कल्पना कीजिए — राजस्थान के किसी सुदूर ज़िले में भीषण अकाल पड़ा है। कलेक्टर साहब को न सिर्फ़ राहत-कार्य चलाना है, बल्कि सैकड़ों पटवारियों, तहसीलदारों और स्वयंसेवकों को प्रेरित (Motivate) भी करना है कि वे दिन-रात काम करें। यहीं से शुरू होता है "नेतृत्व (Leadership)" का सवाल — कलेक्टर कैसा व्यवहार करे कि लोग उसके पीछे चलें?
कलेक्टर अपने निर्देश गाँव-गाँव तक कैसे पहुँचाए, और गाँव की असली स्थिति उसे समय पर कैसे पता चले — यह है "संचार (Communication)"। अगर संदेश बीच में बदल जाए, या पटवारी डर के कारण सही आँकड़े ऊपर न भेजे, तो सबसे अच्छी योजना भी असफल हो जाती है।
और अगर लगातार काम के बावजूद कर्मचारियों का हौसला बना रहे, थकान के बावजूद वे उत्साहित रहें, एक-दूसरे का साथ दें — यही है "मनोबल (Morale)"। ये तीनों — नेतृत्व, संचार और मनोबल — मिलकर "प्रशासनिक व्यवहार (Administrative Behaviour)" कहलाते हैं, यानी यह अध्ययन कि प्रशासन में लोग वास्तव में कैसा व्यवहार करते हैं, न कि केवल यह कि काग़ज़ी नियम क्या कहते हैं।
इस अध्याय में हम यही समझेंगे कि एक अच्छा नेता कैसे बनता है, संदेश सही ढंग से कैसे पहुँचता है, और कर्मचारियों का मनोबल कैसे ऊँचा रखा जाता है। हर बात को हम सरकारी दफ़्तर, ज़िला प्रशासन और रोज़मर्रा के उदाहरणों से जोड़कर पढ़ेंगे।
1. प्रशासनिक व्यवहार — अर्थ, महत्व और तीन स्तंभ
2. नेतृत्व (Leadership) — अर्थ, परिभाषाएँ, प्रकृति और नेता बनाम प्रबंधक
3. नेतृत्व के शक्ति-स्रोत — फ्रेंच और रेवन के पाँच आधार
4. नेतृत्व के सिद्धांत — महान पुरुष, गुण (स्टॉगडिल), व्यवहारवादी (आयोवा, ओहायो, मिशिगन, लिकर्ट, प्रबंधकीय ग्रिड)
5. परिस्थितिजन्य सिद्धांत — फीडलर, टैननबॉम-श्मिट, मार्ग-लक्ष्य, हर्सी-ब्लैंचर्ड, व्रूम-येटन, रेडिन
6. आधुनिक नेतृत्व — रूपांतरणकारी बनाम लेन-देनकारी (बर्न्स, बास) और सेवक नेतृत्व (ग्रीनलीफ़)
7. नेतृत्व शैलियाँ — लेविन, लिपिट और व्हाइट: निरंकुश, लोकतांत्रिक, अहस्तक्षेप
8. नेतृत्व के कार्य और गुण — बर्नार्ड, सेल्ज़निक, फॉलेट, एप्पलबी; लोक प्रशासन में नेतृत्व
9. संचार (Communication) — अर्थ, परिभाषाएँ, महत्व, उद्देश्य और विशेषताएँ
10. संचार पर विचारकों का योगदान, संचार-प्रक्रिया (शैनन-वीवर मॉडल) और संचार के प्रकार
11. औपचारिक संचार-जाल, ग्रेपवाइन (अनौपचारिक संचार) और संचार की बाधाएँ
12. प्रभावी संचार के सिद्धांत तथा ई-शासन में संचार — जन सूचना पोर्टल, ई-ऑफ़िस, सूचना का अधिकार
13. मनोबल (Morale) — अर्थ, परिभाषाएँ और मनोबल बनाम अभिप्रेरणा
14. मनोबल के कारक, संकेतक, मापन और सुधार के उपाय; मनोबल और उत्पादकता
15. अभिप्रेरणा के सिद्धांत — परंपरागत, मैस्लो, मैक्ग्रेगर, हर्ज़बर्ग (द्वि-कारक)
16. सरकारी कर्मचारियों का मनोबल — भारत की वर्तमान स्थिति
17. समय-रेखा
1प्रशासनिक व्यवहार — अर्थ और महत्व
प्रशासनिक व्यवहार (Administrative Behaviour) का अर्थ है — किसी प्रशासनिक संगठन में काम करने वाले लोगों का वास्तविक आचरण। इसमें यह देखा जाता है कि अधिकारी और कर्मचारी कैसे सोचते हैं, कैसे निर्णय लेते हैं, एक-दूसरे से कैसे बात करते हैं, किस बात से प्रेरित होते हैं और किस बात से निराश होते हैं। संगठन का ढाँचा, नियम और पदानुक्रम काग़ज़ पर एक जैसे हो सकते हैं, पर दो दफ़्तरों का काम बहुत अलग हो सकता है — इस अंतर का कारण अक्सर वहाँ के लोगों का व्यवहार ही होता है।
प्रारंभिक विचारक (जैसे टेलर, फेयोल, गुलिक) संगठन को एक मशीन की तरह देखते थे, जिसमें मनुष्य केवल एक पुर्ज़ा था। बाद में हॉथोर्न प्रयोगों (देखें अध्याय 02) ने दिखाया कि कर्मचारी की भावनाएँ, उसका समूह और उसे मिलने वाला सम्मान उत्पादकता को गहराई से प्रभावित करते हैं। हर्बर्ट साइमन (Herbert Simon) ने 1947 में अपनी पुस्तक "Administrative Behavior" में प्रशासन को निर्णय-निर्माण और व्यवहार के आधार पर समझने पर बल दिया। तभी से "प्रशासनिक व्यवहार" लोक प्रशासन का एक प्रमुख अंग बन गया।
पाठ्यक्रम में प्रशासनिक व्यवहार के तीन विषय हैं — नेतृत्व, संचार और मनोबल। ये तीनों आपस में जुड़े हुए हैं: अच्छा नेता अच्छा संचार करता है, अच्छे संचार से कर्मचारियों में भरोसा और मनोबल बढ़ता है, और ऊँचा मनोबल संगठन को लक्ष्य तक पहुँचाता है। नीचे का चित्र इस संबंध को दिखाता है।

शास्त्रीय अर्थ: संगठन में कार्यरत व्यक्तियों और समूहों के उस वास्तविक आचरण का अध्ययन, जो निर्णय-निर्माण, नेतृत्व, संचार, अभिप्रेरणा और मनोबल के रूप में दिखाई देता है।
सरल भाषा में: नियम-पुस्तिका बताती है कि दफ़्तर "कैसे चलना चाहिए", जबकि प्रशासनिक व्यवहार बताता है कि दफ़्तर "वास्तव में कैसे चलता है"। उदाहरण: दो तहसीलों में एक जैसे नियम और एक जैसा स्टाफ़ है, फिर भी एक तहसील में नामांतरण (म्यूटेशन) एक सप्ताह में हो जाता है और दूसरी में तीन महीने लगते हैं — यह अंतर तहसीलदार के नेतृत्व, कर्मचारियों के आपसी संचार और उनके मनोबल से आता है।
2नेतृत्व (Leadership) — अर्थ, परिभाषाएँ और प्रकृति
2.1 नेतृत्व का अर्थ
नेतृत्व वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से एक व्यक्ति दूसरों के व्यवहार को इस प्रकार प्रभावित करता है कि वे किसी सामान्य लक्ष्य की प्राप्ति हेतु स्वेच्छा से और उत्साहपूर्वक कार्य करें। लोक प्रशासन में नेतृत्व केवल आदेश देने की शक्ति नहीं, बल्कि अनुयायियों (Followers) का विश्वास और सहयोग अर्जित करने की कला है। एक ज़िला कलेक्टर, एक थानाधिकारी, एक विभागाध्यक्ष — सभी को अपने अधीनस्थों का नेतृत्व करना होता है, चाहे उनके पास औपचारिक सत्ता (Formal Authority) हो या न हो।
कीथ डेविस (Keith Davis) ने नेतृत्व का महत्व बताते हुए कहा कि नेतृत्व के बिना संगठन केवल "मनुष्यों और मशीनों का एक बेतरतीब ढेर" है। नेतृत्व ही संगठन की छिपी हुई क्षमता को वास्तविक परिणाम में बदलता है। इसका अर्थ यह है कि संसाधन, बजट और कर्मचारी होने के बाद भी, यदि उन्हें दिशा देने वाला और जोड़ने वाला व्यक्ति नहीं है, तो परिणाम नहीं आते।
2.2 नेतृत्व की प्रमुख परिभाषाएँ
विभिन्न विद्वानों ने नेतृत्व को अलग-अलग शब्दों में परिभाषित किया है, पर सभी परिभाषाओं में एक बात समान है — नेतृत्व "प्रभाव (Influence)" है, "दबाव" नहीं। नीचे की तालिका में प्रमुख परिभाषाएँ उनके सरल अर्थ के साथ दी गई हैं।
| विद्वान | परिभाषा (हिंदी में) | मुख्य संकेत |
|---|---|---|
| डिमॉक और डिमॉक (Dimock & Dimock) | नेतृत्व शक्ति, प्रभुत्व या सामाजिक श्रेष्ठता नहीं है; यह लोगों पर प्रभाव है, लोगों के ऊपर शक्ति नहीं। | प्रभाव, न कि प्रभुत्व |
| रॉबर्ट टैननबॉम (Robert Tannenbaum) | नेतृत्व किसी परिस्थिति में डाला गया वह अंतर्वैयक्तिक प्रभाव है, जो संचार-प्रक्रिया के माध्यम से किसी विशेष लक्ष्य की ओर निर्देशित होता है। | परिस्थिति + संचार + लक्ष्य |
| जॉर्ज आर. टेरी (George R. Terry) | नेतृत्व लोगों को इस प्रकार प्रभावित करने की क्रिया है कि वे साझा उद्देश्यों के लिए स्वेच्छा से प्रयास करें। | स्वेच्छा |
| कूंट्ज़ और ओ'डोनेल (Koontz & O'Donnell) | नेतृत्व लोगों को किसी सामान्य उद्देश्य की प्राप्ति में सहयोग के लिए राज़ी करने की क्रिया है। | राज़ी करना (Persuasion) |
| कीथ डेविस (Keith Davis) | नेतृत्व दूसरों को निर्धारित उद्देश्यों को उत्साहपूर्वक प्राप्त करने के लिए राज़ी करने की योग्यता है। | उत्साह |
| चेस्टर बर्नार्ड (Chester Barnard) | नेतृत्व व्यक्ति के व्यवहार का वह गुण है, जिसके द्वारा वह संगठित प्रयास में लोगों की गतिविधियों का मार्गदर्शन करता है। | मार्गदर्शन |
| जेम्स मूने (James Mooney) | नेतृत्व सत्ता का वह रूप है जो सत्ता के क्रिया में आने पर दिखाई देता है। | क्रियाशील सत्ता |
| मेरी पार्कर फॉलेट (Mary Parker Follett) | नेता वह नहीं जो केवल संगठन का अध्यक्ष हो, बल्कि वह है जो पूरी परिस्थिति को देख सके और एक परिस्थिति से दूसरी परिस्थिति में जाने का मार्ग समझ सके। | परिस्थिति की समझ |
| वॉरेन बेनिस (Warren Bennis) | नेता की सबसे विशिष्ट योग्यता एक दृष्टि (Vision) बनाना और उसे साकार करना है। | दृष्टि |
2.3 नेतृत्व की प्रकृति — विचारकों के मत
नेतृत्व की प्रकृति को समझाने के लिए अलग-अलग विचारकों ने अलग-अलग पहलुओं पर बल दिया है। इन मतों से यह स्पष्ट होता है कि नेतृत्व एक व्यक्ति का गुण भी है, एक संबंध भी है और परिस्थिति की उपज भी है।
- लुई ए. एलन (Louis A. Allen): उन्होंने "व्यक्तिगत नेतृत्व" और "प्रबंधकीय नेतृत्व" में अंतर किया। उनके अनुसार व्यक्ति व्यक्तिगत नेतृत्व की प्रतिभा के साथ जन्म ले सकता है, पर प्रबंधकीय नेतृत्व उसे सीखना पड़ता है। यानी आकर्षक व्यक्तित्व जन्मजात हो सकता है, पर फ़ाइल-प्रबंधन, टीम-निर्माण और योजना-निर्माण प्रशिक्षण से आते हैं।
- चेस्टर बर्नार्ड (Chester Barnard): उनके अनुसार नेतृत्व तीन बातों पर निर्भर करता है — व्यक्ति (नेता), अनुयायी और परिस्थितियाँ। किसी एक के बदलने से नेतृत्व की सफलता बदल सकती है।
- मेरी पार्कर फॉलेट (Mary Parker Follett): उन्होंने कहा कि नेता केवल समूह को प्रभावित नहीं करता, बल्कि समूह भी नेता को प्रभावित करता है। इस आपसी संबंध को उन्होंने "वृत्ताकार प्रतिक्रिया (Circular Response)" कहा। उन्होंने नेतृत्व के तीन प्रकार बताए — (क) पद का नेतृत्व, जिसमें नेता के पास औपचारिक पद होता है; (ख) व्यक्तित्व का नेतृत्व, जिसमें नेता के पास प्रभावशाली व्यक्तिगत गुण होते हैं; (ग) कार्य (Function) का नेतृत्व, जिसमें उस व्यक्ति के पास परिस्थिति से जुड़ा ज्ञान होता है। फॉलेट के अनुसार आधुनिक संगठनों में "कार्य का नेतृत्व" सबसे महत्वपूर्ण है — जिस व्यक्ति के पास उस समय आवश्यक ज्ञान है, वही उस क्षण का नेता बन जाता है, भले ही उसका पद छोटा हो।
- जॉन मिलेट (John Millet): उनके अनुसार "नेतृत्व प्रायः परिस्थितियों से बनता या बिगड़ता है।" प्रशासनिक नेतृत्व की परिस्थितियाँ दो प्रकार की होती हैं — राजनीतिक (बाहरी राजनीतिक निर्देशन और नियंत्रण के प्रति उत्तरदायी रहना) और संस्थागत (एजेंसी के आंतरिक कामकाज को सुचारु रखना)।
- काट्ज़ और कान (Katz & Kahn): उनके अनुसार नेतृत्व का सार वह "अतिरिक्त प्रभाव" है, जो सामान्य दिनचर्या से आगे जाकर, संगठन द्वारा दी गई औपचारिक शक्ति के अलावा अन्य स्रोतों से भी प्रभाव पैदा करता है।
शास्त्रीय अर्थ: फॉलेट की वह अवधारणा, जिसके अनुसार नेता और समूह एक-दूसरे को लगातार प्रभावित करते हैं; प्रभाव एक दिशा में नहीं, बल्कि चक्र की तरह दोनों दिशाओं में चलता है।
सरल भाषा में: नेता टीम को बदलता है और टीम भी नेता को बदलती है — दोनों एक-दूसरे से सीखते हैं। उदाहरण: एक नया थानाधिकारी सख़्ती से गश्त का नियम लागू करता है (नेता का प्रभाव); सिपाही उसे बताते हैं कि रात की गश्त में मोहल्ले के लोगों से बात करने पर अपराध की सूचना जल्दी मिलती है, और थानाधिकारी अपनी योजना बदल देता है (समूह का प्रभाव)।
2.4 नेता बनाम प्रबंधक
हिक्स और गलेट (Hicks & Gullett) के अनुसार "नेता" और "प्रबंधक" शब्द एक-दूसरे के स्थान पर हमेशा प्रयोग नहीं किए जा सकते, क्योंकि नेतृत्व प्रबंधन का एक उप-भाग है। नेता के लिए दूसरों के व्यवहार को प्रभावित करना आवश्यक है, पर उसे प्रबंधक के सभी कार्य करने की आवश्यकता नहीं है। नेतृत्व की पहचान यह है कि दूसरे लोग उसका अनुसरण करने को तैयार हों।
| आधार | प्रबंधक (Manager) | नेता (Leader) |
|---|---|---|
| शक्ति का स्रोत | पद और औपचारिक सत्ता | व्यक्तिगत प्रभाव, ज्ञान और विश्वास |
| मुख्य ध्यान | नियम, प्रक्रिया, नियंत्रण और व्यवस्था | दृष्टि, परिवर्तन और प्रेरणा |
| अनुयायियों का भाव | अधीनस्थ आदेश मानते हैं | अनुयायी स्वेच्छा से साथ चलते हैं |
| प्रश्न | "काम कैसे और कब होगा?" | "काम क्यों और किस दिशा में होगा?" |
| उदाहरण | फ़ाइलें समय पर निपटाने वाला अनुभाग अधिकारी | पूरे ज़िले को स्वच्छता अभियान से जोड़ने वाला कलेक्टर |
