टीका (Vaccine) एक ऐसा जैविक पदार्थ है जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को किसी विशेष रोगजनक (जीवाणु/विषाणु) को पहचानने व उससे लड़ने के लिए 'प्रशिक्षित' करता है — बिना वास्तव में उस रोग से पीड़ित हुए। एडवर्ड जेनर के 1796 के ऐतिहासिक प्रयोग (हूक स्टोरी में वर्णित) के बाद टीकाकरण विज्ञान ने एक लंबा सफर तय किया है — शब्द 'वैक्सीन' (Vaccine) स्वयं लैटिन शब्द 'vacca' (गाय) से बना है, जो जेनर के गाय-आधारित प्रयोग की याद में रखा गया।
🖼️ टीकाकरण से पहले व बाद में संक्रामक रोगों (चेचक, पोलियो, खसरा) के मामलों में नाटकीय गिरावट — ऐतिहासिक आंकड़े

| वर्ष | वैज्ञानिक/घटना | योगदान |
|---|---|---|
| 1796 | एडवर्ड जेनर | विश्व का पहला टीका — चेचक (Smallpox) के विरुद्ध |
| 1885 | लुई पास्चर | रेबीज़ (Rabies) का पहला टीका |
| 1955 | जोनास साल्क | निष्क्रिय पोलियो टीका (IPV) |
| 1963 | साबिन | मुख मार्ग से दी जाने वाली पोलियो टीका (OPV) |
| 1980 | WHO | चेचक का वैश्विक उन्मूलन घोषित — प्रथम पूर्णतः उन्मूलित मानव रोग |
| 2020 | कई वैज्ञानिक दल | कोविड-19 mRNA टीके — रिकॉर्ड 11 महीनों में विकसित |
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार टीकाकरण प्रतिवर्ष विश्व भर में लगभग 35-40 लाख मौतों को रोकता है, जिससे यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के इतिहास का सबसे प्रभावी हस्तक्षेप माना जाता है। चेचक (1980 में उन्मूलित) के बाद अब पोलियो भी वैश्विक उन्मूलन के बेहद करीब है।
◆ टीका/वैक्सीन ◆ एडवर्ड जेनर ◆ चेचक ◆ लुई पास्चर ◆ जोनास साल्क ◆ पोलियो उन्मूलन ◆ WHO
टीकों को उनके निर्माण की विधि के आधार पर कई श्रेणियों में बांटा जाता है। परंपरागत टीके मुख्यतः चार प्रकार के होते हैं, जो दशकों से प्रयोग में हैं और आज भी अनेक रोगों से बचाव में उपयोगी हैं।
| टीके का प्रकार | सिद्धांत | उदाहरण |
|---|---|---|
| निष्क्रिय टीका (Inactivated) | ऊष्मा/रसायन से मारा गया पूर्ण रोगजनक; सुरक्षित परंतु प्रतिरक्षा-प्रतिक्रिया कमजोर, बूस्टर डोज़ जरूरी | कोवैक्सिन, IPV (पोलियो) |
| क्षीणित जीवित टीका (Live Attenuated) | कमजोर किया गया परंतु जीवित रोगजनक; प्रबल व दीर्घकालिक प्रतिरक्षा | MMR (खसरा-गलसुआ-रूबेला), BCG, OPV |
| सबयूनिट टीका (Subunit) | रोगजनक का केवल एक भाग (जैसे सतही प्रोटीन); अत्यंत सुरक्षित | हिपेटाइटिस-B टीका (रीकॉम्बिनेंट DNA आधारित) |
| टॉक्सॉइड टीका (Toxoid) | रोगजनक द्वारा बनाए गए विष (टॉक्सिन) का निष्क्रिय रूप | टिटनेस व डिप्थीरिया टीके |
💡 BCG टीका — भारत में जन्म के तुरंत बाद क्यों?: बैसिल कैलमेट-गुएरां (BCG) टीका क्षय रोग (Tuberculosis) से सुरक्षा हेतु एक क्षीणित जीवित टीका है, जो भारत में जन्म के तुरंत बाद ही सभी नवजातों को दिया जाता है, क्योंकि भारत में क्षय रोग का बोझ अत्यधिक है (देखें अध्याय-08)। यह विशेषकर बच्चों में गंभीर व घातक रूपों (जैसे तपेदिक मेनिन्जाइटिस) से सुरक्षा प्रदान करता है।
