🌦️ अध्याय 3/14 — राजस्थान भूगोल

जलवायु एवं जलवायु वर्गीकरण

Climate & Climate Classification | RAS Pre + Mains
📋 इस अध्याय में
  1. जलवायु — परिचय एवं परिभाषा
  2. जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक
  3. सामान्य जलवायु वर्गीकरण (5 प्रकार)
  4. कोपेन का जलवायु वर्गीकरण (Koppen Classification)
  5. त्रिवार्था का जलवायु वर्गीकरण (Trewartha Classification)
  6. थॉर्नथ्वेट का जलवायु वर्गीकरण (Thornthwaite Classification)
  7. ग्रीष्म ऋतु (मार्च - जून)
  8. वर्षा ऋतु (जून - सितंबर) — मानसून
  9. शरद ऋतु (अक्टूबर - नवंबर) — मानसून निवर्तन
  10. शीत ऋतु (दिसंबर - फरवरी)
  11. अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
  12. नवीनतम अपडेट 2025-26 (Latest Updates — इंटरनेट रिसर्च आधारित)
  13. त्वरित पुनरावृत्ति एवं सारांश (Quick Revision)
🌟 क्या आप जानते हैं?

कल्पना कीजिए — एक ही राज्य में, एक ही दिन, दो बिल्कुल अलग मौसम मिल जाएँ। जून के महीने में जब बाड़मेर और चूरू में गर्म हवा (लू) चलती है और तापमान 50°C के पार पहुँच जाता है, ठीक उसी समय माउंट आबू में इतनी ठंडक होती है कि लोग स्वेटर पहनते हैं — यही है राजस्थान की जलवायु का सबसे बड़ा आश्चर्य! और यह भी जानकर हैरानी होगी कि माही नदी विश्व में अनोखी है, वैसे ही राजस्थान का मानसून भी अनोखा है — यह देश में सबसे देरी से आता है, लेकिन सबसे जल्दी लौट भी जाता है, जैसे कोई मेहमान बहुत देर से आए और जल्दी में ही वापस चला जाए। साल 2025 में तो कमाल ही हो गया — राजस्थान में इतनी बारिश हुई कि यह पिछले 108 सालों में दूसरी सबसे ज़्यादा मानसूनी बारिश वाला साल बन गया, जबकि परंपरागत रूप से यही राज्य अपने सूखे और मरुस्थल के लिए जाना जाता रहा है। आइए, इस अध्याय में हम समझते हैं कि आखिर राजस्थान की जलवायु को कौन-कौन से कारक प्रभावित करते हैं, वैज्ञानिकों ने इसे किन-किन तरीकों (कोपेन, त्रिवार्था, थॉर्नथ्वेट) से वर्गीकृत किया है, और यहाँ की चार ऋतुएँ — गर्मी, बरसात, पतझड़ और सर्दी — अपने साथ कौन-कौन सी अनोखी घटनाएँ (लू, आंधी, मावठ, शीत लहर) लेकर आती हैं।

1जलवायु — परिचय एवं परिभाषा

जलवायु (Climate) शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है — जल + वायु। इसकी परिभाषा है: किसी भू-भाग पर एक लम्बी अवधि (सामान्यतः 30 वर्ष से अधिक) के दौरान, अलग-अलग समयों में विभिन्न मौसमों की औसत अवस्था को 'जलवायु' कहते हैं। इसे एक आसान उदाहरण से समझें — अगर आप किसी व्यक्ति के आज के मूड के बारे में पूछें, तो वह 'मौसम' (Weather) जैसा है — बदलता रहता है, कभी खुश तो कभी उदास। लेकिन अगर आप पूछें कि वह व्यक्ति 'सामान्यतः' कैसा स्वभाव रखता है (जैसे शांत, गुस्सैल, या मिलनसार), तो यह उसकी 'जलवायु' जैसा है — यानी लंबे समय में औसत व्यवहार।

जलवायु बनाम मौसम — सबसे आसान अंतर

⏱️ मौसम (Weather)
  • अल्पकालीन (Short-term) अवस्था
  • आज, इस हफ्ते या इस महीने की स्थिति
  • हर दिन बदल सकता है
📅 जलवायु (Climate)
  • दीर्घकालीन (Long-term) अवस्था
  • 30 वर्ष या उससे अधिक का औसत
  • आसानी से नहीं बदलती

2जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक

राजस्थान की जलवायु किसी एक कारण से नहीं बनती — इसे बनाने में कई भौगोलिक तत्वों का मिला-जुला असर होता है। इन्हें समझना ज़रूरी है क्योंकि आगे के सभी वर्गीकरण इन्हीं कारकों पर आधारित हैं।

1. अक्षांशीय स्थिति (Latitudinal Position)

2. समुद्र से दूरी (Distance from Sea)

3. उच्चावच (Relief — ऊँचाई-नीचाई)

💡 माउंट आबू ठंडा क्यों रहता है?

