पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) एक ऐसी प्राकृतिक इकाई है, जिसमें किसी क्षेत्र के सभी जीवधारी (पौधे, जंतु, सूक्ष्मजीव) आपस में तथा अपने भौतिक पर्यावरण (हवा, पानी, मिट्टी, तापमान) के साथ निरंतर अंतःक्रिया करते हुए एक संतुलित तंत्र बनाते हैं। यह शब्द सबसे पहले 1935 में ब्रिटिश वनस्पति वैज्ञानिक आर्थर टैन्सले (Arthur Tansley) द्वारा प्रस्तावित किया गया था। एक तालाब, एक जंगल, एक रेगिस्तान, यहां तक कि आपके घर का एक छोटा बगीचा भी — सभी पारिस्थितिकी तंत्र के उदाहरण हैं।
| 🌿 जैविक घटक (Biotic Components) | 🪨 अजैविक घटक (Abiotic Components) |
|---|---|
| ◆ उत्पादक (Producers): हरे पौधे व शैवाल, जो प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं ◆ उपभोक्ता (Consumers): शाकाहारी (प्राथमिक), मांसाहारी (द्वितीयक/तृतीयक) ◆ अपघटक (Decomposers): जीवाणु व कवक, जो मृत जीवों को विघटित कर पोषक तत्व मिट्टी में वापस लौटाते हैं | ◆ भौतिक कारक: तापमान, प्रकाश, वर्षा, आर्द्रता ◆ रासायनिक कारक: मिट्टी की संरचना, pH, पोषक तत्व, गैसें (ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड) ◆ इन दोनों घटकों के बीच निरंतर ऊर्जा व पदार्थ का आदान-प्रदान होता रहता है |
💡 राजस्थान का एक सरल पारिस्थितिकी तंत्र उदाहरण: थार मरुस्थल के एक ओएसिस (मरूद्यान) को लीजिए — यहां खेजड़ी (Prosopis cineraria) व बबूल जैसे पौधे उत्पादक हैं, चिंकारा व ऊंट जैसे शाकाहारी प्राथमिक उपभोक्ता हैं, लोमड़ी जैसे मांसाहारी द्वितीयक उपभोक्ता हैं, तथा मिट्टी में मौजूद जीवाणु व कवक अपघटक की भूमिका निभाते हैं। ये सभी घटक यहां की अत्यंत सीमित वर्षा, उच्च तापमान व रेतीली मिट्टी (अजैविक घटक) के साथ मिलकर एक नाजुक परंतु संतुलित मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र बनाते हैं।
◆ पारिस्थितिकी तंत्र ◆ आर्थर टैन्सले ◆ उत्पादक ◆ उपभोक्ता ◆ अपघटक ◆ जैविक घटक ◆ अजैविक घटक
पारिस्थितिकी तंत्र में ऊर्जा एक दिशा में प्रवाहित होती है — सूर्य से उत्पादकों में, फिर उपभोक्ताओं की विभिन्न श्रेणियों में — जबकि पोषक तत्व चक्रीय रूप से (Cycle) पुनः उपयोग होते रहते हैं। इस ऊर्जा-स्थानांतरण के मार्ग को खाद्य श्रृंखला (Food Chain) कहते हैं।
📐 एक सरल खाद्य श्रृंखला का उदाहरण — सूत्र/प्रक्रिया: घास (उत्पादक) → टिड्डा (प्राथमिक उपभोक्ता) → मेंढक (द्वितीयक उपभोक्ता) → सांप (तृतीयक उपभोक्ता) → बाज (चतुर्थक उपभोक्ता)
वास्तविक प्रकृति में जीव केवल एक ही खाद्य श्रृंखला का हिस्सा नहीं होते — कई खाद्य श्रृंखलाएं आपस में जुड़कर एक जटिल जाल बनाती हैं, जिसे खाद्य जाल (Food Web) कहते हैं। यह जाल पारिस्थितिकी तंत्र को अधिक स्थिर व लचीला बनाता है — यदि एक खाद्य स्रोत समाप्त हो जाए, तो जीव दूसरे विकल्प की ओर रुख कर सकते हैं।
🖼️ ऊर्जा प्रवाह — सूर्य से उत्पादकों, शाकाहारी, मांसाहारी व अपघटकों से होते हुए वापस खनिज पोषक-भंडार तक

दस प्रतिशत नियम (10% Law)