◆ निष्क्रिय टीका ◆ क्षीणित जीवित टीका ◆ सबयूनिट टीका ◆ टॉक्सॉइड टीका ◆ BCG ◆ MMR ◆ IPV/OPV
वेक्टर आधारित टीके (Viral Vector Vaccines) एक अपेक्षाकृत नई तकनीक हैं, जिसमें एक हानिरहित वायरस (जैसे चिंपैंजी को संक्रमित करने वाला एडेनोवायरस, जो मनुष्यों में रोग नहीं फैलाता) को 'वाहक' (वेक्टर) के रूप में उपयोग किया जाता है। इस वेक्टर वायरस के DNA में लक्ष्य रोगजनक (जैसे कोविड-19 के स्पाइक प्रोटीन) का जीन डाल दिया जाता है। जब यह वेक्टर वायरस शरीर में प्रवेश करता है, तो वह कोशिकाओं को उस स्पाइक प्रोटीन को बनाने का 'निर्देश' दे देता है, जिसके विरुद्ध शरीर प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया विकसित कर लेता है — असली रोगजनक के बिना ही।
भारत में वेक्टर आधारित टीका — कोविशील्ड
भारत में सबसे व्यापक रूप से उपयोग किया गया कोविड-19 टीका 'कोविशील्ड' (Covishield) एक वेक्टर आधारित टीका था, जिसे ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय व एस्ट्राज़ेनेका कंपनी ने विकसित किया तथा भारत में सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (पुणे) ने बड़े पैमाने पर उत्पादित किया — भारत विश्व का सबसे बड़ा टीका उत्पादक देश होने के कारण, इस महामारी के दौरान 'विश्व की फार्मेसी' कहलाया।
| 💉 वेक्टर आधारित टीके | 🧬 mRNA टीके (अगले टॉपिक में विस्तार से) |
|---|---|
| ◆ हानिरहित वायरस को वाहक (वेक्टर) के रूप में उपयोग ◆ शरीर की कोशिकाएं ही एंटीजन प्रोटीन बनाती हैं ◆ उदाहरण: कोविशील्ड (AstraZeneca), स्पुतनिक-V, जॉनसन एंड जॉनसन | ◆ वायरस के बजाय सीधे mRNA अणु का उपयोग ◆ लिपिड नैनोकण (Lipid Nanoparticle) में पैक करके शरीर में पहुंचाया जाता है ◆ उदाहरण: फाइज़र-बायोएनटेक, मॉडर्ना |
◆ वेक्टर आधारित टीका ◆ एडेनोवायरस वेक्टर ◆ स्पाइक प्रोटीन ◆ कोविशील्ड ◆ सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ◆ एस्ट्राज़ेनेका
mRNA (मैसेंजर RNA / संदेशवाहक RNA) कोशिका जीव विज्ञान का एक मूल अणु है, जो केंद्रक में स्थित DNA से 'निर्देश' प्रतिलिपि (copy) करके कोशिका द्रव्य में स्थित राइबोसोम तक ले जाता है, जहां उन निर्देशों के अनुसार प्रोटीन का निर्माण होता है — यही है कोशिका का मूल 'प्रोटीन-निर्माण तंत्र' (देखें अध्याय-01)। mRNA टीके की मूल सूझ अत्यंत सरल परंतु क्रांतिकारी थी — यदि शरीर की अपनी कोशिकाओं को ही सीधे किसी वायरस के हानिरहित प्रोटीन (जैसे स्पाइक प्रोटीन) के 'निर्देश' (mRNA) दे दिए जाएं, तो कोशिकाएं स्वयं वह प्रोटीन बना लेंगी, और शरीर उसके विरुद्ध प्रतिरक्षा विकसित कर लेगा — बिना किसी जीवित/निष्क्रिय वायरस को शरीर में डाले।
