⚖️ अध्याय 8/11 — लोक प्रशासन

प्रशासन पर नियंत्रण

Control over Administration | RAS Pre + Mains
📋 इस अध्याय में
  1. विधायी नियंत्रण (Legislative Control)
  2. कार्यपालिका नियंत्रण (Executive Control)
  3. न्यायिक नियंत्रण (Judicial Control)
  4. अन्य नियंत्रण तंत्र (Other Control Mechanisms)

सोचिए एक विशाल जहाज़ (प्रशासन) समुद्र में चल रहा है — बिना किसी नियंत्रण (control) के यह जहाज़ किसी भी दिशा में भटक सकता है, यहाँ तक कि डूब भी सकता है। इसलिए इस जहाज़ पर चार पहरेदार बिठाए गए हैं — पहला है संसद/विधानसभा (विधायी नियंत्रण), जो सवाल पूछती है और बजट मंज़ूर करती है। दूसरा है खुद कार्यपालिका के भीतर का अनुशासन (कार्यपालिका नियंत्रण) — मंत्रिमंडल सचिवालय व PMO की निगरानी। तीसरा है अदालत (न्यायिक नियंत्रण) — जो किसी गलत फैसले को रिट (writ) के ज़रिए पलट सकती है। और चौथा है मीडिया, नागरिक समाज व लोकपाल-लोकायुक्त जैसे अन्य पहरेदार। यही चार स्तंभ मिलकर सुनिश्चित करते हैं कि प्रशासन नामक जहाज़ अपने रास्ते से न भटके और जनता के प्रति जवाबदेह (देखें अध्याय 03 — Accountability) बना रहे।

1विधायी नियंत्रण (Legislative Control)

संसदीय शासन प्रणाली में कार्यपालिका (सरकार) विधायिका (संसद/विधानसभा) के प्रति उत्तरदायी होती है — यही "उत्तरदायी शासन (Responsible Government)" का मूल सिद्धांत है। संसद कई प्रकार के औज़ारों से प्रशासन पर निगरानी रखती है।

🎓 विधायी नियंत्रण के साधन विचारक/प्रवर्तक: भारतीय संसदीय प्रणाली | वर्ष: RAS Mains PYQ 2016 (10 अंक) का प्रत्यक्ष उत्तर
  • प्रश्नकाल (Question Hour): सांसद/विधायक मंत्रियों से लिखित/मौखिक प्रश्न पूछ सकते हैं — तारांकित प्रश्न (मौखिक उत्तर व पूरक प्रश्न) व अतारांकित प्रश्न (केवल लिखित उत्तर) — यह प्रशासन को प्रतिदिन सतर्क रखने का सबसे प्रभावी साधन है।
  • शून्यकाल (Zero Hour): प्रश्नकाल के तुरंत बाद का समय (दोपहर 12 बजे से) जब सांसद बिना पूर्व सूचना के तत्काल/जरूरी सार्वजनिक मुद्दे उठा सकते हैं — यह भारतीय संसद की अपनी मौलिक (indigenous) नवाचार है, कहीं और से उधार नहीं ली गई।
  • स्थगन प्रस्ताव (Adjournment Motion): किसी अत्यावश्यक सार्वजनिक मामले पर सदन का सामान्य कामकाज रोककर चर्चा हेतु — इसे "संसद का सबसे तीखा हथियार" कहा जाता है।
  • निंदा प्रस्ताव (Censure Motion): किसी विशिष्ट नीति/कार्य के लिए मंत्रिपरिषद की निंदा हेतु — कारण बताना अनिवार्य; पारित होने पर भी सरकार गिरती नहीं (अविश्वास प्रस्ताव से भिन्न)।
  • बजट स्वीकृति (Budget Approval): संसद की स्वीकृति के बिना सरकार एक रुपया भी खर्च नहीं कर सकती — "अनुदानों की माँग (Demand for Grants)" पर मतदान व कटौती प्रस्ताव (Cut Motion) के माध्यम से नियंत्रण।
💡 सरल भाषा में समझें — घर के बजट पर बच्चों की निगरानी
सोचिए घर में पिता कमाकर लाते हैं, पर हर बड़ा खर्च करने से पहले परिवार की एक बैठक में बताना पड़ता है — बच्चे सवाल पूछ सकते हैं "इतना पैसा कहाँ खर्च हुआ?" (प्रश्नकाल), अचानक कोई ज़रूरी बात आ जाए तो बीच में ही उठा सकते हैं (शून्यकाल), और अगर खर्च का पूरा हिसाब मंज़ूर न हो तो पैसा रोका जा सकता है (बजट नियंत्रण)। संसद भी सरकार के साथ ठीक यही करती है — रोज़ के सवाल-जवाब से लेकर सालाना बजट की मंज़ूरी तक।