पारिस्थितिकी विज्ञानी रेमंड लिंडमैन (Raymond Lindeman) द्वारा प्रतिपादित इस नियम के अनुसार, खाद्य श्रृंखला के एक पोषण स्तर (Trophic Level) से अगले स्तर पर औसतन केवल 10% ऊर्जा ही स्थानांतरित होती है — शेष 90% ऊर्जा श्वसन, गति व ऊष्मा के रूप में नष्ट हो जाती है। यही कारण है कि खाद्य श्रृंखला में सामान्यतः 4-5 पोषण स्तरों से अधिक नहीं होते, तथा शीर्ष परभक्षी (जैसे बाघ, बाज) की जनसंख्या हमेशा उत्पादकों की तुलना में बहुत कम होती है।
यदि किसी घास के मैदान में 10,000 किलोकैलोरी ऊर्जा उत्पादकों (घास) में संचित हो, तो शाकाहारी (टिड्डे) को केवल लगभग 1,000 किलोकैलोरी मिलेगी, मांसाहारी (मेंढक) को मात्र 100 किलोकैलोरी, और शीर्ष परभक्षी (सांप/बाज) को केवल 10 किलोकैलोरी। यही गणितीय नियम बताता है कि प्रकृति में शाकाहारी भोजन शृंखला मांसाहारी शृंखला से कहीं अधिक ऊर्जा-कुशल क्यों होती है — यह सिद्धांत मानव आहार व खाद्य सुरक्षा नीति (देखें अध्याय-07) के लिए भी प्रासंगिक है।
◆ खाद्य श्रृंखला ◆ खाद्य जाल ◆ पोषण स्तर ◆ 10% नियम ◆ रेमंड लिंडमैन ◆ ऊर्जा प्रवाह
पृथ्वी पर पारिस्थितिकी तंत्रों को व्यापक रूप से दो श्रेणियों में बांटा जाता है — स्थलीय (Terrestrial) एवं जलीय (Aquatic), जो आगे कई उप-प्रकारों में विभाजित होते हैं।
| पारिस्थितिकी तंत्र का प्रकार | विशेषता एवं उदाहरण |
|---|---|
| वन पारिस्थितिकी तंत्र (Forest) | उच्च जैव-विविधता; उदाहरण: उष्णकटिबंधीय वर्षावन, राजस्थान के रणथंभौर व सरिस्का के वन |
| घास स्थल पारिस्थितिकी तंत्र (Grassland) | कम वर्षा, विस्तृत घास क्षेत्र; उदाहरण: सवाना, राजस्थान की ओरण भूमि |
| मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र (Desert) | अत्यंत कम वर्षा, विशेष अनुकूलित जीव; उदाहरण: थार मरुस्थल |
| पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र (Mountain) | ऊंचाई के साथ बदलती जलवायु व वनस्पति; उदाहरण: अरावली पर्वत श्रृंखला |
| मीठे जल पारिस्थितिकी तंत्र (Freshwater) | नदी, झील, तालाब; उदाहरण: चंबल नदी, पिछोला झील |
| समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र (Marine) | खारा जल, ज्वारीय क्षेत्र, प्रवाल भित्ति; उदाहरण: गुजरात-महाराष्ट्र तटीय क्षेत्र |
अरावली पर्वत श्रृंखला, जो विश्व की सबसे प्राचीन मोड़दार पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, राजस्थान से होकर गुजरती है और थार मरुस्थल को पूर्व की ओर फैलने से रोकने में एक प्राकृतिक अवरोध (Barrier) का कार्य करती है — यही कारण है कि अरावली के संरक्षण को राजस्थान की पारिस्थितिकीय स्थिरता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है (टॉपिक-13 में विस्तार से)।
◆ स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र ◆ जलीय पारिस्थितिकी तंत्र ◆ घास स्थल ◆ मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र ◆ अरावली पर्वत श्रृंखला ◆ ओरण भूमि
जैव-भू-रासायनिक चक्र (Biogeochemical Cycle) वे प्राकृतिक प्रक्रियाएं हैं, जिनके द्वारा पृथ्वी पर आवश्यक तत्व (कार्बन, नाइट्रोजन, जल आदि) जीवधारियों, वायुमंडल, जलमंडल व स्थलमंडल के बीच निरंतर चक्रित होते रहते हैं — यही चक्र जीवन को असीमित समय तक चलाए रखना संभव बनाते हैं, क्योंकि पदार्थ नष्ट नहीं होता, केवल एक रूप से दूसरे रूप में बदलता व स्थानांतरित होता रहता है।
