कल्पना कीजिए — एक युवा हर साल लाखों प्रतियोगियों के बीच परीक्षा देकर IAS बनता है (यह संघ लोक सेवा आयोग का काम है); एक नेता चुनाव जीतकर सरकार बनाता है (यह निर्वाचन आयोग सुनिश्चित करता है कि चुनाव निष्पक्ष हों); उस सरकार का हर रुपया कहाँ ख़र्च हुआ, इसकी जाँच कौन करता है (यह नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक का काम है); केंद्र से राज्यों को पैसा किस अनुपात में बँटेगा, यह कौन तय करता है (वित्त आयोग); कोई मंत्री या अधिकारी भ्रष्टाचार करे तो कौन पकड़ेगा (लोकपाल); और देश की दीर्घकालिक नीति-दिशा कौन तय करेगा (नीति आयोग)।
यही छह संस्थाएँ — संघ लोक सेवा आयोग, निर्वाचन आयोग, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, वित्त आयोग, लोकपाल एवं नीति आयोग — भारत के लोकतांत्रिक व प्रशासनिक ढाँचे के स्तंभ (Pillars) हैं, जो सरकार को निष्पक्ष, जवाबदेह व कुशल बनाए रखती हैं।
अब राजस्थान के एक साधारण परिवार को सोचिए — बेटा RAS की तैयारी करता है (राज्य लोक सेवा आयोग), पिता पंचायत चुनाव में वोट डालते हैं (राज्य निर्वाचन आयोग), गाँव की सड़क का पैसा केंद्र के करों से राज्य को मिला (वित्त आयोग), और उस सड़क के घटिया निर्माण पर महालेखाकार की रिपोर्ट विधानसभा में रखी गई (लेखा-परीक्षा)। इन संस्थाओं को हम रोज़ नहीं देखते, पर हमारा रोज़ का जीवन इन्हीं पर टिका है। इस अध्याय में हम इन्हीं छह "पहरेदारों" को एक-एक करके समझेंगे।
1. भूमिका — संस्थाएँ क्यों? संवैधानिक, सांविधिक और कार्यकारी निकायों का अंतर
2. संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) — अनुच्छेद 315 से 323; इतिहास, गठन, स्वतंत्रता, कार्य, सीमाएँ और सुधार
3. भारत निर्वाचन आयोग (ECI) — अनुच्छेद 324; ढाँचे का विकास, 2023 का अधिनियम, शक्तियाँ और चुनाव-सुधार
4. नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) — अनुच्छेद 148 से 151; लेखा-परीक्षा के प्रकार, लोक लेखा समिति, सीमाएँ
5. वित्त आयोग (Finance Commission) — अनुच्छेद 280; ऊर्ध्वाधर-क्षैतिज बँटवारा और 16वाँ वित्त आयोग
6. लोकपाल (Lokpal) — ओम्बड्समैन की अवधारणा, 1968 से 2013 तक की यात्रा, 2013 का अधिनियम और लोकायुक्त
7. नीति आयोग (NITI Aayog) — योजना आयोग का उत्तराधिकारी; संरचना (2026), कार्य और प्रमुख पहलें
8. सार-तुलना और समय-रेखा
1भूमिका — प्रशासनिक संस्थाएँ क्यों ज़रूरी हैं?
लोकतंत्र में सरकार जनता की ओर से शासन करती है, पर सरकार भी इंसानों से बनी है — इसलिए उसमें पक्षपात, मनमानी, फ़िज़ूलख़र्ची और भ्रष्टाचार का ख़तरा बना रहता है। संविधान-निर्माताओं ने इस ख़तरे को पहचाना और कुछ ऐसे काम सरकार के सीधे नियंत्रण से अलग करके स्वतंत्र संस्थाओं को सौंप दिए। जैसे — अफ़सरों की भर्ती कौन करेगा (ताकि सरकार अपने चहेतों को न भर दे), चुनाव कौन कराएगा (ताकि सत्ताधारी दल अपने लाभ के लिए चुनाव न मोड़ दे), और सरकारी ख़र्च की जाँच कौन करेगा (ताकि जनता का पैसा सही जगह लगे)।
इन संस्थाओं की तीन साझा विशेषताएँ हैं — (1) ये सरकार के रोज़मर्रा के आदेशों से स्वतंत्र रहती हैं; (2) इनके प्रमुखों को आसानी से हटाया नहीं जा सकता; और (3) ये अपनी रिपोर्ट सीधे राष्ट्रपति और संसद के सामने रखती हैं, जिससे पूरी व्यवस्था जनता के प्रति जवाबदेह बनती है। इस अर्थ में ये संस्थाएँ अध्याय 03 में पढ़े "जवाबदेही" के सिद्धांत का संस्थागत रूप हैं।
1.1 वैधानिक आधार के अनुसार तीन प्रकार

| प्रकार | अर्थ | उदाहरण (इस अध्याय में) | स्वतंत्रता की मात्रा |
|---|---|---|---|
| संवैधानिक निकाय (Constitutional Body) | जिसका गठन, कार्य और प्रमुख की सेवा-शर्तें संविधान में ही लिखी हैं | संघ लोक सेवा आयोग, निर्वाचन आयोग, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, वित्त आयोग | सबसे अधिक — बदलने के लिए संविधान-संशोधन चाहिए |
| सांविधिक निकाय (Statutory Body) | जिसे संसद या विधानमंडल ने साधारण क़ानून बनाकर स्थापित किया | लोकपाल (2013 का अधिनियम) | मध्यम — संसद क़ानून बदलकर ढाँचा बदल सकती है |
| कार्यकारी निकाय (Executive Body) | जिसे सरकार ने मंत्रिमंडल के संकल्प (Resolution) से बनाया | नीति आयोग (1 जनवरी 2015 का संकल्प) | सबसे कम — सरकार नए संकल्प से बदल या भंग कर सकती है |
शास्त्रीय अर्थ: ऐसी संस्था जिसका अस्तित्व, संरचना और मूल शक्तियाँ सीधे संविधान के अनुच्छेदों से निकलती हैं।
सरल भाषा में: संविधान में "नाम लिखा हुआ" संस्थान — इसे कोई सरकार अपने मन से बंद नहीं कर सकती। उदाहरण: निर्वाचन आयोग (अनुच्छेद 324) — इसे समाप्त करने के लिए संसद को संविधान बदलना पड़ेगा।
क्रिकेट मैच में दोनों टीमें खेलती हैं, पर निष्पक्षता के लिए तीन "बाहरी" लोग चाहिए — चयनकर्ता (जो योग्य खिलाड़ी चुने), अंपायर (जो नियम लागू करे) और स्कोरर (जो हर रन का हिसाब रखे)। सरकार में संघ लोक सेवा आयोग "चयनकर्ता" है, निर्वाचन आयोग "अंपायर" है और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक "स्कोरर"। अगर ये तीनों किसी एक टीम (सत्ताधारी दल) के हाथ में आ जाएँ तो खेल का कोई अर्थ नहीं बचता।
2संघ लोक सेवा आयोग (Union Public Service Commission — UPSC)
संघ लोक सेवा आयोग भारत की केंद्रीय भर्ती संस्था है, जिसका कार्य है — योग्यतम व्यक्तियों का निष्पक्ष चयन कर उन्हें अखिल भारतीय सेवाओं (IAS, IPS, IFoS) व केंद्रीय सेवाओं में नियुक्त करने की सिफ़ारिश करना। यह संविधान द्वारा स्थापित एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय है, ताकि सिविल सेवा भर्ती राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रहे। इसे भारत में "योग्यता प्रणाली का प्रहरी" (Watchdog of the Merit System) कहा जाता है।
योग्यता प्रणाली (Merit System) का अर्थ है — सरकारी नौकरी उसी को मिले जो खुली प्रतियोगी परीक्षा में अपनी योग्यता सिद्ध करे, न कि वह जो सत्ताधारी दल का समर्थक हो। इसका उल्टा है "लूट प्रणाली" (Spoils System), जिसमें चुनाव जीतने वाला दल सरकारी पद अपने कार्यकर्ताओं में "लूट के माल" की तरह बाँटता है — अमेरिका में 19वीं सदी में यही होता था (विस्तार से देखें अध्याय 06 और 09)। लोक सेवा आयोग इसी लूट प्रणाली को रोकने के लिए बना संस्थागत "बाँध" है।
पृष्ठभूमि — "धूर्तों को बाहर रखो" से "सर्वश्रेष्ठ को आकर्षित करो" तक
लोक सेवा आयोगों का जन्म भर्ती में लूट प्रणाली के दोषों को दूर करने के लिए हुआ। शुरू में इनका उद्देश्य नकारात्मक था — उनका मुख्य काम सरकारी सेवाओं से "धूर्तों को बाहर रखना" (Keeping the rascals out) तक सीमित था। इसका परिणाम यह हुआ कि साधारण योग्यता वाले लोग भी सेवा में आ गए और आयोग "औसत के नियम" (Law of Average) पर चलने लगे। आधुनिक दृष्टि सकारात्मक भर्ती (Positive Recruitment) की है — केवल अयोग्य को रोकना नहीं, बल्कि सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं को सरकारी सेवा की ओर सक्रिय रूप से आकर्षित करना।
| किंग्सले के अनुसार सकारात्मक भर्ती की 4 विशेषताएँ | अर्थ |
|---|---|
| 1. योग्य व्यक्तियों की व्यापक खोज | केवल विज्ञापन देकर इंतज़ार नहीं, प्रतिभाओं तक पहुँचना |
| 2. पद और पदोन्नति-क्रम पर बल | उम्मीदवार को आगे का करियर-मार्ग स्पष्ट दिखे |
| 3. नियुक्ति-पूर्व परीक्षा | अयोग्य को छाँटने की वैज्ञानिक परीक्षा |
| 4. विभागों में सहयोग | भर्ती एजेंसी और विभागों के बीच शांतिपूर्ण तालमेल |
फिफनर और प्रेस्थस के शब्दों में — आधुनिक भर्ती में "धूर्तों को बाहर रखने" पर उतना बल नहीं होगा जितना इस पर कि राज्य की सेवा के लिए सर्वोत्तम व्यक्तियों को कैसे प्रोत्साहित किया जाए। एक विदेशी विशेषज्ञ ने व्यंग्य किया था कि भारतीय सरकारी भर्ती-विज्ञापन "जन-संपर्क विशेषज्ञों ने नहीं, वकीलों ने लिखे" लगते हैं — यानी उनमें आकर्षण कम, शर्तें अधिक होती हैं।
2.1 ऐतिहासिक विकास

| वर्ष | घटना | महत्व |
|---|---|---|
| 1854 | मैकॉले समिति की रिपोर्ट | भारतीय सिविल सेवा में संरक्षण (Patronage) की जगह खुली प्रतियोगी परीक्षा का सिद्धांत |
| 1919 | भारत शासन अधिनियम (मॉन्टेग्यू-चेम्सफ़ोर्ड सुधार) | भारत में एक लोक सेवा आयोग बनाने का प्रावधान |
| 1924 | ली आयोग (Lee Commission) | संघीय लोक सेवा आयोग की स्थापना की सिफ़ारिश |
| 1926 (1 अक्टूबर) | लोक सेवा आयोग (Public Service Commission) की स्थापना | प्रथम अध्यक्ष — सर रॉस बार्कर; UPSC का पूर्ववर्ती स्वरूप |
| 1935 | भारत शासन अधिनियम | संघीय लोक सेवा आयोग (1937 से) और प्रांतों के लिए प्रांतीय लोक सेवा आयोग |
| 1950 (26 जनवरी) | संविधान लागू | संघीय आयोग का नाम "संघ लोक सेवा आयोग" — अनुच्छेद 315 से 323 के अंतर्गत संवैधानिक दर्जा |
विचारक/प्रवर्तक: संवैधानिक निकाय — अनुच्छेद 315-323 | वर्ष: स्थापना: 1926 (लोक सेवा आयोग), वर्तमान स्वरूप 1950 से
- संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 315 (आयोग की स्थापना), अनुच्छेद 316 (नियुक्ति व पदावधि), अनुच्छेद 317 (निष्कासन — केवल राष्ट्रपति द्वारा, कदाचार सिद्ध होने पर सर्वोच्च न्यायालय की जाँच के बाद), अनुच्छेद 320 (कार्य), अनुच्छेद 323 (वार्षिक प्रतिवेदन राष्ट्रपति को)।
- गठन: 1 अध्यक्ष + अन्य सदस्य (संख्या राष्ट्रपति तय करते हैं — वर्तमान में अध्यक्ष सहित कुल संख्या 9-11 के बीच रहती है); नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा।
- कार्यकाल: 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु, जो भी पहले हो; त्यागपत्र राष्ट्रपति को सौंपा जा सकता है।
- स्वतंत्रता के उपाय: सेवा-शर्तें नियुक्ति के बाद अलाभप्रद रूप से नहीं बदली जा सकतीं; व्यय भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) पर भारित (Charged) होता है — संसद में मतदान नहीं होता; अध्यक्ष व सदस्य पुनर्नियुक्ति के लिए पात्र नहीं (कुछ अपवादों सहित)।
- वर्तमान अध्यक्ष (मई 2025 से): डॉ. अजय कुमार — 1985 बैच के केरल कैडर के भूतपूर्व IAS अधिकारी व पूर्व रक्षा सचिव — जिनका कार्यकाल अक्टूबर 2027 तक निर्धारित है।
सोचिए किसी स्कूल में अगर हेडमास्टर ख़ुद ही अपने पसंदीदा बच्चों को टॉपर घोषित कर दे तो यह अन्यायपूर्ण होगा। इसीलिए बाहर से एक स्वतंत्र परीक्षक बुलाया जाता है जो निष्पक्ष रूप से मूल्यांकन करे। संघ लोक सेवा आयोग ठीक यही भूमिका निभाता है — सरकार अपने ही पसंदीदा लोगों को अफ़सर न बना दे, इसके लिए एक स्वतंत्र, संवैधानिक संस्था परीक्षा लेकर योग्यतम को चुनती है।
2.2 संवैधानिक प्रावधान — अनुच्छेद 315 से 323

| अनुच्छेद | प्रावधान | सरल व्याख्या |
|---|---|---|
| 315 | संघ और राज्यों के लिए लोक सेवा आयोग | संघ के लिए एक आयोग; हर राज्य के लिए एक आयोग; दो या अधिक राज्य चाहें तो संसद क़ानून बनाकर संयुक्त राज्य लोक सेवा आयोग (JSPSC) बना सकती है |
| 316 | नियुक्ति और पदावधि | संघ आयोग के अध्यक्ष-सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं; कम से कम आधे सदस्य ऐसे हों जो 10 वर्ष तक केंद्र या राज्य सरकार की सेवा में रहे हों |
| 317 | हटाना और निलंबन | कदाचार (Misbehaviour) के आधार पर हटाने से पहले राष्ट्रपति मामला सर्वोच्च न्यायालय को भेजते हैं; न्यायालय की सलाह राष्ट्रपति पर बाध्यकारी है; जाँच के दौरान निलंबन संभव |
| 318 | सदस्य-संख्या और सेवा-शर्तें | राष्ट्रपति तय करते हैं; नियुक्ति के बाद सेवा-शर्तें अलाभकारी रूप से नहीं बदली जा सकतीं |
| 319 | कार्यकाल के बाद रोक | संघ आयोग का अध्यक्ष आगे किसी सरकारी नौकरी के योग्य नहीं; सदस्य केवल संघ आयोग का अध्यक्ष या किसी राज्य आयोग का अध्यक्ष बन सकता है |
| 320 | आयोग के कार्य | परीक्षाएँ कराना और भर्ती, पदोन्नति, अनुशासन आदि मामलों में परामर्श देना |
| 321 | कार्यों का विस्तार | संसद क़ानून बनाकर अतिरिक्त कार्य दे सकती है (जैसे किसी स्थानीय प्राधिकरण की सेवाएँ) |
| 322 | आयोग का व्यय | वेतन-भत्ते-पेंशन भारत की संचित निधि पर भारित — संसद में मतदान नहीं |
| 323 | प्रतिवेदन | वार्षिक प्रतिवेदन राष्ट्रपति को; जिन मामलों में सरकार ने आयोग की सलाह नहीं मानी, उनके कारण एक ज्ञापन सहित संसद के सामने रखे जाते हैं |
2.3 निष्कासन — किन आधारों पर?
