⚠️ अध्याय 7/11 — लोक प्रशासन

प्रशासन में प्रमुख मुद्दे

Issues in Administration | RAS Pre + Mains
📋 इस अध्याय में
  1. केंद्र-राज्य संबंध (Union-State Relations)
  2. मंत्री-लोकसेवक संबंध (Minister-Civil Servant Relations)
  3. सामान्यवादी-विशेषज्ञ विवाद (Generalists vs Specialists)
  4. प्रशासनिक सुधार (Administrative Reforms)
  5. सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit)

कल्पना कीजिए — राजस्थान सरकार एक नई योजना बनाना चाहती है, पर उसके लिए केंद्र से पैसा व अनुमति चाहिए — यहीं से शुरू होता है "केंद्र-राज्य संबंध" का सवाल। उसी योजना को लागू करने का आदेश एक मंत्री देता है, पर उसे ज़मीन पर उतारता एक IAS अधिकारी है — दोनों के बीच का तालमेल व टकराव "मंत्री-लोकसेवक संबंध" है। योजना को लागू करने के लिए एक सामान्य प्रशासक (कलेक्टर) की ज़रूरत है या किसी इंजीनियर/डॉक्टर विशेषज्ञ की — यह है "सामान्यवादी-विशेषज्ञ विवाद"। योजना अगर पुराने ढर्रे पर अटकी रहे तो उसे सुधारने के लिए आयोग बनते हैं — यह है "प्रशासनिक सुधार"। और अंत में, गाँव का हर नागरिक खुद जाँच सके कि पैसा सही खर्च हुआ या नहीं — यह है "सामाजिक अंकेक्षण"। यही पाँच मुद्दे आज के भारतीय प्रशासन की सबसे बड़ी बहसों का केंद्र हैं।

1केंद्र-राज्य संबंध (Union-State Relations)

भारत एक "संघात्मक शासन प्रणाली, एकात्मक झुकाव के साथ (Quasi-Federal)" है — यानी सामान्य समय में यह संघीय (federal) व्यवहार करता है, पर संकटकाल में केंद्र को अतिरिक्त शक्तियाँ मिल जाती हैं। संविधान का भाग XI (अनुच्छेद 245-263) केंद्र-राज्य संबंधों को तीन आयामों में बाँटता है — विधायी (Legislative), प्रशासनिक (Administrative — अनुच्छेद 256-263) व वित्तीय (Financial) संबंध।

प्रशासनिक संबंध के प्रमुख प्रावधान

विधायी संबंध (Legislative Relations)

वित्तीय संबंध (Financial Relations)