📐 mRNA टीके की कार्यप्रणाली — सूत्र/प्रक्रिया: चरण 1: प्रयोगशाला में वांछित प्रोटीन (जैसे वायरस स्पाइक प्रोटीन) का mRNA संश्लेषित किया जाता है चरण 2: इस नाजुक mRNA अणु को लिपिड नैनोकण (Lipid Nanoparticle) के सुरक्षा कवच में पैक किया जाता है चरण 3: टीके के इंजेक्शन से यह mRNA शरीर की कोशिकाओं में प्रवेश करता है चरण 4: कोशिका का राइबोसोम इस mRNA को 'पढ़कर' वह विशेष प्रोटीन बनाता है चरण 5: कोशिका सतह पर यह प्रोटीन प्रस्तुत होता है, जिसे प्रतिरक्षा तंत्र पहचानता है चरण 6: शरीर एंटीबॉडी व स्मृति कोशिकाएं (Memory Cells) बनाता है — भविष्य में असली वायरस से सुरक्षा चरण 7: कुछ ही दिनों में वह कृत्रिम mRNA स्वाभाविक रूप से नष्ट हो जाता है — यह मानव DNA में कभी नहीं जुड़ता
एक आम भ्रांति यह है कि mRNA टीके मानव DNA को बदल देते हैं — यह वैज्ञानिक रूप से गलत है। mRNA कभी भी कोशिका के केंद्रक (जहां DNA रहता है) में प्रवेश नहीं करता, वह केवल कोशिका द्रव्य में रहकर अपना कार्य करता है और कुछ दिनों में स्वयं विघटित हो जाता है। यह प्रक्रिया शरीर की अपनी स्वाभाविक कोशिकीय प्रक्रिया (प्रोटीन संश्लेषण) का ही उपयोग करती है।
◆ mRNA ◆ राइबोसोम ◆ लिपिड नैनोकण ◆ स्पाइक प्रोटीन ◆ स्मृति कोशिकाएं ◆ प्रोटीन संश्लेषण
दिसंबर 2019 में जब चीन के वुहान शहर से एक नए कोरोनावायरस (SARS-CoV-2) के फैलने की खबर आई, तो विश्व भर के वैज्ञानिकों ने रिकॉर्ड समय में टीका विकसित करने की होड़ शुरू की। पारंपरिक टीका विकास में सामान्यतः 10-15 वर्ष लगते हैं, परंतु फाइज़र-बायोएनटेक व मॉडर्ना कंपनियों ने mRNA तकनीक की तीव्रता व लचीलेपन का उपयोग करते हुए मात्र 11 महीनों में सुरक्षित व प्रभावी टीके विकसित कर लिए — यह चिकित्सा इतिहास की सबसे तेज टीका विकास प्रक्रिया थी।
🖼️ mRNA टीका शरीर में कैसे प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया (T-कोशिका सक्रियण) उत्पन्न करता है

mRNA तकनीक की भविष्य की संभावनाएं
💡 mRNA तकनीक की खोज — नोबेल पुरस्कार 2023: कैटालिन कारिको (Katalin Karikó) व ड्रू वाइसमैन (Drew Weissman) को 2023 में शरीर विज्ञान/चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया, उनकी उस मौलिक खोज के लिए जिसने mRNA अणु को शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली से 'छिपाकर' सुरक्षित रूप से कोशिकाओं तक पहुंचाना संभव बनाया — यही खोज कोविड-19 mRNA टीकों की नींव बनी।
◆ SARS-CoV-2 ◆ फाइज़र-बायोएनटेक ◆ मॉडर्ना ◆ कैटालिन कारिको ◆ ड्रू वाइसमैन ◆ नोबेल पुरस्कार 2023 ◆ व्यक्तिगत कैंसर टीके
कोविड-19 महामारी के दौरान भारत ने न केवल विश्व की सबसे बड़ी टीकाकरण मुहिम चलाई, बल्कि कई स्वदेशी टीके भी विकसित किए — जो भारत की वैज्ञानिक व औद्योगिक क्षमता का प्रमाण हैं।
| टीका | निर्माता | विशेषता |
|---|---|---|
| कोवैक्सिन (Covaxin) | भारत बायोटेक (हैदराबाद) व ICMR | भारत का पहला स्वदेशी टीका; निष्क्रिय विषाणु आधारित |
| कॉर्बेवैक्स (Corbevax) | बायोलॉजिकल-ई (हैदराबाद) | सबयूनिट प्रोटीन आधारित; भारत का पहला स्वदेशी सबयूनिट कोविड टीका |
| ZyCoV-D | ज़ाइडस कैडिला | विश्व का पहला DNA आधारित कोविड टीका; सुई-रहित (needle-free) इंजेक्टर से दिया गया |
| जेमकोवैक-19 (Gemcovac-19) | जेनोवा बायोफार्मास्युटिकल्स (पुणे) | भारत का पहला स्वदेशी mRNA टीका |