अनुच्छेद 317 के अनुसार राष्ट्रपति संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या किसी सदस्य को दो तरह से हटा सकते हैं। पहला — कदाचार (Misbehaviour): इसके लिए राष्ट्रपति को मामला सर्वोच्च न्यायालय को भेजना होता है; न्यायालय जाँच करके यदि हटाने की सलाह देता है, तभी राष्ट्रपति हटा सकते हैं। संविधान यह भी बताता है कि सरकार के किसी अनुबंध में आर्थिक हित रखना या उसके लाभ में हिस्सा लेना "कदाचार" माना जाएगा। दूसरा — सीधे राष्ट्रपति द्वारा, यदि अध्यक्ष या सदस्य (क) दिवालिया घोषित हो जाए, (ख) अपने कार्यकाल में पद के बाहर कोई वेतनभोगी काम करे, या (ग) राष्ट्रपति की राय में मानसिक या शारीरिक अक्षमता के कारण पद पर बने रहने के अयोग्य हो।
2.4 स्वतंत्रता के संवैधानिक कवच
| कवच | कैसे स्वतंत्रता देता है? |
|---|---|
| सुरक्षित कार्यकाल | 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु — सरकार बदलने से कार्यकाल प्रभावित नहीं |
| कठिन निष्कासन | कदाचार पर सर्वोच्च न्यायालय की जाँच अनिवार्य — सरकार मनमाने ढंग से नहीं हटा सकती |
| सेवा-शर्तों की सुरक्षा | नियुक्ति के बाद वेतन-भत्ते घटाए नहीं जा सकते |
| भारित व्यय | ख़र्च संचित निधि पर भारित — बजट रोककर दबाव नहीं डाला जा सकता |
| भविष्य की नौकरी पर रोक | अध्यक्ष आगे सरकारी पद नहीं ले सकता — इसलिए सरकार को ख़ुश करने का लालच नहीं |
| पुनर्नियुक्ति पर रोक | कार्यकाल पूरा होने पर उसी पद पर दोबारा नियुक्ति नहीं |
2.5 कार्य एवं शक्तियाँ (Functions & Powers) — अनुच्छेद 320
- अखिल भारतीय सेवाओं व केंद्रीय सेवाओं हेतु परीक्षा आयोजित करना व भर्ती की सिफ़ारिश करना।
- दो या अधिक राज्यों के अनुरोध पर संयुक्त भर्ती योजनाएँ चलाना।
- सिविल सेवकों की पदोन्नति, स्थानांतरण व अनुशासनात्मक मामलों (जैसे बर्ख़ास्तगी) पर सरकार को परामर्श देना।
- राष्ट्रपति को वार्षिक प्रतिवेदन (Annual Report) सौंपना, जो संसद में प्रस्तुत होता है।
अनुच्छेद 320(3) के अनुसार सरकार को इन मामलों में आयोग से परामर्श लेना होता है — (1) सिविल सेवाओं और पदों पर भर्ती की पद्धति; (2) नियुक्ति, पदोन्नति और एक सेवा से दूसरी सेवा में स्थानांतरण के सिद्धांत तथा उम्मीदवारों की उपयुक्तता; (3) सरकारी कर्मचारी पर अनुशासनात्मक कार्रवाई, स्मरण-पत्र और याचिकाएँ; (4) कर्तव्य-पालन में किए कार्य के लिए मुक़दमे का ख़र्च दिलाने के दावे; (5) सेवा के दौरान लगी चोट के लिए पेंशन के दावे।
जिन मामलों में परामर्श आवश्यक नहीं: पिछड़े वर्गों के लिए नियुक्तियों और पदों में आरक्षण (अनुच्छेद 16(4)) तथा अनुसूचित जाति-जनजाति के दावों पर विचार (अनुच्छेद 335)। इसके अलावा राष्ट्रपति नियम बनाकर कुछ पदों को आयोग के दायरे से बाहर रख सकते हैं, पर ऐसे नियम कम से कम 14 दिन संसद के सामने रखे जाते हैं और संसद उन्हें बदल या रद्द कर सकती है।
| UPSC द्वारा आयोजित प्रमुख परीक्षाएँ | संक्षिप्त विवरण |
|---|---|
| सिविल सेवा परीक्षा (Civil Services Exam — CSE) | IAS, IPS, IFS सहित अखिल भारतीय व केंद्रीय सेवाओं हेतु — तीन चरण: प्रारंभिक, मुख्य, साक्षात्कार। |
| भारतीय वन सेवा परीक्षा (IFoS) | वन सेवा अधिकारियों की भर्ती हेतु — सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा के साथ संयुक्त। |
| संयुक्त रक्षा सेवा परीक्षा (CDS) | सेना/नौसेना/वायुसेना में अधिकारी पद हेतु। |
| केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल परीक्षा (CAPF) | BSF, CRPF, CISF आदि में सहायक कमांडेंट पद हेतु। |
| भारतीय इंजीनियरिंग सेवा परीक्षा (ESE) | केंद्रीय तकनीकी/इंजीनियरिंग सेवाओं हेतु। |
| राष्ट्रीय रक्षा अकादमी परीक्षा (NDA/NA) | 12वीं के बाद सेना की तीनों शाखाओं में प्रवेश हेतु। |
| संयुक्त चिकित्सा सेवा परीक्षा (CMS) | केंद्र सरकार चिकित्सा सेवाओं हेतु। |

आज की तीन-चरणीय सिविल सेवा परीक्षा की नींव कोठारी समिति (1976) की सिफ़ारिश पर पड़ी, जो 1979 से लागू हुई। बाद में सतीश चंद्र समिति (1989), अलघ समिति (2001), होता समिति (2004) और बासवान समिति (2016) ने परीक्षा-पद्धति की समीक्षा की। प्रारंभिक परीक्षा का दूसरा प्रश्नपत्र (CSAT) 2011 में जुड़ा और 2015 से केवल योग्यता-मात्र (Qualifying, 33%) बना दिया गया।
2.6 सीमाएँ — "सलाहकार" निकाय की मजबूरियाँ
- सलाह बाध्यकारी नहीं: आयोग केवल सिफ़ारिश करता है; नियुक्ति का अधिकार सरकार का है। सरकार आयोग की सलाह न माने तो उसे केवल संसद को कारण बताने होते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने भी माना है कि अनुच्छेद 320 का परामर्श अनिवार्य होते हुए भी उसकी सलाह सरकार पर बाध्यकारी नहीं है, और आयोग की सूची में नाम आने मात्र से नियुक्ति का अधिकार नहीं मिल जाता।
- अस्थायी नियुक्तियाँ: सरकार एक वर्ष तक की अस्थायी नियुक्तियाँ आयोग से पूछे बिना कर सकती है।
- दायरे से बाहर पद: समूह "ख" के कई पदों और लगभग सभी समूह "ग" पदों पर भर्ती कर्मचारी चयन आयोग (SSC) या विभाग स्वयं करते हैं।
- कार्मिक प्रबंधन में घटती भूमिका: केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) के बनने से अनुशासनात्मक मामलों में आयोग की भूमिका कुछ घटी है; अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति, स्थानांतरण आदि मुख्यतः कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) देखता है।
- पार्श्व प्रवेश (Lateral Entry) पर बहस: 2018 से संयुक्त सचिव और निदेशक स्तर पर विशेषज्ञों की सीधी भर्ती आयोग के माध्यम से हुई; अगस्त 2024 में आरक्षण संबंधी आपत्तियों के बाद सरकार के अनुरोध पर आयोग ने ऐसा विज्ञापन वापस ले लिया।
अन्य आलोचनाएँ: (1) संविधान केवल यह कहता है कि आधे सदस्य 10 वर्ष के सरकारी अनुभव वाले हों — शेष सदस्यों की योग्यता, चरित्र और निष्पक्षता की कोई कसौटी नहीं, इसलिए नियुक्ति सत्ताधारी दल की इच्छा पर निर्भर रहती है; (2) कई राज्य लोक सेवा आयोगों पर प्रश्नपत्र-लीक, भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं; (3) प्रश्नपत्रों में त्रुटियों, आरक्षण-विवादों और मुक़दमों से परिणामों में देरी होती है; (4) परीक्षा-योजना में बार-बार बदलाव से उम्मीदवारों में अनिश्चितता रहती है; (5) परीक्षा-कैलेंडर का समय पर पालन नहीं होता; (6) पात्रता की जाँच परिणाम के बाद होने से अंत में उम्मीदवार अयोग्य घोषित होते हैं। पॉल एपलबी ने भी आयोग को भर्ती में अधिक सक्रिय होने और चयन में उन्नत तकनीकें अपनाने का सुझाव दिया था।
2024 में एक प्रशिक्षु अधिकारी द्वारा पहचान और प्रमाण-पत्रों में धोखाधड़ी का मामला सामने आने के बाद आयोग ने उम्मीदवारों की पहचान जाँचने की व्यवस्था कड़ी की। अगस्त 2024 में केंद्र सरकार ने आयोग को उम्मीदवारों के आधार-आधारित प्रमाणीकरण की अनुमति दी, और परीक्षा-केंद्रों पर चेहरा-पहचान (Face Authentication) तकनीक का प्रयोग शुरू किया गया। इसका उद्देश्य है — परीक्षा में किसी दूसरे के बैठने (Impersonation) और फ़र्ज़ी प्रमाण-पत्रों पर रोक।
- अनुच्छेद 315 — संघ के लिए
- अध्यक्ष-सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं
- कार्यकाल — 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु
- अखिल भारतीय और केंद्रीय सेवाओं की भर्ती
- प्रतिवेदन राष्ट्रपति को, फिर संसद में
- अध्यक्ष आगे किसी सरकारी पद के योग्य नहीं
- अनुच्छेद 315 — हर राज्य के लिए
- नियुक्ति राज्यपाल करते हैं, पर हटाते राष्ट्रपति ही हैं
- कार्यकाल — 6 वर्ष या 62 वर्ष की आयु
- राज्य सेवाओं की भर्ती (जैसे RAS, RPS)
- प्रतिवेदन राज्यपाल को, फिर विधानमंडल में
- अध्यक्ष UPSC का अध्यक्ष-सदस्य या किसी अन्य राज्य आयोग का अध्यक्ष बन सकता है
राज्य स्तर पर संघ लोक सेवा आयोग के समकक्ष संस्था है — राजस्थान लोक सेवा आयोग (Rajasthan Public Service Commission — RPSC), अजमेर — जो RAS सहित राज्य की सिविल सेवाओं की भर्ती परीक्षाएँ आयोजित करता है। इसका संवैधानिक आधार भी अनुच्छेद 315-323 में ही निहित है (राज्य लोक सेवा आयोग के रूप में)। इसकी स्थापना का अध्यादेश 20 अगस्त 1949 को प्रकाशित हुआ और 22 दिसंबर 1949 को सदस्यों की नियुक्ति के साथ आयोग अस्तित्व में आया। पहले इसका मुख्यालय जयपुर में था, जो 21 अगस्त 1958 को अजमेर स्थानांतरित हुआ। प्रथम अध्यक्ष सर एस. के. घोष थे।
वर्तमान स्थिति (2026): अध्यक्ष उत्कल रंजन साहू (पूर्व पुलिस महानिदेशक) 19 जून 2026 को सेवानिवृत्त हुए; इसके बाद राज्यपाल ने वरिष्ठतम सदस्य ले. कर्नल (से.नि.) केसरी सिंह राठौड़ को कार्यवाहक अध्यक्ष बनाया। नियमित अध्यक्ष की नियुक्ति तक यही व्यवस्था रहेगी। (राज्य प्रशासन से जुड़ी संस्थाओं के लिए देखें अध्याय 10।)
315 स्था(पना) — 316 नि(युक्ति) — 317 ह(टाना) — 318 से(वा-शर्तें) — 319 रो(क) — 320 का(र्य) — 321 वि(स्तार) — 322 व्य(य) — 323 प्र(तिवेदन)।
वाक्य बनाइए: "स्थापित नियुक्त हटाओ, सेवा रोक, काम विस्तार, व्यय प्रतिवेदन"।
3भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India — ECI)
निर्वाचन आयोग भारत के लोकतंत्र की रीढ़ है — यह सुनिश्चित करता है कि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, संसद व राज्य विधानसभाओं के चुनाव स्वतंत्र, निष्पक्ष व नियमित रूप से हों। बिना एक स्वतंत्र निर्वाचन आयोग के, लोकतंत्र केवल काग़ज़ों तक सीमित रह जाता — यही कारण है कि संविधान-निर्माताओं ने इसे एक शक्तिशाली स्वतंत्र संस्था के रूप में स्थापित किया।
संविधान-निर्माताओं ने चुनाव कराने का काम न केंद्र सरकार को दिया, न राज्य सरकारों को — बल्कि एक अखिल भारतीय, स्थायी और स्वतंत्र आयोग को दिया, जो संसद, विधानसभा, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति — चारों के चुनाव कराता है। पंचायत और नगरपालिका के चुनाव इसके दायरे में नहीं आते; वे राज्य निर्वाचन आयोग कराते हैं।
विचारक/प्रवर्तक: संवैधानिक निकाय — अनुच्छेद 324 | वर्ष: स्थापना: 25 जनवरी 1950 (राष्ट्रीय मतदाता दिवस इसी दिन मनाया जाता है)
- संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 324 — चुनाव के अधीक्षण, निर्देशन व नियंत्रण की शक्ति निर्वाचन आयोग में निहित।
- गठन: प्रारंभ में (1950-1989) एकल-सदस्यीय निकाय था; 1989 में अस्थायी रूप से बहु-सदस्यीय बनाया गया; अक्टूबर 1993 से स्थायी रूप से त्रि-सदस्यीय — 1 मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) + 2 निर्वाचन आयुक्त, सभी समान शक्ति रखते हैं, निर्णय बहुमत से।