माउंट आबू समुद्र तल से लगभग 1200 मीटर से भी ज़्यादा ऊँचाई पर स्थित है। ऊपर बताए गए नियम (हर 165 मीटर पर 1°C कमी) के अनुसार, माउंट आबू राजस्थान के मैदानी इलाकों से कई डिग्री ठंडा रहता है। इसे ऐसे समझें जैसे किसी पहाड़ पर चढ़ते समय हवा पतली और ठंडी होती जाती है — विमान में बैठकर ऊपर जाने पर भी खिड़की से बाहर बहुत ठंड महसूस होती है, वजह वही ऊँचाई है।

4. अरावली पर्वतमाला का प्रभाव

💡 समानांतर बनाम टकराने वाली हवा — सरल उदाहरण

सोचिए एक गेंद को दीवार के बिल्कुल बराबर (समानांतर) दिशा में फेंका जाए — वह दीवार को छुए बिना निकल जाएगी। लेकिन अगर गेंद को सीधे दीवार पर (लंबवत) फेंका जाए, तो वह टकराकर रुक जाएगी और ऊर्जा वहीं खर्च होगी। अरब सागरीय हवाएँ अरावली के 'समानांतर' बहने की वजह से बिना टकराए निकल जाती हैं (कम वर्षा), जबकि बंगाल की खाड़ी की हवाएँ अरावली से 'टकराकर' ऊपर उठती हैं और वहीं अपना पानी बरसा देती हैं (अधिक वर्षा) — यही वजह है कि दक्षिण-पूर्वी राजस्थान (हाड़ौती, वागड़) में पश्चिमी राजस्थान से कहीं अधिक बारिश होती है।

(रिक्त मानचित्र में स्वयं अभ्यास करें) मानचित्र — राजस्थान में अरावली पर्वतमाला की दिशा एवं मानसूनी हवाओं (अरब सागरीय व बंगाल की खाड़ी शाखा) का प्रवाह-मार्ग

3सामान्य जलवायु वर्गीकरण (5 प्रकार)

सबसे सरल एवं सामान्य वर्गीकरण तापमान एवं वर्षा के आधार पर किया जाता है, जिसमें राजस्थान को 5 जलवायु प्रकारों में बाँटा जाता है। यह वर्गीकरण सीधे भौतिक प्रदेशों (अध्याय 1B) से भी जुड़ा हुआ है — जैसे-जैसे आप मरुस्थल से हाड़ौती की ओर बढ़ते हैं, वर्षा भी बढ़ती जाती है।

जलवायु का प्रकारऔसत वार्षिक वर्षासंबंधित भौतिक प्रदेश
शुष्क कटिबन्धीय (Arid Tropical)0-20 सेमीपश्चिमी मरुस्थल
अर्द्धशुष्क (Semi-Arid)20-40 सेमीमरुस्थल का सीमावर्ती क्षेत्र
उपआर्द्र (Sub-Humid)40-60 सेमीअरावली पर्वतीय प्रदेश
आर्द्र (Humid)60-80 सेमीपूर्वी मैदानी प्रदेश
अति आर्द्र (Very Humid)80-120 सेमीहाड़ौती पठार, माही बेसिन (वागड़)

याद रखने का आसान तरीका: ध्यान दें कि वर्षा की मात्रा पश्चिम से पूर्व/दक्षिण-पूर्व की ओर बढ़ते हुए क्रमशः बढ़ती जाती है — जैसे किसी सीढ़ी पर चढ़ते हुए हर कदम पर वर्षा 20 सेमी बढ़ती जाए: 0-20 (मरुस्थल) → 20-40 (अर्द्धशुष्क) → 40-60 (अरावली) → 60-80 (पूर्वी मैदान) → 80-120 (हाड़ौती/वागड़)।

4कोपेन का जलवायु वर्गीकरण (Koppen Classification)

व्लादिमीर कोपेन एक जर्मन-रूसी जलवायुविद् थे, जिन्होंने विश्व स्तर पर जलवायु वर्गीकरण की एक बेहद प्रसिद्ध पद्धति विकसित की, जो वनस्पति, तापमान एवं वर्षा — तीनों को आधार बनाती है। कोपेन के अनुसार राजस्थान में कुल 4 प्रकार की जलवायु पाई जाती है (ध्यान रहे — कोपेन के वर्गीकरण में एक 'E' यानी हिमतुल्य/टुंड्रा प्रकार की जलवायु भी होती है, लेकिन वह राजस्थान में कहीं नहीं पाई जाती, क्योंकि राजस्थान में इतनी ठंड और बर्फ कहीं नहीं है)।

1. BWh — शुष्क मरुस्थल तुल्य जलवायु (उष्ण)

2. BShw — अर्द्धशुष्क या स्टेपी तुल्य जलवायु

महत्वपूर्ण तथ्य: कोपेन के वर्गीकरण के अनुसार BShw (अर्द्धशुष्क/स्टेपी) राजस्थान का क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा जलवायु प्रदेश है।

3. Cwg — उपआर्द्र तुल्य जलवायु प्रदेश

4. Aw — उष्ण आर्द्र तुल्य जलवायु

(रिक्त मानचित्र में स्वयं अभ्यास करें) मानचित्र — कोपेन जलवायु वर्गीकरण के अनुसार राजस्थान के 4 जलवायु प्रदेश (BWh, BShw, Cwg, Aw)

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5त्रिवार्था का जलवायु वर्गीकरण (Trewartha Classification)

ग्लेन थॉमस त्रिवार्था (Glenn Trewartha) ने कोपेन के वर्गीकरण को थोड़ा संशोधित करके एक नया वर्गीकरण दिया, जो मुख्यतः वर्षा एवं गर्म ग्रीष्म ऋतु (Hot Summer) को आधार बनाता है। राजस्थान में इसके अनुसार भी 4 प्रकार की जलवायु पाई जाती है, और दिलचस्प बात यह है कि त्रिवार्था के कोड कोपेन जैसे ही मिलते-जुलते हैं, बस औसत वर्षा के आँकड़े अलग बताए गए हैं।