🖼️ वैश्विक कार्बन चक्र — वायुमंडल, वनस्पति, मिट्टी, महासागर व जीवाश्म ईंधन भंडार के बीच कार्बन का प्रवाह (गीगाटन में)

प्रकाश संश्लेषण के दौरान पौधे वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) को अवशोषित कर कार्बनिक यौगिकों में बदलते हैं; श्वसन, दहन (जीवाश्म ईंधन जलाना) व अपघटन के दौरान यह कार्बन पुनः CO₂ के रूप में वायुमंडल में लौट आता है। औद्योगिक क्रांति के बाद से मानव गतिविधियों (कोयला, पेट्रोल, प्राकृतिक गैस का दहन) ने इस चक्र में भारी असंतुलन उत्पन्न कर दिया है — जितना कार्बन प्राकृतिक रूप से अवशोषित हो पाता है, उससे कहीं अधिक वायुमंडल में उत्सर्जित हो रहा है, जो जलवायु परिवर्तन (अगले टॉपिक में विस्तार से) का मूल कारण है।
नाइट्रोजन चक्र (Nitrogen Cycle) — संक्षिप्त पुनरावलोकन
वायुमंडल का लगभग 78% भाग नाइट्रोजन गैस है, परंतु अधिकांश जीव इसे सीधे उपयोग नहीं कर सकते। राइज़ोबियम जैसे जैविक नाइट्रोजन-स्थिरीकरण जीवाणु (देखें अध्याय-09) इसे पौधों के उपयोग योग्य रूप में बदलते हैं, जो खाद्य श्रृंखला के माध्यम से आगे बढ़ती है, और अंततः अपघटन व विनाइट्रीकरण (Denitrification) प्रक्रिया द्वारा पुनः वायुमंडल में लौट जाती है।
जल चक्र (Water Cycle) — संक्षिप्त पुनरावलोकन
सूर्य की ऊष्मा से समुद्र, नदी व झीलों का पानी वाष्पीकृत होकर बादल बनाता है, जो वर्षा के रूप में पुनः धरती पर लौटता है — यह जल भूमिगत जल, नदियों व पुनः महासागरों में पहुंचकर चक्र को पूरा करता है। राजस्थान जैसे शुष्क राज्य के लिए जल चक्र में किसी भी व्यवधान (जैसे अनियमित वर्षा पैटर्न) का सीधा व गंभीर प्रभाव जल-सुरक्षा पर पड़ता है (टॉपिक-13 में विस्तार से)।
◆ जैव-भू-रासायनिक चक्र ◆ कार्बन चक्र ◆ नाइट्रोजन चक्र ◆ जल चक्र ◆ विनाइट्रीकरण ◆ वाष्पीकरण
ग्रीनहाउस प्रभाव (Greenhouse Effect) मूलतः एक स्वाभाविक व जीवन-रक्षक प्राकृतिक प्रक्रिया है — यदि यह न हो, तो पृथ्वी का औसत तापमान लगभग -18°C होता, यानी जीवन के लिए बहुत ठंडा। वायुमंडल में मौजूद कुछ गैसें (कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड, जलवाष्प) सूर्य से आई ऊष्मा को अंतरिक्ष में वापस जाने से आंशिक रूप से रोक लेती हैं, जिससे पृथ्वी का तापमान जीवन-योग्य (लगभग 15°C औसत) बना रहता है — यह ठीक वैसे ही है जैसे कांच का ग्रीनहाउस (पौधशाला) अंदर की गर्मी को बाहर नहीं जाने देता।
🖼️ ग्रीनहाउस गैसें दीर्घ-तरंग विकिरण को पुनर्निर्देशित कर पृथ्वी की सतह को गर्म रखती हैं — बिना ग्रीनहाउस गैसों के तापमान -18°C, वर्तमान में 15°C

समस्या ग्रीनहाउस प्रभाव में नहीं, बल्कि इसकी अत्यधिक मात्रा में है। औद्योगिक क्रांति (लगभग 1850) के बाद से मानव गतिविधियों — जीवाश्म ईंधन दहन, वनों की कटाई, औद्योगिक प्रक्रियाएं, गहन कृषि — ने वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों की सांद्रता को खतरनाक रूप से बढ़ा दिया है, जिससे पृथ्वी का औसत तापमान असामान्य रूप से बढ़ रहा है — इसी को 'वैश्विक तापन' (Global Warming) व व्यापक रूप से 'जलवायु परिवर्तन' (Climate Change) कहा जाता है।
| प्रमुख ग्रीनहाउस गैस | मुख्य स्रोत |
|---|---|
| कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) | जीवाश्म ईंधन दहन, वनों की कटाई, सीमेंट उत्पादन |