- नियुक्ति प्रक्रिया (मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें एवं पदावधि) अधिनियम, 2023): चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता, तथा प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री शामिल — यह सर्वोच्च न्यायालय के अनूप बरनवाल निर्णय (2023) के बाद बनाया गया नया क़ानूनी ढाँचा है (उस निर्णय में भारत के मुख्य न्यायाधीश भी समिति में थे, जो अंतरिम व्यवस्था थी)।
- कार्यकाल व निष्कासन: 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु, जो पहले हो; मुख्य निर्वाचन आयुक्त को केवल महाभियोग (Impeachment) की उसी प्रक्रिया से हटाया जा सकता है जो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के लिए है — जिससे उसे कार्यपालिका के दबाव से सुरक्षा मिलती है।
- वर्तमान मुख्य निर्वाचन आयुक्त (फ़रवरी 2025 से): श्री ज्ञानेश कुमार — भारत के 26वें मुख्य निर्वाचन आयुक्त; अन्य दो निर्वाचन आयुक्त — डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी।
क्रिकेट मैच में दोनों टीमों में से कोई भी अंपायर नहीं बन सकता — एक निष्पक्ष तीसरा व्यक्ति अंपायर बनता है ताकि फ़ैसले पर कोई विवाद न हो। ठीक वैसे ही, चुनाव में कोई भी राजनीतिक दल ख़ुद चुनाव नहीं करा सकता — निर्वाचन आयोग एक स्वतंत्र "अंपायर" की तरह चुनाव प्रक्रिया की निगरानी करता है, आचार संहिता लागू करता है और परिणाम घोषित करता है।
3.1 संवैधानिक प्रावधान — अनुच्छेद 324 से 329
| अनुच्छेद | प्रावधान |
|---|---|
| 324 | चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण निर्वाचन आयोग में निहित; आयोग की संरचना; मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया; अन्य आयुक्तों को केवल मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफ़ारिश पर हटाया जा सकता है |
| 325 | हर क्षेत्र के लिए एक ही सामान्य मतदाता-सूची; धर्म, मूलवंश, जाति या लिंग के आधार पर किसी को सूची से बाहर नहीं किया जा सकता |
| 326 | वयस्क मताधिकार — 18 वर्ष या अधिक आयु का हर नागरिक मतदाता (61वें संशोधन, 1988 से 21 वर्ष की जगह 18 वर्ष) |
| 327 | संसद को चुनाव संबंधी क़ानून बनाने की शक्ति (जैसे लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और 1951) |
| 328 | राज्य विधानमंडल को अपने चुनावों पर (संसद के क़ानून के अधीन) क़ानून बनाने की शक्ति |
| 329 | चुनाव संबंधी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप पर रोक — चुनाव को केवल चुनाव-याचिका से चुनौती दी जा सकती है |
3.2 ढाँचे का विकास और नई नियुक्ति-प्रक्रिया

1950 से 1989 तक आयोग में केवल मुख्य निर्वाचन आयुक्त होते थे; प्रथम मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुकुमार सेन ने 1951-52 के पहले आम चुनाव कराए। 16 अक्टूबर 1989 को दो निर्वाचन आयुक्त नियुक्त किए गए, पर जनवरी 1990 में ये पद समाप्त कर दिए गए। 1 अक्टूबर 1993 को फिर दो निर्वाचन आयुक्त नियुक्त हुए और तब से आयोग तीन-सदस्यीय है। सर्वोच्च न्यायालय ने टी. एन. शेषन बनाम भारत संघ (1995) में बहु-सदस्यीय आयोग को वैध माना और कहा कि मतभेद होने पर बहुमत का निर्णय मान्य होगा।
लंबे समय तक आयुक्तों की नियुक्ति केवल सरकार की सलाह पर राष्ट्रपति करते थे। अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2 मार्च 2023) में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने कहा कि जब तक संसद क़ानून नहीं बनाती, नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश की समिति की सलाह पर होगी। इसके बाद संसद ने दिसंबर 2023 में अधिनियम बनाया, जिसमें मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक कैबिनेट मंत्री को रखा गया। इस बदलाव पर आपत्ति है कि समिति में सरकार का बहुमत (2:1) हो गया है; इस अधिनियम और इसके अंतर्गत हुई नियुक्तियों को चुनौती देने वाली याचिकाएँ सर्वोच्च न्यायालय में लंबित हैं।
| 2023 के अधिनियम के प्रमुख प्रावधान | विवरण |
|---|---|
| खोज-समिति (Search Committee) | विधि मंत्री की अध्यक्षता में, सचिव स्तर के दो अधिकारी — 5 नामों का पैनल तैयार करती है |
| चयन-समिति (Selection Committee) | प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), लोकसभा में विपक्ष के नेता, प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री; पैनल से बाहर के व्यक्ति पर भी विचार कर सकती है |
| पात्रता | भारत सरकार के सचिव स्तर का पद धारण कर चुके या कर रहे व्यक्ति, जिन्हें चुनाव-प्रबंधन का ज्ञान और अनुभव हो |
| कार्यकाल | 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु; पुनर्नियुक्ति नहीं |
| वेतन | सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान |
| संरक्षण | पद पर रहते हुए किए गए कार्यों के लिए आयुक्तों पर दीवानी-फ़ौजदारी कार्रवाई से संरक्षण |
3.3 कार्य एवं शक्तियाँ
| कार्य एवं शक्तियाँ (Functions & Powers) | विवरण |
|---|---|
| निर्वाचन संचालन | राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, संसद व राज्य विधानसभाओं के चुनाव कराना। |
| मतदाता सूची तैयार करना | आवधिक रूप से मतदाता सूचियों को तैयार करना व अद्यतन करना। |
| आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) | चुनाव की घोषणा से परिणाम तक राजनीतिक दलों व उम्मीदवारों के आचरण हेतु दिशा-निर्देश। |
| राजनीतिक दलों की मान्यता व चुनाव चिह्न | दलों को मान्यता देना, चुनाव चिह्न आवंटित करना, विवाद की स्थिति में निर्णय (जैसे चिह्न विवाद) — चुनाव चिह्न (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश, 1968 के अंतर्गत। |
| परिसीमन (Delimitation) में सहयोग | परिसीमन आयोग के साथ मिलकर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएँ तय करने में सहयोग। |
| निर्वाचन व्यय की निगरानी | उम्मीदवारों के चुनावी ख़र्च की सीमा तय करना व निगरानी करना। |
| अर्ध-न्यायिक (परामर्शदात्री) कार्य | संसद सदस्यों की अयोग्यता पर राष्ट्रपति को (अनुच्छेद 103) और विधायकों की अयोग्यता पर राज्यपाल को (अनुच्छेद 192) राय देना — यह राय बाध्यकारी है। |
| मतदान केंद्र और कर्मचारी | चुनाव के दौरान केंद्र-राज्य के कर्मचारी आयोग के अनुशासन में आ जाते हैं; मतदान रद्द करके पुनर्मतदान का आदेश दे सकता है। |
📌 भारत निर्वाचन आयोग और राज्य निर्वाचन आयोग में अंतर: भारत निर्वाचन आयोग (ECI) संसद व विधानसभा चुनाव कराता है (अनुच्छेद 324), जबकि राज्य निर्वाचन आयोग (SEC) पंचायत व नगरपालिका जैसे स्थानीय निकायों के चुनाव कराता है (अनुच्छेद 243K और 243ZA — विस्तार से देखें अध्याय 10 — राज्य प्रशासन)। दोनों अलग-अलग स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाएँ हैं। राज्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति राज्यपाल करते हैं, पर उसे भी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जैसी प्रक्रिया से ही हटाया जा सकता है।
3.4 आदर्श आचार संहिता और चुनाव-सुधार
आदर्श आचार संहिता कोई क़ानून नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों की आपसी सहमति से बनी नैतिक संहिता है। इसकी शुरुआत 1960 में केरल विधानसभा चुनाव से हुई; 1962 के आम चुनाव में आयोग ने इसे सभी दलों तक पहुँचाया और 1979 में सत्ताधारी दल के आचरण पर विशेष प्रावधान जोड़े गए। चुनाव की घोषणा होते ही यह लागू हो जाती है — सरकार नई योजनाएँ घोषित नहीं कर सकती, अधिकारियों के स्थानांतरण पर रोक लग जाती है और सरकारी साधनों का प्रचार में उपयोग नहीं हो सकता। क़ानूनी दर्जा न होने के बावजूद आयोग की नैतिक सत्ता और जनमत के दबाव से इसका पालन होता है।
| वर्ष | चुनाव-सुधार / घटना | महत्व |
|---|---|---|
| 1982 | केरल के परवूर उपचुनाव में पहली बार इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) | 2004 के लोकसभा चुनाव से सभी निर्वाचन क्षेत्रों में |
| 1990-96 | टी. एन. शेषन का कार्यकाल | आचार संहिता का कड़ाई से पालन; 1993 में मतदाता फ़ोटो पहचान-पत्र (EPIC) |
| 2011 | राष्ट्रीय मतदाता दिवस (25 जनवरी) की शुरुआत | आयोग के स्थापना-दिवस पर; मतदाता-जागरूकता के लिए "स्वीप" (SVEEP) कार्यक्रम |
| 2013 | NOTA (उपरोक्त में से कोई नहीं) — सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय | मतदाता को सभी उम्मीदवारों को अस्वीकार करने का विकल्प |
| 2013-2019 | VVPAT (मतदाता-सत्यापन पर्ची) | 2013 में नागालैंड के नोकसेन उपचुनाव से; 2019 लोकसभा चुनाव में सभी मतदान केंद्रों पर |
| 2024 | चुनावी बॉन्ड योजना असंवैधानिक घोषित (15 फ़रवरी) | राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय |
| 2025-26 | मतदाता-सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) | बिहार के बाद नवंबर 2025 से राजस्थान सहित 12 राज्यों-केंद्रशासित प्रदेशों में घर-घर सत्यापन |
3.4.1 राजनीतिक दलों की मान्यता
चुनाव चिह्न (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश, 1968 के अंतर्गत आयोग दलों को राष्ट्रीय दल या राज्य दल के रूप में मान्यता देता है। मान्यता से दल को आरक्षित चुनाव चिह्न, आकाशवाणी-दूरदर्शन पर प्रचार का समय और मतदाता-सूची की निःशुल्क प्रतियाँ जैसी सुविधाएँ मिलती हैं।
| मान्यता | शर्तें (इनमें से कोई एक) |
|---|---|
| राष्ट्रीय दल | (1) लोकसभा या विधानसभा चुनाव में 4 या अधिक राज्यों में कुल वैध मतों का 6% और साथ में लोकसभा की 4 सीटें; या (2) लोकसभा की कुल सीटों का 2% (कम से कम 3 राज्यों से); या (3) 4 राज्यों में राज्य दल के रूप में मान्यता |
| राज्य दल | (1) विधानसभा चुनाव में 6% मत + 2 सीटें; या (2) लोकसभा चुनाव में राज्य के 6% मत + 1 सीट; या (3) विधानसभा की 3% सीटें या 3 सीटें (जो अधिक हो); या (4) राज्य की हर 25 लोकसभा सीटों में से 1; या (5) 8% वैध मत |
| प्रमुख चुनाव-सुधार समितियाँ | वर्ष | मुख्य सुझाव |
|---|---|---|
| तारकुंडे समिति | 1975 | मतदान की आयु 18 वर्ष; बहु-सदस्यीय निर्वाचन आयोग |
| दिनेश गोस्वामी समिति | 1990 | EVM का प्रयोग, मतदाता पहचान-पत्र, निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता |
| वोहरा समिति | 1993 | अपराधियों, राजनेताओं और नौकरशाहों के गठजोड़ पर रिपोर्ट |
| इंद्रजीत गुप्त समिति | 1998 | चुनावों का आंशिक सरकारी वित्त-पोषण (State Funding) |
| विधि आयोग — 170वाँ प्रतिवेदन | 1999 | दलों में आंतरिक लोकतंत्र, आपराधिक पृष्ठभूमि वालों पर रोक |