📌 ध्यान दें: एक अच्छा प्रशासक दोनों होता है — वह प्रबंधक की तरह व्यवस्था भी बनाए रखता है और नेता की तरह लोगों को प्रेरित भी करता है। केवल प्रबंधक होने से दफ़्तर चलता है, पर बदलाव नहीं आता; केवल नेता होने से उत्साह आता है, पर व्यवस्था बिखर सकती है।
3नेतृत्व के शक्ति-स्रोत (Bases of Power)
नेता दूसरों को किस आधार पर प्रभावित करता है? इस प्रश्न का सबसे प्रसिद्ध उत्तर जॉन फ्रेंच (John French) और बर्ट्रम रेवन (Bertram Raven) ने 1959 में दिया। उन्होंने नेता के प्रभाव के पाँच स्रोत बताए। इन्हें समझने से यह पता चलता है कि एक ही पद पर बैठे दो अधिकारियों का प्रभाव अलग-अलग क्यों होता है।
| शक्ति-स्रोत | अर्थ | प्रशासनिक उदाहरण |
|---|---|---|
| 1. दंडात्मक शक्ति (Coercive Power) | भय पर आधारित; कार्य न करने पर दंड देने की क्षमता — जैसे निलंबन, वेतन-कटौती, पदावनति। | लापरवाही पर कारण-बताओ नोटिस जारी करना। |
| 2. पुरस्कार शक्ति (Reward Power) | दंड का उल्टा; अच्छे कार्य पर मौद्रिक या अमौद्रिक पुरस्कार देने की क्षमता। | स्वतंत्रता दिवस पर उत्कृष्ट कर्मचारी को सम्मान-पत्र देना। |
| 3. वैध शक्ति (Legitimate Power) | संगठन के पदानुक्रम में पद से आने वाली शक्ति; अधीनस्थ उसे मानना अपना दायित्व समझते हैं। | कलेक्टर का आदेश तहसीलदार मानता है, क्योंकि यह पद की सत्ता है। |
| 4. विशेषज्ञ शक्ति (Expert Power) | ज्ञान, विशेष कौशल या महत्वपूर्ण सूचना से आने वाली शक्ति। | ज़िले का सबसे अनुभवी अभियंता, जिसकी तकनीकी राय सब मानते हैं। |
| 5. संदर्भ / आकर्षण शक्ति (Referent Power) | नेता के व्यक्तित्व के प्रति अनुयायियों का आकर्षण; वे उसे आदर्श मानते हैं। | ईमानदार और मिलनसार अधिकारी, जिसके लिए कर्मचारी स्वेच्छा से देर तक रुकते हैं। |
बर्नार्ड बास (Bernard Bass) ने इन पाँचों को दो वर्गों में बाँटा। दंडात्मक, पुरस्कार और वैध शक्ति को उन्होंने "पद-शक्ति (Position Power)" कहा, क्योंकि ये संगठन के ढाँचे से आती हैं। विशेषज्ञ और संदर्भ शक्ति को उन्होंने "व्यक्तिगत शक्ति (Personal Power)" कहा, क्योंकि ये नेता के अपने गुणों से आती हैं, चाहे उसका पद कुछ भी हो। पद-शक्ति अधिकारी के तबादले के साथ चली जाती है, जबकि व्यक्तिगत शक्ति उसके साथ जाती है।
"डर, इनाम, पद, ज्ञान, आकर्षण" — इसी क्रम में याद रखें: डर = दंडात्मक, इनाम = पुरस्कार, पद = वैध, ज्ञान = विशेषज्ञ, आकर्षण = संदर्भ। पहले तीन "पद-शक्ति" (कुर्सी से), अंतिम दो "व्यक्तिगत शक्ति" (व्यक्ति से)।
4नेतृत्व के सिद्धांत (Theories of Leadership)
नेतृत्व के सिद्धांत इस प्रश्न का उत्तर खोजते हैं कि "कोई व्यक्ति प्रभावी नेता क्यों बनता है?" इतिहास में इसके तीन मुख्य उत्तर दिए गए — (1) गुण उपागम: नेता अपने गुणों के कारण नेता है, यानी नेता "क्या है"; (2) व्यवहारवादी उपागम: नेता अपने व्यवहार के कारण नेता है, यानी नेता "क्या करता है"; (3) परिस्थितिजन्य उपागम: नेता की सफलता परिस्थिति पर निर्भर है। बाद में रूपांतरणकारी और सेवक नेतृत्व जैसे आधुनिक विचार आए। नीचे इन्हें क्रम से समझते हैं।
4.1 गुण उपागम (Trait Approach)
विचारक/प्रवर्तक: थॉमस कार्लाइल (Thomas Carlyle) | वर्ष: 19वीं सदी
- मूल विचार: नेता "जन्म से" होते हैं (Leaders are born, not made) — कुछ महान व्यक्तित्व असाधारण गुणों के साथ जन्म लेते हैं जो उन्हें स्वाभाविक रूप से नेतृत्व की ओर ले जाते हैं।
- ऐतिहासिक उदाहरण के रूप में नेपोलियन, गांधी, चर्चिल जैसे व्यक्तित्वों को प्रस्तुत किया जाता है — जिनका नेतृत्व असाधारण परिस्थितियों में स्वतः उभरा।
- आलोचना: यह सिद्धांत अत्यधिक सरलीकृत (Oversimplified) है — यह न तो प्रशिक्षण से नेता बनाए जाने की संभावना को स्वीकारता है, न ही परिस्थिति (Situation) की भूमिका को महत्व देता है। आधुनिक शोध इसे अवैज्ञानिक मानते हैं।
विचारक/प्रवर्तक: राल्फ स्टॉगडिल (Ralph M. Stogdill) | वर्ष: 1948 (अध्ययन-समीक्षा)
- मूल विचार: प्रभावी नेताओं में कुछ समान व्यक्तिगत विशेषताएँ (Traits) पाई जाती हैं — जैसे बुद्धिमत्ता, आत्मविश्वास, दृढ़ संकल्प, सत्यनिष्ठा (Integrity), सामाजिकता (Sociability) और निर्णय-क्षमता।
- स्टॉगडिल ने 1948 में सैकड़ों अध्ययनों की समीक्षा कर पाया कि केवल विशेषताएँ ही नेतृत्व की सफलता तय नहीं करतीं — परिस्थिति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, इसलिए उन्होंने बाद में "परिस्थितिजन्य दृष्टिकोण" की ओर रुख़ किया।
- महत्वपूर्ण विशेषताएँ — बुद्धिमत्ता, आत्म-विश्वास, दृढ़ता, सत्यनिष्ठा, सामाजिकता, संप्रेषण-क्षमता, ज़िम्मेदारी लेने की इच्छा।
- आलोचना: विशेषताओं की कोई निश्चित या सार्वभौमिक सूची संभव नहीं; एक ही व्यक्ति एक परिस्थिति में सफल नेता हो सकता है, दूसरी में असफल — इसलिए यह सिद्धांत भी अधूरा माना गया।
गुण उपागम के प्रमुख समर्थकों में चेस्टर बर्नार्ड, ऑर्डवे टीड (Ordway Tead), मिलेट, टेरी और पॉल एप्पलबी (Paul Appleby) गिने जाते हैं। शुरुआत में यह माना गया कि नेता जन्मजात होते हैं — इसे ही "महान पुरुष सिद्धांत" कहा गया। बाद के व्यवहारवादी अध्ययनों ने दिखाया कि नेतृत्व के गुण पूरी तरह जन्मजात नहीं होते, बल्कि सीखने और अनुभव से भी विकसित होते हैं। लगभग 1900 से 1940 तक यह उपागम लोकप्रिय रहा, पर इसकी निम्नलिखित आलोचनाएँ हुईं:
- 1. यह नेतृत्व के गुणों की कोई सामान्य (सार्वभौमिक) सूची नहीं दे सका; अलग-अलग विद्वानों ने अलग-अलग गुण गिनाए।
- 2. यह नहीं बताता कि विभिन्न गुणों का तुलनात्मक महत्व क्या है — कौन-सा गुण अधिक ज़रूरी है।
- 3. जो गुण नेताओं में बताए जाते हैं, वे बहुत-से ऐसे लोगों में भी होते हैं जो नेता नहीं हैं।
- 4. यह नेतृत्व पाने के लिए आवश्यक गुणों और नेतृत्व बनाए रखने के लिए आवश्यक गुणों में अंतर नहीं करता।
- 5. यह अनुयायियों (अधीनस्थों) की आवश्यकताओं की उपेक्षा करता है।
- 6. यह नेतृत्व पर परिस्थिति के प्रभाव को स्वीकार नहीं करता।
4.2 व्यवहारवादी उपागम (Behavioural Approach)
गुण उपागम इस बात पर केंद्रित था कि नेता "क्या है", जबकि व्यवहारवादी उपागम इस पर केंद्रित है कि नेता "क्या करता है"। शोधकर्ताओं ने देखा कि नेता कैसे निर्णय लेता है, अधीनस्थों से कैसे बात करता है, उन्हें कैसे प्रेरित करता है और किस शैली में काम लेता है। इस उपागम का बड़ा लाभ यह है कि व्यवहार सीखा और सिखाया जा सकता है — यानी नेतृत्व का प्रशिक्षण संभव है। इसके प्रमुख अध्ययन नीचे की तालिका में हैं।
| अध्ययन / मॉडल (वर्ष, विद्वान) | पहचानी गई शैलियाँ / चर | सबसे प्रभावी शैली |
|---|---|---|
| आयोवा विश्वविद्यालय अध्ययन (1930 का अंतिम दौर; कर्ट लेविन, रोनाल्ड लिपिट, राल्फ व्हाइट) | सत्तावादी (निरंकुश), लोकतांत्रिक और अहस्तक्षेप | लोकतांत्रिक शैली |
| ओहायो स्टेट विश्वविद्यालय अध्ययन (1945 से; फ्लाइशमैन, हैरिस, बर्ट आदि) | संरचना-निर्माण (Initiating Structure — काम पर ध्यान) और विचारशीलता (Consideration — लोगों पर ध्यान) | उच्च संरचना + उच्च विचारशीलता |
| मिशिगन विश्वविद्यालय अध्ययन (1940 का दशक; रेंसिस लिकर्ट और साथी) | उत्पादन-केंद्रित और कर्मचारी-केंद्रित | कर्मचारी-केंद्रित |
| प्रबंधन की चार प्रणालियाँ (1961/1967; रेंसिस लिकर्ट) | प्रणाली-1 शोषक-सत्तावादी; प्रणाली-2 परोपकारी-सत्तावादी; प्रणाली-3 परामर्शी; प्रणाली-4 सहभागी समूह | प्रणाली-4 (सहभागी / लोकतांत्रिक) |
| प्रबंधकीय ग्रिड (1964; रॉबर्ट ब्लेक और जेन माउटन; 1991 में "नेतृत्व ग्रिड" नाम) | पाँच शैलियाँ — दरिद्र (1,1), कंट्री क्लब (1,9), कार्य (9,1), मध्य मार्ग (5,5), टीम (9,9) | टीम नेतृत्व (9,9) |
लिकर्ट की चार प्रणालियाँ सरल भाषा में इस प्रकार हैं — प्रणाली-1 में ऊपर के अधिकारी सब तय करते हैं और भय से काम लेते हैं; प्रणाली-2 में अधिकारी दयालु मालिक की तरह व्यवहार करते हैं पर निर्णय फिर भी ऊपर ही होते हैं; प्रणाली-3 में अधिकारी अधीनस्थों से सलाह लेते हैं पर अंतिम निर्णय स्वयं करते हैं; प्रणाली-4 में पूरा समूह मिलकर निर्णय करता है और संचार सभी दिशाओं में खुलकर चलता है। लिकर्ट के अनुसार प्रणाली-4 वाले संगठन सबसे अधिक उत्पादक होते हैं।
प्रबंधकीय ग्रिड को एक नक्शे की तरह समझिए। क्षैतिज अक्ष पर "काम के प्रति चिंता" और ऊर्ध्वाधर अक्ष पर "लोगों के प्रति चिंता" 1 से 9 तक मापी जाती है। जो अधिकारी न काम की परवाह करता है न लोगों की, वह (1,1) पर है; जो केवल लोगों को ख़ुश रखता है, वह (1,9) "कंट्री क्लब" है; जो केवल लक्ष्य के लिए दबाव डालता है, वह (9,1) है; जो दोनों में बीच का समझौता करता है, वह (5,5) है; और जो दोनों की पूरी चिंता करता है, वह (9,9) "टीम नेता" है।

नेतृत्व शैलियाँ (Leadership Styles) — लेविन, लिपिट और व्हाइट का अध्ययन
कर्ट लेविन (Kurt Lewin), रोनाल्ड लिपिट (Ronald Lippitt) और राल्फ व्हाइट (Ralph White) ने 1939 में आयोवा विश्वविद्यालय में एक प्रसिद्ध प्रयोग (Iowa Leadership Studies) किया, जिसमें बच्चों के समूहों पर तीन अलग-अलग नेतृत्व शैलियों के प्रभाव का अध्ययन किया गया। किसी नेता द्वारा अधीनस्थों के पर्यवेक्षण के समय दिखाए गए व्यवहार को ही "नेतृत्व शैली" कहा जाता है।
| शैली | विशेषताएँ | प्रभाव |
|---|---|---|
| निरंकुश / अधिनायकवादी (Autocratic) | सभी निर्णय नेता स्वयं लेता है; अधीनस्थों से कोई परामर्श नहीं; कठोर नियंत्रण। इसे सत्तावादी या निर्देशात्मक शैली भी कहते हैं; नेता पूर्ण आज्ञापालन चाहता है और पुरस्कार रोकने या दंड देने का प्रयोग करता है। | तेज़ निर्णय, पर असंतोष और निर्भरता बढ़ती है; नेता की अनुपस्थिति में कार्य बाधित। |
| लोकतांत्रिक (Democratic) | निर्णय-प्रक्रिया में अधीनस्थों की भागीदारी; सुझाव आमंत्रित किए जाते हैं; समूह-चर्चा को बढ़ावा। इसे सहभागी शैली भी कहते हैं; संचार सभी दिशाओं में खुलकर चलता है। मानव संबंध युग में यह शैली लोकप्रिय हुई। | उच्च मनोबल, रचनात्मकता और दीर्घकालिक उत्पादकता — पर निर्णय में समय अधिक लग सकता है। |
| अहस्तक्षेप / स्वतंत्र (Laissez-faire) | नेता न्यूनतम हस्तक्षेप करता है; अधीनस्थों को पूर्ण स्वतंत्रता दी जाती है। इसे "खुली लगाम (Free Rein)" शैली भी कहते हैं; नेता केवल माँगी गई सामग्री और सूचना उपलब्ध कराता है। | उच्च-कुशल और स्वप्रेरित टीम में कारगर; अन्यथा अनुशासनहीनता और लक्ष्यहीनता का ख़तरा। |
एक मॉनिटर जो हर बच्चे को ख़ुद तय करके बिठाए और किसी की न सुने — निरंकुश (Autocratic)। दूसरा जो सबसे पूछकर तय करे — लोकतांत्रिक (Democratic)। तीसरा जो कह दे "जो जहाँ बैठना चाहे बैठ जाए" और ख़ुद कुछ तय ही न करे — अहस्तक्षेप (Laissez-faire)। तीनों शैलियाँ अलग-अलग स्थितियों (आपातकाल, सामान्य कक्षा, या एक अनुशासित टॉपर्स की कक्षा) में अलग-अलग असरदार साबित होती हैं।
4.3 परिस्थितिजन्य उपागम (Situational / Contingency Approach)
गुण और व्यवहार — दोनों उपागम नेतृत्व का पूरा और संतोषजनक सिद्धांत नहीं दे सके, क्योंकि दोनों ने परिस्थिति की भूमिका की उपेक्षा की। इसलिए शोधकर्ताओं ने यह माना कि नेतृत्व की प्रभावशीलता नेता के गुणों और व्यवहार के साथ-साथ परिस्थिति के अनेक कारकों से भी तय होती है — जैसे अनुयायी कैसे हैं, काम कैसा है, वातावरण कैसा है। इस दृष्टि से नेतृत्व बहु-आयामी (Multi-dimensional) है, और "हर परिस्थिति के लिए एक सर्वश्रेष्ठ शैली" जैसी कोई चीज़ नहीं होती।
विचारक/प्रवर्तक: फ्रेड फीडलर (Fred Fiedler) | वर्ष: 1960 का दशक (मॉडल 1964, पुस्तक 1967)
- मूल विचार: कोई भी नेतृत्व-शैली सार्वभौमिक रूप से सर्वोत्तम नहीं होती — नेतृत्व की प्रभावशीलता परिस्थिति (Situation) पर निर्भर करती है। यह मॉडल "आकस्मिकता सिद्धांत (Contingency Theory)" कहलाता है।
