कल्पना कीजिए एक युवा का सफ़र — वह लाखों प्रतियोगियों में से चुना जाता है (भर्ती), फिर मसूरी या जयपुर की अकादमी में प्रशिक्षण लेता है (प्रशिक्षण), वर्षों की सेवा के बाद वरिष्ठ पद पर पदोन्नत होता है (पदोन्नति), चाहे किसी भी पार्टी की सरकार आए वह निष्पक्ष रहकर काम करता है (तटस्थता), उसकी ग़लती पर मंत्री जवाब देता है, वह ख़ुद नहीं (गुमनामी), और वह एक तय आचार संहिता के दायरे में रहकर ही जीवन जीता है (आचार संहिता)।
यही है "कार्मिक प्रशासन (Personnel Administration)" — यानी सरकार अपने सबसे बड़े संसाधन, अपने मानव-बल (Human Resource) का प्रबंधन कैसे करती है — भर्ती से लेकर सेवानिवृत्ति तक। सरकार की सबसे अच्छी योजना भी उतनी ही अच्छी होती है, जितने अच्छे उसे लागू करने वाले लोग। इसलिए कहा जाता है — "प्रशासन उतना ही अच्छा होता है जितने उसके कर्मचारी।"
राजस्थान का उदाहरण लें — RAS परीक्षा पास करके एक उपखंड अधिकारी (SDM) बनने वाला युवा पहले हरिश्चंद्र माथुर राजस्थान राज्य लोक प्रशासन संस्थान (HCM RIPA), जयपुर में प्रशिक्षण लेता है, फिर किसी उपखंड में तैनात होता है, हर वर्ष उसका कार्य-मूल्यांकन होता है, और लगभग ढाई-तीन दशक बाद वह पदोन्नत होकर IAS बन सकता है। इस पूरे सफ़र के हर पड़ाव के नियम और सिद्धांत ही इस अध्याय का विषय हैं।
1. कार्मिक प्रशासन — अर्थ, परिभाषाएँ, क्षेत्र और महत्व
2. लोक सेवा (Civil Service) — विशेषताएँ, भूमिका; संविधान के अनुच्छेद 309 से 312 और अखिल भारतीय सेवाएँ
3. भर्ती (Recruitment) — दर्शन, प्रकार, प्रक्रिया, परीक्षण, समस्याएँ; मॉर्स्टीन मार्क्स के 4 प्रकार; आरक्षण; पार्श्व प्रवेश
4. प्रशिक्षण (Training) — उद्देश्य, प्रकार, विधियाँ, संस्थान (LBSNAA, HCM RIPA) और मिशन कर्मयोगी
5. पदोन्नति (Promotion) — वरिष्ठता बनाम योग्यता, APAR, विभागीय पदोन्नति समिति; RAS से IAS
6. तटस्थता (Neutrality) और प्रतिबद्ध नौकरशाही (Committed Bureaucracy)
7. गुमनामी (Anonymity) — मंत्रिस्तरीय उत्तरदायित्व और RTI का प्रभाव
8. आचार संहिता (Code of Conduct) और सिविल सेवा के मूल्य — सत्यनिष्ठा, निष्पक्षता, नैतिकता
9. सार-तुलना और समय-रेखा
1कार्मिक प्रशासन — अर्थ, क्षेत्र और महत्व
किसी भी संगठन के पास तीन प्रकार के संसाधन होते हैं — धन (Money), सामग्री (Material) और मनुष्य (Men)। इनमें मनुष्य सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि बाक़ी दोनों संसाधनों का उपयोग भी मनुष्य ही करता है। सरकार में काम करने वाले लाखों कर्मचारियों की भर्ती, प्रशिक्षण, पदस्थापन, पदोन्नति, वेतन, अनुशासन, कल्याण और सेवानिवृत्ति — इन सबके प्रबंधन को कार्मिक प्रशासन कहते हैं। आज इसे "मानव संसाधन प्रबंधन" (Human Resource Management) भी कहा जाने लगा है, क्योंकि कर्मचारी को अब केवल "ख़र्च" नहीं, बल्कि विकसित किया जाने वाला "संसाधन" माना जाता है।
| विद्वान | परिभाषा |
|---|---|
| फ़ेलिक्स नीग्रो | "कार्मिक प्रशासन नए कर्मचारियों के चयन और पुराने कर्मचारियों के उपयोग की ऐसी कला है, जिससे कार्य-बल से अधिकतम गुणवत्ता और मात्रा में उत्पादन और सेवा प्राप्त हो।" |
| पिगर्स और मायर्स | "कार्मिक प्रशासन कर्मचारियों की क्षमताओं को विकसित करने की ऐसी विधि है, जिससे उन्हें अपने काम से अधिकतम संतोष मिले और वे संगठन को अपना सर्वश्रेष्ठ दें।" |
| ऑर्डवे टेड और मेटकाफ़ | "किसी संगठन की उन गतिविधियों का नियोजन, पर्यवेक्षण, निर्देशन और समन्वय, जो न्यूनतम मानवीय प्रयास और घर्षण से तथा कर्मचारियों के कल्याण का ध्यान रखते हुए संगठन के उद्देश्य पूरे करने में योगदान देती हैं।" |
शास्त्रीय अर्थ: संगठन में काम करने वाले मनुष्यों की भर्ती से सेवानिवृत्ति तक की सभी गतिविधियों का नियोजन, संगठन, निर्देशन और नियंत्रण।
सरल भाषा में: सही काम के लिए सही व्यक्ति चुनना, उसे सिखाना, आगे बढ़ाना और संतुष्ट रखना — ताकि वह अपना सर्वश्रेष्ठ दे। उदाहरण: RPSC से RAS का चयन, HCM RIPA में प्रशिक्षण, APAR से मूल्यांकन और पदोन्नति — सब कार्मिक प्रशासन है।

1.1 कार्मिक प्रशासन का क्षेत्र
| क्षेत्र | मुख्य प्रश्न |
|---|---|
| मानव-शक्ति नियोजन (Manpower Planning) | कितने कर्मचारी, किस योग्यता के और कब चाहिए? |
| पद-वर्गीकरण (Classification) | समान कर्तव्य और दायित्व वाले पदों को एक वर्ग में रखना — ताकि "समान काम, समान वेतन" हो |
| भर्ती और चयन | योग्य व्यक्ति कैसे खोजें और चुनें? |
| प्रशिक्षण और विकास | चुने गए व्यक्ति को कार्य के योग्य कैसे बनाएँ और लगातार विकसित करें? |
| पदोन्नति और स्थानांतरण | किसे और किस आधार पर आगे बढ़ाएँ? |
| कार्य-मूल्यांकन | कर्मचारी के प्रदर्शन को कैसे मापें? (APAR) |
| वेतन और सेवा-शर्तें | उचित वेतन, भत्ते, अवकाश, पेंशन — वेतन आयोगों के माध्यम से |
| आचरण और अनुशासन | आचरण नियम, दंड और अपील की व्यवस्था |
| कर्मचारी-संबंध और कल्याण | कर्मचारी संघ, शिकायत-निवारण, मनोबल (देखें अध्याय 04) |
| सेवानिवृत्ति | पेंशन, अनुभव का उपयोग |
1.2 महत्व
- नीति से परिणाम तक का पुल: संसद और मंत्रिमंडल नीति बनाते हैं, पर उसे गाँव-गाँव तक लोक सेवक ही पहुँचाते हैं।
- कल्याणकारी राज्य की ज़रूरत: आज सरकार शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग, डिजिटल सेवाओं तक फैल गई है — इतने बड़े कार्यक्षेत्र के लिए कुशल, प्रशिक्षित और ईमानदार मानव-बल अनिवार्य है।
- निरंतरता और स्थायित्व: सरकारें बदलती हैं, पर स्थायी लोक सेवा प्रशासन को निरंतर चलाती रहती है।
- मनोबल और उत्पादकता: निष्पक्ष भर्ती, पदोन्नति और वेतन से कर्मचारियों का मनोबल बढ़ता है, जिसका सीधा असर सेवा की गुणवत्ता पर पड़ता है (देखें अध्याय 04)।
- जनता का विश्वास: नागरिक सरकार को उसी अधिकारी के व्यवहार से पहचानता है, जो उसके सामने बैठा है — इसलिए अच्छा कार्मिक प्रशासन ही अच्छे शासन की पहचान है।
2लोक सेवा (Civil Service) और उसका संवैधानिक ढाँचा
लोक सेवा (Civil Service) से आशय सरकार के उन स्थायी, वेतनभोगी और पेशेवर कर्मचारियों से है, जो सेना, पुलिस-बल और न्यायपालिका से अलग "असैनिक" प्रशासनिक कार्य करते हैं। हरमन फ़ाइनर ने इसे "अधिकारियों का एक पेशेवर निकाय कहा है — जो स्थायी, वेतनभोगी और कुशल होता है"। मैक्स वेबर की नौकरशाही (देखें अध्याय 02) इसी का आदर्श रूप है।
| लोक सेवा की विशेषताएँ | अर्थ |
|---|---|
| स्थायित्व (Permanence) | सरकार बदलने पर भी अधिकारी बने रहते हैं |
| योग्यता-आधारित भर्ती (Merit) | खुली प्रतियोगी परीक्षा से चयन |
| पदानुक्रम (Hierarchy) | स्पष्ट पद-क्रम और आदेश की शृंखला |
| व्यावसायिकता (Professionalism) | प्रशिक्षित, विशेषज्ञ और करियर-आधारित सेवा |
| राजनीतिक तटस्थता (Neutrality) | दलगत राजनीति से दूरी |
| गुमनामी (Anonymity) | श्रेय और दोष मंत्री का |
| नियम-आधारित कार्य | लिखित नियमों और प्रक्रियाओं के अनुसार निर्णय |
| जवाबदेही | वरिष्ठों, मंत्री, विधायिका, न्यायपालिका और जनता के प्रति |
सरदार पटेल ने 21 अप्रैल 1947 को दिल्ली के मेटकाफ़ हाउस में पहले बैच के अधिकारियों को संबोधित करते हुए लोक सेवकों को "भारत का इस्पाती ढाँचा" (Steel Frame of India) कहा था। इसी की स्मृति में हर वर्ष 21 अप्रैल को "राष्ट्रीय सिविल सेवा दिवस" मनाया जाता है (2006 से)।
2.1 संविधान का भाग XIV — अनुच्छेद 308 से 314

| अनुच्छेद | प्रावधान | व्याख्या |
|---|---|---|
| 309 | भर्ती और सेवा-शर्तें | संसद (केंद्र के लिए) और राज्य विधानमंडल (राज्य के लिए) क़ानून बना सकते हैं; जब तक क़ानून न बने, राष्ट्रपति/राज्यपाल नियम बनाते हैं (जैसे केंद्रीय सिविल सेवा नियम) |
| 310 | प्रसादपर्यंत सिद्धांत (Doctrine of Pleasure) | केंद्र के कर्मचारी राष्ट्रपति के और राज्य के कर्मचारी राज्यपाल के "प्रसाद" (इच्छा) तक पद पर रहते हैं — यह ब्रिटिश परंपरा से आया सिद्धांत है |