| विधि आयोग — 255वाँ प्रतिवेदन | 2015 | आयुक्तों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम, सभी आयुक्तों को समान संरक्षण |
3.5 स्वतंत्रता पर उठने वाले प्रश्न
- संविधान आयुक्तों की योग्यता तय नहीं करता — 2023 का अधिनियम भी केवल पूर्व-नौकरशाहों तक दायरा सीमित करता है।
- सेवानिवृत्ति के बाद आयुक्तों के सरकारी पद लेने पर संवैधानिक रोक नहीं है (जबकि CAG और UPSC अध्यक्ष पर है)।
- अन्य दो आयुक्तों को केवल मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफ़ारिश पर हटाया जा सकता है — यानी उन्हें मुख्य आयुक्त जितना संरक्षण नहीं।
- आयोग का अपना स्थायी कर्मचारी-तंत्र नहीं — चुनाव के समय वह केंद्र और राज्य सरकारों के कर्मचारियों पर निर्भर रहता है।
- आयोग का ख़र्च संचित निधि पर भारित नहीं है; द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग और विधि आयोग ने भारित करने तथा कॉलेजियम जैसी चयन-व्यवस्था की सिफ़ारिश की थी।
राज्य में विधानसभा और लोकसभा चुनावों के लिए भारत निर्वाचन आयोग का प्रतिनिधि मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO), राजस्थान होता है; ज़िले में ज़िला निर्वाचन अधिकारी (प्रायः कलेक्टर) और हर विधानसभा क्षेत्र में निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी तथा रिटर्निंग अधिकारी होते हैं। गाँव-स्तर पर बूथ स्तरीय अधिकारी (BLO) मतदाता-सूची का घर-घर सत्यापन करते हैं — 2025-26 के विशेष गहन पुनरीक्षण में राजस्थान के BLO ने यही काम किया। पंचायत-नगरपालिका चुनाव अलग संस्था — राज्य निर्वाचन आयोग, राजस्थान — कराती है (देखें अध्याय 10)।
324 आ(योग) — 325 सू(ची एक) — 326 व(यस्क मताधिकार) — 327 सं(सद का क़ानून) — 328 रा(ज्य का क़ानून) — 329 न्या(यालय पर रोक)।
आयोग का ढाँचा: "50 में एक, 89 में तीन, 90 में फिर एक, 93 से हमेशा तीन"।
4नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (Comptroller & Auditor General — CAG)
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक को संविधान का "लेखा-परीक्षक (Auditor)" कहा जाता है — सरकार द्वारा जनता के पैसे का हर रुपया संविधान व क़ानून के अनुसार सही ढंग से ख़र्च हुआ या नहीं, इसकी जाँच करने वाली सर्वोच्च संस्था। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इसे "भारतीय संविधान के अंतर्गत सबसे महत्वपूर्ण अधिकारी" कहा था, और यह भी कहा था कि उसका कर्तव्य न्यायपालिका से भी अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह संसद की ओर से सरकार के पूरे ख़र्च पर नज़र रखता है।
लोकतंत्र में संसद तय करती है कि सरकार कितना पैसा, किस काम पर ख़र्च करेगी (बजट)। पर ख़र्च हो जाने के बाद संसद ख़ुद हर बिल-वाउचर नहीं देख सकती — यह काम उसकी "आँख और कान" बनकर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक करता है। इसलिए उसे संसद का "मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक" भी कहा जाता है।
विचारक/प्रवर्तक: संवैधानिक निकाय — अनुच्छेद 148 | वर्ष: भारत के "जनता के धन का संरक्षक (Guardian of Public Purse)"
- संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 148 (नियुक्ति), अनुच्छेद 149 (कर्तव्य व शक्तियाँ), अनुच्छेद 150 (लेखा प्रारूप), अनुच्छेद 151 (प्रतिवेदन राष्ट्रपति/राज्यपाल को)।
- नियुक्ति: राष्ट्रपति द्वारा अपने हस्ताक्षर और मुहर सहित अधिपत्र (Warrant) से; कार्यकाल — 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु, जो पहले हो।
- निष्कासन: सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान प्रक्रिया (अनुच्छेद 124(4)) — संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से कदाचार/असमर्थता सिद्ध होने पर ही हटाया जा सकता है — यह उसे अत्यधिक स्वतंत्रता देता है।
- लेखा परीक्षण के प्रकार: (i) अनुपालन लेखा परीक्षा (Compliance/Regularity Audit) — नियमों के पालन की जाँच (ii) निष्पादन लेखा परीक्षा (Performance Audit) — योजना के उद्देश्य कितने प्राप्त हुए (iii) वित्तीय लेखा परीक्षा (Financial Audit) — खातों की सत्यता की जाँच।
- प्रतिवेदन प्रक्रिया: प्रतिवेदन राष्ट्रपति/राज्यपाल को सौंपा जाता है, फिर संसद/विधानसभा में रखा जाता है, और फिर लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee — PAC) उसका विस्तृत परीक्षण करती है।
- वर्तमान नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (नवंबर 2024 से): श्री के. संजय मूर्ति — भारत के 15वें CAG, जिन्होंने 21 नवंबर 2024 को पदभार ग्रहण किया।
सोचिए एक बड़े परिवार में हर महीने पैसा ख़र्च होता है — राशन, स्कूल फ़ीस, बिजली बिल। अगर कोई सदस्य बेईमानी से पैसा ग़लत जगह ख़र्च कर दे, तो घर का कोई भरोसेमंद बुज़ुर्ग सारा हिसाब जाँचता है। सरकार में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यही भूमिका निभाता है — वह जाँचता है कि टैक्स के पैसे से बनी सड़क, अस्पताल, योजना पर ख़र्च सही हुआ या नहीं, और अपनी रिपोर्ट खुलकर संसद के सामने रखता है।
4.1 ऐतिहासिक विकास
भारत में लेखा-परीक्षा की परंपरा पुरानी है — 1858 में ब्रिटिश सरकार ने महालेखाकार (Auditor General) का पद बनाया और 1860 में सर एडवर्ड ड्रमंड पहले महालेखाकार बने। भारत शासन अधिनियम 1919 और 1935 ने इस पद को वैधानिक सुरक्षा दी। स्वतंत्र भारत के पहले नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक वी. नरहरि राव (1948-1954) थे। भारत में लेखा-परीक्षा की स्वतंत्रता का प्रश्न 1912 में उठा, जब वित्त-प्रभारी सर गाई फ़्लीटवुड विल्सन ने तर्क दिया — "ईमानदार और सुदृढ़ वित्त हमारे अस्तित्व के लिए सदैव आवश्यक रहा है, और इसे सुनिश्चित करने का एकमात्र मार्ग यह है कि व्यय की जाँच स्वतंत्र लेखा-परीक्षा के अधीन हो।" 1913 से भारत में लेखा-परीक्षा की स्वतंत्रता सामान्यतः मान्य हो गई। (ब्रिटेन में कार्यपालिका से स्वतंत्र और सीधे संसद को रिपोर्ट देने वाले लेखा-परीक्षक का उदय 1866 के राजकोष एवं लेखा-परीक्षा विभाग अधिनियम से हुआ था।) संविधान में पद का नाम "महालेखा परीक्षक" से बदलकर "नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक" रखा गया। संविधान लागू होने के बाद संसद ने नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कर्तव्य, शक्तियाँ और सेवा-शर्तें) अधिनियम, 1971 बनाया। 1976 में संघ सरकार के लेखा-संधारण (Accounts) को लेखा-परीक्षा (Audit) से अलग कर दिया गया — अब हिसाब रखने का काम विभाग ख़ुद करते हैं और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक केवल जाँचता है।
4.2 स्वतंत्रता के उपाय
| उपाय | प्रावधान |
|---|---|
| सुरक्षित कार्यकाल | 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु — सरकार की इच्छा से नहीं |
| कठिन निष्कासन | केवल सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जैसी प्रक्रिया — संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत |
| वेतन और सेवा-शर्तें | वेतन सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के बराबर; नियुक्ति के बाद अलाभकारी बदलाव नहीं |
| भारित व्यय | कार्यालय का पूरा प्रशासनिक व्यय भारत की संचित निधि पर भारित |
| आगे पद पर रोक | पद छोड़ने के बाद भारत सरकार या किसी राज्य सरकार में कोई पद नहीं |
| शपथ | तीसरी अनुसूची के अनुसार संविधान और क़ानूनों को बनाए रखने की शपथ |
| अपने विभाग पर नियंत्रण | भारतीय लेखा-परीक्षा एवं लेखा विभाग (IA&AD) के कर्मचारियों की सेवा-शर्तें उसकी सलाह से तय |
4.3 कार्य
| CAG के कार्य | विवरण |
|---|---|
| संघ व राज्य सरकारों के खातों का लेखा-परीक्षण | केंद्र व राज्य दोनों स्तर पर सरकारी व्यय की जाँच — नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक दोनों के लिए एकीकृत संस्था है। |
| सार्वजनिक उपक्रमों का लेखा-परीक्षण | सरकारी कंपनियों व निगमों (Public Sector Undertakings) के खातों की जाँच। |
| निष्पादन लेखा परीक्षा रिपोर्ट | योजनाओं की प्रभावशीलता व मूल्य-प्रतिफल (Value for Money) की जाँच — जैसे 2G स्पेक्ट्रम और कोयला आवंटन पर रिपोर्टें। |
| लेखा प्रारूप निर्धारण | संघ व राज्यों के खातों को किस रूप में रखा जाए, यह निर्धारित करना (राष्ट्रपति की सलाह से)। |
| प्राप्तियों की जाँच | केवल ख़र्च ही नहीं, करों और अन्य आय की वसूली की भी जाँच |
| शुद्ध आय का प्रमाणन | किसी कर या शुल्क की "शुद्ध आय" का प्रमाण-पत्र देना — यह अंतिम माना जाता है |
| स्थानीय निकायों को तकनीकी मार्गदर्शन | पंचायतों और नगरपालिकाओं के लेखा-परीक्षण में तकनीकी मार्गदर्शन और सहायता (TGS) |
लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee) से संबंध: संसद के पास समय कम है, इसलिए नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के प्रतिवेदनों की विस्तृत जाँच लोक लेखा समिति करती है। इस समिति की परंपरा इंग्लैंड में 1861 में ग्लैडस्टोन के समय शुरू हुई; भारत में यह 1921 से (मॉन्टेग्यू-चेम्सफ़ोर्ड सुधारों के बाद) है। आज इसमें 22 सदस्य (15 लोकसभा + 7 राज्यसभा) होते हैं, कोई मंत्री सदस्य नहीं होता, और 1967 से इसका अध्यक्ष परंपरागत रूप से विपक्ष से बनाया जाता है। समिति अपनी जाँच नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के प्रतिवेदन के आधार पर करती है, और वह समिति की बैठकों में सहायता करता है — इसीलिए उसे लोक लेखा समिति का "मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक" कहा जाता है। प्रशासक अशोक चंदा के शब्दों में — "इस समिति ने लोक-व्यय पर नियंत्रण करने वाली एक महान शक्ति का रूप धारण कर लिया है।" (विस्तार से देखें अध्याय 08।)

4.4 सीमाएँ — "महालेखा परीक्षक" अधिक, "नियंत्रक" कम
ब्रिटेन में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक दोनों काम करता है — "नियंत्रक" के रूप में वह संचित निधि से पैसा निकलने की अनुमति देता है, और "महालेखा परीक्षक" के रूप में बाद में जाँच करता है। भारत में पैसा निकालने पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है — विभाग बिना उसकी अनुमति के ख़र्च कर सकते हैं; वह केवल ख़र्च के बाद (Post-facto) जाँच करता है। इसलिए कहा जाता है कि भारत में वह केवल "महालेखा परीक्षक" है, "नियंत्रक" नहीं।
- गुप्त सेवा व्यय: सुरक्षा से जुड़े गुप्त ख़र्च के ब्योरे की वह जाँच नहीं कर सकता; उसे सक्षम अधिकारी का प्रमाण-पत्र स्वीकार करना होता है।