🎓 सरकारिया आयोग (Sarkaria Commission) विचारक/प्रवर्तक: न्यायमूर्ति आर.एस. सरकारिया (Justice R.S. Sarkaria) | वर्ष: गठन: 1983, रिपोर्ट: 1988 (1600 पृष्ठ, 247 सिफारिशें)
  • उद्देश्य: केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा कर संघीय ढांचे को सुदृढ़ करने हेतु सिफारिशें देना।
  • अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) का प्रयोग केवल अंतिम उपाय (last resort) के रूप में, अत्यंत संयम से करने की सिफारिश।
  • राज्यों को अधिक वित्तीय स्वायत्तता देने व राजकोषीय संघवाद (fiscal federalism) मजबूत करने की सिफारिश।
  • राज्यपाल की नियुक्ति व भूमिका में निष्पक्षता सुनिश्चित करने हेतु सुधार सुझाए।
  • स्थायी अंतर्राज्यीय परिषद (Inter-State Council) की स्थापना का सुझाव — ताकि केंद्र-राज्य संवाद व सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) को संस्थागत रूप मिले (यह परिषद बाद में 1990 में अनुच्छेद 263 के तहत वास्तव में स्थापित की गई)।
🎓 पूंछी आयोग (Punchhi Commission) विचारक/प्रवर्तक: न्यायमूर्ति मदन मोहन पूंछी (पूर्व मुख्य न्यायाधीश, भारत) | वर्ष: गठन: अप्रैल 2007, रिपोर्ट: 30 मार्च 2010 (7 खंड, 273 सिफारिशें)
  • राज्यपाल की नियुक्ति राज्य से बाहर के व्यक्ति की हो, ताकि निष्पक्षता व संतुलित शासन सुनिश्चित हो।
  • राज्यपाल का कार्यकाल निश्चित 5 वर्ष का हो, तथा हटाने की प्रक्रिया राज्य विधानसभा द्वारा महाभियोग जैसी प्रक्रिया से हो (मनमाने ढंग से नहीं)।
  • आपातकालीन प्रावधानों का "स्थानीयकरण (Localising)" — अनुच्छेद 355-356 के तहत पूरे राज्य के बजाय केवल प्रभावित जिले/क्षेत्र में ही राष्ट्रपति शासन लगाने का सुझाव।
  • निष्कर्ष: "सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism)" ही भारत की एकता, अखंडता व विकास के लिए अनिवार्य है।
💡 सरल भाषा में समझें — संयुक्त परिवार में बड़े भाई की भूमिका
सोचिए एक संयुक्त परिवार में बड़ा भाई (केंद्र) घर का मुखिया है, पर हर छोटे भाई (राज्य) का भी अपना कमरा व निर्णय-अधिकार है। सामान्य दिनों में हर भाई अपने कमरे का फैसला खुद लेता है (राज्य सूची के विषय), पर घर में आग लगे (आपातकाल) तो बड़ा भाई पूरे घर का नियंत्रण अपने हाथ में ले सकता है। सरकारिया व पूंछी आयोग बस यही सुनिश्चित करने की कोशिश करते हैं कि बड़ा भाई अपनी ताकत का दुरुपयोग न करे, और छोटे भाइयों को उचित सम्मान व स्वायत्तता मिले।

राज्यपाल विवाद — नवीनतम सर्वोच्च न्यायालय निर्णय (2025)

तमिलनाडु राज्य बनाम तमिलनाडु के राज्यपाल (8 अप्रैल 2025): तमिलनाडु विधानसभा द्वारा पारित 10 विधेयकों को राज्यपाल ने वर्षों तक अनिश्चितकाल के लिए राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखा (जैसे तमिलनाडु विश्वविद्यालय विधि संशोधन विधेयक, जो 11 मई 2022 को पारित हुआ पर 17 महीनों तक कोई निर्णय नहीं आया)। सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक निर्णय देते हुए कहा कि अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल को कोई "पूर्ण वीटो (absolute veto)" या "जेब वीटो (pocket veto)" प्राप्त नहीं है — राज्यपाल विधेयकों पर अनिश्चितकाल तक निर्णय टाल नहीं सकते। न्यायालय ने स्पष्ट समय-सीमा तय की — सहमति रोकने हेतु 1 माह, मंत्रिपरिषद की सलाह के विरुद्ध कार्य हेतु 3 माह, तथा पुनर्विचार के बाद दोबारा प्रस्तुत विधेयकों हेतु 1 माह।

राष्ट्रपति संदर्भ (Presidential Reference) — 13 मई 2025: इस निर्णय के बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अनुच्छेद 143(1) के तहत सर्वोच्च न्यायालय से 14 प्रश्नों पर परामर्शी राय (Advisory Opinion) माँगी — विशेषकर इस पर कि क्या न्यायपालिका राज्यपाल/राष्ट्रपति के लिए समय-सीमा तय कर सकती है। पंजाब, तेलंगाना व केरल में भी इसी प्रकार के राज्यपाल-राज्य सरकार विवाद सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन रहे हैं — यह दर्शाता है कि राज्यपाल की भूमिका आज भी केंद्र-राज्य संबंधों का सबसे संवेदनशील बिंदु बना हुआ है।