| 311 | सुरक्षा-कवच | (1) नियुक्त करने वाले प्राधिकारी से निचला अधिकारी बर्ख़ास्त या पद से हटा नहीं सकता; (2) जाँच और सुनवाई का उचित अवसर दिए बिना बर्ख़ास्तगी, पद से हटाना या पदावनति नहीं |
| 311(2) के अपवाद | सुनवाई की ज़रूरत नहीं | (क) आपराधिक आरोप में दोषसिद्धि; (ख) प्राधिकारी लिखित कारण दे कि सुनवाई व्यावहारिक नहीं; (ग) राष्ट्रपति/राज्यपाल संतुष्ट हों कि राज्य की सुरक्षा के हित में सुनवाई उचित नहीं |
| 312 | अखिल भारतीय सेवाएँ | राज्यसभा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित करे, तो संसद नई अखिल भारतीय सेवा बना सकती है |
| 312A | पुरानी सेवाओं की शर्तें | स्वतंत्रता से पहले की भारतीय सिविल सेवा (ICS) के अधिकारियों की सेवा-शर्तें बदलने की शक्ति (28वाँ संशोधन, 1972) |
| 313-314 | संक्रमणकालीन प्रावधान | पुराने नियमों का जारी रहना |
📌 प्रसादपर्यंत सिद्धांत पर सीमाएँ: भारत में यह सिद्धांत ब्रिटेन की तरह असीमित नहीं है — अनुच्छेद 311 के सुरक्षा-कवच और मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 14, 16) इसे सीमित करते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने यूनियन ऑफ़ इंडिया बनाम तुलसीराम पटेल (1985) में अनुच्छेद 311(2) के अपवादों को वैध माना, पर साथ ही कहा कि इनका प्रयोग मनमाने ढंग से नहीं, ठोस कारणों से ही हो सकता है।
2.2 अखिल भारतीय सेवाएँ (All India Services)
अखिल भारतीय सेवा भारतीय संघवाद की एक अनोखी व्यवस्था है — इन सेवाओं के अधिकारियों की भर्ती और प्रशिक्षण केंद्र करता है, पर वे राज्यों में सेवा करते हैं, वेतन राज्य देते हैं, और ज़रूरत पड़ने पर केंद्र में प्रतिनियुक्ति (Deputation) पर आते हैं। इस तरह ये सेवाएँ केंद्र और राज्यों को प्रशासनिक रूप से जोड़ने वाला "संघीय सेतु" हैं। इनका क़ानूनी आधार अखिल भारतीय सेवा अधिनियम, 1951 है।

| सेवा | गठन | प्रशिक्षण संस्थान | नियंत्रण करने वाला मंत्रालय |
|---|---|---|---|
| भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) | 1947 — भारतीय सिविल सेवा (ICS) का स्थान | लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी, मसूरी | कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन मंत्रालय (DoPT) |
| भारतीय पुलिस सेवा (IPS) | 1948 — भारतीय पुलिस (IP) का स्थान | सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय पुलिस अकादमी, हैदराबाद | गृह मंत्रालय |
| भारतीय वन सेवा (IFoS) | 1966 — अनुच्छेद 312 के अंतर्गत गठित | इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी, देहरादून | पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय |
- राष्ट्रीय एकता — पूरे देश में एक जैसा प्रशासनिक स्तर
- केंद्र-राज्य के बीच समन्वय का सेतु
- राज्यों को उच्च योग्यता वाले अधिकारी मिलते हैं
- अधिकारी स्थानीय दबावों से कुछ हद तक स्वतंत्र रहते हैं
- राष्ट्रीय दृष्टिकोण और स्थानीय अनुभव का मेल
- राज्यों की स्वायत्तता पर प्रश्न — अनुशासन का अंतिम अधिकार केंद्र के पास
- प्रतिनियुक्ति पर टकराव — 2022 में IAS कैडर नियमों में प्रस्तावित संशोधन का कई राज्यों ने विरोध किया
- सामान्यज्ञ (Generalist) बनाम विशेषज्ञ (Specialist) की बहस
- राजनीतिक दबाव में बार-बार स्थानांतरण
- नई अखिल भारतीय सेवाओं (जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, न्यायिक) के प्रस्ताव अब तक लागू नहीं
राज्य स्तर पर अनुच्छेद 309 के अंतर्गत बने सेवा-नियम लागू होते हैं — जैसे राजस्थान प्रशासनिक सेवा नियम, राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1958 और राजस्थान सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1971। राज्य सेवाओं में RAS (राजस्थान प्रशासनिक सेवा), RPS (राजस्थान पुलिस सेवा), राजस्थान लेखा सेवा, राजस्थान तहसीलदार सेवा आदि प्रमुख हैं, जिनकी भर्ती राजस्थान लोक सेवा आयोग, अजमेर करता है (देखें अध्याय 05)। राज्य में अधीनस्थ और मंत्रालयिक पदों की भर्ती राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड करता है।
3भर्ती (Recruitment)
भर्ती का अर्थ है — रिक्त पदों के लिए योग्य उम्मीदवारों को खोजना, आकर्षित करना व चयनित करना। एक कुशल प्रशासन की नींव उसकी भर्ती-प्रक्रिया की निष्पक्षता व गुणवत्ता पर टिकी होती है — वेबर के अनुसार (देखें अध्याय 02) आधुनिक नौकरशाही की पहचान ही यह है कि नियुक्ति तकनीकी योग्यता व खुली प्रतियोगी परीक्षा (Open Competitive Examination) के आधार पर हो, व्यक्तिगत पसंद के आधार पर नहीं।
किंग्सले के शब्दों में — "भर्ती वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा उम्मीदवारों को प्रतियोगी लोक सेवा की ओर आकर्षित किया जाता है।" इसीलिए भर्ती और चयन (Selection) में अंतर किया जाता है — भर्ती का काम है अधिक से अधिक योग्य लोगों को आवेदन के लिए प्रेरित करना (सकारात्मक प्रक्रिया), जबकि चयन का काम है उनमें से सबसे उपयुक्त को छाँटना (छँटनी की प्रक्रिया)। ग़लत भर्ती की क़ीमत सरकार 30-35 वर्ष चुकाती है, क्योंकि एक बार नियुक्त अधिकारी पूरे करियर तक सेवा में रहता है — इसलिए भर्ती को कार्मिक प्रशासन की "आधारशिला" (Cornerstone) कहा जाता है।
3.1 भर्ती का दर्शन — लूट प्रणाली से योग्यता प्रणाली तक
विचारक/प्रवर्तक: फ़्रिट्ज़ मॉर्स्टीन मार्क्स (Fritz Morstein Marx) | वर्ष: वर्गीकरण अध्ययन ("The Administrative State", 1957)
- संरक्षक नौकरशाही (Guardian Bureaucracy): प्लेटो के "संरक्षक" (Guardian) विचार पर आधारित — अधिकारी शैक्षणिक/नैतिक श्रेष्ठता के आधार पर चुने जाते हैं, स्वयं को जनहित का संरक्षक मानते हैं (प्राचीन चीन व प्रशा में उदाहरण)।
- जाति/वर्ग नौकरशाही (Caste Bureaucracy): भर्ती केवल एक विशेष वर्ग/जाति से होती है — निर्णय में भी वर्गगत विचार हावी रहते हैं (प्राचीन समाजों में कुछ वर्गों को ही उच्च पद; इंग्लैंड में अभिजात वर्ग को वरीयता)।
- संरक्षण/भ्रष्ट नौकरशाही (Patronage/Spoils Bureaucracy): राजनीतिक संरक्षकों द्वारा अपने समर्थकों को सरकारी पद बतौर इनाम देना — इसे "लूट प्रणाली" (Spoils System) भी कहते हैं (19वीं सदी अमेरिका में प्रचलित; योग्यता व अनुशासन की कमी के लिए आलोचित)।
- योग्यता नौकरशाही (Merit Bureaucracy): उपरोक्त तीनों की कमियों के जवाब में विकसित — भर्ती स्पष्ट योग्यता व मानकों पर आधारित, सेवा में स्थिरता व राजनीतिक नियंत्रण दोनों सुनिश्चित — आधुनिक भारत सहित अधिकांश लोकतंत्रों में यही मॉडल अपनाया गया है (पेंडलटन अधिनियम, 1883, USA — देखें अध्याय 09)।

सोचिए एक क्रिकेट टीम में सिलेक्टर सिर्फ़ अपने रिश्तेदारों को टीम में चुन ले (संरक्षण/लूट प्रणाली) — टीम कभी नहीं जीतेगी। लेकिन अगर हर खिलाड़ी को एक खुले ट्रायल (Open Competition) से गुज़ार कर, सिर्फ़ प्रदर्शन के आधार पर चुना जाए (योग्यता प्रणाली) — तभी सबसे अच्छी टीम बनेगी। भारत में संघ लोक सेवा आयोग और राजस्थान लोक सेवा आयोग वही "निष्पक्ष ट्रायल" हैं जो सुनिश्चित करते हैं कि प्रशासन में सबसे योग्य लोग ही आएँ।
| वर्ष | देश | योग्यता प्रणाली की ओर क़दम |
|---|---|---|
| 1853-54 | भारत | चार्टर अधिनियम 1853 के बाद मैकॉले समिति (1854) — भारतीय सिविल सेवा में खुली प्रतियोगी परीक्षा (पहली परीक्षा 1855) |
| 1854 | ब्रिटेन | नॉर्थकोट-ट्रेवेलियन प्रतिवेदन — संरक्षण की जगह खुली परीक्षा; 1855 में सिविल सेवा आयोग |
| 1883 | अमेरिका | पेंडलटन अधिनियम — राष्ट्रपति गारफ़ील्ड की एक असंतुष्ट पद-आकांक्षी द्वारा हत्या (1881) के बाद लूट प्रणाली पर रोक |
| 1926 | भारत | लोक सेवा आयोग की स्थापना (देखें अध्याय 05) |
3.2 भर्ती की समस्याएँ — विलोबी के पाँच प्रश्न
- 1. भर्ती का अधिकार किसे हो? — स्वयं विभाग को, या किसी स्वतंत्र आयोग को?
- 2. भर्ती भीतर से हो या बाहर से? — पदोन्नति से या सीधी भर्ती से?