संसदीय समितियाँ (Parliamentary Committees)

समितिकार्य
लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee — PAC)CAG की रिपोर्ट (देखें अध्याय 05) की विस्तृत जाँच — सरकारी धन के दुरुपयोग व अनियमितताओं की पड़ताल; अध्यक्ष परंपरागत रूप से विपक्ष से।
प्राक्कलन समिति (Estimates Committee)बजट अनुमानों (estimates) की मितव्ययिता (economy) व दक्षता जाँचती है — "निरंतर मितव्ययिता समिति (Continuous Economy Committee)" भी कहलाती है।
सार्वजनिक उपक्रम समिति (Committee on Public Undertakings — COPU)सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) के प्रबंधन व वित्तीय प्रदर्शन की समीक्षा।
विभाग-संबंधी स्थायी समितियाँ (DRSCs)संबंधित मंत्रालयों के बजट, नीतियों व विधेयकों की विस्तृत जाँच — 1993 से गठित।

राजस्थान विधानसभा समितियाँ: राजस्थान विधानसभा में भी केंद्र के समान लोक लेखा समिति, प्राक्कलन समिति व अन्य समितियाँ कार्यरत हैं, जो राज्य के बजट, CAG रिपोर्ट (राजस्थान राज्य लेखा-परीक्षा रिपोर्ट) व विभागीय कार्यप्रणाली की जाँच करती हैं — यह राज्य स्तर पर विधायी नियंत्रण सुनिश्चित करने का प्रमुख माध्यम है।

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2कार्यपालिका नियंत्रण (Executive Control)

कार्यपालिका नियंत्रण का अर्थ है — प्रशासनिक तंत्र पर स्वयं कार्यपालिका (राष्ट्रपति/प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री व उनके अधीनस्थ ढांचे) द्वारा रखी गई आंतरिक निगरानी। यह नियंत्रण सबसे तात्कालिक (immediate) होता है, क्योंकि यह रोज़मर्रा के कामकाज के भीतर से ही काम करता है।

कार्यपालिका नियंत्रण की संरचना

राजस्थान संदर्भ — मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) एवं मंत्रिपरिषद नियंत्रण: राजस्थान में मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) व मंत्रिपरिषद, राज्य सचिवालय (देखें अध्याय 10) के माध्यम से समस्त विभागों पर कार्यपालिका नियंत्रण रखते हैं — मुख्य सचिव (Chief Secretary) राज्य प्रशासन का शीर्ष अधिकारी होने के नाते इस नियंत्रण-तंत्र का केंद्र बिंदु होता है।

💡 सरल भाषा में समझें — स्कूल में प्रिंसिपल की निगरानी व्यवस्था

एक स्कूल में प्रिंसिपल हर टीचर की क्लास में जाकर निगरानी नहीं कर सकते, इसलिए वे वाइस-प्रिंसिपल व हेड-ऑफ-डिपार्टमेंट के ज़रिए एक निगरानी-श्रृंखला बनाते हैं, और साल के अंत में हर टीचर का रिपोर्ट कार्ड (Performance Review) भी बनवाते हैं। कार्यपालिका नियंत्रण भी ठीक ऐसे ही काम करता है — मंत्रिमंडल सचिवालय व मुख्य सचिव की भूमिका उसी वाइस-प्रिंसिपल जैसी है, जो रोज़ के कामकाज पर नज़र रखते हैं।