राजस्थान संदर्भ — केंद्र-राज्य सहयोग का उदाहरण (PKC-ERCP परियोजना)

पार्वती-कालीसिंध-चंबल एवं पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना (PKC-ERCP): पूर्वी राजस्थान के 13 जिलों में पेयजल व सिंचाई हेतु प्रस्तावित इस बहुराज्यीय नदी-जोड़ो परियोजना पर वर्षों तक राजस्थान, मध्य प्रदेश व केंद्र के बीच सहमति नहीं बन पा रही थी। अंततः 28 जनवरी 2024 को तीनों पक्षों के बीच समझौता ज्ञापन (MoU) व 5 दिसंबर 2024 को समझौता करार (MoA) हस्ताक्षरित हुआ — जिसमें राजस्थान व मध्य प्रदेश दोनों राज्यों में 2.8 लाख हेक्टेयर से अधिक सिंचाई क्षेत्र शामिल है। यह उदाहरण दर्शाता है कि अनुच्छेद 262-263 के अंतर्गत अंतर्राज्यीय जल-विवाद केंद्र की मध्यस्थता व सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) से किस प्रकार सुलझाए जा सकते हैं।

💡 सरल भाषा में समझें — तीन पड़ोसियों के बीच पानी की साझी नाली

सोचिए तीन पड़ोसी घरों को एक ही नाली/पाइपलाइन से पानी बाँटना है, पर हर घर अपने हिस्से को लेकर झगड़ता रहे तो पानी कभी नहीं बंटेगा। ऐसे में एक बुजुर्ग (केंद्र सरकार) बीच में आकर तीनों को बिठाकर एक लिखित समझौता करवा दे, जिसमें साफ लिखा हो कि किसे कितना पानी मिलेगा — यही राजस्थान-मध्य प्रदेश-केंद्र के बीच PKC-ERCP समझौते ने किया, दशकों की खींचतान के बाद पानी के बंटवारे पर तीनों पक्षों को एक मेज़ पर ला दिया।

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2मंत्री-लोकसेवक संबंध (Minister-Civil Servant Relations)

लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था में मंत्री (राजनीतिक कार्यपालिका) व सिविल सेवक (स्थायी प्रशासनिक तंत्र) के बीच का रिश्ता "नीति (Policy)" व "प्रशासन (Administration)" के बीच के रिश्ते जैसा है — मंत्री दिशा व नीति तय करता है, सिविल सेवक उसे क्रियान्वित करता है। परंतु व्यवहार में यह विभाजन रेखा उतनी स्पष्ट नहीं जितनी सिद्धांत में दिखती है (देखें अध्याय 02 — Politics-Administration Dichotomy)।

संवैधानिक स्थिति

व्यावहारिक समस्याएँ

1. राजनीतिक हस्तक्षेप — मंत्री द्वारा तबादले, पोस्टिंग व ठेकों में अनुचित हस्तक्षेप, जिससे सिविल सेवक की स्वतंत्र निर्णय-क्षमता प्रभावित होती है।

2. "कमिटेड ब्यूरोक्रेसी (Committed Bureaucracy)" की बहस — क्या सिविल सेवक को सरकार की विचारधारा के प्रति 'प्रतिबद्ध' होना चाहिए, या केवल संविधान व कानून के प्रति? भारत में यह बहस 1970 के दशक से चली आ रही है।

3. दंडात्मक स्थानांतरण (Punishment Transfers) — निष्पक्ष सलाह देने वाले अधिकारियों को असुविधाजनक पदस्थापन का सामना करना पड़ता है, जिससे "निर्भीक सलाह" व्यवहार में कमज़ोर पड़ती है।

4. उत्तरदायित्व का धुंधलापन — जब कोई योजना असफल होती है, तो यह तय करना कठिन होता है कि गलती नीति (मंत्री) की थी या क्रियान्वयन (अधिकारी) की — इससे जवाबदेही (देखें अध्याय 03) कमज़ोर पड़ जाती है।