कोपेन प्रकारत्रिवार्था प्रकारऔसत वर्षाविशेषता
AwAw100 सेमीगर्म ग्रीष्म ऋतु
BWhBWh10 सेमीगर्म ग्रीष्म ऋतु
BShwBShw30 सेमीगर्म ग्रीष्म ऋतु
Cwg/CawCaw70 सेमीगर्म ग्रीष्म ऋतु

6थॉर्नथ्वेट का जलवायु वर्गीकरण (Thornthwaite Classification)

चार्ल्स वॉरेन थॉर्नथ्वेट (C.W. Thornthwaite) का वर्गीकरण सबसे वैज्ञानिक माना जाता है, क्योंकि यह सिर्फ वर्षा-तापमान ही नहीं बल्कि वाष्पीकरण (Evaporation — यानी पानी के भाप बनकर उड़ने की मात्रा) को भी ध्यान में रखता है। यही कारण है कि व्यक्तिगत जलवायु वर्गीकरणों में थॉर्नथ्वेट का वर्गीकरण सबसे अधिक मान्य (सर्वाधिक स्वीकृत) माना जाता है।

थॉर्नथ्वेट की कोड-प्रणाली को समझें

थॉर्नथ्वेट अपने कोड में दो तरह के अक्षरों का प्रयोग करते हैं — पहला अक्षर वर्षा दर्शाता है और दूसरा तापमान। इसे नीचे सारणी में देखें:

🌧️ वर्षा संबंधित कोड
  • A = अति आर्द्र (सबसे अधिक वर्षा)
  • B = आर्द्र
  • C = उपआर्द्र
  • D = अर्द्धशुष्क
  • E = शुष्क (सबसे कम वर्षा)
🌡️ तापमान संबंधित कोड
  • A = उच्च ताप (गर्म)
  • A' = मध्य ताप (सामान्य)

ध्यान रखें: राजस्थान में A (अति आर्द्र) एवं B (आर्द्र) — ये दोनों सबसे अधिक वर्षा वाली श्रेणियाँ बिल्कुल नहीं पाई जातीं, क्योंकि राजस्थान समग्र रूप से एक अपेक्षाकृत शुष्क राज्य है। राजस्थान में केवल C, D एवं E श्रेणी की जलवायु ही पाई जाती है।

1. CA'w — उपआर्द्र तुल्य जलवायु

2. DA'w — अर्द्धशुष्क तुल्य जलवायु

महत्वपूर्ण तथ्य: थॉर्नथ्वेट के अनुसार DA'w (अर्द्धशुष्क तुल्य) राजस्थान का क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा जलवायु प्रदेश है — ध्यान रहे, यह कोपेन के सबसे बड़े प्रदेश (BShw) से एक अलग वर्गीकरण पद्धति है, इसलिए दोनों नाम अलग-अलग हैं, लेकिन भौगोलिक तौर पर काफी हद तक एक जैसे क्षेत्र को कवर करते हैं।

3. DB'w — शुष्क-अर्द्धशुष्क जलवायु

4. EA'd — शुष्क मरुस्थल तुल्य जलवायु

(रिक्त मानचित्र में स्वयं अभ्यास करें) मानचित्र — थॉर्नथ्वेट जलवायु वर्गीकरण के अनुसार राजस्थान के 4 जलवायु प्रदेश (CA'w, DA'w, DB'w, EA'd)

7ग्रीष्म ऋतु (मार्च - जून)

राजस्थान में चार प्रमुख ऋतुएँ पाई जाती हैं — ग्रीष्म (मार्च-जून), वर्षा (जून-सितंबर), शरद (अक्टूबर-नवंबर) एवं शीत (दिसंबर-फरवरी)। सबसे पहले बात करते हैं ग्रीष्म ऋतु की, जो राजस्थान की सबसे प्रचंड और चुनौतीपूर्ण ऋतु मानी जाती है।

ऋतुसमयविशेषता
ग्रीष्म ऋतुमार्च - जूनलू, आंधी, भभूल्या
वर्षा ऋतुजून - सितंबरमानसून
शरद ऋतुअक्टूबर - नवंबरमानसून निवर्तन
शीत ऋतुदिसंबर - फरवरीमावठ, शीत लहर

(i) लू (Loo/Hot Wind)

(ii) आंधी (Dust Storm)

(iii) भभूल्या (Whirlwind/Dust Devil)

💡 लू, आंधी और भभूल्या में फर्क कैसे याद रखें?

