कल्पना कीजिए — राजस्थान सरकार एक नई योजना बनाना चाहती है, पर उसके लिए केंद्र से पैसा और अनुमति चाहिए — यहीं से शुरू होता है "केंद्र-राज्य संबंध" का सवाल। उसी योजना को लागू करने का आदेश एक मंत्री देता है, पर उसे ज़मीन पर उतारता एक IAS अधिकारी है — दोनों के बीच का तालमेल और टकराव "मंत्री-लोक सेवक संबंध" है। योजना को लागू करने के लिए एक सामान्य प्रशासक (कलेक्टर) की ज़रूरत है या किसी इंजीनियर या डॉक्टर विशेषज्ञ की — यह है "सामान्यज्ञ-विशेषज्ञ विवाद"।
योजना अगर पुराने ढर्रे पर अटकी रहे तो उसे सुधारने के लिए आयोग बनते हैं — यह है "प्रशासनिक सुधार"। और अंत में, गाँव का हर नागरिक ख़ुद जाँच सके कि पैसा सही ख़र्च हुआ या नहीं — यह है "सामाजिक अंकेक्षण"। यही मुद्दे आज के भारतीय प्रशासन की सबसे बड़ी बहसों का केंद्र हैं।
ध्यान देने की बात यह है कि ये पाँचों बहसें अलग-अलग नहीं हैं। राज्यपाल की भूमिका केंद्र-राज्य संबंधों का हिस्सा है, मंत्री और अधिकारी का रिश्ता सामान्यज्ञ-विशेषज्ञ विवाद से जुड़ा है, और सामाजिक अंकेक्षण अपने-आप में एक प्रशासनिक सुधार है। इस अध्याय में हम इन्हें एक-एक करके, पर आपस में जोड़ते हुए पढ़ेंगे।
1. केंद्र-राज्य संबंध — विधायी, प्रशासनिक और वित्तीय; अनुच्छेद 256 से 263; समन्वय के मंच; सरकारिया और पूंछी आयोग
2. राज्यपाल विवाद — अनुच्छेद 200; तमिलनाडु निर्णय (अप्रैल 2025) और राष्ट्रपति संदर्भ पर राय (नवंबर 2025)
3. मंत्री-लोक सेवक संबंध — संवैधानिक स्थिति, तुलनात्मक मॉडल, समस्याएँ और सुधार के सुझाव
4. सामान्यज्ञ बनाम विशेषज्ञ — विवाद की जड़, दोनों पक्षों के तर्क, पदसोपान के मॉडल, प्रथम ARC की सिफ़ारिशें
5. प्रशासनिक सुधार — अर्थ, आयाम, स्वतंत्रता से पहले और बाद के आयोग; प्रथम और द्वितीय ARC; राजस्थान में सुधार
6. सामाजिक अंकेक्षण — अर्थ, MKSS आंदोलन, प्रक्रिया, क़ानूनी आधार, लाभ और चुनौतियाँ
7. सार-तुलना और समय-रेखा
1केंद्र-राज्य संबंध (Union-State Relations)
भारत एक "संघात्मक शासन प्रणाली, एकात्मक झुकाव के साथ (Quasi-Federal)" है — यानी सामान्य समय में यह संघीय (Federal) व्यवहार करता है, पर संकटकाल में केंद्र को अतिरिक्त शक्तियाँ मिल जाती हैं। संविधान का भाग XI (अनुच्छेद 245-263) केंद्र-राज्य संबंधों को तीन आयामों में बाँटता है — विधायी (Legislative), प्रशासनिक (Administrative — अनुच्छेद 256-263) और वित्तीय (Financial) संबंध। वित्तीय संबंधों का विस्तार भाग XII में है।
संविधान-निर्माताओं ने जान-बूझकर एक मज़बूत केंद्र बनाया, क्योंकि विभाजन की हिंसा, रियासतों के विलय और देश की विविधता के बीच एकता सबसे बड़ी प्राथमिकता थी। संविधान में "संघ (Federation)" शब्द नहीं है; अनुच्छेद 1 भारत को "राज्यों का संघ (Union of States)" कहता है। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने स्पष्ट किया था कि भारतीय संघ राज्यों के किसी समझौते का परिणाम नहीं है, इसलिए किसी राज्य को इससे अलग होने का अधिकार नहीं है। इसी कारण के.सी. व्हीयर (K.C. Wheare) ने भारत को "अर्ध-संघीय (Quasi-Federal)" कहा।

1.1 विधायी संबंध (Legislative Relations)
- अनुच्छेद 245 — संसद पूरे भारत या उसके किसी भाग के लिए, तथा राज्य विधानसभा राज्य के लिए क़ानून बना सकती है।
- अनुच्छेद 246 — तीन सूचियाँ (संघ, राज्य, समवर्ती) क़ानून बनाने के विषयों को बाँटती हैं (सातवीं अनुसूची)। अवशिष्ट विषयों (Residuary Subjects) पर क़ानून बनाने की शक्ति अनुच्छेद 248 के अनुसार संसद के पास है।
- अनुच्छेद 249 — राष्ट्रीय हित में राज्यसभा दो-तिहाई बहुमत से संकल्प पारित कर संसद को राज्य-सूची के विषय पर भी क़ानून बनाने का अधिकार दे सकती है।
- अनुच्छेद 250 — राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान संसद राज्य-सूची के विषयों पर भी क़ानून बना सकती है; अनुच्छेद 252 — दो या अधिक राज्यों की सहमति से संसद उनके लिए राज्य-सूची विषय पर क़ानून बना सकती है; अनुच्छेद 253 — अंतरराष्ट्रीय संधियों को लागू करने के लिए; अनुच्छेद 254 — टकराव होने पर संघ का क़ानून राज्य के क़ानून पर प्रभावी होता है (Repugnancy)।
- राज्यपाल कुछ विधेयकों को राष्ट्रपति के विचार हेतु आरक्षित कर सकते हैं (अनुच्छेद 200, 201) — यह राज्य-विधान पर केंद्र के नियंत्रण का एक और माध्यम है, जिस पर आगे खंड 2 में विस्तार से चर्चा है।
1.2 प्रशासनिक संबंध (Administrative Relations) — इस अध्याय का केंद्र
लोक प्रशासन की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण आयाम प्रशासनिक संबंध है। संविधान का सिद्धांत यह है कि केंद्र की कार्यपालिका शक्ति संसद के विषयों तक और राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्य-विधानमंडल के विषयों तक फैली है (अनुच्छेद 73 और 162)। पर कई प्रावधान ऐसे हैं जो केंद्र को राज्यों के प्रशासन पर दिशा देने का अधिकार देते हैं, ताकि पूरे देश में एकरूपता बनी रहे।
| अनुच्छेद | प्रावधान | प्रशासनिक अर्थ |
|---|---|---|
| 256 | राज्य की कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग इस प्रकार हो कि संसद के क़ानूनों का पालन हो; केंद्र आवश्यक निर्देश दे सकता है | राज्य को केंद्रीय क़ानून लागू करने ही होंगे |
| 257 | राज्य अपनी कार्यपालिका शक्ति से केंद्र की शक्ति में बाधा नहीं डालेगा; राष्ट्रीय और सैनिक महत्व के संचार-साधनों तथा रेलवे की सुरक्षा पर केंद्र निर्देश दे सकता है | राष्ट्रीय महत्व के कामों में केंद्र की प्रधानता |
| 258 | राष्ट्रपति, राज्य सरकार की सहमति से, केंद्र के कुछ कार्य राज्य को सौंप सकते हैं; संसद का क़ानून भी राज्य को कार्य सौंप सकता है | कार्यों का "प्रत्यायोजन" — लचीलापन |
| 258क | राज्यपाल, केंद्र की सहमति से, राज्य के कुछ कार्य केंद्र को सौंप सकते हैं (सातवाँ संशोधन, 1956) | उल्टी दिशा में प्रत्यायोजन |
| 261 | केंद्र और राज्यों के सार्वजनिक कृत्यों, अभिलेखों और न्यायिक कार्यवाहियों को पूरे भारत में "पूर्ण विश्वास और साख (Full Faith and Credit)" | एक राज्य का दस्तावेज़ दूसरे राज्य में भी मान्य |
| 262 | अंतर्राज्यीय नदी-जल विवादों के निर्णय हेतु संसद क़ानून बना सकती है (अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956) | जल-विवाद न्यायाधिकरण |
| 263 | राष्ट्रपति अंतर्राज्यीय परिषद् (Inter-State Council) बना सकते हैं | संवाद का संवैधानिक मंच |
| 312 | राज्यसभा के संकल्प पर संसद नई अखिल भारतीय सेवा बना सकती है | केंद्र द्वारा भर्ती, राज्यों में सेवा — एकता की कड़ी |
| 355 | बाहरी आक्रमण और आंतरिक अशांति से राज्यों की रक्षा करना केंद्र का कर्तव्य | केंद्रीय बलों की तैनाती का आधार |
| 356 | राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल होने पर राष्ट्रपति शासन | केंद्र-राज्य टकराव का सबसे विवादित बिंदु |
| 365 | केंद्र के निर्देश न मानने पर राष्ट्रपति मान सकते हैं कि संवैधानिक तंत्र विफल हो गया है | अनुच्छेद 256-257 के निर्देशों का "दंड" |
📌 ध्यान दें: अनुच्छेद 365 के कारण अनुच्छेद 256 और 257 के निर्देश केवल सलाह नहीं, बल्कि बाध्यकारी आदेश बन जाते हैं। इसीलिए सरकारिया आयोग ने कहा कि ऐसे निर्देश बहुत संयम से और केवल अंतिम उपाय के रूप में दिए जाएँ।
प्रशासनिक संबंधों के कुछ अन्य माध्यम: (1) अखिल भारतीय सेवाएँ — IAS, IPS और भारतीय वन सेवा के अधिकारी राज्यों में काम करते हैं पर उनकी भर्ती, प्रशिक्षण और अनुशासन पर अंतिम नियंत्रण केंद्र का होता है (विस्तार अध्याय 06 में); (2) केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल — अनुच्छेद 355 के तहत राज्यों में तैनाती; (3) केंद्र प्रायोजित योजनाएँ (Centrally Sponsored Schemes) — धन केंद्र देता है, पर शर्तें भी उसी की होती हैं; (4) अनुच्छेद 275 के अनुदान और अनुच्छेद 282 के विवेकाधीन अनुदान; (5) राज्यपाल — केंद्र द्वारा नियुक्त, राज्य का संवैधानिक प्रमुख।
1.3 टकराव के प्रमुख क्षेत्र
- 1. अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग — 1950 से अब तक सौ से अधिक बार राष्ट्रपति शासन लगाया जा चुका है, कई बार राजनीतिक कारणों से। एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि राष्ट्रपति शासन की घोषणा न्यायिक समीक्षा के अधीन है और बहुमत की परीक्षा सदन के पटल (Floor Test) पर ही होनी चाहिए।
- 2. राज्यपाल की भूमिका — नियुक्ति, विधेयकों पर निर्णय में देरी, सरकार-गठन में विवेकाधिकार (आगे खंड 2)।
- 3. अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति — केंद्र अधिकारियों को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर बुलाना चाहता है, जबकि राज्य अपने अनुभवी अधिकारियों को छोड़ना नहीं चाहते। IAS संवर्ग नियमों में बदलाव के 2022 के प्रस्ताव का कई राज्यों ने विरोध किया।
- 4. केंद्रीय जाँच एजेंसियाँ — कई राज्यों ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को दी गई "सामान्य सहमति (General Consent)" वापस ली है, क्योंकि "पुलिस" और "लोक व्यवस्था" राज्य-सूची के विषय हैं।
- 5. वित्तीय निर्भरता — राज्य ख़र्च का बड़ा भाग उठाते हैं, पर कर लगाने की बड़ी शक्तियाँ केंद्र के पास हैं; इसे "ऊर्ध्वाधर राजकोषीय असंतुलन (Vertical Fiscal Imbalance)" कहते हैं।
- 6. समवर्ती सूची पर बिना परामर्श क़ानून — शिक्षा, वन, कृषि-विपणन जैसे विषयों पर केंद्रीय क़ानूनों को लेकर राज्यों की शिकायत।
1.4 वित्तीय संबंध (Financial Relations)
- अनुच्छेद 268-269 — कुछ कर संघ द्वारा लगाए और वसूले जाते हैं पर राज्यों को हस्तांतरित होते हैं; कुछ कर संघ लगाता है पर राज्य वसूलते और रखते हैं। अनुच्छेद 270 — केंद्रीय करों का "विभाज्य पूल (Divisible Pool)" केंद्र और राज्यों में बँटता है।
- अनुच्छेद 275 — संघ द्वारा राज्यों को सहायता अनुदान (Grants-in-Aid); अनुच्छेद 293 — राज्यों की उधार लेने की शक्ति पर संघ का नियंत्रण।
- अनुच्छेद 279क — वस्तु एवं सेवा कर परिषद् (GST Council), 101वें संविधान संशोधन (2016) से; केंद्रीय वित्त मंत्री अध्यक्ष, सभी राज्यों के वित्त मंत्री सदस्य। निर्णय में केंद्र का एक-तिहाई और राज्यों का दो-तिहाई मत-भार — यह सहकारी संघवाद का सबसे ठोस उदाहरण है।
- अनुच्छेद 280 — वित्त आयोग (देखें अध्याय 05) केंद्र-राज्य कर-राजस्व बँटवारे की सिफ़ारिश करता है — 16वें वित्त आयोग ने राज्यों को 41% हिस्सेदारी की सिफ़ारिश की है। अद्यतन: डॉ. अरविंद पनगढ़िया की अध्यक्षता वाले 16वें वित्त आयोग (2026-31) की रिपोर्ट 1 फ़रवरी 2026 को संसद में रखी गई; विभाज्य पूल में राज्यों का हिस्सा 41% ही रखा गया, और राज्यों के बीच बँटवारे में राजस्थान का हिस्सा 5.93% है (15वें आयोग में 6.03% था)।
1.5 समन्वय के मंच — सहकारी संघवाद के औज़ार

| मंच | आधार और गठन | अध्यक्ष | भूमिका |
|---|---|---|---|
| अंतर्राज्यीय परिषद् | अनुच्छेद 263; सरकारिया आयोग की सिफ़ारिश पर 1990 में राष्ट्रपति के आदेश से | प्रधानमंत्री | केंद्र-राज्य और अंतर्राज्यीय मुद्दों पर विचार; 2024 में पुनर्गठित; अब तक 11 बैठकें, अंतिम जुलाई 2016 में; स्थायी समिति के अध्यक्ष केंद्रीय गृह मंत्री |
| क्षेत्रीय परिषदें | राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 — 5 परिषदें (उत्तरी, मध्य, पूर्वी, पश्चिमी, दक्षिणी); पूर्वोत्तर परिषद् अलग क़ानून (1971) से | केंद्रीय गृह मंत्री | पड़ोसी राज्यों के साझा मुद्दे; राजस्थान उत्तरी क्षेत्रीय परिषद् का सदस्य |
| नीति आयोग | 1 जनवरी 2015, कार्यपालिका संकल्प से (योजना आयोग के स्थान पर) | प्रधानमंत्री | शासी परिषद् में सभी मुख्यमंत्री; "टीम इंडिया" और सहकारी-प्रतिस्पर्धी संघवाद |