- फीडलर ने "सबसे कम पसंदीदा सहकर्मी पैमाना (Least Preferred Co-worker — LPC Scale)" विकसित किया — नेता से अपने सबसे कम पसंदीदा सहकर्मी का मूल्यांकन कराया जाता है: उच्च LPC स्कोर = संबंध-उन्मुख (Relationship-oriented) नेता, निम्न LPC स्कोर = कार्य-उन्मुख (Task-oriented) नेता। उन्होंने एक दूसरा पैमाना "विपरीतों के बीच मानी गई समानता (ASO Scale)" भी प्रयोग किया।
- "परिस्थितिजन्य अनुकूलता (Situational Favourableness)" तीन कारकों से तय होती है: (i) नेता-अधीनस्थ संबंध (ii) कार्य-संरचना (Task Structure) (iii) पदीय सत्ता (Position Power)।
- निष्कर्ष: अत्यंत अनुकूल या अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में कार्य-उन्मुख नेता अधिक सफल होता है; मध्यम अनुकूलता वाली परिस्थिति में संबंध-उन्मुख नेता बेहतर परिणाम देता है।
सोचिए एक कलेक्टर के सामने अचानक बाढ़ आ जाए — ऐसी आपात-स्थिति (अत्यंत प्रतिकूल परिस्थिति) में एक सख़्त, तुरंत आदेश देने वाला (कार्य-उन्मुख) नेता ज़्यादा कारगर होता है, बहस या चर्चा का समय नहीं होता। लेकिन सामान्य दिनों में दफ़्तर चलाते समय, जहाँ टीम स्थिर है और माहौल सहज (मध्यम अनुकूल परिस्थिति) है, वहाँ एक ऐसा नेता बेहतर काम करता है जो टीम के साथ रिश्ते बनाकर (संबंध-उन्मुख) काम ले। यही है फीडलर का मूल संदेश — "सबसे अच्छी नेतृत्व शैली" जैसी कोई एक चीज़ नहीं होती, यह परिस्थिति पर निर्भर करता है।
फीडलर के बाद अनेक विद्वानों ने परिस्थितिजन्य उपागम को आगे बढ़ाया। उनके मॉडल नीचे की तालिका में सरल भाषा में दिए गए हैं।
| सिद्धांत (वर्ष, प्रवर्तक) | मुख्य विचार |
|---|---|
| नेतृत्व व्यवहार का सातत्य (1958, 1973 में संशोधित; रॉबर्ट टैननबॉम और वॉरेन श्मिट) | नेता अपनी शैली तीन शक्तियों को देखकर चुनता है — (i) स्वयं में, (ii) अधीनस्थों में, (iii) परिस्थिति में। शैलियों की एक रेखा है, जिसके एक छोर पर "बॉस-केंद्रित" और दूसरे छोर पर "अधीनस्थ-केंद्रित" नेतृत्व है; बीच में अनेक मिश्रित शैलियाँ हैं। |
| आकस्मिकता मॉडल (1964/1967; फ्रेड फीडलर) | नेता की प्रभावशीलता नेता-सदस्य संबंध, कार्य-संरचना और पदीय सत्ता पर निर्भर। ऊपर विस्तार से देखें। |
| मार्ग-लक्ष्य सिद्धांत (1970-71; मार्टिन इवांस और रॉबर्ट हाउस) | अभिप्रेरणा के प्रत्याशा सिद्धांत पर आधारित। नेता का काम अधीनस्थों के लिए "लक्ष्य तक का मार्ग" साफ़ करना है। चार शैलियाँ — निर्देशात्मक, सहायक, सहभागी और उपलब्धि-उन्मुख — जिनकी सफलता अधीनस्थों की विशेषताओं और वातावरण के दबावों पर निर्भर है। |
| त्रि-आयामी मॉडल (1970; विलियम रेडिन) | तीन आयाम — कार्य-उन्मुखता, संबंध-उन्मुखता और प्रभावशीलता। परिस्थिति के अनुसार चार प्रभावी शैलियाँ (कार्यकारी, विकासक, परोपकारी निरंकुश, नौकरशाह) और चार अप्रभावी शैलियाँ (समझौतावादी, मिशनरी, निरंकुश, भगोड़ा)। |
| निर्णय-सहभागिता मॉडल (1973; विक्टर व्रूम और फिलिप येटन) | निर्णय की गुणवत्ता, अधीनस्थों द्वारा निर्णय की स्वीकृति और निर्णय में लगने वाला समय — इन तीन चरों के आधार पर नेता तय करे कि अधीनस्थों को कितना शामिल करे। पाँच शैलियाँ: सत्तावादी (AI, AII), परामर्शी (CI, CII) और पूर्ण सहभागी (GII)। |
| जीवन-चक्र / परिस्थितिजन्य नेतृत्व (1969; पॉल हर्सी और केनेथ ब्लैंचर्ड) | अनुयायियों की "परिपक्वता (Maturity)" के अनुसार चार शैलियाँ — बताना (Telling), समझाना/बेचना (Selling), सहभागिता (Participating) और प्रत्यायोजन (Delegating)। |
नया भर्ती हुआ पटवारी (कम परिपक्वता) — तहसीलदार उसे क़दम-दर-क़दम बताता है। कुछ महीनों बाद पटवारी काम सीखने लगा पर आत्मविश्वास कम है — तहसीलदार कारण समझाता है और उत्साह बढ़ाता है। एक साल बाद पटवारी कुशल है पर कभी-कभी झिझकता है — तहसीलदार उसके साथ मिलकर निर्णय करता है (सहभागिता)। पाँच साल बाद पटवारी पूरी तरह कुशल और भरोसेमंद है — तहसीलदार उसे पूरा काम सौंप देता है। एक ही व्यक्ति के लिए समय के साथ नेतृत्व की शैली बदलती है।
4.4 आधुनिक उपागम — रूपांतरणकारी बनाम लेन-देनकारी नेतृत्व (Transformational vs Transactional)
विचारक/प्रवर्तक: जेम्स मैक्ग्रेगर बर्न्स (James MacGregor Burns) | वर्ष: 1978
- बर्न्स ने नेतृत्व को दो व्यापक श्रेणियों में बाँटा — लेन-देनकारी (Transactional) और रूपांतरणकारी (Transformational)।
- यह विभाजन आगे चलकर लोक प्रशासन में सुधारवादी और प्रेरक नेतृत्व की अवधारणा को समझने का आधार बना — विशेषकर संकटकाल या बड़े प्रशासनिक सुधारों में।
- बर्नार्ड बास (Bernard Bass) ने 1985 में इस विचार को आगे बढ़ाया और रूपांतरणकारी नेता के चार गुण बताए — आदर्श प्रभाव (नेता स्वयं उदाहरण बने), प्रेरक अभिप्रेरणा (भविष्य की आकर्षक दृष्टि दे), बौद्धिक उद्दीपन (नए विचार और प्रश्न करने को प्रोत्साहित करे) और व्यक्तिगत ध्यान (हर कर्मचारी की ज़रूरत को अलग से समझे)।
- नेता अनुयायियों से "लेन-देन" के आधार पर व्यवहार करता है — अच्छे काम पर इनाम, ख़राब काम पर दंड।
- उदाहरण: बेहतर प्रदर्शन पर पदोन्नति या वेतन-वृद्धि (Increment) का वादा।
- यह नेता और अनुयायी दोनों के आत्म-हित (Self-interest) पर आधारित है।
- दैनिक या नियमित प्रशासनिक कार्यों के लिए उपयुक्त — स्थिरता बनाए रखता है, पर बड़ा बदलाव नहीं लाता।
- नेता अनुयायियों की उच्चतर आवश्यकताओं (Higher Needs) और मूल्यों को छूकर उन्हें एक साझा नैतिक लक्ष्य के लिए प्रेरित करता है।
- उदाहरण: एक सुधारवादी आई.ए.एस. अधिकारी जो पूरे ज़िले की सोच और कार्य-संस्कृति ही बदल दे।
- यह सामूहिक हित (Collective Interest) और नैतिक उत्थान (Moral Upliftment) पर केंद्रित है।
- बड़े प्रशासनिक सुधारों, संकटकाल और संगठनात्मक बदलाव के लिए उपयुक्त — अपेक्षाओं और आकांक्षाओं को नया आकार देता है।
एक टीचर जो कहे "होमवर्क करोगे तो स्टार दूँगा, नहीं करोगे तो सज़ा" — यह लेन-देनकारी (Transactional) है। दूसरी टीचर जो बच्चों में पढ़ाई के प्रति सच्ची जिज्ञासा और सपने जगा दे, ताकि वे ख़ुद से बेहतर बनना चाहें — यह रूपांतरणकारी (Transformational) है। दोनों ज़रूरी हैं, पर बड़ा बदलाव हमेशा रूपांतरणकारी नेतृत्व से ही आता है।
दिल्ली मेट्रो का पहला चरण बनाने का दायित्व ई. श्रीधरन को मिला। उन्होंने संगठन में समय की पाबंदी, ईमानदारी और पेशेवर दक्षता को सबसे बड़े मूल्य बना दिया — लक्ष्य स्पष्ट रूप से तय किए, निविदाओं पर तेज़ी से निर्णय लिए और ठेकेदारों के साथ लगातार बैठकें कीं। उन्होंने स्वयं ईमानदारी और अनुशासन का उदाहरण पेश किया, इंजीनियरों पर भरोसा करके उन्हें अधिकार सौंपे।
परिणाम यह हुआ कि लगभग 65 किलोमीटर का पहला चरण 2005 में तय समय से लगभग पौने तीन वर्ष पहले और बजट के भीतर पूरा हुआ — जो उस समय भारत की बड़ी सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए दुर्लभ बात थी। यह रूपांतरणकारी नेतृत्व का उदाहरण है: नेता ने केवल इनाम-दंड से काम नहीं लिया, बल्कि पूरी टीम में "समय पर, ईमानदारी से, उच्च गुणवत्ता से" काम करने का मूल्य बैठा दिया।
सेवक नेतृत्व (Servant Leadership)
विचारक/प्रवर्तक: रॉबर्ट ग्रीनलीफ़ (Robert K. Greenleaf) | वर्ष: 1970 ("The Servant as Leader")
- मूल विचार: सच्चा नेता पहले "सेवक (Servant)" होता है — वह पहले दूसरों की सेवा करने की स्वाभाविक भावना से प्रेरित होता है, और उसके बाद ही नेतृत्व करने का सचेत निर्णय (Conscious Choice) लेता है।
- सेवक-नेता अपने अनुयायियों की आवश्यकताओं और विकास को अपने हितों से ऊपर रखता है — वह सत्ता को बाँटता है, आदेश नहीं थोपता।
- ग्रीनलीफ़ के अनुसार 10 प्रमुख विशेषताएँ — सुनना (Listening), सहानुभूति (Empathy), उपचार-भाव (Healing), जागरूकता (Awareness), प्रेरण (Persuasion), संकल्पना (Conceptualization), दूरदर्शिता (Foresight), न्यासिता या धरोहर-भाव (Stewardship), दूसरों के विकास हेतु प्रतिबद्धता, समुदाय-निर्माण (Building Community)।
- लोक प्रशासन में प्रासंगिकता: एक ज़िला कलेक्टर या पुलिस अधिकारी जो नागरिकों और अधीनस्थों दोनों की भलाई को अपनी सत्ता से ऊपर रखे — यह सुशासन (Good Governance) और "नागरिक, ग्राहक नहीं (Citizens not Customers)" वाली नई लोक सेवा (देखें अध्याय 01) के दर्शन से मेल खाता है।
| आधार | लेन-देनकारी | रूपांतरणकारी | सेवक |
|---|---|---|---|
| मूल प्रेरणा | इनाम और दंड | साझा दृष्टि और मूल्य | दूसरों की सेवा |
| नेता की भूमिका | सौदा करने वाला | प्रेरणा देने वाला | सेवा और सहायता करने वाला |
| उपयुक्त स्थिति | नियमित कामकाज | सुधार और संकट | जन-सेवा, कल्याण कार्य |
| प्रवर्तक | बर्न्स (1978) | बर्न्स (1978), बास (1985) | ग्रीनलीफ़ (1970) |
5नेतृत्व के कार्य और गुण तथा लोक प्रशासन में नेतृत्व
5.1 नेतृत्व के कार्य — विचारकों के मत
| विचारक | नेतृत्व के कार्य |
|---|---|
| फिलिप सेल्ज़निक (Philip Selznick) | (1) संस्था के मिशन और भूमिका को परिभाषित करना, यानी लक्ष्य और नीतियाँ तय करना; (2) उद्देश्य को संस्था में उतारना, यानी नीति का अर्थ निचले स्तर तक पहुँचाना; (3) संस्था की अखंडता की रक्षा, यानी मूल मूल्यों और पहचान को बनाए रखना; (4) आंतरिक संघर्षों का समाधान, यानी विभिन्न हितों में संतुलन रखना। |
| हिक्स और गलेट (Hicks & Gullett) | आठ कार्य — सदस्यों को उद्देश्य देना; असहमति में मध्यस्थता; अधीनस्थों को कार्य के लिए जगाना (उत्प्रेरक); विचार सुझाना; प्रेरित करना; प्रशंसा करके मान्यता और सम्मान की आवश्यकता पूरी करना; समस्या में सुरक्षा देना; बाहर संगठन का प्रतिनिधित्व और प्रतीक बनना। |
| चेस्टर बर्नार्ड (Chester Barnard) | चार कार्य — उद्देश्यों का निर्धारण; साधनों का प्रबंधन; क्रिया के उपकरणों पर नियंत्रण; समन्वित क्रिया को प्रोत्साहन। |
| मेरी पार्कर फॉलेट | तीन कार्य — समन्वय; उद्देश्य की परिभाषा; भविष्य का पूर्वानुमान (Anticipation)। |
| पीटर ड्रकर (Peter Drucker) | मनुष्य की दृष्टि को ऊँचा उठाना; उसके कार्य-प्रदर्शन को ऊँचे मानक तक ले जाना; उसके व्यक्तित्व को सामान्य सीमाओं से आगे विकसित करना। |
| फ्रेड फीडलर | समूह की गतिविधियों का निर्देशन और समन्वय। |
| फिफ़नर और शेरवुड (Pfiffner & Sherwood) | नेता संगठनात्मक व्यवहार को बदलने वाला है — "सही व्यक्ति को नेतृत्व के पद पर बिठा दो, तुम्हारी सारी समस्याएँ हल हो जाएँगी।" |
5.2 नेतृत्व के गुण — विचारकों की सूचियाँ
- चेस्टर बर्नार्ड: महत्व के क्रम में चार गुण — (1) जीवन-शक्ति और सहनशीलता, (2) निर्णय-क्षमता, (3) राज़ी करने की क्षमता, (4) ज़िम्मेदारी और बौद्धिक क्षमता। बर्नार्ड ने बौद्धिकता को चौथे स्थान पर रखा, क्योंकि उनका मानना था कि अधिक बौद्धिकता कभी-कभी निर्णय लेने और ज़िम्मेदारी उठाने में बाधा बनती है।
- पॉल एप्पलबी (Paul H. Appleby): एक अच्छा प्रशासक — ज़िम्मेदारी लेने को तैयार रहता है; लगातार व्यक्तिगत विकास करता है; काम करने की ओर झुका रहता है; अच्छा श्रोता होता है और सटीक प्रश्न पूछता है; हर तरह के लोगों के साथ काम कर लेता है; सबसे योग्य अधीनस्थ खोजता है; सब कुछ स्वयं करने की बजाय संस्था के संसाधनों का उपयोग करता है; शक्ति को केवल प्रभावशीलता के साधन के रूप में देखता है; आत्मविश्वासी होने के कारण अपनी सीमाएँ और ग़लतियाँ स्वीकार करता है; बुरी ख़बर को भी अच्छी ख़बर की तरह खुले मन से सुनता है; अधीनस्थों का उतना ही सम्मान करता है जितना वरिष्ठों का; संस्था के प्रदर्शन को लगातार सुधारता है; और लोकतंत्र में राजनीतिक प्रक्रियाओं का सम्मान करता है। एप्पलबी के अनुसार प्रशासक में "शासकीय समझ" और "राजनीतिक समझ" दोनों होनी चाहिए।
- मिलेट: अच्छा स्वास्थ्य, मिशन की भावना, दूसरों में रुचि, बुद्धिमत्ता, सत्यनिष्ठा, राज़ी करने की क्षमता, विवेक और निष्ठा।
- टेरी: ऊर्जा, भावनात्मक स्थिरता, मानवीय संबंधों का ज्ञान, स्व-प्रेरणा, संप्रेषण-कौशल, सिखाने की क्षमता, सामाजिक कौशल और तकनीकी दक्षता।
"जी-नि-रा-बु" — जीवन-शक्ति, निर्णय-क्षमता, राज़ी करना, बुद्धि (ज़िम्मेदारी के साथ)। याद रखें — बुद्धि सबसे अंत में!