- 3. पदों के लिए योग्यताएँ क्या हों? — शिक्षा, आयु, अनुभव, चरित्र।
- 4. योग्यता जाँचने का तरीक़ा क्या हो? — लिखित परीक्षा, साक्षात्कार, व्यावहारिक परीक्षण।
- 5. भर्ती का प्रशासकीय संगठन कैसा हो? — लोक सेवा आयोग का ढाँचा, स्वतंत्रता और शक्तियाँ।
3.3 भर्ती के प्रकार (Types of Recruitment)
- खुली प्रतियोगी परीक्षा (UPSC/RPSC/SSC) के माध्यम से बाहर से नए उम्मीदवारों की भर्ती।
- ताज़ा विचार व ऊर्जा संगठन में लाती है।
- उदाहरण: सिविल सेवा परीक्षा से सीधे IAS/IPS में चयन।
- लाभ: चयन का दायरा व्यापक; युवा और शिक्षित प्रतिभा; लोकतांत्रिक — सबको समान अवसर।
- दोष: अनुभवहीन लोग ऊँचे पदों पर; पुराने कर्मचारियों में निराशा; प्रशिक्षण पर अधिक ख़र्च।
- संगठन के भीतर मौजूद कर्मचारियों को अनुभव व वरिष्ठता के आधार पर ऊपर उठाना।
- अनुभवी कर्मियों को अवसर व मनोबल बढ़ाता है (देखें अध्याय 04)।
- उदाहरण: राज्य सेवा के अधिकारी का पदोन्नति द्वारा IAS में चयन।
- लाभ: अनुभव का उपयोग; कर्मचारियों में स्थायित्व और निष्ठा; प्रशिक्षण-व्यय कम।
- दोष: चयन का दायरा सीमित; नए विचारों का अभाव; "अंतःप्रजनन" (Inbreeding) और जड़ता।
व्यवहार में संतुलन: भारत में दोनों का मिश्रण है — जैसे IAS के लगभग दो-तिहाई पद सीधी भर्ती से और लगभग एक-तिहाई राज्य सेवाओं से पदोन्नति द्वारा भरे जाते हैं। प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग ने राज्य सेवाओं से पदोन्नति का अंश बढ़ाने का सुझाव दिया था। हाल के वर्षों में पार्श्व प्रवेश (Lateral Entry) के रूप में तीसरा तरीक़ा भी जुड़ा है (देखें 3.7)।
3.4 योग्यताएँ और परीक्षण
| योग्यताएँ | उदाहरण |
|---|---|
| सामान्य योग्यताएँ | नागरिकता, आयु-सीमा (सिविल सेवा परीक्षा में 21 से 32 वर्ष, आरक्षित वर्गों को छूट), अच्छा चरित्र, शारीरिक स्वास्थ्य |
| विशेष योग्यताएँ | शैक्षिक योग्यता (स्नातक), तकनीकी योग्यता (इंजीनियरिंग, चिकित्सा), अनुभव, भाषा-ज्ञान (जैसे RAS में राजस्थानी संस्कृति और हिंदी का ज्ञान) |
| परीक्षण का प्रकार | उद्देश्य | गुण / दोष |
|---|---|---|
| लिखित परीक्षा — वस्तुनिष्ठ | बड़ी संख्या में उम्मीदवारों की तेज़ और निष्पक्ष छँटनी | निष्पक्ष, तेज़; पर रटने को बढ़ावा, गहराई कम |
| लिखित परीक्षा — वर्णनात्मक | विश्लेषण, अभिव्यक्ति और विचार की परख | गहन परख; पर मूल्यांकन में व्यक्तिपरकता |
| मौखिक परीक्षा / साक्षात्कार | व्यक्तित्व, निर्णय-क्षमता, संतुलन | व्यक्तित्व की झलक; पर पूर्वाग्रह और समय की कमी |
| व्यावहारिक (Performance) परीक्षण | काम करने की वास्तविक क्षमता — जैसे टाइपिंग, कंप्यूटर परीक्षण | कुशलता की सीधी जाँच |
| मनोवैज्ञानिक / अभिरुचि परीक्षण | बुद्धि, अभिरुचि (Aptitude), व्यक्तित्व-गुण | वैज्ञानिक; पर भारत में सीमित प्रयोग (सेना के SSB में व्यापक) |
| शिक्षा और अनुभव का मूल्यांकन | वरिष्ठ विशेषज्ञ पदों पर — अंक-आधारित | सरल; पर औपचारिक डिग्री पर अत्यधिक निर्भरता |
3.5 भर्ती की प्रक्रिया और एजेंसियाँ

| चरण | विवरण |
|---|---|
| प्रारंभिक परीक्षा (Preliminary Exam) | वस्तुनिष्ठ (Objective/MCQ) प्रकृति की स्क्रीनिंग परीक्षा — केवल मुख्य परीक्षा हेतु अर्हता (Qualifying) के लिए, मेरिट में अंक नहीं जुड़ते। |
| मुख्य परीक्षा (Main Exam) | वर्णनात्मक (Descriptive) परीक्षा — निबंध, सामान्य अध्ययन व वैकल्पिक/विशिष्ट विषय (जैसे RAS मुख्य परीक्षा का प्रश्नपत्र 3); RAS में नए पैटर्न (2026) अनुसार अब केवल 5 व 10 अंकों के प्रश्न। |
| साक्षात्कार/व्यक्तित्व परीक्षण (Interview/Personality Test) | अंतिम चरण — उम्मीदवार के व्यक्तित्व, निर्णय-क्षमता व प्रशासनिक योग्यता का आकलन; अंतिम मेरिट में मुख्य परीक्षा + साक्षात्कार दोनों के अंक जुड़ते हैं। |
| भर्ती एजेंसी | कार्यक्षेत्र |
|---|---|
| संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) | अखिल भारतीय सेवाएँ और केंद्रीय समूह "क" सेवाएँ (देखें अध्याय 05) |
| कर्मचारी चयन आयोग (SSC) | केंद्र के समूह "ख" (अराजपत्रित) और "ग" पद — 1975 में अधीनस्थ सेवा आयोग के रूप में बना, 1977 में वर्तमान नाम |
| रेलवे भर्ती बोर्ड और बैंकिंग कार्मिक चयन संस्थान (IBPS) | रेलवे और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की भर्ती |
| राष्ट्रीय भर्ती एजेंसी (NRA) | अगस्त 2020 में स्वीकृत — समूह "ख" और "ग" के लिए एक साझा "सामान्य पात्रता परीक्षा" (CET) का प्रस्ताव; बुनियादी ढाँचे की कमी से इसका आरंभ लगातार टलता रहा है |
| राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) | RAS सहित राज्य की राजपत्रित सेवाएँ, स्कूल और कॉलेज व्याख्याता आदि |
| राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड | पटवारी, ग्राम विकास अधिकारी, कनिष्ठ सहायक जैसे अधीनस्थ और मंत्रालयिक पद (पूर्व नाम — राजस्थान अधीनस्थ एवं मंत्रालयिक सेवा चयन बोर्ड) |
3.6 आरक्षण नीति (Reservation Policy)
भारत में सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने हेतु संविधान द्वारा भर्ती में आरक्षण का प्रावधान किया गया है — ताकि ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों को प्रशासन में उचित प्रतिनिधित्व मिल सके। नौकरशाही में समाज के सभी वर्गों के प्रतिनिधित्व की इसी अवधारणा को "प्रतिनिधि नौकरशाही" (Representative Bureaucracy) कहते हैं — यह शब्द जे. डोनाल्ड किंग्सले ने 1944 में दिया था।
| वर्ग | केंद्र सरकार | राजस्थान (राज्य सेवाएँ) |
|---|---|---|
| अनुसूचित जाति (SC) | 15% | 16% |
| अनुसूचित जनजाति (ST) | 7.5% | 12% |
| अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) | 27% | 21% |
| अति पिछड़ा वर्ग (MBC) | — | 5% |
| आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग (EWS) | 10% | 10% |
| संवैधानिक प्रावधान / निर्णय | विवरण |
|---|---|
| अनुच्छेद 16(4) | पिछड़े वर्गों के लिए नियुक्तियों में आरक्षण, जिनका सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं |
| अनुच्छेद 16(4A) — 77वाँ संशोधन (1995) | अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए पदोन्नति में आरक्षण (85वें संशोधन, 2001 से परिणामी वरिष्ठता) |
| अनुच्छेद 16(4B) — 81वाँ संशोधन (2000) | बिना भरे आरक्षित पदों (Backlog) को अगले वर्षों में अलग से भरना — 50% सीमा उन पर लागू नहीं |
| अनुच्छेद 16(6) — 103वाँ संशोधन (2019) | आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों के लिए अधिकतम 10% आरक्षण; जनहित अभियान (2022) में सर्वोच्च न्यायालय ने वैध माना |
| अनुच्छेद 335 | आरक्षण के दावों पर विचार करते समय "प्रशासन की दक्षता" बनी रहे |
| इंद्रा साहनी (1992) | OBC का 27% आरक्षण वैध; "क्रीमी लेयर" बाहर; कुल आरक्षण सामान्यतः 50% से अधिक नहीं; पदोन्नति में आरक्षण नहीं (जिसे बाद में 77वें संशोधन ने बदला) |
| एम. नागराज (2006) और जरनैल सिंह (2018) | पदोन्नति में आरक्षण के लिए पिछड़ेपन, अपर्याप्त प्रतिनिधित्व और दक्षता की शर्तें; 2018 में SC-ST के लिए पिछड़ेपन का आँकड़ा देना ज़रूरी नहीं माना |
| पंजाब राज्य बनाम दविंदर सिंह (1 अगस्त 2024) | राज्य अनुसूचित जाति-जनजाति के भीतर उप-वर्गीकरण कर सकते हैं |
सोचिए एक 400 मीटर की दौड़ में कुछ धावकों को जन्म से ही जूते नहीं मिले, कुछ को शुरुआत में ही रस्सी से बाँध दिया गया था — अब सबको एक ही लाइन से दौड़ाना "बराबरी" नहीं, बल्कि अन्याय होगा। इसलिए जिन्हें पीछे रखा गया था, उन्हें थोड़ा आगे की लाइन से शुरू करने का मौक़ा (आरक्षण) दिया जाता है — ताकि दौड़ सच में बराबरी की हो सके। भर्ती में आरक्षण भी ऐतिहासिक असमानता को पाटने का यही प्रयास है, योग्यता को दरकिनार करना नहीं।
3.7 पार्श्व प्रवेश (Lateral Entry) — इतिहास एवं नवीनतम विवाद
पार्श्व प्रवेश का अर्थ है — पारंपरिक सिविल सेवा परीक्षा के बाहर से, निजी क्षेत्र, शैक्षणिक जगत या अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के विशेषज्ञों को सीधे संयुक्त सचिव/निदेशक/उप सचिव जैसे वरिष्ठ पदों पर भर्ती करना — ताकि विशेषज्ञता (Domain Expertise) की कमी पूरी हो सके। यह विचार नया नहीं है — डॉ. मनमोहन सिंह, मोंटेक सिंह अहलूवालिया और विमल जालान जैसे विशेषज्ञ पहले भी सरकार में सीधे ऊँचे पदों पर लाए गए थे; द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2008) और नीति आयोग ने भी इसकी सिफ़ारिश की थी।
- शुरुआत (2018): जून 2018 में कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने पहली बार निजी क्षेत्र से 10 "विशिष्ट व्यक्तियों" को केंद्र में संयुक्त सचिव (Joint Secretary) स्तर पर भर्ती हेतु आवेदन आमंत्रित किए — न्यूनतम 15 वर्ष के अनुभव की शर्त रखी गई, नियुक्ति 3-5 वर्ष के संविदा (Contract) आधार पर हुई। इस पहले दौर में 9 व्यक्ति विभिन्न मंत्रालयों में चयनित हुए — यह भारतीय नौकरशाही में पार्श्व प्रवेश का औपचारिक शुभारंभ था। बाद की भर्तियाँ संघ लोक सेवा आयोग के माध्यम से हुईं।