💡 सरल भाषा में समझें — कप्तान और कोच का रिश्ता

क्रिकेट में टीम मैनेजमेंट/कोच (मंत्री) रणनीति और लक्ष्य तय करता है, पर मैदान पर असली फैसले (कब कौन गेंदबाज़ी करे) कप्तान (सिविल सेवक) लेता है। अगर कोच मैदान पर हर छोटी बात में दखल देने लगे, तो कप्तान का आत्मविश्वास व स्वतंत्र निर्णय क्षमता दोनों प्रभावित होंगे। स्वस्थ प्रशासन के लिए ज़रूरी है कि मंत्री बड़ी दिशा तय करे, और अधिकारी को क्रियान्वयन में उचित स्वतंत्रता व सुरक्षा मिले।

3सामान्यवादी-विशेषज्ञ विवाद (Generalists vs Specialists)

भारतीय प्रशासन में एक पुरानी व सतत बहस है — क्या किसी विभाग (जैसे स्वास्थ्य, PWD, सिंचाई) का नेतृत्व एक "सामान्यवादी (Generalist — सामान्यतः IAS अधिकारी)" करे, या उस क्षेत्र के "विशेषज्ञ (Specialist — डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक)" को यह जिम्मेदारी मिले?

संघर्ष के मुख्य बिंदु (RAS Mains PYQ 2023 — 10 अंक)

सामान्यवादी (Generalist — IAS) के पक्ष में तर्क
  • व्यापक प्रशासनिक अनुभव — कई विभागों में काम करने से समन्वय व नीति-निर्माण की समझ बेहतर।
  • निष्पक्ष, सर्वांगीण दृष्टिकोण — किसी एक तकनीकी क्षेत्र के प्रति पक्षपात नहीं।
  • अखिल भारतीय सेवा होने से केंद्र-राज्य समन्वय आसान (देखें अध्याय 06)।
विशेषज्ञ (Specialist) के पक्ष में तर्क
  • गहन तकनीकी ज्ञान — जटिल क्षेत्रों (स्वास्थ्य, इंजीनियरिंग, वित्त) में बेहतर निर्णय क्षमता।
  • समय की बचत — विशेषज्ञ को नए सिरे से विषय सीखना नहीं पड़ता, जैसा एक सामान्यवादी को हर नई पोस्टिंग पर करना पड़ता है।
  • तकनीकी अधिकारियों में असंतोष — उन्हें लगता है कि "ग्लास सीलिंग (glass ceiling)" के कारण वे कभी शीर्ष प्रशासनिक पद तक नहीं पहुँच पाते, चाहे वे कितने भी अनुभवी क्यों न हों।

🎓 प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (1st ARC) की सिफारिशें विचारक/प्रवर्तक: 1966-70, अध्यक्ष: मोरारजी देसाई → के. हनुमंतैया | वर्ष: RAS Mains PYQ 2023 (10 अंक) का प्रत्यक्ष उत्तर

कोठारी समिति (1976) — संबंधित सुधार: डी.एस. कोठारी समिति (D.S. Kothari Committee, 1976) मुख्यतः UPSC भर्ती प्रक्रिया में सुधार हेतु गठित थी — इसी की सिफारिश पर वर्तमान त्रि-चरणीय परीक्षा प्रणाली (Prelims → Mains → Interview) अस्तित्व में आई (देखें अध्याय 06)। यद्यपि यह सीधे तौर पर सामान्यवादी-विशेषज्ञ विवाद पर केंद्रित नहीं थी, फिर भी इसने वैकल्पिक/विशेष विषयों को परीक्षा प्रणाली में शामिल कर तकनीकी दक्षता को कुछ महत्व दिया।

राजस्थान संदर्भ: राजस्थान में PWD, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य, सिंचाई जैसे तकनीकी विभागों में सचिवालय स्तर पर सचिव (सामान्यतः IAS) होता है, जबकि विभागाध्यक्ष (Head of Department) स्तर पर तकनीकी विशेषज्ञ (जैसे मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, मुख्य अभियंता) होते हैं — यह दोनों के बीच एक व्यावहारिक संतुलन बनाने का प्रयास है।