5.3 लोक प्रशासन में नेतृत्व — आई.ए.एस. अधिकारी की भूमिका
- ज़िला कलेक्टर संकट के समय (बाढ़, अकाल, महामारी) अपनी टीम को दिशा और साहस देने वाला नेता बनता है — यहाँ परिस्थितिजन्य और कभी-कभी निरंकुश शैली आवश्यक हो जाती है।
- विकास प्रशासन (जैसे महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना — मनरेगा, स्वास्थ्य और शिक्षा योजनाओं का क्रियान्वयन) में सफलता के लिए अधिकारी को रूपांतरणकारी नेता बनना पड़ता है — ग्रामीणों और कर्मचारियों दोनों में भागीदारी की भावना जगानी होती है।
- मिशन कर्मयोगी (2020) के अंतर्गत सिविल सेवकों को "नेतृत्व दक्षता (Leadership Competency)" के आधुनिक प्रशिक्षण से जोड़ा जा रहा है, ताकि पारंपरिक नियम-आधारित प्रशासन से आगे बढ़कर परिणाम-उन्मुख (Outcome-oriented) नेतृत्व विकसित हो सके। 2025-26 से केंद्र सरकार के कर्मचारियों और अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों के लिए निर्धारित ऑनलाइन पाठ्यक्रम पूरे करना अनिवार्य किया गया है और इसे उनके वार्षिक कार्य-मूल्यांकन (APAR) से जोड़ा गया है।
- राजनीतिक कार्यपालिका और जनता के बीच सेतु बनना भी प्रशासनिक नेता का कार्य है — मिलेट के शब्दों में उसे "राजनीतिक परिस्थितियों" और "संस्थागत परिस्थितियों" दोनों के प्रति उत्तरदायी रहना पड़ता है।
1999 में ओडिशा में आए महाचक्रवात में लगभग दस हज़ार लोगों की मृत्यु हुई थी। इस दर्दनाक अनुभव के बाद राज्य ने आपदा प्रबंधन का पूरा तंत्र नए सिरे से खड़ा किया — चक्रवात आश्रय-स्थल, प्रशिक्षित स्वयंसेवक और गाँव-गाँव तक चेतावनी पहुँचाने की व्यवस्था।
अक्टूबर 2013 में जब फैलिन चक्रवात आया, तो प्रशासन ने दस लाख से अधिक लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया और मृतकों की संख्या 40 से भी कम रही। इसमें तीनों स्तंभ दिखते हैं: नेतृत्व (मुख्य सचिव से लेकर ग्राम-स्तर तक स्पष्ट ज़िम्मेदारी और तेज़ निर्णय), संचार (मौसम विभाग की चेतावनी का रेडियो, लाउडस्पीकर और स्थानीय कर्मियों के माध्यम से हर गाँव तक पहुँचना) और मनोबल (कर्मचारियों और स्वयंसेवकों का यह विश्वास कि "इस बार हम एक भी जान नहीं जाने देंगे")।
6संचार (Communication) — अर्थ, परिभाषाएँ और महत्व
6.1 संचार का अर्थ
संचार का अर्थ है — विचारों, सूचना, निर्देशों और भावनाओं का एक व्यक्ति या इकाई से दूसरे व्यक्ति या इकाई तक हस्तांतरण, ताकि परस्पर समझ (Mutual Understanding) बन सके। किसी भी संगठन में संचार वही भूमिका निभाता है जो शरीर में रक्त-संचार (Blood Circulation) निभाता है — इसके बिना संगठन का कोई भी अंग ठीक से काम नहीं कर सकता। ठीक इसीलिए इसे "संगठन का जीवन-रक्त (Life-blood of an Organisation)" कहा जाता है।
अंग्रेज़ी शब्द "Communication" लैटिन भाषा के शब्द "कम्यूनिस (Communis)" से बना है, जिसका अर्थ है "सामान्य" या "साझा"। इसलिए संचार का मूल अर्थ केवल सूचना भेजना नहीं, बल्कि किसी विषय पर साझी समझ बनाना है। यदि कलेक्टर ने आदेश भेज दिया पर तहसीलदार ने उसका अर्थ कुछ और समझा, तो संचार हुआ ही नहीं — केवल काग़ज़ आगे गया। लोक प्रशासन में संचार का अर्थ इसलिए बहुत व्यापक है: यह भिन्न-भिन्न स्थानों के लोगों तक विचार और सूचनाएँ पहुँचाकर उनमें सहभागिता और साझेदारी की भावना पैदा करता है।
6.2 संचार की प्रमुख परिभाषाएँ
| विद्वान | परिभाषा (हिंदी में) |
|---|---|
| कीथ डेविस (Keith Davis) | संचार वह प्रक्रिया है जिसमें संदेश और समझ को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाया जाता है। |
| न्यूमैन और समर (Newman & Summer) | संचार दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच तथ्यों, विचारों, सम्मतियों या भावनाओं का पारस्परिक आदान-प्रदान है। |
| कूंट्ज़ और ओ'डोनेल | संचार शब्दों, पत्रों, प्रतीकों या संदेशों द्वारा किया गया आदान-प्रदान है; यह वह तरीक़ा है जिससे संगठन का एक सदस्य दूसरे के साथ अर्थ और समझ साझा करता है। |
| मैक्फ़रलैंड (McFarland) | संचार मनुष्यों के बीच सार्थक अंतःक्रिया की प्रक्रिया है, जिसके द्वारा अर्थ ग्रहण किए जाते हैं और समझ बनती है। |
| जॉन मिलेट (John Millet) | संचार किसी साझे उद्देश्य की "साझी समझ" है। |
| ऑर्डवे टीड (Ordway Tead) | संचार का मूल लक्ष्य समान विषयों पर मस्तिष्कों का मेल है। |
| लुई ए. एलन (Louis A. Allen) | संचार वह सब कुछ है जो एक व्यक्ति तब करता है जब वह दूसरे के मस्तिष्क में समझ पैदा करना चाहता है; यह बताने, सुनने और समझने की एक व्यवस्थित और निरंतर प्रक्रिया है। यह एक व्यक्ति के मस्तिष्क को दूसरे व्यक्ति के मस्तिष्क से जोड़ने वाला पुल है। |
| हर्बर्ट साइमन (Herbert Simon) | संचार वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा निर्णयों के आधार (Decisional Premises) संगठन के एक सदस्य से दूसरे सदस्य तक पहुँचाए जाते हैं। |
| चेस्टर बर्नार्ड | जो संचार समझा न जा सके, उसकी कोई सत्ता नहीं होती। |
| पीटर ड्रकर | संचार किसी उद्यम के विभिन्न कार्यात्मक समूहों की वह क्षमता है, जिससे वे एक-दूसरे के कार्यों और चिंताओं को समझते हैं। |
| थियो हेमन (Theo Haimann) | संचार एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को सूचनाएँ और समझ हस्तांतरित करने की प्रक्रिया है। |
| सी. जी. ब्राउन (C. G. Brown) | संचार विचारों और भावनाओं को एक व्यक्ति से दूसरे तक स्थानांतरित करने की प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य सूचना पाने वाले में समझ पैदा करना है। |
| एफ. जी. मेयर (F. G. Meyer) | मानवीय विचारों और सम्मतियों का शब्दों, पत्रों और संदेशों के माध्यम से आदान-प्रदान ही संचार है। |
इन सभी परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि संचार एक सतत प्रक्रिया है, जिसमें दो या दो से अधिक व्यक्ति अपने संदेशों, विचारों, तर्कों, भावनाओं और सम्मतियों का आदान-प्रदान करते हैं। इसके लिए शब्द, पत्र, हाव-भाव, मौन, चिह्न या अन्य कोई भी साधन प्रयोग हो सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि संचार का सार सूचना को समझना है, केवल सूचना को भेजना नहीं।
6.3 संचार का महत्व — विद्वानों के कथन
| विद्वान | संचार को क्या कहा |
|---|---|
| जॉन मिलेट | "प्रशासनिक संगठन की रक्तधारा (Blood Stream)" |
| जॉन फिफ़नर (John Pfiffner) | "प्रबंध का हृदय (Heart of Management)" |
| चेस्टर बर्नार्ड | "कार्यपालिका का पहला कार्य संचार-व्यवस्था विकसित करना और बनाए रखना है"; उन्होंने इसे सहकारी समूह-गतिविधि की नींव कहा |
| पीटर ड्रकर | "अच्छा संचार सुदृढ़ प्रशासन की नींव है"; "सूचना प्रबंध का विशेष अस्त्र है" |
| नॉर्बर्ट वीनर (Norbert Wiener) | "संचार वह सीमेंट है जो संगठन को बनाता है" |
| जॉर्ज आर. टेरी | "संचार वह चिकनाई (Lubricant) है जो प्रबंध-प्रक्रिया को सुचारु बनाती है" |
| कीथ डेविस | "व्यवसाय के लिए संचार का उतना ही महत्व है जितना व्यक्ति के लिए रक्तधारा का" |
| थियो हेमन | "सभी प्रबंधकीय कार्यों की सफलता कुशल संचार पर निर्भर है" |
| हर्बर्ट साइमन | "संचार के बिना संगठन संभव ही नहीं, क्योंकि तब समूह व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित ही नहीं कर सकता" |
| न्यूमैन / मेरी कुशिंग नाइल्स | "अच्छा संचार समन्वय में सहायक है" / "समन्वय हेतु अच्छा संचार अनिवार्य है" |
संचार को प्रशासन का "प्रथम सिद्धांत" भी माना जाता है। आधुनिक संगठनों में संचार का महत्व इन बातों से समझा जा सकता है:
- 1. संचार योजना के निर्माण और उसके क्रियान्वयन — दोनों के लिए अनिवार्य है। अनेक प्रकार की सूचनाएँ, तथ्य और आँकड़े इसी के माध्यम से मिलते हैं।
- 2. संचार के कारण संगठन में गतिशीलता और जीवंत वातावरण बना रहता है। बर्नार्ड के शब्दों में, संचार की एक सुनिश्चित प्रणाली बनाना संगठनकर्ता का पहला कार्य है।
- 3. संगठन में समन्वय (Coordination) स्थापित करने का सबसे सशक्त उपकरण संचार है।
- 4. अच्छी संचार-व्यवस्था के बिना संगठन के उद्देश्यों की प्राप्ति की कल्पना करना व्यर्थ है; संचार ही लोगों को समान उद्देश्यों के लिए आपस में जोड़ता है।
- 5. कर्मचारियों में अभिप्रेरणा, प्रोत्साहन और मनोबल पैदा करने के लिए अच्छा संचार आवश्यक है। प्रबंधक लोगों को हाँकता नहीं, बल्कि उन्हें प्रेरित, निर्देशित और संगठित करता है — और इसके लिए मौखिक या लिखित शब्द ही उसका मुख्य औज़ार हैं।
- 6. संगठनात्मक कार्यकुशलता, प्रभावशीलता, संगठनात्मक विकास, सुधार और नवाचार के लिए संचार आवश्यक है।
- 7. सही समय पर सही निर्णय लेने के लिए पर्याप्त तथ्यों और आँकड़ों की आवश्यकता होती है — यह भी प्रभावी संचार-प्रणाली से ही संभव है।
- 8. अच्छी संचार-व्यवस्था से प्रभावी नियंत्रण संभव होता है।
- 9. कुशल संचार-व्यवस्था कर्मचारियों में समूह-भावना का विकास करती है और उनकी कार्य-संतुष्टि बढ़ाती है।
- आदेशों, निर्देशों और निर्णयों को सभी संबंधित व्यक्तियों तक सही और स्पष्ट रूप में पहुँचाना।
- कर्मचारियों को संस्था की प्रगति से अवगत कराना।
- संगठन की नीतियों, योजनाओं और निर्णयों से कर्मचारियों को अवगत कराना।
- विचारों और सूचनाओं का स्वतंत्र आदान-प्रदान करना।
- कर्मचारियों से आवश्यक सूचनाएँ और सुझाव प्राप्त करना।
- उचित संचार-व्यवस्था के माध्यम से संगठन में मधुर मानवीय संबंध बनाना।
- संचार एक सतत (निरंतर) प्रक्रिया है।
- इसमें संदेशों, विचारों, तर्कों, सूचनाओं और भावनाओं का परस्पर विनिमय होता है।
- इसमें अनेक माध्यम (लिखित, मौखिक और सांकेतिक) प्रयोग हो सकते हैं।
- संचार की सफलता समय पर निर्भर करती है — देर से पहुँचा संदेश बेकार हो सकता है।
- संचार ऊर्ध्वगामी, अधोगामी या समतल हो सकता है।
- संचार में प्रेषक, सूचना, माध्यम, प्राप्तकर्ता और प्रतिपुष्टि जैसे तत्व होते हैं।
7संचार पर विचारकों का योगदान
संचार को संगठनात्मक व्यवहार का एक महत्वपूर्ण पहलू बनाने में चार विचारकों का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
शास्त्रीय विचारक | योगदान: "गैंग प्लैंक (Gang Plank)"
- फेयोल संगठन में संचार की समस्या का व्यापक विश्लेषण करने वाले पहले प्रशासनिक विचारक थे।
- उन्होंने शीघ्र संचार के महत्व को रेखांकित किया और इसका व्यावहारिक समाधान "गैंग प्लैंक" के रूप में दिया — इसका अर्थ है समान स्तर के अधिकारियों के बीच क्षैतिज संचार, ताकि हर बात को पदानुक्रम में ऊपर-नीचे घुमाकर देर न हो (देखें अध्याय 03)।
पुस्तक: "The Functions of the Executive" (1938)
- बर्नार्ड ने संगठन को एक "सहकारी व्यवस्था (Cooperative System)" माना, जिसके तीन तत्व हैं — साझा उद्देश्य, योगदान की इच्छा और संचार।
- उनके अनुसार संचार संगठनात्मक व्यवहार की एक जीवंत शक्ति है जो संगठन का रूप और उसकी आंतरिक व्यवस्था तय करती है।
- उनके अनुसार कार्यपालिका का पहला कार्य संचार-व्यवस्था देना है; दूसरा, आवश्यक प्रयास प्राप्त करना (जो मनोबल, प्रशिक्षण, प्रोत्साहन और पर्यवेक्षण से होता है); तीसरा, संगठन के उद्देश्य बनाना।
- बर्नार्ड ने सत्ता को भी संचार से जोड़ा — "सत्ता संचार का वह गुण है जिसके कारण संगठन के सदस्य उसे स्वीकार करते हैं।"
पुस्तक: "Administrative Behavior" (1947)
- साइमन ने संचार को वह प्रक्रिया माना जिसके द्वारा निर्णयों के आधार एक सदस्य से दूसरे तक पहुँचते हैं।
- उन्होंने कहा कि संचार के बिना संगठन संभव ही नहीं है।
- बर्नार्ड की तरह साइमन ने भी अनौपचारिक संचार (ग्रेपवाइन) पर बल दिया। उनके अनुसार ग्रेपवाइन संगठन की "जनमत का बैरोमीटर" है — यदि प्रशासक इसे सुने, तो उसे पता चलता है कि कर्मचारी किन विषयों में रुचि रखते हैं और उनके प्रति उनका दृष्टिकोण क्या है।
योगदान: "साइबरनेटिक्स (Cybernetics)"
- "साइबरनेटिक्स" शब्द यूनानी शब्द "काइबरनेटीस (Kybernetes)" से बना है, जिसका अर्थ है "पतवार चलाने वाला" या "मल्लाह"। इसने संचार के आधुनिक दृष्टिकोण को गहराई से प्रभावित किया।
- वीनर के अनुसार संगठन स्वाभाविक रूप से अव्यवस्था, बिखराव और आत्म-विनाश की ओर बढ़ते हैं — इसे "धनात्मक एंट्रॉपी (Positive Entropy)" कहते हैं।
- इस प्रवृत्ति को व्यवस्थित सूचना-प्रक्रिया से रोका जा सकता है। सूचना एंट्रॉपी की "दवा" है, जो संगठन को व्यवस्था और एकीकरण यानी "ऋणात्मक एंट्रॉपी (Negative Entropy)" की ओर ले जाती है।
- सूचना की प्रतिपुष्टि (Feedback) द्वारा व्यवस्था-नियंत्रण की उनकी अवधारणा ने इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर के विकास में भी योगदान दिया।
शास्त्रीय अर्थ: किसी व्यवस्था में अव्यवस्था की मात्रा; वीनर के अनुसार संगठन बिना सूचना-प्रवाह के धीरे-धीरे अव्यवस्था (धनात्मक एंट्रॉपी) की ओर जाते हैं, और सूचना उन्हें व्यवस्था (ऋणात्मक एंट्रॉपी) की ओर लाती है।
सरल भाषा में: अगर किसी दफ़्तर में कोई किसी को कुछ बताए नहीं, तो धीरे-धीरे सब अपने-अपने ढंग से काम करने लगेंगे और गड़बड़ बढ़ती जाएगी; नियमित बैठकें, रिपोर्ट और प्रतिपुष्टि इस गड़बड़ को रोकती हैं। उदाहरण: बिना साप्ताहिक समीक्षा-बैठक वाले ज़िले में हर विभाग अलग दिशा में चलता है — एक विभाग सड़क बनाता है, दूसरा उसे पाइपलाइन के लिए खोद देता है। समीक्षा-बैठक (सूचना का आदान-प्रदान) इस अव्यवस्था को रोकती है।
8संचार की प्रक्रिया (Process of Communication)
संचार एक-तरफ़ा घटना नहीं, बल्कि कई चरणों वाली प्रक्रिया है। इसके मूल पाँच चरण हैं:
- 1. प्रेषक (Sender) — जो संदेश भेजता है। संचार-प्रक्रिया का आरंभ प्रेषक से होता है, जो जानकारी, आँकड़े, विचार, निर्णय या भावना एक या अधिक व्यक्तियों तक भेजता है।
- 2. संदेश (Message) — जो सूचना या विचार भेजा जा रहा है। यह आदेश, निर्देश, सुझाव, शिकायत, प्रशंसा या परिवेदना — किसी भी रूप में हो सकता है।