भारत की वैक्सीन कूटनीति (Vaccine Diplomacy): 'वैक्सीन मैत्री' (Vaccine Maitri) पहल के अंतर्गत भारत ने कोविड-19 महामारी के दौरान 100 से अधिक देशों को टीके निर्यात व अनुदान के रूप में उपलब्ध कराए — इससे भारत की वैश्विक छवि 'विश्व की फार्मेसी' के रूप में और सुदृढ़ हुई। भारत विश्व के कुल टीका उत्पादन का लगभग 60% हिस्सा उत्पन्न करता है।
◆ कोवैक्सिन ◆ कॉर्बेवैक्स ◆ ZyCoV-D ◆ Gemcovac-19 ◆ भारत बायोटेक ◆ वैक्सीन मैत्री ◆ विश्व की फार्मेसी
कल्पना कीजिए कि DNA एक विशाल किताब है, और वैज्ञानिकों के पास अब ऐसी 'आणविक कैंची' आ गई है जो इस किताब के किसी भी एक निश्चित शब्द को अत्यंत सटीकता से काटकर, वहां सही शब्द चिपका सकती है — यही है CRISPR-Cas9 तकनीक। इसकी खोज की कहानी भी दिलचस्प है — वैज्ञानिकों ने सबसे पहले साधारण जीवाणुओं (जैसे Streptococcus pyogenes) में एक अजीब दोहराव वाला DNA पैटर्न देखा, जिसे नाम दिया गया CRISPR (Clustered Regularly Interspaced Short Palindromic Repeats)। बाद में पता चला कि यह जीवाणुओं की अपनी 'प्रतिरक्षा प्रणाली' है — जब कोई विषाणु (बैक्टीरियोफेज) जीवाणु पर हमला करता है, तो जीवाणु उस विषाणु के DNA का एक टुकड़ा अपने CRISPR क्षेत्र में 'याद' के रूप में जमा कर लेता है, ताकि भविष्य में उसी विषाणु को तुरंत पहचानकर Cas प्रोटीन (आणविक कैंची) की मदद से नष्ट कर सके।
जेनिफर डाउडना (Jennifer Doudna, अमेरिका) एवं एमानुएल शारपेंटियर (Emmanuelle Charpentier, फ्रांस) को 2020 में रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया, उनके इस खोज के लिए कि जीवाणुओं की इस प्राकृतिक प्रतिरक्षा प्रणाली को किसी भी जीव के DNA को सटीकता से 'संपादित' (edit) करने के एक सार्वभौमिक औजार में कैसे बदला जा सकता है — यह जैव-प्रौद्योगिकी के इतिहास की सबसे बड़ी खोजों में से एक मानी जाती है।
| ✂️ पुरानी जीन एडिटिंग तकनीकें | 🎯 CRISPR-Cas9 |
|---|---|
| ◆ जटिल, महंगी एवं समय-साध्य (जैसे ZFN, TALEN) ◆ हर नए लक्ष्य जीन के लिए नया प्रोटीन डिज़ाइन करना पड़ता था ◆ प्रयोगशाला में उपयोग सीमित विशेषज्ञों तक | ◆ सरल, सस्ती एवं तीव्र ◆ केवल एक छोटा RNA अणु (गाइड RNA) बदलकर नया लक्ष्य जीन चुना जा सकता है ◆ विश्व भर की हजारों प्रयोगशालाओं में सुलभ — 'जीन एडिटिंग का लोकतंत्रीकरण' |
◆ CRISPR ◆ Streptococcus pyogenes ◆ Cas9 ◆ जेनिफर डाउडना ◆ एमानुएल शारपेंटियर ◆ नोबेल पुरस्कार 2020 ◆ जीन एडिटिंग
CRISPR-Cas9 प्रणाली मूलतः दो घटकों से मिलकर बनी है — एक 'गाइड RNA' (guide RNA — gRNA), जो GPS की तरह ठीक उस स्थान तक पहुंचाता है जहां कर्तन (cutting) करना है, तथा Cas9 प्रोटीन, जो वास्तविक 'आणविक कैंची' का कार्य करता है।
🖼️ CRISPR-Cas9 तंत्र — गाइड RNA (crRNA + tracrRNA मिलकर sgRNA) एवं Cas9 प्रोटीन का प्लाज्मिड में संयोजन