- निगमों पर सीमित भूमिका: कई सार्वजनिक निगमों का लेखा-परीक्षण निजी लेखा-परीक्षक करते हैं; वह केवल पूरक लेखा-परीक्षा कर सकता है।
- देरी: प्रतिवेदन प्रायः घटना के एक-दो वर्ष बाद आते हैं, तब तक अधिकारी बदल चुके होते हैं।
- प्रतिवेदन पर कार्रवाई की कमी: लोक लेखा समिति की सिफ़ारिशों पर सरकार की "की गई कार्रवाई" अक्सर अधूरी रहती है।
- "अनुमानित हानि" पर विवाद: 2G स्पेक्ट्रम जैसी रिपोर्टों में बताई गई "अनुमानित हानि" पर आलोचकों ने कहा कि लेखा-परीक्षक नीतिगत निर्णयों का मूल्यांकन करने लगे हैं — इससे "नीति-पक्षाघात" का डर पैदा होता है।
अमेरिकी विशेषज्ञ पॉल एच. एपलबी ने 1953 में भारत सरकार को दिए अपने प्रतिवेदन में कहा कि भारतीय प्रशासन में लेखा-परीक्षा पर अत्यधिक बल दिया जाता है, जिससे अधिकारी निर्णय लेने से डरते हैं और प्रशासन धीमा पड़ता है। उनके अनुसार लेखा-परीक्षक को यह समझने की योग्यता नहीं होती कि प्रशासनिक निर्णय किन परिस्थितियों में लिए गए। इस आलोचना का उत्तर यह दिया जाता है कि निष्पादन-लेखा-परीक्षा ने नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक को केवल "हिसाब मिलाने वाले" से आगे बढ़ाकर "जनता के धन के मूल्य" का प्रहरी बनाया है।
राज्य स्तर पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक का कार्य प्रधान महालेखाकार (लेखा-परीक्षा), राजस्थान, जयपुर के माध्यम से होता है। राज्य से जुड़े प्रतिवेदन — जैसे राज्य वित्त लेखा-परीक्षा प्रतिवेदन (State Finance Audit Report) और निष्पादन लेखा-परीक्षा प्रतिवेदन — अनुच्छेद 151(2) के अंतर्गत राज्यपाल को सौंपे जाते हैं और राजस्थान विधानसभा में रखे जाते हैं। इनमें राज्य की वित्तीय स्थिति, योजनाओं के क्रियान्वयन में कमियाँ व राजस्व हानि जैसे मुद्दे उजागर होते हैं — इन्हें राज्य की लोक लेखा समिति आगे जाँचती है (विस्तार से देखें अध्याय 08 — प्रशासन पर नियंत्रण)।
148 नि(युक्ति) — 149 क(र्तव्य) — 150 प्रा(रूप) — 151 प्र(तिवेदन)। वाक्य: "नियुक्त करो, कर्तव्य दो, प्रारूप बनाओ, प्रतिवेदन लो।"
तीन प्रकार की लेखा-परीक्षा — "अ-वि-नि": अनुपालन, वित्तीय, निष्पादन।
5वित्त आयोग (Finance Commission)
भारत एक संघीय व्यवस्था (Federal System) है, जिसमें केंद्र व राज्यों के बीच वित्तीय संसाधनों का न्यायसंगत बँटवारा एक निरंतर चुनौती है। वित्त आयोग इसी समस्या का संवैधानिक समाधान है — यह एक अर्ध-न्यायिक (Quasi-judicial) निकाय है जो हर पाँच वर्ष में केंद्र-राज्य कर-राजस्व के बँटवारे की सिफ़ारिश करता है।
समस्या की जड़ को "ऊर्ध्वाधर राजकोषीय असंतुलन" (Vertical Fiscal Imbalance) कहते हैं — आयकर, निगम कर, सीमा शुल्क जैसे बड़े और बढ़ते कर केंद्र के पास हैं, जबकि शिक्षा, स्वास्थ्य, पुलिस, कृषि, सड़क जैसे ख़र्चीले काम राज्यों के पास। साथ ही राज्यों के बीच भी अंतर है — कोई राज्य अमीर है, कोई ग़रीब; कोई छोटा, कोई रेगिस्तानी और बड़ा (जैसे राजस्थान) — इसे "क्षैतिज असंतुलन" (Horizontal Imbalance) कहते हैं। वित्त आयोग इन्हीं दोनों असंतुलनों को कम करने का संवैधानिक तंत्र है।
विचारक/प्रवर्तक: संवैधानिक निकाय — अनुच्छेद 280 | वर्ष: 16वाँ वित्त आयोग — अध्यक्ष: डॉ. अरविंद पनगढ़िया
- संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 280 — राष्ट्रपति द्वारा हर 5 वर्ष में (या आवश्यकता होने पर पहले भी) गठित; अध्यक्ष व 4 अन्य सदस्य।
- मुख्य कार्य (Terms of Reference): (i) केंद्र व राज्यों के बीच करों की शुद्ध आय का बँटवारा (Vertical Devolution) (ii) राज्यों के बीच इस आय का वितरण (Horizontal Devolution) (iii) संचित निधि से राज्यों को सहायता अनुदान (Grants-in-Aid) के सिद्धांत (iv) स्थानीय निकायों (पंचायत/नगरपालिका) के संसाधन बढ़ाने हेतु उपाय (v) आपदा प्रबंधन हेतु वित्तीय सिफ़ारिशें।
- 16वाँ वित्त आयोग: डॉ. अरविंद पनगढ़िया की अध्यक्षता में 31 दिसंबर 2023 को गठित; इसकी रिपोर्ट 17 नवंबर 2025 को राष्ट्रपति को सौंपी गई और 1 फ़रवरी 2026 को संसद में प्रस्तुत की गई — यह 2026-27 से 2030-31 तक (5 वर्ष) के लिए सिफ़ारिशें करती है।
- प्रमुख सिफ़ारिशें: राज्यों को केंद्रीय करों में हिस्सेदारी 41% (15वें वित्त आयोग के समान बरक़रार); क्षैतिज बँटवारे में एक नया मापदंड — "GDP में योगदान" को 10% भार (कर एवं राजकोषीय प्रयास मापदंड हटाया गया); ग्रामीण स्थानीय निकायों हेतु लगभग ₹4.35 लाख करोड़ व शहरी स्थानीय निकायों हेतु लगभग ₹3.56 लाख करोड़ के अनुदान; राज्य आपदा प्रबंधन कोष हेतु ₹2,04,401 करोड़।
सोचिए एक संयुक्त परिवार में सबसे बड़ा भाई कमाता है, पर पैसा पूरे परिवार (छोटे भाई-बहनों) में बाँटना है। कौन कितना पाएगा, यह तय करने के लिए एक निष्पक्ष बुज़ुर्ग सदस्य बुलाया जाता है, जो हर सदस्य की ज़रूरत, हैसियत, व योगदान देखकर बँटवारा तय करता है। वित्त आयोग ठीक यही भूमिका निभाता है — केंद्र (जो ज़्यादा टैक्स वसूलता है) और राज्यों (जिन्हें ज़्यादा ख़र्च करना है) के बीच पैसे का निष्पक्ष बँटवारा तय करता है।
5.1 संवैधानिक और वैधानिक ढाँचा
| प्रावधान | विवरण |
|---|---|
| अनुच्छेद 280 | संविधान लागू होने के 2 वर्ष के भीतर और फिर हर 5 वर्ष (या पहले) वित्त आयोग का गठन; अध्यक्ष + 4 सदस्य |
| अनुच्छेद 280(3) | आयोग के विचारणीय विषय; 73वें-74वें संशोधन (1992) से पंचायतों और नगरपालिकाओं के संसाधन बढ़ाने के उपाय भी जुड़े — उप-खंड (bb) और (c) |
| अनुच्छेद 281 | राष्ट्रपति आयोग की सिफ़ारिशें और उन पर की गई कार्रवाई का व्याख्यात्मक ज्ञापन संसद के दोनों सदनों के सामने रखवाते हैं |
| अनुच्छेद 270 | केंद्रीय करों की शुद्ध आय का केंद्र और राज्यों में बँटवारा |
| अनुच्छेद 275 | संचित निधि से ज़रूरतमंद राज्यों को सहायता-अनुदान |
| वित्त आयोग (विविध प्रावधान) अधिनियम, 1951 | अध्यक्ष — सार्वजनिक मामलों का अनुभवी व्यक्ति; सदस्य — उच्च न्यायालय का न्यायाधीश (या योग्य), सरकारी वित्त-लेखा का विशेषज्ञ, वित्तीय मामलों और प्रशासन का अनुभवी, और अर्थशास्त्र का विशेष ज्ञाता; सदस्य पुनर्नियुक्ति के पात्र |
सलाहकारी स्वरूप: वित्त आयोग की सिफ़ारिशें क़ानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं हैं — सरकार चाहे तो न माने। पर व्यवहार में कर-बँटवारे की सिफ़ारिशें लगभग हमेशा स्वीकार की जाती हैं, क्योंकि आयोग एक निष्पक्ष, संवैधानिक "निर्णायक" के रूप में देखा जाता है। इसीलिए इसे अर्ध-न्यायिक निकाय कहते हैं — इसे दीवानी न्यायालय जैसी शक्तियाँ (गवाह बुलाना, दस्तावेज़ मँगाना) प्राप्त हैं।
5.2 ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज बँटवारा

शास्त्रीय अर्थ: ऊर्ध्वाधर — केंद्रीय करों के "विभाज्य पूल" (Divisible Pool) में से राज्यों का कुल हिस्सा; क्षैतिज — उस कुल हिस्से का राज्यों के बीच आपसी बँटवारा।
सरल भाषा में: पहले तय होता है कि "राज्यों की थाली" में कितना आएगा (41%), फिर तय होता है कि उस थाली में से किस राज्य को कितना मिलेगा। उदाहरण: 16वें आयोग में राजस्थान को राज्यों के कुल हिस्से में से 5.93% मिलेगा।
| क्षैतिज बँटवारे के मापदंड | 15वाँ वित्त आयोग | 16वाँ वित्त आयोग |
|---|---|---|
| आय-दूरी (Income Distance) | 45% | 42.5% |
| जनसंख्या (2011 जनगणना) | 15% | 17.5% |
| जनसांख्यिकीय निष्पादन (Demographic Performance) | 12.5% | 10% |
| क्षेत्रफल (Area) | 15% | 10% |
| वन एवं पारिस्थितिकी (Forest & Ecology) | 10% | 10% |
| कर एवं राजकोषीय प्रयास (Tax & Fiscal Effort) | 2.5% | हटाया गया |
| GDP में योगदान (नया मापदंड) | — | 10% |
मापदंडों का अर्थ: आय-दूरी का अर्थ है — किसी राज्य की प्रति व्यक्ति आय सबसे अमीर राज्य से जितनी कम है, उसे उतना अधिक हिस्सा मिलेगा; यह समानता (Equity) का मापदंड है। जनसांख्यिकीय निष्पादन उन राज्यों को पुरस्कृत करता है जिन्होंने जनसंख्या-नियंत्रण में अच्छा काम किया। नया मापदंड "GDP में योगदान" उन राज्यों के लिए है जो देश की अर्थव्यवस्था में अधिक योगदान देते हैं — यह कुशलता (Efficiency) का मापदंड है, जिसकी माँग दक्षिण और पश्चिम के समृद्ध राज्य लंबे समय से कर रहे थे।
| 16वें वित्त आयोग की अन्य प्रमुख सिफ़ारिशें | विवरण |
|---|---|
| कुल सहायता-अनुदान | ₹9,47,409 करोड़ (2026-31) |
| स्थानीय निकाय अनुदान | कुल ₹7,91,493 करोड़ — ग्रामीण ₹4,35,236 करोड़; शहरी ₹3,56,257 करोड़ (जयपुर सहित 22 शहरों में अपशिष्ट-जल प्रबंधन के लिए विशेष घटक) |
| अनुदान की शर्तें | स्थानीय निकायों का गठन, खातों का सार्वजनिक प्रकाशन और राज्य वित्त आयोग का समय पर गठन; बुनियादी अनुदान का आधा भाग खुला, आधा स्वच्छता-जल प्रबंधन से बँधा |
| आपदा प्रबंधन | कुल कोष ₹2,04,401 करोड़ (केंद्र का हिस्सा ₹1,55,916 करोड़); पूर्वोत्तर-हिमालयी राज्यों के लिए 90:10, अन्य के लिए 75:25 |
| राजस्व घाटा अनुदान | बंद किए गए; क्षेत्र-विशेष और राज्य-विशेष अनुदान भी नहीं |
| राजकोषीय अनुशासन | केंद्र का राजकोषीय घाटा 2030-31 तक GDP का 3.5%; राज्यों के लिए GSDP का 3%; बजट से बाहर के उधार बंद कर बजट में लाए जाएँ |
| संयुक्त ऋण | केंद्र-राज्य संयुक्त ऋण GDP के 77.3% (2026-27) से घटकर 73.1% (2030-31) होने का अनुमान |
| अन्य सुधार | बिजली वितरण कंपनियों (DISCOMs) का निजीकरण; सब्सिडी की समीक्षा; 308 निष्क्रिय राज्य सार्वजनिक उपक्रमों की समीक्षा और बंदी |
📌 राजकोषीय स्थिति — नवीनतम अनुमान: 16वें वित्त आयोग के अनुसार केंद्र-राज्य संयुक्त ऋण (Combined Debt) 2026-27 में GDP के 77.3% से घटकर 2030-31 तक 73.1% रह जाने का अनुमान है — यह राजकोषीय समेकन (Fiscal Consolidation) की दिशा में एक सकारात्मक संकेत है।
5.3 वित्त आयोगों की यात्रा
| आयोग | अध्यक्ष | अवधि | राज्यों का हिस्सा |
|---|---|---|---|
| पहला (1951) | के. सी. नियोगी | 1952-57 | — |
| 13वाँ (2007) | डॉ. विजय केलकर | 2010-15 | 32% |
| 14वाँ (2013) | डॉ. वाई. वी. रेड्डी | 2015-20 | 42% (सबसे बड़ी छलाँग) |
| 15वाँ (2017) | एन. के. सिंह | 2020-26 | 41% (जम्मू-कश्मीर के केंद्रशासित प्रदेश बनने से 1% कम) |
| 16वाँ (2023) | डॉ. अरविंद पनगढ़िया | 2026-31 | 41% |
5.4 चुनौतियाँ और आलोचनाएँ
- उपकर और अधिभार (Cess & Surcharge): ये विभाज्य पूल से बाहर रहते हैं, इसलिए राज्यों को इनका हिस्सा नहीं मिलता। केंद्र की कुल कर-आय में इनका भाग बढ़ने से राज्यों का वास्तविक हिस्सा 41% से काफ़ी कम रह जाता है।