- नवीनतम घटनाक्रम (अगस्त 2024): संघ लोक सेवा आयोग ने 17 अगस्त 2024 को 45 पदों (संयुक्त सचिव, निदेशक, उप सचिव) हेतु पार्श्व प्रवेश का विज्ञापन जारी किया। इसमें SC/ST/OBC/EWS आरक्षण का कोई प्रावधान न होने पर विपक्षी दलों व सत्तारूढ़ गठबंधन के कुछ सहयोगी दलों ने भी कड़ा विरोध किया — सामाजिक न्याय व संवैधानिक आरक्षण-व्यवस्था को दरकिनार करने की आशंका जताई गई। परिणामस्वरूप 20 अगस्त 2024 को केंद्र सरकार के अनुरोध पर आयोग ने यह विज्ञापन वापस ले लिया — सरकार ने कहा कि पार्श्व प्रवेश को सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप बनाया जाएगा।
- विशेषज्ञता — अर्थव्यवस्था, तकनीक, ऊर्जा, वित्त जैसे क्षेत्रों में
- नई सोच और निजी क्षेत्र की कार्य-संस्कृति
- तेज़ निर्णय-क्षमता और परिणाम-उन्मुखता
- संयुक्त सचिव स्तर पर अधिकारियों की कमी की पूर्ति
- प्रतिस्पर्धा से स्थायी सेवा में भी सुधार का दबाव
- आरक्षण का अभाव — "एकल पद" के नाम पर सामाजिक न्याय की अनदेखी
- पारंपरिक अधिकारियों में असंतोष और मनोबल पर असर
- हितों का टकराव — निजी कंपनी से आकर नीति बनाना और फिर वापस जाना
- संविदा-आधारित नियुक्ति — जवाबदेही और तटस्थता पर प्रश्न
- सरकारी प्रक्रियाओं से अपरिचय — 3-5 वर्ष में सीखने में ही समय
3.8 भारत की भर्ती-व्यवस्था की कमियाँ और सुधार-समितियाँ
- 1. परीक्षाएँ विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रम पर अधिक, पद के लिए आवश्यक ज्ञान, अभिवृत्ति और कौशल पर कम आधारित।
- 2. रटने और डिग्री-केंद्रित तैयारी को बढ़ावा; मनोवैज्ञानिक परीक्षण की विश्वसनीय प्रणाली का अभाव।
- 3. साक्षात्कार में चयन-मंडल के व्यक्तिगत पूर्वाग्रह का ख़तरा।
- 4. प्रश्नपत्र-लीक, मुक़दमे और परीक्षा-कैलेंडर में देरी — विशेषकर राज्य-स्तर पर।
- 5. लंबी और महँगी तैयारी — आर्थिक रूप से कमज़ोर उम्मीदवारों के लिए कठिन; अलग-अलग पदों के लिए बार-बार परीक्षाएँ।
- 6. भर्ती "सूचनात्मक" है, "आकर्षक" नहीं — योग्य लोगों को सरकारी सेवा की ओर प्रेरित करने का सक्रिय प्रयास कम। पॉल एपलबी ने भारत की भर्ती-व्यवस्था को "कल्पनाशीलता और सुधार के प्रयासों से दूर" पाया था।
| सुधार-समिति | वर्ष | मुख्य सिफ़ारिश |
|---|---|---|
| कोठारी समिति | 1976 | प्रारंभिक, मुख्य और साक्षात्कार — तीन चरण (1979 से लागू); सभी सेवाओं के लिए एक साझा परीक्षा |
| सतीश चंद्र समिति | 1989 | मुख्य परीक्षा में निबंध प्रश्नपत्र जोड़ना (1993 से); साक्षात्कार के अंक बढ़ाना |
| वाई. के. अलघ समिति | 2001 | परीक्षा-पद्धति की समीक्षा; योग्यता-आधारित चयन और प्रशिक्षण से जोड़ना |
| पी. सी. होता समिति | 2004 | अभिरुचि और नैतिकता की परख; प्रवेश की अधिकतम आयु कम करने पर विचार |
| द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग — 10वाँ प्रतिवेदन | 2008 | "कार्मिक प्रशासन का नवीनीकरण" — प्रवेश-आयु 21-25 वर्ष (सामान्य), पार्श्व प्रवेश, दक्षता-आधारित पदस्थापन |
| बासवान समिति | 2016 | आयु-सीमा और प्रयासों की संख्या की समीक्षा |
राज्य में राजपत्रित पदों की भर्ती राजस्थान लोक सेवा आयोग और अधीनस्थ पदों की भर्ती राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड करता है। प्रश्नपत्र-लीक की घटनाओं के बाद राज्य ने राजस्थान सार्वजनिक परीक्षा (भर्ती में अनुचित साधनों की रोकथाम के उपाय) अधिनियम, 2022 बनाया, जिसमें कड़े दंड और संपत्ति ज़ब्ती का प्रावधान है (2023 के संशोधन से अधिकतम दंड आजीवन कारावास); केंद्र ने भी सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधन निवारण) अधिनियम, 2024 बनाया। RAS मुख्य परीक्षा का पैटर्न 2026 से बदला गया है, जिसमें केवल 5 और 10 अंकों के प्रश्न हैं।
संरक्षक (Guardian) — जाति (Caste) — संरक्षण (Patronage) — योग्यता (Merit): "संजा संयो" — "संजा(य) का संयोग"।
केंद्र का आरक्षण — "15-7.5-27-10"; राजस्थान — "16-12-21-5-10"।
4प्रशिक्षण (Training)
चयन के बाद प्रशिक्षण ही वह सेतु है जो एक सामान्य उम्मीदवार को एक सक्षम प्रशासक में बदलता है। जितनी सावधानी भर्ती में बरती जाती है, प्रशिक्षण में उतनी ही सावधानी ज़रूरी है — बिना उचित प्रशिक्षण के सबसे मेधावी अधिकारी भी मैदानी प्रशासन (Field Administration) की जटिलताओं में असफल हो सकता है।
विलियम जी. टॉर्पी के शब्दों में — "प्रशिक्षण कर्मचारियों में ऐसे कौशल, आदतें, ज्ञान और दृष्टिकोण विकसित करने की प्रक्रिया है, जिससे वे अपने वर्तमान पद पर अधिक प्रभावी बनें और भविष्य के ऊँचे पदों के लिए भी तैयार हों।" इस परिभाषा में प्रशिक्षण के तीन तत्व छिपे हैं — ज्ञान (Knowledge — क्या करना है), कौशल (Skill — कैसे करना है) और दृष्टिकोण (Attitude — किस भावना से करना है)।
4.1 प्रशिक्षण के उद्देश्य — एश्टन समिति
ब्रिटेन में सिविल सेवकों के प्रशिक्षण पर बनी एश्टन समिति (1944) ने प्रशिक्षण के उद्देश्य बताए, जो आज भी आधार माने जाते हैं:
- 1. कार्य में दक्षता और परिशुद्धता — कर्मचारी अपना वर्तमान काम ठीक और कुशलता से करे।
- 2. बदलती परिस्थितियों के अनुसार ढलना — नई नीतियों, तकनीकों और सामाजिक ज़रूरतों के साथ तालमेल।
- 3. "यंत्रवत्" होने से बचाना — कर्मचारी केवल नियमों का पुर्ज़ा न बने, बल्कि अपने काम को व्यापक सामाजिक संदर्भ में देखे।
- 4. ऊँचे पदों के लिए तैयारी — भविष्य की बड़ी ज़िम्मेदारियों के लिए क्षमता बढ़ाना।
- 5. मनोबल बढ़ाना — प्रशिक्षण से कर्मचारी को लगता है कि संगठन उसमें निवेश कर रहा है।
4.2 प्रशिक्षण के प्रकार (Types)

- A. आगमनी/नींव प्रशिक्षण (Induction/Foundation Training): सेवा में प्रवेश के तुरंत बाद दिया जाने वाला प्रारंभिक प्रशिक्षण — मूल्यों, नियमों व प्रशासनिक संस्कृति से परिचय।
- B. सेवाकालीन प्रशिक्षण (In-Service Training): सेवा के दौरान समय-समय पर दिया जाने वाला प्रशिक्षण, ताकि अधिकारी नई नीतियों/तकनीकों से अपडेट रहें।
- C. पुनश्चर्या प्रशिक्षण (Refresher Training): वर्षों बाद कौशल को पुनः तरोताज़ा करने हेतु — विशेषकर पदोन्नति से पहले।
- D. औपचारिक बनाम अनौपचारिक: औपचारिक प्रशिक्षण अकादमी में निर्धारित पाठ्यक्रम से होता है; अनौपचारिक प्रशिक्षण वरिष्ठों को देखकर और काम करते-करते मिले अनुभव से।
- E. प्रवेश-पूर्व बनाम प्रवेशोत्तर: प्रवेश-पूर्व प्रशिक्षण विश्वविद्यालयों में (जैसे लोक प्रशासन की पढ़ाई); प्रवेशोत्तर प्रशिक्षण सेवा में आने के बाद।
- वास्तविक कार्यस्थल पर, कार्य करते हुए सीखना।
- उदाहरण: प्रोबेशनर IAS अधिकारी की ज़िले में अटैचमेंट ट्रेनिंग।
- लाभ: व्यावहारिक, सस्ता, सीधे काम से जुड़ा।
- दोष: सिखाने वाले वरिष्ठ की योग्यता पर निर्भर; ग़लत आदतें भी सीखी जा सकती हैं।
- कक्षा/अकादमी में सैद्धांतिक व व्यावहारिक प्रशिक्षण।
- उदाहरण: LBSNAA मसूरी में फ़ाउंडेशन कोर्स।
- लाभ: व्यवस्थित, विशेषज्ञ प्रशिक्षक, व्यापक दृष्टि।
- दोष: महँगा; सिद्धांत और व्यवहार में दूरी।
| प्रशिक्षण की विधियाँ | अर्थ |
|---|---|
| व्याख्यान (Lecture) | बड़े समूह को एक साथ ज्ञान देना — सस्ता, पर एकतरफ़ा |
| केस अध्ययन (Case Study) | वास्तविक प्रशासनिक घटना का विश्लेषण कर निर्णय-क्षमता बढ़ाना |
| सिंडिकेट / समूह-चर्चा | छोटे समूह किसी समस्या पर रिपोर्ट तैयार करते हैं |
| भूमिका-निर्वाह (Role Play) | काल्पनिक स्थिति में अधिकारी, नागरिक आदि की भूमिका निभाना |
| क्षेत्र-भ्रमण और "भारत दर्शन" | IAS प्रशिक्षुओं का देशभर का भ्रमण, गाँव में रहना (ग्राम-भ्रमण) |
| अनुकरण (Simulation) और खेल | आपदा-प्रबंधन जैसे अभ्यास |
| ई-लर्निंग | iGOT कर्मयोगी जैसे डिजिटल मंच — कहीं भी, कभी भी सीखना |
4.3 प्रमुख प्रशिक्षण संस्थान
| संस्थान | विवरण |
|---|---|
| लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी (LBSNAA), मसूरी | IAS सहित सभी अखिल भारतीय व केंद्रीय सेवाओं के अधिकारियों का साझा फ़ाउंडेशन कोर्स — भारत का सर्वोच्च प्रशासनिक प्रशिक्षण संस्थान। 1959 में "राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी" के रूप में स्थापित, बाद में लाल बहादुर शास्त्री के नाम पर नामकरण। |
| सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय पुलिस अकादमी (SVPNPA), हैदराबाद | IPS अधिकारियों का प्रशिक्षण (1948 में माउंट आबू में आरंभ, 1975 में हैदराबाद स्थानांतरित)। |
| इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी (IGNFA), देहरादून | भारतीय वन सेवा के अधिकारियों का प्रशिक्षण। |
| भारतीय लोक प्रशासन संस्थान (IIPA), नई दिल्ली | 1954 में स्थापित — शोध, प्रकाशन और मध्य-करियर प्रशिक्षण। |
| सचिवालय प्रशिक्षण एवं प्रबंध संस्थान (ISTM), नई दिल्ली | केंद्रीय सचिवालय के कर्मचारियों का प्रशिक्षण। |