📐 CRISPR-Cas9 जीन संपादन की प्रक्रिया — सूत्र/प्रक्रिया: चरण 1: वैज्ञानिक एक 'गाइड RNA' डिज़ाइन करते हैं, जो लक्ष्य जीन के DNA अनुक्रम से ठीक मेल खाता है चरण 2: गाइड RNA व Cas9 प्रोटीन मिलकर कोशिका में लक्ष्य DNA तक पहुंचते हैं चरण 3: गाइड RNA सही स्थान से जुड़ जाता है (आधार-युग्मन द्वारा) चरण 4: Cas9 प्रोटीन उस सटीक स्थान पर DNA की दोनों रज्जुकों को काट देता है चरण 5: कोशिका की अपनी प्राकृतिक मरम्मत प्रणाली सक्रिय होती है — या तो जीन निष्क्रिय हो जाता है (Knockout), या वैज्ञानिक द्वारा दिया गया नया DNA टुकड़ा वहां जुड़ जाता है (Knock-in/सुधार)
PAM अनुक्रम — सुरक्षा जांच बिंदु
Cas9 केवल तभी DNA काटता है जब लक्ष्य स्थल के ठीक बगल में एक विशेष छोटा अनुक्रम मौजूद हो, जिसे PAM (Protospacer Adjacent Motif) कहते हैं — यह एक प्रकार की 'सुरक्षा जांच' की तरह कार्य करता है, जो गलत जगह कटने से रोकने में मदद करता है।
◆ गाइड RNA (gRNA) ◆ Cas9 प्रोटीन ◆ आधार-युग्मन ◆ Knockout ◆ Knock-in ◆ PAM अनुक्रम ◆ DNA मरम्मत तंत्र
दशकों के प्रयोगशाला अनुसंधान के बाद, दिसंबर 2023 में CRISPR तकनीक ने चिकित्सा इतिहास में एक नया अध्याय लिखा — जब विश्व की पहली CRISPR-आधारित चिकित्सा को आधिकारिक अनुमोदन मिला।
कैस्जेवी (Casgevy, वैज्ञानिक नाम exagamglogene autotemcel) को नवंबर 2023 में ब्रिटेन (MHRA) व दिसंबर 2023 में अमेरिका (FDA) ने सिकल सेल एनीमिया व थैलेसीमिया (देखें अध्याय-08 व अध्याय-10) के उपचार हेतु अनुमोदित किया — यह विश्व की पहली स्वीकृत CRISPR-आधारित चिकित्सा बनी।
📐 Casgevy चिकित्सा कैसे कार्य करती है — सूत्र/प्रक्रिया: चरण 1: रोगी की अपनी अस्थि मज्जा स्टेम कोशिकाएं शरीर से निकाली जाती हैं चरण 2: प्रयोगशाला में CRISPR-Cas9 द्वारा एक विशेष जीन (BCL11A) को संपादित किया जाता है चरण 3: यह संपादन कोशिकाओं को भ्रूणीय हीमोग्लोबिन (Fetal Hemoglobin) पुनः बनाने के लिए 'पुनः सक्रिय' करता है, जो सामान्यतः जन्म के बाद बंद हो जाता है चरण 4: यह भ्रूणीय हीमोग्लोबिन दोषपूर्ण वयस्क हीमोग्लोबिन की कमी की भरपाई कर देता है चरण 5: संपादित कोशिकाएं वापस रोगी के शरीर में प्रत्यारोपित की जाती हैं
भारत में CRISPR चिकित्सा — BIRSA 101
भारत ने भी अपनी स्वदेशी CRISPR-आधारित सिकल सेल एनीमिया चिकित्सा 'BIRSA 101' विकसित की है, जिसका नामकरण आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी भगवान बिरसा मुंडा के सम्मान में किया गया — यह भारत के जनजातीय क्षेत्रों में सिकल सेल एनीमिया के उच्च प्रसार को देखते हुए विशेष महत्व रखता है। छत्तीसगढ़ में इसके मानव नैदानिक परीक्षण (Clinical Trial) की योजना है, ताकि यह जीवनरक्षक चिकित्सा भारतीय रोगियों के लिए भी किफायती व सुलभ बनाई जा सके — क्योंकि वर्तमान में उपलब्ध विदेशी CRISPR चिकित्सा की लागत करोड़ों रुपयों में है, जो अधिकांश भारतीय रोगियों की पहुंच से बाहर है।
◆ Casgevy ◆ exagamglogene autotemcel ◆ BCL11A जीन ◆ भ्रूणीय हीमोग्लोबिन ◆ BIRSA 101 ◆ भगवान बिरसा मुंडा ◆ छत्तीसगढ़ नैदानिक परीक्षण
CRISPR तकनीक की उपयोगिता चिकित्सा तक ही सीमित नहीं है — यह कृषि, निदान (डायग्नोस्टिक्स) व मौलिक अनुसंधान के क्षेत्र में भी क्रांति ला रही है।
