जैव-विविधता (Biodiversity, जैविक विविधता का संक्षिप्त रूप) का अर्थ है पृथ्वी पर पाए जाने वाले समस्त जीवों — पौधे, जंतु, सूक्ष्मजीव — की विविधता, तथा उनके बीच व उनके पर्यावरण के बीच पाए जाने वाले जटिल संबंधों की समग्रता। यह शब्द पहली बार 1985 में वाल्टर जी. रोसेन (Walter G. Rosen) द्वारा प्रस्तावित किया गया, तथा 1992 के रियो पृथ्वी सम्मेलन (Rio Earth Summit) में जैविक विविधता कन्वेंशन (Convention on Biological Diversity — CBD) पर हस्ताक्षर के बाद यह वैश्विक नीति का केंद्रीय विषय बन गया।
| स्तर | विवरण एवं उदाहरण |
|---|---|
| आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity) | एक ही प्रजाति के भीतर व्यक्तियों के बीच आनुवंशिक भिन्नता; उदाहरण: धान की हजारों देशी किस्में, मनुष्यों में भिन्न रक्त समूह |
| स्पीशीज़ विविधता (Species Diversity) | किसी क्षेत्र में पाई जाने वाली विभिन्न प्रजातियों की संख्या व विविधता; उदाहरण: भारत में लगभग 1,00,000 पशु प्रजातियां व 50,000 पादप प्रजातियां |
| पारिस्थितिकी तंत्र विविधता (Ecosystem Diversity) | किसी क्षेत्र में पाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के पारिस्थितिकी तंत्रों की विविधता (देखें अध्याय-13); उदाहरण: वन, आर्द्रभूमि, मरुस्थल, पर्वत |
राजस्थान में जैव-विविधता के तीनों स्तर स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं — आनुवंशिक स्तर पर स्थानीय पशु नस्लें (जैसे मारवाड़ी घोड़ा, थारपारकर गाय, मारवाड़ी बकरी) व फसल किस्में (जैसे बाजरे व सौंफ की देशी किस्में — देखें अध्याय-10); स्पीशीज़ स्तर पर बाघ, चिंकारा, गोडावण (राज्य पक्षी) व सैकड़ों अन्य प्रजातियां; तथा पारिस्थितिकी तंत्र स्तर पर थार मरुस्थल, अरावली वन, केवलादेव आर्द्रभूमि जैसे विविध पारिस्थितिकी तंत्र।
◆ जैव-विविधता ◆ रियो पृथ्वी सम्मेलन 1992 ◆ जैविक विविधता कन्वेंशन (CBD) ◆ आनुवंशिक विविधता ◆ स्पीशीज़ विविधता ◆ पारिस्थितिकी तंत्र विविधता
जैव-विविधता को अक्सर पृथ्वी की 'जीवन-सहायता प्रणाली' कहा जाता है — यह न केवल पारिस्थितिकी तंत्र को स्थिर रखती है, बल्कि मानव सभ्यता के अस्तित्व के लिए भी अपरिहार्य है। इसके महत्व को तीन व्यापक श्रेणियों में समझा जा सकता है।
(A) पारिस्थितिक/पर्यावरणीय महत्व
(B) आर्थिक महत्व
(C) नैतिक एवं सांस्कृतिक महत्व
कई नैतिक दार्शनिकों का तर्क है कि प्रत्येक प्रजाति को जीवित रहने का 'आंतरिक अधिकार' (Intrinsic Right) है, चाहे उससे मनुष्य को प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ हो या न हो। भारतीय संस्कृति में भी जैव-विविधता संरक्षण की गहरी परंपरा रही है — पवित्र वन (जैसे राजस्थान के ओरण, देखें अध्याय-13), बिश्नोई समुदाय का वृक्ष व वन्यजीव संरक्षण के प्रति समर्पण (अमृता देवी विश्नोई का 1730 में खेजड़ी वृक्षों की रक्षा हेतु बलिदान — चिपको आंदोलन का ऐतिहासिक प्रेरणास्रोत) इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
◆ पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएं ◆ परागण ◆ औषधीय महत्व ◆ पारिस्थितिकी पर्यटन ◆ आंतरिक अधिकार ◆ अमृता देवी विश्नोई ◆ बिश्नोई समुदाय