- उत्तर-दक्षिण बहस: जनसंख्या को अधिक भार देने से जनसंख्या-नियंत्रण में सफल दक्षिणी राज्य अपने को "दंडित" मानते हैं; 16वें आयोग ने "GDP में योगदान" जोड़कर इस शिकायत को कुछ संतुलित किया।
- विचारणीय विषयों (Terms of Reference) पर विवाद: केंद्र सरकार ही आयोग के विचारणीय विषय तय करती है, इसलिए राज्यों को लगता है कि आयोग की स्वतंत्रता सीमित हो जाती है।
- स्थायी सचिवालय का अभाव: हर आयोग अस्थायी होता है; विशेषज्ञ लंबे समय से स्थायी अनुसंधान-इकाई की माँग करते रहे हैं।
राजस्थान देश का सबसे बड़ा राज्य (क्षेत्रफल) है, इसलिए "क्षेत्रफल" मापदंड का भार घटना (15% से 10%) उसके लिए नुक़सानदेह रहा। 16वें आयोग में राज्यों के कुल हिस्से में राजस्थान का भाग 5.93% है (15वें में 6.03% और 14वें में 5.5%)। स्थानीय निकायों के लिए राजस्थान को ग्रामीण बुनियादी अनुदान ₹25,173 करोड़ और शहरी बुनियादी अनुदान ₹10,145 करोड़ की सिफ़ारिश हुई है; अपशिष्ट-जल प्रबंधन के विशेष घटक में जयपुर शामिल है।
राज्य के भीतर पंचायतों-नगरपालिकाओं को राज्य के करों में हिस्सा दिलाने का काम राज्य वित्त आयोग करता है (अनुच्छेद 243I और 243Y) — विस्तार से देखें अध्याय 10।
42.5 — 17.5 — 10 — 10 — 10 — 10: "बयालीस-आधा आय का, साढ़े-सत्रह जनता का, बाकी चार दस-दस।"
हिस्सा याद रखें: 14वाँ 42, 15वाँ 41, 16वाँ 41 — "बयालीस से इकतालीस, फिर इकतालीस ही।"
6लोकपाल (Lokpal)
भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने हेतु एक स्वतंत्र लोकपाल की माँग दशकों पुरानी है। पहले प्रशासनिक सुधार आयोग (1966-70 — विस्तार से देखें अध्याय 07) ने सबसे पहले केंद्र में "लोकपाल" व राज्यों में "लोकायुक्त" जैसी स्वतंत्र ओम्बड्समैन संस्था बनाने की सिफ़ारिश की थी।
6.1 ओम्बड्समैन — अवधारणा और विदेशी अनुभव
नागरिक जब प्रशासन से पीड़ित होता है तो उसके पारंपरिक उपाय — समाचार-पत्र, अपने विधायक या सांसद को पत्र, अधिकारी या मंत्री से भेंट — अत्यंत सीमित और अपर्याप्त सिद्ध होते हैं; न्यायालय का रास्ता महँगा और लंबा है। इसी कमी को दूर करने के लिए स्कैंडिनेवियाई देशों में "ओम्बड्समैन" (Ombudsman) नाम की संस्था बनी। ओम्बड्समैन का शाब्दिक अर्थ है — "जनता का प्रतिनिधि" या "सार्वजनिक कर्तव्य पर तैनात वकील", जो संसद की ओर से नागरिकों की शिकायतों की जाँच करता है और अपनी रिपोर्ट संसद को देता है।
| देश | वर्ष | टिप्पणी |
|---|---|---|
| स्वीडन | 1809 | दुनिया का पहला ओम्बड्समैन — संसद द्वारा नियुक्त, संसद को रिपोर्ट |
| फ़िनलैंड | 1919 | स्वीडन के बाद दूसरा |
| डेनमार्क | 1955 | आधुनिक "डेनिश मॉडल" — अन्य देशों का आदर्श |
| नॉर्वे | 1962 | स्कैंडिनेवियाई क्रम पूरा |
| न्यूज़ीलैंड | 1962 | संसदीय प्रणाली और सामान्य क़ानून (Common Law) वाला पहला देश |
| ब्रिटेन | 1967 | संसदीय आयुक्त (Parliamentary Commissioner) — व्हायट रिपोर्ट (1961) के बाद |
6.2 भारत में विचार का विकास और प्रशासनिक सुधार आयोग
भारत में 1962-63 से ओम्बड्समैन की चर्चा तेज़ हुई — अगस्त 1962 में नई दिल्ली के विधि सम्मेलन में, और 15 जुलाई 1963 को भारत के मुख्य न्यायाधीश पी. बी. गजेंद्रगडकर ने भारतीय लोक प्रशासन संस्थान (IIPA) के दीक्षांत भाषण में इसकी सिफ़ारिश की। 1963 में ही सांसद डॉ. एल. एम. सिंघवी ने ओम्बड्समैन के लिए भारतीय शब्द "लोकपाल" गढ़ा। उल्लेखनीय है कि राजस्थान प्रशासनिक सुधार समिति (1963) ने भी मंत्रियों सहित उच्च अधिकारियों के विरुद्ध शिकायतों के लिए राज्य-स्तर पर ओम्बड्समैन जैसे आयुक्त की सिफ़ारिश की थी।
प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (5 जनवरी 1966 को गठित; पहले अध्यक्ष मोरारजी देसाई, बाद में के. हनुमंतैया) ने अपने पहले अंतरिम प्रतिवेदन "नागरिकों की शिकायतों के निवारण की समस्याएँ" (1966) में दो-स्तरीय व्यवस्था सुझाई — (1) केंद्र और राज्यों के मंत्रियों और सचिवों के विरुद्ध शिकायतों के लिए लोकपाल; (2) अन्य अधिकारियों के विरुद्ध शिकायतों के लिए केंद्र और हर राज्य में लोकायुक्त। आयोग के अनुसार ये संस्थाएँ कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका — तीनों से स्वतंत्र हों; लोकपाल का दर्जा भारत के मुख्य न्यायाधीश के समान हो; नियुक्ति राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर करें, और प्रधानमंत्री यह सलाह मुख्य न्यायाधीश तथा विपक्ष के नेता से विचार-विमर्श करके दें; और सेवानिवृत्ति के बाद उसे कोई सरकारी पद न मिले।
6.3 1968 से 2013 तक की यात्रा
लोकपाल विधेयक संसद में पहली बार 1968 में पेश हुआ, परंतु अगले चार दशकों में यह 1971, 1977, 1985, 1989, 1996, 1998 व 2001 में बार-बार पेश होने के बावजूद पारित नहीं हो सका — हर बार लोकसभा भंग होने या राजनीतिक सहमति न बनने से यह विधेयक निरस्त हो जाता। स्थिति तब बदली जब 2011 में सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हज़ारे के नेतृत्व में "इंडिया अगेंस्ट करप्शन (India Against Corruption)" आंदोलन ने जन लोकपाल विधेयक (Jan Lokpal Bill) की माँग को लेकर देशव्यापी जन-आंदोलन खड़ा कर दिया — इस दबाव में सरकार को लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013 पारित करना पड़ा।

| विधेयक | मुख्य बात |
|---|---|
| 1968 (9 मई) | लोकसभा से पारित, पर राज्यसभा में लंबित रहते लोकसभा भंग — विधेयक व्यपगत |
| 1971 | प्रधानमंत्री को दायरे से बाहर रखा गया; पाँचवीं लोकसभा भंग होने से व्यपगत |
| 1977 | आपातकाल के अनुभव के बाद पहली बार प्रधानमंत्री को दायरे में लाया गया; लोकपाल को अपनी स्वतंत्र जाँच-व्यवस्था देने का प्रस्ताव |
| 1985 | व्यापक विधेयक लाने के नाम पर 1988 में वापस लिया गया |
| 1996 | अध्यक्ष + 2 सदस्य; अध्यक्ष सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश (वर्तमान या पूर्व); प्रधानमंत्री, मंत्री और सांसद दायरे में; झूठी शिकायत पर दंड |
| 1998 | पूर्व प्रधानमंत्री और पूर्व सांसद भी दायरे में; सांसदों को संपत्ति का ब्योरा देना अनिवार्य; अपराध के 10 वर्ष के भीतर की शिकायतें |
| 2001 | फिर से पेश, पर पारित नहीं |
| 2011-2013 | जन-आंदोलन; संसद की स्थायी समिति; दिसंबर 2013 में दोनों सदनों से पारित |
पुराने विधेयकों में एक दिलचस्प बात यह थी कि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, मुख्य निर्वाचन आयुक्त और लोक सेवा आयोग के सदस्य लोकपाल के दायरे से बाहर रखे गए थे — क्योंकि इनकी स्वतंत्रता के लिए संविधान में पहले से अलग व्यवस्था है।
- CBI की भ्रष्टाचार-निरोधी शाखा लोकपाल के अधीन हो
- न्यायपालिका भी दायरे में हो
- प्रधानमंत्री बिना किसी अपवाद के दायरे में
- सभी स्तरों के कर्मचारी सीधे लोकपाल के अधीन
- नागरिक अधिकार-पत्र (Citizen's Charter) का उल्लंघन भी शिकायत का आधार
- CBI अलग रही; लोकपाल को केवल उसके भेजे मामलों में अधीक्षण
- न्यायपालिका दायरे से बाहर
- प्रधानमंत्री दायरे में, पर कई विषयों में छूट और पूर्ण पीठ की अनुमति ज़रूरी
- समूह ग-घ के मामले केंद्रीय सतर्कता आयोग के माध्यम से
- शिकायत-निवारण का अलग क़ानून (नागरिक अधिकार-पत्र विधेयक) पारित नहीं हुआ
6.4 लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013
विचारक/प्रवर्तक: सांविधिक निकाय — लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013 | वर्ष: गठन: 2019 — पहले अध्यक्ष न्यायमूर्ति पिनाकी चंद्र घोष
- स्वरूप: लोकपाल एक सांविधिक (Statutory) निकाय है — संवैधानिक नहीं — जो केंद्र सरकार के अधिकारियों व राजनेताओं के विरुद्ध भ्रष्टाचार की शिकायतों की जाँच करता है।
- गठन: 1 अध्यक्ष + अधिकतम 8 सदस्य (जिनमें कम से कम 50% न्यायिक सदस्य होने चाहिए); अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति एक चयन समिति करती है जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, लोकसभा में विपक्ष के नेता, भारत के मुख्य न्यायाधीश (या नामित न्यायाधीश) व एक प्रख्यात विधिवेत्ता शामिल होते हैं।
- क्षेत्राधिकार (Jurisdiction): प्रधानमंत्री (कुछ सुरक्षा-कवचों सहित — अंतरराष्ट्रीय संबंध, सुरक्षा, लोक व्यवस्था, परमाणु ऊर्जा व अंतरिक्ष जैसे विषय बाहर; अन्य मामलों में भी जाँच तभी, जब पूर्ण पीठ दो-तिहाई बहुमत से निर्णय ले), केंद्रीय मंत्री, सांसद, तथा केंद्र सरकार के सभी समूह क/ख/ग/घ कर्मचारी व सरकारी वित्त-पोषित निकायों के अधिकारी।
- प्रक्रिया: शिकायत मिलने पर 90 दिन में प्रारंभिक जाँच (Preliminary Inquiry) व 6 माह में पूर्ण अन्वेषण (Investigation) पूर्ण करने का प्रावधान।
- वर्तमान अध्यक्ष (फ़रवरी 2024 से): न्यायमूर्ति ए. एम. खानविलकर — भारत के दूसरे लोकपाल अध्यक्ष, जिन्होंने प्रथम अध्यक्ष न्यायमूर्ति पिनाकी चंद्र घोष (कार्यकाल समाप्ति: मई 2022) का स्थान लिया।

| प्रावधान | विवरण |
|---|---|
| पारित और लागू | दिसंबर 2013 में संसद से पारित; 1 जनवरी 2014 को राष्ट्रपति की स्वीकृति; 16 जनवरी 2014 से लागू |
| अध्यक्ष की योग्यता | भारत का पूर्व मुख्य न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय का पूर्व न्यायाधीश, या भ्रष्टाचार-निरोध, लोक प्रशासन, सतर्कता, वित्त, क़ानून या प्रबंधन में कम से कम 25 वर्ष का अनुभव रखने वाला प्रख्यात व्यक्ति |
| सामाजिक प्रतिनिधित्व | कम से कम आधे सदस्य अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक और महिलाओं में से |
| कार्यकाल | 5 वर्ष या 70 वर्ष की आयु, जो पहले हो; बाद में कोई सरकारी पद नहीं |
| खोज-समिति | कम से कम 7 सदस्य — चयन-समिति के लिए नामों का पैनल तैयार करती है |
| जाँच और अभियोजन शाखा | लोकपाल की अपनी जाँच शाखा (जाँच निदेशक) और अभियोजन शाखा (अभियोजन निदेशक); लोकपाल द्वारा भेजे गए मामलों में CBI पर अधीक्षण |
| समूह क-ख बनाम ग-घ | समूह क और ख के अधिकारियों की प्रारंभिक जाँच के बाद केंद्रीय सतर्कता आयोग की रिपोर्ट लोकपाल को; समूह ग और घ के मामलों में आयोग अपने अधिनियम के अनुसार कार्रवाई करता है |
| शक्तियाँ | दीवानी न्यायालय जैसी शक्तियाँ; भ्रष्ट तरीक़े से अर्जित संपत्ति की कुर्की; जाँच के दौरान अधिकारी के स्थानांतरण या निलंबन की सिफ़ारिश |
| विशेष न्यायालय | मुक़दमे की सुनवाई 1 वर्ष में (अधिकतम 2 वर्ष तक बढ़ सकती है) |
| लोकायुक्त (धारा 63) | हर राज्य अधिनियम लागू होने के 1 वर्ष के भीतर लोकायुक्त बनाए — पर उसका ढाँचा राज्य स्वयं तय करें |
| झूठी शिकायत | दंड का प्रावधान (कारावास और जुर्माना) |
| आदर्श वाक्य | ईशोपनिषद् से — "मा गृधः कस्यस्विद्धनम्" (किसी के धन का लोभ मत करो) |
