरह अद्यतन रखने के लिए जुलाई 2026 तक की स्थिति के अनुसार नवीनतम वन एवं वन्यजीव संबंधी घटनाओं व आँकड़ों को यहाँ शामिल किया गया है।
कुंभलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य को राजस्थान का छठा एवं भारत का 59वाँ टाइगर रिजर्व बनाने की प्रक्रिया अंतिम चरण में है। NTCA (राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण) की तकनीकी समिति ने इसे मंज़ूरी दे दी है। यह लगभग 30 वर्षों से चल रहे प्रयासों का परिणाम है, जिसे 2015 के बाद गति मिली। 11 अक्टूबर 2025 को विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों को मंज़ूरी मिलने के बाद कोर क्षेत्र का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया, और 24 फरवरी 2026 को राज्य सरकार ने अनुपालन रिपोर्ट भी भेज दी है। गजट नोटिफिकेशन का इंतज़ार है। खास बात यह है कि यह भारत का सबसे पश्चिमी छोर पर स्थित टाइगर रिजर्व होगा। प्रस्तावित क्षेत्र राजसमंद, उदयपुर, पाली, अजमेर व सिरोही — इन 5 जिलों में फैला होगा।
दिसंबर 2025 में केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने अलवर जिले की सिलीसेढ़ झील को रामसर स्थल घोषित किया — यह अरावली की पहाड़ियों में स्थित एक कृत्रिम (मानव-निर्मित) झील है। इसके साथ ही राजस्थान में रामसर स्थलों की कुल संख्या 5 हो गई है (केवलादेव, सांभर, मेनार, खींचन, सिलीसेढ़), जबकि यह भारत का 96वाँ रामसर स्थल है। जून 2026 तक भारत में कुल रामसर स्थलों की संख्या बढ़कर 100 हो चुकी है — यानी हर लगभग हर महीने कोई-न-कोई नई आर्द्रभूमि इस अंतरराष्ट्रीय सूची में जुड़ रही है, जो दर्शाता है कि भारत आर्द्रभूमि संरक्षण को कितनी गंभीरता से ले रहा है।
भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) की रिपोर्ट हर दो वर्ष में आती है। नवीनतम प्रकाशित रिपोर्ट अभी भी 18वीं ISFR (2023 का डेटा, दिसंबर 2024 में प्रकाशित) ही है — अगली रिपोर्ट (ISFR 2025) जुलाई 2026 तक प्रकाशित नहीं हुई है। इसलिए इस अध्याय में दिए गए सभी वन-आँकड़े ISFR 2023 (18वीं रिपोर्ट) पर आधारित हैं, जो वर्तमान में उपलब्ध सबसे नवीनतम आधिकारिक आँकड़े हैं।
(रिक्त मानचित्र में स्वयं अभ्यास करें) मानचित्र — 2025-26 के नवीनतम संरक्षण स्थल (कुंभलगढ़ प्रस्तावित टाइगर रिजर्व, सिलीसेढ़ रामसर स्थल)
| प्रश्न | उत्तर |
|---|---|
| राजस्थान का राज्य वृक्ष कौनसा है? | खेजड़ी (1983 में घोषित) |
| राजस्थान का राज्य पुष्प कौनसा है? | रोहिड़ा (1983 में घोषित) |
| राजस्थान का राज्य पशु कौनसा है? | चिंकारा (1981) |
| राजस्थान का राज्य पक्षी कौनसा है? | गोडावण / Great Indian Bustard (1981) |
| राजस्थान में सर्वाधिक वन प्रकार (भौगोलिक %) कौनसा है? | उष्ण धोक वन — 58% |
| राजस्थान का सबसे बड़ा राष्ट्रीय उद्यान कौनसा है? | मुकुंदरा हिल्स राष्ट्रीय उद्यान |