भारत विश्व के 17 'मेगा-डाइवर्स' (अत्यंत समृद्ध जैव-विविधता वाले) देशों में से एक है, जो विश्व के मात्र 2.4% भूभाग में विश्व की लगभग 7-8% ज्ञात प्रजातियों को समेटे हुए है। भारत में अब तक लगभग 1,00,000 से अधिक पशु प्रजातियां व 50,000 से अधिक पादप प्रजातियां दर्ज की जा चुकी हैं।
🖼️ पश्चिमी घाट (Western Ghats) — भारत के चार जैव-विविधता हॉटस्पॉट में से एक, अनगिनत स्थानिक (endemic) प्रजातियों का आवास

भारत के चार जैव-विविधता हॉटस्पॉट
जैव-विविधता हॉटस्पॉट (Biodiversity Hotspot) वे क्षेत्र हैं, जहां असाधारण रूप से उच्च प्रजातीय विविधता व स्थानिकता (Endemism) पाई जाती है, परंतु साथ ही वे गंभीर मानवजनित खतरे का भी सामना कर रहे होते हैं — यह अवधारणा 1988 में ब्रिटिश पारिस्थितिकीविद् नॉर्मन मायर्स (Norman Myers) द्वारा प्रस्तावित की गई थी।
◆ मेगा-डाइवर्स देश ◆ जैव-विविधता हॉटस्पॉट ◆ नॉर्मन मायर्स ◆ स्थानिकता (Endemism) ◆ पश्चिमी घाट ◆ हिमालय हॉटस्पॉट ◆ इंडो-बर्मा
राजस्थान, भारत का सबसे बड़ा राज्य, अपनी विविध भौगोलिक संरचना — थार मरुस्थल, अरावली पर्वत श्रृंखला, दक्षिणी आर्द्र वन क्षेत्र (वागड़ व मेवाड़), पूर्वी मैदान — के कारण अत्यंत विविध वनस्पति व जीव-जंतु समूह को आश्रय देता है, जो एक विशिष्ट रूप से शुष्क व अर्ध-शुष्क पारिस्थितिकी तंत्र के अनुकूलित हैं।
खेजड़ी (Prosopis cineraria, राजस्थान का राज्य वृक्ष) मरुस्थलीय क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण वनस्पति है — इसे 'मरुस्थल का कल्पवृक्ष' कहा जाता है, क्योंकि यह पशुओं को चारा, ईंधन की लकड़ी व छाया प्रदान करती है, तथा इसकी गहरी जड़ें भूमि कटाव रोकती हैं। अन्य प्रमुख वनस्पति में रोहिड़ा (Tecomella undulata, राजस्थान का राज्य पुष्प वाला वृक्ष), बबूल, कैर, बेर व सेवण घास शामिल हैं, जो दक्षिणी राजस्थान के सागवान व सालर वनों से भिन्न, मरुस्थलीय व अर्ध-शुष्क परिस्थितियों के विशेष अनुकूलन को दर्शाते हैं।
राजस्थान के प्रमुख जीव-जंतु
| प्रजाति | राज्य में स्थिति |
|---|---|
| बाघ (Tiger) | रणथंभौर, सरिस्का, मुकुंदरा में; राज्य पशु नहीं परंतु प्रमुख आकर्षण |
| चिंकारा (Chinkara) | राजस्थान का राज्य पशु; मरुस्थलीय क्षेत्र में व्यापक रूप से पाया जाने वाला हिरण |
| गोडावण/ग्रेट इंडियन बस्टर्ड | राजस्थान का राज्य पक्षी; अत्यंत संकटग्रस्त (Critically Endangered), मुख्यतः डेजर्ट नेशनल पार्क में |
| ऊंट (Camel) | राज्य पशु घोषित (2014); मरुस्थलीय जीवन व अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग |
| सारस क्रौंच | केवलादेव घना राष्ट्रीय उद्यान में प्रवासी पक्षियों में प्रमुख |
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (गोडावण) विश्व की सबसे भारी उड़ने वाली पक्षियों में से एक है, जिसकी वैश्विक आबादी अब मात्र 150 के आसपास शेष रह गई है, जिसमें से अधिकांश राजस्थान के जैसलमेर क्षेत्र के डेजर्ट नेशनल पार्क में पाई जाती है। ऊंची पारेषण विद्युत लाइनों से टकराना इसकी मृत्यु का एक प्रमुख कारण है — इसीलिए 'गोडावण संरक्षण परियोजना' के अंतर्गत महत्वपूर्ण क्षेत्रों में विद्युत लाइनों को भूमिगत करने व बर्ड डायवर्टर लगाने जैसे उपाय किए जा रहे हैं।
◆ खेजड़ी ◆ रोहिड़ा ◆ चिंकारा ◆ गोडावण (Great Indian Bustard) ◆ ऊंट राज्य पशु ◆ सेवण घास ◆ गोडावण संरक्षण परियोजना