2018 में चीनी वैज्ञानिक हे जियानकुई (He Jiankui) ने गुप्त रूप से CRISPR तकनीक का उपयोग करके मानव भ्रूण के जीन संपादित किए और जुड़वां बच्चियों को जन्म दिया — यह विश्व की पहली 'जर्मलाइन' (देखें अध्याय-10) मानव जीन-संपादन घटना थी, जिसे वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय ने घोर अनैतिक करार दिया, क्योंकि इसमें न तो पर्याप्त सुरक्षा-परीक्षण था, न ही उचित नैतिक अनुमोदन। इस घटना ने मानव भ्रूण जीन-संपादन पर वैश्विक नैतिक बहस को और तीव्र कर दिया तथा कड़े अंतर्राष्ट्रीय दिशा-निर्देशों की मांग को बल दिया।
◆ सिसजेनिक फसल-सुधार ◆ नॉन-ब्राउनिंग मशरूम ◆ SHERLOCK/DETECTR ◆ जीन ड्राइव ◆ हे जियानकुई ◆ CRISPR बेबी विवाद
जब कोई अंग रोग या दुर्घटना के कारण पूर्णतः कार्य करना बंद कर दे, और प्राकृतिक प्रत्यारोपण (Transplant) हेतु दाता अंग उपलब्ध न हो (जो एक वैश्विक समस्या है — भारत सहित अधिकांश देशों में अंग-दान की तुलना में प्रतीक्षा-सूची कहीं अधिक लंबी है), तो कृत्रिम अंग (Artificial Organs) जीवन बचाने का एक महत्वपूर्ण विकल्प बनते हैं।
🖼️ कार्डियोवेस्ट कुल कृत्रिम हृदय (Total Artificial Heart) — गंभीर हृदय-विफलता के रोगियों में अस्थायी रूप से प्रत्यारोपित किया जाने वाला यांत्रिक उपकरण

| कृत्रिम अंग | कार्य/उपयोग |
|---|---|
| कुल कृत्रिम हृदय (Total Artificial Heart) | गंभीर हृदय-विफलता में, प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा के दौरान अस्थायी सहारा |
| वेंट्रिकुलर सहायक उपकरण (VAD) | कमजोर हृदय की पंपिंग क्षमता को यांत्रिक रूप से सहायता देना |
| कृत्रिम किडनी (डायलिसिस मशीन) | वृक्क-विफलता में रक्त से अपशिष्ट पदार्थ छानने का कार्य (देखें अध्याय-05) |
| कृत्रिम अग्न्याशय (Artificial Pancreas) | टाइप-1 मधुमेह में रक्त शर्करा स्तर के अनुसार स्वचालित इंसुलिन आपूर्ति |
| कॉक्लियर इम्प्लांट | गंभीर बहरेपन में ध्वनि को विद्युत संकेतों में बदलकर श्रवण तंत्रिका को उत्तेजित करना |
💡 जार्विक-7 — कृत्रिम हृदय का प्रारंभिक इतिहास: 1982 में डॉ. रॉबर्ट जार्विक द्वारा डिज़ाइन किया गया 'जार्विक-7' विश्व का पहला स्थायी रूप से प्रत्यारोपित कुल कृत्रिम हृदय था, जिसे बार्नी क्लार्क नामक रोगी में प्रत्यारोपित किया गया, जो इसके साथ 112 दिनों तक जीवित रहे। यह एक ऐतिहासिक चिकित्सा उपलब्धि थी, जिसने भविष्य के सभी कृत्रिम हृदय उपकरणों की नींव रखी।
◆ कृत्रिम अंग ◆ कुल कृत्रिम हृदय ◆ वेंट्रिकुलर सहायक उपकरण ◆ कृत्रिम अग्न्याशय ◆ कॉक्लियर इम्प्लांट ◆ जार्विक-7
यांत्रिक कृत्रिम अंगों से आगे बढ़कर, वैज्ञानिक अब ऐसी तकनीकों पर कार्य कर रहे हैं जो वास्तविक, जैविक रूप से कार्यशील मानव ऊतकों व अंगों को प्रयोगशाला में ही 'उगाने' या 'प्रिंट' करने में सक्षम हों।
3D बायोप्रिंटिंग (3D Bioprinting)