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3न्यायिक नियंत्रण (Judicial Control)

न्यायिक नियंत्रण का अर्थ है — न्यायपालिका द्वारा यह सुनिश्चित करना कि प्रशासनिक कार्य संविधान, कानून व प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) के सिद्धांतों के दायरे में हों। यदि कोई प्रशासनिक निर्णय अवैध, मनमाना (arbitrary) या अधिकार-क्षेत्र से बाहर हो, तो न्यायालय उसे रद्द कर सकते हैं — इसे "न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review)" कहा जाता है।

रिट (Writs) — संविधान के अनुच्छेद 32 व 226

सर्वोच्च न्यायालय (अनुच्छेद 32) व उच्च न्यायालय (अनुच्छेद 226) दोनों को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन (व उच्च न्यायालय को अन्य कानूनी अधिकारों के लिए भी) हेतु 5 प्रकार की रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है।

रिटअर्थ एवं प्रयोग
बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus)"शरीर को प्रस्तुत करो" — अवैध हिरासत में रखे व्यक्ति को अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने का आदेश; व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा हेतु सबसे शक्तिशाली रिट।
परमादेश (Mandamus)"हम आदेश देते हैं" — किसी सार्वजनिक अधिकारी को उसका वैधानिक कर्तव्य पूरा करने हेतु बाध्य करने का आदेश (जैसे किसी अधिकारी को लंबित फाइल पर निर्णय लेने को बाध्य करना)।
प्रतिषेध (Prohibition)किसी निचली अदालत/अधिकरण को उसके अधिकार-क्षेत्र से बाहर के मामले में कार्यवाही जारी रखने से रोकने का आदेश — यह कार्यवाही के दौरान (pending proceeding में) जारी होता है, निवारक (preventive) प्रकृति का।
उत्प्रेषण (Certiorari)निचली अदालत/अधिकरण द्वारा पहले ही दिए गए निर्णय को उच्च न्यायालय द्वारा रद्द (quash) करना — यह उपचारात्मक (curative) प्रकृति का है, कार्यवाही पूर्ण होने के बाद जारी होता है।
अधिकार-पृच्छा (Quo Warranto)"किस अधिकार से?" — किसी व्यक्ति द्वारा अवैध रूप से धारण किए गए सार्वजनिक पद पर सवाल उठाने व उसे पद से हटाने हेतु।

RAS Mains PYQ 2018 (5 अंक) — Prohibition बनाम Mandamus: "न्यायिक नियंत्रण के संदर्भ में प्रतिषेध (Prohibition) व परमादेश (Mandamus) रिट में अंतर बताइए।" — मुख्य अंतर: Prohibition किसी निचली अदालत/अधिकरण को अधिकार-क्षेत्र से बाहर कार्यवाही करने से रोकती है (रोकने वाली, negative प्रकृति); जबकि Mandamus किसी लोक अधिकारी को अपना वैधानिक कर्तव्य निभाने हेतु बाध्य करती है (करने को कहने वाली, positive प्रकृति)। Prohibition केवल न्यायिक/अर्ध-न्यायिक निकायों के विरुद्ध चलती है, जबकि Mandamus किसी भी लोक प्राधिकारी के विरुद्ध।

जनहित याचिका (Public Interest Litigation — PIL)

PIL एक ऐसा तंत्र है जिसमें कोई भी सार्वजनिक-भावना से प्रेरित नागरिक/संगठन, पीड़ित पक्ष न होते हुए भी, समाज के किसी वंचित/असहाय वर्ग के हित में सीधे उच्च/सर्वोच्च न्यायालय जा सकता है — यह भारतीय न्यायपालिका का एक अनूठा व सक्रिय (activist) योगदान है, जिसने न्यायिक नियंत्रण को आम नागरिक के लिए अधिक सुलभ बनाया।