| मीथेन (CH₄) | धान की खेती, पशुपालन (मवेशियों का पाचन), लैंडफिल कचरा |
| नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O) | नाइट्रोजन उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग, औद्योगिक प्रक्रियाएं |
| क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) | रेफ्रिजरेटर, एयर-कंडीशनर, एरोसोल (अब अधिकांश देशों में प्रतिबंधित) |
◆ ग्रीनहाउस प्रभाव ◆ ग्रीनहाउस गैसें ◆ वैश्विक तापन ◆ कार्बन डाइऑक्साइड ◆ मीथेन ◆ नाइट्रस ऑक्साइड ◆ CFC
जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अब केवल भविष्य की चिंता नहीं, बल्कि वर्तमान की वास्तविकता है — वैश्विक स्तर पर तथा भारत में भी इसके प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं।
वैश्विक प्रभाव
भारत पर प्रभाव
नवंबर 2025 में ब्राज़ील के बेलेम शहर में आयोजित COP30 सम्मेलन (पेरिस समझौते की 10वीं वर्षगांठ) में भारत ने घोषणा की कि उसने अपना गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता का 50% लक्ष्य निर्धारित समय (2030) से पहले ही प्राप्त कर लिया है — यह भारत की स्वच्छ ऊर्जा प्रतिबद्धता का एक महत्वपूर्ण प्रमाण है। सम्मेलन में विकासशील देशों के लिए जलवायु-अनुकूलन कोष को तिगुना करने पर सहमति बनी, हालांकि जीवाश्म ईंधन व वनों की कटाई पर कोई औपचारिक समझौता नहीं हो सका।
◆ वैश्विक तापन 1.1°C ◆ हिमनद पिघलना ◆ समुद्र स्तर वृद्धि ◆ चरम मौसमी घटनाएं ◆ मानसून अनियमितता ◆ COP30 बेलेम ◆ 50% गैर-जीवाश्म ऊर्जा लक्ष्य
वायु प्रदूषण (Air Pollution) का अर्थ है वायुमंडल में हानिकारक पदार्थों (गैसें, धूल कण) की उपस्थिति, जो मानव स्वास्थ्य, वनस्पति व पर्यावरण के लिए हानिकारक हो। भारत के कई शहर विश्व के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में गिने जाते हैं, विशेषकर शीतकाल में उत्तर भारत का वायु गुणवत्ता स्तर गंभीर श्रेणी में पहुंच जाता है।
| प्रदूषक | मुख्य स्रोत | स्वास्थ्य प्रभाव |
|---|---|---|
| सूक्ष्म कण (PM2.5, PM10) | वाहन उत्सर्जन, निर्माण कार्य, पराली जलाना | श्वसन व हृदय रोग, फेफड़ों का कैंसर |
| सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) | कोयला दहन, औद्योगिक इकाइयां | श्वसन तंत्र में जलन, अम्ल वर्षा |
| नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) | वाहन उत्सर्जन, बिजली संयंत्र | फेफड़ों की क्षति, धुंध (Smog) निर्माण |
| कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) | अपूर्ण दहन (वाहन, चूल्हा) | रक्त में ऑक्सीजन वहन क्षमता घटाना |
वायु प्रदूषण नियंत्रण उपाय
◆ वायु प्रदूषण ◆ PM2.5/PM10 ◆ सल्फर डाइऑक्साइड ◆ राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम ◆ AQI ◆ BS-VI मानक
जल प्रदूषण (Water Pollution) व मृदा प्रदूषण (Soil Pollution) पारिस्थितिकी तंत्र के दो अन्य महत्वपूर्ण घटकों — जल व भूमि — को प्रभावित करने वाली गंभीर समस्याएं हैं, जिनका सीधा असर खाद्य सुरक्षा व मानव स्वास्थ्य (देखें अध्याय-07 व 08) पर पड़ता है।
जल प्रदूषण के प्रमुख स्रोत
मृदा प्रदूषण के प्रमुख स्रोत