राजस्थान अपने संरक्षित क्षेत्रों के नेटवर्क के माध्यम से जैव-विविधता संरक्षण में अग्रणी भूमिका निभाता है, जिसमें राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य व बाघ अभयारण्य शामिल हैं।
🖼️ बंगाल बाघ (Panthera tigris tigris) — रणथंभौर व सरिस्का जैसे राजस्थान के बाघ अभयारण्यों का प्रमुख आकर्षण

| बाघ अभयारण्य | जिला | विशेषता |
|---|---|---|
| रणथंभौर | सवाई माधोपुर | राज्य का सबसे प्रसिद्ध; लगभग 88 बाघ (2022 गणना अनुसार) |
| सरिस्का | अलवर | 2004-05 में बाघ-विलुप्ति के बाद सफल पुनर्स्थापन; जून 2025 तक 49 बाघ |
| मुकुंदरा हिल्स | कोटा | 2013 में अधिसूचित; चंबल नदी क्षेत्र का हिस्सा |
| रामगढ़ विषधारी | बूंदी | राज्य का नवीनतम बाघ अभयारण्यों में से एक |
| धौलपुर-करौली | धौलपुर व करौली | राज्य का पांचवां व सबसे नया बाघ अभयारण्य |
💡 सरिस्का — विश्व की सबसे उल्लेखनीय बाघ पुनर्स्थापन गाथाओं में से एक: 2004-05 में अवैध शिकार (Poaching) के कारण सरिस्का से बाघ पूर्णतः विलुप्त हो गए — यह भारत के वन्यजीव संरक्षण इतिहास की सबसे बड़ी असफलताओं में गिना गया। परंतु 2008 से राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के नेतृत्व में रणथंभौर से बाघों को स्थानांतरित कर सरिस्का में पुनर्स्थापन कार्यक्रम शुरू किया गया। दो दशक से भी कम समय में सरिस्का में जून 2025 तक 49 बाघ हो चुके हैं — यह सिद्ध करता है कि वैज्ञानिक योजना व राजनीतिक इच्छाशक्ति से जैव-विविधता की गंभीर क्षति को भी उलटा जा सकता है।
राजस्थान के अन्य प्रमुख संरक्षित क्षेत्र
◆ रणथंभौर ◆ सरिस्का बाघ पुनर्स्थापन ◆ मुकुंदरा हिल्स ◆ रामगढ़ विषधारी ◆ धौलपुर-करौली ◆ केवलादेव घना ◆ डेजर्ट नेशनल पार्क ◆ NTCA
वैज्ञानिकों के अनुसार, पृथ्वी वर्तमान में अपने इतिहास के छठे बड़े सामूहिक विलुप्ति दौर (Sixth Mass Extinction) से गुजर रही है — परंतु पहले पांच दौरों (जैसे डायनासोर का विलुप्तिकरण) के विपरीत, यह वर्तमान दौर मुख्यतः मानवजनित (Anthropogenic) कारणों से हो रहा है।
| खतरे का कारण | संक्षिप्त विवरण |
|---|---|
| आवास हानि एवं विखंडन (Habitat Loss) | वनों की कटाई, शहरीकरण, कृषि विस्तार — विलुप्ति का सबसे बड़ा कारण |
| अतिदोहन (Overexploitation) | अवैध शिकार, अत्यधिक मछली पकड़ना, अनियंत्रित वन उत्पाद संग्रहण |
| प्रदूषण | वायु, जल व मृदा प्रदूषण (देखें अध्याय-13) प्रजातियों के आवास को विषाक्त बनाना |
| जलवायु परिवर्तन | बदलता तापमान व वर्षा पैटर्न प्रजातियों के प्राकृतिक आवास को अनुपयुक्त बनाना |
| आक्रामक विदेशी प्रजातियां (Invasive Species) | बाहरी प्रजातियों का प्रवेश, जो स्थानीय प्रजातियों से संसाधनों हेतु प्रतिस्पर्धा करती हैं |
| जलवायु-अनुकूलित प्रजातियों पर दबाव | जैसे राजस्थान में गोडावण — विद्युत लाइनों, आवास हानि व अतिचारण से खतरा |
वैज्ञानिक अनुमानों के अनुसार वर्तमान प्रजाति-विलुप्ति दर, मानव-पूर्व स्वाभाविक (प्राकृतिक) दर से 100 से 1,000 गुना अधिक है। इसे 'होलोसीन विलुप्ति' (Holocene Extinction) या 'एंथ्रोपोसीन विलुप्ति' भी कहा जाता है, क्योंकि इसका मुख्य कारण मानव गतिविधियां हैं, न कि कोई प्राकृतिक भूवैज्ञानिक घटना।
◆ छठा सामूहिक विलुप्ति दौर ◆ आवास हानि ◆ अतिदोहन ◆ आक्रामक विदेशी प्रजातियां ◆ होलोसीन विलुप्ति ◆ एंथ्रोपोसीन
अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (International Union for Conservation of Nature — IUCN) विश्व की सबसे व्यापक व वैज्ञानिक रूप से प्रामाणिक जैव-विविधता संरक्षण स्थिति-सूची तैयार करता है, जिसे 'IUCN रेड लिस्ट' कहा जाता है — यह किसी प्रजाति के विलुप्ति-जोखिम का वैज्ञानिक मूल्यांकन कर उसे विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत करती है।
🖼️ IUCN रेड लिस्ट की श्रेणियां — विलुप्त (EX) से लेकर न्यूनतम चिंता (LC) तक, बीच में संकटग्रस्त (Threatened) श्रेणियां CR, EN, VU

प्रमुख श्रेणियां
IUCN रेड लिस्ट केवल एक वैज्ञानिक दस्तावेज़ नहीं, बल्कि नीति-निर्माण का महत्वपूर्ण आधार है — भारत का वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 (देखें अगले टॉपिक) व राष्ट्रीय संरक्षण प्राथमिकताएं प्रायः IUCN वर्गीकरण के अनुरूप ही निर्धारित की जाती हैं। जब किसी प्रजाति को 'गंभीर संकटग्रस्त' घोषित किया जाता है (जैसे गोडावण), तो यह तत्काल व विशेष संरक्षण हस्तक्षेप की आवश्यकता का वैज्ञानिक संकेत होता है।
◆ IUCN रेड लिस्ट ◆ विलुप्त (EX) ◆ गंभीर संकटग्रस्त (CR) ◆ संकटग्रस्त (EN) ◆ सुभेद्य (VU) ◆ गोडावण CR श्रेणी
स्व-स्थाने संरक्षण (In-situ Conservation) का अर्थ है किसी प्रजाति को उसके प्राकृतिक आवास में ही संरक्षित करना — यानी 'जहां वह प्रजाति स्वाभाविक रूप से रहती है, वहीं उसकी रक्षा करना'। यह संरक्षण की सर्वाधिक प्रभावी विधि मानी जाती है, क्योंकि इसमें प्रजाति अपने संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र — उसके शिकारी, शिकार, सहजीवी संबंध — के साथ संरक्षित रहती है, न कि केवल एक अलग-थलग व्यक्ति के रूप में।
| स्व-स्थाने संरक्षण का प्रकार | विशेषता |
|---|---|
| राष्ट्रीय उद्यान (National Park) | उच्चतम स्तर का संरक्षण; मानव गतिविधि (चराई, वानिकी) पूर्णतः निषिद्ध; उदाहरण: रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान |
| वन्यजीव अभयारण्य (Wildlife Sanctuary) | राष्ट्रीय उद्यान से कम कठोर; कुछ नियंत्रित मानवीय गतिविधियों की अनुमति |
| बायोस्फीयर रिजर्व (Biosphere Reserve) | बड़ा संरक्षित क्षेत्र, जिसमें कोर (पूर्ण संरक्षण), बफर व संक्रमण क्षेत्र होते हैं; मानव-प्रकृति सहअस्तित्व पर बल |
| पवित्र उपवन (Sacred Groves) | सामुदायिक/धार्मिक विश्वास द्वारा संरक्षित वन खंड; उदाहरण: राजस्थान के ओरण (देखें अध्याय-13) |
💡 बायोस्फीयर रिजर्व की त्रि-स्तरीय संरचना: एक बायोस्फीयर रिजर्व में तीन क्षेत्र होते हैं — केंद्रीय कोर क्षेत्र (Core Zone, जहां न्यूनतम मानवीय हस्तक्षेप, पूर्ण संरक्षण), बफर क्षेत्र (Buffer Zone, जहां सीमित, नियंत्रित वैज्ञानिक अनुसंधान व पारंपरिक गतिविधियां अनुमत) एवं संक्रमण क्षेत्र (Transition Zone, जहां स्थानीय समुदायों की सतत आर्थिक गतिविधियां जारी रहती हैं)। भारत में 18 बायोस्फीयर रिजर्व घोषित हैं, जिनमें से कुछ UNESCO के विश्व नेटवर्क में भी शामिल हैं।
◆ स्व-स्थाने संरक्षण ◆ राष्ट्रीय उद्यान ◆ वन्यजीव अभयारण्य ◆ बायोस्फीयर रिजर्व ◆ कोर-बफर-संक्रमण क्षेत्र ◆ पवित्र उपवन
बाह्य-स्थाने संरक्षण (Ex-situ Conservation) का अर्थ है किसी प्रजाति को उसके प्राकृतिक आवास से बाहर, नियंत्रित/कृत्रिम परिस्थितियों में संरक्षित करना — यह विशेषकर तब उपयोग किया जाता है जब किसी प्रजाति की प्राकृतिक आबादी इतनी घट चुकी हो कि केवल स्व-स्थाने संरक्षण पर्याप्त न हो, या जब प्राकृतिक आवास ही सुरक्षित न हो।