राजस्थान उच्च न्यायालय से उपजा नवीनतम सर्वोच्च न्यायालय निर्णय (2024): Tej Prakash Pathak व अन्य बनाम राजस्थान उच्च न्यायालय (2024) — यह मामला राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा अनुवादक (Translator) पदों की भर्ती से जुड़ा था। सर्वोच्च न्यायालय ने इस केस में महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रतिपादित किया — "खेल के नियम (Rules of the Game)" भर्ती-प्रक्रिया शुरू होने के बाद बीच में नहीं बदले जा सकते, जब तक कि नियमों में स्पष्ट रूप से इसकी अनुमति न हो। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि चयन-सूची में नाम आने मात्र से नियुक्ति का अधिकार (indefeasible right) स्वतः प्राप्त नहीं होता, परंतु रिक्तियाँ उपलब्ध होने पर राज्य मनमाने ढंग से नियुक्ति से इनकार भी नहीं कर सकता। यह निर्णय भर्ती व सेवा-मामलों में न्यायिक नियंत्रण का ताज़ा उदाहरण है।

सूचना का अधिकार एवं सूचना आयोग (RTI Act एवं Information Commission)

यद्यपि सूचना आयोग औपचारिक रूप से एक न्यायालय नहीं, बल्कि एक अर्ध-न्यायिक (quasi-judicial) निकाय है, फिर भी यह न्यायिक नियंत्रण की भावना को आगे बढ़ाता है — नागरिकों को सूचना न देने वाले अधिकारियों पर जुर्माना लगाने व शिकायतों पर निर्णय देने की शक्ति के कारण।

प्रशासनिक अधिकरण (Administrative Tribunals) — CAT/SAT

🎓 केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (Central Administrative Tribunal — CAT) विचारक/प्रवर्तक: Administrative Tribunals Act, 1985 (अनुच्छेद 323A) | वर्ष: वर्तमान चुनौती: भारी लंबित मामले (Pendency Crisis)
  • उद्देश्य: सरकारी कर्मचारियों की सेवा-संबंधी शिकायतों (भर्ती, पदोन्नति, अनुशासनात्मक कार्रवाई आदि) का त्वरित व विशेषज्ञ निपटारा — नियमित उच्च न्यायालयों का बोझ कम करने हेतु स्थापित।
  • राज्य प्रशासनिक अधिकरण (State Administrative Tribunal — SAT) राज्य कर्मचारियों हेतु समान भूमिका निभाते हैं (अनुच्छेद 323B)।
  • नवीनतम चुनौती: CAT के समक्ष वर्तमान में लगभग 1,25,000 से अधिक मामले लंबित हैं (2022 के 80,545 मामलों से भी बढ़कर) — भारत के मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने भी टिप्पणी की कि "कई मामलों में सरकारी अधिकारी सेवानिवृत्त हो जाते हैं, इससे पहले कि उनका मामला निपटे।"
  • सुधार के प्रस्ताव: रिक्त पदों को भरना, AI-सक्षम केस-प्रबंधन प्रणाली लागू करना, तथा CAT के निर्णयों को अंतिम मानकर केवल सीमित अपील सर्वोच्च न्यायालय तक सीमित करने का सुझाव — जिससे मूल उद्देश्य (त्वरित न्याय) फिर से प्राप्त हो सके।
💡 सरल भाषा में समझें — रेफरी को चुनौती देने का अधिकार
सोचिए मैच में रेफरी (प्रशासन) कोई गलत फैसला दे दे — तो एक तीसरा पक्ष (अदालत) होना चाहिए जो उस फैसले की समीक्षा कर सके। रिट याचिका ठीक यही काम करती है — Mandamus से अदालत रेफरी को कहती है "अपना काम पूरा करो", और Certiorari से कहती है "तुमने जो फैसला दिया वह रद्द किया जाता है"। यही न्यायिक नियंत्रण का मूल भाव है — प्रशासन को कानून की सीमा में रखना।

4अन्य नियंत्रण तंत्र (Other Control Mechanisms)

औपचारिक विधायी, कार्यपालिका व न्यायिक नियंत्रण के अतिरिक्त, कुछ अन्य तंत्र भी प्रशासन को जवाबदेह बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