| GST परिषद् | अनुच्छेद 279क (2016) | केंद्रीय वित्त मंत्री | अप्रत्यक्ष करों पर साझा निर्णय |
| वित्त आयोग | अनुच्छेद 280; हर पाँच वर्ष पर | राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त | करों का ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज बँटवारा |
शास्त्रीय अर्थ: वह व्यवस्था जिसमें केंद्र और राज्य प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि साझा लक्ष्यों के लिए मिलकर काम करने वाले साझेदार होते हैं।
सरल भाषा में: केंद्र और राज्य एक ही टीम के खिलाड़ी हैं — गोल एक है, भले पोज़ीशन अलग-अलग हों। उदाहरण: GST परिषद् में सभी राज्य मिलकर कर-दरें तय करते हैं; नीति आयोग की शासी परिषद् में मुख्यमंत्री विकास की रणनीति पर चर्चा करते हैं। जब राज्य आपस में निवेश, स्वच्छता या शिक्षा के सूचकांकों पर बेहतर रैंक के लिए होड़ करते हैं, तो उसे "प्रतिस्पर्धी संघवाद (Competitive Federalism)" कहते हैं।
1.6 केंद्र-राज्य संबंधों पर आयोग और समितियाँ

- प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (1966-70) — इसके अध्ययन दल (अध्यक्ष एम.सी. सीतलवाड) के आधार पर आयोग ने "केंद्र-राज्य संबंध" पर अपनी 12वीं रिपोर्ट (जून 1969) दी। मुख्य सुझाव: अनुच्छेद 263 के तहत अंतर्राज्यीय परिषद् बने जिसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री हों; राज्यपाल ऐसे व्यक्ति बनें जिन्हें प्रशासन और सार्वजनिक जीवन का लंबा अनुभव हो, जिनकी छवि निष्पक्ष हो और जिनकी पुनर्नियुक्ति न हो।
- राजमन्नार समिति (1969-71) — तमिलनाडु सरकार द्वारा न्यायमूर्ति पी.वी. राजमन्नार की अध्यक्षता में गठित; राज्यों को अधिक स्वायत्तता, अनुच्छेद 356 हटाने और अवशिष्ट शक्तियाँ राज्यों को देने का सुझाव।
अध्यक्ष: न्यायमूर्ति रणजीत सिंह सरकारिया | गठन: 1983, रिपोर्ट: 1988 (1600 पृष्ठ, 247 सिफ़ारिशें) | अन्य सदस्य: बी. शिवरामन, डॉ. एस.आर. सेन
- उद्देश्य: केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा कर संघीय ढाँचे को सुदृढ़ करने हेतु सिफ़ारिशें देना। आयोग ने कहा कि देश की एकता और अखंडता के लिए मज़बूत केंद्र अनिवार्य है — पर मज़बूत केंद्र का अर्थ कमज़ोर राज्य नहीं।
- अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) का प्रयोग केवल अंतिम उपाय (Last Resort) के रूप में, अत्यंत संयम से करने की सिफ़ारिश।
- राज्यों को अधिक वित्तीय स्वायत्तता देने और राजकोषीय संघवाद (Fiscal Federalism) मज़बूत करने की सिफ़ारिश।
- राज्यपाल की नियुक्ति और भूमिका में निष्पक्षता — राज्यपाल राजनीतिक रूप से तटस्थ हो, उस राज्य का निवासी न हो, और नियुक्ति से पहले मुख्यमंत्री से परामर्श हो।
- स्थायी अंतर्राज्यीय परिषद् (Inter-State Council) की स्थापना का सुझाव — ताकि केंद्र-राज्य संवाद और सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) को संस्थागत रूप मिले (यह परिषद् बाद में 1990 में अनुच्छेद 263 के तहत वास्तव में स्थापित की गई)।
- समवर्ती सूची पर क़ानून बनाने से पहले केंद्र राज्यों से परामर्श करे; इंजीनियरिंग, चिकित्सा, शिक्षा जैसे क्षेत्रों में नई अखिल भारतीय सेवाएँ बनें; राष्ट्रीय विकास परिषद् का नाम "राष्ट्रीय आर्थिक एवं विकास परिषद्" हो।
अध्यक्ष: न्यायमूर्ति मदन मोहन पूंछी (पूर्व मुख्य न्यायाधीश, भारत) | गठन: अप्रैल 2007, रिपोर्ट: मार्च 2010 (7 खंड, 273 सिफ़ारिशें)
- राज्यपाल की नियुक्ति राज्य से बाहर के व्यक्ति की हो, ताकि निष्पक्षता और संतुलित शासन सुनिश्चित हो; नियुक्ति से कम से कम दो वर्ष पहले से वह सक्रिय राजनीति में न हो।
- राज्यपाल का कार्यकाल निश्चित 5 वर्ष का हो, तथा हटाने की प्रक्रिया राज्य विधानसभा द्वारा महाभियोग जैसी प्रक्रिया से हो (मनमाने ढंग से नहीं) — यानी "प्रसादपर्यंत सिद्धांत" समाप्त हो।
- राज्यपाल की नियुक्ति प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, लोकसभा अध्यक्ष और संबंधित मुख्यमंत्री की समिति करे; राज्यपाल विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति (Chancellor) न बनें।
- आपातकालीन प्रावधानों का "स्थानीयकरण (Localising)" — अनुच्छेद 355-356 के तहत पूरे राज्य के बजाय केवल प्रभावित ज़िले या क्षेत्र में ही केंद्रीय शासन लगाने का सुझाव, अधिकतम तीन माह के लिए।
- समवर्ती सूची के विषयों पर विधेयक लाने से पहले अंतर्राज्यीय परिषद् के माध्यम से राज्यों से परामर्श।
- निष्कर्ष: "सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism)" ही भारत की एकता, अखंडता और विकास के लिए अनिवार्य है।
सोचिए एक संयुक्त परिवार में बड़ा भाई (केंद्र) घर का मुखिया है, पर हर छोटे भाई (राज्य) का भी अपना कमरा और निर्णय-अधिकार है। सामान्य दिनों में हर भाई अपने कमरे का फ़ैसला ख़ुद लेता है (राज्य सूची के विषय), पर घर में आग लगे (आपातकाल) तो बड़ा भाई पूरे घर का नियंत्रण अपने हाथ में ले सकता है। सरकारिया और पूंछी आयोग बस यही सुनिश्चित करने की कोशिश करते हैं कि बड़ा भाई अपनी ताक़त का दुरुपयोग न करे, और छोटे भाइयों को उचित सम्मान और स्वायत्तता मिले।
पार्वती-कालीसिंध-चंबल एवं पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना (PKC-ERCP): पूर्वी राजस्थान के 13 जिलों में पेयजल और सिंचाई हेतु प्रस्तावित इस बहुराज्यीय नदी-जोड़ो परियोजना पर वर्षों तक राजस्थान, मध्य प्रदेश और केंद्र के बीच सहमति नहीं बन पा रही थी। अंततः 28 जनवरी 2024 को तीनों पक्षों के बीच समझौता ज्ञापन (MoU) और 5 दिसंबर 2024 को समझौता करार (MoA) हस्ताक्षरित हुआ — जिसमें राजस्थान और मध्य प्रदेश दोनों राज्यों में 2.8 लाख हेक्टेयर से अधिक सिंचाई क्षेत्र शामिल है।
अद्यतन: संशोधित परियोजना को अब "राम जल सेतु लिंक परियोजना" कहा जाता है। प्रधानमंत्री ने 17 दिसंबर 2024 को जयपुर में इसकी आधारशिला रखी। संशोधित रूप में इससे पूर्वी राजस्थान के 17 जिलों को लाभ बताया गया है (मूल योजना 13 जिलों की थी; जिलों के पुनर्गठन के कारण गिनती बदली)।
यह उदाहरण दर्शाता है कि अनुच्छेद 262-263 के अंतर्गत अंतर्राज्यीय जल-विवाद केंद्र की मध्यस्थता और सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) से किस प्रकार सुलझाए जा सकते हैं।
सोचिए तीन पड़ोसी घरों को एक ही नाली या पाइपलाइन से पानी बाँटना है, पर हर घर अपने हिस्से को लेकर झगड़ता रहे तो पानी कभी नहीं बँटेगा। ऐसे में एक बुज़ुर्ग (केंद्र सरकार) बीच में आकर तीनों को बिठाकर एक लिखित समझौता करवा दे, जिसमें साफ़ लिखा हो कि किसे कितना पानी मिलेगा — यही राजस्थान-मध्य प्रदेश-केंद्र के बीच PKC-ERCP समझौते ने किया, दशकों की खींचतान के बाद पानी के बँटवारे पर तीनों पक्षों को एक मेज़ पर ला दिया।
2राज्यपाल विवाद — नवीनतम सर्वोच्च न्यायालय निर्णय (2025)
राज्यपाल (अनुच्छेद 153-162) राज्य का संवैधानिक प्रमुख है, पर उसकी नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं (अनुच्छेद 155) और वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद पर रहता है (अनुच्छेद 156)। इस प्रकार वह एक साथ दो भूमिकाएँ निभाता है — राज्य मंत्रिपरिषद् की सलाह पर काम करने वाला संवैधानिक प्रमुख, और केंद्र तथा राज्य के बीच की कड़ी। यही दोहरी भूमिका विवाद की जड़ है।
विवाद के प्रमुख बिंदु: (1) त्रिशंकु विधानसभा में मुख्यमंत्री की नियुक्ति में विवेकाधिकार; (2) अनुच्छेद 356 के लिए राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेजना; (3) विधानसभा सत्र बुलाने में देरी; (4) विधेयकों पर निर्णय टालना; (5) विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति पर राज्य सरकार से टकराव। बी.पी. सिंघल बनाम भारत संघ (2010) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि केंद्र में सरकार बदलने मात्र से राज्यपाल को मनमाने ढंग से नहीं हटाया जा सकता।

तमिलनाडु विधानसभा द्वारा पारित 10 विधेयकों को राज्यपाल ने वर्षों तक अनिश्चितकाल के लिए रोके रखा, और दोबारा पारित होने के बाद राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखा (जैसे तमिलनाडु विश्वविद्यालय विधि संशोधन विधेयक, जो 11 मई 2022 को पारित हुआ पर 17 महीनों तक कोई निर्णय नहीं आया)।
सर्वोच्च न्यायालय (न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और आर. महादेवन की पीठ) ने ऐतिहासिक निर्णय देते हुए कहा कि अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल को कोई "पूर्ण वीटो (Absolute Veto)" या "जेब वीटो (Pocket Veto)" प्राप्त नहीं है — राज्यपाल विधेयकों पर अनिश्चितकाल तक निर्णय टाल नहीं सकते।
न्यायालय ने स्पष्ट समय-सीमा तय की — मंत्रिपरिषद् की सलाह पर सहमति रोकने या आरक्षित करने हेतु 1 माह, मंत्रिपरिषद् की सलाह के विरुद्ध कार्य हेतु 3 माह, तथा पुनर्विचार के बाद दोबारा प्रस्तुत विधेयकों हेतु 1 माह। अनुच्छेद 142 का प्रयोग करते हुए उन 10 विधेयकों को "मानित स्वीकृति (Deemed Assent)" प्राप्त मान लिया गया।
इस निर्णय के बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अनुच्छेद 143(1) के तहत सर्वोच्च न्यायालय से 14 प्रश्नों पर परामर्शी राय (Advisory Opinion) माँगी — विशेषकर इस पर कि क्या न्यायपालिका राज्यपाल या राष्ट्रपति के लिए समय-सीमा तय कर सकती है। पंजाब, तेलंगाना और केरल में भी इसी प्रकार के राज्यपाल-राज्य सरकार विवाद सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन रहे हैं — यह दर्शाता है कि राज्यपाल की भूमिका आज भी केंद्र-राज्य संबंधों का सबसे संवेदनशील बिंदु बना हुआ है।
अद्यतन — 20 नवंबर 2025 की राय: मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली पाँच-न्यायाधीश संविधान पीठ ने कहा: (1) अनुच्छेद 200 और 201 में कोई समय-सीमा नहीं है, इसलिए न्यायालय राज्यपाल या राष्ट्रपति पर समय-सीमा नहीं थोप सकता; (2) "मानित स्वीकृति" की धारणा संविधान में नहीं है, और अनुच्छेद 142 से भी ऐसा नहीं किया जा सकता; (3) फिर भी राज्यपाल विधेयक को अनिश्चितकाल तक नहीं रोक सकते — लंबी, बिना कारण और अनिश्चित निष्क्रियता की सीमित न्यायिक समीक्षा हो सकती है, जिसमें न्यायालय निर्णय लेने का निर्देश दे सकता है, पर निर्णय के गुण-दोष की जाँच नहीं करेगा।
राय में यह भी कहा गया कि राज्यपाल के पास तीन विकल्प हैं — स्वीकृति देना, राष्ट्रपति हेतु आरक्षित करना, या (धन विधेयक को छोड़कर) टिप्पणी के साथ पुनर्विचार हेतु लौटाना; स्वीकृति रोकने पर विधेयक लौटाना ही होगा। दो प्रश्नों का उत्तर नहीं दिया गया। ध्यान दें कि अनुच्छेद 143 की राय परामर्शी होती है।
जुलाई 2020 में राजस्थान में राजनीतिक संकट के समय राज्य मंत्रिमंडल ने विधानसभा का सत्र बुलाने का प्रस्ताव भेजा, पर राज्यपाल ने कई बार प्रश्न उठाकर प्रस्ताव लौटाया; अंततः अगस्त 2020 में सत्र बुलाया गया। इस घटना ने यह बहस फिर छेड़ी कि सत्र बुलाने (अनुच्छेद 174) में राज्यपाल मंत्रिपरिषद् की सलाह से बँधे हैं या नहीं — नबाम रेबिया (2016) निर्णय के अनुसार, सामान्यतः वे सलाह से बँधे हैं।
हाँ = स्वीकृति | ना = स्वीकृति रोकना (पर विधेयक लौटाना होगा) | लौटा = पुनर्विचार हेतु (धन विधेयक नहीं) | ऊपर = राष्ट्रपति हेतु आरक्षित (अनुच्छेद 201)।
3मंत्री-लोक सेवक संबंध (Minister-Civil Servant Relations)
लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था में मंत्री (राजनीतिक कार्यपालिका) और सिविल सेवक (स्थायी प्रशासनिक तंत्र) के बीच का रिश्ता "नीति (Policy)" और "प्रशासन (Administration)" के बीच के रिश्ते जैसा है — मंत्री दिशा और नीति तय करता है, सिविल सेवक उसे क्रियान्वित करता है। परंतु व्यवहार में यह विभाजन रेखा उतनी स्पष्ट नहीं जितनी सिद्धांत में दिखती है (देखें अध्याय 02 — राजनीति-प्रशासन द्विभाजन)।