| RCVP नरोन्हा प्रशासन अकादमी, भोपाल (मध्य प्रदेश) | मध्य प्रदेश राज्य सिविल सेवाओं के अधिकारियों हेतु राज्य-स्तरीय प्रशिक्षण संस्थान। |
| हरिश्चंद्र माथुर राजस्थान राज्य लोक प्रशासन संस्थान (HCM RIPA), जयपुर | 1957 में स्थापित; राजस्थान की RAS, राजस्थान पुलिस सेवा, राजस्थान लेखा सेवा सहित विभिन्न राज्य सेवाओं का फ़ाउंडेशन प्रशिक्षण देने वाला प्रमुख संस्थान; राजस्थान कैडर के IAS अधिकारियों का भी प्रशिक्षण; इसके उदयपुर, बीकानेर, जोधपुर व कोटा में 4 क्षेत्रीय प्रशिक्षण केंद्र भी हैं। |
| राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (NJA), भोपाल | न्यायिक अधिकारियों का प्रशिक्षण। |
राष्ट्रीय प्रशिक्षण नीति: भारत सरकार ने 1996 में पहली राष्ट्रीय प्रशिक्षण नीति बनाई और 2012 में उसे संशोधित किया — जिसका सूत्र था "सभी के लिए प्रशिक्षण" (Training for All), यानी सबसे निचले कर्मचारी से लेकर सचिव तक हर व्यक्ति को प्रशिक्षण। IAS अधिकारियों के लिए 2007 से मध्य-करियर प्रशिक्षण (चरण III, IV और V — सेवा के लगभग 7-9, 14-16 और 26-28 वर्ष पर) अनिवार्य किया गया।
4.4 मिशन कर्मयोगी
विचारक/प्रवर्तक: भारत सरकार — राष्ट्रीय सिविल सेवा क्षमता निर्माण कार्यक्रम (NPCSCB) | वर्ष: शुभारंभ: सितंबर 2020
- उद्देश्य: नियम-आधारित (Rule-based) प्रशासन से आगे बढ़कर भूमिका-आधारित (Role-based) दक्षता प्रशिक्षण की ओर ले जाना — सिविल सेवकों को "रचनात्मक, कल्पनाशील, नवोन्मेषी, सक्रिय, व्यावसायिक, प्रगतिशील, ऊर्जावान, पारदर्शी व तकनीकी रूप से सक्षम (Creative, Imaginative, Innovative, Proactive, Professional, Progressive, Energetic, Transparent, Tech-enabled)" गुणों से युक्त बनाना।
- iGOT (Integrated Government Online Training) कर्मयोगी डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर हर सिविल सेवक की भूमिका-आधारित ऑनलाइन प्रशिक्षण, "कर्म अंक (Karma Points)" के आधार पर प्रगति ट्रैकिंग की सुविधा है।
- अद्यतन (अप्रैल 2026): iGOT प्लेटफ़ॉर्म पर 1.5 करोड़ से अधिक शिक्षार्थी पंजीकृत, 8 करोड़ से अधिक कोर्स-पूर्णताएँ, 4,600 से अधिक बहुभाषी कोर्स उपलब्ध; अनिवार्य कोर्स व मूल्यांकन पूर्ण करने की समय-सीमा 30 अप्रैल 2026 तक बढ़ाई गई (APAR प्रस्तुत करने से पहले पूर्ण करना अनिवार्य)।
- दिसंबर 2025 में "iGOT मार्केटप्लेस" लॉन्च किया गया — जिसमें राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों के उन्नत कोर्स निःशुल्क उपलब्ध हैं; मार्च 2026 में एक अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन-शिक्षा मंच के साथ भागीदारी कर तकनीक, डेटा-विश्लेषण व नेतृत्व-कौशल के कोर्स जोड़े गए।
- नवीनतम (अगस्त 2026, संसद में दी गई जानकारी): 1.7 करोड़ से अधिक पंजीकृत उपयोगकर्ता और 23 भारतीय भाषाओं में 5,600 से अधिक पाठ्यक्रम; 2025-26 से केंद्र और अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों के लिए निर्धारित पाठ्यक्रम हर वर्ष पूरे करना अनिवार्य, जिनकी प्रविष्टि APAR में होती है।

| मिशन कर्मयोगी का संस्थागत ढाँचा | भूमिका |
|---|---|
| प्रधानमंत्री की मानव संसाधन परिषद् | शीर्ष निकाय — क्षमता-निर्माण की दिशा तय करना |
| क्षमता निर्माण आयोग (Capacity Building Commission) | अप्रैल 2021 में गठित — मंत्रालयों की वार्षिक क्षमता-निर्माण योजनाएँ, प्रशिक्षण संस्थानों के मानक |
| कर्मयोगी भारत (विशेष प्रयोजन वाहन) | iGOT डिजिटल मंच का स्वामित्व और संचालन |
| कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में समन्वय इकाई | कार्यक्रम की निगरानी और समन्वय |
सोचिए कोई गाड़ी चलाना सीखे बिना सीधे हाईवे पर उतर जाए — दुर्घटना तय है। इसीलिए पहले ड्राइविंग स्कूल में प्रशिक्षण दिया जाता है। ठीक वैसे ही, एक नया IAS अधिकारी सीधे कलेक्टर की कुर्सी पर बैठाया जाए तो जनता के जीवन से जुड़े फ़ैसले ग़लत हो सकते हैं — इसलिए LBSNAA जैसी अकादमियाँ व अब iGOT जैसा डिजिटल मंच उसे व्यावहारिक अनुभव व निरंतर अपडेटेड ज्ञान देते हैं।
4.5 भारत में प्रशिक्षण की समस्याएँ और सुझाव
- प्रशिक्षण संस्थानों में पदस्थापन को "दंड-पोस्टिंग" माना जाता है, इसलिए श्रेष्ठ अधिकारी प्रशिक्षक बनने से कतराते हैं।
- प्रशिक्षण और पदस्थापन का संबंध नहीं — प्रशिक्षण किसी विषय में, पोस्टिंग किसी और विषय में।
- प्रशिक्षण का मूल्यांकन नहीं — कितना सीखा और काम में कितना बदलाव आया, यह मापा नहीं जाता।
- निचले कर्मचारियों की उपेक्षा — ऊँचे अधिकारियों पर ध्यान, जबकि जनता का सीधा संपर्क निचले कर्मचारियों से होता है।
- अन्य कमियाँ: पाठ्यक्रम वर्षों तक नहीं बदलते; अधिकांश संस्थानों में व्याख्यान-आधारित एकतरफ़ा पद्धति; प्रशिक्षण-आवश्यकताओं का अध्ययन (Training Need Analysis) किए बिना प्रशिक्षण; प्रशिक्षकों के प्रशिक्षण (Training of Trainers) की कमी; जनसंपर्क और मानवीय व्यवहार पर कम ध्यान — जिससे लोक सेवक जनता से "स्वामी जैसा" व्यवहार करते हैं; छोटे और तकनीकी कर्मचारियों के प्रशिक्षण संस्थानों में आधारभूत सुविधाओं का अभाव।
- सुझाव (द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग): हर पदोन्नति से पहले अनिवार्य प्रशिक्षण, प्रशिक्षण के परिणाम को कार्य-मूल्यांकन से जोड़ना, विशेषज्ञता-आधारित (Domain) प्रशिक्षण, और प्रशिक्षण संस्थानों में श्रेष्ठ अधिकारियों की तैनाती के लिए प्रोत्साहन।
5पदोन्नति (Promotion)
पदोन्नति का अर्थ है — किसी कर्मचारी को उसकी वर्तमान से उच्चतर श्रेणी/पद पर स्थानांतरित करना, सामान्यतः अधिक वेतन, सत्ता व दायित्व के साथ। पदोन्नति प्रणाली की निष्पक्षता ही किसी संगठन में मनोबल (देखें अध्याय 04) बनाए रखने की कुंजी है।
एल. डी. व्हाइट के अनुसार — "पदोन्नति का अर्थ है किसी पद से ऊँचे ग्रेड के ऐसे पद पर नियुक्ति, जिसमें कर्तव्य अधिक कठिन और दायित्व अधिक हों, पद-नाम बदले और सामान्यतः वेतन भी बढ़े।" ध्यान दें — केवल वेतन बढ़ना (वार्षिक वेतन-वृद्धि) पदोन्नति नहीं है; पदोन्नति में कर्तव्य और दायित्व का बढ़ना ज़रूरी है।
5.1 पदोन्नति का महत्व
- करियर सेवा का आधार: आगे बढ़ने की आशा न हो तो योग्य युवा सरकारी सेवा में आएँगे ही नहीं।
- प्रेरणा और मनोबल: अच्छे काम का पुरस्कार मिलने से कर्मचारी परिश्रम करते हैं।
- अनुभव का उपयोग: ऊँचे पदों पर अनुभवी लोग आते हैं, जो संगठन की परंपराएँ जानते हैं।
- प्रतिभा को रोकना: पदोन्नति के अवसर न हों तो योग्य कर्मचारी निजी क्षेत्र में चले जाते हैं।
5.2 वरिष्ठता बनाम योग्यता (Seniority vs Merit)

- सेवा में बिताए वर्षों के आधार पर स्वतः क्रम से पदोन्नति।
- लाभ: निष्पक्ष, पक्षपात की गुंजाइश कम, अनुभव को महत्व।
- लाभ: वस्तुनिष्ठ और सरल — कर्मचारी जानते हैं कि उनका नंबर कब आएगा; आपसी ईर्ष्या कम।
- दोष: कार्यकुशलता की अनदेखी हो सकती है — कमज़ोर प्रदर्शन करने वाला भी सिर्फ़ उम्र/अनुभव के दम पर ऊपर पहुँच सकता है।
- दोष: युवा प्रतिभाएँ निराश; "जैसा है वैसा चलने दो" की मानसिकता।
- कार्य-प्रदर्शन, दक्षता व मूल्यांकन के आधार पर पदोन्नति।
- लाभ: कुशल व मेहनती कर्मचारियों को प्रोत्साहन, प्रतिस्पर्धा व उत्पादकता बढ़ती है।
- लाभ: ऊँचे पदों पर सबसे सक्षम व्यक्ति।
- दोष: मूल्यांकन में पक्षपात/व्यक्तिपरकता (Subjectivity) की आशंका बनी रहती है।
- दोष: "चाटुकारिता" को बढ़ावा; वरिष्ठों और कनिष्ठों में तनाव।
व्यवहार में अधिकांश देश (भारत सहित) दोनों का मिश्रण अपनाते हैं — "वरिष्ठता-सह-योग्यता (Seniority-cum-Merit)" सिद्धांत, जिसमें वरिष्ठता को आधार बनाते हुए भी न्यूनतम प्रदर्शन-मानक (Benchmark) अनिवार्य किया जाता है। ऊँचे पदों पर प्रायः "योग्यता-सह-वरिष्ठता" (Merit-cum-Seniority) अपनाया जाता है, जहाँ पहले योग्यता देखी जाती है और बराबर योग्यता होने पर वरिष्ठता। सामान्य नियम यह माना जाता है — निचले पदों पर वरिष्ठता को अधिक, और ऊँचे पदों पर योग्यता को अधिक महत्व।
| योग्यता जाँचने के तरीक़े | विवरण |
|---|---|
| खुली प्रतियोगी परीक्षा | विभाग के भीतर और बाहर — दोनों के उम्मीदवार |
| सीमित विभागीय प्रतियोगी परीक्षा (LDCE) | केवल विभाग के कर्मचारियों के बीच प्रतियोगिता |
| उत्तीर्णता परीक्षा (Pass Examination) | न्यूनतम स्तर पार करना — फिर वरिष्ठता से क्रम |
| सेवा-अभिलेख / कार्य-मूल्यांकन (APAR) | वर्षों का कार्य-प्रदर्शन — भारत में सबसे प्रचलित |
| विभागाध्यक्ष का व्यक्तिगत निर्णय | सबसे सरल, पर पक्षपात की सबसे अधिक आशंका |
सोचिए स्कूल में हर साल सिर्फ़ उम्र के आधार पर अगली क्लास में भेज दिया जाए, चाहे बच्चा पास हो या फ़ेल — यह विशुद्ध "वरिष्ठता" होगी, जो ग़लत है। लेकिन अगर सिर्फ़ एक दिन के पेपर पर सब कुछ तय हो, अनुभव को बिल्कुल न गिना जाए — यह विशुद्ध "योग्यता" होगी, जो भी अधूरी है। असली व्यवस्था वही अच्छी है जो सालभर का रिपोर्ट कार्ड (APAR जैसा) भी देखे और अनुभव को भी सम्मान दे।