तीनों ग्रीष्म ऋतु की हवाएँ हैं, लेकिन इनका असर अलग-अलग है — लू सीधी, गर्म और सूखी हवा है जो सीधा तापमान बढ़ाती है (जैसे हेयर ड्रायर से गर्म हवा लगना)। आंधी धूल भरी हवा है जो ऊपर-नीचे संवहन प्रक्रिया से बनती है और तापमान को थोड़ा कम कर देती है (क्योंकि इसमें कुछ नमी भी होती है)। भभूल्या एक छोटा, गोल घूमने वाला धूल का बवंडर है (जैसे किसी खुले मैदान में अचानक धूल का एक छोटा बवंडर उठकर घूमने लगे) — यह आकार में सबसे छोटा और स्थानीय होता है।

ग्रीष्म ऋतु के महत्वपूर्ण तथ्य

तथ्यउत्तर
राजस्थान का सबसे गर्म महीनाजून
राजस्थान का सर्वाधिक गर्म जिलाचूरू
राजस्थान का सर्वाधिक गर्म स्थानफलौदी
ग्रीष्म ऋतु में सबसे ठंडा जिलासिरोही
ग्रीष्म ऋतु में सबसे ठंडा स्थानमाउंट आबू (ऊँचाई अधिक होने के कारण)
सर्वाधिक दैनिक तापांतर (दिन-रात के तापमान का अंतर)जैसलमेर
सर्वाधिक वार्षिक तापांतर (गर्मी-सर्दी के तापमान का अंतर)चूरू

8वर्षा ऋतु (जून - सितंबर) — मानसून

राजस्थान की सबसे प्रतीक्षित ऋतु है वर्षा ऋतु, जो मानसून के आगमन से शुरू होती है। 'मानसून' शब्द अरबी भाषा के 'मौसिम' शब्द से लिया गया है, जिसके जनक अल मसूदी माने जाते हैं। इसका अर्थ है — ऋतु में परिवर्तन, यानी मौसमी हवाओं की दिशा में बदलाव, जो समुद्र (जल) से स्थल की ओर चलती हैं। भारत एवं राजस्थान में जो मानसून आता है, वह दक्षिण-पश्चिम मानसून (South-West Monsoon) कहलाता है, जो हिन्द महासागर से उठकर आता है।

8.1 मानसून की महत्वपूर्ण तिथियाँ

आगमन/घटनातिथि
भारत में मानसून की शुरुआत (केरल)1 जून (मालाबार तट से)
राजस्थान में प्रथम आगमन21 मई
राजस्थान में पूर्ण आगमन2 जून (बाँसवाड़ा, डूंगरपुर क्षेत्र)
उत्तरी भारत में आगमन30 जून
सम्पूर्ण भारत में आगमन15 जुलाई
मानसून के लौटने की तिथि30 सितंबर

राजस्थान के मानसून की खास प्रकृति: राजस्थान में मानसून की सबसे बड़ी खासियत यह है — यह देरी से आता है और जल्दी लौट जाता है। यानी बाकी भारत की तुलना में राजस्थान को मानसून का सबसे कम फायदा मिल पाता है, क्योंकि यहाँ इसकी अवधि सबसे छोटी होती है।

8.2 मानसून की दो शाखाएँ

राजस्थान में मानसून एक साथ दो अलग-अलग रास्तों (शाखाओं) से प्रवेश करता है — दोनों की भूमिका और असर बिल्कुल अलग है।

🌊 अरब सागरीय / हिमाचल शाखा
  • राजस्थान में सबसे पहले मानसून/वर्षा लाने वाली शाखा
  • अरावली के समानांतर बहने के कारण ज़्यादा वर्षा नहीं करा पाती
  • राजस्थान में आर्द्रता (नमी) की प्रमुख स्रोत है
🌊 बंगाल की खाड़ी / शिवालिक शाखा
  • राजस्थान में सर्वाधिक वर्षा कराने में सहयोग देती है
  • मुख्य असर राज्य के दक्षिणी-पूर्वी भाग में पड़ता है
  • इससे आने वाली पूर्वी मानसूनी हवाओं को 'पुरवाई' कहते हैं

8.3 मानसून की राजस्थान में विस्तृत प्रविष्टि (चरणबद्ध)

तिथिघटना
15 जूनदक्षिण-पूर्व दिशा से प्रवेश (बाँसवाड़ा, डूंगरपुर क्षेत्र में)
1 जुलाईअरावली के पूर्वी ढलानों में पहुँचकर 60-80 सेमी तक वर्षा कराता है
15 जुलाईमरुस्थल में प्रवेश करता है, लेकिन वहाँ उच्च तापमान के कारण वर्षा में कमी आ जाती है
30 जुलाईराज्य के पश्चिमी भाग तक पहुँच जाता है

वज्र तूफान (Thunderstorm): दक्षिणी-पूर्वी जिलों में तेज़ पवनों के साथ होने वाली वर्षा को 'वज्र तूफान' कहा जाता है — इसमें आमतौर पर बिजली की कड़क और तेज़ हवाएँ भी शामिल होती हैं।

8.4 मानसून का प्रभाव — सर्वाधिक व न्यूनतम

प्रभावजिलास्थान/वर्षा
सर्वाधिक प्रभावबाँसवाड़ा/झालावाड़माउंट आबू (150 सेमी)
न्यूनतम प्रभावजैसलमेर/बीकानेरसम, जैसलमेर (लगभग 0 सेमी)

औसत वार्षिक वर्षा: राजस्थान की औसत वार्षिक वर्षा 57.5 सेमी अथवा 575 मिलीमीटर मानी जाती है (यह लंबी अवधि का ऐतिहासिक औसत है — जुलाई-अगस्त 2025 के दौरान वास्तविक वर्षा इससे कहीं अधिक रही, विस्तार से 'नवीनतम अपडेट' खंड में देखें)।

8.5 समवर्षा रेखाएँ (Isohyets)

समवर्षा रेखा (Isohyet) एक ऐसी काल्पनिक रेखा है, जो मानचित्र पर एक समान वर्षा वाले स्थानों को आपस में जोड़ती है — ठीक वैसे ही जैसे मौसम के नक़्शे में एक जैसे तापमान वाले शहरों को जोड़ने वाली रेखा खींची जाती है।