संसदीय प्रजातंत्र में दोनों को "प्रशासनिक यान के दो पहिए" कहा जाता है। लोक सेवक केवल नीति लागू ही नहीं करते, बल्कि नीति-निर्माण में आवश्यक आँकड़े, अनुभव और विशेषज्ञ सलाह भी देते हैं। अंतिम निर्णय मंत्री का होता है, क्योंकि जनता और संसद के प्रति उत्तरदायी वही है।

3.1 संवैधानिक स्थिति
- मंत्री संसद या विधानसभा के प्रति सामूहिक रूप से (Collective Responsibility — अनुच्छेद 75(3) और 164(2)) और अपने विभाग हेतु व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होता है।
- सिविल सेवक स्थायी, तटस्थ और गुमनाम रहता है (देखें अध्याय 06 — तटस्थता एवं गुमनामी) — वह सीधे जनता या संसद के प्रति उत्तरदायी नहीं होता; उसकी जवाबदेही मंत्री के माध्यम से होती है।
- आदर्श व्यवस्था में सिविल सेवक मंत्री को "निष्पक्ष और निर्भीक सलाह (Frank and Fearless Advice)" देने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए, भले ही वह सलाह मंत्री की राजनीतिक इच्छा के विरुद्ध ही क्यों न हो।
- कार्य-संचालन नियम (Rules of Business) — अनुच्छेद 77(3) और 166(3) के तहत बने ये नियम तय करते हैं कि कौन-सा निर्णय मंत्री लेगा और कौन-सा सचिव; विभाग का प्रशासनिक प्रमुख सचिव होता है।
घटना: 1957 में जीवन बीमा निगम (LIC) ने उद्योगपति हरिदास मूँधड़ा की संकटग्रस्त कंपनियों के शेयरों में लगभग 1.24 करोड़ रुपये लगाए। संसद में यह मुद्दा फ़िरोज़ गांधी ने उठाया।
जाँच: सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति एम. सी. छागला का एक-सदस्यीय आयोग बना। आयोग ने तत्कालीन वित्त सचिव एच. एम. पटेल की भूमिका पर प्रश्न उठाए और माना कि सचिव के कार्यों के लिए वित्त मंत्री टी. टी. कृष्णमाचारी संवैधानिक रूप से ज़िम्मेदार हैं।
परिणाम: वित्त मंत्री ने 1958 में त्यागपत्र दिया — यह भारत में व्यक्तिगत मंत्री-उत्तरदायित्व (Individual Ministerial Responsibility) का सबसे चर्चित उदाहरण है: अधिकारी की चूक पर भी राजनीतिक ज़िम्मेदारी मंत्री की होती है।
3.2 मंत्री बनाम लोक सेवक — स्वभाव का अंतर
| आधार | मंत्री | लोक सेवक |
|---|---|---|
| चयन | चुनाव और दल में स्थिति के आधार पर | खुली प्रतियोगी परीक्षा — योग्यता के आधार पर |
| कार्यकाल | अस्थायी — चुनाव या मंत्रिमंडल फेरबदल तक | स्थायी — सेवानिवृत्ति तक |
| ज्ञान | प्रायः विभाग के विषय में नौसिखिया (Amateur) | प्रशिक्षित और अनुभवी |
| प्रकृति | राजनीतिक | गैर-राजनीतिक, तटस्थ |
| उत्तरदायित्व | संसद और जनता के प्रति प्रत्यक्ष | मंत्री के माध्यम से अप्रत्यक्ष |
| पहचान | सार्वजनिक, प्रसिद्ध | गुमनाम (Anonymous) |
| मुख्य कार्य | नीति का निर्धारण, जनमत से जोड़ना | नीति-निर्माण में सलाह और क्रियान्वयन |
मंत्री "नौसिखिया" क्यों होता है? तीन कारण बताए जाते हैं — (1) उसकी नियुक्ति राजनीतिक आधार पर होती है (दल में स्थिति, व्यक्तित्व, प्रधानमंत्री की पसंद), किसी परीक्षा से नहीं; (2) उसका कार्यकाल अस्थायी होता है; (3) वह राजनीतिक गतिविधियों — चुनाव-क्षेत्र, दल, संसद — में बहुत व्यस्त रहता है। मनरो (Munro) ने ब्रिटेन का उदाहरण दिया कि वहाँ युद्ध मंत्री कोई दार्शनिक, नौसेना मंत्री व्यापारी या बैरिस्टर और वित्त मंत्री वकील रह चुके थे।
"वित्त मंत्रालय में द्वितीय श्रेणी के क्लर्क का पद पाने के लिए नवयुवक को अंकगणित की परीक्षा उत्तीर्ण करनी पड़ती है, पर वित्त मंत्री अधेड़ उम्र का ऐसा व्यक्ति भी हो सकता है जो दशमलव के छोटे-छोटे बिंदुओं का अर्थ जानने के लिए उत्सुक हो।"
यह कथन व्यंग्य है, पर इसका संदेश गंभीर है — लोकतंत्र में विशेषज्ञता लोक सेवक के पास और वैधता (Legitimacy) मंत्री के पास होती है। अच्छा शासन तभी होता है जब दोनों एक-दूसरे की ताक़त का सम्मान करें। कहा जाता है कि "प्रशासन स्थायित्व का प्रतीक है और मंत्री निरंतरता का"।
3.3 संबंधों में जटिलता — नियंत्रण के चार पहलू
स्वतंत्रता के बाद ये संबंध जटिल हुए, क्योंकि प्रशासन का आकार बहुत बढ़ा, विकास-कार्य बढ़े, गठबंधन सरकारों से मंत्रियों की स्थिति कमज़ोर हुई और प्रशासन का राजनीतिकरण बढ़ा। मंत्री चाहते हैं कि प्रशासक इतने अधीन रहें कि उनकी "तटस्थता" राजनीतिक लक्ष्यों में बाधा न बने; प्रशासक कहते हैं कि "राजनीतिक नियंत्रण का अर्थ राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं" है। प्रशासनिक स्वायत्तता को राजनेता "ग़ैर-ज़िम्मेदारी" कहते हैं, और कठोर नियंत्रण को प्रशासक "राजनीतिक अराजकता"।
- 1. नीति-निर्माण और क्रियान्वयन — अंतिम शब्द मंत्री का; प्रशासक सलाहकार है, पर उसकी सलाह धमकी या दबाव न बने।
- 2. संसदीय लोकतंत्र और प्रत्यायोजित विधान — सत्ता का क्रम संसद से मंत्री और मंत्री से प्रशासन तक जाता है; नियम बनाने का बहुत-सा काम प्रशासन करता है, पर उसकी ज़िम्मेदारी मंत्री की होती है।
- 3. कार्मिक नीति — नियुक्ति, स्थानांतरण, पदोन्नति मंत्री द्वारा तय नीति के परिणाम हैं; यहीं सबसे अधिक टकराव होता है।
- 4. समन्वय — आलोचक कहते हैं कि मंत्री का कठोर नियंत्रण तटस्थता तोड़ता है और भ्रष्टाचार बढ़ाता है; समर्थक कहते हैं कि बिना नियंत्रण के प्रशासक स्वयं निहित स्वार्थ बन जाते हैं।
3.4 तुलनात्मक मॉडल
| देश | संबंध का स्वरूप | मुख्य विशेषता |
|---|---|---|
| ब्रिटेन | तटस्थ, गुमनाम, सामान्यज्ञ लोक सेवा | प्रतिबद्धता के लिए कोई स्थान नहीं; सेवा नीति-निर्माण और क्रियान्वयन दोनों में प्रभावी, पर राजनीति से दूर |
| अमेरिका | अर्ध-राजनीतिक प्रशासन | राष्ट्रपति शीर्ष पदों पर अपने विश्वस्त लोग नियुक्त करते हैं — व्यक्तिगत निष्ठा का महत्व |
| पूर्व सोवियत संघ | विचारधारा से बँधी "कैडर नौकरशाही" | प्रशासक का काम सलाह देना नहीं, दल की नीति को कुशलता से लागू करना |
| फ्रांस | विशिष्ट दर्जे वाली शक्तिशाली नौकरशाही | नौकरशाही राजनीति की "संतुलनकर्ता" — बार-बार बदलती सरकारों के बीच स्थायित्व |
| भारत | मिश्रित | "ब्रिटेन से अधिक राजनीतिक, सोवियत संघ से कम प्रतिबद्ध, अमेरिका की तरह अर्ध-राजनीतिक और फ्रांस की तरह संतुलनकर्ता" |
3.5 व्यावहारिक समस्याएँ
- 1. राजनीतिक हस्तक्षेप — मंत्री द्वारा तबादले, पोस्टिंग और ठेकों में अनुचित हस्तक्षेप, जिससे सिविल सेवक की स्वतंत्र निर्णय-क्षमता प्रभावित होती है।
- 2. "प्रतिबद्ध नौकरशाही (Committed Bureaucracy)" की बहस — क्या सिविल सेवक को सरकार की विचारधारा के प्रति "प्रतिबद्ध" होना चाहिए, या केवल संविधान और क़ानून के प्रति? भारत में यह बहस 1970 के दशक से चली आ रही है (विस्तार अध्याय 06 में)। इस संदर्भ में कहा गया — "यदि हस्तक्षेप प्रशासकों की शिकायत है, तो प्रतिबद्धता मंत्रियों की माँग है।"
- 3. दंडात्मक स्थानांतरण (Punishment Transfers) — निष्पक्ष सलाह देने वाले अधिकारियों को असुविधाजनक पदस्थापन का सामना करना पड़ता है, जिससे "निर्भीक सलाह" व्यवहार में कमज़ोर पड़ती है।
- 4. उत्तरदायित्व का धुंधलापन — जब कोई योजना असफल होती है, तो यह तय करना कठिन होता है कि ग़लती नीति (मंत्री) की थी या क्रियान्वयन (अधिकारी) की — इससे जवाबदेही (देखें अध्याय 03) कमज़ोर पड़ जाती है।
- 5. स्वार्थपूर्ण गठजोड़ (Nexus) — अस्थिर या गठबंधन सरकारों में कुछ अधिकारी और नेता आपसी लाभ के लिए गठजोड़ बना लेते हैं; इससे "नेता का नौकरशाहीकरण और नौकरशाही का राजनीतिकरण" होता है। विद्वानों का मत है कि दोनों के बीच एक स्वस्थ दूरी बनी रहनी चाहिए, और यह देखने का दायित्व प्रधानमंत्री और कैबिनेट सचिव का है।
- 6. मौखिक आदेश — कई बार अधिकारियों को मौखिक निर्देश दिए जाते हैं, जिनकी बाद में कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेता।
3.6 सुधार के सुझाव
- 1. जहाँ नीति स्पष्ट न हो, नीति से हटना पड़े या मंत्री सचिव से असहमत हो — वहाँ निर्णय कारण सहित लिखित हो।
- 2. मंत्री वरिष्ठ अधिकारियों में निडरता और न्याय का वातावरण बनाएँ और उन्हें स्पष्ट तथा निष्पक्ष परामर्श देने के लिए प्रोत्साहित करें।
- 3. प्रधानमंत्री मंत्री और लोक सेवक के बीच अस्वस्थ व्यक्तिगत निष्ठा पनपने से रोकें।
- 4. गंभीर अन्याय, भारी चूक या कुशासन को छोड़कर मंत्री दिन-प्रतिदिन के प्रशासन में हस्तक्षेप न करें; व्यक्तिगत छूट देने के बजाय नियम या नीति पर पुनर्विचार करें।
- 5. सचिव मंत्रियों की राजनीतिक कठिनाइयाँ समझें, और छोटे समायोजन तथा बुनियादी नियम-परिवर्तन में अंतर करें।
- 6. सचिव की मंत्री के प्रति निष्ठा और मंत्री का सचिव के प्रति विश्वास — यही संबंध की नींव है।
- द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (10वीं रिपोर्ट, 2008): नीति-निर्माण और क्रियान्वयन को अलग करना — मंत्रालय नीति बनाएँ और क्रियान्वयन स्वायत्त कार्यकारी अभिकरणों (Executive Agencies) को सौंपा जाए; सिविल सेवा के लिए नया "सिविल सेवा क़ानून" और केंद्रीय सिविल सेवा प्राधिकरण; वरिष्ठ पदों पर न्यूनतम निश्चित कार्यकाल; मंत्री और अधिकारियों के बीच भूमिकाओं का स्पष्ट निर्धारण।
- टी.एस.आर. सुब्रमण्यम बनाम भारत संघ (2013): सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि अधिकारियों के स्थानांतरण के लिए सिविल सेवा बोर्ड बने, उन्हें न्यूनतम निश्चित कार्यकाल मिले, और अधिकारी मौखिक आदेशों पर नहीं, केवल लिखित आदेशों पर काम करें (विस्तार अध्याय 06 में)।
- एपलबी (Paul H. Appleby): लोक सेवकों में "शासन की भावना" और मंत्रियों में "प्रशासन की समझ" हो; मंत्री बनने से पहले कार्यकर्ता, विधायक, सांसद और समिति-सदस्य की सीढ़ियाँ चढ़ी जाएँ ताकि अनुभव आए।
- प्रो. सी.पी. भाम्भरी: मंत्री कमज़ोर हो तो नौकरशाही हावी हो जाती है। उपाय — (1) मंत्री को बाहरी विशेषज्ञ सलाहकार और अपना छोटा सचिवालय मिले; (2) प्रशासन को सतर्कता आयोग, लोकपाल जैसी संस्थाओं से जनता के प्रति जवाबदेह बनाया जाए।
- एस.पी. अय्यर: राजनेताओं और प्रशासकों के बीच नियमित विचार-विमर्श, संयुक्त प्रशिक्षण और अनुभवों का आदान-प्रदान।
- उत्तरदायित्व का स्पष्ट बँटवारा — क़ानूनी दायित्व (मंत्री और सचिव दोनों), राजनीतिक दायित्व (मंत्री — सामूहिक), विभागीय दायित्व (मंत्री) और प्रशासनिक दायित्व (सचिव — नीति के दायरे में दिन-प्रतिदिन के निर्णय)।
इस समिति ने स्पष्ट सुझाव दिया कि मंत्री नीति-निर्धारण करें और नीति लागू करने का दायित्व पूरी तरह लोक सेवकों पर छोड़ दें, उसमें हस्तक्षेप न करें। साथ ही समिति ने मंत्रिमंडल छोटा और सघन रखने और प्रशासन में मानवीय तत्व पर सबसे अधिक बल दिया (विस्तार खंड 5 में)।
क्रिकेट में टीम मैनेजमेंट या कोच (मंत्री) रणनीति और लक्ष्य तय करता है, पर मैदान पर असली फ़ैसले (कब कौन गेंदबाज़ी करे) कप्तान (सिविल सेवक) लेता है। अगर कोच मैदान पर हर छोटी बात में दख़ल देने लगे, तो कप्तान का आत्मविश्वास और स्वतंत्र निर्णय-क्षमता दोनों प्रभावित होंगे। स्वस्थ प्रशासन के लिए ज़रूरी है कि मंत्री बड़ी दिशा तय करे, और अधिकारी को क्रियान्वयन में उचित स्वतंत्रता और सुरक्षा मिले।
4सामान्यज्ञ बनाम विशेषज्ञ (Generalists vs Specialists)
भारतीय प्रशासन में एक पुरानी और सतत बहस है — क्या किसी विभाग (जैसे स्वास्थ्य, सार्वजनिक निर्माण विभाग, सिंचाई) का नेतृत्व एक "सामान्यज्ञ (Generalist — सामान्यतः IAS अधिकारी)" करे, या उस क्षेत्र के "विशेषज्ञ (Specialist — डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक)" को यह ज़िम्मेदारी मिले?