5.3 APAR (वार्षिक कार्य-निष्पादन मूल्यांकन प्रतिवेदन) एवं DPC
- APAR (Annual Performance Appraisal Report) — पूर्ववर्ती "गोपनीय प्रतिवेदन (Annual Confidential Report — ACR)" का स्थान लिया; अब यह अधिकारी के साथ साझा की जाती है, जिससे पारदर्शिता बढ़ी है। अखिल भारतीय सेवाओं में यह अखिल भारतीय सेवा (कार्य-निष्पादन मूल्यांकन) नियम, 2007 से लागू हुई; इसमें 1 से 10 के अंकों में ग्रेडिंग होती है और यह ऑनलाइन "SPARROW" प्रणाली से भरी जाती है।
- देव दत्त बनाम भारत संघ (2008): सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि सरकारी कर्मचारी की हर प्रविष्टि (केवल प्रतिकूल नहीं) उसे बताई जाए, ताकि वह सुधार कर सके या आपत्ति दर्ज कर सके — इसी ने ACR को "गोपनीय" से "पारदर्शी" बनाया।
- DPC (Departmental Promotion Committee) — विभागीय पदोन्नति समिति जो APAR, सेवा-अभिलेख (Service Record) व अनुशासनात्मक इतिहास की समीक्षा कर पदोन्नति योग्य अधिकारियों की सूची तैयार करती है। समूह "क" के पदों की समिति में प्रायः संघ लोक सेवा आयोग का एक सदस्य अध्यक्ष होता है।
- बहु-स्रोत प्रतिपुष्टि (360-डिग्री मूल्यांकन): केंद्र में संयुक्त सचिव और ऊपर के पदों के लिए सूचीबद्धता (Empanelment) में वरिष्ठों के साथ-साथ सहकर्मियों और अधीनस्थों की राय भी ली जाती है।
- राजस्थान में भी राज्य सेवा नियमों के तहत DPC प्रणाली के माध्यम से RAS से IAS पदोन्नति सहित सभी विभागीय पदोन्नतियाँ होती हैं — वरिष्ठता सूची (Seniority List) व APAR दोनों का आकलन होता है।
सामान्यतः RAS अधिकारी को IAS में पदोन्नत होने में लगभग 25-30 वर्ष की सेवा लगती है। अखिल भारतीय सेवा के IAS (पदोन्नति द्वारा नियुक्ति) विनियम, 1955 के अंतर्गत संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या सदस्य की अध्यक्षता वाली चयन समिति (Selection Committee) वरिष्ठता व APAR के आधार पर निर्णय लेती है, और केंद्रीय कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) अधिसूचना जारी करता है। जून 2025 में इसी प्रक्रिया के तहत 16 RAS अधिकारियों को वर्ष 2024 की रिक्तियों (Vacancies) के विरुद्ध IAS में पदोन्नत किया गया — यह दर्शाता है कि पदोन्नति कोटा प्रतिवर्ष केंद्र द्वारा तय रिक्तियों पर निर्भर करता है, न कि केवल राज्य पर।
अच्छी पदोन्नति-प्रणाली की विशेषताएँ — विलोबी: (1) सभी कर्मचारियों के कर्तव्य और योग्यताएँ निश्चित हों; (2) पदों का उनकी प्रकृति के आधार पर वर्गीकरण और पदानुक्रम में संगठन; (3) राजनीतिक पदों को छोड़कर सभी ऊँचे प्रशासनिक पद इस वर्गीकरण में हों; (4) ऊँचे पद यथासंभव भीतर से (पदोन्नति से) भरे जाएँ; (5) पदोन्नति में योग्यता का सिद्धांत; (6) योग्यता मापने के निश्चित साधन; (7) कर्मचारियों के चरित्र और सेवा-स्थिति का वर्गीकृत अभिलेख।
5.4 पदोन्नति की समस्याएँ और समाधान
- ठहराव (Stagnation): पद कम और योग्य उम्मीदवार अधिक — वर्षों तक एक ही पद पर। समाधान के लिए केंद्र में 2009 से संशोधित सुनिश्चित करियर प्रगति योजना (MACP) लागू है, जिसमें पदोन्नति न मिलने पर भी 10, 20 और 30 वर्ष की सेवा पर वित्तीय उन्नयन मिलता है।
- देरी और मुक़दमे: वरिष्ठता-सूची और आरक्षण पर विवादों के कारण विभागीय पदोन्नति समिति की बैठकें वर्षों टलती हैं।
- मूल्यांकन में व्यक्तिपरकता: APAR में अधिकांश अधिकारियों को "उत्कृष्ट" दे देना — जिससे वास्तविक अंतर पता नहीं चलता।
- पुरानी व्यवस्था की कमियाँ (जो सुधारों का कारण बनीं): सेवा-अभिलेख इतने गोपनीय थे कि कर्मचारी को केवल प्रतिकूल टिप्पणी की सूचना मिलती थी; अपील का प्रभावी अधिकार नहीं; पूरे सेवा-काल की जगह केवल अंतिम कुछ वर्षों का अभिलेख देखा जाता था; गुणों की जगह दोषों पर ध्यान; और गोपनीय प्रतिवेदन प्रायः निजी संबंधों के आधार पर लिखे जाते थे। APAR, देव दत्त निर्णय और ऑनलाइन SPARROW प्रणाली इन्हीं कमियों का उत्तर हैं।
- सुझाव: समयबद्ध DPC, वस्तुनिष्ठ और परिणाम-आधारित मूल्यांकन, प्रशिक्षण को पदोन्नति से जोड़ना, और कमज़ोर प्रदर्शन वालों की समय-समय पर समीक्षा (जैसे मौलिक नियम 56(ज) के अंतर्गत समय-पूर्व सेवानिवृत्ति)।
निचले पदों पर काम नियमित है — इसलिए अनुभव (वरिष्ठता) काफ़ी है; ऊँचे पदों पर नीति और नेतृत्व चाहिए — इसलिए योग्यता ज़रूरी।
ACR से APAR: "गोपनीय से पारदर्शी" — देव दत्त (2008) — "देव ने दिखाया दत्त (दस्तावेज़)"।
5.5 सेवा-शर्तें — वर्गीकरण, वेतन आयोग और कर्मचारी संघ
- वर्गीकरण व्यक्ति के "दर्जे" (Rank) पर — जैसे समूह क, ख, ग
- अधिकारी एक सेवा का सदस्य, जो अलग-अलग पदों पर जा सकता है
- सामान्यज्ञ (Generalist) अधिकारियों के अनुकूल
- भारत में छठे वेतन आयोग के बाद समूह "घ" को समूह "ग" में मिला दिया गया
- वर्गीकरण "पद" के कर्तव्यों और दायित्वों पर
- समान काम, समान वेतन — हर पद का विस्तृत विवरण
- विशेषज्ञ (Specialist) आधारित; अमेरिका में वर्गीकरण अधिनियम 1923 और 1949
- भर्ती, वेतन और प्रशिक्षण पद की ज़रूरत के अनुसार
| केंद्रीय वेतन आयोग | वर्ष | अध्यक्ष | विशेष बात |
|---|---|---|---|
| पहला | 1946 | श्रीनिवास वरदाचारियर | "जीवन-निर्वाह योग्य वेतन" का सिद्धांत |
| चौथा | 1983 | पी. एन. सिंघल | कार्य-प्रदर्शन से जुड़ी वेतन-वृद्धि का विचार |
| पाँचवाँ | 1994 | न्यायमूर्ति एस. रत्नवेल पांडियन | कर्मचारियों की संख्या 30% घटाने का सुझाव |
| छठा | 2006 | न्यायमूर्ति बी. एन. श्रीकृष्ण | वेतन-बैंड और ग्रेड-वेतन; समूह "घ" समाप्त |
| सातवाँ | 2014 | न्यायमूर्ति ए. के. माथुर | 1 जनवरी 2016 से; "वेतन मैट्रिक्स"; न्यूनतम वेतन ₹18,000 |
| आठवाँ | 2025 | न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई | जनवरी 2025 में स्वीकृति; 3 नवंबर 2025 को गठन की अधिसूचना; 18 माह में रिपोर्ट |
कर्मचारी संघ और हड़ताल का अधिकार: सरकारी कर्मचारी संघ बना सकते हैं (अनुच्छेद 19(1)(ग)), पर हड़ताल करने का कोई मौलिक अधिकार नहीं है — सर्वोच्च न्यायालय ने कामेश्वर प्रसाद बनाम बिहार राज्य (1962) में शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर पूर्ण रोक को अवैध माना, पर हड़ताल पर रोक को वैध रखा; और टी. के. रंगराजन बनाम तमिलनाडु राज्य (2003) में स्पष्ट कहा कि सरकारी कर्मचारियों को हड़ताल का न मौलिक, न वैधानिक, न नैतिक अधिकार है। कर्मचारियों और सरकार के बीच विवाद सुलझाने के लिए केंद्र में 1966 से संयुक्त परामर्श तंत्र (Joint Consultative Machinery — JCM) काम करता है। यह ब्रिटेन की व्हिटले परिषदों (Whitley Councils) के नमूने पर बना; 1960 की केंद्रीय कर्मचारियों की हड़ताल के बाद इसे स्वीकार किया गया। यह त्रि-स्तरीय है — कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में राष्ट्रीय परिषद्, विभागीय परिषदें और क्षेत्रीय/कार्यालय परिषदें; वेतन-भत्ते, साप्ताहिक कार्य-घंटे और अवकाश जैसे मामलों में असहमति होने पर अनिवार्य पंच-निर्णय (Compulsory Arbitration) का प्रावधान है। राजस्थान ने भी मार्च 1970 में मुख्य सचिव की अध्यक्षता में ऐसा तंत्र प्रयोग के रूप में शुरू किया था।
6तटस्थता (Neutrality)
सिविल सेवा तटस्थता का अर्थ है — सरकारी अधिकारी अपने व्यक्तिगत राजनीतिक विचारों से ऊपर उठकर, चाहे किसी भी दल/विचारधारा की सरकार सत्ता में हो, उसे समान निष्ठा व निष्पक्षता से सेवा दे। यह वेस्टमिंस्टर मॉडल (Westminster Model — देखें अध्याय 09) की एक केंद्रीय विशेषता है, जिसे भारत ने ब्रिटिश परंपरा से अपनाया।
तटस्थता का अर्थ यह नहीं है कि अधिकारी के अपने विचार न हों या वह मंत्री को स्पष्ट सलाह न दे। अच्छा अधिकारी फ़ाइल पर अपनी निर्भीक और ईमानदार राय लिखता है; पर एक बार मंत्री निर्णय ले ले, तो वह उसे पूरी निष्ठा से लागू करता है — चाहे उसकी निजी राय अलग रही हो। ब्रिटेन में इसे "सत्ता से सच कहना" (Speaking truth to power) कहा जाता है।
6.1 तटस्थता के आयाम
- स्थायी सिविल सेवक (Permanent Civil Servant) — चुनाव के बाद सरकार बदलने पर भी नौकरशाही वही रहती है, जबकि राजनीतिक कार्यपालिका (मंत्री) बदलती है।
- सिविल सेवक को व्यक्तिगत राजनीतिक विचार सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने, चुनाव लड़ने या राजनीतिक दल की सदस्यता लेने से आचार-नियमों द्वारा रोका जाता है (देखें आगे — आचार संहिता)।
- तटस्थता का उद्देश्य है — नीतियों के क्रियान्वयन में निरंतरता व स्थिरता बनाए रखना, चाहे सरकार कोई भी हो।
- नियुक्ति और पदोन्नति में निष्पक्षता — योग्यता से, राजनीतिक निष्ठा से नहीं; ब्रिटेन में मास्टरमैन समिति (1949) ने सिविल सेवकों की राजनीतिक गतिविधियों की सीमाएँ तय करने के लिए उन्हें श्रेणियों में बाँटा था।
| पाठ्यक्रम के प्रमुख मूल्य | अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