समवर्षा रेखामहत्व
25 सेमी वर्षा रेखामरुस्थल को दो भागों में बाँटती है — शुष्क मरुस्थल (1 लाख वर्ग किमी) एवं अर्द्धशुष्क मरुस्थल (75,000 वर्ग किमी)
40 सेमी वर्षा रेखाराजस्थान को लगभग दो बराबर भागों में बाँटती है; यह पश्चिमी मरुस्थल की पूर्वी सीमा मानी जाती है
50 सेमी वर्षा रेखाअरावली पर्वतमाला पर स्थित है, जो पूर्वी मैदान एवं पश्चिमी मरुस्थल को एक-दूसरे से अलग करती है

जिलेवार समवर्षा रेखाएँ (अनुमानित औसत वर्षा)

वर्षा (सेमी)जिले
10 सेमीजैसलमेर, फलौदी, बीकानेर
30 सेमीबाड़मेर, जोधपुर, बागोर, चूरू, हनुमानगढ़
40 सेमीजालौर, पाली, डीडवाना-कुचामन, सीकर, झुंझुनूं
60 सेमीउदयपुर, राजसमंद, भीलवाड़ा, अजमेर, जयपुर, कोटपूतली-बहरोड़
70 सेमीडूंगरपुर, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, बूंदी, सवाई माधोपुर, करौली, धौलपुर
80-90 सेमीबाँसवाड़ा, प्रतापगढ़, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, कोटा, बारां, झालावाड़

(रिक्त मानचित्र में स्वयं अभ्यास करें) मानचित्र — राजस्थान की समवर्षा रेखाएँ (25 सेमी, 40 सेमी, 50 सेमी की प्रमुख रेखाओं सहित)

8.6 मानसून की अनिश्चितता एवं परिवर्तनशीलता

राजस्थान में कुल वार्षिक वर्षा का लगभग 90% भाग मानसूनी वर्षा से आता है, जबकि शेष 10% मावठ (शीत ऋतु की वर्षा) से प्राप्त होता है।

💡 अनिश्चितता का सीधा नियम — याद रखने का सरल तरीका

यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण उल्टा संबंध (inverse relationship) याद रखें — वर्षा की मात्रा एवं मानसून की अनिश्चितता एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत चलते हैं। जहाँ अधिक वर्षा होती है, वहाँ मानसून की अनिश्चितता कम होती है (यानी अनुमान लगाना आसान है, हर साल लगभग तय मात्रा में बारिश होती है)। लेकिन जहाँ कम वर्षा होती है (जैसे पश्चिमी मरुस्थल), वहाँ मानसून की अनिश्चितता अधिक होती है (यानी किसी साल बिल्कुल बारिश ना हो, किसी साल अचानक बहुत ज़्यादा हो जाए) — यही कारण है कि मरुस्थलीय क्षेत्रों में सूखे और अचानक बाढ़ दोनों की समस्या बार-बार आती रहती है। यही नियम 'परिवर्तनशीलता' (Variability) पर भी लागू होता है — चाहे वार्षिक आधार पर देखें या सिर्फ वर्षा ऋतु के दौरान, ऊँची वर्षा वाले क्षेत्रों में परिवर्तनशीलता कम और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में परिवर्तनशीलता अधिक होती है।

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9शरद ऋतु (अक्टूबर - नवंबर) — मानसून निवर्तन

मानसून के लौटने की प्रक्रिया को 'मानसून निवर्तन' या 'प्रत्यावर्तन मानसून' कहा जाता है। यह ऋतु नवंबर से मध्य दिसंबर तक चलती है। यह ग्रीष्म व वर्षा ऋतु के तीखे मौसम के बाद एक संक्रमण काल (transition period) है, जब मौसम धीरे-धीरे ठंडा होना शुरू होता है।

💡 कार्तिक/अक्टूबर हीट क्या है?

मानसून निवर्तन के दौरान कभी-कभी अचानक तापमान बढ़ जाता है, जिसे 'कार्तिक हीट' या 'अक्टूबर हीट' कहा जाता है। इसका कारण है — वायुमंडलीय आर्द्रता (हवा में नमी) का कम होना और साथ ही भूमि की आर्द्रता (ज़मीन में नमी, जो अभी-अभी हुई बारिश से बची है) का बढ़ना। इसे ऐसे समझें — बारिश के तुरंत बाद ज़मीन गीली रहती है, और जब धूप तेज़ पड़ती है तो वह नमी भाप बनकर उड़ती है, जिससे हवा में उमस (गर्मी के साथ चिपचिपापन) महसूस होती है — यही कार्तिक हीट का एहसास है।

10शीत ऋतु (दिसंबर - फरवरी)

(i) मावठ (Western Disturbances)

(ii) शीत लहर (Cold Wave)

शीत ऋतु के महत्वपूर्ण तथ्य

11अन्य महत्वपूर्ण तथ्य

11.1 तापमान संबंधित तथ्य

तथ्यउत्तर
औसत वार्षिक तापमान38°C
सबसे गर्म महीनाजून
सबसे गर्म जिला (सर्वाधिक वार्षिक तापांतर भी)चूरू
सबसे गर्म स्थानफलौदी
सबसे ठंडा महीनाजनवरी
न्यूनतम दैनिक तापांतर किस माह मेंअक्टूबर-नवंबर
न्यूनतम तापांतर वाला स्थानमाउंट आबू