3D बायोप्रिंटिंग एक ऐसी तकनीक है, जिसमें जीवित कोशिकाओं से बनी विशेष 'जैव-स्याही' (Bioink) का उपयोग करके, परत-दर-परत, त्रि-आयामी जैविक ऊतक संरचनाएं बनाई जाती हैं — ठीक वैसे ही जैसे सामान्य 3D प्रिंटर प्लास्टिक की परतें जमाकर कोई वस्तु बनाता है, परंतु यहां 'स्याही' जीवित कोशिकाएं होती हैं। 2025 तक वैज्ञानिक रक्त वाहिकाओं के जटिल नेटवर्क सहित छोटे ऊतक-खंड (जैसे हृदय ऊतक) प्रिंट करने में सफल हो चुके हैं — यह किसी भी बड़े अंग (जैसे संपूर्ण किडनी) के लिए आवश्यक रक्त-आपूर्ति तंत्र बनाने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि है। वैश्विक 3D बायोप्रिंटिंग बाजार 2025 में लगभग 3 बिलियन डॉलर का आंका गया है, जिसके अगले कुछ वर्षों में दोगुने से भी अधिक बढ़ने का अनुमान है।
जेनोट्रांसप्लांटेशन (Xenotransplantation)
जेनोट्रांसप्लांटेशन का अर्थ है एक प्रजाति के अंग को दूसरी प्रजाति में प्रत्यारोपित करना — विशेषकर आनुवंशिक रूप से रूपांतरित सुअर (Sus scrofa domesticus) के अंगों (किडनी, हृदय, यकृत) का मनुष्यों में प्रत्यारोपण, क्योंकि सुअर के अंगों का आकार मानव अंगों से काफी मिलता-जुलता है। CRISPR तकनीक (देखें टॉपिक-7 से 9) का उपयोग करके सुअर के जीन में ऐसे परिवर्तन किए जाते हैं जो मानव प्रतिरक्षा तंत्र द्वारा अस्वीकृति (Rejection) के जोखिम को कम करते हैं। 2025 में अमेरिका में एक अंतिम-चरण वृक्क-रोग रोगी में आनुवंशिक रूप से रूपांतरित सुअर की किडनी का सफल प्रत्यारोपण किया गया — यह जेनोट्रांसप्लांटेशन के क्षेत्र में निरंतर प्रगति को दर्शाता है।
विश्व भर में, तथा भारत में भी, अंग-प्रत्यारोपण हेतु उपलब्ध दाता अंगों की तुलना में आवश्यकता कहीं अधिक है — हजारों रोगी वर्षों तक प्रतीक्षा-सूची में रहते हैं, और कई की प्रतीक्षा के दौरान ही मृत्यु हो जाती है। यही कारण है कि 3D बायोप्रिंटिंग व जेनोट्रांसप्लांटेशन जैसी तकनीकों को भविष्य में इस वैश्विक संकट के संभावित समाधान के रूप में देखा जाता है।
◆ 3D बायोप्रिंटिंग ◆ जैव-स्याही (Bioink) ◆ जेनोट्रांसप्लांटेशन ◆ रूपांतरित सुअर अंग ◆ अंग प्रतीक्षा-सूची संकट
भारत भी इन चारों क्रांतिकारी तकनीकों (टीके, mRNA, CRISPR, कृत्रिम अंग) के अनुसंधान व अनुप्रयोग में सक्रिय रूप से आगे बढ़ रहा है — कई प्रमुख राष्ट्रीय संस्थान इस दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
Feluda टेस्ट — भारत की CRISPR डायग्नोस्टिक उपलब्धि: 'Feluda' (FNCAS9 Editor Linked Uniform Detection Assay) भारत की पहली CRISPR-आधारित कोविड-19 जांच तकनीक थी, जिसे CSIR की प्रयोगशालाओं व टाटा समूह ने मिलकर विकसित किया — यह पारंपरिक RT-PCR जांच जितनी ही सटीक, परंतु कहीं अधिक तीव्र व सस्ती थी। यह दर्शाता है कि भारत केवल तकनीक का उपयोगकर्ता ही नहीं, बल्कि नवीनतम जैव-प्रौद्योगिकी नवाचार का सृजनकर्ता भी बन रहा है।
◆ CSIR-IGIB ◆ Feluda टेस्ट ◆ राष्ट्रीय प्रतिरक्षाविज्ञान संस्थान ◆ AIIMS नेटवर्क ◆ DBT-BIRAC
राजस्थान भी इन नवीनतम चिकित्सा तकनीकों को अपने स्वास्थ्य ढांचे में सम्मिलित करने की दिशा में प्रयासरत है, विशेषकर उन्नत चिकित्सा संस्थानों व अनुसंधान केंद्रों के माध्यम से।