| बाह्य-स्थाने संरक्षण का प्रकार | विशेषता एवं उदाहरण |
|---|---|
| चिड़ियाघर (Zoo) | जंतु प्रजातियों का संरक्षण, प्रजनन कार्यक्रम व जन-जागरूकता; उदाहरण: नंदनकानन प्राणी उद्यान (ओडिशा) का सफेद बाघ प्रजनन |
| वनस्पति उद्यान (Botanical Garden) | पादप प्रजातियों का जीवंत संग्रह व संरक्षण |
| बीज बैंक/जीन बैंक (Seed/Gene Bank) | आनुवंशिक पदार्थ का दीर्घकालिक संरक्षण (देखें अध्याय-10); उदाहरण: NBPGR, स्वालबार्ड सीड वॉल्ट |
| ऊतक संवर्धन बैंक (Tissue Culture Bank) | दुर्लभ पादप प्रजातियों के ऊतकों का प्रयोगशाला-आधारित संरक्षण व पुनरुत्पादन |
| क्रायोप्रिजर्वेशन (Cryopreservation) | अत्यंत निम्न तापमान (-196°C तक, तरल नाइट्रोजन में) पर बीज, शुक्राणु व भ्रूण का दीर्घकालिक संरक्षण |
| 🏞️ स्व-स्थाने संरक्षण | 🏛️ बाह्य-स्थाने संरक्षण |
|---|---|
| ◆ प्राकृतिक आवास में ही संरक्षण ◆ संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र सहित सुरक्षा ◆ बड़े क्षेत्र व दीर्घकालिक प्रबंधन आवश्यक | ◆ आवास से बाहर, नियंत्रित परिस्थितियों में ◆ अत्यंत संकटग्रस्त प्रजातियों हेतु अंतिम उपाय ◆ प्रजनन कार्यक्रमों द्वारा आबादी पुनर्स्थापन संभव |
◆ बाह्य-स्थाने संरक्षण ◆ चिड़ियाघर ◆ वनस्पति उद्यान ◆ बीज बैंक ◆ क्रायोप्रिजर्वेशन ◆ ऊतक संवर्धन बैंक
भारत ने अपनी समृद्ध परंतु संकटग्रस्त जैव-विविधता के संरक्षण हेतु कई महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू किए हैं, जिनमें से कुछ को वैश्विक स्तर पर सफलता की मिसाल माना जाता है।
| कार्यक्रम | वर्ष | उपलब्धि |
|---|---|---|
| प्रोजेक्ट टाइगर | 1973 | 9 अभयारण्यों से शुरू होकर आज 56 बाघ अभयारण्य; बाघों की संख्या 1,827 (1973 पूर्व-अनुमान) से बढ़कर 3,682 (2022) |
| प्रोजेक्ट एलिफेंट | 1992 | हाथी आवासों व गलियारों (Corridors) का संरक्षण, मानव-हाथी संघर्ष प्रबंधन |
| राष्ट्रीय आर्द्रभूमि संरक्षण कार्यक्रम | 1985 (संशोधित) | केवलादेव घना जैसी महत्वपूर्ण आर्द्रभूमियों का संरक्षण |
| गोडावण संरक्षण परियोजना | 2013 (गहनता 2020 के बाद) | राजस्थान में गंभीर संकटग्रस्त गोडावण की आबादी बचाने हेतु विशेष प्रजनन केंद्र |
| प्रोजेक्ट चीता | 2022 | अफ्रीकी चीतों का भारत (कूनो राष्ट्रीय उद्यान, मध्य प्रदेश) में पुनःस्थापन — भारत से चीता 1952 में विलुप्त घोषित हुआ था |
💡 प्रोजेक्ट टाइगर — पांच दशकों की उपलब्धि: 1973 में शुरू हुआ प्रोजेक्ट टाइगर विश्व के सबसे सफल वन्यजीव संरक्षण कार्यक्रमों में गिना जाता है। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (National Tiger Conservation Authority — NTCA) के तहत आज देश भर में 56 बाघ अभयारण्य कार्यरत हैं, जो लगभग 82,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को कवर करते हैं। भारत आज विश्व के कुल जंगली बाघों का लगभग 80% भाग आश्रय देता है — यह किसी एक देश में केंद्रित विश्व की सबसे बड़ी बाघ आबादी है। छठवीं अखिल भारतीय बाघ गणना (All India Tiger Estimation) 2025 के अंत में शुरू हुई है, जिसकी अंतिम रिपोर्ट जुलाई 2027 तक अपेक्षित है।
◆ प्रोजेक्ट टाइगर 1973 ◆ NTCA ◆ प्रोजेक्ट एलिफेंट ◆ गोडावण संरक्षण परियोजना ◆ प्रोजेक्ट चीता ◆ कूनो राष्ट्रीय उद्यान ◆ अखिल भारतीय बाघ गणना