11.2 वर्षा संबंधित तथ्य

तथ्यउत्तर
सर्वाधिक वर्षा वाला जिलाझालावाड़ (इसे 'राजस्थान का चेरापूंजी' भी कहते हैं)
दूसरा सर्वाधिक वर्षा वाला जिलाबाँसवाड़ा
सर्वाधिक वर्षा वाला स्थानमाउंट आबू (125-150 सेमी) — इसे भी 'राजस्थान का चेरापूंजी' कहा जाता है
न्यूनतम वर्षा वाला जिलाजैसलमेर (सर्वाधिक शुष्क एवं सर्वाधिक जलवायु विषमता वाला जिला)
न्यूनतम वर्षा वाला स्थानसम (जैसलमेर)
दोंगड़ामानसून के आने से पहले होने वाली वर्षा को कहते हैं

11.3 विशेष उपाधियाँ (Nicknames)

11.4 विशेष तिथियाँ

ऐतिहासिक घटना — छप्पनिया अकाल

वर्ष 1899-1900 ई. (विक्रम संवत 1956) में राजस्थान में एक अत्यंत भीषण अकाल पड़ा था, जिसे 'छप्पनिया अकाल' कहा जाता है (नाम विक्रम संवत 1956 से '56' अंक के आधार पर पड़ा)। यह राजस्थान के इतिहास के सबसे भयावह अकालों में गिना जाता है, जिसमें भारी जन-धन की हानि हुई थी।

11.5 समवायुदाब रेखाएँ (Isobars)

समवायुदाब रेखा (Isobar) मानचित्र पर एक समान वायुदाब (हवा के दबाव) वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा है। ध्यान रहे — तापमान और वायुदाब में हमेशा विपरीत (उल्टा) संबंध होता है, यानी जहाँ तापमान बढ़ता है, वहाँ वायुदाब घटता है, और जहाँ तापमान घटता है, वहाँ वायुदाब बढ़ता है।

ऋतुतापमान-वायुदाब संबंधउच्च/निम्न वायुदाब वाले क्षेत्र
जनवरी (शीत ऋतु)तापमान अधिक → वायुदाब कम1018-1019 Mb: श्रीगंगानगर, अनूपगढ़, सीकर | 1019 Mb: जोधपुर, पाली, जैसलमेर, राजसमंद, चित्तौड़गढ़, झालावाड़
जुलाई (ग्रीष्म ऋतु)तापमान कम → वायुदाब अधिक997-1000 Mb: जैसलमेर, बीकानेर, जोधपुर, नागौर, चूरू | 998-999 Mb: जालौर, पाली, सवाई माधोपुर, अजमेर, टोंक, उदयपुर, प्रतापगढ़

11.6 समताप रेखाएँ (Isotherms)

समताप रेखा (Isotherm) मानचित्र पर एक समान तापमान वाले स्थानों को आपस में मिलाने वाली रेखा होती है — यह अवधारणा समवर्षा रेखा (Isohyet) एवं समवायुदाब रेखा (Isobar) जैसी ही है, बस यह वर्षा या वायुदाब की बजाय तापमान को दर्शाती है।

12नवीनतम अपडेट 2025-26 (Latest Updates — इंटरनेट रिसर्च आधारित)

इस अध्याय को पूरी तरह अद्यतन रखने के लिए जुलाई 2026 तक की स्थिति के अनुसार नवीनतम जलवायु-संबंधी घटनाओं व आँकड़ों को यहाँ शामिल किया गया है — ये आँकड़े किसी पुरानी किताब में नहीं मिलेंगे।

💡 मानसून 2025 — 108 वर्षों में दूसरी सबसे अधिक वर्षा

वर्ष 2025 राजस्थान के लिए एक ऐतिहासिक मानसून वर्ष साबित हुआ। पूरे मानसून सीज़न (जून-सितंबर) के दौरान राज्य में 715.9 मिलीमीटर वर्षा दर्ज की गई, जो सामान्य औसत 435.6 मिलीमीटर से लगभग 64% अधिक थी। यह राजस्थान के मौसम-इतिहास में दूसरी सबसे अधिक मानसूनी वर्षा है — इससे पहले सबसे अधिक वर्षा का रिकॉर्ड वर्ष 1917 में बना था, जब 844.2 मिलीमीटर वर्षा हुई थी और यह आज भी सर्वोच्च रिकॉर्ड है। एक चरम घटना के रूप में, 23 अगस्त 2025 को बूंदी जिले के नैनवां क्षेत्र में मात्र 24 घंटों में 502 मिलीमीटर वर्षा दर्ज की गई — यह सामान्य वार्षिक वर्षा से भी कहीं अधिक थी, सिर्फ एक दिन में! जिलेवार आँकड़ों में श्रीगंगानगर, नागौर, हनुमानगढ़, टोंक, सवाई माधोपुर व दौसा में औसत से लगभग दोगुनी वर्षा हुई, जबकि चूरू, सीकर, धौलपुर, बूंदी, बारां व अजमेर में सामान्य से 90-98% अधिक वर्षा दर्ज हुई।