सोचिए स्कूल में अगर कोई टीचर ग़लत काम करे, तो बच्चे सीधे प्रिंसिपल को नहीं बल्कि एक स्वतंत्र "शिकायत समिति" को बता सकें जो प्रिंसिपल के दबाव में न हो। लोकपाल भी वैसा ही एक स्वतंत्र निकाय है — नागरिक बड़े से बड़े नेता या अधिकारी के भ्रष्टाचार की शिकायत सीधे उस निकाय तक पहुँचा सकते हैं, जो सरकार के दबाव से मुक्त रहकर जाँच करता है।
6.5 लोकपाल की सीमाएँ और आलोचना
- देर से गठन: अधिनियम 2014 में लागू हुआ, पर पहला लोकपाल मार्च 2019 में नियुक्त हुआ — एक कारण यह था कि 2014 के बाद लोकसभा में मान्यता-प्राप्त "विपक्ष का नेता" नहीं था। सर्वोच्च न्यायालय ने कॉमन कॉज़ बनाम भारत संघ (2017) में कहा कि विपक्ष के नेता के बिना भी नियुक्ति आगे बढ़ाई जाए।
- शिकायतों का निपटारा: बड़ी संख्या में शिकायतें निर्धारित प्रारूप में न होने के कारण शुरुआत में ही ख़ारिज होती रही हैं; बहुत कम मामलों में पूर्ण अन्वेषण तक बात पहुँची।
- स्वतंत्र तंत्र पर निर्भरता: लोकपाल अब भी काफ़ी हद तक CBI और केंद्रीय सतर्कता आयोग जैसी सरकारी एजेंसियों पर निर्भर है; जाँच और अभियोजन शाखाओं का पूर्ण विकास धीमा रहा।
- न्यायपालिका दायरे से बाहर, और व्हिसलब्लोअर (भ्रष्टाचार उजागर करने वाले) को सुरक्षा देने वाला 2014 का क़ानून प्रभावी रूप से लागू नहीं हो सका।
- राज्यों में असमानता: धारा 63 के बावजूद लोकायुक्तों की शक्तियाँ अलग-अलग राज्यों में बहुत भिन्न हैं — कहीं अपनी जाँच एजेंसी है, कहीं केवल सलाहकारी भूमिका।
एक पुरानी पर आज भी सच्ची चेतावनी — "लोकपाल प्रशासनिक सुधारों का विकल्प नहीं है।" जहाँ भ्रष्टाचार व्यापक हो और कार्यकुशलता कम, वहाँ केवल एक संस्था बना देने से काम नहीं चलेगा; पूरे प्रशासन में सुधार चाहिए। फिर भी, कमज़ोरियों के बावजूद ऐसे संस्थान का होना न होने से बेहतर है — इसकी उपस्थिति मात्र से अधिकारियों में संयम आता है।
6.6 राज्यों में लोकायुक्त
| राज्य लोकायुक्त | स्थापना वर्ष |
|---|---|
| ओडिशा (सबसे पहला — अधिनियम) | 1970 |
| महाराष्ट्र (पहली नियुक्ति) | 1972 |
| राजस्थान | 1973 |
| बिहार | 1974 |
| उत्तर प्रदेश | 1975 |
| कर्नाटक | 1979 |
| मध्य प्रदेश | 1981 |
| आंध्र प्रदेश | 1983 |
| गुजरात, हिमाचल प्रदेश | 1983-86 |
राज्य लोकायुक्त अधिनियमों के सामान्य प्रावधान: (1) नियुक्ति राज्यपाल करते हैं — मुख्यमंत्री और विपक्ष के नेता (कई राज्यों में उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश भी) से परामर्श के बाद; (2) लोकायुक्त मंत्रियों और सचिवों के विरुद्ध, उप-लोकायुक्त उससे नीचे के अधिकारियों के विरुद्ध शिकायतें देखते हैं; (3) लोकायुक्त का दर्जा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के बराबर; (4) जाँच-प्रक्रिया गोपनीय; (5) हटाने की प्रक्रिया कठिन।
राजस्थान ने 1973 में ही (ओडिशा व महाराष्ट्र के बाद देश का तीसरा राज्य) राजस्थान लोकायुक्त तथा उप-लोकायुक्त अधिनियम, 1973 के तहत लोकायुक्त संस्था स्थापित कर दी थी — जो राज्य के मंत्रियों व अधिकारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार और कुप्रशासन की शिकायतों की जाँच करती है। ध्यान रहे — राजस्थान लोकायुक्त मुख्यतः सिफ़ारिशी संस्था है; उसके पास अपनी अभियोजन-शक्ति नहीं है (विस्तृत वर्तमान लोकायुक्त व क्षेत्राधिकार — देखें अध्याय 10, राज्य प्रशासन)। राज्य में भ्रष्टाचार के आपराधिक मामलों की जाँच भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) करता है।
केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC): 1964 में संथानम समिति (1962-64) की सिफ़ारिश पर कार्यकारी संकल्प से बना; 2003 के अधिनियम से सांविधिक दर्जा मिला। यह केंद्र सरकार के विभागों में सतर्कता की निगरानी करता है और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के मामलों में CBI के कार्य पर अधीक्षण रखता है।
केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI): दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 के अंतर्गत; 1963 में गृह मंत्रालय के संकल्प से वर्तमान नाम मिला। यह जाँच एजेंसी है, शिकायत-निवारण संस्था नहीं।
लोकपाल: उच्च राजनीतिक पदधारियों (प्रधानमंत्री, मंत्री, सांसद) तक के विरुद्ध शिकायत सुनने वाली सर्वोच्च भ्रष्टाचार-निरोधी संस्था; CVC और CBI दोनों लोकपाल द्वारा भेजे गए मामलों में उसे रिपोर्ट करते हैं।
1 अध्यक्ष + 8 सदस्य; आधे न्यायिक, आधे वंचित-वर्गों से; कार्यकाल 5 वर्ष या 70 वर्ष; प्रारंभिक जाँच 90 दिन, अन्वेषण 6 माह।
चयन-समिति — "प्र-अ-वि-न्या-वि": प्रधानमंत्री, (लोकसभा) अध्यक्ष, विपक्ष नेता, (मुख्य) न्यायाधीश, विधिवेत्ता।
7नीति आयोग (NITI Aayog)
1950 में स्थापित योजना आयोग (Planning Commission) दशकों तक भारत की पंचवर्षीय योजनाओं व संसाधन-आवंटन का केंद्र रहा। परंतु बदलते आर्थिक परिवेश — बाज़ार-आधारित अर्थव्यवस्था, राज्यों की बढ़ती भूमिका — के मद्देनज़र इसे 1 जनवरी 2015 से नीति आयोग (NITI Aayog — National Institution for Transforming India, अर्थात् "राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्थान") से प्रतिस्थापित किया गया।
7.1 पृष्ठभूमि — योजना आयोग का उदय और अंत
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1934 | एम. विश्वेश्वरैया की पुस्तक "Planned Economy for India" — देश की आय दुगुनी करने के लिए 10 वर्षीय योजना का विचार |
| 1938 | कांग्रेस की राष्ट्रीय योजना समिति (अध्यक्ष — जवाहरलाल नेहरू) |
| 1946 | के. सी. नियोगी की अध्यक्षता में सलाहकार योजना बोर्ड (Advisory Planning Board) |
| 1950 (15 मार्च) | मंत्रिमंडल के संकल्प से योजना आयोग — न संवैधानिक, न सांविधिक; अध्यक्ष — प्रधानमंत्री |
| 1951 | पहली पंचवर्षीय योजना (1951-56) |
| 1952 (6 अगस्त) | राष्ट्रीय विकास परिषद् (NDC) — योजनाओं को अंतिम स्वीकृति देने वाला सर्वोच्च परामर्शदात्री निकाय |
| 2012-17 | बारहवीं (अंतिम) पंचवर्षीय योजना |
| 2014 (15 अगस्त) | प्रधानमंत्री ने लाल क़िले से योजना आयोग को समाप्त करने की घोषणा की |
| 2015 (1 जनवरी) | मंत्रिमंडल के संकल्प से नीति आयोग अस्तित्व में आया |
योजना आयोग की आलोचना होती थी कि वह "सुपर कैबिनेट" और "समानांतर मंत्रिमंडल" की तरह काम करता है, राज्यों पर "एक जैसी योजनाएँ" थोपता है (One size fits all) और योजना-अनुदान के माध्यम से राज्यों पर केंद्र का नियंत्रण बढ़ाता है — इसीलिए उसे केंद्रीकरण का प्रतीक माना गया (देखें अध्याय 03)। 1991 के बाद उदारीकरण से बाज़ार की भूमिका बढ़ी, और "केंद्र से नियोजित" अर्थव्यवस्था का मॉडल पुराना पड़ गया। प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग ने भी सुझाव दिया था कि योजना आयोग विशेषज्ञ परामर्शदात्री निकाय बने और मंत्री उसके सदस्य न हों। पॉल एपलबी ने भी कहा था कि "योजना आयोग का कार्य योजना बनाना है, योजनाओं को लागू करना नहीं।"
विचारक/प्रवर्तक: सरकारी संकल्प (Executive Resolution) द्वारा गठित नीति थिंक-टैंक | वर्ष: स्थापना: 1 जनवरी 2015
- स्वरूप: नीति आयोग कोई संवैधानिक या सांविधिक निकाय नहीं, बल्कि एक कार्यकारी प्रस्ताव (Cabinet Resolution) से बना "नीति थिंक-टैंक (Policy Think-Tank)" है — योजना आयोग के विपरीत, इसके पास धन आवंटन (Fund Allocation) की शक्ति नहीं है, यह केवल नीतिगत सुझाव व दिशा देता है।
- गठन: अध्यक्ष — प्रधानमंत्री (पदेन); उपाध्यक्ष (Vice-Chairperson) — अप्रैल 2026 से डॉ. अशोक कुमार लाहिड़ी, जिन्होंने सुमन बेरी का स्थान लिया; मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) — जुलाई 2026 से अनुराग जैन (बी. वी. आर. सुब्रह्मण्यम का कार्यकाल फ़रवरी 2026 में पूरा होने के बाद कुछ समय निधि छिब्बर के पास अतिरिक्त प्रभार रहा); शासी परिषद (Governing Council) में सभी राज्यों के मुख्यमंत्री व केंद्रशासित प्रदेशों के उपराज्यपाल शामिल।
- मुख्य कार्य: सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) व प्रतिस्पर्धी संघवाद (Competitive Federalism) को बढ़ावा देना; दीर्घकालिक नीतिगत ढाँचा (जैसे "विकसित भारत @2047") तैयार करना; आकांक्षी ज़िला कार्यक्रम (Aspirational Districts Programme) के माध्यम से पिछड़े ज़िलों का विकास; SDG इंडिया इंडेक्स के माध्यम से राज्यों के सतत विकास लक्ष्यों की प्रगति मापना।
योजना आयोग एक "ख़ज़ांची (Treasurer)" जैसा था — वह तय करता था कि किस राज्य/विभाग को कितना पैसा मिलेगा। नीति आयोग एक "सलाहकार (Advisor)" जैसा है — वह पैसा नहीं बाँटता, बल्कि सुझाव देता है कि किस दिशा में आगे बढ़ना बेहतर होगा, और राज्यों को ख़ुद अपनी प्राथमिकताएँ तय करने की आज़ादी देता है। यही फ़र्क़ है केंद्रीकृत नियंत्रण (योजना आयोग) और सहयोगी मार्गदर्शन (नीति आयोग) में।
7.2 संरचना

| घटक | संरचना | वर्तमान स्थिति (2026) |
|---|---|---|
| अध्यक्ष | प्रधानमंत्री (पदेन) | प्रधानमंत्री |
| उपाध्यक्ष | प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त; कैबिनेट मंत्री का दर्जा | डॉ. अशोक कुमार लाहिड़ी (अप्रैल 2026); पहले उपाध्यक्ष — डॉ. अरविंद पनगढ़िया (2015) |
| पूर्णकालिक सदस्य | राज्य मंत्री का दर्जा | राजीव गौबा, प्रो. के. वी. राजू, प्रो. गोबर्धन दास, डॉ. एम. श्रीनिवास, प्रो. अभय करंदीकर (अप्रैल 2026 का पुनर्गठन) |
| अंशकालिक सदस्य | विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों से अधिकतम 2, बारी-बारी से | — |
| पदेन सदस्य | केंद्रीय मंत्रिपरिषद् से अधिकतम 4, प्रधानमंत्री द्वारा नामित | प्रधानमंत्री द्वारा नामित मंत्री |
| विशेष आमंत्रित | विशेषज्ञ और मंत्री, प्रधानमंत्री द्वारा नामित | — |
| मुख्य कार्यकारी अधिकारी | भारत सरकार के सचिव स्तर का; निश्चित अवधि | अनुराग जैन (जुलाई 2026; 2 वर्ष या अगले आदेश तक); पहली CEO — सिंधुश्री खुल्लर |
| शासी परिषद | प्रधानमंत्री, सभी राज्यों और विधानमंडल वाले केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री, अन्य केंद्रशासित प्रदेशों के उपराज्यपाल | पहली बैठक — 8 फ़रवरी 2015 |
| क्षेत्रीय परिषदें | एक से अधिक राज्यों से जुड़े विशेष मुद्दों के लिए, निश्चित अवधि हेतु; प्रधानमंत्री या उनके नामित व्यक्ति की अध्यक्षता | आवश्यकता के अनुसार |
7.3 उद्देश्य और कार्य