जैसे-जैसे टीके, mRNA, CRISPR व कृत्रिम अंग जैसी तकनीकें अधिक किफायती व सुलभ होती जाएंगी, राजस्थान जैसे राज्यों के लिए यह अवसर होगा कि वे अपनी सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली (देखें अध्याय-08) को इन नवीनतम प्रगतियों से जोड़ें — विशेषकर सिकल सेल एनीमिया जैसे रोगों के लिए, जो राजस्थान के जनजातीय क्षेत्रों (जैसे बांसवाड़ा, डूंगरपुर) में विशेष रूप से प्रचलित हैं, जहां भविष्य में किफायती CRISPR चिकित्सा (जैसे BIRSA 101) एक बड़ा परिवर्तन ला सकती है।
◆ AIIMS जोधपुर ◆ SMS चिकित्सा महाविद्यालय जयपुर ◆ कोल्ड-चेन व्यवस्था ◆ राजस्थान जैव-प्रौद्योगिकी विभाग ◆ बांसवाड़ा-डूंगरपुर सिकल सेल एनीमिया
• टीकाकरण 1796 में एडवर्ड जेनर के चेचक टीके से शुरू होकर आज WHO के अनुसार प्रतिवर्ष 35-40 लाख मौतें रोकता है; टीके निष्क्रिय, क्षीणित, सबयूनिट, टॉक्सॉइड, वेक्टर व mRNA प्रकार के होते हैं। • mRNA टीके शरीर की कोशिकाओं को ही वायरस प्रोटीन बनाने का 'निर्देश' देते हैं; कोविड-19 में फाइज़र व मॉडर्ना ने रिकॉर्ड 11 महीनों में टीके विकसित किए — इस खोज पर 2023 का नोबेल पुरस्कार मिला। • भारत ने कोवैक्सिन, कॉर्बेवैक्स, ZyCoV-D एवं Gemcovac-19 (पहला स्वदेशी mRNA टीका) विकसित किए तथा 'वैक्सीन मैत्री' के अंतर्गत 100+ देशों को टीके निर्यात किए। • CRISPR-Cas9 जीवाणुओं की प्राकृतिक प्रतिरक्षा प्रणाली से विकसित 'आणविक कैंची' है, जो गाइड RNA की सहायता से DNA के किसी भी स्थान को सटीकता से काट सकती है — इसकी खोज पर 2020 का नोबेल पुरस्कार मिला। • 2023 में Casgevy विश्व की पहली अनुमोदित CRISPR चिकित्सा बनी, जो सिकल सेल एनीमिया व थैलेसीमिया का उपचार करती है; भारत की स्वदेशी BIRSA 101 चिकित्सा इसी दिशा में एक किफायती विकल्प है। • CRISPR के अनुप्रयोग चिकित्सा से आगे कृषि (सिसजेनिक फसलें), रोग-निदान (SHERLOCK/DETECTR, भारत का Feluda टेस्ट) एवं जीन ड्राइव तक फैले हैं — साथ ही मानव भ्रूण जीन-संपादन को लेकर गंभीर नैतिक प्रश्न भी उठे हैं (2018 CRISPR बेबी विवाद)। • कृत्रिम अंग (कृत्रिम हृदय, VAD, डायलिसिस मशीन, कृत्रिम अग्न्याशय) दाता-अंग की कमी की समस्या का एक व्यावहारिक समाधान हैं; जार्विक-7 (1982) कृत्रिम हृदय का ऐतिहासिक मील का पत्थर था। • 3D बायोप्रिंटिंग व जेनोट्रांसप्लांटेशन (आनुवंशिक रूप से रूपांतरित सुअर अंग) भविष्य में अंग-प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा-सूची संकट को हल करने की दिशा में उभरती तकनीकें हैं — 2025 में सफल सुअर-किडनी प्रत्यारोपण इसका उदाहरण है। • भारत में CSIR-IGIB, AIIMS नेटवर्क व DBT-BIRAC इन नवीनतम तकनीकों के अनुसंधान व अनुप्रयोग में अग्रणी हैं; AIIMS जोधपुर व SMS जयपुर राजस्थान के प्रमुख केंद्र हैं। • राजस्थान के जनजातीय क्षेत्रों (बांसवाड़ा-डूंगरपुर) में सिकल सेल एनीमिया के उच्च प्रसार को देखते हुए, भविष्य की किफायती CRISPR चिकित्सा राज्य के लिए विशेष महत्व रखती है।