| निष्पक्षता (Impartiality) | नागरिकों के साथ व्यवहार में भेदभाव न करना — जाति, धर्म, लिंग, अमीरी-ग़रीबी, राजनीतिक झुकाव से ऊपर उठकर नियम लागू करना | तहसीलदार हर किसान के नामांतरण आवेदन को एक ही नियम से निपटाए |
| दल-निरपेक्षता (Non-partisanship) | किसी राजनीतिक दल का पक्ष न लेना; हर निर्वाचित सरकार की समान निष्ठा से सेवा | चुनाव के बाद नई सरकार की योजनाएँ भी उतनी ही लगन से लागू करना |
| सत्यनिष्ठा (Integrity) | ईमानदारी और नैतिक दृढ़ता — विचार, वचन और कर्म में एकरूपता; निजी लाभ के लिए पद का उपयोग न करना | दबाव या प्रलोभन के बावजूद ग़लत फ़ाइल पर हस्ताक्षर न करना |
| नैतिकता (Ethics) | सही-ग़लत का विवेक; नियम मौन हों वहाँ भी जनहित के अनुसार निर्णय | आपदा में नियमों की भावना समझकर तुरंत राहत पहुँचाना |
📌 निष्पक्षता और दल-निरपेक्षता में अंतर: निष्पक्षता (Impartiality) का संबंध नागरिकों के साथ व्यवहार से है — सबके साथ एक जैसा न्याय। दल-निरपेक्षता (Non-partisanship) का संबंध राजनीतिक दलों से है — किसी दल का पक्ष न लेना। एक अधिकारी दल-निरपेक्ष होकर भी पक्षपाती हो सकता है (जैसे अपनी जाति के लोगों को वरीयता देना), और निष्पक्ष होकर भी किसी दल का समर्थक हो सकता है — लोक सेवा में दोनों मूल्य साथ-साथ ज़रूरी हैं।
6.2 तटस्थता बनाम प्रतिबद्ध नौकरशाही (Committed Bureaucracy)
1969-70 में कांग्रेस के विभाजन और "समाजवादी" नीतियों (बैंक राष्ट्रीयकरण, प्रिवी पर्स की समाप्ति) के दौर में यह बहस उठी कि क्या "तटस्थ" नौकरशाही सामाजिक परिवर्तन की नीतियों को उत्साह से लागू करेगी? तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और मंत्री मोहन कुमारमंगलम जैसे नेताओं ने "प्रतिबद्ध नौकरशाही" की बात की — यानी ऐसी नौकरशाही जो सरकार की नीतियों और विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध हो। आपातकाल (1975-77) के दौरान इस विचार का दुरुपयोग हुआ और शाह आयोग (1978) ने अधिकारियों के "राजनीतिक आदेशों के आगे झुकने" की कड़ी आलोचना की।
- किसी दल या विचारधारा से नहीं, केवल क़ानून और संविधान से बँधी
- हर सरकार की समान निष्ठा से सेवा
- निर्भीक सलाह, पर निर्णय के बाद पूर्ण पालन
- निरंतरता और स्थायित्व
- जोखिम: "यथास्थितिवाद", सामाजिक परिवर्तन के प्रति उदासीनता
- सत्ताधारी दल की नीतियों और विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध
- तेज़ सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन का साधन
- राजनीतिक नेतृत्व की इच्छा के अनुसार काम
- जोखिम: "दलगत नौकरशाही", चाटुकारिता, आपातकाल जैसा दुरुपयोग
- स्वीकार्य रूप: संविधान, लोकतंत्र और जनकल्याण के प्रति प्रतिबद्धता
संतुलित निष्कर्ष: आज सर्वमान्य मत यह है कि लोक सेवक राजनीतिक रूप से तटस्थ, पर संविधान के मूल्यों और जनकल्याण के प्रति प्रतिबद्ध हों — यानी वे दल के नहीं, संविधान और जनता के प्रति प्रतिबद्ध हों। सर्वोच्च न्यायालय ने टी. एस. आर. सुब्रमण्यन बनाम भारत संघ (2013) में राजनीतिक हस्तक्षेप से अधिकारियों को बचाने के लिए न्यूनतम निश्चित कार्यकाल, सिविल सेवा बोर्ड द्वारा स्थानांतरण और मौखिक आदेशों को लिखित रूप में दर्ज करने का निर्देश दिया।
- स्थायी, तटस्थ, गुमनाम सिविल सेवा — चुनाव परिणाम से अप्रभावित।
- एक ही अधिकारी अलग-अलग विचारधारा वाली सरकारों की समान निष्ठा से सेवा करता है।
- भर्ती स्वतंत्र आयोग (UPSC/RPSC) द्वारा, कार्यकाल स्थायी।
- सत्ता परिवर्तन के साथ वरिष्ठ पदों पर बड़े पैमाने पर नियुक्तियाँ बदलती हैं (जैसे अमेरिका के "शेड्यूल सी" पद)।
- नियुक्तियाँ राजनीतिक निष्ठा/चुनावी सहयोग के आधार पर होती हैं।
- लाभ: नई सरकार की नीतिगत प्राथमिकताओं से बेहतर तालमेल; दोष: निरंतरता व तटस्थता प्रभावित (देखें अध्याय 09 — तुलनात्मक लोक प्रशासन)।
6.3 भारत में तटस्थता की चुनौतियाँ
- राजनीतिक हस्तक्षेप — मनचाहा तबादला/पोस्टिंग न मिलने पर अधिकारियों को दंडात्मक स्थानांतरण (Punishment Transfers) का सामना करना पड़ता है, जिससे तटस्थता व्यावहारिक रूप से प्रभावित होती है।
- गठबंधन सरकारों व राजनीतिक अस्थिरता के दौर में अधिकारियों पर किसी विशेष राजनीतिक ख़ेमे के साथ "एडजस्ट" होने का अप्रत्यक्ष दबाव बनता है।
- सेवानिवृत्ति के बाद के पद (आयोग, न्यायाधिकरण, राज्यपाल) का लालच — जिससे सेवा के दौरान "झुकने" की प्रवृत्ति।
- अधिकारी-नेता गठजोड़ — वोहरा समिति (1993) ने अपराधियों, राजनेताओं और अधिकारियों के गठजोड़ पर चिंता जताई थी।
- निर्वाचन आयोग (देखें अध्याय 05) चुनाव के दौरान आदर्श आचार संहिता व अधिकारियों के स्थानांतरण संबंधी दिशा-निर्देशों के माध्यम से तटस्थता सुनिश्चित करने का प्रयास करता है।
फ़ुटबॉल मैच का रेफ़री किसी एक टीम का समर्थक नहीं हो सकता, चाहे कोई भी टीम जीते उसे दोनों के लिए एक जैसा निष्पक्ष रहना है। सिविल सेवक भी वैसे ही होते हैं — चुनाव में कोई भी पार्टी जीते, कलेक्टर या सचिव को समान निष्ठा से नई सरकार की नीतियाँ लागू करनी होती हैं, अपनी निजी राजनीतिक पसंद को बीच में नहीं लाना होता।
7गुमनामी (Anonymity)
गुमनामी के सिद्धांत का अर्थ है — सिविल सेवक अपने कार्यों के लिए सीधे जनता या संसद के प्रति उत्तरदायी नहीं होता; उसकी ओर से राजनीतिक जवाबदेही मंत्री (Minister) वहन करता है। यह वेस्टमिंस्टर परंपरा का दूसरा स्तंभ है, जो "मंत्रिस्तरीय उत्तरदायित्व (Ministerial Responsibility)" के सिद्धांत से जुड़ा है। भारत में यह अनुच्छेद 75(3) और 164(2) के सामूहिक उत्तरदायित्व तथा व्यक्तिगत मंत्रिस्तरीय उत्तरदायित्व की परंपरा पर टिका है।
विचारक/प्रवर्तक: वेस्टमिंस्टर संसदीय परंपरा | वर्ष: ब्रिटिश मूल, भारत में अपनाया गया
- मूल तर्क: मंत्री एक राजनीतिक नियुक्ति है, जो संसद के प्रति (अपने "निर्वाचित स्वामियों" के प्रति) उत्तरदायी है। स्थायी अधिकारी (सिविल सेवक) चुनाव नहीं लड़ता, इसलिए वह सीधे जनता/संसद के प्रति उत्तरदायी नहीं हो सकता — उसकी ग़लतियों की राजनीतिक ज़िम्मेदारी मंत्री लेता है।
- इसका व्यावहारिक अर्थ है — सिविल सेवक "जनता के ग़ुस्से (Public Fury)" से सुरक्षित रहता है; वह केवल विभागीय जाँच व अनुशासनात्मक कार्रवाई के अधीन होता है, सार्वजनिक बहस/आलोचना के सीधे निशाने पर नहीं आता।
- यह सिद्धांत ऐतिहासिक रूप से लोकपाल (देखें अध्याय 05) की स्थापना में एक बड़ी बाधा रहा — तर्क दिया गया कि यदि लोकपाल सीधे अधिकारियों की जाँच करेगा, तो यह गुमनामी व मंत्रिस्तरीय उत्तरदायित्व दोनों सिद्धांतों का उल्लंघन होगा। यह उन कारणों में से एक था जिनसे 1968 से 2013 तक लोकपाल विधेयक बार-बार अटकता रहा।
- सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act, 2005) ने इस सिद्धांत को बड़ी चुनौती दी है — अब नागरिक सीधे यह जान सकते हैं कि किस अधिकारी ने कौन-सी फ़ाइल पर क्या निर्णय लिया, जिससे सिविल सेवकों की "गुमनामी" व्यावहारिक रूप से घटी है और प्रत्यक्ष जवाबदेही (Direct Accountability) बढ़ी है।

क्रिशल डाउन प्रकरण (ब्रिटेन, 1954): कृषि मंत्रालय के अधिकारियों ने युद्ध के समय ली गई एक ज़मीन को लौटाने में मूल मालिक के साथ अन्याय किया। ग़लती अधिकारियों की थी, पर कृषि मंत्री सर थॉमस डगडेल ने संसद में ज़िम्मेदारी लेकर इस्तीफ़ा दे दिया — यह मंत्रिस्तरीय उत्तरदायित्व का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण माना जाता है।
लाल बहादुर शास्त्री (भारत, 1956): तमिलनाडु के अरियालुर में भीषण रेल दुर्घटना के बाद रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए इस्तीफ़ा दे दिया, जबकि दुर्घटना में उनकी व्यक्तिगत भूमिका नहीं थी।
सीख: मंत्री विभाग का "चेहरा" है — विभाग की हर सफलता और विफलता उसकी है; अधिकारी पर्दे के पीछे रहकर काम करता है।
7.1 गुमनामी का क्षरण — बदलती वास्तविकता
- सूचना का अधिकार (2005): फ़ाइल-नोटिंग तक सार्वजनिक — अधिकारी का नाम और राय जनता के सामने।
- संसदीय समितियाँ: लोक लेखा समिति आदि के सामने अधिकारी स्वयं उपस्थित होकर जवाब देते हैं।
- न्यायालय और जाँच आयोग: अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से तलब किया जाता है; कई बार व्यक्तिगत दायित्व भी तय होता है।
- मीडिया और सोशल मीडिया: "लोकप्रिय कलेक्टर" और "सिंघम अधिकारी" जैसी छवियाँ — अधिकारी स्वयं सार्वजनिक चेहरे बन रहे हैं।
- नया लोक प्रबंधन (देखें अध्याय 01): परिणाम-आधारित प्रबंधन में अधिकारी को व्यक्तिगत लक्ष्यों और परिणामों के लिए जवाबदेह बनाया जाता है।
सोचिए क्रिकेट टीम हार जाए तो मीडिया व फ़ैंस सबसे ज़्यादा सवाल कप्तान से पूछते हैं, टीम के फ़िज़ियो या नेट-बॉलर से नहीं — भले ही अंदरूनी रणनीति में उनकी भी भूमिका हो। ठीक वैसे ही, किसी योजना में गड़बड़ी होने पर संसद/मीडिया में मंत्री से जवाब माँगा जाता है, फ़ाइल बनाने वाले अधिकारी से सीधे नहीं — यही "गुमनामी" का सिद्धांत है। लेकिन RTI आने के बाद अब यह पर्दा थोड़ा हट गया है, और लोग सीधे यह भी पूछ सकते हैं कि "फ़ाइल पर दस्तख़त किसके थे?"