💡 यूट्रोफिकेशन — एक शृंखलाबद्ध पारिस्थितिक क्षति: जब अत्यधिक नाइट्रोजन व फॉस्फोरस युक्त कृषि अपवाह किसी झील या तालाब में पहुंचता है, तो शैवाल की तीव्र वृद्धि होती है (Algal Bloom) — यह पानी की सतह को ढक लेता है, सूर्य प्रकाश जलीय पौधों तक नहीं पहुंच पाता, और जब यह शैवाल मरता है तो उसके अपघटन में भारी मात्रा में ऑक्सीजन खर्च होती है, जिससे मछलियां व अन्य जलीय जीव ऑक्सीजन की कमी से मरने लगते हैं — यह दर्शाता है कि पारिस्थितिकी तंत्र के एक हिस्से में असंतुलन कैसे पूरी शृंखला को प्रभावित कर सकता है।
◆ जल प्रदूषण ◆ औद्योगिक अपशिष्ट ◆ यूट्रोफिकेशन ◆ मृदा प्रदूषण ◆ भारी धातु संचय ◆ प्लास्टिक कचरा
पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन (Environmental Impact Assessment — EIA) एक ऐसी वैज्ञानिक व नियामक प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत किसी बड़ी विकास परियोजना (जैसे बांध, राजमार्ग, औद्योगिक इकाई, खनन) को अनुमति देने से पहले यह आकलन किया जाता है कि उस परियोजना का पर्यावरण, जैव-विविधता व स्थानीय समुदायों पर क्या संभावित प्रभाव पड़ेगा — ताकि विकास व पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाया जा सके।
📐 भारत में EIA की प्रक्रिया (चार चरण) — सूत्र/प्रक्रिया: चरण 1 — स्क्रीनिंग (Screening): परियोजना की श्रेणी तय करना (श्रेणी A — केंद्रीय स्तर पर मूल्यांकन, श्रेणी B — राज्य स्तर पर) चरण 2 — स्कोपिंग (Scoping): विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (EAC) द्वारा अध्ययन के दायरे व शर्तों (Terms of Reference) का निर्धारण चरण 3 — सार्वजनिक परामर्श (Public Consultation): प्रभावित स्थानीय समुदायों व हितधारकों से सुनवाई एवं राय प्राप्त करना चरण 4 — मूल्यांकन एवं स्वीकृति (Appraisal): EAC द्वारा पूर्ण मूल्यांकन के बाद पर्यावरणीय स्वीकृति (Environmental Clearance) प्रदान करना या अस्वीकार करना
भारत में EIA का कानूनी आधार एवं हालिया अपडेट (2025): भारत में EIA, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 के अंतर्गत EIA अधिसूचना 2006 द्वारा नियंत्रित होता है। मार्च 2025 में पर्यावरण मंत्रालय ने रैखिक अवसंरचना परियोजनाओं (सड़क, पाइपलाइन) को दी गई पूर्व छूट को समाप्त कर दिया, तथा अगस्त 2025 से पर्यावरण लेखा-परीक्षा नियम (Environment Audit Rules, 2025) भी लागू हो गए हैं, जो पर्यावरणीय अनुपालन की व्यवस्थित जांच अनिवार्य करते हैं। फरवरी 2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ परियोजना श्रेणियों (औद्योगिक शेड, स्कूल, कॉलेज) को दी गई छूट पर भी रोक लगाई — यह दर्शाता है कि भारत की EIA व्यवस्था निरंतर सुदृढ़ हो रही है।
◆ EIA ◆ पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 ◆ EIA अधिसूचना 2006 ◆ स्क्रीनिंग ◆ स्कोपिंग ◆ सार्वजनिक परामर्श ◆ पर्यावरणीय स्वीकृति ◆ पर्यावरण लेखा-परीक्षा नियम 2025
भारत ने पर्यावरण संरक्षण हेतु एक व्यापक कानूनी व संस्थागत ढांचा विकसित किया है, जो समय-समय पर बदलती चुनौतियों के अनुसार सुदृढ़ होता रहा है।
| कानून/संस्था | वर्ष | उद्देश्य |
|---|---|---|
| वन्यजीव संरक्षण अधिनियम | 1972 | वन्यजीव प्रजातियों व उनके आवासों का संरक्षण |
| जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम | 1974 | जल स्रोतों में प्रदूषण नियंत्रण |
| वन संरक्षण अधिनियम | 1980 | वन भूमि के गैर-वानिकी उपयोग पर नियंत्रण |
| वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम | 1981 | वायु प्रदूषण नियंत्रण |
| पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम | 1986 | भोपाल गैस त्रासदी के बाद बना छत्र-कानून; EIA का आधार |
| राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) | 2010 | पर्यावरणीय विवादों के त्वरित निपटारे हेतु विशेष न्यायाधिकरण |
| जैव विविधता अधिनियम | 2002 | जैव संसाधनों व पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण (देखें अध्याय-14) |
भोपाल गैस त्रासदी — भारत के पर्यावरण कानून की जननी: दिसंबर 1984 में भोपाल की यूनियन कार्बाइड कीटनाशक फैक्ट्री से जहरीली मिथाइल आइसोसाइनेट गैस के रिसाव ने हजारों लोगों की जान ली — यह विश्व की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदियों में से एक थी। इसी त्रासदी के प्रत्युत्तर में भारत सरकार ने 1986 में पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम बनाया, जो आज भी भारत के संपूर्ण पर्यावरणीय नियमन का आधार-स्तंभ है।
◆ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 ◆ पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 ◆ राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ◆ भोपाल गैस त्रासदी ◆ जैव विविधता अधिनियम 2002
जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक चुनौती है, जिसका समाधान किसी एक देश के प्रयासों से संभव नहीं — इसीलिए संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में कई अंतर्राष्ट्रीय जलवायु समझौते किए गए हैं।
प्रमुख वैश्विक समझौते
💡 COP30, बेलेम (नवंबर 2025) — पेरिस समझौते की 10वीं वर्षगांठ: ब्राज़ील के बेलेम शहर में आयोजित COP30 सम्मेलन (10-22 नवंबर 2025) पेरिस समझौते के एक दशक पूरे होने का अवसर था। सम्मेलन में विकासशील देशों के लिए जलवायु-अनुकूलन वित्त-पोषण को तिगुना करने पर सहमति बनी तथा अनुकूलन संकेतकों पर प्रगति हुई, परंतु जीवाश्म ईंधन के क्रमिक उन्मूलन व वनों की कटाई रोकने पर कोई औपचारिक वैश्विक समझौता नहीं हो सका — यह दर्शाता है कि वैश्विक जलवायु कूटनीति में अभी भी महत्वाकांक्षा व वास्तविक कार्यान्वयन के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है।
◆ क्योटो प्रोटोकॉल ◆ पेरिस समझौता 2015 ◆ NDC ◆ UNFCCC ◆ COP सम्मेलन ◆ COP30 बेलेम
मरुस्थलीकरण (Desertification) एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें शुष्क, अर्ध-शुष्क व उप-आर्द्र भूमि की उत्पादक क्षमता जलवायु परिवर्तन व मानवीय गतिविधियों (अत्यधिक चराई, वनों की कटाई, असंतुलित सिंचाई, अनुपयुक्त कृषि पद्धतियां) के कारण क्रमशः घटती जाती है, अंततः वह भूमि रेगिस्तान जैसी बंजर स्थिति में बदल जाती है। यह किसी भूमि पर वास्तविक रेगिस्तान के 'विस्तार' से भिन्न है — यह मौजूदा उपजाऊ भूमि का क्रमिक क्षरण है।
| मरुस्थलीकरण के प्रमुख कारण | विवरण |
|---|---|