- 3. माध्यम (Channel) — जिस रास्ते संदेश जाता है (मौखिक, लिखित, इलेक्ट्रॉनिक, सांकेतिक, दृश्य)। कौन-सा माध्यम श्रेष्ठ होगा, यह संदेश की प्रकृति और प्राप्तकर्ता की रुचि पर निर्भर करता है।
- 4. प्राप्तकर्ता (Receiver) — जो संदेश ग्रहण करता है। इसके बिना संचार-प्रक्रिया अधूरी रहती है।
- 5. प्रतिपुष्टि (Feedback) — प्राप्तकर्ता की प्रतिक्रिया, जो संचार-चक्र (Loop) को पूरा करती है — बिना प्रतिपुष्टि के संचार अधूरा माना जाता है। संचार तभी पूर्ण माना जाता है जब संदेश को उसी अर्थ में समझा जाए जिस अर्थ में भेजने वाले ने उसे भेजा था।
शैनन और वीवर का मॉडल
क्लॉड शैनन (Claude Shannon) और वॉरेन वीवर (Warren Weaver) ने संचार-प्रक्रिया का सबसे अधिक प्रयोग होने वाला मॉडल दिया (1949)। इसमें आठ घटक हैं — (1) स्रोत, (2) कूटबद्धता, (3) संदेश, (4) माध्यम, (5) विकूटन, (6) प्राप्तकर्ता, (7) प्रतिपुष्टि और (8) शोर।

| घटक | अर्थ |
|---|---|
| स्रोत (Source) | संचार शुरू करने वाला व्यक्ति, जो अपने विचार, आवश्यकता या सूचना दूसरे तक पहुँचाना चाहता है। |
| कूटबद्धता (Encoding) | विचारों को किसी कोड, प्रतीक, भाषा या रूप में बदलना, ताकि उन्हें भेजा जा सके। |
| संदेश (Message) | कूटबद्धता से बना वास्तविक "उत्पाद" — वह अर्थ जो स्रोत पहुँचाना चाहता है। |
| माध्यम (Channel) | वह साधन जिससे संदेश जाता है; प्रेषक और प्राप्तकर्ता के बीच की कड़ी। |
| विकूटन (Decoding) | संदेश को ऐसे रूप में बदलना जिसे प्राप्तकर्ता समझ सके। |
| प्राप्तकर्ता (Receiver) | वह व्यक्ति जिसके लिए संदेश भेजा गया। |
| प्रतिपुष्टि (Feedback) | प्राप्तकर्ता की प्रतिक्रिया, जिससे प्रेषक जान पाता है कि संदेश सही ढंग से मिला और समझा गया या नहीं। |
| शोर (Noise) | वे सभी कारक जो संदेश की सटीकता घटाते हैं; यह किसी भी चरण में आ सकता है। |
मुख्यमंत्री कार्यालय यह सोचता है कि "हर ज़िले में पीने के पानी की स्थिति रोज़ ऊपर पहुँचे" (विचार)। इसे एक परिपत्र में लिखा जाता है (कूटबद्धता)। परिपत्र ई-मेल से ज़िलों में जाता है (माध्यम)। ज़िले का अधिकारी उसे पढ़कर समझता है कि "रोज़ शाम 5 बजे पानी की रिपोर्ट भेजनी है" (विकूटन)। अगर परिपत्र की भाषा कठिन हो, या ई-मेल समय पर न खुले (शोर), तो संदेश बिगड़ सकता है। जब पहली रिपोर्ट मुख्यमंत्री कार्यालय पहुँचती है, तो पता चलता है कि संदेश सही समझा गया (प्रतिपुष्टि)।
"स्रो-कू-सं-मा-वि-प्रा + प्रति + शोर" — स्रोत से चलकर कूटबद्ध संदेश माध्यम से विकूटन होकर प्राप्तकर्ता तक पहुँचता है; वापसी में प्रतिपुष्टि आती है; और बीच में हर जगह शोर घुस सकता है।
9संचार के प्रकार (Types of Communication)
संचार को अलग-अलग आधारों पर अलग-अलग प्रकारों में बाँटा जाता है — संबंध की प्रकृति के आधार पर (औपचारिक और अनौपचारिक), दिशा के आधार पर (अधोगामी, ऊर्ध्वगामी और समतल), माध्यम के आधार पर (मौखिक, लिखित और सांकेतिक) तथा क्षेत्र के आधार पर (आंतरिक, बाह्य और अंतर्वैयक्तिक)।
| वर्गीकरण का आधार | प्रकार |
|---|---|
| संबंध की प्रकृति | औपचारिक संचार; अनौपचारिक संचार (ग्रेपवाइन) |
| दिशा | अधोगामी (ऊपर से नीचे); ऊर्ध्वगामी (नीचे से ऊपर); समतल / क्षैतिज (समान स्तर पर) |
| माध्यम | मौखिक; लिखित; सांकेतिक (हाव-भाव, इशारे) |
| क्षेत्र | आंतरिक (संगठन के भीतर); बाह्य (संगठन और जनता / अन्य संगठन के बीच); अंतर्वैयक्तिक (कर्मचारियों के आपसी संबंध) |
| संसाधन / साधन | श्रव्य (सम्मेलन, साक्षात्कार); दृश्य (परिपत्र, रिपोर्ट, चित्र); श्रव्य-दृश्य (टेलीविज़न, वीडियो) |
9.1 औपचारिक बनाम अनौपचारिक संचार
जब प्रेषक और प्राप्तकर्ता के बीच औपचारिक संबंध हो, तो उनके बीच संदेशों के आदान-प्रदान को औपचारिक संचार कहते हैं। यह नियमों के अंतर्गत और व्यवस्थित रूप में होता है, और संगठन की नियमावली में इसका उल्लेख होता है। औपचारिक संचार प्रायः लिखित होता है — जैसे स्थायी आदेश, वार्षिक प्रतिवेदन, परिपत्र। अनौपचारिक संचार कर्मचारियों के व्यक्तिगत संबंधों पर आधारित होता है; यह संगठन-चार्ट के रास्तों से नहीं, बल्कि आपसी संबंधों के आधार पर चलता है। इसमें हाव-भाव, आँखों के इशारे, सिर हिलाना, मुस्कुराना आदि भी शामिल हैं।
- संगठन के निर्धारित पदानुक्रम या चैनलों (Official Channels) से होकर गुज़रता है (देखें अध्याय 03 — पदसोपान शृंखला)।
- दिशाएँ: अधोगामी (Downward — आदेश / निर्देश), ऊर्ध्वमुखी (Upward — रिपोर्ट / शिकायत), क्षैतिज (Horizontal — विभागों के बीच समन्वय हेतु)।
- लाभ: जवाबदेही तय होती है, रिकॉर्ड बना रहता है।
- दोष: धीमा हो सकता है — इसीलिए फेयोल ने "गैंग प्लैंक (Gang Plank)" का सुझाव दिया था (देखें अध्याय 03), ताकि समान स्तर के अधिकारी बिना पदानुक्रम तोड़े सीधे संपर्क कर सकें।
- बिना किसी निर्धारित चैनल के, व्यक्तिगत या सामाजिक संबंधों के आधार पर स्वतः विकसित होता है — जैसे दफ़्तर की गपशप, चाय की चुस्कियों के बीच बातचीत।
- "ग्रेपवाइन (Grapevine)" नाम इसलिए पड़ा क्योंकि यह अंगूर की बेल की तरह अनियमित दिशाओं में तेज़ी से फैलता है।
- लाभ: तेज़, कर्मचारियों के वास्तविक मनोबल और भावनाओं को दर्शाता है, औपचारिक तंत्र के अंतराल को भरता है।
- दोष: सूचना विकृत (Distorted) या अफ़वाह (Rumour) के रूप में फैल सकती है — प्रबंधन को इसकी निगरानी करनी चाहिए; इसे पूरी तरह ख़त्म नहीं किया जा सकता।
9.2 दिशा के आधार पर संचार
- अधोगामी संचार (Downward): संगठन में उच्च स्तर से निम्न स्तर की ओर होने वाला संचार — जैसे आदेश, निर्देश, परिपत्र। यह प्रबंधन और कर्मचारियों के संबंध को दिखाता है।
- ऊर्ध्वगामी संचार (Upward): निम्न स्तर से उच्च स्तर की ओर होने वाला संचार — जैसे आवेदन, प्रतिवेदन, सुझाव, कार्य-प्रगति रिपोर्ट, शिकायत। यह कर्मचारियों और प्रबंधन के संबंध को दिखाता है।
- समतल / क्षैतिज संचार (Horizontal / Across): एक ही स्तर के अधिकारियों के बीच होने वाला संचार — जैसे एक अधिकारी द्वारा अपने समकक्ष अधिकारी को भेजा गया पत्र। अधोगामी और ऊर्ध्वगामी संचार "ऊर्ध्वाधर" होते हैं, जबकि यह "क्षैतिज" होता है। ये तीनों आंतरिक संचार के ही प्रकार हैं।
- आंतरिक संचार: संगठन या विभाग के भीतर का संचार प्रवाह, जो कर्मचारियों के साथ संगठन के संबंध से जुड़ा है। बाह्य संचार: संगठन द्वारा बाहर के संगठन या जनता से किया गया संचार; इसे "जन-संपर्क (Public Relations)" भी कहते हैं। अंतर्वैयक्तिक संचार: कर्मचारियों के आपसी संबंधों से जुड़ा संचार।
9.3 माध्यम के आधार पर — मौखिक, लिखित और सांकेतिक संचार
मौखिक संचार (Verbal / Oral) का अर्थ है संदेश को मुख से बोलकर प्राप्तकर्ता तक पहुँचाना। यह संचार का सबसे लोकप्रिय और परंपरागत तरीक़ा है। लॉरेंस ए. एप्पले (Lawrence A. Appley) के अनुसार मौखिक शब्दों द्वारा पारस्परिक संचार, संचार की सर्वश्रेष्ठ कला है। व्यावसायिक जगत में लगभग 75 प्रतिशत समय मौखिक संचार में ही बीतता है। इसके साधन हैं — आमने-सामने बातचीत, टेलीफ़ोन, रेडियो, फ़िल्में, साक्षात्कार, विचार-गोष्ठियाँ, सम्मेलन, सभाएँ, प्रशिक्षण पाठ्यक्रम, टेलीविज़न और श्रमिक संघ।
- श्रेष्ठ नेतृत्व प्रदान करने में सहायक।
- काग़ज़ी कार्यवाही कम — समय और धन की बचत।
- अधिकार-प्रत्यायोजन को सरल बनाता है।
- भावाभिव्यक्ति अधिक प्रभावशाली; संदेह का तुरंत निवारण।
- समूह-भावना का विकास।
- लिखित की तुलना में अधिक लचीला; संदेश तुरंत प्रसारित।
- प्रेषक और प्राप्तकर्ता में पारस्परिक विश्वास बढ़ता है।
- दोनों पक्षों का एक समय पर उपस्थित होना ज़रूरी; प्रत्यक्ष संपर्क न हो तो अनुपयुक्त।
- लिखित साक्ष्य का अभाव — कोई भी पक्ष अपनी बात से मुकर सकता है, जिससे वैधानिक कार्यवाही में कठिनाई होती है।
- भविष्य के संदर्भ के लिए अनुपयुक्त।
- सोचने का समय कम मिलता है; तनाव या मनमुटाव की आशंका।
लिखित संचार (Written) का अर्थ है संदेश को लिखित या मुद्रित रूप में भेजना। इसके साधन हैं — पत्र, पत्रिकाएँ, पुस्तकें, पोस्टर, बुलेटिन, रिपोर्ट, आदेश-पत्र, डायरियाँ, हैंडबुक, मैनुअल, सुझाव-पुस्तिकाएँ, नियमावली, चार्ट, समाचार-पत्र और संगठन-अनुसूचियाँ।
- दोनों पक्षों की प्रत्यक्ष उपस्थिति आवश्यक नहीं।
- विस्तृत और जटिल सूचनाओं के लिए अधिक उपयुक्त।
- संदेश में स्पष्टता आती है, जिससे यह अधिक प्रभावशाली होता है।
- प्रमाण का काम करता है; भविष्य के संदर्भ के लिए उपयोगी।
- कई व्यक्तियों को एक साथ सूचना दी जा सकती है; सामान्यतः एक ही अर्थ निकलता है।
- श्रम, समय और धन का व्यय; छोटा संदेश लिखकर भेजना अपव्यय।
- हर छोटी-बड़ी बात लिखित में देना संभव नहीं।
- प्रत्यक्ष संपर्क न होने से प्राप्तकर्ता की प्रतिक्रिया जल्दी पता नहीं चलती।
- संदेश को गोपनीय रखना कठिन।
- कार्य में विलंब; अनेक औपचारिकताओं के कारण लालफ़ीताशाही बढ़ती है।
मौखिक और लिखित — इनमें कौन-सी विधि श्रेष्ठ है, यह तय करना कठिन है। दोनों के अपने गुण-दोष हैं, इसलिए परिस्थिति के अनुसार विधि अपनाई जाती है। थियो हेमन लिखते हैं कि "यदि प्रबंधक केवल एक विधि चुनता है, तो उसे गंभीर असफलता का सामना करना पड़ेगा; मौखिक और लिखित संचार वास्तव में एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।"
सांकेतिक संचार में न बोलना पड़ता है, न लिखना — संदेश संकेतों, हाव-भाव और इशारों से जाता है। जैसे होंठों पर उँगली रखकर चुप रहने का इशारा, पीठ थपथपाना, आँखों से इशारा करना, अँगूठा उठाकर प्रोत्साहित करना, हँसकर या सिर हिलाकर प्रशंसा करना।
9.4 सम्मेलन विधि (Conference Method)
लोक प्रशासन में संचार की सम्मेलन-विधि (बैठक या समीक्षा-बैठक) बहुत लोकप्रिय हुई है, क्योंकि इससे विलंब घटता है, लालफ़ीताशाही कम होती है और पत्राचार न्यूनतम हो जाता है। मिलेट के अनुसार सम्मेलन-विधि — (1) किसी समस्या की जानकारी पाने में, (2) समस्या का समाधान खोजने में, (3) निर्णयों की स्वीकृति और क्रियान्वयन में, (4) अधिकारियों में एकता की भावना बढ़ाने में, (5) प्रशासनिक कर्मियों में सूचना के आदान-प्रदान में, और (6) कर्मियों के मूल्यांकन में सहायक होती है।
हर ज़िले में कलेक्टर की साप्ताहिक या मासिक समीक्षा-बैठक सम्मेलन-विधि का जीवंत उदाहरण है। इसमें सभी विभागों के अधिकारी एक साथ बैठते हैं, इसलिए दस पत्रों से होने वाला काम एक बैठक में हो जाता है, विभागों के बीच समन्वय होता है और कलेक्टर हर अधिकारी के काम का मूल्यांकन भी कर लेता है। आजकल यही बैठक वीडियो-कॉन्फ़्रेंसिंग से राज्य-स्तर तक जुड़ जाती है।
10संचार-जाल (Communication Networks) और ग्रेपवाइन
10.1 औपचारिक संचार-जाल
संचार के मार्गों को "संचार-जाल" भी कहते हैं। प्रबंधन द्वारा सोच-समझकर बनाया गया आधिकारिक मार्ग औपचारिक जाल है, जबकि कार्यस्थल की सामाजिक शक्तियों से अपने-आप बना मार्ग अनौपचारिक जाल यानी ग्रेपवाइन है। औपचारिक संचार-जाल के छह रूप हैं:

| जाल | कैसे काम करता है |
|---|---|
| शृंखला (Chain) | सूचना केवल पदानुक्रम की कड़ी में ऊपर या नीचे जाती है; आदेश-शृंखला का कठोर पालन। |
| तारा / पहिया (Star / Wheel) | सभी सदस्य केवल केंद्र में बैठे नेता के माध्यम से बात करते हैं, आपस में सीधे नहीं। यह सबसे अधिक केंद्रीकृत जाल है। |
| वृत्त (Circle) | हर सदस्य केवल अपने पास वाले सदस्यों से बात करता है; सूचना बग़ल-बग़ल चलती है। |
| सर्व-माध्यम (All-channel) | समूह के सभी सदस्य आपस में स्वतंत्र रूप से बात करते हैं। यह सबसे अधिक विकेंद्रीकृत जाल है; इसे "पूर्णतः जुड़ा हुआ" जाल भी कहते हैं। |
| उल्टा V (Inverted V) | अधीनस्थ अपने तत्काल वरिष्ठ से भी बात करता है और वरिष्ठ के वरिष्ठ से भी — पर दूसरे मामले में विषय पहले से तय होते हैं। |
| Y-आकार (Y) | दो अधीनस्थ पदानुक्रम की कड़ी से एक वरिष्ठ तक बात पहुँचाते हैं, और वह वरिष्ठ अपने ऊपर के दो वरिष्ठों से बात करता है। यह तारा-जाल से कम केंद्रीकृत है। |
10.2 ग्रेपवाइन — कीथ डेविस का अध्ययन
कीथ डेविस (Keith Davis) ने संगठनों में ग्रेपवाइन का विशेष अध्ययन किया (1953 के आसपास)। उन्होंने कहा कि ग्रेपवाइन को "न ख़त्म किया जा सकता है, न छिपाया जा सकता है, न रोका जा सकता है। यदि एक जगह दबाओ, तो दूसरी जगह उभर आता है।" जहाँ भी लोग समूह में इकट्ठे होते हैं, वहाँ ग्रेपवाइन अवश्य विकसित होता है — इस अर्थ में यह मनुष्य का "जन्मसिद्ध अधिकार" है। बाद के शोधों में पाया गया कि ग्रेपवाइन की अधिकांश सूचनाएँ (लगभग तीन-चौथाई या अधिक) सही होती हैं, पर बची हुई ग़लत सूचना बड़ा नुक़सान कर सकती है।

| ग्रेपवाइन का रूप | अर्थ |
|---|---|
| एकल धागा (Single Strand) | सूचना एक से एक तक जाती है — क, ख को बताता है; ख, ग को बताता है; और इसी तरह आगे। |
| गपशप (Gossip) | सूचना रखने वाला व्यक्ति बिना चुने सबको बता देता है, जिससे भी मिलता है। |
| संभाव्यता (Probability) | सूचना संयोग के नियम से फैलती है — एक व्यक्ति कुछ लोगों को अनायास बताता है, वे आगे कुछ और लोगों को। |
| गुच्छा (Cluster) | सूचना चुनकर फैलती है — व्यक्ति केवल उन्हें बताता है जिन पर भरोसा है, और वे आगे अपने चुने लोगों को। डेविस के अनुसार यह सबसे लोकप्रिय और सबसे आम रूप है। |
📌 प्रशासक के लिए सीख: ग्रेपवाइन को दबाने की बजाय उसे सुनना चाहिए (साइमन — "जनमत का बैरोमीटर"), और अफ़वाह का जवाब समय पर सही औपचारिक सूचना देकर देना चाहिए। जब औपचारिक संचार धीमा या अस्पष्ट होता है, तभी अफ़वाहें तेज़ होती हैं।
11संचार की बाधाएँ (Barriers to Communication)
संचार-प्रक्रिया में कई बाधाएँ आती हैं, जो संदेश को बिगाड़ देती हैं या पहुँचने ही नहीं देतीं। प्रमुख बाधाएँ नीचे की तालिका में हैं।
| बाधा का प्रकार | विवरण / उदाहरण |
|---|---|
| अर्थ-संबंधी बाधा (Semantic Barrier) | शब्दों या भाषा के अलग-अलग अर्थ निकलना — जैसे तकनीकी शब्दावली (Jargon) आम नागरिक को समझ न आना। शब्दों और प्रतीकों की व्यक्तिगत व्याख्या अलग होने से यह बाधा आती है। |