| राजस्थान का सबसे छोटा राष्ट्रीय उद्यान कौनसा है? | केवलादेव (28.73 किमी²) |
| राजस्थान का सबसे बड़ा वन्यजीव अभयारण्य कौनसा है? | राष्ट्रीय मरु उद्यान (3162 किमी²) |
| राजस्थान का सबसे छोटा वन्यजीव अभयारण्य कौनसा है? | सज्जनगढ़, उदयपुर (5.19 किमी²) |
| राजस्थान में कुल कितने बाघ परियोजना (Tiger Reserve) हैं? | 5 (रणथम्भौर, सरिस्का, मुकुंदरा हिल्स, रामगढ़ विषधारी, धौलपुर-करौली) |
| राजस्थान में कुल कितने रामसर स्थल हैं? | 5 (केवलादेव, सांभर, मेनार, खींचन, सिलीसेढ़) |
| खेजड़ली आंदोलन किस वर्ष हुआ और कितने लोगों ने बलिदान दिया? | 1730 ई. में, 363 लोगों ने (अमृतादेवी बिश्नोई के नेतृत्व में) |
| विश्व का प्रथम पेड़ बचाओ आंदोलन कौनसा माना जाता है? | खेजड़ली आंदोलन, राजस्थान (1730 ई.) |
| ISFR रिपोर्ट कौनसी संस्था तैयार करती है? | भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI), देहरादून — प्रति 2 वर्ष में |
| देश की प्रथम राज्य वन नीति किस राज्य ने जारी की? | राजस्थान — 18 फरवरी 2010 |
| स्वः स्थाने एवं बाह्य स्थाने संरक्षण में क्या अंतर है? | स्वः स्थाने = प्राकृतिक आवास में संरक्षण (राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य); बाह्य स्थाने = आवास के बाहर संरक्षण (चिड़ियाघर, मृग उद्यान) |
| CAZRI एवं AFRI की स्थापना कब व कहाँ हुई? | CAZRI: 1959, जोधपुर | AFRI: 1987, जोधपुर |
| संख्या | अर्थ |
|---|---|
| 3 | राष्ट्रीय उद्यान (रणथम्भौर, केवलादेव, मुकुंदरा हिल्स) |
| 26 (कुछ स्रोतों में 28) | वन्यजीव अभयारण्य |
| 5 | बाघ परियोजनाएँ (Tiger Reserves) |
| 5 | रामसर स्थल (2025 के बाद) |
| 39 | कंजर्वेशन रिजर्व |
| 33 | आखेट निषेध क्षेत्र |
| 5 | जंतुआलय (Zoo) |
| 7 | मृग उद्यान (Deer Park) |
| 8.00% | ISFR 2023 अनुसार कुल वन+वृक्षावरण प्रतिशत |
| 58% | उष्ण धोक वन — राजस्थान का सबसे बड़ा वन प्रकार |
| 363 | खेजड़ली आंदोलन (1730 ई.) में बलिदान देने वालों की संख्या |
| 12 सितंबर | खेजड़ली दिवस |
Q1. राजस्थान के 4 पारिस्थितिकी तंत्रों का वर्णन कीजिए तथा बताइए किसमें जैव विविधता सर्वाधिक है। Q2. खेजड़ली आंदोलन का ऐतिहासिक महत्व स्पष्ट कीजिए। Q3. ISFR रिपोर्ट क्या है? ISFR 2023 के अनुसार राजस्थान के वन आँकड़े बताइए। Q4. राजस्थान के भौगोलिक वर्गीकरण के अनुसार 5 प्रमुख वन प्रकारों की तुलना कीजिए। Q5. स्वः स्थाने एवं बाह्य स्थाने संरक्षण में अंतर स्पष्ट करते हुए राजस्थान के उदाहरण दीजिए। Q6. राजस्थान के 3 राष्ट्रीय उद्यानों की तुलना (वर्ष, जिला, क्षेत्रफल, विशेषता) कीजिए। Q7. राजस्थान की बाघ परियोजनाओं का विस्तृत विवरण दीजिए। Q8. राजस्थान के रामसर स्थलों की सूची एवं उनकी विशेषताएँ बताइए। Q9. गोडावण (Great Indian Bustard) के संरक्षण हेतु उठाए गए कदमों की चर्चा कीजिए।