लोकपाल एवं लोकायुक्त — भारत का "ऑम्बड्समैन (Ombudsman)"

लोकपाल (केंद्र स्तर) व लोकायुक्त (राज्य स्तर) — दोनों की विस्तृत चर्चा अध्याय 05 (लोकपाल) व यहाँ राजस्थान लोकायुक्त के संदर्भ में की जा रही है (देखें अध्याय 06 — 1973 में स्थापना का उल्लेख)। "ऑम्बड्समैन (Ombudsman)" शब्द मूलतः स्वीडन से आया है — जहाँ एक स्वतंत्र अधिकारी नागरिकों की शिकायतों पर सरकार के विरुद्ध जाँच करता था; भारत में लोकपाल-लोकायुक्त इसी अवधारणा का भारतीय रूपांतरण हैं (तुलनात्मक संदर्भ हेतु देखें अध्याय 09)।

राजस्थान लोकायुक्त — वर्तमान स्थिति (नवीनतम): न्यायमूर्ति प्रताप कृष्ण लोहरा (Justice Pratap Krishna Lohra) अक्टूबर 2023 से राजस्थान के 13वें लोकायुक्त हैं। राजस्थान लोकायुक्त का क्षेत्राधिकार पूरे राज्य में फैला है — इसके अंतर्गत मंत्रिपरिषद के सदस्य (मुख्यमंत्री को छोड़कर), राज्य लोक सेवा से जुड़े अधिकारी, जिला परिषद प्रमुख व उप-प्रमुख, नगर निगम महापौर व उप-महापौर, स्थानीय निकाय सदस्य तथा सरकारी कंपनियों/निगमों/बोर्ड के अध्यक्ष व अधिकारी आते हैं। लोकायुक्त स्वप्रेरणा (suo motu) से या शिकायत के आधार पर जाँच शुरू कर सकता है, अभिलेख तलब कर सकता है व अधिकारियों को समन कर सकता है।

RAS Mains PYQ 2016 (5 अंक, दो बार पूछा गया): "लोकायुक्त के कोई पाँच कार्य लिखिए।" — उत्तर में शामिल करें: (1) भ्रष्टाचार व सत्ता के दुरुपयोग की शिकायतों की जाँच (2) स्वप्रेरणा से जाँच की शक्ति (3) मंत्रियों व अधिकारियों को समन/अभिलेख तलब करने की शक्ति (4) जाँच के बाद अनुशंसात्मक रिपोर्ट सरकार/राज्यपाल को सौंपना (5) स्थानीय निकाय पदाधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करना।

मीडिया — चतुर्थ स्तंभ (Fourth Estate)

नागरिक समाज एवं गैर-सरकारी संगठन (Civil Society & NGOs)

💡 सरल भाषा में समझें — घर में चार अलग-अलग निगरानी करने वाले सदस्य

सोचिए एक घर में पैसों के हिसाब पर चार लोग नज़र रखते हैं — बड़े भाई-बहन सवाल पूछते हैं (विधायिका), पिता खुद अनुशासन रखते हैं (कार्यपालिका), बाहर से एक निष्पक्ष रिश्तेदार (अदालत) कभी-कभी दखल देकर गलत फैसला पलट देता है, और मोहल्ले के लोग/अखबार (मीडिया-नागरिक समाज) भी बातें फैलाकर दबाव बनाते हैं। घर (प्रशासन) तभी सही चलता है जब चारों निगरानी करने वाले सक्रिय व सतर्क रहें — अकेले किसी एक पर निर्भर रहना खतरनाक है।

"जहाँ स्वतंत्र न्यायपालिका, सतर्क विधायिका, जिम्मेदार मीडिया व जागरूक नागरिक समाज एक साथ खड़े हों, वहीं वास्तविक प्रशासनिक जवाबदेही संभव है।" — नियंत्रण-तंत्र का समेकित दर्शन
🎯 प्रशासन पर नियंत्रण — RAS Mains उत्तर लेखन कोण 5-अंक: 60-70 शब्द | 10-अंक: ~120 शब्द