| अत्यधिक चराई (Overgrazing) | पशुओं की संख्या भूमि की वहन क्षमता से अधिक होने पर वनस्पति आवरण नष्ट |
| वनों की कटाई | जड़ों द्वारा मिट्टी को बांधे रखने की क्षमता समाप्त, कटाव बढ़ना |
| असंतुलित सिंचाई | अत्यधिक सिंचाई से भूमि में लवणता (Salinity) बढ़ना |
| जलवायु परिवर्तन | अनियमित वर्षा, बढ़ता तापमान, दीर्घकालिक सूखा |
| हवा व जल कटाव (Erosion) | ऊपरी उपजाऊ मिट्टी की परत का बहना/उड़ना |
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की रिपोर्टों के अनुसार, भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 30% भाग भूमि क्षरण या मरुस्थलीकरण से किसी न किसी रूप में प्रभावित है। राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक व जम्मू-कश्मीर इससे सर्वाधिक प्रभावित राज्यों में शामिल हैं — इनमें भी राजस्थान की स्थिति सबसे गंभीर मानी जाती है, क्योंकि थार मरुस्थल राज्य के एक बड़े भूभाग में फैला हुआ है (अगले टॉपिक में विस्तृत चर्चा)।
◆ मरुस्थलीकरण ◆ अत्यधिक चराई ◆ भूमि लवणता ◆ ISRO भूमि क्षरण रिपोर्ट ◆ संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम कन्वेंशन (UNCCD)
राजस्थान, भारत का सबसे बड़ा राज्य (क्षेत्रफल की दृष्टि से), अपनी अनूठी भौगोलिक स्थिति के कारण देश की सबसे गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना करता है — राज्य का लगभग 60% भूभाग थार मरुस्थल के अंतर्गत आता है, जो इसे विश्व के सर्वाधिक घनी आबादी वाले मरुस्थलों में से एक बनाता है।
🖼️ राजस्थान का थार मरुस्थल — रेत के धोरे व वनस्पति रेखा साथ-साथ, जो मरुस्थलीकरण व भूमि उपयोग परिवर्तन की गतिशील प्रक्रिया दर्शाते हैं

जल संकट
राजस्थान भारत का सर्वाधिक जल-न्यून (Water Scarce) राज्य है — यहां देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 10.4% भाग है, परंतु देश के कुल जल संसाधनों का मात्र 1.16% ही उपलब्ध है। भूजल का अत्यधिक दोहन (विशेषकर सिंचाई हेतु) राज्य के कई जिलों में भूजल स्तर को खतरनाक रूप से नीचे ले गया है।
वायु प्रदूषण
जयपुर, जोधपुर, कोटा जैसे राजस्थान के प्रमुख शहर भी वाहन उत्सर्जन, निर्माण गतिविधियों व औद्योगिक प्रदूषण से प्रभावित हैं — विशेषकर सर्दियों में वायु गुणवत्ता में गिरावट देखी जाती है। इसके साथ ही मरुस्थलीय क्षेत्रों में प्राकृतिक धूल भरी आंधियां (Dust Storms) भी एक अतिरिक्त चुनौती हैं।
◆ थार मरुस्थल 60% भूभाग ◆ भूमि क्षरण में कमी ◆ मरुस्थलीकरण संवेदनशीलता ◆ हवा का कटाव ◆ जल-न्यून राज्य ◆ भूजल दोहन ◆ धूल भरी आंधियां
इन गंभीर चुनौतियों के बावजूद, राजस्थान ने सदियों पुराने पारंपरिक ज्ञान व आधुनिक तकनीक के संयोजन से कई प्रभावी पर्यावरण संरक्षण मॉडल विकसित किए हैं, जो राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सराहे जाते हैं।
पारंपरिक जल-संरक्षण प्रणालियां
आधुनिक संरक्षण पहल
💡 अरवरी नदी का पुनर्जन्म — एक प्रेरणादायक उदाहरण: अलवर जिले की अरवरी नदी, जो दशकों तक सूखी रह चुकी थी, तरुण भारत संघ द्वारा निर्मित सैकड़ों जोहड़ों की मदद से 1990 के दशक में पुनः बहने लगी। इस सफलता ने न केवल स्थानीय कृषि व पेयजल आपूर्ति में सुधार किया, बल्कि विश्व भर में समुदाय-आधारित जल-संरक्षण के एक आदर्श मॉडल के रूप में मान्यता प्राप्त की। राजेंद्र सिंह को इसी कार्य के लिए 2001 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार व 2015 में स्टॉकहोम जल पुरस्कार (जल क्षेत्र का 'नोबेल पुरस्कार' माना जाने वाला सम्मान) प्रदान किया गया।