शास्त्रीय अर्थ: ऐसा अधिकारी जिसकी कोई विशेष तकनीकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि आवश्यक नहीं, पर जो नियमों, प्रक्रियाओं और समन्वय में पारंगत हो, और जिसे किसी भी विभाग में लगाया जा सके।
सरल भाषा में: "हर काम सँभाल सकने वाला" प्रबंधक — आज कृषि, कल शिक्षा, परसों राजस्व। उदाहरण: ज़िला कलेक्टर, उपखंड अधिकारी, तहसीलदार, संभागीय आयुक्त, सचिवालय के सचिव।
शास्त्रीय अर्थ: ऐसा अधिकारी जिसकी भर्ती किसी विशिष्ट तकनीकी या व्यावसायिक योग्यता के आधार पर होती है, और जो प्रायः उसी क्षेत्र में पूरा सेवा-काल बिताता है।
सरल भाषा में: "एक काम का गहरा जानकार"। उदाहरण: डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री, सांख्यिकीविद्, प्राध्यापक, कृषि वैज्ञानिक।
4.1 विवाद की जड़
इस विवाद के बीज ब्रिटेन की नॉर्थकोट-ट्रेवेलियन रिपोर्ट (1853) और भारत के लिए मैकाले रिपोर्ट (1854) में हैं। इनका विचार था कि 18 से 22 वर्ष के सामान्य उदार शिक्षा पाए होनहार युवकों को चुना जाए, जो किसी भी काम को सीख सकें — इसे "प्रतिभाशाली नौसिखिए (Gifted Amateur)" का सिद्धांत कहा गया। इसी सोच से भारतीय सिविल सेवा (ICS) बनी, जो स्वतंत्रता के बाद IAS बनी। औपनिवेशिक शासन में मुख्य काम क़ानून-व्यवस्था और राजस्व था, इसलिए सामान्यज्ञ उपयुक्त थे। पर स्वतंत्रता के बाद विकास-कार्य, उद्योग, विज्ञान और तकनीक बढ़े, तब विशेषज्ञों ने बराबरी की माँग उठाई।
ब्रिटेन में फुल्टन समिति (Fulton Committee, 1968) ने सामान्यज्ञ परंपरा की आलोचना करते हुए कहा कि सिविल सेवा में "प्रतिभाशाली नौसिखिए" का दर्शन पुराना पड़ चुका है; विशेषज्ञों को बेहतर दर्जा, उच्च पदों तक पहुँच और सिविल सेवा का व्यावसायीकरण (Professionalisation) होना चाहिए। इसका भारत की बहस पर भी गहरा प्रभाव पड़ा।
4.2 संघर्ष के मुख्य बिंदु — दोनों पक्षों के तर्क
- व्यापक प्रशासनिक अनुभव — कई विभागों में काम करने से समन्वय और नीति-निर्माण की समझ बेहतर।
- निष्पक्ष, सर्वांगीण दृष्टिकोण — किसी एक तकनीकी क्षेत्र के प्रति पक्षपात नहीं।
- अखिल भारतीय सेवा होने से केंद्र-राज्य समन्वय आसान (देखें अध्याय 06)।
- ज़िला प्रशासन का अनुभव — ज़मीनी समस्याओं और जनता की नब्ज़ की पहचान।
- नीति में राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक सभी पहलुओं का संतुलन बिठाने की क्षमता।
- विशेषज्ञ अपने क्षेत्र को ही सबसे महत्वपूर्ण मानता है — सामान्यज्ञ प्राथमिकताएँ तय कर सकता है।
- गहन तकनीकी ज्ञान — जटिल क्षेत्रों (स्वास्थ्य, इंजीनियरिंग, वित्त) में बेहतर निर्णय-क्षमता।
- समय की बचत — विशेषज्ञ को नए सिरे से विषय सीखना नहीं पड़ता, जैसा एक सामान्यज्ञ को हर नई पोस्टिंग पर करना पड़ता है।
- तकनीकी अधिकारियों में असंतोष — उन्हें लगता है कि "ग्लास सीलिंग (Glass Ceiling)" के कारण वे कभी शीर्ष प्रशासनिक पद तक नहीं पहुँच पाते, चाहे वे कितने भी अनुभवी क्यों न हों।
- सामान्यज्ञ को "हरफ़नमौला, पर माहिर किसी में नहीं" कहा जाता है; बार-बार तबादलों से निरंतरता टूटती है।
- आधुनिक कल्याणकारी और तकनीकी राज्य में "प्रतिभाशाली नौसिखिए" का सिद्धांत उपयुक्त नहीं।
- सामान्यज्ञों में लालफ़ीताशाही और औपनिवेशिक अहं की प्रवृत्ति।
- लॉर्ड कर्ज़न: "भारत पर शासन शिमला या कलकत्ता से हो सकता है, पर प्रशासन मैदानों (ज़िलों) से होता है।" — सामान्यज्ञ के ज़िला अनुभव के पक्ष में।
- पॉल एपलबी: "विशेषज्ञता का मूल्य हर प्रकार का संकीर्णतावाद है।"
- हेरोल्ड लास्की: विशेषज्ञ अपने क्षेत्र की गहराई में सामान्य बुद्धि (Common Sense) की बलि चढ़ा देते हैं।
- थॉर्स्टीन वेबलेन: विशेषज्ञता को "प्रशिक्षित अक्षमता (Trained Incapacity)" कहा — यानी एक क्षेत्र का गहरा प्रशिक्षण दूसरे क्षेत्रों को देखने की क्षमता घटा देता है।
- जवाहरलाल नेहरू: "भारत को डॉक्टर, वैज्ञानिक और विशेषज्ञ चाहिए।" और यह भी कि "एक इंजीनियर प्रशासक के रूप में काम कर सकता है, पर प्रशासक इंजीनियर के बिना काम नहीं कर सकता।"
4.3 विशेषज्ञों की प्रमुख शिकायतें
| क्र. | शिकायत |
|---|---|
| 1 | सामान्यज्ञों की तुलना में कम वेतन और कमज़ोर सेवा-शर्तें; पदोन्नति धीमी |
| 2 | सचिवालय के उच्च पद IAS के लिए "आरक्षित" जैसे हैं |
| 3 | बिना तकनीकी ज्ञान के सामान्यज्ञ तकनीकी नीतियाँ बनाते हैं |
| 4 | विशेषज्ञों की सलाह की उपेक्षा; फ़ाइल सचिवालय में सामान्यज्ञों के कई स्तरों से गुज़रती है |
| 5 | ज़िले का प्रमुख सदैव सामान्यज्ञ — विशेषज्ञ विभाग उसके अधीन |
| 6 | विशेषज्ञों का कार्य-मूल्यांकन भी सामान्यज्ञ करते हैं |
| 7 | विशेषज्ञों में गतिशीलता कम — उन्हें दूसरे विभागों या केंद्र में जाने के अवसर कम |
| 8 | कई विशेषज्ञ पदों पर भी सामान्यज्ञ नियुक्त (जैसे सार्वजनिक उद्यमों के प्रबंधक) |
1966-70 | अध्यक्ष: मोरारजी देसाई, फिर के. हनुमंतैया | संबंधित रिपोर्ट: "कार्मिक प्रशासन" (अप्रैल 1969)
- तकनीकी और वैज्ञानिक विभागों में यथासंभव विशेषज्ञों को ही नेतृत्व सौंपने की सिफ़ारिश — विशेषकर जहाँ निर्णयों के लिए गहन तकनीकी ज्ञान अनिवार्य हो।
- आयोग ने कहा कि IAS एक "सामान्यज्ञ सर्वगुण-संपन्न अधिकारी (Generalist All-rounder)" बन गई है, जो सार्वजनिक उद्यमों या भारी उद्योग, इस्पात, पेट्रोलियम जैसे तकनीकी मंत्रालयों में नीति-निर्माण के लिए उपयुक्त नहीं; ऐसे पदों पर विशिष्ट ज्ञान वाले अधिकारी हों।
- IAS का कार्यात्मक क्षेत्र — भू-राजस्व प्रशासन, मजिस्ट्रेट के कार्य और नियामकीय कार्य; बाक़ी क्षेत्रों के लिए कार्यात्मक सेवाएँ (Functional Services) बनें; आठ कार्यात्मक अखिल भारतीय सेवाओं का सुझाव।
- मध्य-स्तर और वरिष्ठ प्रबंधकीय पद सभी सेवाओं के लिए खुले हों, और चयन प्रतियोगिता से हो; "कुछ पदों को केवल सामान्यज्ञों के लिए अब और अधिक समय तक सुरक्षित नहीं माना जाना चाहिए"।
- सामान्यज्ञ अधिकारियों के लिए भी संबंधित क्षेत्र में न्यूनतम विशेष प्रशिक्षण अनिवार्य किए जाने का सुझाव, ताकि वे तकनीकी विभागों को बेहतर समझ सकें।
- सेवाकालीन प्रशिक्षण (In-service Training) को सुदृढ़ करने पर बल, ताकि सामान्यज्ञ-विशेषज्ञ के बीच ज्ञान की खाई कम हो (देखें अध्याय 06 — प्रशिक्षण)।
- करियर की प्रगति में विशेषज्ञों को हतोत्साहित न करने, उन्हें उचित उच्च पदों तक पहुँचने का अवसर देने और समान कार्य के लिए समान वेतन वाला तार्किक वेतन-ढाँचा बनाने की सिफ़ारिश।
डी.एस. कोठारी समिति मुख्यतः संघ लोक सेवा आयोग की भर्ती प्रक्रिया में सुधार हेतु गठित थी — इसी की सिफ़ारिश पर वर्तमान त्रि-चरणीय परीक्षा प्रणाली (प्रारंभिक, मुख्य, साक्षात्कार) अस्तित्व में आई (देखें अध्याय 06)। यद्यपि यह सीधे तौर पर सामान्यज्ञ-विशेषज्ञ विवाद पर केंद्रित नहीं थी, फिर भी इसने वैकल्पिक और विशेष विषयों को परीक्षा प्रणाली में शामिल कर तकनीकी दक्षता को कुछ महत्व दिया।
4.4 समाधान — पदसोपान के चार मॉडल

विभिन्न देशों ने इस विवाद को अलग-अलग ढंग से सुलझाया है। पृथक मॉडल में तकनीकी विभाग पूरी तरह विशेषज्ञों के हाथ में होते हैं। समानांतर मॉडल में सचिव (सामान्यज्ञ) और विभागाध्यक्ष (विशेषज्ञ) साथ-साथ होते हैं — भारत में यही सबसे आम है, जैसे केंद्र में स्वास्थ्य सचिव के साथ स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक। संयुक्त मॉडल में एक ही सचिव के अधीन दोनों मिलकर काम करते हैं। एकीकृत मॉडल में विशेषज्ञ स्वयं प्रशासनिक पद भी सँभालते हैं — पाकिस्तान ने 1973 में यही अपनाया।
- अन्य समाधान: विभागों का कार्यात्मक बँटवारा; नई अखिल भारतीय सेवाएँ (सरकारिया आयोग का भी यही सुझाव); सामान्यज्ञों और विशेषज्ञों का संयुक्त प्रशिक्षण; मुख्यालय के पद दोनों के लिए खुले, क्षेत्रीय तकनीकी पद विशेषज्ञों के लिए; और सार्वजनिक उद्यमों में निदेशक पदों पर सामान्यज्ञों की नियुक्ति बंद करना।
भारतीय रेल प्रबंधन सेवा (IRMS): दिसंबर 2019 में केंद्र सरकार ने रेलवे की आठ अलग-अलग समूह-क सेवाओं (इंजीनियरिंग, यातायात, लेखा आदि) को मिलाकर एक एकीकृत सेवा बनाने का निर्णय लिया, ताकि विभागीय खींचतान ख़त्म हो — यह एकीकृत मॉडल की दिशा में बड़ा प्रयोग है।
पार्श्व प्रवेश (Lateral Entry): 2018 से संयुक्त सचिव, निदेशक और उपसचिव स्तर पर निजी क्षेत्र और शिक्षा-जगत के विशेषज्ञों की भर्ती का प्रयोग हुआ; अगस्त 2024 का 45 पदों का विज्ञापन आरक्षण के प्रश्न पर वापस लिया गया (विस्तार अध्याय 06 में)।
मिशन कर्मयोगी: "नियम-आधारित" के बजाय "भूमिका-आधारित" क्षमता-निर्माण — हर पद के लिए आवश्यक दक्षताओं (Competencies) की सूची, जिससे सामान्यज्ञ अधिकारी भी अपने विभाग का आवश्यक तकनीकी ज्ञान प्राप्त कर सकें।
राजस्थान में सार्वजनिक निर्माण, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य, सिंचाई जैसे तकनीकी विभागों में सचिवालय स्तर पर सचिव (सामान्यतः IAS) होता है, जबकि विभागाध्यक्ष (Head of Department) स्तर पर तकनीकी विशेषज्ञ (जैसे निदेशक चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाएँ, मुख्य अभियंता) होते हैं — यह दोनों के बीच एक व्यावहारिक संतुलन बनाने का प्रयास है, यानी समानांतर मॉडल।
हरिश्चंद्र माथुर समिति (1963) ने सुझाव दिया था कि तकनीकी कार्यक्रमों में सरकार को सलाह देने के लिए विशेषज्ञों को अंशकालिक सलाहकार नियुक्त किया जाए।