💡 हीटवेव 2026 — फलौदी व चूरू में अत्यधिक तापमान

ग्रीष्म ऋतु 2026 के दौरान राजस्थान के पश्चिमी जिलों में भीषण गर्मी दर्ज की गई। फलौदी में अधिकतम तापमान 51°C तक पहुँच गया — यह सीज़न का सबसे गर्म दिन था। वहीं चूरू जिले में तापमान 50.5°C तक पहुँचा, जो बीते 8 वर्षों में भारत में कहीं भी दर्ज किया गया सर्वाधिक तापमान था। एक अन्य अवसर पर मई 2026 में चूरू में 46.4°C व फलौदी में 46.2°C दर्ज हुआ। यह डेटा इस अध्याय में पहले बताए गए तथ्यों — फलौदी 'सबसे गर्म स्थान' एवं चूरू 'सबसे गर्म जिला' — की पुष्टि करता है, बल्कि यह दिखाता है कि यह अंतर समय के साथ और भी बढ़ता जा रहा है।

💡 जलवायु परिवर्तन का रुझान — पश्चिमी राजस्थान में बढ़ती वर्षा

वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार राजस्थान की वर्षा का पारंपरिक स्वरूप बदल रहा है। वर्ष 1950 तक प्रतापगढ़, बाँसवाड़ा एवं दक्षिणी राजस्थान में सबसे अच्छी वर्षा होती थी, लेकिन 1951-2015 की अवधि में यह स्थिति बदलने लगी — अब जोधपुर एवं बीकानेर जैसे पश्चिमी/उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र भी दक्षिण-पूर्वी राजस्थान की तुलना में अधिक वर्षा प्राप्त करने लगे हैं। मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट (जर्मनी) के वर्ष 2013 के एक शोध के अनुसार, वर्ष 2020-2049 के दौरान पश्चिमी राजस्थान में वर्षा में 20-35% तक की वृद्धि हो सकती है, जबकि पूर्वी राजस्थान में यह वृद्धि 5-20% तक सीमित रहेगी। यह प्रवृत्ति अध्याय 1B में बताए गए तथ्य से भी मेल खाती है, जहाँ हमने देखा कि राजस्थान में मरुस्थलीकरण (Desertification) की दर भी धीरे-धीरे घट रही है — यानी अधिक वर्षा और कम मरुस्थलीकरण, दोनों तथ्य एक-दूसरे को मज़बूत करते हैं। हालाँकि इसके साथ चिंता की बात यह भी है कि राज्य में भूजल स्तर तेज़ी से घट रहा है और शहरी क्षेत्रों (विशेषकर सीकर) में न्यूनतम दैनिक तापमान में भी उल्लेखनीय वृद्धि देखी जा रही है — यानी सर्दियों की रातें भी पहले जितनी ठंडी नहीं रह गई हैं।

(रिक्त मानचित्र में स्वयं अभ्यास करें) मानचित्र — राजस्थान में 2025-26 के जलवायु परिवर्तन रुझान (बढ़ती वर्षा वाले पश्चिमी क्षेत्र एवं हीटवेव-प्रभावित क्षेत्र चिह्नित करने हेतु)

13त्वरित पुनरावृत्ति एवं सारांश (Quick Revision)

13.1 जलवायु वर्गीकरण — त्वरित पुनरावृत्ति

वर्गीकरणआधारप्रकारों की संख्यासबसे बड़ा प्रदेश
सामान्य वर्गीकरणतापमान + वर्षा5
कोपेनवनस्पति + तापमान + वर्षा4BShw (अर्द्धशुष्क/स्टेपी)
त्रिवार्थावर्षा + गर्म ग्रीष्म ऋतु4
थॉर्नथ्वेटतापमान + वाष्पीकरण + वर्षा4DA'w (अर्द्धशुष्क तुल्य) — सर्वाधिक मान्य वर्गीकरण भी

13.2 बार-बार पूछे जाने वाले तथ्य

प्रश्नउत्तर
कोपेन के अनुसार राजस्थान का सबसे बड़ा जलवायु प्रदेश कौनसा है?BShw (अर्द्धशुष्क/स्टेपी तुल्य)
थॉर्नथ्वेट के अनुसार राजस्थान का सबसे बड़ा जलवायु प्रदेश कौनसा है?DA'w (अर्द्धशुष्क तुल्य)
राजस्थान में सर्वाधिक मान्य जलवायु वर्गीकरण कौनसा है?थॉर्नथ्वेट का वर्गीकरण
राजस्थान में मानसून का प्रथम आगमन कब व कहाँ होता है?21 मई (प्रथम प्रभाव); 2 जून को पूर्ण आगमन (बाँसवाड़ा-डूंगरपुर)
राजस्थान में मानसून की सबसे बड़ी विशेषता क्या है?देरी से आना और जल्दी लौट जाना
राजस्थान की औसत वार्षिक वर्षा कितनी है?57.5 सेमी (575 मिमी)
राजस्थान का सबसे गर्म स्थान व जिला कौनसा है?फलौदी (स्थान), चूरू (जिला)
राजस्थान का सबसे ठंडा स्थान व जिला कौनसा है?माउंट आबू (स्थान), सिरोही (जिला)
राजस्थान का सर्वाधिक वर्षा वाला स्थान व जिला कौनसा है?माउंट आबू (स्थान), झालावाड़ (जिला)
राजस्थान का न्यूनतम वर्षा वाला स्थान व जिला कौनसा है?सम (स्थान), जैसलमेर (जिला)
'राजस्थान का शिमला' किसे कहा जाता है?माउंट आबू
'राजस्थान का चेरापूंजी' किसे कहा जाता है?झालावाड़ जिला एवं माउंट आबू स्थान
छप्पनिया अकाल कब पड़ा था?1899-1900 ई. (विक्रम संवत 1956)
25 सेमी समवर्षा रेखा क्या दर्शाती है?मरुस्थल का शुष्क व अर्द्धशुष्क भागों में विभाजन
मावठ किस फसल के लिए लाभकारी है और इसे क्या कहते हैं?रबी फसल (गेहूँ); 'सुनहरी बूंदें'