💡 सरल भाषा में समझें — अस्पताल में डायरेक्टर बनाम डॉक्टर

सोचिए एक बड़े अस्पताल में एक प्रशासनिक डायरेक्टर हो जो बजट, स्टाफ व नीति संभाले, और एक वरिष्ठ डॉक्टर हो जो इलाज का तकनीकी फैसला ले। अगर डायरेक्टर डॉक्टर के इलाज के फैसलों में दखल दे, तो मरीज को नुकसान होगा। लेकिन अगर सिर्फ डॉक्टर पूरा अस्पताल भी चलाए, तो बजट-प्रबंधन व बड़ी नीतियों में कमी रह सकती है। सही तरीका है दोनों की भूमिका स्पष्ट रखना व आपसी सम्मान से काम करना — यही सामान्यवादी-विशेषज्ञ विवाद का व्यावहारिक हल भी है।

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4प्रशासनिक सुधार (Administrative Reforms)

समय के साथ प्रशासनिक ढांचे में जड़ता (rigidity), भ्रष्टाचार व अक्षमता आ जाती है — इसे दूर करने हेतु समय-समय पर "प्रशासनिक सुधार आयोग (Administrative Reforms Commission — ARC)" गठित किए गए हैं, जिनकी सिफारिशें आज भी भारतीय प्रशासन का आधार बनी हुई हैं।

आयोगअध्यक्ष एवं कार्यकालप्रमुख कार्यक्षेत्र
प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (1st ARC)मोरारजी देसाई (शुरुआत), बाद में के. हनुमंतैया — 1966-70; कुल 20 रिपोर्ट, लगभग 537 सिफारिशेंमंत्रालयों का पुनर्गठन, सामान्यवादी-विशेषज्ञ संतुलन, लोकपाल-लोकायुक्त की सिफारिश (देखें अध्याय 05), राज्य प्रशासन में सुधार
द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC)वीरप्पा मोइली — 2005-09; कुल 15 रिपोर्ट (जून 2006 से मई 2009)सूचना का अधिकार, प्रशासन में नैतिकता, ई-गवर्नेंस, संकट प्रबंधन, स्थानीय शासन, वित्तीय प्रबंधन, नागरिक-केंद्रित प्रशासन

द्वितीय ARC की 15 रिपोर्टों में से प्रमुख विषय

Mission Karmayogi — क्षमता ढांचा (Competency Framework), 2020: द्वितीय ARC की सुधार-भावना को आगे बढ़ाते हुए सितंबर 2020 में शुरू किए गए Mission Karmayogi का केंद्रीय विचार है — प्रत्येक पद के लिए एक स्पष्ट "क्षमता ढांचा (Competency Framework)" तय करना, ताकि प्रशिक्षण नियम-आधारित न होकर भूमिका-आधारित (role-based) हो (विस्तार से देखें अध्याय 06 — iGOT Karmayogi प्लेटफॉर्म)। यह 2nd ARC की "नागरिक-केंद्रित प्रशासन" व क्षमता-निर्माण संबंधी सिफारिशों का ही आधुनिक, डिजिटल विस्तार है।

RAS Mains PYQ 2018 (10 अंक): "भारत में प्रशासन में सत्यनिष्ठा (integrity) बढ़ाने हेतु अपनाए गए उपायों को स्पष्ट कीजिए।" — उत्तर में शामिल करें: 2nd ARC की Ethics in Governance रिपोर्ट, अखिल भारतीय सेवा आचरण नियम (अध्याय 06), Lokpal & Lokayuktas Act 2013 (अध्याय 05), RTI Act 2005, तथा Asset Declaration जैसे प्रावधान।

DARPG एवं Good Governance Index (GGI)