जैव-विविधता संरक्षण का मूल आधार तीन प्रमुख प्राकृतिक संसाधनों — वन, जल व मृदा — के संरक्षण पर टिका है, क्योंकि ये संसाधन ही समस्त पारिस्थितिकी तंत्र की नींव हैं।
वन संरक्षण
भारत की राष्ट्रीय वन नीति (1988) का लक्ष्य देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के कम से कम 33% भाग को वन/वृक्ष आवरण के अंतर्गत लाना है — वर्तमान में यह लगभग 24-25% है। सामाजिक वानिकी (Social Forestry) व कृषि वानिकी (Agroforestry) जैसे कार्यक्रम स्थानीय समुदायों की भागीदारी से वृक्षारोपण को बढ़ावा देते हैं।
जल संरक्षण
जल संरक्षण में वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting), भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) व कुशल सिंचाई तकनीकें (ड्रिप/स्प्रिंकलर सिंचाई) प्रमुख हैं। राजस्थान की पारंपरिक जल-संरक्षण प्रणालियां (जोहड़, बावड़ी, टांका — देखें अध्याय-13) इस क्षेत्र में विश्व स्तर पर सराही जाती हैं।
मृदा संरक्षण
मृदा संरक्षण के उपायों में समोच्च जुताई (Contour Ploughing), सीढ़ीदार खेती (Terrace Farming), वृक्षारोपण द्वारा भूमि कटाव रोकना, तथा जैविक खेती (कम रासायनिक उर्वरक/कीटनाशक उपयोग) शामिल हैं — ये सभी उपाय दीर्घकाल में मृदा की उर्वरता व उत्पादकता बनाए रखने में सहायक हैं।
वन, जल व मृदा संरक्षण एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं — वृक्षों की जड़ें मिट्टी को बांधे रखती हैं (कटाव रोकना), स्वस्थ मिट्टी वर्षा जल को बेहतर अवशोषित करती है (भूजल पुनर्भरण), और पर्याप्त जल वनस्पति वृद्धि को समर्थन देता है। इसीलिए पर्यावरण संरक्षण नीतियां इन तीनों को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक समग्र (Integrated) दृष्टिकोण से देखती हैं।
◆ राष्ट्रीय वन नीति 1988 ◆ सामाजिक वानिकी ◆ वर्षा जल संचयन ◆ भूजल पुनर्भरण ◆ समोच्च जुताई ◆ सीढ़ीदार खेती ◆ समग्र संसाधन प्रबंधन
संतत् विकास (Sustainable Development) की सबसे प्रसिद्ध व व्यापक रूप से स्वीकृत परिभाषा 1987 की ब्रंटलैंड रिपोर्ट ('हमारा साझा भविष्य' — Our Common Future) में दी गई — 'ऐसा विकास जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को इस प्रकार पूरा करे कि भविष्य की पीढ़ियों की अपनी आवश्यकताएं पूरी करने की क्षमता से समझौता न हो।' यह परिभाषा नॉर्वे की तत्कालीन प्रधानमंत्री ग्रो हार्लेम ब्रंटलैंड (Gro Harlem Brundtland) की अध्यक्षता वाले संयुक्त राष्ट्र आयोग द्वारा प्रस्तुत की गई थी।
संतत् विकास के तीन स्तंभ
| 🌍 पर्यावरणीय स्थिरता | 💰 आर्थिक स्थिरता |
|---|---|
| ◆ प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग ◆ पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण ◆ प्रदूषण व कार्बन उत्सर्जन नियंत्रण | ◆ समावेशी व दीर्घकालिक आर्थिक वृद्धि ◆ संसाधनों का कुशल व न्यायसंगत उपयोग ◆ गरीबी उन्मूलन |
तीसरा स्तंभ — सामाजिक समावेशन (Social Equity) — सुनिश्चित करता है कि विकास के लाभ समाज के सभी वर्गों, विशेषकर हाशिए पर स्थित समुदायों तक समान रूप से पहुंचें। इन तीनों स्तंभों — पर्यावरण, अर्थव्यवस्था व समाज — का संतुलन ही सच्चे संतत् विकास की कसौटी है।