| मनोवैज्ञानिक बाधा (Psychological Barrier) | पूर्वाग्रह, अविश्वास, भय (जैसे वरिष्ठ अधिकारी को सच बताने से डरना) संचार को बाधित करते हैं। |
| संगठनात्मक बाधा (Organisational Barrier) | अत्यधिक लंबे पदानुक्रम (देखें अध्याय 03) के कारण संदेश हर स्तर पर विकृत होता जाता है — इसे "संदेश-विकृति (Message Distortion)" कहते हैं। |
| भौतिक / तकनीकी बाधा (Physical / Technical Barrier) | दूरी, शोर, इंटरनेट या नेटवर्क की कमी — विशेषकर ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में ई-शासन (e-Governance) हेतु चुनौती। |
| सांस्कृतिक-भाषाई बाधा (Cultural-Linguistic Barrier) | भारत जैसे बहुभाषी देश में अलग-अलग क्षेत्रीय भाषाएँ प्रशासनिक संचार में बाधा बन सकती हैं। |
| वैचारिक बाधा (Ideological Barrier) | संगठन के सदस्यों का दृष्टिकोण और विचारधारा एक जैसी नहीं होती। फिफ़नर के अनुसार पृष्ठभूमि, शिक्षा और अपेक्षाओं के अंतर से अलग-अलग सामाजिक-राजनीतिक विचार बनते हैं — ये संचार की सबसे बड़ी और सबसे कठिन बाधाएँ हैं। |
| छनन (Filtering) | प्रेषक द्वारा सूचना को जान-बूझकर तोड़-मरोड़कर आगे भेजना। पदानुक्रम में जितने अधिक स्तर, छनन की उतनी अधिक गुंजाइश। |
| हठधर्मिता (Dogmatism) | व्यक्ति के पहले से बने विचार उसे नई और सही सूचना स्वीकार नहीं करने देते। |
| प्रभामंडल प्रभाव (Halo Effect) | चीज़ों को केवल दो खानों में देखना — अच्छा या बुरा, सही या ग़लत; जबकि अधिकांश स्थितियाँ इतनी सरल नहीं होतीं। |
| रूढ़िबद्ध धारणा (Stereotyping) | किसी व्यक्ति या घटना के बारे में पहले से बनी धारणा के आधार पर संदेश का अर्थ तय कर लेना। |
| अन्य बाधाएँ | वरिष्ठों में संवाद की इच्छा का अभाव; संचार के निश्चित साधनों का अभाव; संगठन का बड़ा आकार और सदस्यों के बीच दूरी; सांस्कृतिक बाधाएँ; प्रतिपुष्टि की बाधाएँ। |
शास्त्रीय अर्थ: सरकारी पत्राचार की वह उलझी, अति-औपचारिक, क़ानूनी लगने वाली भाषा, जिसे आम व्यक्ति समझ न सके। यह शब्द अमेरिकी सांसद मॉरी मेवरिक (Maury Maverick) ने 1944 में दिया; रुडोल्फ़ फ़्लेश (Rudolf Flesch) ने 1945 के अपने लेख में बताया कि अति-सटीक और अति-अमूर्त बनने की चाह में सरकारी भाषा रूखी और समझ से बाहर हो जाती है।
सरल भाषा में: जब सरकारी चिट्ठी इतनी घुमावदार भाषा में लिखी हो कि पढ़ने वाला पूछे — "आख़िर कहना क्या चाहते हैं?" — तो वह गॉबलडीगूक है। उदाहरण: "उपर्युक्त संदर्भित प्रकरण के परिप्रेक्ष्य में अधोहस्ताक्षरकर्ता को निर्देशित किया गया है कि…" की जगह सीधे लिखा जाए — "आपके आवेदन पर निर्णय हो गया है; आपकी पेंशन अगले महीने से शुरू होगी।"
12प्रभावी संचार के सिद्धांत और ई-शासन में संचार
12.1 मिलेट के सात तत्व
जॉन मिलेट ने प्रभावी संचार के सात आवश्यक तत्व (सिद्धांत) बताए:
- 1. स्पष्टता (Clarity) — संदेश स्पष्ट और सटीक भाषा में हो।
- 2. संगति (Consistency) — संदेश प्राप्तकर्ता की अपेक्षाओं और पहले के निर्देशों से मेल खाए।
- 3. पर्याप्तता (Adequacy) — सूचना पर्याप्त हो, न इतनी अधिक कि बोझ बने, न इतनी कम कि अधूरी रहे।
- 4. समयबद्धता (Timeliness) — संदेश न बहुत देर से पहुँचे, न बहुत पहले।
- 5. एकरूपता (Uniformity) — जिन लोगों से एक जैसा व्यवहार अपेक्षित है, उन सबको एक जैसा संदेश मिले, भेदभाव न हो।
- 6. लचीलापन (Flexibility) — संदेश रूप या स्वभाव में कठोर न हो।
- 7. स्वीकार्यता (Acceptability) — संदेश ऐसा हो कि प्राप्तकर्ता उसे स्वीकार करे और सकारात्मक प्रतिक्रिया दे।
"स्प-सं-प-स-ए-ल-स्वी" — स्पष्ट, संगत, पर्याप्त, समय पर, एकरूप, लचीला, स्वीकार्य। वाक्य बनाकर याद करें: "स्पष्ट संदेश पहुँचे समय पर, एक जैसा, लचीला और स्वीकार्य।"
12.2 टेरी की आठ शर्तें
जॉर्ज आर. टेरी ने अच्छे संचार की आठ शर्तें बताईं — (1) संचार से पहले विषय की पूरी जानकारी और तथ्य जुटाएँ, ताकि संदेश में विरोधाभास न हो; (2) प्राप्तकर्ता को विश्वास में लें, ताकि वह संदेश स्वीकार करने को तत्पर रहे; (3) दोनों पक्षों को ज्ञात और एक-अर्थ वाले शब्द प्रयोग करें; (4) अनुभव का एक साझा आधार खोजें, ताकि प्राप्तकर्ता सूचना समझ सके; (5) संदर्भ और प्रसंग का ध्यान रखें; (6) प्राप्तकर्ता का ध्यान आकर्षित और बनाए रखें; (7) उदाहरणों और रेखाचित्रों का प्रयोग करें; (8) प्रतिक्रिया देने में जल्दबाज़ी न करें और ऐसे संचार से बचें जिससे प्रतिक्रिया देर से मिले। संक्षेप में, श्रेष्ठ संचार वह है जिसमें स्पष्टता, एकार्थता, समयानुकूलता और प्रासंगिकता हो, और जो आवश्यकता के अनुसार उदाहरणों और चित्रों के साथ हो।
12.3 प्रबंध सूचना प्रणाली (Management Information System)
नई विकसित प्रबंध सूचना प्रणाली (MIS) ने संगठनात्मक संचार को बहुत सुधारा है। इसका अर्थ है संचार-प्रक्रिया में सूचना प्रौद्योगिकी का प्रयोग — सूचना बनाना, उसे संसाधित करना और आगे भेजना। यह प्रबंधकों को समस्या-समाधान, निर्णय-निर्माण और रणनीतिक योजना में सहायता करती है। आज के "डैशबोर्ड" — जिन पर किसी योजना की ज़िले-वार प्रगति एक क्लिक में दिखती है — इसी का आधुनिक रूप हैं।
12.4 ई-शासन में संचार — राजस्थान का उदाहरण
राजस्थान का "जन सूचना पोर्टल" ई-शासन के माध्यम से संचार-बाधाओं को दूर करने का सजीव उदाहरण है। इसे 13 सितंबर 2019 को शुरू किया गया। यह सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 4(2) की भावना — यानी सरकार द्वारा स्वयं आगे बढ़कर सूचना सार्वजनिक करने (Proactive Disclosure) — पर आधारित है।
शुरुआत में इसमें 13 विभागों की जानकारी थी; अब 115 से अधिक विभागों की 350 से अधिक प्रकार की सूचनाएँ और योजनाएँ (जैसे राशन, मनरेगा के मस्टर-रोल, पेंशन, छात्रवृत्ति, खनन-पट्टे) सीधे ग्राम पंचायत स्तर तक, बिना सूचना का अधिकार आवेदन दाखिल किए, उपलब्ध हैं। नागरिक जन आधार परिवार पहचान संख्या, आधार, राशन कार्ड, जॉब कार्ड या मोबाइल नंबर से अपनी जानकारी खोज सकते हैं।
यह ऊर्ध्वमुखी और अधोमुखी दोनों तरह के औपचारिक संचार को पारदर्शी और तीव्र बनाने का प्रयास है — सरकार की सूचना सीधे जनता तक जाती है, और जनता को गड़बड़ी दिखे तो वह शिकायत ऊपर पहुँचा सकती है।
- ई-ऑफ़िस (e-Office), वीडियो-कॉन्फ़्रेंसिंग, व्हाट्सऐप शासन-समूह — आधुनिक तकनीकी माध्यमों ने पदानुक्रम (Hierarchy) को तोड़े बिना संचार को तीव्र किया है — यह फेयोल के "गैंग प्लैंक" सिद्धांत का डिजिटल रूप है।
- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act) ने नागरिक-प्रशासन संचार को क़ानूनी अधिकार का रूप दिया — अब सरकार को नागरिकों के साथ ऊर्ध्वमुखी संचार हेतु बाध्य किया जा सकता है।
- केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण और निगरानी प्रणाली (CPGRAMS) — नागरिक की शिकायत ऑनलाइन सीधे संबंधित मंत्रालय या विभाग तक पहुँचती है और उसकी स्थिति देखी जा सकती है। यह नागरिक से सरकार की ओर ऊर्ध्वगामी संचार का संस्थागत रूप है।
13मनोबल (Morale) — अर्थ, परिभाषाएँ और मनोबल बनाम अभिप्रेरणा
13.1 मनोबल का अर्थ
मनोबल का अर्थ है — किसी कर्मचारी अथवा समूह का अपने कार्य, संगठन और सहकर्मियों के प्रति समग्र मानसिक रवैया (Mental Attitude), उत्साह और संतुष्टि का स्तर। उच्च मनोबल वाला कर्मचारी कठिन परिस्थितियों में भी उत्साह से काम करता है, जबकि निम्न मनोबल वाला कर्मचारी सामान्य परिस्थितियों में भी उदासीन रहता है।
मनोबल एक भावनात्मक अवस्था है, जो बहुत ऊँचे से लेकर बहुत नीचे तक हो सकती है और समय के साथ बदलती रहती है। यह किसी एक व्यक्ति से अधिक पूरे समूह का गुण है — इसीलिए हम "पुलिस बल का मनोबल" या "सेना का मनोबल" कहते हैं। हेनरी फेयोल का चौदहवाँ सिद्धांत "एस्प्री डी कॉर्प्स (Esprit de Corps)" — यानी "एकता में शक्ति" — मनोबल की ही बात करता है: कर्मचारियों के बीच सामंजस्य और एकता संगठन की सबसे बड़ी ताक़त है।
13.2 मनोबल की प्रमुख परिभाषाएँ
| विद्वान | परिभाषा (हिंदी में) | मुख्य संकेत |
|---|---|---|
| एडविन बी. फ़्लिप्पो (Edwin B. Flippo) | मनोबल व्यक्तियों और समूहों की वह मानसिक दशा या दृष्टिकोण है, जो सहयोग करने की उनकी इच्छा को निर्धारित करता है। | सहयोग की इच्छा |
| अलेक्ज़ेंडर लेटन (Alexander Leighton) | मनोबल किसी समूह की वह क्षमता है जिससे वह किसी साझे उद्देश्य के लिए लगातार और एकजुट होकर प्रयास करता रहे। | कठिनाई में भी एकजुटता |
| राल्फ़ डेविस (Ralph Davis) | मनोबल वह दशा है जिसमें व्यक्ति उचित सीमा तक अपने व्यक्तिगत लक्ष्यों को स्वेच्छा से संगठन के लक्ष्यों के अधीन कर देते हैं। | स्वैच्छिक समर्पण |
| थियो हेमन (Theo Haimann) | मनोबल मन और भावनाओं की वह अवस्था है जो काम करने की इच्छा को प्रभावित करती है, और इसके द्वारा संगठन के उद्देश्यों को भी। | काम करने की इच्छा |
| जेम्स मूने (James Mooney) | मनोबल साहस, धैर्य, संकल्प और सबसे बढ़कर आत्मविश्वास का मिश्रण है। | आत्मविश्वास |
| मॉरिस विटेल्स (Morris Viteles) | मनोबल वह दृष्टिकोण है जिसमें समूह के लक्ष्यों से संतुष्टि, समूह में बने रहने की इच्छा और उन लक्ष्यों के लिए प्रयास करने की तत्परता शामिल है। | मापने योग्य दृष्टिकोण |
शास्त्रीय अर्थ: किसी समूह या व्यक्ति का अपने काम, संगठन और साथियों के प्रति वह सामूहिक मानसिक रवैया, जो सहयोग करने और लगातार प्रयास करने की उसकी इच्छा तय करता है।
सरल भाषा में: मनोबल यानी टीम का "हौसला" — कठिन समय में भी साथ टिके रहने और पूरे मन से काम करने की भावना। उदाहरण: चुनाव ड्यूटी में दो दिन से लगातार काम कर रहे मतदान-कर्मी थके हैं, पर उनका दल-प्रमुख सबका ध्यान रखता है, समय पर भोजन की व्यवस्था करता है और काम की सराहना करता है — दल हँसते-हँसते काम पूरा करता है। यह उच्च मनोबल है।
13.3 मनोबल बनाम अभिप्रेरणा (Morale vs Motivation)
मनोबल और अभिप्रेरणा को प्रायः एक ही समझ लिया जाता है, पर दोनों में अंतर है। अभिप्रेरणा एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा मनुष्य किसी कार्य के लिए प्रेरित होता है, जबकि मनोबल स्वयं कार्य करने की इच्छा और मनःस्थिति है, जो अभिप्रेरणा से और प्रबल होती है। अभिप्रेरणा से कर्मचारी का मनोबल बढ़ता है और वह अधिक कार्य करने के लिए प्रेरित होता है। साथ ही, ऊँचा मनोबल हर व्यक्ति को अपने-आप प्रेरित कर दे, यह ज़रूरी नहीं।
- यह एक समूह या सामूहिक मानसिक स्थिति है।
- यह अपेक्षाकृत स्थायी (Stable) और दीर्घकालिक भावना है।
- यह कार्य के प्रति समग्र संतुष्टि और दृष्टिकोण दर्शाता है।
- यह एक परिणाम या अवस्था है — "हम कैसा महसूस करते हैं"।
- यह एक व्यक्तिगत या आंतरिक प्रेरक-शक्ति है।
- यह अल्पकालिक भी हो सकती है — किसी विशेष कार्य या लक्ष्य हेतु।
- यह किसी विशेष व्यवहार को क्रियान्वित करने वाली ऊर्जा है।
- यह एक प्रक्रिया है — "हमें क्या चीज़ काम करने को प्रेरित करती है"।
14मनोबल के कारक, संकेतक, मापन और सुधार
14.1 मनोबल को प्रभावित करने वाले कारक (Factors)
मनोबल अनेक कारकों से बनता और बिगड़ता है। इन्हें चार मुख्य वर्गों में समझा जा सकता है:
- A. आर्थिक कारक — वेतन, भत्ते, पदोन्नति की संभावना। उचित और समय पर वेतन मिलना मनोबल की पहली शर्त है।
- B. सामाजिक कारक — मान्यता (Recognition), सम्मान, कार्यस्थल का सामाजिक वातावरण (देखें अध्याय 02 — हॉथोर्न अध्ययन)। सहकर्मियों का व्यवहार और समूह में स्वीकार्यता भी इसी में आते हैं।
- C. मनोवैज्ञानिक कारक — कार्य में संतुष्टि, आत्म-सम्मान, उपलब्धि की भावना। काम सार्थक लगे, तो मनोबल अपने-आप बढ़ता है।
- D. संगठनात्मक कारक — नेतृत्व की गुणवत्ता, संचार-व्यवस्था, कार्य-दशाएँ (Working Conditions), संगठन के लक्ष्य, शिकायत-निवारण की व्यवस्था और पर्यवेक्षण का ढंग।
इनके अतिरिक्त कर्मचारी की अपनी पृष्ठभूमि (शिक्षा, व्यक्तित्व) और उसका निजी वातावरण (परिवार, सामाजिक जीवन) भी मनोबल को प्रभावित करते हैं। एक महत्वपूर्ण नियम यह है कि जब मिलने वाला पुरस्कार अपेक्षा से अधिक होता है तो मनोबल बढ़ता है, और जब वास्तविकता अपेक्षा से कम होती है तो मनोबल गिरता है। इसीलिए पहले से तय वेतन-वृद्धि से मनोबल पर बहुत कम असर होता है, जबकि अचानक मिली सराहना बहुत असर डालती है।
14.2 उच्च और निम्न मनोबल के संकेतक (Indicators)
- कम अनुपस्थिति (Absenteeism) और कर्मचारी-टर्नओवर (नौकरी छोड़ने की दर)।
- स्वेच्छा से अतिरिक्त ज़िम्मेदारी लेने की प्रवृत्ति।
- शिकायतों और विवादों की संख्या कम।
- टीम-भावना और सहयोग।
- अनुशासन, समय-पालन और काम की गुणवत्ता पर गर्व।
- अधिक अनुपस्थिति, देरी से आना।
- बार-बार शिकायतें और असंतोष।
- कार्य की गुणवत्ता में गिरावट; ग़लतियाँ, बर्बादी और दुर्घटनाएँ बढ़ना।
- नकारात्मक ग्रेपवाइन और अफ़वाहें बढ़ना।
- अनुशासनहीनता, "धीमे काम करो" आंदोलन, हड़ताल, स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति।
14.3 मनोबल का मापन (Measurement of Morale)
मनोबल दिखाई नहीं देता, इसलिए इसे सीधे नहीं, बल्कि कुछ तरीक़ों से अप्रत्यक्ष रूप से मापा जाता है:
- 1. अवलोकन (Observation): पर्यवेक्षक कर्मचारियों के व्यवहार, बोलचाल और हाव-भाव को देखकर मनोबल में बदलाव पहचानते हैं।
- 2. दृष्टिकोण सर्वेक्षण (Attitude Survey): प्रश्नावली या साक्षात्कार द्वारा कर्मचारियों से उनकी संतुष्टि और शिकायतें पूछी जाती हैं। नाम गुप्त रखने पर उत्तर अधिक सच्चे आते हैं।
- 3. साक्षात्कार: निर्देशित और अनिर्देशित साक्षात्कार, तथा नौकरी छोड़ने वाले कर्मचारी से "निकास साक्षात्कार (Exit Interview)" — जिससे पता चलता है कि लोग क्यों जा रहे हैं।
- 4. सुझाव-पेटी / सुझाव-प्रणाली: कर्मचारियों के सुझावों की संख्या और प्रकृति से उनकी भागीदारी और मनोबल का अनुमान।