प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत विभाग (Department of Administrative Reforms and Public Grievances — DARPG) भारत सरकार की वह नोडल एजेंसी है जो प्रशासनिक सुधारों को लागू करने व निगरानी करने का कार्य करती है।

5सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit)

सामाजिक अंकेक्षण का अर्थ है — किसी सरकारी योजना पर हुए खर्च व उसके वास्तविक परिणामों की जाँच स्वयं लाभार्थी नागरिकों द्वारा, सार्वजनिक रूप से, खुली बैठक (Public Hearing) में करना। यह CAG (देखें अध्याय 05) जैसे औपचारिक/तकनीकी ऑडिट से अलग है — यहाँ आम ग्रामीण नागरिक ही "ऑडिटर" की भूमिका निभाते हैं।

🎓 सामाजिक अंकेक्षण का जन्म — MKSS आंदोलन विचारक/प्रवर्तक: मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS) — अरुणा रॉय, निखिल डे, शंकर सिंह | वर्ष: स्थापना: 1 मई 1990, देवडूंगरी गाँव, राजसमंद, राजस्थान

विधिक आधार — MGNREGA की धारा 17: महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA), 2005 की धारा 17 सामाजिक अंकेक्षण को अनिवार्य बनाती है — हर ग्राम पंचायत को वर्ष में कम से कम एक बार सार्वजनिक सुनवाई (Social Audit Gram Sabha) आयोजित कर योजना के तहत हुए खर्च का हिसाब ग्रामीणों के सामने रखना अनिवार्य है। यह प्रावधान सीधे तौर पर MKSS की तकनीक को कानूनी मान्यता देता है।

सामाजिक अंकेक्षण की प्रक्रिया एवं महत्व

1. सरकारी अभिलेखों (मस्टर रोल, बिल, वाउचर) को सार्वजनिक रूप से पढ़ा जाता है।

2. ग्राम सभा में उपस्थित नागरिक अपने अनुभव के आधार पर अभिलेखों की सत्यता जाँचते हैं — जैसे "क्या वाकई इतने दिन काम हुआ?"

3. विसंगति पाए जाने पर सार्वजनिक रूप से जवाबदेही तय होती है व सुधारात्मक कार्रवाई की सिफारिश होती है।

4. ग्राम सभा की भूमिका केंद्रीय है — बिना सक्रिय जन-भागीदारी के सामाजिक अंकेक्षण एक औपचारिकता मात्र बनकर रह जाता है।

💡 सरल भाषा में समझें — घर के खर्च का सार्वजनिक हिसाब

सोचिए एक मोहल्ले में चंदा इकट्ठा कर सड़क बनवाई गई। अगर सिर्फ मुखिया कहे "पैसा खर्च हो गया" और कोई सवाल न पूछे, तो गड़बड़ी की गुंजाइश बनी रहेगी। लेकिन अगर पूरे मोहल्ले को बुलाकर बिल-वाउचर दिखाए जाएं और हर कोई पूछे "क्या वाकई इतनी ईंटें लगीं?" — तो भ्रष्टाचार पकड़ में आ जाएगा। सामाजिक अंकेक्षण ठीक यही करता है, बस पूरे गाँव व सरकारी योजना के स्तर पर — CAG जैसे बड़े ऑडिट के अलावा यह "जनता का अपना ऑडिट" है।

🎯 प्रशासन में प्रमुख मुद्दे — RAS Mains उत्तर लेखन कोण 5-अंक: 60-70 शब्द | 10-अंक: ~120 शब्द