सोचिए एक बड़े अस्पताल में एक प्रशासनिक डायरेक्टर हो जो बजट, स्टाफ़ और नीति सँभाले, और एक वरिष्ठ डॉक्टर हो जो इलाज का तकनीकी फ़ैसला ले। अगर डायरेक्टर डॉक्टर के इलाज के फ़ैसलों में दख़ल दे, तो मरीज़ को नुक़सान होगा। लेकिन अगर सिर्फ़ डॉक्टर पूरा अस्पताल भी चलाए, तो बजट-प्रबंधन और बड़ी नीतियों में कमी रह सकती है। सही तरीक़ा है दोनों की भूमिका स्पष्ट रखना और आपसी सम्मान से काम करना — यही सामान्यज्ञ-विशेषज्ञ विवाद का व्यावहारिक हल भी है।
5प्रशासनिक सुधार (Administrative Reforms)
समय के साथ प्रशासनिक ढाँचे में जड़ता (Rigidity), भ्रष्टाचार और अक्षमता आ जाती है — इसे दूर करने हेतु समय-समय पर "प्रशासनिक सुधार आयोग (Administrative Reforms Commission — ARC)" गठित किए गए हैं, जिनकी सिफ़ारिशें आज भी भारतीय प्रशासन का आधार बनी हुई हैं।
कोई भी प्रशासन शून्य में काम नहीं करता — उसे लगातार बदलते सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और तकनीकी परिवेश में काम करना पड़ता है। परिवेश बदलता है, पर प्रशासन की आदतें, नियम और ढाँचे पुराने ही बने रहते हैं। इसी अंतर को पाटने के लिए सोच-समझकर, योजनाबद्ध ढंग से किए गए परिवर्तन को प्रशासनिक सुधार कहते हैं। आरंभ में सुधार को केवल ढाँचे (संरचना) के बदलाव तक सीमित माना जाता था, पर अब इसमें संरचना, प्रक्रिया और व्यवहार — तीनों का परिवर्तन शामिल है।
5.1 अर्थ और परिभाषाएँ
| विद्वान | परिभाषा |
|---|---|
| गेराल्ड काइडेन (Gerald Caiden) | "प्रशासनिक सुधार प्रशासनिक परिवर्तन का कृत्रिम प्रेरण है।" उनके अनुसार, परिवर्तन के स्वाभाविक रूप से होने का इंतज़ार करने के बजाय, बदलते परिवेश में प्रशासन को कृत्रिम तरीक़ों से गति देनी चाहिए। |
| मॉण्टगोमरी (Montgomery) | "प्रशासनिक सुधार से तात्पर्य लोक सेवा के व्यवहार में परिवर्तन लाना है।" |
| लीमैन्स (Leemans) | "प्रशासनिक सुधार प्रशासनिक मशीनरी में उत्प्रेरित (Induced) परिवर्तन लाने की प्रक्रिया है।" |
शास्त्रीय अर्थ: प्रशासन की दक्षता, प्रभावशीलता, जवाबदेही और नागरिक-केंद्रितता बढ़ाने के लिए उसकी संरचना, प्रक्रियाओं और कर्मचारियों के व्यवहार में जान-बूझकर किया गया, योजनाबद्ध परिवर्तन।
सरल भाषा में: पुरानी मशीन की मरम्मत और उसे नए ज़माने के अनुसार अपग्रेड करना। उदाहरण: जन्म प्रमाण-पत्र के लिए दफ़्तर के कई चक्कर लगाने के बजाय ऑनलाइन आवेदन और समय-सीमा में प्रमाण-पत्र मिलना — यह प्रक्रियात्मक और प्रौद्योगिकीय सुधार है।
प्रशासनिक सुधार की आवश्यकता क्यों? (1) कल्याणकारी राज्य के कारण सरकार के कार्यों का भारी विस्तार; (2) नागरिकों की बढ़ती अपेक्षाएँ और जागरूकता; (3) भ्रष्टाचार, लालफ़ीताशाही और देरी; (4) 1991 के बाद उदारीकरण और वैश्वीकरण — सरकार की भूमिका "कर्ता" से "सुविधादाता" की ओर; (5) प्रौद्योगिकी का विकास; (6) नव लोक प्रबंधन (New Public Management) और सुशासन की अवधारणाएँ (देखें अध्याय 01); (7) संसाधनों की कमी — कम लागत में अधिक परिणाम की माँग।

5.2 भारत में प्रशासनिक सुधार — ऐतिहासिक यात्रा

(क) स्वतंत्रता से पहले: ब्रिटिश काल में व्यवस्थित सुधारों की शृंखला दिखती है, पर उनका मूल उद्देश्य औपनिवेशिक शासन को मज़बूत करना था।
| आयोग / समिति | वर्ष | मुख्य योगदान |
|---|---|---|
| ऐचिसन आयोग | 1886 | अनुबंधित (Covenanted) और अननुबंधित सेवाओं का भेद समाप्त कर सेवाओं को तीन श्रेणियों — इंपीरियल (भारतीय सिविल सेवा), प्रांतीय और अधीनस्थ — में बाँटने की सलाह |
| इस्लिंगटन आयोग | 1912 | लोक सेवाओं में भर्ती और नियुक्ति के भारतीयकरण की माँग पर विचार |
| सचिवालय प्रक्रिया समिति | 1919 | भारत सरकार के सचिवालय की प्रक्रिया में सुधार |
| ली आयोग | 1923 | उच्च लोक सेवाओं पर शाही आयोग; लोक सेवा आयोग की स्थापना का सुझाव — इसी से 1926 में संघीय लोक सेवा आयोग का पूर्वज बना |
| टॉटनहम समिति | 1945-46 | युद्धोत्तर पुनर्निर्माण के लिए सचिवालय का पुनर्गठन; विभाजन के कारण अमल नहीं हो सका |
(ख) स्वतंत्रता के बाद (1991 से पहले): लोक-कल्याणकारी राज्य के रूप में सरकार के दायित्व में आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय जुड़ गए, इसलिए प्रशासनिक संस्थाओं के ढाँचे, कार्य-शैली और प्रक्रियाओं में बड़े बदलाव की ज़रूरत पड़ी।
| आयोग / समिति | वर्ष और अध्यक्ष | प्रमुख सुझाव और परिणाम |
|---|---|---|
| सचिवालय पुनर्गठन समिति | 1947 — गिरिजा शंकर बाजपेयी | विभाजन से उपजी अधिकारियों की कमी दूर करना; सचिवालय में प्रक्रियात्मक सुधार |
| मितव्ययता समिति | 1948 — कस्तूरभाई लालभाई | बढ़ते असैनिक व्यय पर नियंत्रण; अनेक मंत्रालयों में मितव्ययता समितियाँ |
| गोपालस्वामी आयंगर प्रतिवेदन | 1949 — एन. गोपालस्वामी आयंगर | संगठन और पद्धति (O&M) इकाई की स्थापना; केंद्रीय मंत्रालयों को चार "ब्यूरो" में पुनर्गठित करने का सुझाव (स्वीकार नहीं हुआ) |
| गोरवाला प्रतिवेदन | 1951 — ए.डी. गोरवाला | दो प्रतिवेदन — "लोक प्रशासन पर प्रतिवेदन" (O&M इकाई, दक्षता और अनुशासन, मंत्री-लोक सेवक के मधुर संबंध, व्हिटले परिषदें, भर्ती और IAS प्रशिक्षण में सुधार) और "सरकारी उद्यमों के दक्ष संचालन" पर |
| एपलबी प्रतिवेदन | 1953 और 1956 — पॉल एच. एपलबी (अमेरिकी विद्वान) | भारत को विश्व के लगभग 12 सबसे विकसित प्रशासन वाले देशों में गिना; परिणाम — भारतीय लोक प्रशासन संस्थान (IIPA, 1954) और केंद्रीय O&M संगठन (1954) |
| वी.टी. कृष्णमाचारी समिति | 1962 | IAS की सीधी भर्ती बढ़ाना, राज्यों में प्रशिक्षण, IAS के लिए पुनश्चर्या पाठ्यक्रम |
| संथानम समिति | 1962-64 — के. संथानम | भ्रष्टाचार-निवारण; केंद्रीय सतर्कता आयोग (1964) की स्थापना; मंत्रियों पर आरोपों की जाँच हेतु राष्ट्रीय संस्था; पर्याप्त वेतन और आवास |
| प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग | 1966-70 — मोरारजी देसाई, फिर के. हनुमंतैया | 20 प्रतिवेदन; लोकपाल-लोकायुक्त, अंतर्राज्यीय परिषद्, निष्पादन बजट (आगे विस्तार) |
| सरकारिया आयोग | 1983-88 — न्यायमूर्ति आर.एस. सरकारिया | केंद्र-राज्य संबंध (खंड 1 में विस्तार) |
अमेरिकी लोक प्रशासन विशेषज्ञ | भारत सरकार के निमंत्रण पर 1952-53 और 1956 में अध्ययन
- पहला प्रतिवेदन (1953) — "भारत में लोक प्रशासन: एक सर्वेक्षण का प्रतिवेदन": भारत को उन लगभग 12 देशों में रखा जिनका प्रशासन पर्याप्त संगठित और विकसित है; पर अत्यधिक केंद्रीकरण, देरी और फ़ाइलों के बहु-स्तरीय प्रवाह की आलोचना की।
- सुझाव: O&M इकाई की स्थापना; लोक सेवकों के प्रशिक्षण हेतु भारतीय लोक प्रशासन संस्थान; सूत्र (Line) और स्टाफ़ (Staff) का अंतर स्पष्ट हो; राज्यों को बहुत अधिक स्वतंत्रता देना उचित नहीं।
- दूसरा प्रतिवेदन (1956) — सरकार के औद्योगिक और वाणिज्यिक उपक्रमों के संदर्भ में; पहले प्रतिवेदन के विपरीत सार्वजनिक निगमों को अधिक स्वायत्तता देने की सिफ़ारिश की, और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की भूमिका को उपक्रमों के लिए अनावश्यक रूप से बाधक बताया।
- मुख्य योगदान: उनकी अनुशंसाओं पर 1954 में भारतीय लोक प्रशासन संस्थान (IIPA) और संगठन एवं पद्धति (O&M) इकाई की स्थापना हुई।
5.3 प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (1966-70)
1965 में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने संसद में कहा था कि अलग-अलग अध्ययन दल स्थिति का सामना नहीं कर पाएँगे, इसलिए पूरे प्रशासन पर विचार करने के लिए एक उच्च-शक्ति प्राप्त आयोग चाहिए। इसी के अनुसार 5 जनवरी 1966 को मोरारजी देसाई की अध्यक्षता में प्रशासनिक सुधार आयोग बना। 1967 में मोरारजी देसाई के उप-प्रधानमंत्री बनने पर के. हनुमंतैया अध्यक्ष बने। आयोग ने 20 अध्ययन दल और 13 कार्यकारी समूह बनाए, जिनमें लगभग 210 विशेषज्ञों ने काम किया।
| क्र. | प्रतिवेदन | वर्ष |
|---|---|---|
| 1 | जन अभियोग (नागरिक शिकायत) निराकरण की समस्याएँ — लोकपाल-लोकायुक्त | 1966 |
| 2 | नियोजन तंत्र (अंतरिम प्रतिवेदन) | 1967 |
| 3 | लोक उपक्रम | 1967 |
| 4 | वित्त, लेखा और लेखा-परीक्षा | 1968 |
| 5 | नियोजन की व्यवस्था | 1968 |
| 6 | आर्थिक प्रशासन | 1968 |
| 7 | भारत सरकार का तंत्र और कार्य-प्रणाली | 1968 |
| 8 | जीवन बीमा प्रशासन | 1968 |
| 9 | केंद्रीय प्रत्यक्ष कर प्रशासन | 1969 |
| 10 | कार्मिक प्रशासन | 1969 |
| 11 | वित्तीय और प्रशासकीय शक्तियों का प्रत्यायोजन | 1969 |
| 12 | केंद्र-राज्य संबंध | 1969 |
| 13 | राज्य प्रशासन | 1969 |
| 14 | संघ शासित क्षेत्र और नेफ़ा (NEFA) का प्रशासन | 1969 |
| 15 | लघु क्षेत्र | 1969 |
| 16 | रेलवे | 1970 |
| 17 | राजकोष | 1970 |
| 18 | भारतीय रिज़र्व बैंक | 1970 |
| 19 | डाक-तार | 1970 |
| 20 | वैज्ञानिक विभाग | 1970 |
कुल 20 प्रतिवेदन | लगभग 537 सिफ़ारिशें (कुछ स्रोत लगभग 580 बताते हैं)
- मंत्रिपरिषद्: केंद्रीय मंत्रिपरिषद् में अधिकतम 45 सदस्य, जिनमें प्रधानमंत्री सहित 16 कैबिनेट मंत्री; संसदीय सचिव का पद समाप्त हो।
- नियोजन: योजना आयोग के सदस्य योग्यता और विशेषज्ञता के आधार पर पूर्णकालिक हों; अन्य मंत्री उसके सदस्य न हों।
- केंद्र-राज्य संबंध: अनुच्छेद 263 के तहत अंतर्राज्यीय परिषद् (अध्यक्ष प्रधानमंत्री); राज्यपाल अनुभवी, निष्पक्ष छवि के हों और उनकी पुनर्नियुक्ति न हो।
- वित्त: विकास-विभागों में निष्पादन बजट (Performance Budgeting); वित्त वर्ष 1 नवंबर से शुरू करने का सुझाव।