8आचार संहिता (Code of Conduct) और सिविल सेवा के मूल्य
आचार संहिता वह लिखित नियम-संहिता है जो सिविल सेवकों के व्यावसायिक व व्यक्तिगत आचरण की सीमाएँ तय करती है — ताकि सेवा में सत्यनिष्ठा (Integrity), निष्पक्षता व अनुशासन बना रहे। यह तटस्थता व गुमनामी दोनों सिद्धांतों को व्यावहारिक/क़ानूनी रूप देने का माध्यम है।
आचार संहिता बनाम नैतिक संहिता: आचार संहिता (Code of Conduct) बताती है कि क्या नहीं करना है — इसके उल्लंघन पर दंड मिलता है। नैतिक संहिता (Code of Ethics) बताती है कि किन मूल्यों के अनुसार जीना है — यह प्रेरणा का स्रोत है। द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने कहा था कि भारत में आचार संहिताएँ तो हैं, पर लोक सेवा मूल्यों की कोई क़ानूनी "नैतिक संहिता" नहीं है।
| नियम-संहिता | प्रयोज्यता (Applicability) |
|---|---|
| अखिल भारतीय सेवा (आचरण) नियम, 1968 | IAS, IPS, IFoS — तीनों अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों पर लागू। 2014 के संशोधन से नियम 3 में लोक सेवा मूल्य (उच्च नैतिक मानक, सत्यनिष्ठा, राजनीतिक तटस्थता, जवाबदेही, पारदर्शिता, कमज़ोर वर्गों के प्रति संवेदनशीलता आदि) जोड़े गए। |
| केंद्रीय सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1964 | केंद्र सरकार के सिविल सेवकों (केंद्रीय सेवाओं) पर लागू। |
| राजस्थान सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1971 | RAS सहित राजस्थान राज्य सेवाओं के समस्त कर्मचारियों पर लागू। |

8.1 आचार संहिता के प्रमुख प्रावधान (क्या करें, क्या न करें)
- 1. राजनीतिक गतिविधि पर प्रतिबंध — किसी राजनीतिक दल का सदस्य बनना, चुनाव में भाग लेना या सार्वजनिक रूप से राजनीतिक विचार व्यक्त करना वर्जित।
- 2. संपत्ति की घोषणा (Asset Declaration) — प्रत्येक वर्ष चल व अचल संपत्ति का विवरण देना अनिवार्य; निर्धारित सीमा से अधिक मूल्यवान उपहार लेने की मनाही।
- 3. निजी व्यापार/व्यवसाय पर रोक — सिविल सेवक बिना सरकार की पूर्व अनुमति के कोई निजी व्यापार, प्रकाशन या मीडिया गतिविधि नहीं कर सकता।
- 4. हड़ताल व प्रदर्शन पर प्रतिबंध — सामूहिक अवकाश (Mass Casual Leave), हड़ताल या सरकार-विरोधी प्रदर्शन में भाग लेना निषिद्ध।
- 5. निष्पक्षता एवं सत्यनिष्ठा — कर्तव्यपालन में दक्षता, सत्यनिष्ठा (Integrity) व भेदभाव-रहित व्यवहार बनाए रखना अनिवार्य।
- 6. ऋण एवं निवेश की सूचना — शेयर बाज़ार में सट्टा-प्रकृति के लेन-देन व बड़े ऋण लेने से पूर्व सक्षम प्राधिकारी को सूचित करना आवश्यक।
- 7. अन्य प्रावधान — दहेज लेना-देना वर्जित; सार्वजनिक स्थान पर नशे में न होना; कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का निषेध; सरकार की नीति की सार्वजनिक आलोचना नहीं; बिना अनुमति गोपनीय सूचना देना वर्जित; तत्परता और शिष्टाचार से काम करना।
8.2 अनुशासनात्मक कार्रवाई
आचरण नियमों के उल्लंघन पर केंद्रीय सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1965 और राजस्थान में राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1958 के अंतर्गत कार्रवाई होती है। दंड दो प्रकार के हैं:
| दंड का प्रकार | उदाहरण | प्रक्रिया |
|---|---|---|
| लघु दंड (Minor Penalty) | परिनिंदा (Censure); पदोन्नति रोकना; हुई हानि की वेतन से वसूली; वेतन-वृद्धि रोकना | आरोपों की सूचना और उत्तर का अवसर — संक्षिप्त प्रक्रिया |
| दीर्घ दंड (Major Penalty) | निचले वेतनमान या पद पर पदावनति; अनिवार्य सेवानिवृत्ति; सेवा से हटाना (Removal — भविष्य में सरकारी नौकरी संभव); बर्ख़ास्तगी (Dismissal — भविष्य की सरकारी नौकरी से भी वंचित) | आरोप-पत्र, विस्तृत जाँच, गवाह, सुनवाई — अनुच्छेद 311 के अनुसार |
8.3 सिविल सेवा के मूल्य और नैतिकता
| नोलन समिति के सार्वजनिक जीवन के 7 सिद्धांत (ब्रिटेन, 1995) | अर्थ |
|---|---|
| 1. निःस्वार्थता (Selflessness) | केवल जनहित में निर्णय |
| 2. सत्यनिष्ठा (Integrity) | किसी के प्रति ऐसे दायित्व न लें जो कर्तव्य को प्रभावित करें |
| 3. वस्तुनिष्ठता (Objectivity) | नियुक्ति, ठेके, पुरस्कार — केवल योग्यता के आधार पर |
| 4. जवाबदेही (Accountability) | अपने निर्णयों और कार्यों के लिए जनता के प्रति उत्तरदायी |
| 5. खुलापन (Openness) | निर्णयों और उनके कारणों में यथासंभव पारदर्शिता |
| 6. ईमानदारी (Honesty) | निजी हितों की घोषणा और टकराव का समाधान |
| 7. नेतृत्व (Leadership) | उदाहरण प्रस्तुत करके इन सिद्धांतों को बढ़ावा देना |
भारत में: द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के चौथे प्रतिवेदन "शासन में नैतिकता" (Ethics in Governance, 2007) ने मंत्रियों, विधायकों और लोक सेवकों के लिए नैतिक संहिता, हितों के टकराव पर स्पष्ट नियम और भ्रष्ट अधिकारियों की संपत्ति ज़ब्त करने की सिफ़ारिश की। कार्मिक मंत्रालय ने लोक सेवा मूल्यों का एक प्रारूप भी प्रस्तावित किया था, जिसमें देशभक्ति, लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति निष्ठा, सत्यनिष्ठा, निष्पक्षता, दल-निरपेक्षता, वस्तुनिष्ठता, समर्पण, कमज़ोर वर्गों के प्रति सहानुभूति, करुणा और सहिष्णुता शामिल थे — इन्हीं मूल्यों को 2014 में अखिल भारतीय सेवा आचरण नियमों में जोड़ा गया।
जैसे किसी स्कूल में शिक्षक के लिए नियम होता है कि वह कक्षा में किसी राजनीतिक पार्टी का प्रचार नहीं करेगा, न ही बच्चों से रिश्वत लेगा, न ही बिना अनुमति ट्यूशन का अलग व्यापार चलाएगा — ठीक वैसे ही, सरकार ने अपने अधिकारियों के लिए यह "आचार संहिता" बनाई है, ताकि जनता का भरोसा बना रहे कि अधिकारी निजी स्वार्थ के बजाय जनसेवा को प्राथमिकता देगा।
राजस्थान सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1971 राज्य कर्मचारियों पर लागू होते हैं; इनके साथ राजस्थान लोक सेवाओं के प्रदान की गारंटी अधिनियम, 2011 और राजस्थान सुनवाई का अधिकार अधिनियम, 2012 तय समय में सेवा न देने या सुनवाई न करने पर अधिकारी पर दंड का प्रावधान करते हैं — यानी आचरण अब केवल "क्या न करें" तक नहीं, बल्कि "समय पर सेवा दें" तक फैल गया है (देखें अध्याय 03 और 08)।
64 केंद्र (CCS) — 68 अखिल भारतीय (AIS) — 71 राजस्थान (RCS): "चौसठ में केंद्र, अड़सठ में अखिल, इकहत्तर में राजस्थान"।
नोलन के 7 सिद्धांत — "निस-वस-जख-ईने": निःस्वार्थता, सत्यनिष्ठा, वस्तुनिष्ठता, जवाबदेही, खुलापन, ईमानदारी, नेतृत्व।
9सार-तुलना और समय-रेखा
| विषय | मूल प्रश्न | भारतीय व्यवस्था | मुख्य चुनौती |
|---|---|---|---|
| भर्ती | कौन आए? | UPSC, SSC, RPSC; आरक्षण; पार्श्व प्रवेश | प्रश्नपत्र-लीक, देरी, मुक़दमे |
| प्रशिक्षण | कैसे सीखे? | LBSNAA, HCM RIPA; मिशन कर्मयोगी | प्रशिक्षण और पदस्थापन का संबंध नहीं |
| पदोन्नति | कौन आगे बढ़े? | वरिष्ठता-सह-योग्यता; APAR; DPC; MACP | ठहराव और मूल्यांकन की व्यक्तिपरकता |
| तटस्थता | किसके प्रति निष्ठा? | वेस्टमिंस्टर मॉडल; आचरण नियम | राजनीतिक हस्तक्षेप, स्थानांतरण |
| गुमनामी | जवाब कौन दे? | मंत्रिस्तरीय उत्तरदायित्व | RTI, मीडिया से क्षरण |
| आचार संहिता | कैसा आचरण? | CCS 1964, AIS 1968, RCS 1971 | नैतिक संहिता का अभाव |
समय-रेखा — कार्मिक प्रशासन के प्रमुख पड़ाव
| वर्ष/अनुच्छेद | विषय |
|---|---|
| 1854 | मैकॉले समिति (भारत) और नॉर्थकोट-ट्रेवेलियन प्रतिवेदन (ब्रिटेन) — खुली प्रतियोगी परीक्षा |
| 1883 | पेंडलटन अधिनियम, अमेरिका — लूट प्रणाली से योग्यता प्रणाली की ओर पहला बड़ा वैश्विक क़दम |
| 1944 | एश्टन समिति (ब्रिटेन) — प्रशिक्षण के उद्देश्य; किंग्सले — "प्रतिनिधि नौकरशाही" |
| 1947 (21 अप्रैल) | सरदार पटेल — "इस्पाती ढाँचा" संबोधन; IAS का गठन |
| 1951 | अखिल भारतीय सेवा अधिनियम |
| 1957 | हरिश्चंद्र माथुर राजस्थान राज्य लोक प्रशासन संस्थान, जयपुर |
| 1959 | राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी, मसूरी (आज LBSNAA) |
| 1964 | केंद्रीय सिविल सेवा (आचरण) नियम — केंद्रीय कर्मचारियों हेतु आचार-संहिता का औपचारिक ढाँचा |
| 1966 | भारतीय वन सेवा (अनुच्छेद 312) |
| 1968 | अखिल भारतीय सेवा (आचरण) नियम — IAS/IPS/IFoS हेतु समान आचार-मानक |
| 1969-70 | "प्रतिबद्ध नौकरशाही" की बहस |
| 1971 | राजस्थान सिविल सेवा (आचरण) नियम — राज्य सेवाओं हेतु स्वतंत्र आचार-संहिता |
| 1976 | कोठारी समिति — तीन-चरणीय सिविल सेवा परीक्षा (1979 से) |
| 1992 | इंद्रा साहनी निर्णय — OBC आरक्षण और 50% की सीमा |
| 1995 | नोलन समिति (ब्रिटेन) — सार्वजनिक जीवन के 7 सिद्धांत; 77वाँ संशोधन — पदोन्नति में आरक्षण |
| 1996 | पहली राष्ट्रीय प्रशिक्षण नीति (2012 में संशोधित) |
| 2005 | सूचना का अधिकार अधिनियम — गुमनामी के सिद्धांत को सीधी चुनौती, अधिकारी-जवाबदेही बढ़ी |
| 2007-08 | द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग — "शासन में नैतिकता" (2007) और "कार्मिक प्रशासन का नवीनीकरण" (2008); APAR नियम (2007) |
| 2008 | देव दत्त निर्णय — हर APAR प्रविष्टि कर्मचारी को बताना अनिवार्य |
| 2013 | टी. एस. आर. सुब्रमण्यन निर्णय — निश्चित कार्यकाल, सिविल सेवा बोर्ड |
| 2014 | अखिल भारतीय सेवा आचरण नियमों में लोक सेवा मूल्य जोड़े गए |
| 2018 | पहला पार्श्व प्रवेश (Lateral Entry) विज्ञापन — संयुक्त सचिव स्तर पर विशेषज्ञों की सीधी भर्ती |
| 2019 | 103वाँ संशोधन — आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों को 10% आरक्षण |
| 2020 (सितंबर) | मिशन कर्मयोगी का शुभारंभ — भूमिका-आधारित क्षमता-निर्माण की नई राष्ट्रीय नीति |
| 2024 (अगस्त) | 45 पदों के पार्श्व प्रवेश विज्ञापन को आरक्षण विवाद के बाद वापस लिया गया; उप-वर्गीकरण पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय |
| 2025-26 | iGOT कर्मयोगी का विस्तार (1.7 करोड़+ उपयोगकर्ता, अगस्त 2026); 8वाँ केंद्रीय वेतन आयोग (नवंबर 2025, अध्यक्ष — न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई) |
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