- 5. संगठन के अभिलेख और रिपोर्ट: अनुपस्थिति, टर्नओवर, शिकायतें, अनुशासनात्मक मामले, हड़तालें — इनके आँकड़े मनोबल का सबसे ठोस संकेत देते हैं।
14.4 मनोबल बढ़ाने के उपाय
- उचित वेतन, भत्ते और समय पर पदोन्नति; पदोन्नति न होने पर वित्तीय उन्नयन की व्यवस्था।
- अच्छे काम की समय पर और सार्वजनिक मान्यता — सम्मान-पत्र, पुरस्कार, सराहना।
- भागीदारी वाला (लोकतांत्रिक) नेतृत्व और खुला दो-तरफ़ा संचार; कर्मचारियों की बात सुनना।
- निष्पक्ष स्थानांतरण नीति और पद पर न्यूनतम कार्यकाल की स्थिरता।
- प्रभावी शिकायत-निवारण तंत्र; कर्मचारी संगठनों से नियमित संवाद।
- अच्छी कार्य-दशाएँ, कल्याणकारी सुविधाएँ (आवास, स्वास्थ्य), लचीले कार्य-घंटे जहाँ संभव हो।
- प्रशिक्षण और कैरियर-विकास के अवसर; काम को अधिक ज़िम्मेदारी वाला और सार्थक बनाना।
- मनोबल गिरने पर प्रबंधन द्वारा तुरंत सुधारात्मक क़दम, ताकि वह पुराने स्तर पर लौट सके।
15मनोबल और उत्पादकता का संबंध
सामान्य धारणा है कि ऊँचे मनोबल से उत्पादकता बढ़ती है। अधिकांश स्थितियों में यह संबंध सकारात्मक होता भी है, पर यह संबंध हमेशा सीधा नहीं होता। मनोबल और उत्पादकता के चार संभावित संयोजन हैं:
| संयोजन | क्या होता है | उदाहरण |
|---|---|---|
| उच्च मनोबल + उच्च उत्पादकता | व्यक्ति और संगठन दोनों के लक्ष्य पूरे होते हैं; यह आदर्श स्थिति है। | टीम प्रसन्न है और लक्ष्य से पहले काम पूरा करती है। |
| उच्च मनोबल + निम्न उत्पादकता | कर्मचारी संतुष्ट हैं, पर उनमें कौशल, प्रशिक्षण या अच्छे पर्यवेक्षण की कमी है; या समूह ने स्वयं उत्पादन सीमित कर रखा है। | मिलनसार दफ़्तर, पर नई कंप्यूटर प्रणाली न आने से फ़ाइलें अटकी हैं। |
| निम्न मनोबल + उच्च उत्पादकता | पर्यवेक्षक कौशल, योजना या दंड के दबाव से उत्पादन निकलवाता है; यह थोड़े समय ही चलता है। | सख़्त अधिकारी डर से लक्ष्य पूरा करा लेता है, पर कर्मचारी तबादला माँगने लगते हैं। |
| निम्न मनोबल + निम्न उत्पादकता | न व्यक्ति के लक्ष्य पूरे होते हैं, न संगठन के। | उपेक्षित दफ़्तर जहाँ न काम होता है, न कोई ख़ुश है। |
इस विषय पर शोधकर्ताओं के मत अलग-अलग रहे हैं। हॉथोर्न अध्ययन के "बैंक वायरिंग रूम" प्रयोग में देखा गया कि बहुत एकजुट (ऊँचे मनोबल वाले) समूह ने जान-बूझकर उत्पादन सीमित रखा। ब्रेफ़ील्ड और क्रॉकेट (Brayfield & Crockett, 1955) को संतुष्टि और कार्य-प्रदर्शन के बीच कोई ख़ास संबंध नहीं मिला। पोर्टर और लॉलर (Porter & Lawler, 1968) ने कहा कि अच्छा प्रदर्शन संतुष्टि लाता है, न कि केवल संतुष्टि अच्छा प्रदर्शन। रेंसिस लिकर्ट ने "समय-अंतराल (Time Lag)" की बात कही — दबाव से उत्पादन कुछ समय के लिए बढ़ सकता है, पर इससे वे स्थितियाँ धीरे-धीरे नष्ट होती हैं जो लंबे समय तक उत्पादन बनाए रखती हैं।
📌 निष्कर्ष: ऊँचा मनोबल ऊँची उत्पादकता की न तो अनिवार्य शर्त है और न ही अपने-आप में पर्याप्त कारण; पर बिना मनोबल के लंबे समय तक ऊँची उत्पादकता बनाए रखना संभव नहीं है। इसलिए प्रशासन को मनोबल के साथ-साथ कौशल, प्रशिक्षण, संसाधन और अच्छा पर्यवेक्षण भी देना होता है।
16अभिप्रेरणा के सिद्धांत — मनोबल से संबंध
16.1 अभिप्रेरणा का अर्थ और परिभाषाएँ
"अभिप्रेरणा" शब्द अंग्रेज़ी के "मोटिवेशन (Motivation)" का हिंदी रूप है, जो लैटिन भाषा के शब्द "मूवेयर (Movere)" से बना है, जिसका अर्थ है "गतिशील होना" या "आगे बढ़ना"। अभिप्रेरणा मूलतः एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है जो व्यक्ति को कार्यशील बनाती है। कोई व्यक्ति कितना भी योग्य और अनुभवी क्यों न हो, यदि उसमें अभिप्रेरणा नहीं है तो वह अपनी क्षमता का प्रभावी प्रयोग नहीं कर पाता। इसीलिए रेंसिस लिकर्ट ने अभिप्रेरणा को "प्रबंध का हृदय (Core of Management)" कहा।
| विद्वान | परिभाषा (हिंदी में) |
|---|---|
| फ़्रेड लुथांस (Fred Luthans) | अभिप्रेरणा एक प्रक्रिया है जो किसी शारीरिक या मानसिक कमी या आवश्यकता से शुरू होती है और किसी लक्ष्य को पाने के लिए व्यवहार को क्रियाशील करती है। |
| माइकल जे. जूसियस (Michael J. Jucius) | अभिप्रेरणा स्वयं को या किसी अन्य को निश्चित कार्य करने के लिए प्रेरित करने की क्रिया है। |
| कूंट्ज़ और ओ'डोनेल | अभिप्रेरणा उन सभी प्रेरणाओं, इच्छाओं, आवश्यकताओं और शक्तियों का सामान्य नाम है जो व्यक्ति या समूह को काम करने के लिए प्रेरित करती हैं। |
| गिलफ़ोर्ड (Guilford) | अभिप्रेरणा कोई विशेष आंतरिक कारक या दशा है जो क्रिया को आरंभ करने और बनाए रखने की ओर प्रवृत्त होती है। |
| मैक्फ़रलैंड (McFarland) | अभिप्रेरणा का विचार मुख्यतः मनोवैज्ञानिक है; यह उन कार्यकारी शक्तियों से संबंधित है जो कर्मचारी को निर्धारित दिशा में कार्य करने या न करने के लिए प्रेरित करती हैं। |
16.2 अभिप्रेरणा की विशेषताएँ, उद्देश्य और प्रकार
विशेषताएँ: (1) अभिप्रेरणा एक अनंत, निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है; (2) यह व्यक्ति के भीतर से आती है — इच्छाएँ और मूल आवश्यकताएँ सबसे शक्तिशाली प्रेरक हैं; (3) पूरा व्यक्ति अभिप्रेरित होता है, उसका केवल एक भाग नहीं; (4) यह एक मनोवैज्ञानिक धारणा है; (5) यह वित्तीय और ग़ैर-वित्तीय दोनों हो सकती है; (6) यह संतुष्टि का कारण नहीं, बल्कि उसका परिणाम है; (7) यह कार्यक्षमता बढ़ाती है, जिससे गुणवत्ता सुधरती है और लागत घटती है; (8) यह मनोबल से भिन्न है; (9) यह क्षमता और इच्छा के बीच पुल का काम करती है।
उद्देश्य: कर्मचारियों का मनोबल ऊँचा उठाना और उनमें आत्मविश्वास व निष्ठा पैदा करना; उन्हें स्वेच्छा से, कुशलता से और मितव्ययिता से काम के लिए प्रोत्साहित करना; उनकी आर्थिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और शारीरिक आवश्यकताएँ पूरी करना; स्वैच्छिक सहयोग पाना; स्वस्थ मानवीय संबंध बनाना; कार्यकुशलता बढ़ाना; बाहरी नियंत्रण की जगह आत्म-नियंत्रण को बढ़ावा देना; आपसी सहयोग बढ़ाना; मानवीय संसाधनों का अधिकतम उपयोग करना और संगठन के लक्ष्य पाना।
| प्रकार | अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
| धनात्मक (Positive) | संभावित लाभ या पुरस्कार का प्रलोभन देकर प्रेरित करना। | नक़द पुरस्कार, प्रशंसा, मान-सम्मान, निर्णयों में भागीदारी, समस्याएँ सुनना। |
| ऋणात्मक (Negative) | भय, दबाव या दंड से प्रेरित करना; इसे अंतिम विकल्प के रूप में ही प्रयोग करना चाहिए, क्योंकि लंबे समय में यह असंतोष और विवाद पैदा करता है। | वेतन-कटौती, पदावनति, निलंबन, डाँटना, कठोर पर्यवेक्षण, पदोन्नति रोकना। |
| मौद्रिक (Monetary) | मुद्रा के रूप में प्रेरणा, जिससे मूल आर्थिक आवश्यकताएँ पूरी हों। | वेतन, बोनस, नक़द इनाम, लाभांश, प्रीमियम। |
| अमौद्रिक (Non-monetary) | मनोवैज्ञानिक और सामाजिक आवश्यकताओं की संतुष्टि। | सम्मान, मान्यता, नौकरी की सुरक्षा, पदोन्नति के अवसर, प्रबंधन में सहभागिता। |
| व्यक्तिगत (Individual) | किसी एक कर्मचारी को अलग से प्रेरित करना। | प्रशंसा-पत्र, प्रमाण-पत्र, विकास के अवसर। |
| सामूहिक (Group) | पूरे समूह को प्रेरित करना; इससे आपसी मतभेद घटते हैं और समूह-भावना बढ़ती है। | पूरे विभाग को पुरस्कार, समूह से सुझाव, लाभ-सहभागिता, समितियाँ। |
अभिप्रेरणा की विधियाँ: संगठन के उद्देश्य स्पष्ट रूप से बताना और यह समझाना कि कर्मचारियों का हित संस्था के हित से अलग नहीं; कुशल नेतृत्व जो समस्याएँ सुने, मार्गदर्शन दे और प्रोत्साहित करे; निर्णयों में सहयोग और भागीदारी; स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और चुनौतीपूर्ण लक्ष्य, जिनकी प्राप्ति पर तुरंत पुरस्कार मिले; और आदर्श आचरण, कार्य की मान्यता, नौकरी की सुरक्षा, कल्याणकारी सुविधाएँ, प्रशिक्षण तथा अच्छी कार्य-दशाएँ।
16.3 परंपरागत सिद्धांत
अभिप्रेरणा के सिद्धांतों को दो वर्गों में रखा जाता है — परंपरागत और आधुनिक। परंपरागत सिद्धांत हैं: (1) भय और दंड का सिद्धांत — काम न करने पर दंड का डर; (2) पुरस्कार का सिद्धांत — काम करने पर पुरस्कार; (3) गाजर और छड़ी (Carrot and Stick) का सिद्धांत — पुरस्कार और दंड दोनों का मिश्रण। इसे "आर्थिक" या "एकल-कारक (Monistic)" सिद्धांत भी कहते हैं, क्योंकि यह मानता है कि मनुष्य केवल अधिक पैसा कमाने वाला "आर्थिक मनुष्य" है। एफ़. डब्ल्यू. टेलर इसके पहले बड़े समर्थक थे। मानव संबंध और व्यवहारवादी विचारकों ने इसकी आलोचना की कि यह सामाजिक-मनोवैज्ञानिक कारकों की उपेक्षा करता है। चेस्टर बर्नार्ड ने कहा कि जीवन-निर्वाह के स्तर के बाद भौतिक पुरस्कार अधिकांश लोगों पर बहुत कम असर करते हैं।
आधुनिक सिद्धांतों को फिर दो भागों में बाँटा जाता है — विषय-वस्तु सिद्धांत (Content Theories), जो बताते हैं कि "क्या" चीज़ प्रेरित करती है (मैस्लो, मैक्ग्रेगर, हर्ज़बर्ग, एल्डरफ़र), और प्रक्रिया सिद्धांत (Process Theories), जो बताते हैं कि अभिप्रेरणा "कैसे" होती है (विक्टर व्रूम, पोर्टर-लॉलर, स्टेसी एडम्स, हेरोल्ड केली)।
16.4 मैस्लो का आवश्यकता-पदानुक्रम सिद्धांत (1943)
प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक अब्राहम मैस्लो (Abraham Maslow) ने 1943 में "साइकोलॉजिकल रिव्यू" पत्रिका में "A Theory of Human Motivation" लेख लिखा; उनकी पुस्तक "Motivation and Personality" 1954 में आई। उनके अनुसार मनुष्य की आवश्यकताएँ ही उसे प्रेरित करती हैं, और ये पाँच स्तरों में एक क्रम (पदानुक्रम) में होती हैं। जैसे ही एक आवश्यकता पूरी होती है, वह प्रेरित करना बंद कर देती है और अगली ऊँची आवश्यकता जाग जाती है। मैस्लो के सिद्धांत को मानवीय अभिप्रेरणा का पहला व्यवस्थित मॉडल माना जाता है।

- 1. शारीरिक आवश्यकताएँ — भोजन, पानी, वस्त्र, आवास, नींद, स्वास्थ्य। ये पूरी न हों तो व्यक्ति के लिए जीवन चलाना ही कठिन होता है।
- 2. सुरक्षा आवश्यकताएँ — रोज़गार की सुरक्षा, स्थायित्व, ख़तरे से बचाव। अस्थायी कर्मचारी अपनी नौकरी स्थायी बनाने का प्रयास इसी आवश्यकता के कारण करता है।
- 3. सामाजिक आवश्यकताएँ — अपनापन, मित्रता, स्नेह, समूह में स्वीकृति।
- 4. सम्मान आवश्यकताएँ — प्रतिष्ठा, मान्यता, आत्म-सम्मान, उपलब्धि। सम्मान न मिलने पर व्यक्ति स्वयं को कमज़ोर और असहाय समझने लगता है।
- 5. आत्म-सिद्धि (Self-actualisation) — जो व्यक्ति बन सकता है, वह बनना; अपनी पूरी क्षमता को साकार करना। मैस्लो के शब्दों में, "संगीतकार को संगीत रचना चाहिए, चित्रकार को चित्र बनाना चाहिए, कवि को लिखना चाहिए — यदि वह अंततः प्रसन्न रहना चाहता है।" "आत्म-सिद्धि" शब्द सबसे पहले कर्ट गोल्डस्टीन (Kurt Goldstein) ने दिया था।
मैस्लो ने शारीरिक, सुरक्षा (और कई व्याख्याओं में सामाजिक) आवश्यकताओं को निम्न-स्तरीय और सम्मान तथा आत्म-सिद्धि को उच्च-स्तरीय आवश्यकताएँ माना। निम्न-स्तरीय आवश्यकताएँ बाहर से (वेतन आदि से) पूरी होती हैं, जबकि उच्च-स्तरीय आवश्यकताएँ भीतर से संतुष्ट होती हैं। मैस्लो ने स्वयं माना कि यह क्रम कठोर नहीं है; आवश्यकताएँ एक-दूसरे पर निर्भर और एक-दूसरे में मिली हुई हैं, और मनुष्य का व्यवहार एक साथ कई कारणों से प्रेरित होता है।
मैस्लो के सिद्धांत की आलोचना
- लॉलर, सटल और पोर्टर के शोधों में आवश्यकताएँ मैस्लो के बताए क्रम में नहीं मिलीं; हॉल और नौगेम भी इससे सहमत रहे।
- कोफ़र और एप्ली ने "आत्म-सिद्धि" की अवधारणा को अस्पष्ट और ढीली बताया।
- वाहबा और ब्रिडवेल के अनुसार आवश्यकताओं के पाँच नहीं, दो ही मुख्य समूह हैं — कमी की आवश्यकताएँ और विकास की आवश्यकताएँ।
- माइकल नैश के अनुसार यह सिद्धांत रोचक है, पर वैध नहीं; इसे प्रबंधकों के लिए व्यावहारिक मार्गदर्शन में नहीं बदला जा सकता। बास और बैरेट ने कहा कि यह "सत्य से अधिक लोकप्रिय और रोचक" है।
- आवश्यकताओं का महत्व देश, काल, संस्कृति और परिस्थिति के अनुसार बदलता है; यह भी ज़रूरी नहीं कि निचली आवश्यकता पूरी होने पर ही ऊँची आवश्यकता प्रेरित करे। फिर भी, इन आलोचनाओं के बावजूद मैस्लो ने अभिप्रेरणा के अध्ययन को नई दिशा दी।
16.5 मैक्ग्रेगर का एक्स और वाई सिद्धांत (1960)
प्रसिद्ध व्यवहारवादी डगलस मैक्ग्रेगर (Douglas McGregor) ने 1960 में अपनी पुस्तक "The Human Side of Enterprise" में बताया कि प्रबंधक मानव-स्वभाव के बारे में जो मान्यताएँ रखता है, उसी के अनुसार वह कर्मचारियों से व्यवहार करता है। उन्होंने दो विरोधी मान्यताएँ बताईं — निराशावादी "सिद्धांत एक्स" और आशावादी "सिद्धांत वाई"।
- सामान्य व्यक्ति स्वभाव से काम से बचना चाहता है और उसमें काम के प्रति अरुचि होती है।
- अधिकांश व्यक्ति महत्वाकांक्षी नहीं होते; ज़िम्मेदारी से बचते हैं और निर्देशित होना पसंद करते हैं।
- व्यक्ति स्वार्थ-केंद्रित और संगठन के लक्ष्यों के प्रति उदासीन होता है; परिवर्तन का विरोधी होता है।
- उनमें समस्याएँ सुलझाने की रचनात्मक क्षमता कम होती है।
- इसलिए उनसे काम लेने के लिए दबाव, भय, कड़ा पर्यवेक्षण, केंद्रीकरण और वित्तीय प्रलोभन आवश्यक हैं।
- काम करना उतना ही स्वाभाविक है जितना खेलना और आराम करना; व्यक्ति स्वेच्छा से काम करना चाहता है।
- औसत व्यक्ति महत्वाकांक्षी होता है और उचित परिस्थिति में ज़िम्मेदारी लेना सीख लेता है।
- व्यक्ति स्वयं-निर्देशित और स्वयं-नियंत्रित होता है; बाहरी नियंत्रण और भय ही एकमात्र साधन नहीं।
- ज़िम्मेदारी से बचना स्वभाव नहीं, प्रेरणा की कमी का परिणाम है; रचनात्मक क्षमता सभी में होती है।
- वित्तीय के साथ-साथ ग़ैर-वित्तीय प्रलोभन (प्रशंसा, मान्यता) भी प्रेरित करते हैं; यह सिद्धांत सहभागिता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित है।