★ परीक्षा में अवश्य ध्यान रखने योग्य तथ्य ★

1. RAS Mains PYQ 2016 (10M) — "संसद लोक प्रशासन पर किन विधियों से नियंत्रण रखती है?" — प्रश्नकाल/शून्यकाल/समितियाँ/बजट से उत्तर दें। 2. शून्यकाल (Zero Hour) — भारतीय संसद की अपनी मौलिक (indigenous) देन, कहीं और से उधार नहीं ली गई। 3. लोक लेखा समिति (PAC) — CAG रिपोर्ट की जाँच करती है; परंपरागत रूप से अध्यक्ष विपक्ष से होता है। 4. प्राक्कलन समिति — बजट अनुमानों की मितव्ययिता जाँचती है, "निरंतर मितव्ययिता समिति" भी कहलाती है। 5. निंदा प्रस्ताव (Censure Motion) पारित होने पर भी सरकार नहीं गिरती — अविश्वास प्रस्ताव से यही मुख्य अंतर है। 6. कैबिनेट सचिवालय — भारत सरकार के वरिष्ठतम सिविल सेवक, कैबिनेट सचिव, की अध्यक्षता में कार्यरत। 7. अनुच्छेद 32 (सर्वोच्च न्यायालय) व अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय) — रिट जारी करने की शक्ति का स्रोत। 8. 5 प्रकार की रिट — बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण, अधिकार-पृच्छा। 9. RAS Mains PYQ 2018 (5M) — Prohibition (रोकने वाली) बनाम Mandamus (करने को कहने वाली) रिट। 10. RAS Mains PYQ 2021 व 2023 — "न्यायिक नियंत्रण के स्वरूप एवं विधियाँ" (5M व 10M दोनों वर्षों में पूछा गया)। 11. PIL (जनहित याचिका) — पीड़ित पक्ष न होने पर भी कोई नागरिक/संगठन जनहित में न्यायालय जा सकता है। 12. Tej Prakash Pathak बनाम राजस्थान उच्च न्यायालय (2024) — "खेल के नियम" भर्ती के बीच नहीं बदले जा सकते। 13. CIC (केंद्रीय सूचना आयोग) — RTI Act, 2005 के तहत अर्ध-न्यायिक निकाय; वर्तमान CIC: राज कुमार गोयल। 14. ऑम्बड्समैन (Ombudsman) — मूल स्वीडन से; भारत में लोकपाल-लोकायुक्त इसी अवधारणा का रूपांतरण। 15. CAT — Administrative Tribunals Act, 1985 (अनुच्छेद 323A); SAT — अनुच्छेद 323B (राज्य स्तर)। 16. CAT में वर्तमान लंबित मामले — लगभग 1,25,000+ (2022 के 80,545 से भी अधिक) — गंभीर लंबन-संकट (Pendency Crisis)। 17. CJI बी.आर. गवई की टिप्पणी — कई मामलों में अधिकारी सेवानिवृत्त हो जाते हैं, मामला निपटने से पहले ही। 18. राजस्थान लोकायुक्त — वर्तमान (13वें) लोकायुक्त: न्यायमूर्ति प्रताप कृष्ण लोहरा (अक्टूबर 2023 से)। 19. राजस्थान लोकायुक्त क्षेत्राधिकार — मंत्रिपरिषद (CM को छोड़कर), जिला परिषद प्रमुख, महापौर, स्थानीय निकाय, सरकारी निगम अधिकारी। 20. RAS Mains PYQ 2016 (5M, दो बार) — "लोकायुक्त के कोई पाँच कार्य लिखिए।" 21. मीडिया — "चतुर्थ स्तंभ (Fourth Estate)" — बोफोर्स, 2G जैसे घोटाले खोजी पत्रकारिता से उजागर हुए। 22. नागरिक समाज — MKSS जैसे संगठनों ने सामाजिक अंकेक्षण के माध्यम से नियंत्रण को संस्थागत रूप दिया (देखें अध्याय 07)। 23. चारों नियंत्रण-तंत्र (विधायी, कार्यपालिका, न्यायिक, अन्य) परस्पर-पूरक हैं — कोई एक अकेला पर्याप्त नहीं।