★ परीक्षा में अवश्य ध्यान रखने योग्य तथ्य ★

1. भारत — "अर्ध-संघीय (Quasi-Federal)" व्यवस्था — सामान्यतः संघीय, संकट में एकात्मक। 2. अनुच्छेद 256-263 — केंद्र-राज्य प्रशासनिक संबंध; अनुच्छेद 262-263 — अंतर्राज्यीय जल-विवाद व परिषद। 3. अनुच्छेद 249/250/252/254 — विधायी संबंध (राष्ट्रीय हित, आपातकाल, राज्यों की सहमति, टकराव में संघ-कानून प्रभावी)। 4. अनुच्छेद 268-269, 275, 293 — वित्तीय संबंध (कर-हस्तांतरण, अनुदान, उधार पर नियंत्रण)। 5. PKC-ERCP परियोजना — राजस्थान-MP-केंद्र त्रिपक्षीय MoU (28 जनवरी 2024) व MoA (5 दिसंबर 2024) — सहकारी संघवाद का ताज़ा उदाहरण। 6. सरकारिया आयोग (1983-88) — 247 सिफारिशें; अनुच्छेद 356 का संयमित प्रयोग; स्थायी अंतर्राज्यीय परिषद का सुझाव। 7. पूंछी आयोग (2007-10) — 273 सिफारिशें; राज्यपाल का 5 वर्ष निश्चित कार्यकाल व राज्य से बाहर नियुक्ति का सुझाव। 8. तमिलनाडु राज्य बनाम राज्यपाल केस (8 अप्रैल 2025) — SC ने "पॉकेट वीटो" को असंवैधानिक बताया, समय-सीमा तय की। 9. राष्ट्रपति संदर्भ (13 मई 2025) — अनुच्छेद 143 के तहत 14 प्रश्नों पर सर्वोच्च न्यायालय से राय माँगी गई। 10. मंत्री-लोकसेवक संबंध — "Frank and Fearless Advice" का सिद्धांत; "Committed Bureaucracy" बहस 1970 के दशक से। 11. RAS Mains PYQ 2023 (10M) — सामान्यवादी बनाम विशेषज्ञ विवाद + 1st ARC सिफारिशें। 12. 1st ARC (1966-70) — अध्यक्ष मोरारजी देसाई → के. हनुमंतैया; 20 रिपोर्ट, ~537 सिफारिशें। 13. 1st ARC ने ही सबसे पहले लोकपाल-लोकायुक्त की सिफारिश की थी (देखें अध्याय 05)। 14. 2nd ARC (2005-09) — अध्यक्ष वीरप्पा मोइली; 15 रिपोर्ट (जून 2006 से मई 2009)। 15. 2nd ARC की पहली रिपोर्ट — "सूचना का अधिकार — सुशासन की मास्टर की"। 16. D.S. कोठारी समिति (1976) — UPSC की वर्तमान त्रि-चरणीय परीक्षा प्रणाली (Prelims-Mains-Interview) की सिफारिश। 17. RAS Mains PYQ 2018 (10M) — "प्रशासन में सत्यनिष्ठा बढ़ाने के उपाय"। 18. DARPG — Good Governance Index (GGI) शुभारंभ: 25 दिसंबर 2019 (सुशासन दिवस); 10 क्षेत्र। 19. GGI — नवीनतम प्रकाशित संस्करण 2021 का; 2023 संस्करण जारी नहीं हुआ। 20. MKSS — स्थापना 1 मई 1990, देवडूंगरी गाँव, राजसमंद (राजस्थान); अरुणा रॉय प्रमुख नेतृत्वकर्ता। 21. MKSS की सबसे बड़ी उपलब्धि — RTI Act, 2005 का पारित होना ("हमारा पैसा, हमारा हिसाब" आंदोलन)। 22. MGNREGA धारा 17 — सामाजिक अंकेक्षण अनिवार्य; वर्ष में कम से कम एक बार ग्राम सभा में सार्वजनिक सुनवाई। 23. People's RTI Museum — ब्यावर, राजस्थान — आधारशिला 19 अक्टूबर 2024 (जश्न-ए-संविधान कार्यक्रम)।

📝 पिछले वर्षों के प्रश्न + संभावित प्रश्न (PYQs) 📝 5-अंक (60-70 शब्द) | 10-अंक (~120 शब्द)