मैक्ग्रेगर के अनुसार "एक प्रभावी संगठन वह है जहाँ नियंत्रण और निर्देशन की जगह निष्ठा और सहयोग स्थापित हो गया है और हर निर्णय में उससे प्रभावित होने वाले लोग शामिल किए जाते हैं।" आलोचना: यह सिद्धांत मान्यताओं पर आधारित है, अनुभवजन्य शोध पर नहीं; मनुष्य का व्यवहार जटिल है और परिस्थिति के अनुसार बदलता है — एक ही व्यक्ति एक स्थिति में आलसी और दूसरी में सक्रिय हो सकता है। फिर भी आधुनिक प्रशासन धीरे-धीरे सिद्धांत वाई की ओर बढ़ रहा है।
16.6 हर्ज़बर्ग का द्वि-कारक सिद्धांत (1959)
विचारक/प्रवर्तक: फ़्रेडरिक हर्ज़बर्ग (Frederick Herzberg) | वर्ष: 1959 ("The Motivation to Work", मॉसनर और स्नाइडरमैन के साथ)
- हर्ज़बर्ग ने पाया कि जो कारक असंतोष (Dissatisfaction) पैदा करते हैं, वे संतोष (Satisfaction) के विपरीत नहीं होते — बल्कि ये दो पूर्णतः अलग-अलग आयाम (Dimensions) हैं।
- स्वास्थ्यकर कारक (Hygiene Factors): वेतन, संगठन की नीतियाँ, कार्य-दशाएँ, नौकरी की सुरक्षा, पर्यवेक्षण — इनकी अनुपस्थिति असंतोष पैदा करती है, पर इनकी उपस्थिति मात्र से मनोबल या प्रेरणा नहीं बढ़ती (ये केवल असंतोष रोकते हैं)।
- प्रेरक कारक (Motivators): उपलब्धि (Achievement), मान्यता (Recognition), कार्य की प्रकृति (Nature of Work), ज़िम्मेदारी, उन्नति के अवसर — ये वास्तविक मनोबल और दीर्घकालिक संतुष्टि बढ़ाते हैं।
- लोक प्रशासन में प्रासंगिकता: केवल वेतन बढ़ा देने (स्वास्थ्यकर कारक) से सरकारी कर्मचारियों का मनोबल स्थायी रूप से नहीं बढ़ेगा — मान्यता, ज़िम्मेदारी और सार्थक कार्य (प्रेरक कारक) देना उतना ही ज़रूरी है।
सोचिए किसी कर्मचारी की तनख़्वाह समय पर मिलती रहे — इससे वह नाराज़ नहीं होगा, पर इससे उसका जोश नहीं बढ़ेगा (यह स्वास्थ्यकर कारक है, बस असंतोष रोकता है)। लेकिन अगर उसका बॉस सबके सामने उसके अच्छे काम की तारीफ़ करे और उसे एक नई ज़िम्मेदारी सौंपे — तभी उसका असली उत्साह और मनोबल बढ़ेगा (यह प्रेरक कारक है)। यही हर्ज़बर्ग का मूल संदेश है — तनख़्वाह से नाराज़गी रुकती है, तारीफ़ और मान्यता से जोश बढ़ता है।

हर्ज़बर्ग ने पिट्सबर्ग क्षेत्र के लगभग 200 इंजीनियरों और लेखाकारों से "महत्वपूर्ण घटना विधि (Critical Incident Method)" से पूछा कि किन घटनाओं से उन्हें काम में बहुत संतोष या बहुत असंतोष हुआ। उन्होंने पाया कि दोनों तरह की घटनाओं के कारक बिल्कुल अलग थे। उन्होंने "हाइजीन" शब्द चिकित्सा से लिया — जैसे स्वच्छता बीमारी को रोकती है पर इलाज नहीं करती, वैसे ही ये कारक असंतोष रोकते हैं पर संतोष पैदा नहीं करते। उनके सिद्धांत का सार है: संतोष का उल्टा असंतोष नहीं, बल्कि "संतोष का न होना" है; और असंतोष का उल्टा संतोष नहीं, बल्कि "असंतोष का न होना" है।
| स्वास्थ्यकर कारक (Hygiene) — काम का वातावरण | प्रेरक कारक (Motivators) — काम स्वयं |
|---|---|
| कंपनी की नीति और प्रशासन | उपलब्धि |
| पर्यवेक्षण (तकनीकी) | मान्यता |
| वेतन | काम स्वयं (रोचक, सार्थक) |
| पर्यवेक्षक, साथियों और अधीनस्थों से संबंध | ज़िम्मेदारी |
| कार्य-दशाएँ | उन्नति |
| निजी जीवन, पद-प्रतिष्ठा, नौकरी की सुरक्षा | विकास |
हर्ज़बर्ग ने मनुष्य की दो प्रवृत्तियाँ बताईं — "पशु-आदम" प्रवृत्ति, जो वातावरण के कष्ट से बचना चाहती है, और "मानव-अब्राहम" प्रवृत्ति, जो काम के माध्यम से विकास चाहती है। उन्होंने कर्मचारियों को "स्वास्थ्य-खोजी (Hygiene Seekers)" और "प्रेरणा-खोजी (Motivation Seekers)" में बाँटा। मैस्लो का सिद्धांत वर्णनात्मक है, जबकि हर्ज़बर्ग का सिद्धांत समाधान सुझाने वाला (निर्देशात्मक) है — उन्होंने "कार्य-संवर्धन (Job Enrichment)" का सुझाव दिया।
शास्त्रीय अर्थ: कार्य-विस्तार में काम को क्षैतिज रूप से बढ़ाया जाता है — उसी स्तर के अधिक काम जोड़ दिए जाते हैं; कार्य-संवर्धन में काम को ऊर्ध्वाधर रूप से गहरा किया जाता है — योजना बनाने, निर्णय लेने, नियंत्रण और मूल्यांकन की अधिक स्वायत्तता और ज़िम्मेदारी दी जाती है।
सरल भाषा में: कार्य-विस्तार = "काम ज़्यादा"; कार्य-संवर्धन = "अधिकार और ज़िम्मेदारी ज़्यादा"। उदाहरण: एक लिपिक को दो की जगह चार रजिस्टर सौंपना कार्य-विस्तार है; उसी लिपिक को छोटे मामलों में स्वयं निर्णय लेने और अपने अनुभाग की मासिक रिपोर्ट बनाकर सीधे प्रस्तुत करने का अधिकार देना कार्य-संवर्धन है — और हर्ज़बर्ग के अनुसार यही वास्तविक प्रेरणा देता है।
हर्ज़बर्ग की आलोचना: हाउस और विगडोर ने कहा कि यह सिद्धांत अपनी शोध-विधि (महत्वपूर्ण घटना विधि) से बँधा है; मूल्यांकन करने वालों का पूर्वाग्रह नियंत्रित नहीं था; इसमें समग्र संतुष्टि नहीं मापी गई; परिस्थिति की उपेक्षा हुई; और इसने केवल संतुष्टि देखी, उत्पादकता नहीं। माइकल नैश ने मैस्लो और हर्ज़बर्ग दोनों के सिद्धांतों को "बड़े ग़लत सिद्धांत" कहा। यह भी कहा गया कि यह सिद्धांत मुख्यतः सफ़ेदपोश और पेशेवर कर्मचारियों पर लागू होता है।
| आधार | मैस्लो | हर्ज़बर्ग |
|---|---|---|
| मूल विचार | कोई भी अपूर्ण आवश्यकता, निम्न या उच्च, प्रेरित करती है। | केवल उच्च आवश्यकताएँ (प्रेरक) प्रेरित करती हैं; निम्न (स्वास्थ्यकर) केवल असंतोष रोकती हैं। |
| प्रयोग का क्षेत्र | सार्वभौमिक — सभी लोगों पर। | सीमित — मुख्यतः सफ़ेदपोश और पेशेवर कर्मचारियों पर। |
| प्रकृति | वर्णनात्मक; समाधान नहीं सुझाता। | निर्देशात्मक; कार्य-संवर्धन सुझाता है। |
| दायरा | सामान्य जीवन की अभिप्रेरणा। | केवल कार्य से जुड़ी अभिप्रेरणा। |
| पैसे की भूमिका | वित्तीय पुरस्कार प्रेरित कर सकता है। | वित्तीय पुरस्कार प्रेरित नहीं करता, केवल असंतोष रोकता है। |
| संबंध | निम्न-स्तरीय आवश्यकताएँ ≈ हर्ज़बर्ग के स्वास्थ्यकर कारक | प्रेरक कारक ≈ मैस्लो की उच्च-स्तरीय आवश्यकताएँ |
16.7 मनोबल से जुड़े सिद्धांत — एक दृष्टि में
| सिद्धांतकार | सिद्धांत | मनोबल से संबंध |
|---|---|---|
| एल्टन मेयो (Elton Mayo) — देखें अध्याय 02 | हॉथोर्न अध्ययन (Hawthorne Studies) | ध्यान (Attention) और सामाजिक मान्यता मिलने मात्र से उत्पादकता और मनोबल बढ़ता है ("हॉथोर्न प्रभाव")। |
| अब्राहम मैस्लो (Maslow) — देखें अध्याय 02 | आवश्यकता पदानुक्रम सिद्धांत (Need Hierarchy) | जब बुनियादी आवश्यकताएँ (सुरक्षा, वेतन) पूरी हो जाती हैं, तभी उच्चतर आवश्यकताएँ (सम्मान, आत्म-सिद्धि) मनोबल को प्रेरित करती हैं। |
| फ़्रेडरिक हर्ज़बर्ग (Frederick Herzberg) | द्वि-कारक सिद्धांत (Two-Factor Theory), 1959 | स्वास्थ्यकर कारक (वेतन, नीति, कार्य-दशाएँ) असंतोष रोकते हैं, पर मनोबल नहीं बढ़ाते; प्रेरक कारक (मान्यता, उपलब्धि, ज़िम्मेदारी) ही वास्तविक मनोबल और संतुष्टि बढ़ाते हैं। |
| डगलस मैक्ग्रेगर (McGregor) — देखें अध्याय 02 | सिद्धांत एक्स और सिद्धांत वाई | सिद्धांत एक्स मानने वाला प्रबंधक कठोर नियंत्रण से मनोबल गिराता है; सिद्धांत वाई मानने वाला प्रबंधक भागीदारी और भरोसे से मनोबल बढ़ाता है। |
| क्रिस आर्गिरिस (Chris Argyris) | मनोवैज्ञानिक अनुबंध (Psychological Contract) | कर्मचारी और संगठन की अलिखित पारस्परिक अपेक्षाएँ; इनके टूटने से मनोबल लिखित नियम टूटने से भी अधिक गिरता है। |
"शरीर सुरक्षित, समाज में सम्मान, फिर आत्म-सिद्धि" — शारीरिक → सुरक्षा → सामाजिक → सम्मान → आत्म-सिद्धि। और हर्ज़बर्ग के लिए: "तनख़्वाह से नाराज़गी रुकती है, तारीफ़ से जोश बढ़ता है।"
17सरकारी कर्मचारियों का मनोबल — भारत में वर्तमान स्थिति
भारत में सरकारी कर्मचारियों का मनोबल कई कारकों से प्रभावित होता है — वेतन और भत्ते, पदोन्नति की गति, बार-बार और मनमाने स्थानांतरण, राजनीतिक दबाव, काम का बोझ (रिक्त पदों के कारण), तथा प्रशिक्षण और मान्यता के अवसर। सरकार ने इन्हें सुधारने के लिए कई संस्थागत क़दम उठाए हैं, जिन्हें हर्ज़बर्ग के दोनों प्रकार के कारकों से जोड़कर समझा जा सकता है।
केंद्र सरकार ने जनवरी 2025 में 8वें केंद्रीय वेतन आयोग के गठन को सैद्धांतिक मंज़ूरी दी, 28 अक्टूबर 2025 को उसकी विचारार्थ विषय (Terms of Reference) स्वीकृत किए, और 3 नवंबर 2025 को राजपत्र अधिसूचना द्वारा आयोग का गठन किया। इसकी अध्यक्ष सर्वोच्च न्यायालय की सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई हैं। आयोग को गठन से 18 माह में रिपोर्ट देनी है।
आयोग वर्ष 2026 में कर्मचारी संगठनों और पेंशनभोगियों से ज्ञापन लेकर देशभर में परामर्श कर रहा है। इससे लगभग 50 लाख केंद्रीय कर्मचारी और लगभग 65 लाख से अधिक पेंशनभोगी प्रभावित होंगे। साथ ही 1 जनवरी 2026 से महंगाई भत्ता (DA) 58% से बढ़ाकर 60% किया गया है।
यह वेतन और भत्तों (स्वास्थ्यकर कारक) के माध्यम से कर्मचारियों का असंतोष कम करने का प्रयास है, परंतु हर्ज़बर्ग के अनुसार वास्तविक मनोबल हेतु मान्यता, प्रशिक्षण और ज़िम्मेदारी (जैसे मिशन कर्मयोगी के अंतर्गत) भी उतने ही आवश्यक हैं।
| पहल / व्यवस्था | क्या है | मनोबल से संबंध |
|---|---|---|
| मिशन कर्मयोगी (2020) और आईगॉट कर्मयोगी (iGOT) मंच | सितंबर 2020 में स्वीकृत सिविल सेवा क्षमता-निर्माण कार्यक्रम। 2026 तक 1.7 करोड़ से अधिक उपयोगकर्ता, 23 भारतीय भाषाओं में 5,600 से अधिक पाठ्यक्रम; क्षमता-निर्माण आयोग इसका मार्गदर्शन करता है। | प्रशिक्षण और विकास — हर्ज़बर्ग का "विकास" और मैस्लो का "आत्म-सिद्धि" स्तर। |
| लोक प्रशासन में उत्कृष्टता हेतु प्रधानमंत्री पुरस्कार | हर वर्ष 21 अप्रैल (सिविल सेवा दिवस) पर ज़िलों और संगठनों को नवाचार और प्राथमिकता कार्यक्रमों के उत्कृष्ट क्रियान्वयन के लिए; ट्रॉफ़ी, प्रशस्ति-पत्र और जन-कल्याण हेतु 20 लाख रुपये। | मान्यता — सबसे शक्तिशाली प्रेरक कारक। |
| सिविल सेवा दिवस (21 अप्रैल) | 21 अप्रैल 1947 को सरदार पटेल ने प्रशिक्षु अधिकारियों को संबोधित कर सिविल सेवा को भारत का "स्टील फ़्रेम" कहा था; 2006 से हर वर्ष मनाया जाता है। | पहचान, गर्व और "एस्प्री डी कॉर्प्स"। |
| न्यूनतम कार्यकाल — टी.एस.आर. सुब्रमण्यम मामला (2013) | सर्वोच्च न्यायालय ने अधिकारियों के लिए निश्चित न्यूनतम कार्यकाल, सिविल सेवा बोर्ड और मौखिक नहीं, लिखित निर्देश की व्यवस्था पर बल दिया। | मनमाने तबादले मनोबल के सबसे बड़े शत्रु; स्थिरता से सुरक्षा का भाव। |
| पुलिस सुधार — प्रकाश सिंह मामला (2006) | पुलिस प्रमुखों के न्यूनतम कार्यकाल, पुलिस स्थापना बोर्ड आदि के निर्देश (विस्तार अध्याय 10 में)। | राजनीतिक दबाव से सुरक्षा; पुलिस बल का मनोबल। |
| देव दत्त मामला (2008) | वार्षिक गोपनीय प्रविष्टि (अब APAR) की हर प्रविष्टि कर्मचारी को बताई जाए, ताकि वह सुधार या अभ्यावेदन कर सके। | निष्पक्षता और पारदर्शिता का भाव। |
| संशोधित सुनिश्चित कैरियर उन्नयन (MACP) | लंबे समय तक पदोन्नति न मिलने पर निश्चित वर्षों बाद वित्तीय उन्नयन। | ठहराव से आने वाली निराशा कम; पर पद-प्रतिष्ठा की कमी बनी रहती है। |
| संयुक्त सलाहकार तंत्र (1966) | सरकार और कर्मचारी संगठनों के बीच नियमित संवाद और शिकायत-निवारण का मंच। | बात सुने जाने से ही मनोबल बढ़ता है (मेयो का निष्कर्ष)। |
- अनुबंध और मानदेय कर्मी: आशा कार्यकर्ता, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और संविदा कर्मियों तथा स्थायी कर्मचारियों के बीच वेतन और सुरक्षा का अंतर मनोबल की एक बड़ी समस्या है।
- रिक्त पद: पुलिस, स्वास्थ्य, शिक्षा और न्यायपालिका में बड़ी संख्या में रिक्त पदों के कारण मौजूदा कर्मचारियों पर काम का बोझ बढ़ता है, जिससे थकान और असंतोष बढ़ता है।
- पुलिस कल्याण: लंबे कार्य-घंटे, साप्ताहिक अवकाश का अभाव और अपर्याप्त आवास पुलिस के मनोबल की प्रमुख समस्याएँ हैं।
राज्यों में भी राज्य वेतन आयोग, राज्य-स्तरीय उत्कृष्टता पुरस्कार और स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस पर ज़िला-स्तरीय सम्मान दिए जाते हैं। राजस्थान जैसे राज्यों में ज़िला कलेक्टर द्वारा उत्कृष्ट कर्मचारियों को दिया जाने वाला सम्मान-पत्र छोटा क़दम लगता है, पर हर्ज़बर्ग के अनुसार "मान्यता" होने के कारण यह मनोबल पर बड़ा प्रभाव डालता है।
18समय-रेखा
समय-रेखा — प्रशासनिक व्यवहार के प्रमुख पड़ाव
| वर्ष/अनुच्छेद | विषय |
|---|---|
| 19वीं सदी | थॉमस कार्लाइल — महान पुरुष सिद्धांत। |
| 1938 | चेस्टर बर्नार्ड — "The Functions of the Executive" (देखें अध्याय 02)। |
| 1939 | लेविन, लिपिट और व्हाइट — आयोवा नेतृत्व अध्ययन। |
| 1943 | अब्राहम मैस्लो — आवश्यकता-पदानुक्रम। |
| 1944 | मॉरी मेवरिक — "गॉबलडीगूक" शब्द। |
| 1945 | ओहायो स्टेट नेतृत्व अध्ययन आरंभ। |
| 1947 | हर्बर्ट साइमन — "Administrative Behavior"। |
| 1948 | राल्फ स्टॉगडिल — गुण सिद्धांत की समीक्षा। |
| 1949 | शैनन और वीवर — संचार का गणितीय मॉडल। |
| 1959 | फ़्रेडरिक हर्ज़बर्ग — द्वि-कारक सिद्धांत; फ्रेंच और रेवन — शक्ति के पाँच स्रोत। |
| 1960 | डगलस मैक्ग्रेगर — सिद्धांत एक्स और वाई। |
| 1960 का दशक | फ्रेड फीडलर — आकस्मिकता सिद्धांत, LPC पैमाना; लिकर्ट — चार प्रणालियाँ; ब्लेक-माउटन — प्रबंधकीय ग्रिड (1964)। |
| 1966 | संयुक्त सलाहकार तंत्र (भारत)। |
| 1969-1973 | हर्सी-ब्लैंचर्ड (1969), मार्ग-लक्ष्य (1970-71), व्रूम-येटन (1973)। |
| 1970 | रॉबर्ट ग्रीनलीफ़ — सेवक नेतृत्व। |
| 1978 | जेम्स मैक्ग्रेगर बर्न्स — रूपांतरणकारी बनाम लेन-देनकारी नेतृत्व। |
| 1985 | बर्नार्ड बास — रूपांतरणकारी नेतृत्व का विस्तार। |
| 2005 | सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act)। |
| 2006 | सिविल सेवा दिवस का आरंभ; प्रकाश सिंह निर्णय। |
| 2013 | टी.एस.आर. सुब्रमण्यम निर्णय। |
| 2019 | राजस्थान जन सूचना पोर्टल (13 सितंबर)। |
| 2020 | मिशन कर्मयोगी — सिविल सेवकों हेतु नेतृत्व-दक्षता ढाँचा। |
| 2025-26 (नवीनतम) | 8वाँ केंद्रीय वेतन आयोग गठित (3 नवंबर 2025); महंगाई भत्ता 60% (1 जनवरी 2026); कर्मयोगी पाठ्यक्रम APAR से जुड़े। |
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