- कार्मिक: IAS में भर्ती की अधिकतम आयु 28 वर्ष; कार्यात्मक सेवाओं का गठन; विशेषज्ञों को उच्च पद (खंड 4)।
- जन शिकायत निवारण: मंत्रियों और सचिवों के विरुद्ध शिकायतों के लिए केंद्र में लोकपाल और केंद्र तथा राज्यों में अन्य अधिकारियों के लिए लोकायुक्त — प्रथम ARC ने ही सबसे पहले लोकपाल-लोकायुक्त की सिफ़ारिश की थी (देखें अध्याय 05)।
- मंत्रालयों का पुनर्गठन, सामान्यज्ञ-विशेषज्ञ संतुलन और राज्य प्रशासन में सुधार।
5.4 उदारीकरण के बाद के सुधार (1991 से)
1990 के दशक में नई आर्थिक नीति के साथ प्रशासनिक सुधार का नया दौर शुरू हुआ। पहले बना केंद्रीकृत ढाँचा ढीला किया गया, और 73वें तथा 74वें संविधान संशोधन से पंचायतों और नगरपालिकाओं को संवैधानिक दर्जा मिलने पर राजनीतिक और प्रशासनिक विकेंद्रीकरण की माँग बढ़ी। सरकार की भूमिका को फिर से परिभाषित करने का प्रयास हुआ — "न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन (Minimum Government, Maximum Governance)"।
- कर सुधार समिति (1991) — अध्यक्ष डॉ. राजा जे. चेलैया; कर-ढाँचे के सरलीकरण के साथ इस बात पर बल दिया कि कुशल और सत्यनिष्ठ कर्मचारियों के बिना कोई कर-सुधार सफल नहीं हो सकता।
- पाँचवाँ वेतन आयोग (1994-97) — अध्यक्ष न्यायमूर्ति एस. रत्नवेल पांडियन; पहली बार किसी वेतन आयोग ने प्रशासनिक सुधार आयोग जैसा काम किया। वेतन को दक्षता से जोड़ने, नव लोक प्रबंधन अपनाने, अगले दस वर्षों में कर्मचारियों की संख्या लगभग 30% घटाने, शासकीय गुप्त बात अधिनियम के स्थान पर सूचना का अधिकार, भ्रष्टाचार-निवारण अभिकरण, नागरिक-मित्र और पारदर्शी प्रशासन, और विशेषज्ञों तथा संविदा-नियुक्तियों की सिफ़ारिश की।
- व्यय सुधार आयोग (2001) — अध्यक्ष के.पी. गीताकृष्णन; प्रशासन का आकार सीमित कर ग़ैर-विकासात्मक व्यय घटाने और अनेक मंत्रालयों में अनुपयोगी पद समाप्त करने के सुझाव।
- छठा वेतन आयोग (2006-08) — अध्यक्ष न्यायमूर्ति बी.एन. श्रीकृष्ण; समूह "घ" के पद समाप्त कर कर्मचारियों को प्रशिक्षित कर समूह "ग" में लाने, कार्य-निष्पादन और विशेषज्ञता पर बल। सातवाँ वेतन आयोग (2014-15) — न्यायमूर्ति ए.के. माथुर; नया वेतन मैट्रिक्स, न्यूनतम वेतन 18,000 रुपये, संशोधित सुनिश्चित करियर प्रगति (MACP) का मानदंड "अच्छा" से "बहुत अच्छा" (अध्याय 06 में वेतन आयोगों की तालिका)।
5.5 द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2005-09)
नई आर्थिक नीति और नव लोक प्रबंधन के दौर में प्रशासन के समग्र सुधार की माँग उठी। इसलिए 31 अगस्त 2005 को कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एम. वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता में द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग बना (बाद में वी. रामचंद्रन अध्यक्ष रहे)। आयोग ने जून 2006 से मई 2009 के बीच 15 प्रतिवेदन दिए।
| क्र. | प्रतिवेदन | वर्ष |
|---|---|---|
| 1 | सूचना का अधिकार — सुशासन की "मास्टर की" | 2006 |
| 2 | मानव पूँजी का उपयोग — रोज़गार गारंटी कार्यक्रम | 2006 |
| 3 | संकट प्रबंधन | 2006 |
| 4 | शासन में नैतिकता | 2007 |
| 5 | लोक व्यवस्था | 2007 |
| 6 | स्थानीय शासन | 2007 |
| 7 | संघर्ष समाधान हेतु क्षमता निर्माण | 2008 |
| 8 | आतंकवाद से मुक़ाबला | 2008 |
| 9 | सामाजिक पूँजी — एक साझा नियति | 2008 |
| 10 | कार्मिक प्रशासन का नवीनीकरण | 2008 |
| 11 | ई-शासन को बढ़ावा | 2008 |
| 12 | नागरिक-केंद्रित प्रशासन — शासन का हृदय | 2009 |
| 13 | भारत सरकार का संगठनात्मक ढाँचा | 2009 |
| 14 | वित्तीय प्रबंधन प्रणालियों का सुदृढ़ीकरण | 2009 |
| 15 | राज्य और ज़िला प्रशासन | 2009 |
- सूचना का अधिकार — मास्टर की (Right to Information — Master Key to Good Governance) — पहली रिपोर्ट, जिसने सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI), 2005 के प्रभावी क्रियान्वयन की नींव मज़बूत की; शासकीय गुप्त बात अधिनियम, 1923 को हटाने का सुझाव।
- लोक सेवाओं में नैतिकता (Ethics in Governance) — भ्रष्टाचार-निरोधक उपायों और आचार-संहिता (देखें अध्याय 06) को सुदृढ़ करने की सिफ़ारिश; राष्ट्रीय लोकायुक्त को संवैधानिक दर्जा, प्रधानमंत्री उसके दायरे से बाहर; राज्यों में लोकायुक्त अनिवार्य।
- ई-शासन (E-Governance) — डिजिटल प्रौद्योगिकी के माध्यम से पारदर्शिता और दक्षता बढ़ाने की सिफ़ारिश — मिशन कर्मयोगी और iGOT (देखें अध्याय 06) जैसी पहलों की वैचारिक नींव।
- स्थानीय शासन (Local Governance) — 73वें और 74वें संशोधन (देखें अध्याय 03) के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु सुझाव।
- कार्मिक प्रशासन (10वीं रिपोर्ट): लोक प्रशासन और प्रबंधन के स्नातक पाठ्यक्रमों के लिए राष्ट्रीय लोक प्रशासन संस्थान; हर सरकारी सेवक को आरंभ में और सेवा-काल में समय-समय पर अनिवार्य प्रशिक्षण; पूरे सेवा-काल में दो बार — 14 और 20 वर्ष की सेवा पर — गहन समीक्षा; नया सिविल सेवा क़ानून और केंद्रीय सिविल सेवा प्राधिकरण; ग़ैर-लाभकारी संगठनों में प्रतिनियुक्ति की छूट; अनुच्छेद 310 और 311 के संरक्षण की समीक्षा।
- नागरिक-केंद्रित प्रशासन (12वीं रिपोर्ट): नागरिक घोषणा-पत्र (Citizen's Charter) को प्रभावी बनाना, सेवोत्तम (Sevottam) मॉडल, शिकायत-निवारण तंत्र।
द्वितीय ARC की सुधार-भावना को आगे बढ़ाते हुए सितंबर 2020 में शुरू किए गए मिशन कर्मयोगी का केंद्रीय विचार है — प्रत्येक पद के लिए एक स्पष्ट "क्षमता ढाँचा (Competency Framework)" तय करना, ताकि प्रशिक्षण नियम-आधारित न होकर भूमिका-आधारित (Role-based) हो (विस्तार से देखें अध्याय 06 — iGOT कर्मयोगी प्लेटफ़ॉर्म)। यह द्वितीय ARC की "नागरिक-केंद्रित प्रशासन" और क्षमता-निर्माण संबंधी सिफ़ारिशों का ही आधुनिक, डिजिटल विस्तार है।
प्रशासन में सत्यनिष्ठा (Integrity) बढ़ाने के लिए भारत में कई उपाय एक साथ काम करते हैं: द्वितीय ARC की "शासन में नैतिकता" रिपोर्ट; अखिल भारतीय सेवा और केंद्रीय सिविल सेवा आचरण नियम (अध्याय 06); लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 (अध्याय 05); सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005; केंद्रीय सतर्कता आयोग; संपत्ति की वार्षिक घोषणा; भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (2018 में संशोधित); और ई-शासन, जिससे अधिकारी और नागरिक के बीच सीधे संपर्क और विवेकाधिकार घटते हैं।
5.6 हाल के प्रमुख प्रशासनिक सुधार
| सुधार | वर्ष | क्या बदला |
|---|---|---|
| स्व-सत्यापन (Self-attestation) | 2014 | प्रमाण-पत्रों को राजपत्रित अधिकारी से सत्यापित कराने की अनिवार्यता हटाई गई |
| प्रगति (PRAGATI) | 2015 | प्रधानमंत्री द्वारा परियोजनाओं और शिकायतों की वीडियो-कॉन्फ़्रेंस से सीधी समीक्षा |
| निचले पदों पर साक्षात्कार की समाप्ति | 2016 (1 जनवरी से) | केंद्र सरकार के समूह "ग" और अराजपत्रित समूह "ख" पदों पर साक्षात्कार समाप्त — पक्षपात की संभावना घटी |
| केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण प्रणाली (CPGRAMS) | निरंतर | ऑनलाइन शिकायत, निगरानी और समय-सीमा में निपटारा |
| ई-ऑफ़िस | निरंतर | काग़ज़ी फ़ाइल की जगह डिजिटल फ़ाइल — तेज़ और पारदर्शी |
| मिशन कर्मयोगी | 2020 | भूमिका-आधारित, निरंतर ऑनलाइन क्षमता-निर्माण |
| जन विश्वास (प्रावधानों में संशोधन) अधिनियम | 2023 | 42 केंद्रीय क़ानूनों के 183 प्रावधानों को अपराध की श्रेणी से हटाया — छोटी चूक पर जेल नहीं, अर्थदंड; "व्यापार में सुगमता" और "जीवन में सुगमता" |
5.7 DARPG और सुशासन सूचकांक (Good Governance Index — GGI)
प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत विभाग (Department of Administrative Reforms and Public Grievances — DARPG) भारत सरकार की वह नोडल एजेंसी है जो प्रशासनिक सुधारों को लागू करने और निगरानी करने का कार्य करती है। यह कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय के अंतर्गत है। यह सुशासन पर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय सम्मेलन, ई-शासन पर राष्ट्रीय सम्मेलन, लोक प्रशासन में उत्कृष्टता के लिए प्रधानमंत्री पुरस्कार (हर वर्ष 21 अप्रैल — सिविल सेवा दिवस पर) और सुशासन सप्ताह (दिसंबर) आयोजित करता है।
- सुशासन सूचकांक (Good Governance Index — GGI) — DARPG द्वारा 25 दिसंबर 2019 (सुशासन दिवस) को शुरू किया गया — 10 क्षेत्रों (कृषि एवं संबद्ध क्षेत्र, वाणिज्य एवं उद्योग, मानव संसाधन विकास, लोक स्वास्थ्य, सार्वजनिक अवसंरचना एवं उपयोगिताएँ, आर्थिक शासन, समाज कल्याण एवं विकास, न्यायपालिका एवं लोक सुरक्षा, पर्यावरण, नागरिक-केंद्रित शासन) में राज्यों की रैंकिंग। 2021 के संस्करण में 58 संकेतक थे।
- नवीनतम स्थिति: GGI का अंतिम प्रकाशित संस्करण 2021 (GGI 2020-21) का है; 2023 संस्करण जारी नहीं किया गया, अगला संस्करण बाद में प्रस्तावित है। राजस्थान पूर्व सूचकांकों में न्यायपालिका-लोक सुरक्षा, पर्यावरण और नागरिक-केंद्रित शासन क्षेत्रों में अपने समूह में शीर्ष पर रहा है। अद्यतन (अक्टूबर 2026 तक): सरकारी स्रोतों में अब भी GGI 2020-21 ही नवीनतम प्रकाशित संस्करण के रूप में उद्धृत है।
5.8 राजस्थान में प्रशासनिक सुधार