राजस्थान की पर्यावरणीय चुनौतियां व समाधान, दोनों RAS परीक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं — उत्तर लेखन में जोहड़/ओरण जैसे पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक अवधारणाओं (जैसे जल चक्र, मरुस्थलीकरण) से जोड़कर प्रस्तुत करना उत्तर की गुणवत्ता बढ़ाता है — यह दर्शाता है कि राजस्थान का पारंपरिक ज्ञान आज की वैश्विक पर्यावरणीय चुनौतियों के लिए भी प्रासंगिक समाधान प्रदान कर सकता है।
◆ जोहड़ ◆ राजेंद्र सिंह ◆ तरुण भारत संघ ◆ अरवरी नदी ◆ ओरण ◆ अरावली हरित दीवार ◆ भड़ला सौर पार्क ◆ मरु विकास कार्यक्रम
• पारिस्थितिकी तंत्र जैविक व अजैविक घटकों की परस्पर अंतःक्रिया से बनता है; ऊर्जा खाद्य श्रृंखला/जाल में एक दिशा में प्रवाहित होती है (10% नियम), जबकि पोषक तत्व चक्रीय रूप से पुनः उपयोग होते हैं (कार्बन, नाइट्रोजन, जल चक्र)। • ग्रीनहाउस प्रभाव एक स्वाभाविक व जीवन-रक्षक प्रक्रिया है, परंतु मानवजनित अतिरिक्त ग्रीनहाउस गैसों (CO₂, मीथेन, N₂O) ने वैश्विक तापन व जलवायु परिवर्तन को जन्म दिया है, जिसका असर मानसून, हिमनद व चरम मौसमी घटनाओं पर स्पष्ट दिखता है। • वायु, जल व मृदा प्रदूषण पारिस्थितिकी तंत्र के तीनों प्रमुख घटकों को प्रभावित करते हैं — यूट्रोफिकेशन जैसी घटनाएं दर्शाती हैं कि एक असंतुलन पूरी खाद्य शृंखला को प्रभावित कर सकता है। • EIA किसी विकास परियोजना को अनुमति देने से पहले पर्यावरणीय प्रभाव का वैज्ञानिक मूल्यांकन है (स्क्रीनिंग → स्कोपिंग → सार्वजनिक परामर्श → अनुमोदन); भारत में 2025 में इसे और सुदृढ़ किया गया (Environment Audit Rules)। • भोपाल गैस त्रासदी (1984) के बाद बना पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 भारत के पर्यावरण कानूनी ढांचे का आधार-स्तंभ है; NGT पर्यावरणीय विवादों के त्वरित निपटारे हेतु विशेष न्यायाधिकरण है। • पेरिस समझौता (2015) वैश्विक तापन को 1.5-2°C तक सीमित रखने का लक्ष्य रखता है; COP30 (बेलेम, 2025) में भारत ने 50% गैर-जीवाश्म ऊर्जा लक्ष्य समय से पहले हासिल करने की घोषणा की। • मरुस्थलीकरण भूमि की उत्पादक क्षमता के क्रमिक क्षरण की प्रक्रिया है; भारत का लगभग 30% भूभाग इससे प्रभावित है, जिसमें राजस्थान सबसे संवेदनशील राज्यों में शामिल है। • राजस्थान का 60% भूभाग थार मरुस्थल के अंतर्गत है; भूमि क्षरण में हाल में कमी आई है, फिर भी लगभग 39% भूभाग मरुस्थलीकरण के प्रति संवेदनशील बना हुआ है, तथा राज्य जल-संकट व वायु प्रदूषण से भी जूझ रहा है। • जोहड़, बावड़ी, टांका व ओरण जैसी पारंपरिक राजस्थानी जल-संरक्षण प्रणालियां आधुनिक पर्यावरणीय चुनौतियों के प्रभावी समाधान सिद्ध हुई हैं — अरवरी नदी का पुनर्जन्म इसका प्रेरणादायक उदाहरण है। • अरावली हरित दीवार परियोजना व भड़ला सौर पार्क जैसी आधुनिक पहलें राजस्थान को पर्यावरण संरक्षण व स्वच्छ ऊर्जा दोनों में अग्रणी राज्य बना रही हैं।