1972 के स्टॉकहोम सम्मेलन में पहली बार पर्यावरण व विकास को साथ जोड़कर देखा गया; 1987 की ब्रंटलैंड रिपोर्ट ने 'संतत् विकास' शब्द को लोकप्रिय बनाया; 1992 के रियो पृथ्वी सम्मेलन में एजेंडा-21 व जैविक विविधता कन्वेंशन जैसे ठोस ढांचे बने; 2015 में संयुक्त राष्ट्र ने सतत विकास लक्ष्य (SDGs, अगले टॉपिक में विस्तार से) अपनाकर इस अवधारणा को 17 ठोस, मापनीय लक्ष्यों में बदल दिया।
◆ संतत् विकास ◆ ब्रंटलैंड रिपोर्ट 1987 ◆ ग्रो हार्लेम ब्रंटलैंड ◆ पर्यावरणीय स्तंभ ◆ आर्थिक स्तंभ ◆ सामाजिक समावेशन ◆ स्टॉकहोम सम्मेलन 1972
सितंबर 2015 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने '2030 एजेंडा फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट' अपनाया, जिसके केंद्र में 17 सतत विकास लक्ष्य (Sustainable Development Goals — SDGs) हैं — ये लक्ष्य वर्ष 2000 के सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों (Millennium Development Goals — MDGs) के उत्तराधिकारी हैं, परंतु कहीं अधिक व्यापक व सभी देशों (केवल विकासशील नहीं) पर लागू होते हैं।
🖼️ संयुक्त राष्ट्र के 17 सतत विकास लक्ष्य (SDGs) — 2030 तक प्राप्त किए जाने वाला वैश्विक एजेंडा

17 लक्ष्यों में गरीबी उन्मूलन, भुखमरी समाप्ति, स्वास्थ्य व कल्याण, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, लैंगिक समानता, स्वच्छ जल-स्वच्छता, सस्ती स्वच्छ ऊर्जा, बेहतर कार्य-आर्थिक वृद्धि, उद्योग-नवाचार-अवसंरचना, असमानता में कमी, संतत नगर-समुदाय, उत्तरदायी उपभोग-उत्पादन, जलवायु कार्रवाई, जलीय जीवन संरक्षण, थलीय जीवन संरक्षण (जैव-विविधता से सीधा संबंध), शांति-न्याय-सुदृढ़ संस्थाएं, तथा लक्ष्यों हेतु भागीदारी शामिल हैं।
| सूचक | भारत की स्थिति (2025) |
|---|---|
| वैश्विक SDG सूचकांक रैंक | 99वां स्थान (167 देशों में), स्कोर 67 — 2024 के 109वें स्थान से बड़ी छलांग, पहली बार शीर्ष 100 में |
| SDG इंडिया इंडेक्स (घरेलू, NITI आयोग) | समग्र स्कोर 71 (2023-24) — 2018 के 57 से लगातार सुधार |
| जल्द प्राप्त होने की संभावना वाले लक्ष्य | SDG-7 (स्वच्छ ऊर्जा), SDG-11 (संतत नगर), SDG-12 (उत्तरदायी उपभोग) — 2025-26 तक राष्ट्रीय स्तर पर प्राप्ति अनुमानित |
| प्रगतिशील लक्ष्य | SDG-3 (स्वास्थ्य) 2026-27 तक; SDG-2 (भुखमरी) व SDG-5 (लैंगिक समानता) 2027-28 तक प्राप्ति का अनुमान |
भारत में SDG लक्ष्यों की निगरानी व क्रियान्वयन का दायित्व NITI आयोग (National Institution for Transforming India) पर है, जो प्रतिवर्ष 'SDG इंडिया इंडेक्स' जारी करता है — यह राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों की SDG लक्ष्यों की दिशा में प्रगति को स्कोर व रैंक के आधार पर मापता है, जिससे राज्यों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा व जवाबदेही को बढ़ावा मिलता है।
◆ 17 SDGs ◆ 2030 एजेंडा ◆ सहस्राब्दि विकास लक्ष्य (MDGs) ◆ वैश्विक SDG सूचकांक 99वां स्थान ◆ SDG इंडिया इंडेक्स ◆ NITI आयोग
राजस्थान अपनी अनूठी पारिस्थितिकीय चुनौतियों (देखें अध्याय-13) के बावजूद, जैव-विविधता संरक्षण व सतत विकास के क्षेत्र में कई उल्लेखनीय पहल कर रहा है, जो पारंपरिक ज्ञान व आधुनिक नीति-निर्माण के संतुलन को दर्शाती हैं।
राज्य स्तरीय संरक्षण नीतियां
सतत विकास की दिशा में राजस्थान के कदम