13.3 महत्त्वपूर्ण संख्याएँ (Number Facts) — एक नज़र में

संख्याअर्थ
57.5 सेमी / 575 मिमीराजस्थान की औसत वार्षिक वर्षा (ऐतिहासिक औसत)
90% : 10%मानसूनी वर्षा : मावठ वर्षा का अनुपात
165 मीटर : 1°Cऊँचाई बढ़ने पर तापमान घटने का अनुपात
38°Cराजस्थान का औसत वार्षिक तापमान
21 मई → 2 जूनराजस्थान में मानसून का प्रथम प्रभाव → पूर्ण आगमन
30 सितंबरमानसून के लौटने की तिथि
1899-1900 (वि.सं. 1956)छप्पनिया अकाल
715.9 मिमी (2025)राजस्थान की 108 वर्षों में दूसरी सबसे अधिक मानसूनी वर्षा (सर्वोच्च: 1917 में 844.2 मिमी)
502 मिमी / 24 घंटेनैनवां (बूंदी) में 23 अगस्त 2025 की चरम वर्षा घटना
51°C (2026)फलौदी का सर्वाधिक दर्ज तापमान
🔑 इस अध्याय के महत्वपूर्ण तथ्य
1. राजस्थान की जलवायु उष्ण/उपोष्ण कटिबंधीय मानसूनी है, जो अक्षांशीय स्थिति, समुद्र से दूरी, उच्चावच एवं अरावली पर्वतमाला — इन 4 प्रमुख कारकों से प्रभावित होती है 2. सामान्य वर्गीकरण में 5 प्रकार (शुष्क कटिबंधीय से अति आर्द्र तक), जबकि कोपेन, त्रिवार्था व थॉर्नथ्वेट — तीनों व्यक्तिगत वर्गीकरणों में राजस्थान को 4-4 प्रकारों में बाँटा गया है 3. कोपेन के अनुसार BShw एवं थॉर्नथ्वेट के अनुसार DA'w — दोनों राजस्थान के सबसे बड़े जलवायु प्रदेश माने जाते हैं; थॉर्नथ्वेट का वर्गीकरण सबसे अधिक वैज्ञानिक व मान्य है क्योंकि यह वाष्पीकरण को भी शामिल करता है 4. राजस्थान में मानसून की सबसे अनोखी विशेषता है — देरी से आना (21 मई) और जल्दी लौट जाना (30 सितंबर), जिससे राज्य को मानसून का सबसे कम लाभ मिल पाता है 5. ग्रीष्म ऋतु में लू (गर्म-शुष्क), आंधी (धूल भरी-ठंडक लाने वाली) व भभूल्या (चक्रवातीय बवंडर) — तीनों अलग-अलग हवाएँ चलती हैं, जबकि शीत ऋतु में मावठ (रबी फसल के लिए वरदान) व शीत लहर (हिमालय से आने वाली ठंड) प्रमुख घटनाएँ हैं 6. फलौदी (सबसे गर्म स्थान) व चूरू (सबसे गर्म जिला) बनाम माउंट आबू (सबसे ठंडा स्थान) व सिरोही (सबसे ठंडा जिला) — यह अंतर 2025-26 के हीटवेव रिकॉर्ड (फलौदी 51°C) से और स्पष्ट हुआ है 7. वर्ष 2025 का मानसून (715.9 मिमी, सामान्य से 64% अधिक) राजस्थान के इतिहास का दूसरा सबसे अधिक बारिश वाला मानसून रहा, जो दर्शाता है कि परंपरागत रूप से सूखा माना जाने वाला राजस्थान अब जलवायु परिवर्तन के दौर से गुज़र रहा है

📝 पिछले वर्षों के प्रश्न (All Exams) 📝

Q1. राजस्थान की जलवायु को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों की व्याख्या कीजिए। Q2. कोपेन एवं थॉर्नथ्वेट के जलवायु वर्गीकरण की तुलना करते हुए बताइए कि कौनसा अधिक मान्य है और क्यों। Q3. राजस्थान में मानसून की दो शाखाओं का वर्णन कीजिए तथा बताइए कि किस शाखा से अधिक वर्षा होती है। Q4. लू, आंधी एवं भभूल्या में अंतर स्पष्ट कीजिए। Q5. समवर्षा रेखा किसे कहते हैं? राजस्थान की तीन प्रमुख समवर्षा रेखाओं का महत्व बताइए। Q6. मावठ एवं शीत लहर में क्या अंतर है? मावठ को 'सुनहरी बूंदें' क्यों कहा जाता है? Q7. राजस्थान के सबसे गर्म व सबसे ठंडे स्थान/जिले कौनसे हैं? कारण सहित बताइए। Q8. 2025 के मानसून को राजस्थान के इतिहास में विशेष क्यों माना जाता है?

📌 अध्याय सारांश (Chapter Summary)

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