Q1. सामान्यज्ञ (जेनरलिस्ट) बनाम विशेषज्ञ (स्पेशलिस्ट) के बीच संघर्ष के मुख्य बिंदुओं पर चर्चा कीजिए। इस संबंध में प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (ARC) द्वारा दी गई सिफारिशों का भी उल्लेख कीजिए। (10 अंक) — RAS Mains 2023 Q2. भारत में प्रशासन में सत्यनिष्ठा (Integrity) बढ़ाने हेतु अपनाए गए उपायों को स्पष्ट कीजिए। (10 अंक) — RAS Mains 2018 Q3. (संभावित) केंद्र-राज्य प्रशासनिक संबंधों की विवेचना करते हुए सरकारिया व पूंछी आयोग की प्रमुख सिफारिशों को स्पष्ट कीजिए। (10 अंक) Q4. (संभावित) केंद्र-राज्य विधायी एवं वित्तीय संबंधों को स्पष्ट कीजिए। (5 अंक) Q5. (संभावित) राज्यपाल की भूमिका को लेकर हाल के विवादों एवं सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों पर टिप्पणी कीजिए। (10 अंक) Q6. (संभावित) मंत्री एवं सिविल सेवक के बीच "निष्पक्ष व निर्भीक सलाह" के सिद्धांत को स्पष्ट कीजिए। (5 अंक) Q7. (संभावित) द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग की प्रमुख सिफारिशों की विवेचना कीजिए। (10 अंक) Q8. (संभावित) सामाजिक अंकेक्षण का अर्थ स्पष्ट करते हुए MGNREGA में इसकी भूमिका बताइए। (5 अंक) Q9. (संभावित) राजस्थान के MKSS आंदोलन ने भारत में सुशासन को किस प्रकार प्रभावित किया? (10 अंक)

वर्षघटना/आयोग/सुधारमहत्व
1966-70प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (1st ARC)।मंत्रालय पुनर्गठन, सामान्यवादी-विशेषज्ञ संतुलन, लोकपाल सिफारिश।
1976D.S. कोठारी समिति।वर्तमान त्रि-चरणीय UPSC परीक्षा प्रणाली की नींव।
1983-88सरकारिया आयोग।केंद्र-राज्य संबंधों पर 247 सिफारिशें, अनुच्छेद 356 पर संयम।
1990 (1 मई)MKSS की स्थापना, देवडूंगरी, राजस्थान।सामाजिक अंकेक्षण तकनीक का जन्मस्थान।
1990अंतर्राज्यीय परिषद (Inter-State Council) की स्थापना।सरकारिया आयोग की सिफारिश का क्रियान्वयन।
2005MGNREGA अधिनियम — धारा 17 सामाजिक अंकेक्षण अनिवार्य; RTI Act पारित।MKSS आंदोलन के दो सबसे बड़े परिणाम।
2005-09द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC), अध्यक्ष वीरप्पा मोइली।15 रिपोर्ट — नैतिकता, ई-गवर्नेंस, स्थानीय शासन आदि।
2007-2010पूंछी आयोग।केंद्र-राज्य संबंधों पर 273 सिफारिशें, राज्यपाल सुधार।
2019 (25 दिसंबर)Good Governance Index (GGI) शुभारंभ।राज्यों की शासन-गुणवत्ता की तुलनात्मक रैंकिंग व्यवस्था।
2024 (19 अक्टूबर)People's RTI Museum आधारशिला, ब्यावर, राजस्थान।MKSS/RTI आंदोलन की विरासत का स्मारकीकरण।
2025 (8 अप्रैल)राज्य तमिलनाडु बनाम तमिलनाडु राज्यपाल — SC निर्णय।राज्यपाल की "पॉकेट वीटो" शक्ति असंवैधानिक घोषित, समय-सीमा तय।
2025 (13 मई)राष्ट्रपति संदर्भ, अनुच्छेद 143।राज्यपाल/राष्ट्रपति शक्तियों पर 14 प्रश्नों पर SC से राय — वर्तमान में विचाराधीन।
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