राजस्थान की कहानी — चाहे वह सरिस्का में बाघ पुनर्स्थापन हो, जोहड़ के माध्यम से जल-संरक्षण हो, या भड़ला सौर पार्क के माध्यम से स्वच्छ ऊर्जा क्रांति — यह दर्शाती है कि सबसे शुष्क व पारिस्थितिकीय रूप से चुनौतीपूर्ण क्षेत्र भी, यदि पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान व दृढ़ नीतिगत इच्छाशक्ति से जोड़ा जाए, तो जैव-विविधता संरक्षण व सतत विकास दोनों में एक राष्ट्रीय मॉडल बन सकते हैं। यही इस अध्याय का केंद्रीय संदेश है — संरक्षण और विकास परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं।
राजस्थान की जैव-विविधता व सतत विकास से जुड़े प्रश्न RAS परीक्षा में अत्यंत नियमित रूप से पूछे जाते हैं — गोडावण, सरिस्का पुनर्स्थापन, जोहड़ प्रणाली व राज्य के बायोस्फीयर/राष्ट्रीय उद्यानों के नाम व स्थान भली-भांति याद रखना उत्तर-लेखन के लिए अनिवार्य है, साथ ही इन्हें SDG लक्ष्यों से जोड़कर प्रस्तुत करना उत्तर को विश्लेषणात्मक गहराई प्रदान करता है।
◆ राजस्थान राज्य जैव-विविधता बोर्ड ◆ जैव-विविधता प्रबंधन समितियां ◆ जन जैव विविधता रजिस्टर ◆ गोडावण प्रजनन केंद्र ◆ भड़ला सौर पार्क ◆ संरक्षण-विकास सहअस्तित्व
• जैव-विविधता के तीन स्तर हैं — आनुवंशिक, स्पीशीज़ व पारिस्थितिकी तंत्र विविधता; इसका महत्व पारिस्थितिक (पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएं), आर्थिक (कृषि, औषधि, पर्यटन) व नैतिक तीनों आयामों में फैला है। • भारत विश्व के 17 मेगा-डाइवर्स देशों में शामिल है, जिसमें पश्चिमी घाट, हिमालय, इंडो-बर्मा व सुंडालैंड — चार जैव-विविधता हॉटस्पॉट स्थित हैं। • राजस्थान की जैव-विविधता में खेजड़ी, रोहिड़ा, चिंकारा, गोडावण (राज्य पक्षी, गंभीर संकटग्रस्त) व ऊंट (राज्य पशु) प्रमुख हैं; राज्य में 5 बाघ अभयारण्य हैं — रणथंभौर, सरिस्का, मुकुंदरा, रामगढ़ विषधारी व धौलपुर-करौली। • सरिस्का में 2004-05 की बाघ-विलुप्ति के बाद सफल पुनर्स्थापन (जून 2025 तक 49 बाघ) जैव-विविधता पुनर्बहाली का एक प्रेरणादायक वैश्विक उदाहरण है। • जैव-विविधता को खतरा आवास हानि, अतिदोहन, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन व आक्रामक प्रजातियों से है — वर्तमान छठा सामूहिक विलुप्ति दौर मुख्यतः मानवजनित है; IUCN रेड लिस्ट प्रजातियों को EX से LC तक वर्गीकृत करती है। • संरक्षण की दो मुख्य विधियां हैं — स्व-स्थाने (राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य, बायोस्फीयर रिजर्व) व बाह्य-स्थाने (चिड़ियाघर, बीज बैंक, क्रायोप्रिजर्वेशन); प्रोजेक्ट टाइगर (1973) व प्रोजेक्ट चीता (2022) भारत के प्रमुख संरक्षण कार्यक्रम हैं। • प्राकृतिक संसाधन संरक्षण (वन, जल, मृदा) परस्पर जुड़े हैं तथा जैव-विविधता संरक्षण की नींव हैं। • संतत् विकास की ब्रंटलैंड परिभाषा (1987) पर्यावरण, अर्थव्यवस्था व समाज — तीन स्तंभों के संतुलन पर आधारित है; 2015 में अपनाए गए 17 SDGs इस अवधारणा को मापनीय लक्ष्यों में बदलते हैं। • भारत ने 2025 में वैश्विक SDG सूचकांक में 99वां स्थान प्राप्त कर पहली बार शीर्ष 100 में प्रवेश किया; SDG इंडिया इंडेक्स घरेलू प्रगति की निगरानी करता है। • राजस्थान राज्य जैव-विविधता बोर्ड, गोडावण संरक्षण केंद्र, भड़ला सौर पार्क व जोहड़ जैसी पारंपरिक प्रणालियां राज्य को जैव-विविधता संरक्षण व सतत विकास दोनों में राष्ट्रीय मॉडल बनाती हैं।