प्रशासन का मुख्य उद्देश्य मानव समाज का समग्र विकास है, और प्रशासनिक सुधार इसी के लिए प्रशासन को सक्षम बनाते हैं। राजस्थान परंपरागत रूप से सामंतवादी राज्य रहा, इसलिए स्वतंत्रता के बाद यहाँ प्रशासनिक सुधार की चुनौती संगठनात्मक कम और व्यवहारात्मक अधिक थी, क्योंकि प्रशासन का लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति झुकाव कम था।
- 1. मंत्रिमंडल छोटा और सघन हो।
- 2. प्रशासन में मानवीय तत्व पर सबसे अधिक बल — "मानवीय तत्व की गुणवत्ता और उसका प्रबंधन प्रशासन पर गहरा प्रभाव रखता है।"
- 3. मंत्री नीति-निर्धारण करें और नीति लागू करने का दायित्व पूरी तरह लोक सेवकों को सौंपें।
- 4. सरकार की कार्यकारी शक्तियों के विरुद्ध जनता की वैध शिकायतों के लिए राज्य में लोकपाल की नियुक्ति।
- 5. तकनीकी कार्यक्रमों में विशेषज्ञों को अंशकालिक सलाहकार बनाया जाए।
- 6. सचिवालय केवल पर्याप्त महत्व वाले और नीतिगत मामलों पर ध्यान दे।
- 7. सचिवालय की संरचना ऐसी हो कि निर्णय लेने वाले अधिकारियों की संख्या बढ़े।
- 8. ज़िलाधीश की राय पर सरकार पर्याप्त ध्यान दे और उसे विभागों से व्यावसायिक सलाह मिले।
- 9. ज़िला स्तर पर जनता की कठिनाइयाँ सामने लाने के लिए प्रतिनिधि समिति।
- 10. अनूठा भर्ती-सुझाव: सामान्य सेवाओं में भर्ती मैट्रिक उत्तीर्ण होने पर ही कर ली जाए; चयनित विद्यार्थियों को राज्य के विशेष संस्थान में डिग्री, प्रशिक्षण और प्रशासनिक ज्ञान देकर, तीन वर्ष का पाठ्यक्रम पूरा होने पर योग्यता के अनुसार नियुक्ति।
- 11. स्थानीय स्वशासन, लोक-संबंध, तकनीकी दक्षता, वित्त, प्रक्रिया और राजस्व मंडल पर भी प्रतिवेदन। (पर राज्य सरकार ने इन्हें लागू करने में विशेष रुचि नहीं दिखाई।)
शिवचरण माथुर प्रशासनिक सुधार आयोग (1999): 11 मई 1999 को पूर्व मुख्यमंत्री शिवचरण माथुर की अध्यक्षता में बने इस आयोग को प्रशासन में ईमानदारी, कार्यकुशलता, मितव्ययता, पारदर्शिता, संवेदनशीलता, नियमों के सरलीकरण और जन-शिकायत निवारण पर सुझाव देने का दायित्व मिला। इसने राजस्व प्रशासन, शहरी कर, स्थानांतरण नीति, जन-शिकायत निवारण, ऊर्जा क्षेत्र सुधार, पंचायती राज और पुलिस प्रशासन पर प्रतिवेदन दिए।
| विषय | शिवचरण माथुर आयोग के प्रमुख सुझाव |
|---|---|
| राजस्व प्रशासन | पटवारी का पदनाम बदलकर "लेखपाल" हो, ताकि मनोवैज्ञानिक बदलाव आए; पंचायत और पटवार-मंडल तथा तहसील और पंचायत समिति की सीमाएँ एक-सी (सह-सीमावर्ती) हों; उप-तहसील व्यवस्था बनी रहे और उसे अधिक शक्तियाँ मिलें |
| ज़िला प्रशासन | सीधी भर्ती का IAS कम से कम 9 वर्ष और पदोन्नत IAS कम से कम 12 वर्ष की सेवा के बाद ही कलेक्टर बने; ज़िला परिषद् का मुख्य कार्यकारी अधिकारी IAS हो; ज़िला ग्रामीण विकास अभिकरण का ज़िला परिषद् में विलय |
| राजस्व न्यायालय | कलेक्टर, उपखंड अधिकारी, तहसीलदार द्वारा राजस्व न्यायालय का काम देखने की वर्तमान व्यवस्था बनी रहे; अलग राजस्व न्यायिक सेवा आवश्यक नहीं |
| स्थानांतरण नीति | सभी कर्मचारियों पर एक समान नीति; सामान्य स्थानांतरण 1 अप्रैल से 31 मई के बीच; न्यूनतम पदस्थापन अवधि 3 वर्ष (गंभीर शिकायत को छोड़कर) |
| जन-शिकायत | मौजूदा संस्थाएँ अप्रभावी; तुरंत सूचना का अधिकार लागू हो; हर विभाग का नागरिक घोषणा-पत्र प्रकाशित हो |
| राजस्थान की प्रमुख सुधार-पहल | वर्ष | विवरण |
|---|---|---|
| संगठन एवं पद्धति (O&M) संभाग | 1955 | सचिवालय में कार्य-प्रक्रिया का अध्ययन कर अनावश्यक क्रियाएँ हटाना |
| अधिकारी प्रशिक्षण स्कूल | 1957 | 14 नवंबर 1957 को जोधपुर में; 1963 में जयपुर; आज हरिश्चंद्र माथुर राजस्थान राज्य लोक प्रशासन संस्थान (HCM RIPA) |
| पंचायती राज | 1959 | 2 अक्टूबर 1959 को नागौर में प्रधानमंत्री नेहरू द्वारा देश में सबसे पहले शुरुआत |
| लोकायुक्त | 1973 | राजस्थान लोकायुक्त एवं उप-लोकायुक्त अधिनियम, 1973 — मंत्रियों और लोक सेवकों के भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग की जाँच |
| भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो | — | पहले "राज्य अन्वेषण ब्यूरो"; महानिदेशक सीधे मुख्यमंत्री को प्रतिवेदन देते हैं |
| सूचना का अधिकार अधिनियम (राज्य) | 2000 | केंद्रीय क़ानून से पाँच वर्ष पहले — MKSS आंदोलन का परिणाम |
| लोक सेवाओं के प्रदान की गारंटी अधिनियम | 2011 | अधिसूचित सेवाएँ समय-सीमा में; न देने पर 500 से 5,000 रुपये तक दंड; अनावश्यक देरी पर 250 रुपये प्रतिदिन (अधिकतम 5,000) |
| सुनवाई का अधिकार अधिनियम | 2012 | शिकायतकर्ता को निर्धारित समय में सुनवाई का वैधानिक अधिकार |
| जन सूचना पोर्टल | 2019 | सरकारी सूचनाओं का स्वतः सार्वजनिक प्रकटीकरण (विस्तार खंड 6 में) |
5.9 सुधारों की बाधाएँ और आगे की राह
- राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी — आयोग बनते हैं, पर सिफ़ारिशें फ़ाइलों में रह जाती हैं (जैसे हरिश्चंद्र माथुर समिति)।
- नौकरशाही का परिवर्तन-विरोध और निहित स्वार्थ।
- सुधारों को टुकड़ों में लागू करना; समग्र दृष्टि का अभाव।
- सिफ़ारिशों के क्रियान्वयन की निगरानी-व्यवस्था नहीं।
- केंद्र और राज्यों के बीच तालमेल की कमी।
- नागरिकों की सीमित भागीदारी।
- सिफ़ारिशों पर समयबद्ध कार्य-योजना और सार्वजनिक प्रगति-रिपोर्ट।
- व्यवहारात्मक सुधार — प्रशिक्षण, नैतिकता और नागरिक-केंद्रित सोच।
- प्रौद्योगिकी का प्रयोग — पर डिजिटल खाई का ध्यान रखते हुए।
- नीति और क्रियान्वयन का अलगाव, निश्चित कार्यकाल, परिणाम-आधारित मूल्यांकन।
- सामाजिक अंकेक्षण और RTI से जन-भागीदारी।
- राज्यों में स्थायी प्रशासनिक सुधार इकाइयाँ।
6सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit)
सामाजिक अंकेक्षण का अर्थ है — किसी सरकारी योजना पर हुए ख़र्च और उसके वास्तविक परिणामों की जाँच स्वयं लाभार्थी नागरिकों द्वारा, सार्वजनिक रूप से, खुली बैठक (Public Hearing) में करना। यह CAG (देखें अध्याय 05) जैसे औपचारिक और तकनीकी ऑडिट से अलग है — यहाँ आम ग्रामीण नागरिक ही "ऑडिटर" की भूमिका निभाते हैं।
शास्त्रीय अर्थ: समुदाय की सक्रिय भागीदारी से किसी योजना या कार्यक्रम के सरकारी अभिलेखों का ज़मीनी वास्तविकता से मिलान, ताकि उसकी पारदर्शिता, जवाबदेही और प्रभावशीलता जाँची जा सके।
सरल भाषा में: "जिसका पैसा, उसी का हिसाब" — जनता ख़ुद पूछे कि उसके नाम पर जो पैसा आया, वह कहाँ गया। उदाहरण: गाँव में बनी सड़क के बिल में 500 बोरी सीमेंट लिखा है, पर ग्राम सभा में मज़दूर बताते हैं कि काम केवल 10 दिन चला और सड़क आधी ही बनी — यह विसंगति सामाजिक अंकेक्षण पकड़ लेता है।
| आधार | पारंपरिक वित्तीय लेखा-परीक्षा (जैसे CAG) | सामाजिक अंकेक्षण |
|---|---|---|
| कौन करता है | प्रशिक्षित लेखा-परीक्षक | लाभार्थी नागरिक, ग्राम सभा, स्वतंत्र सामाजिक अंकेक्षण इकाई |
| दिशा | ऊर्ध्वाधर — ऊपर से नीचे | क्षैतिज — जनता द्वारा, जनता के सामने |
| मुख्य प्रश्न | क्या ख़र्च नियमों के अनुसार हुआ? | क्या लाभ सही व्यक्ति तक, सही मात्रा में पहुँचा? |
| आधार-सामग्री | खाते, वाउचर, अभिलेख | अभिलेख + लोगों की गवाही + स्थल-निरीक्षण |
| समय | प्रायः काम पूरा होने के बाद | निरंतर और सहभागी |
| परिणाम | संसद या विधानमंडल को प्रतिवेदन | तत्काल सार्वजनिक जवाबदेही, वसूली, सुधार |
6.1 सामाजिक अंकेक्षण का जन्म — राजस्थान
प्रवर्तक: मज़दूर किसान शक्ति संगठन (MKSS) — अरुणा रॉय, निखिल डे, शंकर सिंह | स्थापना: 1 मई 1990, देवडूंगरी गाँव, राजसमंद, राजस्थान
- MKSS ने 1990 के दशक की शुरुआत में मध्य राजस्थान के गाँवों में अकाल राहत कार्यों और सस्ती दर पर राशन वितरण में हो रहे भ्रष्टाचार को उजागर करने हेतु "सामाजिक अंकेक्षण" तकनीक का प्रयोग शुरू किया — सरकारी अभिलेखों (मस्टर रोल) को ग्रामीणों की मौखिक गवाही से मिलाकर फ़र्ज़ी नामों और मज़दूरी में गड़बड़ी पकड़ी।
- 1994-95 में पाली, अजमेर, राजसमंद और भीलवाड़ा ज़िलों के गाँवों में हुई "जन सुनवाइयों" ने दिखाया कि मृत लोगों और बाहर गए लोगों के नाम पर भी मज़दूरी उठाई जा रही थी। सबसे बड़ा प्रश्न यह बना कि ये अभिलेख जनता को देखने कैसे मिलें — यहीं से सूचना के अधिकार की माँग उठी।
- ब्यावर धरना (1996): अप्रैल 1996 में ब्यावर के चांग गेट पर लगभग 40 दिन का धरना — नारा "हम जानेंगे, हम जिएँगे"। इसके परिणामस्वरूप राजस्थान सूचना का अधिकार अधिनियम, 2000 बना।
- MKSS की सबसे बड़ी उपलब्धि — सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act), 2005 का पारित होना, जो सीधे उनके आंदोलन "हमारा पैसा, हमारा हिसाब" से प्रेरित था। रोज़गार गारंटी क़ानून (2005) में सामाजिक अंकेक्षण को शामिल कराने में भी इसकी भूमिका रही।
- MKSS ने 2019 में राजस्थान के जन सूचना पोर्टल (देखें अध्याय 04) के डिज़ाइन में भी योगदान दिया, जो 23 श्रेणियों की सरकारी जानकारी स्वतः सार्वजनिक करता है।
- नवीनतम: 19 अक्टूबर 2024 को ब्यावर (राजस्थान) में "जन RTI संग्रहालय (People's RTI Museum)" की आधारशिला रखी गई — "जश्न-ए-संविधान" कार्यक्रम के दौरान, जो MKSS की तीन दशक लंबी यात्रा का प्रतीक है।
6.2 सामाजिक अंकेक्षण की प्रक्रिया और महत्व

- 1. सरकारी अभिलेखों (मस्टर रोल, बिल, वाउचर) को सार्वजनिक रूप से पढ़ा जाता है। इससे पहले सामाजिक अंकेक्षण इकाई के संसाधन-व्यक्ति अभिलेख जुटाते हैं और घर-घर जाकर मज़दूरों से उनका सत्यापन करते हैं।
- 2. ग्राम सभा में उपस्थित नागरिक अपने अनुभव के आधार पर अभिलेखों की सत्यता जाँचते हैं — जैसे "क्या वाक़ई इतने दिन काम हुआ?"