1 जनवरी 2015 के संकल्प में नीति आयोग के उद्देश्य बताए गए हैं — (1) राज्यों की सक्रिय भागीदारी से राष्ट्रीय विकास की प्राथमिकताओं पर साझा दृष्टिकोण बनाना; (2) "सशक्त राज्य ही सशक्त राष्ट्र" के सिद्धांत पर सहकारी संघवाद को बढ़ावा देना; (3) ग्राम-स्तर पर विश्वसनीय योजनाएँ बनाने का ढाँचा तैयार करना; (4) राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों को आर्थिक नीति में शामिल करना; (5) समाज के उन वर्गों पर विशेष ध्यान देना जिन्हें आर्थिक प्रगति का पर्याप्त लाभ नहीं मिला; (6) दीर्घकालिक नीति और कार्यक्रम-ढाँचा बनाकर उसकी प्रगति की निगरानी करना; (7) शोध संस्थानों और विशेषज्ञों का "ज्ञान-भंडार" (Knowledge Hub) बनना; (8) अंतर-विभागीय और अंतर-राज्यीय मुद्दों के समाधान का मंच देना; (9) कार्यक्रमों का सक्रिय मूल्यांकन करना।
| प्रमुख पहलें | वर्ष | उद्देश्य |
|---|---|---|
| अटल नवाचार मिशन (AIM) | 2016 | स्कूलों में अटल टिंकरिंग लैब, स्टार्टअप इन्क्यूबेटर — नवाचार और उद्यमिता |
| आकांक्षी ज़िला कार्यक्रम | जनवरी 2018 | 112 पिछड़े ज़िलों में स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, आधारभूत ढाँचे आदि संकेतकों पर "सहयोग, समन्वय, प्रतिस्पर्धा" |
| SDG इंडिया इंडेक्स | 2018 से | सतत विकास लक्ष्यों पर राज्यों की रैंकिंग — प्रतिस्पर्धी संघवाद |
| आकांक्षी ब्लॉक कार्यक्रम | जनवरी 2023 | 500 पिछड़े ब्लॉकों पर वही मॉडल |
| राजकोषीय स्वास्थ्य सूचकांक (Fiscal Health Index) | जनवरी 2025 | 18 बड़े राज्यों की वित्तीय सेहत की तुलना — 5 उप-सूचकांक |
| विकास निगरानी एवं मूल्यांकन कार्यालय (DMEO) | 2015 से | सरकारी योजनाओं का स्वतंत्र मूल्यांकन |
| राज्य सहायता मिशन (State Support Mission) | 2023-24 से | राज्यों में "राज्य-स्तरीय नीति आयोग" जैसी संस्थाएँ बनाने में सहायता |
| विकसित भारत @2047 | 2023 से | स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष तक विकसित भारत का दीर्घकालिक दृष्टि-पत्र |
7.4 योजना आयोग बनाम नीति आयोग (Planning Commission vs NITI Aayog)
- केंद्रीकृत, "ऊपर से नीचे" (Top-down) दृष्टिकोण — केंद्र राज्यों को योजना बताता था।
- धन आवंटन की शक्ति — पंचवर्षीय योजनाओं के लिए बजट तय करता था।
- राज्यों की सीमित भूमिका/परामर्श — राष्ट्रीय विकास परिषद् के माध्यम से।
- अध्यक्ष: प्रधानमंत्री; उपाध्यक्ष को कैबिनेट मंत्री का दर्जा।
- नियोजन की प्रकृति — केंद्रीकृत और मात्रात्मक (लक्ष्य-आधारित)।
- विकेंद्रीकृत, "नीचे से ऊपर" (Bottom-up) दृष्टिकोण — राज्यों को अधिक स्वायत्तता।
- केवल नीतिगत थिंक-टैंक — कोई सीधा धन आवंटन नहीं (यह अब वित्त मंत्रालय व वित्त आयोग के माध्यम से होता है)।
- शासी परिषद में सभी मुख्यमंत्रियों की सक्रिय भागीदारी — सहकारी संघवाद पर बल।
- अध्यक्ष: प्रधानमंत्री; उपाध्यक्ष व मुख्य कार्यकारी अधिकारी दोनों प्रमुख पद।
- नियोजन की प्रकृति — संकेतात्मक (Indicative) और गुणात्मक।
| आधार | वित्त आयोग | योजना आयोग (पूर्व) | नीति आयोग |
|---|---|---|---|
| वैधानिक आधार | संवैधानिक (अनुच्छेद 280) | कार्यकारी संकल्प (1950) | कार्यकारी संकल्प (2015) |
| स्वरूप | अस्थायी — हर 5 वर्ष पर नया | स्थायी | स्थायी |
| धन का हस्तांतरण | करों का बँटवारा और अनुदान — "सांविधिक हस्तांतरण" | योजना-अनुदान — "विवेकाधीन हस्तांतरण" | कोई धन-आवंटन नहीं |
| राज्यों की भूमिका | आयोग राज्यों से परामर्श करता है | राष्ट्रीय विकास परिषद् के माध्यम से | शासी परिषद् के सदस्य |
| मुख्य भूमिका | राजकोषीय संघवाद का "निर्णायक" | केंद्रीकृत नियोजक | नीति-सलाहकार और थिंक-टैंक |
समानताएँ: दोनों ही गैर-संवैधानिक और गैर-सांविधिक हैं; दोनों मंत्रिमंडल के संकल्प से बने; और दोनों के अध्यक्ष प्रधानमंत्री।
7.5 आलोचना
- वैधानिक आधार नहीं: केवल कार्यकारी संकल्प से बना है, इसलिए इसकी स्वतंत्रता और स्थायित्व सरकार की इच्छा पर निर्भर है।
- "दाँत-विहीन" संस्था: धन-आवंटन की शक्ति न होने से राज्यों पर इसका प्रभाव सीमित है; योजनागत अनुदान का अधिकार वित्त मंत्रालय के पास चला गया।
- शासी परिषद की अनियमित बैठकें: कई मुख्यमंत्री बैठकों का बहिष्कार करते रहे हैं; आलोचकों के अनुसार सहकारी संघवाद व्यवहार में कमज़ोर है।
- राष्ट्रीय विकास परिषद् का प्रश्न: NDC की अंतिम बैठक 27 दिसंबर 2012 को हुई; उसे औपचारिक रूप से भंग किए बिना निष्क्रिय छोड़ दिया गया।
- "सरकार का प्रवक्ता" होने का आरोप: कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि स्वतंत्र थिंक-टैंक के बजाय यह सरकार की नीतियों का समर्थक मंच बनता जा रहा है।
राजस्थान के पाँच आकांक्षी ज़िले हैं — बारां, धौलपुर, जैसलमेर, करौली और सिरोही। इन ज़िलों में स्वास्थ्य-पोषण, शिक्षा, कृषि-जल संसाधन, वित्तीय समावेशन-कौशल विकास और आधारभूत ढाँचे के संकेतकों पर हर महीने प्रगति मापी जाती है। राज्य के मुख्यमंत्री नीति आयोग की शासी परिषद के सदस्य हैं। राज्य स्तर पर नियोजन के लिए राजस्थान राज्य योजना मंडल 1973 में बना था (1963 की हरिश्चंद्र माथुर समिति ने राज्य आयोजना एवं विकास आयोग का सुझाव दिया था); राज्य ने "विकसित राजस्थान @2047" विज़न दस्तावेज़ भी तैयार किया है।
National Institution for Transforming India — "राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्थान"।
तिथियाँ: "15 मार्च 1950 — योजना; 1 जनवरी 2015 — नीति"। "पंद्रह को जन्मा योजना, पंद्रह (2015) में आई नीति"।
8सार-तुलना और समय-रेखा
| संस्था | आधार | प्रमुख / कार्यकाल | हटाने की प्रक्रिया | वर्तमान प्रमुख |
|---|---|---|---|---|
| संघ लोक सेवा आयोग | अनुच्छेद 315-323 | अध्यक्ष + सदस्य; 6 वर्ष / 65 वर्ष | कदाचार पर सर्वोच्च न्यायालय की जाँच | डॉ. अजय कुमार |
| निर्वाचन आयोग | अनुच्छेद 324 | CEC + 2 आयुक्त; 6 वर्ष / 65 वर्ष | CEC — सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जैसी | ज्ञानेश कुमार |
| नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक | अनुच्छेद 148-151 | एक व्यक्ति; 6 वर्ष / 65 वर्ष | सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जैसी | के. संजय मूर्ति |
| वित्त आयोग | अनुच्छेद 280 | अध्यक्ष + 4; हर 5 वर्ष पर नया | अस्थायी निकाय | डॉ. अरविंद पनगढ़िया (16वाँ) |
| लोकपाल | 2013 का अधिनियम | अध्यक्ष + 8; 5 वर्ष / 70 वर्ष | सर्वोच्च न्यायालय की जाँच के बाद राष्ट्रपति | न्यायमूर्ति ए. एम. खानविलकर |
| नीति आयोग | 2015 का संकल्प | अध्यक्ष — प्रधानमंत्री | सरकार की इच्छा पर | उपाध्यक्ष — अशोक कुमार लाहिड़ी |
| स्वतंत्रता का कवच | UPSC अध्यक्ष | CEC | CAG | लोकपाल अध्यक्ष |
|---|---|---|---|---|
| सुरक्षित कार्यकाल | हाँ | हाँ | हाँ | हाँ |
| कठिन निष्कासन | सर्वोच्च न्यायालय की जाँच | महाभियोग जैसी प्रक्रिया | महाभियोग जैसी प्रक्रिया | सर्वोच्च न्यायालय की जाँच |
| व्यय संचित निधि पर भारित | हाँ | नहीं | हाँ | हाँ |
| सेवानिवृत्ति के बाद सरकारी पद पर रोक | हाँ | नहीं | हाँ | हाँ |
निष्कर्ष: ये छह संस्थाएँ मिलकर भारतीय लोकतंत्र की "जवाबदेही की शृंखला" बनाती हैं — योग्य अधिकारी चुने जाएँ (संघ लोक सेवा आयोग), सरकार निष्पक्ष चुनाव से बने (निर्वाचन आयोग), जनता का धन सही ख़र्च हो (नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक), संसाधनों का न्यायसंगत बँटवारा हो (वित्त आयोग), भ्रष्टाचार पर अंकुश लगे (लोकपाल) और देश की दिशा दूरदर्शी हो (नीति आयोग)। इनकी शक्ति काग़ज़ के प्रावधानों से कम और इनके पदधारियों की निष्पक्षता तथा जनता के विश्वास से अधिक आती है।
समय-रेखा — प्रशासनिक संस्थाओं के प्रमुख पड़ाव
| वर्ष/अनुच्छेद | विषय |
|---|---|
| 1809 | स्वीडन में दुनिया का पहला ओम्बड्समैन |
| 1854 | मैकॉले समिति — खुली प्रतियोगी परीक्षा का सिद्धांत |
| 1860 | सर एडवर्ड ड्रमंड — भारत के पहले महालेखाकार |
| 1926 (1 अक्टूबर) | लोक सेवा आयोग की स्थापना (सर रॉस बार्कर) — UPSC का पूर्ववर्ती स्वरूप |
| 1935 | भारत शासन अधिनियम — संघीय लोक सेवा आयोग |
| 1949 | राजस्थान लोक सेवा आयोग का गठन (अध्यादेश 20 अगस्त; गठन 22 दिसंबर) |
| 1950 (25 जनवरी) | भारत निर्वाचन आयोग की स्थापना — राष्ट्रीय मतदाता दिवस इसी दिन |
| 1950 (26 जनवरी) | संघ लोक सेवा आयोग को संवैधानिक दर्जा (अनुच्छेद 315-323) |
| 1950 (15 मार्च) | योजना आयोग की स्थापना — केंद्रीकृत योजना-निर्माण युग की शुरुआत |
| 1951 | पहला वित्त आयोग (के. सी. नियोगी); वित्त आयोग (विविध प्रावधान) अधिनियम |
| 1963 | डॉ. एल. एम. सिंघवी ने "लोकपाल" शब्द गढ़ा; राजस्थान प्रशासनिक सुधार समिति (हरिश्चंद्र माथुर) |
| 1966-70 | प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग — सबसे पहले लोकपाल/लोकायुक्त की सिफ़ारिश (देखें अध्याय 07) |
| 1968 | पहला लोकपाल विधेयक |
| 1970 | ओडिशा — लोकायुक्त अधिनियम बनाने वाला पहला राज्य |
| 1971 | नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कर्तव्य, शक्तियाँ और सेवा-शर्तें) अधिनियम |
| 1973 | राजस्थान लोकायुक्त अधिनियम पारित; राजस्थान राज्य योजना मंडल |
| 1976 | कोठारी समिति — तीन-चरणीय सिविल सेवा परीक्षा (1979 से); संघ के लेखों का लेखा-परीक्षा से पृथक्करण |
| 1993 (1 अक्टूबर) | निर्वाचन आयोग स्थायी रूप से त्रि-सदस्यीय; EPIC पहचान-पत्र |
| 2004 | लोकसभा चुनाव में सभी निर्वाचन क्षेत्रों में EVM |
| 2011 | अन्ना हज़ारे — इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन |
| 2013 | लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम पारित (1 जनवरी 2014 को स्वीकृति); NOTA |
| 2015 (1 जनवरी) | नीति आयोग की स्थापना — योजना आयोग का स्थान लिया |
| 2018 | आकांक्षी ज़िला कार्यक्रम (112 ज़िले, राजस्थान के 5) |
| 2019 | न्यायमूर्ति पिनाकी चंद्र घोष — प्रथम लोकपाल अध्यक्ष; सभी मतदान केंद्रों पर VVPAT |
| 2023 | अनूप बरनवाल निर्णय (मार्च); मुख्य निर्वाचन आयुक्त नियुक्ति अधिनियम (दिसंबर); 16वाँ वित्त आयोग गठित (31 दिसंबर) |
| 2024 | न्यायमूर्ति ए. एम. खानविलकर लोकपाल अध्यक्ष; चुनावी बॉन्ड योजना निरस्त; के. संजय मूर्ति CAG (नवंबर) |
| 2025 | ज्ञानेश कुमार मुख्य निर्वाचन आयुक्त (फ़रवरी); डॉ. अजय कुमार UPSC अध्यक्ष (मई); मतदाता-सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण |
| 2026 | 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट संसद में (1 फ़रवरी); नीति आयोग का पुनर्गठन — उपाध्यक्ष अशोक कुमार लाहिड़ी (अप्रैल), CEO अनुराग जैन (जुलाई) |
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