📝 पिछले वर्षों के प्रश्न + संभावित प्रश्न (PYQs) 📝 5-अंक (60-70 शब्द) | 10-अंक (~120 शब्द)

Q1. उन विधियों की गणना कीजिए जिनके माध्यम से संसद लोक प्रशासन पर नियंत्रण रखती है। (10 अंक) — RAS Mains 2016 Q2. प्रशासन पर न्यायिक नियंत्रण के विभिन्न स्वरूपों का उल्लेख कीजिए। (5 अंक) — RAS Mains 2021 Q3. न्यायिक नियंत्रण के संदर्भ में प्रतिषेध (Prohibition) एवं परमादेश (Mandamus) रिट में अंतर लिखिए। (5 अंक) — RAS Mains 2018 Q4. प्रशासन पर न्यायिक नियंत्रण की किन्हीं दो विधियाँ लिखिए। (2 अंक) — RAS Mains 2016 Q5. भारत में न्यायिक नियंत्रण के स्वरूपों एवं विधियों का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (10 अंक) — RAS Mains 2023 Q6. लोकायुक्त के कोई पाँच कार्य लिखिए। (5 अंक) — RAS Mains 2016 Q7. (संभावित) कार्यपालिका नियंत्रण के साधनों की विवेचना कीजिए। (5 अंक) Q8. (संभावित) सूचना का अधिकार अधिनियम एवं सूचना आयोग किस प्रकार प्रशासन पर नियंत्रण का साधन बनते हैं? (5 अंक) Q9. (संभावित) CAT/SAT जैसे प्रशासनिक अधिकरणों की भूमिका एवं वर्तमान चुनौतियों पर प्रकाश डालिए। (10 अंक) Q10. (संभावित) प्रशासन पर नियंत्रण में मीडिया एवं नागरिक समाज की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए। (10 अंक)

वर्षघटना/संस्थान/सुधारमहत्व
1950संविधान लागू — अनुच्छेद 32, 226 (रिट), 323A/B (अधिकरण) प्रभावी।न्यायिक नियंत्रण का संवैधानिक आधार स्थापित।
1970उड़ीसा — देश का पहला लोकायुक्त (देखें अध्याय 05)।राज्य स्तर पर स्वतंत्र नियंत्रण-तंत्र की शुरुआत।
1973राजस्थान लोकायुक्त अधिनियम पारित।राजस्थान में लोकायुक्त संस्था की स्थापना।
1980 का दशकजनहित याचिका (PIL) का उदय — न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती व वी.आर. कृष्ण अय्यर के प्रयासों से।न्यायिक नियंत्रण को आम नागरिक के लिए सुलभ बनाया।
1985Administrative Tribunals Act — CAT की स्थापना।सेवा-विवादों के त्वरित निपटारे हेतु विशेष अधिकरण।
1993विभाग-संबंधी स्थायी समितियाँ (DRSCs) गठित।विधायी नियंत्रण को अधिक गहन व विशेषज्ञ बनाया।
2005सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act)।नागरिक-आधारित नियंत्रण को कानूनी अधिकार बनाया (देखें अध्याय 06)।
2013Lokpal and Lokayuktas Act पारित।केंद्र स्तर पर सांविधिक भ्रष्टाचार-निरोधक निकाय (देखें अध्याय 05)।
2022 (दिसंबर)CAT में लंबित मामले 80,545 दर्ज।अधिकरणों की क्षमता-संकट पहली बार व्यापक रूप से उजागर।
2023 (अक्टूबर)न्यायमूर्ति प्रताप कृष्ण लोहरा — राजस्थान के 13वें लोकायुक्त नियुक्त।राजस्थान लोकायुक्त संस्था में वर्तमान नेतृत्व।
2025CAT में लंबित मामले 1,25,000+ — CJI बी.आर. गवई की टिप्पणी; AI-आधारित सुधार प्रस्तावित।अधिकरण-सुधार की तात्कालिक आवश्यकता को रेखांकित किया।
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