- 3. विसंगति पाए जाने पर सार्वजनिक रूप से जवाबदेही तय होती है और सुधारात्मक कार्रवाई की सिफ़ारिश होती है — धन की वसूली, दोषी कर्मचारी पर कार्रवाई, लंबित मज़दूरी का भुगतान।
- 4. ग्राम सभा की भूमिका केंद्रीय है — बिना सक्रिय जन-भागीदारी के सामाजिक अंकेक्षण एक औपचारिकता मात्र बनकर रह जाता है।
- 5. अनुवर्ती कार्रवाई (Follow-up) — अगले अंकेक्षण में पिछली सिफ़ारिशों के पालन की जाँच; इसके बिना पूरी प्रक्रिया अधूरी है।
6.3 क़ानूनी आधार
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (MGNREGA), 2005 की धारा 17 सामाजिक अंकेक्षण को अनिवार्य बनाती है — ग्राम सभा ग्राम पंचायत के भीतर सभी परियोजनाओं के क्रियान्वयन की निगरानी करेगी और उनका नियमित सामाजिक अंकेक्षण करेगी, तथा ग्राम पंचायत सभी संबंधित दस्तावेज़ ग्राम सभा को उपलब्ध कराएगी। यह प्रावधान सीधे तौर पर MKSS की तकनीक को क़ानूनी मान्यता देता है।
तथ्य-सुधार: पुराने पाठ में "वर्ष में कम से कम एक बार" लिखा था; वास्तव में योजनाओं की लेखा-परीक्षा नियम, 2011 (Audit of Schemes Rules, 2011) के अनुसार हर ग्राम पंचायत में कम से कम हर छह माह में एक बार सामाजिक अंकेक्षण ग्राम सभा होनी चाहिए। इन नियमों में हर राज्य में सरकार से स्वतंत्र सामाजिक अंकेक्षण इकाई (Social Audit Unit) बनाने का भी प्रावधान है।
अद्यतन (2025-26): संसद ने दिसंबर 2025 में विकसित भारत — रोज़गार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025 (VB-G RAM G) पारित किया, जिसने MGNREGA का स्थान लिया और 1 जुलाई 2026 से लागू हुआ। इसमें प्रति ग्रामीण परिवार 125 दिन के रोज़गार की गारंटी है, और ग्राम सभा द्वारा कम से कम हर छह माह में सामाजिक अंकेक्षण का प्रावधान बनाए रखा गया है; साथ में जियो-टैगिंग, बायोमेट्रिक सत्यापन और साप्ताहिक सार्वजनिक प्रकटीकरण जैसे डिजिटल उपाय जोड़े गए हैं।
- राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 (धारा 28) — उचित मूल्य की दुकानों और लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली का समय-समय पर सामाजिक अंकेक्षण।
- मेघालय सामुदायिक भागीदारी और लोक सेवा सामाजिक अंकेक्षण अधिनियम, 2017 — देश का पहला राज्य, जिसने अनेक विभागों की योजनाओं के सामाजिक अंकेक्षण के लिए अलग क़ानून बनाया।
- सामाजिक न्याय मंत्रालय की योजनाओं का अंकेक्षण — 2021-22 से राज्यों की सामाजिक अंकेक्षण इकाइयों के माध्यम से कई कल्याण-योजनाओं का सामाजिक अंकेक्षण।
- पंचायती राज क़ानून — 73वें संशोधन के बाद ग्राम सभा को पंचायत के कामकाज की समीक्षा का अधिकार; कई राज्यों के पंचायत क़ानूनों में सामाजिक अंकेक्षण का उल्लेख।
6.4 लाभ और चुनौतियाँ
- भ्रष्टाचार और रिसाव (Leakage) पर रोक — फ़र्ज़ी नाम, फ़र्ज़ी बिल पकड़े जाते हैं।
- जवाबदेही — अधिकारी को जनता के सामने जवाब देना पड़ता है।
- ग्राम सभा का सशक्तीकरण और सहभागी लोकतंत्र।
- योजनाओं के वास्तविक प्रभाव की जानकारी — केवल ख़र्च नहीं, परिणाम भी।
- लाभार्थियों में अधिकार-चेतना; अभिलेख-रखाव में सुधार।
- सरकार को प्रतिक्रिया (Feedback) मिलती है, जिससे नीति सुधरती है।
- सामाजिक अंकेक्षण इकाइयों की स्वायत्तता और संसाधनों की कमी।
- स्थानीय प्रभावशाली लोगों का दबाव और धमकी; गवाही देने वालों की सुरक्षा।
- निष्कर्षों पर कार्रवाई और वसूली बहुत कम — अनुवर्ती व्यवस्था कमज़ोर।
- ग्राम सभा में कम उपस्थिति, विशेषकर महिलाओं और वंचित वर्गों की।
- अभिलेख देर से या अधूरे मिलना; अधिकारियों का असहयोग।
- केवल रोज़गार योजना तक सीमित — दूसरे विभागों में प्रसार धीमा।
- आगे की राह: सामाजिक अंकेक्षण पर राष्ट्रीय क़ानून; सामाजिक अंकेक्षण इकाइयों को वैधानिक स्वायत्तता और पर्याप्त धन; बाधा डालने पर दंड; निष्कर्षों और कार्रवाई का ऑनलाइन डैशबोर्ड; CAG द्वारा अंकेक्षण की गुणवत्ता की निगरानी; और सभी कल्याणकारी योजनाओं तक इसका विस्तार।
जन सूचना पोर्टल (2019): सितंबर 2019 में शुरू; सूचना के अधिकार की धारा 4 (स्वतः प्रकटीकरण) की भावना पर आधारित — आवेदन किए बिना ही राशन, पेंशन, रोज़गार, खनन जैसी योजनाओं की जानकारी हर नागरिक को।
जवाबदेही क़ानून की माँग: राज्य बजट (2019 और 2020) में सामाजिक जवाबदेही क़ानून की घोषणा हुई; पूर्व राज्य निर्वाचन आयुक्त राम लुभाया की अध्यक्षता वाली समिति ने फ़रवरी 2020 में "राजस्थान पारदर्शिता और सामाजिक जवाबदेही विधेयक" का प्रारूप दिया, पर यह विधेयक अब तक विधानसभा में पारित नहीं हुआ। इसके समर्थन में 2021-22 में "जवाबदेही यात्रा" भी निकाली गई।
लोक सेवाओं के प्रदान की गारंटी अधिनियम (2011) और सुनवाई का अधिकार अधिनियम (2012) — दोनों का उद्देश्य नागरिक को समय-सीमा में सेवा और सुनवाई का क़ानूनी अधिकार देना है, जो सामाजिक जवाबदेही की ही दिशा है।
सोचिए एक मोहल्ले में चंदा इकट्ठा कर सड़क बनवाई गई। अगर सिर्फ़ मुखिया कहे "पैसा ख़र्च हो गया" और कोई सवाल न पूछे, तो गड़बड़ी की गुंजाइश बनी रहेगी। लेकिन अगर पूरे मोहल्ले को बुलाकर बिल-वाउचर दिखाए जाएँ और हर कोई पूछे "क्या वाक़ई इतनी ईंटें लगीं?" — तो भ्रष्टाचार पकड़ में आ जाएगा। सामाजिक अंकेक्षण ठीक यही करता है, बस पूरे गाँव और सरकारी योजना के स्तर पर — CAG जैसे बड़े ऑडिट के अलावा यह "जनता का अपना ऑडिट" है।
1990 (1 मई) — MKSS का जन्म | 1994 — जन सुनवाइयाँ | 1996 — ब्यावर धरना | 2000 — राजस्थान RTI | 2005 — केंद्रीय RTI और रोज़गार गारंटी क़ानून (धारा 17)।
7सार-तुलना और समय-रेखा
| मुद्दा | मूल प्रश्न | भारतीय व्यवस्था | मुख्य चुनौती |
|---|---|---|---|
| केंद्र-राज्य संबंध | शक्ति किसके पास? | मज़बूत केंद्र; अनुच्छेद 256-263; अंतर्राज्यीय परिषद्, GST परिषद् | अनुच्छेद 356, प्रतिनियुक्ति, वित्तीय निर्भरता |
| राज्यपाल | केंद्र का प्रतिनिधि या संवैधानिक प्रमुख? | अनुच्छेद 200, 201; मंत्रिपरिषद् की सलाह | विधेयकों में देरी; 2025 के निर्णय |
| मंत्री-लोक सेवक | नीति और क्रियान्वयन की सीमा कहाँ? | कार्य-संचालन नियम; तटस्थ, गुमनाम सेवा | हस्तक्षेप, दंडात्मक तबादले, गठजोड़ |
| सामान्यज्ञ-विशेषज्ञ | नेतृत्व किसका? | समानांतर मॉडल; IAS की प्रधानता | विशेषज्ञों का असंतोष, ग्लास सीलिंग |
| प्रशासनिक सुधार | बदलाव कैसे? | दो ARC, वेतन आयोग, मिशन कर्मयोगी | क्रियान्वयन और राजनीतिक इच्छाशक्ति |
| सामाजिक अंकेक्षण | हिसाब कौन ले? | ग्राम सभा; स्वतंत्र अंकेक्षण इकाई | कार्रवाई की कमी, दबाव |
समय-रेखा — प्रशासन के प्रमुख मुद्दों के पड़ाव
| वर्ष/अनुच्छेद | विषय |
|---|---|
| 1853-54 | नॉर्थकोट-ट्रेवेलियन और मैकाले प्रतिवेदन — "प्रतिभाशाली नौसिखिए" सामान्यज्ञ की परंपरा |
| 1886 | ऐचिसन आयोग — सेवाओं का तीन श्रेणियों में विभाजन |
| 1923 | ली आयोग — लोक सेवा आयोग का सुझाव |
| 1953, 1956 | एपलबी प्रतिवेदन; 1954 में IIPA और O&M संगठन |
| 1956 | राज्य पुनर्गठन अधिनियम — 5 क्षेत्रीय परिषदें; सातवें संशोधन से अनुच्छेद 258क |
| 1959 (2 अक्टूबर) | नागौर, राजस्थान — पंचायती राज का शुभारंभ |
| 1963 | हरिश्चंद्र माथुर प्रशासनिक सुधार समिति, राजस्थान |
| 1964 | संथानम समिति की सिफ़ारिश पर केंद्रीय सतर्कता आयोग |
| 1966-70 | प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (प्रथम ARC) — मंत्रालय पुनर्गठन, सामान्यज्ञ-विशेषज्ञ संतुलन, लोकपाल सिफ़ारिश |
| 1968 | फुल्टन समिति (ब्रिटेन) — सिविल सेवा का व्यावसायीकरण |
| 1969-71 | राजमन्नार समिति (तमिलनाडु) — राज्य स्वायत्तता |
| 1973 | राजस्थान लोकायुक्त एवं उप-लोकायुक्त अधिनियम |
| 1976 | डी.एस. कोठारी समिति — वर्तमान त्रि-चरणीय संघ लोक सेवा आयोग परीक्षा प्रणाली की नींव |
| 1983-88 | सरकारिया आयोग — केंद्र-राज्य संबंधों पर 247 सिफ़ारिशें, अनुच्छेद 356 पर संयम |
| 1990 (1 मई) | MKSS की स्थापना, देवडूंगरी, राजस्थान — सामाजिक अंकेक्षण तकनीक का जन्मस्थान |
| 1990 | अंतर्राज्यीय परिषद् (Inter-State Council) की स्थापना — सरकारिया आयोग की सिफ़ारिश का क्रियान्वयन |
| 1994 | एस.आर. बोम्मई निर्णय — अनुच्छेद 356 पर न्यायिक समीक्षा |
| 1996 | ब्यावर धरना — सूचना के अधिकार की माँग |
| 1999 | शिवचरण माथुर प्रशासनिक सुधार आयोग, राजस्थान |
| 2000 | राजस्थान सूचना का अधिकार अधिनियम |
| 2005 | MGNREGA अधिनियम — धारा 17 सामाजिक अंकेक्षण अनिवार्य; RTI अधिनियम पारित — MKSS आंदोलन के दो सबसे बड़े परिणाम |
| 2005-09 | द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (द्वितीय ARC), अध्यक्ष वीरप्पा मोइली — 15 रिपोर्ट: नैतिकता, ई-शासन, स्थानीय शासन आदि |
| 2007-10 | पूंछी आयोग — केंद्र-राज्य संबंधों पर 273 सिफ़ारिशें, राज्यपाल सुधार |
| 2011 | योजनाओं की लेखा-परीक्षा नियम (6-माही सामाजिक अंकेक्षण); राजस्थान लोक सेवा गारंटी अधिनियम |
| 2013 | टी.एस.आर. सुब्रमण्यम निर्णय — सिविल सेवा बोर्ड, न्यूनतम कार्यकाल, लिखित आदेश |
| 2015 (1 जनवरी) | नीति आयोग |
| 2016 / अनुच्छेद 279क | GST परिषद् |
| 2017 | मेघालय सामाजिक अंकेक्षण अधिनियम |
| 2019 (25 दिसंबर) | सुशासन सूचकांक (GGI) शुभारंभ — राज्यों की शासन-गुणवत्ता की तुलनात्मक रैंकिंग; इसी वर्ष राजस्थान जन सूचना पोर्टल और भारतीय रेल प्रबंधन सेवा का निर्णय |
| 2023 | जन विश्वास अधिनियम — 183 प्रावधान अपराधमुक्त |
| 2024 (28 जनवरी / 5 दिसंबर) | PKC-ERCP — MoU और MoA; 17 दिसंबर 2024 को आधारशिला |
| 2024 (19 अक्टूबर) | जन RTI संग्रहालय की आधारशिला, ब्यावर, राजस्थान — MKSS/RTI आंदोलन की विरासत का स्मारकीकरण; इसी वर्ष अंतर्राज्यीय परिषद् का पुनर्गठन |
| 2025 (8 अप्रैल) | तमिलनाडु राज्य बनाम तमिलनाडु राज्यपाल — सर्वोच्च न्यायालय निर्णय; "पॉकेट वीटो" असंवैधानिक, समय-सीमा तय |
| 2025 (13 मई) / अनुच्छेद 143 | राष्ट्रपति संदर्भ — राज्यपाल और राष्ट्रपति की शक्तियों पर 14 प्रश्न |
| 2025 (20 नवंबर) | संदर्भ पर पाँच-न्यायाधीश पीठ की राय — न्यायिक समय-सीमा और मानित स्वीकृति नहीं |
| 2026 | 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट (1 फ़रवरी) — राज्यों का हिस्सा 41%; VB-G RAM G अधिनियम लागू (1 जुलाई) |
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